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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(७९१)

मैली तन झीनी ॥ दासमलूक सलूकसे ओढे, रघुवर टुकरी लीन्ही ॥ धनि धर्मदास जुगतसे ओढे, गढ बांधो चौका कीन्ही ॥ साहेब कवीर शब्दसे ओढे, जस लीन्ही तस दीन्ही ॥

शब्द ५९-जोगी चेतन नगरमें रहुरे ॥ टे० ॥ प्रेमप्रीति रंग ओढो चादर, दिलकी तसबी गहुरे ॥ अजपा जाप जपो दोय अच्छर, काल भरम सब डहुरे ॥ नामकी धूनी अंदर बारो, भेद न परगट कहुरे ॥ आसनमार गुफामें बैठो, नाम धनीका भजुरे ॥ सोहैं शब्द समय सबनमें, स्वासा संग धुन गहुरे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, भौजल पार उतर रहुरे ॥

शब्द ६०-सोवे जोगिया कौन जगावे ॥ टे० ॥ गढ परबत जोगी कुटी बनावे । मृगछाला जोगी झाड बिछावे ॥ अन्न न खाय जोगी पानी न पावे । ये जोगिया जग रूप दिखावे ॥ जीव न सीव स्वासा सुर नाहीं । जाय गगन बिच ध्यान लगाहीं ॥ कहैं कवीर सुनो साधो । या जोगियाको कैसे समुझाई ॥

शब्द ६१-संतो धोका सबको मारे ॥ टे० ॥ ऐसा है कोई संत बिवेकी, निरमल ज्ञान विचारे ॥ कोई खोजे शिवशक्तीमें, कोई खोजे काया ॥ कोई खोजे सुन्न महलमें, ऐसे जग भरमाया ॥ कोई सुनीजन मनको मूंढे, कोई उलटा पवन चढावे ॥ कोई जंग्र मंत्र कोई ओषद खोजे, कोई काशी करवत लावे ॥ कोई जंगम जलमाँहिं नहावे, कोई कोई सेष सयाना ॥ कोईकोई देश दिसंतर डोले, कोई तीरथ व्रत लपटाना ॥ कोई कर्म भर्म्मकी सांकर काटे, कोई पारब्रह्मको धावे ॥ कहैं कवीर सोई जन मेरा, सिर अपने भार न लावे ॥

शब्द ६२-हंसा सुरत करो ठहराई ॥ जासों जिव परले ना जाई ॥ टे० ॥ साख रमैनी बहुत कहतहौ, कथ कथ गये अपारा ॥ राई भर

(७९२)

कवीरपंथी—

अमृतके पाये, हंस भये ततसारा॥ राई भर है वस्तु हमारा, अरध राई अस्थूला॥ लहर लहर घट भीतर होवे, सोई पुरुष निज मूला॥ सेत पान पुरइन पर चौका, जहाँ एक पुरुष है सौरा॥ असंख पंखुरीके लोक बना है, सिर डुरत अग्रके चौरा॥ कहैं कवीर हम शब्द कहा है, कछू न राखी गोई॥ है अनमोला शब्द हमारा, लख पावै जन सोई॥

शब्द ६३—अवधू भजन भेद है न्यारा॥ टे० ॥ का मुद्रा मालाके पहिरे, का चंदन घिसे लिलारा॥ मूंड मुडाय का जटा रखाये, का अंग लगाये छारा॥ का गाये का लिख पढ लाये, का भरमे संसारा॥ संध्या का तरपन का कीन्हे, का घट कर्म अचारा॥ का पानी पाहनके पूजे, का कंद मूल अहारा॥ तीरथ व्रत का संजम कीन्हे, जो नहि तत्त्व विचारा॥ कर परचे स्वामी होय बैठे, कर विवेक व्योहारा॥ दया धरमके मरम न जाने, ठाने बेद ऊंकारो॥ फूँके कान कुमत अपनीसों, यह बोझे वह भारा॥ विन सतगुरु गुरु केते बहि गये, लोभ लहरकी धारा॥ भेष अभेष बधिककी टाटी, लिये फिरे विष चारा॥ ज्यों बाला ध्यान धरे जल भीतर, अपने अंग विकारा॥ गहिर गंभीर पीर जो पावे, खज अखजसों न्यारा॥ भये सुदिष्ट पार चलनेको, सहज मिटे भ्रम भारा॥ निर्मल जोत आतमा जागे, है निज नाम अधारा॥ कहैं कवीर जानेसे कहिये, मैं तैं तजे बिकारा॥

शब्द ६४—सो जन मतवाला, जिन पिया पुर्सका प्याला॥ ॥ टे० ॥ मूल कँवल पर बंद लगावे, उलटा पवन चढावे॥ अमृत पिये मगन होय बैठे, बिन रसना गुन गावे॥ बिन धरतीके मंदिर दीसे बिन सरवर जहैं पानी॥ बिन दीपक जगमग उजियारा, गुरुमुख बोले बानी॥ इंगला पिगला, सुषुमुन सोधे, उनमुनके

शब्दावली

(७९३)

घर मेला ॥ षट दल चक्र एक कमल विराजे, जहाँ पुरुष अल- बेला ॥ चंद सूर जो घरको लावे, सुषुप्तन सुरति समावे ॥ कहैं कवीर कायाकी बातें, सतगुरु मिले लखावे ॥

शब्द ६५-गलतान मता जब आवेगा। तब जियरा सुख पावेगा ॥ टे० ॥ चार अचार मिटे जब तनकी, तब साहब सुख पावैगा ॥ ज्ञान ध्यानमें निसदिन राचे, आप अपन ससुझावैगा ॥ अनहद बाजा बजे सुहेला, हरदम खबर मँगावेगा ॥ कहैं कवीर तत्त्व जब दरसे, मैं तैं दूर बहावेगा ॥

शब्द ६६-मेरी सुरति सोहागिन जागरी ॥ का सोवै पंडित लोभ मोहमें, उठ गुरुके चरने लागरी ॥ चित दे सरवन सुन दौय अच्छर, उठत मधुर धुन रागरी ॥ का तू अटकी लोभ मोहमें, उठ गुरुके शब्दसो लागरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, यह जगत परा जम जालरी ॥

