कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(७४९)
आपदा, एही बड़ी अनरीती ॥ स्वीर समान साग हम पाये, गावत रैन बिहाई। कहैं कवीर दासकी महिमा, आप श्रीमुख गाई॥
राग कान्हरा आरम्भः ।
राग कान्हरा १—जा कुल भक्त भागवत होई। गिनिय न अवरन बरन रंक धन, विमल वंस मानिये निज सोई ॥ टेक ॥ ब्राह्मन छत्री वैश्य सूदलौ, नारि चंडाल मलेच्छ जो होई । होय पुनी तजे भगवंता, आप तरे तारे कुल दोई॥ धन वही गांव ठांव सोह पावन, होत पुनीत संगके लोई । सुर पंडित अरु निरपति पादसाह, भगत बरोबर तुले न कोई ॥ गहत सार पद पीवत ग्यान रस, तजि संसार जानि जस छोई । पुरइन पत्र समान रहत जल, कहैं कवीर जगमें जन सोई ॥
राग कान्हरा २—बहुत दिननसों प्रीतम पाये। भाग भले घर बैठिहिं आये ॥ टे० ॥ मंगल चारि मांहि मन राखूं । राम रसायन रसना चाखूं ॥ मंदिर माहिं भयो उजियारा । ले सूती पि्या अपना पि्यारा ॥ मैं जो निरासी जो निधि पाई । हमरो कहा पि्या तुमरी बड़ाई ॥ कहैं कवीर हम कछु नहिं कीनो । सहज सुहाग राम मोहि दीनों ॥
राग कान्हडा ३—अब तोहिं जान न देऊँ रामा प्यारे । ज्यों भावे त्यों रहो हमारे ॥ टे० ॥ बहुत दिननके बिछडे पाये । भाग भले घर बैठिहिं आये ॥ चरन लागि कहैं बरियाई । प्रेम प्रीति राखूं उरझाई ॥ आय बसो मन मंदिर चोखे । कहैं कवीर परो मति धोखे ॥
राग कान्हडा ४—अब मोहि राम भरोसो तोरा । को काहू का करै निहोरा ॥ टेक ॥ जाके हरि अस ठाकुर भाई । सो क्यों अनत पुकारन जाई ॥ तीन लोक जाके सिर भारा । क्यों न करे जनकी प्रतिपारा ॥ कहैं कवीर सेवो बनवारी । सींचो मूल फले सब डारी ॥
(७५०)
कवीरपंथी-
राग कान्हड़ा ५-चल मन हरि चटसाल पढाऊँ । जात कुमार मारग लाऊँ ॥ टे० ॥ पाटी प्रीति सुरतिकी लेखन, रराँ मम्मा दोय अंक लिखाऊँ ॥ गुरुकी साटि शब्दकी औपटि, बिच बिच सहज समाधि लगाऊँ ॥ बावन भित्र रहत जोइ अच्छर, सो पद परसि बहुरि नहिँ आऊँ ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, हेलो मारि कहि समझाऊँ ॥
राग कान्हड़ा ६-नाम मोर पूंजी नाम मोर धना । या पूंजीसे लगो मेरो मना ॥ टेक ॥ या पूंजी है अगम अपारा । कोई इक बनिजे साहूकारा ॥ अगिन जरे न ईली खाय । राजा डंडे न चोर लेजाय ॥ खेती करै न बनिजन जाय । नाम खजीना वैठा खाय ॥ कागद चढै न कृता होय । कहैं कवीर धन पाया सोय ॥
राग कान्हड़ा ७-भजन विन तीनों पन विगडे । चेतो रे नर जीवन थोडा, काल करत नित झगडे ॥ टे० ॥ बालपना बालपन खोये, अरू तरुण पन टेडे । बिरध भयो तब काल गरासे, अंध होय निवेडे ॥ मन भुजंग मायाको मातो, बोलत है करडे । जबहिँ हंसा देत पयाना, मांढी होय निवडे ॥ मानुष देह धरि काहेको, पशु न भया कहुरे । कहैं कवीर सुनो भाई संतो, कोई संतहि ध्यान धरे ॥
राग कान्हड़ा ८-अब देखो विसरी गया इहाँ आय । अति मंद मस्त मोह तन छाकै, फिरत लटेम कराय ॥ टेक ॥ जननीके गरभ उरध मुख झूल्यो, तहाँ रहै दुख पाय ॥ अति संकट तहाँ भाठी औटे, मलमै मूँड गडाय ॥ ता दिन तेरे कौन संग था, खान पान पहुँचाय । जाको पिता प्रान पति कहिये, ताको क्यों विसराय ॥ अति मति हीन बुधि तुच्छ तनमै, सब विधि हाथ पराये । कहैं कवीर मृग सर लागा, वालि विषैके खाये ॥
शब्दावली
(७५१)
राग कान्हडा ९-जाय रे दिनहिं दिन देहा । करिले बावरे राम सनेहा ॥ टेक ॥ बालापन गयो जीवन जासी । जरा मरन भव संकट आसी ॥ पलटे केस नयन जल छावे । मुखर खेत बुढापो आवे ॥ राम कहत लज्जा नहिं कीजै । पल पल आयु घटै तन छीजै ॥ लज्जा कहै मैं जमकी दासी । एक हाथ सुदूर दूजे फांसी ॥ कहैं कवीर तिन सरबस हारा । राम नाम जिन मना विसारा ॥
राग कान्हडा १०-कहा मांगू कछु थिर न रहाई । देखत नैन चला जग जाई ॥ टे० ॥ एक लख पुत्र सवा लख नाती । ता रावन घर दिया न बाती ॥ लंका सो कोट समुद्रसी खाई । ता रावनकी खबर न पाई ॥ सोनेदा महल रूपेदा छाजा । छोड़ि चला नगरीका राजा ॥ को कर महल को कर टाटी । उड़ि गया हंस पड़ी रहि मांटी ॥ आवत संग न जात संवाती । कहा भयो द्वारे बांधे हाथी ॥ कहैं कवीर अन्तकी बारी । हाथ झारि जस चले जुआरी ॥
