कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
५५४ कथासरित्सागर
५५४ कथासरित्सागर तदा विद्याधरगुरोर्विद्यां प्राप्य भविष्यथ। पुनर्विद्याधरो युक्तो शापमुक्तौ स्वबन्धुभिः॥२८६॥ एवं तैर्मुनिभिः शप्तौ जातावावामुभाविह। वियोगोऽत्र यथाभूत्तत्सर्वं विदितं च नः॥२८७॥ इदानीं पद्मदूतोश्च स्ववधूसिद्धिप्रभावतः। यक्षपतेः पुरं गत्वा प्राप्तोऽस्य चानुजो मया॥२८८॥ तत्रैव च गुरोः प्राप्य विद्यां प्रज्ञप्तिकोदिकात्। सद्यो विद्याधरीभूय यथ क्षिप्रमिहागता॥२८९॥ इत्युक्त्वा पितरौ च तौ प्रियतमां तां चारुमूर्जां भूपतेः। सद्यः शापतमोविमोक्षमुदितो विद्याविधेयैर्निजः॥ तैस्तैः सभ्यमभूद् विचित्रचरितः सोऽशोकदत्तस्तदा। यन्ते सद्यदि प्रबुद्धमनसोऽजायन्त विद्याधराः॥२९०॥ ततस्तमामन्त्र्य नृपं स साकं मातापितृभ्यां दयिताद्वयेन। उत्पत्य धन्यो निजचक्रवर्तिधाम द्युमार्गेण जयी जगाम॥२९१॥ राज्ञाश्लेष्य समाज्ञां प्राप्य च तस्मादशोकवेग इति। नाम स बिभ्रत् सोऽपि च तद्भ्राता विजयवेग इति॥२९२॥ विद्याधरवरतरुणौ स्वजनानुगतावुभौ निजनिवासम्। गोविन्दकूटसञ्ज्ञकमचलवरं भ्रातरौ ययतुः॥२९३॥ सोऽप्याश्चर्यवशः प्रतापकूटो वाराणसीभूपतिः स्वस्मिन् दैवकृते द्वितीयकलशन्यस्तैकहेमाम्बुजः। तद्धंसैरपरे सुवर्णकमलरम्यस्थितय्यम्बक- स्तात्सम्बन्धमहत्तया प्रमुदितो मेने कृतार्थं कुलम्॥२९४॥ एवं दिव्या कारणानावतीर्णा जायन्तेऽस्मिञ्जन्तवो जीवलोके। सत्त्वोत्साहो स्वोचितौ ते वभागा दुष्प्रापामप्यर्थसिद्धिं लभन्ते॥२९५॥ तत्सत्त्वसागर ! भवामपि कोऽपि जाने देवांश एव भविता च यथेष्टसिद्धिः। प्रायः क्रियासु महतामपि दुश्चरासु घोरसाहता कथयति प्रकृतेर्विशेषम्॥२९६॥ सापि त्वदीप्सिता ननु दिव्या राजारमजा कनकरेखा। सामान्यथा हि वाञ्छति कनकपुरीदर्शिनं वरं द्विपठिम्। २९७॥
पंचम लम्बक ५५५
पंचम लम्बक ५५५ उस समय विद्याधरों के गुरु से विद्या प्राप्त करके तुम दोनों शाप से मुक्त होकर पुनः विद्याधर बनोगे॥२८६॥ इस प्रकार उन मुनियों से होकर शापित हम दोनों यहाँ मनुष्य-योनि में उत्पन्न हुए। यहाँ हम सातों का कैसे वियोग हुआ यह सब आपको ज्ञात ही है॥२८७॥ इस समय स्वर्ण-कमल लाने के कारण गाय के प्रभाव से शंखराज के नगर में जाकर मैंने इस छोटे भाई को प्राप्त किया॥२८८॥ और वहीं गुरु प्रभातिकौशिक से विद्याएं प्राप्त करके पुनः विद्याधर होकर शीघ्र यहाँ आये ॥२८९॥ शाप-रूपी अन्धकार के दूर हो जाने से प्रसन्न मनोरथदत्त ने इस प्रकार माता-पिता का तथा अपनी राजकुमारी पत्नी का अपनी विद्या की विशेषता से विद्या-प्रदान करके सभी को विचित्र चरित्र-वाला विद्याधर बना दिया ॥२ ॥ तब वह राजा प्रतापमुकुट से मिलकर माता-पिता दोनों प्रियतमाओं और भाई के साथ वह भव्य मनोरथदत्त आकाश-मार्ग से उड़कर अपने चक्रवर्ती स्थान को गया ॥२९१॥ वहाँ जाकर और वहाँ से आज्ञा प्राप्त करके उसने अपना नाम मनोजवेग और छोटे भाई का नाम विजयवेग रखा ॥२९२॥ वे दोनों सुन्दर विद्याधर तरुण भाई, अपने बन्धु-बान्धवों से मिलकर गोविन्दकूट नामक अपने निवासस्थान को गये ॥२९३॥ अपने देव-मन्दिर में दूसरे कमल में भी एक स्वर्ग कमल रखकर और अशोकदत्त द्वारा प्रदत्त अन्य स्वर्ण-कमलों से शिवजी की पूजा करके अपनी कन्या के महान् सम्बन्ध से वह काशिराज प्रतापमुकुट भी अत्यन्त प्रसन्न और पवित्र हुआ॥२९४॥ इसी प्रकार दिव्य व्यक्ति किसी प्रकार शाप आदि किन्हीं कारणों से जीवलोक में जन्म लेते हैं और अपने स्वरूप के अनुसार बल और उत्साह धारण करते हुए दुष्प्राप्य कार्यों में भी सफलता प्राप्त करते हैं॥२९५॥ इसलिए हे रूप के समुद्र ! मैं समझता हूँ कि तुम भी अपने अपराध सिद्ध अथवा किसी देवता के अंश हो। उच्च व्यक्तियों का कठिन-से-कठिन कार्यों में उत्साहित होना उनके स्वभाव की महत्ता को प्रकट करता है ॥२९६॥ वह तुम्हारी प्यारी राजकुमारी भी अवश्य दिव्य रही है। नहीं तो वह कन्या कनकपुरी देखनेवाले पति को ही क्यों चाहती? ॥२९७॥
५५२ कथासरित्सागर