शब्द ६७-पंडित मिथ्या करो बिचारा। तब नहीं सृष्टि न सिरजनहारा ॥ सुत्र अस्थूल पावक जग नहीं, पवन न रवि शशि धरना ॥ जोत सरूप निरंजन नहीं, नहीं भाषा नहीं बरना ॥ गोरखदत्त राम तब नहीं, नहीं तीर्थ पखाना ॥ हरि ब्रह्मा नहीं शिवसकती, नहीं वेद आचरना ॥ कर्म भर्म दोजख तब नहीं, नहीं मंत्र नहीं पूजा ॥ बैकुंठ मसीत भाव तब नहीं, ना तब एक न दूजा ॥ मात पिता कुल वाके नहीं, वह तो पुरुष अकेला ॥ कहैं कवीर या पद को बूझे, सो सतगुरुका चेला ॥

शब्द ६८-रासुरा भौरा कँवल ना पावे। ताते जनम जनम डहकावे ॥ टे० ॥ सुच्छम खेत बिजूका रोपा, मिरगा चरन नहीं पावे ॥ भर्महि मारे भरम पछारे, ताते निकट न आवे ॥ पुरइन पेड बसे एक दादुर, स्वातीके स्वाद न पावे ॥ कँमल बास भौरा

(७९४)

कवीरपंथी—

जब वेधे, सहजेही चल आवे ॥ भक्ति करत चौबिस जुग बीते, कोई सुरति समाध लगावै ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, बहुरि न भौजल आवै ॥

शब्द ६९—बाँका गढको लीजे मन भाई, जामें बेवड कोट औ तेवड खाई ॥ टे० ॥ काम किवारी दुख सुख दरवानी, पाप पुन्य दरवाजा ॥ क्रोध प्रधान काल डमराऊ, मन मवासी राजा ॥ पांच पचीस बडे डमराऊ, आडी प्रेमल माया ॥ मोहि गरीबके जोर चले नहिं, मैं का करों रघुराया ॥ सेना सदा तोप ममताके, कुमति कमान चढाई ॥ तृष्णा नीर बहे घट भीतर, सो बुध हाथ न आई ॥ तनकी तोप सुरतके हवाई, ज्ञानके गोला भराई ॥ प्रेम पलीता सहज प्रजारे, एकै चोट गढ ढाई ॥ शील संतोष दोउ लडने लागे, तोडा दस दरवाजा ॥ सार संतनकी भीर भगतनकी, पकरा गढका राजा ॥ साधुके संगत गुरुके परतापे, कटी करमकी फांसी ॥ साहेब कवीर चढे गढ ऊपर, राज लिया अविनाशी ॥

शब्द ७०—संतो तनका मन रखवारा । कोई जाने जाननहारा ॥ टे० ॥ मनही देव देहरा मनही, मन सेवा मन पूजा ॥ मनही मन ले पाती तोरै, मनही मनके साजा ॥ मनही ऊठे मनही बैठे, मन भेगा मन न्यारा ॥ मनही ताता मनही शीतल, मन मीठा मन खारा ॥ ध्यान लगाय बैठे घट भीतर, तजदे विषय बिकारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, सो जन जगसों न्यारा ॥

शब्द ७१—अवधू सो जोगी गुरु साँचा । प्रभुजीको सेवो रे मनसा बाचा ॥ टे० ॥ शीलकी मुद्रा सहजकी झोरी, सुरति निरति ले खेला । ज्ञान भभूत सबे तन लागा, साहेब अंतर हेला ॥ क्षमा डंड संतोष मेखला, अंमर प्याला, पीवे । अविनाशी घर

शब्दावली

(७१५)

भिच्छा मांगे, ऐसा जोगी जीवे॥ मन थिर राखे अगमको खोजे, दुनियां संगन लावे। कहैं कवीर यह जोग जगत में, अविनाशी को पावे॥

शब्द ७२-इश्क नहीं आसान यारो। इश्क नहीं आसान ॥ टे० ॥ हरदम शीतल या दम सूखा, जान करो कुरवान ॥ प्रेम कटारी या तन मारी, निकल गया यह जान ॥ आपन पिया खोज दिल अंदर, आशुक इश्क इमान ॥ कहैं कवीर फकीरी मानो, जब साहेब मेहरबान ॥

शब्द ७३-हमारे देश रहो कहि अचरज ख्याल ॥ टे० ॥ उमड़ घुमड़के आवे बदरिया, रिमझिम बरसे मेहा। परे रहों चोगान चौहटे, भीजत नहीं मेरी देहा ॥ हमारे देशमें उर्धमुख कूंवा, सांकुर वाकी खोरी। सुरति सोहागिन है पनिहारी, ना गागर ना डोरी ॥ हमारे देशमें नित उठ पूनो, कबहु न होत अमवासिया। छांह धूप व्यापे ना कबहुँ, ना ग्रीषम ना पावसिया ॥ हमारे देशमें बाजा बाजे, अजगैबी होत अवाजा। साहेब कवीर टुक मगन भये हैं, बैठ गगन गढ़ छाजा ॥

शब्द ७४-पंडित अपनी अगिन बुझावो। हम तो अपनी राह चलत हैं, तुम काहे दुख पावो ॥ टे० ॥ गरभवास औंधे मुख झूले, सप्तधात रस पीया। अब तुम चौका देकै बैठे, उहाँ चौका को दीया ॥ कौन हो तुम कहाँसे आये, अनेक जनम फिरि आये। अबतो तुम ब्राह्मन होय बैठे, चौरासी बिसराये ॥ कुल अभिमान आप विप्र पूजा, यही कुमत तोहे लागी ॥ जो तेरी जात भली थी, पंडित शुक्रदेव काहे त्यागी ॥ पांच तत्त्वका सकल पसारा, तामें जिव दुख पावे। कहैं कवीर ब्राह्मन सत सोई, उलटा ब्रह्म समावे ॥

शब्द ७५-परम गुरु सोई दया कर दीन्हा। ताते अनचीन्हे हम चीन्हा ॥ टे० ॥ बिन पग चलना बिन पर उडना, बिना चोंचके

