कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
५४ कथासरित्सागरे
५४ कथासरित्सागरे अन्येद्युश्च विमानेन सहसूर्यप्रभा ययुः। चन्द्रप्रभाद्याः सर्वे ते चीनदेशं सपौरखाः ॥१७५॥ तत्राग्रे निर्गतो राजा निजकोट्टं प्रवेश्य तान्। स सुराहोऽपि दुहितुश्चक्रे वैवाहिकं विधिम् ॥१७६॥ अवाञ्च विद्युन्मालायै तस्यै सूर्यप्रभाय च। असङ्ख्यहयहस्त्यश्वरत्नचीनांशुकादिकम् ॥१७७॥ तस्थुश्च तत्र त तैस्तद्भोर्गैश्चन्द्रप्रभादयः। दिनानि कतिचित्सर्वे सुरोहाभ्यर्चितास्तदा ॥१७८॥ आसीत् सूर्यप्रमश्चात्र विलसद्धनयौवनः¹। प्रावृट्कालो यथा विद्युन्मालया शोभितस्तया ॥१७९॥ एवं स बुभुजे तत्र तत्र श्वशुरवेश्मनि। तत्तत्कान्तासखः सूर्यप्रभो भोगान्सबान्धवः ॥१८०॥ ततः समन्त्र्य सिद्धार्थप्रमुखैः सचिवैः सह। ध्रमाङ्गारभटादींस्तानस्वीयसहिता नृपान् ॥१८१॥ विसृज्य निजदेशेषु तं सुरोहमहीपतिम्। आमन्त्र्य सत्कृतामुक्तः पितृभ्यां सह सानुगः ॥१८२॥ भूशासनविमानं तदारुह्य व्योमवर्त्मना। स्वं स सूर्यप्रभः प्रायाच्छाकल नगरं कृती ॥१८३॥ क्वचिन्मृदङ्गसङ्घः क्वचिदपि च सङ्गीतकरवैः। क्वचित् पानक्रीडा क्वचन सुदृशां मण्डनविधिः। क्वचिदप्याभीष्टस्तुतिमुखरवैतालिकरवः पुरे सन्निभ्रासीत्प्रमद इति तस्यागमनजः ॥१८४॥ सभार्य्या पितृवेश्मसु स्थितवतीरानाय्य स स्वप्रियाः। दत्तैस्तत्पितृभिर्गजाश्वनिवहहस्ताभि सहवागतैः। नानारत्नमपूर्णभारविभवैरूष्ट्रैश्च रोष्यादिगं लीलानर्त्तितदिग्गजपोत्यविभवञ्चक्रे प्रजाकौतुकम् ॥१८५॥ १ प्रावृट्पक्षे--विलसत् घनानां यौवनं यस्मिन् सूर्य प्रभपक्षे--विलसद् घनं यौवनं यस्य। २ प्रावृट्पक्षे--विद्युतां मालयापहस्तया, शोभितः सूर्यप्रभपक्षे तन्नाम्न्या वीणाविद्येति गन्तव्या। ३ अङ्गमेवायनात्।
अष्टम लम्बक - २५५
अष्टम लम्बक - २५५ और दूसरे ही दिन वे सभी सूर्यप्रभ को लेकर राजा पौरव के साथ विमान से चीन देश को गये ॥१७५॥ वहाँ अगवानी के लिए बाहर आये हुए राजा ने उन्हें अपने बिम में ले जाकर अपनी कन्या का विवाह-संस्कार किया तथा मुदाह में विद्युन्माला और सूर्यप्रभ को कन्यादान में अमूल्य सोना रत्न एवं चीन के वस्त्र आदि प्रदान किये ॥१७६-१७७॥ विवाह के अनन्तर चन्द्रप्रभ आदि राजा गुरोह से सेवा-सत्कार प्राप्त करते हुए कुछ दिनों तक चीन में रहकर आनन्द करते रहे ॥१७८॥ घनघोर घटाटोपवाले वर्षाकाल के समान उमड़े हुए धन-यौवन से समृद्ध सूर्यप्रभ भी विद्युन्माला [बिजली] के साथ समुद्गृह में विविध प्रकार के भाव-विलासों का आनन्द लेने लगा ॥१७९-१८०॥ कुछ दिनों के अनन्तर सिद्धार्थ आदि मन्त्रियों से सम्मति करके अन्यान्य श्वशुर राजाओं को उपहारों के साथ अपने-अपने देश को भेजकर, सूर्यप्रभ भी राजा गुरोह से आज्ञा लेकर, उनकी कन्या विद्युन्माला तथा अपने माता-पिता के साथ सफल होकर भूतासन नामक विमान में बैठकर अपनी राजधानी शाकल में आ गया ॥१८१-१८३॥ सूर्यप्रभ के राजधानी में आने पर, सारी नगरी हर्ष से पागल-सी हो रही थी। कहीं नाच हो रहा था तो कहीं गाना-बजाना चल रहा था। कहीं मद्यपान-गोष्ठियाँ हो रही थीं तो कहीं स्त्रियों की सजधज चल रही थी। कहीं प्रचुर पुरस्कार-प्राप्त बन्दी-चारण आदि प्रशंसा के गान गा रहे थे ॥१८४॥ सूर्यप्रभ ने अपनी राजधानी में जाकर अपने-अपने पिताओं के घर में छोड़ी गई सभी रानियों को अपने पास बुलवा लिया। वे रानियां भी अपने-अपने पिताओं द्वारा दिये गये असंख्य हाथी घोड़े और दास-दासियों और धन-रत्नों के साथ आईं तो ऐसा प्रतीत होता था कि मानों सूर्यप्रभ के दिग्विजय का वैभव आ गया हो। यह सब देखकर नागरिक जनता आश्चर्य-चकित हो गई ॥१८५॥
२५६ कथासरित्सागर
२५६ कथासरित्सागर बहुवसुभूरिनिधानं सन्न महाभोगिना तदाध्युषितम्। सुर'-दानव'-भुजग'-नगरैः कृतमिव तच्छाकलं विभौ॥१८६॥ ततो मदनसेनया सह स तत्र सूर्यप्रभो यथामिमतभोगभुक्सकलपूर्णसम्पत्सुखी । उवास पितृसंयुतः ससचिवोऽन्यपत्नीयुत श्कृतागमनसंविदं मयमुदीक्षमाणोऽन्वहम्॥१८७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके प्रथमस्तरङ्गः
द्वितीयस्तरङ्गः चत्रप्रभसभायां मयदानवस्यापगमनम्
अथ तत्रैकदास्थानस्थितं चन्द्रप्रभे नृपे। सूर्यप्रभे च तत्रस्थे समग्रसचिवान्विते॥१॥ सिद्धार्थोदीरितकथाप्रसङ्गेन मये स्थिते। अकस्मादत्र वसुधा सभामध्ये व्यदीर्यत॥२॥ ततो भूविवरादादौ सद्यन्धः सुरभिर्मरुत्। आविरासीत्ततः पश्चादुज्जगाम मयासुरः॥३॥ शृङ्गोन्नतांसधिरः पृथुह्रस्वस्नेहमहौषधिः। रक्ताम्बरोष्ठमद्धातुमिश्रायामिव पर्वत॥४॥ यथार्हकृतपूजश्च राजा चन्द्रप्रभेण सः। रत्नासनोपविष्टः सन् दानवेन्द्रोऽभ्यभाषत॥५॥
