सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५५

स्वाद्युमांसास्स्त्विमे वृष्या उष्णाः पित्तविवर्धनाः । कषायतिक्ता रसतो वातघ्नाः कटुपाकिनः ।। २८ ।।

वृक (भेडिया), ऋक्ष (रीछ), कोक (ईहामृग), जम्बूक (गीदड़), सिंह, व्याघ्र, तरक्षु (व्याघ्रविशेष) का मांस स्वादु, वृष्य, उष्ण तथा पित्तवर्धक होता है। इनका रस कषाय एवं तिक्त होता है, ये वातनाशक हैं तथा इनका विपाक कटु होता है ॥२७-२८॥

नकुलो मूषिकः श्वाविद्बभ्रुः शल्यक एव च । कषायमधुराः शीता वृष्या गोधाश्च तद्गुणाः ।। २९ ।।

नेवला, मूषिक (चूहा), श्वावित् (सेही), बभ्रु (नकुल भेद) तथा शल्यक—का मांस कषाय, मधुर, शीत एवं वृष्य होता है। गोधा (गोह) का मांस भी इन्हीं के समान होता है ॥

ये स्युः शशकुरङ्गाद्याः सृमरश्चमराश्च ये । लघवो ........ ष्णाः पित्तला नातिबृंहणाः ।। ३० ।।

शश (खरगोश), कुरंग (हरिण), सृमर (शृङ्ग त्यागी मृग), चमर (चंवर गाय) का मांस-लघु, ... उष्ण, पित्तकारक तथा थोड़े बृंहण होते हैं ॥३०॥

बार्हिणं मधुरोष्णं तु विषघ्नं गुरु बृंहणम् । तुल्यं कौक्कुटजं वन्यं, तत्तुल्यं ग्राम्यकौक्कुटम् ।। ३१ ।।

मोर का मांस—मधुर, उष्ण, विषनाशक, गुरु एवं बृंहण होता है। जंगली तथा ग्राम्य (पालतू) मुर्गे का मांस भी इन्हीं के समान है ॥३१॥

विष्किराः क्रौञ्चवर्तीका मयूरेण समाः स्मृताः ।
तस्माल्लघुस्तु वर्तीरो वर्तीका लघवो लघुः ।। ३२ ।।

विष्किर (पंजों से कुरेद कर चुगने वाले प्राणी—विकीर्य विष्किराश्चेति), क्रौञ्च तथा वर्तीक (बटेर) के मांसों के गुण मोर के मांस के समान होते हैं। वर्तीर (कपिञ्जल के समान पक्षी-घरघरा) उससे लघु होता है वर्तीक (बटेर) उससे भी लघु होता है ॥३२॥

तित्तिरिस्तु कटुः पाके सोष्णास्तु कफवातजित् । कपिञ्जलश्चकोरश्च उपचक्रश्च तत्समाः ।। ३३ ।।

तीतर (काला तीतर) का मांस—विपाक में कटु, उष्ण तथा कफ और वात को शान्त करने वाला है। कपिञ्जल (गोरा तीतर), चकोर तथा उपचक्र (हंस विशेष) के मांस इन्हीं के समान होते हैं ॥३३॥

लोहपृष्ठो रक्तपृष्ठो रक्ताक्षो जीवजीवकः । तथाऽन्ये हिमवज्जाता मधुरा वृष्यबृंहणाः ।। ३४ ।।
गुरवः शीतलाः पाके कषाया रसस्तथा ।

लोहपृष्ठ (कङ्कपक्षी), रक्तपृष्ठ, रक्ताक्ष (पारावत-कबूतर), जीवजीवक (प्लवजातीय चकोर भेद) तथा अन्य हिमालय में उत्पन्न होने वाले प्राणी-मधुर, वृष्य, बृंहण, गुरु, पाक में शीतल तथा रस में कषाय होते हैं ॥३४॥

खञ्जरीटो वपुक्कारः क्रकरो दीर्घपुंसकः ।। ३५ ।।
कोयष्टिकः कपोतश्च रक्तपादो वसन्तकः । भृङ्गराजोऽथ हारीतः कोकिलः शुकसारिकाः ।। ३६ ।।
एते चान्ये च प्रच्छदा (?) शीतमारुतकोपकाः । कषायमधुराः स्वादे कफघ्नाः कटुपाकिनः ।। ३७ ।।

खञ्जरीट (खञ्जन), वपुक्कार, केकड़ा, दीर्घपुंसक, कोयष्टिक (टिटिहरी या क्रौञ्च), कबूतर, रक्तपाद (तोता), वसन्तक, भृङ्गराज (पक्षिविशेष), हारीत (हरिताल पक्षी), कोयल, तोता तथा मैना—इन तथा अन्य भी प्रच्छद पक्षियों के मांस शीत तथा वायु को कुपित करनेवाले हैं। ये स्वाद में कषाय एवं मधुर हैं, कफनाशक हैं तथा इनका विपाक कटु है ॥३५-३७॥

५५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

गृध्रः काकः श्येनचाषौ भासोलूककुलिङ्गकाः । शशन्ता मूषिकाः क्रोडास्तथाऽन्ये मांसभोजनाः ।।
प्रसहास्ते तु मधुरा वातघ्नाः कटुपाकिनः । बृंहणाश्चोष्णवीर्याश्च सततं शोषिणां हिताः ।।३९।।

गृध्र, कौवा, श्येन (बाज), चाष, भास (गोकुलचारी गृध्रविशेष), उल्लू, कुलिङ्गक (चिड़िया), शशन्त, मूषिक, क्रोड-तथा अन्य जो भी प्रसहवर्ग के मांस भोजन करनेवाले हैं वे मधुर, वातनाशक, कटुपाकी, बृंहण तथा उष्णवीर्य हैं एवं शोषरोगियों के लिये निरन्तर सेवन करने से हितकर हैं। प्रसह—अपना भोजन जबरदस्ती पकड़ कर खानेवाले प्राणी 'प्रसह' कहलाते हैं ।।

प्लवा बका बलाकाश्च तीदार्यः कुररास्तथा । ........ रक्ताक्षा मल्लिकाक्षाः सवारटाः ।।४०।।
नदीमुखा मेघरावाः शराख्या जलकुक्कुटाः । समुद्रकाकाः कुहरा गोट्टुभा गण्डमालकाः ।।४१।।
कारण्डवाः सजीमूतास्तथाऽन्ये जलचारिणः । पाके च मधुरा वृष्या गुरवश्च ........ ।।४२।।
............................................ । ............................................ ।।४३।।

प्लव (पानी में तैरनेवाले जीव संघातंचारी पक्षी), बक (बगुला), बलाका (बकभेद), तीदार्य, कुरर, ..... रक्ताश्व, मल्लिकाक्ष (हंस विशेष), वारट (हंसी), नन्दीमुख, मेघराव (मेघनाद या चातक), शर, जलकुक्कुट (जल मुर्गा), समुद्र का, कुहर, गोट्टुभ, गण्डमालक, कारण्डव (सफेद हंस का भेद), जीमूत तथा अन्य जो भी जलचर पक्षी हैं उनका मांस पाक में मधुर, वृष्य एवं गुरु होता है ....... ।।४०-४३।।

हंसस्तु गुरुरत्यर्थं वृष्योऽथ कफपित्तलः । शरारिः पाकहंसश्च चक्रवाकस्तथैव च ।।४४।।
जालपादास्तथाऽन्ये च हंसतुल्या गुणैः स्मृताः ।

हंस का मांस अत्यन्त गुरु, वृष्य तथा कफ एवं पित्तवर्धक हैं। शरारि (आटी), पाकहंस, चक्रवाक, जालपाद तथा अन्य पक्षी गुणों में हंस के समान माने गये हैं ।।४४।।

क्रौञ्चः कुलिङ्गो द्रविडः पद्मपुष्करसादकः ।।४५।।
वार्धीणसः सारसश्च सारङ्गो धामृण्यलिकः (?) ।
एते चान्ये चाम्बुचराः पक्षिणो गुरवः स्मृताः ।।४६।।
रसे पाके च मधुरा उष्णाः सलवणान्वयाः । वृष्या वातहराश्चैव कफपित्तविवर्धनाः ।।४७।।

क्रौञ्च, कुलिङ्ग, द्रविड, पद्मपुष्कर, सादक,, वार्धीणस (नीली ग्रीवा तथा लाल सिर वाला पक्षी विशेष), सारस, सारङ्ग (मृगभेद-चित्रमृग), धामृण्यलिक (?)—इत्यादि तथा अन्य भी जलक्षर पक्षी गुरु माने गये हैं। ये रस तथा विकाप में मधुर होते हैं और ये उष्ण, लवणरसयुक्त, वृष्य, वातनाशक एवं कफ और पित्त को बढ़ाने वाले हैं ।।४५-४७।।

नलमीनो झषश्चैव पाठीनश्चर्मपीवरः । चेलीमः शकुलार्भ(द)श्च शिलीन्ध्रो गर्गरस्तथा ।।४८।।
पुष्करो गोकरो मूचो वारडः शूलपाटलः । कृष्णमत्स्यः श्वेतमत्स्यो गोमत्स्यो रोहितस्तथा ।।४९।।
शकली महाशकली चम्पः कुन्दोऽथ मद्गुरः ।
इल्यः शङ्कुश्चिरणो राजीवः शफरी तथा ।।५०।।
एते चान्ये च बहवो विविधा मत्स्यजातयः । रसे पाके च मधुरा वातघ्ना वृष्यबृंहणाः ।।५१।।
उष्णवीर्याश्च ते ज्ञेया गुरवः कफपित्तलाः । लघ्वाशायास्तेऽन्ये तु किञ्चित्तिक्तान्वयान्तराः ।।५२।।
रोहितो नलमीनश्च ........... लघवः स्मृताः ।

मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५७

नलमीन (चिलिचिम मछली), झष (मत्स्यभेद), पाठीन, चर्सपीवर, चेलीम, शकुलार्भक, शिलीन्द्र, गर्गर, पुष्कर, गोकर, मूच, वारड, शूलपाटल, कृष्णमत्स्य, श्वेतमत्स्य, गोमत्स्य, रोहित, शकली, महाशकली, चम्प, कुन्द, मद्गुर, इल्य, शङ्क (शांकोच), चिचरण, राजीव, शफरी (प्रोष्ठी मत्स्य), इत्यादि तथा अन्य भी कई मछलियों की जातियां रस एवं पाक में मधुर, वातघ्न, वृष्य, बृंहण, उष्णवीर्य, गुरु तथा कफ एवं पित्तवर्धक हैं। इनमें लघु शरीर वाले तथा कुछ तिक्त रस वाले प्राणियों का ग्रहण करना चाहिये। रोहित एवं नलमीन ..... आदि लघु कहे गये हैं॥४८-५२॥

कूर्मो दुटिश्च नक्रश्च मकरोऽवकुशस्तथा ॥५३॥
तिमिः सहस्रदशनस्तथैव च तिमिङ्गिलः । इञ्चकः शुक्तिकः शङ्खोऽवलूको जलसूकरः ॥५४॥
शम्बूकश्चन्द्रिकः शृङ्गी कर्कटः शकुटीपयः । एते चान्ये च जलजा मधुरा रसपाकयोः ॥५५॥
गुरवश्चोष्णवीर्याश्च गुरवः कफपित्तलाः ।।

कूर्म (कछुआ), दुटि, नक्र (नाका), मकर (मगरमच्छ), अवकुश, तिमि, सहस्रदशन, तिमिङ्गिल, इञ्चक, शुक्तिक (सीप), शङ्ख, अवलूक, जलशूकर, शम्बूक (घोंघा), चन्द्रिक, शृङ्गी, कर्कट (केंकड़ा), शकुटीपय आदि तथा अन्य जलचर प्राणी रस तथा पाक में मधुर, गुरु, उष्णवीर्य, गुरु तथा कफ एवं पित्तवर्धक होते हैं ॥५३-५५॥

आनूपे तूत्तमश्छागः, श्रेष्ठो मत्स्येषु रोहितः ॥५६॥
जलजे शुक्तिकूर्मौ च, वारटोऽप्यथ पक्षिषु । एणो मृगेषु प्रवरः, प्रतुदेषु शुको वरः ॥५७॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २६२ तमं पत्रम्)

विषयेषु ...... ग्न्यो लावः खगेषु तु ।
तित्तिरो विष्किरेष्वग्न्यः, काकोऽग्न्यः प्रसहेषु तु ॥५८॥

आनूप (जलयुक्त प्रदेश में रहने वाले) प्राणियों में बकरा सबसे श्रेष्ठ माना गया है। मछलियों में रोहित मछली सबसे श्रेष्ठ होती है (रोहितो मत्स्यानां-चरक सू. अ. २५), जलज प्राणियों में शुक्ति और कूर्म (कछुआ), पक्षियों में वारट, मृगों में एण हरिण (ऐणेयं मृगमांसानां-चरक सू. अ. २५), प्रतुद (नोक से कुरेदकर चुगनेवाले) पक्षियों में तोता, विषयों में ........., पक्षियों में लाव (लावः पक्षिणां चरक सू. अ. २५), विष्किर (पंजों से कुरेदकर चुगने वाले) प्राणियों में तीतर, प्रसह (अपना भोजन जबरदस्ती पकड़ कर खाने वाले) प्राणियों में कौवा श्रेष्ठ माना गया है ॥५६-५८॥

लघूक्तं रुधिरं मांसाद् गुरु मेदश्च चर्म च । मज्जावसे गुरुतरे तेभ्यो गुरु शिरः स्मृतम् ॥५९॥

मांस की अपेक्षा रक्त लघु कहा गया है तथा मेद और चर्म (त्वचा) गुरु और मज्जा तथा वसा इनसे गुरु तथा सिर इनसे भी गुरु माना गया है ॥५९॥

लघुः स्कन्धो हि शिरसस्तस्मात् पार्श्वं लघु स्मृतम् ।
पार्श्वात् सक्थि लघु प्रोक्तं पादमांसं गुरु स्मृतम् ॥६०॥

सिर की अपेक्षा कन्धा लघु होता है, कन्धों से पार्श्वभाग तथा पार्श्व से सक्थि लघु होती है तथा पैरों का मांस गुरु होता है ॥६०॥

वसा मेदश्च मज्जा च वातपित्तहिताः स्मृताः । रसे पाके च मधुराः स्नेहाच्छ्लेष्मप्रकोपनाः ॥६१॥
रक्तं रक्तप्रशमनं मांसं मांसविवर्धनम् ।

वसा मेद तथा मज्जा—वात एवं पित्त के लिये हितकर होते हैं। ये रस तथा पाक में मधुर होते हैं, स्नेहयुक्त होते हैं तथा श्लेष्मा को प्रकुपित करते हैं। रक्त रक्त को निर्मल करने वाला है तथा मांस मांस की वृद्धि करता है ॥६१॥

५५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

गुरवः प्राणिनो बाला, युवानो वृष्यबृंहणाः ।।६२।।
वृद्धास्तु वातला रूक्षाः, पुंभ्यस्तु लघवः स्त्रियः ।
मृगाल्लघुतरः पक्षी, पक्षिभ्योऽम्बुचरो गुरुः ।।६३।।

बाल (छोटे) प्राणी गुरु माने गये हैं, युवा प्राणी वृष्य तथा बृंहण होते हैं तथा वृद्धप्राणी वातकारक एवं रूक्ष होते हैं। पुरुषों (Males) की अपेक्षा स्त्रियां (Females) लघु होती हैं। मृगों (पशुओं) की अपेक्षा पक्षी लघु होते हैं तथा पक्षियों से जलचर प्राणी गुरु होते हैं ॥६२-६३॥

महाशरीराश्चल्पकाया लघवो जीवक ! स्मृताः । विज्ञेयाश्चाल्पभुग्भ्योऽपि गुरवो बहुभोजनाः ।।६४।।

हे जीवक ! (नकुल मूषिक आदि) अल्प शरीरवाले प्राणियों में बड़े और मोटे प्राणियों का मांस लघु होता है । अल्पभुक् (थोड़ा खानेवाले) प्राणियों में अधिक भोजन करनेवाले प्राणी गुरु होते हैं ॥६४॥

लघवोऽल्पभूमिचरा, अलसेभ्यो विदूरगाः । लघुदेशचरा अल्पा लघवो लघुभोजनाः ।।६५।।

अल्पभूमिचर (थोड़ा चरने वाले) प्राणी लघु होते हैं । आलसी प्राणियों में बहुत दूर तक जाकर चरने वाले प्राणी लघु होते हैं तथा लघु देश में चरने वाले, अल्प शरीर वाले एवं लघु भोजन करने वाले प्राणी भी लघु होते हैं ॥६५॥

गुरुदेशचराः स्थूला गुरवो गुरुभोजनाः । पाशबद्धं गुरु मांसं रूक्षं क्षुद्व्याधिभिर्हतम् ।।६६।।

गुरु (भारी) देश (स्थान) में विचरने वाले, स्थूल तथा गुरु भोजन करने वाले प्राणी गुरु होते हैं। जाल में पकड़े हुए प्राणियों का मांस गुरु होता है। क्षुधा (भूख) एवं रोग से मरे हुए प्राणी का मांस रूक्ष होता है ॥६६॥

श्वभिर्हतं पीतरक्तं नातिबृंहणमुच्यते । विषैर्हतमभक्ष्यं स्याच्छुष्कं नातिगुणावहम् ।।६७।।

कुत्तों द्वारा मारे हुए तथा जिसका रक्तपान कर लिया गया है ऐसे प्राणियों का मांस अधिक बृंहण नहीं होता है। विष द्वारा मारे हुए प्राणियों का मांस अभक्ष्य होता है। वह शुष्क तथा गुणहीन होता है ॥६७॥

सद्योऽपरिक्लिष्टहतं मांसं धातुं विवर्धयेत् । पूतिमांसं गुर्वसारं तदवृष्यमबृंहणम् ।।६८।।

ताजा मारा हुआ तथा अदूषित मांस-मांस तथा धातु की वृद्धि करता है। जो मांस सड़ा हुआ, गुरु एवं साररहित हो वह अवृष्य तथा अबृंहण होता है ।

**वक्तव्य—**चरक सू. अ. २५ तथा सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी अत्यन्त विस्तारपूर्वक देश, काल, अवस्था, लिङ्ग, जाति तथा अङ्गों के भेद से मांस के गुणों का वर्णन किया गया है ॥६८॥

एवं मांसविशेषज्ञः कल्पयेद्भोजने सदा । बालानां गुर्विणीनां वा बालपुत्रासु वा भिषक् ।।६९।।
दुष्प्रजातासु वा स्त्रीषु बाले वा कृशिते सदा । प्रयुञ्जन् सिद्धिमप्नोति तत्त्वविद् वृद्धजीवक ! ।।७०।।

इस प्रकार मांस के गुणों को जानने वाले व्यक्तियों को भोजन में सदा मांस की कल्पना करनी चाहिये । हे वृद्धजीवक ! जो तत्त्ववेत्ता मनुष्य बालक, गर्भिणी, छोटी लड़की, दुष्प्रजाता स्त्री तथा कृश बालकों में इस प्रकार कल्पनानुसार मांस का प्रयोग करता है वह सिद्धि (सफलता) को प्राप्त करता है ॥६९-७०॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)

