कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
चतुर्थ लम्बक ४३१
चतुर्थ लम्बक ४३१ अपने विशालपंखों की छाया से आकाश को छाये हुए गरुड़ ने चोंच मारकर उस महाप्राणी जीमूतवाहन को उठा लिया॥२२३॥ बहती हुई रक्तधारावाले और उखड़कर गिरी हुई सिर की मणिवाले जीमूतवाहन को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर उसका भक्षण करने लगा॥२२४॥ इसी समय आकाश से पुष्पवृष्टि हुई। गरुड़ भी यह क्या है ऐसा सोचकर आश्चर्य चकित हो गया॥२२५॥ इतने में ही वह शंखचूड़ भी गोकर्णेश्वर शिव को प्रणाम करके आ गया और उसने वध्यशिला को रक्त से सचंप पाया॥२२६॥ और सोचने लगा कि धिक्कार है मुझे। उस महात्मा ने निश्चय ही मेरे लिए जीवन-दान दिया है। गरुड़ इस समय उसे कहाँ ले गया होगा॥२२७॥ मैं उसे शीघ्र खोजता हूँ। सम्भव है, मैं उसे प्राप्त कर लूँ। ऐसा सोचकर वह सज्जन रक्त की धारा के पीछे-पीछे चला॥२२८॥ उधर, जीमूतवाहन को प्रसन्न देखकर गरुड़ ने उसका भोजन करना छोड़ दिया और आश्चर्यान्वित हो उसे देखने लगा॥२२९॥ 'यह नाग नहीं कोई दूसरा ही जीव है, जो मेरे खाये जाने पर भी मरता नहीं प्रत्युत इसके विपरीत प्रसन्न हो रहा है' ॥२३०॥ इस प्रकार मन में सोचते हुए गरुड़ को अपनी दृष्टिसिद्धि के लिए जीमूतवाहन बोला—॥२३१॥ 'हे पक्षिराज ! अब भी मेरे शरीर में मांस और रक्त है। फिर भी तुम बिना तृप्त हुए ही खाने से सहसा क्यों रुक गये हो ? ॥२३२॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित गरुड़ ने पूछा—हे सज्जन तुम नाग नहीं बताओ कौन हो ? ॥२३३॥ 'मैं नाग ही हूँ तुम खाओ। जो प्रारम्भ किया है, उसे समाप्त करो। महान् व्यक्ति किसी कार्य को जिसको आरम्भ किया हो समाप्त किये बिना नहीं छोड़ते'॥२३४॥ जीमूतवाहन जबतक ऐसा कह ही रहा था तबतक शंखचूड़ दूर से चिल्लाकर बोला—॥२३५॥ 'हे गरुड़ ! इसे मत खाओ मत खाओ। यह नाग नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य नाग मैं हूँ। तुम्हें यह सहसा भ्रम कैसे हो गया। इसे छोड़ दो'॥२३६॥ यह सुनकर पक्षिराज गरुड़ अत्यन्त व्याकुल हो गया और जीमूतवाहन को अपनी अभीष्ट सिद्धि न होने का खेद हुआ॥२३७॥
४६२ कथासरित्सागर
४६२ कथासरित्सागर ततोऽप्योव्यसमालाप्रचन्दद्विद्याधराधिपम् बुद्धवा तं भक्षितं मोहाद् गरुत्मानभ्यतप्यत ॥२३८॥ अहो बत मूढस्य पापमापतितं मम । किं वा सुलभपापा हि भवन्त्युन्मार्गवृत्तयः ॥२३९॥ श्लाघ्यस्त्वय महात्मैष परार्थप्राणदायिना । ममेति मोहकृद्वक्ष येन विश्वमधः कृतम् ॥२४०॥ इति तं चिन्तयन्तं च गरुडं पापशुद्धये । वह्निं विविक्षुं जीमूतवाहनोऽथ जगाद स ॥२४१॥ पक्षिन्द्र किं विषण्णोऽसि सत्यं पापाद् बिभेषि चेत् । सन्दिदानीं न भूयस्ते भक्ष्याहीमे भुजङ्गमाः ॥२४२॥ कार्यश्चानुशयस्तेषु पूर्वभक्तेषु भोगिषु । एषोऽत्र हि प्रतीकारो वृथान्यच्चिन्तितं तव ॥२४३॥ इत्युक्तस्तेन स प्रीतस्ताख्यो भूतानुकम्पिना । तथेति प्रतिपेदे तद्वाक्यं तस्य गुरोरिव ॥२४४॥ ययौ चामृतमानेतुं नाकाञ्जीवयितुं जवात् । क्षताङ्गं तत्र तं चाप्यानस्थिशेषानहीनपि ॥२४५॥ ततश्च साक्षादागत्य देव्या सिक्तोऽमृतेन स । जीमूतवाहनो गौर्या तद्भार्याभक्तितुष्टया ॥२४६॥ तेनाधिकतरोद्भूतकान्तिर्ग्व्यङ्गानि जज्ञिरे । तस्य सानन्दगीर्वाणदुन्दुभिध्वनिभि सह ॥२४७॥ स्वस्थोत्थितं ततस्तस्मिन्नानीय गरुडोऽपि तत् । कृत्स्ने बेलातटेऽप्यथ ववर्षामृतमम्बरात् ॥२४८॥ तेन सर्वे समुत्तस्थुर्जीवन्तस्तत्र पन्नगाः । बभौ तच्च तदा भूरिभुजङ्गकुलसङ्कुलम् ॥२४९॥ बेलावनं विनिर्मुक्तबैनतेयभय तत । पातालमिव जीमूतवाहनालोकनागतम् ॥२५० ॥ ततोऽक्षयेण देहेन यशसा च विराजितम् । बुद्ध्वाभ्यनन्दत् बन्धुजनो जीमूतवाहनम् ॥२५१॥ ननन्द तस्य भार्या च सन्नातिः पितरौ तथा । को न प्रहृष्येद् दृष्टेन सुसत्त्वपरिघातिना ॥२५२॥
चतुर्थ लम्बक ४६१
