भारतकोश
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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०३४ )

बोधसागर

१२६

होय अधीन प्रेम लौलावै कुल अभिमान मिटावै । सहज शून्यमें रहे समार्ई पठिगुण सब बिसरावै ॥ गुरुकी दया साधुकी संगती भावभक्ति चितलावै । कहै कबीर सुनो भाई साधो कौन परमपद पावै ॥ कौन हमारे आये केशव क्यों न हमारे आये । पट रस व्यंजन छोटि रसोई साग विदुरघर खाये ॥ जहँ अभिमान तहाँ हम नहीं वह व्यंजन विष लागे । सोई मुनिजन पूरा कहिये अभिमानीको त्यागे ॥ जातिहीन जाके कुल नहीं है दासीको जायौ । ताकीट परिख्या तुम जायके बैठे कहा बड़ापन पायौ ॥ सत्यासत्यवचन कहो दुरयोधन सुनिले बात हमारी । विदुर हमारे प्रानसो प्यारे तुम विषिया बेकारी ॥ पुरातन कथा तुम्हारी हरिजी वनमें छाक मँगाई । ग्वालनके संग भोजन करते सो मति तुममें आई ॥ प्रेम प्रीतिके हम हैं भूखे अभिमानी नहीं भावै । कहैं कबीर साधुकी महिमा हरि अपने मुख गावै ॥

रामचंद्रवचन-चौपाई

सबहि मानप्रद आप अमानी । भरथ प्रानसम ते मम प्रानी ॥ वेद प्रमान आदि ओंकारा । सो करता सोई श्रुति सारा ॥ सो ओंकारको अर्थ बखानो । दीनता और गरीबी जानो ॥ जहँ दीनता गरीबी बसई । सबगुण ज्ञान ताहिमें लसई ॥ तौरे तो इञ्जील सोयी नय । आहि दीनता ज्ञान गुणनमय ॥ पुनि जन्बूर कहे सो हेता । दीनको प्रभु सोभा गति देता ॥ पुनि कुरानको सोई मत हेरी । ऊँच बोल है गर्दभ केरी ॥ गदहा पर ईसा चढ़ि चाले । सो दीनता धर्म प्रतिपाले ॥

१२७

जीवधर्मबोध

( २०३५ )

धन्य दीनता कह इञ्जीला । ताते हो जिव बंधन ढीला ॥ जूठी बेर सेवरी ल्याई । रामचन्द्र अति रुचिते खाई ॥ लक्ष्मन निर आदिरकर ताही । भिलनी जूठा हम नहिं खाही ॥ भई सजीवन बूटी सोई । लक्ष्मन प्रान बचायौ सोई ॥ पंडो यज्ञ जुरे ऋषि भूरी । स्वपचभक्त विन यज्ञ न पूरी ॥ जातिपातिकुलगुण अभिमानी । भ्रमत फिरे चौरासी खानी ॥ भगते भगवा भेष बनाये । शिव शंकर निज शीश चढ़ाये ॥ आदि भक्ति शिवजक्त प्रकाशी । भगवा भेष धरे संन्यासी ॥ भग पृथ्वीका रूप कहाये । तात भगवा वरन बनाये ॥ पृथ्वी तुल्य गरीबी आवै । संन्यासी जीवत मरिजावै ॥ बैरागी जो तिलक लगाई । ले मृतिका निजमाथ चढ़ाई ॥ आदम अघ तौ रेत प्रसंगा । कीनो प्रभुकी आज्ञाभंगा ॥ अदन बाहर आदन भैऊ । ताते प्रभु पुनि ऐसे कहेऊ ॥ खेहसे तेरी देह बनाई । जबलौ बहुरिन तेहि मिलिजाई ॥ तबलौं श्रम करिकरिके खैहो । अब नहिं अमृत फलको पैहो ॥ ताको ऐसो गहिये ज्ञान । जीवतही मिट्टी मिल जाना ॥ मुये तो सबही मिट्टी होता । पावै कर्म बीज यश बोता ॥ जीवतही लोधू मरजाना । यही सकल मतको परमाना ॥ चरनामृत अरु शीत प्रसादा । ताको आहि बड़ो मरजादा ॥ करिके कृपा साधु जो देही । दीनको शिष्य सेवक सो लेही ॥ ताको ऐसा अर्थ बिचारी । गहो गरीबी सब नरनारी ॥ बहुरि शिष्यसे भीख मंगवै । ताते तासु मान बिनसावै ॥ सुरगण जो अतिगुण गण धामा । आदमको कर दंड प्रणामा ॥ कारण यही तासुमें पायौ । प्रभु दीनताको श्रेष्ठ देखायौ ॥ कह आदम मिट्टीकी मूरत । कह इबलीस दीस शुचि मूरत ॥

( २०३६ )

बोधसागर

१२८

कह नारद ब्रह्मा सुत होई । कहब पुरा कैवर्तक जोई ॥ कहु सुख देवगर्भके योगी । कह नृप जनकविषयरस भोगी ॥ कह मूसा गुण ज्ञान निधाना । कह इबलीस दोजखी जाना ॥ बिनदी मतान जिव कोई तरिहै । करि सुकर्म भवसागर परिहै ॥

नानक शाह वचन

दोहा-नानक नन्हे हो रहो, जैसी नन्ही दूब । घास पात जरि जाहिगी, दूबखूबकी खूब ॥

सेख फरीद वचन

दोहा-फरीदा ऐसा हो रहो, जैसा करकख मंसीत । आठोपहरलताडिये, तेरीरब्बनालरह प्रीत ॥ सोरठा-धर्मसार यह जान, भक्ति दीन ता दिल गहे । तजि दीजै मदमान, होयपरम कल्यान तब ॥ तनमनधन गुरुअर्प, करनीकर गुरुद्वारनिज । बहुरि काल नहिं दर्प, प्रेमभाव पद पूजिये ॥

