कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ ऋग्वेदीय श्रीराधोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीराधाजीके स्वरूप तथा नामोंका वर्णन
[बायाँ स्तम्भ] ॐ एक बार ऊर्ध्वरेता सनकादि महर्षियोंने भगवान् श्रीब्रह्माजीकी स्तुति करके पूछा, 'देव ! सर्वप्रधान देवता कौन हैं और उनकी कौन कौन-सी शक्तियाँ हैं तथा उन शक्तियोंमें सृष्टिका सर्वश्रेष्ठ कारण कौन-सी शक्ति है ?' यह सुनकर श्रीब्रह्माजी बोले—'पुत्रो ! सुनो, किंतु इस अति गोपनीय रहस्यको तुम किसीसे प्रकट न करना—तुम इसे किसी ऐरे-गैरेको मत दे डालना । हाँ, जो स्नेही हों, ब्रह्मवादी हों, गुरुभक्त हों, उन्हें अवश्य देना । उनके अतिरिक्त और किसीको देनेसे महान् पाप लगेगा । भगवान् हरि श्रीकृष्ण ही परमदेव हैं । वे छहों ऐश्वर्योंसे पूर्ण भगवान् गोप और गोपियोंके सेव्य, श्रीवृन्दा ( तुलसी ) देवीसे आराधित और श्रीवृन्दावनके अधीश्वर हैं । वे ही एकमात्र सर्वेश्वर हैं । उन्ही श्रीहरिके एक रूप नारायण भी हैं जो कि अखिल ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर हैं । ये श्रीकृष्ण प्रकृतिसे भी पुरातन और नित्य हैं। उनकी आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञान, इच्छा और क्रिया आदि बहुत-सी शक्तियाँ हैं । उनमें आह्लादिनी सर्वप्रधान हैं । ये ही परम अन्तरङ्गभूता श्रीराधा है। कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिये ये राधा है, अथवा ये सर्वदा कृष्णकी आराधना करती है; इसलिये राधिका कहलाती हैं । श्रीराधाको गान्धर्वा भी कहते हैं, ब्रजकी गोपाङ्गनाएँ, द्वारकाकी समस्त श्रीकृष्ण महिषियाँ और
[दायाँ स्तम्भ] श्रीलक्ष्मीजी इन्हीं श्रीराधिकाजीकी कायव्यूह (अंशरूपा) हैं। ये राधा और श्रीकृष्ण रस सागर एक होते हुए ही शरीरसे क्रीड़ाके लिये दो हो गये हैं। ये श्रीराधिकाजी भगवान् हरिकी सर्वेश्वरी, सम्पूर्ण सनातनी विद्या हे और श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं । वेद एकान्तमे इनकी ऐसी ही स्तुति किया करते हैं । इनकी महिमाका मैं अपनी सम्पूर्ण आयुमें भी वर्णन नहीं कर सकता । जिसपर इनकी कृपा होती है, परमधाम उनके हाथमें आ जाता है । इन श्रीराधिकाजीको न जानकर जो श्रीकृष्णकी आराधना करना चाहता है, वह महामूर्ख है, मूढ़तम है । श्रुतियाँ इनके इन नामोंका गान करती है— १ राधा, २ रासेश्वरी, ३ रम्या, ४ कृष्णमन्त्राधिदेवता, ५ सर्वाद्या, ६ सर्ववन्द्या, ७ वृन्दावनविहारिणी, ८ वृन्दारोध्या, ९ रमा, १० अशेषगोपीमण्डलपूजिता, ११ सत्या, १२ सत्यपरा, १३ सत्यभामा, १४ श्रीकृष्णवल्लभा, १५ वृषभानुसुता, १६ गोपी, १७ मूल प्रकृति, १८ ईश्वरी, १९ गान्धर्वा, २० राधिका, २१ आरम्या, २२ रुक्मिणी, २३ परमेश्वरी, २४ परात्परतरा, २५ पूर्णा, २६ पूर्णचन्द्रनिभानना, २७ भुक्तिमुक्तिप्रदा तथा २८ भवव्याधिविनाशिनी । इन अट्ठाईस नामोंका जो पाठ करते है, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं। यों भगवान् श्रीब्रह्माजीने कहा है* ।
[पाद-टिप्पणी श्लोक]
- राधा रासेश्वरी रम्या कृष्णमन्त्राधिदेवता । सर्वाद्या सर्ववन्द्या च वृन्दावनविहारिणी ॥ वृन्दारोध्या रमाशेषगोपीमण्डलपूजिता । सत्या सत्यपरा सत्यभामा श्रीकृष्णवल्लभा ॥ वृषभानुसुता गोपी मूलप्रकृतिरीश्वरी । गान्धर्वा राधिकाऽऽरम्या रुक्मिणी परमेश्वरी ॥ परात्परतरा पूर्णा पूर्णचन्द्रनिभानना । भुक्तिमुक्तिप्रदा नित्यं भवव्याधिविनाशिनी ॥
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६६३ '(इस प्रकार भगवान्की आह्लादिनी-शक्ति श्रीराधिकाजीका और जड है। (जड होनेके कारण भगवान्की दृष्टि पड़नेसे) यह वर्णन हुआ, अब उनकी सन्धिनी-शक्तिका विवरण सुनो।) अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना करती है तथा यही माया और यह सन्धिनी-शक्ति धाम, भूषण, शय्या और आसनादि तथा अविद्यारूपसे जीवका बन्धन करती है। क्रियाशक्तिको ही मित्र और भृत्यादिके रूपमें परिणत होती है और मृत्युलोकमे लीलाशक्ति कहते हैं। अवतार लेनेके समय माता-पिताके रूपमें परिणत हो जाती 'जो इस उपनिषद्को पढते हैं, वे अव्रती भी व्रती हो है। यही अनेक अवतारोंकी कारण है। ज्ञानशक्तिको ही जाते हैं तथा वे अग्निपूत, वायुपूत और सर्वपूत हो जाते है। क्षेत्रज्ञशक्ति कहते हैं और इच्छाशक्तिके अन्तर्भूत माया- वे श्रीराधाकृष्णके प्रिय होते हैं और जहाँतक दृष्टिपात करते शक्ति है। यह सत्त्व, रज और तमोगुणारूपा है तथा बहिरङ्ग हैं, वहाँतक सबको पवित्र कर देते हैं। ॐ तत्सत्।' ॥ ऋग्वेदीय श्रीराधोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! एकमात्र श्रीकृष्ण ही भजनीय हैं एको वशी सर्वगः कृष्ण ईड्य एकोऽपि सन् बहुधा यो विभाति तं पीठस्थं येऽनुभजन्ति धीरास्तेषां सिद्धिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तं पीठगं येऽनुभजन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (गोपालपू० ता०) एकमात्र सबको वशमें रखनेवाले, सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा स्तवन करने योग्य हैं। वे एक होकर भी बहुत रूपोंमें प्रकाशित हैं। जो धीर भक्त उन पीठस्थ भगवान्को भजते हैं, उन्हींको सनातनी सिद्धि मिलती है, दूसरोंको नहीं। जो नित्योंके भी नित्य हैं, चेतनोंके भी परम चेतन हैं, जो एक ही बहुतोंकी कामना पूर्ण करते हैं, उन पीठस्थ श्रीभगवान्को जो धीर भक्त भजते हैं, उन्हींको सनातन सुख मिलता है, दूसरोंको नहीं।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यन्तरण दिया गया है:
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय बिन्दू नि षद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मनके लयका साधन, आत्माका स्वरूप तथा ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय
ॐ । मन दो प्रकारका बताया गया है, एक तो शुद्ध मन और दूसरा अशुद्ध । जिसमें कामनाओं—विषय-भोगोंके सङ्कल्प उठते रहते हैं, वह अशुद्ध मन है, तथा जिसमें कामनाओंका सर्वथा अभाव हो गया है, वही शुद्ध मन है। मनुष्योंका मन ही उनके बन्धन और मोक्षका कारण है। विषयासक्त मन बन्धनका और विषय-सङ्कल्पसे रहित मन मोक्षका कारण माना गया है। क्योंकि विषय-सङ्कल्पसे शून्य होनेपर ही इस मनका लय होता है, इसलिये मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाला साधक अपने मनको सदा विषयोंसे दूर रक्खे। जब मनसे विषयासक्ति निकल जाती है और वह हृदयमें स्थिर होकर उन्मनीभावको प्राप्त (संकल्प विकल्पसे रहित) हो जाता है, तब वही परम पद है। मनको तभीतक रोकनेका प्रयत्न करना चाहिये, जबतक कि वह हृदयमें ही विलीन नहीं हो जाता । मनका हृदयमें लय हो जाना—यही ज्ञान और मोक्ष है; इसके सिवा जो कुछ है, वह ग्रन्थका विस्तारमात्र है। जब न तो कोई चिन्तनीय रह जाय और न अचिन्तनीय ही रह जाय, चिन्तनीय तथा अचिन्तनीय दोनोंमेंसे किसीके प्रति भी मनका पक्षपात न रह जाय, उस समय यह साधक ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। स्वर अर्थात् प्रणवके साथ परमात्माकी एकता करे और फिर प्रणवसे अतीत परम तत्त्वकी भावना (चिन्तन) करे। प्रणवातीत तत्त्वकी उस भावनाके द्वारा भावरूप परमात्माकी ही उपलब्धि होती है, अभावकी नहीं। अर्थात् उसके बिना समाधि शून्यरूप ही होती है। वही कलाओंसे रहित अर्थात् अवयवहीन, विकल्पशून्य एव निरञ्जन—मायारूप मलरहित ब्रह्म है। 'वह ब्रह्म मैं हूँ' यों जानकर मनुष्य निश्चय ही ब्रह्म
हो जाता है। विकल्प-शून्य, अनन्त, हेतु और दृष्टान्तसे रहित, अप्रमेय तथा अनादि परम कल्याणमय ब्रह्मको जानकर विद्वान् पुरुष अवश्य ही ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ १-९ ॥ न सहार है न सृष्टि; न बन्धन है न उससे छूटनेका उपदेश; न मुक्तिकी इच्छा है न मुक्ति। ऐसा निश्चय होना ही परमार्थबोध (यथार्थ ज्ञान) है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंमें एक ही आत्माका सम्बन्ध मानना चाहिये। जो इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत हो गया है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तर्यामी आत्मा प्रत्येक प्राणीके भीतर स्थित है। पृथक् पृथक् जलमें प्रतिबिम्बित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति वही एक और अनेक रूपोंमें दृष्टिगोचर होता है। घटमें आकाश भरा है, किन्तु घटके फूट जानेपर जैसे केवल घड़ेका ही नाश होता है, उसमें भरे हुए आकाशका नहीं, उसी प्रकार देहधारी जीव भी आकाशके ही समान है—शरीरके नाशसे आत्माका नाश नहीं होता। जीवोंका यह भिन्न-भिन्न प्रकारका शरीर घटके ही सदृश है, जो बार-बार फूटता या नष्ट होता रहता है। यह नष्ट होनेवाला जड शरीर अपने भीतर परिपूर्ण चिन्मय ब्रह्मको नहीं जानता, परन्तु वह सर्वसाक्षी परमात्मा सब शरीरोंको सदा ही जानता रहता है। जीवात्मा जबतक नाममात्रका अस्तित्व रखनेवाली मायासे आवृत्त है, तबतक हृदय-कमलमें बद्धकी भाँति स्थित रहता है, जब अज्ञानमय अन्धकारका नाश हो जाता है, तब ज्ञानके आलोकमें विद्वान् पुरुष जीवात्मा और परमात्माकी नित्य एकताका ही दर्शन करता है ॥ १०-१५ ॥