(७९६)

कवीरपंथी—

चुगना ॥ बिना नैन जहाँ देखन पेशा, तहाँ मृतक होय रहना ॥ चंद न सूर दिवस ना रजनी, तहाँ जाय सुरति मिलाई ॥ विन जिभ्या जहाँ अमृत अचवे, बिन जल तृषा बुझाई ॥ जहाँ कुछ नहीं तहाँ सब कुछ देखा, या सुख कासों कहना ॥ कहैं कवीर बल बल सतगुरुकी, धन्य शिष्यका लहना ॥

शब्द ७६—ऐसा कोई प्रेमका देखा मतवाला हो ॥ टे० ॥ छाक चढी क्षुधा बीसरी, पिया प्रेम पियाला ॥ पीवत तेहि तन बीसरी, सो जगतसे न्यारा ॥ कान सुना देखा नहीं, वाते मतवाला ॥ सो छाका निज नामसे, सतगुरुका प्याला ॥ गोली लागी ज्ञानकी, कसनी बहुते दीन्हा ॥ जीवतही मृतक होय रहे, जिन गुरुगम चीन्हा ॥ नामरसायन जो पिये, जग बहुर न आवे ॥ कहैं कवीर कोई छका, जेहि कछु और न भावे ॥

शब्द ७७—एक दिन होयगा प्रान बिगाना ॥ टे० ॥ जो लग प्रान बोले घट भीतर, तों लग करत गुमाना ॥ निकसे प्रान बाहिर कर डेरा, घरके लोग डराना । काठके ठठरीमें लेके चढावे, लै जमुना पहुँठामा ॥ पांच जने मिल फूँक दिये हैं, जर गये सुखके ग्रामा । कहे कवीर सुनो भाई साधू, या पद है निरवाना ॥ पद निरवान चीन्ह ना पावे, अंतकाल पछताना ॥

शब्द ७८—निस दिन माला जुगतकी फेरे ॥ टे० ॥ रवि शशि बांध मन धागा करे, गहि गहि तार सोहंगम घेरे ॥ बंक नाल चढ़ि गिरवर तरवरे, जब टकसार गगन गढ पैरे ॥ अर्ध उर्ध बिच अजब रंग कहिये, बरषे शब्द अमीरस झरे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, ऐसा ध्यान कोई बिरले धरे ॥

शब्द ७९—हंसनके नाह तुम तबहीं कहाये हो ॥ टे० ॥ काशीमें केवल नाम माड़ौ है, उडीसा धाम पंडो पग जरत, देखत वहीँ

शब्दावली

(७१७)

बुझाये हो ॥ साहू सुमरन कीन्हा तबहीं दरशन दीन्हा, उदधि उबारन वोहित बचाये हो॥ तुम साहब दया जोय जीवनको दिये पान ताके तन छूट गयो हांसी कराये हो॥ तुम साहेब मेरी गत राखो घट बांधो पतधर्मनी, दुखित जान कवीर पिया आये हो॥

शब्द ८०-जंगलमें भोंदू का फिरे, तेरे घरहीमें ठग लूटे ॥ जानेगा कोई सूरबीर, सांचे मतसे छूटे ॥ टे० ॥ का जप का तप का संजम, का का कर दिखलावे॥ साहबसे परचे नाहीं, का बहु भेष बनावे॥ चलरे मन सेहरापुर पाटन जइये। भजिये त्रिभुवन नाथको निरभै हो रहिये॥ अमर नहीं संसारमें, विनसे या देही॥ कहे कवीर एक सांच, ले राखो नाम सनेही ॥

शब्द ८१-नाम सनेही साधवा, मुखपाट न खोले॥ नाम जपे निरबान पद, बूझे सो बोले॥ टे० ॥ जो बोलै सो सत कहे, सुख असत न भाखै॥ कलह कलपना मेटकै, चरनों चित राखै॥ धुनमें ध्यान लगाय रहे, बिसराम न छांडे॥ विन बूझे जो आपतें, बकबाद न मांडे॥ सार शब्द संग्रह करे, त्यागे सब छोई॥ कहे कवीर तिहुँ लोकमें, तत्तवेता है सोई ॥

शब्द ८२-भीजे सुर जन माहीं हो नागर॥ टे० ॥ धरन अकाश नीर नहि पवना, अमृत बरषे ताही॥ सौ जोजन जहां बादर नाहीं, घटहि माहि घहराई॥ विन घटवार घाट ना छूटे, निजमें जाय समाई॥ बारा मास कमरिया भीजे, शीतल अंग बुझाई॥ आदि महल विदेही नामा, आवागमन मिट जाई॥ बरषे गगन नदी सब सूखी, प्यासे बूडे ताही॥ प्रीतम छाड़ चले सब ऊपर, जरा मरन मिट जाई॥ सदा रहे इनही बिच गौना, द्वादशहीते न्यारा॥ कहे कवीर सो प्रीतम साथी, जो परखे टकसारा॥

शब्द ८३-निरखो निरगुन निरबानी ॥ टे० ॥ अमर मूरत

(७९८)

कवीरपंथी—

मरे ना कबहुँ, सो मूरत मनमानी। लखत बने तो भल सुख उपजे, ज्ञानरतनकी खानी ॥ जाका आहि सकल जग रचना, इछाते भइ अनहद बानी। कहे कवीर सुनो भाई साधू, उलट दिष्ट जाकी सुरत समानी ॥

शब्द ८४—अजब रंग लागारे गुलजार ॥ टे० ॥ चलो सखी जहां देखन चलिये, निरत करे करतार। मिली सोहागिन परम पुरुषको, जुगन जुगनके यार ॥ झिलमिल जोत निरंतर दरसे, विच विच मोतिनके हार। कहे कवीर सुनो भाइ साधू, सतगुरु कवीर अपार ॥