१ सुरनगरं = स्वर्गः; बहवो वसवः तन्नामका देवता यत्र तत्तादृशम्; शाकलं नगरं च बहु = भूरि वसु = धनं यत्रेति बहुवसु । २ यक्षस्य = कुबेरस्य नगरं भूरिनिधानं शङ्कादिवपुष्करम् शाकलं च भूरिनिधानम् = इतरस्याविशेषपुष्करम्। ३ पाताल भुजगनगरं महाभोगिना = सर्पराजा वासुकिना अध्युषितम् = अधिष्ठि- तम् शाकलं नगरञ्च महाभोगिना महाविलासिना सूर्यप्रभेनाधिष्ठितम्। ४ विहितागमनसुसंवादम्। ५ आस्थानं = सभा गृहम्। ६ तत्र वार्त्तायामेव मयान् निर्गतासीत्।
अष्टम लम्बक २९७
अष्टम लम्बक २९७ अत्यधिक धन से परिपूर्ण और बहुत-सी प्रजाओं से भरा हुआ तथा महाभोगी¹ सूर्यप्रभ से अलंकृत शाकल नगर ऐसा लगता था मानों स्वर्ग अलकापुरी और पाताल तीनों लोकों के सम्मिश्रण से इस पुरी की रचना की गई हो॥१८६॥ तदनन्तर वह युवराज सूर्यप्रभ पटरानी मदनसेना तथा अन्यान्य रानियों के साथ समस्त सम्पत्तियों से भरपूर होकर समस्त उत्तमोत्तम भोगों को भोगता हुआ पिता तथा मन्त्रियों के साथ आने का वचन दिये हुए मयासुर दानव के आने की दिन-रात प्रतीक्षा करता हुआ राजधानी में सुखपूर्वक रहने लगा॥१८७॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागरके सूर्यप्रभ लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग चन्द्रप्रभ की सभा में मय दानव का आगमन एक बार दरबार में सूर्यप्रभ तथा चन्द्रप्रभ के मन्त्रियों के सहित बैठे-बैठे सिद्धार्थ के साथ बातचीत के प्रसंग मे मय का नाम आते ही दरबार-भवन की भूमि बीच में सहसा फट पड़ी ॥ १-२॥ फटी हुई भूमि के दरार से पहले शब्द उत्पन्न हुआ तदनन्तर सुगन्धित वायु निकली और उसके पश्चात् उसमे से मयासुर का आविर्भाव हुआ ॥३॥ वह दानव (मयासुर) पर्वताकार था। उसके काले और ऊँचे सिर-रूपी शिखर पर (पीले वर्ण की) केश-रूपी महौषधियां मानों जल रही थी और रक्त वस्त्र-रूपी धातु शरीर पर दीख रहे थे ॥४॥ राजा चन्द्रप्रभ द्वारा समुचित सत्कार प्राप्त करने के बाद सिंहासन पर स्थित दानवराज मय इस प्रकार बोला—॥५॥ १ महाभोगी—पाताल-पक्ष में महासर्प। सूर्यप्रभ के पक्ष में—महान् भोगी विलासी या ऐश्वर्य-सम्पन्न।—अनु ३३
२५८ कथासरित्सागर
२५८ कथासरित्सागर
भुक्ता भोगा इमे भौमा भवद्भिरधुना च वः। कालोऽन्येषां तदुपभोगे मतिं कुरुत साम्प्रतम् ॥६॥ दूतान् प्रध्यानयध्वं स्वान्नृपान् सम्बन्धिबान्धवान्। ततो विद्याधरेन्द्रेण मिलिष्यामः सुमेरुणा ॥७॥ क्षेष्यामः श्रुतशर्माणि प्राप्स्यामः खचराश्रियम्¹। सुमेरुश्च सहायत्वं अन्त्युबुद्ध्या स्थितोऽत्र नः ॥८॥ रक्षो सूर्यप्रभं दद्यास्त्वं चैतस्मै निजां सुताम्। इत्यादावेव देवेन स ह्यादिष्टः पिनाकिना ॥९॥ एवं मयासुरेणोक्ते प्रहस्तादीन् सखेश्वरान्। चन्द्रप्रभः प्रहितवान् दूतान् सर्वमहीभृताम् ॥१०॥ सूर्यप्रभश्च विद्याभिः स्वभार्या मन्त्रिणोऽखिलान्। सविमेजे मयावशात् संविभक्ता न ये पुरा ॥११॥
सूर्यप्रभास्थाने नारदमुनेरागमनम्
तावच्चात्र स्थितष्वेव प्रभाभासितदिक्मुखः। अवतीर्याम्बरात्साक्षाद्रदो मुनिराययौ ॥१२॥ गृहीतार्घोपविष्टश्च स चन्द्रप्रममब्रवीत्। प्रेषितोऽहमिहेन्द्रेण तेन चोक्तमिदं तव ॥१३॥ ज्ञातं मया यद्युष्माभिर्महेश्वरनिवेशतः। मयासुरसखैः सूर्यप्रभस्याज्ञानमोहितैः ॥१४॥ अस्य मर्त्यशरीरस्य संसाधयितुमिष्यते। सर्वविद्याधराधीशचक्रवर्तिपदं महत् ॥१५॥ तदयुक्तं यदस्माभिर्दत्तं हि श्रुतशर्मणे। विद्याधरकुलाम्पिन्दोस्तच्च तस्य क्रमागतम् ॥१६॥ अस्माकं प्रातिपद्येण धमबाधेन चैव यत्। कुरुध्ये तद्विनाधाय निन्दितं च प्रकल्पते ॥१७॥ पूर्वं च रुद्रयज्ञेन यजमानो भवान् मया। प्राप्यञ्स्वाश्वमयेनेत्युक्तं च कृतवान् न तम् ॥१८॥
१ खे=आकाशे चरन्तीति खचरा=विद्याधराः तेषां श्रियं=राजलक्ष्मीम्।
अष्टम लम्बक ९५१
अष्टम लम्बक ९५१ 'आपने ये पार्थिव भोग (अनल्प) तो भोग किये। अब अन्य दिव्य भोगों के भोगने का समय आ गया है। अतः उसके लिए उद्योग प्रारम्भ कीजिए ॥६॥ दूतों को भेजकर अपने सम्बन्धी बन्धुओं को बुलवाइए। तब विद्याधरों के राजा सुमेरु से मिलिये ॥७॥ तदनन्तर श्रुतशर्मा को जीतने और आकाशचारियों का साम्राज्य प्राप्त करेंगे। सुमेरु नामक विद्याधर राजा हमारी सहायता के लिए सम्बन्धी की भावना से तैयार बैठा है। 'सूर्यप्रभ की रक्षा करना और उसे अपनी कन्या प्रदान करना' शिवजी ने इस प्रकार का आदेश उसे पहले से ही दे रखा है" ॥८-९॥ मयासुर के ऐसा कहने पर चन्द्रप्रभ ने सब बन्धु-राजाओं के पास आकाशचारी प्रहस्त प्रभास आदि दूतों को उन्हें बुलाने के लिए भेज दिया ॥१०॥ तदनन्तर मय दानव की आज्ञा से सूर्यप्रभ ने जिन पत्नियों और मन्त्रियों को इन्द्रजाल आदि विद्याएँ नहीं सिखाई थीं उन सबको अपनी विद्याएँ सिखा दीं ॥