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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १९३४ )

बोधसागर

२६

कीट पतंगसे पूछे बाता । दीपक गिरे कौन सुख आता ॥ तेहि पतंग अस वचन सुनावो । तुमहि दीप ढिग चलि सुख पावो ॥ कीट तबहि दीपक नियराया । पुनि पतंग ढिग सो चलि आया ॥ आय पतंगसे वचन सुनाई । मैं कछु ज्योति स्वाद नहीं पाई ॥ तेहि पतंग बोला चिछाई । तैं किमि ज्योतिके सुखको पाई ॥ अरे मूढ संसारी कीडा । तोहि न व्यापी तन मन पीडा ॥ सुख पतंग आसिक सो जाना । दीपकमें जो धाय समाना ॥ तू तो फिरा देखिके आगी । जाने कहा मूढ दुरभागी ॥ शीश काटि निज करमें लीजै । ब्रह्मके सुखमें तब चित्त भीजै ॥ चले जक्त सब देखी देखा । सार असार करे को लेखा ॥ भेड़ा चाल सकल संसारा । नर पामरको यह व्यवहारा ॥ सबकोई कह यह मेरो धर्मा । मेरो गुरु कहा यह कर्मा ॥ सबते हमरो धर्म बडारा । सो बुधवंत जो करे विचारा ॥ चले अंधके पीछे अंधा । बिना विचार करे सोई धंधा ॥ यक शृगाल तेहि औसर बोला । ततछन तासुजाति सुह खोला ॥ वायस एक जो बोल उचारी । सबहि जातिगण तबहि पुकारी ॥ कीटके पीछे कीट जो चाला । तैसे जक्त धर्म प्रतिपाला ॥ यक धोबी यक गदहा राखा । सोढर नाम तासुको भाखा ॥ घाटके ऊपर धोबी गयऊ । ताहि ठौर सोढर मरिगयऊ ॥ ताते धोबीको दुःख होई । सोढर सोढर कहिके रोई ॥ घाटके ऊपर धोबिन आई । रुदन करत धोबीको पाई ॥ पुनि धोबिन निजघर फिर आई । सोढर कहिके रुदन कराई ॥ राजाकी रानी तेहि बेरी । धोबी गृह पठयो निज चेरी ॥ रुदन करत धोबिनिहि निहारा । सोढर सोढर करे पुकारा ॥ चेरी पुनि तहैंते फिरि आई । सोऊ रुदन करे बिलखाई ॥

२७

जीवधर्मबोध

(१९३५)

बांदी विलपत देखा रानी । रुदन बिलाप सोऊ तब ठानी ॥ राजा जब निज महलमें आया । रुदन करत रानीको पाया ॥ रानी रोवै सोढर कहि ताहा । सुनि सो रुदन रोवै नरनाहा ॥ राजा रुदनकरन जब लागा । नग्र नारि नर धीरज त्यागा ॥ सकल नग्रमें परा खँभारा । नृप मंत्री तब तहँ पग धारा ॥ मंत्री नृपते बचन उचारी । कारन कहा रुदन भो भारी ॥ तब नरनाथ बचन अस कहेऊ । दुखी सकल सोढर मरि गएऊ ॥ सोढर कौन सो मन्त्री बूझा । तब नृप कहौ मोहि नहिं सूझा ॥ रानी को मैं रोवत देखा । कीन्हौ मैं पुनि सोई लेखा ॥ रानीते जब पूछा जाई । सोढर कौन सो देहु बताई ॥ रानी कहे न जाने सोढर । मैं रोई बांदीके औढर ॥ जब पूछै बांदीसे जाई । सोढर कौन कहा बतलाई ॥ बूषली बोले मैं नहिं जानी । धोबिन देखि रुदन मैं ठानी ॥ धोबिन कह मोर धोबी रोई । सो लखि सोग मोहिको होई ॥ धोबीसे जब पूछा जाई । सोढर गढ़ा नाम बताई ॥ ऐसेही अंधा संसारा । देखा देखी कर्म पसारा ॥ जिनके हृदये माह बिचारा । सो नहिं लीकलीक पग धारा ॥ दोहा-लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत ॥ तीन लीकमें नहिं चले, सूरा सन्त सपूत ॥

चौपाई

जगमें कतहुँ न तुर्क न हिंदू । सकल देखिये नाद अरु बिंदू ॥ जेते नाद बिंदु मय बंदा । सबही कर्मके फंदमें फंदा ॥ जैसो कर्म करे जो कोई । तैसोई फल पावै सोई ॥ कर्म कुरूप स्वरूप सँवारा । कर्महि ऊँच नीच गति डारा ॥ कर्महि दुःखसुख जीव भोगावै । कर्महि सकल योनि भरमावै ॥

( १९३६ )

बोधसागर

२८

अष्ट कर्म विधि जैन बखाना । बहुरि मिमांसा कर्मप्रधाना ॥ सत्यकवीर कहै पुनि ऐसे । सब जिव कर्म फन्दमें पैसे ॥

सत्यकवीर वचन-कर्मखंडकी रमैनी

कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चंद सूर परकाशा ॥ कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महि ते भये गौरि गणेशा ॥

सात वार पंद्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम कृष्ण औतारा । कर्महि कंस रावन संसारा ॥

सार्वी-कवीर कर्म रख सागरबंध्यौ, सौ योजन मरजाद ॥ बिन अक्षर कोइ ना छुटै, सो अक्षर अगम अगाध ॥

रमैनी

सो सागर भवसागर धारा । नहिं कछु सूझै वार न पारा ॥ तहँवा बावन अक्षर लेखा । कर्मरेख सबहिन पर देखा ॥