चतुर्थ लम्बक ४६१ तदनन्तर परस्पर वार्तालाप के प्रसंग में सिसकते हुए उसे विद्याधरों का राजा जानकर और भ्रम से उसे खाकर गरुड़ को भारी मानसिक ताप हुआ ॥२३८॥ वह सोचने लगा कि मुझ जैसा क्रूर ने भारी पाप किया। उच्छृङ्खल वृत्ति के व्यक्तियों से पाप हो जाना सुलभ या स्वाभाविक है। यह एक प्रशंसनीय महात्मा है जो दूसरों के लिए अपने प्राण दे रहा है। मैंने अज्ञानवश संसार को नीचा कर दिया ॥२३९ २४ ॥ इस प्रकार पश्चात्ताप कर पापमुक्ति के लिए आग में जलकर प्राण-त्याग करने की बात सोचते हुए गरुड़ को जीमूतवाहन ने कहा—॥२४०॥ 'हे पक्षीराज ! दुःखी क्यों हो रहे हो। यदि सचमुच पाप से डरते हो तो आज से इन सर्पों का भक्षण करना छोड़ दो। पहले जिन्हें खा चुके हो उनके लिए पश्चात्ताप करो। यही इसका प्रायश्चित्त या प्रतिक्रिया है। और कुछ सोचना व्यर्थ है' ॥२४२-२४३॥ इस प्रकार प्राणियों पर दया करनेवाले जीमूतवाहन के कहने पर गरुड़ ने उसके वचन को गुरु की आज्ञा के समान माना ॥ २४४॥ और, तदपश्चात् वह खाये हुए नागों को जीवित करने के लिए अमृत लेने गया। उस अमृत से क्षत-विक्षत अंगवाले जीमूतवाहन पर उसकी पत्नी मलयवती की भक्ति से सन्तुष्ट गौरी ने स्वयं आकर अमृत-सिंचन किया। स्वयं गौरी के अमृत-सिंचन से अधिक मनोहर होने के कारण उसकी शोभा और बढ़ गई। लावण्ययुक्त देवताओं के भाव-बोध के साथ स्वस्थ होकर उठे जीमूतवाहन को देखकर गरुड़ ने समूचे समुद्र-तट पर अमृत की वर्षा कर दी ॥२४५ २४८॥ इस अमृत-सिंचन से तट पर इधर-उधर बिखरे हुए सभी नाग-कंकाल पुनर्जीवित हो उठे। फलतः वह शंखा-वत्त नागों के झुंडों से भर गया और उन्हें सर्वदा के लिए गरुड़ के भय से मुक्ति मिल गई ॥२४९॥ ऐसा प्रतीत होता था कि नागकुल के रक्षक जीमूतवाहन को देखने के लिए मानो सारा पाताल वहीं आ गया हो ॥२५०॥ तदनन्तर अक्षय शरीर और अक्षय यश से शोभित जीमूतवाहन का समस्त बन्धुओं ने अभिनन्दन किया ॥२५१॥ जीमूतवाहन की पत्नी और उसके माता-पिता सभी परम प्रसन्न हुए। सच है दुःख के सुख-रूप में परिणत हो जाने पर कौन प्रसन्न नहीं होता ॥ २५२॥
४६४ कथासरित्सागर
४६४ कथासरित्सागर विवस्वन्तमिव च द्योः शङ्खचक्रगदाधरम् । न्यग्रोधमण्डलेऽपश्यद् वेश्माभ्यन्तरमञ्जसा ॥ ५३॥ ततः प्राविशदाश्चर्यतरमस्यापरं गृहं प्रत्युद्गतं वितानीकृतमण्डपं सन्ततम् । मन्दारपुष्पवर्षैर्निश्चिन्तितानुद्धतं गङ्गावर्त्ताकारैश्च मणिरत्नप्रदीपैर्विराजितम् ॥ ५४॥ मध्ये चापश्यदेनां शुभां प्राग्दृष्टां च तरुणीम् । मन्दरोन्मथिताम्बुधेश्चन्द्रिकामिवोद्गताम् ॥ ५५ ॥ ताराभिरिव संकीर्णां विलोक्यैतां च मन्दरात् । पार्श्वगस्य शुश्राव विद्याधरपतेर्गिरम् ॥ ५६॥ एष शङ्खचक्रगदाधरोऽपरापराजितः । अभ्यन्तरपदेऽनेन संलग्नोऽस्ति महान् ॥ ५७॥ इत्याकर्ण्य कथां दिव्यामेतामादौ समाहितमनाः । दृष्ट्वा च तां कन्यां तद्रूपानन्दपूरिता ॥ ५८॥ ततः स राजा शुश्राव गीतिं तस्याः सुमधुरस्वरसंयुक्तां वीणावादनतत्पराम् । दिव्यस्त्रीसदृशाकारां दृष्ट्वा तां हृष्टचेताः स राजा तां विलोक्य ॥ ५९॥ एवं संचिन्त्य स नृपस्तस्याः समीपं गत्वा सादरमुक्तवानिति । ततोऽवदन्नृपः .................................................. .................................................. .................................................. .................................................. .................................................. .................................................. ..................................................
चतुर्थ लम्बक ४६५
चतुर्थ लम्बक ४६५ जीमूतवाहन के कहने पर शंखचूड़ भी रसातल को गया और जीमूतवाहन का यश तीनों लोकों में फैल गया॥ २५३॥ तदनन्तर प्रेम से नम्र देवताओं के समूह गरुड़ के पास आकर उस विद्याधर-कुल के तिलक जीमूतवाहन को प्रणाम करने लगे। पार्वती की कृपा से मतंग नामक जीमूतवाहन के सम्बन्धी भी भय से जाकर उसे प्रणाम करने लगे जो पहले उसके विरुद्ध थे॥ २५४॥ उन्हीं पूर्वविरोधी बन्धुओं से प्रार्थना किया गया जीमूतवाहन अपनी पत्नी मलयवती और प्रियमित्र मित्रावसु के साथ मलयाचल से हिमाचल पर अपनी प्राचीन राजधानी को गया॥२५५॥ इस प्रकार उस धैर्यशाली जीमूतवाहन ने चिरकाल तक विद्याधर-चक्रवर्ती पद का उपभोग किया ॥२५६॥ अपने इस उज्ज्वल चरित्र से तीनों लोकों के हृदयों को चमत्कृत करनेवाले महापुरुषों की कल्याण-परम्परा स्वयं उनके समीप आती है ॥२५७॥ महारानी वासवदत्ता यौगन्धरायण के मुख से इस अद्भुत कथा को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई ॥२५८॥ तदनन्तर प्रसन्न देवताओं के निरन्तर आवेश प्राप्त होते रहने के कारण इसी प्रसंग की चर्चा करती हुई अपने पति के निकट बैठी वासवदत्ता ने विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती अपने पुत्र की कथा में वह दिन व्यतीत किया ॥ २५९॥ नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त तृतीय तरंग वासवदत्ता का स्वप्न कुछ समय के अनन्तर एक दिन वासवदत्ता मन्त्रियों के साथ बैठे हुए वत्सराज से एकान्त में इस प्रकार कहने लगी—॥१॥ 'हे आर्यपुत्र ! जबसे मैंने इस गर्भ को धारण किया है, तब से मुझे इसकी रक्षा के लिए हृदय में अत्यधिक व्याकुलता बढ़ रही है ॥२॥ इसी प्रकार की चिन्ता करती हुई मैं आज रात किसी प्रकार सोई। नींद आने पर मैंने स्वप्न में एक पुरुष को देखा ॥३॥ ५९
