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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(१०४)

कवीरपंथी—

जो न तरे । गहि परतीति कीन जिन जासों सोई तहैं मरे ॥ जो कहु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझ स्याना । कहैं कवीर तासों का कहिये देखत दधि भुलाना ॥ १४ ॥

शब्द ४०३—रामरा चली बिनावन माहो । घर छोड़े जात जोलाहो ॥ टे० ॥ गज नौ गज दस गज उनइसकी पुरिया एक तनाई । सात सूत नौ गाड़ बहतारि पाट लागु अधिकार्ई ॥ तापट तूल न गजन अमाई पैसन सेर अढार्ई । तामैं घटै बढै रतिओ नहीं करकच करघ रहाई ॥ तिन उठि बैठ खसम सो बरबस तापर लागु तिहाई । भीनी पुरिया काम न आवे जोलहा चला रिसार्ई ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो जिन यह सूधि उपाई, छाड़ि पसार राम भजु बौरै भवसागर कठिनाई ॥ १५ ॥

शब्द ४०४—रामरा झीझी जंतर बाजे । कर चरन विहूना राजै ॥ टे० ॥ कर विनु बाजे सुने सरवन विनु सरवने सरोता होई । पाटन स्ववस सभा विनु अवसर बूझे सुनि जन लोई ॥ इंद्रि विनु भोग स्वाद जिह्वा विनु अच्छय पिंड विहूना । जागत चौर मंदिर तहैं मूसे स्वम्भ अच्छत घर सूना ॥ बीज विनु अंकुर पेड़ विनु तरुवर विनु फूले फल फलिया । बांझके कोख पुत्र अव- तरिया विनु पग तरुवर चढिया ॥ मसि विनु द्राइत कलम विनु कागज विनु अच्छर सुधि होई । सुधि विनु सहज ज्ञान विनु ज्ञाता कहैं कवीर जन सोई ॥ १६ ॥

शब्द ४०५—राम गाइ औरन समुझावे, हरि जाने विनु विकल फिरे ॥ टे० ॥ जा मुख वेद गायत्री उचरे तासु वचन संसार तरे ॥ जाके पांव जगत उठि लागे सो ब्राह्मन जिव बद्ध करै ॥ अपना ऊंच नीच घर भोजन धीन कर्म करि उदर भरै । ग्रहन अमावस ढुकि ढुकि मांगै कर दीपक लिये कूप परै ॥ एकादशी व्रती

शब्दावली

(१०५)

नहीं जानै भूत प्रेत हठि हृदय धरै । तजि कपूर गांठी विष बाँधै ज्ञान गंवाय मुगुध फिरे ॥ छीजे साहु चोर प्रतिपालै संत जनन की कूट करै । कहहिँ कवीर जिह्वाके लम्पट यहि विधि प्रानी नरक परै ॥ १७ ॥

शब्द ४०६-रामगुन न्यारो न्यारो न्यारो । अबुझा लोग कहाँ लौ बूझैं बूझनहार विचारो । केते रामचन्द्र तपसी सो जिन यह जग विटमाया ॥ केते कान्ह भये सुरलीधर तिन भी अन्त न पाया ॥ केतिक सिध साधक संन्यासीजिन बनवास बसाया ॥ केते मुनि जन गोरख कहिये तिन भी अंत न पाया ॥ जाकी गति ब्रह्मै नहीं पाई शिव शनकादिक हारे । ताके गुन नर कैसे पैहो कहे कवीर पुकारे ॥ १८ ॥

शब्द ४०७-ए तत राम जपो हो प्रानी तुम बूझा अकथ कहानी । जाको भाव होत हरि ऊपर, जागत रैन बिहानी ॥ टे० ॥ डाइनि डारे सोनहा डारे सिंह रहे बन घरे । पांच कुटुम्ब मिलि जूझन लागे बाजन बाज घनेरे ॥ रोहु मिरगा संशय बन हाँके पारथ बाना मेलै ॥ शायर जरे सकल बन डाहे मच्छ अहेरा खेलै ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो जो यह पद निरवारै । जो यह पदको गाइ विचारे आपु तरे अरु तारै ॥ १९ ॥

शब्द ४०८-कोइ राम रसिक रस पियहुगे सुख जियहुगे ॥ टे० ॥ फल अंकृतै बीज नहीं बोकला सुक पंछी रस खाई । चुवै न बुंद अंग नहीं भीजै दास भँवर सँग लाई ॥ निगम रसाल चारि फल लागै तामैं तीन समाई । एकहै दूरि चहै सब कोई जतन जतन कोई पाई ॥ गयउ बसंत ग्रीषम ऋतु आई बहुरि न तरुवरतर आवै । कहै कवीर स्वामी सुख सागर राम मगन है पावै ॥ २० ॥

(१०६)

कवीरपंथी-

शब्द ४०९-राम न रमसि कौन दंड लागा । मरि जेबेका करिबे अभागा ॥ ८० ॥ कोइ तीरथ कोइ सुंडित केशा । पाखंड भरम मन्त्र उपदेशा ॥ विद्या वेद पढि कर हंकारा । अन्तकाल मुख फाँके छारा ॥ दुखित सुखिन सब कुटुम्ब जिवैवै । मरन बेर अकसर दुख पैवै । कहैं कवीर यह कलि है खोटी । जो रह करवा निकसै टोटी ॥ २१ ॥

शब्द ४१०-अवधू छोड़ो मन विस्तारा । सौ पद गहु जाहि ते सद्गति पार ब्रह्म ते न्यारा ॥ ८० ॥ नहीं महादेव नहीं मद्भ्यमद हरि हजरत तब नाही । आदम ब्रह्मा नहीं तब होते नहीं धूप नहीं छाहीं ॥ असी सहस्र पैगम्बर नाही सहस्र अठासी मूनी । चन्द्र सूर तारा गन नाही मच्छ कच्छ नहि दूनी ॥ वेद किताब सुम्रिति नहि संजम नहि जमन परसाई । बांग नेमाज कलमा नहि होते रामों नहीं खुदाई ॥ आदि अन्त मन मध्य न होते आतत पवन न पानी । लख चौरासी जीव जनतु नहि साखी शब्द न बानी ॥ कहैं कवीर सुनो हो अवधू आगे करहु विचारा । पूरनब्रह्म कहाँते प्रगटे किरतम किन उपचारा ॥ २२ ॥