कर्मरेख बांधा सब कोई । खानी बानी देख बिलोई ॥

वेद कतेव कर्मही गाया । कर्महिको निह कर्म बताया ॥

सतगुरु मिले तो भेद बतावे । कर्म अकर्ममध्य देखलावे ॥

कर्मरेख तहँवा लगि राखा । जहँलगि वेद व्यास कछु भाषा ॥

सार्वी-कवीर कर्मफांस छूटे नहीं, केतो करे उपाय ॥

सतगुरु मिले तो ऊबरे, नातो परलय जाय ॥

कवीर बहु बंधनते बांधिया, एक विचारा जीव ॥

जीव विचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव ॥

रमैनी

सूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥

दुखिया होय रैन दिन रोवे । भोगी भोग करे सुख सोवे ॥

दुःख सुख भोग सोग समजाने । भली बुरी कछु मन नहिं आने ॥

भली बुरीको करे सो त्याग । निश्चै पावै पद वैराग ॥

२९

जीवधर्मबोध

(१९३७)

साखी-आसन साधे आपमें, आपा डारे खोय । कहैं कबीर सो योगी, सहजे निर्मल होय ॥

कुण्डलिया

मानुष है नहिं कोई सुवा, सुवा सो डंगर ढोर । चौरासी भर्मत फिरे, टूटै न कर्मकी डोर ॥ टूटै न कर्मकी डोर, भोर बुधि जहाँ तहैं भटके । लहे न ज्ञान अन्नप, रूप भवमें पुनि पटके ॥ पुनि पुनि पटके काल, कर्म बेरी पग भारी । वचन कह यक मृग चोट, जहां लख कोट शिकारी ॥

चौपाई

कृपा करे गुरु धनी दयाला । जीवहि खच लोक ले चाला ॥ ताकी कृपा योग जब होना । लगे मही तब कालको टोना ॥ कृपा योग जबलों नहिं लोई । कृपा कौनविधि तापर होई ॥

सत्यकबीर वचन

धर्मदास तोहि लाख दोहाई । सार शब्द बाहर नहिं जाई ॥ सारशब्द बाहर जो परि है । बिचलै पीढी हंस नहिं तरि है ॥ युगन युगन तुम सेवा कीनी । ता पीछे हम इहां पगदीनी ॥ कोटिन जन्म भक्ति जब कीन्हा । सारशब्द तबही पै चीन्हा ॥ अंकुरी जिव होय जो कोई । सारशब्द अधिकारी सोई ॥ सत्यकबीर प्रमाण बखाना । ऐसो कठिन है पद निर्वाना ॥ पै दुतिये विधि कह्यो बहोरी । जापर सदगुरु कृपा न थोरी ॥ धर्मदास प्रति ऐसे कहेऊ । मांगु जो कछु तेरो चित चहेऊ ॥ धर्मदास तब वचन उचारा । तारो मोहि सहित परिवारा ॥ पिता पितामह सरखा समेता । सबहि पारकर कृपानिकेता ॥

( १९३८ )

बोधसागर

३०

तेहि अवसर सतगुरु विहसाना । का मांगे कछु मांग न जाना ॥ तारो सकल सृष्टिको भाई । तुम तो आप रहे अरुगाई ॥ यामें नहिं कछु दोष तुम्हारा । कालपुरुष तुमरी मति मारा ॥ ऐसो समरथ सत्य कबीरा । पलमें सब क्रम कागज चीरा ॥ कोटिन जन्म जो परा भुलेषा । करे जो कृपा चुकावै लेखा ॥ जहँ तहँ देख आप सदगुरु है । नहिं कहँ असुर नहीं कहँ सुर है ॥ असुर भाव जब सुरको आया । ता छन ताको असुर बनाया ॥ सुरते असुर असुर सुर होई । नारिते पुरुष पुरुष तिय सोई ॥ नीचते ऊंच ऊंचते नीचा । उत्तम मध्यम योनिमें खींचा ॥ ताते देखो दृष्टि पसारी । सकलधर्म प्रभु आप बिहारी ॥ मेरे मतसों सब धर्मनमें । खेले खेल सकल कर्मनमें ॥ जो कोइ चीन्है लाल बिहारी । दुबिधा सकल दूरकरि डारी ॥

सत्यकबीर वचन

राम रहीम करीमा केशव हरि हजरतहैं सोई । गहना एकै दृढ है गहना दुतिया और न कोई ॥

चौपाई

सब धर्मनमें आपै खेले । एक दूसरेसे नहिं मेले ॥ भर्मत सारी सृष्टि भुलानी । होय चहुँदिश ऐंचातानी ॥ झूठ सांच जब लेख सविवेका । झूठको तज गहु सत्तको टेका ॥ यह संसार सकल भ्रम छाही । भ्रमकरि सर्व सत्य दरशाही ॥ एक अनेक अनेक भो एका । ज्ञानते होय सो एक अनेका ॥ यथा कांचके मंदिर माहीं । कोटिन मणि मानिक रहजाहीं ॥ झाड़ फतूस अनेकन टांगा । तामें यक भ्रम दीपक जागा ॥ भ्रम दीपक जब तहां प्रकासा । कोटिन दीप मंदिरहि भाषा ॥ यक प्रतिबिम्ब अनेकन देखो । वार न पार लेख कह लेखो ॥

३१

जीवधर्मबोध

( १९३९ )

