कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
४ कथासरित्सागर
४ कथासरित्सागर व्याधिस्ततोऽवदद्राजञ्शरीरे क्षणनश्वरे । एवंप्रायेष्वसारेषु धीमान्को नाम मज्जति ॥१३३॥ नहि मोहयति प्राज्ञं लक्ष्मीरूमरुमरीचिका । इत्युक्त्वैव स तत्कालं तपसे निर्जगतो ययौ ॥१३४॥ अगमच्च योगनन्दं पाटलिपुत्रं स्वराजनगरं सः । भोगाय चाणमूर्ते ! मत्सहितः सकलसैन्ययुतः ॥१३५॥ तत्रोपक्रोधापरिचर्यमाणः समुद्वहन्मन्त्रिधुरं च तस्य । अहं जनन्या गुरुभिश्च साकमासाद्य लक्ष्मीमवसं चिराय ॥१३६॥ बहु तत्र दिने दिने द्विजेभ्यः कनकं मह्यमदात्प्रसन्ना । वव्राति स्म शरीरिणी च साक्षान्मम कार्याणि सरस्वती सदैव ॥१३७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः ।
पञ्चमस्तरङ्गः एवमुक्त्वा वररुचिः पुनरेतदवर्णयत् । कालेन यागमन्दोऽयं कामादिवसमामयौ ॥१॥ गजेन्द्र इव मत्तश्च नापेक्षत स किञ्चन । अकाण्डपातोपनता न न लक्ष्मीर्विमोहयेत् ॥२॥ अचिन्तयं ततश्चाहं राजा तावद् विमूर्च्छकः । तत्कार्यचिन्तयाक्रान्तः स्वधर्माद् मेऽप्रसीदति ॥३॥ तस्माद् वरं सहायं तं शकटालं समुद्धरे । श्रियेत चेद् विरुद्धं च किं स कुर्यान्मयि स्थिते ॥४॥ निश्चित्यैतन्मयाभ्यर्थ्य राजानं सोऽन्धकूपतः । उद्धृतः शकटालोऽथ मुमुदे हि विजातये ॥५॥ दुर्जयो योगनन्दोऽस्य स्थिते वररुचावतः । आश्रये वैतसीं वृत्तिं काले तावत्प्रतीक्षितुम् ॥६॥ इति सञ्चिन्त्य स प्राज्ञः शकटालो मदिच्छया । अकरोद्राजकार्याणि पुनः सम्प्राप्य मन्त्रिताम् ॥७॥ कदाचिद्योगनन्दोऽथ निर्गतो नगराद् बहिः । क्षिपन्त्यल्पञ्चाङ्गुलिं हस्तं गङ्गामध्ये व्यलोकयत् ॥८॥
प्रथम लम्बक ५५
प्रथम लम्बक ५५ तब व्याडि ने कहा—'हे राजन् ! यह शरीर क्षण-भर में नष्ट हो जानेवाला है। अतः कौन बुद्धिमान् इस अनित्य सुख भोगों में डूबता है ॥१३३॥ लक्ष्मी की मृगतृष्णा किस धीर-पुरुष को मोहित नहीं कर लेती'? ऐसा कहकर तपस्या के लिए निश्चय किए हुए वह व्याडि उसी समय चला गया ॥१३४॥ वररुचि कहता गया—'हे काणभूते ! इसके अनन्तर योगनन्द अयोध्या-शिविर से समस्त सेना के सहित मेरे साथ चलकर प्रधान राजधानी पाटलिपुत्र में राज-भोग करने के लिए आ गया ॥१३५॥ इस प्रकार, पाटलिपुत्र में आकर उपकोशा द्वारा मेरी सेवा होती थी। और, साथ ही राजा नन्द के मन्त्रित्व-भार को वहन करता हुआ मैं माता और सुहृज्जनों के साथ समृद्धि का उपभोग करने लगा ॥१३६॥ पाटलिपुत्र में तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी मुझे प्रतिदिन बहुत-सा सुवर्ण देती थीं और साक्षात् शरीरधारिणी सरस्वती मेरे कार्यों में सर्वदा स्वयं सम्मति देती रहती थीं ॥१३७॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त। पञ्चम तरंग वररुचि की कथा (चालू) वररुचि का वैराग्य ऐसा कहकर वररुचि ने फिर कहना प्रारम्भ किया कि कुछ समय के अनन्तर योगनन्द काम क्रोध आदि के वशीभूत हो गया ॥१॥ वह योगनन्द गजेन्द्र के समान उन्मत्त हो गया और उसे कुछ भी न सूझता था। आकस्मिक रूप में प्राप्त हुई लक्ष्मी किसे उन्मत्त नहीं बना देती ॥२॥ तब मैंने सोचा कि राजा अनियन्त्रित स्थिति में हो रहा है। इसके कार्यों की चिन्ता में व्याकुल होकर मेरा कर्तव्य भ्रष्ट हो रहा है। अतः अपनी सहायता के लिए क्यों न शकटाल का उद्धार करूँ? यदि वह राजा के विरुद्ध आक्रमण करेगा भी तो मेरे रहते क्या कर सकता है ॥३ ४॥ इसलिए मैंने प्रार्थना करके शकटाल को अन्धकूप से निकलवाया। कारण यह कि ब्राह्मण जाति स्वभावतः शान्त होती है ॥५॥ 'वररुचि के रहते हुए योगनन्द पर विजय नहीं किया जा सकता। अतः इस समय बक के समान मन्द नीति धारण करके कुछ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए' ॥६॥ ऐसा सोचकर शकटाल मेरी सम्मति से पुनः मन्त्रित्व-पद प्राप्त कर राजकार्य करने लगा ॥७॥ किसी समय योगनन्द नगर से बाहर गया और पाँचों अँगुलियों से मिले हुए हाथ को उसने कड़ाही में घूमते हुए देखा ॥८॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर किमेतदिति पप्रच्छ मामाहूय स तत्क्षणम्। अहं च द्वे निजाङ्गुल्यौ दिशि तस्यामदर्शयम् ॥१९॥ तेन तस्मिंस्तिरोभूते हस्ते राजातिविस्मयात्। भूयोऽपि तदपृच्छन्मां ततश्चाहं समब्रवम् ॥२०॥ पञ्चभिर्मिलितैः किं यज्जगतीह न साध्यते। इत्युक्तवानसौ हस्तः स्वाङ्गुलीः पञ्च दर्शयन् ॥२१॥ ततोऽस्य राजन्नङ्गुल्यावते द्वे दर्शिते मया। ऐकचित्ये द्वयोरेव किमसाध्यं भवेदिति ॥२२॥ इत्युक्त गूढविज्ञाने समतुष्यत्ततो नृपः। शकटासो ऽप्यपीदक्ष्वं मद्बुद्धिं वीक्ष्य दुर्जयाम् ॥२३॥ ! एकदा योगनन्दश्च दृष्टवान्महिषीं निजाम्। वातायनात्प्राप्स्यन्तीं ब्राह्मणातिथिमुन्मुखम् ॥२४॥ तन्मात्रादेव कुपितो राजा विप्रस्य तस्य सः। आदिदेशवधमीर्ष्या हि विवेकपरिपन्थिनी ॥२५॥ हन्तुं वध्यभुवं तस्मिन्नीयमाने द्विज तथा। अहसद्गतजीवोऽपि मत्स्यो विपणिमध्यगः ॥२६॥ तदव राजा तद् बुद्ध्वा वधं तस्य न्यवारयत्। विप्रस्य मामपृच्छच्च मत्स्यहासस्य कारणम् ॥२७॥ निरूप्य कथयाम्येतदित्युक्त्वा निर्गतं च माम्। चिन्तितोपस्थितान्ते सुरस्वयमब्रवीत् ॥२८॥ अस्य तालतरोः पृष्ठे तिष्ठ रात्रावलक्षितः। अत्र श्रोष्यसि मत्स्यस्य हासहेतुमसंशयम् ॥२९॥ तच्छ्रुत्वा निशि तत्राहं गत्वा तालोपरि स्थितः। अपश्यं राक्षसीं घोरां बालैः पुत्रैः सहागताम् ॥३०॥ सा भक्ष्यं याचमानांस्तानब्रवीत्प्रतिपाल्यताम्। प्रातर्वो विप्रमांसानि दास्याम्यद्य हतो न सः ॥३१॥ कस्मात्स न हतोऽद्येति पृष्टा तैरब्रवीत्पुनः। तं हि दृष्ट्वा मृतोऽपीह मत्स्यो हसितवानिति ॥३२॥ हसितं किमु तनेति पृष्टा भूयः सुतैश्च सा। अद्योपहासासीद् राज्ञः सर्वा रात्रोऽपि निष्कृता ॥३३॥