राग कान्हडा ११-सोइरे अजीत जो कालहिं जीते ॥ टेक ॥ निरख होय तो शब्दहिं पावे, शब्द कहै मोहि दिठ करि लीजै ॥ बहुरि नहिं कछु दोष हमारा, अपने अवगुन आपही छीजै ॥ जारसो रहै खसम सों हसे, कहो सुहागि कैसे कै दीजै ॥ जार रुठे तब जाय मनावे, हमहिं देखि कछु परदा दीजै ॥ सब कोइ साधु कहे चलनेको, चल न सके तेहि कैसे कीजै ॥ इन बातन सो अमर घर चाहे, कहो अमर घर कैसे दीजै ॥ यही उछाह कहै सब कोई, जानि बूझिकै अंतर भीजै ॥ कहैं कवीर सोई हंस निरखियो, शब्द हमारा हमहिं पतीजै ॥
राग कान्हडा १२-कहा भयो मुख राम कह्यो रे । ज्यों भुजंग मंत्रन वस कीनो, अन्तर्गत वाको विष न गयोरै ॥ टेक ॥ माला तिलक भेष धरि हरिको, मांगत मांगत जन्म गयोरै ॥ जैसे बधिक
(७५२)
कवीरपंथी—
ओट टाटी की, बहु जीवनको दाव दियोरे॥ अन्तर कपट बचन सुख शीतल, तन अधीन मन तऊ न नयोर॥ कहैं कवीर ताको सग न कीजे, विन विवेक जिन भेष लयोर॥
राग कान्हडा १३—जो तैं हिरदयमें राम न जान्यो। तसबी गहे कहा भौ भाई, कहा कितेब बखान्यो॥ टेक॥ स्याही गई सफेदी आई, दिल सफेद अजहुं न हुआ॥ हुजरे निमाज बांग क्या दीजै, हुजरे भीतर पैठि सुआ॥ आन्यो जीव पछाड्यो परबस, गला काटि सिर भार लिया॥ जीवता मारि मूदौर किया है, ताको कहै हलाल किया॥ अपना किया न बूझै सुगधा, कहै हमारो बडेन किया॥ उनकी स्नूत तुम्हारी गर्दन, जिन तुमको उपदेश दिया॥ जाहि मांसकुं तुम पाक कहत हो, ताकी उत्पत्ति सुन भाई॥ रज वीरजते मांस उत्पाने, मांस न पाक लखाई॥ वेद पठै पठि पंडित भूला, काजी पठि रहु कुराना॥ कहैं कवीर ते नर नरक पड़ेगे, जिन आतम राम न जाना॥
राग कान्हडा १४—कहा पंडिताई भूलोरे प्रानी। सतनाम जप अमृत वानी॥ टेक॥ घरही पंडित युधिष्ठिर केरा। काहे न घंट बज्यो तेहि वेरा॥ कोटिन विप्र जिमायो राजा। सुपच भगत विन घंट न बाजा॥ पठिलिय भारत चारिवों वेदा। विन सतगुरु नहिं पायो भेदा॥ सुपच भगत कीनी जिवनारा। बाज्यो घंट भई झनकारा॥ कहैं कवीर हम सब कहु जाना। देखत गनिका चढी विमाना॥
राग कान्हडा १५—सतगुरु अहरिन अजब बनाया। एक मठीके दस दरवाजा, सरब तत जहैं लपटाया॥ टे०॥ अहरन आनि अग्निमें पटकी, घनवां पांच लगाया॥ सुरति सँडासी हरष हथोडा, अकिल आँकडा लाया॥ स्वांस उस्वांसकी नाल बनाई, उलटा
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(७५३)
पवन चलाया ॥ करम काठका कोयला झोंक्यो, अकरम कीट जलाया ॥ मन लोहाको इस विधि ताया, ताव भला बनि आया ॥ सील साँचकी चाँडी रोपी, तामैं आनि बुझाया ॥ तोल न मोल हलकों नहिं भारी, ऐसा रतन निपजाया ॥ कहैं कवीर बलि बलि सतगुरुकी, लोहा करि पारस लाया ॥
राग कान्हडा १६-मन नटनीको निरत विचारी ॥ टे० ॥ गागरि पाँच धरी शिर ऊपर, वरत चढी यक नारी ॥ तन मन दियो बरतके ऊपर जैसे भरे पनिहारी ॥ आडौ बाँस सलियाकर तोलैं, दाबी पांव तर थारी ॥ आपन नाचै रिझावे जगको, आप जगतसों न्यारी ॥ गुरुका शब्द गहै कर दंतै, कटिसों बाँधि कटारी ॥ नौ नारी मिलि खेल रचो है, तन मन हो हुशियारी ॥ जैसे मकडी उलटि तारसों, पलटि गहै फिर तारी ॥ ऐसी कला नाच मन मोरा, तरत न लागे बारी ॥ तीन लोक चौथे मतवारी, छर अच्छर सो न्यारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, पंचे रीझ भई भारी ॥
राग कान्हडा १७-अब हम सकल कुसल कर जाना । सती भई जब सहज समाना ॥ टेक ॥ तनमें होती कोटि उपाधी । उलटि भई सुख सहज समाधी ॥ बैरी उलट भया है भिकता, साकट उलटि भयो है संता ॥ जमतें उलटि भया है रामा । दुख विसरा सुख किय विसरामा ॥ आप जानि उलटि लै आया । तब नहिं व्यापै तीनों तापा ॥ अब मन उलटि सनातन हुआ । तब हम जाना जीवत मूवा ॥ कहैं कवीर सुख सहज समाजै । आप डरुं नहिं और डराऊं ॥
राग कान्हडा १८-अब हम एक एक करि जाना । दूजा कहै ताहिको दोजक, जिन तू नहिं पहिचाना ॥ टेक ॥ पवन पावक पानी पृथ्वी नभ, एक जोति संसारा ॥ एकहि खास घडे बहु