यक भ्रम दीप जो दियो बुझाई । सकलो भास नाश है जाई ॥ ऐसे एकते भयौ अनेका । बहुरि अनेक एकही एका ॥ यहि विधिसकलजक्त यहलागा । जस भ्रम दीप कांचगृह जागा ॥ ज्ञान उदयते रहै न कोई । यथा नखतगण जलमें जोई ॥ जल सूखे नहीं दरसै तारे । कोई नहीं देखजात किहि द्वारे ॥ ऐसेहि सकल जक्त यह थापा । सबमें शोभित आपै आपा ॥ ब्रह्म सब देसी लख ऐसे । यथास्फटिकमणि देखी तैसे ॥ यही स्फटिक मणिकेर सुभाऊ । जहँजसमतितसगति दरसाऊ ॥ जौन रंग तेहि सन्मुख आना । गहै स्फटिक मणि सोई बाना ॥ कर्मरंग जाट्टंग सघट्टा । देखफटिक मणिमें सोई ठट्टा ॥ राता पीता आदिक रंगा । होयस्फटिकमणि को सोई ढंगा ॥ सर्वांगी अस ब्रह्म बखाना । कर्म बनाव अनेक विधाना ॥ जहँ जसकर्म तहां तस भासू । सो निरलेप है स्वतह प्रकासू ॥ कर्मडोरि जबलों नहीं तोरे । अपनो रूप न पावै भोरे ॥ कर्मबंधते अलग जो होई । परम सोहावन उज्जल सोई ॥ कर्मसूतमें बंधा जो रहई । नाना रंग ढंग गुन गहई ॥ जेते धर्म जक्तके मांही । सबमें सोई ब्रह्म दरसाही ॥ जो दरसै सो सब भ्रम भासा । नहीं दरसै तेहि कौन प्रकाशा ॥ जो नहीं कहन सुननमें आवै । ताको कथा कौन कहि गावै ॥ मन बानीकी गम जहँ नाही । पुनि मनबानी किमि कहताही ॥ नैनते सकल जक्त दरसाई । पै निज रूप न सो लखिपाई ॥ देखे आंख सुने सब काना । रसना रसिक गंध गह ब्राना ॥ त्वचा स्पर्श तेहीको अहई । सबइंद्री निज निज कर्म गहई ॥ आंखिन रशनाको गुन जाना । स्वाद भेद नहीं सो पहिचाना ॥ कान न कबहु रूपको देखे । नाक न कबहु स्पर्शको लेखे ॥

( १९४० )

बोधसागर

३२

इंद्री निज निज कर्मही योगा । निजनिज भोग और नहिं भोगा ॥ सो इन्द्री जेहि ब्रह्म लखाही । कोई इन इन्द्रिनमें नाहीं ॥ जाते आत्मको पहिचाना । ताकी है कछु और ठेकाना ॥ मौन दशा ताते गह साधू । यह सब दीखै भर्म उपाधू ॥ विन जाने जो मौन गहाई । सो नहिं साधु मूर्ख कहलाई ॥ जो कछु कहो कहत नहिं बनई । जो चुप रहौ रहत नहिं बनई ॥ आपै आप खेल सब खेले । भर्म कूपमें मोहि कयों ठेले ॥ रसै बसै सब माह समावै । अर्श पै अपनौ तखत बतावै ॥ जो जाने सो कैसे कहई । नहिं जाने बहु बानी बहई ॥ सबही धर्म जक्तमें तेरो । कहो तो दोष देय सब मेरो ॥

सत्यकबीर वचन

काल दयाल हमै है भाई । छोड़ो दुबिधा काल पराई ॥ सबही धर्म ताहि सतगुरुके । चीन्हे बिनाकाल नहिं सुरके ॥ स्वसंवेदमें कहा बखानी । ताहि बूझि सुख पावै ज्ञानी ॥ काल पुरुष सतपुरुष समायौ । सत्य पुरुषकी देह जो पायौ ॥ सत्यपुरुष दीनों निज देही । कालपुरुष गहि लीनो येही ॥ विषयभोग सब कालकी अंगा । देखहु स्वसंवेद परसंगा ॥ विषयवासना जिहि जिवजागी । सबको धर्मराय है भागी ॥ निविकार अरु विनय विहीना । सकल वासना त्याग जोकीना ॥ सो समस्त सतपुरुष सनेही । सत्यपुरुष पुर पहुँचे येही ॥ इन्द्रीभोग विषय जो ध्यावै । धर्मरायके धाम समावै ॥ सदा रहै सो कालके फंदा । सो नहिं सत्यपुरुषको बंदा ॥ रस प्रीतिसे भक्ति जो करही । विषयविहायनाम निति रहही ॥ कालहिमें दयाल प्रकटाई । गहि करतासु लोक ले जाई ॥ सत्य पुरुषको भक्त कहावै । विषय विकार तेजो मनलावै ॥

३३

जीवधर्मबोध

( १९४१ )

प्रेमभक्ति जामें नहीं कोई । नहीं संतनकी सेवा होई ॥ सो सतपुरुषकि भक्तिसे गिरता । काल पुरुषके बंधन परता ॥

छंद—सत्यपुरुष जो निज बपुवरकह काल पुरुषको दीन्हेऊ । ताही पुरुषमें काल पुरुष कालमें तेहि चीन्हेऊ ॥ अंतरो बाहर दोऊ ठाहरमें निरखि भल लीन्हेऊ ॥ मोरे मते सतपुरुष सबही दूर दुविधा कीन्हेऊ ॥