इति श्रीधर्मसार

अथ सर्वधर्मएकता वर्णन-चौपाई

एकै धर्म सकल संसारा । भिन्न भेदते दरसै न्यारा ॥ विषय अमृतमें दियौ मिलाई । ताते जिवकी सुधि विसराई ॥ सप्त पंथ तजि कुपुर कमावै । न्यारी राह जीवको भावै ॥ कहु तीरथ व्रत मूरति बताया । कहुमदमास हरामको खाया ॥ जारी जोर जुलुम कहु देखो । यक अछहको न्यारो लेखो ॥ उज्वल करनी सब देखलाई । तामें कहुक हराम मिलाई ॥ जबलों भोगकिआसा रहई । तबलों जिव हराम गतिगहई ॥ भोगकि इच्छा दिलसे त्यागे । तब जिव सत्य पंथमें लागे ॥ विषय विकारते मुक्ति न पावै । सतगुरु त्याग औरको ध्यावै ॥

१२९

जीवधर्मबोध

( २०३७ )

परम पुरुष पदको जब त्यागा । तब हराम कारीमें लागा ॥ जीव गँवायो ज्ञान कि थेली । तजि शुभकर्म करै बदफैली ॥ जौन विकार जाहि मत माहीं । तजि सब जिव निर्मल है जाहीं ॥ निज औगुणजब जिव पहिचाना । भर्म छाँडि शुभ धर्महि जाना ॥ हृदयमें जब उगे विवेका । तब सब जिवके मत हो एका ॥ सत्य पुरुषकी भक्ति जो गहेऊ । तजि विकार तब अमरसो भैऊ ॥

इति सर्वधर्मएकता

अथ ब्रह्माण्ड और पिंडकी एकता—चौपाई

यह ब्रह्मांड सकल है पानी । तामें अद्भुत ख्याल उपानी ॥ अण्ड पिंड दो उदधि अपारा । इन्द्रजाल तामें विस्तारा ॥ रच्यौ ख्याल यह बाजीगरको । अन्न लहेको भवसागरको ॥ अण्डाकार पिंड ब्रह्माण्ड । तामें सकल द्रौप नौखण्डा ॥ यह समुद्र है अगम अगाहा । भरमत जीव न पावे थाहा ॥ चौरासी लख गोता खाही । बूड़े उछले पार न जाही ॥ जिमि ब्रह्मांड समुद्र बखानी । तिमियह पिंडबून्दयकजानी ॥ सिन्धु बून्द दोनों यकरूपा । कहिनजाय अति अकथअनूपा ॥ सिन्धुमें बून्द बून्दमें सागर । जाने विनापन्यौ जगझागर ॥ जो कछु रचना सिन्धुमें परखो । ज्योंकीत्योंसोई बुंदमें निरखो ॥ वारिद बुंद विचार विलोका । दोनों द्वैधौ दोनों एका ॥ दोनों एक तुल्य है चोखे । विषय विकार दोहुनको पोखे ॥ इंद्रिन सहित दोहु एक सारा । दोहुमें एकै खेल पसारा ॥ ताते प्रथम पिंड गति जानो । पुनि ब्रह्माण्डको लेखा ठानो ॥ पिंड खेल जबलों नहीं लहई । अंडलेख तबलों कह कहई ॥ पहिले पिंड आपनो तरना । पुनि ब्रह्मांडके पार उतरना ॥ जाते पिंड तरो नहीं जाई । सो ब्रह्मा पार कह पाई ॥

( २०३८ )

बोधसागर

१३०

जबलों देह सत्यकरि जानी । तबलों पिण्ड तरे नहिं प्रानी ॥ आदिमें अण्ड रूप यक रहेऊ । हिरण्यगर्भ ताहीको कहेऊ ॥ हिरण्यगर्भ निज मनहि विचारा । द्रन्द्व खेल तेहि काल सँवारा ॥ हिरण्यगर्भ प्रजापति मेला । ताते खिला जत्तको खेला ॥ फूटा अंड भयो द्वै धारा । ताते द्रन्द्व जत्त हितकारा ॥ द्रन्द्वमता संसारहि मेले । नर नारी दोउ जगमें खेले ॥ दोनों मिले होय तब रचना । सकल स्वरूप ताहिसे खचना ॥ जिहि अवसर जिव भर्महि भंडा । जो कछु पिण्ड सोह ब्रह्मण्डा ॥ आपै लखे लखो सब जाई । आपहिमें सब सृष्टि समाई ॥ माया ब्रह्म मेल जब होई । यह संसार खेल तब होई ॥ माया दीख ब्रह्म नहिं दरसै । शून्य स्वरूप ताहिको षरसै ॥ बिंदु रुधिर दूनों हैं पानी । अंड पिंड रचनाको खानी ॥ बिंदु पिता लोहू है माता । श्वेत अरुण कहिये द्वै बाता ॥ यकभो द्रन्द्व द्रन्द्व जब टूटे । हैं अनन्त सब जगमें फूटे ॥ रुधिरसे तीन धातु प्रकटानी । चाम मासु अरु रुधिर बखानी ॥ तीन धातु नर विन्दुसे होई । हाड अरु गूद विन्द कह सोई ॥ माता तीन पिता मलतीनी । ताते जगकी रचना कीनी ॥ माताको सब कोई लखि पावै । पिता काहुकी नजर न आवै ॥ मातामें रह पिता छपाई । ताते कोई देखि नहिं पाई ॥ माता जबहि पिता बतलावै । तब कोई खबर तासुको पावै ॥ माताको अभाव जब होई । पिता दरस तब कर सब कोई ॥ यह दृष्टांत मैं प्रकट बखाना । मायामें हमि ब्रह्म लुकाना ॥ चाम मास लोहू है बाहर । हाड अरु गूद विन्द है भीतर ॥ माता जैसे पिता छपावै । माया ऐसे ब्रह्म दुरावै ॥

