कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
४४६ कथासरित्सागर
४४६ कथासरित्सागर विष्वग्गन्धवहुद्धात सदापुष्पफलद्रुमम्। गन्धर्वरूपसङ्गीतमप्सरोनृत्तोत्सवम् ॥१८९॥ तमेकदेशे स्फटिकमयसिंहासने स्थितम्। त्रिलोचनं शूलपाणिं स्वच्छस्फटिकसन्निभम् ॥१९०॥ बद्धपिङ्गटाजूटं चारुचन्द्रार्धशेखरम्। पार्श्वस्थया गिरिजया भगवत्योपसेवितम् ॥१९१॥ सूर्यप्रभः स सानन्दं पश्यति स्म महेश्वरम्। उपेत्य चापतत्तस्य सप्रतीकस्य पादयोः ॥१९२॥ ततः पृष्ठे करं दत्त्वा समुत्थाप्योपवेश्य च। किमर्थमागतोऽसीति पप्रच्छ भगवान्हरः ॥१९३॥ प्रत्यासन्नोऽभिषेको मे सन्निधानं तदर्हथ। प्रभोस्तत्रेति तं सूर्यप्रभः प्रत्यब्रवीच्च सः ॥१९४॥ ततः शम्भुरुवाचेममियान्क्लिष्टोऽसि तद्धि किम्। सन्निधानाय किं पुत्र तत एवास्मि न स्मृतः ॥१९५॥ तवस्तु सन्निधास्याहमित्युक्त्वा भक्तवत्सलः। सोऽन्तिकस्थितमाहूय गणमेकं समादिशत् ॥१९६॥ गच्छैतमभिषेकार्थमृषभं पर्वतं नय। महाभिषेकस्थानं हि तद्देशां चक्रवर्तिनाम् ॥१९७॥ इत्यादिष्टो भगवता स तं सूर्यप्रभं गणः। प्रदक्षिणीकृतेशामनुत्सङ्गे व्रजतोऽग्रहीत् ॥१९८॥ नीत्वा संस्थापयामास तस्मिन्नृषभपर्वते। स्वसिद्ध्या रत्नशृङ्गेनैव ययौ चादर्शनं ततः ॥१९९॥ सूर्यप्रभस्य चात्रस्थाः समाययुः स्ववयस्यकाः। कामचूडामणिमुखा भार्या विद्याधराधिपाः ॥२००॥ सेन्द्राश्च देवा असुराः समयाता महर्षयः। श्रुतधर्मा सुमेरुश्च स सुवासकुमारकः ॥२०१॥ सूर्यप्रभश्च सर्वांस्तान्यथोचितममानयत्। उक्तप्रहादिवृतान्तमभ्यनन्दंश्च तेऽपि तम् ॥२०२॥ अथ विविधौषधिसहितं नवीनवान्भोधिदीर्घसम्भूतम्। मणिकनकमयैः कुम्भैः स्वयमानिन्युर्जलं प्रभासाद्याः ॥२०३॥
अष्टम लम्बक ४४७
अष्टम लम्बक ४४७ जिस धाम में दिव्य पुरुषों के झुंड वृक्षों पर झूल रहे थे और वृक्ष पुष्पों से लदे हुए थे। वहाँ गन्धर्व गान कर रहे थे और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं॥१८६॥ वहीं एक ओर सूर्यप्रभ ने स्फटिक के सिंहासन पर बैठे हुए, तीन नेत्रोंवाले हाथ में शूल लिये हुए, चमकते हुए स्फटिक के समान स्वच्छ पीली जटाओं को बाँधे हुए, सुन्दर अर्धचन्द्र से शोभित मस्तक वाले और पार्श्व में बैठी हुई भगवती गौरी से शोभित महादेव को देखा उनके समीप जाकर गौरी और शंकर के चरणों में वह नतमस्तक हुआ ॥ १८९-१९१॥ तब पीठ को हाथ से थपथपाकर और उठाकर बैठाये गये सूर्यप्रभ से शिवजी ने पूछा— 'किसलिए आये हो ? ॥१९२॥ सूर्यप्रभ ने कहा—'प्रभो मेरा अभिषेक शीघ्र ही होनेवाला है। अतः, आपके वहाँ पधारने की प्रार्थना है॥१९३॥ तब शिवजी ने उससे कहा—'बेटे, तो तुमने इतना कष्ट क्यों उठाया? मुझे आने के लिए यहीं स्मरण क्यों नहीं कर लिया ?॥१९४॥ तो ठीक है, मैं आऊँगा ऐसा कहकर भक्तवत्सल भगवान् ने पास बैठे हुए एक गण को बुलाकर कहा—'जाओ इसे (सूर्यप्रभ को) अभिषेक के लिए ऋषभ पर्वत पर ले जाओ। वह ऋषभ पर्वत विद्याधर चक्रवर्तियों का अभिषेक-स्थान है। भगवान् से आज्ञापित गण ने प्रदक्षिणा और प्रणाम किये हुए सूर्यप्रभ को नम्रता-पूर्वक गोद में उठा लिया और उसे ले जाकर ऋषभ पर्वत पर बैठा दिया। अपनी सिद्धि के प्रभाव से वह उसी क्षण वहाँ से अदृश्य हो गया ॥१९५—१९९॥ सूर्यप्रभ जब ऋषभ पर्वत पर ही था तब उसके सभी मित्र मन्त्री कामचूड़ामणि आदि सभी पत्नियां सभी विद्याधरों के राजा इन्द्र-सहित सभी देवता मय आदि सभी असुर, याज्ञवल्क्य आदि सभी ऋषिगण तथा श्रुतदेव और सुबाहुकुमार आदि वहाँ एकत्र हुए। सूर्यप्रभ ने भी सभी का स्वागत करके उनका यथोचित सम्मान किया और शिवजी के निमन्त्रण का वृत्तान्त सुनकर सभी को प्रसन्न किया। उन सब ने भी उसे इस बात पर बधाई दी ॥२००-२०२॥ तब सूर्यप्रभ के प्रभास आदि मन्त्री मित्र मणियों और सोने के विविध कलशों में नाना प्रकार की ओषधियों से युक्त समस्त नदियों, नदों, समुद्रों और तीर्थों का जल ले स्वयं जाकर लाय ॥२०३॥
४४८ कथासरित्सागरं
४४८ कथासरित्सागरं