४६६ कथासरित्सागर
४६६ कथासरित्सागर भस्माङ्गरागसितया क्षेत्तरीकृतचन्द्रया। पिङ्गङ्गजटामूर्ध्न्या क्षोभितं सूरुहस्तया ॥४॥ स च मामभ्युपेत्येव सानुकम्प इवाबदत् । पुत्रि ! गर्भकृते चिन्ता न कार्या काचन त्वया ॥५॥ अह तर्बेनं रक्षामि दत्तो ह्येष मयैव ते । किञ्चायच्छृणु वक्ष्याव तव प्रत्ययकारणम् ॥६॥ श्व कापि नारी विज्ञाप्तिहेतोर्युष्मानुपैष्यति । अवष्टभ्यैव साक्षेपमाक्रयन्ती निज पतिम् ॥७॥ सा च दुश्चारिणी योषित् स्वबान्धवबलात् पतिम् । त घातयितुमिच्छन्ती सब मिथ्या ब्रवीति तत् ॥८॥ त्व चात्र पुत्रि ! वत्सस्य पूर्व विज्ञापयस्तया । तस्या सकाशात्स यथा साधुर्मुच्येत कुस्त्रिय ॥९॥ इत्यादिश्य गते तस्मिन्नन्तर्धान महार्मान । प्रबुद्धा सहसैवाह विभाता च विभावरी ॥१ ॥ एवमुक्ते तया देव्या शर्वानुग्रहवादिन । तत्रासन्विसिमता सर्वे संवादापेक्षिमानसा ॥११॥ तस्मिन्नव क्षण चात्र प्रविश्यार्त नुकम्पिनम् । वत्सराज प्रतीहारमुस्त्याऽकस्माद्व्यजिज्ञपत् ॥१२॥ आगता देव विज्ञप्त्यै कापि स्त्री बान्धवैर्वृता। पञ्चपुत्रान् गृहीत्वा स्वमाक्षिप्य विषण्ण पतिम् ॥१३॥ तच्छ्रुत्वा नृपतिर्देवीस्वप्नसम्वादविस्मित । प्रवेश्यतामिहैवेति प्रतीहारं तमादिशत् ॥१४॥ स्वप्नसत्यत्वसञ्जातमत्पुत्रप्राप्तिनिश्चया । देवी वासवदत्तापि सा सम्प्राप परां मुदम् ॥१५॥ अथ द्वारोन्मुख सर्वेरीक्ष्यमाणा सकौतुकम् । प्रतीहारानुया योषिद् भर्तृयुक्ता विवेश सा ॥१६॥ प्रविश्याश्रितवेन्था च यथाक्रमकृतानति । मध संसदि राजानं सदेवीक व्यजिज्ञपत् ॥१७॥ मय निरपराधाया मम भर्त्ता मदश्रपि । न प्रयच्छत्यनाथाया भोजनाच्छादनादिकम् ॥१८॥
चतुर्थ लम्बक ४६७
चतुर्थ लम्बक ४६७ उस पुरुष की मूर्ति भस्म के अंगराग से श्वेत थी और मस्तक पर चन्द्रमा था। उसकी लम्बी-लम्बी और पीले रंग की जटाएँ थीं और हाथ में त्रिशूल था॥४॥ उसने मेरे पास आकर मानों दयार्द्र होकर कहा — 'बेटी! तुम्हें अपने गर्भ के सम्बन्ध में कोई भी चिन्ता नहीं करनी चाहिए॥५॥ मैं तेरे गर्भ की रक्षा करता हूँ और मैंने ही तुझे यह गर्भ दिया है। तुम्हारे विश्वास के लिए एक बात और बता दूँ, सुनो॥६॥ प्रातःकाल कोई एक स्त्री अपने पति को पकड़कर डाँटती-डपटती और उसे खींचती हुई कुछ निवेदन करने के लिए तुमलोगों के पास आवेगी ॥७॥ यह स्त्री दुराचारिणी है और अपने बन्धुजन के बलपर पति को मारना चाहती है। वह मिथ्या भाषण करती है॥८॥ यह बात सुनकर वत्सराज उदयन को पहले ही बता देना जिससे वह सज्जन पति उस दुष्टा से छूट जाय' ॥९॥ इस प्रकार स्वप्न में आज्ञा देने पर और उनके सहसा अदृश्य हो जाने पर मैं एकाएक जागी तो देखा कि रात भी बीत चुकी और प्रातःकाल हो गया ॥१० ॥ रानी का यह स्वप्न-समाचार सुनकर शिवजी की कृपा का वर्णन करते हुए उस स्त्री के आने की प्रतीक्षा करते हुए सभी व्यक्ति आश्चर्यचकित हो रहे थे॥११॥ उसी क्षण प्रधान द्वारपाल ने आकर वीणा पर ध्यान वत्सराज से एकाएक निवेदन किया—॥१२॥ महाराज ! अपने बान्धवों के साथ पाँच पुत्रों को लिये हुए और विवश पति को डाँटती-फटकारती हुई कोई स्त्री महाराज से निवेदन करने के लिए द्वार पर आई है' ॥१३॥ रानी के स्वप्न-समाचार से आश्चर्यचकित राजा ने यह सुनते ही 'उसे यहाँ लाओ'— इस प्रकार की आज्ञा द्वारपाल को दी ॥१४॥ स्वप्न की सत्यता से उत्तम पुत्र की प्राप्ति का पूर्ण विश्वास हो जाने के कारण रानी वासवदत्ता ने परम प्रसन्नता प्राप्त की॥१५॥ तदनन्तर बड़े ही कौतुक के साथ द्वार की ओर देखते हुए सभी उपस्थित व्यक्तियों के सामने पति से युक्त वह स्त्री द्वारपाल की आज्ञा से सम्मुख आई॥१६॥ आते ही दीनतापूर्ण मुख बनाकर और क्रमशः सभी उपस्थित व्यक्तियों का अभिवादन करके रानी के साथ बैठे हुए राजा से उसने निवेदन किया—॥१७॥ 'हे महाराज ! मुझ निरपराधिन का पति होकर भी यह व्यक्ति मुझ अनाथिनी को भोजन-वस्त्र नहीं देता' ॥१८॥
