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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

प्र० ४० : अ० २४ ] कृषि-विभाग का अध्यक्ष १९७

(१) यथर्तुवशेन वा बीजवापाः । (२) वापातिरिक्तमर्धसीतिकाः कुर्युः । स्ववीर्योपजीविनो वा चतुर्थ-पञ्चभागिकाः । यथेष्टमनवसितभागं दद्युरन्यत्र कृच्छ्रेभ्यः । (३) स्वसेतुभ्यो हस्तप्रावर्तितममुदकभागं पंचमं दद्युः । स्कन्दप्रावर्तितं चतुर्थम् । स्रोतोयन्त्रप्रावर्तितं च तृतीयम् । (४) चतुर्थं नदीसरस्तटाककूपोद्घाटम् । (५) कर्मोदकप्रमाणेण कैदारं हैमनं ग्रैष्मिकं वा सस्यं स्थापयेत् । (६) शाल्यादि ज्येष्ठम् । षण्डो मध्यमः । इक्षुः प्रत्यवरः । इक्षवो हि बह्वाबाधा व्ययग्राहिणश्च । (७) फेनाघातो वल्लीफलानाम्, परीवाहान्ताः पिप्पलीमुद्वीकेक्षूणाम्, कूपपर्यन्ताः शाकमूलानाम्, हरिणिपर्यन्ता हरितकानाम्, पाल्यो लवानां

कुल्थी, जो, गेहूँ, मटर, अलसी और सरसों आदि अन्नों को वर्षा के अन्त में बोना चाहिए ।

( १ ) अथवा इन सभी अन्नों को ऋतु के अनुसार, जैसा उचित हो बोना चाहिए।

( २ ) जो खेत बोये न गये हों, उन्हें सीताध्यक्ष आधी कटाई पर दूसरे किसानों को बोने के लिए दे दे । अथवा जो लोग शारीरिक श्रम पर ही जीवित हैं, उनको यह जमीन दे दी जाय और उस जमीन की पैदावार का चौथा या पाचवां भाग उन्हें दिया जाय या स्वामी की इच्छानुसार ही उनको दिया जाय, किन्तु इस बात का ध्यान रहे कि उन्हें उस प्रदत्त भाग को स्वीकार करने में कोई कष्ट न हो ।

( ३ ) अपने धन और बाहुबल से बनाये गए तालाबों से यदि सिंचाई की जाय तो उस उपज का पांचवां हिस्सा राजा को देना चाहिए । अपने कन्धों पर जल लाकर यदि वह खेतों की सिंचाई करता है तो उसे चौथाई हिस्सा राजा को देना चाहिए । यदि वह नहर या नालियां बना कर खेतों को सींचता है तो उसे पैदावार का तीसरा ही हिस्सा देना चाहिए ।

( ४ ) अपने धन और श्रम से यदि नदी, झील और कुओं पर रहट लगाकर खेत की सिंचाई की जाय तो पैदावार का चौथा भाग राजा को देना चाहिए ।

( ५ ) ऋतु के अनुसार तथा पानी की सुविधा देखकर ही खेतों में बीज बोना चाहिए ।

( ६ ) धान, गेहूँ आदि की फसल उत्तम मानी गई है । कँदली आदि की फसल मध्यम कोटि की है । ईख की फसल ओछी मानी गई है, क्योंकि इसके बोने में बड़ा श्रम करना पड़ता है और अनेक बाधाओं से उसकी रक्षा करनी पड़ती है ।

( ७ ) नदी के कछारों एवं किनारों की जमीन का पेठा, कद्दू, ककड़ी तथा तरबूज आदि बोने के लिए उपयुक्त है, पीपल और ईख आदि बोने के लिए वह जमीन उपयुक्त है, जहाँ पर नदी का जल एक बार घूम गया हो, साग-भाजी बोने के

१९८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

गन्धभैषज्योशीरह्रीबेरपिण्डालुकादीनाम् । यथास्वं भूमिषु च स्थूल्याश्चा-
नूप्याश्चौषधीः स्थापयेत् ।
(१) तुषारपायनमुष्णशोषणं चासप्तरात्रादिति धान्यबीजानां, त्रिरात्रं पंचरात्रं वा कोशीधान्यानां, मधुघृतसूकरवसाभिः शकृद्युक्ताभिः काण्डबीजानां छेदलेपो मधुघृतेन कन्दानाम् । अस्थिबीजानां शकृदालेपः । शाखिनां गर्तदाहो गोऽस्थिशकृद्भिः काले दौहृदं च ।
(२) प्ररूढांश्चाशुष्ककटुमत्स्यांश्च स्नुहिक्षीरेण पाययेत् ।
(३) कार्पास्सारं निर्मोकं सर्पस्य च समाहरेत् ।
न सर्पास्तत्र तिष्ठन्ति धूमो यत्रैष तिष्ठति ॥
(४) सर्वबीजानां तु प्रथमवापे सुवर्णोदकसंप्लुतां पूर्वमुष्टिं वापयेत् अमुं च मन्त्रं ब्रूयात्—
'प्रजापतये काश्यपाय देवाय नमः सदा ।
सीता मे ऋध्यतां देवी बीजेषु च धनेषु च' ॥


लिए कुए के आस-पास की जमीन उपयुक्त है, जई आदि बोने के लिए भील तथा तालाबों के किनारे की गीली जमीन उपयुक्त है, धनिया, जीरा, खस, नेत्रवाला तथा कचालू आदि बोने के लिए ऐसे खेत उपयुक्त हैं जिनके बीच में तालाब बने हों, सूखी और गीली, जमीन में जिन-जिन अनाजों की अधिक उपज हो उनको समझ कर बोना चाहिए ।

( १ ) धान के बीजों की सात दिन तक रात की ओस और दिन की धूप में रखना चाहिए । मूंग, उड़द आदि के बीजों को इसी प्रकार तीन दिन-रात या पांच दिन-रात ओस और धूप में रखना चाहिए, बोए जाने वाले ईख के पोरों की कटी हुई जगहों में शहद, घी या सुअर की चर्बी के साथ गोबर मिला कर लगा देना चाहिए, सूरन, शकरकन्द आदि कन्दफलों के कटे हुए स्थानों पर गोबर-शहद का लेप अथवा घी का लेप लगा देना चाहिए, कपास आदि के बीजों को गोबर आदि से लपेट कर बोना चाहिए, आम, कटहल आदि वृक्षों के बीजों को किसी गढ़े में डाल कर कुछ गर्मी दी जाने के बाद उन्हें गाय की हड्डी और गोबर के साथ मिलाकर रखा जाना चाहिए, निष्कर्ष यह कि इन सब प्रकार के बीजों का यथाविधि संस्कार करके फिर इनको खेत में बोना चाहिए ।

( २ ) बीज बोने के बाद जब उनमें अंकुर निकल जांय तब उनमें छोटी मछलियों की खाद छुड़वा देनी चाहिए और उन्हें सेहुड़ के दूध से सींचना चाहिए ।

