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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१९० कथासरित्सागर

१९० कथासरित्सागर ततस्तं राज्यसाहाय्यसहं मत्वा द्विजोत्तमम्। सस्तुवन्बहु मेने स राजा सर्वातिशायिनम्॥२९॥ सा त्वशोकवती राज्ञी तस्य रूपं गुणांश्च तान्। दृष्ट्वा श्रुत्वा द्विजस्याभूत्सद्यस्तद्गतमानसा॥३०॥ एवं चेन्नाप्नुयां नाहं तत्किं मे जीविते फलम्। इति सञ्चिन्त्य युक्त्या सा राजानमिदमब्रवीत्॥३१॥ आर्यपुत्र प्रसीदाज्ञां देह्यस्मै गुणधर्मणे। यथा मां शिक्षयत्येष वीणां वादयितुं प्रभो॥३२॥ अस्यैतदद्य दृष्ट्वा हि वीणावादननैपुणम्। उत्पन्नः कोऽप्ययं सद्य मम प्राणाधिको रसः॥३३॥ तच्छ्रुत्वा गुणशर्माणं स राजा निजगाद तम्। वत्सस्त्रीवादनं देषीमिमां शिक्षय सर्वथा॥३४॥ यथादिशसि कुर्मोऽत्र प्रारम्भं शुभेऽहनि। इत्युक्तवामन्त्र्य स नृपं गुणशर्मा गृहं ययौ॥३५॥ वीणारम्भावहारं तु चक्रे स दिवसान्बहून्। दृष्टिमप्यादृशीं राज्ञ्याः प्रेक्ष्यापममशङ्कितः॥३६॥ एकस्मिंश्च दिने राज्ञो भुञ्जानस्यान्तिके स्थितः। व्यञ्जनं ददतं सूदमेकं मा मेत्यवारयत्॥३७॥ किमेतदिति पृष्टश्च राज्ञा प्राज्ञो जगाद सः। सविषं व्यञ्जनमिदं मया ज्ञातं न संशयः॥३८॥ सूदेन मम दृष्टे हि व्यञ्जनं ददतामुना। मुहुः भयसकम्पेन दृष्टाशङ्कितदृष्टिना॥३९॥ दृश्यतां पातुमवैतत्कर्मणेज्जिहीमतामिदम्। भोजनव्यञ्जनं यस्य निर्हरिष्याम्यहं विषम्॥४०॥ इत्युक्तस्तं राजा स सूपकारं तमेव तत्। व्यञ्जनं भोजयामास भुक्त्वा तच्च मुमूर्च्छ सः॥४१॥ मन्त्रापास्तविषस्तत्र सतः स गुणशर्मणा। राजा पृष्टो यथातत्त्वमथं वक्ति स्म सूपकृत्॥४२॥ देवाहं गौडपतिना राज्ञा विक्रमशक्तिना। विषं प्रदातुं प्रहितो युष्माकमिह वैरिणा॥४३॥

तब राजा ने उस गुणी कलाकार को राज्य की सहायता के योग्य समझकर उसकी प्रशंसा करते हुए उसे सबसे अधिक मान दिया ॥२९॥ उधर रानी असोकवती भी उस ब्राह्मण के यौवन सौन्दर्य और उन-उन कलात्मक गुणों को देखकर सर्वात्मना उस पर आसक्त हो गई ॥३०॥ और सोचने लगी कि यदि मैं इसे न पा सकी तो मेरा जीवन ही निष्फल है। इस पर मेरा अनिर्वचनीय और प्राणों से भी अधिक प्रेम हो गया है। ऐसा सोचकर उसने युक्ति से राजा को यह कहा— 'प्रियतम आज इस गुणशर्मा की वीणा-वादन में निपुणता देखकर मुझे उसमें प्राणों से भी अधिक रस (आनन्द) प्राप्त हुआ' ॥३१-३३॥ यह सुनकर राजा ने गुणशर्मा से कहा कि तुम रानी को वीणा-वादन भली भाँति सिखा दो ॥३४॥ 'आपकी जैसी आज्ञा किन्तु किसी शुभ दिन उसका प्रारम्भ करूँगा'—गुणशर्मा राजा को इस प्रकार उत्तर देकर अपने घर चला गया ॥३५॥ और, रानी की दृष्टि भेद भरी जानकर गुणशर्मा ने वीणा सिखाने का प्रारम्भ टाल दिया ॥३६॥ एक बार, गुणशर्मा भोजन करते हुए राजा के समीप बैठा था। उस समय राजा के आगे व्यञ्जन परोसते हुए रसोइये को उसने 'मत दो मत दो'—ऐसा कहकर परोसने से रोक दिया ॥३७॥ 'यह क्या बात है'—राजा के इस प्रकार पूछने पर वह बुद्धिमान् गुणशर्मा कहने लगा कि 'यह व्यञ्जन विषाक्त है। यह मैंने रसोइये के लक्षणों से जाना क्योंकि इसने व्यंजन देते समय भय से काँपते हुए तथा शंका से चंचल दृष्टि से मेरा मुँह देखा ॥३८-३९॥ और, अभी देखा जाता है। यह व्यंजन किसी को खिलाया जाय। मैं उसका विष दूर कर दूँगा' ॥४०॥ गुणशर्मा के ऐसा कहने पर राजा ने वही व्यंजन उसी रसोइये को खिलाया और वह उसे खाकर तुरन्त मूर्च्छित हो गया। गुणशर्मा के मन्त्र प्रयोग द्वारा विष दूर हो जाने पर स्वस्थ रसोइये ने राजा के पूछने पर सच्ची बात कही—॥४१-४२॥ 'राजन् तुम्हारे शत्रु गौडदेशाधिपति विक्रमशक्ति ने मुझे तुम्हें विष खिलाकर मार डालने के लिए भेजा था ॥४३॥

१६२ कथासरित्सागरः

१६२ कथासरित्सागरः सोऽभूद्वैदेशिको भूत्वा कुशलः सूदकर्मणि। देवाद्यात्मानमाबध्य प्रविष्टोऽत्र महानसे॥४४॥ राज्ञाद्य दददेवाहे विषं व्यञ्जनमध्यगम्। लक्षितो धीमतानेन प्रभुर्जानात्यतः परम्॥४५॥ इत्युक्तवन्तं तं सूपं निगृह्य गुणशर्मणे। प्रीतो ग्रामसहस्रं स प्राणदाय ददौ नृपः॥४६॥ अथैयुष्यनुबध्नन्त्या राज्ञ्या राजा स यत्नतः। वीणायां गुणशर्माणं शिक्षारम्भमकारयत्॥४७॥ तत शिक्षयतस्तस्य वीणां सा गुणशर्मणः। राज्ञी विलासहासादि चक्रेऽशोकवती सदा॥४८॥ एकदा सा करङ्गुह्यविध्यन्ती विजने मुहुः। उवाच वारयन्तं तं धीरं स्मरशरातुरा॥४९॥ वीणावाद्यापदेशेन त्वं सुन्दर मयाश्रितः। त्वयि गाढोऽनुरागो हि जातो मे तद्भजस्व माम्॥५०॥ एवमुक्तवतीं राज्ञीं गुणशर्मा जगाद ताम्। मैवं वादीर्मम त्वं हि स्वामिदारा न नेदृशम्॥५१॥ अस्मार्दृशः प्रभुद्रोहं कुर्याद्विरम साहसात्। इत्युक्तवान्तां सा राज्ञी गुणशर्म्मानमाह तम्॥५२॥ किमिदं निष्फलं रूपं वैदग्ध्यं च कलासु ते। मामीदृशीं प्रणयिनीं नीरसोपेक्षसे कथम्॥५३॥ तच्छ्रुत्वा गुणशर्मा तां सोपहासमभाषत। सुष्ठूक्तं तस्य रूपस्य वैदग्ध्यस्य च किं फलम्॥५४॥ परदारापहारेण यशःकीर्त्तिमलीमसम्। इहामुत्र च यन्न स्यात्पाताय नरकार्णवे॥५५॥ इत्युक्ते तेन सा राज्ञी सकोपेव तमब्रवीत्। मरणं मे ध्रुवं यावन्मङ्गमभ्युपकृतं त्वया॥५६॥ तदहं मारयित्वा त्वां मरिष्याम्यपमानिता। गुणशर्मा ततोऽवादीत्कामं भवतु नाम तत्॥५७॥ वरं यद्धर्मपालन क्षणमेकं हि जीवितम्। वरं न यदधर्मेण कल्पकोटिशताम्यपि॥५८॥