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६६५ शब्दब्रह्म (प्रणव) भी अक्षर है और परब्रह्म भी अक्षर है। इनमेंसे जिसके क्षीण होनेपर जो अक्षय बना रहता है, वह (परब्रह्म) ही वास्तवमे अक्षर (अविनाशी) है। विद्वान् पुरुष यदि अपने लिये शान्ति चाहे तो उस अक्षर परब्रह्मका ही ध्यान करे । दो विद्याएँ जाननेयोग्य हैं—एक तो वह, जिसे 'शब्दब्रह्म' कहते हैं और दूसरी वह, जो 'परब्रह्म' के नामसे प्रसिद्ध है। 'शब्दब्रह्म' (वेद-शास्त्रोंके ज्ञान) से पारङ्गत होनेपर मनुष्य परब्रह्मको जान लेता है। बुद्धिमान् पुरुष ग्रन्थका अभ्यास करके उससे ज्ञान-विज्ञानके तत्त्वको ग्रहण कर ले, फिर समूचे ग्रन्थको त्याग दे—ठीक उसी तरह, जैसे धान्य—अन्न चाहने- वाला मनुष्य अन्नको तो ले लेता है और पुआलको खलिहानमें ही छोड़ देता है। अनेक रंग-रूपोंवाली गौओंका भी दूध एक ही रंगका होता है। इसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष विभिन्न साम्प्रदायिक चिह्नोंको धारण करनेवाले पुरुषोंके ज्ञानको भी गौओंके दूधकी भाँति एक-सा ही देखता है। बाह्य चिह्नोंके भेदसे ज्ञानमें कोई अन्तर नहीं आता। जैसे दूधमे घी छिपा रहता है, उसी प्रकार प्रत्येक प्राणीके भीतर विज्ञान (चिन्मय ब्रह्म) निवास करता है। जिस प्रकार घीके लिये दूधका मन्थन किया जाता है, वैसे ही विज्ञानमय ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये मनको मथानी बनाकर सदा मन्थन (चिन्तन और विचार) करते रहना चाहिये। तदनन्तर ज्ञानदृष्टि प्राप्त करके अग्निके समान तेजोमय ब्रह्मका इस प्रकार अनुभव करे कि 'वह कलाशून्य, निर्मल एव शान्त परब्रह्म मैं हूँ।' यही विज्ञान माना गया है। जिसमें सम्पूर्ण भूतोंका निवास है, जो स्वयं भी सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें निवास करता है तथा सबपर अहैतुकी दया करनेके कारण प्रसिद्ध है, वह सर्वात्मा वासुदेव मैं हूँ, वह सर्वात्मा वासुदेव मैं हूँ। इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥ १६–२२ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय ब्रह्मविन्दूपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! निश्चयके अनुसार ब्रह्मकी प्राप्ति सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्माऽन्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माऽऽह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः । (३।१४।४) शाण्डिल्य ऋषिके ये वचन हैं—जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, समस्त विश्वमें सर्वत्र व्याप्त, वाक्रहित ओर संभ्रमशून्य है, वह मेरा आत्मा हृदयमें सदा विराजमान है। यही ब्रह्म है। इस शरीरको छोड़कर जानेपर मैं इसी परब्रह्मको प्राप्त हो जाऊँगा। जिसका ऐसा दृढ़ विश्वास है, जिसको इसमें कोई संदेह भी नही है (उसे इसी ब्रह्मकी प्राप्ति होती है)। उ० अं० ८४-
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय ध्या बिन्दूपनि ष द् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ध्यानयोगकी महिमा तथा स्वरूप यदि बहुयोजनविस्तीर्ण पर्वतके समान भी भारी पाप- राशि हो, तो भी वह ध्यानयोगके द्वारा नष्ट हो जाती है। (ऐसे महापाप) और किसी साधनसे कभी नष्ट नहीं होते ॥ १ ॥ बीज (कारणभूत) अक्षर (मकार) से परे बिन्दु है और बिन्दुसे परे भी नाद स्थित है, जिससे सुन्दर शब्दका उच्चारण होता है। शक्तिरूप प्रणव नादसे भी परे स्थित है तथा अकारसे लेकर शक्तिपर्यन्त प्रणवरूप अक्षरके क्षीण होने- पर जो शब्दहीन स्थिति होती है, वही 'शान्त' नामसे प्रसिद्ध परम पद है। जो अनाहत (बिना आघातके उत्पन्न, ध्यानमें सुनायी पड़नेवाला, मेघ-गर्जनके समान प्रकृतिका आदि शब्द) है, उस शब्दका भी जो परम कारण-शक्ति है, उसके भी परमकारण सच्चिदानन्दस्वरूप शान्तपदको जो योगी प्राप्त कर लेता है, उसके समस्त संदेह नष्ट हो जाते हैं ॥ २-३ ॥ बालकी नोकके पचास हजार भाग किये जायें, फिर उस भागके भी सहस्र भाग करनेपर उस भागका भी जो अर्द्ध- भाग है, उसके समान सूक्ष्मातिसूक्ष्म वह निरञ्जन (विशुद्ध) ब्रह्म है—यो जानना चाहिये। तात्पर्य यह कि वह अत्यन्त दुर्लक्ष्य परमतत्त्व है। जैसे पुष्पमें गन्ध व्याप्त रहती है, जैसे दूधमें घृत अलक्षित रहता है, जैसे तिलमे तेल अनुस्यूत रहता है, जैसे सोनेकी खानके पत्थरंामे सोना अव्यक्त रहता है, उसी प्रकार वह आत्मा समस्त प्राणियोंमें छिपा है। निश्चयात्मिका बुद्धिसे सम्पन्न, अशनारहित ब्रह्मवेत्ता (सूत्रकी) मणियोंमे सूत्रके समान आत्माको व्याप्त जानकर उसी ब्रह्मस्वरूपमें स्थित रहते हैं। जैसे तिलोंमें तेल व्याप्त है, जैसे फूलोंमें सुगन्ध व्याप्त है, वैसे ही पुरुषके शरीरके बाहर एव भीतर सब ओर आत्मतत्त्व व्याप्त होकर स्थित है ॥ ४-७ ॥ जैसे वृक्ष अपनी पूरी कलाके साथ रहता है और उसकी छाया वृक्षकी कलासे हीन रहती है, वैसे ही आत्मा अपने कलात्मक (स्व-सच्चिदानन्द) स्वरूपसे और निष्कल (छाया- स्थानीय जगद्रूप) भावसे सर्वत्र व्याप्त होकर अवस्थित है ॥८॥ (उपर्युक्त आत्मस्वरूपकी उपलब्धि—अनुभूतिके लिये साधन निर्देश करते हैं कि विधिवत् आसनपर अवस्थित होकर) पूरकके द्वारा श्वासको भीतर खींचते हुए नाभिस्यानमें अतसी-पुष्पके समान नीलवर्ण, चतुर्भुज महावीर (भगवान् विष्णु) का ध्यान करना चाहिये। कुम्भकके द्वारा— श्वासको भीतर रोके हुए हृदयस्थानमें लाल कमलकी कर्णिकापर विराजमान, लालवर्णके, चार मुखवाले लोकपितामह ब्रह्माजीका ध्यान करना चाहिये। रेचकके द्वारा श्वास छोड़ते समय ललाटमे विद्यास्वरूप, तीन नेत्रोंवाले, शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल रगके, कलारहित, पापविनाशक भगवान् शङ्करका ध्यान करना चाहिये ॥ ९-११ ॥ सुषुम्णापथमें उपर्युक्त तीनों कमलोंमेंसे नाभिस्यानका कमल आठ दलोका है। हृदयस्थानका कमल ऊपर नाल एव नीचे मुख करके अवस्थित है। ललाटमें अवस्थित कमल केलेके फूलके समान नीललोहित (बैगनी रगका) है। ये तीनों कमल सर्वदेवमय हैं। इन तीनोंसे ऊपर मूर्धदेशमें एक और कमल है। उसमें सौ दल हैं। उस खिले हुए कमलकी कर्णिका विस्तृत है।
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६६७ उस कर्णिकापर पहले सूर्य, फिर उनके ऊपर चन्द्रमा और चन्द्रके ऊपर अग्नि—इस प्रकार एकके ऊपर एकका क्रमशः चिन्तन करे। क्योंकि वह कमल सुप्त है; अतः सूर्य, चन्द्र एवं अग्निके धारणके लिये ध्यानके द्वारा उसे पहले जाग्रत्—विकसित कर लेना चाहिये। उस पद्मपर स्थित बीजों (पचास अक्षरों) का उच्चारण करके ही यह जीवात्मा बात- चीत आदि व्यवहारका निर्वाह करता रहता है ॥ १२-१४ ॥ (नाभि, हृदय एवं ललाट)—इन तीनों स्थानों तथा (अपनी उपासनाके पूरक, कुम्भक, रेचक)—रूप तीन मागोंवाले, विष्णु, ब्रह्मा एवं शिवरूपसे त्रिविध ब्रह्मस्वरूप, प्रणवरूपमें अकारादि तीन अक्षरोंवाले, उसी रूपमें अकार, उकार, मकार—इन तीन मात्राओंवाले तथा उनमें व्याप्त अर्धमात्रास्वरूप जो परमात्मा हैं, उनको जो जानता है, वही वेदके तात्पर्यका ज्ञाता है। इन तेलकी धाराके समान अविच्छिन्न, घण्टेकी अनुरणनरूप ध्वनिके समान दीर्घकालतक ध्वनित होनेवाला तथा विना वाणीके (प्राणोंद्वारा ही) उच्चरित विन्दुपर्यन्त प्रणवके बाद प्रकट होनेवाले नादको जो जानता है, वही वेदोंको ठीक जानता है ॥ १५-१६ ॥ प्रणव धनुष है, आत्मा ही बाण है एवं परब्रह्म परमात्मा उसके लक्ष्य हैं। प्रमादहीन साधकके द्वारा ही वह वेधा जाता है। अतः बाणकी भाँति उस लक्ष्यमे तन्मय हो जाना चाहिये। अपने शरीरको नीचेकी अरणि (यज्ञिय अग्निमन्थन-काष्ठ) बनावे और प्रणवको ऊपरकी अरणि बनावे। ध्यानाभ्यासरूपी मन्थन-क्रियाके द्वारा साधक काष्ठमें व्याप्त हुई अग्निकी भाँति सबके भीतर व्याप्त परमदेव परमात्माका साक्षात्कार करे ॥ १७-१८ ॥ जैसे (बच्चे) कमलकी नालसे पानी धीरे-धीरे खींचते हैं, वैसे ही योगी योगावस्थामें स्थित होकर धीरे-धीरे प्राणोंको खींचे (अर्थात् स्वाधिष्ठान आदि चक्रोंका भेदन करते हुए प्राणको क्रमशः ऊर्ध्वभूमिकामें ले जाय)। जैसे किसान रस्सी- द्वारा कुएँसे जल निकालता है, उसी प्रकार प्रणवकी अर्धमात्रा (अव्यक्त नादोच्चारण) को रस्सी बनाकर हृदय-कमलरूपी कुएँसे नाल (सुषुम्णा)-मार्गके द्वारा जलरूपा कुण्डलिनीको भ्रूमध्यमे ले जाय। नासिकाकी जड़से लेकर दोनों भौंहोंके मध्यमे जो ललाट है, वहाँतक अमृत-स्थान समझना चाहिये। यही विश्वका महान् निवास-स्थान (परमात्मपद) है। यही विश्वका महान् निवासस्थान (परमात्मपद) है। ॥ कृष्णयजुर्वेदीय ध्यानविन्दूपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ब्रह्मज्ञानसे ब्रह्मत्वकी प्राप्ति स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ (बृहदारण्यक ४।४।२५) यह महान् आत्मा जन्मसे रहित, बुढ़ापेसे रहित, मृत्युसे रहित और भयसे रहित है। ब्रह्म अभय है, निश्चय ब्रह्म अभय है। जो इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही ब्रह्म हो जाता है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय तेजोबिन्दूपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रणवस्वरूप तेजोमय विन्दुके ध्यानकी महिमा तथा उसके अधिकारी एवं अनधिकारी ॐ मायिक जगत्से परे हृदयाकाशमें अवस्थित प्रणवस्वरूप तेजोमय बिन्दु का ध्यान ही परम ध्यान है। वह तेजोमय बिन्दुका ध्यान आणव (अत्यन्त सूक्ष्म उपायसे साध्य), शाम्भव (शिवरूपताकी प्राप्ति करानेवाला) एव शाक्त (गुरुकी शक्तिसे ही साध्य) है। इसी प्रकार स्थूल, सूक्ष्म तथा इन दोनोंसे परे सर्वातीत फलरूप भी है। बुद्धिमान् मुनियोंके लिये भी उस बिन्दुके ध्यानकी साधना बड़ी कठिन है, वह कठिनतासे आराधित (सिद्ध) होता है। वह दुर्दर्श है। उसका आश्रयण कठिनतासे हो पाता है। वह कठिनाईसे ही लक्षित होता है। वह दुस्तर है; उस ध्यानको अन्ततक निभा लेना अत्यन्त कठिन है ॥ १-२ ॥ आहारको जीतकर (मिताहारी होकर), क्रोधको वशमें करके, समस्त सङ्गोंसे तटस्थ होकर, इन्द्रियोंपर विजय करके, सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित होकर, अहङ्कारको त्यागकर, समस्त आशाओंको छोड़कर एव सङ्ग्रहीन होकर, तथा दूसरोंको जो अगम्य है, उसे भी प्राप्त करनेके दृढ निश्चयसे युक्त होकर, केवल गुरुसेवाका ही प्रयोजन रखनेवाला साधक इस ध्यानका मुख्य अधिकारी है। इस तेजोमय बिन्दुके ध्यानमे साधकलोग वैराग्य, उत्साह एव गुरुभक्ति—ये तीन द्वार (प्रमुख साधन) उपलब्ध करते हैं; अतः यह हस (विशुद्धतत्त्व) त्रिधामा कहा जाता है ॥ ३-४ ॥ यह ध्यान करनेयोग्य तेजोबिन्दु परम गोपनीय एव अधिष्ठानरूप है। यह सबको प्रतीत न होनेके कारण अव्यक्त है, ब्रह्मस्वरूप है; इसका कोई अधिष्ठान नहीं। यह स्वय ही सबका आधार है। यह आकाशके समान व्यापक है, सूक्ष्मकलात्मक एव भगवान् विष्णुका प्रसिद्ध परमपद (परमधाम) भी यही है। यह तीनों लोकोंका पिता (उत्पत्तिस्थान), त्रिगुणमय, सबका आश्रय, त्रिभुवनस्वरूप, निराकार, गतिहीन, समस्त विकल्पोंसे रहित, बिना किसी आधार एवं आश्रयका—स्वप्रतिष्ठानस्वरूप है। यह समस्त उपाधियोंसे रहित, स्थिति, वाणी प्रभृति इन्द्रियों एव मनकी गतिसे परे, स्वभावकी भावना (अपने वास्तविक स्वरूपके चिन्तन)-द्वारा ही ग्राह्य तथा समष्टि और व्यष्टिवाचक पदोंसे भी अगम्य है ॥ ५-७ ॥ यह तेजोबिन्दु आनन्दस्वरूप, विषय-सुखोंसे परे, बड़ी कठिनाईसे साक्षात् होनेवाला, अजन्मा, अविनाशी, चित्तकी वृत्तियोंसे विनिर्मुक्त, शाश्वत, निष्कल तथा अस्खलित है। वही ब्रह्मस्वरूप है। वही अध्यात्मस्वरूप है। वही निष्ठा, परम मर्यादा और वही परम आश्रय है। वह शून्य न होनेपर भी शून्यके समान है और शून्यसे परे स्थित है। वह न ध्यान है, न ध्यान करनेवाला है और न ध्येय है; तथापि सदा ध्यान करनेयोग्य अथवा ध्येयस्वरूप ही है। वह सर्वरूप और सबसे परे है। शून्यस्वरूप है। उस परमतत्त्वसे परे कुछ भी नहीं है। वह परात्पर है। वह अचिन्त्य है। उसमें जागरण आदिका व्यापार नहीं है। उसे ज्ञानी महात्मा सत्यरूपसे ही जानते हैं। वह मुनियोंके योग्य (मुनियोंका आराध्य) तत्त्व है और देवता उसे परमतत्त्वरूप ही जानते हैं ॥८-११॥ लोभ, मोह, भय, अहङ्कार, काम और क्रोधके परायण तथा पापोंमें लगे हुए लोग, सर्दी-गर्मीके द्वन्द्वोंमें आसक्त, भूख-प्यासकी चिन्ता एव विविध सङ्कल्प-विकल्पोंमें संलग्न, ब्राह्मण (उच्च) वंशमें उत्पत्तिका गर्व रखनेवाले और मुक्ति- प्रतिपादक शास्त्रोंके केवल सङ्ग्रहमें आसक्त (केवल शास्त्र- ज्ञानी) उस तेजोबिन्दुको नहीं जान पाते। तथा वह भय, सुख-दुःख तथा मानापमानादिमें फँसे हुए लोगोंको भी नहीं प्राप्त होता। जो इन सारे (दूषित) भावोंसे छूटे हुए हैं, उन्हींके द्वारा यह परात्पर ब्रह्म प्राप्त होनेयोग्य है। उन्हींके द्वारा वह परात्पर ब्रह्म प्राप्त होनेयोग्य है ॥ १२-१३ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय तेजोविन्दूपनिषद् समाप्त ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऋग्वेदीय नादबिन्दूपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड ॐकारकी हंसरूपमें ॐ। प्रणवरूपी हंसका अकार दक्षिण पक्ष (पाँख) और हृदयमें है, तपोलोक कण्ठदेशमें है। भौंहों और ललाटके बीचमें उकार उत्तर (बायों) पक्ष माना गया है। मकार ही उसकी पूँछ है सत्यलोक व्यवस्थित है । उपर्युक्त कथनके अनुमोदनमें तथा अर्द्धमात्रा सिर है। रजोगुण और तमोगुण उसके दोनों श्रुतिने संगतिरूपसे 'सहस्राक्ष्यम्'* यह मन्त्र प्रदर्शित किया पैर हैं और सत्त्वगुण शरीर कहलाता है। धर्म दक्षिण नेत्र है है। इस प्रकारसे वर्णित जो ॐकाररूपी हंस है, उसपर और अधर्म वाम नेत्र कहलाता है। भूलोक उसके दोनों आरूढ—उसके चिन्तनमें निमग्न हुआ हंसयोग-विचक्षण पैरोंमें है। भुवर्लोक उसके दोनों जानुओंमें है, स्वर्लोक उसके पुरुष—प्रणवकी ध्यान-विधिमें कुशल उपासक कर्मानुष्ठान कटिदेशमें है और महर्लोक नाभिदेशमें है। जनलोक उसके करते हुए कोटि-कोटि पापोंसे छूटकर बन्धन-मुक्त हो जाता है ॥ १–५ ॥ द्वितीय खण्ड ॐकारकी बारह मात्राएँ और उनमें प्राण-वियोगका फल अकार नामकी प्रथम मात्रा आग्नेयी है, अग्निमण्डल वायु उसके देवता हैं। उसके बाद मकार नामकी उत्तर-मात्रा सदृश उसका रूप है, अग्नि उसके देवता हैं। दूसरी उकार सूर्यमण्डलके सदृश है, सूर्य ही उसके देवता हैं। और चौथी नामकी मात्रा वायव्या है, वायुमण्डलसदृश रूपवाली है। अर्द्धमात्रा वारुणी है, उसके देवता वरुण हैं । उन चारों
- पूरा मन्त्र और उसका अर्थ इस प्रकार है—'सहस्राक्ष्य विहितावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पतत स्वर्ग म् देवान् सर्वानुरस्यथदद्य सम्पश्यन् याति भुवनानि पश्य ।' अर्थात् सूर्यदेवके विचरण करनेयोग्य जो स्वर्ग—द्युलोक है, उसकी ओर उड़नेवाले श्रीविष्णुरूपी हंस (ॐकार) के दो पक्ष हैं— पूर्व और पश्चिमके आकाशस्वरूप, अकार और उकार—ये दो मात्राएँ। वह ॐकाररूप हंस सात्त्विक देवताओंको अपने सत्त्वमय हृदयमें स्थापित करके सम्पूर्ण लोकोंको प्रत्यक्ष देखता हुआ ब्रह्मलोकतक गमन करता है, उसपर आरूढ़ हुआ उपासक भी वहाँतक पहुँच जाता है।
६७० नादविन्दूपनिषद् [ अध्याय २