तावद् गौरीसहितो भगवानथाययौ पुरारातिः। देवासुरविद्याधरनृपतिमहर्षिप्रणम्यमानाङ्घ्रिः ॥२०४॥ सर्वेषु सेषु सुरदानवेश्वरेषु । पुण्याहघोषमुखरेष्वखिलेर्जलेस्तैः ॥ सूर्यप्रभं तमृपयो धुचराधिराज्ये। सिंहासने समुपवेशितमम्यपिञ्चन् ॥२०५॥ बबन्ध पट्टं मुकुटं च तस्य स प्रत्यूष्य विज्ञानमयो मयासुरः। ननाद तूर्यैः सह देवदुन्दुभिर्वराप्सरोनृत्तपुरःसरो दिवि ॥२०६॥ तां च महर्षिसमूहः स कामचूडामणि समभिषिच्य। सूर्यप्रभस्य विदधे तस्य समुचितां महादेवीम् ॥२०७॥ ततो गतेषु त्रिदशासुरेषु सूर्यप्रभो बन्धुसुहृद्वयस्यः। सहात्र विद्याधरचक्रवर्ती महाभिषेकोत्सवमाततान ॥२०८॥ विन्देश्च वेधश्चक्रमूत्तरं तद्दत्वा हरोक्ते श्रुतशर्मणे सः। अथाः प्रियाः प्राप्य समं वयस्यैर्भेजे चिरं खेचरराज्यलक्ष्मीम् ॥२०९॥ एवं हरप्रसादप्रभावात् प्रापि मानुषेणापि। सूर्यप्रभेण पूर्वं विद्याधरचक्रवर्तित्वम् ॥२१ ॥ इति विद्याधरधुर्यो व्याख्याय कथां स वत्सराजाग्रे। वज्रप्रभः प्रणम्य च नरवाहनदत्तमुद्ययौ गगनम् ॥२११॥ तस्मिन्गते च नरवाहनदत्तदेवो दृष्ट्वा स्वभा भवनमम्बुकन्या समेतः। वत्सेश्वरस्य पितुरास्त गृहे स धीरो विद्याधरेन्द्रपदलाभमुदीक्षमाणः ॥२१२॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके सप्तमस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं सूर्यप्रभलम्बकोऽष्टमः।
अष्टम लम्बक ४४९
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उसी अवसर पर भगवती गौरी के साथ शंकर भी वहाँ उपस्थित हुए और सभी देव असुर, दानव तथा विद्याधर आदि राजाओं ने उनके चरणों में सादर प्रणाम किया ॥२४॥ तदनन्तर, सभी देव दानव और विद्याधरों के पुण्याहवाचन का पाठ करने पर समस्त ऋषिगण तथा प्रभास आदि से लाये गये जलों से विधिपूर्वक सिंहासन पर बैठे हुए सूर्यप्रभ का विद्याधर चक्रवर्ती पद पर अभिषेक किया मुकुट और पट्ट-बन्धन किया। उस समय आकाश में वाद्यों के साथ देवताओं की दुन्दुभियां बज उठीं और सुन्दरी अप्सराएं नाचने लगीं॥२५-२६॥ तब महर्षियों के समूह ने कामचूड़ामणि का भी अभिषेक किया और उसे सूर्यप्रभ की महिषी (वैमानिक महारानी) बनाया ॥२७॥ अभिषेक-महोत्सव के सम्पन्न होने के पश्चात् देवताओं और असुरों ने अपने-अपने स्थानों को लौट जाने पर सूर्यप्रभ ने अपने बन्धुओं और मित्रों के साथ और कुछ दिनों तक अभिषेकोत्सव को बढ़ाया ॥२८॥ तदुपरान्त कुछ दिनों के पश्चात् उत्तर की वेदी का आधा राज्य शिवजी के आज्ञानुसार श्रुतशर्मा को देकर तथा अन्य पत्नियों को प्राप्त कर सूर्यप्रभ ने अपने मित्रों के साथ चिरकाल तक विद्याधर राज्य की लक्ष्मी का उपभोग किया ॥२९॥ इस प्रकार शिवजी की कृपा से मनुष्य होते हुए भी सूर्यप्रभ ने विद्याधरों की राज्य लक्ष्मी प्राप्त की ॥३०॥ इस क्रम से विद्याधर-श्रेष्ठ वयत्रज वत्सराज के सम्मुख सूर्यप्रभ की कथा सुनाकर और नरवाहनदत्त को प्रणाम करके आकाश में उड़ गया ॥३१॥ उसके चले जाने पर युवराज नरवाहनदत्त अपनी पटरानी मदनमञ्चुका के साथ विद्या धर चक्रवर्ती बनने की उत्सुकता लिये हुए पिता वत्सराज के गृह में निवास करने लगा ॥३२॥
सूर्यप्रभ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त। सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक भी समाप्त इति महाकविश्रीयोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर में
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अलङ्कारवती नाम नवमो लम्बकः
अलङ्कारवती नाम नवमो लम्बकः इव गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति ये विगतविघ्नसम्वर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्गः मङ्गलाचरणम् निष्कम्पमरुतोर्वीश्वसिताः पर्वता अपि। यं नमन्तीव नृत्यन्तं नमामस्तं विनायकम्॥१॥ नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) एव वत्सेश्वरसुतः कौशाम्ब्यां भवने पितुः। वसन्विद्याधराधीशैरावासेव कृतानतिः॥२॥ नरवाहनदत्त' स कदाचिन्मृगयागतः। विवेश गोमुखसखो मुक्तसैन्यो महद्वनम्॥३॥ स तत्र दक्षिणेनाक्ष्णा स्फुरतोक्तशुभागमः। दिव्यवीणानिनादमिश्रमशृणोत् गीतनिःस्वनम्॥४॥ गत्वा तदनुसारेण नातिदूरं ददर्श सः। स्वयम्ब्वायतनं शम्भोः सपताश्वो विवेश च॥५॥ तत्रोपवीणयन्तीं च देवेशं देवकन्यकाम्। अपश्यद् वरकन्याभिर्बह्वीभिः परिवारिताम्॥६॥ सा दृष्टा तस्य हृदयं प्रसरत्कान्तिनिर्भरा। इन्दुमूर्तिरिवाम्भोघेः क्षोभयामास तत्क्षणम्॥७॥
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४५२ कथासरित्सागर