अष्टम लम्बक १९१

अष्टम लम्बक १९१ अतः मैं विदेशी बनकर आया और आपसे 'भोजन-निर्माण में दक्ष हूँ' ऐसा कह कर आपके रसोईघर में प्रविष्ट हुआ ॥४४॥ हे राजन्, आज ही भोजन में विष देते हुए इस बुद्धिमान् ने मुझे पकड़ लिया। इसके आगे जो कुछ हुआ आप जानते हैं ॥४५॥ ऐसा सुनकर राजा ने उस पाचक को दंडित करके प्राण देनेवाले उस गुणधर्मा को एक हजार ग्राम पुरस्कार में दिये ॥४६॥ किसी दूसरे दिन रानी के बार-बार आग्रह किये जाने पर राजा के प्रयत्न से गुणधर्मा द्वारा रानी को वीणा सिखाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया ॥४७॥ वीणा-वादन सिखाते हुए गुणधर्मा के सामने रानी अधोक्षवती सदा कायचेष्टाएँ किया करती थी ॥४८॥ एक बार एकान्त में नाखूनों को गड़ाती हुई कामातुरा रानी गुणधर्मा द्वारा रोके जाने पर बोली- 'हे सुन्दर, वीणा बजाने के बहाने से मैंने तुम्हें पाया है। तुम्हारे प्रति मेरा घनिष्ठ प्रेम हो गया है। अतः मेरा उपभोग करो' ॥४९-५०॥ इस प्रकार कहती हुई रानी से गुणधर्मा ने कहा- 'ऐसा न कहो। तुम मेरे स्वामी की स्त्री हो, मुझ जैसा व्यक्ति इस प्रकार का स्वामिद्रोह नहीं कर सकता।' ऐसा कहते हुए गुणधर्मा से रानी ने फिर कहा- 'हे नीरस तुम्हारे इस सुन्दर रूप और कला-कौशल का क्या महत्त्व जब तुम मुझ जैसी कामातुरा प्रेयसी की उपेक्षा कर रहे हो' ॥५१-५३॥ यह सुनकर गुणधर्मा हँसी करता हुआ उससे बोला- 'ठीक कहा उस चातुर्य का क्या फल जो परदारा के अपहरण से निन्दित और मलिन हो और जो इस लोक तथा परलोक में भी नरक में पतन का कारण बने' ॥५४-५५॥ गुणधर्मा के ऐसा कहने पर वह रानी क्रोध के साथ उससे बोली- 'यदि तुम मेरी बात न मानोगे तो अवश्य ही मेरी मृत्यु हो जायगी किन्तु अपमानिता मैं पहले तुम्हें मारकर मरूँगी। मेरी बात न मानने पर तुम अपना भी मरण निश्चित समझो। गुणधर्मा ने उत्तर में कहा- 'भले ही मृत्यु हो जाय। धर्म के बन्धन से बँधकर एक क्षण का भी जीवन उत्तम है, किन्तु अधर्म के साथ प्रलयकाल तक का भी जीवन अच्छा नहीं ॥५६-५८॥ ५

श्लाघ्यश्चाकृतपापस्य मम मृत्युरगर्हितः। न पुनः कृतपापस्य गर्हितं राजशासनम्॥५९॥ एतच्छ्रुत्वापि सा राज्ञी पुनरेवमुवाच तम्। आत्मनो मम च द्रोहं मा कृथाः शृणु वच्मि ते॥६०॥ नातिक्रामति राजायामशक्यमपि मद्वचः। तदस्य कृत्वा विज्ञप्तिं विषयान्दापयामि ते॥६१॥ कारयामि च सामन्तान्सर्वांस्तवनुयायिनः। तेन सम्पत्स्यसे राजा स्वमेवेह गुणोज्ज्वलः॥६२॥ ततस्ते किं भयं कस्त्वां कथं परिभविष्यति। तन्मां भजस्व निःशङ्कमन्यथा न भविष्यसि॥६३॥ इति तां ब्रुवतीं मत्वा सानुबन्धां नृपाङ्गनाम्। गुणशर्माब्रवीद्युक्त्या तत्क्षणं स व्यपोहितुम्॥६४॥ यदि तेऽत्यन्तनिर्वन्धस्तत्करिष्ये वचस्तव। प्रतिषेधमयाद्देवि सहसा तु न युज्यते॥६५॥ सहस्व दिवसान्कांश्चित्सत्यं जानीहि मद्वचः। सर्वनाशफलेनानार्थेस्तवैतद्विरोधेन को मम॥६६॥ इत्याशया तां सन्तोष्य प्रतिपन्नवचास्तया। गुणशर्मा स निर्गत्य ययावुच्छ्वसितस्ततः॥६७॥ ततो दिनेषु गच्छत्सु स महासेनभूपतिः। गत्वैव वेष्टयामास कोट्टस्थं सोमकेश्वरम्॥६८॥ तत्र प्राप्तं विदित्वा च गौडनाथः स भूपतिः। एत्य विक्रमशक्तिस्तं महासेनमवेष्टयत्॥६९॥ ततः स गुणशर्माणं महासेननृपोऽब्रवीत्। एकं रुद्ध्वा स्थिताः सन्तो रुद्धा स्मोऽन्येन शत्रुना॥७०॥ तदिदानीमपर्याप्ताः कथं युध्यामहे द्वयोः। अयुग्मे रुद्धके वीर स्थास्यामश्च कियच्चिरम्॥७१॥ तदस्मिन्त्सङ्कटेऽस्माभिः किं कार्यमिति तं सः। पृष्टः पार्श्वस्थितो राज्ञा गुणशर्माभ्यभाषत॥७२॥ धीरो भव करिष्यामि देवोपायं तथाविधम्। येनास्माभिस्तरिष्यामः सङ्कटादपि कार्यतः॥७३॥