पंचम लम्बक ५७
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
पंचम लम्बक ५७ राजा ने उसी समय मुझे बुलाकर पूछा कि 'यह क्या है ?' मैंने भी उसी दिशा की ओर अपनी दो अँगुलियाँ दिखा दीं और हाथ अन्तर्हित हो गया ॥९॥ इस प्रकार उस हाथ के तिरोहित हो जाने पर राजा ने अत्यन्त विस्मय के साथ मुझसे फिर पूछा तब मैंने कहा—॥१० ॥ पाँचों अँगुलियों को दिखाते हुए उस हाथ ने कहा कि पाँच के मिलने पर कौन-सा काम सिद्ध नहीं हो सकता ॥११॥ इसीलिए मैंने उसे दो अँगुलियाँ दिखाईं कि यदि दो का एकचित्त हो तो संसार में असाध्य क्या है ? ॥१२॥ राजा योगनन्द का अन्तःपुर मरी मछली का हँसना इस प्रकार गूढ़ विज्ञान बतलाने पर राजा अति प्रसन्न हुआ और सपत्नीक मेरी बुद्धि को सुवर्ण लगाकर सुखी हुआ ॥१३॥ एक बार राजा योगनन्द ने ऊपर मुँह किये हुए एक ब्राह्मण अतिथि को झरोखे से देखती हुई अपनी महारानी को देखा ॥१४॥ राजा ने ब्राह्मण को दुराचारी जानकर उसके वध की आज्ञा दे दी। क्योंकि ईर्ष्या विवेक की विरोधिनी होती है। ॥१५॥ राजाज्ञानुसार जब ब्राह्मण वध्यभूमि में ले जाया जा रहा था तब बाजार में रखा हुआ मृत मत्स्य उसे देखकर हँसने लगा ॥१६॥ जब राजा को यह मालूम हुआ तब उसने ब्राह्मण का वध रोक दिया और मुझसे मछली के हँसने का कारण पूछा ॥१७॥ 'सोचकर कहूँगा' ऐसा कहकर मैं राजभवन से चला गया। जब एकान्त में मैंने सरस्वती का ध्यान किया तब सरस्वती ने उपस्थित होकर यह कहा ॥१८॥ उस ताल के पेड़ पर रात को छिपकर बैठो तब वहाँ मछली के हँसने का कारण निश्चय ही सुनोगे ॥१९॥ यह जानकर मैं रात में वहाँ जाकर ताल-वृक्ष पर बैठा और रात को छोटे-छोटे बालकों के साथ आई हुई एक भीषण राक्षसी को देखा ॥२० ॥ बच्चों के भोजन माँगने पर वह राक्षसी बोली कि अभी प्रतीक्षा करो। प्रातःकाल तुम्हें ब्राह्मण का मांस दूँगी। आज वह मारा नहीं गया ॥२१॥ बच्चों ने पूछा कि आज वह क्यों नहीं मारा गया ? तब राक्षसी ने कहा कि उसे देख कर मरा हुआ मत्स्य भी हँसन लगा इसलिए नहीं मारा गया ॥२२॥ बालकों के यह पूछने पर कि 'वह मृत मत्स्य क्यों हँसा ?' राक्षसी बोली कि 'राजा की सभी रानियाँ भ्रष्ट हो गई हैं' ॥२३॥ ८
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर सर्वत्रान्तः पुरे ह्यत्र स्त्रीरूपाः पुरुषाः स्थिताः । हन्यन्तेऽनपराधस्तु विप्र इत्यहसत्त्विति ॥२४॥ भूतानां पार्थिवात्यर्थनिर्विषक्तत्वहासिनाम् । सर्वान्तश्चारिणां ह्येता भवन्त्येव च विक्रियाः ॥२५॥ एतत्तस्या वचः श्रुत्वा ततोऽप्रक्रान्तवाहनम् । प्रातश्च मत्स्यहासस्य हेतुं राज्ञे न्यवेदयम् ॥२६॥ प्राप्य चान्तःपुरेभ्यस्तान्स्त्रीरूपान्पुरुषांस्ततः । बहुमन्यत मां राजा वधाद् विप्रं च मुक्तवान् ॥२७॥ इत्यादि चेष्टितं दृष्ट्वा तस्य राज्ञो विश्रब्धहृदयम् । श्लिष्टे मयि कदाचिच्च तत्रागाच्चित्रकृन्नरः ॥२८॥ अलिखत्स महादेवीं योगनन्दं च तं पटे । सजीवमिव सञ्चित्रं वाक्चेष्टारहितं त्वभूत् ॥२९॥ तं च चित्रकरं राजा तुष्टो वित्तैरपूरयत् । तं च वासगृहे चित्रपटं भित्तावकारयत् ॥३०॥ एकदा च प्रविष्टस्य वासके तत्र सा मम । सम्पूर्णलक्षणा सर्व्वी प्रतिभाति स्म चित्रगा ॥३१॥ लक्षणान्तरसम्बन्धादभ्यूह्य प्रतिभानतः । अथाकारयमंह तस्यास्तिलकं मेखलापदे ॥३२॥ सम्पूर्णलक्षणां तेन कृत्स्नां गतवानहम् । प्रविष्टो योगनन्दोऽथ तिलकं तं व्यलोकयत् ॥३३॥ केनाप्य रचितोऽत्रेति सोऽपृच्छच्च महत्तरान् । ते च न्यवेदयस्तस्मै कर्त्तारं तिलकस्य माम् ॥३४॥ देव्या गुप्तप्रवेशस्थमियं नान्यो मया विना । वेत्ति तज्ज्ञातवानेवमसौ वररुचिः कथम् ॥३५॥ सन्निहितोऽधुना नूनं ममान्तःपुरविप्लवः । दृष्टवागतएवायम् स्त्रीरूपांस्तत्र तान्नरान् ॥३६॥ इति सन्दिग्धयामास योगनन्दः क्रुधा ज्वलन् । जायन्ते बत मूढानां यत्नादा अपि तादृशाः ॥३७॥ ततः स्वैरं समाहूय शकटालं समादिशत् । त्वया वररुचिर्बध्यो देवीविप्रलम्भनादिति ॥३८॥
प्रथम लम्बक ५९