११॥ सूर्यप्रभ के दरबार में नारद मुनि का आगमन इतने में ही जब सभा में यह चर्चा चल रही थी तभी अपने तपःप्रभाव से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए नारदमुनि आकाश से उतरे ॥१२॥ अर्घ्य देकर आसन पर विराजमान नारदमुनि ने राजा चन्द्रप्रभ से कहा—'राजन्, मुझे इन्द्र ने भेजा है और यह सन्देश दिया है कि मुझे ज्ञात हुआ है कि आप लोगों ने शिवजी की आज्ञा से और मय दानव की सहायता से अज्ञानवश मानवशरीरधारी सूर्यप्रभ को समस्त विद्याधरों का चक्रवर्ती बनाने का प्रयत्न प्रारम्भ किया है ॥१३-१५॥ यह उचित नहीं है। यह पद मैंने श्रुतशर्मा को दिया है। वह विद्याधर कुल-रूपी क्षीर सागर का चन्द्रमा है और कुल-परम्परा से उसे यह पद प्राप्त है ॥१६॥ हमारे विरोधी (शत्रु) के रूप में यदि तुम धर्म-विरुद्ध कार्य करोगे तो वह अवश्य ही तुम्हारे विनाश के लिए होगा ॥१७॥ पहली बार भी यज्ञ-याग करते हुए मैंने तुमसे कहा था कि पहले अश्वमेध यज्ञ करो ऐसा मेरे कहने पर भी तुमने वह नहीं किया ॥१८॥
सहेवाननपद्मस्य रुद्रप्रत्याशयानया। यथाचरथ दर्पेण भवतां न शिवाय तत् ॥१९॥ इत्युक्ते सत्रसन्निवेशे नारदेन विहस्य तम्। मयोऽब्रवीन् न साधूक्तं सुरेन्द्रेण महामुने ॥२०॥ सूर्यप्रभस्य मर्त्यस्य यदुक्ति तदपार्थकम्। वह्वामोवरसङ्ग्रामे न ज्ञातं तेन तस्य किम् ॥२१॥ मर्त्या एव हि सत्त्वाढ्याः सर्वसिद्धयर्थकारिणः। ऐन्द्रं न साधितं पूर्वं पदं किं नहुषादिभिः ॥२२॥ यच्चाह दत्तमस्माभिः साम्राज्यं श्रुतशर्मणे। क्रमागतं च तत् तस्येतेद्वप्यसमञ्जसम् ॥२३॥ दाता महेश्वरो यत्र प्रामाण्यं तत्र कस्य किम्। ज्येष्ठागतं हिरण्याक्षस्येन्द्रत्वं च कथं कृतम् ॥२४॥ यच्चापरं प्रातिपक्ष्यमधर्मं चाह तन्मृषा। स एव हि हठात् स्वार्थं प्रातिपक्ष्यं करोति नः ॥२५॥ कश्चाधर्मो जिगीषामो वयं हि परिपन्थिनम्। न हरामो मुनेर्भार्यां१ ब्रह्महत्यां२ न कुर्महे ॥२६॥ यच्चाश्वमेधाकरणं वेदावज्ञां च जल्पति। तदसद्भूतयज्ञे हि विहितेऽन्यैः किमध्वरैः ॥२७॥ अचिते देवदेवे च सम्भौ देवो न कोऽचितः। यच्चाहंनैव दास्या न पिबेति तदप्यसत् ॥२८॥ किं सत्र दवनिर्वह्नेरन्यैर्यत्रोद्यतो हरः। रवावभ्युदितऽन्यानि किं तेजांसि चकासति ॥२९॥ तदेतद्देवराजाय सर्वं वाच्यं त्वया मुने। वयं च प्रस्तुतं कुर्मः स यद्वेत्ति करोतु तत् ॥३०॥ एवं मयासुरेणोक्तो नारदषिस्तथेति तम्। प्रतिसन्देशमादाय ययौ सुरपतिं प्रति ॥३१॥ गत तस्मिन् मुनौ सोऽत्र तं चन्द्रप्रभमूपतिम्। शत्रुसन्देशसाशङ्कमुखाभं मयासुरः ॥३२॥
१ अत्र गौतमधर्म्मदारस्य जारत्वमिन्द्रस्य व्यज्यते। २ त्वाष्ट्रस्य वत्रासुरस्य हननं स्मर्य्यते।
तुम दूसरे देवताओं की परवाह न करके केवल एक रुद्र की आज्ञा से जो कुछ घमंड के साथ कर रहे हो वह तुम्हारे हित के लिए न होगा' ॥१९॥ नारदजी के ऐसा कहने पर दानवराज मय हँसकर बोला—हे महामुनि देवेन्द्र ने जो कहा है वह उचित नहीं है। वह जो कहता है कि सूर्यप्रभ मनुष्य है यह मिथ्या-कथन है। इस बात को दामोदर-संग्राम में इन्द्र ने नहीं देख लिया था कि वह अलौकिक मानव है ? मनुष्य सत्त्ववान् प्राणी है, अतः वह सभी सिद्धियों का अधिकारी है। क्या राजा नहुष आदि ने इन्द्र-पद की सिद्धि नहीं प्राप्त की थी ? और भी इन्द्र जो यह कहता है कि श्रुतशर्मा को हमने विद्याधर-चक्रवर्ती का पद प्रदान किया है तथा वह पद उसके कुलक्रम से चला आ रहा है, यह भी विरुद्ध बात है। महेश्वर शिव जिसके दाता हैं उसमें किसी प्रकार की प्रामाणिकता की क्या आवश्यकता है ? दूसरे, बड़ा भाई होने के कारण हिरण्याक्ष को इन्द्र-पद मिलना चाहिए था उस पर उसने कैसे अपना अधिकार कर लिया ? ॥२०-२४॥ और भी इन्द्र ने जो यह सन्देश दिया कि इस प्रकार हमारी तुम्हारे साथ शत्रुता ठन जायगी यह भी ठीक नहीं क्योंकि इन्द्र केवल अपने हठ के कारण हमसे शत्रुता रखता है। फिर, इसमे अधर्म की भी कौन-सी बात है। हम तो शत्रु पर विजय प्राप्त करके क्षात्र धर्म का पालन ही कर रहे हैं, न कि उसके समान मुनि-पत्नी¹ का अपहरण कर रहे हैं और न उसके समान ब्रह्महत्या² ही कर रहे हैं ॥२५ २६॥ और, इन्द्र जो कहता है कि अश्वमेध यज्ञ की आज्ञा की अवहेलना करके हमने देवताओ का अपमान किया है यह भी उसका प्रलाप-मात्र है क्योंकि रुद्र-यज्ञ कर लेने पर फिर अन्य यज्ञों का क्या महत्त्व रह जाता है ॥२७॥ देवाधिदेव महादेव की अर्चना कर लेने पर किस देवता की अर्चना नही हो जाती ? वह जो कहता है कि वज्रप्रभ की एकमात्र आस्था शिव पर ही है और वह उसके हित के लिए नहीं है, यह भी अनुचित है ॥२८॥ जहाँ स्वयं शिवजी उद्यत हैं, वहाँ अन्य देवताओं की बात ही क्या ? सूर्य के उदय होने पर अन्य तेज-समूह क्या फीके नहीं पड़ जाते ? ॥२९॥ इसलिए हे मुनिवर, तुम जाकर यह सब देवराज इन्द्र से कहो। हम अपना प्रस्तुत कार्य करते हैं और वह भी जो चाहे, करे' ॥३०॥ मयासुर द्वारा इस प्रकार कहे गये देवर्षि नारद प्रतिसन्देश लेकर देवराज इन्द्र के समीप गये ॥३१॥ नारद मुनि के चले जाने पर इन्द्र के सन्देश से शंकित राजा वज्रप्रभ से मयासुर ने कहा—॥३२॥