अष्टम लम्बक १९५

अष्टम लम्बक १९५ बिना पाप किये मेरी प्रशंसनीय मृत्यु श्रेष्ठ है। किन्तु, पाप करके निन्दित राज्यासन भोगना अच्छा नहीं ॥५९॥ ऐसा सुनकर वह रानी फिर बोली—'तू मेरी और अपनी आत्मा के साथ विद्रोह मत कर। मैं कहती हूँ सुन—॥६०॥ यह राजा मेरी असंभव बात का भी नहीं टालता। इसलिए, मैं उससे निवेदन करके तुझे किसी देश का राज्य दिला दूँगी। और, सभी सामन्तों को तुम्हारा अनुयायी बना दूँगी। इससे तुम गुणों से उज्ज्वल राजा बन जाओगे ॥६१-६२॥ तब तुझे भय नहीं रहेगा। तुझे कौन और कैसे अपमानित करेगा। इसलिए, शंका छोड़ कर मेरा उपभोग कर। नहीं तो जीवित न रहूँगी' ॥६३॥ गुणशर्मा ने रानी को इतना आग्रह करती हुई देखकर उस समय को टालने के लिए युक्ति पूर्वक कहा—॥६४॥ यदि तेरा अत्यन्त आग्रह ही है तो तेरी बात सफल करूँगा किन्तु रहस्य खुलने के भय से सहसा ऐसा करना उचित नहीं। इसलिए कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करो। मेरी बात मान जाओ। तेरा विरोध करके मैं शत्रुता नहीं मोल ले सकता ॥६५-६६॥ इस प्रकार भविष्य की आशा से उसे सन्तुष्ट करके और उससे पुनर्मीलन का वचन लेकर लम्बी साँस लेता हुआ गुणशर्मा किसी प्रकार वहाँ से बाहर निकला ॥६७॥ तदनन्तर कुछ दिनों के बीतने पर राजा महासेन ने किले में बैठे हुए राजा सोमेश्वर को चढ़ाई करके घेर लिया ॥६८॥ महासेन को उधर फँसा हुआ देखकर गौड़देश के राजा विक्रमशक्ति ने चढ़ाई करके उसे (महासेन को) घेर लिया ॥६९॥ तब महासेन ने गुणशर्मा से कहा—'जबकि हम एक राजा को घेरकर बैठे हैं तभी दूसरे शत्रु द्वारा घेर लिए गये। अब दोनों से एक साथ युद्ध करने में असमर्थ हम लोग संकट में पड़ गये हैं। और बिना युद्ध किए भी कब तक घर में घिरे रहेंगे ॥७०-७१॥ अब इस संकट-काल में हमें क्या करना चाहिए ? राजा के इस प्रकार पूछने पर गुणशर्मा ने उससे कहा—॥७२॥ 'स्वामी धैर्य रखें। मैं इसका उपाय करता हूँ जिससे कि आप इस संकट को पार कर सकें ॥७३॥

१२६ कथासरित्सागर

१२६ कथासरित्सागर इत्याश्वास्य नृपं दत्त्वा सोऽन्तर्धानाञ्जनं दृशोः। रात्रौ विक्रमशक्तेस्तददृश्यः कटकं ययौ ॥७४॥ प्रविश्य चान्तिकं तस्य सुप्तं च प्रतिबोध्य तम्। जगाद विद्धि मां राजन्देवदूतमुपागतम् ॥७५॥ सन्धिं कृत्वा महासेनेनृपेणापसर द्रुतम्। अन्यथा ते ससैन्यस्य नाशः स्यादिह निश्चितम् ॥७६॥ प्रेक्षिषे च त्वया दूते स सन्धिं तदनुमन्यत। इति वक्तुं भगवता विष्णुना प्रहितोऽस्मि ते ॥७७॥ भक्तस्त्वं च स भक्तानां योगक्षेममवेक्षते। सन्नुक्त्वा चिन्तितं तेन राज्ञा विक्रमशक्तिना ॥७८॥ निश्चितं सत्यमेवैतद्दुष्प्रवेशेऽन्यथा कथम्। इह यः प्रविशेत्कश्चित्सैषा मर्त्योचिताकृतिः ॥७९॥ इत्यालोच्य स तं प्राह राजा धन्योऽस्मि यस्य मे। देवः समादिशत्येवं यथाविष्टं करोमि तत् ॥८०॥ इति वादिन एवास्य राज्ञः प्रत्ययमादधत्। अञ्जनान्तर्हितो भूत्वा गुणशर्मा ततो ययौ ॥८१॥ गत्वा यथाकृतं तच्च महासेनाय सोऽभ्यधात्। सोऽप्यभ्यनन्दत्कण्ठे तं गृहीत्वा प्राणराज्यदम् ॥८२॥ प्रातर्विक्रमशक्तिश्च स दूतं प्रेष्य भूपतिः। महासेनेन सन्धाय ससैन्यः प्रययौ ततः ॥८३॥ महासेनोऽपि जित्वा तं सोमकं प्राप्य हस्तिनः। अश्वांश्चोज्जयिनीमागात्प्रभावाद् गुणशर्मणः ॥८४॥ तत्रस्थं च नवीनाने प्राहाङ्गुकपने च तम्। सर्पवंशविषाद् भूपं गुणशर्मा ररक्ष सः ॥८५॥ गतेष्वथ दिनेष्वाप्तबलो राजा स वैरिणम्। महासेनोऽभियोक्तुं तं ययौ विक्रमशक्तिकम् ॥८६॥ सोऽपि बुद्ध्वैव तस्याग्रे नृपो युद्धाय निर्ययौ। ततः प्रवृत्ते तत्र , संग्रामोऽप्रतिमहास्तयोः ॥८७॥ क्रमाच्च द्वन्द्वयुद्धेन मिलितौ तावुभावपि। राजानौ सहसाभूतामन्योन्यं विरथीकृतौ ॥८८॥

अष्टम लम्बक १९७

अष्टम लम्बक १९७ गुणशर्मा राजा को इस प्रकार आश्वासन देकर और आँखों में अन्तर्धान होने का अंजन लगाकर रात्रि के समय अदृश्य होकर विक्रमशक्ति के शिविर में गया ॥७४॥ वह उसके निजी भवन में आकर और सोये हुए विक्रमशक्ति को जगाकर बोला-'मैं देव- दूत हूँ और तुम्हारे पास आया हूँ ॥७५॥ तुम महासेन के साथ सन्धि करके शीघ्र ही यहाँ से हट जाओ नहीं तो निश्चित रूप से तुम्हारा नाश होगा। तुम्हारे दूत भेजने पर वह सन्धि स्वीकार कर लेगा ऐसा सन्देश देकर विष्णु ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है ॥७६-७७॥ क्योंकि तू विष्णु का भक्त है और वे भक्तों से प्यार करते हैं तथा उनके योग-क्षेम का ध्यान रखते हैं। यह सुनकर राजा विक्रमशक्ति ने सोचा-॥७८॥ इस देवदूत का कथन अवश्य ही सत्य है। अन्यथा कठिनता से भी यहाँ किसी का प्रवेश असम्भव है। उसका स्वरूप भी मनुष्यों का-सा नहीं है ॥७९॥ ऐसा सोचकर राजा बोला- मैं धन्य हूँ जिसे भगवान् विष्णु ने ऐसा सन्देश दिया है। मैं उनके आदेश का पालन करता हूँ ॥८०॥ ऐसा कहते हुए राजा पर विश्वास करके गुणशर्मा अंजन के प्रभाव से अदृश्य हो गया ॥८१॥ और उसने जो कुछ किया था वह महासेन से आकर कह सुनाया। महासेन ने प्राण और राज्य देनेवाले गुणशर्मा को गले से लगा लिया ॥८२॥ प्रातःकाल ही विक्रमशक्ति दूत भेजकर और महासेन के साथ सन्धि करके सेना के साथ शीघ्र ही लौट गया ॥८३॥ महासेन भी राजा गोमन्द को जीतकर गुणशर्मा के प्रभाव से हाथी और घोड़े प्राप्त करके अपनी राजधानी में लौट आया ॥८४॥ उज्जयिनी में रहते हुए महासेन को नदी में स्नान करते समय ग्राह से और उद्यान में भ्रमण करते समय सर्प के काटने से गुणशर्मा ने बचाया ॥८५॥ कुछ दिनों के बीतने पर, अपनी सेना को प्रबल बनाकर महासेन ने राजा विक्रमशक्ति पर आक्रमण कर दिया ॥८६॥ विक्रमशक्ति भी उसे आया जानकर युद्ध के लिए बाहर निकल आया और दोनों में परस्पर भयानक युद्ध हुआ। ८७॥ युद्ध में वे दोनों राजा रथरहित होकर पैदल ही द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥८८॥