प्रथम लम्बक ५९ राजा के रनिवास में अनेक पुरुष स्त्रियों के रूप में भरे हैं किन्तु यह बेचारा ब्राह्मण बिना अपराध ही मारा जा रहा है—ऐसा सोचकर मत्स्य हँसा था॥२४॥ राजा की अत्यन्त निर्विवेकिता पर हँसनवाले सब के मन्दर में रहनेवाले प्राणियों का ऐसे विचार होते हैं॥२५॥ राक्षसी की इन बातों को सुनकर मैं वहाँ से भाग आया और प्रातःकाल मैंने राजा से मछली के हँसने का कारण बता दिया॥२६॥ मेरे कथनानुसार राजा ने खोज करने पर रनिवास में रहनेवाले स्त्रीवेषधारी अनेक पुरुषों को पकड़ा। तब से मुझ अत्यधिक मानने लगा और ब्राह्मण को भी वध से मुक्त कर दिया॥२७॥ इस प्रकार की राजकीय अव्यवस्थाओं को देखकर मैं खिन्न हो रहा था कि एक बार राजा के पास एक नया चित्रकार आया॥२८॥ उसने एक चित्रपट पर महादेवी और योगनन्द का चित्र ऐसा सजीव बनाया कि वह केवल बोलने की चेष्टा से ही रहित था॥२९॥ राजा ने चित्रकार पर प्रसन्न होकर उसे भरपूर धन दिया और चित्र को अपने निजी भवन (कमरे) की दीवार पर लटकवा दिया॥३०॥ एक बार जब मैं राजा के शयन-कक्ष में गया तब उस चित्र में महारानी के सम्पूर्ण लक्षणों को देखा॥३१॥ अंगराग लक्षणों के सम्बन्ध में मैंने अपनी प्रतिभा के बल से यह जान लिया कि इसकी कमर में तिल का चिह्न होना चाहिए। मैंने चिह्न बना दिया और महारानी को सम्पूर्ण लक्षण से युक्त कर दिया॥३२॥ कुछ समय के अनन्तर राजा जब उस भवन में आया तब उसने मेरे बनाये हुए तिल-चिह्न को देखा॥३३॥ राजा ने उस तिल को देखते ही कामसूत्र के रचयिता से पूछा कि यह चिह्न किसने बनाया? उन्होंने मेरा नाम बता दिया॥३४॥ 'महारानी के गुप्त प्रदेश के इस चिह्न को मेरे बिना दूसरा नहीं जानता इसे वररुचि ने कैसे जान लिया?'॥३५॥ अतः वररुचि ने गुप्त रूप से अवश्य ही मेरी महारानी को भ्रष्ट किया है और इसलिए उसने रनिवास में स्त्रियों का रूप धारण किए हुये पुरुषों को भी देखा होगा॥३६॥ ऐसा सोचकर योगनन्द क्रोध से जलने लगा। सच है मूर्खों में शंका करने वाले अनुगामी ही होते हैं॥३७॥ तब महाराज ने सकटाल को एकान्त कक्ष में बुलाकर कहा कि वररुचि ने महारानी का सतीत्व-भंग किया है। अतः तुम उसे मार डालो ॥३८॥ १ अरेबियन नाइट्स में शहरयार के अन्तःपुर में इसी प्रकार स्त्री-वेषधारी पुरुषों के रहने की चर्चा आती है। २ शेक्सपियर के नाटक सिम्बेललाइन में भी ऐसी शंका का उत्पन्न होना दीखता है।
९० कथासरित्सागर
९० कथासरित्सागर यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा शकटालोऽगमद् बहिः। अचिन्तयच्च शक्तिः स्याद्धन्तुं वररुचिं न मे ॥३९॥ दिव्यबुद्धिप्रभावोऽसावुद्धर्त्ता च ममापदः। विप्रदोषं तद्वरं गुप्तं सम्प्रति स्वीकरोमि तम् ॥४०॥ इति निश्चित्य सोऽभ्येत्य राज्ञः कोपमकारणम्। वृत्तान्तं कथयित्वा मे शकटालोऽब्रवीत्ततः ॥४१॥ अथ कञ्चित्प्रवादाय हर्म्यह त्वं च मद्गृहे। प्रच्छन्नस्तिष्ठ मामस्माद्रक्षितुं कोपनान्नृपात् ॥४२॥ इति तद्वचनाच्छन्नस्तद्गृहैकस्थितोऽभवम्। स चान्यं हत्वा कञ्चिन्मद्वधवार्त्तामये निशि ॥४३॥ एवं प्रयुक्तनीतिं च प्रीत्याऽप्रोचमहं तदा। एको मन्त्री भवान्येन हन्तुं मां न कृता मतिः ॥४४॥ नहि हन्तुमहं शक्यो राक्षसो मित्रमस्ति मे। ध्यातमात्रागतो विश्वं ग्रसते स मदिच्छया ॥४५॥ राजा त्विहेन्द्रदत्ताख्यः सखा वध्यो न मे द्विजः। तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीन्मन्त्री रक्षो मे दर्शयतामिति ॥४६॥ ततो ध्यानागतं तस्मै तद्रक्षोऽहमदर्शयम्। तद्दर्शनाच्च वित्रस्तो विस्मितश्च बभूव सः ॥४७॥ रक्षस्यन्तर्हिते तस्मिन् शकटालः स मां पुनः। कथं ते राक्षसो मित्रं सञ्जात इति पृष्टवान् ॥४८॥ ततोऽहमब्रुवं पूर्वं रक्षार्थं नगरं भ्रमन्। रात्रौ रात्रौ मया प्राप्तदेकैकको नगराधिपः ॥४९॥ तच्छ्रुत्वा योगनन्दो मामकरोन्नगराधिपम्। भ्रमंश्चापश्यमत्राहं भ्रमन्तं राक्षसं निशि ॥५०॥ स च मामवदद् ब्रूहि विख्याते नगरेऽत्र का। सुरूपा स्त्रीति तच्छ्रुत्वा विहस्याहं तमब्रुवम् ॥५१॥ या यस्याभिमता मूर्ख¹ सुरूपा तस्य सा भवेत्। तच्छ्रुत्वा स्वयमेवैनं जितोऽस्मीत्यवदत्स माम् ॥५२॥ प्रश्नमोक्षाद् वधोत्तीर्णं मां पुनश्चाब्रवीदसौ। तुष्टोऽस्मीति सुहृन्मे त्वं सन्निधास्ये च ते स्मृतः ॥५३॥
प्रथम लम्बक ६१
प्रथम लम्बक ६१ 'जो आज्ञा'-ऐसा कहकर शकटाल अपने घर आकर सोचने लगा कि मुझमें वररुचि को मारने की शक्ति नहीं है॥३९॥ उसका बुद्धि-प्रभाव अलौकिक है। उसने मुझे मृत्यु से बचाया है। फिर वह ब्राह्मण है। अतः इस समय इसे गुप्त रखकर (वध की आज्ञा) स्वीकार कर लेता हूँ॥४०॥ ऐसा सोचकर उसने राजा के अकारण क्रोध और मेरी वधाज्ञा मुझे सुनाकर कहा॥४१॥ 'मैं हण्ड्य मशान में किसी डिण्डी चोर को मारकर तुम्हारे वध की घोषणा कर देता हूँ। तुम मेरे घर में छिपकर रहो और उस पापी राजा से मेरी रक्षा करो'॥४२॥ इस प्रकार शकटाल के कहने पर मैं गुप्त रूप से उसके घर में रहने लगा। उसने मेरा वध प्रचारित करने के लिए रात में किसी अन्य का वध करा दिया॥४३॥ इस प्रकार, नीति प्रयोग करनेवाले शकटाल को मैंने एक दिन प्रेमपूर्वक कहा कि 'एक मन्त्री तुम हो जिसने मेरे मारने का विचार नहीं किया॥४४॥ मैं मारा भी नहीं जा सकता क्योंकि मेरा मित्र राक्षस है जो स्मरण करते ही उपस्थित होकर पल-भर में मेरी इच्छा से सारे विश्व का नाश कर सकता है॥