४१८ कथासरित्सागर
४१८ कथासरित्सागर इत्युक्तवत्यां तस्यां च स तद्भर्त्ता व्यजिज्ञपत्। देव ! मिथ्या वदत्येषा सवन्न्मूर्खद्वेषिणी ॥१९॥ आ वत्सरान्तं सर्वं हि दत्तमस्या मयाग्रतः। एतद्वेश्मभव एवाये तटस्था मेऽत्र साक्षिणः ॥२०॥ एव विज्ञापितस्तेन राजा स्वयमभाषत। देवीस्वप्ने कृतं साक्ष्य देवेनैवात्र शूलिना ॥२१॥ तत्किं साक्षिभिरेषैव निग्राह्या स्त्री सबान्धवा। इति राज्ञोदितेऽवादीद्धीमान् यौगन्धरायणः ॥२२॥ तथापि साक्षिबचनात्कार्यं देव यथोचितम्। लोको ह्यतदजानानो न प्रतीयात् कथञ्चन ॥२३॥ तच्छ्रुत्वा साक्षिणो राजा तद्वत्यानाय्य तत्क्षणम्। पृष्टाः शशंसुस्ते धाम तां मिथ्यावादिनीं स्त्रियम् ॥२४॥ तत प्रख्याप्यसधर्मद्रोहामतां सबान्धवाम्। सपुत्रां च स वत्सेशः स्वदेशान्नरवासयत् ॥२५॥ विससर्ज च तं साधु तद्भर्त्तारं दयार्द्रधीः। विवाहान्तरपर्याप्तं द्वितीयं विपुलं वसु ॥२६॥ पुमांसमाकुलं क्रूरा पतितं दुर्व्यधावटे। जीवन्तमेव कृच्छ्राति शकीव कुकुटुम्बिनी ॥२७॥ स्निग्धा कुलीना महती गृहिणी तापहारिणी। तरुच्छायेव मार्गस्था पुण्यैः कस्यापि जायते ॥२८॥ इति धवलमङ्गेन वदन्तं स महीपतिम्। वसन्तकः स्थितः पार्श्वे कथापटुरबोचत ॥२९॥ किं च देव विरोधो वा स्नेहो वापीह देहिनाम्। प्राग्जन्मवासनाभ्याससञ्चारप्रायेण जायते ॥३०॥ तथा च श्रूयतामत्र कथैषा वर्ण्यते मया। सिंहविक्रमस्य कलहकारिण्यास्तद्भार्यायाश्च कथा आसीद् विक्रमचण्डाख्यो वाराणस्यां महीपतिः ॥३१॥ तस्याभूद् वल्लभो भृत्यो नाम्ना सिंहपराक्रमः। यो रणेष्विव सर्वेषु धूतेष्वप्यसमो जयी ॥३२॥
चतुर्थ लम्बक ४१९
चतुर्थ लम्बक ४१९ पत्नी के ऐसा कहने पर उसके पति ने कहा—'महाराज ! अपने भाई-बन्धुओं के साथ मुझे मार डालना चाहती हुई यह स्त्री झूठ बोलती है। एक वर्ष पर्यन्त मैंने इसे भोजन वस्त्र आदि सब कुछ दिया है। इसके सभी भाई-बन्धु तथा और भी निष्पक्षपात व्यक्ति इस बात के साक्षी हैं ॥१९-२०॥ इस प्रकार उससे निवेदित राजा स्वयं बोला—'इस बात का साक्ष्य रानी के स्वप्न में भगवान् शिवजी ने स्वयं किया है, तो अब और दूसरे साक्षियों की क्या आवश्यकता है। अतः इस दुष्टा स्त्री को बन्धु-बान्धवों सहित पकड़कर कैद कर लेना चाहिए ॥२१॥ राजा के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा—॥२२॥ महाराज ! यह तो ठीक है। फिर भी, नियमानुसार साक्षियों की बातों पर ही यथो- चित दंड दिया जाना चाहिए; क्योंकि जनता स्वप्न की बात को न जानती हुई इस समुचित न्याय पर कैसे विश्वास करेगी ॥२२-२३॥ यह सुनकर और यौगन्धरायण की सम्मति को उचित मानकर राजा ने साक्षियों को बुला कर साक्षी ली। सभी ने उस स्त्री को झूठी बताया ॥२४॥ तब राजा ने उस स्त्री के लिए बन्धुओं के साथ सज्जन पति के द्रोह का अपराध लगाकर पुत्रों और बन्धुओं के साथ देश-निकाले का दंड दिया ॥२५॥ और उसके सज्जन पति का आदर कर दयालु राजा ने उसका दूसरा विवाह करने के लिए स्वयं प्रचुर द्रव्य भी उसे दिया ॥२६॥ सच है क्रूर और कुलटा स्त्रियां दुर्बलापरत्न एवं व्याकुल पतियों को जीते-ही जीते कौवियों के समान नोच खाती हैं ॥२७॥ वृक्ष की छाया के समान स्नेहपूर्ण सुशीला उदारहृदया सुगृहिणी और सन्मार्ग स्थित पत्नी किसी को ही बड़े पुण्यों से प्राप्त होती है ॥२८॥ इस प्रकार कहते हुए राजा के समीप बैठा हुआ कथा कहने में निपुण विदूषक वसन्तक बोला—॥२९॥ महाराज ! एक बात और भी है कि मनुष्य में परस्पर स्नेह या विराग प्रायः पूर्व जन्म के संस्कार से ही होता है ॥३०॥ मैं इस सम्बन्ध में एक कथा की कहानी सुनाता हूँ, उसे सुनो ॥३१॥ निहिश्चय और उसकी कलहकारिणी भार्या की कथा किसी समय वाराणसी नगरी में विषमशील नाम का एक राजा था। उसका सिंह- विक्रम नाम का एक प्यारा सेवक था, जो दण्ड में और जुआ खेलने में अतिनिपुण था ॥३२-३३॥
४०० कथासरित्सागर