१३१

जीवधर्मबोध

( २०३९ )

माया ब्रह्म जीव कह आहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥ आपै खोजि आपको पैये । और कहा केहि खोजन जैये ॥ पिंड अंड दोनों यक लेखो । बाहर भीतर एकै देखो ॥ पग पाताल कहे सतइ महि । चरण पृष्ठ पाताल छठा कहि ॥ पद अंगुली सो कहे असुरगण । पदके नख असुरनके बाहण ॥ अष्टांलिग महातल पञ्चम । पेडीतलातल चौथ विरञ्चम ॥ ठेघुनी सुतल तीसरे कहिये । जंघको बितल दूसरो गहिये ॥ काल समय अथवा यज्ञ होई । पाव चलनको कहिये सोई ॥ भगसो अतलहै पहिली धरनी । लिंग ताहि प्रजापति बरनी ॥ वर्षा बीज नाम महि भनिये । महिते सो आकाशलो गनिये ॥ चूतर माथ सौ प्रभा प्रभाता । श्वेत रंग जो प्रथम लखाता ॥ मोट मास अथवा कह माया । सौ प्रदोष सन्ध्या बतलाया ॥ नाभी गंभीरता है जोई । क्षीर समुद्र बखानो सोई ॥ इत जठरा उत बडवा आगी । नसा जाल सरितागण जागी ॥ पेट सो भुवलोक पहिचानो । बालभोग लछु पल्लय जानो ॥ तृषा सो लछु पल्लय जग सोवन । हृदया स्वर्ग भूमि ऊपर भन् ॥ इत वैजन्ती माला जोई । उत लम्बादिक जाला सोई ॥ दक्षिण कुच यहि भांति बखाना । मांगनके प्रथम दे दाना ॥ बाम पयोधर ताहि कहीजै । दान याचना पीछे दीजै ॥ मन सोई गुण तीन मिलाना । रज सत तमगुण कीन प्रणामा ॥ मनसंकल्प सोई है ब्रह्मा । जग रचना जिन कीन अरंभा ॥ पोषण गुणसों वदे विष्णुवर । कोधहनन हंकार महेश्वर ॥ हास अनन्द सोई है माया । ज्ञान दुःख दंभ दूर कराया ॥ प्रानसो पौन पिष्ठ अपकर्मा । पीठ अस्थिहिमगिरि कह मर्मा ॥ पसुली इतर अस्थि गिर नामा । जो हिमगिरिके दक्षिण बामा ॥ दहनाहाथ सो दान अस वर्षा । बाम सूम तासुष्को तर्खा ॥

( २०४० )

बोधसागर

१३२

हाथ चीन्ह अप्सरा सुभाती । कर नख सो सुरगण बहु जाती॥ दक्षिण करबंध अरु निजतार्ई । लोकपाल देव अग्नि बनाई ॥ बाम जोड़कर जो अरु निजलो । अहं देव ईसान नामलो ॥ औरनिज सो कल्पद्वुम कहिये । आगे और भेद कछु कहिये ॥ दक्षिण कंध सो दांहना छोरा । वामकंध सो बायो ओरा ॥ गरदन मोठा वरुणदेववर । कंठसो महल्लोकके स्वर्ग ऊपर ॥ शब्दसो अनहद बुद्धि जो नीकी । महल्लोकके ऊपर ठीकी ॥ सो यम लोक बखानों ताहा । चितादुःखसे जगकी चाहा ॥ होटको ओष्ठ लोभको साजू । ऊपरको ओष्ठ हया अरु लाजू ॥ तालू पानी जिह्वा आगी । वचन सोई सरस्वती सुभागी ॥ दंतमोह जग पुनि कह भोजन । सब जग जीव करे जो भक्षण ॥ इतबानी उत चारों वेदा । हास्य सो माया रचना भेदा ॥ कानदो जक्त आठ विधि धारा । नाकपरा सो अश्विनी कुमारा ॥ देहगंध सो पृथ्वी योका । अधोतन दक्षिणपंचमयमलोका॥ अर्धदेह उत्तर जो हेरी । सो तपलोक षष्ठमो टेरी ॥ मस्तक बल सो नूर असलकह । आदि कि उत्पतिको सूरय वह॥ दृष्टि सदा जग उत्पति सारा । पलक मारन दिनरात उचारा ॥ दक्षिण दिशकी भृकुटी जोई । प्रीति देवता महतर सोई ॥ बाम और भृकुटी जो लस्ता । कहर कोध सुर कहे देवस्ता ॥ मस्तक सो तपलोक बखानो । सो जनलोकके ऊपर जानो ॥ शीस खोपड़ी लोकालोकू । सब लोकनते उपर विलोकू ॥ शिर कच महाप्रलय घनकारे । तनरोम नोक वनस्पति भारे ॥ रूप अनूप लक्ष्मी जाना । देहकार्ति रवि प्रभा प्रमाना ॥ महापुरुषको सोहैं गेहा । जगमें जेती मानुष देहा ॥ आतम चिदानंद करि मानी । खास महल पूर यतन ज्ञानी ॥ खास जबही नीचेको जाई । सारी सृष्टि तबै प्रकटार्ई ॥

१३३

जीवधर्मबोध

( २०४१ )

जिहि औसर बिच श्वासा रोका। हरा होय तब सब जग लोका ॥ जबहि श्वास ऊपरको खींचा। महाप्रलयहो सबकी मींचा ॥ दोहा-पिंड और ब्रह्मांडमें, रंच भेद नहीं वाद। नानक सत्यकबीरको, अब सुनिये संवाद ॥

नानक वचन

तीन लोककी कहो गुसाईं। कैसे जानि परे तन माही ॥ कहीये दयासिंधु मोहि बानी। तुम निज पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥

जिंदा वचन

हेठ चरण दैं शीश अकाशा। तीनलोक देही प्रकाशा ॥ शब्द खंड ब्रह्मांडमें सोईं। माया ब्रह्म फैल घट दोईं ॥ हमरे पदको लहै न कोई। भले बूझ तुम पारख होईं ॥

