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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
प्रकरण १४०-१४१# पश्चात्कोपचिन्ता, बाह्यान्तर-प्रकृतिकोपप्रतीकारश्च #
अध्याय ३

(१) अल्पः पश्चात्कोपो महान् पुरस्ताल्लाभ इति । अल्पः पश्चात्कोपो गरीयान् । अल्पं पश्चात्कोपं प्रयातस्य दूष्यामित्राटविका हि सर्वतः समेधयन्ति, प्रकृतिकोपो वा । लब्धमपि च महान्तं पुरस्ताल्लाभमेवंभूते भृत्यमित्रक्षयव्यया ग्रसन्ते । तस्मात्साहस्रैकीयः पुरस्ताल्लाभस्यायोगः शतैकीयो वा पश्चात्कोप इति न यायात् । सूचीमुखा ह्यनर्था इति लोकप्रवादः । (२) पश्चात्कोपे सामदानभेददण्डान्प्रयुञ्जीत । पुरस्ताल्लाभे सेनापतिं कुमारं वा दण्डचारिणं कुर्वीत ।


पाश्चात्कोपचिन्ता और बाह्याभ्यन्तर प्रकृति के कोप का प्रतीकार

( १ ) यदि थोड़ा पश्चात्कोप और अधिक भावी लाभ हो तो दोनों में से थोड़ा पश्चात्कोप ही गुरुतर है, क्योंकि विजिगीषु के युद्ध में चले जाने के कारण थोड़े पश्चात्कोप को भी राजद्रोही और आटविक बहुत बढ़ा देते हैं, अथवा विजिगीषु की अनुपस्थिति में उसका कुपित प्रकृतिवर्ग थोड़े भी पश्चात्कोप को अधिक बढ़ा देता है । यदि पश्चात्कोप की लापरवाही करके आक्रमण से होने वाले बड़े लाभ को प्राप्त कर लिया जाय तो उस बढ़े हुए पश्चात्कोप के प्रतीकार के लिए जो भृत्य तथा मित्रसंबंधी क्षय-व्यय करना पड़ता है, उसमें वह महान लाभ सब बराबर हो जाता है । इसलिए जब भावी लाभ की सफलता प्रति सहस्र एक अंश मात्र होनेवाली हो तो उसकी अपेक्षा पश्चात्कोप से होने वाला अनर्थ प्रतिशत एक अंश समझना चाहिए, अर्थात् पश्चात्कोपजन्य अनर्थ की अपेक्षा भावी लाभ में दसगुनी असारता होती है । लोकप्रसिद्धि है कि अनर्थ सदा सूचीमुख हुआ करते हैं, अर्थात् पहिले तो उनका रूप सुई के मुँह जितना सूक्ष्म होता है, किन्तु बाद में वे भयावह रूप धारण कर लेते हैं ।

( २ ) यदि पश्चात्कोप की अधिक संभावना हो तो साम, दाम, दण्ड, भेद आदि उपायों से किसी भी प्रकार उसका प्रतीकार करना चाहिए । यदि भावी लाभ को भी न छोड़ना हो तो सेनापति या युवराज के संरक्षण में सेना को विजययात्रा के लिए भेजना चाहिए ।

प्र० १४०-१४१ : अ० ३ ] पश्चात्कोप और प्रकृति कोप ६०३

(१) बलवान् वा राजा पश्चात्कोपावग्रहसमर्थः पुरस्ताल्लाभमादातुं यायात् । अभ्यन्तरकोपशङ्कायां शङ्कितानादाय यायात् ।

(२) बाह्यकोपशङ्कायां वा पुत्रदारमेषामभ्यन्तरावग्रहं कृत्वा शून्यपालमनेकबलवर्गमनेकमुख्यं च स्थापयित्वा यायात् । न वा यायात् । 'अभ्यन्तरकोपो बाह्यकोपात्पापीयान्' इत्युक्तं पुरस्तात् ।

(३) मन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजानामन्यतमकोपोऽभ्यन्तरकोपः । तमात्मदोषत्यागेन परशक्त्यपराधवशेन वा साधयेत् ।

(४) महापराधेऽपि पुरोहिते संरोधनमवस्रावणं वा सिद्धिः, युवराजे संरोधनं निग्रहो वा गुणवत्यन्यस्मिन्सति पुत्रे ।


( १ ) अथवा जो शक्तिसंपन्न राजा पश्चात्कोप का प्रतीकार करने में समर्थ हो और उसका यह विश्वास हो कि वह पश्चात्कोप को पूरी तरह शांत कर सकेगा, तो थोड़ी-सी सेना पीछे छोड़कर विजिगीषु स्वयं भी यात्रा में जा सकता है । यदि ऐसी स्थिति में भीतरी कोप की आशंका हो तो उन आशंकित व्यक्तियों को साथ लेकर विजिगीषु को युद्ध में जाना चाहिए ।

( २ ) अथवा यदि बाह्यकोप की आशंका हो तो विजिगीषु के लिए उचित है वह उन बाह्यकोपकारी अंतपाल आदि के पुत्र तथा स्त्रियों को अपने अमात्यों के अधीन करके युद्ध में जाय । यदि बाह्य और आभ्यन्तर दोनों की ओर से उपद्रव की आशंका हो तो पीछे बताई गई मौलभृत आदि सात प्रकार की सेनाओं तथा अनेक मुख्य सेनापतियों से युक्त शून्यपाल को राजधानी की रक्षा के लिए नियुक्त करके विजययात्रा करनी चाहिए । इतने इन्तजाम में भी यदि आभ्यन्तर विद्रोह की आशंका बनी रहे तो विजिगीषु कदापि न जाय क्योंकि आभ्यन्तर कोप, बाह्यकोप की अपेक्षा अत्यन्त हानिकर होता है, इस बात को पहिले ही कहा जा चुका है ।

( ३ ) मन्त्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज इन चारों में से किसी एक के द्वारा किए जाने वाले उपद्रव को आभ्यन्तरकोप कहते हैं । यह आभ्यन्तरकोप यदि विजिगीषु के किसी दोष के कारण पैदा हुआ हो तो उस दोष का परित्याग कर आभ्यन्तर कोप को शान्त करना चाहिए । यदि वह मन्त्री, पुरोहित आदि के कारण उत्पन्न हुआ हो तो उनको अपराध के अनुसार प्राणदण्ड, बन्धन तथा अर्थदण्ड आदि के द्वारा सीधा करना चाहिए ।

( ४ ) यदि पुरोहित से ऐसा कोई महान् अपराध हो जाय तो भी उसका वध नहीं करना चाहिए, क्योंकि ब्राह्मण का वध निषिद्ध है । इसलिए उसको या तो कैद में डाल दिया जाय अथवा देश-निर्वासन का दण्ड दिया जाय । यदि युवराज इस तरह

६०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) ताभ्यां मन्त्रिसेनापती व्याख्यातौ ।

(२) पुत्रं भ्रातरमन्यं वा कुल्यं राज्यग्राहिणमुत्साहेन साधयेत् । उत्साहाभावे गृहीतानुवर्तनसन्धिकर्मभ्यामरिन्सन्धानभयात् । अन्येभ्यस्तद्द्विधेभ्यो वा भूमिदानैर्विश्वासयेदेनम् । तद्विशिष्टं स्वयंग्राहं दण्डं वा प्रेषयेत्, सामन्ताटविकान् वा । तैर्विगृहीतमतिसन्दध्यात् । अवरुद्धादानं पारग्रामिकं वा योगमातिष्ठेत् ।

(३) एतेन मन्त्रिसेनापती व्याख्यातौ ।

(४) मन्त्र्यादिवर्जनामन्तरमात्यानामन्यतमकोपोऽन्तरमात्यकोपः । तत्रापि यथार्हमुपायान् प्रयुञ्जीत ।


का महान् अपराध कर डाले तो उसे या तो आजन्म कैद में डाल दिया जाय या प्राणदण्ड दिया जाय, किन्तु यह प्राणदण्ड उसी दशा में दिया जाय जब कि दूसरा कोई गुणवान् पुत्र विद्यमान हो ।

( १ ) पुरोहित और युवराज के समान ही मन्त्री और सेनापति का भी उनके अपराध के अनुसार वध या बन्धन का दण्ड समझना चाहिए ।