४०० कथासरित्सागर तस्याऽभवच्च विकृता वपुषीवाशयेऽप्यरम्। ख्याता कलहकारीति नाम्नान्वर्थेन गेहिनी ॥३३॥ स सम्यक् सततं भूरि राजतो द्यूततस्तथा। प्राप्य प्राप्य धनं धीरः सर्वमेव समर्पयत् ॥३४॥ सा तु तस्य समुत्पन्नपुत्रत्रययुता शठा। तथापि क्षणमप्येकं न तस्थौ कलहं विना ॥३५॥ बहिः पिवसि भुङ्क्षे च नैव किञ्चिद्ददासि न । इत्याटन्ती ससूता सा तं नित्यमतापयत् ॥३६॥ प्रसाध्यमानाप्याहारपानवस्त्रैरहर्निशम् । दुरन्ता भोगतृष्णेव भृशं जज्वल तस्य सा ॥३७॥ ततः श्रमण तन्मुषितस्त्यक्त्वैव तद्गृहम्। स विन्ध्यवासिनीं द्रष्टुमागात्सिंहपराक्रमः ॥३८॥ सा च स्वप्ने निराहारस्थितं देवी समाविशत् । उत्तिष्ठ पुत्र तामद्य गच्छ वाराणसीं पुरीम् ॥३९॥ तत्र सर्वमहानेको योऽस्ति न्यग्रोधपादपः । तन्मूलात् खन्यमानाच्च स्वं निधिमवाप्स्यसि ॥४०॥ तन्मध्याल्लप्स्यसे चैकं नभःखण्डमिव च्युतम् । पात्रं गरुडमाणिक्यमयं निस्त्रिंशन्निर्मलम् ॥४१॥ तत्रापिताक्षो द्रक्ष्यस्यन्तः प्रतिमितामिव । सर्वस्य जन्तोः प्राग्जातिं या स्याज्जिज्ञासिता तव ॥४२॥ तेनैव वटवा भार्याया पूर्वजातिं तथाऽऽत्मनः । अवाप्ताथ सुखी तत्र गतसवो निवत्स्यसि ॥४३॥ एवमुक्तश्च देव्या स प्रबुद्धः कृतपारणः । वाराणसीं प्रति प्रायात्प्रातः सिंहपराक्रमः ॥४४॥ गत्वा च तां पुरीं प्राप्य तस्मान्न्यग्रोधमूलतः । खनं निधानं तन्मध्यात् पात्रं मणिमयं महत् ॥४५॥ अपश्यच्चात्र जिज्ञासुः पात्रे पूर्वं च जन्मनि । घोरामृक्षीं स्वभार्यां तामात्मानं च मृगाधिपम् ॥४६॥ पूर्वजातिमहावैरवासनानिच्छल ततः । बुद्ध्वा भार्यारमनोद्रूपं गेहमोहो मुमोष सः ॥४७॥
चतुर्थ लम्बक ४७१
चतुर्थ लम्बक ४७१ उसकी कलहकारिणी नाम की पत्नी यथार्थ नामवाली थी जो शरीर और हृदय दोनों से कुटिल थी ।।३३।। वह धैर्यशाली सिंहविक्रम नौकरी से और जुए से भी प्राप्त सभी धन उस पत्नी को अर्पण कर देता था।।३४।। तीन पुरुषोंकी वह दुष्टा स्त्री एक क्षण भी बिना कलह किये नही रह सकती थी ।।३५।। वह अपने पति से कहा करती थी कि 'तुम बाहर ही खाते-पीते हो मुझे कुछ नहीं देते हो'। इस प्रकार वह उसे प्रतिदिन सन्ताप देती थी।।३६।। भोजन वस्त्र और आभूषण आदि से सदा उसको प्रसन्न रखने की चेष्टा करते रहने पर भी वह ज्वलन्त मोम-गुग्गुल के समान सदा जलती ही रहती थी।।३७।। इस प्रकार उसके दुःख से दुःखी सिंहविक्रम उस घर को छोड़कर विन्ध्यवासिनी देवी का दर्शन करने के लिए चला गया ।।३८।। वहां जाकर उसके निराहार धरना देने पर प्रसन्न देवी ने स्वप्न में उससे कहा—'बेटा ! उठो अभी वाराणसी नगरी को जाओ।।३९।। वहाँ एक बहुत विशाल वटवृक्ष है उसकी जड़ खोदने पर तुम बहुत बड़ा खजाना पाओगे। उसके भीतर तुम मानों आकाश से गिरा हुआ और तलवार-सा चमकता हुआ एक मणिमय पात्र पाओगे। उसके भीतर देखने से सभी प्राणियों के पूर्वजन्म तुम देख सकोगे। उससे तुम अपनी पत्नी तथा अपने पूर्व जन्म की जाति को जानकर सफल मुखी और शोकरहित हो जाओगे' ।।४०-४३।। देवी से इस प्रकार आदिष्ट वह सिंहविक्रम प्रातःकाल उठकर और व्रत का पारण (समाप्ति) करके वाराणसी को गया ।।४४।। वहाँ जाकर उसने वटवृक्ष की जड़ से खजाना प्राप्त किया और वह पात्र भी उसे मिल गया ।।४५।। उस पात्र में उसने अपनी पत्नी को पूर्वजन्म में भीषण भालू (भाड़ा) के रूप में और अपने को सिंह के रूप में देखा। अतः उसने पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण अपना और पत्नी का घोर मतभेद समझकर दुःख और मोह छोड़ दिया ।।४६-४७।।
४७२ कथासरित्सागर
४७२ कथासरित्सागर अथ बह्वी परिप्राप्तामन्यत्र पात्रभावतः। प्राग्जन्मविप्रजानीयाः परिगृह्यैव रूपकाः ॥४८॥ तुल्यां अत्रान्तरे गित्वा परिणीय विधिन्य मः। भार्यां द्वितीयां गृहशोभाम्नीं गिल्पगत्रम् ॥४९॥ कृत्वा शृङ्गारिणं च तां ग ग्रामकभागिनीम्। निधानप्राप्तिजन्मित्तस्मन्धी नवबधूरग ॥५०॥ इत्थं दातव्ययोरीह भवन्ति भुवन नृणाम्। प्रारम्भावन्ध्यतायात्दैवम्महा महीपत ॥५१॥ इत्यापद्य कथां चित्रां बह्वराजो वसन्तकम्। भूय सुभोग सहितो दद्या कामबशता ॥५२॥ एव दिनेषु गच्छत्सु राज्ञस्तस्य न्विनिशम्। भतृम्पत्य लसद्गर्भेदीवश्चन्द्रनुददान ॥५३॥ मन्त्रिपुत्राणामुत्पत्तिः मन्त्रिणामुदपद्यन्त सर्वेषां शुभलक्षणाः। क्रमेण तनयास्तत्र भाविबस्त्याणसूचकाः ॥५४॥ प्रथम मन्त्रिमुल्यस्य जायते स्म विलास्मजः। योगन्धरायनम्यव मम्मूर्तिरिति श्रुतः ॥५५॥ ततो रुमन्वतॊ जज्ञे सुतो हरिदिलाभिधः। वसन्तकस्याप्युत्पेद तनयोज्य तपन्तकः ॥५६॥ ततो नित्येोदिताख्यास्य प्रतीहाराधिकारिणः। इत्यकापरसज्ञस्य पुत्रोऽजायत गोमुखः ॥५७॥ वत्सराजसुतस्येह भाविनश्चक्रवर्त्तिनः। मन्त्रिणोऽमी भविष्यन्ति पैरिवंदाबमवित् ॥५८॥ इति तेषु च जातेषु वर्त्तमाने महोत्सवे। तत्राशरीरा नभसो निस्ससार सरस्वती ॥५९॥ दिवसेष्वथ कातेषु वत्सराजस्य तस्य सा। देवी मासपदतामूदागन्नप्रमवोदया ॥६०॥ नरवाहनदत्तजन्म जध्यास्त सा च तस्मिन्न पुण्योभि परिष्कृतम्। जातवासगृहं साकल्यमीगुप्तगुबालकम् ॥६१॥