देशसात्म्याध्यायः २५] खिलस्थानम् ५५९

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)


अथ देशसात्म्याध्यायः पञ्चविंशः ।

अथातो देशसात्म्याध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम देशसात्म्याध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

**वक्तव्य—**इस अध्याय में किस २ देश में कौन २ सा आहार-विहार सात्म्य होता है—इसका वर्णन किया जायगा। यह अध्याय भी अपूर्ण ही मिलता है। इसमें कुरुक्षेत्र को मध्य (Centre) मानकर पहले पूर्व दिशा के देश तथा सात्म्य आहार विहार का वर्णन किया है। उससे आगे दक्षिण दिशा के देश में केवल नामों का ही उल्लेख मिलता है। उससे आगे अध्याय खण्डित हो गया है। उस खण्डित अंश में संभवतः दक्षिण देशों का सात्म्य आहार-विहार तथा पश्चिम एवं उत्तर देशों के नामपूर्वक सात्म्य आहार-विहार आदि का वर्णन किया गया होगा ॥१-२॥

कश्यपाख्यमृषिश्रेष्ठं पृष्टवान् ...... रोचतः । देशसात्म्यमजानन्तः कथं कुर्युश्चिकित्सितम् ॥३॥
कस्य देशस्य मध्ये तु कुरुक्षेत्रं प्रतिष्ठितम् ।

कश्यप नाम वाले श्रेष्ठ ऋषि से जीवन ने प्रश्न किया-देश सात्म्य को जाने बिना हम किस प्रकार चिकित्सा कर सकते हैं तथा कुरुक्षेत्र किस देश के मध्य में स्थित है ॥३॥

इत्येवमुक्तो भगवान् काशिराजो महामुनिः ॥४॥
इदमुत्तरमक्लिष्टं व्याख्यातुमुपचक्रमे । कुरुक्षेत्रं मध्यदेशश्चाद्योजनानां शतं परम् ॥५॥
समस्तान् षड्रसान् प्रायो भुञ्जते मध्यदेशजाः । भक्ष्यभोज्यान्नवीरास्ते तु भुञ्जन्तो वाऽसकृत्तथा ॥६॥

इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर महामुनि भगवान् काशीराज ने सरल ढंग से उत्तर देना प्रारंभ किया-देश के मध्यभाग में सौ योजन विस्तार वाला कुरुक्षेत्र प्रदेश है। मध्य देश के निवासी प्रायः सम्पूर्ण छहों रसों (रसों से युक्त आहार) का सेवन करते हैं। वे भक्ष्य, भोज्य एवं अन्न (खान पान) में अत्यन्त वीर होते हैं तथा वे अनेक बार भोजन करते हैं। अर्थात् वे खूब खाने पीने वाले होते हैं ॥४-६॥

पूर्वदिशस्तु विज्ञेयो मधुरः शीतलो गुरुः । कुमारवर्तनीमा(चा)दौ कटीवर्षस्तथैव च ॥७॥
मगधासु महाराष्ट्रऋषभद्वीपमेव च । पौण्ड्रवर्धनकं चापि मृत्तिकावर्धमानकम् ॥८॥
कर्वटं च समातङ्गं ताम्र(प्र)लिप्तं सचीरकम् । प्रियङ्गुमथ कौशल्यं कलिङ्गपृष्ठपूरकम् ॥९॥

पूर्व दिशा के देश मधुर, शीतल तथा गुरु माने गये हैं। वे देश निम्न हैं—सबसे पहले कुमारवर्तनी, फिर कटीवर्ष, मगध में महाराष्ट्र, ऋषभ द्वीप, पौण्ड्रवर्द्धनक, मृत्तिकावर्धमानक, कर्वट, मातङ्ग, ताम्रलिप्त, चीर (चीन), प्रियङ्गु, कौशल्य, कलिङ्ग तथा पृष्ठपूरक ॥७-९॥

एषु प्लीहविनो मर्त्या गलगण्डिकमे(न ए)व च । गुडशाल्योदनप्राया मत्स्यभोजनसेविनः ॥१०॥
प्रायशो मधुराहारा वातश्लेष्मात्मका नराः ।

५६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

इन देशों के लोग प्लीहा एवं गलगण्ड से युक्त होते हैं अर्थात् उनमें प्लीहारोग (Enlargement of Spleen आदि) तथा गलगण्ड (Goitre) रोग अधिक होते हैं। ये प्रायः गुड तथा शालिचावल और मछली का भोजन करते हैं। इनका आहार प्रायः मधुर होता है तथा यहां के लोग वात एवं श्लेष्म प्रकृति के होते हैं ॥१०॥

तेषां कटुकतिक्तं च रूक्षमुष्णं च भोजनम् ।।११।।
यच्चान्यदपि श्लेष्मघ्नं तेषां तत्तत् प्रयोजयेत् ।

इन व्यक्तियों को कटु, तिक्त, रूक्ष एवं उष्ण भोजन कराना चाहिये तथा अन्य जो भी श्लेष्मनाशक आहार-विहार है—उसका सेवन कराना चाहिये ॥११॥

कञ्चीपदा नवध्वाना कावीरास्तुल्ययोरपि ।।१२।।
वानसी कुमुदाराज्यं चिरिपालिस्तथैव च। चीरराज्यञ्च चोराणां पुलिन्द(न्दं)द्रविडेषु च ।।१३।।
करघाटशनानां च विवे(दे)हा मण्डपेषु च। कान्तारं च वराहं च घटास्वाभीरमेव च ।।१४।।
दक्षिणां दिशमाश्रित्य देशा वि ........ ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६४ तमं पत्रम्)

दक्षिण दिशा का आश्रय करके निम्न देश हैं—कञ्चीपद, नवध्वान, कावीर, वानसी, कुमुदाराज्य, चिरिपालि, चोरों का चीरराज्य, द्रविड में पुलिन्द, शनों में करघाट, मण्डपों में विदेह, कान्तार, वाराह तथा घटाओं में आभीर देश हैं।....
(वक्तव्य—इन देशों का यथासंभव परिचय उपोद्धात में दिया गया है। पाठक इन्हें वहीं देखें) ॥१२-१४॥

..................................................
..................................................
..................................................
..................................................

खिलस्था¹नस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ।
खिलस्थान का इतना ही भाग उपलब्ध होता है।

काश्यपसंहिता वृद्धजीवकीयतन्त्रं च एतावत्येवोपलब्धभागे विश्राम्यति ।


१. खिलान्यशीतिरध्याया इति पूर्वोद्देशानुसारेणाऽस्मादपूर्णपञ्चविंशाध्यायादुत्तरं पञ्चपञ्चाशदध्याया अवशिष्यन्ते, तेनाऽर्धग्राम इवायमकाण्डे विच्छिन्नो ग्रन्थः पूर्त्तये पुनरनुकूलदैवं समीहते। उक्तं चाभियुक्तैः—
द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥ इत्यलम्।

काश्यपसंहिताया विषयानुक्रमणिका

सूत्रस्थानम् ।

विषयपृ.^१पं.विषयपृ.पं.
लेहाध्यायः ।शुद्धक्षीरस्य लक्षणम्१२६
लेहनविषये जीवकस्य प्रश्नाः११अशुद्धक्षीरसेवनदोषास्तेषां शान्तिश्च१३१
कश्यपस्योत्तरम्२१वज्रस्य (स्तनकीलकस्य) संज्ञाहेतुसंप्राप्ति-लक्षणानि१३३
गर्भिण्या रसधातोस्त्रिधा विभागः२२वज्रस्य चिकित्सा१४५
देहिनां प्रकृत्यभिनिर्वृत्तौ हेतुः२४नार्याः स्तनोपरि दुष्टदृष्टिपातस्तच्चिकित्सा च१५२
देहप्रकृतेर्भेदाः२४दन्तजन्मिकाध्यायः २० ।
देहप्रकृत्याश्रिता भेषजकल्पना४१दन्तजन्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः१५८
वयोभेदेन बालेषु भेषजमात्रानिर्देशः४२कश्यपस्योत्तरम्१६१
लेहनायोग्या बालाः५६दन्तानां भेदाः, संज्ञाः, उत्पत्तिकालश्च१६१
बालानां सात्म्यान्येवान्नपानान्युपयोज्यानि६१कुमारीणां कुमाराणां च दन्तजन्मनि विशेषः१७१
लेहनविधिः६३दन्तानां निषेकोद्भेदादौ हेतुः१७२
बालानां सुवर्णप्राशनगुणाः६५दन्तानां निषेककालः१८१
बालानां मेधाजनना लेहाः७२अप्रशस्तं दन्तजन्म, तच्छान्तिश्च१८१
बालानां लेहनार्थम् अभयं घृतम्७६चतुर्विधं दन्तजन्म१८५
बालानां लेहनार्थम् संवर्धनं घृतम्८३सामुद्रसंवृतविवृतानां दोषाः१८५
बालानां लेहनार्थम् ब्राह्मयाद्यं घृतम्८५मासविशेषेण दन्तनिषेकस्य दोषा गुणाश्च१८७
क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ।दन्तसंपत्१८१०
स्कन्दादिग्रहदूषितधात्रीदुग्धलक्षणम्९१अप्रशस्ता दन्ताः१८१२
रसवर्णाभ्यां धात्र्याः क्षीरपरीक्षा९५चूड़ाकरणीयाध्यायः २१ ।
दुष्टक्षीरस्य संशोधनम्९६कर्णपालीवर्धनोपायाः२११
क्षीरवर्धनम्१०५अभिषजः कर्णवेधननिषेधः२१४
क्षीरविशोधनो गणः१०८स्नेहाध्यायः २२ ।
क्षीरशोधनकालिक आहारः११२स्नेहस्य योनिर्विकल्पाश्च२३३
क्षीरसंशोधनकाले वर्जनीयानि११३स्थावरस्नेहाः२३३
क्षीर-प्रजनन-वर्धनानि११४