५५२ कथासरित्सागर तदा श्मशाने यामिन्यां राक्षसत्व गतस्य मे। अभवत्कीदृशो वत्स वृत्तान्तो वर्ण्यतामिति॥२७२॥ छतो विजयदत्तस्त यमाचे तात! चापलात्। प्रस्फोटितचितादीप्तकपालोऽह विधेषंघात्॥२७३॥ मुखप्रविष्टया सद्यस्तद्दक्षाशष्टया तदा। रक्षोभूतस्त्वया तावद्दृष्टो मायाविमोहित ॥२७४॥ 'कपालस्फोट' इत्येव नाम कृत्वा हि राक्षसैः। ततोऽन्यैर्बहुमाहूतस्तन्मध्ये मिश्रितोऽभवम्॥२७५॥ तैश्च नीतो निजस्यास्मि पाश्वं रक्षपते क्रमात्। सोऽपि दृष्ट्वैव मां प्रीत सेनापत्य न्ययोजयत्॥२७६॥ तत कदाचिद् गन्धर्वनिभियोक्तु मदन सः। गतो रक्षपतिस्तत्र सग्रामे निहतोऽरिभिः॥२७७॥ तथैव प्रतिपन्न च तद्भूत्यम॑म शासनम्। ततोऽहं रक्षसां राज्यमकार्ष तत्पुरे स्थित ॥२७८॥ तत्राकस्माच्च युष्माञ्जन्हेतो प्राप्तस्य दश्वमात्। आयस्याशोकदत्तस्य प्रशान्ता सा दशा मम॥२७९॥ अनन्तर यथास्माभि शापमोक्षवशाद्निजाः। विद्या प्राप्तास्तथाऽयो च कृत्स्नमावेदयिष्यति॥२८०॥ एव विजयदत्तेन तेन तत्र निवेदिते। अशोकदत्त स तथा तथामूलादवर्णयत्॥२८१॥ पुरा विद्याधरो सन्तौ गगनाद् गाङ्गयाथमे। भावां स्नान्ती¹ रपश्याव गङ्गायां मुनिकन्यका ॥२८२॥ तुल्याभिलाषास्ताश्चान वाञ्छन्तौ सहसा रहः। बुद्ध्वा तद्वन्धुभि क्रोधाच्छप्तौ स्वो दिव्यवृष्टिभि ॥२८३॥ पापाचारौ प्रजापर्वा मर्त्ययोनौ युवामुभौ। तथापि विप्रयोगाच्च विचित्रो वो भविष्यति॥२८४॥ मानुपागोचर यदा विप्रकृष्टेऽप्युपागतम्। एक दृष्ट्वा द्वितीयो वो यदा प्रज्ञानमाप्स्यति॥२८५॥ १ स्नानमाचरन्तीः।
पञ्चम लम्बक ५५३
पञ्चम लम्बक ५५३ 'बेटा उस समय श्मशान में रात के समय जब तू राक्षस बन गया था तब क्या हुआ बताओ' ॥२७२॥ तब विजयदत्त ने कहा—'पिताजी मैंने बाल-स्वभाव-सुलभ चंचलता से चिता में जलते हुए कपाल को दैववश फोड़ डाला ॥२७३॥ उससे निकली हुई चर्बी की धारा जब मेरे मुख में पड़ी, तब माया से मूढ़ मैं उसी समय राक्षस बन गया ॥२७४॥ तदनन्तर दूसरे राक्षसों ने मेरा नाम कपालस्फोट रखकर अपनी मंडली में बुलाया और मैं भी उसमें सम्मिलित हो गया ॥२७५॥ वे लोग मुझे अपने साथ राक्षसों के राजा के समीप ले गये। उसने मुझे देखकर प्रसन्नता प्रकट की और मुझे अपना सेनापति बना दिया ॥२७६॥ उसके पश्चात् एक बार राक्षसराज ने घमंड में आकर गन्धर्वों पर चढ़ाई कर दी और वह स्वयं युद्ध में मारा गया ॥२७७॥ तब से उसके सेवकों ने मेरा शासन स्वीकार किया और मैंने उसके नगर में रहकर राक्षसों पर राज्य किया ॥२७८॥ वहाँ पर अकस्मात् सोन के कमल लाने के लिए जाय हुए आर्य (बड़े भाई) अशोकदत्त के दर्शन से वह मेरी राक्षसी दशा समाप्त हो गई ॥२७९॥ उसके पश्चात् शाप से मोक्ष होने पर हमलोगों ने अपनी विद्याएँ जैसे प्राप्त कीं यह सब आर्य अशोकदत्त आपको सुनावेंगे' ॥२८०॥ विजयदत्त के इस प्रकार कहने पर अशोकदत्त ने सारी कथा प्रारम्भ से सुनाई —॥२८१॥ पूर्वकाल में हम दोनो विद्याधर थे। उस समय हम दोनों ने गालव मुनि के आश्रम में गंगा स्नान करती हुई मुनि-कन्याओं को देखा ॥२८२॥ समान अभिलाषावाली उन कन्याओं को चाहते हुए हम लोग एकान्त स्थान ढूँढ़ने लगे। दिव्य दृष्टिवाले हमारे गन्धुओ ने इस रहस्य को जानकर हमें शाप दिया ॥२८३॥ 'तुम दोनों पापाचारी मनुष्य-योनि में उत्पन्न होओ। उस योनि में भी तुम दोनो का विचित्र वियोग होगा ॥२८४॥ मनुष्यों से अगम्य दूर देश में एक-दूसरे को देखकर अपने तत्त्व को जानोगे ॥२८५॥
५५४ कथासरित्सागरे
५५४ कथासरित्सागरे तदा विद्याधरगुरोर्विद्यां प्राप्य भविष्यथ । पुनर्विद्याधरौ युक्तौ शापमुक्तौ स्वबन्धुभिः ॥२८६॥ एव तैर्मुनिभिः शाप्तौ जातावावामुभाविह । वियोगोऽत्र मयाभूतस्तत्सर्वं विदितं च वः ॥२८७॥ इदानीं पश्चहेतोश्च स्वभूसिद्धिप्रभावतः । रक्षःपतेः पुरं गत्वा प्राप्तोऽय सानुजो मया ॥२८८॥ तत्रैव च गुरोः प्राप्य विद्याः प्रज्ञप्तिकौशिकात् । सद्यो विद्याधरीभूय वय क्षिप्रमिहागताः ॥२८९॥ इत्युक्त्वा पितरौ च तौ प्रियतमां तां चात्मजां भूपतेः । सद्यः शापसमोविमोक्षमुदितो विद्याविशैर्निजैः ॥ तैस्तैः सम्भ्रमजद् विचित्रचरितः सोऽशोकदत्तस्तदा । येनते सपदि प्रबुद्धमनसोऽजायन्त विद्याधराः ॥२९०॥ ततस्तमामन्त्र्य नृपं स सार्द्धं मातापितृभ्यां दयिताद्वयेन । उत्पत्य धन्यो निजचक्रवर्त्तिधाम द्युमार्गेण जवी जगाम ॥२९१॥ तत्रावलोक्य तमाज्ञां प्राप्य च तस्मादशोकवेग इति । माम् स बिभ्रत् सोऽपि च सद्भ्राता विजयवेग इति ॥२९२॥ विद्याधरवरतरुणौ स्वजनानुगतावुभौ निजनिवासम् । गोविन्दकूटसंज्ञकमचलवरं भ्रातरौ ययतुः ॥२९३॥ सोऽप्यादश्चर्यवशाः प्रतापमुकुटो वाराणसीभूपतिः स्वस्मिन् ददृशुस्त द्वितीयकलशम्यस्तैर्महेभाम्ययुजः । तद्वर्तंग्परे सुवर्णकमलरम्याश्चित्सम्भ्रम्बक- स्तत्सम्बन्धमहत्तया प्रमुदितो मने कृतार्थं कुलम् ॥२९४॥ एव दिव्या कारमनावतीर्णा जायन्तेऽस्मिञ्जन्तवो जीवलोक । गत्त्वाऽवगाहो स्वोचितीं च दद्यामा बुध्यात्मप्यधमिरित भ्रमन्ते ॥२९५॥ तत्तपस्यसागर ! भवानपि कोऽपि जाने देवादा एव भविता च ययत्नसिद्धिः । प्रायः श्रियाम् महतामपि दुष्टरगणु मोग्माहृताः क्षययन्ति प्रशस्तशेषेवम् ॥२९६॥ गापि स्वस्त्रीजिता मनु श्रिया राजाम्रजा कनकरखा । धामाय्या द्वि वाञ्छन्ति कनधपुरेण निन कथं द्विपत्तिम् । २९७॥