शब्द ८५—निरख निज नामहिं चीन्हो हो ॥ टे० ॥ नाम बिना बहुते दुखी वे तीनों देवाहो। गन गंधर्व मुनि देवता, सब कालके भेवा हो ॥ पानी तज पय अचवे, सो हंसा कहिये हो। सो हंसा ना विछुरे, जिन या मति लहिये हो ॥ भेष धरे पाखंडका, करता नहिं चीन्हा हो। मिथ्या जनम गवाईया, जम कागद भीना हो ॥ काम क्रोध मद त्यागके, निरमल कर लीन्हा हो। कहे कवीर सुख अमर दे, दुख बनिज न कीन्हा हो ॥

शब्द ८६—संतो तो उतरे भौ पारा। मनकी ईद्री सबही त्यागे, छांडे विषै विकारा ॥ टे० ॥ धीर गंभीर औ सहज भावसों, गहे सतनाम पियारा। प्रेमभाव उपजे हिरदेमें, साध संगत आधारा ॥ दया धीर संतोष धरे जिव, सुरति निरति चित धारा ॥ ज्ञानदृष्टि सबहीको देखे, गहे शब्द टकसारा। सत सुकितके नावपैँ चढ़िये, ज्ञानगुरु कडिहारा ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, उतरो भौजल पारा ॥

शब्द ८७—संतो अब मेरा मन माना। सतगुरु राह बताय दई है, चीन्हो आतमरामा ॥ जो उपदेश दियो मोहि सतगुरु,

शब्दावली

(७९९)

ताहि कियो पहिचाना । घाट वाट कोई रोकि सके नहिं, हाथ दियो परवाना ॥ सो हंसा निज घरको पहुँचे, दीन्हा ज्ञान दामा ॥ डंका बाजे शब्द विराजे, शिरपर छाजे नामा । श्वेत ध्वजा फहरात धनीकी. निरभै अनहद धामा ॥ कहैं कवीर बलिहारी गुरुकी, दर्द अविचल विसरामा ॥

शब्द ८८-संतो नायक राम हमारा । जाका सब जग है बन-जारा ॥ टे० ॥ पाप पुन्य दोउ बैल लदाये, तूष्णा गोन भराई । पांच जने मिल लादन लागे, गोनी लाद न जाई ॥ आज्ञा थाकी मनसा थाकी, थाकी कंचन काया । सुरति निरति वह दोनों थाकी, एक न थाकी माया ॥ या संसार हाटका लेखा, सब कोई बनिजे आई । कहैं कवीर जिन जैसी लादी, तिन तस करी कमाई ॥

शब्द ८९-गुरु मोही छुँटिया पिलाई ॥ टे० ॥ जबसे गुरु मोही छुँटिया पिलाई । भई सुचित मिठी दुचिताई ॥ ज्ञान ओषधी रतन कटोरी । सो भर पिवत कुमति गई मोरी ॥ ब्रह्मा पिये विष्णु लौलाई । शिवशंकर रहे ध्यान लगाई ॥ कहैं कवीर सुनु साथो भाई, गुरुके चानपर ध्यान लगाई ॥

शब्द ९०-बेग गहो गुरु सरना हो, भटक मर जाइ ॥ टे० ॥ या संसार कागदका पुत्रा, बूंद परे गल जाना हो ॥ या संसार अगिनकी चिनगी, भूल परे जल जाना हो ॥ या संसार काँटेकी बारी, समुझ समुझ पग धरना हो ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निरख परख गुरु करना हो ॥

शब्द ९१-भलारे गुनी ऐसो गजब न कीजे ॥ टे० ॥ गरब किये रतनागर सागर, जल खारा कर डारा रे गुनी ॥ गरब किये लंका-पति रावन, मरद गरद कर डारा रे गुनी ॥ गर्ब किये जंगलके घुंगची,

(८००)

कवीरपंथी-

सुँह कारा कर डारा रे गुनी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, गर्ब किया सो हारा रे गुनी ॥

शब्द ९२-प्रेम बान जोगी मारा हो, कसके जोर मोर ॥ टे० ॥ जोगियाकी लाली लाली अंखियां हो, जैसे कँवलके फूल ॥ हमरो सुरंग चुनरिया हो, सोहै तालमतूल ॥ जोगीको लेवे मृगछाला हो, हमरो पट चीर ॥ दोऊ मिल सीवे गुदरिया हो, होइजाय फकीर ॥ गगनमें बंसी बजावे हो, चितवे चहुँ ओर ॥ जोगी अजब रंग भीना हो, मन हर लीन्हा मोर ॥ जोगिया अमर मरे नहीं, पुरवे मेरी आश ॥ पुरब जनम फल पायेऊँ हो, गावे धनी धर्मदास ॥

शब्द ९३-जिव जिन मार सुवा मत लावो, मांस बिना मत आवो हो ॥ टे० ॥ पैल पार एक बेल वृछवा, वृछामें पत्र नहीं है हो ॥ सोई पत्र चुग जात मिरगवा, मिरगाके शीश नहीं है हो ॥ उरबिन खुरबिन चरन चोंच बिन, पंख बिहूना हँसा हो ॥ सो सावज मोहि मार देखावो, जाके रकत न मेसा हो ॥ धनुष बान ले चलो पारधी, धनुषमें पनच नहीं है हो ॥ सोई धनुषसे मारे मिरगवा, मिरगाके घाव नहीं है हो ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, या पद है निरबाना हो ॥ जो या पदके अरथ लगावे, सोई संत सुजाना हो ॥

शब्द ९४-झडाका सुमरनसे मन लागा ॥ टे० ॥ मथुरा आम बोवाइया, जगन्नाथ गई डार । फूल फुलाने द्वारका, फल लागे बद्दीद्वार ॥ पोस्ताकेरे खेतमें फूल बना सब हेत । कोई कुदरती लाल है, और सेतका सेत ॥ आगे दिन पीछे गये, किये न हरिसे हेत । अब पछताये का भया, जब चिरिया चुन गई खेत ॥ आग झरे लोहा झरे, झर झर परे जंजीर । गुरु रामानंदके फौजमें, सनमुख लडे कवीर ॥

शब्द ९५-साहेब बाग लगाया है कोई अजब तरेका ॥ टे० ॥

शब्दावली

(८०१)