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने पुत्र, भाई या किसी खानदानी व्यक्ति को, जो राज्य लेने की इच्छा करे, उसको उसके योग्य उच्च अधिकारपदों पर नियुक्त कर के अपने वश में करे । क्योंकि यदि उन्हें वश में न किया गया तो यह आशंका नित्य ही बनी रहती है कि कहीं वे शत्रु राजा के साथ जाकर न मिल जाँय । अथवा इसी तरह के दूसरे खानदानी व्यक्तियों को जमीन आदि देकर अपने अधीन कर लेना चाहिए । अथवा ऐसे व्यक्तियों को स्वयं ग्राह सेना का सेनापति बनाकर कहीं बाहर युद्ध के लिए भेज देना चाहिए । अथवा उन्हें सामंत तथा आटविकों की सेना का अध्यक्ष नियुक्त कर के बाहर भेज देना चाहिए और फिर उस स्वयं ग्राह सेना तथा उन सामंत आटविकों के साथ झगड़ा कराके उसको कैद में डाल देना चाहिए । स्वयं ग्राह सेना द्वारा गिरफ्तार उस व्यक्ति को राजा स्वयं ले ले अथवा दुर्गलम्भोपाय प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा उसे वश में करे ।

( ३ ) इसी प्रकार मन्त्री और सेनापति के द्वारा पैदा किये गये उपद्रव तथा उसके प्रतीकार का भी व्याख्यान समझ लेना चाहिए ।

( ४ ) मन्त्री, पुरोहित, युवराज और सेनापति के अतिरिक्त अन्य अन्तरमात्य अर्थात् द्वारपाल या रनिवास के कर्मचारी आदि में से किसी एक द्वारा उठाये गये कोप को अन्तरमात्यकोप कहते हैं । ऐसे कोप को शान्त करने के लिए उपर्युक्त उपायों को ही काम में लाना चाहिए ।

प्र० १४०-१४१ : अ० ३ ] पश्चात्कोप और प्रकृति कोप ६०५

(१) राष्ट्रमुख्यान्तपालाटविकदण्डोपनतानामन्यतमकोपो बाह्यकोपः। तमन्योन्येनावग्राहयेत्। अतिदुर्गप्रतिस्तब्धं वा सामन्ताटविकतत्कुलीनाव-रुद्धानामन्यतमेनावग्राहयेत्। मित्रेणोपग्राहयेद्वा, यथा नामित्रं गच्छेत्। (२) अमित्रार्द्वा सत्री भेदयेदेनम्—'अयं त्वा योगपुरुषं मन्यमानो भर्त-र्यैव विक्रमयिष्यति, अवाप्तार्थो दण्डचारिणममित्राटविकेषु कृच्छ्रे वा प्रवासे योक्ष्यति, विपुत्रदारमन्ते वा वासयिष्यति, प्रतिहतविक्रमं त्वां भर्तरि पण्यं करिष्यति, त्वया वा सन्धिं कृत्वा भर्तारमेव प्रसादयिष्यति, मित्रमुपकृष्टं वास्य गच्छेद्' इति। (३) प्रतिपन्नमिष्टाभिप्रायैः पूजयेत्। (४) अप्रतिपन्नस्य संश्रयं भेदयेद्—'असौ ते योगपुरुषः प्रणिहितः' इति।

(१) राष्ट्र के प्रमुख व्यक्ति, अन्तपाल, आटविक और बलपूर्वक अधीन किये गये व्यक्ति (दण्डोपनत) आदि में से किसी एक के द्वारा उठाये गये उपद्रव को बाह्यकोप कहते हैं। ऐसे कोप को शान्त करने का यही तरीका है कि उन कोपकारों को एक-दूसरे के साथ लड़ा कर शान्त किया जाय। बाह्यकोप को उठाने वाले राष्ट्र-मुख या अन्तपाल आदि को सामन्त, आटविक या उनके कुल के किसी गिरफ्तार राजकुमार द्वारा पकड़वा दिया जाय, अथवा अपने मित्र के साथ उसकी मित्रता जोड़ दी जाय, जिससे कि वह शत्रुपक्ष में न मिल जाय।

(२) सत्री नामक गुप्तचर को चाहिए कि वह बाह्य कोपकारी राष्ट्रमुख आदि व्यक्तियों को यह कह कर मित्र बनाये रखे कि 'तुम जिसके साथ मिलना चाहते हो वह तुमको विजिगीषु का गुप्तचर समझ कर तुमको तुम्हारे मित्र से लड़ने को कहेगा और उस आक्रमण के परिणाम को देख कर तुमको अपनी सेना का नायक बनाकर अपने शत्रु या आटविक के मुकाबले में किसी दुष्कर आक्रमण के लिए नियुक्त करेगा, अथवा तुमको तुम्हारे स्त्री-पुत्रों से वियुक्त कर अपने किसी सरहदी इलाके में नियुक्त कर देगा, अथवा अपने ही मालिक के मुकाबले में यदि तुम हार गए तो तुम्हारे मालिक से धन लेकर वह उसी के हाथ तुम्हें बेच देगा, अथवा तुम्हारे स्वामी के हाथ तुम्हें ही शर्तनामा के रूप में गिरवी रख कर सन्धि कर लेगा, अथवा तुम्हें शर्त में रखकर अपने किसी मित्र के साथ तुम्हारे स्वामी की सन्धि करा देगा।'

(३) यदि सत्री के इस भेद भरे उपदेश को वह बाह्यकोपकारी स्वीकार कर ले तो उसको उसकी मनचाही वस्तुएं देकर सम्मानित किया जाय।

(४) यदि स्वीकार न करे तो संश्रयनीति के द्वारा उसे यह कहकर भिन्न कर

६०६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ नौवां अधिकरण

(१) सत्री चैनमभित्यक्तशासनैर्घातयेद् गूढपुरुषैर्वा । सहप्रस्थायिनो वास्य प्रवीरपुरुषान् यथाभिप्रायकरणेनावाहयेत् । तेन प्रणिहितान् सत्री ब्रूयात् । इति सिद्धिः । परस्य चैनान्कोपानुत्थापयेत् । आत्मनश्च शमयेत् । (२) यः कोपं कर्तुं शमयितुं वा शक्तः, तत्रोपजापः कार्यः । यः सत्य-सन्धः शक्तः कर्मणि फलावाप्तौ चानुग्रहीतुं विनिपाते च त्रातुं, तत्र प्रति-जापः कार्यः । तर्कयितव्यश्च—कल्याणबुद्धिरुताहो शठ इति । (३) शठो हि बाह्योऽभ्यन्तरमेवमुपजपति—भर्तारं चेद्धत्वा मां प्रति-पादयिष्यति शत्रुवधो भूमिलाभश्च मे द्विविधो लाभो भविष्यति, अथवा


दिया जाय कि 'जो व्यक्ति तुम्हारे आश्रय में है वह दूसरे का गुप्तचर है, उससे तुम्हें सम्भल कर रहना चाहिए ।'

( १ ) अथवा सत्री को चाहिए कि वध के लिए नियुक्त व्यक्ति ( अभित्यक्त ) के हाथ जाली पत्र भेजवा कर— जिसमें शत्रु को छिपकर मार डालने का निर्देश हो—शत्रु के मन में सन्देह पैदा कर उसी के द्वारा उस बाह्यकोपकारी का वध करा दे, अथवा गुप्तचरों के द्वारा ही उसका वध करा दिया जाय । अथवा शत्रु का आश्रय लेने के लिए उन बाह्यकोपकारी राष्ट्रमुख्य, अन्तपाल आदि के साथ जो वीर पुरुष जाने को तैयार हों, उनकी मनचाही मुराद पूरी कर के उन्हें अपनी ओर मिला ले । यदि वे वीर पुरुष मिलने के लिए तैयार न हों तो उनके सम्बन्ध में शत्रु राजा के यहाँ जाकर सत्री इस प्रकार कहे 'ये सभी वीर पुरुष विजिगीषु ने तुम्हारे वध के लिए भेजे हैं, ये सभी गुप्तचर हैं' और इस प्रकार शत्रु को समझा कर उसी के द्वारा उनको मरवा डाले । शत्रु के पक्ष में अन्तर-बाह्यकोप पैदा करे और अपने पक्ष के कोपों का प्रतीकार करे ।