चौपाई

जाहि धर्ममें जो जिव रहई । जब नखशिखसुकर्म सब गहई ॥ तब सांचा सतगुरु समुहै है । परम धर्मको मार्ग पैहै ॥ जबलों नहीं अति उत्तम करनी । परमपंथ तबलों नहीं धरनी ॥ हो यथा एक गोलाकारा । चहुँदिश ताके घेर सँवारा ॥ मध्यमें बिन्दु घेरके आही । घेरते बिन्दुको लीक जो जाही ॥ सो लकीर सब होहि बराबर । जौँ नहीं इंग बिझ्न मारगधर ॥ तेसे यह मृतलोक बखानो । सब धर्मनको थोक बखानो ॥ गोलाकार जान यह धरनी । ब्रह्मबिन्दु सतगुरुको वरनी ॥ लीक समान धर्म सब जगको । गह सब ब्रह्मबिन्दु मारगको ॥ जौ सुकर्म सब उत्तम होई । पहुँचे ब्रह्मबिन्दुको सोई ॥ टेढ़े टेढ़े चले जो कोई । ब्रह्मबिन्दु पहुँचे नहीं सोई ॥ इमि सब धर्मनके आचारी । टेढ़ चाल जब तज एक बारी ॥ ब्रह्मबिन्दुको तब सो पाई । ठाढ होहि तापर पुनि जाई ॥ सीधे खड़े होहि तेहि ऊपर । तब चहुँओर निहारेहि भूपर ॥ सब धर्मनकी दशा निहारी । केहि कर्मन अरुझे नरनारी ॥ ब्रह्मबिन्दुपर पहुँचे जो कोई । सीधे ठाढ न तापर होई ॥ शुद्ध रूप तेहि दृष्टि न आवै । फेरि फेरि भव भटका खावै ॥ बिन्दुपै सीधे खड़े भे आई । शुद्ध स्वरूप ताहि दरशाई ॥

( १९४२ )

बोधसागर

३४

शुद्ध स्वरूप जीव जब हेरी । करे न सो भवसागर फेरी ॥ गोलाकार स्वरूप बनावो । तामें सकल खेल दृशावो ॥

ब्रह्मविन्दु है आदि पुकारा । करखग आदिकसबधर्म पुकारा॥ निज निजमत जो आछे पाला । तौ सब ब्रह्मविन्दुको चाला ॥ टट्टा टेदे मारग जाहीं । ब्रह्मविन्दु पहुँचे सो नाहीं ॥ सस्सा विन्दुपे पहुँचे जाई । सीधे खड़े भये तहँ आई ॥ पूरन ज्ञानदृष्टि तिन पायौ । परम रूप रमि भवनहि आयौ॥ नन्नाहू लह विन्दु ठेकाना । ठाढ़ होनगति सो नहिं जाना॥ टेदे जायके ठाढ भयञ्ज । ताते शुद्ध स्वरूप न लहेञ्ज ॥ गोलाकार जो कथा बखानी । यह संसार सकल है पानी ॥ पानीमें जिव गोता मारा । बूड़ि जाय पुनि शीश निकारा॥ बूढे उछलै पार न पावै । लख चौरासी माह समावै ॥ जिमि शिशुमारचक यह फिरता । यकपलभरिनहिं ताको थिरता ॥ जो लग्नादिक चक्रमें आही । सबही ताके संग भ्रमाही ॥ भ्रमनकरे निशिदिन सब सोई । तिनको थिरता कबहुँ न होई ॥ ऐसहि गुरु संग सब चेले । भवसागरमें वाजी खेले ॥ उत्तर दक्षिणको जो छोरा । तहँ जो पहुँचहो थिर तेहिठौरा ॥

३५

जीवधर्मबोध

( १९४३ )

जो कोई पहुंचे तेहि खूटा । ध्रुव तारा सम भ्रमनते छूटा ॥ ज्ञानी पहुंचे कुतुबके किले । अटल होहि सो बहुरिन हिले ॥ सतगुरु किला जो ऐसे पैहै । बहुरि न सो भवमें भरमैहै ॥ यह दृष्टांत जो कोई बूझे । निश्चय परम पंथ तेहि सूझे ॥ सकल धर्मको एकै साई । सब पाले निज पुत्रकि नाई ॥ एक सोनार गढै सब गहना । जैसो कर्मरूप तस लहना ॥ सोन रूपको तार बनावै । गढ़िगुढ़ि ठोकि ठांकि सुधरावै ॥ ठोंकि ठांकि जब सीधा करई । यंत्रमें तबहि तारसों धरई ॥ खैंच तार धरि यंत्रके माही । इंग बिंग तब सब मिट जाही ॥ ऐसहि सर्व धर्म जग करो । टेढ बिंग व्यौहार जो हेरो ॥ धर्म कबीर धरहि जेहि बारी । खोट कर्म तब दूर पवारी ॥ तार समान सकल मत मंत्री । धर्मकबीर सोनारको यंत्री ॥ दोय प्रकार वासना अहई । भली बुरी जाको सब कहई ॥ दोनों भवसागरमें डारा । कहा करे यह जीव बेचारा ॥ अर्थ अरु धर्मकाम अरु मोखा । चारों त्यागे साधु सो चोखा ॥ चारते पार और जो होई । सतगुरु भेद बतावै सोई ॥

सत्यकबीर वचन

सारखी-तीरथ गयेते एक फल, संत मिले फल चार । सतगुरु मिले अनेकफल, कहै कबीर विचार ॥

चौपाई

कर्मको फल नर पावै कैसे । भोजन रस तन व्यापै जैसे ॥ जैसे भोजन जो को खाई । ताहीको गुन तामें आई ॥ आकशमात कर्म फल पावत । दुःखसुखसबजिवकोप्रकटावत ॥ जस बासना कर्म कर तैसा । तेहि अनुसार धर्म गह ऐसा ॥ सब निज निज वासना गहाई । ता तोषनकी करे उपाई ॥

( १९४४ )