१ यह इन्द्र का गौतम-पत्नी अहल्या के साथ समागम-रूपी अनाचार पर व्यंग्य है।—अनु २ यह ब्राह्मण वृत्रासुर को मारने पर व्यंग्य है।—अनु
२४२ कथासरित्सागर
२४२ कथासरित्सागर न शक्राद्भो भयं कार्यं स च स्याच्छङ्कराद्गणः। पक्षे देवगणे सार्धमस्मद्देशेण संयुगे॥३३॥ तवसख्या महाराज प्रह्लादादिष्विवा वयम्। युष्मत्पक्ष स्थिता एव हसिता वत्यदानवे॥३४॥ कृतप्रसादे चास्माकमुद्युक्ते त्रिपुरान्तके। वराकस्यापरस्यास्ति कस्य शक्तिर्जगत्त्रये॥३५॥ तद्वीरा कुरुतोद्योगं कार्येऽस्मिन्नित्युदीरिते। मयेन हृष्टा सर्वे ते तत्तथेवेति मेनिरे॥३६॥ अथ दूतोक्तसन्देशात् सर्वे तत्राययुः क्रमात्। नृपा वीरभटाश्चास्ते ये चान्ये मित्रबान्धवाः॥३७॥ कृतोचितसपर्येषु¹ ससैन्येष्वेषु राजसु। पुनश्चन्द्रप्रभं भूपमुवाचेदं मयासुरः॥३८॥ कुरुष्वमद्य रुद्रस्य रात्रौ राजन् महाबलिम्। ततो यथाहं वक्ष्यामि तथा सर्वं विधास्यथ॥३९॥ एतन्मयवचः श्रुत्वा राजा चन्द्रप्रभोऽथ सः। रुद्रस्य बलिसम्भारं कारयामास तत्क्षणम्॥४०॥ ततो गत्वाटवीं रात्रौ मये कर्मोपदेष्टरि। चन्द्रप्रभः स्वयं चक्रे बलिं रुद्रस्य भक्तितः॥४१॥ होमकर्मप्रवृत्ते च राज्ञि तस्मिन्नथाद्भुतम्। साक्षादाविरभूत्तत्र नन्दी भूतगणाधिपः॥४२॥ सोऽर्चितो विधिवद्राज्ञा प्रहृष्टनेदमब्रवीत्। मन्मुखेनेदमादिष्टं स्वयं देवेन शम्भुना॥४३॥ अपि शस्त्रशतान् मा भूद् भयं वो मत्प्रसादतः। सूर्यप्रभश्चक्रवर्ती भवितैव शुभाशिषाम्॥४४॥ इत्युक्त्वशङ्करादद्यो गृहीतबलिभागकः। नन्दीश्वरो भूतगणैः सह तत्र तिरोबधे॥४५॥ ततश्चन्द्रप्रभो जातप्रत्ययस्तनयोदये। बलिं समाप्य होमान्ते विवेश रमयं पुरम्॥४६॥ १ कृता उचिता=योग्या सपर्या=सत्कारो येषां तेषु ।
अष्टम लम्बक २६३
अष्टम लम्बक २६३ 'तुम्हें इन्द्र से या श्रुतशर्मा से तनिक भी भय नहीं करना चाहिए। हमारी शत्रुता के कारण यदि श्रुतशर्मा अपनी ओर से युद्ध में देवताओं को लायेगा तो महाराज प्रह्लाद की अध्यक्षता में हम असंख्य दानव तुम्हारे पक्ष में तैयार हैं॥३४-३५॥ हम पर प्रसन्न शिवजी की कृपा के लिए तैयार रहने पर तीनों लोकों में किस बेचारे की शक्ति है कि वह हमारा सामना कर सके ॥३५॥ इसलिए, हे वीरो इस कार्य के लिए उद्योग करो। मय द्वारा इस प्रकार कहे गये वे सभी प्रसन्न होकर उनकी बातों को मान गये ॥३६॥ तदनन्तर दूत द्वारा भेजे गये सन्देश के अनुसार वीरभट आदि सभी मित्र बन्धु यथा योग्य नगर में आने लगे ॥३७॥ राजा चन्द्रप्रभ द्वारा उनका स्वागत-सत्कार और अभ्यागत सत्कार कर लेने पर मयासुर ने राजा चन्द्रप्रभ से फिर कहा—॥३८॥ 'हे राजन्! आज रात्रि को रुद्र की महाबलि की तैयारी करो। तदनन्तर मैं जैसा कहूँगा वैसा करना' ॥३९॥ मय के वचन सुनकर राजा चन्द्रप्रभ ने रुद्रबलि की सामग्री तैयार करा दी और [L16: रात को श्मशान में जाकर मय के उपदेशानुसार चन्द्रप्रभ ने स्वयं भक्तिपूर्वक बलि-दान किया॥४०-४१॥ राजा उस बलि-दान के अद्भुत हवन कार्य में निमग्न होकर लगा हुआ था तभी अग्नि से जय-जय का अत्यन्त भारी आकाश-गूंजने शब्द हुआ ॥४२॥ राजा द्वारा विधिवत् पूजन कर लेने पर प्रसन्न शूली ने कहा—'राजन्! इस द्रव्यवान् दान से मैं तुम से बड़ा आनन्दित हुआ हूँ। विमुह्य मेरी कृपा के कारण चक्रव्यूहाङ्ग में भी भय न होता चक्रवर्ती सूर्यप्रभ आकाशचारी विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा अवश्य होगा' ॥४३-४४॥ इस प्रकार ईश्वर की आज्ञा सुनकर और बलि को स्वीकार करते प्रत्यक्षतः देखकर सभी आनन्दित हो गये ॥४५॥ तब राजा चन्द्रप्रभ अपने पुत्र के उदय से पूर्ण विश्वास पाकर और कृत-कृत्य-सा मानकर धीरे-धीरे सब अपने नगर को लौट आये॥४६॥