४५॥ राजा नन्द मेरा इन्द्रदत्त नामक मित्र है और ब्राह्मण है। अतः वह भी मेरे लिए वध्य नहीं है। शकटाल ने कहा कि 'उस राक्षस को मुझे दिखाओ'॥४६॥ तब स्मरण करते ही आये हुए राक्षस को मैंने उसे दिखा दिया उसे देखकर शकटाल आश्चर्य-चकित और भयभीत हुआ॥४७॥ गुग्गल कौन है? राक्षस के अन्तर्धान होने पर शकटाल ने प्रश्न किया कि 'यह राक्षस तुम्हारा मित्र कैसे हुआ'? ॥४८॥ तब मैंने कहा 'बात जिस प्रकार से हुई वह सुनो। रात को भ्रमण (गश्त) करते हुए प्रतिदिन एक-एक नगर रक्षक (शहर कोतवाल) मारा जाता था॥४९॥ परस्पर परास्त हुए राजा नन्द ने एक बार जब ही नया नगर रक्षक (कोतवाल) बना दिया। तब व्याकुल होकर (नगर रक्षक बनकर) मैंने उस राक्षस को देखा। उसने मुझे देखकर कहा कि 'बताओ इस नगर में सब से सुन्दरी स्त्री कौन है'? तब मैंने हँसकर गुप्त रूप से कहा॥५०॥ 'जो दूसरे को अच्छी दिखाई पड़ती है वही उसके लिए सुन्दरी है।' इस प्रश्न का उत्तर दे कर उसके चंगुल से छूटे हुए भागे हुए को फिर उसने—'हे नगर रक्षक! तुम बड़े चतुर हो' फिर इस प्रकार की वार्तालाप सुनकर हिंसामुखी बात से छुड़ा दिया तथा उपदेश दिया—॥५१॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन्यथागतमगामहम्। एवमापत्सहायो मे राक्षसो मित्रतां गतः ॥५४॥ इत्युक्तवानहं भूयः शकटालेन याचितः। गङ्गामदर्शयं तस्मै मूर्त्तां ध्यानादुपस्थिताम् ॥५५॥ स्तुतिभिस्तोषिता सा च मया देवी शिरोदृशा। बभूव शकटालश्च सहायः प्रणतो मयि ॥५६॥ एकदा च स मंत्री मां गुप्तस्थः सिद्धमब्रवीत्। सर्वथेनापि खेदाय किमात्मा दीयते त्वया ॥५७॥ किं न जानासि यद्राज्ञामविचाररता धियः। अचिराच्च भवेच्छुद्धिस्तथा चात्र कथां शृणु ॥५८॥ आदित्यवर्मनामात्र बभूव नृपतिः पुरा। शिववर्म्माभिधानोऽस्य मन्त्री चाभून्महामतिः ॥५९॥ राज्ञस्तस्यैकदा चका राज्ञी गर्भमधारयत्। तद्बुद्ध्वा स नृपोऽपृच्छदित्यन्तःपुररक्षिणः ॥६०॥ अपंसाय प्रविष्टस्य वर्ततेऽन्तःपुरऽथ मे। तदेषा गर्भसम्भूतिः कुतः सम्प्रति कथ्यताम् ॥६१॥ अथोचुस्ते प्रवेशोऽत्र पुंसोऽन्यस्यास्ति न प्रभो! शिववर्म्मा तु ते मन्त्री प्रविशत्यनिवारितः ॥६२॥ तच्छ्रुत्वाचिन्तयद्राजा नूनं द्रोही स एव मे। प्रकाशं च हते तस्मिन्नपवादो भवेन्मम ॥६३॥ इत्यालोच्य स च युक्त्या शिववर्माणमीश्वरः। सामन्तस्यान्तिकं शत्र्योः प्राहिणोद् भोगवर्मणः ॥६४॥ तद्वधार्थं तस्य लेखेन सन्दिद्य तदनन्तरम्। निगूढं च नृपस्तत्र सप्रहारं व्यसर्जयत् ॥६५॥ याते मन्त्रिणि सप्ताहे गते भीत्या पलायिता। सा राज्ञी रक्षिभिलंघ्या पुंसा स्त्रीरूपिणा सह ॥६६॥ आदित्यवर्मा तद्बुद्ध्वा सानुतापोऽभवत्ततः। धिङ् मया तादृशो मन्त्री घातितोऽकारणादिति ॥६७॥ अत्रान्तरं स च प्राप निकटं भोगवर्मणः। शिववर्म्मा स योगात्साङ्गमपश्यत् पूरणं ॥६८॥
प्रथम लम्बक ६१
प्रथम लम्बक ६१ इस प्रकार कहकर राक्षस के अन्तर्धान हो जाने पर मैं अपने रास्ते से चला गया। इस प्रकार यह राक्षस मेरा मित्र बना ॥५४॥ ऐसा कहकर शकटाल द्वारा पुनः प्रार्थना किये जाने पर मैंने ध्यान से उपस्थित मूर्त्तिमती गंगा को दिखाया ॥५५॥ मुझसे स्तुति द्वारा सन्तुष्ट की गई गंगा देवी तिरोहित हो गईं। यह सब देख-सुनकर शकटाल मुझे प्रणाम करता हुआ मेरा सहायक बन गया ॥५६॥ एक बार मन्त्री शकटाल ने छिपे हुए और खिन्न मुझे देखकर कहा—"तुम अपनी आत्मा में खेद क्यों कर रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि 'राजाओं की बुद्धि अविचार पूर्ण होती है' इसलिए शीघ्र ही तुम्हारी शुद्धि हो जायगी। मैं इस सम्बन्ध में एक कथा सुनाता हूँ सुनो" ॥५७-५८॥ राजा आदित्यवर्मा और मन्त्री शिववर्मा की कथा पूर्वकाल में आदित्यवर्मा नामक एक राजा था। शिववर्मा नामक उसका महा बुद्धिमान् मन्त्री था ॥५९॥ इस राजा की एक रानी एक बार गर्भवती हुई, यह सुनकर राजा ने रक्षकों से पूछा 'मुझे रनिवास में गये हुए दो वर्ष हो गए फिर भी रानी का यह गर्भ-धारण कैसे हुआ—यह बताओ' ॥६०-६१॥ रक्षकों ने कहा—महाराज आपके इस अन्तःपुर में किसी पुरुष का प्रवेश असम्भव है किन्तु आपका मन्त्री शिववर्मा बे-रोक टोक अन्दर आता-जाता है' ॥६२॥ यह सुनकर राजा ने सोचा कि अवश्य यह मन्त्री मेरा द्रोही है, किन्तु इसे प्रकट रूप में मार देने पर मेरी निन्दा होगी ॥६३॥ ऐसा सोचकर राजा ने शिवशर्मा को अपने मित्र सामन्त राजा गोपवर्मा के पास भेज दिया ॥६४॥ उसके जाने के अनन्तर राजा ने गुप्त रूप से मन्त्री का वध करने के लिए पत्र लिखकर छिपे तौर पर पत्रवाहक को भेजा ॥६५॥ मन्त्री के चले जाने पर एक सप्ताह व्यतीत होने के अनन्तर वह गर्भवती रानी भय से भाग गई और सिपाहियों ने उसे स्त्री-रूप धारण किये हुए पुरुष के साथ पकड़ा ॥६६॥ यह समाचार जानकर आदित्यवर्मा शोक से पश्चात्ताप करने लगा कि मैंने ऐसे भले मन्त्री को बिना कारण ही मार डाला ॥६७॥ इसी बीच शिववर्मा भोगवर्मा के पास पहुँचा किन्तु राजाज्ञा का पत्र लेकर पत्रवाहक भी तबतक न पहुँचा ॥६८॥