( ३ ) साँप की केंचुली और बिनौलों को एक साथ मिलाकर जला दिया जाय, जहां तक उसका धुआं फैलेगा वहां तक कोई भी सांप नहीं ठहर सकता ।

( ४ ) बोने से पहिले हरेक बीज को सुवर्ण से स्पर्श हुए जल में भिगोना चाहिए और तब बोते समय बीज की पहिली मुट्ठी भरकर यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ;

प्र० ४० : अ० २४ ] कृषि-विभाग का अध्यक्ष १९९

(१) षण्डवाटगोपालकदासकर्मकरेभ्यो यथापुरुषपरिवापं भक्तं कुर्यात् । सपादपणिकं मासं दद्यात् । कर्मानुरूपं कारुभ्यो भक्तवेतनम् । (२) प्रशीर्णं पुष्पफलं देवकार्यार्थं व्रीहियवमाग्रयणार्थं श्रोत्रियास्तपस्विनश्चाहरेयुः । राशीमूलमुच्छवृत्तयः । (३) यथाकालं च सस्यादि जातं जातं प्रवेशयेत् । न क्षेत्रे स्थापयेत् किञ्चित् पलालमपि पण्डितः ॥ (४) प्रकराणां समुच्छ्रायान् वलभीर्वा तथाविधाः । न संहतानि कुर्वीत न तुच्छानि शिरांसि च ॥ (५) खलस्य प्रकरान् कुर्यान्मण्डलान्ते समाश्रितान् । अनग्निकाः सोदकाश्च खले स्युः परिकर्मिणः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सीताध्यक्षो नाम चतुर्विंशोऽध्यायः, आदितश्चतुश्चत्वारिंशः ।

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'प्रजापति, सूर्यपुत्र और मेघ, तुम्हारी सदैव हम वन्दना करते हैं, हे धरती माता, हमारे बीजों और अनाजों में सदा वृद्धि होती रहे'।

( १ ) खेतों की रखवाली करने वाले ग्वाले, दास और नौकर आदि प्रत्येक को उनकी मेहनत के अनुसार भोजन-वस्त्र आदि दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्हें प्रतिमास सवा पण नियत वेतन मिलना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे कारीगरों को भी उनके परिश्रम के अनुसार भोजन, वस्त्र और वेतन आदि दिया जाना चाहिए।

( २ ) पेड़ों से अपने आप गिरे हुए फल-फूलों को देवकार्य के लिए, तथा गेहूँ जौ आदि अन्नों को इष्ट देवता को भोग लगाने के लिए श्रोत्रिय और तपस्वी लोग उठा लें। खलिहान उठ जाने पर जो अन्न के दाने पड़े रह जांय उन्हें सीता बीनकर गुजर करने वाले लोग उठा लें।

( ३ ) ठीक समय पर तैयार हुई फसल को सुरक्षित स्थान में रखवा देना चाहिए, पुआल और भूसा आदि असार वस्तुओं को भी उठाकर ले जाना चाहिए।

( ४ ) अनाज रखने का स्थान ( प्रकर ) कुछ ऊँची जगह में बनवाना चाहिए, उसी प्रकार के मजबूत तथा घिरे हुए अन्नागारों को बनवाना चाहिए, उनके ऊपरी हिस्से न तो आपस में मिले हुए हों और न वे खाली हों।

( ५ ) कटे हुए अनाज को रखने की जगह ( खलिहान ) और दाँई लेने की जगह ( मण्डल ) दोनों आस-पास होने चाहिए। खलिहान में काम करने वाले व्यक्ति अपने पास आग न रखें किन्तु उनके पास जल का प्रबन्ध अवश्य होना चाहिए।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में चौबीसवां अध्याय समाप्त।

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प्रकरण ४१ | सुराध्यक्षः अध्याय २५ |


(१) सुराध्यक्षः सुराकिण्वव्यवहारान् दुर्गे जनपदे स्कन्धावारे वा तज्जातसुराकिण्वव्यवहारिभिः कारयेदेकमुखमनेकमुखं वा, विक्रयक्रयवशेन वा। षट्छतमत्ययमन्यत्र कर्तृक्रेतृविक्रेतॄणां स्थापयेत् । ग्रामादनिर्णयनम-सम्पातं च सुरायाः, प्रमादभयात् कर्मसु निर्दिष्टानां मर्यादातिक्कमभया-दार्याणाम् । उत्साहभयाच्च तीक्ष्णानाम् ।

(२) लक्षितमल्पं वा चतुर्भागमर्धकुडुवं कुडुबमर्धप्रस्थं प्रस्थं वेति ज्ञातशौचा निर्हरेयुः ।

(३) पानागारेषु वा पिबेयुरसञ्चारिणः ।

(४) निक्षेपोपनिधिप्रयोगापहृतादीनामनिष्टोपगतानां च द्रव्याणां ज्ञानार्थमस्वामिकं कुप्यं हिरण्यं चोपलभ्य निक्षेप्तारमन्यत्र व्यपदेशेन ग्राहयेत् । अतिव्ययकर्तारमनायतिव्ययं च ।

आबकारी विभाग का अध्यक्ष

(१) आबकारी विभाग के अध्यक्ष (सुराध्यक्ष) को चाहिए कि वह दुर्ग, जनपद, अथवा छावनी आदि में सुरा के व्यापार का प्रबन्ध, शराब के बनाने वाले तथा बेचने वाले निपुण व्यक्तियों के द्वारा करवाये, शराब का ठेका एक बड़े व्यापारी को दिया जाय या अनेक छोटे-छोटे व्यापारियों को, अथवा क्रय-विक्रय की जैसी व्यवस्था उचित जँचे, तदनुसार ही उसकी विक्री का प्रबन्ध किया जाय । ठेक़ों के अलावा अन्यत्र शराब बनाने, बेचने और खरीदने वालों पर ६०० पण जुर्माना किया जाय । शराब तथा शराबी को गाँव से बाहर, एक घर से दूसरे घर, अथवा भीड़ में न जाने दिया जाय, क्योंकि ऐसा करने से एक तो राजकीय कर्मचारी कार्यों की हानि करने लगेंगे, दूसरे में आर्य लोग अपनी मर्यादा को भंग कर सकते हैं, और तीसरे में तेज मिजाज सैनिक हथियारों का भी प्रयोग कर सकते हैं ।

(२) सुविदित आचार-व्यवहार वाले लोग चौथाई कुडव, आधा कुडव, एक कुडव, आधा प्रस्थ या एक प्रस्थ मुहरबन्द शराब साथ भी ले जा सकते हैं ।

(३) जिन लोगों को शराब साथ ले जाने की आज्ञा न हो वे मदिरालय में ही बैठकर शराब पीयें ।

(४) यदि कोई व्यक्ति धरोहर, गिरवी, चोरी-डाका आदि का धन और सोना-चांदी आदि वस्तुओं को शराबखाने में गिरवी रख कर शराब पीये तो उसको वहाँ