प्रातश्च देव्या पुत्रेण राजभिः सचिवैर्वृतम्। एकान्तस्थं च तं चन्द्रप्रभभूपं मयोऽभ्यधात् ॥४७॥ शृणु राजन् रहस्यं ते वक्ष्येऽद्य चिररक्षितम्। त्वं दानवः सुनीथाख्यो मम पुत्रो महाबलः ॥४८॥ सूर्यप्रभः सुमुण्डीकसमकश्च तवानुजः। देवाहवे हतौ जातौ पितापुत्रौ युवामिह ॥४९॥ तद्दानवशरीरं ते संरक्ष्य स्थापितं मया। आलिप्य युक्त्या दिव्याभिरोषधीभिर्घृतेन च ॥५०॥ तस्मात् प्रविश्य विवरं पातालमुपगम्य च। प्रविश स्वं शरीरं तद्युक्त्या मदुपदिष्टया ॥५१॥ तच्छरीरप्रविष्टश्च तेजोवीर्यबलाधिकः। तथा भविष्यसि यथा जेष्यसि त्रिदशान् रणे ॥५२॥ सूर्यप्रभस्त्वनेनैव कान्तेन वपुषा चिरम्। सुमुण्डीकावतारोऽयं भवता खचरेश्वरः ॥५३॥ एतन्मयासुरान्मूत्वा सर्वैरङ्गीचकार सः। राजा चन्द्रप्रभो हृष्टः सिद्धार्थस्त्विदमब्रवीत् ॥५४॥ अयंदहप्रविष्टः किं किमयं पञ्चतां गतः। इति भ्रान्तो तदस्माकं का धृतिर्वदतां वर ॥५५॥ किं चैष विस्मरेदस्मांस्तदा देहान्तराश्रितः। परलोकगतो यद्वत्तत् कोऽयं वय च के ॥५६॥ एतत् सिद्धार्थतः श्रुत्वा स जगाद मयासुरः। प्रविशन्तममुं तस्मिञ्छरीरे योगयुक्तितः ॥५७॥ स्वतन्त्रं यूयमागत्य साक्षात् तत्रैव पश्यत। न चैव विस्मरेद्येष युष्माञ्छृणुत कारणम् ॥५८॥ अस्वप्नो मृतोऽन्यत्र गर्भे यो जायते न सः। किञ्चित् स्मरत्यन्तरितः क्लेशैस्तैर्गर्भादिभिः ॥५९॥ स्वातन्त्र्येण तु योऽन्यस्मिञ्छरीरे योगयुक्तितः। अन्तःकरणमाविश्य प्रविशन्दिन्द्रियाणि च ॥६०॥ अविप्लुतमनोबुद्धिर्गुहादिव गृहान्तरम्। सहसा स स्मरत्येव ज्ञानी योगेश्वरोऽखिलम् ॥६१॥
अष्टम लम्बक २६५
अष्टम लम्बक २६५ प्रातःकाल महारानी, पुत्र और मन्त्रियों के साथ एकान्त में बैठे हुए राजा चन्द्रप्रभ से मय ने कहा—॥४७॥ 'हे राजन्, सुनो मैं तुम्हें बहुत दिनों से छिपाया हुआ एक रहस्य बताता हूँ। तू मेरा पुत्र है और महाबलवान् सुनीथ नाम का दानव है और सूर्यप्रभ सुमुण्डीक नाम का तेरा छोटा भाई है। तुम दोनों देवताओं द्वारा युद्ध में मारे जाने पर इस जन्म में पिता-पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए हो ॥४८-४९॥ इसलिए, मैंने तुम्हारा दानव-शरीर दिव्य ओषधियों और घृत से लेप करके सुरक्षित रखा है॥५०॥ इसलिए, गुफा के मार्ग से पाताल में प्रवेश करके मेरी बताई हुई युक्ति से अपने शरीर में प्रवेश करो ॥५१॥ पहले उस दानव-शरीर में प्रवेश करके तेज, पराक्रम और बल में तुम इतने अधिक बढ़ जाओगे जिससे कि युद्ध में आकाशचारियों पर विजय प्राप्त कर लोगे ॥५२॥ और, यह सूर्यप्रभ नामक सुमुण्डीक उसी सुन्दर शरीर से चिरकाल तक विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥५३॥ राजा सूर्यप्रभ ने मय के मुख से ऐसा सुनकर, 'ठीक है' कहकर, उसकी आज्ञा को स्वीकार किया किन्तु मन्त्री सिद्धार्थ ने कहा—॥५४॥ 'हे दानवश्रेष्ठ राजा के दानव-शरीर में प्रवेश करने पर 'क्या यह मर गया' इस भ्रम में पड़े हुए लोगों को धीरज कैसे बँधेगा ? ॥५५॥ और, दूसरे शरीर को धारण करके परलोकगामी आत्मा के समान यह इन बातों को भूल जायगा तो यह कौन और हम कौन अर्थात् हमारे इसके सभी सम्बन्ध टूट जायेंगे ॥५६॥ सिद्धार्थ की बात सुनकर मयासुर ने कहा—'योग की क्रिया द्वारा उस पूर्व शरीर में स्वातन्त्र्य से प्रवेश करते हुए तुम उसे प्रत्यक्ष रूप से देखो। इस प्रकार यह आप लोगों को नहीं भूलेगा ॥५७-५८॥ इसका कारण सुनो। जो व्यक्ति मृत्यु के वश में होकर मर जाता है, वह नवीन गर्भ में आकर पिछला सब कुछ भूल जाता है और मृत्यु, रोग आदि कष्टों से पीड़ित होकर कुछ भी स्मरण नहीं कर पाता ॥५९॥ जो व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक स्वतन्त्र रूप से दूसरे शरीर में योग की युक्ति से प्रवेश करता है वह पहले अन्तःकरण में प्रवेश कर इन्द्रियों में प्रवेश करता है। उसका मन और उसकी बुद्धि ठीक रहते हैं। जैसे कोई व्यक्ति एक घर से दूसरे घर में प्रवेश करता है, वैसे वह व्यक्ति एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है और पहले छोड़े हुए घर को नहीं भूलता। वह ज्ञानवान् होकर सब कुछ स्मरण रखता है॥६०-६१॥ ३४
२६६ कथासरित्सागर
२६६ कथासरित्सागर तस्माद्विकल्पो मा भूद्वः प्रत्युतैष भूपो महत्। दिव्यं शरीरमाप्नोति जरारोगविवर्जितम् ॥६२॥ यूयं च दानवाः सर्वे प्रविश्यैभ रसातलम्। सुधापानेन नीरोगदिव्यदेहा भविष्यथ ॥६३॥ एतन्मयासुरवचः श्रुत्वा सर्वे तथेति ते। शङ्कातप्यपरित्यक्तशङ्कास्तत्प्रतिपेदिरे ॥६४॥ तद्वाक्येन च सोऽप्येवमिलिताखिलराजनकः। चन्द्रप्रभश्चन्द्रभागेरावत्योः सङ्गमं ययौ ॥६५॥ तत्रावस्थाप्य नृपतीन् बहिनिक्षिप्य तेषु सः। सूर्यप्रमावरोधांस्तानुरेष्य मयदर्शितम् ॥६६॥ विवेश विवरं सोऽथ सह सूर्यप्रभेण सः। चन्द्रप्रभः समं देव्या सिद्धार्थेशैश्च मन्त्रिभिः ॥६७॥ प्रविश्य गत्वा दीर्घं च तेनाध्वानं ददर्श सः। दिव्यं देवकुलं तच्च सर्वैः सह विवेश तैः ॥६८॥ तावच्च ये स्थितास्तत्र राजानो विवराद्बहिः। तेषां विद्याधरा व्योम्ना सैन्यैः सह समापतन्¹ ॥६९॥ ते तान्संस्तम्भ्य मायाभिर्भार्याः सूर्यप्रभस्य ताः। अहुरंस्तत्क्षणं चावमुदगाद् भारती दिवः ॥७०॥ श्रुतशर्म्न्नरे पाप यद्येताश्चक्रवर्तिनः। भार्याः स्पृश्यसि तत्सद्यः ससैन्यो मृत्युमाप्स्यसि ॥७१॥ तस्मान्मासुवदतास्त्वं पश्यन् रक्षे सगौरवम्। अधुनैव न हत्वा त्वां यदेता मोषिता मया ॥७२॥ समास्ति कारणं किञ्चित्तत्तिष्ठन्त्वत्र सम्प्रति। इत्युक्ते दिव्यया वाचा खचरास्ते तिरोदधुः ॥७३॥ राजानस्ते च मीढास्ता दृष्ट्वा वीरभटादयः। आसन्नान्योन्ययुद्धेन दहत्याग कृतोद्यमाः ॥७४॥ मैतानामस्ति विश्वस्तः प्राप्स्यथैताः सुताः पुनः। तस्याह्वं न युष्माभिः कार्य पश्चाणमस्तु वः ॥७५॥ १ आक्रमणं चक्रुरित्यर्थः।