६४ कथासरित्सागरे
६४ कथासरित्सागरे वाचमित्या च तं लब्धमेकान्ते शिववर्मणः । शशंस बधनिर्देशं भोगवर्मा विधेयताम् ॥६९॥ शिववर्माऽप्यवोचत्तं सामन्तं मन्त्रिसत्तमः । स्वं व्यापार्य मां नो षश्छिन्द्यादात्मानमात्मना ॥७०॥ सच्छ्रुत्वा विस्मयाविष्टो भोगवर्मा जगाद तम् । किमेतद् ब्रूहि मे विप्र ! शापितोऽसि न वक्षि चेत् ॥७१॥ अथ बक्ति स्म तं मन्त्री हृष्यन् यत्र भूपतेः । तत्र द्वादश वर्षाणि देशे दद्यो न वर्षति ॥७२॥ तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणि श्लाघे भोगवर्मा व्यचिन्तयत् । दुष्टः स राजा देशस्य नाशमस्माकमिच्छति ॥७३॥ किं हि तत्र न सन्त्येव वधका गुप्तगामिनः । तस्मान्मन्त्री म वध्योऽसौ रक्ष्यः स्वात्मबवादपि ॥७४॥ इति सम्भ्रथ दत्वा च रक्षका भोगवर्मणा । शिववर्मा ततो देशात्प्रोषितोऽभूत्ततः क्षणात् ॥७५॥ एवं प्रत्याययो जीवन्स मन्त्री प्रज्ञया स्वया । शुद्धिश्वास्यान्द्यतो जाता नहि धर्मोऽन्यथा भवेत् ॥७६॥ इत्थं तवापि शुद्धिः स्यात्तिष्ठ तावद् गृहे मम । कार्यायन नृपोऽप्यद्य सानुतापो भविष्यति ॥७७॥ इत्युक्तः शकटालम् अच्छोऽहं तस्य वेश्मनि । प्रतीक्षमाणोऽवसरं तान्यहान्यत्यवाहयम् ॥७८॥ तस्याथ योगनन्दस्य कालभूते ! कदाचन । पुत्रो हिरण्यगुप्ताख्यो मृगयाय गतोऽभवत् ॥७९॥ अश्ववेगात्प्रमातस्य क्यञ्चिद्दूरमन्तरम् । एकाकिनो वनं तस्य वासरः पर्यहीयत ॥८०॥ ततश्च तां निशां गतुं वृक्षमारेहति स्म सः । क्षणात्तत्र चारोहदृक्षं सिंहम् भीपितः ॥८१॥ स दृष्ट्वा राजपुत्रं तं भीतं मानुषभाषया । मा भैषीर्मम मित्रं त्वमित्युक्त्वा निर्भय व्यधात् ॥८२॥ विस्रम्भाद्वशवाश्यं राजपुत्रोऽथ सुप्तवान् । ऋक्षस्तु जाग्रदेवाशीदथ सिंहोऽथ सोऽब्रवीत् ॥८३
प्रथम लम्बक १५
प्रथम लम्बक १५ दैववश भोगवर्मा ने पत्र को पढ़कर एकान्त में शिववर्मा से उसके वध की बात सुना दी ॥६९॥ मन्त्रिवर शिववर्मा ने भोगवर्मा से कहा कि तुम निर्देश के अनुसार मुझे मारो। यदि नहीं मारोगे तो मैं स्वयं आत्मघात कर लूँगा ॥७० ॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित भोगवर्मा ने शिववर्मा से कहा कि 'हे मित्र ! यह क्या रहस्य है मुझे बताओ। यदि नहीं बताओगे तो मैं तुम्हें शपथ देता हूँ' ॥७१॥ राजा के आग्रह करने पर मन्त्री ने कहा कि 'हे राजन् ! मैं जिस देश में मारा जाऊँगा वहाँ बारह वर्षों तक वृष्टि न होगी—अकाल पड़ेगा' ॥७२॥ यह सुनकर भोगवर्मा चकित होकर अपने मन्त्रियों के साथ सोचने लगा कि आदित्यवर्मा दुष्ट है। वह हमारे देश का विनाश चाहता है ॥७३॥ क्या उसके यहाँ गुप्त हत्या करनेवाले बधिक नहीं हैं। इसलिए मंत्री की रक्षा करनी चाहिए। भले ही आत्महत्या हो जाय किन्तु इसका वध कदापि न किया जायगा ॥७४॥ इस प्रकार मन्त्री शिववर्मा अपनी बुद्धि से जीवित ही लौट आया उसकी निर्दोष- ता दूसरे प्रकार से सिद्ध हो गई। यश कभी विपरीत नहीं होता यश सहायक ही होता है ॥७५-७६॥ वात्स्यायन इसी प्रकार तुम्हारी भी शुद्धि होगी। अर्थात् निर्दोषता प्रमाणित हो जायगी और राजा पश्चात्ताप करेगा ॥७७॥ शर्वदत्त से इस प्रकार कहा हुआ मैं उसी घर में छिपा रहा और अवसर की प्रतीक्षा करता रहा। वे दिन मैंने अत्यन्त कठिनाई से व्यतीत किए ॥७८॥ मित्रद्रोह का फल एक बार उस पाण्ड्य का पुत्र विक्रमतुंग शिकार खेलने के लिए सदा से गया। घोड़े की तेज दौड़ने के कारण राजपुत्र अति दूर गहन वन में पहुँच गया। उस अकेले भ्रमण करने-डरने दिन समाप्त हुआ ॥७९॥ राजपुत्र उस रात को बिताने के लिए एक उपयुक्त पेड़ पर चढ़ गया। कुछ ही समय के अनन्तर सिंह से डराया हुआ एक भालू भी उसी वृक्ष पर आ चढ़ा॥८०॥ भालू राजपुत्र को घबड़ाया हुआ देखकर मनुष्य की भाषा में बोला—'राजपुत्र तू मेरा मित्र है। डर मत। मैं कष्टदायक नहीं। ऐसा कहकर उसने राजपुत्र के हृदय पर अपना विश्वास जमा दिया और उसे निर्भय कर दिया॥८१-८२ ॥ भालू की बातों से विश्वस्त होकर राजपुत्र का भय और श्रम उपशम हुआ। इतने में नीचे से सिंह बोला॥८३॥
५६ कथासरित्सागर
५६ कथासरित्सागर ऋक्ष मानुषमद्य मे क्षिप यावद् व्रजाम्यहम्। ऋक्षस्ततोऽब्रवीत्पाप ! न मित्रं घातयाम्यहम् ॥८४॥ क्रमादृक्षे प्रसुप्ते च राजपुत्रे च जाग्रति। पुनं सिंहोऽब्रवीत्तन्मृक्षं मे क्षिप मानुष! ॥८५॥ तच्छ्रुत्वात्मभयात्तन सिंहस्याराधनाय सः। क्षिप्तोऽपि नापतन्निम्नमृक्षो दैवप्रचोदितः ॥८६॥ मित्रद्रोहिन्मभोन्मत्त इति शापमवाप्य सः। तस्य राजसुतस्तत्त्वं वृत्तान्तावगमावधिम् ॥८७॥ प्राप्यैव स्वगृहं प्रातर्हन्मत्तोऽभून्नृपात्मजः। योगनन्दश्च तद् दृष्ट्वा विषादं सहसागमत् ॥८८॥ अब्रवीच्च स कालऽस्मिञ्जीवेद् वररुचिर्यदि। ज्ञायेत तत्सर्वं धिक् च तद्वधपाटवम् ॥८९॥ तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञः शकटालो व्यचिन्तयत्। हन्त कात्यायनस्यायं समयः काल प्रकाशने ॥९०॥ न सोऽत्र मानी तिष्ठेच्च राजा मयि च विश्वसेत्। इत्यालोच्य स राजानमब्रवीद्याचिताऽभयः ॥९१॥ राजन्ख विषादेन जीवन्वररुचिः स्थितः। योगनन्दस्ततोऽवादीद्द्रुतमानीयतामिति ॥९२॥ अथाहं शकटारेन योगनन्तान्तिकं हठात्। आनीतस्तं तथाभूतं राजपुत्रं व्यलोकयम् ॥९३॥ मित्रद्रोहः कृतोऽनेन देवेत्युक्त्वा तथैव सः। सरस्वतीप्रसादेन वृत्तान्तः कथितो मया ॥९४॥ सतस्तच्छापमुक्तेन स्तुतोऽहं राजसूनुना। त्वया कथमिवं ज्ञातमित्यपृच्छत्स भूपतिः ॥९५॥ अथाहमवदं राजँल्लक्षणैरनुमानतः। प्रतिभातञ्च पश्यन्ति सर्वं प्रज्ञावतां धियः ॥९६॥ तद्यथा तिष्ठतां मातस्तथा सर्वमिदं मया। इति मद्वचनात्साक्षाद्भूद्राजा सञ्जानुतापवान् ॥९७॥ अपानादृतमर्थाश्च परिगृह्यैव मामवान्। स्वगृहं गतवानस्मि धीर हि विदुषां धनम् ॥९८॥