पंचम लम्बक ५५५
पंचम लम्बक ५५५ उस समय विद्याधरों के गुरु से विद्या प्राप्त करके तुम दोनों शाप से मुक्त होकर पुनः विद्याधर बनोगे॥२८६॥ इस प्रकार उन मुनियों से होकर शापित हम दोनों यहाँ मनुष्य-योनि में उत्पन्न हुए। यहाँ हम दोनों का जैसे वियोग हुआ यह सब आपको ज्ञात ही है॥२८७॥ इस समय स्वर्ण-कमल लाने के कारण सास के प्रभाव से राक्षसराज के नगर में जाकर मैंने इस छोटे भाई को प्राप्त किया॥२८८॥ और वहीं गुरु प्रज्ञप्तिकौशिक से विद्याएं प्राप्त करके पुनः विद्याधर होकर शीघ्र यहाँ आये॥२८९॥ शाप-रूपी अन्धकार के दूर हो जाने से प्रसन्न अशोकदत्त ने इस प्रकार माता-पिता को तथा अपनी राजकुमारी पत्नी को अपनी विद्या की विशेषता से विद्या-प्रदान करके सभी को विचित्र चरित्र-वाला विद्याधर बना दिया॥२९०॥ तब वह राजा प्रतापमुकुट से मिलकर माता-पिता दोनों प्रियतमाओं और भाई के साथ वह धन्य अशोकदत्त आकाश-मार्ग से उड़कर अपने चक्रवर्ती स्थान को गया॥२९१॥ वहाँ जाकर और वहाँ से आज्ञा प्राप्त करके उसने अपना नाम जयाग्रवेग और छोटे भाई का नाम विजयवेग रखा ॥२९२॥ वे दोनों सुन्दर विद्याधर, सदन भाई, अपने बन्धु-बान्धवों से मिलकर गोविन्दकूट नामक अपने निवासस्थान को गये॥२९३॥ अपने देव-मन्दिर में दूसरे कलश में भी एक स्वर्ण-कमल रखकर और अशोकदत्त द्वारा प्रदत्त अन्य स्वर्ण-कमलों से शिवजी की पूजा करके अपनी कन्या के महान् सम्बन्ध से वह काशिराज प्रतापमुकुट भी अत्यन्त प्रसन्न और चकित हुआ॥२९४॥ इसी प्रकार दिव्य व्यक्ति किसी प्रकार शाप आदि किन्हीं कारणों से जीवलोक में जन्म लेते हैं और अपने स्वरूप के अनुरूप बल और उत्साह धारण करते हुए दुष्प्राप्य कार्यों में भी सफलता प्राप्त करते हैं॥२९५॥ इसलिए हे बल के समुद्र ! मैं समझता हूँ कि तुम भी अपने मनोरथ सिद्ध करनेवाले किसी देवता के अंश हो। उच्च व्यक्तियों का कठिन-से-कठिन कार्यों में उत्साहित होना उनके स्वभाव की महत्ता को प्रकट करता है॥२९६॥ यह तुम्हारी प्यारी राजकुमारी भी अवश्य दिव्य स्त्री है। नहीं तो वह कन्या कनकपुरी देखनेवाले पति को ही क्यों चाहती ? ॥२९७॥
५५८ कथासरित्सागर
५५८ कथासरित्सागर ततः सत्यव्रतोऽप्यावीदसौ देवो वटद्रुमः। अस्याहुः सुमहावर्त्तमधस्ताद् वडवामुखम् ॥११०॥ एतं च परिखृत्यैव प्रदेशमिह गम्यते । अत्रावर्त्ते गतानां हि न भवत्यागमः पुनः ॥१११॥ इति सत्यव्रते तस्मिन् ब्रुवाणेवाम्बुवेगतः । तस्यामेव प्रवृत्तं गन्तु तद्वहण दिशि ॥११२॥ तद्दृष्ट्वा शक्तिदेवं स पुनः सत्यव्रतोऽब्रवीत् । ब्रह्मन् ! विनाशकालोऽय ध्रुवमस्माकमागतः ॥११३॥ यदकस्मात् प्रवहण पश्यात्रैव प्रमात्यदः । शक्यत नैव रोद्धु च कथमप्यधुना मया ॥११४॥ तदावर्त्ते गभीरेऽत्र वयं मृत्योरिवामने । क्षिप्ता एवाम्बुनाकृष्य कर्मनैव¹ बलीयसा ॥१५॥ एतच्च नव मे दुःख शरीर कस्य हि स्थिरम् । दुःख तु यन्न सिद्धिस्ते कृच्छेऽपि मनोरथः ॥११६॥ तद्यावद् वारयाम्येतन्मुहुः प्रवहण मनाक् । तावदस्यावलम्बस्वा शाखां वटतरोबृंहम् ॥११७॥ कदाचिज्जीवितोपायो भवेद् भव्याहृतेस्तव । विधिविलासानम्भोधेण तरङ्गानूको हि तकयेत् ॥११८॥ इति सत्यव्रतस्यास्य धीरसत्त्वस्य जल्पतः । बभूव निकटे तस्य तरो प्रवहण ततः ॥११९॥ तत्क्षण स कृतोत्कारः शक्तिदेवो विसम्भसः । पुप्लुवामग्रहच्छाखां तस्याम्बितटशाखिनः ॥१२०॥ सत्यव्रतस्तु बहुता देहेन वहनेन च । परार्थकल्पितनाम विवेश वडवामुखम् ॥१२१॥ शक्तिदेवश्च शाखाभिः पूरिताशस्य तस्य सः । आश्रित्यापि तरो शाखां निराशः समचिन्तयत् ॥१२२॥ न तावत्सा च कनकपुरी दृष्टा मया पुरी। अपदे नद्यता सावहाधग्ग्रोऽप्यय नाशितः ॥१२३॥ यदि वा सततन्न्यस्तपदा सर्वस्य मूर्धनि । काम भगवती कम भज्यते भवितव्यता ॥१२४॥ १ भाग्येनेत्यर्थः ।
पंचम लम्बक ५५१