शब्द ४११-अवधू कुदरतकी गति न्यारी । रंक निवाज करै वह राजा राजा भूपति करै भिखारी ॥ ८० ॥ येते लौगहि फल नहि लागै चन्दन फूल न फूले । मच्छ शिकारी रमें जंगलमें सिंह समुद्रहि झूले ॥ रेंडा रुख भया मल्यागिरि चहुँ दिशि फूटी बासा । तीन लोक ब्रह्मंड खंडमें देखै अन्ध तमाशा ॥ पंगुल मेरु सुमेरु उल्लै त्रिभुवन मुक्ता डोलै । गुंगा ज्ञान विज्ञान परगासै अनहद बानी बोले ॥ बांधि अकाश पताल पठावै शेष सरगपर राजे । कहैं कवीर राम है राजा जो कछु करै सो छाजे ॥ २३ ॥

शब्द ४१२-अवधू सो जोगी गुरु मेरा । जो ई पदको करै

शब्दावली

(१०७)

निवेरा ॥ टे० ॥ तरुवर एक मूल विन ठाढो विन फूले फल लागा । साखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन सुख जागा ॥ पौ विन पत्र करह विन तुम्बा विनु जिह्वा गुन गावै । गावन हारके रूप न रेखा सतगुरु होइ लखावै ॥ पंछिक खोज मीनको मारग कहैं कवीर दोउ भारी । अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरतिकी बलिहारी ॥ २४ ॥

शब्द ४१३-अवधू ओ तत रावल राता । नाचै बाजन बाज बराता ॥ टे० ॥ मौरके माथे दुलहा दीन्हो अकथा जोर कहाता । मडवक चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता ॥ दुलहिन लीप चौक बैठाये निरभय पद परभाता । भातहिं उलटि बरातहिं खायो भली बनी कुशलाता ॥ पाणि ग्रहण भये भव मंडयो सुषुप्तनि सुरति समाता ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो बूझो पंडित ज्ञाता ॥ २५ ॥

शब्द ४१४-कोइ विरला दोस्त हमारा भाइ रे बहुत का कहिये । गांठन भजन संवारे सोई ज्यों राम रखे त्यों रहिये ॥ टे० ॥ आसन पवन जोग श्रुति सुमृति ज्योतिष पढि बैलाना । छौ दरशन पाखंड छानवे ये कल काहु न जाना ॥ आलम दुनी सकल फिरि आये या कल जीव न आना । ताही करिके जगत उठावे मनमें मनन समाना ॥ कहैं कवीर जोगी औ जंगम फीकी उनकी आशा । रामै नाम रटे ज्यों चात्रिक निश्चय भगति निवाशा ॥ २६ ॥

शब्द ४१५-भाई अदुत रूप अनूप कथा है कहौं तोको पति-याई । जहँ जहँ देखौं तहँ तहँ सोई सब घट रह्यो समाई ॥ टे० ॥ लच्छ विनु सुख दरिद्र विनु दुख है नौंद विना सुख सोवै ॥ जस विनु ज्योति रूप विनु आशिक रतन विहूना रोवै ॥ भरम विनु

(१०८)

कबीरपंथी—

ज्ञान मने बिनु निरखै रूप बिना बहु रूपा । थिति बिनु सुरति रहस बिनु आनंद ऐसो चरित अनूपा ॥ कहै कवीर जगत बिनु ( हरि ) मानिक देखौ चित अनुमानी । परि हरि लाभै लोग कुटुम्ब सब भजहुँ न झारंग पानी ॥ २७ ॥

शब्द ४१६—भाइरे गैया एक विरंचि दियो है भार अभर भौ भाई । नौ नारीको पानि पियति है तिरषा तच्छ न बुताई ॥८०॥ कोठा बहतरि औ लौ लाय वज्र केवार लगाई । खूटा गाडि डोरी दृढ बांधो तैयो तोरि पराई ॥ चारि वृक्ष छौ साख वाके पत्र अठारह भाई एतिक ले गैया गम कीन्हो गैया अति हर-हाई ई सातौ अवरन है सातौ नौ औ चौदह भाई । एतिक गैया खाय बढायो गैया तउ न अघाई ॥ घूटामे राती है गैया स्वेत साँग है भाई । अवरन बरन कछू नहीं वाके भच्छ अभच्छौ खाई ॥ ब्रह्मा विष्णु खोजिकै आये शिव शनकादिक भाई ॥ सिद्ध अनंत वहि खोज परे हैं गैया किनहुँ न पाई ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो जो या पद अरथाई । जो या पदको गाइ विचरिहैं आगे है तरि जाई ॥ २८ ॥

शब्द ४१७—भाईरे नयन रसिक जो जागे । पारब्रह्म अविगत अविनाशी कैसेहुके मन लागे ॥८१॥ अमली लोग खुमारी तृष्णा कतहुँ सन्तोष न पावे । काम क्रोध दोनों मतवाले माया भरि भरि प्यावै ॥ ब्रह्म कलाल चढाइनि भाठी ले इन्द्री रस चाखै । संगहि पोच है ज्ञान पुकारै चतुर होइ सो नाखै ॥ संकट सोच पोच या कलिमों बहुतक व्याधि शरीरा । जहंवां धीर गँभीर अति निर्मल तहँ उठि मिलहु कवीरा ॥ २९ ॥

शब्द ४१८—भाईरे दुइ जगदीश कहाँते आया, कहु कौने भरमाया । अछाः राम करीम केशव हरि हजरत नाम धराया

शब्दावली

(१०९)