बोधसागर

३६

नवी मलेशस्थानको यक रह । प्रभुप्रति विनतीकरि ऐसे कह ॥ हे प्रभु मोहि तियरति बलथोरा । यह बरदेव होय सो जोरा ॥ तेहि नम वानी कीन पुकारा । रति कारन कर मांसु अहारा ॥ मांसु खान लागा तब सोई । जान्यो प्रभुकी आज्ञा होई ॥ जस मनोरथ तैसी प्रभु आज्ञा । सत्य कहो करिके परितिज्ञा ॥ जस वासना जीव उर खोले । ताको यतन अकाशते बोले ॥ तथा फिरिशते स्वपना सुथरे । तस कलाम अछाको उतरे ॥ मिश्रसे जबहि यहूदी चाले । जब उजाड़में आय निराले ॥ मांसु खान कह प्रभु प्रतिटेरी । दियौ लगाय बटेरकी ढेरी ॥ खातहि खात मृत्यु तेहि डाला । कर्मको फल पायौ ततकाला ॥ जिन जिन मांसु खानको रोये । बचन एक प्रान सब खोये ॥ बीस वर्षके ऊपर जोई । सब मरि गयौ बचा नहिं कोई ॥ ज्ञान बिनाको प्रभु पहिचाना । ताको धर्म न कोई जाना ॥ जैसो धर्म धरे जो कोई । तैसी गति निश्चय लह सोई ॥ कोई स्वर्ग नर्कको भोगा । कोई अधर मृत्यु पुर लोगा ॥ जीव वासना प्रेरि लेआवै । ताही गतिमति स्थित करावै ॥ तीनों पुर पसरा यमजाला । कोइ बचै जेहि राख दयाला ॥

सत्यकबीर बचन

तीनों लोकमें लागी आग । कहैं कबीर कहैं जैहो भाग ॥

चौपाई

उभयवासनां ते जिव अटका । छूटै न आवा गौन को खटका ॥ कालहि रचै कालही पोषे । कालहि सब रचनाको सोषे ॥ कालको कृत कालही खैहै । कोई विरला गुरुगमबचजैहै ॥

कुंडलिया

निर्वाकार आतम सदा, वंधाकर्मकी डोर । मरकट नटके हाथ जिमि, फिरताखोरिन खोर ॥

३७

जीवधर्मयोग

( १९४५ )

फिरता खोरिन खोरि, कंठमें कर्म जझीरा । दर दर नाचत जाय, पाय तन मन बहु पीरा ॥ पीरा लह मतिमंद, होय नहीं बन्द खलासी । बंद दयाल जेहि काल, कालकी काटे फांसी ॥ कबीर खड़े बाजारमें, गल कट्टोंके पास । जो कोई करे सो भरेंगे, तुम क्यों भये उदास ॥ तुम क्यों भये उदास, भाष कर्महिको सारा । कर्मको रचित जहान, खान चहुँ कर्म सँवारा ॥ कर्म सँवारा दर्ब, सर्व जहाँलों जग दरसै । आतम तो निरलेप, एक सम सबमें सरसै ॥ हृदमें चल सो मानुवा, वेहह चले न कोय । हृद वेहहके बीचमें, रहौ कबीरा सोय ॥ रहौ कबीर सोय, कोय नहीं ताको परसै । परसै संत सुजान, ज्ञानके नैनन निरसै ॥ निरसै ज्ञानके नैन, परख पूरन सो पावै । जहाँ तहाँ दशै आप, ताप तिहुँ दूर बहावै ॥ हृदमें चलै सो मानुवा, बेहह चलै सो साध । हृद बेहह जो दोनों त्यागे, ताको मता अगाध ॥ ताको मता अगाध, आध अरु व्याध न लागे । कर्म जनित सब रोग, भोग भवमें नहीं पागे ॥ नहीं पागे भवभोग योग, जग नाता तोरे । टूटे न भजनको तार, प्रीति नामहिते जोरे ॥ हिंदू कही तो हौ नहीं, मुसलमान भी नाहिं । पांच तत्त्वको पूतला, खेलै गैबी माहिं ॥ खेलै गैबी माह गैबको गैबी जाने ।

( १९४६ )

बोधसागर

३८

कहन सुनन कछु नाहिं, विचार हृदय निजआने ॥ आने हृदय विचार, चारु चिर चोर चपेरे । मूसे जो घर मोर भोर, निश ताको हेरे ॥

चौपाई

काल कराल आपही जानी । ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी ॥ षट्दरशन सोई प्रभु थापा । सब पंथनमें आपै आपा ॥ मूसा ईशा महम्मद आदिक । सोई सब मतके मरजादिक ॥ सब धर्मनको सोइ अचारज । सबहीको कीने प्रभु कारज ॥ सब ही धर्म ताहिको जानी । प्रणवों सबहि मनोक्रम बानी ॥ सोई प्रभु सबही ये देखा । बपुरा जीव करे कह लेखा ॥

छन्द—आप खास है आप दार है आप खेल खेलायऊ । मलसोध जीव प्रबोध कीनो बौध होकर आयऊ ॥ जग जगन्नाथको माथ नावैं रूप और बनायऊ । थापे महात्म बौधको खुद बौधीदास कहायऊ ॥

चौपाई

दोय पुत्र ब्रह्माके भयऊ । यकसुरदुतियअसुर जो कहेउ ॥ सत्तोगुनी सुर कह सब कोई । विषय विकारी असुर सो होई ॥ तीन लोकमें विषय विकारा । चौथा लोक विषयते न्यारा ॥