१. अत्र सर्वत्र पङ्क्तिसंख्यागणनायां केवलं संस्कृतमूलश्लोकगद्यस्थितपङ्क्तीनामेव ग्रहणम् ।

५६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
औद्भिदाः स्नेहाः२३४जीर्णस्नेहलक्षणम्३३३
घृततैलवसामज्ज्ञां पूर्वपूर्वस्य श्रेष्ठत्वम्२३५स्नेहावपीडगुणाः३३६
घृतगुणाः२४१स्नेहापचारजा रोगाः, तच्चिकित्सा च३३८
तैलगुणाः२४३स्नेहव्यापद्धेतुस्तच्चिकित्सा च३४३
मज्जावसोर्गुणाः२४४स्नेहविचारणायोग्या नराः३४५
तिलतैलघृतप्रयोगप्रशंसा२४५प्रमेहादिषु स्नेहने विशेषविधिः३४८
ऋतुविशेषेण स्नेहविशेषोपयोगः२५१स्नेहनस्वेदनविशोधनक्रमः३५१
स्नेहविशेषेणानुपानविशेषः२५३स्वेदाध्यायः २३ ।
उष्णोदकानुपानगुणाः२५५स्वेदविषये जीवकस्य प्रश्नाः३५४
उष्णोदकनिर्माणविधिः२५६कश्यपस्योत्तरम्३५७
उष्णोदकानुपानं येषां निषिद्धम्२५७स्वेद्या नराः३५१०
ओदनादिभिः स्नेहप्रयोगविधानम्२६१दोषविशेषेण स्वेदविशेषः३५११
प्रकृतिविशेषेण स्नेहप्रयोगकालः, ततोऽन्यथा प्रयोगे दोषाश्च२६३शरीरावयवविशेषे स्वेदविशेषः३६२
स्नेहाच्छपाने त्रिविधा मात्रा, तद्योग्या नराश्च२७१स्वेदनसमये नेत्रादिसंरक्षणविधिः३६३
त्रिविधस्नेहमात्राणां गुणाः२८१स्वेदनिर्वर्तनकालः३७३
घृतपानयोग्या नराः२८५अतिस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च३७४
तैलपानयोग्याः नराः२८७मन्दस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च३७८
वसापानयोग्याः नराः२९१सम्यक्स्विन्नस्य लक्षणम्३८१
मज्जपानयोग्याः नराः२९३अस्वेद्या नराः३८३
स्नेह्याः नराः२९५स्वेद्या नराः३८५
अस्नेह्याः नराः३०१स्वेदस्यादौ भेदाः३९२
अस्नेह्यानामच्छस्नेहपानाद्दोषाः३०५हस्तस्वेदविधिः३९३
अस्निग्धस्य लक्षणम्३०७अवहितेन बालेषु स्वेदो योज्यः४०१
स्निग्धस्य लक्षणम्३०८प्रदेहस्वेदविधिः४०७
अतिस्निग्धस्य लक्षणम्३०९नाडीस्वेदविधिः४११
स्नेहपानात् पूर्वदिने कर्तव्यम्३११प्रस्तरस्वेदविधिः४१२
स्नेहपीतस्य विहारः३१३सङ्करस्वेदविधिः४२१
कोष्ठभेदेन स्नेहनकालः३१४उपनाहस्वेदविधिः४२३
मृदुकोष्ठस्य लक्षणम्३१५उपकल्पनीयाध्यायः २४ ।
अजीर्णस्नेहलक्षणम्३२३सम्यक्शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः४३१
स्नेहजीर्णाजीर्णविशङ्कायां चिकित्सा३२४अन्नसंसर्जनक्रमव्यभिचारजा रोगाः४५७
तैलादीनामजीर्णे विशेषलक्षणानि३२६शुद्धस्य शीतपानान्नादिसेवनजा रोगाः४६२
स्नेहाजीर्णे चिकित्सा३३१सम्यग्जीर्णान्निलक्षणम्४६३

विषयानुक्रमणिका

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
अजीर्णत्रिलक्षणम्४६४विषूचिकाया लक्षणानि५१६
अजीर्णस्य चत्वारो भेदाः४७१अलसकस्य लक्षणानि५१७
आमविदग्धसश्लेष्मरसशेषाजीर्णानां लक्षणानि४७२नेत्रामयानां लक्षणानि५२१
कण्ड्वाः लक्षणानि५२२
अजीर्णानां सामान्यलक्षणम्४७३आमस्य पूर्वरूपाणि५२४
अजीर्णानां साध्यासाध्यविचारः४७४पाण्डुरोगस्य लक्षणानि५२६
अजीर्णानां चिकित्सा४७७कामलायाः लक्षणानि५२७
सम्यक्कृतसंशोधनगुणाः४८३मदात्ययस्य लक्षणानि५२८
वेदनाध्यायः २५ ।उरोघातस्य लक्षणानि५३१
अवचसां बालानां वेदनाज्ञानविषये जीवकस्य प्रश्नाः४८८जन्तुकार्दितस्य लक्षणानि५३३
ग्रहाबाधायाः पूर्वरूपाणि५३४
कश्यपस्योत्तरम्४९१बालरोगाणां सामान्यासाध्यत्वलक्षणानि५३१३
शिरोरुजाया लक्षणम्४९२बालरोगाणामुपक्रमाः५४३
कर्णवेदनायाः लक्षणम्४९३चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६ ।
मुखामयस्य लक्षणम्४९४चिकित्सायाश्चत्वारः पादाः५४६
कण्ठवेदनायाः लक्षणम्४९५भिषजो गुणाः५५३
अधिजिह्विकायाः लक्षणम्४९६भेषजसंपत्५५७
गलग्रहस्य लक्षणम्४९७आतुरसंपत्५६१
कण्ठश्वयथोः लक्षणम्४९७परिचारकसंपत्५६४
ज्वरपूर्वरूपाणि४९८चतुःषु पादेषु भिषजः श्रेष्ठत्वम्५७१
अतिसारस्य पूर्वरूपाणि५०२रोगाध्यायः २७ ।
शूलिनो बालस्य लक्षणानि५०३रोगाणां प्रभेदविषये महर्षीणां मतानि५८३
छर्देः पूर्वरूपाणि५०४रोगाणां असंख्येयत्वे हेतुः५८९
श्वासस्य पूर्वरूपाणि५०५रोगाणां अधिष्ठानद्वयम्५८१०
हिक्कायाः पूर्वरूपाणि५०५व्याधेः प्रकृतेश्च लक्षणम्५८११
तृष्णायाः पूर्वरूपाणि५०६रोगाणां द्विविधा प्रकृतिः५९२
आनाहस्य पूर्वरूपाणि५०७वातादिदोषाणां शरीरे विशिष्टस्थानानि५९३
अपस्मारस्य पूर्वरूपाणि५०८निजागन्तुरोगयोर्विशेषः६०१
उन्मादस्य रूपाणि५०८ओजसः स्वरूपम्६०३
मूत्रकृच्छ्रस्य रूपाणि५०९ओजसो वर्धनानि६११
प्रमेहस्य रूपाणि५११वातादिसाम्यवैषम्ययोः फलम्६१२
अर्शसां रूपाणि५१३आविष्कृततमानां व्याधीनां स्थूलतः कथनम्६१३
अश्मर्याः रूपाणि५१४अशीतिवातविकाराणां नामतो निर्देशः६१४
विसर्पस्य पूर्वरूपाणि५१५वायोः स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च६३१

५६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
चत्वारिंशत्पित्तविकाराणां नामतो निर्देशः६३५शुभाशुभानि स्फिगलक्षणानि६९१६
पित्तस्य स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च६४१शुभाशुभानि कुकुन्दरलक्षणानि६९१८
कफजविंशतिविकाराणां नामतो निर्देशः६५१शुभाशुभानि जघनलक्षणानि६९१९
श्लेष्मणः स्वरूपं, कर्माणि, उपक्रमाश्च६५४शुभाशुभानि वृषणलक्षणानि६९२०
वातपित्तश्लेष्मणां विशिष्टोपक्रमाः६६१शुभाशुभानि प्रजननलक्षणानि६९२३
एकविधा व्याधयः६६३शुभाशुभानि मूत्रलक्षणानि६९२४
द्विविधाः६६५शुभाशुभानि योनिलक्षणानि७०१
त्रिविधाः६६६शुभाशुभानि रोमराजिलक्षणानि७०४
चतुर्विधाः व्याधयः६६८शुभाशुभानि कुक्षिलक्षणानि७०६
पञ्चविधाः व्याधयः६६१०शुभाशुभानि उदरलक्षणानि७०७
षड्विधाः व्याधयः६६१०शुभाशुभानि नाभिलक्षणानि७०११
सप्तविधाः व्याधयः६६११शुभाशुभानि पायुलक्षणानि७०१३
अष्टविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि पार्श्वलक्षणानि७०१३
दशविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि पृष्ठलक्षणानि७०१४
विंशतिविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि अंसलक्षणानि७०१५
उपद्रवलक्षणम्६७१शुभाशुभानि कक्षालक्षणानि७०१७
उपद्रवचिकित्साविचारः६७२शुभाशुभानि बाहुलक्षणानि७०१८
रक्तजविकाराणां हेतुः६७६शुभाशुभानि मणिबन्धलक्षणानि७०२०
रक्तजा रोगाः६८१शुभाशुभानि यवपंक्तिलक्षणानि७०२१
रक्तजानां रोगाणां चिकित्सा६८४शुभाशुभानि केशभूमिलक्षणानि७०२४
बालोपक्रमे विशेषः६८६शुभाशुभानि गतिलक्षणानि७०२६
लक्षणाध्यायः २८ ।अप्रशस्तानि शरीराणि७०२७
बालानां शुभाशुभदेहलक्ष्णविषये जीवकस्य प्रश्नाः६९१बालानां प्रशस्तानि रुषितादीनि७०२८
कश्यपस्योत्तरम्६९३वक्त्रचक्षुःस्वररूपैर्वृत्तमनःसारगुणानां परीक्षा७४१
शुभाशुभानि नखलक्षणानि६९४सत्त्वानां भेदाः७४३
शुभाशुभानि पादलक्षणानि६९७ब्राह्मसत्त्वस्य लक्षणम्७५२
शुभाशुभानि अङ्गुलीलक्षणानि६९११प्राजापत्यसत्त्वस्य लक्षणम्७५३
शुभाशुभानि पार्ष्णिलक्षणानि६९१२आर्षसत्त्वस्य लक्षणम्७५४
शुभाशुभानि उत्तरपादलक्षणानि६९१३ऐन्द्रसत्त्वस्य लक्षणम्७५५
शुभाशुभानि गुल्फलक्षणानि६९१३याम्यसत्त्वस्य लक्षणम्७५६
शुभाशुभानि जङ्घालक्षणानि६९१४वारुणसत्त्वस्य लक्षणम्७५७
शुभाशुभानि जानुलक्षणानि६९१५कौबेरसत्त्वस्य लक्षणम्७६१
शुभाशुभानि ऊरुलक्षणानि६९१६गान्धर्वसत्त्वस्य लक्षणम्७६२
शुद्धसत्त्वस्य सामान्यलक्षणम्७६३