॥ टे० ॥ गहना एक कनक ते गहना तामें भाव न दूजा । कहन सुननको दुइ करि थाये यक निमाञ्ज यक पूजा ॥ वही महादेव वही महम्मद ब्रह्मा आदम कहिये । कोइ हिन्दू कोइ तुर्क कहावै एक जमींपर रहिये ॥ वद किताब पढैं वे खुतबा वे मोलना वे पांडे । बिगत विगतके नाम धरावे यक माटीके भांडे ॥ कहैं कवीर वै दोनों भूले रामहि किनहु न पाया । वे खसिया वे गाय कटावैं बादैं जनम गँवाया ॥ ३० ॥

शब्द ४१९-हंसा संशय छूरी कुहिया । गैया पियै बछरुवै दुहिया ॥ टेक ॥ घर घर सावज खेलै अहेरा पारथ वोटा लेई । पानी मांहिं तलफिगै भ्रुसुरि धूरि हिलोरा देई ॥ धरती वरसे बादल भीजै भीट भया पैराऊ । हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ जौ लगि कर डोलै पग चलई तौ लगि आश न कीजै । कहहिं कवीर जेहि चलत न दीखै तासु बचन कालीजै ॥ ३१ ॥

शब्द ४२०-हंसा हो चित चेतु सवेरा । इन्ह परपंच कयल बहुतेरा ॥ टेक ॥ पारखंड रूप रच्यो इन्ह त्रिगुन तेहि पारखंड भूलल संसारा । घरको खसम बधिक भौ राजा परजा काधौं करे विचारा ॥ भगति न जानै भगत कहावै तजि अमृत विषके लिय सारा । आगे बढे ऐसेहि बूढ़े तिनहुं न मानत कहा हमारा ॥ कहल हमारा गांठी बांधो निशि बासर रहिहहु हुशियारा । ये कलिके गुरु बड परपंची डारि ठगोरी सब जग मारा ॥ वेद किताब दोय फन्द पसारा ते फन्दे परु आप बिचारा । कहैं कवीर ते हंस न विछुरे जेहि मै मिलों छोडावन हारा ॥ ३२ ॥

शब्द ४२१-हंसा प्यारे सरवर ते जे जाय ॥ टे० ॥ जेहि सरवर बिच मोतिया चुगते बहुविधि केलि कराय ॥ सूखे ताल पुरइनि

(९१०)

कवीरपंथी-

जल छोड़े कमल गयो कुंभिलाय । कहैं कवीर जो अबकी बिछरे बहुरि मिलै कब आय ॥ ३३ ॥

शब्द ४२२-हरि जन हंस दशा लिये डोलैं। निर्मल नाम चुनि चुनि बोलैं ॥ टे० ॥ सुकताहल लिये चाँच लोभावैं। मौन रहै कि हरिगुन गावैं ॥ मानसरोवर तटके बासी। राम चरण चित अन्त उदासी ॥ काग बुद्धि निकट नहिं आवै। प्रतिदिन हंसा दर्शन पावै ॥ नीर छीर को करै निबेरा। कहैं कवीर सोई जन मेरा ॥ ३४ ॥

शब्द ४२३-हरि मोर पीव मैं राम की बहुरिया। राम मोर बडो मैं तन की लहुरिया ॥ टे० ॥ हरि मोर रहैंटा मैं रतन पिउरिया। हरि को नाम लै कातल बहुरिया ॥ छः मास ताग वरष दिन कुकुरी। लोग कहल भल कातल बपुरी ॥ कहैं कवीर सूत भल काता। रहैंटा न हाय सुकति कर दाता ॥ ३५ ॥

शब्द ४२४-हरि ठग ठगत ठगौरी लाई। हरि वियोग कस जियहु रे भाई ॥ टे० ॥ को काको पुरुष कवन काकि नारी। अकथ कथा जम जाल पसारी ॥ को काको पुत्र कवन काको बापा। को रे मरै को सहे सन्तापा ॥ ठगि ठगि मूल सबन को लीन्हौं। राम ठगौरी विरलै चीन्हौं ॥ कहैं कवीर ठग सो मन माना। गई ठगौरी ठग पहिचाना ॥ ३६ ॥

शब्द ४२५-हरि ठग ठगत सकल जग डोलै। गवन करत मोसे मुखहु न बोले ॥ टे० ॥ बालापनके मीत हमारे। हमैं छोड़ि कहैं चले सकारे ॥ तुम अहु पुरुष हौं नारि तुम्हारी। तुम्हरी चाल पाहनहुंते भारी ॥ माटिक देह पवनको शरीरा। हरि ठग ठग सो डरल कवीरा ॥ ३७ ॥

शब्द ४२६-हरि विनु भरम बिगुरन गन्दा। जहं जहं गये अपनपौ खोये तेहि फंदे बहु फन्दा ॥ टे० ॥ जोगी कहै जोग है नीको

शब्दावली

(१११)

द्वितीया और न भाई। चुंडित मुंडित मौन जटाधरि तिनहुं कहां सिधि पाई॥ ज्ञानी गुनी स्मर कवि दाता ये जो कहहिं वड हमहीं। जहंसे उपजे तहहिं समाने छूटि गये सब तबहीं ॥ बाँये दहिने तजो विकारे निजुके हरिपद गहिया। कहै कवीर गुंगे गुर खाया पूछे सो का कहिया ॥ ३८ ॥

शब्द ४२७-ऐसे हरि सो जगत लरतु है। पंडुर कतहुं गुरुठ धरतु है॥टे०॥ मूस विलारी कैसनि हेतू। जम्बुक कर केहरि सो खेतू॥ अचरज यक देखा संसारा। सोनहा खेद कुंजर असवारा॥ कह कवीर सुनो संतो भाई। यह संधी कोह बिरले पाई ॥ ३९ ॥