नानक वचन

चार दिशा मोहि कहो गोसाईं। सातद्वीप निज कहो बुझाईं ॥ प्रभु नौरखंड अब कहो बखानी। चंद्रशूर तन कैसी मानी ॥

जिंदा वचन

आगा पीछा दक्षिण बाना। चार दिशा देही प्रमाना ॥ साठे तीन हाथकी देही। उनचास कोटि बिसियाहै पेही ॥ नवो खंड नौ संधी जानो। पिंड अंडको लेखा मानो ॥ परवत यामें हाड लगाया। धड पास ब्रह्मांड रचाया ॥ चंद्र शूर द्वै नेत्र जगावा। देखो पीठ सुमेर बनावा ॥ नसन दिया तन भीतर जानो। पेट गंडार पिंडमें मानो ॥

नानक वचन

तत्त्व प्रकार कही तुम वानी। वाकी शब्द संधि पहिचानी ॥ सातसमुद्र कहो बखानी। तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥

जिंदा वचन

जीभ नासिका नेत्र बखानो। श्रवण नाभ गुद इंद्री मानो ॥

( २०४२ )

बांधसागर

१३४

खार मीठ जल सब पहिचानो । नौसौ नदी पिंडमें मानो ॥ श्वासा नदी नासिका वासा । जिह्वा स्वाद करे रस भाखा ॥ ये समुद्रमें जाय समानो । है गंडार नहीं त्रिसानो ॥

नानक वचन

सात समुद्रकी लहर बखानो । इनकी लहर कौन विधि मानो ॥

जिंदा वचन

काम अरु क्रोध लोभ हंकारा । मनमायाकी लहर अपारा ॥ अग्नि पौन पानी प्रचण्डा । पांच तत्त्व बतैं नौ खण्डा ॥

नानक वचन

बाही लहर हीरा अरु मोती । यामें कहा निकसि है सोती ॥ सभी भेद मोहिं कहु गुरुदेवा । नहिं छोड़ो अब तुमरी सेवा ॥

जिंदा वचन

जब गुरु मिलै भुङ्ग सम रंगा । ब्रह्मज्ञान उपजै सतसंगा ॥ सुमिरन भजन होय परकाशा । अनहद ध्यान पुरुषकी आशा ॥ अर्श गैवमें ध्यान लगावै । तवासिंधु थाह कोइ पावै ॥ जाय हंस तहैं डुबकी मारा । ले निकसे तब वस्तु अपारा ॥ हीरा लाल नाम परकाशा । शब्द सुरति हंसाको बासा ॥ कथा समाज निकसिहै ज्ञाना । सो हीरा मणि माणिक जाना ॥

नानक वचन

खार मीठ जल इहां अपारा । उहां कहाँ गुरुकर निर्धारा ॥

जिंदा वचन

नयन नाक इन्द्री जल खारी । गुदा श्रवण जानौ जलधारी ॥ खार मीठ जल सभी भरा है । जो ब्रह्मांड सो पिंड कहा है ॥

नानक वचन

इहां है काठ लोहकी नौका । कहो स्वामी व्यौहार वहांका ॥

१३५

जीवधर्मबोध

( २०४३ )

जिंदा वचन

नाम पुरुष नौका इहां भाई । खेवट संत गुरु संत मिलाई ॥ पुरुष शब्द सुमिरो लौ लाई । पुरुष प्रताप उतारि चल भाई ॥

नानक वचन

धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । अमरभेद भाषी निज बानी ॥

साखी-तिलघोटत तारी लगी, दिलदरियाके तीर ।

नानककी संशय मिटी, जो सतगुरु मिले कबीर ॥

चौपाई

बहुरि अर्ब यूनानके ज्ञानी । पिंड अण्ड सम तूल बखानी ॥ जो सबही ब्रह्मांडमें देखो । पिंड केर सोई है लेखो ॥ अस्थि पहाड़ है मेघ पसीना । शिर नभ इंद्री कर्म प्रवीना ॥ सुर नर सुनि ग्रंथव अरु देवा । पिंड अण्डमें एकै भेवा ॥ सकल भांतिके पशु खग नाना । कर्म करंत बसै परधाना ॥ भोजन पावक पौरुष जोई । सोई रसोईदार कहोई ॥ जो बल अंतमें भोजन धरई । गन्धी नामक तासुको परई ॥ जो बल रुधिरको श्वेत बनावै । नारि कुचनमें दूध कहावै ॥ अण्डकोष नर बीरज धोवै । धोबी नाम तासुको होवै ॥ भोजन अंगमें बाटनहारा । नाम बंधानी तासु उचारा ॥ जल जो पसीना रूप निकारी । सो कहिये सक्का पनिहारी ॥ जो भोजन मल बाहर डारे । नाम हलाहलखोर सो धारे ॥ बात पित्त जो अन्तर गहई । सोई न्याय करंता कहई ॥ यह विधि सब पशुखगतनमाही । कोध स्वरूपी बीग सो आही ॥ अंड पिंडकी अकथ कहानी । मैं कछु सूक्ष्म लिखा प्रमानी ॥ दोहा-बूँद समाना सिंधुमें, यह जाने सब कोय । सिंधु समाना बूँदमें, जाने बिरला सोय ॥

( २०४४ )

बोधसागर

१३६

कुंडलिया

जाते बिरला सोय होय जब सतगुरु दाय। मैंहि मैं सब ठौर और सबही भ्रम छाया ॥ भ्रम छाया सब और दौर मन ज्ञान कि टट्टी। टट्टी जब टुटि जाय आय नहिं पुनि या हट्टी ॥

इति ब्रह्मांड पिंड

अथ सर्वदेशभाषाकी एकता

दोहा-जेते मानुष जत्कमें, हिंदू सबकी आदि। भाषा सारे जत्ककी, संस्कृत पितु है बादि ॥