प्र० ४१ : अ० २५ ] आबकारी विभाग का अध्यक्ष २०१

(१) न चानर्घेण कालिकां वा सुरां दद्यादन्यत्र दुष्टसुरायाः । तामन्यत्र विक्रापयेत् । दासकर्मकरेभ्यो वा वेतनं दद्यात् । वाहनप्रतिपानं सूकरपोषणं वा दद्यात् । (२) पानागाराण्यनेककक्ष्याणि विभक्तशयनासनवन्ति पानोद्देशानि गन्धमाल्योदकवन्ति ऋतुसुखानि कारयेत् । (३) तत्रस्थाः प्रकृत्यौत्पत्तिकौ व्ययौ गूढा विद्युरागन्तूंश्च । (४) क्रेतॄणां मत्तसप्तानामलङ्काराच्छादनहिरण्यानि च विद्युः । तन्नाशे वणिजस्तच्च तावच्च दण्डं दद्युः । (५) वणिजस्तु संवृतेषु कक्ष्याविभागेषु स्वदासीभिः पेशलरूपाभिरागन्तूनां वास्तव्यानां च आर्यरूपाणां मत्तसुप्तानां भावं विद्युः । (६) मेदकप्रसन्नासवारिष्टमैरेयमधूनाम् ।


से बाहर कर किसी दूसरे बहाने से नगराध्यक्ष के हवाले करा देना चाहिए । इसी प्रकार जो व्यक्ति आमदनी से अधिक या बिना आमदनी के ही फजूल खर्च करे उसे भी गिरफ्तार करा देना चाहिए ।

( १ ) थोड़ी कीमत पर, उधार या व्याज सहित अदा होने के मूल्य पर बढ़िया शराब न बेचनी चाहिए, बल्कि ऐसे खरीदारों को घटिया शराब देनी चाहिए । घटिया शराब को बढ़िया शराब की दुकान से न बेचना चाहिए । घटिया शराब या तो दास जैसे छोटे कर्मचारियों को वेतन के रूप में दे देनी चाहिए, अथवा बैल-ऊंट की सवारी हांकने वालों तथा सूअर का पालन-पोषण करने वालों को दे देनी चाहिए ।

( २ ) शराबखानों में अनेक ड्योढ़ियां होनी चाहिए, लेटने तथा बैठने के लिए अलग-अलग कमरे होने चाहिए, शराब पीने के लिए अलग स्थान होने चाहिए, उनमें सुगन्धित द्रव्यों एवं पानी आदि का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए, ये सभी स्थान ऐसे बने हों, जो मौसम में सुखद हों ।

( ३ ) सरकारी गुप्तचर को चाहिए कि वह प्रतिदिन शराब की खपत तथा खर्च का हिसाब रखे और यह भी निगरानी रखे कि बाहर से कौन-कौन व्यक्ति वहाँ आते हैं ।

( ४ ) शराब के नशे में बेहोश हो जाने वाले लोगों के जेवर, वस्त्र और नकदी का भी गुप्तचर ध्यान रखे । यदि बेहोश हालत में शराबियों की कोई चीज चोरी हो जाय तो उसको ठेकेदार ही अदा करे, वरन्, वह उतनी ही लागत का जुर्माना राजा को भी अदा करे ।

( ५ ) ठेकेदार को चाहिये कि वह चतुर एवं सुन्दरी दासियों के द्वारा, अलग-अलग कमरों में बेहोश उन बाहर से आये या नगर के रहने वाले, ऊपर से आर्य लगने वाले, शराबियों के भीतरी भावों का पता लगाये ।

( ६ ) शराब कई प्रकार की होती है : १. मेदक, २. प्रसन्ना ३. आसव ४. अरिष्ट ५. मैरेय और ६. मधु ।

२०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) उदकद्रोणं तण्डुलानामर्धाढकं त्रयः प्रस्थाः किण्वस्येति मेदकयोगः । (२) द्वादशाढकं पिष्टस्य पञ्च प्रस्थाः किण्वस्य पुत्रकत्वक्फलयुक्तो वा जातिसम्भारः प्रसन्नायोगः । (३) कपित्थतुला फाणितं पञ्चतौलिकं प्रस्थो मधुन इत्यासवयोगः । पादाधिको ज्येष्ठः पादहीनः कनिष्ठः । (४) चिकित्सकप्रमाणाः प्रत्येकशो विकाराणामरिष्टाः । (५) मेषशृङ्गीत्वक्क्वाथाभिषुतो गुलप्रतीवापः पिप्पलीमरिचसम्भारस्त्रिफलायुक्तो वा मैरेयः । गुलयुक्तानां वा सर्वेषां त्रिफलासम्भारः । (६) मृद्वीकारसो मधु । तस्य स्वदेशे व्याख्यानं कापिशायनं हारहूरकमिति । (७) माषकलनीद्रोणमामं सिद्धं वा त्रिभागाधिकतण्डुलं मोरटादीनां कार्षिकभागयुक्तं किण्वाबन्धः ।


( १ ) एक द्रोण जल, आधा आढक चावल और तीन प्रस्थ सुराबीज (किण्व), इनके मेल से जो शराब बनाई जाती है उसका नाम मेदक है ।

( २ ) बारह आढक चावल की पिट्ठी, पाँच प्रस्थ सुराबीज ( किण्व ) अथवा उसकी जगह पुत्रक ( वृक्ष ) की छाल तथा फलों सहित जाति-संभार मिलाकर प्रसन्ना शराब तैयार की जाती है ।

( ३ ) सौ पल कैंथफल का सार, पाँच सौ पल राब और एक प्रस्थ शहद को एक साथ मिलाकर आसव शराब बनाई जाती है । उक्त वस्तुओं के योग को यदि सवापण कर दिया जाय तो उत्तम आसव और पौना कर दिया जाय तो घटिया आसव कहा जाता है ।

( ४ ) प्रत्येक रोग का अरिष्ट उसी प्रकार तैयार किया जाना चाहिए, जैसा कि रोग के अनुसार वैद्य बतलाये ।

( ५ ) मेढासिंगी की छाल का क्वाथ बनाकर उसमें गुड़, पीपल और मिर्च का चूर्ण या पीपल, मिर्च की जगह त्रिफला का चूर्ण मिलाया जाय तो मैरेय शराब तैयार हो जाती है । गुड़ वाली सभी शराबों में त्रिफला का चूर्ण मिलाना आवश्यक है ।

( ६ ) दाख या अंगूर के रस से जो शराब बनाई जाती है उसी का नाम मधु है । अपने देश में उसके दो नाम है : कापिशायन और हारहूरक ।

( ७ ) एक द्रोण उड़द का कल्क, उसका तीसरा भाग ( १ ⅓ ) चावल और एक-एक कर्ष मोरटा आदि वस्तुएँ एक साथ मिलाकर किण्व सुरा बनती है, उसी को मद्यबीज या सुराबीज भी कहते हैं ।