(७५४)
कवीरपंथी—
भांडा, एकहि सिरजन हारा ॥ जैसे बढई काठहिं काटै, अगिन न काटै कोई । ऐसे व्यापक है सबहिनमें, रवि स्वरूप है सोई ॥ माया मोह करि जगत भुलाना, गरंथ देखि गरवाना ॥ होय निःशंक शंक नहिं व्यापै, कहैं कवीर दिवाना ॥
राग कान्हडा १९—अब मैं पायो ब्रह्म ग्यान । सहज समाधी मुखमें रहिबो, कोटि कलप विसरान ॥ टे० ॥ गुरु कृपाल कृपा जब कीन्हा, हृदया कमल बिगासा ॥ भागा भरम दसों दिसि सूझा, परम ज्योति परगासा ॥ मृतक उठी धनुष कर लीन्हा, काल अहेरी भागा ॥ उदसिया सूर निसि किया प्याना, सोवतते तब जागा ॥ अविगत अकल अनुपम देखा, कहता कहो न जाई ॥ सेन करै मनही मन राखे, गुंगे जान मिठाई ॥ पुहुप बिना एक तरुवर फलिया, बिन कर तूर बजाया ॥ नारी विना नीर घट भरिया, सहज रूपसो पाया ॥ देखत काँच भया मन कंचन, बिन बानी मन माना ॥ उडा विहंगम खोज न पाया, ज्यों जल जलहि समाना ॥ पूजो देव बहुरि नहिं पूजूं, नहाय उदक न नहाऊं ॥ भाग्या भरम एकहि कहता, आप बहुरि नहिं आऊं ॥ आपामें जब आप निरखिया, आपनमें आपहिं सूझा ॥ आपहिं कहत सुनत पुनि आपै, आपनमहिं आपा बूझा ॥ अपने परिचय लागी तारी, आपनमें आप समाना ॥ कहैं कवीर जे आप विचारे, मिटिगा आवन जाना ॥
राग कान्हडा २०—कौन मरे जन्मे को आई । सुरग नरक कौन गति पाई ॥ टेक ॥ पांच तत्त्व अविगत तैं उपजा, ये कै किया निवासा ॥ विछुरा तत्त्व फिर ततैं समाना, रेषहिं रही न आसा ॥ जलमें कुंभ कुंभमें जल है, बाहर भीतर पानी ॥ बिनसा कुंभ जल जलहि समाना, यह तत कथै सु ग्यानी ॥ आदे गगना मधे
शब्दावली
(७५५)
गगना, अंतहि गगना भाई॥ कहै कवीर करम काहे लागै, झूठौ सकल उपाई ॥
राग कान्हडा २१-ताहि विचारो पंडित लोई । जाके रूप बरन नहीं होई ॥ टेक ॥ पिंडमें प्रान कहाँ तैं आवै, सुवा जीव कहु कहाँ समावै ॥ इंद्री कहाँ करै विसरामा । सोँ कित गया जो कहता रामा ॥ पांच तत्त्व जहाँ सबद न स्वादा । अलख निरंजन विधी न वादा ॥ कहैं कवीर मन मनहि समाना । अगम निगम झूठ करि जाना ॥
राग कान्हडा २२-मन मेरा पंछी विलमत हीरारे । गुरुका सबद एक अजर अमर है, धूप छाँह दुख डुंद नहींरे ॥ टेक ॥ अमर लोक हंसनका वासा, सुख सागर सुख लेत तहीरे ॥ तहँके गण बहुरि नहीं आवै, करत अनंद दुख डुंद नहींरे ॥ कपटकी पांघ द्वारि निरवारो, जो ले उडत विकार महीरे ॥ सुरतिकी चाँच संवारि सबैरे, नाम चुगै चुग रहु ढिगहीरे ॥ निरमल नाम जपौ हिरदामैं, बार बार मैं तोहि कहीरे ॥ आवागमन मिटै तब तेरो, बहुरि न या जग जनम लहीरे ॥ सदा आनंद होत है वा घर, कबहुँ न होत उदास वहीरे ॥ कहैं कवीर जहाँ अधिक जाल नहीं, गुर मारग चलि जाय तहीरे ॥
राग कान्हडा २३-हरिजन हंस दिसा लिय डोलै । निरमल नाम चुनि चुनि बोले ॥ टे० ॥ मान सरोवर तटके बासी । राम चरन रति आन उदासी ॥ सुकताहल बिन चोंच न लावै । मौन रहे कै हरिगुन गावै ॥ कौआ कुबुधि निकट नहि आवै । सो हंसा निज दर्शन पावै ॥ कहैं कवीर सोई जन मेरा । नीर पीरका करै निवेरा ॥
राग कान्हडा २४-धोषैही धोषै डहकायो । समुझ न परी सनद सतगुरकी, बहु फंदनमें आय फदायो ॥ टे० ॥ सुवना एक अंबके
(७५६)
कवीरपंथी—
भोरे, सेवा करन आक की आयो॥ मारी चोंच जब हूओ उडायो, छीर शरीर अंग लपटायो ॥ रातो फूल देखि सेमलको सुवना, अंत वासों नेह लगायो ॥ मारी चोंच फल गयौ दूटि जब, उडि गयो तूर तिवारो आयो॥ उडि न सकै बहु परचो झोलमें, तातै नाम किर जुवो कहायो॥ कहै कवीर नीचकी संगति, जाति गई औ जनम गवाँयो ॥
राग कान्हडा २५—नाम विना धिक धिक नर नारी । कहाँ ते आय कियो संसारी ॥ टे० ॥ धिग वो रसना धिग वो कामा । चीन्हो नाहीं आतम रामा ॥ जा कुल पुत्र न भक्ति विचारी । जनमत क्यों न मरी महतारी॥ भरम सुचे सुच रही क्यों न बंझा । सुकरी रूप फिरै जग मंझा ॥ विधवा नारी करत सिंगारा । शोभा न पावे बिन भरतारा॥ वेश्याके पुत्र पिता कासो कहै । बिन गुर चेला ग्यान कैसे लहै ॥ राज बिना कैसी रजपूता । ग्यान बिना फोकट अवधूता ॥ जा कुल नाही हरिको दासा । सो कुल जानो ठाक पलासा ॥ कहैं कवीर भक्ति निज सारा । जो चीन्है सो उतरे पारा ॥