चौपाई

संस्कृत कह सोधित जनको। सोई पिता सर्व भाषनको ॥ संस्कृतके जो गुण औगाहा। ताकी नहिं कोई पावे थाहा ॥ वेदकि संस्कृत जो आहीं। अबके पंडित ससुझत नाहीं ॥ एक सूत्रके अर्थ अपारा। कह सब निजु निजु मति अनुसारा। मर्म न जाने अर्थको सोई। यथा बुद्धि भाषे बुध लोई ॥ गूढ अर्थ जाने ब्रह्म-ज्ञानी। गुप्त वस्तु जेहि कछु न दुरानी ॥ संस्कृतको वर्ण बिचारो। और न कहुँ अस युक्ति निहारो ॥ प्रथम संस्कृतको वर्ण माला। और न कोई भाषामें भाला ॥ आदिके अक्षर बारह स्वरको। ब्रह्मस्वरूप जानिये तिनको ॥ अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ कह। औ अं अः रामरमित सब यह ॥ बारह ब्रह्म वसै ब्रह्मंड। कथै कौन सब गुणमय मंडा ॥ एक अकारते बारह स्वर हैं। व्यंजन सकलको परम पितर हैं ॥ सबके आदि है एक अकार। ताते वृद्ध भये पुनि बारा ॥ बारह रूप अकार सो बनेऊ। न्यारे न्यारे कारज ठनेऊ ॥ एक थूल यक सूक्ष्म रूपा। थूल प्रकट सूक्ष्म रह गूपा ॥ थूल अकार जो सूक्ष्म भैऊ। सो सब बरणनमें रमि गैऊ ॥ वासुदेव सब माहि बिहारी। कोई साधुजन सकै निहारी ॥

१३७

जीवधर्मबोध

( २०४५ )

निर्गुणते सरगुण जब भैऊ । ताहीको ककार जग कहेऊ ॥ जब अकार निज रूप गहाया । है ककार दशमें दरसाया ॥ पुत्र पौत्र सही तथा न कर । क ख ग घ ङ दशमें दर ॥ पञ्च ब्रह्म रह दशमें द्वारा । तिनके पुत्र अग्र पग धारा ॥ तालूपर सो कीन बसेरा । च छ ज झ ज सोई टेरा ॥ तिनते पुनि ट ठ ड ढ ण भैऊ । तालू अग्रवास तिन लैऊ ॥ त थ द ध न फिर आगे आये । दंतमूल सो बैठक पाये ॥ प फ ब भ म अधरनपै बैठारी । मुख कपाट सो दीन उचारी ॥ य र ल व श ष स ह क्ष त्र झ अगाहा । बाहरको कर चले उछाहा ॥ खोलि कपाट सो बाहर बिचरे । ब्रह्मवेत्ता बुध बानी उचरे ॥ संस्कृतके हैं अक्षर जोई । सबके पिता जानिये सोई ॥ बारह ब्रह्म सकल व्यंजनमें । धरि लघुरूप रमे सब तनमें ॥ जड़ चेतन सब माह बिहारी । जो चीन्है सो ब्रह्माचारी ॥ वासुदेव है आदि अकारा । सो रमिरहा सकल संसारा ॥ आदि ब्रह्म अकार कहाये । जहँ तहँ सोइ रहा जग छाये ॥ लखोन जाये अलख अविनाशी । सर्व खानिमें स्वतह प्रकाशी ॥ सोई अकार जो भयौ विकारी । रचनासरिसो जक्त पसारी ॥

दोहा-जब अकार ब्रह्मांडसे, भूत मंडलमें आये ।

दशमें दर परथान कर, सोई ककार कहलाये ॥

सो ककार काया रचे, जनक जगत करतार ।

तारण कारण जीवके, गुरु है सो तनधार ॥

चौपाई

अब दुतिये बिधि कहो बखानी । आदि संस्कृत जावे जानी ॥

सर्व वेदकी भाषा जोई । एक मिलान बखानो सोई ॥

सब यूनानके देवी देवा । हिंदूको पूजा अरु सेवा ॥

हिन्दू जाको श्रीकह गाये । सीरिज यूनानी बतलाये ॥

( २०४६ )

बोधसागर

१३८

इत जो देव गणेश बखानी । सो गम्मस रूमी यूनानी ॥ इंद्रको हिन्दू कह देव पितर । उत जु पितर कह लाववप्रधर ॥ हिन्दू अनपूर्णा कह भाषी । अनपूर्णा यूनानी साषी ॥ संस्कृतमें जो पित्र कहावै । सोई पारसी पितर बतावै ॥ अंग्रेजीमें फादर सोई । मातर मादर कहिये जोई ॥ आता प्रादर नाम कहीजै । कृतकार कृतगार भनीजै ॥ अंग्रेजी कृयटार कहावै । हिन्दू सो करताहि बतावै ॥ मिह संस्कृत सूरज भाषा । अरबी मिह नाम सोइ राखा ॥ अब्र संस्कृत बादल बोले । अब्र पारसीमें सोइ खोले ॥ पुत्र संस्कृत सुअन कहावै । अंग्रेजीमें सन बतलावै ॥ पृष्ठ पारसी पुस्त प्रमाना । नैन सो अबीऐन बखाना ॥ सृष्टि संस्कृत कीन बखाना । सो पारसी सरिस्त प्रमाना ॥ दुहिता संस्कृत बेटी होई । सो पारसी दुखतर कह सोई ॥ सो डाटर अंगरेजी माहीं । अस्व अस्य लो हार्स कहाहीं ॥ शब्द अनेक बकी यक ताई । बुधवन्तो सो लेहु मिलाई ॥ भाषा बहुत पढ़े जो कोई । बोलके मेल मिलावै सोई ॥ अब तृतिये दृष्टांत निरेखे । संस्कृत व्याकरण परेखे ॥ जो व्याकरण संस्कृत माहीं । ऐसो शुद्ध और कई नाहीं ॥ संस्कृतसे है अरबी बानी । मिश्री यूनानी अलेनानी ॥ संस्कृतसे सब गुण महि सारी । उक्ति युक्ति कछु भिन्नसवारी ॥ अब चौथे यह भाषो भेदा । सर्व शास्त्रके प्रथमहि वेदा ॥ चारो महा बाल है जोई । संस्कृतमें पुनि उजरी सोई ॥ पुनि पञ्चम अस कहो बखानी । ताते आदि संस्कृत जानी ॥ मुख्य नाम परमेश्वर केरा । संस्कृत की बोलीमें हेरा ॥ और बोलमें आवत नाहीं । संस्कृतमें शुद्ध गहाहीं ॥ अब छठये यहि विधिते सुनिये । ताते आदि संस्कृत गुणिये ॥