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यह सुनकर सत्यव्रत ने कहा—यह वटवृक्ष रूपी देवता है। इसके नीचे आनवाले आवर्त्त (भँवर) को बड़वानल (समुद्री अग्नि) का मुँह बताते हैं। इसीलिए नाववाले उस स्थान को छोड़कर चलते हैं क्योंकि उस भँवर में पड़े हुए नाव फिर लौटते नहीं ॥१०-११॥ जबतक सत्यव्रत इस प्रकार कह ही रहा था इतने में ही उसकी नाव पानी के वेग से उसी ओर बढ़ गई ॥१२॥ यह देखकर सत्यव्रत न शक्तिदेव से फिर कहा—'ब्राह्मण देवता ! हमारे विनाश का समय आ गया है ! ॥१३॥ क्योंकि यह नाव अकस्मात् उसी ओर बही जा रही है। इसे अब मैं किसी तरह भी नहीं रोक सकता ॥१४॥ हम लोग मृत्यु-मुख के समान इस गहरे भँवर में पड़ गये हैं। हमें बलवान् कर्म के समान वेगवान् जल ने इसमें ढकेल दिया है ॥१५॥ मुझे मृत्यु का दुःख नहीं है किसका शरीर अमर रहा है? दुःख केवल इसी बात का है कि इतना कष्ट उठाने पर भी तुम्हारे कार्य म सफलता न मिली ॥१६॥ मैं भरसक नाव को कुछ हटाने का यत्न कर रहा हूँ। तुम शीघ्र ही इस वटवृक्ष की शाखा को पकड़ने का यत्न करना ॥१७॥ तुम भव्य (सुन्दर) आकृतिवाले हो। सम्भव है तुम्हारा कल्याण हो। दैव के विधानों और सुदृढ़ तरंगों को कौन जान सकता है ॥१८॥ धैर्यशाली सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर नाव वटवृक्ष के पास आ गई। उसी समय शक्तिदेव ने बिना व्याकुलता के उछलकर वटवृक्ष की एक मोटी शाखा पकड़ ली ॥१९-२० ॥ किन्तु सत्यव्रत परोपकार के लिए निर्मित नाव से और अपने शरीर से बड़वानल के मुख में चला गया ॥२१॥ शक्तिदेव भी शाखाओं से आशा को पूर्ण करनेवाले उस वृक्ष की शाखा पर आश्रय पाकर, निराश हो सोचने लगा। मैंने कनकपुरी अभी तक नहीं देखी और ऐसे अवसर पर धीवरराज सत्यव्रत को खो दिया। सभी के सिर पर पैर रखकर खड़ी भवितव्यता (होनहार) को कौन मिटा सकता है ॥२२-२४॥
५५६ कथासरित्सागर
५५६ कथासरित्सागर
इति रहसि निशम्य विष्णुदत्तात् सरसकथाप्रकरं स शक्तिदेवः। भुवि कनकपुरीवलोकनेऽपी धृतिमवलम्ब्य निनाय च त्रियामाम् ॥१९८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे चतुरदारिका लम्बके द्वितीयस्तरङ्गः।
तृतीयस्तरङ्गः शक्तिदेवस्य कनकपुरीं प्रति प्रस्थानम् ततस्तत्रोत्स्यरुद्वीपे प्रभाते तं मठस्थितम्। शक्तिदेवं स दाशेन्द्रं सत्यव्रत उपाययौ ॥१॥ स च प्राक्प्रतिपन्नं सङ्घपेटयनमभाषत। प्रह्लांस्त्वदिष्टसिद्धयर्थमुपायश्चिन्तितो मया ॥२॥ अस्ति द्वीपवरं मध्ये रत्नकूटाख्यमम्बुधेः। कृतप्रतिष्ठस्तत्रास्ते भगवान्हरिरम्बिनः॥३॥ आषाढशुक्लद्वादश्यां तत्र यात्रोत्सवे मुदा। आयान्ति सर्वद्वीपेभ्यः पूजाय यत्नतो जनाः ॥४॥ तत्र ज्ञायत कनकपुरी सा जातुचित् पुरी। तदेहि तत्र गच्छावः प्रत्यासन्ना हि सा तिथिः ॥५॥ इति सत्यव्रतेनोक्तं शक्तिदेवस्तथेति सः। जग्राह हृष्टं पाथेयं विष्णुदत्तोपकल्पितम् ॥६॥ ततो वहनमारुह्य स सत्यव्रतढौकितम्। तेनैव साकं त्वरितं प्रायाद् वारिधिवर्त्मना ॥७॥ गच्छंश्च तत्र स द्वीपनि भनक्ते'ऽम्बुतालप । सत्यव्रतं तं पप्रच्छ क्षणमारतया स्थितम् ॥८॥ इतो दूरं महाभोगं किमेतद्दृश्यतेऽम्बुधौ। यदृच्छाप्रोत्सृगतोदप्रसपक्षगिरिविभ्रमम् ॥९॥
१ समुद्रे 'हैल'प्रभृतयो हीनकुत्सा मत्स्या भवन्तीति प्रसिद्धिः।
द्वितीय तरंग समाप्त
विष्णुदत्त से इस प्रकार एकान्त रात्रि में परम कथा सुनकर उस शक्तिदेव ने हृदय में कनकपुरी देखने की अभिलाषा रखते हुए धैर्य के साथ वह रात्रि व्यतीत की ॥२९८॥ द्वितीय तरंग समाप्त
तृतीय तरंग शक्तिदेव का कनकपुर के लिए प्रस्थान तदनन्तर उस उत्स्थल द्वीप के मठ में ठहरे हुए शक्तिदेव के समीप नाविकों का सरदार सत्यव्रत आया ॥१॥ उसने पहले ही शक्तिदेव से कनकपुरी का पता लगाने की प्रतिज्ञा की थी। इसीलिए उसने आकर शक्तिदेव से कहा—'हे ब्राह्मणदेव मैने तुम्हारी इष्ट-सिद्धि का एक उपाय सोचा है ॥२॥ समुद्र के मध्य रत्नकूट नाम का एक द्वीप है। उसमें समुद्र में भगवान् विष्णु की स्थापना की है॥३॥ आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को वहाँ यात्रा का मेला लगता है। उस अवसर पर भगवान् विष्णु के पूजन के लिए सभी द्वीपों से यात्री आते हैं ॥४॥ वहाँ जाने पर सम्भव है कि किसी यात्री से उस कनकपुरी का पता लग सके। इसलिए चलो वहीं चलें। वह तिथि (द्वादशी) भी समीप ही है॥५॥ सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर शक्तिदेव ठीक है ऐसा कहकर चलने को उद्यत हुआ और विष्णुदत्त द्वारा बनाया गया पाथेय उसने साथ ले लिया ॥६॥ तदनन्तर वह सत्यव्रत के चलाए हुए जहाज में उसी के साथ शीघ्र ही समुद्री मार्ग से चला गया ॥७॥ टापुओं के समान बड़े-बड़े मत्स्यों से भरे हुए और आश्चर्यों के भवन उस समुद्र में जाते हुए उसने नाव को ले जाते हुए सत्यव्रत से पूछा कि 'यहाँ से दूर पर महँगा निकला हुआ पक्ष-सहित पर्वत के समान वह क्या दीख रहा है? ॥८-९॥
५५८ कथासरित्सागर
५५८ कथासरित्सागर