सत्यकबीर वचन—चौपाई

विषय विकार मान मद जेते । सो सब प्रभु असुरनको देते ॥ जाने थोर बहुत जो कहई । तीनों काल मूर्ख सो रहई ॥ जेते जाने तेते जो भनिये । मध्यम गतिमें ताको गनिये ॥ जाने बहुत कहे जो थोरा । सोई ज्ञानी सब शिरमौरा ॥ सब धर्मनको भेद जो पावै । ताकी बुद्धि शुद्ध है जावै ॥ जाके धर्म ताहिंते जांचो । तब लखिपरे झूठ कह सांचो ॥

३९

जीवधर्मबोध

( १९४७ )

जौन धर्मगति चह चित सुनिया। ढोढों ताको पंडित गुनिया ॥ पक्षरहित जो बात बतावै। तामें कछू कसर जौ आवै ॥ तौ पूछो औरन बुध लोई। निजबल बुद्ध बतावे सोई ॥ एक कि भूल दूसरा कहई। यहिविधिचतुरशंकनिजदहई ॥ औरको धर्म औरते बूझै। ताको दिनदोपहर नहि सूझै ॥ वायस मिल वायसहि प्रशंसा। हम सम नहि ब्रह्माको वंशा ॥ हमसम और न बोल सुधारा। जाने कह कोकिला गँवारा ॥ सो सुनि भूलि जाहि जिवसंठा। जानन कागहि जो कटुकंठा ॥ जिमि उलूक निजपरको ठानू। कानते सुने न देखे भानू ॥ तामें सब कोइ मिथ्या करई। जगमें कतहु न सूरज अहई ॥ ताकी शास्त्र भरनको साचा। चमगुदरी उठि बोली वाचा ॥ सुनि लीजै उलूक मम आता। जो कछु कहो सत्य तुम बाता ॥ मैं कबहुँ दिनकर नहि देखा। कहै जक्त सब झूठा लेखा ॥ भरे बहुरिके ताकी साखी। आय छछन्दर ऐसे भाषी ॥ सत्य वचन तुम दोहुकी आही। दिनकर तीनकाल कहुनाही ॥ ऐसहि अंधहि अन्ध सराहत। जो दिनपतिहि दूरकरचाहत ॥ तिनके वचनमें जो जिव बंधे। तिनसमान सो सबही अन्धे ॥ जाधर पकै हरामको दाना। तिनको धर्म कर्म बिन माना ॥ जो कोई करे हराम कमाई। आप खाय अरु और खिलाई ॥ जो हरामको दाना देहे। ताको दंड आप शिर लैहे ॥ खाय हराम हरामही करि है। करि हराम भवसागर परि है ॥ जो कोई अन्न हरामको खाई। ताकी बुद्धि अन्ध हो जाई ॥ बुद्धि विभंग होय जब जाको। धर्मकथा भावै नहि ताको ॥ अन्धकार जब हृदयें घरे। शुद्धपन्थ सो कबहु न हेरे ॥ खाय हराम हरामी जायौ। मातु पिताकुलकानि गवायौ ॥

( १९४८ )

बोधसागर

४०

करि श्रम शुद्ध अन्नभक्ष जोई । ताकी कृपा शुद्ध सब होई ॥ भक्ष सुअन निजधर्म जो पाला । ज्ञान दृष्टि पावै ततकाला ॥ विषकी बेल है यह संसारा । चहुँदिश आवै विषकी झारा ॥ जलथलमें विष रहा समार्ई । विष नहिं तजै भजै चितलाई ॥ विषहीमें निज भौन बनाई । विषय भोगि विषको तनपाई ॥ सबही सन्त श्रुति कहे बखानी । नरस्वरूप नारायण जानी ॥ लिखो वेद वेदान्त पुराना । तौरे तो इअील कुराना ॥ सब ही मिल करते निरधारा । नर ईश्वर निज रूप संवारा ॥ निश्चय नर नारायण देही । पै जब ईश्वर गुनगह येही ॥ जबलों ईश्वर गुन नहिं गहई । संज्ञा जीव तासुको रहई ॥ ताते जीव शीव शिव कहिये । विषयबिकारनतनमन गहिये ॥ जब सबही शुभगुनगहि लीना । ब्रह्मस्वरूप ताहि कहि दीना ॥ ब्रह्मस्वरूप आप जब मंडा । तब रचि सके कोटि ब्रह्मण्डा ॥ सिरजै पोष प्रलय करिडारी । पुण्यपाप नहिं ताहि विचारी ॥ जिमि शिशुमाटीधूल खेलोना । नाना भांति रचै मनभौना ॥ खेलि खेलि पुनि मिट्टी मेल। ऐसहि ब्रह्म सृष्टि को खेला ॥ सकल सृष्टिको करता होई । ताको नाम जपै सब कोई ॥ जो जिव विषयनमें लपटावै । दिन दिन तुच्छ देह सो पावै ॥ जब जब तुच्छ अन्त है जाई । नरकनमें निज भोन बनाई ॥ ताते विषई जीव सबनकी । विषयविहिन देह ईश्वरकी ॥

सत्यकबीर वचन

सारखी-कबीर कबीर तु क्या करो, साधो अपना शरीर ।

पांचो इन्द्री वश करो, तुमही दास कबीर ॥

बुलेशाह वचन

काम क्रोध लोभ मोह हंकार । पञ्चो कटुवां जू दो मार ॥ इन्हा करवी है बदवो । बुछा आपै अल्लह हो ॥

४१

जीवधर्मबोध

(१९४९)

यह संसार दुसह दुःख दागा । बिरत विचारी सन्तसो त्यागा॥ कौन राम कौनी विधिजपना । कौन ठौर तेहि प्रभुको थपना॥