४५२ कथासरित्सागर सापि तं सरसस्निग्धमुग्धेनालोक्य चक्षुषा। तदेकगतचित्ताभूद्विस्मृतस्वरधारणा ॥८॥ नरवाहनदत्तस्य चित्तज्ञो गोमुखस्ततः। केयं कस्य सुता चेति यावत्पृच्छति तत्सखी ॥९॥ तावच्च संमुखी तस्याः पूर्वं हेमारुणप्रभा। पश्चादवततारैका प्रौढा विद्याधरी दिवः ॥१०॥ सा चावतीर्य कन्यायास्तस्या पार्श्वे उपाविशत्। कन्याप्युत्थाय सा तस्याः पादयोरपतत्तदा ॥११॥ सर्वविद्याधराधीशं निर्विघ्नं पतिमाप्नुहि। इति प्रौढापि सा तस्यै कन्याया आशिषं ददौ ॥१२॥ नरवाहनदत्तोऽथ तामुपेत्य प्रणम्य च। दत्ताशिषं पर्यपृच्छत्सोम्यां विद्याधरीं शनैः ॥१३॥ केयं कन्या भवत्यम्ब त्वं का कथ्यतामिति। ततो विद्याधरी सा तमुवाच शृणु वच्म्यहम् ॥१४॥ अलङ्कारवती कथा अस्ति गौरीगुरोः शैले श्रीसुन्दरपुरं पुरम्। आस्तेऽलङ्कारशीलाख्यस्तत्र विद्याधरेश्वरः ॥१५॥ तस्योदारगुणन्यास्ति महिषी काञ्चनप्रभा। तस्यां तस्य च कालेन राज्ञः सूनुरजायत ॥१६॥ एष धर्मपरो भावीत्यादिष्टमुमया यया। स्वप्ने तदा धर्मशीलं नाम्ना तमकरोत्पिता ॥१७॥ क्रमेण यौवनप्राप्तं धर्मशीलं स तं सुतम्। राजा संयोज्य विद्याभिर्यौवराज्येऽभिषिक्तवान् ॥१८॥ ततः स यौवराज्यस्थो धर्मैकपरमो वशी। अरञ्जयद्धर्मशीलः पितुरप्यधिकं प्रजाः ॥१९॥ ततोऽलङ्कारशीलस्य राज्ञः सा काञ्चनप्रभा। अन्तर्वत्नी सती राज्ञी तस्य सूते स्म कन्यकाम् ॥२०॥ नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा चक्रवर्तिनः। कन्या भवित्रीति तदा दिव्या वागुदचोचयत् ॥२१॥
नवम लम्बक ४५३
नवम लम्बक ४५३ सरस और स्नेहपूर्ण आँखों से राजकुमार को देखती हुई वह दिव्यकुमारी भी स्वर संभाषण को भूलकर उसके प्रेम में मग्न हो गई ॥८॥ नरवाहनदत्त के हृदय को जाननेवाले उसके साथी गोमुख ने उस कन्या की सखियों से 'यह कौन है और किसकी कन्या है' आदि प्रश्न पूछने का जैसे ही विचार किया इतने में ही तपे हुए स्वर्ण के समान रक्तवर्णवाली एक प्रौढ़ा विद्याधरी आकाश से नीचे उतरी ॥९-१०॥ उतरकर वह उसी दिव्य कन्या के पास आकर बैठी। तब उस कन्या ने उठकर उसके चरणों में झुककर प्रणाम किया ॥११॥ तब उस प्रौढ़ा विद्याधरी ने आशीर्वाद दिया कि 'तू समस्त विद्याधरों के चक्रवर्ती को निर्विघ्न रूप से पति के रूप में प्राप्त कर' ॥१२॥ तब नरवाहनदत्त भी उसके पास जाकर और प्रणाम करके आशीर्वाद लेती हुई उस सौम्य विद्याधरी से पूछने लगा—॥१३॥ माता यह कन्या कौन है और तुम्हारी कौन होती है बताओ । तब वह विद्याधरी उससे कहने लगी—'सुनो मैं कहती हूँ ॥१४॥ अलंकारवती की कथा हिमालय पर्वत के ऊपर सुन्दरपुर नाम का एक नगर है। उस नगर में अलंकारशील नाम का विद्याधरों का राजा है॥१५॥ उदारगुणोंवाले उस राजा की कांचनप्रभा नाम की रानी है। समयानुसार उस रानी से राजा के एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१६॥ उसके उत्पन्न होने पर पार्वती ने स्वप्न में उसे यह आदेश दिया कि यह पुत्र अत्यन्त धर्मशील होगा। तभी राजा ने तदनुसार उसका नाम धर्मशील रख दिया ॥१७॥ क्रमशः युवावस्था में पहुँचे हुए उस पुत्र को पिता ने अपनी विद्याएँ पढ़ाकर युवराज-पद पर बैठा दिया ॥१८॥ युवराज-पद पर रहकर, एकमात्र धर्मपरायण और जितेन्द्रिय उस धर्मशील ने पिता से भी बढ़कर प्रजा को प्रसन्न किया ॥१९॥ तदनन्तर, राजा अलंकारशील की महारानी कांचनप्रभा ने गर्भवती होकर एक कन्या को जन्म दिया ॥२०॥ उस कन्या के उत्पन्न होने पर आकाशवाणी हुई कि यह कन्या विद्याधर चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की पत्नी होगी' ॥२१॥
४५४ कथासरित्सागर
४५४ कथासरित्सागर
ततोऽत्र तेनालङ्कारवतीति कृतनामिका। पित्रा क्रमणावर्धिष्ट भासा शशिकलेव सा॥२२॥ कालेन यौवनस्था च प्राप्तविद्या निजात्पितुः। तत्तदायतनं शम्भोर्भक्त्या भ्रमितुमुद्यता॥२३॥ तावच्च धर्मशीलोऽस्य भ्राता शान्तो युवापि सन्। रहोऽलङ्कारशीलं तं पितरं स्वं व्यजिज्ञपत्॥२४॥ न मां भोगा इमे तात प्रीणन्ति क्षणभङ्गुराः। किं तदस्ति हि संसारे पर्यन्तविरसं न यत्॥२५॥ तथा चैतत्त्वया किं न श्रुतं व्यासमुनेर्वचः। सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः॥२६॥ संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम्। तदेषु का रतिस्तात नश्वरेषु मनस्विनाम्॥२७॥ परत्र न सहायान्ति न भोगा मार्त्ससञ्चयाः। एकस्तु बान्धवो धर्मो न जहाति पदात्पदम्॥२८॥ तस्माद्वनं गत्वाहं साधयाम्युत्तमं तपः। आसादयेयं तद्येन शाश्वतं परमं पदम्॥२९॥ इत्युक्तवन्तं तं पुत्रं धर्मशीलं सगाकुलम्। राजाऽलङ्कारशीलोऽथ वक्ति स्मोदश्रुलोचनः॥३०॥ [L19: बालस्येव तवाकाण्डे कोऽयं पुत्र मतिभ्रमः। उपयुक्ते हि तारुण्ये प्रशमः सद्भिरिष्यते॥३१॥ कृतदारस्य धर्मेण राज्यं पालयतस्तव। भोगा भोक्तुमयं कालो न वैराग्यस्य साम्प्रतम्॥३२॥ एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा धर्मशीलोऽभ्यधात्पुनः। न शमाश्रमयोरेष नियमोऽस्ति वयःकृतः॥३३॥ ईश्वरानुगृहीतो हि कश्चिद्बालोऽपि शाम्यति। वृद्धोऽपि न शमं याति कश्चित्कापुरुषः पुनः॥३४॥ न च राज्ये रतिर्मेऽस्ति न वा दारपरिग्रहे। ममेतज्जीवितफलं यच्छिवारधनं तपः॥३५॥ इति ब्रुवाणं यत्नाप्यनिवार्यमवेक्ष्य तम्। पिताऽलङ्कारशीलोऽसौ विमुख्याप्यूच्यभाषत॥३६॥