अथ राग काफी प्रारम्भः ।
राग काफी १—मैं तेरा दीदार हो दीदार दिवाना । घडी घडी तुझे देखा चाहों, सुनु साहेब रहमाना ॥ टे० ॥ पडा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यू घरका बंदी जादा ॥ नेकी कुलाह लिये सिर ऊपर, गलै प्रेमका धागा ॥ हुआ अलमस्त खबरि नहीं तनकी, पिया जो प्रेम पियाला ॥ ठाढे होय करि झुकि झुकि परते, तैरे रंग मतवाला ॥ तसबी और निमाज न जावूँ, ना धरि जानौ रोजा ॥ बंग जिकिरि जबहीसँ विसरायो, जबते तन मन खोजा ॥ कहैं कवीर कजा
शब्दावली
(७५७)
नहीं करना, दिलहीसे दिल लाया ॥ मक्का हज् हिंय बिच हिंजरत, पूरा सुरसिद पाया ॥
राग काफी २—सतगुरु हो महाराजा मोपै राम रंग डारा ॥टेक॥ सबदकी चोट लगी मेरे तनमें, बेधि लिया तन सारा ॥ औषध मुरि कछुओ नहीं लागे, का करे वैद विचारा ॥ सुर नर मुनिजन पीर औलिया, कोइ न पावै पारा ॥ दास कवीर अब रंग रंगिया, सब रंगन रंग न्यारा ॥
राग काफी ३—दूर नहीं रहमाना कोई सबद विचारो, दूर नहीं रहमाना ॥ दूर भटक नहीं मरना रे यारो, नेरेही मन माना ॥टे०॥ एक जो खोजियारे, दूजा दिलहि समाना ॥ खोजत खोजत थकित भये हैं, हिन्दू मुसलमाना ॥ कहा पढ़ि लीये वेद पुराना, कहा कथ लीये ग्यानाना ॥ गुरु पीरसो पाईये तब, पहुँचे जाय ठिकाना ॥ सबद विचार रहो तुम सन्मुख, नेरैही मन माना ॥ बंदे तू करे बन्दगी, तोहि साहब पै जाना ॥ एकम एका होय रहा है, ज्यों जल जलहि समाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, लगा निरंतर ध्यानाना ॥
राग काफी ४—नैना आशिक मेरा महबूब तूही है । जित देखु तित याही मूरति है, यामें अनंत चितेरो ॥ टेक ॥ ऐसा नैन लालची मेरा, तुमही मैं खूब खूवैरा ॥ जब देखु मैं अपनी मूरतको, निकट बिराजत नेरा ॥ ऐसी प्रीति लगी तुम मांहीं, जैसे चंद चकोरा ॥ देखत देखत उलटि परी है, यूं मन लग्यो जु मेरा ॥ गांसी सार सबदकी, घायल लेत घुमेरा ॥ उरझि पुरझि रह्यो बंक नालमें, सुरझत नाहिं सुझेरा ॥ लगन लगी कोई लाख कहोरे, छूटत नाहिं हटेरा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मिटि गौ सकल अंधेरा ॥
(७५८)
कवीरपंथी—
राग काफी ५—नैनन माझ बसाऊँ जो मैं साहिब पाऊँ ॥ टे० ॥ नैननमें मेरा साहेब वसदा, डरती पलक न लगाऊँ ॥ एक टक ठाढी पंथ निहारौं, पलकसौं पलक न लाऊँ ॥ त्रिकुटी महल में बना है झरोखा, जहां सुख झाँकी पाऊँ ॥ अकह महलमें चवँर ढुराऊँ, सुखकी सेज विछाऊँ ॥ पियाको परसि भई पटरानी, आनंद मंगल गाऊँ ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सिंधु बुंद मिलि जाऊँ ॥
राग काफी ६—लेखा तेरा लीजैगा रे सुनु दिल महरम यार ॥ टे० ॥ चलना दूरि अभी कयूं थाकयो, पंथ खड़की धार ॥ हकहि साखी न्याव जो होयगा, वा सांचे दरबार ॥ धरम राय जब लेखा मांगे, परत गुरजकी मार ॥ घरकी नारी प्रान सों प्यारी, सो न चले तेरे लार ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, हरि भजि उतरो पार ॥
राग काफी पंजाब ७—साहबसों लौ लाव हो मन गरब गुमानी ॥ टे० ॥ आज कालि अरु पांच दिनामें, आवैगे जमदानी ॥ हाथमें मुगदर लोहका, तेरी खूब करै मिजमानी ॥ पल पल आयु घटे छिन छिनमें, ज्यों अंजुली जन पानी ॥ अब तू समझि देख दिल अपने, सुरति करौ पहिचानी ॥ हस्ती घोडा छत्र सिंहासन, दुनियां देखि लुभानी ॥ बाँह पकड़ि जम ले चले जब, होयगी ऐचातानी ॥ भयो नर अंध मगन मायामें, ज्यू कपि मूठ बंधानी ॥ कर्म डोरि बाजीगरके बस, घर घर नाच नचानी ॥ हिल मिल एक जो होय रहै, सबदमें सुरति समानी ॥ अग्रदास दीदार दिवाना, दरिया बुंद मिलानी ॥
राग काफी ८—येही हाल फकीरा हंदा, सुन लीजो सब कोई बे ॥ सुरग मिरत पताल लोककी, फिकर फकीरौ खोई बे ॥ टोपी तत खवनी चितवन, सीगी अनहद सोई बे ॥ नाम निरंतर चोला पहिरे,