ततः सत्यव्रतोऽवादीदसौ दवो वटद्रुमः। अस्याधः सुमहावर्त्तमधस्ताद् वडवामुखम् ॥११०॥ एतच्च परिवर्त्यैव प्रदेशमिह गम्यते । अत्रावर्त्ते गतानां हि न भवत्यागमः पुनः ॥१११॥ इति सत्यव्रते तस्मिन् वदत्यवाम्बुवेगतः । तस्यामेव प्रवृत्ते गन्तुं तद्वहनं दिशि ॥११२॥ तद्दृष्ट्वा शक्तिधव स पुनः सत्यव्रतोऽब्रवीत् । ब्रह्मन् ! विनाशकालोऽय ध्रुवमस्माकमागतः ॥११३॥ यदकस्मात् प्रवहणं पश्यात्रैव प्रमाथ्यते । शक्यत नैव रोद्धुं च कथमप्यधुना मया ॥११४॥ तदावर्त्ते गभीरेऽद्य वयं मृत्योरिवानने। क्षिप्ता एवाम्बुनाकृष्य कर्मणेव' बलीयसा ॥११५॥ एतच्च नैव मे दुःखं शरीरं कस्य हि स्थिरम्। दुःखं तु यन्न सिद्धस्ते कृच्छ्रेणापि मनोरथः ॥११६॥ एतावद् वारयाम्येतदहं प्रवहणं मनाक। तावदस्यावलम्बस्वा- शाखां वटवरोद्गताम् ॥११७॥ कदाचिज्जीवितोपायो भवेद् भव्याकृतेस्तव । विधेर्विलासगम्भीरेष्व तरङ्गानको हि तर्कयेत् ॥११८॥ इति सत्यव्रतस्यास्य धीरसत्त्वस्य जल्पतः । बभूव निकटे तस्म तरोः प्रवहणं क्षणात् ॥११९॥ तत्क्षणं स कृतोत्फालः शक्तिदेवो विसाध्वसः । पृथुलामग्रहीच्छाखां तस्याम्बिटशालिनः ॥१२०॥ सत्यव्रतस्तु महता वेगेन वहनेन च। परावर्त्तस्खलितनात्र विवेश वडवामुखम् ॥१२१॥ शक्तिदेवश्च शाखाभि पूरिताक्षस्य तस्य सः। आधिरूयापि तरो शाखां निराशः समचिन्तयत् ॥१२२॥ न सावस्था च कनकपुरी दृष्टा मया पुरी। अपथे मग्नता तावद्दाक्षेन्द्रेणोऽप्येष माश्रितः ॥१२३॥ यदि वा सततन्यस्तपदा सर्वस्य मूर्धनि। कामं भगवती केन भज्यत भवितव्यता ॥१२४॥
१ आप्येनेत्यर्थः ।
पंचम लम्बक ५५५
पंचम लम्बक ५५५ यह सुनकर सत्यव्रत ने कहा—वह वटवृक्ष रूपी देवता है। इसके नीचे आनेवाले आवर्त्त (भँवर) को बड़वानल (समुद्री अग्नि) का मुँह बताते हैं। इसीलिए नाववाल उस स्थान को छोड़कर चलते हैं, क्योंकि उस भँवर म पड़ हुए लोग फिर लौटते नहीं ॥१०-११॥ जबतक सत्यव्रत इस प्रकार कह ही रहा था इतने में ही उसकी नाव पानी के वेग से उसी ओर बढ़ गई ॥१२॥ यह देखकर सत्यव्रत ने शक्तिदेव से फिर कहा—'ब्राह्मण देवता ! हमारे विनाश का समय आ गया है । ॥१३॥ क्योकि यह नाव अकस्मात् उसी ओर बही जा रही है। इसे अब मैं किसी तरह भी नहीं रोक सकता ॥१४॥ हम लोग मृत्य-मुख के समान इस गहरे भँवर म पड़ गये हैं। हमें बलवान् कर्म के समान वेगवान् जल ने इसमें ढकेल दिया है ॥१५॥ मुझे मृत्य का दुख नहीं है किसका शरीर अमर रहा है ? दुःख केवल इसी बात का है कि इतना कष्ट उठाने पर भी तुम्हारे कार्य म सफलता न मिली ॥१६॥ मैं भरसक नाव को कुछ हटाने का यत्न कर रहा हूँ। तुम शीघ्र ही उस वटवृक्ष की शाखा को पकड़ने का यत्न करना ॥१७॥ तुम भव्य (सुन्दर) आकृतिवाले हो। सम्भव है तुम्हारा कल्याण हो। दैव के विधानों और सुदृढ़ तरंगों को कौन जान सकता है ॥१८॥ धैर्यस्वामी सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर नाव वटवृक्ष के पास आ गई। उसी समय शक्तिदेव ने बिना व्याकुलता के उछलकर वटवृक्ष की एक बड़ी शाखा पकड़ ली ॥१९-२ ०॥ किन्तु सत्यव्रत परोपकार के लिए निर्मित नाव से और अपने शरीर से वडवानल के मुख में चला गया ॥२१॥ शक्तिदेव भी शाखाओं से आशा को पूर्ण करनेवाले उस वृक्ष की शाखा पर आश्रय पाकर, निराश हो सोचने लगा। मैंने कनकपुरी अभी तक नहीं देखी और ऐस अवसर पर धीरप्रवर सत्यव्रत को भी खो दिया। मर्त्य के सिर पर पैर रखकर गई अविभव्यता (होनहार) को कौन मिटा सकता है ॥२२-२४॥
५६० कथासरित्सागर
५६० कथासरित्सागर इत्यवस्थोचितं तस्य तत्तच्चिन्तयतस्तदा । विप्रसूनोस्तरुस्कन्धे दिनं तत्पर्यहीयत ॥१२५॥ सायं च सवतंस्तस्मिन् स महाविहगान् बहून् । वनवृक्षां प्रविशतः शब्दापूरितदिगन्तरान् ॥१२६॥ अपश्यत् पृथुसत्पक्षवातधूतानवोर्मिभिः । गुहाम् परिचयप्रीत्या कृतप्रत्युद्गमानिव ॥१२७॥ तत शाखाविलीनानां रा तेषां पक्षिणां मिथः । मनुष्यवाचा संलापं पत्रोच्छेच्छ्रिताञ्च्छृणोत् ॥१२८॥ कश्चिद् द्वीपान्तरं कश्चिद् गिरि कश्चिद् दिगन्तरम् । तदहश्चरणस्थानमर्चं समवर्णयत् ॥१२९॥ एकश्च वृद्धविहगस्तयां मध्यादभाषत । अहं विहर्तुं कनकपुरीमद्य गतोऽभवम् ॥१३०॥ प्रात पुनश्च तत्रैव गन्तास्मि भरित गुहाम् । क्षमावहेन शोण्यो म पितूरगमनेन हि ॥१३१॥ दृश्यवाण्णुपुत्त्यासाग्रदुदेनास्य पक्षिणः । वधमा सान्त्वनाप मन् पक्षिम्वो व्यचिन्तयत् ॥१३२॥ न्ष्टिया मामयब मगरी तत्प्राप्य माययम म । उपाय गमहापाया विम्गो वाहनीकृत ॥१३३॥ इत्यालोच्य धनरदस्य तस्य गृध्यस्य पक्षिण । पुच्छानान्तर गोप्य गस्तित्वा व्यनीयत ॥१३४॥ प्रातश्चतत्रागाध गभणाग्रय पक्षिणु। ग क्त्वा र्गन्ताम्यकान्ताशा विविपया ॥१३५॥ दशास्यन् यन् पूरा गविम्यसमधितम्। शणान्तथ्यकनकपुरी सा पक्षि गुत ॥१३६॥ तथोद्यानान्तर तत्सिप्ररहि विमुक्तम् । ग सच्छित्वा निभृत सन्त गुप्तन्वागात् ॥१३७॥ भाग्येष च गन्ताच्छादाद् भार्या त ग । स गुताश्चन्तश्च कश्चित् त्त याचितो ॥१३८॥ गत्वा नगर च सर्ववृत्तान्तमैक्षत । गोपूपुर इन्दोत्र व षष्ट दमानीता ॥१३९॥