चतुर्थ लम्बक ४०५
चतुर्थ लम्बक ४०५ उसके पश्चात् उसने पात्र के प्रभाव से अनेक कन्याओं के पूर्वजन्म को देखा और पूर्वजन्म की भिन्न-भिन्न जातीय उन कन्याओं को छोड़कर अपने पूर्व जाति के समान सिंह जाति की एक कन्या से उसने विवाह किया। उस स्त्री का नाम सिंहिनी था ॥४८ ४९॥ उस कलहकारिणी स्त्री को केवल भोजन मात्र देकर, खजाना मिलने से सुखी सिंहविक्रम नवीन वधू के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥५०॥ इस कथा को सुनाकर वसन्तक ने कहा—महाराज ! इस प्रकार पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण भी स्त्री पुत्र मित्र आदि इस जन्म में स्नेही या विरोधी हो जाते हैं ॥५१॥ वत्सराज उदयन वसन्तक के मुख से इस कथा को सुनकर महारानी के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥५२॥ इस प्रकार गर्भवती रानी के मुखचन्द्र को निरन्तर देखते हुए राजा के दिन व्यतीत होने लगे ॥५३॥ मन्त्रियों के पुत्रों की उत्पत्ति इन्हीं दिनों राजा के सभी मन्त्रियों के यहाँ शुभ लक्षणोंवाले पुत्र उत्पन्न हुए, जो भविष्य के लिए कल्याण-प्राप्ति की सूचना देनेवाले थे ॥५४॥ सबसे पहले यौगन्धरायण का मरुभूति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५५॥ तब सेनापति रुमण्वान् का हरिशिख नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और नर्मसचिव वसन्तक का भी तपन्तक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५६॥ तब गिरिपोषित नाम के द्वारपालाध्यक्ष के जिसका दूसरा नाम 'इत्यक' था गोमुख नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५७॥ ये सभी बालक विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती एवं बैरियों के वंश का नाश करनेवाले वत्सराज के कुमार के भावी मन्त्री होंगे ॥५८॥ इन बालकों के उत्पन्न होने पर जब महोत्सव मनाये जा रहे थे तब उस समय वहाँ पर आकाश से देववाणी हुई—॥५९॥ 'कुछ ही और दिनों के व्यतीत होने पर वत्सराज की रानी वासवदत्ता का प्रसवकाल भी सन्निकट होगा' ॥६०॥ नरवाहनदत्त का जन्म तब वह रानी आक और शमी के पत्तों से ढँकी हुई खिड़कियोंवाले रत्न-दीपकों की किरणों और शस्त्रास्त्रों की चमक-दमक से आलोकित एवं पुत्रवती सुहागिनों से भरे हुए प्रसूति गृह में रहने लगी ॥६१॥ ९
४७४ कथासरित्सागर
४७४ कथासरित्सागर
रत्नदीपप्रभासङ्गमक्रूरविविधायुधैः । गर्भरक्षाक्षमं तेजो ज्वलद्द्भिरिवावृतम् ॥६२॥ मन्त्रिभिस्तन्त्रितानमन्त्रतन्त्रादिरक्षितम् । धातृ मातृगणस्येव दुर्गं दुरितदुजयम् ॥६३॥ तत्रासूत च सा काले कुमारं कान्तदर्शनम् । क्षीरेन्दुमित्रं निर्गच्छच्छामृतमयमद्युतिम् ॥६४॥ येन जातेन न परं मन्दिरं तत्प्रकाशितम् । यावद्धृदयमप्यस्या मातुर्निश्शोकतमासम् ॥६५॥ ततः प्रमोदे प्रसरत्यन्तःपुरवासिनाम् । वत्सेशः सुतजन्मैतच्छुश्रावाभ्यान्तराज्जनात् ॥६६॥ तस्मै स राज्यमपि यत्प्रीतं प्रियनिवेदने । न ददौ तदनौचित्यभयेन न तु तृष्णया ॥६७॥ एत्य चान्तःपुरं सद्यो बढोत्सुक्येन चेतसा । चिरात्फलितसङ्कल्पः स ददर्श सुतं नृपः ॥६८॥ रक्तायताधरदलं पलोर्वाचारुकेसरम् । मुखं दधानं साम्राज्यलक्ष्मीलीलाम्बुजोपमम् ॥६९॥ प्रायेणान्यनृपश्रोभिर्भीत्येव निजलाञ्छनैः । उज्झितरक्षितं मूर्द्धो पादयोश्छत्रचामरैः ॥७०॥ ततो हर्षभरापूर्पोत्नोत्फुल्लया दृशा । मात्रायाः स्रवतीवास्मिंस्तत्स्नेहमहीपती ॥७१॥ नन्दत्स्वपि च योगन्धरायणादिषु मन्त्रिषु । गगनादुच्चचारैष काले तस्मिन् सरस्वती ॥७२॥ कामदेवावतारोऽयं राजन् जातस्तवात्मजः । नरवाहनदत्तश्च जामीहोनेमिहाख्यया ॥७३॥ अनेन भवितव्यं च दिव्यं कल्पमतन्द्रिणा । सर्वविद्याधरेन्द्रणामधिराज्यचक्रवर्तिना ॥७४॥ इत्युक्त्वा विरते वाचा तत्क्षणं नभसः क्रमात् । पुष्पवर्षनिपतितं प्रसूतं दुन्दुभिस्वने ॥७५॥ ततः महोत्सवारम्भजनिताभ्यधिकादरम् । स राजा सुतरां हृष्टश्चकार परमुत्सवम् ॥७६॥
चतुर्थ लम्बक ४०५