१९८ कथासरित्सागर

१९८ कथासरित्सागर ततस्तयोर्भवितव्यो प्रकोपात्खड्गहस्तयोः । आकुलत्वेन चस्खाल महासेननृपः क्षितौ ॥८९॥ स्खलितेऽस्मिन्प्रहरतश्चक्रेण भुजमच्छिनत् । राज्ञो विक्रमशक्तेः स गुणशर्मा सखड्गकम् ॥९०॥ पुनश्च हृदि हत्वा तं परिघेण न्यपातयत् । तच्चोत्थाय महासेनो राजा दृष्ट्वा तुतोष सः ॥९१॥ किं वच्मि पञ्चमं वारमिदं प्राणा इमे मम । विप्रवीर त्वया दत्ता इति तं चावदन्मुहुः ॥९२॥ ततो विक्रमशक्तेस्तत्तस्य सैन्यं सराष्ट्रकम् । आजक्राम महासेनो हतस्य गुणशर्मणा ॥९३॥ आक्रम्य चान्यान्नृपतीन्सहाये गुणशर्मणि । आगत्योज्जयिनीं तस्यां स राजा सुखितस्तदा ॥९४॥ सा त्वशोकवती राज्ञी सोत्सुका गुणशर्मणः । विरराम न निर्बन्धप्रार्थनातो दिवानिशम् ॥९५॥ स तु नाङ्गीचकारैव तदकार्यं कथञ्चन । देहपातमपीच्छन्ति सन्तो नाविनयं पुनः ॥९६॥ ततोऽशोकवती बुद्ध्वा निश्चयं तस्य वैरतः । एकदा व्याजखेदं सा कृत्वा तस्थौ रुषन्मुखी ॥९७॥ प्रविष्टोऽथ महासेनस्तामालोक्य तथास्थिताम् । पप्रच्छ राजा किमिदं प्रिये केनासि कोपिता ॥९८॥ ब्रूहि तस्य करोम्यद्य धर्मं प्राणैश्च निग्रहम् । इति ब्रुवाणं तं भूपं राज्ञी कृच्छ्रादिवाह सा ॥९९॥ येन मेऽपकृतं तस्य नैव त्वं निग्रहे क्षमः । न स तादृक्तदेतेन मिथ्योद्घाटितेन किम् ॥१००॥ इत्युक्त्वा सानबन्धे सा राज्ञि मिथ्येवमब्रवीत् । आर्यपुत्रातिनिर्बन्धो यदि ते वच्मि तच्छृणु ॥१०१॥ अयं गौडेश्वरात्प्राप्तुं तेन संस्थाप्य संविदम् । गुणशर्मा तव द्रोहं कर्तुमेतच्चिकीर्षति ॥१०२॥ त्वं च रूपनिबन्धाद्धि गौडं कारयितुं नृपम् । विससर्ज स दूतं स्वं गुप्तमाप्तं द्विजाधमः ॥१०३॥

अष्टम लम्बक १६९

अष्टम लम्बक १६९ क्रोध से खड्ग लेकर दौड़ते हुए उन दोनों में महासेन व्याकुल होकर भूमि में फिसलने के कारण गिर गया ॥८९॥ गिरे हुए राजा पर राजा विक्रमशक्ति के खड्ग-सहित हाथ को गुणशर्मा ने चक्र से काट डाला और तदनन्तर लोहे के डंडे से उसे मार डाला। महासेन उठकर और यह देखकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ और बोला—हे विप्रवीर, क्या कहूँ यह पाँचवीं बार तुमने मेरी प्राण-रक्षा की ॥९०-९२॥ गुणशर्मा से विक्रमशक्ति के मारे जाने पर, महासेन ने विक्रमशक्ति की सेनाओं और उसके राष्ट्र पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की ॥९३॥ गुणशर्मा की सहायता से उसने अन्यान्य राजाओं पर भी आक्रमण करके और उन्हें अधीन करके महासेन उज्जयिनी लौट आया ॥९४॥ उधर उत्कण्ठिता रानी अशोकवती गुणशर्मा से बार-बार आग्रहपूर्वक प्रार्थना करने से रुकती न थी ॥९५॥ किन्तु, गुणशर्मा ने उसकी प्रार्थना किसी प्रकार स्वीकार न की। सच है, सज्जन व्यक्ति मरना स्वीकार करते हैं किन्तु दुराचार नहीं ॥९६॥ अशोकवती ने भी गुणशर्मा के दृढ़ निश्चय को देखकर उससे शत्रुता ठान ली। वह एकबार बनावटी खेद का-सा मुंह बनाकर और रोने का-सा मुंह लेकर पड़ी थी ॥९७॥ महासेन ने आकर यह देखा और पूछा—'प्रिये क्या बात है, तुम्हें किसने क्रुद्ध किया है, मुझे बताओ मैं अभी उसके धन और प्राणों का विनाश करता हूँ ॥९८-९९॥ इस प्रकार कहते हुए राजा से रानी ने बड़े ही कष्ट से कहा—'यह कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसके प्रकट करने से कोई लाभ हो ॥१००॥ जिसने मेरा अपकार किया है, तुम उसे दंड देने में समर्थ नहीं हो। तथापि आर्यपुत्र यदि तुम्हारा आग्रह ही है तो सुनो, कहती हूँ ॥१०१॥ गुणशर्मा गौडेश्वर से धन लेने की इच्छा से उसके साथ षड्यन्त्र करके छल से भीतर ही भीतर तुमसे द्रोह करता था। इस नीच ब्राह्मण ने गौडेश्वर को राजा बनाने के लिए गुप्त दूत भेजा था ॥१०२-१०३॥