नवम लम्बक ४५५
नवम लम्बक ४५५ तदनन्तर पिता ने उसका नाम अलंकारवती रखा और वह क्रमशः चन्द्रकला के समान बढ़ने लगी ॥२२॥ वह कन्या क्रमशः यौवनावस्था को प्राप्त कर, और पिता से विद्याओं को सीखकर, शिवभक्ति के कारण उन-उन शिव-मन्दिरों में भ्रमण करने लगी ॥२३॥ इसी अवसर पर इसके बड़े भाई धर्मशील ने युवा होने पर भी एक बार एकान्त में पिता से इस प्रकार निवेदन किया—॥२४॥ 'हे पिता ! ये क्षण-भंगुर सांसारिक भोग मुझे प्रसन्न नहीं करते। संसार में वह क्या है जो अन्त में नीरस नहीं हो जाता ॥२५॥ और, क्या तुमने व्यास मुनि का यह वचन नहीं सुना है कि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सभी का अन्त विनाश है। और, जितनी उन्नति है, उस सभी का अन्त पतन है ॥२६॥ सभी संयोगों का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मरण है। इसलिए, हे पिता, निश्चित रूप से विनाशवान् इन पदार्थों में मनस्वी विद्वानों को क्या प्रेम ? ॥२७॥ सांसारिक भोग और धन का संग्रह परलोक में सहायक नहीं हो सकते। अर्थात्, ये यहीं नष्ट हो जाते हैं॥२८॥ इसलिए, मैं वन में जाकर सर्वोत्तम तप करता हूँ जिसके द्वारा परम पद (मोक्ष) को प्राप्त कर सकूँ' ॥२९॥ राजा अलंकारशील पुत्र धर्मशील को इस प्रकार कहते हुए सुनकर व्याकुल हो उठा और आँखों में आँसू भरकर बोला—॥३०॥ पुत्र इस समय (यौवनकाल) में ही तुम्हें यह क्या बुद्धि भ्रम हो गया ! विद्वान् लोग युवावस्था का उपभोग हो जाने पर ही वैराग्य की कामना करते हैं ॥३१॥ यह समय विवाह करके धर्मपूर्वक राज्य के पालन करने का है। यह तुम्हारे लिए सांसारिक भोगों के भोगने का समय है, वैराग्य का नहीं' ॥३२॥ पिता के इस प्रकार वचन सुनकर धर्मशील फिर कहने लगा-'भोग और विराग का नियम वयस्था पर निर्भर नहीं है। ईश्वर की कृपा से अनुगृहीत कोई बालक भी विरक्त हो जाता है, किन्तु कोई कुत्सित पुरुष वृद्ध होने पर भी विरक्त नहीं हो पाता ॥३३-३४॥ राज्य पर मेरा प्रेम नहीं है और न मैं विवाह ही करना चाहता हूँ। शिव की आराधना करके तप करना ही मेरे जीवन का मुख्य ध्येय है ॥३५॥ ऐसा कहते हुए और विविध प्रयत्नों से भी न मानते हुए पुत्र को पिता ने आँसू बहाते हुए कहा—॥३६॥
यदि यूनोऽपि ते पुत्र वैराग्यमिदमीदृशम् । नास्ति वृद्धस्य मे सक्तिर्महमप्याश्रये वनम् ॥३७॥ इत्युक्त्वा मर्त्यलोकं च गत्वा भारायुतं ददौ । ब्राह्मणेभ्यो दरिद्रेभ्यो रत्नानां काञ्चनस्य च ॥३८॥ एत्य च स्वपुरं भार्यामुवाचैतत्काञ्चनप्रभाम् । त्वया मदाज्ञयैहैव स्थातव्यं नगरे निजे ॥३९॥ रक्षालङ्कारवत्येषा कन्या पूर्णे च वत्सरे । अस्ति यैवाह्नोऽस्यास्तिष्याख्यतने शुभे ॥४०॥ नरवाहनदत्ताय दास्याम्येतामहं तदा । स चक्रवर्ती जामाता पास्यतीदं पुरं च नः ॥४१॥ इत्युक्त्वा दत्तशपथां भार्यां राजा निवर्त्य सः । ससुतां विलपन्तीं तां सपुत्रः शिश्रिये वनम् ॥४२॥ सा तु स्वपुरमभ्यास्त तत्र भार्या काञ्चनप्रभा । दुहित्रा सह साध्वी स्त्री भर्त्राज्ञां का हि लङ्घयेत् ॥४३॥ सस्नुता च तया मात्रा सह स्नेहानुयातया । अलङ्कारवती भ्रान्ता बहून्यायतनानि च ॥४४॥ एकदा तां च वक्ति स्म विद्या प्रज्ञप्तिसंज्ञिका । कश्मीरेषु स्वयम्भूणि गत्वा क्षेत्राणि पूजय ॥४५॥ नरवाहनदत्तं हि निर्विघ्नं त्वं पतिं ततः । सर्वविद्याधरेन्द्रैकचक्रवर्तिनमाप्स्यसि ॥४६॥ इत्युक्ता विद्यया गत्वा काश्मीरात्सा समातृका । अलङ्कारवती शम्भुं पुण्यक्षेत्रेष्वपूजयत् ॥४७॥ नन्दिक्षेत्रे महादेवगिरावमरपर्वते । सुरेश्वर्याद्रिषु तथा विजये कपटेश्वरे ॥४८॥ एवमादिषु सम्पूज्य क्षेत्रेषु गिरिजापतिम् । विद्याधरेन्द्रकन्या सा तन्माता चागते गुहाम् ॥४९॥ तामेतां विद्ध्यलङ्कारवतीं सुभग कन्यकाम् । तां च मातरमप्येतस्या विद्धि मां काञ्चनप्रभाम् ॥५०॥ अद्य चैषा ममानुक्त्वेवागतेमं शिवालयम् । तत प्रज्ञप्तिविद्यातो विज्ञाय्याहमिहागता ॥५१॥