१३९

जीवधर्मबोध

( २०४७ )

सत्य कबीरके नाम जो चारो । चहुँयुगमें भिन्न भिन्न उचारो ॥ सत्य सुकृत सुनींद्र कहाये । करूनामय स्वामी बतलाये ॥ कलियुग माह कबीर उचारो । चारों युगके नाम हैं चारो ॥ नाम संस्कृतमें युग तीनी । कलियुग मिश्रीत करि दीनी ॥ अरबी संस्कृत मिश्रीत कबीरा । हिन्दू सुसलमान गुरु पीरा ॥ जेते और कबीरके नाऊ । सबही संस्कृत माह कहाऊ ॥ सतये स्वसंवेद कह येही । अज हरि हर मथुरा धर देही ॥ तीनों देव पिता सब नरके । तीन लोक ब्रह्मा हरि हरके ॥ ब्रह्म श्वासते वेद उपानी । उचरे तीन देव सुख बानी ॥ संस्कृत सुर बानी होई । ताते श्रेष्ठ और नहिं कोई ॥ इति देश

अथ ब्रह्मा और आदमकी एकता—चौपाई

ब्रह्मा आदम एकै अहई । सत्यकबीर बचन अस कहई ॥ ब्रह्मा सावित्री नर नारी । आदम होवा ताहि पुकारी ॥ ब्रह्माको काशीमें वासा । अदनवाग सो नाम प्रकाशा ॥ काशी सम कोइ पुरी न आना । देखो काशी खंड प्रमाना ॥ बन अनंद पथमें कहलाया । वाराणसी बहुरि बतलाया ॥ नाम तासु कहिये पुनि वासी । सब अनंद सब सुखकी रासी ॥ वाराणसी सो भयो बनारस । सुखसे सावित्री ब्रह्मावस ॥ आदिमें कहे जो वन आनंदा । अरबी अदनबाग सुखकंदा ॥ वन है बाग अरबकी भाषा । नाम अनंद अदवसों राखा ॥ उलटि आनंद अदन हो सोई । कहे अरब पारसके लोई ॥ संस्कृतकी बोली बहुतेरी । अरब लोग उलटा कहि टेरी ॥ वन अनंद बाग अदन जो भैऊ । वाराणसी बनारस कहेऊ ॥ अरब न संस्कृत सके उचारी । उलटा सुलटा सो करि डारी ॥ इति आदमब्रह्मा

( २०४८ )

बोधसागर

१४०

अथ मनुशतव्रता और नूहकी एकता-चौपाई

मनुशतव्रता नूहको जानी । पल्लय पयोध जो राख्यौ प्राणी ॥ नाव बहेतरा मनु नृपाला । रच्यौ बचावनजिव तेहिकाला ॥ ताही बहेत्रा सकल चढ़ाई । तेहि औसर जल परलय आई ॥ तब हरि लियौ मीन औतारा । दौय सींग निजु शीशमें धारा ॥ मीन रूप जो विष्णु बनाई । ताहि बहेत्रा शृंग लगाई ॥ भलिबिधि बांधे बहेत्रा ताही । निजु बलते गहि राख्यौ वाही ॥ नाव बाँधि हरि आन्हा दैऊ । मनुजाये तह आसन गहेऊ ॥ लीने सप्तऋषी निजु संगा । आठ जीव बैठे यहि ढंगा ॥ चहुँ दिश तबहि जलामय होई । भे संहार बचा नहिं कोई ॥ तरे बहेत्रा जलके माही । आठो जीव तहां बचि जाही ॥ प्रलैय कीन फिर सृष्टि बसाये । धर्म महम्मद अस बतलाये ॥ प्रलय पिछारी नूह पुकारा । प्रथमें नाम और कछु धारा ॥ आदिको नाम नूह ना होई । बदलि गयौ पीछे ते सोई ॥

इति मनुशतव्रत।

अथ महादेव और महम्मदकी एकता-चौपाई

श्रीमुख सत्यकबीर बखानी । महम्मद महादेव सो जानी ॥ महादेव क्षत्री रन वाके । सोह महम्मदकी है साके ॥ धर्म जासुको शस्त्र प्रहारा । सोई करे सृष्टि संहारा ॥ तमगुण आदिमें वेद बखाना । रुह महम्मद प्रथम उपाना ॥ तमगुण आदि सृष्टिको करता । भवसागर ताते थिर धरता ॥ भव है नाम महादेव केरा । ताते यह भवसागर टेरा ॥ भव भवानी द्वै रूप बनाया । भवसागर सरदारी पाया ॥ शिवके संग नारि द्वै जानी । शीश गंग कटि गौरि भवानी ॥ महम्मदमें मकार द्वै देखो । दोहू नारि तेहि संग विशेषो ॥ दोउ मकार महम्मद नामा । गंग गौरि बरणो वर बामा ॥

१४१

जीवधर्मबोध

( २०४९ )