चार खूंट चौरासी क्यारी, ता विच फूल फुलाया है । मोहके क्यारा बागके भीतर, बारमबार सिंचाया है ॥ सूख गये कँवल भँवर जब उड़ चले, लालचसे फिर आया है । कहें कवीर सुनो भाई साधू, साहेबका फुरमाया है ॥

शब्द ९६—कोई दिन याद करोगे, रमता राम फकीर ॥ टे० ॥ कोइ दिन सोवे कोइ दिन जागे, कोइ दिन साईंकी जगीर ॥ कोइ दिन ओढे साल दुशाला, कोइ दिन भगवाँ चीर ॥ कोइ दिन पावे मेवा मिठाई, कोइ दिन अचवे नीर ॥ कोइ दिन बैठे घोडे पालकी, शिरपर अबदागीर ॥ कोइ दिन जंगल कोइ दिन बसती, फिरते लाल फकीर ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, गुरुके चरन रहु थीर ॥

शब्द ९७—चरखा तोर डारो हो, भजो रामके राजी ॥ टे० ॥ चरखा तेरा रंग बिरंगी, पोनी लाल गुलाल । कातनवारी छेल-छवीली, तन मन डारे तार ॥ छोटकी ननदिया चीकन पीसेछे, वडकी भरेछे पानी ॥ वो दहिजरवा लीटी लगाइस, हम चरखा तर रहली ॥ जाये गवाँये गँवार परोसिन, हम चरखेकी रानी ॥ एक वेर चरखा कातन पाऊं, दोहरी नथनी गढानी ॥ सात सेरकी सात बनाये, चौदा सेरकी एकै ॥ वो दहिजरवा सातो खायस, हम कुलवती एकै ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, या पद है निरबानी ॥ जो या पदके अर्थ लगावै, ताको सुकति निशानी ॥

शब्द ९८—अवधू मनमथ करुम न होता । तब धर अघर कहाँते होता ॥ टे० ॥ मात पिता मिल बेरा साजे, करी कर्मकी पूजा । पहिले पिता अकेले होते, पूत भये भय दूजा ॥ अलख रूप आतुर होय खेला, नादहिते बिंद छूटा । ताका सकल पसारा कहिये, कवीरपंथी शब्दावली २६

(८०२)

कवीरपंथी-

ब्रह्म किंच होय फूटा ॥ याको निदे वाकों बंदे, सो तो निगुरा कहिये । याते न्यारा वाते न्यारा, न्यारा न्यारा रहिये ॥ कहैं कवीर सोई सुख कीन्हा, आप आपमें मेला । रचि जनि रहो बिरचि जनि छांड़ो, संग मिल रहो अकेला ॥

शब्द ९९-अवधू निरख परख गुरु करना । तन मन कछू हाथ ना आवैं, काहेको पच मरना ॥ टे० ॥ काल न छूटो जंजाल न मेटो, भयो न मनको सूरा । कुलको बास करो मत कोई, जो गुरु मिलै न पूरा ॥ अष्टधातका पिंजरा बनाया, तामैं जुगतका सूवा । सतगुरु मिलै तो कालसे बांचे, ना तो परलै हूवा ॥ कंदप रूप कायको मंडन, मिथ्या काह उलीचै । कहैं कवीर समुझ नर भोंदू, अमी अरंड का सींचे ॥

शब्द १००-अवधू जोग अपूठो पैडो । पहुँचेगा कोई गुरुका बालक, निगुरा भूला गैडो ॥ टे० ॥ पोढ़ी झटक बाज गहिलीने, छेरीने सिंह खाया । चीतेकी गरदन हरन दबाई, खलक तमासे आया ॥ खोजेके घर बालक उपजे, गगनमें सिंगी पूरी । ले मरघट सुरदा पर जारे, तस कर ऊपर सूरी ॥ कहैं कवीर सुनो हो अवधू, अकथ कथा यह भाखी । जानेगा कोई जाननहारा, नार पुरुष पर राखी ॥

शब्द १०१-अवधू सो जोगी पद बूझे, जाको अगम अगोचर सूझे ॥ टे० ॥ काया हमारी शब्द बोलिये, ज्ञान भभूत प्रकाशा । सुरत हमारी सवता कहिये, अलख हमारो बासा ॥ सिंगी शब्द अनाहद बाजे, उनमुन शब्द समाना । प्रेम पियाला पीवे जोगी, धुनमें अघर अमाना ॥ मीच बिन मरन नीर बिन तरना, राग बिन रंग अपारा । सोवे सदा जागे निशिवासर, ऐसा शब्द बिचारा ॥

शब्दावली

(८०३)

कहें कवीर सुनो हो अवधू, सबद कहां तुम पाया । सत्य शब्द सतगुरुको चीन्हो, माया जग भरमाया ॥

शब्द १०२—कैसे बोलो स्वामी, गगन नहीं धरनी । चंद न सूर दिवस नहीं रजनी ॥ टे० ॥ जड़ नहीं मूल वृच्छ नहीं बेल। सबद न स्वाद गुरु ना चेल। उपजे न विनसे आवे न जाई । जरा मरन वाके बाप न माई ॥ नहायवेको न तीरथ न परसवेको देवा । कहें गोरख सुन अलख अभेवा ॥

शब्द १०३—ऐसे बोलो अवधू गगनमें धरनी । चंदमें सूर दिवसमें रजनी ॥ जरमें मूल वृच्छमें बेल। शब्दमें स्वाद गुरुमें चेल। उपजेमें विनसे आवेमें जाई । जरा मरन वाके बापहिमें माई ॥ नहायवेको तीरथ परसवेको देवा । कहें कवीर सुनो गोरख भेवा ॥

शब्द १०४—रामुरा ऐसा को बैरागी । आठ पहर लग रहे सबदसो, कलह करूप विष त्यागी ॥ टे० ॥ ब्रह्मा एक सृष्टिका करता, नाम कुलाल धराया । बहु विध भांडे उन्ही गठिया, मायाको अंत न पाया ॥ तरवर एक नानाबिधि फरिया, जाके पत्र न साखा । भौजल भूल रहे सब प्रानी, सो फल किनहु न चाखा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, मिथ्या दुनियां अंधी । माटीमें माटी मिलजासी, सबद गुरुका संधी ॥