प्र० ४१ : अ० २५ ] आबकारी विभागों का अध्यक्ष २०३

(१) पाठालोध्रतेजोवत्येलावालुकमधुमधुरसाप्रियङ्गुदारुहरिद्रामरिचपिप्पलीनां च पञ्चकार्षिकः सम्भारयोगो मेदकस्य प्रसन्नायाश्च। मधुकनिर्यूहयुक्ता कटशर्करा वर्णप्रसादनी च।
(२) चोचचित्रकविडङ्गगजपिप्पलीनां च कार्षिकः क्रमुकमधुकमुस्तालोध्राणां द्विकार्षिकश्चासवसम्भारः दशभागश्चैषां बीजबन्धः।
(३) प्रसन्नायोगः श्वेतसुरायाः।
(४) सहकारसुरा रसोत्तरा बीजोत्तरा वा महासुरा सम्भारिकी वा।
(५) तासां मोरटापलाशपत्तूरमेषशृङ्गीकरञ्जक्षीरवृक्षकषायभावितं दग्धकटशर्कराचूर्णं लोध्रचित्रकबिडङ्गपाठामुस्ताकलिङ्गयवदारुहरिद्रन्दीवरशतपुष्पापामार्गसप्तपर्णनिम्बास्फोटकल्कार्धयुक्तमन्तर्नखो मुष्टिःकुम्भीं राजपेयां प्रसादयति। फाणितः पञ्चपलिकश्चात्र रसवृद्धिर्देयः।


( १ ) पाठा, लोध, गजपीपल, इलाइची, इत्र, मुलहटी, दूब, केशर, दारुहल्दी, मिर्च और पीपल, इन सब चीजों का पांच-पांच कर्ष मिला देने से सम्भारयोग तैयार होता है, जो मेदक और प्रसन्ना सुरा में मिलाया जाता है। मुलहटी के काढ़े में रवेदार शक्कर मिलाकर यदि मेदक तथा प्रसन्ना में छोड़ दिया जाय तो उनका रङ्ग निखर आता है।

( २ ) दालचीनी, चीता, बायविडंग और गजपीपल का एक-एक कर्ष, सुपारी, मुलहटी मोथा तथा लोध का दो-दो कर्ष लेकर इन सब को आपस में मिला दिया जाय तो आसव सुरा का मसाला बन जाता है। दालचीनी आदि उक्त वस्तुओं का दसवां भाग बीजबन्ध कहलाता है।

( ३ ) प्रसन्ना नामक सुरा का जो योग बताया गया है वही श्वेतसुरा का भी समझना चाहिए।

( ४ ) सुरा के चार भेद हैं : १. सहकारसुरा ( साधारण शराब में आम का रस या तेल डालकर बनती है ), २. रसोत्तरा ( गुड़ की चाशनी छोड़कर बनाई जाती है ), ३. बीजोत्तरा ( बीजबन्ध द्रव्यों को छोड़कर बनाई जाती है ), इसी को महा-सुरा भी कहते हैं, और ४. संभारिकी ( अधिक मसाले छोड़कर बनाई जाती है )।

( ५ ) इन सभी शराबों की सफाई एवं निखार का तरीका इस प्रकार है : मरोरफली, पलाश, लोहमारक ( पत्तूर औषध ), मेढ़ासिंगी, करञ्जवा तथा क्षीर-वृक्ष ( बरगद, गूलर आदि ) के काढ़े में भावना दिया गया गर्म रवेदार शक्कर का चूरा, उसका आधा लोध, चीता, बायविडङ्ग, पाठा, मोथा कर्लिंगज जौ, दारु-हल्दी, कमल, सौंफ, चिरचिड़ा, सप्तपर्ण, नींव और आखे का फूल, इन सबका पिसा हुआ चूर्ण एकत्र करके यदि उसकी एक मुट्ठी, एक खारी परिमाण शराब में डाल दी जाय तो

२०४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण

(१) कुटुम्बिनः कृत्येषु श्वेतसुरामौषधार्थं वारिष्टमन्यद्वा कतुं लभेरन् । (२) उत्सवसमाजयात्रासु चतुरहः सौरिको देयः । तेष्वननुज्ञातानां प्रवहणान्तं दैवसिकमत्ययं गृह्णीयात् । (३) सुराकिण्वविचयं स्त्रियो बालाश्च कुर्युः । (४) अराजपण्याः पञ्चकं शतं शुल्कं दद्युः । सुरकामेदकारिष्टमधु-फलाम्लशीधूनां च । (५) अह्नश्च विक्रयं व्याजीं ज्ञात्वा मानहिरण्ययोः । तथा वैधरणं कुर्यादुचितं चानुवर्तयेत् ॥ इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सुराध्यक्षो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः, आदितः पञ्चचत्वारिंशः ।

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शराब का रंग इतना निखर उठता है कि वह राजाओं तक को मोहित कर लेती है । स्वाद बढ़ाने के लिये उसमें पांच पल राब अधिक मिला देनी चाहिए ।

( १ ) नगर तथा जनपद के निवासी विवाह आदि उत्सवों में श्वेतसुरा और दवाई के लिए आसव अथवा मेदक आदि सुरा अपने घर में बना सकते हैं ।

( २ ) उत्सवों में, मित्र-बन्धुओं के समाज में और तीर्थयात्रा के अवसर पर, सुरा के अध्यक्ष को चार दिन तक सुरा पीने की इजाजत दे देनी चाहिए । यदि इन उत्सवों में कोई भी व्यक्ति बिना आज्ञा प्राप्त किये शराब पिये पकड़ा जाय तो उत्सव समाप्त होने पर उसको यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( ३ ) सुरा को बनाने एवं उसका मसाला तैयार करने के लिये स्त्रियों और बालकों को नियुक्त करना चाहिए ।

( ४ ) बिना राजाज्ञा के जो व्यक्ति उत्सवों के अवसर पर शराब बेचें वे साधारण शराब, मेदक, अरिष्ट, मधु, ताड़ी और रसोत्तरा आदि सुराओं का पांच प्रतिशत शुल्क अदा करें ।

( ५ ) इस शुल्क अदायगी के अतिरिक्त सुराध्यक्ष दैनिक बिक्री और तोल-माप की उचित जानकारी प्राप्त कर नाप-तौल पर सोलहवाँ हिस्सा और नकद आमदनी पर बीसवां हिस्सा टैक्स वसूल करे, किन्तु उनके साथ सदा ही उचित व्यवहार बर्ताव बनाये रखे ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में सुराध्यक्ष नामक पच्चीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४२सूनाध्यक्षः
अध्याय २६

(१) सूनाध्यक्षः प्रदिष्टभयानामभयवनवासिनां च मृगपशुपक्षि-मत्स्यानां बन्धवधहिंसायामुत्तमं दण्डं कारयेत् । कुटुम्बिनामभयवनपरि-ग्रहेषु मध्यमम् । (२) अप्रवृत्तवधानां मत्स्यपक्षिणां बन्धवधहिंसायां पादोनसप्तविंशति-पणमत्ययं कुर्यात्, मृगपशूनां द्विगुणम् । (३) प्रवृत्तहिंसानामपरिगृहीतानां षड्भागं गृह्णीयात् । मत्स्यपक्षिणां दशभागं वाधिकं, मृगपशूनां शुल्कं वाधिकम् । (४) पक्षिमृगाणां जीवत्षड्भागमभयवनेषु प्रमुञ्चेत् । (५) सामुद्रहस्त्यश्वपुरुषवृषभगर्धभाकृतयो मत्स्याः सारसा नादेयास्त-टाककुल्योद्भूवा वा, क्रौञ्चोत्क्रोशकदात्यूहहंसचक्रवाकजीवञ्जीवकभृङ्ग-