आप भिखारी अनधन देही । महम्मद महादेव है येही ॥ धन अरु दर्ब चाकरन पाही । आप अलोनो साग जो खाही ॥ महा उदार महम्मद दाता । जत्तमाह सो शिव विख्याता ॥ योग भोग दोनों गुण भीजा । साबर मन्त्रो दोवा तवीजा ॥ योग युक्ति शिववर्त बताया । उत नमाजा रोज ठहराया ॥ ये ऊँकार शब्द गोहरावै । वे भोरे उठि बाग उठावै ॥ खड़ी एक नस महम्मद माथे । दंडाकार तिलक तेहि साथे ॥ प्रकट दोऊ भृकुटीके बीचे । मस्तक अंत प्रजंतलों खींचे ॥ जस कबीरमुनि तिलक कराही । सोई महम्मद मस्तक माही ॥ कोधवंत जब महम्मद बोले । तेहि औसर सोई नस डोले ॥ रोमधार यक उर बिच धारी । सोऊ दंडाकार सँवारी ॥ नाभिते कंठप्रजंतलो सोही । जन कबीर मुनि रूप है ओही ॥ शिवके संग रहे बहु देवी । तिमि बहु तारि महम्मद सेवी ॥ चीन्ह चक्र सब ताके साथ । आदिभक्ति सोई पशुनाथा ॥

इति श्रीमहादेव और भहम्मदकी एकता

अथ हनुमान और अलीकी एकता

छन्द—मूलना

हंक हनुमानते लंकमें शंकभ अलीके हंक गढ बंक टूटे । अली हनुमान दोऊ बांहके बली अरि अनी दलमली ज्यौ सनी कूटे ॥ १ ॥ शूद्र जेहि शत्रुगण वीर्य सामुद्रधन रुद्र शिव देखि दल दैत फूटे ॥ शूर संग्राममें गुणनके धाम दोऊ अली हनुमान गुणमाहँ जूटे ॥ २ ॥

इति हनुमान

अथ परशुराम और मूसाकी एकता—चौपाई

परशुराम मूसा यकताई । ऐसे दोहुको मेल मिलाई ॥

( २०५० )

बोधसागर

१४२

विप्र अवज्ञा कीनो हरिकी । क्रोधवन्त कमला तबसरकी ॥ विष्णुकि छाती चरण प्रहारा । सब दुःख द्रन्द्व घेर तिहि बारा ॥ रहे बेहाल काल बहु तेरे । तब प्रभु तिनिहि दयाद्वग हेरे ॥ परशुराम लीनों औतारा । ब्राह्मण कुलको पा ८नहारा ॥ विद्या बुद्धि तपोधन धारी । रूप शील बल वीरज भारी ॥ सो द्विजराज काज चित दीने । क्षत्री मारि निछत्तर कीने ॥ तथा यहूदिन विकल विचारा । तब मूसा लीनो औतारा ॥ सो फिर उनको मारि नसाया । इवरानिनको प्राण बचाया ॥ विद्या बुद्धि निपुण गुणखानी । बल वीरज शोभा सरसानी ॥ परशुराम कर फरसा जोटा । तैसे मूसाके कर सोटा ॥ जैसे ब्राह्मण तथा यहूदी । दोनों माह देखिये खूदी ॥ कुल अभिगान दोहुनमें भारी । अबिरहाम वंश तन धारी ॥ परशुराम मूसा यक सारा । दोनों विष्णु केर औतारा ॥

इति परशुराम और मूसा

अथ कृष्ण और कृष्णकी एकता—चौपाई

कृष्ण कैष्ट दोउ एक समाना । हरि औतार धरे नर बाना ॥ कैष्ट नाम ईसाको आही । अंग्रेजी बोलीके माही ॥ हिंदू कहे कृष्ण जगदीसा । ईसा इनके ईस हैं ईशा ॥ कृष्ण आगमन जबहि जनायौ । सो सुनि कंसराय भय पायौ ॥ इसा जन्म भव्य सुनि काना । तबहि रोद भूपति भय माना ॥ कृष्ण जोजन्म भयौ जेहि बारा । चहुँदिस फैल गयौ उजियारा ॥ कंसकी डर वसुदेव डेराये । मथुरासे गोकुलमें ल्याये ॥ यथा कृष्ण मथुराको त्यागे । तैसे ईसाको ले भागे ॥ गर्भसे जब ईसा प्रकटाने । चहुँदिश तबहि तेज चमकाने ॥ यूसुफ नृप हिरौद भय पाई । ले मसीहको मिश्र सिधार्ई ॥ कृष्ण जन्म सुनि कंस डेरायो । केते बालक मारि नशायो ॥

१४३

जीवधर्मबोध

( २०५१ )

ईसा भय हिरोद भूपाला । हने बहुत बालक तेहि काला ॥ रोग अनेकन कृष्ण घटाये । जीव केर दुःखद्वन्द्व हटाये ॥ मृतकहूको फेरि जिलाये । गुण अनेक कहलों बतलाये ॥ सा सबही गुण ईसा माहीं । देखि द्वैतदल दूर पराहीं ॥ इन असुरनको मारि नशाया । उन भूतन अरु प्रेत भजाया ॥ कुबरी कूबर कृष्ण सुधारा । तिमि ईसा कुबरी सुखसारा ॥ साठि हजार शिष्य संग लयऊ । दुर्वासा ऋषि आवत भयऊ ॥ चावल एक कृष्ण भंडारा । सबको तृप्त कीन तेहि वारा ॥ रोटी पांच मीन द्वै रहई । सो मसीह निज करमें गहई ॥ पांच हजार भीर नरदीसा । सबको पेट भन्यौ तेहि ईसा ॥ ज्वाला कठिन कृष्णकर घाटा । ईसा अंधकारको डाटा ॥ अर्जुन पर हरि कीनी दाय। तिहि निजरूप विराट देखाया ॥ तिमि ईसा शोभा सरसाई । निजशिष्यन निजरूप दिखाई ॥ कृष्णमें केते गुण सरसाई । तिमि कोइ गुण ईसा अधिकाई ॥ कृष्ण किष्ट दूनों यक रूपा । उभय भये भवसागर भूपा ॥ कृष्णमृत्यु जिमिप्रथम बताया । भील तीरते प्राण नसाया ॥ जगमें जगन्नाथ जग मगही । कृष्ण अस्थि हरिमेला लगही ॥ ईसा को तिमि क्रूस चढाये । जिये बहुरि निज पंथ चलाये ॥ इन गीता उत कथा इञ्जीला । दोनों विष्णु स्वरूप सुशीला ॥