( २ ) जो व्यक्ति कोप को उत्पन्न करने और शान्त करने में समर्थ हो उसी पर उपजाप का प्रयोग कर दूसरे के साथ उसकी फूट डाल देनी चाहिए । जो पुरुष सत्य-प्रतिज्ञ हो, कार्य तथा फलसिद्धि के समय अनुग्रह करने वाला हो और आपत्ति के समय रक्षा कर सके उसके साथ प्रतिजाप ( उपजाप को स्वीकार कर लेना प्रतिजाप है ) का प्रयोग करना चाहिए । यदि उपजाप करने वाले व्यक्ति के प्रति उपजाप को स्वीकार कर लेने वाले व्यक्ति को यह आशंका हो कि कहीं वह ठगने के लिए तो ऐसा नहीं कह रहा है तो उसकी कल्याण बुद्धि या शठबुद्धि की परीक्षा लेकर भली भाँति विचार-विनिमय कर ले ।

( ३ ) जो बाह्य शठबुद्धि होते हैं वे अभ्यंतर के प्रति यह सोचकर उपजाप करते हैं कि मेरे द्वारा बहकाया गया मंत्री यदि अपने राजा को मारकर उसके स्थान पर मुझे राजा बना देगा तो शत्रु का नाश और भूमि का लाभ, ये दोनों फायदे मुझे एक

प्र० १४०-१४१ : अ० ३ ] पाश्चात्कोप और प्रकृति कोप ६०७

शत्रुरेनमाहनिष्यति हतबन्धुपक्षस्तुल्यदोषदण्डेन वा उद्विग्नश्च, मे भूयान् कृत्यपक्षो भविष्यति तद्विधे वान्यस्मिन्नपि शङ्कितो भविष्यति अन्यमन्यं चास्य मुख्यमभित्यक्तशासनेन घातयिष्यामि इति । (१) अभ्यन्तरो वा शठो बाह्यमेवमुपजपति—कोषमस्य हरिष्यामि, दण्डं वास्य हनिष्यामि, दुष्टं वा भर्तारमनेन घातयिष्यामि, प्रतिपन्नं बाह्यममित्र्राटविकेषु विक्रमयिष्यामि चक्रमस्य सज्जतां वैरमस्य प्रसज्यतां ततः स्वाधीनो मे भविष्यति, ततो भर्तारमेव प्रसादयिष्यामि, स्वयं वा राज्यं ग्रहीष्यामि, बद्ध्वा वा बाह्यभूमिं चोभयमवाप्स्यामि, विरुद्धं वावाहयित्वा बाह्यं विश्वस्तं घातयिष्यामि शून्यं वास्य मूलं हरिष्यामि इति । (२) कल्याणबुद्धिस्तु सहजीव्यर्थमुपजपति । कल्याणबुद्धिना सन्दधीत । शठं 'तथा' इति प्रतिगृह्यातिसन्दध्यात् । इति ॥ (३) एवमुपलभ्य,


साथ हो जायेंगे, अथवा यदि शत्रु ही मंत्री को मार डालेगा तो मंत्री का बन्धुवर्ग तथा दूसरे क्रुद्ध या लुब्ध लोग राजा के शत्रु बन जायेंगे और तब बड़ी सरलता से उन्हें मैं अपने वश में कर सकूँगा, इस प्रकार दूसरे कर्मचारियों पर से भी राजा का विश्वास उठ जायगा और उस दशा में मैं, एक-एक करके सभी प्रमुख कर्मचारियों के नाम अभित्यक्त व्यक्तियों के हाथ जाली पत्र भेजकर, उनको भी मरवा डालूँगा।'

(१) इसी प्रकार जो अभ्यन्तर शठ होते हैं वे बाह्य के प्रति यह सोचकर उपजाप करते हैं कि, 'इस बाह्य के कोष का मैं अपहरण कर सकूँगा अथवा इसकी सेना को मार डालूँगा, या अपने दुष्ट राजा को इसके द्वारा मरवा डालूँगा, या जब यह मेरे राजा को मारना स्वीकार कर लेगा तो उस समय इसे शत्रुओं तथा आटविकों के साथ युद्ध करने के लिए भेज दूँगा, तब इसकी सारी सेना वहीं युद्ध में फँसी रहेगी, उसका आपस में वैर बढ़ता रहेगा, उस अवस्था में यह मेरे अधीन हो जायेगा और ऐसा कार्य करके मैं अपने मालिक को प्रसन्न कर लूँगा, अथवा बाह्य को वश में करके उसका राज्य मैं स्वयं हड़प लूँगा, अथवा उसको कैद में डालकर उसकी भूमि को और अपने मालिक की भूमि को अपने अधिकार में कर लूँगा, अथवा बाह्य के किसी विरोधी से मिलकर उसके द्वारा इस बाह्य को मरवा डालूँगा, अथवा जब यह युद्ध में फँसा हो तब इसकी सूनी राजधानी को लूटूँगा।

(२) जो कल्याणबुद्धि होता है वह अपनी आजीविका को सुरक्षित रखते हुए साथी बनकर ही उपजाप किया करता है। इसलिए विजिगीषु जो चाहिए कि वह कल्याणबुद्धि के साथ सन्धि कर ले शठबुद्धि की बात को मानकर पीछे अवसर आने पर धोखा दे दे।

(३) इस प्रकार कल्याणबुद्धि और शठबुद्धि का निश्चय करके,

६०८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ नौवां अधिकरण

(१) परे परेभ्यः स्वे स्वेभ्यः स्वे परेभ्यः स्वतः परे । रक्ष्याः स्वेभ्यः परेभ्यश्च नित्यमात्मा विपश्चिता ॥

इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे पश्चात्कोपचिन्ता बाह्याभ्यन्तरप्रकृति-कोपप्रतीकारश्चेति तृतीयोऽध्यायः; आदितस्त्रयोविंशत्युत्तरशततमः ।

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( १ ) कार्यतत्त्व को जानने वाले विद्वान् विजिगीषु को चाहिए कि वह जिन दूसरों को शठ समझता है उनकी बात को दूसरों पर प्रकट न होने दे । और जो अपने शठ हैं उनकी बात अपनों पर भी प्रकट न होने दे, इसी प्रकार दोनों प्रकार के शठों पर एक दूसरे की बात को प्रकट न होने दे, अपने शठों की वह परायों से रक्षा करे और उनके अनुकूल या प्रतिकूल अभिप्राय को वह अपनी ओर से प्रकट न करे ।

अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में आभ्यन्तर-वाह्यकोपप्रतीकार नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १४२
अध्याय ४

क्षयव्ययलाभविपरिमर्शः


(१) युग्यपुरुषापचयः क्षयः । हिरण्यधान्यापचयो व्ययः । (२) ताभ्यां बहुगुणविशिष्टे लाभे यायात् । (३) आदेयः, प्रत्यादेयः, प्रसादकः प्रकोपको, ह्रस्वकालः, तनुक्षयः, अल्पव्ययो, महान्, वृद्धयुदयः, कल्यो, धर्म्यः, पुरोगश्चेति लाभसम्पत् । (४) सुप्राप्यानुपाल्यः परेषामप्रत्यादेय इत्यादेयः । (५) विपर्यये प्रत्यादेयः । तमाददानस्तत्रस्थो वा विनाशं प्राप्नोति । (६) यदि वा पश्येत्—'प्रत्यादेयमादाय कोशदण्डनिचयरक्षाविधानान्यवस्त्रावयिष्यामि, खनिद्रव्यहस्तिवनसेतुबन्धवणिक्पथानुद्धृतसारान्करि-


क्षय, व्यय और लाभ का विचार

(१) हाथी-घोड़े आदि सवारियों और राज-कर्मचारियों के नाश को क्षय कहते हैं। हिरण्य और धान्य आदि के नाश को व्यय कहते हैं।

(२) विजिगीषु को चाहिए कि क्षय और व्यय का ध्यान रखकर जिस समय वह बहुगुणविशिष्ट लाभ की सम्भावना समझे उस समय युद्ध के लिए प्रस्थान कर दे।

(३) लाभ के विशिष्ट बारह गुणों के नाम हैं : १. आदेय २. प्रत्यादेय ३. प्रसादक ४. प्रकोपक ५. हस्तकाल ६. तनुक्षय ७. अल्पव्यय ८. महान् ९. वृद्धयुदय १०. कल्प ११. धर्म्य और १२. पुरोग।

(४) जो बड़ी सरलता से प्राप्त किया जा सके, प्राप्ति के बाद सरलता से जिसकी रक्षा की जा सके और कालान्तर में भी जिसको शत्रु छीन न सके। ऐसे लाभ को आदेय कहते हैं।