वधस्थान का अध्यक्ष

( १ ) सरकारी जंगलों या ऋषियों के आश्रमों में रहनेवाले ऐसे मृग, गेंडा, भैंसा, मोर तथा मछलियां, जिनको मारने-पकड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया है, कोई भी व्यक्ति उनको मारे, पकड़े या क्षति पहुँचाये तो सून ( वधस्थान ) का अध्यक्ष उसे उत्तम साहस दण्ड दिलवाये । कोई राजपरिवार के व्यक्ति इस आज्ञा का उल्लंघन करें तो उन्हें मध्यम साहस दण्ड देना चाहिए ।

( २ ) पक्षी और मछली जैसे अहिंसक प्राणियों को पकड़ने, प्रहार करने या मारनेवाले व्यक्ति को पौने सत्ताईस पण का दण्ड दिया जाय । जो व्यक्ति मृग और पशुओं का वध करे उसको दुगुना ( साढ़े तिरपन पण ) दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जो हिंसक जानवर हों, जिनका कोई मालिक न हो, जो सरकारी जंगलों या ऋषि-आश्रमों के न हों, उनका जो शिकार करे उससे सूनाध्यक्ष छठा हिस्सा सरकारी टैक्स के रूप में ले ले । इसी प्रकार मछली तथा पक्षियों का दसवां हिस्सा या उससे कुछ अधिक और मृग आदि, पशुओं का भी दशवां हिस्सा या उससे कुछ अधिक राजभाग ले लेना चाहिए ।

( ४ ) अरक्षित जङ्गलों से पकड़े हुए पक्षी और मृग आदि का छठा भाग लेकर उन्हें सरकारी जङ्गलों में छोड़ देना चाहिए ।

( ५ ) समुद्र में पैदा होने वाले; हाथी, घोड़े, पुरुष, बैल, गधा आदि की आकृति वाले, मत्स्य, सारस आदि जलचर प्राणी; तालाबों, झीलों, नदियों एवं नहरों में पैदा होने वाली मछलियाँ, क्रोंच, टिटहरी, जलकौवा, हंस, चक्रवाक, जीवंजीवक,

२०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

राजचकोरमत्तकोकिलमयूरशुकमदनशारिका विहारपक्षिणो मङ्गल्याश्चा- ऽन्येऽपि प्राणिनः पक्षिम्शृगा हिंसाबाधेभ्यो रक्ष्याः । रक्षातिक्रमे पूर्वः साहस- दण्डः ।

(१) मृगपशूनामनस्थि मांसं सद्योहतं विक्रीणीरन् । अस्थिमतः प्रति- पातं दद्युः । तुलाहीने हीनाष्टगुणम् ।

(२) वत्सो वृषो धेनुश्चैषामवध्याः । घ्नतः पञ्चाशतको दण्डः । क्लिष्टघातं घातयतश्च ।

(३) परिसूनमशिरःपादास्थि विगन्धं स्वयम्मृतं च न विक्रीणीरन् । अन्यथा द्वादशपणो दण्डः ।

(४) दुष्टाः पशुमृगव्याला मत्स्याश्चाभयचारिणः । अन्यत्र गुप्तित्स्थानेभ्यो वधबन्धमवाप्नुयुः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सूनाध्यक्षो नाम षड्विंशोऽध्यायः, आदितोः षट्चत्वारिंशः ।

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भृङ्गराज, चकोर, मत्तकोकिल, मोर, तोता, मदन मैना और बुलबुल, तीतर, बटेर तथा मुर्गा आदि क्रीडायोग्य पक्षियों की रक्षा करनी चाहिए । इनको कोई मारे, पकड़े तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( १ ) मृग और पशुओं का हड्डी-रहित ताजा मांस बाजार में बेचना चाहिए । मांस यदि हड्डी सहित हो तो हड्डी के वजन का अधिक मांस दिया जाना चाहिए । यदि मांस तौलने में कपट किया जाय तो तौलने वाले से आठ गुना मांस दण्डरूप में वसूल करना चाहिए, जिसमें आठवां हिस्सा खरीदार का और बाकी सात हिस्से सूनाध्यक्ष के हैं ।

( २ ) पशुओं में मृग, बछड़ा, सांड़ और गाय, इन्हें कभी न मारना चाहिए । जो व्यक्ति उनमें से किसी एक को भी मारे वह पचास पण का दण्डभागी है । दूसरे पशुओं को यातना देकर मारने वाले व्यक्तियों पर भी पचास पण जुर्माना करना चाहिए ।

( ३ ) कसाईखाने से बाहर मारे हुए जानवरों का मांस, शिर, पैर तथा हड्डी-रहित मांस, बदबू वाला मांस, रोग आदि के कारण स्वयं मरे हुए जानवर का मांस बाजारों में न बेचा जाय । जो इस नियम का उल्लंघन करता हुआ पकड़ा जाय उस पर बारह पण जुर्माना कर दिया जाय ।

( ४ ) राज-रक्षित जङ्गलों के हमलावर जानवर, नीलगाय, पशु, मृग और मछली आदि वनचर-जलचर प्राणी यदि सुरक्षित जङ्गलों से बाहर चले जाँय तो उनको मारा या पकड़ा जा सकता है ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४३ | अध्याय २७

गणिकाध्यक्षः

(१) गणिकाध्यक्षो गणिकान्वयामगणिकान्वयां वा रूपयौवनशिल्प-सम्पन्नां सहस्रेण गणिकां कारयेत् । कुटुम्बार्धेन प्रतिगणिकाम् ।

(२) निष्पतिताप्रेतयोर्दुहिता भगिनी वा कुटुम्बं भरेत । तन्माता वा प्रतिगणिकां स्थापयेत् । तासामभावे राजा हरेत् ।

(३) सौभाग्यालङ्कारवृद्ध्या सहस्रेण वारं कनिष्ठं मध्यममुत्तमं वारो-पयेत् । छत्रभृङ्गारव्यजनशिबिकापीठिकारथेषु च विशेषार्थम् ।

(४) सौभाग्यभङ्गे मातृकां कुर्यात् ।


वेश्यालयों का अध्यक्ष

(१) वेश्यालयों की व्यवस्था करने वाले राजकीय अधिकारी को चाहिए कि रूप, यौवन से सम्पन्न एवं गायन-वादन में निपुण स्त्री को, चाहे वह वेश्याकुल से संबद्ध हो या न हो, एक हजार पण देकर गणिका (वेश्या) के कार्य पर नियुक्त करे। इसी प्रकार दूसरी गणिकाओं को नियुक्त किया जाय, और एक सहस्र पण में से आधा उन्हें तथा आधा उनके परिवार को दे दिया जाय।