तं दृष्ट्वा तत्र सूदस्तमाप्तो राजानमभ्यधात्। महं से साधयाम्यत्सत्कार्यं मार्गक्षय कृथाः॥१०४॥ इत्युक्त्वा बन्धयित्वा च स दूतं गुणशर्मणः। सूदो मन्त्रस्रुतिं , रक्षन्निहागाद्विषदायकः॥१०५॥ तन्मध्ये च पलाय्यैव सतो निर्गत्य बन्धनात्। गुणशर्म्मान्तिक दूतस्तदीयः सोऽप्युपागमत्॥१०६॥ तेनाधिगतवृत्तान्तेनोक्त्या सर्वं स दर्शितः। सूपो महानसेजस्माकं प्रविष्टो गुणशर्मणे॥१०७॥ ततो ज्ञात्वा स धूर्त्तेन सूपकृद् ग्राह्यत्युना। विषदानोद्यतस्तेन शुम्यमावेद्य भातिष्ठत्॥१०८॥ अथ तस्येह सूदस्य मातुभार्ये तथानुजाम्। वार्त्तामन्वेष्टुमायातान्गुणशर्मा स बुद्धिमान्॥१०९॥ बुद्ध्या तेन हृता तस्य भार्या माता च सोऽस्य तु। भ्राता पलायितो दैवात्प्रविष्टन्मम मन्दिरम्॥११०॥ तेन तद्वर्ण्यते यावत्सर्वं मे शरणार्थिना। गुणशर्मा स मदासगृहं तावत्प्रविष्टवान्॥१११॥ तं दृष्ट्वा मां च श्रुत्वा भ्राता सूदस्य तस्य सः। भयान्निर्गम्य मत्पाश्र्वाभि जागे क्व पलायितः॥११२॥ गुणशर्मापि तं दृष्ट्वा स्वभृत्यैः पूर्व्वदर्शितम्। संभूत्सद्यः सवेमक्ष्यो विमृशन्निव किञ्चन॥११३॥ गुणशर्मन्किमर्थैवंमन्यादृक्ष इवेक्ष्यसे। इत्यपृच्छमहं तं च जिज्ञासुविजने ततः॥११४॥ सोऽप्य स्वीकर्त्तुकामो मामाह स्मोद्भेदशङ्कितः। देवि त्वदनुरागाग्निदग्धोऽहं तद्भजस्व माम्॥११५॥ धन्यथाहं न जीवेयं देहि मे प्राणदक्षिणाम्। इत्युक्त्वा वासक शून्ये पादयोरपतन्म मे॥११६॥ ततोऽहं पादमाक्षिप्य सम्भ्रमादायदुत्थिता। साम्टूत्याय तनाहमबलामिलिङ्गिता बलात्॥११७॥ सत्तार्ण च प्रविष्टा मे शती पल्लविकान्तिकम्। तां दृष्ट्वैव स निष्क्रम्य गुणशर्मा भयाद् गतः॥११८॥

अष्टम लम्बक ४०१

अष्टम लम्बक ४०१ यह सुनकर राजा के विश्वस्त रसोईदार ने कहा—'यह काम मैं कर दूंगा। द्रव्य का अपव्यय न करो' ॥१ ४॥ ऐसा कहकर गुणशर्मा के दूत को बाँधकर कैद में डाल दिया और रसोईदार गुप्त रूप से तुम्हें विष देने के लिए यहाँ आया ॥१ ५॥ इसी बीच गुणशर्मा का दूत किसी प्रकार जेल से भागकर यहाँ आ गया और उसने रसोईदार का समस्त समाचार गुणशर्मा से सुनाया। पाचक हमारे भोजनालय में था इसलिए उस दुष्ट ब्राह्मण ने विष देते हुए तुम्हें बताकर उसे मरवा डाला ॥१ ६—१ ८॥ जब उस रसोईदार का समाचार जानने के लिए आये हुए उसकी माता स्त्री तथा भाइयों को जानकर उस बुद्धिमान् गुणशर्मा ने उन सबको मार डाला किन्तु उसका भाई भागकर दैवयोग से मेरे घर आ गया ॥१ ९—११ ॥ उस शरणार्थी ने मुझे सब समाचार सुनाया और इतने में गुणशर्मा भी मेरे वासगृह में आया ॥१११॥ उसे देखकर और मुझसे उसका नाम जानकर वह रसोइये का भाई भय से न जाने कहाँ भाग गया ॥११२॥ गुणशर्मा भी अपने सेवकों से बचाये हुए उसे मेरे पास देखकर कुछ सोचते-सोचते तुरन्त मलिन हो गया ॥११३॥ 'गुणशर्मन् आज तुम कुछ दूसरे-से क्यों मालूम हो रहे हो? —मैंने उसका भाव जानने के लिए एकान्त में उससे पूछा ॥११४॥ गुणशर्मा रहस्य खुलने के भय से मुझे स्वीकार करने की इच्छा से बोला—'रानी मैं तुम्हारी प्रेमाग्नि से जल रहा हूँ। अतः, तुम मुझे स्वीकार करो। अन्यथा मैं नहीं जिऊँगा। मुझे प्राणों की भिक्षा दो। इस प्रकार कहकर वह सूने घर में मेरे पैरों पर गिर पड़ा ॥११५ ११६॥ तब मैं पैर छुड़ाकर जब उठी तब उसने मुझ अबला को बलपूर्वक अपने से लिपटा लिया ॥११७॥ उसी समय मेरी सेविका पल्लविका अन्दर आई। उसे देखकर वह गुणशर्मा भय से बाहर चला गया ॥११८॥ ५१

४०२ कथासरित्सागर

४०२ कथासरित्सागर

यदि पल्लविका नात्र प्रावेक्ष्यत्तत्स निश्चितम्। अध्यवसिष्यत्पापो मामित्येवं वृत्तमद्य मे॥११९॥ इत्युक्त्वा सा नृपं राज्ञी विरराम ररोद च। आदावसत्स्ववचनं पश्चाज्जाता हि कुस्त्रियः॥१२०॥ राजा च स तदाकर्ण्य जज्वल झटिति क्रुधा। स्त्रीबन्धु प्रत्ययो हन्ति विचारं महतामपि॥१२१॥ अब्रवीच्च स कान्तां स्वां समाश्वसिहि सुन्दरि। तस्यावश्यं करिष्यामि द्रोहिणो वधनिग्रहम्॥१२२॥ किं तु युक्त्या स हन्तव्यो भवेदपयशोऽन्यथा। स्यात् हि यत्पञ्चकृत्वो दत्तं मे तेन जीवितम्॥१२३॥ त्वदास्कन्दनदोषश्च लोके वक्तुं न युज्यते। इत्युक्ता तेन राज्ञा सा राज्ञी तं प्रत्यभाषत॥१२४॥ अवाच्य एव वोढव्यस्तेदसाञ्चाप्योऽस्य सोऽपि किम्। यो गीतेश्वरसख्येन प्रभुद्रोहे समुद्यतः॥१२५॥ एवमुक्ते तया युक्तमुक्तमित्यभिधाय सः। ययौ राजा महासेनो निजमास्थानसंसदम्॥१२६॥ तत्र सर्वे समाजग्मुर्दर्शनायास्य भूपतेः। राजानो राजपुत्राश्च सामन्ता मन्त्रिणस्तथा॥१२७॥ तावच्च गुणशर्मापि गृहाद्राजकुलं प्रति। आगा मार्गे च सुबहून्यनिमित्तान्यवैक्षत॥१२८॥ वामस्तस्माभवत्काकः श्वा वामाद्दक्षिणं ययौ। दक्षिणोऽहिरभूद्वामः सस्कन्धश्चास्फुरद् भुजः॥१२९॥ अशुभं सूचयन्त्येतान्यनिमित्तानि मे ध्रुवम्। तन्ममैवास्तु यत्किञ्चिन्मा भूद्राज्ञस्तु मत्प्रभोः॥१३०॥ इत्यन्तश्चिन्तयंस्सोऽथ नृपस्यास्थानमाविशत्। मा स्याद्राजकुले किञ्चिद्विरुद्धमिति शङ्कितः॥१३१॥ प्रणम्यानोपविष्टं च न तं राजा स पूर्ववत्। अभ्यनन्ददपश्यत्तु तिर्यग्वक्रोपेक्षया दृशा॥१३२॥ विमतन्ति तस्मिंश्च गुणशर्मणि शङ्किते। स उत्थायाथनाद्राजा तस्य स्कन्धे उपाविशत्॥१३३॥