(५) आदेय से विपरीत लाभ को प्रत्यादेय कहते हैं। जो इस प्रकार के लाभ को प्राप्त करता है अथवा उसी पर जीवन-निर्वाह करता है वह अवश्य ही विनाश को प्राप्त होता है।

(६) यदि विजिगीषु यह समझे कि : ‘प्रत्यादेय लाभ को प्राप्त कर मैं अपने शत्रु के कोष, सेना; अन्न-संचय और दुर्ग आदि के संरक्षण साधनों को नष्ट कर सकूँगा, अथवा शत्रु के खान, द्रव्यवन, हस्तिवन, सेतुबंध और व्यापारी मार्ग आदि का शोषण

३९ कौ०

६१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

ष्यामि; प्रकृतीरस्य कर्षयिष्यामि; आवाहयिष्यामि, आयोगेनाराधयि- ष्यामि वा, ताः परः प्रतियोगेन कोपयिष्यति; प्रतिपक्षे वास्य पण्यमेनं करिष्यामि; मित्रमवरुद्धं वास्य प्रतिपादयिष्यामि; मित्रस्य स्वस्व वा देशस्य पीडामन्त्रस्थस्तस्करेभ्यः परेभ्यश्च प्रतिकरिष्यामि; मित्रमाश्रयं वास्य वैगुण्यं ग्राहयिष्यामि, तदमित्रविरक्तं तत्कुलीनं प्रतिपत्स्यते; सत्कृत्य वास्मै भूमिं दास्यामि, इति, संहितसमुत्थितं मित्रं मे चिराय भविष्यति' इति प्रत्यादेयमपि लाभमाददीत । इत्यादेयप्रत्यादेयौ व्याख्यातौ ।

(१) अधार्मिकाद्धार्मिकस्य लाभो लभ्यमानः स्वेषां परेषां च प्रसादको भवति । विपरीतः प्रकोपक इति । मन्त्रिणामुपदेशाल्लाभोऽलभ्यमानः कोपको भवति, 'अयमस्माभिः क्षयव्ययौ ग्राहितः' इति । दूष्यमन्त्रिणाम- नादराल्लाभो लभ्यमानः कोपको भवति, 'सिद्धार्थोऽयमस्मान् विनाश- यिष्यति' इति । विपरीतः प्रसादकः । इति प्रसादककोपकौ व्याख्यातौ ।


कर उन्हें सारहीन बना दूँगा, या शत्रु के प्रकृतिमंडल को कष्ट पहुँचा कर निर्बल बना दूँगा, या शत्रु की भूमि को प्राप्त करके उसके उपभोग के लिए शत्रु की प्रजा को लाकर बसा दूँगा, अथवा इच्छानुसार सुख-साधनों की सुविधा देकर उन्हें अपने वश में कर लूँगा, या मेरे द्वारा प्राप्त भूमि के पुनः छिन जाने पर अपने प्रतिकूल आचरण से शत्रु वहाँ की प्रजा को कुपित कर देगा, या उस प्राप्त भूमि को शत्रु के हाथ बेच दूँगा, अथवा विशेष लाभ रहित उस भूमि में अपने मित्र या अपने पुत्र को स्थापित कर दूँगा, अथवा स्वयं ही उस भूमि का शासन करता हुआ मैं चोरों और शत्रुओं से अपने मित्र देश की रक्षा करूँगा, अथवा इस शत्रु के मित्र तथा आश्रय को इसके विरुद्ध उभार दूंगा, अथवा उस भूमि का शासन कर मैं ठीक-ठीक कर लेकर शत्रु की अयोग्यता और प्रजा की पीड़ा के सम्बन्ध में आश्रयभूत राजा से बहुत कुछ कहूँगा, जिससे किसी दूसरे योग्य व्यक्ति को वहाँ का राज्यसिंहासन मिलेगा, अथवा उस प्राप्त भूमि को मैं ही सम्मानपूर्वक शत्रु को वापिस कर दूँगा, इस संधि के कारण वह मेरा पक्का मित्र बन जायेगा'—ऐसी अवस्थाओं में विजिगीषु को चाहिए कि वह प्रत्यादेय लाभ को भी ले ले। यहाँ तक आदेय और प्रत्यादेय लाभ के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।

(१) जो लाभ अधार्मिक राजा से धार्मिक राजा को प्राप्त हो तथा जो अपने तथा पराये लोगों की प्रसन्नता का कारण हो उसे प्रसादक कहते हैं। इसके विपरीत लाभ को प्रकोपक कहते हैं। प्रकोपक लाभ भी दो प्रकार का होता है :—मंत्रियों के अनुसार कार्य करने पर भी लाभ का न होना प्रकोपक कहलाता है और जिस कार्य में व्यर्थ का क्षय-व्यय करके मंत्रियों को पश्चाताप करना पड़े वह लाभ ग्राहित कह-

प्र० १४२ : अ० ४ ] क्षय-व्यय-लाभ विचार ६११

(१) गमनमात्रसाध्यत्वाद्ध्रस्वकालः ।
(२) मन्त्रसाध्यत्वात्तनुकशयः ।
(३) भक्तमात्रव्ययत्वादल्पव्ययः ।
(४) तदात्ववैपुल्यान्महान् ।
(५) अर्थानुबन्धकत्वाद् वृद्ध्युदयः ।
(६) निराबाधकत्वात्कल्यः ।
(७) प्रशस्तोपादानाद्धर्म्यः ।
(८) सामवायिकानामनिबन्धगामित्वात्पुरोग इति ।
(९) तुल्ये लाभे, देशकालौ शक्त्युपायौ प्रियाप्रियौ जवाजवौ सामीप्य-विप्रकर्षौ तदात्वानुबन्धौ सारत्वसातत्ये बाहुल्यबाहुगुण्ये च विमृश्य बहुगुणयुक्तं लाभमाददीत ।


लाता है । राजद्रोही मंत्रियों के अनादर से जो लाभ प्राप्त हो वह भी प्रकोपक है, क्योंकि मंत्रियों के मन में यह शंका हो जाती है कि सिद्धिलाभ करके अवश्य ही राजा उनको नष्ट कर देगा । प्रकोपक लाभ से विपरीत गुणसंपन्न लाभ प्रसादक है । यहाँ तक प्रसादक और प्रकोपक के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।

( १ ) अल्पश्रम और अल्पकालीन लाभ से प्राप्त लाभ ह्रस्वकाल कहा जाता है ।

( २ ) जो लाभ केवल उपजाप आदि से ही प्राप्त हो उसे तनुकशय कहते हैं ।

( ३ ) जो लाभ केवल भोजन-भत्ता व्यय करके ही प्राप्त हो उसे अल्पव्यय कहते हैं ।

( ४ ) जो लाभ अत्यधिक मात्रा में तत्काल ही प्राप्त हो उसे महान् कहते हैं ।

( ५ ) जो लाभ भविष्य में भी अत्यधिक अर्थ-प्राप्ति कराने वाला हो उसे वृद्ध्युदय कहते हैं ।

( ६ ) जिस लाभ में आगे किसी तरह की बाधा उपस्थित न हो उसे कल्य कहते हैं ।

( ७ ) जो लाभ प्रकाशयुद्ध आदि उपादानों से धर्मपूर्वक प्राप्त किया गया हो उसे धर्म्य कहते हैं ।

( ८ ) जो लाभ मित्रराजाओं ने निर्बाध रूप से बिना किसी शर्त के प्राप्त किया हो उसे पुरोग कहते हैं ।

( ९ ) यदि दोनों पक्षों में बराबर लाभ दिखाई दे तो ऐसा बहुगुणविशिष्ट लाभ प्राप्त करना चाहिए जिसमें देश, काल, शक्ति, उपाय, प्रियाप्रिय, जयाजय, समीप-दूर, तात्कालिक, भविष्य में लगातार होना, बहुमूल्य, उपयोगी, अधिक और अत्युत्तम आदि गुण विद्यमान हों ।

६१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) लाभविघ्ना:—काम: कोप: साध्वसं कारुण्यं ह्री: अनार्यभावो मान: सानुक्रोशता परलोकापेक्षा दाम्भिकत्वम् अत्याशित्वं दैन्यम् असूया हस्तगतावमानो दौरात्मिकमविश्वासो भयमनिकार: शीतोष्णवर्षाणामाक्षम्यं मङ्गलतिथिनक्षत्रेष्टित्वमिति ।