शब्द ४२८-पंडित बाद बदौ सो झूठा। रामके कहे जगत गति पावै खांड कहै मुख मीठा॥टेक॥ पावक कहै पांव जो दाहै जल कहै तिरषा बुझाई। भोजन कहे भूख जो भाजे तो दुनिया तरि जाई॥ नरके संग सुवा हरि बोले हरि प्रताप नहिं जानै। जो कबहुं उडि जाय जंगलको तौ हरि सुरति न आने❧ ॥ बिनु देखे विनु अरस परसके नाम लिये का होई। धनके कहे धनिक जो हो तो निर्धन रहत न कोई ॥ सांची प्रीति विषय माया सों हरि भगतनकी हांसी। कह कवीर यक नाम भजे विनु बांधे जमपुर जासी ॥ ४० ॥

शब्द ४२९-पण्डित देखौ मनमों जानी। कहुधौं छूत कहांते उपजी तबहि छूति तुम मानी॥टेक॥ नादे बिन्दु रुधिर यक संगै घटहीमें घट सजै। अष्ट कमलकी पुहुमी आई यह छूति कहांते उपजै ॥ लख चौरासी बहुत बासना सो सब सरि भौ मांटी। एकै पाट सकल बैठारे सींच लेत धौं काटी ॥ छूतिहिं जेवन छूतिहिं

  • देखो सुवाबतीसी।

(९१२)

कवीरपंथी—

अचवन छूतिहि जग उपजाया । कह कवीर ते छूति बिर्वाजित जाके संग न माया ॥ ४१ ॥

शब्द ४३०—पंडित सोधि कहहु समुझाई । जाते आवागमन नशाई ॥ अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौन दिशा बस भाई ॥ टेक ॥ उत्तर दछिन पूरब पच्छिम सरग पतालके माही । विन गोपाल ठौर नहिं कतहुं नरक जात धौं काही ॥ अनजानेको नरक सरग है हरि जानेको नाहीं । जेहि डरको सब लोक डरतु है सो डर हमरे नाहीं ॥ पापपुन्यकी शंका नाहीं सरग नरक नहिं जाहीं । कहैं कवीर सुनो हो संतो जहैं पद तहां समाहीं ॥ ४२ ॥

शब्द ४३१—पंडित मिथ्या करो विचारा । ना ह्लां सृष्टि न सिरजनहारा ॥ टेक ॥ थूल स्थूल पवन नहिं पावक रवि शशि धरनि न नीरा । ज्योति स्वरूपी काल न उहवां बचन न आहि शरीरा ॥ धरम करम कछुवो नहिं उहवां ना कछु मंत्र न पूजा । संजम सहित भाव नहिं एको सो तो एक न दूजा ॥ गोरख राम एको नहिं उहवां ना वर्हिं भेद विचारा । हरि हर ब्रह्म नहीं शिव सकती तिरथौं नहीं अचारा ॥ माय बाप गुरु जाके नाहीं सो दूजा कि अकेला । कह कवीर जो अबकी समझैं सोइ गुरु हम चैला ॥ ४३ ॥

शब्द ४३२—बूझहु पंडित करहु विचारी, पुरुष अहे कि नारी ॥ टेक ॥ ब्राह्मन केरे ब्रह्मनी होती जोगी के घर चेली । कलमां पठि पठि भई तुरकिनी कलिमें रहै अकेली ॥ वर नहिं वरै व्याह नहिं करई पुत्र जनम होनिहारी । कारे मूडे एक नहिं छाडे अबहुं आदि कुवारी । मायिक न रहै जाइ न ससुरे साईं संग न सोवे ॥ कह कवीर वे जुग जुग जीवे जाति पांति कुल खोवे ॥ ४४ ॥

शब्द ४३३—कौन सुआ कह पंडित जना । सो समुझाय कहौ

शब्दावली

(११३)

मोहि सना ॥ ८० ॥ मूये ब्रह्मा विष्णु महेशा । पार्वती सुत भये गनेशा ॥ मूये चन्द्र मुखे रवि केता । मुखे हनुमत जिन बांधी सेता ॥ मूये कृष्ण मुखे करतारा । यक न मुआ जो सिरजन हारा ॥ कहैं कवीर मुआ नहीं सोई । जाको आवागमन न होई ॥ ४५ ॥ शब्द ४३४-पंडित अचरज यक बड़ होई । यक मरमुखे अन्न नहीं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ ८० ॥ करि अस्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ । हांडी हाड हाड थारी मुख अब षट करम बनेऊ ॥ धरम कथे जहं जीव बचे तहं अकरम कर मेरे भाई । जो तोहरेको ब्राह्मन कहिय तो केहि कहिय कसाई ॥ कह कवीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनियाई । अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४६ ॥

शब्द ४३५-पंडित बूझ पियो तुम पानी । जा माटीके घरमें बैठे तामें सुछि समानी ॥ छप्पन कोटि जादव जहं विनशे सुनि जन सहस अठासी । परग परग पैगम्बर गाडे ते सरि माटी मासी ॥ मच्छ कच्छ घरियार वियाने रुधिर नीर जल भरिया । नदिया नीर नरक बहि आवै पशु मानुष सब सरिया ॥ हाड झरो झरि गूद गली गलि दूध कहातै आयो । सो तुम पांडे जेवन बैठे मटिअहि छूत लगायो ॥ बेद किताब छोड दिहु पांडे ई सब मनके करमा । कहैं कवीर सुनो हो पांडे ई सब तुम्हरे धरमा ॥ ४७ ॥

शब्द ४३६-पंडित देखौ हृदय विचारी । कौन पुरुष को है नारी ॥ ८० ॥ सहज समाना घट घट बोले वाको चरित अनूपा । वाको नाम का कहि लीजे ना बहि वरन न रूपा ॥ तैं मैं क्या कोर नर बौरै क्या तेरा क्या मेरा । राम खुदाय सकति शिव एकै कहु धौ काहि निवेरा ॥ बेद पुरान कुरान कितेबा नाना भांति बखानी । हिन्दू तुरुक जैन ओ जोगी एकल काहु न जानी ॥

(११४)

कवीरपंथी—

छः दरशनमें जे परवाना तासु नाम मन माना । कहै कवीर हमहीं हैं बौरै ई सब खलक स्याना ॥ ४८ ॥