हे भ्रात तुम इस मनुष्य को पेड़ से नीचे फेंक दो। मैं इसे लेकर चला जाऊँ। भालू बोला— 'रे पापी ! यह मेरा मित्र है। मैं मित्र को मरवाना नहीं चाहता' ॥८४॥ क्रमशः भालू के सोने और राजपुत्र के जागते रहने पर सिंह ने राजपुत्र से कहा— 'हे मनुष्य तुम इस भालू को मेरे लिए पेड़ से नीचे फेंक दो' ॥८५॥ यह सुनकर भय के कारण सिंह को प्रसन्न करने के लिए राजपुत्र ने भालू को नीचे फेंकने का यत्न किया। आश्चर्य है कि दैवयोग से तत्काल जागा हुआ भालू उसके यत्न करने पर भी नीचे न गिर सका ॥८६॥ भालू ने राजपुत्र को शाप दिया कि 'हे मित्रद्रोहिन् ! जबतक यह वृत्तान्त प्रकट न होगा तबतक तू पागल बना रहेगा' ॥८७॥ प्रातःकाल राजकुमार राजभवन पहुँचते ही पागल हो गया। योगनन्द, उसकी यह दशा देखकर अकस्मात् अत्यन्त दुःखी हुआ ॥८८॥ राजा ने कहा—'यदि इस समय वररुचि जीवित होता तो इस पागलपन का कारण मालूम होता। उसके मारने में जो मैंने चातुर्य किया इसके लिए मुझे धिक्कार है' ॥८९॥ राजा की बातें सुनकर मन्त्री शकटाल ने सोचा कि यह अवसर वररुचि को प्रकट करने का है ॥९०॥ उसने सोचा कि वररुचि मानी है। अब वह यहाँ मन्त्री बनकर न रह सकेगा और मैं ही एकमात्र सर्वसर्वा रहूँगा। राजा मुझ पर विश्वास करेगा। (तब मैं अपना बदला निर्द्वन्द्व होकर ले सकूँगा) ऐसा सोचकर उसने राजा से अभय की प्रार्थना करके बोला ॥९१॥ इसके अनन्तर शकटाल ने हर्षपूर्वक मुझे योगनन्द के पास पहुँचाया और मैंने उन्मत्त राजपुत्र को देखा ॥९२॥ उसे देखकर मैंने राजा से कहा—'इसने मित्रद्रोह किया है' और गन्धवती की कृपा से उस को रात का सारा वृत्तान्त कह दिया ॥९३॥ मेरे वृत्तान्त कहने पर राजपुत्र शाप से मुक्त होकर मेरी स्तुति करने लगा और राजा ने पूछा कि तुमने इस वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ॥९४-९५॥ तब मैंने कहा—'राजन् ! बुद्धिमान् की बुद्धि अथवा या अनुमान से तथा प्रतिभा से सब कुछ जान लेती है। जैसे मैंने रात्री की कमर में सिंह का ज्ञान किया था। यह सुनकर राजा पश्चात्ताप करने लगा ॥९६-९७॥ तदनन्तर राजा के द्वारा दिये गये सम्मान दान आदि की उपेक्षा करके विरक्तता को बहुत बड़ा लाभ समझकर मैं अपने घर चला गया। कारण यह कि चरित्र की पवित्रता ही विद्वानों का धन है ॥९८॥
प्राप्तस्यैव च तत्रस्थो जनोऽरोदीत्पुरो मम। अभ्येत्य मां समुद्भ्रान्तमुपवर्षोऽब्रवीत्ततः ॥९९॥ राजा हत निशम्य त्वामुपकोशाग्निसाम्बुषु। अकरोदथ मातुस्ते शुचा हृदयमस्फुटत् ॥१ ०॥ तच्छ्रुत्वाभिनवोद्भूतशोकवेगविव्हलः । सद्योऽहमपतं भूमौ वातरुग्ण इव द्रुमः ॥१०१॥ क्षणाच्च गतवानस्मि प्रलापार्ता रसज्ञताम्। प्रियबन्धुविनाशोत्थः शोकाग्निः कं न तापयेत् ॥१०२॥ जातःसारं जगत्त्यस्मिन्का नित्या ह्यनित्यता। तदेतामैश्वरीं मायां किं जानन्नपि मुह्यसि ॥१०३॥ इत्याविभिस्पागत्य वर्षेण वचनैरहम्। बोधितोऽथ यथातत्त्वं कथम्चिद्धृतिमप्तवान् ॥१०४॥ ततो विरक्तहृदयस्त्यक्त्वा सर्व निबन्धनम्। प्रस्थमैकसहायोऽहं तपोवनमक्षियिम् ॥१ ५॥ दिवसष्वप गच्छत्सु तत्तपोवनमकतः। अयोध्यात उपागच्छद् विप्र एको मयि स्थितः ॥१ ६॥ स मया योगनन्दस्य राज्यवार्तामपृच्छ्यत। प्रत्यभिज्ञाय मां सोऽथ सशोकमिदमब्रवीत् ॥१ ७॥ शृणु नन्दस्य यद्वृत्तं तत्सकाक्षाद् गते त्वयि। [L20: लब्धावकाशस्तत्राभूच्छकटालश्चिरेण सः ॥१०८॥ स चिन्तयन्बधोपायं योगनन्दस्य युक्तितः। क्षितिं खनन्तमद्राक्षीच्चाणक्याख्यं द्विजं पथि ॥१ ९॥ किं भुवः खनसीत्युक्ते तेन विप्रोऽथ सोऽब्रवीत्। दर्भमुन्मूलयाम्यत्र पाने येतेन मे क्षतः ॥११ ०॥ तच्छ्रुत्वा सहसा मन्त्री कोपनं क्रूरनिश्चयम्। तं विप्रं योगनन्दस्य बधोपायममन्यत ॥१११॥ नाम पृष्ट्वाऽब्रवीच्च व हे ब्रह्मन् दापयामि ते। अह त्रयोदशीनाद्य गृहे नन्दस्य भूपतेः ॥११२॥ दक्षिणातः सुवर्णस्य लक्षं तव भविष्यति। भोक्ष्यस धुरि चास्येपामर्हि तावद् गृहं मम ॥११३॥
प्रथम लम्बक ६९