(२) नक्षत्रमतिपृच्छन्तं बालमर्थोऽतिवर्तते ।
अर्थो ह्यर्थस्य नक्षत्रं किं करिष्यन्ति तारका: ॥

(३) नाधना: प्राप्नुवन्त्यर्थान्नरा यत्नशतैरपि ।
अर्थैरर्था: प्रबध्यन्ते गजा: प्रतिगजैरिव ॥

इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे क्षयव्ययलाभविपरिमर्शो नाम चतुर्थोऽध्याय:, आदितश्चतुर्विंशत्युत्तरशततम: ।

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( १ ) लाभ-विघ्न : लाभ में इस प्रकार के विघ्न उपस्थित हो सकते हैं : काम, क्रोध, अप्रगल्भता ( साध्वस ), करुणा, लज्जा ( ह्री ), विश्वासघात ( अनार्य-भाव ) अहंकार, दयाभाव ( सानुक्रोशता ), परलोकभय ( परलोकापेक्षा ), दंभभाव अन्याय से अधिक लाभ प्राप्त करना ( अत्याशित्व ), दीनता असूया, हाथ में आयी चीज का तिरस्कार करना ( हस्तगतावमान ), दुर्व्यवहार ( दौरात्मिक ), अविश्वास, भय, शत्रु का तिरस्कार न करना ( अतिकार ), सर्दी, गर्मी तथा वर्षा आदि का सहन न करना और मंगल कार्यों के आरम्भ में तिथि, नक्षत्र आदि को देखना—ये सभी बात लाभ के लिए बाधास्वरूप हैं ।

( २ ) कार्य को आरम्भ करने में जो राजा नक्षत्र, तिथि, लग्न, मुहूर्त्त आदि आदि की अनुकूलता को अधिक पूछता है वह प्रमादी राजा कभी भी अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर सकता है । प्रत्येक कार्य की सिद्धि के लिए पर्याप्त धन और आवश्यक साधनों को ही नक्षत्र समझना चाहिए, इस नक्षत्र-गणना से कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं है ।

( ३ ) धन और आवश्यक उपायों से रहित व्यक्ति सैकड़ों यत्न करने पर भी अपने अभीष्ट फल को प्राप्त नहीं कर पाते हैं । अर्थों का ही अर्थों के साथ सम्बन्ध होता है, जैसे एक हाथी के द्वारा दूसरे हाथी को वश में किया जाता है ।

अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में क्षयव्ययलाभविपरिमर्श नामक चौथा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १४३बाह्याभ्यन्तराश्चापदः
अध्याय ५

(१) सन्ध्यादीनामयथोद्देशावस्थापनमपनयः। तस्मादापदः सम्भवन्ति। (२) बाह्योत्पत्तिरभ्यन्तरप्रतिजापा। अभ्यन्तरोत्पत्तिर्बाह्यप्रतिजापा। बाह्योत्पत्तिर्बाह्यप्रतिजापा। अभ्यन्तरोत्पत्तिरभ्यन्तरप्रतिजापा। इत्यापदः। (३) यत्र बाह्या अभ्यन्तरानुपजपन्ति, अभ्यन्तरा वा बाह्यान् तत्रोभय-योगे प्रतिजपतः सिद्धिर्विशेषवती। सुव्याजा हि प्रतिजपितारो भवन्ति, नोपजपितारः। तेषु प्रशान्तेषु नान्याञ्शक्नुयुरुपजपितुमुपजपितारः। कृच्छ्रोपजापा हि बाह्यानामभ्यन्तरास्तेषामितरे वा। महतश्च प्रयत्नस्य वधः, परेषामर्थानुबन्धश्चात्मनोऽन्य इति।


बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ

(१) सन्धि, विग्रह आदि छः गुणों का उनके उचित स्थानों पर उपयोग न करना ही अपनय है। इस अपनय के कारण ही सारी विपत्तियाँ पैदा होती हैं।

(२) बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ चार तरह से पैदा होती हैं। १. राष्ट्र-मुख्य तथा अन्तपाल आदि बाह्य लोगों के द्वारा उत्पन्न और मन्त्री, पुरोहित आदि आभ्यन्तर लोगों के द्वारा प्रोत्साहित पहिली आपत्ति है, २. आभ्यन्तर लोगों के द्वारा उत्पन्न और बाह्य लोगों के द्वारा प्रोत्साहित दूसरी आपत्ति है, ३. बाह्य लोगों के द्वारा उत्पन्न और उन्हीं के द्वारा प्रोत्साहित तीसरी आपत्ति है, इसी प्रकार ४. आभ्यन्तर लोगों के द्वारा उत्पन्न और उन्हीं से प्रोत्साहित चौथी आपत्ति है।

(३) जहाँ अपने देश के लोग विदेशियों से या विदेशी लोग अपने देश के लोगों से मिलकर षड्यन्त्र रचते हैं, उनमें से जो लोग षड्यन्त्र करने के लिए बहकाये गये (प्रतिजापिता) हैं उनको साम, दाम आदि उपायों से अपने वश में कर लेना अधिक लाभप्रद है, क्योंकि ऐसे लोगों का उद्देश्य धन लेना होता है। किन्तु षड्यन्त्र के लिए बहकाने वाले (उपजपिता) लोगों को सहज ही में वश में नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उनके उद्देश्य का पता लगाना बड़ा कठिन होता है। इस प्रकार प्रतिजापित लोगों को यदि एक बार शान्त कर दिया जाय तो उपजपित फिर दूसरे लोगों को, भेद फूट जाने के भय से, उनकी जगह तैयार करने का साहस नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में बाह्य लोगों का आभ्यन्तर लोगों से और आभ्यन्तर लोगों

६१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवाँ अधिकरण

(१) अभ्यन्तरेषु प्रतिजपत्सु सामदाने प्रयुञ्जीत । स्थानमानकर्म सान्त्वम् । अनुग्रहपरिहारौ कर्मस्वायोगो वा दानम् । (२) बाह्येषु प्रतिजपत्सु भेददण्डौ प्रयुञ्जीत । सत्रणो मित्रव्यञ्जना वा बाह्यानां चारमेषां ब्रूयुः—‘अयं वो राजा दूष्यव्यञ्जनैरतिसन्धातुकामो, बुध्यध्वम्’ इति । दूष्येषु वादूष्यव्यञ्जनाः प्रणिहिता दूष्यान् बाह्यैर्भेदयेयुः, बाह्यान् वा दूष्यैः । दूष्याननुप्रविष्टा वा तीक्ष्णाः शस्त्ररसाभ्यां हन्युः । आहूय वा बाह्यान् घातयेयुरिति । (३) यत्र बाह्या बाह्यानुपजपन्ति, अभ्यन्तरानभ्यन्तरा वाः तत्रैकान्त-


का बाह्य लोगों से उपजाप करना बड़ा कठिन हो जाता है। उपजाप को स्वीकार करके यदि फिर वह फूट जाय तो उपजापिता का बड़ा भारी अनिष्ट हो जाता है, क्योंकि उसके एक महान् प्रयत्न की हत्या हो जाती है । इस तरह षड्यन्त्र का भंडाफोड़ हो जाने पर उपजाप्य व्यक्ति तो अपने स्वामी की प्रसन्नता से अभीष्ट लाभ को प्राप्त करता है और उपजापिता व्यक्ति अपने स्वामी की अप्रसन्नता से अनर्थ का भागी होता है ।

(१) यदि मन्त्री, पुरोहित आदि आभ्यन्तर व्यक्ति ही षड्यन्त्रकारियों को प्रोत्साहित करने वाले हों तो उन्हें साम और दान उपायों से शान्त कर देना चाहिए । विशेषाधिकार स्थानों पर नियुक्त करना तथा विशेष सम्मान देना साम कहलाता है, और धन देना, कर्जा तथा कर आदि से मुक्त कर देना एवं विशेष कार्यों में प्राप्त सम्पूर्ण फल को दे देना दान कहलाता है ।