शब्दावली
(७५९)
सेली सुरति समोई बे॥ जत कोपीन सत आडबंद, मगन पतंगा होई बे । सिरजनहार तिलक सिर ऊपर, सुमरन कंठी पोई बे ॥ भिच्छा भाव सहजकी चीपी, झोली अकल जुठोई बे । जो देवै जाइपै लेवे, ऊँच नीच नहिं कोई बे॥ सेज भोम अकास ओढना, जोति चंद्रमा जोई बे॥ पवन रैन दिन करै षवासी, दिठ आसना परि सोई बे ॥ धुनी ध्यान धकावै रैन दिन, फिकर फावडी होई बे॥ आशा तृष्णा इंधन लकरी, धूंनी माहिं धकोई बे॥ उन सुनि दिष्ट उदास जगतसे, निस प्रेही निरमोही बे ॥ तरक त्यागबैराग धारना, राव रंक नहिं जोई बे ॥ एका एकी रहै अवनि पर, दिलकी डुरमति खोई बे ॥ कहैं कवीर अलमस्त फकीरा, आय निरंतर सोई बे ॥
राग काफी ९-वाह वाह गुजरान फकीरी दी ॥ टे० ॥ कबहुँक सौड निहाली पथरिया, कबहुँ भूत सरीरो दी ॥ कबहुँ टुकडा बासी कूसी, कबहुँक खीर मलीदो दी ॥ कबहुँक ओढै मल मल खासा, कबहुँ गुदडी लीरों दी ॥ कबहुँक मैडी कबहुँक मन्दर, कबहुँक आसन चौडो दी॥ कहैं कवीर परवाह न किसी दी, एक परवाह गुर पीरो दी ॥
राग काफी १०-रस मगन भया जब क्या गावै॥ टे० ॥ दिल दरियाव सदा जल निरमल, अनत नहावनकूँ कहैं जावै॥ जाग्रत सुषन सुषोपति तुरिया, भँवर गुफामें घेर छावै॥ इंगला पिंगला सुषमन नारी, वंक नालकी सुधि पावै॥ त्रिकुटी ऊपर ध्यान लगावै, अविनाशीकूँ लखि पावै॥ कहैं कवीर सिष पर बैठा, आवागवन जब मिटि पावै ॥
राग काफी ११-मेरा दिल लगा फकीरीमें ॥ टे० ॥ जो सुख पायो नाम भजनमें, सो सुख नाहिं अमीरीमें॥ भली बुरी सबकी
(७६०)
कबीरपंथी—
सुनि लीजे, करि गुजरान गरीबीमें ॥ प्रेम नगरमें रहन हमारी, भली बनि आई सबूरीमें ॥ कहैं कबीर दया सतगुरुकी, पाई भगति जगीरीमें ॥
राग काफी १२—दिल मगन भया जब क्या बोलै ॥ टे० ॥ तेरा साहेब है तुझ माहीं, बाहर नैना क्या खोलै ॥ मान सरोवर हंसा बासी, डाबर डाबर क्या डोलै ॥ सुरति कलाली भयी मतवाली, अमृत पाया बिन तोलै ॥ हस्तीकी चाल चलु मन मेरा, बाहर भीतर क्या डोलै ॥ कहैं कबीर अलमस्त फकीरा, साहेब पायो तिन ओलै ॥
राग काफी १३—दिल मगन भया अनहद बासी ॥ टे० ॥ अड- सठको फल जान लियो है, खोजि लई काया कासी ॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि आगे ठाढी, जुगन जुगनकी है दासी ॥ बिन ब्याई जहाँ काम घेतु है, दूझत है बारह मासी ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, गगन मंडलका है बासी ॥
राग काफी १४—मेरी लगन साहेबसो लागी है ॥ टे० ॥ बन्धन काटि किया गुर मुकता, जरा मरन भरम भागी है ॥ जबसे दया भई सतगुरुकी, लोक लाज कुल त्यागी है ॥ गुरुकी दया साधुकी संगत, अमर लोक लौ लागी है ॥ सुरति निरति दोष भइ मत- वारी, प्रेम सुधा रस पागी है ॥ एक नाम बिन और न दूजा, कहैं कबीर बड भागी है ॥
राग काफी १५—फकीरोंदा हाल यह हानी ॥ टे० ॥ गोदडी गुरु ज्ञान दी हो, दया दी कफनी । कमर मंतंगा जतदा, माथे तिलक उनसुनी ॥ धूनी धीरज ध्यान दी हो, सेली सुरति अपार । फावडी गुरु ज्ञान दी हो, चित्त लगदा दसवें द्वार ॥ अन्तर तुरिया झूलदा हो, मरम न जाने कोय । जग विच दीसा बावरा हो,
शब्दावली
(७६१)
टुक हंस दे टुक रोय ॥ माता हस्ती झूलदो हो, आहूँ पहर खुसाल । चेला दास कवीरदा, पद गावे कमाल ॥
राग काफी १६-गलताना मता जब आवैगा, तब जीवड़ा सुख पावैगा ॥ टे० ॥ अचार विचार छुटे या जिवका, डुरमति दूर नसावैगा ॥ माया मोह भरमके बादल, परदा खोलि बहावैगा ॥ पांच पचीस करो बसि अपने, सतगुरु सबद लखावैगा ॥ रहनि गहनिकी नाव सवारी, तब भव पार सिधावैगा ॥ हंस सुजन जन बहुरि मिलैंगे, साहिबका गुन गावैगा ॥ अमरलोक इम्रतकी काया, तहाँ बड़ा सुख पावैगा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, यह तत विरला पावैगा ॥
अथ मंगल प्रारम्भः ।