विषयानुक्रमणिका
५६५

विषयपृ.पं.
आसुरसत्त्वस्य लक्षणम्७६६
राक्षससत्त्वस्य लक्षणम्७७१
पैशाचसत्त्वस्य लक्षणम्७७२
सार्पसत्त्वस्य लक्षणम्७७३
याक्षसत्त्वस्य लक्षणम्७७४
भूतसत्त्वस्य लक्षणम्७७५
शाकुनसत्त्वस्य लक्षणम्७७६
राजससत्त्वस्य सामान्यलक्षण्७८१
पाशवसत्त्वस्य लक्षणम्७८२
मात्स्यसत्त्वस्य लक्षणम्७८३
वानस्पत्यसत्त्वस्य लक्षणम्७८४
तामससत्त्वस्य सामान्यलक्षणम्७८५
सत्त्वरजस्तमसां लक्षणानि७८६
सत्त्वानुरूपं देहिनामाचरणं तत्फलं च७९१
समानसत्त्वाया धात्र्याः प्रशस्तत्वम्७९२
नवविधसाराणां नामतो निर्देशः७९४
त्वक्सारबालस्य लक्षणम्७९६
रक्तसारबालस्य लक्षणम्७९७

विमानस्थानम् ३ ।

कर्णायजयावळीवनं(?)विमानम् ? ।

विषयपृ.पं.
अवेक्षितगदानां चिकित्सा८३१

शिष्योपक्रमणीयं विमानम् ? ।

विषयपृ.पं.
शिष्योपनयनयोग्यः कालः८३६
शिष्योपनयनविधिः८३८
शिष्यगुणाः८५१
गुरोर्गुणाः८५४
शिष्यानुशासनम्८६१
अध्ययनविधिः८७१
अनध्ययनकालाः८७४
अधीतायुर्वेदस्य कर्तव्यानि८७८
तद्विद्यसंभाषाविधिः८८७
आयुर्वेदविषये पञ्चदश प्रश्नाः८९१
आयुषो लक्षणम्८९४
आयुर्वेदशब्दस्य निरुक्तिः८९६
आयुर्वेदस्याष्टावङ्गानि८९८
आयुर्वेदस्योत्पत्तिः८९१०
ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैः किमर्थमायुर्वेदोऽध्येयः८९१३
कौमारभृत्यतन्त्रस्याष्टस्वङ्गेष्वाद्यत्वम्८९१८
आयुर्वेदस्य पञ्चमवेदत्वप्रतिपादनम्९०१
आयुर्वेदस्य नित्यत्वप्रतिपादनम्९०६
आयुर्वेदस्य वातपित्तकफाश्रयत्वप्रतिपादनम्९०८
वातपित्तश्लेष्मप्रकृतीनां लक्षणानि९०१०

शारीरस्थानम् ४ ।

विषयपृ.पं.
ऋतुविभागः९५१
युगविभागेन कालविभागः९५४
*सृष्ट्युत्पत्तिक्रमः९७१
अष्टौ प्रकृतयः९७१
पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि९७२
पञ्च कर्मेन्द्रियाणि९७३
पञ्च इन्द्रियार्थाः९७३
मनसोऽतीन्द्रियत्वम्९७३
क्षेत्रक्षेत्रज्ञनिरूपणम्९७४
आत्मनो लिङ्गानि९७५
मनसो लक्षणम्९७६
पञ्चमहाभूतानि९७८
महाभूतानां गुणाः९७८
नव द्रव्याणि९७९
गुणानां द्रव्याश्रितत्वम्९७९
खादीनां विशिष्टा गुणाः९७१०
इन्द्रियाणां विप्रकृष्टसन्निकृष्टवृत्तित्वम्९७१०
सर्वेन्द्रियाणां स्पर्शनलक्षणत्वम्९७११

असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ?

विषयपृ.पं.
गर्भाभिवृद्धिक्रमः, चतुर्थादिमासेषु गर्भिण्या लिङ्गानि च१०२१

गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ।

विषयपृ.पं.
जीवस्य गर्भेऽवक्रमणम्१०५१

५६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.
गर्भस्य शरीरावयवाभिनिर्वृत्तिविषये जीवकस्य प्रश्नाः१०५४
कश्यपस्योत्तरम्१०५७
गर्भस्याकाशादिमहाभूतजाः शरीरावयवाः१०५८
गर्भस्य मातृजाः१०५१३
गर्भस्य पितृजाः१०५१४
गर्भस्य आत्मजाः शारीरभावाः१०५१५
गर्भस्य सात्म्यजाः शारीरभावाः१०५१७
गर्भस्य रसजाः शारीरभावाः१०५१८
सत्त्वस्यौपपादुकत्वकथनम्१०५१९
हृदययकृत्प्लीहफुप्फुसनिरूपणम्१०७१
गर्भाशय-गुद-बस्तीनां निरूपणम्१०७३
अष्टावाशयाः गर्भस्य मातृजाः पितृणाश्च धातवः१०८१
देहस्य षट्कोशवत्त्वम्१०८२
शरीरविचयशारीराध्यायः ? ।
अवयवविभागेनास्थां गणना१०८३
दश प्राणायतनानि११११
त्रीणि महामर्माणि१११३
कोष्ठाङ्गानि११२१
प्रत्यङ्गानि११२३
द्विविधानि स्रोतांसि११३१
दश मातृसिराः११३४
देहस्वरूपम्११४१
धमन्यः११४५
रोमकूपानि११४७
रोमकूपेभ्यः स्वेदप्रवृत्तिः११४९
अञ्जलिप्रमेयाः शरीरधातवः११४१०
शुक्रप्रवृत्तिकालः११५८
महाभूतानामन्योऽन्याश्रयत्वम्११५९
देहावयवसौक्ष्म्यस्य सुदुर्वाचत्वम्११६२
जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ।
स्वभावस्य मनुष्याद्याकृतिभेदनिर्वर्तकत्वम्११६६
शरीराभिनिर्वृत्तौ वायुपरमाणूनां कार्यम्११६७
स्वभावतः प्रजानिर्वृत्तौ स्त्रीपुंसयोरुपचार११६८
शुक्रशोणितयोरभिव्यक्तेः कालावेक्षितवम्११७१
कदा शुक्रशोणिते पूर्णे भवतः११७३
ऋतुकालः११७४
पुत्रकामः कन्यार्थी च कदा स्त्रियमुपेयात्११८१
गर्भाधानविधिः११९१
पुत्रीया इष्टिः११९६
आहारस्य धातुपोषकत्वम्१२१३
धातूनां धातुपोषकत्वम्१२१५
धातूनां तत्समगुणैस्तत्पोषणम्१२१७
गर्भिण्यै हितानि१२३३
गर्भिण्या हितं वेश्म१२३४
गर्भिण्या हिता चर्या१२३७
आसन्नप्रसवाया लक्षणानि१२३११
तत्र कर्तव्यानि१२४१
शीघ्रप्रसवकरा योगाः१२६२
प्रसवसमये कर्तव्यम्१२६४
इन्द्रियस्थानम् ५ ।
ओषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १२ ।
ओषधभेषजयोर्विशेषः१३०३
औषधभेषजयोर्गुणालाभेऽचिकित्स्यत्वं१३०५
मासान्तिकं रिष्टम्१३११
मासार्धिकं१३१२
स्कन्दादिग्रहाबाधसूचकानि स्वप्नानि१३१९
अफलाः स्वप्नाः१३३५
फलवन्तः स्वप्नाः१३४१
दुःस्वप्नफलम्१३४३
शुभं स्वप्नदर्शनम्१३४५
दुःस्वप्नशान्तिः१३५७
चिकित्सास्थानम् ६ ।
ज्वरचिकित्साध्यायः ? ।
ज्वरनिदानचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः१३७३