अष्टम लम्बक ४०५

अष्टम लम्बक ४०५ यदि उस समय मेरी सेविका वहाँ न आती तो वह पापी अवश्य ही मेरा चरित्र भ्रष्ट कर देता। ॥११९॥* इस प्रकार की मिथ्या बातें बनाकर रानी चुप हो गई और रोने लगी सच है पहले झूठ की उत्पत्ति हुई और उसके उपरान्त दुष्ट स्त्रियों की। यह सुनते ही राजा क्रोध से जल उठा क्योंकि स्त्रियों की बातों पर विश्वास करने पर बड़े-बड़े विवेकयों का विवेक नष्ट हो जाता है॥१२०-१२१॥ और, राजा रानी से कहने लगा-'सुन्दरि, धैर्य रखो। मैं उस द्रोही का वध अवश्य करूँगा ॥१२२॥ किन्तु, उसे युक्ति से मारना होगा नहीं तो निन्दा होगी। यह बात प्रसिद्ध है कि उसने पाँच बार मुझे जीवन-दान दिया है ॥१२३॥ इसका यह अपराध जन-समाज में घोषित नहीं किया जा सकता। राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर रानी ने राजा से फिर कहा—'यदि यह दोष अगोपनीय¹ है तो क्या यह नहीं घोषित किया जा सकता कि वह 'वीरेश्वर से मित्रता करके राजद्रोह करता था' ॥१२४ १२५॥ रानी के इस सुझाव पर हाँ ठीक कहा'—इस प्रकार कहकर राजा सभा-भवन में चला आया ॥१२६॥ राजा के सभा में आने पर उसके दर्शन के लिए सामन्त राजा राजकुमार, मन्त्री तथा सचिव आदि सब वहाँ आये ॥१२७॥ उधर गुणशर्मा भी अपने घर से सभा में उपस्थित होने के लिए चला। उसने आते हुए मार्ग में अनेक तरह के अपशकुन देखे ॥१२८॥ उसकी बाईं ओर कौआ उड़ रहा था और कुत्ता बाईं ओर से दाहिनी ओर गया। साँप बाँये से बाईं ओर गया और कन्धे के साथ उसकी बाईं भुजा भी फड़कने लगी ॥१२९॥ 'सचमुच अपशकुन हो रहे हैं, इनका जो भी अशुभ फल होना है मुझे हो किन्तु मेरे स्वामी (राजा) का भला हो' ॥१३ ०॥ मन में ऐसा सोचता हुआ गुणशर्मा दरबार में आ पहुँचा। उसके हृदय में यह शंका थी कि राजगृह में कहीं अनिष्ट न हो ॥१३१॥ प्रणाम करके बैठे हुए गुणशर्मा की ओर राजा ने अच्छी दृष्टि से नहीं देखा और न उसका मौखिक स्वागत ही किया। प्रत्युत क्रोध के कारण तिरछी और पैनी दृष्टि से राजा उसे देखता रहा ॥१३२॥ आज यह क्या बात है' इस प्रकार अपने मन में गुणशर्मा जब सोच ही रहा था कि वह राजा अपने आसन से उठकर गुणशर्मा के कन्धे पर जा बैठा ॥१३३॥ १ प्रगट न करने के योग्य।

४०४ कथासरित्सागर

४०४ कथासरित्सागर

विस्मितांश्चाब्रवीत्सभ्यान्यायं मे गुणशर्मणः। शृणुतेति ततस्तं स गुणशर्मा व्यजिज्ञपत् ॥१३४॥ भृत्योऽहं त्वं प्रभुस्तद्वौ व्यवहारः कथं समः। अधितिष्ठासनं पश्चाद्यदिच्छसि तथाविधम् ॥१३५॥ इति धीरेण तेनोक्तो मन्त्रिभिश्च प्रबोधितः। अभ्यास्ते स्मासने राजा पुनः सभ्यानुवाच च ॥१३६॥ विदितं वावदेतद्वो मन्त्रिणो यत्क्रमागतम्। विहाय गुणशर्मायं तावदात्मसमः कृतः ॥१३७॥ श्रूयतां मम चैतेन कीदृग्दूतगतागतैः। गौडेश्वरेण कृतैक्यं द्रोहं कर्तुमचिन्तयत् ॥१३८॥ इत्युक्त्वा वर्णयामास तत्तेभ्यः स महीपतिः। यदशोकवती तस्मै जगाद रचितं मृषा ॥१३९॥ योऽप्यारम्भवसनाक्षेपस्तया तस्य मृषोदितः। निष्कास्य लोकान्ताप्तेभ्यः सोऽप्युक्तस्तेन भूभुजा ॥१४०॥ ततः स गुणशर्मा तमुवाचासत्यमीदृशम्। देव केनासि विज्ञप्तं तन्मित्रं केन निर्मितम् ॥१४१॥ तच्छ्रुत्वैव नृपोऽवादीत्पाप सत्यं न चेदिदम्। चरुभाण्डान्तरस्थं तत्कथं ज्ञातं विषं त्वया ॥१४२॥ प्रज्ञया ज्ञायते सर्वमित्युक्ते गुणशर्मणा। अशक्यमेतदित्यूचुस्तद्वेषेणान्यमन्त्रिणः ॥१४३॥ देव तत्त्वमनन्विष्य वक्तुमेव न ते क्षमम्। प्रभुश्च निर्विचारश्च नीतिज्ञैर्न प्रशस्यते ॥१४४॥ इत्यस्य वदतो भूयः स राजा गुणशर्मणः। धावित्वा छुरिकाघातं ददौ धृष्ट इति ब्रुवन् ॥१४५॥ तस्मिन्प्रहारे चरणप्रयोगात्तेन वञ्चिते। अन्ये तु प्रहरन्ति स्म वीरे तस्मिन्नृपानुगाः ॥१४६॥ स चापि युद्धकरणैर्वञ्चयित्वा कृपाणिकाः। गुणशर्मा समं तेषां सर्वेषामप्यपाहरत् ॥१४७॥ बबन्ध चैतानन्योऽन्यं केशपाशेन वेष्टितान्। कृत्वा चरणयुक्त्यैव चित्रद्युतिशितलाघवः ॥१४८॥