(२) यदि कोई गणिका दूसरी जगह चली जाय या मर जाय तो उसकी जगह उसकी लड़की या बहिन नियुक्त होकर परिवार का पोषण करे। अथवा उसकी माता उसकी जगह किसी दूसरी गणिका को नियुक्त करे। यदि ऐसा भी सम्भव न हो सके तो उसकी संपत्ति को राजा ले ले।

(३) वेश्याओं की तीन श्रेणियां हैं। १. कनिष्ठ, २. मध्यम और ३. उत्तम। सौन्दर्य तथा सजावट में कमसल कनिष्ठ वेश्या का वेतन एक हजार पण, सौन्दर्य तथा सजावट में उससे अच्छी मध्यम वेश्या का वेतन दो हजार पण, और हर एक बात में चतुर उत्तम वेश्या का वेतन तीन हजार पण होता है। कनिष्ठ वेश्या छत्र तथा इत्रदान लेकर राजा की सेवा करे, मध्यम वेश्या पालकी के साथ रहकर राजा को व्यजन करे, और उत्तम वेश्या राजसिंहासन तथा रथ आदि के निकट रह कर राजा की परिचर्या करे।

(४) जब गणिकाओं का सौन्दर्य जाता रहे और उनकी जवानी ढल जाय, तब उन्हें खाला (मातृका) के स्थान पर नियुक्त कर देना चाहिए।

२०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) निष्क्रयश्चतुर्विंशतिसाहस्रो गणिकायाः। द्वादशसाहस्रो गणिकापुत्रस्य। अष्टवर्षात्प्रभृति राज्ञः कुशीलवकर्म कुर्यात्। (२) गणिकादासी भग्नभोगा कोष्ठागारे महानसे वा कर्म कुर्यात्। अविशन्ती सपादपणमवरुद्धा मासवेतनं दद्यात्। (३) भोगं दायमायं व्ययमायतिं च गणिकाया निबन्धयेत्। अतिव्ययकर्म च वारयेत्। (४) मातृहस्तादन्यत्राभरणन्यासे सपादचतुष्पणो दण्डः। स्वापतेयं विक्रयमाधानं नयन्त्याः सपादपञ्चाशत्पणो दण्डः। (५) चतुर्विंशतिपणो वाक्पारुष्ये। द्विगुणो दण्डपारुष्ये। सपादपञ्चाशत्पणः पणोऽर्धपणश्च कर्णच्छेदने। (६) अकामायाः कुमार्या वा साहसे उत्तमो दण्डः। सकामायाः पूर्वः साहसदण्डः।


(१) जो गणिकाएँ राजवृत्ति से अपने को मुक्त करना चाहें, वे राजा को चौवीस हजार पण देकर स्वतन्त्र हो सकती हैं। यदि वेश्यापुत्र राजसेवा से निवृत्त होना चाहे तो वह बारह पण अदा करे। यदि वह मुक्त होने का मूल्य (निष्क्रय) अदा करने में असमर्थ हो तो आठ वर्ष तक राजा के यहाँ चारण का कार्य कर अपने आप को मुक्त कर सकता है।

(२) वेश्या की दासी जब बूढ़ी हो जाये तो उसे कोष्ठागार या रसोई के कार्य में नियुक्त कर देना चाहिए। यदि वह काम न करना चाहे और किसी पुरुष की स्त्री बन कर रहना चाहे, वह प्रतिमास उस गणिका को सवा पण वेतन दे।

(३) गणिकाध्यक्ष को चाहिए कि वह वेश्याओं के भोगधन (सम्भोग से प्राप्त हुई आमदनी), माता से मिला धन (दायभाग), संभोग के अतिरिक्त आमदनी (आय) और भावी-प्रभाव (आयति) आदि को रजिस्टर में दर्ज करता रहे, और उन्हें अधिक खर्च करने से रोकता रहे।

(४) यदि गणिका अपने आभूषणों को अपनी माता के सिवा किसी दूसरे के हाथ सौंपे तो उसे सवा चार पण दण्ड दिया जाय। यदि वह अपने गहने, कपड़े, बर्तन आदि को बेचे या गिरवी रखे तो उस पर सवा पचास पण का दण्ड किया जाय।

(५) यदि वह किसी के साथ कठोरता का बर्ताव करे तो उसे चौबीस पण का दण्ड दिया जाय। यदि वह हाथ, पैर, लाठी आदि से प्रहार करे तो दुगुना (अड़तालीस पण) दण्ड दिया जाय। यदि वह किसी का कान, हाथ काट ले तो उसे पौने बावन पण का दण्ड दिया जाय।

(६) यदि कोई पुरुष कामनारहित कुमारी पर बलात्कार करे तो उसे उत्तम

प्र० ४३ : अ० २७ ] वेश्यालयों का अध्यक्ष २०९

(१) गणिकामकामां रुन्धतो निष्पातयतो वा व्रणविदारणेन वा रूप- मुपघ्नतः सहस्रदण्डः । स्थानविशेषेण वा दण्डवृद्धिरानिष्क्रयद्विगुणात् पणसहस्रं वा दण्डः । (२) प्राप्ताधिकारां गणिकां घातयतो निष्क्रयात्त्रिगुणो दण्डः । मातृ- कादुहितृकारूपदासीनां घात उत्तमः साहसदण्डः । (३) सर्वत्र । प्रथमेऽपराधे प्रथमः, द्वितीये द्विगुणः, तृतीये त्रिगुणः, चतुर्थे यथाकामी स्यात् । (४) राजाज्ञया पुरुषमनभिगच्छन्ती गणिका शिफासहस्रं लभेत, पञ्चसहस्रं वा दण्डः । (५) भोगं गृहीत्वा द्विषत्या भोगद्विगुणो दण्डः । वसतिभोगापहारे भोगमष्टगुणं दद्यात्, अन्यत्र व्याधिपुरुषदोषेभ्यः ।


साहस दण्ड देना चाहिए । जो इच्छा करने वाली कुमारी के साथ संभोग करे उसे भी प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( १ ) जो पुरुष किसी कामनारहित वेश्या को जबर्दस्ती अपने घर में रोक कर रखे या कोई चोट तथा घाव कर उसके रूप को क्षति पहुँचाये उस पुरुष को एक हजार पण से दण्डित करना चाहिए । शरीर के भिन्न-भिन्न स्थानों को चोट पहुँचाने पर, उन-उन स्थानों की विशेषताओं के अनुसार अधिक दण्ड दिया जा सकता है, यह दण्ड-राशि अड़तालीस हजार पण तक ली जा सकती है ।