अष्टम लम्बक २६७
अष्टम लम्बक २६७ इसलिए, तुम लोग शंका न करो। प्रत्युत तुम्हारा यह राजा जरा-मरण रहित दिव्य और महाबलवान् शरीर धारण करेगा ॥६२॥ तुम सभी मानव भी रसातल में प्रवेश करके अमृतपान से दिव्य वपुधारी और रोग-रहित हो जाओगे' ॥६३॥ मयासुर के यह वचन सुनकर उसकी बात को सभी ने मान लिया और उसके विश्वास से शंका-रहित होकर वे सब सहमत हो गये ॥६४॥ मयासुर के कथनानुसार, दूसरे दिन राजा चन्द्रप्रभ चन्द्रभागा¹ और इरावती नदी के संगम पर सब राजाओं के साथ गया ॥६५॥ वहाँ वह सेना-सहित सब राजाओं को ठहराकर और सूर्यप्रभ की सभी रानियों को उनकी संरक्षता में रखकर मयासुर द्वारा निर्दिष्ट गुफा में सूर्यप्रभ तथा सिद्धार्थ आदि मन्त्रियों एवं अपनी रानियों के सहित प्रवेश कर गया ॥६६-६७॥ उस गुफा में जाकर उसने दूर से एक देव-मन्दिर को देखा और उन सब के साथ वह उस मन्दिर में गया ॥६८॥ ऊपर जो राजा सूर्यप्रभ की प्रतीक्षा में गुफा के द्वार पर ठहरे थे, उनपर अपनी सेना के साथ विद्याधर आकाश-मार्ग से टूट पड़े ॥६९॥ उन विद्याधरों ने अपनी मायाओं (विद्याओं) से उन सब को बाँधकर सूर्यप्रभ की सभी पत्नियों का हरण कर लिया और इसके बाद ही आकाशवाणी हुई—॥७०॥ 'अरे पापी श्रुतशर्मन्, यदि तू चक्रवर्ती सूर्यप्रभ की इन पत्नियों का स्पर्श भी करेगा तो उसी क्षण सेना के साथ मर जायगा ॥७१॥ इसलिए इन स्त्रियों को माता के समान देखते हुए सम्मान के साथ इनकी रक्षा कर। इसी लिए, मैंने अभी तुझे मारकर इन्हें नहीं छुड़ाया है ॥७२॥ इसमें कुछ कारण है, अतः ये अभी दूसरे स्थान पर रहें।' आकाशवाणी के ऐसा कहकर बन्द हो जाने पर वे सभी विद्याधर भाग गये ॥७३॥ और, वीरभट आदि राजा अपनी कन्याओं का प्रत्यक्ष आहरण देखकर परस्पर युद्ध करके प्राणत्याग करने के लिए उद्यत होगये ॥७४॥ 'इन कन्याओं का नाश न होगा, तुम लोग फिर इन्हें प्राप्त करोगे, इसलिए मरण का साहस न करो, तुम्हारा कल्याण हो' ॥७५॥
१. पंजाब की दो प्रसिद्ध नदियाँ चन्द्रभागा—चेनाव और इरावती— रावी।—अनु.
१६८ कथासरित्सागर
१६८ कथासरित्सागर इति वाङ् मामकी¹ तेषां समुद्योगं न्यवारयत्। ततः प्रतीक्षमाणास्ते तस्थुस्तत्रैव भूभुजः ॥७६॥ अत्रान्तरे च पाताले तस्मिन् देवकुले स्थितम्। सर्वैर्वृत्तमवोचत्समेव चन्द्रप्रभं मयः ॥७७॥ राजन्नेकमना भूत्वा शृण्विदानीमनुत्तमम्। उपदेक्ष्यामि ते योगमन्यदेहप्रवेशदम् ॥७८॥ इत्युक्तवाख्याय सांख्यं च योगं च सरहस्यकम्। युक्तिं देहान्तरावेशे तस्मादुपदिदेश सः ॥७९॥ जगाद च स योगीन्द्र सैषा सिद्धिरियं च तत्। ज्ञानं स्वातन्त्र्यमैश्वर्यमणिमादिनिकेतनम् ॥८०॥ अत्रैश्वर्ये स्थिता मोक्षं न वाञ्छन्ति सुरेश्वराः। एतदर्थं जपतपःक्लेशम येऽपि कुर्वते ॥८१॥ सम्प्राप्तमपि नेच्छन्ति स्वर्गभोगं महाशयाः। तथा च शृणुतामत्र कथां वः कथयाम्यहम् ॥८२॥ कालनाम्नो ब्राह्मणस्य कथा आसीत्कोऽपि पुराकल्पे कालो नाम महाद्विजः। स गत्वा पुष्करे तीर्थे जपं चक्रे दिवानिशम् ॥८३॥ जपतस्तस्य तत्रागाद्दिव्यं वर्षशतद्वयम्। ततोऽस्य शिरसोऽच्छिद्रमचिराग्निरभून्महत् ॥८४॥ येन सूर्यायुतेनेव प्रोद्गतेनाम्बरे गतिः। सिद्धादीनां निरुद्धाभूज्जज्वाल च जगत्त्रयम् ॥८५॥ ब्रह्मन् यस्ते वरोऽभीष्टस्तं गृहाण ज्वलत्यमी। लोकास्तद्वदिपस्त्यूचुर्बहवेन्द्राद्या उपेत्य तम् ॥८६॥ जपादन्धत्र मा भून्मे रतिरित्थेष एव मे। वरो नान्यद्वृणे किञ्चिदिति तान् प्रत्युवाच सः ॥८७॥ निर्बन्धं तेषु कुर्वत्सु ततो गत्वापि दूरतः। उत्तरे हिमवत्पार्श्वे जपन्नासीत्स जापकः ॥८८॥ १ मामकी वाक् = आकाशवाणी।
अष्टम लम्बक २६१