अष्टम लम्बक ४५

अष्टम लम्बक ४५ राजा ने सभासदों से कहा—'गुणशर्मा के लिए मेरा न्याय सुनो। यह सुनकर गुणशर्मा ने कहा—'मैं सेवक हूँ आप मेरे स्वामी हैं, अतः मेरा और आपका व्यवहार समान नहीं हो सकता। पहले आप अपने आसन पर बैठें फिर जो इच्छा हो आज्ञा करें' ॥१३४-१३५॥ धैर्यशाली गुणशर्मा द्वारा इस प्रकार कहा गया और सभ्यों द्वारा समझाया गया राजा अपने आसन पर बैठ गया और सभ्या से बोला—॥१३६॥ 'आपलोगों को विदित है कि कुलक्रम से आये हुए मन्त्रियों को छोड़कर मैंने इस गुणशर्मा को अपने समान बना डाला। अब आप लोग सुनिए कि इसने दूतों के यातायात द्वारा गौडदेश के राजा से मिलकर राजद्रोह करने की सोची। ऐसा कहकर राजा ने रानी अशोकमती की बनावटी बातें सभा में सुना दीं। इसके अतिरिक्त उसने अन्य लोगों को हटाकर अत्यन्त आत्मीय व्यक्तियों से रानी अशोकमती के सतीत्व-नाश करने की उसकी चेष्टा भी स्पष्ट कर दी ॥१३७—१४०॥ तब गुणशर्मा ने कहा—'राजन् आपको यह झूठी बात किसने कह दी। और, यह आकाश-चित्र किसने बनाया ॥१४१॥ यह सुनते ही राजा ने कहा—'हे पापी यदि यह सच नहीं है, तो भोजन-पात्र के अन्दर पड़े हुए विष का पता तुम्हें कैसे चला ? ॥१४२॥ बुद्धि से सब कुछ जाना जा सकता है' गुणशर्मा के इस प्रकार कहने पर उसके शत्रु अन्य मन्त्री बोले—'यह असम्भव है महाराज ! 'तत्व की खोज किये बिना आपको ऐसा न कहना चाहिए। राजा और वह भी विवेक-हीन हो तो प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता' ॥१४३-१४४॥ गुणशर्मा जब यह कह ही रहा था कि राजा ने उठकर उस पर छुरे का प्रहार करते हुए कहा कि 'तू बड़ा ढीठ है' ॥१४५॥ गुणशर्मा ने करभ प्रयोग १ (कलावाजी) से उस प्रहार को बचा लिया यह देखकर अन्य दरबारियों ने भी उस पर छुरे से प्रहार कर दिया ॥१४६॥ आश्चर्यजनक कलावाज गुणशर्मा ने अपनी विचित्र कला से उन सबकी छुरियां छीन लीं और उन्हें ही सिर के बालों से आपस में बाँध दिया ॥१४७-१४८॥ १ करभ-प्रयोग, एक प्रकार की पैंतरेबाजी।

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर निर्ययौ च ततस्तस्याः प्रसभं नृपसंसदः। अश्वान क्षतमात्रं च योधानामनुधावताम् ॥१४९॥ ततो दत्त्वाञ्चलस्य तदन्तर्धानाञ्जनं दृशोः। अदृश्यः प्रययौ तस्माद्देशात्तत्क्षणमेव सः ॥१५०॥ दक्षिणापथमुद्दिश्य गच्छंश्चाचिन्तयत्पथि। नूनं तयाशोकवत्या मूढोऽसौ प्रेरितो नृपः ॥१५१॥ अहो विषादप्यधिकाः स्त्रियो रक्तविमानिताः। अहो असेव्याः साधूनां राजानोऽतत्त्वदर्शिनः ॥१५२॥ इत्यादि चिन्तयन्प्राप गुणशर्मा कथञ्चन। ग्रामं तत्र वटस्याधो ददर्शैकं द्विजोत्तमम् ॥१५३॥ शिष्यानध्यापयन्तं समुपसृत्याभ्यवादयत्। सोऽपि तं विहितातिथ्यः पप्रच्छ ब्राह्मणः क्षणात् ॥१५४॥ हे ब्रह्मन्कतमां शाखामधीषे कथ्यतामिति। ततः स गुणशर्मा तं ब्राह्मणं प्रत्यवोचत ॥१५५॥ पठामि द्वादश ब्रह्मन् शाखा द्वे सामवेदतः। ऋग्वेदाद्द्वे यजुर्वेदात्सप्त चैकामथर्वतः ॥१५६॥ तच्छ्रुत्वा तर्हि वेत्थस्त्वमित्युक्त्वा ब्राह्मणोऽथ सः। आकृत्या कथितोत्कर्षं प्रहृष्टः पप्रच्छ तं पुनः ॥१५७॥ को देशः कोऽन्वयो ब्रूहि जन्मनामश्रुतंस्तव। किं ते नाम कथं वेत्थस्त्वमधीतं क्व वा वद ॥१५८॥ गुणशर्मणो जन्मवृत्तान्तम् तच्छ्रुत्वा गुणशर्मा तमुवाचोज्जयिनीपुरि। आदित्यशर्मनामासीत्कोऽपि ब्राह्मणपुत्रकः ॥१५९॥ पिता तस्य च बालस्य सतः पञ्चत्वमाययौ। माता तेन समं पत्या विवेश च हुताशनम् ॥१६०॥ ततः स ववृधे तस्यां पुरि मातुसवेश्मनि। सादित्यशर्माधीयानो वेदान्विद्याः कलास्तथा ॥१६१॥ प्राप्तविद्यस्य तस्याथ जपव्रतनिषेविणः। प्रव्राजकेन केनापि सख्यं समुदपद्यत ॥१६२॥ स परिव्राट् समं तेन मित्रेणादित्यशर्मणा। गत्वा पितृवने होमं यक्षिणीसिद्धये व्यधात् ॥१६३॥

[Header: षष्ठम लम्बक, ४०७]

[Header: षष्ठम लम्बक, ४०७]

तदनन्तर गुणधर्मा बलपूर्वक सबको विवश करके राजसभा से निकल गया और उसका पीछा करते हुए एक सौ ग्यारह सिपाहियों को भी उसने मार डाला॥१४९॥ तब आँख में बचे हुए अंजन को लगाकर वह अन्तर्धान होकर उसी क्षण उस देश से बाहर चला गया ॥१५०॥ दक्षिण-पथ की ओर जाते हुए उसने मार्ग में सोचा कि 'रानी अधोकवती ने अवश्य उस मूर्ख को उकसाया है' ॥१५१॥ प्रेमी द्वारा अपमानित स्त्रियां विष से भी अधिक भीषण होती हैं और असत्प्रवर्ती (अविवेकी) राजा भी सज्जनों के लिए सेवनीय नहीं होते ॥१५२॥ ऐसा सोचता हुआ गुणधर्मा एक गाँव में पहुँचा और वहाँ उसने वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए एक ब्राह्मण को देखा जो शिष्यों को पढ़ा रहा था। उसके पास जाकर गुणधर्मा ने प्रणाम किया। उस ब्राह्मण ने भी उसका स्वागत-सत्कार करके पूछा—'हे ब्राह्मण देवता! कौन-सी शाखा का अध्ययन करते हो बताओ। तब गुणधर्मा उस ब्राह्मण से कहने लगा—'हे विद्वान्! मैं बारह शाखाओं का अध्ययन करता हूँ। दो सामवेद से दो ऋग्वेद से सात यजुर्वेद से और एक अथर्व से ॥१५३—१५६॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला-'तब तो तुम देवता-स्वरूप हो। प्रभावशाली आकृति से उत्कृष्ट प्रतीत होते हुए गुणधर्मा से ब्राह्मण ने पुनः नम्रतापूर्वक कहा—'यह तो बताओ कि तुम अपने जन्म से कौन-सा देश और कौन-सा कुल अलंकृत करते हो? और तुम्हारा नाम क्या है। तुमने कहाँ पढ़ा? ॥१५७–१५८॥