६७० नादविन्दूपनिषद् [ अध्याय २ मात्राओंमेंसे प्रत्येक मात्रा तीन तीन कलारूपी मुखसे सुशोभित का उत्क्रमण होनेपर वह महिमाशाली यक्ष होता है । तृतीया है । इस प्रकार द्वादशकलात्मक 'ॐकार' कहा गया है । मात्रामे विद्याधर, और चतुर्थीमे गन्धर्व होता है। यदि पञ्चमी धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा इसको जानना चाहिये । मात्रामें उसका प्राणोंसे वियोग होता है तो वह तुषित नामके उन द्वादश कलाओंमें प्रथमा मात्रा 'घोषिणी' कहलाती है, देवताओंके साथ रहता हुआ चन्द्रलोकमे सम्मानित होता है। षष्ठी द्वितीया 'विद्युन्माला', तृतीया 'पतङ्गी', चतुर्थी 'वायुवेगिनी', मात्रामें (मृत्यु होनेपर) इन्द्रका सायुज्य प्राप्त होता है । सप्तमी- पञ्चमी 'नामधेया' और षष्ठी मात्रा 'ऐन्द्री' कहलाती है । में भगवान् विष्णुक पद ( वैकुण्ठ-धाम ) को प्राप्त करता सप्तमीका नाम 'वैष्णवी' है और अष्टमी 'शाङ्करी' कहलाती है । अष्टमीमें रुद्रलोकमे जाकर पशुपति भगवान् शङ्करका है । नवमी 'महती', दशमी 'ध्रुवा', एकादशी 'मौनी' और सामीप्य लाभ करता है । नवमी मात्रामें महर्लोक, दशमी द्वादशी मात्रा 'ब्राह्मी' कहलाती है । यदि प्रथमा मात्रामें मात्रामे ध्रुवलोक, एकादशी मात्रामें तपोलोक तथा द्वादशी उपासकका प्राणान्त होता है तो वह भारतवर्षमें सार्वभौम मात्रामें प्राणका उत्क्रमण होनेपर उपासक शाश्वत ब्रह्मलोकमें चक्रवर्ती राजाके रूपमें जन्म लेता है । द्वितीया मात्रामें प्राणों- (ब्रह्माकी आयुपर्यन्त ) प्रतिष्ठित होता है ॥ १-१० ॥ तृतीय खण्ड योगयुक्त स्थितिका वर्णन इसकी अपेक्षा भी परतर—श्रेष्ठ, शुद्ध, व्यापक, निष्कल में ही आसक्त है, वह योगमार्गके द्वारा स्वस्थ होकर सब तथा कल्याणस्वरूप सदा उदित परब्रह्म-तत्त्व है; उसीसे प्रकारकी लौकिक आसक्तियोंसे मुक्त हो धीरे-धीरे शरीरमें अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदि सभी प्रकारकी ज्योतियोंका उदय आत्माभिमानको त्याग दे । तब उसका संसार-बन्धन होता है । जब मन इन्द्रियातीत और सत्त्व आदि तीनों नष्ट हो जाता है; वह निर्मल, कैवल्य-प्राप्त और गुणोंके परे परतत्त्वमें लीन होता है, तब वह उपमारहित और परमात्मस्वरूप हो जाता है । और उसी ब्रह्मभावसे अभावरूप हो जाता है। उस स्थितिमें साधकको योगयुक्त परमानन्दको प्राप्त करता है, परमानन्दका उपभोग करता कहना चाहिये। जो परमात्माका भक्त है, जिसका मन परमात्मा- है ॥ १-४ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अध्याय प्रथम खण्ड ज्ञानीके लिये प्रारब्ध नहीं रह जाता हे महामते ! निरन्तर प्रयत्न करके आत्माके स्वरूपको प्रकार यह जाग्रत्-कालका शरीर भी अध्यासमात्र है । अध्यस्त जानकर उसीके चिन्तनमे अपना समय व्यतीत करो, समस्त पदार्थकी उत्पत्ति कहाँ होती है । और जिसकी उत्पत्ति नहीं प्रारब्धकर्मोंके भोगोंको भोगते हुए तुम्हे उद्विग्न नहीं होना हुई, उसकी स्थिति कहाँ । ( जैसे रज्जुमें सर्पका अध्यास चाहिये । आत्मज्ञान हो जानेपर भी प्रारब्ध स्वयं नहीं छोड़ता। होनेपर रज्जुमें सर्प नहीं पैदा होता और न वहाँ सर्पकी परन्तु जब तत्त्वज्ञानका उदय होता है, तब ज्ञानीकी दृष्टिमे स्थिति ही होती है ।) इस प्रपञ्चका उपादान-कारण आत्मा प्रारब्धकर्मका उसी प्रकार अभाव हो जाता है, जिस प्रकार है, जिस प्रकार मिट्टीके पात्रोंका उपादान-कारण मिट्टी है । स्वप्नलोकके देहादिक असत् होनेके कारण जागनेपर नहीं वेदान्तके अनुसार यह प्रपञ्च अज्ञानके कारण आत्मामें भासता रह जाते । जन्मान्तरके लिये हुए जो कर्म हैं, वे ही प्रारब्ध है, यदि अज्ञान नष्ट हो जाय तो विश्वकी विश्वता कहाँ रहेगी। कहे गये हैं। परन्तु ज्ञानीके लिये तो जन्मान्तर भी नहीं है, जिस प्रकार भ्रमसे मनुष्य रज्जुबुद्धिका त्याग करके उसे सर्प- अत उसके लिये कभी भी प्रारब्ध नहीं रहता । जिस प्रकार बुद्धिसे ग्रहण करता है, उसी प्रकार अज्ञानी पुरुष सत्य स्वप्नकालीन देह देह नहीं होती अध्यासमात्र होती है, उसी (आत्मा)का ज्ञान न होनेके कारण प्रपञ्चको देखता है ।
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७१ जब सामने रस्सीके टुकड़ेको अच्छी तरह पहचान लेनेपर शिवस्वरूप परमात्माका आविर्भाव होता है—ठीक वैसे ही, जैसे उसमें प्रतीत होनेवाला सर्परूप नहीं रह जाता, उसी जिस प्रकार मेघके दूर हो जानेपर सूर्यनारायण प्रकाशित हो प्रकार अधिष्ठानस्वरूप आत्माका ज्ञान होनेपर जब प्रपञ्च भी उठते हैं। योगी सिद्धासनसे बैठकर वैष्णवी मुद्रा¹ धारण करके शून्यताको प्राप्त हो जाता है, तब देह भी प्रपञ्चरूप ही दहिने कानके भीतर उठते हुए नाद ( अनाहत ध्वनि ) होनेके कारण उसके साथ ही शून्यतामें परिणत हो जाता है। को सदा सुनता रहे। इस प्रकार अभ्यासमें लाया हुआ नाद उस अवस्था मे प्रारब्धकी स्थिति कैसे रह सकती है। अज्ञानी- वाह्य ध्वनियोंको आवृत कर लेता है। इस प्रकार एक पक्ष जनोंको समझानेके लिये प्रारब्धकी बात कही जाती है। अर्थात् अकारको जीतकर दूसरे पक्ष उकारको जीते और तदनन्तर कालवश ही प्रारब्धके नष्ट हो जानेपर प्रणव और क्रमशः सम्पूर्ण प्रणवपर विजय प्राप्तकर तुर्यपद अर्थात् ब्रह्मकी एकताके चिन्तनसे नादरूपमें साक्षात् ज्योतिर्मय, आत्मसाक्षात्कारको प्राप्त होता है ॥ १-११ ॥ द्वितीय खण्ड नादके अनेक प्रकार अभ्यासके प्रारम्भमें यह नाद बहुत जोर-जोरसे और तथा नगारेकी ध्वनिके समान वह नाद सुनायी देता है और नाना प्रकारसे सुनायी देता है और अभ्यासके बढ़ जानेपर अन्तमें किङ्किणी, वंशी, वीणा तथा भ्रमरकी ध्वनिके समान वह सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर रूपमें सुनायी पड़ता है। प्रारम्भमें समुद्र, मधुर नाद सुन पड़ता है। इस प्रकार सूक्ष्म-से-सूक्ष्म होते हुए बादल, भेरी तथा झरनोंसे उत्पन्न ध्वनिके समान एव मृदङ्ग, घंटे नाना प्रकारके नाद सुनायी पड़ते हैं ॥ १-३ ॥ तृतीय खण्ड नादानुसंधान जब महान् भेरी आदिकी ध्वनि सुन पड़े, तब उसमे मन उस नादके साथ ही सहसा चिदाकाशमे विलीन हो जाता सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर नादका विचार करे—घने नादको छोड़कर है। इसलिये नाद-श्रवणसे अतिरिक्त विषयोंकी ओरसे उदासीन सूक्ष्म नादमे अथवा सूक्ष्म नादको छोड़कर घने नादमें रमते होकर सयमी पुरुष निरन्तर अभ्यासके द्वारा मनको तत्काल या जाते हुए मनको अन्यत्र न ले जाय। पहले जिस किसी अपने प्रति उत्सुक बनानेवाले नादका ही श्रवण एव चिन्तन भी सूक्ष्म या घन नादमें मन लगता है, वहीं-वहीं वह स्थिर होकर करता रहे। सारी चिन्ताओंका त्याग करके, सारी चेष्टाओंको उस नादके साथ ही विलीन हो जाता है। सारे वाह्य प्रपञ्चको छोड़कर नादका ही अनुसंधान करे; क्योंकि नादमें चित्त भूलकर दूधमें मिले हुए पानीके समान नादमे एकीभूत हुआ विलीन होता है, नादमे चित्त विलीन होता है ॥ १-५ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अध्याय प्रथम खण्ड नादके द्वारा मन कैसे वशीभूत होता है जिस प्रकार पुष्परसका पान करता हुआ भ्रमर पुष्पगन्ध- चित्तरूपी आन्तरिक सर्प नादको ग्रहण करनेपर उस सुन्दर की अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार नादमें सदा आसक्त नादकी गन्धसे बँधकर तत्काल सारी चपलताओंका रहनेवाला चित्त विषयोंकी आकाङ्क्षा नहीं करता । यह परित्याग कर देता है। फिर ससारको भूलकर और १ 'अन्तर्लक्ष्य वहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता । एषा सा वैष्णवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ 'बाहरकी ओर निर्निमेष दृष्टि हो और भीतरकी ओर लक्ष्य हो—सब तन्त्रोंमें गूढ भावसे बतायी हुई वह वैष्णवी मुद्रा यही है।'
६७२ नादबिन्दूपनिषद् [ अध्याय ३
६७२ * नादबिन्दूपनिषद् * [ अध्याय ३ एकाग्र होकर इधर-उधर कहीं नहीं दौड़ता । विषयोंके यह नाद मनरूपी मृगके बाँधनेमें जालका काम करता उद्यानमे विचरनेवाले मनरूपी मतवाले हाथीको वशीभूत है । मनरूपी तरङ्गको रोकनेमे तट का काम करता करनेमे यह नादरूपी तीक्ष्ण अंकुश ही समर्थ होता है। है ॥ १-५ ॥ द्वितीय खण्ड नादमें मनका लय ' ब्रह्मस्वरूप प्रणवमें सलग्न नाद ज्योतिःस्वरूप होता है, मन भी अमन हो जाता है । सशब्द नाद अक्षर-ब्रह्ममें उँसमे मन लयको प्राप्त होता है । वही भगवान् विष्णुका क्षीण हो जाता है । उस निःशब्द नादको ही परम पद कहते परमपद है । जबतक शब्दोंका उच्चारण और श्रवण होता है, हैं। जब निरन्तर नादका अनुसन्धान करनेसे वासनाएँ तभीतक मनमे आकाशका सङ्कल्प रहता है । निःशब्द होनेपर सम्यक्रूपसे क्षीण हो जाती हैं, तब मन और प्राण निःसन्देह तो वह परम ब्रह्म परमात्मरूपमें ही अनुभूत होता है । जबतक निराकार ब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं । कोटि-कोटि नाद और नाद है, तबतक मन है । नादके सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर होनेपर कोटि-कोटि बिन्दु ब्रह्मप्रणवनादमें लीन हो जाते हैं ॥ १-५ ॥ तृतीय खण्ड मनके अमन हो जानेकी स्थितिका वर्णन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति प्रभृति सारी अवस्थाओंसे सम्यक्रूपसे त्याग कर देता है । योगीका चित्त जाग्रत्, स्वप्न, मुक्त हुआ तथा सारी चिन्ताओंको त्यागकर जो योगी सुषुप्ति आदि तीनो अवस्थाओंका कभी अनुसरण नहीं मृतवत् रहता है, वह मुक्त है—इसमें संशय नहीं है। वह करता । योगी जाग्रत् तथा स्वप्नावस्थासे मुक्त होकर अपने शङ्ख-दुन्दुभिनादको कदापि नहीं सुनता । जिसमें मन अमन स्वरूपमें अवस्थित होता है । बिना दृश्य वस्तुके ही जिसकी हो जाता है, उस अवस्थाके होनेपर मन इस देहमें दृष्टि स्थिर है, बिना प्रयत्नके ही जिसकी प्राणवायु स्थिर है, रहकर भी काष्ठवत् निश्चेष्ट प्रतीत होता है। वह न शीत बिना किसी अवलम्ब या आश्रयके ही जिसका चित्त स्थिर जानता है न उष्ण और न सुख जानता है न दुःख । न हो गया है, वह योगी ब्रह्ममय प्रणवके अन्तर्वर्ती तुरीय-तुरीय मान समझता है न अपमान । समाधिके द्वारा वह इन सबका स्वरूप नादरूपमे स्थित है । यह इतना उपनिषद् है ॥ १-५ ॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ ऋग्वेदीय नादबिन्दूपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यूतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अमृतनादोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रणवोपासना, योगके छः अङ्ग, प्राणायामकी विधि; योग-साधनका फल, पाँचों प्राणोंका रंग