प्रथम लम्बक ६९ मेरे घर पहुँचते ही वहाँ के सभी मनुष्य मेरे सामने आकर रोने लगे। इस प्रकार, व्याकुल मुझे उपवर्ष (श्वशुर) ने कहा—॥१९॥ ‘राजा के द्वारा तुम्हारे मारे जाने का समाचार सुनकर उपकोशा ने शरीर को अग्नि में दग्ध कर दिया और तुम्हारी माता का हृदय शोक से फट गया’ ॥१ ॥ यह सुनकर अमितव शोक के आक्रमण से मूर्च्छित होकर मैं हवा से गिराये हुए वृक्ष के समान भूमि पर गिर पड़ा ॥१ २॥ मूर्च्छित होने के अनन्तर ही पागलों की भाँति प्रलाप करने लगा। प्रियतम बन्धु के विनाश से उत्पन्न शोक-अग्नि किसे उत्तप्त नहीं करती ॥१ २॥ ‘इस अनन्त संसार में अनित्यता ही एकमात्र नित्य वस्तु है, इस बात (ईश्वरी माया) को जानते हुए भी तुम साधारण मनुष्यों के समान क्यों मोहित हो रहे हो ? आचार्य वर्ष ने आकर ऐसे वचनों से मुझे प्रतिबोधित किया तब किसी प्रकार मुझे धैर्य प्राप्त हुआ ॥१ ३-१ ४॥ वररुचि का वैराग्य और महाप्रस्थान तदनन्तर विरक्तहृदय होकर और सांसारिक सभी बन्धनों को छोड़कर मैं शान्तिपूर्वक तपोवन की शरण में गया ॥१ ५॥ कुछ दिनों के अनन्तर मेरे तपोवन में रहते ही उसमें एक ब्राह्मण अयोध्या से आया ॥१ ६॥ मैंने उस ब्राह्मण से योगनन्द की राज्य-स्थिति के सम्बन्ध में पूछा। उसने मुझे पहचान कर शोक के साथ कहा ॥१ ७॥ सुनो मन्त्रिवर्य त्यागकर तुम्हारे चले जाने पर धीरे-धीरे शकटाल का चिरकाल के बाद अवसर मिला ॥१ ८॥ शकटाल ने युक्ति द्वारा नन्द के वध का उपाय सोचते-सोचते पृथ्वी को खोदते हुए चाणक्य नामक ब्राह्मण को मार्ग में देखा ॥१ ९॥ शकटाल के यह पूछने पर कि ‘तुम भूमि क्यों खोद रहे हो ?’ उस ब्राह्मण ने कहा कि ‘मैं कुशांकुरों का उन्मूलन कर रहा हूँ क्योंकि इसने मेरे पैरों में व्रण (घाव) कर दिया' ॥११० ॥ चाणक्य की कथा शकटाल ने उस ब्राह्मण का नाम पूछकर कहा—'हे ब्राह्मण मैं तुम्हें राजा नन्द के घर में त्रयोदशी तिथि को श्राद्ध का निमन्त्रण देता हूँ ॥१११॥ भोजन की दक्षिणा से तुम्हें एक लाख सोने की मुहरें प्राप्त होंगी एवं और भी ब्राह्मणों में ऊँचे बैठकर भोजन करोगे। आओ मेरे घर पर' ॥११२-११३॥ १ विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में इस वार्ता को प्रकारान्तर से लिया गया है, किन्तु मुद्राराक्षस की कथा का आधार यही है। चाणक्य के विषय में विस्तृत और ऐतिहासिक विवेचन परिशिष्ट में देखिए।
कथासरित्सागर
४० कथासरित्सागर
इत्युक्त्वा शकटालस्तं चाणक्यमनयद् गृहम्। श्राद्धाहेऽदर्शयत् च राज्ञे स ददृशे च तम्॥११४॥ ततः स गत्वा चाणक्यो धुरि ग्राह उपाविशत्। सुबन्धुनामा विप्रश्च तामच्छद्धुरमात्मनः॥११५॥ तद्गत्वा शकटालेन विज्ञप्तो मन्दभूपतिः। अवादीन्नापरो योग्यः सुबन्धुर्धुरि तिष्ठतु॥११६॥ आगत्यतां च राज्ञाज्ञां शकटालो भयानतः। न मेऽपराध इत्युक्त्वा चाणक्याय न्यवेदयत्॥११७॥ सोऽथ कोपेन चाणक्यो ज्वलन्निव समन्ततः। निजां मुक्त्वा शिखां तत्र प्रतिज्ञामकरोदिमाम्॥११८॥ अवश्यं हन्त नन्दोऽयं सप्तभिर्दिवसैर्मया। विनाश्यो वन्धनीयैषा ततो निर्मथ्युना शिखा॥११९॥ इत्युक्तवन्तं कुपिते योगनन्दे पलायितम्। अलक्षितं स्वगेहे तं शकटाखो न्यवेशयत्॥१२०॥ तत्रोपकरणं दत्ते गुप्तं तेनैव मन्त्रिणा। स चाणक्यो द्विजः क्वापि गत्वा कृत्यामसाधयत्॥१२१॥ तयोद्गाढोगनन्योऽथ दाहज्वरमवाप्य सः। सप्तमे दिवसे प्राप्ते पञ्चत्वं समुपागमत्॥१२२॥ हत्वा हिरण्यगुप्तं च शकटालेन तत्सुतम्। पूर्वनन्दसुते लक्ष्मीश्चन्द्रगुप्ते निवेशिता॥१२३॥ मन्त्रित्वे तस्य चाभ्यर्च्य बृहस्पतिसमं धिया। चाणक्यं स्थापयित्वा तु स मन्त्री कृतकृत्यताम्॥१२४॥ मन्वानो योगनन्दस्य कृतवैरप्रतिक्रियः। पुत्रशोकेन निर्विण्णः प्रविवेश महद् वनम्॥१२५॥ इति तस्य मुखाच्छ्रुत्वा विप्रस्य सुतरामहम्। काणभूते ! गतः सर्वं सर्वमालोक्य चञ्चलम्॥१२६॥ तदाञ्चाहमिमां द्रष्टुमागता विन्ध्यवासिनीम्। तत्प्रसादेन दृष्ट्वा स्पो स्मृता जातिर्मया मम॥१२७॥ प्राप्तं दिव्यं च विमानं मयोपेता च महावचाः। इदानीं शीर्णपापोऽहं यतिष्ये देहमुज्झितुम्॥१२८॥ एष च मम्प्रति तिष्ठतु यावदायाति तेऽन्तिकम्। शिष्ययुक्तो गुणाढ्याख्यस्तत्समात्रात्रयोऽसि ॥१२९॥
प्रथम लम्बकः ७१
प्रथम लम्बकः ७१ ऐसा कहकर शकटाल उस चाणक्य ब्राह्मण को अपने घर ले गया। श्राद्ध के दिन उस राजा के पास ले गया और राजा ने उसे स्वीकार किया ॥११४॥ अनन्तर श्राद्ध के अवसर पर आकर चाणक्य सबसे ऊपर बैठ गया किन्तु सुबन्धु नामक ब्राह्मण उस स्थान को अपने लिए चाहता था॥११५॥ शकटाल ने राजा नन्द के पास जाकर ऊपर बैठन का झगड़ा सुनाया। नन्द ने कहा— सुबन्धु ही सबसे ऊपर बैठेगा। दूसरा योग्य नहीं है। ॥११६॥ भय से नीचे मुँह किये हुए शकटाल ने श्राद्ध-स्थान में आकर, चाणक्य को वह राजाज्ञा सुना दी और कहा कि इसमें मेरा अपराध नहीं है, यह राजाज्ञा है॥११७॥ राजाज्ञा को अपना अपमान समझते हुए क्रोध से जलकर चाणक्य ने अपनी शिखा को खोलकर यह प्रतिज्ञा की॥११८॥ सात दिनों के भीतर राजा नन्द को अवश्य मार डालूँगा। तभी मैं क्रोध-रहित होकर शिखा को बाँधूँगा॥११९॥ ऐसा कहते हुए चाणक्य पर योगनन्द के कुपित होने के कारण वह वहाँ से भागा और शकटाल ने गुप्त रूप से उसे अपने घर में रख लिया॥१२० ॥ शकटाल मन्त्री के द्वारा सामग्री दिये जाने पर वह ब्राह्मण वहीं एकान्त में जाकर कृत्या की साधना करने लगा॥