'बेटा यदि तुम्हारी इस अवस्था में ही तुम्हें वैराग्य हुआ है तो क्या वह मुझ वृद्ध को नहीं होगा ? अतः मैं भी वन में जाऊँगा' ॥३७॥ ऐसा कहकर और मर्त्यलोक में जाकर राजा ने ब्राह्मणों को रत्नों और सुवर्णों के दस हजार भार दान में दे दिये ॥३८॥ और, अपने नगर में आकर पत्नी कांचनप्रभा से कहा कि 'तुम्हें मेरी आज्ञा से इसी नगर में रहना होगा ॥३९॥ यहाँ रहकर इस कन्या अलंकारवती की रक्षा करनी होगी और समय आने पर, एक वर्ष पूरा होने पर,—क्योंकि आज का दिन ही उसके विवाह के लिए शुभ है। यही दिन इसके विवाह के शुभ लग्नवाला है—इसी दिन मैं स्वयं आकर इसे जामाता नरवाहनदत्त के लिए दूँगा। वह चक्रवर्ती जामाता हमारे इस नगर की रक्षा करेगा' ॥४०-४१॥ ऐसा कहते हुए राजा रोती हुई पत्नी और पुत्री को धपय देकर और उन्हें अपने घर छोड़कर स्वयं पुत्र के साथ वन को चला गया ॥४२॥ तब वह रानी कांचनप्रभा अपनी कन्या के साथ अपने नगर में ही रहने लगी। सच है कौन पतिव्रता स्त्री पति की आज्ञा का उल्लंघन कर सकती है ॥४३॥ तब राजा मलंकारशील की वह कन्या अलंकारवती स्नेह के साथ तीर्थयात्रा करती हुई अपनी माता के संग बहुत-से शैव तीर्थों का भ्रमण करने लगी ॥४४॥ एक बार उस अलंकारवती को प्रज्ञप्ति नामकी विद्या ने कहा कि कश्मीर में बहुत से स्वयंभू तीर्थ हैं। उनमें जाकर तप पूजन आदि करो। तब तुम विद्याविष के सब विद्याधरों के चक्रवर्ती नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त कर सकोगी ॥४५ ४६॥ विद्या के द्वारा ऐसा आदेश मिलने पर अलंकारवती ने माता के साथ कश्मीर जाकर अनेक पुण्यतीर्थों में शिव की पूजा की ॥४७॥ नन्दिक्षेत्र में महादेव पर्वत पर, अमर पर्वत पर, सुरेश्वरी पर्वत पर, विजय पर्वत तथा कपटेश्वर आदि क्षेत्रों में पार्वती-पति शिव की पूजा करके वह कन्या और उसकी माता अपने घर लौट आई ॥४८ ४९॥ हे सुभट, इस कन्या को तुम वही अलंकारवती समझो और मुझे उसकी माता कांचनप्रभा ॥५०॥ आज यह अलंकारवती मुझे बिना कहे ही यहाँ चली आई। मैंने भी प्रज्ञप्ति विद्या के प्रभाव से इसका यहाँ आना जानकर, यहाँ आ गई हूँ ॥५१॥ ५८
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर समुत्खातेव च ज्ञातस्त्वमपीहागतो मया। तदेतां देवताविष्टामुपयच्छस्व मे सुताम्॥५२॥ प्रातश्च सोऽस्या पित्रोक्तः प्रातो वैवाहिकवासरः। तदद्य पुत्र कौशाम्बीं स्वामेव नगरीं व्रज॥५३॥ आवामितश्च गच्छावः प्रातरेत्य तपोवनात्। राजालङ्कारशीलस्ते दास्येतेां सुतां स्वयम्॥५४॥ एवं तयोस्तेऽलङ्कारस्यास्तस्याश्च तस्य च। नरवाहनदत्तस्य काप्यवस्था द्वयोरभूत्॥५५॥ अन्योन्यरजनीमात्रविश्लेषासहनात्मनो । चक्रवाक्योरिवासन्ने दिनान्ते साश्रुनेत्रयोः॥५६॥ दृष्ट्वा तौ तादृशौ द्वावप्यवादीत्काञ्चनप्रभा। किमेकरात्रिविश्लेषे ह्यधैर्यं युवयोरिदम्॥५७॥ अनिश्चितावधि धीराः सहन्ते विरहं चिरम्। श्रूयतां रामभद्रस्य सीतादेव्यास्तथा कथा॥५८॥ रामसीताकथा राज्ञो दशरथस्यासीदयोध्याधिपतेः सुतः। रामो भरतशत्रुघ्नलक्ष्मणानां पुराग्रजः॥५९॥ विष्णोरवतारांशो रावणोच्छेदनाय यः। सीता तस्याभवद् भार्या प्राणैष्टा जनकात्मजा॥६०॥ स पित्रा भरतन्यस्तराज्येन विधियोगतः। प्रेषितोऽभूद्वनं साकं सीतया लक्ष्मणेन च॥६१॥ तत्र तस्याहरत्सीतां मायया रावणः प्रियाम्। निनाय च पुरीं लङ्कां पथि हत्वा जटायुषम्॥६२॥ ततः स रामो मित्री सुग्रीवं वालिनो वधात्। स्वीकृत्य मारुतिं प्रेष्य तत्प्रवृत्तिमबुध्यत॥६३॥ गत्वा च सागरे सेतुं बद्ध्वा हत्वा च रावणम्। लङ्कां विभीषणे न्यस्य सीतां प्रत्याजहार सः॥६४॥ १ सुप्रसिद्धा रामकथा। उत्तरकथायामत्र किञ्चित्प्रसिद्धकथातो भेदो दृश्यते।
नवम लम्बक ४५९