मंगल १-तन मन सुरति विचारि तो बात जनाइये । तुम प्रभु दीन दयाल सो ब्याह रचाइये ॥ वेद बुधि करि विधिसों चौक गुराइये । विषम भरम सब मेटिकै कलश धराइये ॥ त्रिकुटी छाजै बैठि नगर खलबल परी । गावत मंगल चार लगन हाथै धरी ॥ काम क्रोध दोउ काटिके खम्भ बनाइये । सत्सुकृतके बाँसन मंडप छाइये ॥ सुरतिको घुडिला पलानि चित चाबुक लियो । अनहद बाजो बजायके ब्याहन चढि चल्यो ॥ शीलको खड़ग बँधाय छिमाको मौरिया । चले अमर पुर जाय धनीकी पौरिया ॥ ब्याहै सदगुरु आप सवारे हेतियो ॥ कहै कवीर सतिभाय अमर घर चेतियो ॥
मंगल २-दीननके हो दयाल भगतिकी पन करौ । सरन आयकी लाज गई साहिब जिनि करो ॥ नऊ द्वार बिकार थार नौका वगे । मेरी सुरति नहीं ठहराय लगन केमे लगे ॥ पांच तत गुना तीनका सावर साजीया । जम राखे बिलमाय तो फंदन फादिया ॥ त्रिगुन
(७६२)
कबीरपंथी—
फांसि फाँदि आय माया मद जालमें । भवसागरके बीच महा जंजालमें ॥ मोक्ष सुक्ति जब होय दया जनपै करो । मेरो काटो कर्म विकार दास अपनो करो ॥ साहेब कवीर बंदी छोर अजर इक मानिये । हमसे पतित उधारि सरन साहिब आनिये ॥
मंगल ३—जो तुम आये हो सरन बचन इक मानियो । तजियो खलककी आस, सुरति ऐसे जानियो ॥ ज्यू जल मीन सनेह, सदा जलमें रहै । जल बिछूरत तजै परान, लगन ऐसी लहै ॥ तजो नीर पीवो, खीर लप नहि लावई । ते नर हंस हमार, सुरति ऐसे धावई ॥ काग वचन तुम छाँडि दे, हंस गति लावई । तेरे पुनि पूरन करि देऊँ, बहुत सुख पावई ॥ काटूँ करम विकार, भार सिर लेइहौं । हंसा तो मैं रहूं समय, आप सम करि गहौं ॥ कहैं कवीर धरमदाससों, तत मतसार ॥ हंसा बेगे लोक मंझार नाम आधार है ॥
मंगल ४—मूल कमलमें बैठि धरनिको बंध दयो ॥ सप्त अगरासी कोटि सबदको वस भयो ॥ मूंदै सप्त पताल मेरु मंडल हले । गरजो गगन अकास अमीसागर झले ॥ नई भई पहिचानि नवल भयो नेहरा । अगर जोति सिरमौर विराजै सेहरा ॥ उठौ सुहागिनि नारि महलको गम करो । वजर पौर उधारि पुरुषसो तुम मिलौ ॥ परम ज्योति प्रकाश निरंतर राजई । मिलौ सुहागिनी नारि तो पुरुष रिझावई ॥ देख्यो सबद रूप विहँसि सुंदरि मिली । चिकुटी नगर मंझार मदन मूरति लगी । धरमदास चित चेति चरन चित लाईये ॥ सतगुरु कवीर कहि दीन तो दीप जगाइये ॥
मंगल ५—सतगुरु आनंद मंगल आरति बोलिये । जुग जुग कहौ पुकारिके परदा खोलिये ॥ अलख निरंजन राय तो चरित्र बनाइया । संसामें छिन भंगु सुपनौ दिखाइया ॥ यह संसार सराय तो बाट
शब्दावली
(७६३)
बरानिया। उठ चले अपने पंथ न काहू जानिया॥ सुन धरमदास सयान पुकार जो कीजिये। निंदा अस्तुति त्यागि पिया चित दीजिये॥ पंथ दुहेला नाहिं कोई सत संगिया। सायर बुंद विनोद प्रेम चित मंडिया॥ नाहिं करो संशय सोग जीवन सब धुन्द है। अजर अमर एक आत्मा अमृत बुंद है॥ पांच तत्त्व सम बुंद पचीस सुहाना। अष्ट धातुको जुगल सो पियाको खेलावना॥ पिया है प्रगट विचारि नाहिं कोई बुझिया। अंत सुहागिनि नारि तत्त्व नहिं सुझिया॥ अछरमें गम राखि निःअछर जानिये। शब्द मंत्र गुरु भाषि सुरति पहिचानिये॥ हरष शोकते भिन्न बूझ प्रवीन हैं। जोग विवेकतैं दरसै जोति अधीन हैं॥ जग मग दीप बनाय आरति कीजिये। घट घट जोति परगास दरस सुख लीजिये॥ यहाँ वहाँ भरिपूर न दुनिया भावना। गुरुगम परचे होत तो इस विधि पावना॥ कहै कवीर धर्मदाससों मूल उचारिये। यही विधि आरती साजि शवद निरवारिये॥
मंगल ६-मनुषा देही पाये सुकृतको धाइये। सुरति जो अषन कुवॉरि हंसको ब्याहिये॥ सतगुरु विप्र बुलाय तो लगन लिखाईये। वेगि करि लेहु ब्याह ठील नहिं लाइये॥ मिलौ पचीसौ नारि तो मंगल गाइये। चौरासीका दुख बहुरि नहिं पाइये॥ सुरति जो सज्यो सिंगार पियापै जाइये। जन्म कर्मके अंक तो तुरत मिटाइये॥ हंसै कियो विचार सुरति सो यों कही। जुग जुग अछन कुँवरि एता दिन क्यों रही॥ सुरति छ करि सलाम पीया तुम सत कही। मोहि सतगुरु मिलिया नाहीं कुवॉरि यों रही॥ परम पुरुषकी सेज अखंडित खेलना। अमृत प्याला पाइ अधरही झेलना॥ पान परवाना पाय तो नाम सुनावई। सतगुरु कहैं कवीर जीव गति पावई॥
(७६४)
कवीरपंथी—