बुद्धिमान् पुरुष शास्त्रोंका अध्ययन करके एवं बार-बार उनका अभ्यास करके ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके परम कारणभूत इस बिजलीकी चमकके समान क्षणप्रभायी जीवनको व्यर्थ नष्ट न करे । ॐकारके रथमें बैठकर और भगवान् विष्णुको सारथि बनाकर ब्रह्मलोकके यथार्थ पदका अन्वेषण करते हुए भगवान् रुद्रकी आराधनामें तत्पर होना चाहिये।* तबतक रथसे चले, जबतक रथसे चलने योग्य मार्गपर ही स्थिति हो । जब वह मार्ग पूरा हो जाता है, तब उस रथ-मार्गपर खड़े हुए रथको छोड़कर मनुष्य स्वतः आगे चला जाता है । तात्पर्य यह कि जबतक लक्ष्यकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक दृढ़तापूर्वक साधनमें संलग्न रहना चाहिये; लक्ष्य सिद्धिके पश्चात् अनावश्यक साधन स्वतः छूट जाते हैं। प्रणवकी जो अकार आदि मात्राएँ हैं, उनके लिङ्गभूत जो 'जागरितस्थान सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः' इत्यादि पद हैं, उनके आश्रयभूत विश्व, विराट् आदिके चिन्तनपूर्वक उनका त्याग करके स्वरहीन (केवल नादरूप) मकारके द्वारा उसके अर्थभूत मात्र ईश्वरका चिन्तन करनेसे साधक
- यहाँ प्रणव तथा उसकी मात्राओंके चिन्तनकी बात कही गयी है । प्रणवकी तीन मात्राएँ हैं—अकार, उकार तथा मकार । अकार विष्णुका, उकार ब्रह्माका तथा मकार भगवान् रुद्रका वाचक है । इन तीन मात्राओंका क्रमश चिन्तन करना चाहिये । विष्णुको सारथि बनाना 'अकार' रूप प्रथम मात्राका चिन्तन करना है । ब्रह्मलोक-पदका अन्वेषण उकारका चिन्तन है और रुद्रका आराधनाका तात्पर्य मकारका चिन्तन है । उ० अ० ८५—
क्रमशः उस सूक्ष्मपद (तुरीयतत्त्व) में प्रवेश करता है, जो अकारादि स्वरों और ककारादि व्यञ्जनोंसे व्यवहृत होनेवाले सम्पूर्ण प्रपञ्चसे सर्वथा परे है । शब्द-स्पर्शादि पाँचों विषय, उन्हें ग्रहण करनेवाली इन्द्रियाँ तथा अत्यन्त चञ्चल मन--इनको सूर्यरूप अपने आत्माकी किरणोंके रूपमें देखे । अर्थात् आत्मप्रकाशसे ही मनकी सत्ता है और उसी आत्मप्रकाशकी बाह्य सत्तासे शब्दादि विषय भी सत्तावान् हैं, ऐसा चिन्तन करे । इस प्रकार अनात्मपदार्थोंकी ओरसे मन और इन्द्रियों- को समेटकर केवल आत्माके चिन्तनको 'प्रत्याहार' कहा जाता है। प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क (विचार) तथा समाधि—ये योगके छः अङ्ग बताये गये हैं ॥ १–६ ॥ जैसे पर्वतोंमें उत्पन्न स्वर्णादि धातुओंका मल उनको अग्निमें तपानेसे भस्म हो जाता है, वैसे ही इन्द्रियोंद्वारा लाये गये दोष प्राणोंके रोकने (प्राणायाम करने) से भस्म हो जाते हैं। प्राणायामके द्वारा दोषों (इन्द्रियोंमें आये हुए विकारों) को तथा धारणाके द्वारा पापों (इन्द्रिय लोलुपताके संस्कारों) को भस्म कर दे। इस प्रकार पापों तथा उनके संस्कारोंका नाश करके आराध्यके मनोहर स्वरूपका चिन्तन करे । आराध्यके उस मनोहर स्वरूपका चिन्तन करते हुए वायुको भीतर स्थिर रखना (कुम्भक करना), रेचक करना (श्वासको छोड़ना) तथा वायुको खींचना (पूरक करना)— इस प्रकार रेचक, पूरक तथा कुम्भकके रूपमें तीन प्रकारके प्राणायाम बताये गये हैं। प्राण शक्तिका विस्तार करनेवाला साधक (ॐ भूः, ॐ भुवः, ॐ स्वः, ॐ महः, ॐ जनः,
६७४ * अमृतनादोपनिषद् * ॐ तपः, ॐ सत्यम्-इस प्रकार) व्याहृतियों तथा प्रणव- सहित सम्पूर्ण गायत्री मन्त्रका (ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् इस) शिरोभागके साथ पूरक, कुम्भक और रेचक करते समय जब तीन-तीन बार मानस-पाठ करे, तब उसे एक 'प्राणायाम' कहते हैं ॥ ७-१० ॥ प्राणवायुको आकाशमें निकालकर हृदयको वायुशून्य एव चिन्तनशून्य करके शून्यभावमें मनको लगा दे; यह रेचक प्राणायामका लक्षण है। जैसे मनुष्य मुखसे कमल नालद्वारा धीरे-धीरे जलको खींचता है, उसी प्रकार धीरे-धीरे वायुको अपने भीतर ग्रहण करना चाहिये-यह पूरकका लक्षण है। न तो श्वासको भीतर खींचे, न बाहर ही निकाले और न शरीरको हिलाये ही-इस प्रकार प्राणवायुका निरोध करे; यह कुम्भक प्राणायामका लक्षण है ॥ ११-१३ ॥ रूपोंको अंधेके समान देखे, शब्दको बहरेके समान सुने तथा शरीरको लकड़ीके समान समझे। अर्थात् रूप, शब्द तथा शरीरके सुख दुःखादिसे तनिक भी प्रभावित न हो । यह 'प्रशान्त' का लक्षण है। बुद्धिमान् पुरुष मनको सकल्पात्मक (सङ्कल्पस्वरूप) समझकर उसे आत्मामे (बुद्धिमें) विलीन कर दे तथा उस बुद्धिको भी परमात्म- चिन्तनमे स्थापित करे-लगाये। इसीको 'धारणा' कहा गया है। शास्त्रोंके अनुकूल ऊहा (युक्तिपूर्वक विचार) 'तर्क' कहा जाता है और जिसे प्राप्त करके दूसरे समस्त प्राप्तव्योंका अपमान कर देता है-सबको तुच्छ समझ लेता है, उस स्थितिको 'समाधि' कहा जाता है ॥ १४-१६ ॥ भूमिके समान एव रमणीय तथा (अशुद्धता, विषमता, कीटादियुक्तता प्रभृति) सम्पूर्ण दोषोंसे रहित भागमें मानसिक रक्षा (दिग्बन्धादि) करके और मण्डल (यदेतन्मण्डल तपति---इत्यादि मण्डल ब्राह्मण) का जप करके पद्मासन, स्वस्तिकासन अथवा भद्रासनमेंसे किमी योगासनको भली प्रकार लगाकर उत्तरकी ओर मुख करके बैठे। फिर एक अँगुलीसे नासिकाके एक छिद्रको बद करके दूसरे खुले छिद्रसे वायुको खींचकर, दोनों नासापुटोंको बदकर उस वायुको धारण करे। उस समय तेजोमय शब्द (प्रणव) का ही चिन्तन करे। वह शब्द 'ॐकार' स्वरूप एकाक्षर ब्रह्म ही है। फिर इसी 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका ही चिन्तन करता हुआ रेचक करे-वायुको धीरे-धीरे छोड़े। इस प्रकार अनेकों बार इस प्रणवस्वरूप दिव्य-मन्त्रके द्वारा (प्राणायाम करते हुए) अपने चित्तके मलको दूर करे ॥ १७-२० ॥ इस प्रकार प्राणायामद्वारा पापराशिका नाश करके पहले बताये हुए (अकार, उकार, मकार, बिन्दु तथा नादरूप) प्रणव-मन्त्रका ध्यान करे अर्थात् प्रणवकी प्रत्येक मात्राके साथ उसके लोक, गुण एव अधिदेवताका चिन्तन करते हुए प्राणायाम करे। इस प्रकारके प्रणवगर्भ प्राणायामको स्थूलाति- स्थूल मात्रा*से अधिक कभी न करे। अपनी दृष्टिको तिर्यक् (सामनेकी ओर), ऊपरकी ओर अथवा नीचेकी ओर स्थिर करके महामति (परम बुद्धिमान्) साधक स्थिरतापूर्वक स्थित होकर, निष्कम्प (अङ्गचालनहीन) रहकर तब योगका अभ्यास करे ॥ २१-२२ ॥ यह योग तालवृक्षके समान कुछ समयमे फल देनेवाला है और इसका धारण नियत योजनापूर्वक (अर्थात् जितना प्रथम प्रारम्भ करे, उसे उतना ही रक्खे या बढाता जाय; पर न तो घटाये और न मध्यमे उसका विराम करे-इस प्रकार) करनेयोग्य है। इसमे द्वादश मात्राओकी (प्रणवकी अ, उ, म तथा नादरूप चारों मात्राओंकी तीनों प्राणायामोंमे) आवृत्ति भी कालसे निश्चित कही गयी है। अर्थात् एक मात्राके लिये जितना समय दिया जाय, दूसरीके लिये भी उतना ही समय देना चाहिये। कोई मात्रा शीघ्र एवं कोई देरतक मनमे न जपी जाय ॥ २३ ॥ यह प्रणव नामक घोष बाह्य प्रयत्नसे उच्चारित होनेवाला नहीं है। यह व्यञ्जन नहीं है। स्वर भी नहीं है। कण्ठ, तालु, ओष्ठ और नासिकासे उच्चारित होनेवाला (सानुनासिक) भी नहीं है। यह रेफजातीय (अर्थात् मूर्द्धासे उच्चारित होनेवाला भी) नहीं है। दोनों ओष्ठोंके भीतर स्थित दन्तनामक स्थानसे भी इसका उच्चारण नहीं हो सकता। यह वह अक्षर है, जो कभी क्षरित (च्युत) नहीं होता अर्थात् यह नादके अव्यक्त- रूपसे नित्य प्रकृतिमे विद्यमान रहता है। कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रणवका प्राणायामके रूपमें तो उपर्युक्त प्रकारसे समयादि- सयमसे अभ्यास करना चाहिये और निरन्तर नादके रूपमें मनको उसमें लगाये रहना चाहिये ॥ २४ ॥
- एक समय इस प्रकारके प्रणवगर्भ प्राणायामकी अस्सी आवृत्तियोंको 'स्थूल मात्रा' कहते हैं। एक बार वायु रोककर अस्सी बार प्रणवके जप करनेको 'अतिस्थूलमात्रा' प्राणायाम कहते हैं और ऐसे प्राणायामकी अस्सी बार आवृत्ति 'स्थूलातिस्थूलमात्रा' प्राणायाम है। इससे अधिक प्राण रोकना या अधिक आवृत्ति करना हानिकर है। प्राणायाम प्रात, मध्याह्न, साय एव अर्धरात्रिमैं---इस प्रकार चार बार नित्य करना चाहिये।