पंचम लम्बक ५६१
पंचम लम्बक ५६१ उस ब्राह्मण युवक के इस प्रकार समयानुसार सोचते हुए वह सारा दिन समाप्त हो गया ॥२५॥ सायंकाल होते ही उसने उस वृक्ष पर अपने शब्दों से दिशाओं को मुखरित करनेवाले बड़े-बड़े पक्षियों को देखा॥२६॥ बड़े-बड़े पंखों की वायु से समुद्र में लहर-सी उठाते हुए मीनों का उसने देखा जो मानों परिचय और प्रेम के कारण उसे लेने के लिए आये हों॥२७॥ तदनन्तर उसने पत्रों की झुरमुट में छिपे हुए और शाखाओं में चिपके हुए एवं मनुष्यों की वाणी में होनेवाले वार्त्तालापों को सुना॥२८॥ वहाँ जो उस दिन चरने गये थे उनमें से कोई किसी नवीन द्वीप का कोई पक्षी किसी पर्वत का और कोई किसी दिशा का वर्णन कर रहा था ॥२९॥ उनमें से एक वृद्ध पक्षी ने कहा— आज मैं चरने के लिए कनकपुरी गया गया था। प्रातःकाल फिर वहीं सुख से चरने के लिए जाऊँगा। व्यर्थ थकावट देनेवाले दूरदेश में जाने से क्या काम ? ॥३०-३१॥ इस प्रकार सहसा अमृत के सार के समान उस पक्षी के वचन से शक्तिदेव का हृदय शान्त हुआ और वह सोचने लगा॥३२॥ भाग्य से कनकपुरी का पता तो लगा किन्तु उसे प्राप्त करने के साधन-स्वरूप अब इस पक्षी को वाहन बनाना है॥३३॥ वह ऐसा सोचकर और धीरे-धीरे चलकर सोये हुए उस वृद्ध पक्षी के पास पहुँचा और उसके पंखों के अन्दर जाकर चिपक गया॥३४॥ प्रातःकाल होते ही अन्य पक्षियों के इधर उधर उड़ जाने पर दैव के समान पक्षपात करता हुआ वह पक्षी भी कन्धे पर छिपे हुए शक्तिदेव को लेकर चरने के लिए क्षणभर में कनकपुरी पहुँचा ॥३५ ३६॥ कनकपुरी के एक उद्यान में उतरकर उस पक्षी के बैठ जाने पर शक्तिदेव धीरे-से उसकी पीठ से नीचे उतर आया॥३७॥ तत्पश्चात् वह उससे दूर हटकर उस उद्यान में घूमने लगा। घूमते हुए उसने पुष्प-चयन में लगी हुई दो स्त्रियों को देखा॥३८॥ शक्तिदेव को देखकर चकित हुई उन स्त्रियों के समीप जाकर उसने पूछा— यह कौन स्थान है और तुम लोगों कौन हो ? ॥३९॥ ७१
५६२ कथासरित्सागर
५६२ कथासरित्सागर इयं कनकपुर्याख्या पुरी विद्याधरास्पदम्। चन्द्रप्रभेति चैतस्यामास्ते विद्याधरी सती ॥४०॥ तस्याश्चावामिहोद्याने जानीह्युद्यानपालिके। पुष्पोच्चयस्तदर्थोऽयमिति ते च तमूचतुः ॥४१॥ ततः सोऽप्यवदद् विप्रो युवां म कुरुतं तथा। यथाहमपि पश्यामि तां युष्मत्स्वामिनीमिह ॥४२॥ एतच्छ्रुत्वा तथेत्युक्त्वा नीतवत्यावुभे च ते। स्त्रियावन्तर्नगर्भास्तं युवानं राजमन्दिरम् ॥४३॥ सोऽपि प्राप्तस्तदद्राक्षीन्माणिक्यस्तम्भभास्वरम्। सौधमभ्रंलिहस्फोतकेतनं सम्पद्दामिव ॥४४॥ तत्रागतं च दृष्ट्वा तं सर्वः परिजनोऽब्रवीत्। गत्वा चन्द्रप्रभायास्तं मानुषागममद्भुतम् ॥४५॥ साप्यादिश्य प्रतीहारमभिसञ्चितमेव तम्। अभ्यन्तरं स्वमीकेतं विप्रं प्रावेशयत्ततः ॥४६॥ प्रविष्टः सोऽप्यपश्यत्तां तत्र नेत्रोत्सवप्रदाम्। धातुर्युवतिनिर्माणपर्याप्तिमिव रूपिणीम् ॥४७॥ सा च सद्रत्नपर्यङ्काद्दूरादुत्थाय तं स्वयम्। स्वागतेनाद्रुतवती तद्दर्शनवशीकृता ॥४८॥ उपविष्टमपृच्छाञ्च कल्याणिन् कस्त्वमीदृशः। कथं च मानुषागम्यामिमां प्राप्तो भवान्भुवम् ॥४९॥ इत्युक्तः स तया चन्द्रप्रभया सकुतूहलम्। शशंसिदेवो निजं देशं जातिं चाथ नाम च ॥५०॥ मत्पुरीङ्गनपगात्राञ्जु तां राजकन्यकाम्। यथा कनकनरेणाप्राप्तागतस्तदवदत्तत् । ५१ ॥ तद्बुद्ध्वा किमपि ध्यात्वा दीर्घं निःश्वस्य सा ततः । चन्द्रप्रभा च विजनं शशिशेखरमभाषत ॥५२॥ नूनं त्वां दर्शिनं तद्धितैषिणा सुभग! गच्छति। : अगस्त्यो गतिगन्धाढ्यो विद्याधरपतिर्भुवि ॥५३॥ : यष तस्य कनकप्रभः जाता दुहितरः प्रमात् । : उत्पन्ना चन्द्रप्रभाप्यस्मि चन्द्रगति चारु ॥५४॥
पंचम लम्बक ५६३