शब्द ४३७-बुझ बुझ पंडित पद निर्बाना । सांझ परे कहंवा बस भाना ॥ ८० ॥ नीच ऊंच पर्वत ढेल न भीत । विन गायन तहवां उठ गीत ॥ ओस न प्यास मन्दिर नहिं जहंवां । सहसौ घेनु दुहावै तहवां ॥ नितै अमावस नित संकांती । नित नित नव ग्रह बैठे पांती ॥ मैं तोहि पूछौ पंडित जना । हृदया ग्रह न लागु केहि खना ॥ कह कवीर इतनो नहिं जान । कौन शब्द गुरु लागा कान ॥ ४९ ॥

शब्द ४३८-बुझ बुझ पंडित विरवा न होई । अध बस पुरुष अधा बस जोई ॥ ८० ॥ विरवा एक सकल संसारा । सरग शीश जर गेल पतारा ॥ बारह पखुरी चौबिस पाता । घन बरोह लागी चहुं घाता ॥ फलै न फूलै वाकि है बानी । रैन दिवस विकार जुव पानी ॥ कह कवीर कछु अच्छलो न जहिया । हरि विरवा प्रतिपालत तहिया ॥ ५० ॥

शब्द ४३९-बुझ बुझ पंडित मन चितलाय । कबहिं भरल वहे कबहि सुखाय ॥ ८० ॥ खन ऊबे खन डूबे खन अवगाह । रतन न मिले पाव नहिं थाह ॥ नदिया नाहिं सरस बहे नीर । मच्छ न मरे केवट रहे तीर ॥ पोहकर नहीं बांधल तहं घाट । पुरइनि नहीं कमल महि बाट ॥ कहै कवीर यह मनका धोखा । बैठारहै चला चह चोखा ॥ ५१ ॥

शब्द ४४०-बूझ लीजे ब्रह्म ज्ञानी । घुरि घुरि बरषा बरषावै परिया बुंद न पानी ॥ ८० ॥ चीटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगै खायो । उदधि मांहते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ मेढुक सर्प रहै इक संगे बिछी स्वान बियाही । नितउठि सिंह सियार सों

शब्दावली

(९१५)

डरपै अद्भुत कथो न जाही ॥ (कौने) संशय भूगा तन वन घेरे पारथ बाना मेले । शायर जरे सकल वन ढाहै मच्छ अहेरा खेले ॥ कह कवीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहि वूझे । विनु पंखै उड़ि जाय अकाशे जीवहि मरन न सूझे ॥ ५२ ॥

शब्द ४४१-वह विरवा चीन्है जो कोय । जरा मरन रहितै तन होय ॥ टे० ॥ विरवा एक सकल संसारा । पेड एक फूटल तिन डारा ॥ मध्यके डार चारि फल लागा । साखा पत्र गनत को बागा ॥ वेलि एक त्रिभुवन लपटानी । बांधेते छूटिहि नहि प्रानी ॥ कहहि कवीर हम जात पुकारा । पंडित होय सो करे विचारा ॥ ५३ ॥

शब्द ४४२-साईके संग सासुर आई । संग न सूती स्वाद न मानी गौ जौबन सपनेकी नाई ॥ टे० ॥ जना चार मिलि लगन सोधाई जना पांच मिलि मंडप छाई । सखी सहेली मंगल गावै दुख सुख माथे हरदि चढाई ॥ नाना रूप परी मन भांवरि गांठी जोरि भई पतियाई । अरघै दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड भई संग साई ॥ भयो विवाह चली बिन दूलह बाट जात समधी समझाई । कहै कवीर हम गौने जैबे तरव कन्त ले तूर बजाई ॥ ५४ ॥

शब्द ४४३-नलको ढाढस देखो आई । कछु अकथ कथा है भाई ॥ टे० ॥ सिंहसारदूल यक हर जोतिनि सीकस बोइन धाना । बनकी खुलइया चाखुर फेरे छागर भये किसाना ॥ छेरी बाघहि व्याह होत है मंगल गावै गाई । बनके रोझ धै दाइज दीन्हों गोह लोकंदै जाई ॥ कागा कपडा धोवन लागे बकुला किररे दांता । मांछी मूँड सुडावन लागी हमहुं जाब बराता ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो जो यह पद अर्थौवै । सोई पंडित सोई ज्ञाता सोई भक्त कहावै ॥ ५५ ॥

शब्द ४४४-नलको नहि परतीति हमारी । झूठे बनज कियो

(९१६)

कबीरपंथी—

झूठे सन पूंजी सबै मिलि हारी ॥ टेक ॥ षट दरशन मिलि पंथ चलायो तिरदेवा अधिकारी । राजा देश बडो परपंची रैयत रहत उजारी ॥ इतते उतरहु उतते उतरहु जमकी साट सवारी । ज्यों कपि डोर बांधि बाजीगर अपने खुशी परारी ॥ यहै पैठ उतपति परलयको विषया सबै विकारी । जैसे स्वान अपावन राजी त्यों लागी संसारी ॥ कहैं कबीर यह अद्भुत ज्ञाना मानो बात हमारी । अजहूं लेहुं छोडाय कालसों जो घट सुरति संभारी ॥ ६६ ॥

शब्द ४४५—न हरि भजसि न आदत छूटी । शब्दै ससुझि सुधारत नाही अंधरे भये हियेकी फूटी ॥ टे० ॥ पानी माहि पषानकी रेखा ठोंकत उठै भभूका । सहस घडा नितहीं जल ढारे फिर सूखेका सूखा ॥ सेते सेते सेत अंग भौ सैन बढो अधिकाई । जो सन्निपात रोगि यहि मारे सो साधुन सिधि पाई ॥ अनहद कहत कहत जग विनसे अनहद सुधि समानी । निकट पयाना जमपुर धावै बोलहि एकै बानी ॥ सतगुरु मिलै बहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारे । कहैं कबीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारे ॥ ६७ ॥