सत्यकबीर-बचन

सारखी-रामजपत है नामको, नाम जपता है थीर । ताहुते कछु अपर है, ताको जपै कबीर ॥

चौपाई

उत्तम धर्म जो कोइ लखि पैंये । आप गहो अरु और गहैंये ॥ ताते सत्यपुरुष हिय हवैं । कृपा वारि तब तोपर वषैं ॥ सत्यकबीर केर परमाना । यहि विधि तैंसो करे बखाना॥ जो कोउ जीवहि राह बतावैं । परमपुरुषकी भक्तिमें लावैं ॥ ऐसो पुण्य तासुको बरना । एक मनुष्य प्रभु सन्मुख करना॥ कोटि गाय जिमि गहे कसाई । ताके करते लेत छोड़ाई ॥ परम पुरुषते जब जिव जूटै । काल कसाई करते छूटै ॥ भक्ति कठिन अतिशय कठिनाई । बिना भक्ति कोइ पार न पाई॥ भक्ति भवन अति उत्तम ऊंचा । इनसीठी बिरला कोइ पहुँचा॥ लागे तहां त्रिविधि सोपाना । एकते एक विचित्र बखाना ॥ रजगुन तमगुन सतगुन वरतो । द्वै तजिके तृतिये पग धरतो ॥ जब सतगुन सीठीपर चढ़िये । तब तहैं ज्ञान अगोचर पढ़िये॥ पढ़िके ज्ञान भयौ जब पक्का । तब सो भक्ति भवनको तक्का ॥ भक्तिभौत जब चाहत चलिये । तब सतगुरु प्रतिहारते मिलिये ॥ ताहि पौरि यहि भेट चढ़ावो । भक्तिभौन तब पैठन पावो ॥ तन मन धन सब अर्पन कीजै । शिर उतारि तेहि चरणधरीजै॥ जो दयाल हो सो प्रतिहारा । भक्तिभौन तब हो पैठारा ॥ भक्तिभौनको भेद जो पाया । त्रिगुन पौरि सो बहुरिन आया॥ आदि अन्त सतगुरु गुनगावो । जिन तोहि भक्तिभौन बैठावो॥

( १९५० )

बोधसागर

४२

भक्तिहि भक्ति भेद बहुतेरा । गहसो भक्ति भेट भवफेरा ॥ विमल भक्ति गहिये मन लाई । जाते त्रिगुनातीत कहाई ॥ आप आप जिव आप फँसाई । आपै बँधा आप दुख पाई ॥ जस क्रमयक जेहि कह खुसियारी । ताकी ऐसी कथा उचारी ॥ सो ऐसो निज भौन बनावै । आपको तामें आप फँसावै ॥ आप चरित ग्रह बंधै आपू । काहूको कछु दोष न पापू ॥ ताहीमें सो फँसि मरिजाई । विविध भांतिसे सो दुखपाई ॥ बंधा तौ पै खुलै न कोई । जब लगि सतगुरु कृपा न होई ॥ हाथ पांव पटकै औ रोवै । तब गुरुकृपा केर भ्रम खोवै ॥ जाति पांति कुल कानि गवावै । भली बुरी कछु चित्त नहिं ल्यावै ॥ सकल नेहको नाता तोरे । प्रीति सदा सतगुरुसे जोरे ॥ वेद कितोब शरा अरु सुन्नत । सो नहिं कछु निज मनमें उन्नत ॥ यह सबही दुनियांकी फांसी । ताते नहिं भेटे अविनाशी ॥

कवित्त-शरीअतकी सलाई जिव आँखन चलाई भय अंध यमबन्ध धोरवधन्धमें परत है । कोई कह हम हिंदू ही जो ऊंचे कुलबिंदू कोई कह हौ ईसाई ईशा आसराध रत है ॥ कोइ वह मुसलमान हौही साबित ईमान मारो काफिरन सारा जंग जेहाद करत है । नहिं चीन्है कोइ देव करे भरम कि सेव गुरु सैन बिन येव लड़ि लड़िके मरत है ॥

सत्यकबीर वचन

मुसलमानकी काटी चमड़ी हिंदूकी बेधे कान । कहे कबीर इस बोलतेको पहिचान हिंदूकी है मुसलमान ॥

चौपाई

जीवधर्म पुरुषार्थ गोगू । ताते सुख पावै सब लोगू ॥

४३

जीवधर्मबोध

( १९५१ )

कछुक कहो पुरुष पुरुषारथ । जो हित स्वारथ अरु परमारथ॥ शिव दधीच हरिचंद समाजा । बलि विक्रम करणादिक राजा ॥ सूरशाह सिकन्दर हातम । हनुमत भीष्म द्रोण भाषेतिम ॥ ब्रह्मा हरि शिव मनु सतरूपा । गोरखदत्त कि कथा अनूपा ॥ कौशिक व्यास वशिष्ठो नारद । शृंगी शुक् विज्ञान विशारद ॥ केते ऋषि मुनि करनी करहीं । कीरति जासु जक्त उच्चरहीं ॥ जीअत ही साधू जो मरेऊ । सूरसती शुभ करनी करेऊ ॥ साकजके हरि कानन कहई । स्वान शृंगाल पेट तेहि भरई ॥ सूर सन्त इमि करनी करही । जक्त जीव ले पार उतरही ॥ तप बल शेष धरे महि भारा । तपबल ब्रह्मा सिरजन हारा ॥ तप बल विष्णु जक्तको पोषै । तप बल शंभु ताहि पुनि सोषै ॥ तप आधार जक्त जगदीशा । तप बल जीव बने हैं ईशा ॥ जैसे जगमें सूर सयाना । निजभुजबल अरिदलदलनाना ॥ करि श्रम सुखी भये सब सोई । तन धन मोह स्यार सब रोई ॥ जहँ लगि जब विद्या चतुराई । पुरुषारथसे सब कछु पाई ॥ आलसी जीवको विद्या नाहीं । धन नहि होय अविद्या पाहीं ॥ निरधनको कोइ मित्र न होई । बिना मित्र निरबल नर सोई ॥ निरबलको सबही दुख घरे । दुखिया दीन तुच्छ जग हेरे ॥ पुरुषनको पुरुषारथ चाही । नारि पतिव्रत धर्म निबाही ॥ मृदु सजापर सोवनहारे । भय सो कीट पतंग बेचारे ॥ विविध प्रकार विषय जिन भोगा । अंतकाल सहसो सब शोगा ॥ मचे जबै घमसान लड़ाई । कोई धीर वीर ठहराई ॥ कैसहु महा महिष किन होई । जो रन तजिके भागे सोई ॥ कतल कैद हो राज विभंगा । कायर नहि देखे रनरंगा ॥ ऋषि मुनि शूर वीरकी करनी । कहलो कहो जाय नहि वरनी ॥