पंचम लम्बक ५६३ उत्तर में वे बोलीं—'यह कनकपुरी नाम की नगरी विद्याधरों का स्थान है। यहाँ चन्द्र- प्रभा नाम की विद्याधरी है। हमें उसी की उद्यानपालिका (मालिन) समझो। यह पुष्प हम उसी के लिए चुन रही हैं' ॥४०-४१॥ तब वह ब्राह्मण कहने लगा कि 'तुमलोग ऐसा यत्न करो कि जिससे मैं तुम्हारी स्वामिनी को देख सकूँ' ॥४२॥ ऐसा सुनकर और उसे स्वीकार कर वे दोनों उस युवक को नगरी के अन्दर स्थित राजभवन में ले गईं ॥४३॥ राजभवन में जाकर उसने मणिमय के स्तम्भों और सोने की दीवारों से चमकते हुए लक्ष्मी के भवन के समान उस भवन को सम्पत्तियों का निवास-स्थान समझा ॥४४॥ भवन में आये हुए उसे देखकर चन्द्रप्रभा की सभी सेविकाओं ने जाकर अपनी स्वामिनी से मनुष्य के आश्चर्यमय आगमन की सूचना दी ॥४५॥ चन्द्रप्रभा ने भी अपने प्रतीहार को आज्ञा देकर शीघ्र ही उसे भवन के भीतर अपने निकट बुला लिया ॥४६॥ अन्दर आये हुए उस शक्तिदेव ने आँखों को आनन्द-देनेवाली और विधाता के आश्चर्यमय निर्माण की मूर्त्तिमती सीमा के समान उस चन्द्रप्रभा को देखा ॥४७॥ वह चन्द्रप्रभा उसे देखकर सुन्दर रत्नों के पलँग से उठकर उसका स्वागत करने के लिए आदर के साथ आगे बढ़ी ॥४८॥ शक्तिदेव के प्रथम दर्शन-मात्र से ही उसके वश में हुई चन्द्रप्रभा उसके बैठन पर कहने लगी—हे कल्याणमय ! मनुष्यों के लिए अगम्य इस भूमि में तुम कैसे आ गये ? चन्द्रप्रभा द्वारा उत्सुकता से इस प्रकार पूछे जाने पर शक्तिदेव ने अपना देश, अपनी जाति और नाम बताकर यह बताया कि कनकपुरी देखने की प्रतिज्ञा पर राजकुमारी कनकरेखा को प्राप्त करने के लिए यहाँ आया हूँ। इस प्रसंग का समस्त वृत्तान्त उसने चन्द्रप्रभा को सुना दिया ॥४९-५१॥ यह सब सुनकर, कुछ सोचकर तथा लम्बी साँस लेकर चन्द्रप्रभा ने एकान्त में शक्तिदेव से कहा—सुनो, मैं तुमसे यह कहती हूँ। इस भूमि पर शशिखण्ड नाम का विद्याधर राज्य करता है। उसकी क्रमशः हम चार कन्याएँ हैं। सबसे बड़ी चन्द्रप्रभा मैं हूँ दूसरी चन्द्ररेखा है ॥५२-५४॥
५६४ कथासरित्सागर
५६४ कथासरित्सागर रुधिरक्ता तृतीया च चतुर्थी च शशिप्रभा । ता वयं क्रमशः प्राप्ता वृद्धिमत्र पितुर्गृहे ॥५५॥ एकदा च भगिन्यो मे स्नातुं तिस्रोऽपि ताः समम् । मयि कन्याव्रतस्थायां जग्मुर्मन्दाकिनीतटम् ॥५६॥ तत्राप्रयतपसं नाम मुनिं यौवनदर्पतः । तोयजन्तून्समसिञ्चन्नारब्धजलकेलयः ॥५७॥ अतिनिर्बन्धिनीस्ताश्च मुनिः क्रुद्धः शशाप सः । शुनकन्यका प्रजायध्वं मर्त्यलोकेऽखिला इति ॥५८॥ तद्बुद्ध्वा सोऽस्मदीयेन पित्रा गत्वा प्रसादितः । पृथक् पृथक् स शापान्तमुक्त्वा तासां यथायथम् ॥५९॥ जातिस्मरत्वं दिव्येन विज्ञानेनोपबृंहितम् । मर्त्यभावेन सर्वासामादिदेश महामुनिः ॥६०॥ ततस्तासु तनूस्त्यक्त्वा मर्त्यलोकं गतासु सः । दत्त्वा मे नगरीमेतां पिता गङ्गाड् गतो वनम् ॥६१॥ अथाहं निवसन्तीं मां देवी स्वप्ने किलाम्बिका । मामुप पुत्रि ! भर्ता ते भवितेति समादिशत् ॥६२॥ ततो विद्याधरांस्तांस्तान् वरानुद्दिशतो बहून् । पितुर्विधारणं कृत्वा कन्यैवाद्याप्यहं स्थिता ॥६३॥ इदानीं चामुनाऽद्यैवमयनागमननेन ते । वपुषा च शरीरेण तुभ्यमवाहमर्पिता ॥६४॥ तद्व्रजामि चतुर्दश्यामागमिष्या भवत्कृते । भर्तुः तातस्य विसृष्टिमृषभागस्य महागिरिम् ॥६५॥ तत्र तस्यां तिथौ सर्वे मिलन्ति प्रतिवत्सरम् । देवं हरं पूजयितुं दिव्या विद्याधरास्तथा ॥६६॥ तत्रागतेन पायासि त्त्वनुगम्यास्य च । इहागच्छाम्यहं तूर्णं मां परिणयस्व माम् ॥६७॥ मनिष्ट मार्थनयुक्त्या मा न विद्याधरोऽपित । अन्यथा शङ्कित मन्त्रयोगप्रभावतः ॥६८॥ तस्य चामुद्रयानेन विख्याताय गृहम् । पराशरस्यास्य गृणनृदनिमञ्जन ॥६९॥
पंचम लम्बक ५६५
पंचम लम्बक ५६५
तीसरी शशिरेखा है और चौथी शशिप्रभा है। हम चारों पिता के घर में बड़ी हुईं। एक बार मुझसे छोटी वे तीनों बहिनें साथ ही गंगा-स्नान के लिए गईं॥५५-५६॥ वे तीनों यौवन-मद में मस्त होकर जलक्रीड़ा करती हुई उतथ्य नामक ऋषि को पानी से सींचने लगीं॥५७॥ ऋषि के बार-बार मना करने पर भी जब बह न मानीं तब क्रुद्ध होकर उसने शाप दिया कि 'तुम तीनों दुष्ट कन्याएँ मर्त्यलोक में उत्पन्न होओ'॥५८॥ इस शाप का समाचार सुनकर हमारे पिता ने ऋषि का अनुनय-विनय करके प्रसन्न किया तो ऋषि उनके शाप का अन्त पृथक्-पृथक् रूप में किया किन्तु दिव्य ज्ञान से जुड़े हुए पूर्वजन्म के स्मरण को मानव-जन्म में भी बने रहने का आदेश दिया॥५९-६०॥ तब उन तीनों के अपने-अपने विद्याधर-शरीर को छोड़कर मर्त्यलोक में चले जाने पर मेरे पिता यह नगरी मुझे देकर वन को चले गये॥६१॥ तदनन्तर यहाँ रहती हुई मुझे स्वप्न में माता पार्वती ने यह आदेश दिया कि 'बेटी तेरा पति मनुष्य होगा'॥६२॥ इसी कारण विद्याधर आदि के अनेक वीरों को छोड़कर मैं अभी तक कन्या ही रह गई॥६३॥ इस समय तुम्हारे इस आश्चर्यमय जयमन्त्र ने और तुम्हारे सुन्दर शरीर ने मुझे अपने वश में कर लिया। फलतः तुम्हारे इन सब आश्चर्यों ने ही मुझे अपने को तुम्हारे लिए अर्पण करने को बाध्य कर दिया है॥६४॥ इसलिए आगामी चतुर्दशी के दिन तुम्हारे इस प्रसंग को पिता को सूचित करने मैं ऋषभ नामक पर्वत पर जाऊँगी॥६५॥ वहाँ प्रतिवर्ष उस अवसर पर शिवपूजन के लिए मेला लगता है और सभी दिशाओं से बड़े बड़े विद्याधर आते हैं॥६६॥ वहीं मेरे पिता भी आते हैं। अतः वहाँ जाकर उनसे आज्ञा लेकर मैं शीघ्र ही आती हूँ तत्पश्चात् तुम मुझसे विवाह कर लो॥६७॥ तबतक यहाँ ठहरो—ऐसा कहकर उसने विद्याधरों के अनुरूप विविध उपचारों से शक्तिदेव का स्वागत-सत्कार किया॥६८॥ वहाँ रहकर उन दिव्य भोगों का उपभोग करते हुए उसे ऐसा सुख प्राप्त हुआ जैसे दावाग्नि से दग्ध (झुलसे हुए) व्यक्ति को अमृत-सरोवर में स्नान करने से होता है॥६९॥
५९९ कथासरित्सागर
५९९ कथासरित्सागर प्राप्तायां च चतुर्दश्यां सा तं चन्द्रप्रभाब्रवीत्। अद्य गच्छामि विज्ञाप्य तातस्याहं भवत्कृतम् ॥७०॥ सर्वं परिजनश्चायं मयैव सह यास्यति। त्वया त्वकाकिना दुःखं न भाव्यं दिवसद्वयम् ॥७१॥ एकेन पुनरतस्मिन्मन्दिरेऽप्यवतिष्ठता। मध्यमा भवता भूमिर्नारोढव्या कथञ्चन ॥७२॥ इत्युक्त्वा सा युवानं स यस्तस्थिता तदन्तिके। तदीयचित्तानुगता ययौ चन्द्रप्रभा ततः ॥७३॥ सोऽप्येकाकी ततस्तत्र स्थितश्चन्ता विनोदयन्। स्थानस्थानञ्च बभ्राम शक्तिदेवा महर्द्धिषु ॥७४॥ किंसविदद्य निषिद्धं मे तया पृष्ठेऽधिरोहणम्। विद्याधरदुहित्रेति जातकौतूहलोऽथ सः ॥७५॥ तस्यैव मध्यमां भूमिं मन्दिरस्यारुगेह् ताम्। प्रायो वारितवामा हि प्रवृत्तिर्मनसो नृणाम् ॥७६॥ आरूढस्तत्र चापश्यद् गुप्तान् स्त्रीन् रत्नमण्डपान्। एकं चोद्घाटितद्वारं तन्मध्यात् प्रविवेश सः ॥७७॥ प्रविश्य चान्तः सद्रत्नपर्यङ्के न्यस्ततूलिके। पटावगुण्ठिततनुं शयानं कञ्चिदक्षत ॥७८॥ वीक्षते यावदुत्क्षिप्य पटं सार्थमृतां तथा। परोपकारिनृपतस्तनयां वरनयकाम् ॥७९॥ दृष्ट्वा चाचिन्तयत्तत्सोऽप्यं किमिदं महदद्भुतम्। किमप्रयोधमुप्तेयं किं वा भ्रान्तिरथाथवा ॥८०॥ यस्याः कृते प्रवासोऽयं मम सर्वेह तिष्ठति। ममाद्यपगतप्राणा तत्र देशे च जीवति ॥८१॥ अम्लानकान्तिरस्याश्च तद् विद्याया मम ध्रुवम्। कमापि चारुनटमिन्द्रजालं वितन्यते ॥८२॥ इति सञ्चिन्त्य विगत्य तावन्यौ मण्डपौ क्रमात्। प्रविश्यान्तं च ददर्श तदृकन्ये च कस्यके ॥८३॥ ततोऽपि निर्गतस्तस्य साश्चर्यो मन्दिरस्य सः। उपविष्टः स्थितोऽपश्यद् वापीमभ्यस्तमामयम् ॥८४॥
कुछ समय पश्चात् चतुर्दशी के आने पर चन्द्रप्रभा शक्तिदेव से कहने लगी—'आज मैं तुम्हारे लिए पिता से निवेदन करने जाती हूँ, मेरे सभी सेवक मेरे साथ ही जायेंगे। इन दो दिनों तक तुम अकेले दुःखी न होना ॥७०-७१॥ इस भवन में अकेले रहते हुए भी तुम बीच की मञ्जिल में कभी न जाना' ॥७२॥ उस युवक को ऐसा कहकर और उसी में अपने हृदय को रखकर तथा इसी प्रकार उसके हृदय को चन्द्रप्रभा अपने साथ लेकर वहाँ से चली गई ॥७३॥ वह शक्तिदेव अब वहाँ अकेला रहता हुआ मन बहलाने के लिए, इधर-उधर अत्यन्त समृद्धि-सम्पन्न उन मकानों में घूमता रहता था ॥७४॥ 'उस विद्याधर-कन्या ने मेरा ऊपर (बीच की मञ्जिल में) जाना क्यो वारित किया' इस प्रकार के कुतूहल से वह उसी मञ्जिल में पहुँचा। मनुष्यों के मन की प्रवृत्ति प्रायः निषेध के विपरीत ही चलती है ॥७५॥ ऊपर चढ़कर उसने मूर्त रूप से सुरचित तीन मंडपों को देखा ॥७६॥ उसमें प्रविष्ट होकर उसने सुन्दर बिछावनों से युक्त रत्नों के पलंग पर दुपट्टा ओढ़ने से ढंके हुए शरीर से शयन करते हुए किसी व्यक्ति को देखा ॥७७-७८॥ जब उसने कपड़ा उठाकर उसे देखा तब तो उसे परोपकारी राजा की मरी हुई कन्या कनक-रेखा दिखाई पड़ी ॥७९॥ उसे देखकर शक्तिदेव सोचने लगा—'यह क्या महान् आश्चर्य है? क्या यह अचेतनावस्था (बेहोशी) में सोई है या मुझ ही भ्रम हो रहा है ॥८०॥ जिसके लिए मेरी इतनी लम्बी और कष्टप्रद यात्रा हुई वह निर्जीव होकर यहाँ पड़ी है और वहाँ (वर्धमान में) जीवित है ॥८१॥ इसकी मुखकान्ति भी मलिन नहीं पड़ी है। प्रतीत होता है कि विधाता ने किसी कारण वश मेरे लिए असमय ही यह इन्द्रजाल रचा है ॥८२॥ ऐसा सोचते-सोचते उसने दूसरे दोनों मंडपों के अन्दर क्रमशः जाकर उसी प्रकार सोई हुई और दो कन्याएँ देखीं ॥८३॥ उन मंडपों से निकलकर आश्चर्यचकित शक्तिदेव ने ऊपर बैठ हुए वहीं से नीचे एक अत्यन्त सुन्दर बावली देखी और उसके किनारे पर रत्नों की जीनवाले एक सुन्दर घोड़े को देखा ॥८४॥
१. 'अरेबियन नाइट्स' में तीन राजपोतों की कहानी में ऐसी राजकन्याओं की चर्चा है और इसी प्रकार एक मंजिल देखने की मनाही है। वहाँ ऐसे ही एक घोड़े का वर्णन भी है।—अनु.