( २ ) राजा की सेवा में नियुक्त वेश्याओं को मारने वाले व्यक्ति पर बहत्तर हजार पण दण्ड किया जाय । खाला, वेश्यापुत्री और वेश्या को मारने-पीटने वाले को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) पूर्वोक्त सारी दण्ड-व्यवस्था एक बार अपराध करने वालों के लिए निर्दिष्ट है । यदि कोई अपराधी उसी अपराध को दुहराये तो दुगुना दण्ड, तिहराये तो तिगुना दण्ड, और चौथी बार भी उसी अपराध को करे तो चौगुना दण्ड अथवा सर्वस्वहरण, देश निकाला आदि जो भी उचित हो, उसे दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) राजा की आज्ञा होने पर यदि कोई वेश्या किसी विशिष्ट व्यक्ति के पास जाने से इनकार कर दे तो उस पर एक हजार कोड़े लगवाये जाँय अथवा उस पर पाँच हजार पण जुर्माना किया जाय ।

( ५ ) यदि कोई वेश्या संभोग-शुल्क ( भाग ) लेकर धोखा कर दे तो उस पर संभोग-शुल्क से दुगुना जुर्माना करना चाहिए । यदि पूरी रात का शुल्क लेकर गणिका किस्सा-कहानियों या दूसरे बहानों में ही सारी रात टाल दे तो उसपर शुल्क का आठ गुना दण्ड किया जाना चाहिए, किसी किसी संक्रामक रोग या किसी दोष

१४ कौ०

२१०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) पुरुषं घ्नन्त्याश्चिताप्रतापोऽप्सु प्रवेशनं वा । (२) गणिकाभरणमर्थं भोगं वापहरतोऽष्टगुणो दण्डः। गणिका भोगमार्यतिं पुरुषं च निवेदयेत् । (३) एतेन नटनर्तकगायकवादकवाग्जीवनकुशीलवप्लवकसौभिकचा-रणस्त्रीव्यवहारिणां स्त्रियो गूढाजीवाश्च व्याख्याताः। (४) तेषां तूर्यमागन्तुकं पञ्चपणं प्रेक्षावेतनं दद्यात् । (५) रूपाजीवा भोगद्वयगुणं मासं दद्युः । (६) गीतवाद्यपाठ्यनृत्तनाट्याक्षरचित्रवीणावेणुमृदङ्गपरचितज्ञानग-न्धमाल्यव्यूहनसम्पादनसंवाहनवैशिककलाज्ञानानि गणिका दासी रङ्गोप-जीविनीश्च ग्राहयतो राजमण्डलादाजीवं कुर्यात् ।

के कारण गणिका यदि संभोग कराने को तैयार न हो तो उसे अपराधिनी न समझा जाय ।

(१) यदि कोई गणिका संभोग-शुल्क लेकर किसी पुरुष को मरवा डाले तो गणिका को उस पुरुष के साथ जीवित ही चिता में जला देना चाहिए, अथवा उसके गले में पत्थर बाँधकर उसको पानी में डुबो देना चाहिए ।

(२) यदि कोई पुरुष किसी गणिका के वस्त्र, आभरण या संभोग से प्राप्त धन को चुरा ले तो उसे उस धन का आठ गुना दण्ड दिया जाय । गणिका को चाहिए कि वह अपने संभोग, अपनी आमदनी और अपने साथ रहनेवाले पुरुष की सूचना गणि-काध्यक्ष को बराबर देती रहे ।

(३) यही दण्ड-विधान और यही व्यवस्था उन लोगों के लिये भी है जो नट, नर्तक, गायक, वादक, कथावाचक, कुशीलव, प्लवक, जादूगर, चारण हैं तथा जो कोई भी स्त्रियों द्वारा जीविका-निर्वाह करते हैं, और वे स्त्रियाँ जो छिपकर व्यभिचार करती हैं ।

(४) बाहर से आई हुई नट-मण्डली प्रत्येक खेल पर पाँच पण राजकर के रूप में अदा करे ।

(५) रूप से जीविका कमाने वाली वेश्या अपनी मासिक आमदनी के हिसाब से दो दिन की कमाई कर रूप में राजा को दे ।

(६) गाना, बजाना, नाचना, नाटक करना, लिखना, चित्रकारी करना, वीणावेणु-मृदंग बजाना, दूसरे के मन को पहिचानना, सुगन्धित द्रव्यों को बनाना, माला गूंथना, पैर दबाना, शरीर सजाना आदि कार्यों में निपुण लोगों की और गणिका, दासी तथा नर्तकियों को कलाओं का ज्ञान देने वाले आचार्यों की, आजी-विका का प्रबन्ध नगरों तथा गाँवों से आने वाली आय द्वारा किया जाना चाहिए ।

प्र० ४३ : अ० २७ ] वेश्यालयों का अध्यक्ष २११

(१) गणिकापुत्रान् रंगोपजीविनश्च मुख्यान् निष्पादयेयुः सर्वतालावचराणां च ।
(२) संज्ञाभाषान्तरज्ञाश्च स्त्रियस्तेषामनात्मसु ।
चारघातप्रमादार्थं प्रयोज्या बन्धुवाहनाः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गणिकाध्यक्षो नाम सप्तविंशोऽध्यायः,
आदितः सप्तचत्वारिंशः ।

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( १ ) वेश्यापुत्रों, नाचने-गाने वालों और इसी प्रकार के अन्य लोगों को वेश्याओं का शिक्षक नियुक्त करना चाहिए ।

( २ ) नट-नर्तक आदि पुरुषों को धन का लालच देकर राजा अपने वश में कर ले और तब, अनेक भाषायें बोलने वाली तथा अनेक प्रकार के वेश बनाने वाली उनकी स्त्रियों को शत्रु के गुप्तचरों का वध करने अथवा उनको विषयवासनाओं में फँसाने के लिये नियुक्त कर दे ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गणिकाध्यक्ष नामक सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४४## नावध्यक्षः ##
अध्याय २८

(१) नावध्यक्षः समुद्रसंयाननदीमुखतरप्रचारान् देवसरोविसरोनदी-तरांश्च स्थानीयादिष्ववेक्षेत । (२) तद्वेलाकूलग्रामाः क्लृप्तं दद्युः । (३) मत्स्यबन्धका नौकाभाटकं षड्भागं दद्युः । पत्तनानुवृत्तं शुल्क-भागं वणिजो दद्युः । यात्रावेतनं राजनौभिः सम्पन्तन्तः शंखमुक्ताग्राहिणो नौभाटकं दद्युः, स्वनौभिर्वा तरेयुः । (४) अध्यक्षश्चैषां खन्यध्यक्षेण व्याख्यातः । (५) पत्तनाध्यक्षनिबन्धं पण्यपत्तनचारित्रं नावध्यक्षः पालयेत् । (६) मूढवाताहतां तां पितेवानुगृह्णीयात् । उदकप्राप्तं पण्यशुल्कमर्ध-शुल्कं वा कुर्यात् ।


नौकाध्यक्ष

(१) नौका-परिवहन के अधिकारी (नौकाध्यक्ष) को चाहिये कि वह समुद्र-तट की समीपवर्ती नदी को, समुद्र के नौका-मार्गों को, झीलों, तालाबों और गाँव के छोटे-छोटे जलीय मार्गों को भली-भांति देखता रहे ।

(२) समुद्र, झील तथा नदियों के किनारों पर बसे हुए ग्रामीणों को चाहिए कि वे राजा को नियत कर दें ।