शब्द १०५—ऐसे राम कहे का होई, जोपै मनकी दुविधा न खोई ॥ टे० ॥ राम कहि कहि नरक परत हैं, पठ पठ वेद पुराना ॥ राम कहि कहि सबे गये हैं, मिटे न अवाजा ॥ राम कहि कहि सती जरत हैं, साधनमें न समाई ॥ डाक परी लिये हाथ सिधोरा, मृतकसे लौ लाई ॥ वेद पठे पर भेद न जाने, पठ पठ लोक रिझावे ॥ कालपुरुषका मरम न जाने, घर जरे धूर बुझावे ॥

(८०४)

कवीरपंथी-

लोगनके राम हंसी खेलौना, सबके प्रान अधारा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, काहु न कीन्ह बिचारा ॥

शब्द १०६—राम भजे सो जानिये, जाके आतुर नहीं॥ शील संतोष लीन्हे रहै, धीरज मन माहीं॥ टे० ॥ काम क्रोध व्यापे नहीं, तृष्णा न जनावे ॥ फर फुल्लित आनंद सदा, हरषित गुन गावे ॥ डुरमति डुरासा परिहरे, या मद हंकारा ॥ साधु भया तब जानिये, जो तजे बिकारा ॥ पर निंदा भावै नहीं, सुख असत ना भाखे ॥ कलह कल्पना मेटिके, चरना चित राखे ॥ समहष्ठी शीतल सदा, दुबिधा नहि आने ॥ कहें कवीर ता दाससे, मेरा मन माने ॥

शब्द १०७—राम हमारा सूवा हम निहचेके बाँचे ॥ छूटे सब जंजाल भरमके, होनाहता सो हुवा ॥ टे० ॥ राम नाम जप जन्म गवाँया, जैसे सेमर सूवा ॥ फूले फले पाके फिर फूटे, उड़े भरमके भूवा ॥ प्रेमनगरको राह बिकट है, जो जावे तो जूवा ॥ पूरा परे दाव तब लागे, कहें कवीर तब हुवा ॥

शब्द १०८—पंडित सतपद जपरे भाई । चरन कमल बिन सब नर डूबे, नरक परी चतुराई ॥ टे० ॥ ज्ञान न उपजे ब्रह्म न चीन्हे, आप कहाँते आये । एक जोनीते चार बरन भये, ब्रह्म देह कहाँ पाये ॥ शुद्ध शरीर ब्रह्म ता भीतर, भिन्न भाव तहैं नाही । लख चौरासी जिया नोनमें, वरत रहा सब माहीं ॥ नौगुन सूत संजोग बिचारो, तीन गिरह दे आनी । ताके जनेऊ कबहुँ न टूटे, दिन दिन बारह बानी ॥ ऋगु यजु वेद ज्ञानके पशुवा, साम अथरबन सोई । सुसुम वेदकी खबर न जाने, कैसे के ब्राह्मन होई ॥ बाराबेदी ब्रह्म बिचारे, सोरा सक्ति समानी । संध्या तर्पन तहवाँ कीन्हा, जहवाँ कुश नहि पानी ॥ ब्रह्म अगिनगत थिर न रहे मत, आप अगिन गहि आनी । ब्रह्म अगिनको नाम न लीजे, लीजे ब्रह्म

शब्दावली

(८०५)

पहिचानी ॥ कहें कवीर गुरु ब्रह्म चीन्हो, जात जनेऊ सोई । पारखंडकी गत सबे मिटावे, तब निज ब्राह्मन होई ॥

शब्द १०९-पंडित पढ पुरान का कीन्हा । साथ संतकी सेवा कीन्ही, भूखेको अन्न न दीन्हा ॥ टे० ॥ पूज सिला चंदन घस लावे, बक ज्यों ध्यान लगावे । अंतरगतके राम न चीन्हे, थोथे घंट बजावे ॥ काम न बिसरो कोष न छूटो, लोभ न बिसरो देवा । परनिंदा ते ह्दै न बिसरी, निरफल गइ तेरी सेवा ॥ दोष लगाय घर मूस पराया, पेट भेर अपराधी । जो निंदा तोहे साधन बरजी, सो हिरदे आराधी ॥ कहें कवीर संतनकी महिमा, परम पुनीत मुनाई । आपा मेट आपको चीन्हो, तबे परमपद पाई ॥

शब्द ११०-पंडित होय तापहि भारी । जाके चित्र गुप्त लिख धारी ॥ टे० ॥ जीवत जीव ब्रह्मको डुरखे, खून करा घर माहीं । तृष्णा कारन जीव बधत हो, बूड रसातल जाही ॥ चौका दे शुचि संजम कीन्हा, सुनो महात्म लोई । जो मर सुनके अन्न तजत है, सो मर तपे रसोई ॥ कर अह्मन तिलक कर बैठे, कांघे त्रिगुन जनेऊ । हँडिया हाड हाड थारी मुख, अब षट्कर्म बनेऊ ॥ घाटी उतर भई सब माटी, मन धीरज धर रहिये । कहें कवीर ये विषके लाडू, खाय पीर कोन सहिये ॥

शब्द १११-मियांजी देखा अजब तमाशा । सांची बात कही ना माने, झूठा लगे खुलासा ॥ टे० ॥ कहे हक पर हक न बूझे, नाहक जीव सताया । हाथ पांव बरबसके बांधे, गल बिच छुरी चलाया ॥ खासे दोस्त नबी साहबके, जिव बध नहिं फरमाया । एक मिस्वाक मास शश्य करते, वृक्षों नाहिं सताया ॥ भूखेको वे भोजन देते, प्यासेको पानि पिलाया । उमर तमाम बंदगी कीन्ही, जो सिवाय नहिं खाया ॥ फक्का फकर फकीरी खुसकी,

(८०६)