१२१॥ उस कृत्या के प्रभाव से राजा नन्द दाह-ज्वर से सातवें दिन मर गया॥१२२॥ योगनन्द के मरने पर शकटाल ने उसके पुत्र हिरण्यगुप्त को मारकर (असल) नन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बना दिया॥१२३॥ चन्द्रगुप्त की मन्त्रिता के लिए बृहस्पति के समान बुद्धिमान् चाणक्य को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कराकर शकटाल पुत्रों के शोक से विरक्त होकर भीषण वन में चला गया॥१२४ १२५॥ हे राजसूनो ! उस ब्राह्मण के मुख से नन्द-राज्य की समस्त कथा सुनकर मुझे अत्यन्त खेद हुआ कि यह सारा प्रपञ्च अनित्य है॥१२६॥ इसी खेद के कारण मैं विन्ध्यवासिनी का दर्शन करने के लिए यहाँ आया। इनकी कृपा से तुम्हें देखकर मुझे अपना पूर्वजन्म का स्मरण हुआ॥१२७॥ और जाति-स्मरण होने के कारण दिव्य विज्ञान भी प्राप्त हो गया। अब मैं पापमुक्त होकर शरीर छोड़ने का यत्न करूँगा॥१२८॥ हे राजसूनो ! तुम तबतक यहीं रहो, जबतक तीन ब्राह्मणों को छोड़े हुए गुणाढ्य नामक ब्राह्मण शिष्यों के साथ तुम्हारे पास आता है॥१२९ ॥
७२ कथासरित्सागर
७२ कथासरित्सागर सोऽपि इहमिव क्रोधादृष्या शप्तो गणोत्तम । माल्यवान्नाम मत्पक्षपाती मर्त्यत्वमागतः ॥१३०॥ तस्मै महेश्वरोक्तैषा कथनीया महाकथा । यतस्त्वं शापनिर्मुक्तिस्तस्य चापि भविष्यति ॥१३१॥ एव वररुचिस्तेन काणभूतिर्निवर्च स । प्रतस्थे देहमोक्षाय पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥१३२॥ गच्छन्वन्द्य गङ्गायां सोऽथ शाकाशिनं मुनिम् । तत्समक्षं च तस्यो कुशनाभूरकरक्षतिः ॥१३३॥ ततोऽस्य रुधिरं निघ्नंस्तन शाकरसीकृतम् । अहङ्कारपरीक्षार्थं कौतुकात्स्वप्रभावतः ॥१३४॥ तद्दृष्ट्वा हन्त सिद्धोऽस्मीत्यगाद्दर्पमसौ मुनिः । ततो वररुचिः किञ्चिद् विहस्यैव जगाद तम् ॥१३५॥ जिज्ञासनाय रक्तं ते मया शाकरसीकृतम् । यावन्नाद्याप्यहङ्कारः परित्यक्तस्त्वया मुने ॥१३६॥ ज्ञानमार्गे अहङ्कारः परिपन्थी दुरतिक्रमः । ज्ञानं विना च नास्त्येव मोक्षो व्रतशतैरपि ॥१३७॥ स्वगस्तु न मुमुक्षूणां क्षयी चित्तं विलोभयेत् । तस्मादहङ्कृतित्यागाज्ज्ञाने यत्नं मुने ! कुरु ॥१३८॥ विनीयैवं मुनिं तं प्रयतं कृतस्तुतिः । तं बदर्याशमोद्देशं शान्तं वररुचिर्ययौ ॥१३९॥ अथ स निबिडभक्त्या तत्र देवीं शर्वाणीं शरणमुपगतोऽसौ मय्यभावं मुमुक्षुः । प्रकटितनिजमूर्तिः सापि तस्मै शशंस स्वयममरससृष्ट्यां धारणां देहमुक्त्यै ॥१४०॥ दग्ध्वा शरीरमथ धारण्या तया तद्- दिव्यां गतिं वररुचिः स निजां प्रपेदे । विन्ध्याटवीभुवि ततः स च काणभूति- रासीदभीप्सितगुणाढ्यसमागमोत्कः ॥१४१॥ इति महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके पञ्चमस्तरङ्गः ।
प्रथम लम्बक ७१
प्रथम लम्बक ७१ वह गुणाढ्य भी मेरा पक्षपाती शिवजी का माल्यवान् नामक उत्तम गण है। मेरा पक्षपात करने के कारण पार्वती ने उसे क्रोध से शाप दिया इसीलिए मानव-योनि में उत्पन्न हुआ है॥१३०॥ इस गुणाढ्य को शिवजी के द्वारा कही गई और मुझसे सुनाई गई यह कथा सुनाना। तब तुम्हारी और उसकी शाप-मुक्ति होगी ॥१३१॥ इस प्रकार वररुचि काणभूति को कहकर शरीर-त्याग करने के लिए पवित्र बद्रिकाश्रम को गया ॥१३२॥ शाकाहारी मुनि की कथा बद्रिकाश्रम जाते हुए वररुचि ने गङ्गातट पर एक शाकाहारी ब्राह्मण को देखा। वररुचि के सामने ही उस ऋषि का हाथ कुश से कट गया ॥१३३॥ उस ऋषि के अहंकार की परीक्षा के लिए तथा कौतुक से उस निकलते हुए रक्त को वररुचि ने अपने प्रभाव से शाक का रस बना दिया ॥१३४॥ अपने इस प्रभाव को देखकर उस मुनि को घमंड उत्पन्न हुआ यह देखकर वररुचि ने मुसकराते हुए कहा ॥१३५॥ मैंने तुम्हारी परीक्षा के लिए रक्त को शाक का रस बना दिया। किन्तु मालूम हुआ कि अभी तक तुमने अहंकार को त्यागा नहीं है ॥१३६॥ अहंकार, ज्ञानमार्ग में कठिनाई से हटनेवाली बाधा है और ज्ञान के बिना सैकड़ों यज्ञों से भी मुक्ति नहीं होती ॥१३७॥ पुण्यों के क्षीण होने पर नष्ट हो जानेवाला स्वर्ग मुक्ति चाहनेवाला को आकृष्ट नहीं करता। इसलिए अहंकार का त्याग कर मुक्ति के लिए यत्न करो ॥१३८॥ इस प्रकार मुनि को शिक्षा देकर और नम्र होते हुए उससे स्तुति किया गया वररुचि प्रणाम-पावन बद्रिकाश्रम के स्थान को गया ॥१३९॥ मनुष्य-देह को छोड़ने की इच्छा से वररुचि बद्रिकाश्रम में गाढ़ी भक्ति के साथ देवी की शरण में प्राप्त हुआ। देवी ने स्वयं प्रकट होकर, शरीर की मुक्ति के लिए उसे स्वयं योग द्वारा शरीर से निकली हुई अग्नि से देहपात करने के लिए कहा अर्थात् अपने शरीर से उत्पन्न योगाग्नि से अपने शरीर की मुक्ति के लिए उसे भस्म करो ॥१४०॥ इस प्रकार वररुचि उसी देवी के द्वारा निर्दिष्ट परम्परा से योगाग्नल से मानव-शरीर को दग्ध करके अपनी यक्ष-गति को प्राप्त हुआ और उधर काणभूति दृष्टिगत गुणाढ्य के समागम के प्रति उत्कण्ठित था ॥१४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का पंचम तरंग समाप्त