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७५ योगी जिससे मार्ग देखता है, अर्थात् मनके द्वारा जिस- जिस स्थानको उसमें प्रवेश करके गमन करनेयोग्य मानता है, प्राण उसी मार्ग (द्वार) से मनके साथ गमन करता है। अतएव प्राण श्रेष्ठ मार्गसे जाय, इसके लिये नित्य अभ्यास करना चाहिये। हृदयद्वार ही वायुके प्रवेशका द्वार है। इसी हृदय- द्वारसे प्राण सुषुम्णामार्गमें प्रवेश करता है। इससे ऊपर ऊर्ध्व- गमनका मार्ग है। सबसे ऊपर इस सुषुम्णामार्गमें मोक्षका द्वार (जिस मार्गसे प्राणोत्सर्ग होनेपर योगी मोक्ष प्राप्त करता है) ब्रह्मरन्ध्र है। इसीको योगी सूर्यमण्डल जानते है। (इसी सूर्यमण्डल या ब्रह्मरन्ध्रको वेधकर प्राण छोड़नेसे मुक्ति होती है) ॥ २५-२६ ॥ भय, क्रोध, आलस्य, अत्यन्त निद्रा, अधिक जागना, बहुत भोजन करना और सर्वथा निराहार रहना—इनको योगी सर्वदा छोड़ दे। इस विधिसे भली प्रकार जो क्रमशः (उत्तरोत्तर बढाता हुआ) नित्य अभ्यास करता है, उसे तीन महीनोंमें स्वयं ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है— इसमें सन्देह नहीं। चार महीनोंमें वह देवताओंको देखने लगता है, पाँच महीनोंमें देवताओंके समान शक्तिशाली हो जाता है और नि सन्देह छः महीनोमे यदि उसकी इच्छा हो तो वह कैवल्य (जीवन्मुक्तावस्था) को प्राप्त कर लेता है।। २७-२९।। पृथिवीतत्त्वकी धारणाके समय प्रणवकी पाँच मात्राओंका, जल- तत्त्वकी धारणाके समय चार मात्राओंका, अग्नितत्त्वकी धारणाके समय तीन मात्राओंका, वायुतत्त्वकी धारणाके समय दो मात्राओं- का, आकाशतत्त्वकी धारणाके समय एक मात्रा का और स्वयं प्रणव- के रूपमें उसके अर्धमात्रास्वरूपका चिन्तन करे। अपने शरीरमें ही मनके द्वारा (पैरसे मस्तकटक क्रमश. पृथिवी आदिकी) धारणा करके पञ्चभूतोंकी सिद्धि करके उनका चिन्तन करे। इस प्रकार प्रणव-धारणाद्वारा पञ्चभूतोंपर अधिकार प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥ तीस अगुल लबा प्राण (श्वास) जिसमें प्रतिष्ठित है, वही इस प्राणवायुका अधिष्ठान (आश्रय) वास्तविक प्राण है। यही 'प्राण' नामसे विख्यात है। जो बाह्य प्राण है, वह तो इन्द्रियगोचर है, इस बाह्य प्राणमे एक लाख तेरह हजार छः सौ अस्सी निःश्वास (श्वास प्रश्वास) एक दिन-रात्रिमें आते हैं ॥ ३२-३३ ॥ आदि प्राण हृदयस्थानमे, अपान गुदास्थानमें, समान नाभिदेशमें तथा उदानं कण्ठमें निवास करता है। व्यान सम्पूर्ण अङ्गोंमें सर्वदा व्यापक होकर रहता है। अब क्रमशः प्राणादि पाँचों वायुओका रग वर्णन किया जाता है। प्राणवायु लाल रगकी मणिके समान कहा जाता है। अपान-वायु गुदाके मध्यमे इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीड़ेके समान लाल है। नाभिके मध्यभागमे समानवायु गायके दूधके समान अथवा स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल है। उदानवायु धूसर (मटमैले) और व्यान-वायु अग्नि-शिखाके रगका अर्थात् प्रकाशमय है ॥ ३४-३७ ॥ जिसका प्राण इस मण्डल (पञ्चतत्त्वात्मक शरीर-स्थान, वायु-स्थान एव हृदयादि द्वारों) को वेधकर मस्तकमें चला जाता है, वह जहाँ-कहीं भी मरे, फिर जन्म नहीं लेता। वह फिर जन्म नहीं लेता ॥ ३८ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अमृतनादोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भीतर-बाहर नारायण ही व्याप्त हैं यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥ ( नारायणोप० ) जो कुछ जगत् देखने या सुननेमें आता है, उस सबको बाहर और भीतरसे व्याप्त करके नारायण स्थित हैं।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऋग्वेदीय मुद्गलोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड पुरुषसूक्तका संक्षिप्त विषय-निरूपण 'पुरुषसूक्त'के द्वारा प्रतिपादित अर्थ निर्णयकी व्याख्या इन तीन मन्त्रोंके समुदायद्वारा ही चतुर्व्यूहात्मक करता हूँ—इसे भगवान् वासुदेवने इन्द्रसे कहा और आगे भगवत्स्वरूपका वर्णन भी है। 'त्रिपाद्' प्रभृति मन्त्रके द्वारा विवेचन किया। पुरुषसंहितामे पुरुषसूक्तका अर्थ संक्षिप्त रीति- न्तुर्व्यूहके अनिरुद्ध-स्वरूपका वैभव वर्णित है। 'तस्माद्विराळ्०' से इस प्रकार बताया जाता है— इस मन्त्रद्वारा पादविभूतिरूप नारायणसे श्रीहरिकी स्वरूपभूता पुरुषसूक्तके 'सहस्रशीर्षा०' इस मन्त्रमे 'सहस्र' शब्द प्रकृति (माया) तथा पुरुष (जीव) की उत्पत्ति प्रदर्शित अनन्तका वाचक है। इसी प्रकार 'दशाङ्गुलम्' यह पद भी की गयी है। 'यत्पुरुषेण' इत्यादि मन्त्रद्वारा सृष्टिरूप यज्ञ अनन्त योजनोंका सूचक है। इस पुरुषसूक्तका उक्त 'सहस्र- कहा गया है और 'सप्तास्यासन् परिधय०' मन्त्रमें उस सृष्टि- शीर्षा०' मन्त्र भगवान् विष्णुके देशगत विभुत्वका वर्णन यज्ञके लिये समिधाका वर्णन हुआ है। यही सृष्टियज्ञ 'तं करता है, अर्थात् यह बतलाता है कि भगवान् सम्पूर्ण देशोंमें यज्ञमिति' मन्त्रके द्वारा बताया गया है और इस व्याप्त हैं। दूसरा मन्त्र इन्हीं भगवान् विष्णुकी कालतः व्याप्ति मन्त्रके द्वारा मोक्षका वर्णन भी हुआ है। 'तस्मादिति' बतलाता है, अर्थात् यह सूचित करता है कि भगवान् विष्णु इत्यादि सात मन्त्रोंमें जगत्की सृष्टि कही गयी है। 'वेदाहम्' सर्वकालव्यापी हैं—सब समय रहते हैं। तीसरा मन्त्र भगवान् इत्यादि दो मन्त्रोंमें श्रीहरिके वैभवका वर्णन किया गया है। विष्णुके मोक्षप्रदत्वको अर्थात् भगवान् श्रीहरि मोक्षदाता हैं— और 'यज्ञेन०' इस मन्त्रके द्वारा सृष्टि एव मोक्षके वर्णनका यह बतलाता है। 'एतावानस्य०' इस तीसरे मन्त्रसे श्रीहरिके उपसंहार किया गया है। जो इस प्रकार इस पुरुषसूक्तको जानता वैभवका वर्णन किया गया है ॥ १–३ ॥ है, वह निश्चय ही मुक्त हो जाता है ॥ ४-९ ॥ द्वितीय खण्ड महापुरुषका रूप-धारण इस प्रकार प्रथम खण्डके द्वारा मुद्गलोपनिषद्में पुरुष- लिये उस परम रहस्यस्वरूप ज्ञानका पुरुषसूक्तमय दो खण्डों- सूक्तका जो वैभव प्रतिपादित हुआ है, उसी भगवदीय ज्ञान- के द्वारा उपदेश किया है ॥ १ ॥ का भगवान् वासुदेवने इन्द्रको उपदेश देकर, फिर सूक्ष्मतत्त्व इस पुरुषसूक्तके दो खण्ड कहे जाते हैं। पुरुषसूक्तमें सुननेके लिये नम्र होकर शरणमें आये हुए उन्हीं इन्द्रके जिस पुरुषका वर्णन है, वह नाम-रूप तथा ज्ञानका
खण्ड ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७७
अविषय होनेके कारण (अपने ब्रह्मस्वरूपसे) सांसारिक प्राणियोंके लिये दुर्ज्ञेय है। अतः संसारी जीवोके लिये अपने इस दुर्ज्ञेयविषयत्व (स्वरूप) को छोड़कर श्वेतादिसे युक्त देवादि (सत्त्वगुणविशिष्ट जीवों) के उद्धारकी इच्छासे उन्होंने सहस्र (अनन्त) कलाओंवाले अवयवोंसे युक्त ऐसे कल्याण- स्वरूप वेषको धारण किया, जो दर्शनमात्रसे मोक्ष देनेवाला है। उसी वेष (रूप) से भूमि आदि लोकोंमें व्याप्त होकर वे अनन्त योजनोंतक स्थित हुए। सृष्टिके पूर्व पुरुषस्वरूप नारायण ही भूत, वर्तमान एव भविष्य—तीनों कालोंके रूपमें अवस्थित थे। वे ही इन सब (जीवो) को मोक्ष देनेवाले हैं। वे सम्पूर्ण महत्त्वशालियोंसे श्रेष्ठ हैं। उनसे अधिक श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है ॥ २-३ ॥
उक्त महापुरुष (परमात्मा) ने अपनेको चार अंशों (चतुर्व्यूहों) मे प्रकट किया। उनमेंसे तीन अंगों (त्रिपादविभूति अथवा वासुदेव, प्रद्युम्न और सङ्कर्षणरूप) से वे परमव्योम (अपने परमधाम वैकुण्ठ) में निवास करते हैं तथा इनसे भिन्न अवशिष्ट चतुर्थ अंश—चतुर्थ व्यूहरूप अनिरुद्ध नामक प्रसिद्ध नारायणके द्वारा सम्पूर्ण विश्वकी रचना (अभिव्यक्ति) हुई॥४॥
उस अनिरुद्धरूप चतुर्थपादात्मक नारायणने जगत्की सृष्टिके लिये प्रकृति (ब्रह्मा) को उत्पन्न किया। वे ब्रह्माजी शरीर प्राप्त करके भी सृष्टिकर्मको न जान सके। तब उन अनिरुद्धस्वरूप नारायणने ब्रह्माजीको सृष्टिका उपदेश किया। भगवान् नारायणने कहा—'ब्रह्माजी ! तुम अपनी इन्द्रियोंका यज्ञकर्ताओंके रूपमे ध्यान करो, कमलकोशसे उत्पन्न सुदृढ ग्रन्थिरूप (बलवान्) अपने शरीरको हवि समझो, मुझे अग्नि मानो, वसन्तकालमें घृतकी धारणा करो, ग्रीष्म ऋतुमें समिधाका भाव करो, शरद् ऋतुको रसरूप समझो। इस प्रकार अग्निमें हवन करनेपर तुम्हारा शरीर इतना सुदृढ हो जायगा कि उसके स्पर्शसे वज्र भी कुण्ठित हो जायगा। तब अपने कार्यरूप (कारणरूपमें विलीन होनेकी अवस्थासे कार्यरूपमें) सब प्राणी—पशु प्रभृति जीव प्रादुर्भूत होंगे। फिर सम्पूर्ण स्थावर- जङ्गम जगत् हो जायगा। इस प्रकार जीव एव आत्माके योगद्वारा मोक्षका प्रकार भी वर्णन किया गया, यह समझना -चाहिये। जो इस सृष्टि-यज्ञ तथा मोक्षप्रकारको भी जानता है, वह पूर्णायुको प्राप्त होता है ॥ ५-७ ॥