विषयानुक्रमणिका

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
गर्भिणीचिकित्सिताध्यायः ? ।वातोत्तरे प्लीहरोगे कतिपययोगाः१५६८
परिकर्तिकाहरा योगाः१४११उदावर्तचिकित्सिताध्यायः ? ।
प्रवाहिकाहरा योगाः१४१३आनानोदावर्त्तयोर्निदानपूर्विका संप्राप्तिः१५८३
कामलाहरा योगाः१४११०उदावर्त्तभेदाः१५८९
हृच्छूलहरा योगाः१४२१उदावर्त्तस्य सामान्यलक्षणानि१५८११
त्वग्वातहरो योगः१४२५उदावर्त्तस्य पूर्वरूपाणि१५८१४
ऊर्ध्वानिलहरो योगः१४२७उदावर्त्तचिकित्सा१५९१
हिक्काश्वासहरो लेहः१४२८राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ।
दीपनीयो योगः१४२९राजयक्ष्मणि पिप्पलीक्षीरम्१६११
गर्भिण्याः पथ्यापथ्यम्१४२१०राजयक्ष्मणि पिप्पलीवर्धमानकम्१६१५
दुष्प्रजाताचिकित्सिताध्यायः ? ।राजयक्ष्मणि नागबलाप्रयोगः१६२३
दुष्प्रजातायाः सामान्यचिकित्सा१४३३राजयक्ष्मणि मण्डूकपर्णीशुण्टीब्राह्मीमधुकानां प्रयोगाः१६२१०
दुष्प्रजाताव्याधीनां निदानम्१४३४राजयक्ष्मणि आजं रसायनम्१६२१४
दुष्प्रजाताव्याधीनां नामतो निर्देशः१४४३राजयक्ष्मणि महाभयारिष्टः१६३१
दुष्प्रजातारोगेषु त्रैवृत्तस्नेहः१४४८राजयक्ष्मणि इन्द्राणीघृतम्१६३८
बालग्रहचिकित्सताध्यायः ? ।राजयक्ष्मणि लशुनप्रयोगः१६३१०
रेवत्या वरप्राप्तिः१४६३राजयक्ष्मणि द्राक्षासर्पिः, पीलुघृतं च१६४१
रेवत्या विंशतिनामानि१४७१राजयक्ष्मणि दैवव्यपाश्रयचिकित्सा१६४३
रेवतीपूजनफलम्१४८४गुल्मचिकित्साध्यायः ? ।
रेवतीरोषजनिता रोगाः१४८९गुल्मस्य भेदाः१६५३
रेवत्याश्चिकित्सा१४९१गुल्मस्य सामान्या संप्राप्तिः१६५४
पूतनाग्रहोत्पत्तिः१५०५वातगुल्मस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः१६५५
पूतनाया नामानि१५०१२गुल्मानां पूर्वरूपम्१६६१
पूतनाया चिकित्सा१५०१४वातगुल्मस्य लक्षणम्१६६२
मुखमण्डिकाग्रहोत्पत्तिः१५३१पित्तगुल्मस्य लक्षणम्१६६४
मुखमण्डिकायाश्चिकित्सा१५३११कफगुल्मस्य लक्षणम्१६६५
शीतपूतनार्दिते बाले चिकित्सा१५४६सान्निपातिकगुल्मस्य लक्षणम्१६७१
सर्वग्रहाणां सामान्य चिकित्सा१५५३रक्तगुल्मस्य निदानसंप्राप्तिलक्षणानि१६७२
प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ? ।गुल्मस्य साध्यासाध्यविचारः१६८१
प्लीहवृद्धिलक्षणानि१५५११गुल्मस्य चिकित्सासूत्रम्१६८२
प्लीहवृद्धौ सामान्यचिकित्सा१५६४वातगुल्मे दशाङ्गं घृतम्१६८४
प्लीहवृद्धौ आमलकीघृतम्१५६५

५६८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयःपृ.पं.विषयःपृ.पं.
वातगुल्मे षट्पलं घृतम्१६८६मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ? ।
वातगुल्मे शैशुकं घृतम्१६९१मूत्रकृच्छ्रस्य संप्राप्तिः१७७१
गुल्मे संशोधनं१६९३दोषभेदेन मूत्रकृच्छ्रस्य लक्षणानि१७७२
गुल्मे भोजनम्१६९४मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोर्विशेषः१७८८
गुल्मे पिप्पल्यादिवटकाः१६९६मूत्रकृच्छ्रे कतिपययोगाः१७९१
वातगुल्मे हितमन्नपानम्१६९१०मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोश्चिकित्सायां विशेषः१७९११
वातगुल्मे बस्तिः१६९१२सरक्ते मूत्रकृच्छ्रे ऊषकादियोगः१७९१४
वातगुल्मे हरीतकीप्रयोगः१६९१३मूत्रकृच्छ्रेऽन्ये कतिपययोगाः१८०३
कुष्ठचिकित्साध्यायः ? ।शर्कराश्मर्योर्लक्षणं चिकित्सा च१८०१३
कुष्ठपूर्वरूपाणि१७११द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ।
वातपित्तकफसन्निपातोत्तराणां कुष्ठानां लिङ्गानि१७२१व्रणविषये जीवकस्य प्रश्नाः१८२४
दोषविशेषैः कुष्ठविशेषोत्पत्तिः१७२५कश्यपस्योत्तरम्१८२५
कुष्ठेषु साध्यासाध्यविभागः१७२९निजागन्तुभेदेन व्रणस्य द्वैविध्यम्१८३१
कुष्ठानामाश्रयभूता धातवः१७२१०दोषभेदेन व्रणानां लिङ्गानि१८३४
सिध्मस्य लक्षणम्१७२११व्रणानां नवविध उपक्रमः१८४२
विचर्चिकायाः लक्षणम्१७२१२दोषभेदेन व्रणोपक्रमाः१८४४
पामायाः लक्षणम्१७२१२व्रणबन्धनविधिः१८५१
दद्रोः लक्षणम्१७२१२व्रणे कल्कदानम्१८५५
किटिभस्य लक्षणम्१७२१३पच्यमानव्रणलक्षणम्१८६३
कपालस्य लक्षणम्१७२१४पक्वव्रणलक्षणम्१८६३
महारुष्कस्य लक्षणम्१७२१५तत्र चिकित्सा१८६४
मण्डलस्य लक्षणम्१७२१६व्रणे सवर्णकरणो योगः१८७१
विषजस्य लक्षणम्१७२१७व्रणे रोमसंजननो योगः१८७३
पौण्डरीकस्य लक्षणम्१७२१७बालानामष्टौ पिडकाः१८७५
श्वित्रस्य लक्षणम्१७२१७तासां नामानि१८७६
ऋष्यजिह्वस्य लक्षणम्१७२१८शराविका-कच्छपिका-जालिनी-सर्षपिकाऽ-लजीविनतानां लक्षणानि१८७७
शतारुष्कस्य लक्षणम्१७२१९विद्रध्याः लक्षणानि१८७१०
औदुम्बरस्य लक्षणम्१७२१९अरुंषिकायाः लक्षणानि१८७११
काकणस्य लक्षणम्१७२२०पिडकानां चिकित्सासूत्रम्१८९२
चर्मदलस्य लक्षणम्१७२२०अरुंषिकाणां चिकित्सा१८९३
एककुष्ठस्य लक्षणम्१७२२०अरकीलिकाय लक्षणं चिकित्सा च१९०२
विपादिकायाः लक्षणम्१७२२१बालानामागन्तुव्रणचिकित्सा१९१७
कुष्ठेषु दोषविशेषेण चिकित्सा१७२२२बालानां दद्रोर्निदानं चिकित्सा च१९११२

विषयानुक्रमणिका

<p align="right">·५६९</p>
विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
बालानां रात्रौ स्नेहमर्दनोपदेशः१९२१मदात्यये तर्पणम्२०५१
बालानां दुस्सङ्ग्रहजनितव्रणचिकित्सा१९२५मदात्यये मद्यप्रयोगः२०५२
द्विव्रणीयचिकित्सितोपसंहारः१९३५मदात्यये आहारविधिः२०५४
प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? ।मदात्यये विहारः२०६४
प्रतिश्यायस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः१९३१०मदात्यये वर्ज्यानि२०६६
प्रतिश्यायस्य सामान्यलक्षणम्१९४१मदात्यये कतिपययोगाः२०६१०
प्रतिश्यायस्य भेदाः१९४६फक्कचिकित्साध्यायः ? ।
प्रतिश्यायस्य वातिकादिभेदेन लक्षणानि१९४७फक्कलक्षणम्२०८१
प्रतिश्यायस्य चिकित्सा१९५२फक्कनिदानम्२०८३
उरोघातचिकित्सिताध्यायः ? ।फक्कभेदाः, तेषां लक्षणानि च२०८८
उरोघातस्य निदानम्१९७३फक्कचिकित्सा२१०१
उरोघातस्य चिकित्सा१९७५धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ।
शोथचिकित्सिताध्यायः ? ।धात्रीचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः२१२३
शोथस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः१९८३कश्यपस्योत्तरम्२१२५
शोथस्य वातिकादिभेदेन लक्षणानि१९८६अग्निभेदेन धात्र्याश्चिकित्सा२१२१०
कृमिचिकित्सिताध्यायः ? ।मेदस्विन्याः धात्र्याश्चिकित्सा२१३१०
बालानां कृमिरोगे विडङ्गघृतम्२००३धात्रीरोगे बलातैलम्२१३१४
बालानां कृमिरोगे पथ्यम्२०११बलातैलातिदेशेनान्येषां तैलानां विधानम्२१५९
बालानां कृमिरोगे धात्र्या औषधादिसेवनं कर्तव्यं२०१३षष्ठीग्रहस्य निदानं चिकित्सा च२१७१
बालानां कृमिरोगे गुदे कटुतैलप्रयोगः२०१७धात्रीणामजीर्णचिकित्सा२१७१०
मदात्ययचिकित्साध्यायः ? ।कौमारभृत्यस्य भिषजः प्रशंसा२१७१६
मद्योत्थरोगभेदाः२०२३मातुः प्रशंसा२१८८
पानात्ययस्य लक्षणम्२०२४सिद्धिस्थानम् ७ ।
पानविभ्रमस्य लक्षणम्२०२६राजपुत्रीया सिद्धिः १ ।
पानापक्रमस्य लक्षणम्२०२६बस्तिकर्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः२१९३
मद्यगुणाः२०२७कश्यपस्योत्तरम्२१९९
अतिसेवितमद्यदोषाः२०३५बालस्य कदा बस्तिकर्म कार्यमित्यत्र नानामुनीनां मतानि२२०१
मदात्ययस्य सामान्यलक्षणम्२०३९बस्तिदानविधिः२२१५
मदात्ययस्य वाताजादिभेदेन लक्षणानि२०४१एकान्तरं बस्तिविधानम्२२२१
मदात्यये लङ्घनम्२०४५निरूहबस्तिगुणाः२२२५