चतुर्थ लम्बक ४०५ वह प्रसूति-गृह मन्त्रियों द्वारा अनेक मन्त्र-तन्त्रों से सुरक्षित किया गया मानों मृगों की रक्षा के लिए और कष्टों के लिए दुर्गम दुर्ग बन गया हो। उस प्रसूति-गृह में रानी ने समय आने पर सुन्दर और दर्शनीय पुत्र को इस प्रकार जन्म दिया जिस प्रकार आकाश स्वच्छ और अमृतमय चन्द्रमा को जन्म देता है ॥६२-६४॥ इस कुमार के जन्म लेने से केवल प्रसूति-गृह ही आलोकित नहीं हुआ प्रत्युत माता का हृदय-गह्वर भी शोक रहित हो प्रसन्नता से आलोकित हो उठा॥६५॥ पुत्र-जन्म से सारे रनिवास में प्रसन्नता की लहर उठ गई और रनिवास के व्यक्ति से ही राजा उदयन ने यह शुभ समाचार सुना ॥६६॥ पुत्र-जन्म का समाचार सुनानेवाले दूत को प्रसन्न राजा ने अपना राज्य साकल्यवत नहीं दिया यह नहीं प्रत्युत अनुचित समझकर ही नहीं दिया ॥६७॥ इस प्रकार, चिरकाल के पश्चात् सफल मनोरथवाले महाराज ने अत्यन्त उत्सुक हृदय से प्रसूति-गृह में जाकर बालक को देखा ॥६८॥ उस बालक का मुख लाल और चौड़े अधरोंवाला ऊन के रेशों के समान सिर के कोमल बालोंवाला और साम्राज्य-लक्ष्मी के लीला-कमल के समान शोभित हो रहा था ॥६९॥ अन्य राजाओं की राज्य-लक्ष्मी ने मानों भय से उसके कोमल चरणों को पहले से ही छत्र और चामर से चिह्नित कर दिया था ॥७० ॥ पुत्र का मुख देखने पर हर्ष की अधिकता से फैली हुई और हर्षाश्रु-धारा बहाती हुई आँखों से प्रतीत होता था कि राजा की पुत्र-स्नेह-वाष्प मानों बह निकली ॥७१॥ उस अवसर पर राजा के परम हितैषी यौगन्धरायण आदि भी अति प्रसन्न हो रहे थे। उसी समय आकाश से इस प्रकार की वाणी हुई—'राजन् तुम्हारा यह पुत्र कामदेव का अवतार है, इसका नाम नरवाहनदत्त होगा। यह वीर एक दिव्य युग तक विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा रहेगा ॥७२-७४॥ ऐसा कहकर वाणी बन्द हो गई। आकाश से पुष्पवर्षा हुई और वाद्यनादों के संगीत फैलने लगे ॥७५॥ देवताओं द्वारा मनाये गये उत्सव से अत्यन्त उत्साहित और प्रसन्न होकर राजा ने अपने विस्तृत राज्य में व्यापक पुत्रजन्म-महोत्सव मनाया ॥७६॥
२४६ कथासरित्सागर
२४६ कथासरित्सागर बभ्रमुस्तूर्यनिर्नादा नभस्तो मन्दिरोद्गताः । विद्याधरेभ्यः सर्वेभ्यो राजनभय शंसितुम् ॥७७॥ सौधाग्रेष्वनिलोद्धूताः शोणरागाः स्वकान्तिभिः । पताका अपि सिन्दूरमयोममकिरन्निव ॥७८॥ भुवि साङ्गस्मरोत्पत्तितोषान्निव सुराङ्गनाः । समागताः प्रतिपदं ननर्तुर्वारयोषितः ॥७९॥ अदृश्यत च सर्वा सा समानविभवा पुरी । राज्ञो महोत्सवात् प्राप्तैर्नववस्त्रविभूषणैः ॥८०॥ तदा हर्षाभ्युपे तस्मिन्खर्वत्यर्थ्यनुजीविषु । कोषादूतं न तन्मध्यो दधौ कश्चन रिक्तताम् ॥८१॥ मङ्गस्यपूर्वा स्वाचारदक्षिणा नर्त्तितापरा । मत्स्रामृतोत्तरास्तैस्तैः सुरक्ष्मिभिरधिष्ठिता ॥८२॥ प्रसृतातोद्यनिर्ह्रादा साक्षाद्दिव इवाखिला । समन्तादाययश्चात्र सामन्तान्तःपुराङ्गनाः ॥८३॥ चेष्टा नृत्तमयी तत्र पूर्णपात्रमयः वचः । व्यवहारो महात्यागमयस्तूर्यमयो ध्वनिः ॥८४॥ चीनपिष्टमयोमोदकचारुचक्रमयी च भूः । मानन्दमयी सर्वस्यामपि तस्यामभूत्पुरि ॥८५॥ एव महोत्सवास्तत्र भूरिवासर्वर्धितः । निर्वर्त्तते स्म न सम पूर्णे पौरमनोरथः ॥८६॥ सोऽपि व्रजत्सु दिवसेष्वथ राजपुत्रो वृद्धिं धित्युः प्रतिपदिन्दुरिवा जगाम । पित्रा यथाविधिनिवेदितदिव्यवाणी निर्दिष्टपूर्वनरवाहनदत्तनाम्ना ॥८७॥ यानि स्फुर मसृणमुग्धमुखप्रभाणि द्वित्राणि यानि च लघुकलनाद्दुराणि । तानि स्मरन्ति ददतो वदतश्च तस्य दृष्ट्वा निशम्य च पदानि पिता तुतोष ॥८८॥ अथ तस्म मन्त्रिवरा स्वसुतानानीय राजपुत्राय । शिशवे शिशून् महीपतिहृदयानन्दान् समर्पयामासुः ॥८९॥
चतुर्थ लम्बक ४७७
चतुर्थ लम्बक ४७७ वाद्यों के शब्द घरों से निकलकर आकाश में फैलने लगे मानों समस्त विद्याधरों को नवीन राजा के जन्म लेने की सूचना दे रहे हों॥७७॥ ऊँचे-ऊँचे महलों पर फहराती हुई सात रंग की पताकाएँ मानां प्रसन्नता से आपस में गुलाल उड़ा रही हों—ऐसी प्रतीत होती थी॥७८॥ घर-घर में प्रसन्नता से वेश्याओं के नाच-गान चल रहे थे। ऐसा लगता था मानों स्वर्ग की सुन्दरियाँ प्रसन्नता से भूमि पर उतर आई हों॥७९॥ उत्सव के उपलक्ष में राजा द्वारा बाँटे गये एक समान वस्त्रों और आभूषणों से सारी नगरी एक समान वैभवशाली मालूम होती थी॥८०॥ जब राजा ने उत्सव के उपलक्ष में अपने सेवकों को धन लुटाना प्रारंभ किया तब खजाने के अतिरिक्त और कोई भी खाली न रहा॥८१॥ पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी मंगलगान करती हुई रीति-रिवाजों को जाननेवाली नाचती गाती और विविध प्रकार के उपहार हाथों में ली हुई अपने लड़कों के साथ-साथ रनिवास में एकत्र हुईं, तो ऐसा लगता था मानों स्वर्ग की स्त्रियाँ प्रसन्नता से राजभवन में उतर आई हों॥८२-८३॥ उस समय सभी की चेष्टाएँ नृत्यमयी सभी के वचन पूर्णपात्रमय सभी का व्यवहार त्यागमय और सभी का स्वर वाद्यमय हो रहा था॥८४॥ आनन्दमयी उस नगरी में सभी जन अबीर-गुलालमय और सारी भूमि रुचियों से भरी हुई थी॥८५॥ इस प्रकार अनेक दिनों तक चलता हुआ यह उत्सव नागरिकों के मनोरथ के समान पूर्ण हुआ॥८६॥ आकाशवाणी के आज्ञानुसार पिता द्वारा दिये गये नरवाहनदत्त नामवाला वह राजकुमार कुछ दिनों में ही प्रतिपदा के चन्द्रमा के समान क्रमशः बड़ा हुआ॥८७॥ चमकते चिकने और सुन्दर गलों की कान्तिवाले दो-चार निकलते हुए आगे के सुन्दर दाँतों- वाले उस राजकुमार के मुँह से निकलते हुए कुछ अस्पष्ट और तुतले बोलों तथा लीलापूर्वक दो-चार डग भरने की उसकी चालों को देखकर उसका पिता मन ही मन अत्यन्त प्रसन्नता अनुभव करता था॥८८॥ इस प्रकार, उसके कुछ बड़े होने पर सभी मन्त्रियों ने हृदयों को आनन्द देनेवाले अपने- अपने बालकों को सादर खेलने के लिए राजकुमार को सौंप दिया॥८९॥
४०८ कथासरित्सागर
४०८ कथासरित्सागर यौगन्धरायणः प्राङ्मरुभूतिं हरिशिखं रुमण्वानथ । गोमुखमित्येकनामा तपन्तकाख्यं वसन्तकश्च सुतम् ॥१९०॥ शान्तिकरोऽपि पुरोधा भ्रातृसुतं शान्तिसोममपरं च। वैश्वानरमर्पितवान्पिङ्गलिकापुत्रकौ यमजौ ॥१९१॥ तस्मिन्क्षणे च नभसो निपपात दिव्या नान्दीनिनादसुभगा सुरपुष्पवृष्टिः । राजा ननन्द च तथा महिषीसमेत- सत्कृत्य तत्र सचिवात्मजमण्डल तद् ॥१९२॥ बाल्योऽपि तैरभिमतैश्च मन्त्रिपुत्रै पञ्चभिस्तदेकनिरतैश्च स राजपुत्रः । युक्तः सदैव नरवाहनदत्त आसी- द्युक्तो गुणैरिव महोदयहेतुभूतैः ॥१९३॥ तं च क्रीडाञ्चलितललिताम्यक्तनर्माभिलापं यान्तं प्रीतिप्रवणमनसामङ्कतोऽङ्कं नृपाणाम्। पुत्रं स्मेराननसरसिज सादरं पश्यतस्ते सदानन्दाः किमपि दिवसा वत्सराजस्य जग्मुः ॥१९४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे नरवाहनदत्तजनन लम्बके तृतीयस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं नरवाहनदत्तजनन लम्बकश्चतुर्थः।
चतुर्थ लम्बक ४७९
चतुर्थ लम्बक ४७९ सबसे पहले यौगन्धरायण ने अपने पुत्र मरुभूति का इसी प्रकार क्रमशः रुमण्वान् ने हरि- शिख को इत्यक (नित्यादित) ने गोमुख का वसन्तक ने तपन्तक का और पुरोहित शान्तिस्वर ने अपने दोनों जुड़वाँ भतीजे शान्तिसोम और वैश्वानर नामक पिंगलिका के पुत्रों को लाकर समर्पित कर दिया ॥९०-९१॥ उस समय सुन्दर मंगलवाद्यों के साथ आकाश से दिव्य पुष्पों की वृष्टि हुई और राजा तथा रानी नवीन मन्त्रिमण्डल का सत्कार करके अत्यन्त आनन्दित हुए ॥९२॥ बाल्यकाल में उन छह अनन्य प्रेमी मन्त्रिपुत्रों के साथ युक्त वह राजकुमार नरवाहनदत्त अभ्युदय के कारणभूत गुणों के समान शोभित हो रहा था ॥९३॥ अपनी विविध और सुन्दर बाल-क्रीड़ाओं से प्रेमपूर्ण हृदयवाले राजाओं की एक गोद से दूसरी गोद में जाते हुए, एवं मुस्कुराते हुए उस राजकुमार के मुखकमल को देखते हुए वत्सराज के दिन सानन्दपूर्वक व्यतीत होने लगे ॥९४॥ तृतीय तरंग समाप्त महाकवि सोमदेवभट्ट-रचित कथासरित्सागर का नरवाहनदत्त-जनन नामक चतुर्थ लम्बक समाप्त
चतुर्दारिका नाम पञ्चमो लम्बकः
चतुर्दारिका नाम पञ्चमो लम्बकः इद गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्वराम्बोलना त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति य विगतविघ्नलब्धद्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन त ॥ प्रथमस्तरङ्गः मदघूर्णितवक्त्रोत्थै सिन्दूरस्फुरयन् महीम्। हेरम्ब पातु वो विघ्नान् स्वतेजोभिर्बहूत्क्षिपन् ॥१॥ एवं स देवीसहितस्तस्थौ वत्सेश्वरस्तदा। नरवाहनदत्तं तमेकपुत्रं विवर्धयन् ॥२॥ तत्राशाकातरं तं च दृष्ट्वा राजानमेकदा। यौगन्धरायणो मन्त्री विजनस्थितमब्रवीत् ॥३॥ राजन् राजपुत्रस्य कृते चिन्ता त्वयाधुना। नरवाहनदत्तस्य विधातव्या कदाचन ॥४॥ असौ भगवता भावी भर्गेण हि भवद्गृहे। सर्वविद्याधराधीशचक्रवर्ती विनिर्मितः ॥५॥ विद्याप्रभावावेक्षञ्च बुद्ध्वा विद्याधराधिपाः। गताः पापेच्छया क्षोभं हन्तुंरमहिप्सवः ॥६॥ तद्विदित्वा च देवेन रक्षार्थं शशिमौलिना। एतस्य स्तम्भको नाम गणेशः स्थापितो निजः ॥७॥ स च तिष्ठत्यदृश्यः सम् रक्षतेतं सुतं तव। एतच्च क्षिप्रमभ्येत्य नारदो मे न्यवेदयत् ॥८॥ वत्सराजसभायां शशिनदैवस्यावगमनकथा इति तस्मिन् वदत्येव मन्त्रिणि व्योममध्यतः। किरीटी कुण्डली दिव्यः खड्गी चावातरत्पुमान् ॥९॥