मंगल ७-पीहर रही भुलाय घना दिन बापके। कर सतगुरुको संग चालु घर आपके॥ मामा और ममसाल भुवा दस बेहनरी। तजि उनहूँको संग जाय सन्मुख अरी॥ मात पिता सुतवीर तजो परिवारको। उभा छोड़ लोग चली है पारको ॥ बहुरि न मिलना होय पीहरि प्यारा लोग सो। चली है अपने देश पूरवला जोग सो ॥ लंघिया औघट घाट कमल सब छेदिया। भँवर गुफाके घाट निरंजन भेदिया ॥ चढी कलश पर जाय अगम गम्य जहाँ किया। निराकार निरलेष पयाना तहाँ दिया ॥ अगम महलमें जाय मिलिहै पीवसो। ब्रह्म कियो भरतार पर हरिया जीवसों ॥ अधर दीपके मध्य पुरुष यक सार है। सांची कहै कवीर सोई भरतार है ॥
मंगल ८-समुझि सुमिर सतनाम जीव गति पाइये। नाहिं न आन उपाय चरन चित लाइये ॥ जहाँ गुरुको अस्थान तहाँ चलि जाइये। कोटि भान परगास सुरति तहाँ छाइये॥ तन मन होय अनंद हरषि गुन गाइये। खुलिहैं ग्यानके नैन ध्यान धरि धाइये॥ कहैं कवीर सतनाम जीव गति पाइये। अविगति अलख लखाय निरखि सिर नाइये ॥
मंगल ९-सतगुरु दीन दयाल काल भय भेटिया। दीन्हां दीपक ग्यान अमर बर भेटिया ॥ हरि देखनको चाव गई सतसंगमें। बाठो अधिक सनेह भिजोई हरि रंगमें ॥ देख्यो अलख अपार अखंडित पूर है। झिलमिल होय सोई हरि नूर है॥ अगिन जले जल माहिं सिंधु बिन पाल है। चहुं भानु गम नाहिं जहाँ मेरा लाल है॥ एक सुन्य दोय सून्य सून्य लख चारि है। जाने कोई गुरुमुख संत विवेक विचारि है ॥ कहैं कवीर विचारि संत भल पावई। बसे अमर घर जाय बहुरि नहिं आवई ॥
शब्दावली ।
(७६५)
यंगल १०—यहि जग को न आपन का संग बोले हो । जस तरवर मैदान अकेलै ढोले हो ॥ चारि पवन झख झोरै कोड न सहायक हो । जस पुरइन पर नीर थीर नहि पायक हो ॥ मन तारै मन बोरै मनहि नचावै हो । मन आवै मन जाय नाम सब गावै हो ॥ विष बोयउ संसार अमृत कहाँ पावौ हो । पुनिरपि जनम तुम्हार दोष केहि लावौ हो ॥ मायाके विस्तार नींद नहि आवै हो । कहैं राजा कहैं रंक दोऊ मिलि रोवै हो ॥ कहै कवीर सुन संतो मन निरवारो हो । बूझहु करहु विचार बहुरि नहि आवो हो ॥
सत्यनाम ।
अथ तीसा यंत्र प्रारम्भः । *
बन्दी छोर कवीर गुरु, धर्मदास शिष जासु ।
तासु चरण बन्दन किये, होय अविद्या नासु ॥
इन्दव छन्द—सोय रह्यो नित मोह निसा महैं, जानि परो नहिं राम पियारो । जन्म अनेक गये सपनांतर, एकहु बार न जागृत
- यह तीसा यंत्र किसी निषेध बिचारवान् महात्माने परोपकारार्थ प्रकट किया है । इसमें निषेध सुन्दर विचार और उपदेश होनेके कारण, तथा सद्गुरु कवीरका श्री, प्रायः साखियाँ इसमें आनेके कारण कवीर पंथियोंको अत्यन्त प्रिय होनेसे, शब्दावलीके संग्रह करनेवालोंने इसे भी, अपनी शब्दावलीमें सम्मिलितकर लिया है । हस्तलिखित या छपी जितनी प्रति मिली सबमें—इसका नाम तो तीसाही यन्त्र लिखा है, किन्तु गिनतीके उपदेशी प्रश्नोत्तर के बल अटुठाइस हो लिखे हैं, इस लिये उसकी वृत्तिके लिये अन्तके दो प्रश्नोत्तर शामिलकर तीस पूरे कर दिये गये हैं, आशा है कि, मेरी इस सभ्य घृष्टताको शिक्षगण क्षमा करेंगे ।
इसकी एक प्रति, दिल्ली खारीबावलीके श्रीमहंत मुखलालदासजी साहबने बहुत दिन हुए भुसे दो थी जिसका नाम तीसा यंत्र न होकर शिक्षा दर्पन लिखा है । इसको किसी शैब संन्यासी महात्माने अपना करके छपवाया है । कवीरपंथियोंके पास जो प्रतियाँ हैं, उसमें मतभेदांतरसे रहित उपदेश मात्र है किन्तु शैब महात्माने इस यंत्रको शैब बनानेके लिये बीच बीचमें अपने अनुकूल कई दोहे मिलाकर यंत्रको अपना बनानेका प्रयत्न किया है । इस प्रकार के कार्य अनुचित होनेपर भी साम्प्रदायिकताके कारण लोगोंसे भूल हुआ ही करती है । इसी लिये सद्गुरुने कहा है—
(७६६)
कबीरपंथी—
धारो ॥ आदिगुरु तब देखि दया करि, तीसा यंत्र शब्द उचारो । चारहु वेद पुरान अठारह, सोधि कहो यह तत् विचारो ॥
सा०-जीव किरतारथ कारने, भाषा कीन विचार । तीसा जंतर बूझिके, नर उतरे भव पार ॥ कलिमें जीवन अलप है, करिये बेगि सम्हार । तप साधन नहि हो सके, केवल नाम अधार ॥
प्र० जगाइये क्या ? उ० प्रेम.