शब्द ४४६—नरहर लागी दाव विकार विन ईधन मिलै न बुझावन हारा । मैं जानों तोही ते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ टे० ॥ पानी माहि अग्नि को अंकुर मिलन बुझावन पानी । एक न जरे जरे नौ नारी जुगति न काहू जानी ॥ सहर जरे पहरू सुख सोवै कहे कुशल घर मेरा । पुरिया जरे वस्तु निज उबै बिकल राम रंग तेरा ॥ कुबिजा पुरुष गले यक लागी पूजि न मनकी साधा । करत विचार जनम गौ खीसा ई तन रहत असाधा ॥ जानि बूझ जे कपट करत है तेहि अस मन्द न कोई । कहे कबीर सब नारि रामकी मोते और न होई ॥ ६८ ॥

शब्दावली

(११७)

शब्द ४४७-माया महा ठगनी हम जानी। निरगुन फ्रांस लिये कर ढोलै बोलै मधुरी बानी ॥ टेक ॥ केशवके कमला है बैठी शिवके भवन भवानी। पंडाके मूरति है बैठी तीरथमें भइ पानी ॥ जोगीके जोगिन है बैठी राजाके घर रानी। काहूके हीरा है बैठी काहूके कौडी कानी ॥ भगतनके भगतिन है बैठी ब्रह्माके ब्रह्मानी। कहै कवीर सुनो हो संतो यह सब अकथ कहानी ॥ ५९ ॥

शब्द ४४८-माया मोह मोहित कीन्ह। ताते ज्ञान रतन हरि लीन्ह ॥ टेक ॥ जीवन ऐसो सपना जैसो जीवन सपन समाना। सबद गुरु उपदेश दियो तैं छाव्यो परम निधाना ॥ जोतिहिं देखि पतंग हुलसे पशु नहिं पेखै आगी। काम क्रोध नल सुगुध परेहैं कनक कामिनि लागी ॥ सग्यद सेख किताब नीरेखे पंडित शास्त्र बिचारे। सत गुरुके उपदेश विना तुम जानिकै जीवहि मारे ॥ करौ विचार बिकार पीर हरौ तरन तारने सोई। कह कवीर भगवंत भजन करु द्वितिया और न कोई ॥ ६० ॥

शब्द ४४९-मरिहौ रे तन काले करिहौ। प्राण छुटै बाहर लै धरिहौ ॥ टे० ॥ काया विगुरचनि अनवनि बाटी। कोइ जारे कोइ गाडै माटी ॥ हिंदू लै जारे तुरुक लै गाडै। यहि बिधि अन्त दुनौ घर छाडै ॥ करम फ्रांस जम जाल पसार। ज्यों धीमर मछरी गहिमारा ॥ राम विना नल हैहो कैसा। बाट माझ गोबरौरा जैसा ॥ कह कवीर पाछे पछतैहौ। या घरसे जब वा घर जेहौ ॥ ६१ ॥

शब्द ४५०-माइ मैं दूनों कुल उजियारी। बारह खसम नेहरे खायो सोरह खायो ससुरारी ॥ टेक ॥ सासु ननद मिलि पटिया बांधल भंझुरा परलौ गारी। जारों मांग मैं तासु नारि की सरिवर रचल हमारी ॥ जनाँ पांच कोखियामें राखों औ राखों दुइ चारी। पार परोसिनि करों कलेवा संगहिं बुधि महतारी ॥ सहजै बपुरी

(११८)

कबीरसंथी-

सेज बिछायो सुतलों पांव पसारी । आउं न जाउं मरों नहिं जीवों साहब मेटल गारी ॥ एक नाम मैं निज के गहिह्यो तो छूटल संसारी । एक नाम मैं बढिके लेखौ कहै कवीर पुकारी ॥ ६२ ॥

शब्द ४५१-मैं कासों कहौ को सुने को पतियाय । फुलवाके छुवत भँवर मरिजाय ॥ टेक ॥ गगन मँडल बिच फुल यक फूला । तर भो डार उपर भो मूला ॥ जोतिय न बोइये सिचिय न सोह । बिन डार बिन पात फुल यक होह ॥ फुल भल फुलल मालिनि भल गांथल । फुलवा विनसि गयल भँवर निरासल ॥ कह कवीर सुनो सन्तो भाई । पंडित जन फुल रहै लुभाई ॥ ६३ ॥

शब्द ४५२-जोलहा हो बिनहु हहिमाना । जाके सुर नर सुनि धैर ध्याना ॥ टेक ॥ ताना तने को अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु वेदा । सर खुंटी इक राम नरायण पूरन परगटे भेदा ॥ भवसागर यक कठवत कीन्हो तामे माडी सानी । माडीको तन माडिरह्यो है माड़ी विरला जानी ॥ त्रिभुवन नाथ जो मंज्जन लागे स्याम सुरार या दीना । चांद सूर दोय गोडा कीन्हो मांझ दीप किय तीना ॥ पाई करिके भरना लीन्हों वे बान्धैको रामा । वय भरी तिहुं लोके बांधैं कोह न रहै उबामा ॥ तीन लोक यक करिगह कीन्हो दिग मग कीन्हो ताना । आदि पुरुष वैठावन बैठे कविरा ज्योति समाना ॥ ६४ ॥

शब्द ४५३-जोगिया फिर गयो नगर मझारी । जाय समान पांच जहाँ नारी ॥ टेक ॥ गये देशांतर कोई न बतावे । जोगिया बहुरि गुफा नहिं आवे ॥ जरिगौ कंथ ध्वजा गौ टूटी । भजिगो दंड खपर गौ फूटी ॥ कह कवीर यह कलि है खोटी । जो रह करवा निकसे टोटी ॥ ६५ ॥

शब्दावली

(११९)

शब्द ४५४-जोगियाकी नगरि बसै मत कोई । जोरे बसै सो जोगिया होई ॥ ६० ॥ वहि जोगियाको उल्टा ज्ञाना । कारा चोला नाहिं म्याना ॥ प्रकट सो कंथा गुप्ता धारी । तामें मूल सजीवनि भारी ॥ वा जोगियाकी जुगुति जो बूझे । राम रमै सो त्रिभुवन सूझे ॥ अमृत बेली छन छन पीवै । कह कवीर सो जुग जुग जीवै ॥ ६६ ॥