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
निरूहयोग्या नरा:२२३७दत्तनस्यस्य हित आहारो विहारश्च२४२१
बस्तिकर्मप्रशंसा२२३९क्रियासिद्धिः ५ ।
त्रिलक्षणा सिद्धिः २ ।पञ्चकर्मणि अजीर्णमैथुनयानोच्चैर्भाष्यादिवा-
पञ्चकर्मसु त्रिविधयोगलक्षणान्यवेक्षेत२२४१२स्वापातिच-ङ्क्रमणस्थानासात्म्यादिव-
विशोधनं कदा देयम्२२५१र्जनोपदेशः२४२११
विरेचनगुणा:२२५४अजीर्णादिसेवनजा व्यापदस्तासां चिकित्सा
दुर्दान्तलक्षणम्२२५६च२४३१
अतिवान्तलक्षणम्२२५९वर्जिता बस्तयः२४३५
सम्यग्विरिक्तलक्षणम्२२६१बस्तिप्रणेतृदोषजा व्यापदस्तासां चिकित्सा
दुर्विरिक्तस्य लक्षणम्२२६५च२४३६
नस्यभेदा:२२६७बस्तिकर्मीया सिद्धिः ६ ।
नस्यस्य समहीनातियोगलक्षणानि२२६१०बस्तिकर्मणोऽयोगातियोगलक्षणं२४५६
स्वनुवासितलक्षणम्२२७३तच्चिकित्सा च
दुरुनुवासितलक्षणम्२२७४भृशमुत्पीडितबस्तेर्व्यापदस्तच्चिकित्सा च२४६३
सम्यङ्निरूढलिङ्गानि२२७६पञ्चकर्मीया सिद्धिः ७ ।
दुर्निरूढलक्षणम्२२८१पञ्चकर्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः२४८३
अतिनिरूढलक्षणम्२२८३वमनानर्हा रोगाः२४८४
कर्मबस्तिलक्षणम्२२८४वमनार्हा रोगा रोगिणश्च२४८७
वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ।विरेचनार्हा रोगाः२४९३
वमनौषधपानविधि:२२८९अविरेच्याः२४९६
वमनस्य वेगसंख्यया हीनमध्योत्तमविभाग:२२९४शिरोविरेचनार्हा रोगाः२५०१
वमनान्तरं कर्तव्य उपचार:२२९५स्नेहननस्ययोग्याः२५०३
बालरोगे शिशुधात्र्योरुभयोरपि संशोधनोपदेश:२३११अनुवासनार्हाः२५०७
विरेचनौषधदानविधि:२३२६अनुवासनायोग्याः२५१२
उत्तमवमनविरेचनयोर्लक्षणम्२३३१निरूहणार्हाः२५१३
वमनविरेचनयोर्व्यापदस्तच्चिकित्सा च२३४३अनिरूह्याः२५१४
नस्तःकर्मीया सिद्धिः ४ ।निरूहानुवासनयोः प्रमाणम्२५१६
नस्यभेदा:२३८५लङ्घनीया रोगाः२५२१
नस्यदानविधि:२३८६बृंहणीया रोगाः२५२२
प्रधमनावपीडनयोर्विधि:२३८१३मङ्गलसिद्धिः ८ ।
नस्यदाने परिहार्याणि२३९३गृहस्थ्यैर्मङ्गलान्येव सेव्यानि२५२८
परिहार्याण्यपरिहरतो व्यापदस्तासां२३९५अनुवासननिरूहयोर्लक्षणम्२५२१०
चिकित्सा चअनुवासनार्थं शैशुकः स्नेहः२५३१

विषयानुक्रमणिका

५७१

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
कतिपयनिरूहयोगाः२५३७धूपाभिमन्त्रणम्२६०१२
कल्पस्थानम् ८ ।लशुनकल्पाध्यायः ५ ।
धूपकल्पाध्यायः ४ ।लशुनविषये जीवकस्य प्रश्नाः२६२३
कतिपयधूपयोगाः२५५१कश्यपस्योत्तरम्२६२७
कौमारो धूपः२५५५लशुनस्य प्रागुत्पत्तिः२६२८
अपस्मारग्रहापहो धूपः२५५८लशुनस्य रसविपाकगुणाः२६३१
माहेश्वरः धूपः२५५१०लशुनप्रयोगानर्हाः२६४१२
आग्नेयः धूपः२५६१लशुनप्रयोगाईः कालः२६५६
भद्रङ्करः धूपः२५६३लशुनप्रयोगविधिः२६५७
रक्षोघ्नः धूपः२५६६लशुनप्रयोगे वर्ज्यानि२६६१४
प्रेतनिवारणः धूपः२५६८लशुनोपद्रवप्रतीकारः२६७१६
दशाङ्ग धूपः२५६११कतिपयलशुनकल्पाः२७०२
मोहः धूपः२५६१४गन्धमहन्नाम लशुनकल्पः२७१७
वारुणः धूपः२५६१६कटुतैलकल्पाध्यायः ६ ।
चतुरङ्गिकः धूपः२५७१प्लीहरोगे कटुतैलकल्पः२७३३
नन्दकः धूपः२५७३प्लीहरोगे हितो विहारः२७५१
कर्णधूपः२५७५प्लीहोदरहराः कतिपयोगाः२७५३
श्रीधूपः२५७७षट्कल्पाध्यायः ७ ।
ग्रहघ्नधूपः२५७९बालानामक्षिरोगोपशमनविषये जीवकस्य प्रश्नाः२७६१
पुण्यो धूपः२५७११कश्यपस्योत्तरम्२७६३
शिशुकः धूपः२५७१३अक्षिरोगे चक्षुष्याकल्पः२७६४
ब्राह्मधूपः२५८१पुष्पक-रोचना-रसाञ्जन-कतकफलानां कल्पाः२७७११
प्रतिधूपाः२५८३चक्षुष्या-रोचना-पुष्पक-रसाञ्जन-कतकफलानां गुणाः२७८४
अरिष्टो धूपः२५८७पञ्चेन्द्रियविवर्धनं पाञ्चभौतिकं तैलं२७८११
अपस्मारनाशनो धूपः२५८९शतपुष्पाशतावरीकल्पाध्यायः ८ ।
सर्वरोगहरः धूपः२५८१०शतपुष्पाशतावरीकल्पविषये जीवकस्य प्रश्नाः२८०३
गणधूपः२५९१कश्यपस्योत्तरम्२८०४
स्वस्तिको धूपः२५९२शतपुष्पागुणाः२८०५
ग्रहनाशनाः पञ्च धूपाः२५९३शतावरीगुणाः२८०७
गृहधूपः२५९५शतपुष्पाशतावरीकल्पार्हाः२८०९
धूपानामुपयोगः२५९६शतपुष्पाकल्पाः२८०१३
धूपनिर्माणविधिः२५९८
धूपभेदाः२६०१
धूपानां प्रागुत्पत्तिः२६०३