अष्टम लम्बक २६१ इस प्रकार की आकाशवाणी ने उनके मरण प्रयत्न को शान्त कर दिया और वे पहले की भाँति चन्द्रप्रभ की प्रतीक्षा में वहीं रुके रहे ॥७६॥ इसी बीच पाताल के उस देवमन्दिर में बैठे हुए और अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे हुए चन्द्रप्रभ से मयासुर ने कहा—॥७७॥ 'हे राजन् एकाग्रचित्त होकर सुनो। मैं तुम्हें अत्यन्त उत्तम योग का उपदेश दूंगा जिसके द्वारा दूसरे शरीर में प्रवेश किया जा सकता है' ॥७८॥ ऐसा कहकर उसने चन्द्रप्रभ को रहस्य के साथ सांख्य और योग द्वारा परकाय प्रवेश का उपदेश दिया ॥७९॥ वह योगीन्द्र कहने लगा—यह सिद्धि है और यह वह स्वतेजस् ज्ञान है जो ऐश्वर्य और अणिमा आदि अष्ट सिद्धियों को देनेवाला है ॥८०॥ इस ऐश्वर्य को प्राप्तकर देवता मोक्ष को भी नहीं चाहते। इसी की प्राप्ति के लिए अन्य मनुष्य जप-तप का क्लेश उठाते हैं ॥८१॥ और वे इच्छानुरूप व्यक्ति मिलने हुए स्वयं-मुक्त को भी नहीं चाहते। मैं इस सम्बन्ध में एक कथा कहता हूँ सुनो'—॥८२॥ काल ब्राह्मण की कथा प्राचीन समय कालनाम का एक ब्राह्मण था उसने पुष्कर तीर्थ में आकर दिन रात जप करना प्रारम्भ किया ॥८३॥ जप करते हुए उसे दो सौ दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये तब उसके सिर से एक अविराम ज्योति पैदा फूट पड़ी ॥८४॥ हजारों सूर्यों से भी अधिक उस प्रचंड ज्योति ने आकाश में उठकर सिद्ध विद्याधर और आकाशचारियों की गति को रोक दिया और तीनो लोक उस ज्वाला के तेज से सन्तप्त होने लगे ॥८५॥ तब ब्रह्मा इन्द्र आदि देवता उस ब्राह्मण के समीप आकर बोले— हे ब्रह्मन् तुष्ट जो भी अभीष्ट हो वर लो। तुम्हारे तप के तेज से तीनो लोक जल रहे हैं ॥८६॥ उस ब्राह्मण ने कहा— मैं यही चाहता हूँ कि जप को छोड़कर अन्यत्र कहीं मेरा मन न लगे। इसके अतिरिक्त मैं कुछ वर नहीं चाहता ॥८७॥ उन देवताओं के बहुत आग्रह करने पर तंग आकर वह ब्राह्मण उत्तर दिशा में हिमालय के पास जाकर फिर जप करने लगा ॥८८॥
२७ कथासरित्सागर
२७ कथासरित्सागर तत्राप्यसह्यं तत्तेजः सविशेषं क्रमाद्यदा । तदा विघ्नाय तस्येन्द्रः प्रजिघाय सुराङ्गनाः ॥८९॥ स धीरो लोभयन्तीस्ता न तृणायाप्यमन्यत । निसृष्टार्थं¹ ततस्तस्मै मृत्युं विससृजुः सुराः ॥९०॥ उपेत्य स तमाह स्म ब्रह्मन् मर्त्यैरियञ्चिरम् । न जीव्यत तदात्मानं त्यज मा रुङ्क्ष्य स्थितिम् ॥९१॥ तच्छ्रुत्वा स द्विजोऽवादीद्यदि पूर्णो ममावधिः । आयुस्तन्न कस्मान्मां नमसे किं प्रतीक्षसे ॥९२॥ स्वयं च नाहमात्मानं त्यजेयं पाशहस्त र । आत्मघाती भवेयं च शरीरं कामतस्त्यजन् ॥९३॥ इत्युक्तवन्तं तं नेतुं प्रभावान्नाशकद्यदा । तदा पराङ्मुखो मृत्युर्जगाम स यथागतम् ॥९४॥ ततो विजितकालं तं शक्रः साक्षाद्ययौ द्विजम् । बलादुत्क्षिप्य बाहुभ्यां निनायेन्द्रः सुरालयम् ॥९५॥ तत्र तद्भोगविमुखो जपादविरमंश्च सः । देवावतारितो भूयस्तमेवागाद्विमाश्रयम् ॥९६॥ तत्रापीन्द्रादया भूयो वरार्थं तोषयन्ति तम् । यावत्सावन्नृपस्तेन मार्गेणेक्ष्वाकुराययौ ॥९७॥ स तद्दृष्ट्वा यथावस्तु जापकं तमभाषत । देवेभ्यद्येव गृह्णासि वरं मत्तो गृहाण भो ॥९८॥ तच्छ्रुत्वा स विहस्यैनं जापकोऽभ्यवदन्नृपम् । त्वं शक्तो वरदाने मे त्रिदशेभ्योऽप्यगृह्णतः ॥९९॥ इत्यूचिवांसं तं विप्रमिक्ष्वाकुः प्रत्युवाच सः । शक्तो न तदहं दातुंस्त्वं मम तर्हेहि म वरम् ॥१००॥ ततः स जापकोऽवादीद्यत्तेऽभीष्टं वृणीष्व तत् । दास्याम्यथति तच्छ्रुत्वा राजान्तश्चिन्तयन् सः ॥१०१॥ महं ददामि विप्राभ्यं गृह्णातीत्युषिता विधिः । विपरीतमिदं गृह्णाम्यहमयं ददाति यत् ॥१०२॥ १ वृत्तमिष्टार्थं ।
अष्टम लम्बक २७१
अष्टम लम्बक २७१ वहाँ भी जब उसका असह्य तेज उसी प्रकार प्रज्वलित हुआ तब इन्द्र ने उसकी तपस्या में विघ्न करने के लिए उसके पास अप्सराओं को भेजा ॥८९॥ किन्तु, उस ब्राह्मण ने उन्हें तृण के समान समझकर उनकी उपेक्षा कर दी तो उस विप्र के पास देवताओं ने मृत्यु को भेजा ॥९०॥ मृत्यु ने उससे कहा हे ब्राह्मण मनुष्य इतने दिनों तक नहीं जीते इसलिए इस आत्मा को छोड़ो और ईश्वरीय मर्यादा का उल्लंघन मत करो ॥९१॥ यह सुनकर ब्राह्मण ने कहा कि 'यदि मेरे आयुष्य की अवधि पूर्ण हो गई, तो मुझे क्यों नहीं ले जाता प्रतीक्षा क्यों कर रहा है। हे पाशवाले मैं स्वयं प्राणों को न छोडूंगा। इस प्रकार, अपनी इच्छा से शरीर छोड़नेवाला मैं आत्मघाती बनूँगा ॥९२-९३॥ इस प्रकार कहते हुए उस ब्राह्मण को तप-प्रभाव के कारण जब काल न ले जा सका तब वह विवश होकर जहाँ से आया था वहीं लौट गया ॥९४॥ तब इन्द्र को पश्चात्ताप हुआ और वह काल को जीतनेवाले उस ब्राह्मण को बलपूर्वक अपने हाथों से उठाकर स्वर्ग में ले गया ॥९५॥ स्वर्ग में जाकर भी उसके भोगों से विरक्त और जप में लीन उस ब्राह्मण को देवताओं ने पृथ्वी पर उतार दिया। वह ब्राह्मण फिर हिमालय की ओर चला गया ॥९६॥ वहाँ पर इन्द्र आदि देवताओं ने बार-बार वर माँगने के लिए उससे कहा। किन्तु, उसने एक न मानी। इतने में ही उस मार्ग से राजा इक्ष्वाकु आ निकला ॥९७॥ उसने देवताओं से सब समाचार जानकर उस जापक ब्राह्मण से कहा— यदि तुम देवताओं से वर नहीं लेते हो तो मुझसे माँगो ॥९८॥ यह सुनकर जापक ब्राह्मण हँसकर बोला कि 'जब मैं देवताओं से भी वर नहीं माँग रहा हूँ तब तुझे क्या वर देने का सामर्थ्य है' ॥९९॥ ऐसा कहते हुए ब्राह्मण से राजा इक्ष्वाकु ने कहा कि यदि मैं वर देने में असमर्थ हूँ तो तू ही मुझे वर दे दे' ॥१००॥ तब वह जापक ब्राह्मण कहने लगा— माँग जो वर तू चाहता है मैं अवश्य ही दूँगा।' यह सुनकर राजा मन में सोचने लगा कि 'मैं देता हूँ और यह ब्राह्मण लेता है यह क्रम तो उचित है किन्तु यह विपरीत क्रम है कि यह दे और मैं लूँ' ॥१०१-१०२॥