(२) यदि षड्यन्त्र को प्रोत्साहित करने वाले लोग बाहरी हों तो उन्हें शान्त करने के लिए भेद और दण्ड का प्रयोग करना चाहिए । मित्र के छद्मवेश में रहने वाले गुप्तचर सभी उन बाहरी लोगों से राजा के गुप्त भेद का यह कह कर उद्घाटन करें कि ‘आपका यह राजा राजद्रोहियों के द्वारा आपको मध्यस्थ बनाकर धोखा देना चाहता है । इस रहस्य पर ध्यान देते हुए आप कभी भी इस कार्य में कदम न रखें ।’ अथवा राजद्रोहियों के गुप्त वेष में रहकर विजिगीषु के गुप्तचर भीतरी राजद्रोहियों से बाहरी लोगों का और बाहरी लोगों से भीतरी राजद्रोहियों से का भेद डाल दें । अथवा तीक्ष्ण गुप्तचर राजद्रोहियों के बीच में घुसकर शस्त्र या विष के द्वारा उनका वध कर डाले, अथवा किसी बहाने से बाह्य को अलग ले जा कर चुपचाप उसका वध कर दिया जाय ।

(३) यदि बाहरी, बाहरी लोगों के साथ और आभ्यन्तर, आभ्यन्तर लोगों के साथ षड्यन्त्र रचें और वहाँ यदि समानजातीय षड्यन्त्रकारी हों तो उनमें जो उपजा-

प्र० १४३ : अ० ५ ] बाह्याभ्यन्तर आपत्तियाँ ६१५

योग उपजपितुः सिद्धिर्विशेषवती । दोषशुद्धौ हि दूष्या न विद्यन्ते । दूष्य-शुद्धौ हि दोषः पुनरन्यान् दूषयति ।

(१) तस्माद्बाह्येषूपजपत्सु भेददण्डौ प्रयुञ्जीत । सत्रिणो मित्रव्यञ्जना वा ब्रूयुः-‘अयं वो राजा स्वयमादातुकामः, विगृहीताः स्थ अनेन राज्ञा, बुध्यध्वम्' इति । प्रतिजपितुर्वा ततो दूतदण्डाननुप्रविष्टास्तीक्ष्णाः शस्त्ररसादिभिरेषां छिद्रेषु प्रहरेयुः । ततः सत्रिणः प्रतिजपितारमभिशंसेयुः ।

(२) अभ्यन्तरानभ्यन्तरेषूपजपत्सु यथार्हमुपायं प्रयुञ्जीत । तुष्टलिङ्गमत्तुष्टं विपरीतं वा साम प्रयुञ्जीत ।

(३) शौचसामर्थ्यापदेशेन व्यसनाभ्युदयापेक्षणेन वा प्रतिपूजनमिति दानम् ।

(४) मित्रव्यञ्जनो वा ब्रूयादेतान्–'चित्तज्ञानार्थमुपधास्यति वो राजा,


पिता हो उसे अपने पक्ष में कर लेना लाभप्रद होता है, क्योंकि उसके न रहने पर षड्यन्त्र आगे नहीं बढ़ पाता है । दूष्य व्यक्तियों को यदि शान्त किया जाय तो उनके दोष दूसरे अनेक लोगों को राजद्रोही बनाने में सहायक होते हैं ।

( १ ) इसलिए षड्यंत्रकारी बाह्य लोगों को भेद और दण्ड के द्वारा दबाना चाहिए । विद्रोहियों के मित्रवेष में रहने वाले गुप्तचर उनसे कहें 'आपको समझ लेना चाहिए कि यह राजा आप लोगों को दूसरे लोगों के द्वारा गिरफ्तार कराना चाहता है । इसलिए आप लोगों को उचित है कि इस राजा से विग्रह कर दें ।' अथवा षड्यन्त्रकारी के पास किसी बहाने से जाकर छद्मवेष गुप्तचर शस्त्र या विष आदि के द्वारा उसको मार डालें । उसके बाद गुप्तचर इस बात का प्रचार करे कि उपजापिताओं को प्रतिजापिताओं ने मारा है, जिससे कि उनमें परस्पर अविश्वास पैदा हो जाय ।

( २ ) इसी प्रकार भीतरी लोगों के साथ षड्यंत्र रचनेवाले भीतरी लोगों में भी आवश्यकतानुसार साम आदि उपायों का प्रयोग किया जाय । अवस्था को देखते हुए उन पर संतोष के सूचक, पर वस्तुतः असंतोषप्रद साम का अथवा असंतोष के सूचक, पर वस्तुतः संतोषजनक साम का प्रयोग किया जाय ।

( ३ ) शौच या सामर्थ्य के बहाने, तथा बंधु-वियोग आदि के दुःखमय अवसर पर या पुत्रोत्सव आदि के सुखमय अवसर पर वस्त्र तथा आभरण के द्वारा किया गया सत्कार ही दान के प्रयोग का तरीका कहलाता है ।

( ४ ) अथवा बनावटी मित्र बने हुए खुफिया लोग उन आभ्यंतर षड्यंत्रकारियों से कहें 'तुम्हारे हृदयस्थ भावों को जानने के लिए धन देकर राजा तुम्हारी परीक्षा

६१६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण

६१६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ नौवां अधिकरण

तदस्याख्यातव्यम्' इति । परस्पराद्वा भेदयेदेनान्—असौ चासौ च वो राजन्येवमुपजपति । इति भेदः ।
(१) दाण्डकर्मिकवच्च दण्डः ।
(२) एतासां चतसृणामापदामभ्यन्तरामेव पूर्वं साधयेत् । 'अहिभयादभ्यन्तरकोपो बाह्यकोपात्पापीयान्' इत्युक्तं पुरस्तात् ।

(३) पूर्वां पूर्वा विजानीयाल्लघ्वीमापदमापदाम् ।
उत्थितां बलवद्भूचो वा गुर्वी लघ्वीं विपर्यये ॥

इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे बाह्याभ्यन्तराश्चापदो नाम पञ्चमोऽध्यायः; आदितः पञ्चविंशत्युत्तरशततमः ।

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लेगा । इसलिए तुम्हें अपने मन की बात सच-सच कह देनी चाहिए ।' इस प्रकार कह देने से वे डर जायेंगे । अथवा उनकी आपस में यह कहकर कि 'अमुक-अमुक व्यक्ति राजा से तुम्हारी शिकायत कर रहा था' फूट डलवा दे ।

(१) ऐसे प्रसङ्गों में दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपांशुदण्ड का प्रयोग करना चाहिए ।

(२) उक्त चारों प्रकार की आपत्तियों में सर्वप्रथम आभ्यन्तर आपत्ति का प्रतीकार करना चाहिए; क्योंकि वह अधिक अनर्थकारी होती है । पहले भी इस बात का संकेत किया जा चुका है कि बाह्यकोप की अपेक्षा आभ्यन्तर कोप घर के साँप की तरह अधिक भयानक होता है ।

(३) पूर्वोक्त आपत्तियों में क्रमशः पूर्व-पूर्व की आपत्ति अपेक्षया लघु होती है; फिर भी जिस आपत्ति के पीछे बलवान् का हाथ हो उसका प्रतीकार पहिले करना चाहिए और इसी प्रकार निर्बल शत्रु के द्वारा पैदा की गयी सबसे बड़ी आपत्ति को लघु ही समझना चाहिए ।

अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में बाह्याभ्यन्तरापद नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १४४दूष्यशत्रुसंयुक्ताः
अध्याय ६

(१) दूष्येभ्यः शत्रुभ्यश्च द्विविधाः शुद्धाः ।

(२) दूष्यशुद्धायां पौरेषु जानपदेषु वा दण्डवर्जनुपायान् प्रयुञ्जीत । दण्डो महाजने क्षेप्तुमशक्यः, क्षिप्तो वा तं चार्थं न कुर्यात् । अन्यं चानर्थ-मुत्पादयेत् । मुख्येषु त्वेषां दाण्डकर्मिकवच्चेष्टेतेति ।

(३) शत्रुशुद्धायां यतः शत्रुः प्रधानः कार्यो वा, ततः सामादिभिः सिद्धिं लिप्सेत ।

(४) स्वामिन्यायत्ता प्रधानसिद्धिः, मन्त्रिष्वायत्तायत्तसिद्धिः, उभया-यत्ता प्रधानायत्तसिद्धिः ।


राजद्रोही और शत्रुजन्य आपत्तियाँ

( १ ) राजद्रोहियों और शत्रुओं द्वारा उत्पन्न दो प्रकार की आपत्तियाँ हैं एक दूष्यशुद्धा और दूसरी शत्रुशुद्धा ।