( १९५२ )

बोधसागर

४४

जहाँ लगि तन पोषक नर नारी । सो नहिं करनीके अधिकारी ॥ सिन्धुमें जो कोई गोता मारा । सो नहिं राखै भय घरियारा ॥ जबलोंं सिंधु न डुबकी मारे । तबलोंं रत्न हाथ नहिं धारे ॥ शर शय्यापर भीष्म विराजे । करि षट्मास शयनगति साजे ॥ तन मन कसहि मुनीश्वर ज्ञानी । लहै भक्ति सब सुखकी खानी ॥

सत्यकबीर वचन-रेखता

हमनसे मतमिलो यारो हमन खफकी दिवाने हैं । खुशीकी राह छोड़ी हैं कठिनमें जा सामने हैं । हमन दिन रैन रोते हैं वो रामसे जान खोते हैं । सुली की सेज सोते हैं विरहके ये रकाने हैं ॥ हम न हथियार हैं जानी पिया हरिनामको पानी । आखिर सब होवैगे फानी बलीमें जा समाने हैं ॥ तजी खिदमत वजीरीकी लही लज्जत फकीरीकी । चढ़े किस्ती सबूरीकी फुकुरके रकाने हैं ।

चौपाई

पुरुषारथकी ऐसी बातें । कर अवश्य पुरुषारथ ताते ॥ यथा कृषान कृषानी करई । उपजैं अन्न पेट निज भरई ॥ हलवाही अवश्य तेहि करना । भली भांति निजखेत सँवरना ॥ बीज बोय रखवाली कीजै । पशु पंछी करिसो मति कीजै ॥ करि निज श्रम बिनवै प्रभुपाही । भरे खेत वर्षाकरि ताही ॥ जो ईश्वर वर्षा नहिं करई । वृथा कृषानी ताकी परई ॥ जो बरपैं बरवारी सुकाला । तो कृषान सो होय निहाला ॥ जो आलस करिके नर कोई । संशय पै हल जोतै नहिं सोई ॥ बीज न बोय न कर रखवारी । बपैं घन अरु भरे कियारी ॥ ताहि अन्न फल हाथ न आये । मूरख मिथ्या आस लगाये ॥

४५

जीवधर्मबोध

( १९५३ )

बिन बोये कहु किनकिन लुनिया । सो जड़ जो यह ज्ञान न गुनिया ॥ ताते पुरुषारथको कीजै । दोऊ लोकमें सुयश लहीजै ॥ सर्वशास्त्र सदग्रंथ विलोका । जान्यौ सर्व धर्मको थोका ॥ तजि असार सार जो आही । सो पंडित मराल मति आही ॥ उत्तम धर्म धरे जो कोई । उत्तम करनी करिहैं सोई ॥ नीच धर्म जो कोई गहई । उत्तम करनी सो किमि लहई ॥ साधु पुत्र नहिं करे कुकर्मा । पुत्र असाधु कुकर्महि धर्मा ॥ कर्मयोनिजनिज मातुपिताका । जिव तेहि भली दृष्टिकरि ताका ॥ ऐसहि सब धर्मनके लोगा । करहि कर्म निज गुरु संयोगा ॥ शुद्ध अशुद्ध विचार न हारा । सो हंसा बिरला संसारा ॥ कहूं कहूं विपरीति देखावै । साधु सुअन असाधु कहावै ॥ कहूं भक्तभा सदन कसाई । पै यह कथा अनोख बताई ॥ धर्म तुच्छ गहि बड़ पद पावै । ऐसेहु कहूं कहूं देखलावै ॥ है परंतु यह अति अज युतरी । रसिकस्वाद कहैं दे कठपुतरी ॥ कोई चंडाल करे द्विज करनी । सो सतसङ्ग केर फल बरनी ॥ उत्तम कुलमें जो जिव होई । मध्यम करनी जाय बिगोई ॥ त्यागहि पक्ष साधु जो ज्ञानी । हो अपक्ष यह मुक्ति निशानी ॥ निजनिज गुरुपद गह सब आछे । यथा भेड़गण पालि न पाछे ॥ निज निज धर्म सत्य सब कहई । ताते परमपन्थ नहिं लहई ॥ जब काहू सच शंका आवै । निज पद पौर गुरु बैठावै ॥ रामचन्द्र मन संशय आई । देह विदेह मुक्ति अर्थाई ॥ मुनि वशिष्ठ निज ज्ञान सुनाये । अपनी ठौर फेर बैठाये ॥