२७२ कथासरित्सागर
२७२ कथासरित्सागर इति यावत्स नृपतिर्विचिकित्सन् विसम्भ्रमे । तावद्विवदमानौ द्वौ तत्र विप्रावुपैयतुः ॥१०३॥ तौ तं दृष्ट्वा नृपं तस्य पुरो न्यायार्थमूचतुः । एकोऽब्रवीत्प्रदत्ता मे गौरनेन सवत्सिना ॥१०४॥ तां मे प्रतिवदानस्य हस्ताद् गृह्णात्यसौ न किम् । अथापरोऽभ्यधाद्याहं कृतपूर्वप्रतिग्रहः ॥१०५॥ न धाषिता मे तत्कस्माद् ग्राहयत्येष मां बलात् । एतच्छ्रुत्वा नृपोऽवादीदाक्षेप्तायं न शुष्यसि ॥१०६॥ प्रतिगृह्य कथं दात्रे बलात् प्रतिददाति गाम् । इत्युक्तवन्तं तं भूपं शक्रो रम्भान्तरोऽब्रवीत् ॥१०७॥ राजन् जानासि चेदेवं न्याय्यं तज्जापकाद्विजात् । वरमभ्यर्थ्य सम्प्राप्तं कस्माद् गृह्णासि नामृत ॥१०८॥ ततो निरुत्तरो राजा जापकं तं जगाद सः । भगवन् स्वजपस्यार्थात् फलं वितर मे वरम् ॥१०९॥ बाढमेवं जपस्यार्थात् मदीयस्यास्तु ते फलम् । इति तस्मै ततो राज्ञे जापकः स वरं ददौ ॥११०॥ सर्वलोकगतिं लेभे तेन राजा स सोऽपि च । जापकः सनिवास्यानं देवानां लोकमाप्तवान् ॥१११॥ तत्र स्थित्वा बहून् कल्पान् पुनरागत्य भूतले । प्राप्य स्वतन्त्रतां योगात् सिद्धिं लेभे च शाश्वतीम् ॥११२॥ एवं स्वर्गाद्विबिमुखैः सिद्धेरेवाभ्यर्थते बुधैः । सा त्वयाप्ता स्वतन्त्रस्तद्राजन् स्वं वेश्माविश ॥११३॥ इत्युक्तः प्रसयोगेन मयेन मुमुदे परम् । सदारतनयामात्यो राजा चन्द्रप्रभोऽथ सः ॥११४॥ ततो द्वितीयं पाताल नीत्वा तेन मयेन सः । प्रावेश्यत गृहं दिव्यं पुत्रादिसहितो नृपः ॥११५॥ तत्रान्तर्ददृशुस्ते च सर्वं सुप्तमिव स्थितम् । महान्तमेकं पुरुषं पवित्रं शयनोत्तमे ॥११६॥ महौषधिघृताभ्यक्तं विकृताकृतिभीषणम् । विषण्णवदनाम्भोजदैत्यराजसुतामृतम् ॥११७॥
अष्टम लम्बक २७१
अष्टम लम्बक २७१ इस प्रकार की शंका करता हुआ राजा जब विलम्ब कर रहा था तब दो ब्राह्मण परस्पर झगड़ते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥१४॥ वे दोनों वहाँ राजा को उपस्थित देखकर न्याय कराने के लिए उनमें से एक बोला- राजन्, इसने दक्षिणा के साथ मुझे गौ दी है ॥१५॥ उसे लौटाते हुए मुझसे यह अपने हाथ से क्यों नहीं लेता ? तब दूसरा ब्राह्मण बोला-'मैंने पहले कभी दान नहीं लिया है और न मुझे यह आवश्यक है। अतः, मैं क्यों लूँ? यह सुनकर राजा ने कहा कि 'वापी शुद्ध नहीं है। वह स्वयं दान लेकर फिर दाता को हठपूर्वक गौ क्यों देता है ? राजा के ऐसा कहने पर बीच में ही इन्द्र ने कहा- हे राजन् जब इस प्रकार का न्याय तुम जानते हो तब इस जापक ब्राह्मण से वर की याचना करके मिलते हुए उसे क्यों नहीं लेते ॥१ ५८॥ तब राजा ने निरुत्तर होकर ब्राह्मण से कहा-'भगवन् अपने किये जप का आधा फल मुझे दे दो' ॥१ ९॥ 'ठीक है, मेरे जप का आधा फल तुम्हें मिले'-जापक ब्राह्मण ने राजा को इस प्रकार वर दे दिया ॥१११॥ इस फल के प्रभाव से उस राजा ने समस्त लोकों में गति (जाने की शक्ति) प्राप्त की और उस ब्राह्मण ने शिव नाम के देवलोक को प्राप्त किया ॥१२१॥ इस प्रकार, असंख कल्पों तक भिन्न-भिन्न लोकों में रहकर और पुनः पृथ्वी पर आकर स्वतन्त्रतापूर्वक योगाभ्यास से अक्षय सिद्धि प्राप्त की ॥१२२॥ इस प्रकार, विज्ञजन स्वर्ग आदि भोगों से विमुख रहकर केवल सिद्धि प्राप्ति का ही लक्ष्य रखते हैं। वह सिद्धि तुमने प्राप्त कर ली है, अब तुम स्वतन्त्र हो। अब अपने पूर्व शरीर में प्रवेश करो ॥१२३॥ योगदान करनेवाले मय द्वारा इस प्रकार कहा गया चन्द्रप्रभ अपनी रानियों पुत्र और मन्त्रियों सहित अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥१२४॥ तब मय दानव राजा चन्द्रप्रभ को सब परिवार के साथ दूसरे पाताल में ले गया और पुत्र पत्नी आदि के साथ उसे एक दिव्य गृह में प्रवेश कराया ॥१२५॥ उस गृह के भीतर उन सबने उत्तम शय्या पर सोये हुए के समान एक दिव्य पुरुष को देखा ॥१२६॥ वह बड़ी-बड़ी आपत्तियों और धूल में लिपटा हुआ-सा था और आकृति से विकृत हो जाने से डरावना-सा प्रतीत होता था। मुंह लटकाए दैववश सो कर/ता ग वह घिरा हुआ था ॥१२७॥ ३५