नवम लम्बक ४५९ इसी विद्या के द्वारा यह भी जाना कि तुम भी यहाँ आये हो। अतः देवता के आदेश से प्राप्त इस कन्या को ग्रहण करो ॥५२॥ इसके पिता का बताया हुआ विवाह-लग्न कल प्रातःकाल है। अतः आज तुम अपनी कौशाम्बी नगरी को जाओ और हम दोनों भी यहाँ से जाती हैं। प्रातःकाल इसके पिता धर्मकार धौत तपोवन से आकर, इस कन्या को स्वयं तुम्हें देंगे ॥५३-५४॥ कांचनप्रभा के इस प्रकार कहने पर, उस अलंकारवती और नरवाहनदत्त-दोनों की अवस्था अवर्णनीय हो गई ॥५५॥ वे दोनों चकवा-चकवी के समान परस्पर एक रात्रि का वियोग-दुःख भी सहन करने में असमर्थ हो रहे थे। अतः सायंकाल के समय उन दोनों की आँखों में आँसू थे ॥५६॥ उन दोनों को इस प्रकार आतुर देखकर कांचनप्रभा ने कहा—'एक रात्रि के ही वियोग में तुम दोनों को इतना अधैर्य क्यों हो रहा है ? ॥५७॥ धैर्यशाली व्यक्ति अनिश्चित अवधि तक चिरकालीन विरह का सहन करते हैं। इस सम्बन्ध में रामचन्द्र और सीतादेवी की कथा सुनो ॥५८॥ राम और सीता की कथा प्राचीन समय में अयोध्या-नरेश दशरथ के पुत्र राम भरत लक्ष्मण और शत्रुघ्न— इन चारों भाइयो में राम सबसे बड़ा था। वह रावण का विनाश करने के लिए विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ था। जनक राजा की सीता नाम की पुत्री उसकी प्राणप्यारी पत्नी थी ॥५९-६०॥ दैवयोग से भरत को राज्य देकर पिता ने राम को सीता और लक्ष्मण के साथ वन भेज दिया ॥६१॥ वहाँ वन में रावण ने कपट करके उसकी प्राणप्यारी सीता का हरण कर लिया और मार्ग में जटायु का वध करके वह उसे लंका को ले गया ॥६२॥ तब वियोगी राम ने बाली को मारकर और सुग्रीव से मित्रता की और हनुमान् को लंका भेजकर उसका समाचार प्राप्त किया ॥६३॥ तदनन्तर, राम ने समुद्र-तट पर जाकर उसमें पुल बाँधकर रावण को मारा और लंका का राज्य विभीषण को देकर सीता को प्राप्त किया ॥६४॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर अथावृत्तस्य वनात् शासतो भरतार्पितम् । तस्य राज्यमयोध्यायां सीता गर्भमधत्त सा ॥६५॥ तावच्चात्र प्रजाचेष्टां ज्ञातुमल्पपरिच्छदः । स्वैरं परिभ्रमन्नेकं सोऽपश्यत्पुरुषं प्रभुः ॥६६॥ हस्ते गृहीत्वा गृहिणीं निरस्यन्तं निशासु गृहात् । परस्येयं गृहमगादिति दोषानुकीर्तनात् ॥६७॥ रक्षोगृहोषिता सीता राघवेन नोज्झिता । अयमभ्यधिको भो मामुज्झति ज्ञातिवेश्मगाम् ॥६८॥ इति तद् गृहिणीं तां च ब्रुवतीं स्वं निज पतिम्। रामो राजा स शुश्राव क्षिप्रञ्चाभ्यन्तरं ययौ ॥६९॥ लोकापवादभीतश्च सीतां तत्याज तां वने। सहते विरहक्लेशं यशस्वी नायशः पुनः ॥७०॥ सा च गर्भालसा दैवाद्वाल्मीकेः प्रापदाश्रमम् । तेनर्षिणा समाश्वास्य तत्रैव ग्राहिता स्थितिम् ॥७१॥ नूनं सीता सदोषाऽयं त्यक्ता भर्त्राऽन्यथा कथम् । तदेतद्दर्शनाश्रित्य पापं संक्रामतीह नः ॥७२॥ वाल्मीकिः कृपया चैनां निर्वासयति नाश्रमात् । एतद्दर्शनजं पापं तपसा च व्यपोहति ॥७३॥ तदेत यावद् गच्छामो द्वितीयं कञ्चिदाश्रमम् । इति सम्मन्त्रयामासुस्तमभ्येत्य मुनयस्तदा ॥७४॥ तद् बुद्ध्वा तान्स वाल्मीकिरब्रवीत्तान् सदयः । शुद्धा प्रणिधानेन मया दृष्टा द्विजा इति ॥७५॥ तथाप्यप्रत्ययस्तेषां यदा सीता तदाभ्यधात् । भगवन्तो यथा विद्म तथा घोषयतेह माम् ॥७६॥ अशुद्धायाः शिरश्छेदनिग्रहः क्रियतां मम। तच्छ्रुत्वा जातकरुणा जगदुर्मुनयोऽथ ते ॥७७॥ अस्त्यत्र टीटिभरावा नाम तीर्थं महत्नु । टीटिभी हि पुरा कापि भर्तृत्यागद्रुतद्रुता ॥७८॥ मिथ्यैव दूषिता साध्वी चतन्दारणा भुषम् ।
नवम लम्बक ४६१
नवम लम्बक ४६१ लंका से लौटने के पश्चात् भरत द्वारा सौंपे गये राज्य का पालन करते हुए राम की पत्नी सीता ने गर्भ धारण किया ॥६५॥ उस अवसर पर प्रजा का समाचार जानने के लिए गुप्त रूप से अयोध्या में भ्रमण करते हुए राम ने एक पुरुष को देखा ॥६६॥ जो अपनी पत्नी को हाथ से खींचकर बाहर निकाल रहा था और वह उसका यह दोष घोषित कर रहा था कि उसकी स्त्री दूसरे व्यक्ति के घर पर जाकर रही ॥६७॥ राजा राम ने उस स्त्री को यह कहते हुए सुनकर अत्यन्त खेद और लज्जा का अनुभव किया कि 'राक्षस के घर में रही हुई सीता को रामचन्द्र ने नहीं छोड़ा। यह मेरा पति उससे भी बड़ा है, जो अपने ही बन्धु के घर में रही हुई मुझे त्याग रहा है, ॥६८ ६९॥ इस प्रकार, लोक-निन्दा के भय से राम ने सीता को वन में छोड़ दिया। सच है, यशस्वी व्यक्ति विरह-क्लेश का सहन करते हैं किन्तु निन्दा का सहन नहीं करते ॥७०॥ भय के कारण खिन्न सीता वन से वाल्मीकि के आश्रम में पहुँची और उस ऋषि ने उसे आश्वासन देकर वहीं ठहराया ॥७१॥ 'सीता अवश्य दुष्टा है अन्यथा उसका पति उसे क्यों छोड़ देता ? तो प्रतिदिन उसका दर्शन करने से लोगों को पाप चढ़ता है। वाल्मीकि तो दया के कारण उसे आश्रम से नहीं निकालते और उसके दर्शन से होनेवाले पाप को तप से नष्ट करते हैं। तो चलो किसी दूसरे आश्रम को चलें'-वाल्मीकि के आश्रम में रहनेवाले दूसरे मुनि इस प्रकार चर्चा करने लगे ॥