तृतीय खण्ड उपासकोंद्वारा अनेक रूपमें देखे गये महापुरुषमें आत्मत्वकी भावनासे उनके स्वरूपकी प्राप्ति
एक ही देव बहुत प्रकारसे प्रविष्ट होकर स्वय अजन्मा रहते हुए भी बहुत प्रकारसे प्रकट होता है। (तात्पर्य यह कि वही एक देव नानात्वमें व्याप्त है। वह स्वयं अजन्मा है, किंतु नानात्वकी सृष्टि भी उसीके द्वारा होती है। नानात्वके रूपमें भी वही है) ॥ १ ॥
अध्वर्युगण उसीकी उपासना इस अग्निके रूपमें करते हैं। यजुर्वेदीय उसीको 'यह यजुः है' इस बुद्धिसे सर्वयज्ञिय कर्मोमे योजित करते हैं। सामगान करनेवाले उसे 'साम' समझते हैं। इसी नारायणरूपमें निश्चय यह सब (दृश्य-जगत्) प्रतिष्ठित है। (तात्पर्य यह कि वही परमतत्त्व यज्ञमें अग्नि, मन्त्र तथा साम है। इससे भी आगे वह समस्त जगत्का आधार है।) सर्प उसे विष मानकर अपनाते हैं। सर्पवेत्ता (योगी) इसे सर्प—प्राणरूपसे ग्रहण करते हैं। देवता इसे अमृतरूपमे अपनाते हैं और मनुष्य इसे धन मानकर जीवन-निर्वाह करते हैं। असुर माया समझते हैं, पितर स्वधा (पितृभोजन) मानते हैं, देवजनवेत्ता (देवोपासक) देवता मानते हैं, गन्धर्व रूप समझते हैं और अप्सराएँ गन्धर्व समझती हैं। इसकी जो जिस भावसे उपासना करता है, यह परमतत्त्व उसके लिये उसी रूपका हो जाता है। इसलिये ब्रह्मज्ञानीको 'पुरुषरूप परब्रह्म मैं ही हूँ' यह भावना करनी चाहिये। ऐसी भावनासे वह उसी स्वरूपको प्राप्त हो जाता है और जो इस रहस्यको इस प्रकार जानता है, वह भी तद्रूप हो जाता है ॥ २-३ ॥
चतुर्थ खण्ड ब्रह्मका स्वरूप तथा उपनिषद्के अध्ययनका माहात्म्य, सूक्तके अनधिकारी तथा उसके उपदेशकी विधि
वह ब्रह्म तीनों तापोंसे रहित, छः कोशोंसे शून्य, षड्- ऊर्मियोंसे वर्जित, पञ्चकोशोंसे अतीत, षड्भावविकारोंसे रहित—इस प्रकार सबसे विलक्षण है। आध्यात्मिक, आधि- भौतिक और आधिदैविक—ये 'तीन ताप' हैं जो कर्ता- कर्म-कार्य, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय और भोक्ता भोग भोग्य—इस प्रकार एक-एक त्रिविध हैं। चर्म, मास, रक्त, अस्थि, नसें और मज्जा—ये 'छः कोश (धातु)' हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—ये 'छः शत्रुवर्ग' हैं। 'पञ्च कोश' हैं—अन्नमय,
६७८ * मुद्गलोपनिषद् * [ खण्ड ४ प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। प्रिय होना, उत्पन्न होना, बढ़ना, बदलना, घटना और नाश होना—ये 'छः भावविकार' हैं। भूख, प्यास, शोक, मोह, वृद्धावस्था और मृत्यु—ये छः ऊर्मियों हैं। कुल, गोत्र, जाति, वर्ण, आश्रम और रूप—ये 'छः भ्रम होते हैं। इन सबके योगसे परम पुरुष ही जीव होता है, दूसरा नहीं ॥ १-९ ॥ जो इस उपनिषद्का नित्य अध्ययन करता है वह अग्नि- पूत होता है। वह वायूपूत होता है। वह आदित्यपूत होता है। वह रोगहीन हो जाता है। श्रीसम्पन्न हो जाता है। पुत्र-पौत्रादिनी समृद्धिसे युक्त हो जाता है। विद्वान् हो जाता है। महापापोंसे पवित्र हो जाता है। × × × काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्यादिसे बाधित नहीं होता। सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसी जन्ममें वह पुरुष (परमात्मरूप) हो जाता है ॥ १० ॥ इसलिये इस पुरुषसूक्तका अर्थ अत्यन्त रहस्ययुक्त है। यह राजगुह्य देवगुह्य एव गोपनीयोंसे भी अधिक गोपनीय है। जो दीक्षित न हो, उसे इसका उपदेश न करे; जो विद्वान् होनेपर भी जिज्ञासुभावसे प्रश्न न करता हो, उसे भी इसका उपदेश न करे। जो यज्ञ न करता हो, उसे भी उपदेश न करे, अवैष्णवको न करे, अयोगीको न करे, बहुभाषीको न करे, अप्रियभाषीको न करे, जो वर्षभरमें एक बार वेदोंका स्वाध्याय न कर ले, उसे भी न करे, असंतोषीको न करे और जिसने वेदोंका अध्ययन न किया हो, उसे भी इसका उपदेश न करे। इसको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् गुरु भी पवित्र देशमें, पुण्य नक्षत्रमे, प्राणायाम करके, परमपुरुषका ध्यान करता हुआ, विनीतभावसे शरणमे आये हुए शिष्यको ही उसके दाहिने कानमे इस पुरुषसूक्तके अर्थका उपदेश करे। बहुत न बोले। नहीं तो वह उपदेश यातयामत्वरूप दोषसे दूषित हो जाता है (उसका सार चल जाता है, अतः वह उपदेश सफल नहीं हो पाता)। बार-बार कानमे उपदेश दे। ऐसा करनेवाला अध्येता (शिष्य) और अध्यापक (गुरु) दोनो इसी जन्ममें पुरुष—ब्रह्मरूप हो जाते हैं ॥ ११ ॥
॥ ऋग्वेदीय मुद्गलोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
नारायणपरो ज्योतिरात्मा नारायणः परः। नारायणपरं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः। नारायणपरो ध्याता ध्यानं नारायणः परः॥ (नारायणोप०) नारायण परमज्योति हैं, नारायण परमात्मा हैं, नारायण परब्रह्म हैं, नारायण परमतत्त्व हैं, नारायण परम ध्याता हैं और नारायण ही परम ध्यान हैं।
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७९ ( मुद्गलोपनिषद्में वर्णित पुरुषसूक्त ) अथ पुरुषसूक्तप्रारम्भः
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुष सहस्राक्ष सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ १ ॥ ॐ
उन परमपुरुषके सहस्रों (अनन्त) मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण हैं। वे इस सम्पूर्ण विश्वकी समस्त भूमि (पूरे स्थान) को सब ओरसे व्याप्त करके इससे दस अङ्गुल (अनन्त योजन) ऊपर स्थित है। अर्थात् वे ब्रह्माण्डमे व्यापक होते हुए उससे परे भी हैं। [यह मन्त्र भगवान् विष्णुके देशगत विभुत्वका प्रतिपादक है।] ॥ १ ॥
ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ २ ॥
- यह जो इस समय वर्तमान (जगत्) है, जो बीत गया और जो आगे होनेवाला है, यह सब वे परमपुरुष ही है। इसके अतिरिक्त वे अमृतत्व (मोक्षपद) के तथा जो अन्नसे (भोजनद्वारा) जीवित रहते हैं, उन सबके भी ईश्वर (अधीश्वर—शासक) हैं। [यह मन्त्र भगवान्के सर्वकालव्यापी रूपका वर्णन करता है।] ॥ २ ॥
ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायाञ्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ ३ ॥
यह भूत, भविष्य, वर्तमानसे सम्बद्ध समस्त जगत् इन परम पुरुषका वैभव है। वे अपने इस विभूति-विस्तारसे महान् हैं। उन परमेश्वरकी एकपाद विभूति (चतुर्थांश) में ही यह पञ्चभूतात्मक विश्व है। उनकी शेष त्रिपादविभूतिमें शाश्वत दिव्यलोक (वैकुण्ठ, गोलोक, साकेत, शिवलोक आदि) हैं। [यह मन्त्र भगवान्के वैभवका वर्णन करता है और नित्य लोकोंके वर्णनद्वारा उनके मोक्षपदत्वको भी बतलाता है।] ॥३॥
ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुष पादोऽस्येहाभवत्पुन । ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि ॥ ४ ॥
वे परमपुरुष स्वरूपतः इस मायिक जगत्से परे त्रिपादू-विभूतिमे प्रकाशमान हैं। (वहाँ मायाका प्रवेश न होनेसे उनका स्वरूप नित्य प्रकाशमान है।) इस विश्वके रूपमें उनका एक पाद ही प्रकट हुआ है। अर्थात् एक पादसे वे ही विश्वरूप भी हैं। इसलिये वे ही सम्पूर्ण जड एवं चेतनमय उभयात्मक जगत्को परिव्याप्त किये हुए हैं। [इस मन्त्रमें भगवान्के चतुर्व्यूहरूपमेंसे चतुर्थ अनिरुद्धरूपका वर्णन हुआ है। यही रूप एकपाद ब्रह्माण्डवैभवका अधिष्ठान है।] ॥ ४ ॥
ॐ तस्माद् विराळजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः ॥ ५ ॥
उन्हीं आदिपुरुषसे विराट् (ब्रह्माण्ड) उत्पन्न हुआ। वे परमपुरुष ही विराट्के अधिपुरुप—अधिदेवता (हिरण्यगर्भ) हुए। वह (हिरण्यगर्भ) उत्पन्न होकर अत्यन्त प्रकाशित हुआ। पीछे उसीने भूमि (लोकादि) तथा शरीर (देव, मानव, तिर्यक् आदि) उत्पन्न किये। [इस मन्त्रमें श्रीनारायणसे माया एव जीवोंकी उत्पत्तिका वर्णन है।] ॥ ५ ॥
ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्म शरद्धविः ॥ ६ ॥
देवताओंने उस पुरुषके शरीरमें ही हविष्यकी भावना करके यज्ञ सम्पन्न किया। इस यज्ञमें वसन्त ऋतु घृत, ग्रीष्म
पाद-टिप्पणी (Footnote):
- उपनिषद्के अनुसार पुरुषसूक्तके प्रारम्भिक चार मन्त्रोंमें वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एव अनिरुद्ध—इन चतुर्व्यूहात्मक भगवत्-स्वरूपोंका वर्णन भी होता है। प्रथम मन्त्रमें भगवान्के वासुदेव-स्वरूपका वर्णन है। मन्त्रके अनुसार वे अनन्त हैं, सबको व्याप्त करके भी सबने परे हैं। उन्हींका दिव्य प्रकाश समस्त अन्त करणोंमें है और फिर भी वे अन्त करणोंके धर्मोंसे निर्लिप्त, सबसे परे हैं। यही उनका चेतनात्मक वासुदेवरूप है।