५७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
शतावरीकल्पाः२८२४विशेषकल्पाध्यायः ११ ।
रेवतीकल्पाध्यायः ९ ।सन्निपातज्वरविषये जीवकस्य प्रश्नाः३१९३
रेवत्याः प्रागुत्पत्तिः२८२८कश्यपस्योत्तरम्३२०१
कथंभूतां स्त्रियं जातहारिणी सज्जते२८५११सन्निपातज्वरहेतवः३२०२
कथंभूतानमनुष्याञ्जातहारिण्याविशति२८७१सन्निपातज्वरस्य दुश्चिकित्स्यत्वम्३२०८
जातहारिण्याविष्ठायाः स्त्रिया लक्षणानि२८९४सन्निपातज्वरस्य पूर्वरूपाणि३२१३
जातहारिण्या भेदास्तेषां लक्षणानि च२८९११सन्निपातज्वरस्य भेदास्तेषां लक्षणानि च३२१४
कस्यामवस्थायां जातहारिण्याविशति२९४१सन्निपातज्वरे शीतलघृतयोर्निषेधः३२७१
याः स्त्रिय आविश्य जातहारिण्यन्यां-<br>स्त्रियं प्रविशति तासां वर्णनम्२९४५सन्निपातज्वरे को दोष आदावुपक्रम्य इत्यत्र<br>विचारः३२७८
तिरश्च्या जातहारिण्या वर्णनम्२९६१संनिपातज्वरे क्षौद्रनिषेधः३२८७
जातहारिणीग्रस्तस्य शिशो रूपाणि२९९३संनिपातज्वरे प्रारम्भोपक्रमाः३२८११
प्रजावरणबन्धविधिः३००२संनिपातज्वरे लङ्घनम्३२९१
भोजनकल्पाध्यायः १० ।संनिपातज्वरे स्वेदनम्३२९७
भोजनविषये जीवकस्य प्रश्नाः३०४१संनिपातज्वरे तृष्णाप्रशमनाय पानीयम्३३१२
बुभुक्षितपिपासितयोर्लक्षणानि तत्रोपचारः३०५१संनिपातज्वरे पेयायूषरसादिविधानम्३३१८
तृष्णाया निदानम्३०५१३संनिपातज्वरे विरेचनम्३३३१
अपतर्पितस्य लिङ्गानि३०६१संनिपातज्वरे कषाययोगाः३३३३
मन्दाशितस्य लिङ्गानि३०६३संनिपातज्वरे उरःक्षतोपद्रवलक्षणम्३३५१
अत्यशितमन्दाशितयोश्चिकित्सा३०६५संनिपातज्वरे पित्तप्रकोपोपचिकित्सा३३५५
सम्यग्भुक्तवतो लक्षणानि३०६७संनिपातज्वरे कटुकं सर्पिः३३५९
भोजनपानकालौ३०६११निवृत्तसन्निपातो यथा रक्ष्यः३३६५
भोज्यानुपूर्वीवर्णनम्३०६१२सन्निपातस्यासाध्यलक्षणम्३३७१
येषां शीतं जलं पथ्यम्३०८११निवृत्तसन्निपातस्य हित आहारो विहारश्च३३७३
येषु देशेषु यद्यत् सात्म्यं तद्देशवासिनस्तैरेव<br>भोज्यैरुपक्रम्याः३०९५सन्निपातज्वरे वर्जनीयानि३३७११
पेयाया गुणाः३१०१४सन्निपातज्वरे पथ्यान्यन्नपानानि३३८१
आमाशयवर्णनम्३११५संहिताकल्पाध्यायः १२ ।
येषां मांसरसो हितः, येषां चाहितः३११७काश्यपसंहितायाः स्थानाध्यायनिरूपणम्३३९१
तक्रगुणाः३१११५एतत्तन्त्राध्ययनफलम्३३९१२
मण्डयूषयोर्गुणाः३१२३रोगाणां प्रागुत्पत्तिः३४०१
यवागूगुणाः३१३११अस्य तन्त्रस्य प्रतिसंस्कारेतिहासः३४०७
क्षीरगुणाः३१४१खिलस्थानम् ९ ।
इक्षुरसगुणाः३१७५विषमज्वरनिर्देशीयाध्यायः १ ।
विषमज्वरविषये जीवकस्य प्रश्नाः३४२३

विषयानुक्रमणिका

५७३

विषयपृ.पविषयपृ.प
कश्यपस्योत्तरम्३४२९ज्वरे विपरीतप्रकृतौ सति सुखसाध्यत्वम्३५९३
समविषमज्वयोर्लक्षणम्३४३१केषां शमनं केषां च शोधनं हितम्३५९६
विषमज्वरस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः३४३४शमनशोधनयोर्लक्षणम्३५९१०
विषमज्वरलक्षणम्३४४१शमनीयानि द्रव्याणि३६०३
विषमज्वरस्य पुनः पुनरभ्यागमने हेतुः३४४५शोधनानि३६०६
सततकान्येद्युष्कतृतीयकचतुर्थकानां लक्षणानि३४५६शमनशोधनानि द्रव्याणि३६०९
चतुर्थकज्वरे दैवव्यपाश्रयचिकित्सा३४६७दोषोपशमलक्षणम्३६०१३
पञ्चमादिदिने विषमज्वरानभ्यागमने हेतुः३४८१संक्षेपतश्चिकित्सोपदेशः३६१२
मोक्षकाले ज्वराभिवर्धने हेतुः३४८५चिकित्सा कथं विधेया३६१४
ज्वरविसृष्टौ हेतुः३४९२आर्षप्रयोगास्तथैव प्रयोक्तव्याः, तत्राविज्ञाय प्रक्षेपापचयौ न विधेयौ३६१७
शीतपूर्वदाहपूर्वज्वरयोर्हेतुः३४९३वयःशरीराद्यवेक्ष्य मात्रा विधेया३६२१
ज्वरे शिरोभितापे पादशैत्ये च हेतुः३५०१०भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ।
ज्वरे उष्णोपक्रमे हेतुः३५११भैषज्योपक्रमादिविषये जीवकस्य प्रश्नाः३६२६
जीर्णविषमज्वरचिकित्सा३५११०कश्यपस्योत्तरम्३६३१८
विषमज्वरे दोषाधिक्येन चिकित्साविशेषः३५२२रोगभेदाः३६४४
विषमज्वरे सामान्यचिकित्सा३५२६शारीरव्याधिहेतवः३६४७
विशेषनिर्देशीयाध्यायः २ ।मानसव्याधिहेतवः३६४८
सर्वज्वरचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः३५४३शारीरमानसरोगयोः प्रतीकारः३६५१
कश्यपस्योत्तरम्३५४६निजागन्तुभेदेन रोगद्वैविध्यम्३६५३
अवस्थायां प्रयुक्तभेषजस्य गुणकारित्वम्३५४८औषधभेदाः, तल्लक्षणं च३६५८
कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम्३५४९कषायशब्दनिरुक्तिः३६६३
कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम्३५४१२कीदृशं भेषजं राजार्हं भवति३६६७
ज्वरे शिरोविरेचनम्३५५१सप्तविधकषायभेदास्तेषां लक्षणानि च३६६११
ज्वरे दोषबलाबलभेदेन चिकित्साभेदः३५५३दशौषधकालाः३६७९
आमज्वरस्य लिङ्गानि३५५८कस्यामवस्थायां केषु च भेषजं न प्रयोज्यम्३६९५
निरामज्वरस्य लिङ्गानि३५५११ऊनद्वादशवर्षाणामेकान्तेन भेषजदाननिषेधः३६९१०
बहिर्मार्गगतज्वरलक्षणं तत्र चिकित्सा च३५६१कीदृशं भेषजं न योज्यम्३७०२
दोषदुर्बलौषधदुर्बललक्षणानि चिकित्सा च३५६४कीदृशं भेषजमवचार्यम्३७०५
ज्वरापहो लंघनादिक्रमः३५७७औषधदानविधिः३७०९
ज्वरे कषायः कदा देयः३५७९पीतौषधेन वर्ज्यानि३७०१२
ज्वरे संशमनम्३५८४जीर्यमाणभेषजलिङ्गानि३७११
ज्वरे सर्पिः३५८६अन्नकालस्य लक्षणम्३७१३
ज्वरे विरेचनम्३५८१०त्रिविधवयोभेदाः३७१५
ज्वरे निरूहानुवासनौ३५९१

५७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पविषयपृ.प
वयोभेदेन भेषजमात्राभेदः३७२१ओदनदोषाः३८४१२
भेषजमात्रानिर्णयेऽग्न्यृतुसात्म्यादीन्यप्यवेक्षेत३७४१४यवागूसाधनपरिभाषा३८५१
योगज्ञस्य भिषजः प्रशंसा३७५३यवागूदोषाः३८५४
तीक्ष्णमृदुमध्यौषधयोग्या नराः३७६४विविधरोगेषु यवागूविधानम्३८५८
यूषनिर्देशीयाध्यायः ४ ।भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५ ।
आहारप्रशंसा३७७४आहारगुणाः३८७९
आहारभेदाः३७८३भोजनविधिः३८७१२
आहारगुणः३७८८आरोग्यलिङ्गानि३८८५
यूषगुणाः३७९५अन्नकालाः३८९१
यूषनिरुक्तिः३७९९भोजनविधिनोपभुञ्जतो गुणाः३८९२
यूषयवाग्वोर्लक्षणम्३७९११मधुरादिरससात्म्यताया गुणा दोषाश्च३९२८
यूषभेदाः३७९१३घृतक्षीरतैलमांससात्म्यताया गुणाः३९३३
यूषरागखाडवपानकानां लक्षणम्३८११भोजनोपकल्पना३९३९
वातरोगे हिता यूषाः३८१३असम्यक्परिपाकहेतवः३९४६
क्वाथकल्कयोः पर्यायाः३८१८समशनस्य लक्षणम्३९५१
मुद्गयूषः३८११०अध्यशनस्य लक्षणम्३९५१
विरसिकायूषः३८११२प्रमृताशनस्य लक्षणम्३९५२
रोचनयूषः३८११३विषमाशनस्य लक्षणम्३९५२
दाडिमयूषः३८११३विरुद्धाशनस्य लक्षणम्३९५३
धात्रीयूषः३८११४अजीर्णाशनस्य लक्षणम्३९५३
चित्रकयूषः३८११५अत्यशनस्य लक्षणम्३९५४
मूलकयूषः३८११७चतुर्विंशतिभोजनोपकल्पनाः केषु योज्याः३९५६
पञ्चकोलयूषः३८२२रसदोषविभागीयाध्यायः ६ ।
धान्ययूषः३८२४रसदोषविभागज्ञस्य भिषजः प्रशंसा३९६१
कुलत्थयूषः३८२८दोषभेदतो व्याधीनां द्विषष्ठिधा कल्पना३९६३
फलयूषः३८२१०रसानां त्रिषष्ठिधा कल्पना३९८३
पुष्पयूषः३८२१२दोषभेदानवेक्ष्य रसा योज्याः३९९३
पत्रयूषः३८३१कफजे व्याधौ कटुतिक्तकषायाः क्रमशो योज्याः४००३
वल्कलयूषः३८३३पित्तजे व्याधौ तिक्तस्वादुकषायाः क्रमशो योज्याः४००८
पल्लवयूषः३८३५वातजे व्याधौ लवणाम्लकषायाः क्रमशो योज्याः४००१२
काम्बलिकयूषः३८३१०
महायूषः३८३१४
मूलकयूषः३८४४
ओदनगुणाः३८४११