७२-७४॥ दूसरे मुनियों के इन विचारों को सुनकर वाल्मीकि ने उनसे कहा-'इसमें सन्देह नहीं कि यह सीता चरित्र से शुद्ध है। हे मुनियों मैंने ध्यान से इसे देख लिया है। फिर भी जब उन मुनियों को अविश्वास रहा तब सीता ने कहा- 'आप लोग जैसा समझें उस प्रकार मेरी शुद्धि की जाँच करें। यदि मैं अशुद्ध होऊँ तो मेरा शिर काटकर मुझे दंड दें। यह सुनकर सभी दयाल मुनि कहने लगे। यहाँ घोर वन में टीटिभ सर नाम का तीर्थ है। प्राचीन समय में किसी टिट्टिहरी को उसके (नर) टिट्टिहरे ने दूसरे टिट्टिहरे के संगम का मिथ्या दोष लगाया था ॥७५-७८॥ इस कलंक के कारण दुःखित शरणहीन एवं अनाथा टिट्टिहरी पृथ्वी और लोकपालों का दुहाई देकर विलाप करने लगी। तब उन्होंने उसकी शुद्धि के लिए उस सरोवर की रचना की ॥७९॥
कथासरित्सागर
४६२ कथासरित्सागर
तत्रैषा राघववधूः परिशुद्धिं करोतु नः । इत्युक्तवद्भिस्तैः साकं जानकी तत्सरो ययौ ॥८०॥ यद्यार्यपुत्रादन्यत्र न स्वप्नेऽपि मनो मम। तदुत्तरेयं सरसः पारमम्ब वसुन्धरे ॥८१॥ इत्युक्त्वैव प्रविष्टा च तस्मिन्सरसि सा सती। नीता च पारमुत्सङ्गं कृत्वाविर्भूतया भुवा ॥८२॥ ततस्तां ते महासाध्वीं प्रणेमुर्मुनयोऽखिलाः। राघवं शप्तुमैच्छंश्च तत्परित्यागमन्युना ॥८३॥ युष्माभिरार्यपुत्रस्य न ध्यातव्यममङ्गलम्। शप्तुमर्हथ मामेव पापामभ्यञ्जलिरेष वः ॥८४॥ इति यद्वारयामास सीता तान्सा पतिव्रता। तेन ते मुनयस्तुष्टास्तस्याः पुत्राशिषं ददुः ॥८५॥ ततः सा तत्र तिष्ठन्ती समये सुषुवे सुतम्। तं च नाम्ना लवं चक्रे स वाल्मीकिमुनिः धियुम् ॥८६॥ बालमादाय तं तस्यां गतायां स्नातुमेकदा। तेन शून्यं तदुटजं दृष्ट्वा सोऽचिन्तयन्मुनिः ॥८७॥ स्थापयित्वार्भकं याति स्नातुं सा तत् क्व सोऽर्भकः । नीतः स श्वापदेनेह नूनमन्यं सृजामि तत् ॥८८॥ स्नात्वागतान्यथा सीता न प्राणान्धारयेदिह। इति ध्यात्वा कुशैः कृत्वा पवित्रं निर्ममेऽर्भकम् ॥८९॥ लवस्य सदृशं स च स तमास्थापयन्मुनिः। आगता तं च सा दृष्ट्वा मुनिं सीता व्यजिज्ञपत् ॥९०॥ स्वकोऽयं मे स्थितो बालस्तदेषोऽन्यः कुतो मुने। तच्छ्रुत्वा स यथावृत्तमुक्त्वा मुनिरुवाच ताम् ॥९१॥ भवितव्यं गृहाण त्वं द्वितीयमममे सुतम्। कुशसंज्ञं मयायं यत्स्वप्रभावात्कुशैः कृतः ॥९२॥ इत्युक्ता तन मुनिना सीता सबबुचो सुतौ। तेनैव कृतसंस्कारौ वर्धयामास तत्र तौ ॥९३॥ बालावेव च तौ दिव्यमस्त्रग्राममवापतुः। विद्याश्च सर्वाः वाल्मीकिमुनेः क्षत्रकुमारकौ ॥९४॥
नवम काण्डक ४६३ उसी सरोवर में राम की यह पत्नी अपनी निष्कलंकता का हमें प्रमाण दें।—इस प्रकार कहते हुए उन मुनियों के साथ सीता टीटिम-सर में गईं ॥८०॥ 'यदि आर्यपुत्र राम के सिवा स्वप्न में भी मेरा मन पर-पुरुष की ओर न गया हो तो हे वसुन्धरे ! मैं इस तालाब के पार हो जाऊँ ॥८१॥ ऐसा कहकर उस सरोवर में प्रविष्ट उस सती सीता को माता पृथ्वी ने गोद में उठाकर उस पार कर दिया ॥८२॥ इस घटना से विश्वस्त समस्त महामुनियों ने उस महापतिव्रता को प्रणाम किया और वे उसका त्याग करने के कारण क्रोध से राम को शाप देने के लिए तैयार हो गये ॥८३॥ तब सती सीता ने कहा—'आप लोगों को मेरे पति रामचन्द्र का अशुभ न सोचना चाहिए। आप लोग मुझे ही शाप दे सकते हैं। मैं आप लोगों को हाथ जोड़ती हूँ' ॥८४॥ इस प्रकार, जब सीता ने उन मुनियों को शाप देने से रोका तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर उसे पुत्र होने का आशीर्वाद दिया ॥८५॥ तदनन्तर, आश्रम में रहती हुई सीता ने वहाँ पुत्र प्रसव किया। मुनि वाल्मीकि ने उसका नाम लव रखा ॥८६॥ एक बार बालक को साथ लेकर वह सीता स्नान करने चली गई। इस कारण उसकी पर्णकुटी को खाली देखकर मुनि वाल्मीकि ने सोचा कि वह (सीता) बालक को सदा यहीं रखकर ही स्नान करने जाती थी तो अवश्य ही किसी हिंसक जन्तु ने बालक को मार खाया होगा। अतः मैं दूसरे बालक का निर्माण करता हूँ ॥८७-८८॥ नहीं तो नहाकर आई सीता अवश्य ही प्राण-त्याग कर देगी। यह सोचकर मुनि ने कुश की पवित्री बनाकर बालक की रचना कर दी ॥८९॥ और लव के समान ही उसे बनाकर उसके स्थान पर रख दिया। तदनन्तर, स्नान से लौट कर आई हुई सीता ने उस बालक को देखकर मुनि से कहा—॥९०॥ 'हे मुने मेरा बालक तो यह है फिर यह दूसरा बालक कैसा है? यह सुनकर मुनि ने सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया और कहा—'हे पवित्र सीते यह भवितव्य की बात है। अब इस दूसरे बालक को भी ग्रहण कर लो। इसका नाम कुश है क्योंकि मैंने अपने प्रभाव से इसे कुशों द्वारा निर्मित किया है ॥९१—९२॥ मुनि द्वारा इस प्रकार कही गई सीता ने मुनि द्वारा ही संस्कार किये गये उन दोनों बालकों का पालन-पोषण किया ॥९३॥ उन दोनों क्षत्रियकुमारों ने बालकपन में ही मुनि वाल्मीकि की कृपा से सभी दिव्य शस्त्रास्त्रों और विद्याओं को भली भाँति सीख लिया ॥९४॥