दूसरे मन्त्रमें उनके संकर्षण-स्वरूपका वर्णन है। संकर्षणस्वरूप दिव्य प्राणात्मक है। समस्त जगत् त्रिकालमें इसी रूपसे व्यक्त होता है और भगवान्का यही रूप उसका शासक एव स्वामी है। यही भगवान्का ईश्वरस्वरूप है।
तीसरे मन्त्रमें भगवान्के प्रद्युम्न-स्वरूपका वैभव है। भगवान्का यह स्वरूप सौन्दर्य-घन, दिव्य कामात्मक एव ध्यानगम्य है। त्रिपाद्विभूतिमें नित्यलोकोंमें भगवान् इसी स्वरूपसे विराजमान हैं। श्रुतिके इस तात्पर्यको उपनिषद्ने स्पष्ट किया है।
चतुर्थ मन्त्रमें भगवान्का अनिरुद्ध—दुर्निवार स्वरूप है। भगवान्का यह स्वरूप योगमायासमन्वित है। वही जगद्रूप एव जगत्का कारण है। यही रूप भगवान्की चतुर्थ पादविभूतिका है।
६८० : मुद्गलोपनिषद् : ऋतु इन्धन और शरद् ऋतु हविष्य ( चरु-पुरोडाशादि विशेष हविष्य ) हुए । अर्थात् देवताओने इनमें यह भावना की । [ इस मन्त्रमें सृष्टिरूप यज्ञका वर्णन है और आगे आठ मन्त्रोंतक वही है । ] ॥ ६ ॥ ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ ७ ॥ सबसे प्रथम उत्पन्न उस पुरुषको ही यज्ञमे देवताओं, साध्यों और ऋषियोंने ( पशु मानकर ) कुशके द्वारा प्रोक्षण करके ( मानसिक ) यज्ञ सम्पूर्ण किया । [ इस मन्त्रमें सृष्टि- यज्ञके साथ मोक्षका वर्णन भी किया गया है । ] ॥ ७ ॥ ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशून् ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये ॥ ८ ॥ उस ऐसे यज्ञसे जिसमें सब कुछ हवन कर दिया गया था, प्रशस्त घृतादि ( दूध, दधि प्रभृति ) उत्पन्न हुए । इस उस यज्ञरूप पुरुषने ही वायुमे रहनेवाले, ग्राममें रहनेवाले, वनमें रहनेवाले तथा दूसरे पशुओंको उत्पन्न किया । ( तात्पर्य यह कि उस यज्ञसे नभ, भूमि एव जलमे रहनेवाले समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई और उन प्राणियोंसे देवताओंके योग्य हवनीय प्राप्त हुआ । ) ॥ ८ ॥ ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ ९ ॥ जिसमें सब कुछ हवन क्रिया गया था, उस यज्ञपुरुषसे ऋग्वेद और सामवेद प्रकट हुए । उसीसे गायत्री आदि छन्द प्रकट हुए । उसीसे यजुर्वेदकी भी उत्पत्ति हुई ॥ ९ ॥
- उपनिषदके अनुसार श्रुतिने मोक्षका प्रतिपादन भी किया है । 'परोक्षवादो वेदोऽयम्'–श्रुतियोंमें अध्यात्मवाद परोक्ष- रूपसे निरूपित है । अत मोक्षप्रतिपादनके लिये इस श्रुतिका अर्थ इस प्रकार होगा— उस आत्म-शोधनरूप यज्ञमें देवताओं-दिव्यवृत्तियोंने पुरुष- शरीराभिमानीको, जो शरीरमें अहङ्कार करके पशु हो गया था, कुशोंके—साधनोंके द्वारा प्रोक्षित—विशुद्ध किया । इस प्रकार प्रोक्षित होनेपर वह अग्रजन्मा ब्राह्मण—ब्रह्मज्ञानसम्पन्न हुआ । इसी प्रकार इन्द्रादि देवताओंने, साध्य देवताओंने और ऋषियोंने भी यजन किया । सबने इसी रीतिसे शरीराभिमानीका आत्मशोधन करके मोक्ष प्राप्त किया । ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥ १० ॥ उस यज्ञपुरुषमें घोड़े उत्पन्न हुए । उनके अतिरिक्त नीचे-ऊपर दोनो ओर दाँतोंवाले ( गर्दभादि ) भी उत्पन्न हुए । उसीसे गौएँ उत्पन्न हुईं और उसीसे बकरियों और मेढ़ें भी उत्पन्न हुईं ॥ १० ॥ ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ॥ ११ ॥ देवताओंने जिस यज्ञपुरुषका विधान ( सङ्कल्प ) किया, उसको कितने प्रकारसे ( किन अवयवोंके रूपमें ) कल्पित किया, इसका मुख क्या था, बाहुएँ क्या थीं, जघाएँ क्या थीं और पैर कौन थे—यह बताया जाता है ॥ ११ ॥ ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥ १२ ॥ ब्राह्मण इसका मुख था । ( मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए । ) क्षत्रिय दोनों भुजाएँ बना । ( दोनो भुजाओंसे क्षत्रिय उत्पन्न हुए । ) इस पुरुषकी जो दोनों जङ्घाएँ थीं, वही वैश्य हुईं अर्थात् उनमे वैश्य उत्पन्न हुए, और पैरोंसे शूद्र-वर्ण प्रकट हुआ ॥ १२ ॥ ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत ॥ १३ ॥ उस यज्ञपुरुषके मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए । नेत्रोसे सूर्य प्रकट हुए । मुखसे इन्द्र और अग्नि तथा प्राणसे वायुकी उत्पत्ति हुई ॥ १३ ॥ ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥ १४ ॥ यज्ञपुरुषकी नाभिसे अन्तरिक्षलोक उत्पन्न हुआ । मस्तक- से स्वर्ग प्रकट हुआ । पैरोंसे पृथिवी, कानोंसे दिशाएँ हुईं । इस प्रकार समस्त लोक उस पुरुषमें ही कल्पित हुए ॥ १४ ॥ ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥ १५ ॥ देवताओंने जब यज्ञ करते समय ( संकल्पसे ) पुरुषरूप पशुका बन्धन किया, तब सात समुद्र इसकी परिधि ( मेखलाएँ ) थे । इक्कीस प्रकारके छन्दोंकी ( गायत्री, अतिजगती और कृतिमैसे प्रत्येकके सात-सात प्रकारसे ) समिधा बनी ॥ १५ ॥ [ इस मन्त्रमे सृष्टि-यज्ञकी समिधाका वर्णन है । ]
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८१ ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसस्तु पारे। सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते* ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिनकी स्तुति की थी, इन्द्रने चारों दिशाओंमें जिसे (व्याप्त) जाना था, उस परम पुरुषको जो इस प्रकार (सर्वस्वरूप) जानता है, वह यहीं अमृतपद (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग निज-निवास (स्वस्वरूप या भगवद्धाम)-की प्राप्तिका नहीं है ॥ १७ ॥ ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा- स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमान सचन्त यत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवा ‡ ॥ १८ ॥ देवताओने (पूर्वोक्त रूपसे) यज्ञके द्वारा यज्ञस्वरूप परम- पुरुषका यजन (आराधन) किया। इस यज्ञसे सर्वप्रथम सब धर्म उत्पन्न हुए। उन धर्मोंके आचरणसे वे देवता महान् महिमावाले होकर उस स्वर्गलोकका सेवन करते हैं, जहाँ प्राचीन साध्य देवता निवास करते हैं ॥ १८ ॥ [इस मन्त्रमें सृष्टि-यज्ञ एवं मोक्षके वर्णनका उपसंहार है।] तमस् (अविद्यारूप अन्धकार) से परे आदित्यके समान प्रकाशस्वरूप उस महान् पुरुषको मैं जानता हूँ। सबकी बुद्धिमें रमण करनेवाला वह परमेश्वर सृष्टिके आरम्भमें समस्त रूपोंकी रचना करके उनके नाम रखता है, और उन्हीं नामोंसे व्यवहार करता हुआ सर्वत्र विराजमान होता है ॥ १६ ॥ [इस मन्त्रमें और इसके आगेके मन्त्रमें भी श्रीहरिके वैभवका वर्णन है।] ॐ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान् प्रदिशश्चतस्रः। तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय† ॥ १७ ॥ ॥ पुरुषसूक्त सम्पूर्ण ॥ परमपद यत्र न सूर्यस्तपति यत्र न वायुर्वाति यत्र न चन्द्रमा भाति यत्र न नक्षत्राणि भान्ति यत्र नाग्निर्दहति यत्र न मृत्युः प्रविशति यत्र न दुःखानि प्रविशन्ति सदानन्दं परमानन्दं शान्तं शाश्वतं सदाशिवं ब्रह्मादिवन्दितं योगिध्येयं परं पदं यत्र गत्वा न निवर्तन्ते योगिनः। (बृहज्जाबाल०) जहाँ सूर्य नहीं तपता, जहाँ वायु नहीं बहता, जहाँ चन्द्रमा नहीं प्रकाशित होता, जहाँ तारे नहीं चमकते, जहाँ अग्नि नहीं जलता, जहाँ मृत्यु प्रवेश नहीं करता, जहाँ दुःख नहीं आ सकते, जो सदानन्द, परमानन्द, शान्त, सनातन, सदा कल्याणमय, ब्रह्मादिसे वन्दित है, वही योगियोंका ध्येय परमपद है, जिसको प्राप्त होकर योगी लौटते नहीं। *-† ये दोनों मन्त्र ऋग्वेदकी प्रचलित प्रतियोंके पुरुषसूक्तमें नहीं मिलते, परन्तु पुरुषसूक्तके पृथक् प्रकाशित कई संस्करणोंमें मिलते हैं। मूल उपनिषद्में भी इनका सकेत है। ये मन्त्र 'पारमात्मिकोपनिषद्,' 'महावाक्योपनिषद्' तथा 'चित्युपनिषद्' में आये हैं। १७ वाँ मन्त्र 'तैत्तिरीय आरण्यक' में भी है। ‡ उपनिषद् इस मन्त्रमें मोक्ष-निरूपणका उपसंहार भी निरूपित—निर्दिष्ट करता है। अत मोक्ष-निरूपणके लिये श्रुतिका अर्थ इस प्रकार होना चाहिये। सम्पूर्ण कर्म, जो भगवदर्पण-बुद्धिसे भगवान्के लिये किये जाते हैं, यज्ञ हैं। उस कर्मरूप यज्ञके द्वारा सात्त्विक वृत्तियोंने उन यज्ञस्वरूप भगवान्का यजन—पूजन किया। इसी भगवदर्पणबुद्धिसे किये गये यज्ञरूप कर्मोंके द्वारा ही सर्वप्रथम धर्म उत्पन्न हुए—धर्माचरणकी उत्पत्ति भगवदर्पणबुद्धिसे किये गये कर्मोंसे हुई । इस प्रकार भगवदर्पणबुद्धिसे अपने समस्त कर्मोंके द्वारा जो भगवान्का यजन- रूप कर्मका आचरण करते हैं, वे उस भगवान्के दिव्यधामको जाते हैं, जहाँ उनके साध्य—आराध्य आदिदेव भगवान् विराजमान हैं। उ० अं० ८६-