( २ ) दूष्यशुद्धा आपत्तियों के प्रतीकार के लिए नगरनिवासियों को तथा जनपद निवासियों को, राजद्रोहियों पर, दण्ड को छोड़ कर बाकी सभी साम, दान, भेद आदि उपायों का प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि बड़े आदमियों पर सहसा दण्ड का प्रयोग कर देना असंभव हुआ करता है । यदि उन पर दण्ड का प्रयोग किया भी जाय तो उससे अभीष्ट की सिद्धि नहीं हो पाती, वरन् उससे कुछ दूसरा ही अनर्थ हो जाता है । इस प्रकार यदि साम आदि उपायों द्वारा उन प्रमुख राजद्रोहियों को शांत न किया जा सके तो उन पर दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार उपांशु-दण्ड का प्रयोग किया जाय ।

( ३ ) शत्रुशुद्धा अर्थात् शत्रुद्वारा उत्पन्न की गई किसी भी प्रकारकी आपत्ति को दूर करने के लिए उन सामंतों पर साम आदि उपायों का प्रयोग किया जाय, शत्रु-मंत्री या अमात्य आदि जिनके अधीन हों ।

( ४ ) मंत्री द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति का प्रतीकार स्वयं राजा को ही करना चाहिए । आयत्तसिद्धि अर्थात् कार्य शब्द से कहे गये अमात्य आदि की आपत्ति का प्रतीकार मंत्रियों द्वारा की जानी चाहिए । इसी प्रकार मंत्री और अमात्य, दोनों के द्वारा की गई आपत्ति का प्रतीकार राजा और मंत्री को करना चाहिए ।

६१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) दूष्यादूष्याणामामिश्रितत्वादा मिश्रा । आमिश्रायामदूष्यतः सिद्धिः । आलम्बनाभावे ह्यालम्बिता न विद्यते । मित्रामित्राणामेकीभावात्परमिश्रा । परमिश्रायां मित्रतः सिद्धिः । सुकरो हि मित्रेण सन्धिर्नामित्रेणेति ।

(२) मित्रं चेन्न सन्धिमिच्छेद्भीक्ष्णमुपजपेत्, ततः सत्रिभिरमित्राद्भेद-यित्वा मित्रं लभेत । मित्रामित्रसङ्घस्य वा योऽन्तस्थायी तं लभेत । अन्त-स्थायिनि लब्धे मध्यस्थायिनो भिद्यन्ते । मध्यस्थायिनं वा लभेत । मध्य-स्थायिनि वा लब्धे नान्तस्थायिनः संहन्यन्ते । यथा चैषामाश्रयभेदस्तानु-पायान्प्रयुञ्जीत ।

(३) धार्मिकं जातिकुलश्रुतवृत्तस्तवेन सम्बन्धेन पूर्वेषां त्रैकाल्योपका-रानपकाराभ्यां वा सान्त्वयेत् ।

(४) निवृत्तोत्साहं विग्रहश्रान्तं प्रतिहतोपायं क्षयव्ययाभ्यां प्रवासेन


( १ ) दूष्य और अदूष्य, दोनों के द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति को आमिश्र या मिश्रित कहते हैं । आमिश्र आपत्ति का प्रतीकार करने के लिए अदूष्य को ही साम आदि उपायों के द्वारा अनुकूल बनाना चाहिए, क्योंकि अदूष्यों ( राजभक्तों ) का सहारा लेकर ही दूष्य ( राजद्रोही ) आपत्तिजनक होता है । उनका सहारा न पाकर दूष्य अपने आप शांत हो जाता है । मित्र और शत्रु, इन दोनों के द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति को परमिश्र या शत्रुमिश्र कहते हैं । परमिश्र आपत्ति में शत्रु के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है; क्योंकि मित्र के साथ संधि हो जाना सरल होता है और शत्रु के साथ इस तरह संधि होना कठिन रहता है ।

( २ ) मित्र यदि संधि करने के लिए राजी न हो तो बार-बार उसे शत्रु से भिन्न करने का उपाय करना चाहिए । सत्री आदि गुप्तचरों के द्वारा भेद डलवाकर मित्र को अपनी ओर करना चाहिए । मित्र और शत्रु संधि के अंत में रहने वाले सामंत को अपनी ओर मिलाना चाहिए; क्योंकि अंत में रहने वाले सामंत के वश में हो जाने पर मध्यस्थ राजा अपने आप फूट जाते हैं । अथवा मध्यस्थ सामंत को ही अपने वश में कर लेना चाहिए; क्योंकि उसको वश में कर लेने पर अंत में रहने वाले राजा आपस में नहीं मिल पाते हैं । अथवा जिस उपाय से भी शत्रु और मित्र अपने शक्ति-शाली आश्रयदाता से भिन्न रह सकें वैसा उपाय करना चाहिए ।

( ३ ) जाति, कुल, श्रुत ( शास्त्र-ज्ञान ) और वृत्त ( सदाचार ) आदि के स्तुति वचनों से तथा उनके कुलवृद्धों का सदा उपकार या अनपकार के द्वारा धार्मिक राजा को शांत करना चाहिए ।

( ४ ) उत्साहहीन, युद्धविमुख, निष्फल उपाय, क्षय, व्यय और प्रवास से संतप्त,

प्र० १४४ : अं० ६ ] दूष्य और शत्रु-जन्य आपत्तियाँ ६१९

चोपतप्तं शौचेनान्यं लिप्समानमन्यस्माद्वा शङ्कमानं मैत्रीप्रधानं वा कल्याण-बुद्धिं साम्ना साधयेत् ।
(१) लुब्धं क्षीणं वा तपस्विमुख्यावस्थापनापूर्वं दानेन साधयेत् ।
(२) तत् पञ्चविधम्—देयविसर्गो, गृहीतानुवर्तनम्, आत्तप्रतिदानम्, स्वद्रव्यदानमपूर्वम्, परस्वेषु स्वयंग्राहदानं चेति दानकर्म ।
(३) परस्परद्वेषवैरभूमिहरणशङ्कितमतोऽन्यतमेन भेदयेत् । भीरुं वा प्रतिघातेन, 'कृतसन्धिरेश त्वयि कर्म करिष्यति, मित्रमस्य निसृष्टं; सन्धौ वा नाभ्यन्तर' इति ।
(४) यस्य वा स्वदेशादन्यदेशाद्वा पण्यानि पण्यागारतयागच्छेयुः, तान्यस्य 'यातव्याल्लब्धानि' इति सत्रिणश्चारयेयुः । बहुलीभूते शासनमभिव्यक्तेन प्रेषयेत्—'एतत्ते पण्यं, पण्यागारं वा मया ते प्रेषितं, सामवायि-

ईमानदारी से किसी दूसरे राजा को अपना मित्र बनाने को इच्छुक, दूसरे पर विश्वास न करने वाले और सबके साथ मित्र-भाव का व्यवहार करने वाले कल्याणबुद्धि राजा को साम उपाय के द्वारा ही शांत करना चाहिए ।

( १ ) लोभी अथवा निर्धन राजा को तपस्वी और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जामिन बनाकर दान के द्वारा वश में करना चाहिए ।

( २ ) वह दान पाँच प्रकार का होता है १. देयविसर्ग ( ग्रहण की हुई भूमि में ब्राह्मण आदि के लिए छोड़ा गया कुछ भाग ) २. गृहीतानुवर्तन ( पूर्वजों द्वारा गृहीत भूमियोग के लिए प्रतिषेध न करना ) ३. आत्त प्रतिदान ( गृहीत भूमि को फिर वापस दे देना ) ४. नये सिरे से स्वयं ही देना और ५. शत्रुदेश से लूटे हुए धन को लूटने वालों को ही दे देना ।

( ३ ) जो राजा आपसी द्वेष, वैर रखता हो तथा जिसके प्रति भूमि का अपहरण करने की आशंका हो उसे इन्हीं द्वेष्य आदि किसी एक के द्वारा भिन्न कर देना चाहिए । भीरु राजा को प्राणघात का भय देकर भिन्न कर देना चाहिए; अथवा यह कह कर उसको अलग कर देना चाहिए कि इस समय तो बलवान् राजा तुमसे संधि कर लेगा पर बाद में तुम्हीं पर आक्रमण कर देगा । क्योंकि संधि करने के लिए विजिगीषु के पास भी उसने अपना आदमी भेज दिया है । अथवा यह कह कर अलग कर दे कि शत्रु तथा मित्र के साथ संधि करते समय उसने तुम्हारा बहिष्कार कर दिया था ।'