२६४ कुशाचरितसार एकदा आश्रममृगं हत्वा तन्मांसमादतुः । अर्धास्थिभिश्च वाल्मीकेरचक्रतुः क्रीडनीयकम् ॥९५॥ तत क्षिप्तो मुनिः सोऽथ सीतादेव्यानुनाधितः । प्रायश्चित्तं तयोरेवमादिक्षेत् कुमारयोः ॥९६॥ गत्वा कुबेरसरसः स्वर्णपद्मान्यथ लवः । तदुद्यानाच्च मन्दारपुष्प्याण्यानयतु द्रुतम् ॥९७॥ तैरेतौ भ्रातरावत्संल्लिङ्गमर्चयतामुभौ । तेनैतयोरिदं पापमुपशान्तिं गमिष्यति ॥९८॥ एतच्छ्रुत्वैव कैलासं स बालोऽपि लवो ययौ । आधस्कन्द कुबेरस्य सरस्तच्चोपवनं च तत् ॥९९॥ निहत्य यक्षानादाय पद्मानि कुसुमानि च । आगच्छन्नपि स श्रान्तो विशश्राम तरोस्तले ॥१००॥ अत्रान्तरं च रामस्य हयमेधे सुलक्षणम् । चिन्वन्मुख्यमागच्छत्तेन मार्गेण लक्ष्मणः ॥१०१॥ स लवं समराहूतं मोहनास्त्रेण मोहितम् । क्षत्रधर्मेण बद्ध्वा तमयोध्यामनयत्पुरीम् ॥१०२॥ तावच्च सीतामाश्वास्य लवागमनदुःखिताम् । वाल्मीकिः स्वाश्रमे तत्र ज्ञानी कुशमभाषत ॥१०३॥ भीतोऽयोध्यांमवष्टभ्य लक्ष्मणेन सुतो लवः । गच्छ मोधय तं तस्मादभिरस्त्रैर्विनिर्जितात् ॥१०४॥ इत्युक्त्वा दत्तदिव्यास्त्रस्तेन गत्वा कुशस्ततः । रोध्यमानामयोध्यायां यज्ञभूमिं सरोष सः ॥१०५॥ जिगाय लक्ष्मणं चात्र तन्निमित्तं प्रभाषितम् । युद्धे दिव्यैर्महास्त्रैस्तैस्ततो रामस्तमभ्यगात् ॥१०६॥ सोऽपि प्रभावाद्वाल्मीकेर्जेतुं नास्त्रं क्षमाक तम् । कुशं यत्नेन पप्रच्छ कोऽर्षस्ते को भवानिति ॥१०७॥ कुशस्ततोऽब्रवीद् बद्ध्वा लक्ष्मणेनाग्रजो मम । आनीतः इह तस्याहं मोचनार्थमिहागतः ॥१०८॥ आवां लवकुशौ रामतनयाविति जानकी । माता नौ वक्ति चेत्युक्त्वा तद्वृत्तान्तं शशंस सः ॥१०९॥
नवम लम्बक ४६५
नवम लम्बक ४६५
एक बार उन दोनों बालकों ने आश्रम के एक मृग को मारकर उसका मांस खा डाला और मुनि वाल्मीकि के पूजन करने के शिवलिङ्ग को बिछौना बनाकर खेल डाला ॥९५॥ इस कारण मुनि खिन्न हुए, तो सीतादेवी ने उनसे क्षमा-प्रार्थना की। तब मुनि ने उन दोनों के लिए इस प्रकार प्रायश्चित्त की आज्ञा दी ॥९६॥ 'यह लव कुबेर के सरोवर में जाकर सोने के कमल ले आवे और उसके उद्यान से मंदार के पुष्प। उनसे ये दोनों भाई इस शिवलिङ्ग की पूजा करें तो इस पाप की शान्ति होगी' ॥९७-९८॥ यह सुनते ही उस बालक लव ने कुबेर के सरोवर और उद्यान पर धावा बोल दिया और उसके रक्षक यक्षों को मारकर कमल और मन्दार-पुष्प प्राप्त किये। उन्हें लेकर लौटते समय मार्ग में श्रान्त होने के कारण उसने एक वृक्ष के नीचे विश्राम किया ॥९९-१००॥ इसी बीच राम के नरमेध यज्ञ में किसी अच्छे लक्षणोंवाले पुरुष को ढूँढ़ता हुआ लक्ष्मण उधर आ निकला ॥१०१॥ वह (लक्ष्मण) युद्ध के लिए ललकारे हुए लव को सम्मोहनास्त्र से मोहित करके क्षात्र धर्म के अनुसार उसे बाँधकर अयोध्या नगरी को ले गया ॥१०२॥ उधर लव के आने में विलम्ब होने पर दुःखित सीता को धैर्य देकर ज्ञानी वाल्मीकि ने अपने आश्रम में कुश से कहा—॥१०३॥ 'पुत्र! लव को लक्ष्मण पकड़कर अयोध्या ले गया है। तू जा और इन दिव्य अस्त्रों से उसको जीतकर और लव को छुड़ाकर ले आ' ॥१०४॥ मुनि के ऐसा कहने पर दिव्य अस्त्रों से युक्त कुश अयोध्या गया और युद्ध करते हुए उसने यज्ञभूमि को घेर लिया ॥१०५॥ और युद्ध करने के लिए आये हुए लक्ष्मण को उसने दिव्य महान् अस्त्रों से जीत लिया। तब राम ने उस पर आक्रमण किया किन्तु वाल्मीकि मुनि के प्रभाव से राम भी उसे अपने अस्त्रों से जीत न सके। तब राम ने कुश से पूछा-'तुम कौन हो ? ॥१०६-१०७॥ तब कुश ने कहा-'लक्ष्मण ने मेरे बड़े भाई लव को बाँध लिया है उसे यहाँ लाओ। मैं उसे छुड़ाने के लिए ही यहाँ आया हूँ ॥१०८॥ हम लव और कुश दोनों राम के पुत्र हैं। ऐसा माता जानकी कहती हैं। इतना कहकर फिर उसने अपना समाचार कहा ॥१०९॥ ५९