शब्द ४५५-जोपै बीजरूप भगवाना । तौ पंडितका बूझो आना ॥ ६० ॥ कहैं मन कहाँ बुद्धि अहंकारा । रज सत तम गुन तीन प्रकारा ॥ विष अमृत फल फूल अनेका । बहुधा वेद कहै तरवेका ॥ कह कवीर ते मैं का जानों । को धौ छूटल को अरुझानो ॥ ६७ ॥

शब्द ४५६-जो चरखा जरि जाय बढैया ना मरै । मैं कातों सूत हजार चरखला ना जरे ॥ ६० ॥ बाबा व्याह करायदे अच्छा बरहि तकाहु । अच्छा बर जो ना मिलै तुमहि मोहिं विवाहु ॥ प्रथमै नगर पहुँचते परिगो शोक सन्ताप । एक अचंभो हौं देखा बेटी व्याहै बाप ॥ समधीके घर समधी आयो आयो बहुको भाइ । गोड चूल्हौने दैरहे चरखा दियो दिढाइ ॥ देवलोक मरि जाहिंगे एक न मरै बढाय । यह मन रंजन कारने चरखा दियो दिढाय कह कवीर संतो सुनौ चरखा लखै न कोई । जाको चरखा लखि परा आवागमन न होई ॥ ६८ ॥

शब्द ४५७-जंत्री जंत्र अनूपम बाजै । वाके अष्ट गगन मुख गाजै ॥ ६० ॥ तूही गाजै बाजै तुही लिये कर डोलै । एक शब्दमें राग छत्तीसो अनहद बानी बोलै ॥ मुखको नाल सरवनको तुम्बा सतगुरु साज बनाया । जिह्वा तार नासिका चरही माया मोम लगाया ॥ गगन मंडल मां भौ उजियारा उल्टा फेर लगाया ॥ कह कवीर जन भये विवेकी जिन जंत्री मन लाया ॥ ६९ ॥

शब्द ४५८-जस मांसु नलकी तस मांसु पशुकी रुधिर रुधिर

(१२०)

कवीरपंथी—

यक सारा जी । पशुको मांस भखे सब कोई नलहिं न भखे सियारा जी ॥ ८० ॥ ब्रह्मकुलाल मेदिनि भरिया उपजि बिनसि कित गइया जी । मांस मछरिया जोपै खैया जो खेतनमें बोइया जी ॥ माटीको करि देवी देवा जीव काटि काटि देइया जी । जो तेरा है सांचा देवा खेत चरत किन लइया जी ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो राम नाम नित लिया जी । जो कटु कियो जिह्वाके स्वरथ बदल पराया देइया जी ॥ ७० ॥

शब्द ४५९—चात्रिक कहाँ पुकारै दूरी । सो जल जगत रहा भरपूरी ॥ ८० ॥ जेहि जल नाद बिन्दुका भेदा । षट्कर्म सहित उपान्यो वेदा ॥ जेहि जल जीव सीवका बासा । सो जल धरनि अमर प्रकाशा ॥ जेहि जल उपजे सकल शरीरा । सो जल भेद न जान कवीरा ॥ ७१ ॥

शब्द ४६०—चलहु का टेढो टेढो टेढो । दसौं द्वार नरकमें बूढे तू गंधीको वेढो ॥ ८० ॥ फूटे नैन हृदय नहिं सूझे मति एको नहिं जानी । काम क्रोध तृष्णाके मारे बूडि सुये विन पानी ॥ जारै देह भसम हँ जाई गाडे कीम किट खाई । सूकर स्वान कागके भोजन तनकी यहै बडाई ॥ चेत न देखु सुगुध नल बोरे तूते काल न दूरी । कोटिन जतन करे बहुतरे तनकी अवस्था धूरी ॥ बालूके घरवामें बैठे चेतत नाहिं अजाना । कह कवीर यक राम भजे विन बूढे बहुत सयाना ॥ ७२ ॥

शब्द ४६१—फिरहु क्या फूले फूले फूले । जो दस मास उरध मुख झूले सो दिन काहेक भूले ॥ ८० ॥ ज्यों माखी स्वादे लहि विहैर सोचि सोचि धन कीना । त्योही पीछे लेहु लेहु कर भूत रहनि कछु दीना ॥ देहरी लौं बर नारी संग है आगे संग सहेला । मृतक थान संग दियो खटोला फिर पुनि हंस अकेला ॥ जारे

शब्दावली

(१२१)

देह भसम है जाई गाडे माँटी खाई। काँचे कुम्भ उदक जो भरिया तनकी इहै बडाई ॥ राम न रमसि मोहमें माते परचो काल वश कूवा। कह कवीर नल आप बँधायो ज्यों नलनी भरम सूवा ॥७३॥

शब्द ४६२-जोगिया ऐसो है बदकरनी। जाके गगन अकाश न धरनी ॥८०॥ हाथ न वाके पाँव न वाके रूप न रेखा। विना हाट हटवाई लावै करै बयाई लेखा ॥ करम न वाके धरम न वाके जोग न वाके जुगती। सिंगी पत्र कछुव नहिं वाके काहेक माँगै भुगती ॥ ते मोहि जाना मैं तोहि जाना मैं तोहि माह समाना। उत्पति परलय एक नहिं होती तब कहुँ कौन को ध्याना ॥ जोगिया एक आनि किय ठाढो राम रहा भरि पूरी। औषधि मूल कछुव नहिं वाके राम सजीवनि मूरी ॥ नटवत बाजी पेखनी पेखै बाजी गरकी बाजी। कहै कवीर सुनो हो संतो भई सो राज विराजी ॥७४॥