( ४ ) अपने देश या शत्रु के देश से बाजार में बिकने के लिए यदि कोई चीज आये तो सत्री गुप्तचर उसके संबंध में यह अफवाह उड़ा दें कि यह सामान छिपे तौर पर संधि करने की इच्छा रखने वाले यातव्य से आया है । जब यह अफवाह सर्वत्र फैल जाय तब वध के लिए निश्चित पुरुष ( अभिव्यक्त ) के हाथ एक जाली पत्र

६२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवाँ अधिकरण

केषु विक्रमस्व, अपगच्छ वा, ततः पणशेषमवाप्स्यसि' इति । ततः सत्रिणः परेषु ग्राहयेयुरेतदरिप्रदत्तमिति ।

(१) शत्रुप्रख्यातं वा पण्यमविज्ञातं विजिगीषुं गच्छेत् । तदस्य वैदेहक-व्यञ्जनाः शत्रुमुख्येषु विक्रीणीरन् । ततः सत्रिणः परेषु ग्राहयेयुः—‘एतत्पण्य-मरिप्रदत्तम्’ इति ।

(२) महापराधार्थमानाभ्यामुपगृह्य वा शस्त्ररसाग्निभिरमित्रे प्रणि-दध्यात् । अथैकमामात्यं निष्पातयेत् । तस्य पुत्रदारमुपगृह्य रात्रौ हतमिति ख्यापयेत् । अथामात्यः शत्रोस्तानेकैकशः प्ररूपयेत् । ते चेद्यथोक्तं कुर्युर्न चैनान्ग्राहयेत् । अशक्तिमतो वा ग्राहयेत् । आप्तभावोपगतो मुख्यादस्या-

लिखकर भेजना चाहिए । उस पत्र का आशय हो 'यह थोड़ा-बहुत सामान जो मैंने आपके लिए भेजा है और साथ ही बाजार में बिकने योग्य बड़ा सामान भी भेज रहा हूँ । मेरे शत्रु की सहायता करने वाले राजाओं पर तुम आक्रमण करो अथवा उन्हें छोड़कर मेरी सहायता के लिए तैयार बने रहो । शर्तनामे का बाकी धन तुम्हें 'चढ़ाई कर देने के बाद मिलेगा ।' उसके बाद सत्री गुप्तचर अन्य सामवायिक राजाओं को यह विश्वास दिला दें कि यह पत्र उनके शत्रु द्वारा ही भेजा गया है ।

(१) अथवा सामवायिक राजाओं से किसी एक के साथ संबंध जोड़कर, रत्न आदि बाजारू सामान बिना किसी के जाने हुए किसी तरह विजिगीषु के पास पहुँचा दिया जाय । उसके बाद व्यापारियों के वेष में रहने वाले गुप्तचर सामवायिक राजाओं में से किसी एक के हाथ उसको बेच दें; उसके बाद सत्री गुप्तचर दूसरे सामवायिक राजाओं के यहाँ जाकर पुलिस द्वारा उस सामान को बरामद करा दे और तब यह सिद्ध करे कि 'यह सामान आपके शत्रु द्वारा यहाँ अमुक-अमुक व्यक्तियों के पास बेचने के लिए भेजा गया है ।' इसका परिणाम यह होगा कि सामवायिक राजाओं को यह विश्वास हो जायेगा कि हम में से कोई राजा विजिगीषु के साथ मिला हुआ है । इस प्रकार उनमें परस्पर फूट पड़ जायेगी ।

(२) विजिगीषु को चाहिए कि अपने महापराधी अमात्य आदि को भूमि, हिरण्य आदि धन तथा मान-संमान देकर अपने वश में करे और फिर उन्हें शत्रु पर शस्त्र, रस आदि के द्वारा आक्रमण करने के लिए नियुक्त कर दे । पहिले इस प्रकार के महापराधी एक ही अमात्य को शत्रु के यहाँ भेजे । उसके चले जाने के बाद उसके स्त्री-पुत्रों को किसी एकांत स्थान में छिपा कर यह अफवाह फैला दे कि राजा ने उनको रात में मरवा डाला है । जब उस अमात्य पर शत्रु का पूरा विश्वास जम जाय तो वह, विजिगीषु के यहाँ से आये हुए अन्य अमात्यों का एक-एक करके राजा से यह परिचय करा दे कि ये लोग विजिगीषु के द्वेष के कारण निकल भागे हैं और

प्र० १४४ : अ० ६ ] दूष्य और शत्रु-जन्य आपत्तियाँ ६२१

त्मानं रक्षणीयं कथयेत्; अथामित्रशासनं मुख्यायोपघाताय प्रेषितमुभयवेतनौ ग्राहयेत्। (१) उत्साहशक्तिमतो वा प्रेषयेत्—'अमुष्य राज्यं गृहाण यथास्थितो न सन्धिः' इति। ततः सत्रिणः परेषु ग्राहयेयुः। (२) एकस्य स्कन्धावारं विवधमासारं वा घातयेयुः, इतरेषु मैत्रीं ब्रुवाणाः। तं सत्रिणः 'त्वमेतेषां घातयितव्यः' इत्युपजपेयुः। (३) यस्य वा प्रवीरपुरुषो हस्ती हयो वा म्रियेत, गूढपुरुषैर्हन्येत ह्रियेत वा, तं सत्रिणः परस्परोपहृतं ब्रूयुः। ततः शासनमभिशस्तस्य प्रेषयेत्—'भूयः कुरु ततः पणशेषमवाप्स्यसि' इति। तदुभयवेतना ग्राहयेयुः।


आपकी सेवा में रहने योग्य हैं। यदि वे अमात्य आदि विजिगीषु की आज्ञानुसार शस्त्र, विष आदि का ठीक-ठीक प्रयोग कर दें तो उनका भेद गुप्त बना रहने दे और यदि वे शत्रु को मारने में अपनी असमर्थता प्रकट करें तो उनका भेद खोलकर शत्रु द्वारा ही उन्हें गिरफ्तार करा दे। विजिगीषु द्वारा निकाला हुआ वह अमात्य सामवायिक राजाओं के प्रमुख से, यह कह कर भेद डाले कि 'आपको सामवायिक राजाओं के प्रमुखों से अपनी रक्षा करनी चाहिए; क्योंकि वे लोग विश्वास योग्य नहीं हैं।' उसके बाद साधारण सामवायिक राजाओं के उच्छेद के लिए शत्रु द्वारा भेजी हुई पूर्व लिखित कूट आज्ञा को उभयवेतन भोगी व्यक्तियों द्वारा प्रमुख सामवायिक राजाओं के पास पहुँचा दे।

(१) अथवा किसी उत्साही, शक्ति-संपन्न एक ही सामवायिक के पास उस कूट आज्ञा को भिजवाये। उस आज्ञापत्र का मसविदा इस प्रकार होना चाहिए 'आप उस मुख्य सामवायिक राजा के राज्य को ले लें, पूर्व निश्चित संधि अब स्वीकार नहीं की जा सकती है।' इसके बाद सत्री गुप्तचर दूसरे सामवायिकों को यह सूचित कर दे कि अमुक मुख्य सामवायिक के पास इस आशय का एक पत्र आया है।

(२) अथवा सत्री गुप्तचर किसी एक सामवायिक राजा की छावनी (स्कंधावार), आयात-निर्यात के मार्ग तथा उसके मित्रबल को नष्ट कर दें। दूसरे सामवायिक राजाओं से वे अपनी मित्रता बनाये रखें, जिससे कि उनको गुप्त रहस्य का पता न लगे। उसके बाद वह सत्री गुप्तचर उस सामवायिक राजा की दूसरे सामवायिक राजाओं से यह कह कर फूट डाल दे कि 'ये सामवायिक राजा उसे मारना चाहते हैं। ऐसी अवस्था में उनके साथ तुम्हारी संधि कैसे संभव है?'

(३) अथवा सामवायिक राजाओं में किसी राजा का कोई वीर सैनिक, हाथी या घोड़ा मर जाय या गुप्तचरों द्वारा मार दिया जाय अथवा अपहरण कर लिया जाय, तो सत्री गुप्तचर उसको किसी दूसरे सामवायिक द्वारा मारा गया बतायें।