गुणधर्मा का जन्म-वृत्तान्त

यह सुनकर गुणधर्मा कहने लगा—"उज्जयिनी नगरी म आदित्यधर्मा नाम का एक ब्राह्मण-कुमार रहता था ॥१५९॥ बाल्यकाल में ही उसके पिता की मृत्यु हो गई और उसकी माता उसी के साथ सती हो गई ॥१६०॥ तब वह आदित्यधर्मा वेदों और कलाओं का अध्ययन करता हुआ उसी नगरी में अपने मामा के घर पर रहने लगा ॥१६१॥ विद्याध्ययन के अनन्तर मन्त्र की बात करनेवाले आदित्यधर्मा की मित्रता एक संन्यासी के साथ हो गई ॥१६२॥ वह संन्यासी उस मित्र आदित्यधर्मा के साथ यक्षिणी की सिद्धि के लिए श्मशान में जाकर हवन करता था ॥१६३॥

तत्र तस्याविरासीच्च कार्तस्वरविमानगा। वरकन्यापरिवृता दिव्यकन्या स्वलङ्कृता॥१६४॥ सा तं मधुरया वाचा बभाषे मस्करिग्रहम्। विद्युन्मालेत्यभिधा यक्षी यक्ष्यश्चापरा इमाः॥१६५॥ तदितो मत्परिवाराद् गृहाणैकां यथारुचि। एतावदेव सिद्धं ते मन्त्रसाधनयानया॥१६६॥ त्वया हि नैव विज्ञातं पूर्णं मन्मन्त्रसाधनम्। अतोऽहं ते न सिद्धैव मान्थ क्लेशं वृथा कृथाः॥१६७॥ एवमुक्तस्तया यक्ष्या परिव्राडनुमान्य सः। यक्षिणीमग्रहीदेकां तस्मात्तत्परिवारात· ॥१६८॥ ततश्च विद्युन्माला सा तिरोभूतां च यक्षिणीम्। आदित्यशर्मा पप्रच्छ सिद्धां प्रव्राजकस्य या॥१६९॥ अप्यस्ति विद्युन्मालातो यक्षिणी काचिदुत्तमा। तन्मुखा यक्षिणी सा तं प्रत्युवाचास्ति सुन्दर॥१७०॥ विद्युन्माला चन्द्रलेखा तृतीया च सुलोचना। उत्तमा यक्षिणीष्वेता एतास्वपि सुलोचना॥१७१॥ इत्युक्त्वा सा यथाकालमागन्तुं यक्षिणी ययौ। आदित्यशर्मणा साकमगात्प्रव्राट् च तद्गृहम्॥१७२॥ तत्र प्रतिदिनं तस्मै प्रीता प्रव्राजकाय सा। प्रायच्छद्यक्षिणी भोगानिष्टान्कालोपगामिनी॥१७३॥ एकदादित्यशर्मा च प्रव्राजकमुखेन ताम्। सुलोचनामन्त्रविधिं को जानातीति पृष्टवान्॥१७४॥ सापि तन्मुख एवास्मन्मक्षिप्येव किलाब्रवीत्। अस्ति तुम्बवनं नाम स्थानं दक्षिणदिङ्मुखे॥१७५॥ तत्रास्ति विष्णुगुप्ताख्यो वणातीरकृतास्पदः। प्रव्राजको भदन्तान्यः स सङ्केत्ति सविस्तरम्॥१७६॥ श्रुत्वैतद्यक्षिणीवाक्यात्तं देशं सोत्सुको ययौ। आदित्यशर्मानुगतः प्रीत्या प्रव्राजकेन सः॥१७७॥ तत्रान्विष्य यथावृत्तं भदन्तमभिगम्य च। परिचर्यापरो भक्त्या त्रीणि वर्षाण्यसेवत॥१७८॥

अष्टम लम्बक ४०९

अष्टम लम्बक ४०९ श्मशान-भूमि में सोने के विमान में बैठी हुई और सुन्दरी कन्याओं से घिरी हुई एक दिव्य कन्या प्रकट हुई ॥१६४॥ वह कन्या मधुर वाणी द्वारा उस संन्यासी से बोली—'हे संन्यासी ! मैं विद्युन्माला नाम की यक्षिणी हूँ और ये भी दूसरी यक्षिणियाँ हैं ॥१६५॥ सो तुम मेरे परिवार में इच्छानुसार एक यक्षिणी को ले लो। तुम्हारी मन्त्र-साधना से इतनी ही सिद्धि हुई है ॥१६६॥ तुमने मेरे मन्त्र की विधि पूर्ण रूप से नहीं जानी। इसलिए, मैं तुम्हें सिद्ध नहीं हो सकी। अब तुम दूसरा कष्ट व्यर्थ न उठाओ' ॥१६७॥ उस यक्षिणी विद्युन्माला द्वारा इस प्रकार कहे गये संन्यासी ने उसकी बात मान ली और उसके परिवार से एक यक्षिणी ले ली ॥१६८॥ तदनन्तर, विद्युन्माला अदृश्य हो गई। तब आदित्यशर्मा ने उस यक्षिणी से जो उस संन्यासी को सिद्ध हुई थी पूछा—॥१६९॥ 'क्या विद्युन्माला से भी बढ़कर और कोई उत्तम यक्षिणी है ? तब वह बोली—'सुन्दर ! उत्तम यक्षिणियों में विद्युन्माला चन्द्रलेखा और सुलोचना तीन हैं। इन तीनों में भी सुलोचना अत्युत्तम है ॥१७०-१७१॥ इस प्रकार कहकर वह यक्षिणी यथासमय आने के लिए चली गई और वह संन्यासी आदित्यशर्मा के साथ उसके घर गया ॥१७२॥ तदनन्तर, प्रतिदिन नियत समय पर आनेवाली वह यक्षिणी प्रसन्न होकर उस परिव्राजक को अभीष्ट भोगों का प्रदान करती थी ॥१७३॥ एक बार आदित्यशर्मा ने परिव्राजक के द्वारा उस यक्षिणी से पूछा कि 'सुलोचना को सिद्ध करने की मन्त्रविधि को कौन जानता है' ॥१७४॥ उस यक्षिणी ने आदित्यशर्मा के सामने ही कहा—'दक्षिण दिशा की भूमि में गुल्मवन नाम का स्थान है। वहाँ पर वेणा नदी के किनारे स्थान बनाकर विद्युन्मुख नाम का मटन्थ (बौद्ध संन्यासी) रहता है। वह उसकी विधि को विस्तारपूर्वक जानता है' ॥१७५-१७६॥ यक्षिणी के मुँह से यह सुनकर उत्सुक आदित्यशर्मा प्रव्राजक के साथ वहाँ गया। वहाँ जाकर, और मटन्थ को ढूँढ़कर वह उसके समीप ही रहने लगा। तत्पश्चात् उसने तीन वर्षों तक भक्ति- पूर्वक उसकी सेवा की ॥१७७-१७८॥ ५२