शब्द ४६३-ऐसो भरम विगुरचिन भारी। वेद किताब दीन औ दोजरव को पुरुष को नारी ॥ माटीको घट साज बनाया नादे बिंद समाना। घट विनशे क्या नाम धरहुगे अहमक खोज भुलाना ॥ एकै हाड़ त्वचा मल सूत्रा रुधिर गूद यक मूद्रा। यक बिन्दु ते सृष्टि रच्यो है को ब्राह्मन को शूद्रा ॥ रजोगुनि ब्रह्म तमोगुनि शंकर सतोगुनी हरि सोई। कहैं कवीर राम रमि रहियो हिन्दू तुरुक न कोई ॥ ७५ ॥

शब्द ४६४-आपनपौ आपहिं विसरचो। जैसे सोनहा काँच मंदिलमें भरमत भुंकि मरचो ॥ ८० ॥ ज्यों केहरि वपु निरखि कूप जल प्रतिमा देखि परचो। ऐसेहि मदगज फटिक शिलापर दसनन आनि अरचो ॥ मरकट मूठी स्वाद न विहुरै घर घर नटत फिरचो। कह कवीर नलनीके सुवना तोहि कौने पकरचो ॥७६॥

शब्द ४६५-आपन आश कियो बहुतेरा। काहु न मरम पाव

(१२२)

कवीरपंथी-

हरि केरा ॥ ६० ॥ इन्द्री कहाँ करै विसरामा । सो कहैं गये जो कहते रामा ॥ सो कहैं गये होत स्यान । होय मृतक यहि पदहि समान ॥ रामानन्द रामरस छाके । कह कवीर हम कहि कहि थाके ॥ ७७ ॥

शब्द ४६६-अब हम जाना हो हरि बाजीको खेल । डंक बजाय देखाय तमाशा बहुरि सो लेत सकेल ॥ ६० ॥ हरि बाजी सुर नर मुनि जहँडे माया चेटक लाया । धरमें डारि सबन भरमाया हृदया ज्ञान न आया ॥ बाजी झूठ बाजीगर साँचा साधुनकी मति ऐसी । कहहिँ कवीर जिन जैसी समुझी ताकी गति भइ तैसी ॥ ७८

शब्द ४६७-कहो हो अम्बर कासों लागा । चेतन हारे चेतु सुभागा ॥ अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दूजे चेतवन हारा ॥ ६० ॥ जेहि खोजै सो उहवाँ नहीं । सो तो आहि अमरपद माहीं ॥ कह कवीर पद बूझै सोइ । मुख हृदया जाके यक होई ॥ ७९ ॥

शब्द ४६८-बन्दे करिले आप निवेरा । आप जियत लखु आप ठवर करु मुखे कहाँ घर तेरा ॥ टेक ॥ यहि अवसर नहिँ चेतौ प्रानी अन्त कोई नहीं तेरा । कहैं कवीर सुनो हो संतो कठिन कालको घेरा ॥ ८० ॥

शब्द ४६९-रहु रराँ मम्माकी भांती हो सब संत उधारन चूनरी ॥ ६० ॥ बालमीकि बन बोइया चूनि लिया शुक्रदेव । कर्म बेनौरा है रह्यो सुत काते जयदेव ॥ तीन लोक ताना तनो ब्रह्मा विष्णु महेश । नाम लेत मुनि हारिया सुरपति सकल नरेश ॥ विन जिह्वा गुन गाइया विन वस्तीका गेह । सूने घरका पाहुना तासों लावे नेह ॥ चार वेद कैडा कियो निरंकार किय रास । विने कवीरा चूनरी पहिरे हरिके दास ॥ ८१ ॥

शब्दावली

(१२३)

शब्द ४७०-तुम यहि विधि समझौ लोईं। गोरी सुख मंदिर बजोईं ॥ टेक ॥ एक सगुन षट् चक्रहि बेघै वित्तु वृषभ कोल्हू मांजै। ब्रह्मै पकरि अग्निमां होमै मछ गगन चटि गजै ॥ नितै अमावस नितै ग्रहन होय राहु ग्रास नित दीजै। सुरभा भच्छन करै वेद सुख घर बरसै तन छीजै ॥ पहुमिक पानी अम्बर भरिया यह अचरज को कीजै। त्रिकुटि कुंडल मध मन्दिर बाजै औघट अम्बर भीजै ॥ कहै कवीर सुनो हो संतो जोगिन सिद्धी प्यारी। सदा रहै सुख संजम अपने बसुधा आदि कुंवारी ॥ ८२ ॥

शब्द ४७१-भुला वे अहमक नादाना। तुम हरदम रामहि ना जाना ॥ टे० ॥ बरबस आनिके गाय पछारी गला काट जिव आप लिया। जीता जीव सुरदा करि डरि तिसको कहत हलाल किया ॥ जाहि माँसुको पाक कहत हैं ताकी उत्तपति सुनु भाई। रज वीरज सो माँस उपानी मासु नापाक जो तुम खाई ॥ अपने दोष कहत नहिं अहमक कहत हमारे बडेन किया। उसकी खून तुम्हारी गर्दन जिन तुमको उपदेश दिया ॥ सियाहा गई सफेदी आई दिल सफेद अजहूं न हुआ। रोजा निमाज बांग क्या कीजै हुजरे भीतर बैठि सुआ ॥ पंडित वेद पुरान पढे सुलना पढै सो कुराना। कह कवीर वे नरक गये जिन हरदम रामहिं ना जाना ॥ ८३ ॥

शब्द ४७२-काजी तुम कौन किताब बखाना। झंखत बकत रहौ निशि बासर मति एकौ नहिं जाना ॥ टे० ॥ सकति न मानै सुनति करतहौ मैं न बदोंगा भाई। जो खोदाय तुव सुनति करत तो आप काटि किन आई ॥ घालि जनेऊ ब्राह्मन होना मेहरीको क्या पहिराया। वो तो जन्मकी शूद्रिन परोसा सो तुम पांडे क्यों खाया ॥ हिन्दू तुरुक कहांते आये किन यह राह चलाई। दिलमें खोजु खोज दिलहीमें भिस्त कहां किन पाई ॥ ८४ ॥