कबीरपंथी-

खसे कछू न चाहा । शब्द कवीर खोज दिल अंदर, तब पावे कुछ लाहा ॥

शब्द ११२-मियांजी बोले नाम न आवे । दूधको दूध पानीको पानी, जोरे करे सो पावे ॥ टे० ॥ हो मिसकीन खुदाई बंदा, तू जियरा जस भावे । असल खोदाय दीनको साहब, जोर नहीं फरमावे ॥ रोजा रहै निमाज गुजारे, कलमा भिस्त न होई । सतर कावे हैं घट भीतर, जो लख पावे कोई ॥ धनीकी जासकी आस कर बंदे, मान मनी कर दूरी । आपा मेट औरको खोजो, तब पावो कछु मूरी ॥ माटी एक बने बहु भांडे, सबमें नूर समाना । कहैं कवीर ऐसी भिस्त छोडके, दोजक सों लपटाना ॥

शब्द ११३-मुलना खूब नजर दिल दीजै । हाजिर नाजिर है घट भीतर, जबह काहेको कीजै ॥ टे० ॥ पकर हलाल हाथ कर लीन्हा, पाँचों पीर मनाया । हलाल हता तो खोय गया अब, मुरेदे सीख लगाया ॥ पैगम्बर महि रकतसों राजी, आपहि सजल सँवारा । फेर दरेग कयामत ताई, दामनगीर तुम्हारा ॥ कर निमाज सिर भुईमें मारे, मैं बंदा खोदाई । कर खून तूजनाके कारन, साहबका फुरमाई ॥ का तसबी दानेके फेरे, पढ पुरान का बूझा । दिलके नैनन अंध भये हैं, परम तत्त्व नहीं सूझा ॥ जो जेहि मारे सो तेहि काटे, मिटे न भौजल फेरा । कहैं कवीर तुम जोर करत हो, कहा न मानो मेरा ॥

शब्द ११४-देखो बनी आदमकी बातें । सांची बात कही न माने, नरक परत हैं ताते ॥ टे० ॥ ओछी बुद्धी त्वचा चामकी, ओ थोरे धन माते । थोरी उमर गुमर बहु भारी, अड्या काम कलाते ॥ हरचा ज्ञान ध्यान मम भूला, दृष्टि लगी अबलाते । वे तो आठे दसमी जागे, बेक़रे बार वफाते ॥ अंगुरी नाय कान

शब्दावली

(८०७)

दोउ मूँदे, पढे बंग सलवाते । रोजा करे निमाज गुजारे, सत्रह पढे रकाते ॥ साझ परे खानेकी बेरा; उमड करे जिव घाते । करे खून बंदगी ठाने, पाक कहें कलमाते ॥ भूले दीन दया तज भागे, दृष्टि लगी विषयाते । भीतर भरी भंगार भरमकी, ऊपर माजे गाते ॥ जानत नहीं आप अपनेको, आय गये धों कहाँते । दरद न जाने पीर पराई, चलत फिरत इतराते ॥ कहें कवीर यह अजब तमाशा, इनको भिस्त कहाते ॥

शब्द ११५—सेखजी बंदा सुरीद केहे केरा । इस पदका करौ निबेरा ॥ कबकी बात कही पैगम्बर, हती कौनसी बेरा ॥ क्या महम्मद तुम्हे गुप्त सुनाई, किताबें नौ हजार ॥ का तुम राखी का तुम प्रगटी, हजूर कहिके परदा ॥ खोजा खोज करो तुम अजहूँ, वह औरत है की मरदा ॥ कौन बिलायत कौनसी जगह, बैठे थे किस ठाई ॥ औवल सफा हकीकत बोलो, तुम जानत हो की नहीं ॥ का फरमान हुवा बंदे पर, की तुम कहो बनाई ॥ कहें कवीर साहब फरमाई, के बीचहि कल्पाई ॥

शब्द ११६—काहूने फिर न कही वह बातें । जो नर यहाँ ते सुकृत कर गये, ता फलकी कुसलाते ॥ सूर चले सनमुख रन जीतन, दे सनमुख उर घाते । वाके स्वाद पूछिये कासों, सहत सेल सिर सांटे ॥ सती जरे पिया अपने संग, बिरह प्रेम रस माते । वाके स्वाद पूछिये कासों, सीरे जरी कि ताते ॥ यह संसा उठे उदमुख जो, आय गये धों कहाँते । कहें कवीर देहगत ऐसी, जान परी है याते ॥

शब्द ११७—नर तू पार उतर कहाँ जेहो ॥ आगे पंथ पंथी ना कोई, कूच मुकाम न पैहो ॥ टे० ॥ नीर नाह नहीं खेवट किरवा, ना गुन खेवनहारा । धरती अकाश करूप कछु नहीं, ना कछु वार न पारा ॥ यह तो आपी आपा कहिये, सुन्न सोध ना पैहो ।

(८०८)

कवीरपंथी—

विलैमान हो जाहु छिनकमें, याहू ठौर बिन होइ हो ॥ बारंबार विचार सोच जिय, अपने माहिं समैहो। कहैं कवीर मुक्ति नहि आगे, ज्योंका त्यों ठहरैहो ॥

शब्द ११८—नर तुम कियों न एकौ काजा। काम कोध तृष्णाके बांधे, लूटत है जमराजा ॥ ८० ॥ बनखंड जाय जोग तप कीन्हा, कंदमूल फल खाया। होते ज्ञानी परम सुख ध्यानी, पाती काह लिखाया ॥ चार वेद तुम हित के राखे, फीकी उनकी आशा। काल भच्छ सब दुनियां सिरानी, इन्हीके विस्वासा ॥ प्रेम भगति हिरदे ना आवे, नाच काछ मन दीन्हा। राग रागिनी डिंभ धरीधर, तिन हरसों का लीन्हा ॥ फिरै काल अनंत लोकमें, मध्य लखे मुनि ज्ञानी। कहैं कवीर ते भये खालसे, रामभक्ति दिद जानी ॥

शब्द ११९—नर तुम झूठे जनम गवाईया। उस झूठेका कोई अंत न पाया ॥ ८० ॥ झूठेके घर झूठा आया, झूठे ते परचाया। झूठी थारी झूठा भोजन, झूठे ले सब खाया ॥ झूठेके घर झूठा आया झूठे व्याह रचाया। झूठा दूलह झूठी दुलहिन, झूठे व्याहन आया ॥ झूठे नर सब झूठी नारी, झूठे बालक जाया। झूठी छाती झूठी कोखी, झूठी दूध पियाया ॥ सांच कहुँ मैं झूठ न बोल्हूँ, सांचेको झूठाया। कहैं कवीर सोई जन साँचा, अपने माहिं समाया ॥