इति श्रीकृष्ण और कृष्णकी एकता

अथ राजा और पण्डितकी एकता चौपाई

राजा पंडित एक समाना । जगमें श्रेष्ठ दोहूका जाना ॥ राज पाये इनके मद भारी । विद्या मद उनके अधिकारी ॥ ये बस करे सेन ले लोहा । अमृत वचन ते मेमन मोहा ॥ ये धन हरबे मनको हरते । हुकुम दोहूको जगमें बरते ॥ इन धन अरु दर्प घनेरा । उनके विद्या धन बहुतेरा ॥

( २०५२ )

बोधसागर

१४४

दिग विजयी दोनों तन धारी । विषयानंद अहै संसारी ॥ इनकी तृष्णा न धनते हटई । वह दिन दिन विद्यामें डटई ॥ धन विद्या बन माह भुलाने । ताते नहीं सतपदको जाने ॥ दोना जो विषयनको तजई । है निरद्वंद जो हरि पद भजई ॥ जत्कमें उत्तम देखो जैसे । भक्तमें श्रेष्ठ होहि सो तैसे ॥ विद्या भक्तिको अंग विचारी । तासु दृष्टि पांडितको भारी ॥ ताते बुध नृपते बड़ अहई । वेद प्रमान शास्त्र अस कहई ॥ विद्याधन सब धनन बड़ेरा । अंग सद्ग ताको नित हेरा ॥ राजकर्म पंडित आधीना । बिन पंडित हो महीप मलीना ॥

इति एकता

अथ भवसागर वर्णन

दोहा-भवसागर वर्षा न करो, सुनो सयाने सन्त । जामें गोता खात जिव, लहै न कोई अन्त ॥ सोरठा-भाँति भाँतिके जीव, चौरासी लख योनि जग । विलग विलग कर पीव, खानि-खानि बिलगायके ॥

चौपाई

यह भव उदधि अपार बखाना । गोता खाहि जीव विधि नाना ॥ चौरासी लख योनि भ्रमावै । बूढ़े उछले पार न पावै ॥ जेते जीव भवनधि तन धारी । मानुष देह मुक्ति अधिकारी ॥ सो मानुष तन दुर्लभ कैसे । जैन धर्म वर्णन कर ऐसे ॥ यह दृष्टांत सुनाये सोई । अस चौड़ा सागर जो होई ॥ कोटिन योजनकी चौड़ाई । भवनधि थूल कहा कहिजाई ॥ बैल केर जूवा गहि लीजै । जूवा डंडा अलग करीजै ॥ तेहि समुद्रके एक किनारे । जूवाको डंडा गहि डारे ॥ जूवा डारे दूजे छोरा । मारे वायूको झकझोरा ॥ बहुत फिरे डंडा अरु जूवा । बहै सदा इत उत सो हूवा ॥

१४५

जीवधर्मबोध

( २०५३ )

जो संयोग कबहु गह सोई । जूवा दंड यकठे होई ॥ आपै आप मिले जो आई । पैठे ताहि छिद्रमें जाई ॥ बिन सहाय जूवामें पैठे । पहिली ठौर ठेकाने बैठे ॥ ऐसी दुर्लभ मानुष देही । चौरासी भ्रम पावै येही ॥ धर्म महम्मद बहुरि बतावै । एक बार मानुष तन पावै ॥ सूसा ईसा मतमें सोई । फेर नहीं मानुष तन होई ॥ वेद करे पुनि ऐसे वर्णन । पुनि पुनि जीव लहै मानुष तन ॥ आठ लक्ष योनी भ्रमि आवै । पुनि गह जीव मनुष तन पावै ॥ सत्यकबीर जो बचन उचारा । अति दुर्लभ मानुष औतारा ॥ नरतनु पाये न भक्ति विचारा । सो पापी आतम हत्यारा ॥ सुरदुर्लभ यह मानुष देही । सो तन लहै भजु परम सनेही ॥ चार खानिके जीव अपारा । जो थावर जंगम तन धारा ॥ कोइ दीर्घ कोइ सूक्ष्म देखो । भारी थूल हरु लघु लेखो ॥ नाना वर्ण और गुणधारी । पूरि रहे भवसागर झारी ॥ युगन प्रजंत काहु थित गाई । अतिसै लघु आयू कोइ पाई ॥ स्वर्ग नर्क चौरासी लाखा । सो सब अंड पिंडकी साखा ॥ भवसागर त्रिदेव भे राजा । सब जिव तिनके देठ विराजा ॥ सोई सुर सुरपति शिरताजा । तिनके हाथ है काज अकाजा ॥ भवसागरमें द्वै तट जानो । एक लोक यक वेद बखानो ॥ वेद कूलपर मन आसीना । लोकछोर माया गहि लीना ॥ मध्यमें तीन देव गुणधारी । महा अपर्बल पाँच शिकारी ॥ भ्रमसागर कहिये भवसागर । दश दिश काल मचायौ झागर ॥ भव पुनि भगको नाम कहावै । तामें सब जिव आवै जावै ॥ भव शिव नाम भवानी पतिको । जीव लखै को ताकी गतिको ॥ तीनों लोक वसै भग माही । बिन गुरु कृपा न बाहर जाही ॥ कोटिन योग युक्ति जो करिये । भग मारग पुनि पुनि पग धरिये ॥