प्रेम जगावे विरहको, विरह जगावे पीव । पीव जगावे जीवको, वही पीव वहि जीव ॥ १ ॥
प्र० कीजिये क्या ? उ० पूजा ।
पूजा गुरुकी कीजिये, सब पूजा जेहि माहिं । ज्यों जल सींचे मूलको, फूले फले अघाहिं ॥ २ ॥
प्र० परखिये क्या ? उ० शब्द ।
परखो द्वारा शब्दका, जो गुरु कहे विचार । विना शब्द कछु ना मिले, देखो नैन निहार ॥ ३ ॥
प्र० लीजिये क्या ? उ० नाम ।
नाम मिलावे रूपको, जो जन खोजी होय । जब वह रूप हिरदे बसे, क्षुधा रहे ना कोय ॥ ४ ॥
प्र० करिये क्या ? उ० सत्संग ।
करिये नित सत्संगको, बाधा सकल मिटाय । ऐसा अवसर ना मिलै, डुरलभ नर तन पाय ॥ ५ ॥
प्र० बोलिये क्या ? उ० मीठा ।
मीठा सबसे बोलिये, रस उपजे चहुँ ओर । बसी करन यह मंत्र है, तेजो बचन कठोर ॥ ६ ॥
पछापछी कारने, सब जग गया मूलान ।
निरपछ होयके हरि भजे, सोई संत मुजान ॥
बिनको अपना कल्याण करना है उन्हें सदा ऐसी साम्प्रदायिकता और मिथ्या अभिमानसे अलग रहकर सत्यकेही बोझ और ग्रहणमें रहना चाहिये ।
संप्रहकर्ता—श्रीयुगलानन्द बिहारी,
शब्दावली ।
(७६७)
प्र० होइये क्या ? उ० दास ।
होय रहै जब दास यह, तब सुख पावै अंत । देखि रीति प्रह्लादकी, सबमें निरखो कंत ॥ ७ ॥
प्र० मानिये क्या ? उ० सबकोसत्य.
मानिये सबको सत्य है, जाको व्यवहार । जियन मरत दोऊ लगा, थिर होय देखु विचार ॥ ८ ॥
प्र० बराइये क्या ? उ० झगरा ।
झगरा नित्य बराइये, झगरा बुरी बलाय । दुख उपजे चिंता बढै, झगरामें घर जाय ॥ ९ ॥
प्र० खाइये क्या ? उ० गम ।
गम समान भोजन नहीं, जो कोई गमको खाय । अम्बरीष गम खाइया, दुरवासा बिललाय ॥ १० ॥
प्र० राखिये क्या उ० निज धर्म ।
राखिये निज २ धर्मको, दिठ गहिये सब काल । निज धर्म आपन राखते, सहजे भये निहाल ॥ ११ ॥
प्र० त्यागिये क्या ? उ० सब कुछ ।
त्याग तो ऐसा कीजिये, सब कुछ एकहि बार । सब प्रभुका मेरा नहीं, निश्चय किया विचार ॥ १२ ॥
प्र० छोड़िये क्या ? उ० अभिमान ।
छोड़ि झूठ अभिमानको, सुखी होय यह जीव । भावै कोई कछु कहै, हिये बसे निज पीव ॥ १३ ॥
प्र० पाइये क्या ? उ० सुख ।
सुख पइये निज रूपमें, द्वेत भाव करि त्याग । निरखो आपा सबनमें, रहै न दुखको लाग ॥ १४ ॥
प्र० देखिये क्या ? उ० आत्मराम ।
देखै सबमें राम है, एकहि रस भरपूर । ऊषहिते सब बनत है, चीनी शक्र गूर ॥ १५ ॥
(७६८)
कवीरपंथी—
प्र० मिटाइये क्या ? उ० प्रम ।
भरम मिटा तब जानिये, अचरज लगे न कोय । यह लीला सब रामकी, निरखे आपा खोय ॥ १६ ॥
प्र० निरखिये क्या ? उ० निजरूप ।
निरखत अपने रूपको, थीर होय सब अंग । कहन सुनन कछु ना रहे, ज्योंका त्योंहि अभंग ॥ १७ ॥
प्र० सुनिये क्या ? उ० गुणवार्ता ।
सुनिये गुणकी वार्ता, औगुन गुनिये नाहिं । हंस छीरको गहत है, नीरस त्यागत आहि ॥ १८ ॥
प्र० साधिये क्या ? उ० इन्द्री ।
साधे इन्द्री प्रबलको, जिहिं ते उठे उपाध । मन राजा बहकावते, पाँचो बडे असाध ॥ १९ ॥
प्र० भारिये क्या ? आशा ।
मारिये आशा साँपनि, जिन डसिया संसार । ताकी औषध तोष है, यह गुरु मंत्र विचार ॥ २० ॥
प्र० दोने क्या ? उ० दान ।
भूखेको कछु दीजिये, यथा शक्ति जो होय । ता ऊपर शीतल बचन, लखी आत्मा सोय ॥ २१ ॥
प्र० बड़ा पुण्य क्या ? उ० दया ।
दया पुण्य सबसे बड़ा, सबके ऊपर भाख । जीव दया चित्त राखिये, वेद पुराण है साख ॥ २२ ॥
प्र० बड़ा पाप क्या उ० हिंसा ।
बड़ा पाप हिंसा अहै, ता समान नहिं कोय । लेखा मांगे धर्म जब, तब सब नौबत होय ॥ २३ ॥
प्र० खुशबूई क्या ? उ० यश ।
खुशबूई यशकी भली फैल रही चहुँ ओर । मल्या गिरि सम गंध है, प्रगट बसे जग सोर ॥ २४ ॥