शब्द १२०—सुन राजा हरचंद भुवनके, सत्त तुम ठानी। विप्र एक काल होय प्रगटो, तुमहुँ असत्त न छानी ॥ ८० ॥ पतनी सहित राज तुम दीन्हा, हाटो हाट बिकानी। जो यह सत्त भली पुन होती, करत नहीं कुल हानी ॥ जेहि कारन तुम नीच डोम घर, भरलाये घट पानी। बसहीके तुम चीर छोडाये, उलटी मत तुम ठानी ॥ अगम अगोचर मूल ब्रह्मको, सो तुम कितहु न पाई। सत्यकर तुम नीच बुध घर, फिर फिर जोनी आई ॥ भरम छांड

शब्दावली

(८०९)

सत्य तुम चीन्हों, सत धोख न कहाई। सत्सरूप जबे तुम पावो, यह सत चित्त न आई॥ मैं तो तुमरे भले कहत हों, सत्य सरूप विचारो। कहें कवीर वह सत् समुझके, आवागवन निवारो ॥

शब्द १२१-देखो अलख पुरुषकी करनी, बड़े बड़े धरा बिगूचे ॥ टे० ॥ हरचंद चले मिहरी बेचनको, पूतहि खायो सांपा ॥ वाकी अम्मा जरावन लागी, जरन न देतो बापा ॥ दशरथके दोय पुगरा कहिये, औरत सो चित दीन्हा ॥ बडा वियोग भया रघुपतिको, रावन गा सिर छीना ॥ सोरा सहस आठ पटरानी, एते कान्हर आनी ॥ बड़े उजीर हते पाठनमें, तिनहूँकी दुरम लुटानी ॥ पांचो पांडव छठी द्रौपदी, और बिगूचे केता ॥ लैके हाड हिमारे गारे, जन कवीर जग जीता ॥

शब्द १२२-धर्म सुत काहे न देख बिचारी। सत् बोलते राज तुम्हारे दीन्हों देश निकारी ॥ टे० ॥ पांच पूत कुंतीके कहिये, एकोतरसौ गंधारी। एकै बुंद पिताके होते, काहेको मांडी रारी ॥ ब्रह्मज्ञान अरजुन तब चीन्हें, धनुष बान दिये डारी। छल प्रपंच कृष्ण एक कीन्है, दीन्हा बदन पसारी ॥ पांच भइयाकी एकै नारी, सबही संग सुख कीन्हा। जीवदान भीम तब मांगे, कृष्ण सहित आधीना ॥ भारथ भरीके अंडा राखे, तुम कुरुक्षेत्र कराये। गोत्रघाव दाव नहीं जानो, ताते हिमाल पठाये ॥ कुंजल एक हतो रन भीतर, तुमसो झूठ बोलावे। नरकबास दिखलावे तोही, जब सुरपुरहि पठावे ॥ सोई सत् दो परदी कहिये, जाकी भक्ति तुम ठानी। कहें कवीर सुनो हो पांडव, हिरदै करो बिलछानी ॥

शब्द १२३-संतो परी अरुझन भारी। कहे सुने कछु हाथ न आवे, अविगतकी गत न्यारी ॥ टे० ॥ कोई कहे हम निरगुन सेवै, निरगुनका गुन कैसा। को निरगुन को सरगुन कहिये, एही

(८१०)

कवीरपंथी—

बडा अंदेशा ॥ निरगुन कहिये नाम महातम, सरगुन संत विराजे । गुन बिन निरगुन हाथ न आवे, औगुन देखे भाजे ॥ निरगुन सरगुन एक रूप है, बिरला जन पद परसे । हंस शब्द एक चित होवे, अमी सुधारस बरसे ॥ कहैं कवीर अंतरकी करनी, परगट होय तब सांची । अपने पति केर पतिबरता, गगन मगन होय नाची ॥

शब्द १२४—सो तो अबिगत अगम अपार, पार कस पावै ॥ टे० ॥ जा खोजत ब्रह्मादि भुलाने, तिनहुँ न पाये भेव । जा खोजत शिव मगन भये, शनकादिक शुकदेव ॥ सतखुगमें सतबरता, द्वापर पूजा पान । त्रेता होम जह्र व्रतसंजम, कलखुग केवल नाम ॥ सेस सहसमुखुख निस दिन गावे, अस्तुत करे सुरार । ऋग् यजु साम अथर्वन थाके, कर न सके निरवार ॥ जोगी जती तपी संन्यासी, दिगंबर दरवेस । चुंडित मुंडित और जटाघर, ये उरझे बहु भेश ॥ तीरथ गये ते एही महातम, तब कोई पूजे पानी । एको सुमत हाथ नहिं आवै, कर गय मुनिजन ज्ञानी ॥ धरती अगिन पवन औ पानी, भिन्न भिन्न विस्तारा । आवे न जाय मरे न जीवे, सबते रहत निनारा ॥ जो कहिये सबहीमें साहब, मौत कहांते होई । कहैं कवीर तिनके जिव डोलै, पिंड प्रान बिन सोई ॥

शब्द १२५—हैरे अडोला कहिं डोलत नाही ॥ गगनमें चंदा जलबिच झाई, मीन गहे मुख आवत नाही ॥ टे० ॥ चंदन काठ सुख जो जाही । ताकी बास ताहीमें रहाही ॥ मिरगा नाभि बसे कस्तूरी । तन नहिं खोजत खोजत मूरी ॥ कहैं कवीर मन मिलिया होई । शब्द सुरतमें राख समोई ॥

शब्द १२६—कोई जन जानेगाहो अबिगत नाथ मतो ॥ भंजन घडन सँवारन आपे, अलखपुरुष रहतो ॥ टे० ॥ ईददवन ऐसेहोते, नित घृते होम करतो ॥ अजगर कीन्हे कूपजलको, पवन भखी