(३) मछुओं को चाहिए कि वे अपनी आमदनी का छठा हिस्सा कररूप में राजा को दें । समुद्रतट के व्यापारी, बन्दरगाहों के नियमानुसार माल के मूल्य का पाचवां या छठा भाग टैक्स दें । सरकारी नौकाओं द्वारा माल लाने-लेजाने का भाड़ा वे अलग से दें । इसी प्रकार शंख और मोती लेजाने वाले व्यापारी नाव का भाड़ा अलग से दें, अथवा सरकारी नौकाओं का उपयोग न कर वे निजी नौकाओं से पार उतरें ।

(४) मछली, मोती और शंख आदि सामुद्रिक वस्तुओं के सम्बन्ध में खानों के अध्यक्ष की ही भांति, नाव का अध्यक्ष भी प्रबन्ध करे या उसी व्यवस्था को लागू करे ।

(५) नगराध्यक्ष द्वारा नियत किये गये बन्दरगाह-सम्बन्धी नियमों को नावध्यक्ष भली-भांति पालन करें ।

(६) दिशाओं का अन्दाज न रह जाने के कारण या तूफान में फँस जाने के कारण डूबती हुई नौका को अध्यक्ष, पिता के समान अनुग्रह करके बचाये । पानी

प्र० ४४ : अ० २८ ] नौकाध्यक्ष २१३

(१) यथानिर्दिष्टाश्चैताः पण्यपत्तनयात्राकालेषु प्रेषयेत् । संयान्तीर्नावः क्षेत्रानुगताः शुल्कं याचेत । हिंस्रिका निर्घातयेद्, अमित्रविषयातिगाः पण्य-पत्तनचारित्रोपघातिकाश्च । (२) शासकनियामकदात्ररश्मिग्राहकोत्सेचकाधिष्ठिताश्च महानावो हैमन्तग्रीष्मतार्यासु महानदीषु प्रयोजयेत् । क्षुद्रिकाः क्षुद्रिकासु वर्षा-स्त्राविणीषु । (३) बद्धतीर्थाश्चैताः कार्याः राजद्विष्टकारिणां तरणभयात् । अकाले-ऽतीर्थे च तरतः पूर्वः साहसदण्डः । (४) अकालेऽतीर्थे चानिसृष्टतारिणः पादोनसप्तविंशतिपणस्तरात्ययः । (५) कैवर्तकाष्ठतृणभारपुष्पफलवाटषण्डगोपालकानामनत्ययः सम्भा-व्यदूतानुपातिनां च सेनाभाण्डप्रचारप्रयोगाणां च । स्वतरणैस्तरताम् । बीजभक्तद्रव्योपस्करांश्चानूपग्रामाणां तारयताम् ।


लग जाने के कारण नुकसान हुए माल का टैक्स माफ कर देना चाहिए या नुकसान को देखते हुए आधा ही टैक्स लेना चाहिए ।

( १ ) निःशुल्क या आधे शुल्क वाली नौकाओं को बन्दरगाहों की ओर यात्रा करने के समय में भेज दिया जाय या छोड़ दिया जाय । चलती हुई नौकाएँ जब चुंगी पर पहुँच जायँ तब उनकी चुंगी वसूल की जाय । चोर-डाकुओं की नौकाओं को नष्ट कर दिया जाय । जो नौकाएं शत्रुदेश की ओर जाती हों या जो व्यापार-नियमों का उल्लंघन करती हों, उन्हें भी तहस-नहस कर दिया जाय ।

( २ ) नाव का कप्तान ( शासक ), नावचालक ( नियामक ), लंगड़ डालने वाला ( दात्रग्राहक ), रस्सी या पतवार पकड़ने वाला ( रश्मिग्राहक ), और नौका में भरे हुए पानी को उलीचने वाला ( उत्सेचक ), इन पाँच कर्मचारियों के रहने पर ही बड़ी-बड़ी नौकाओं को गर्मी तथा सर्दी में समान रूप से बहने वाली बड़ी-बड़ी नदियों में चलाने की आज्ञा देनी चाहिए । बरसाती नदियों में चलाने के लिये अलग नौकाएँ होनी चाहिए ।

( ३ ) इन बड़ी नौकाओं को ठहरने के लिये नियत बन्दरगाह होने चाहिए और उन पर पूरी निगरानी रखी जानी चाहिए, जिससे किसी शत्रु राजा के गुप्तचर उनमें प्रवेश न कर सकें ।

( ४ ) कोई भी नाव वाला यदि अनिश्चित समय में ही अनियमित मार्ग से घाट के आर-पार जाये तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त ठीक समय पर और नियत घाट से बिना आज्ञा नाव पार करने वाले व्यक्ति पर पौने सत्ताईस पण दण्ड निर्धारित किया जाय ।

( ५ ) धीवर, लकड़हारे, घसियारे, माली, कुंजड़े, खेतों के रखवाले, चोर की डर से पीछे जाने वाले, राजदूत के पीछे शेष कार्य को पूरा करने के लिए जाने वाली

२१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) ब्राह्मणप्रव्रजितबालवृद्धव्याधितशासनहरगर्भिण्यो नावध्यक्षमुद्राभिस्तरेयुः । (२) कृतप्रवेशाः पारविषयिकाः सार्थप्रमाणाः विशेयुः । (३) परस्य भार्या कन्यां वित्तं वापहरन्तं शङ्कितमाविग्नमुद्भाण्डीकृतं महाभाण्डेन मूर्ध्नि भारेणावच्छादयन्तं सद्योगृहीतलिङ्गिनमलिङ्गिनं वा प्रव्रजितमलक्ष्यव्याधितं भयविकारिणं गूढसारभाण्डशासनशस्त्राग्नियोगं विषहस्तं दीर्घपथिकममुद्रं चोपग्राहयेत् । (४) क्षुद्रपशुर्मनुष्यश्च सभारो माषकं दद्यात् । शिरोभारः कायभारो गवाश्वं च द्वौ । उष्ट्रमहिषं चतुरः । पञ्च लघूयानम् । षड् गोलिङ्गम् । सप्त शकटम् । पण्यभारः पादम् ।

सेना, सैनिक सामग्री और गुप्तपुरुषों को बिना समय एवं बिना आज्ञा ही नदी पार करने पर कोई दण्ड न दिया जाना चाहिए । अपनी नाव से नदी पार करने वाले व्यक्तियों पर भी कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए । बीज, कर्मचारियों की भोजन-सामग्री, फल, फूल, शाक और मसाला ( उपस्कर ) आदि सामान को पार ले जाने वाले व्यक्ति भी दण्ड से मुक्त समझे जाँय ।

( १ ) ब्राह्मण, संन्यासी, बालक, बीमार, राजदूत या हलकारा और गर्भवती स्त्री को नौकाध्यक्ष की मुहर देखकर ही, बिना भाड़ा के पार कर देना चाहिए ।

( २ ) जिन परदेशियों को पासपोर्ट मिल गया हो अथवा पासपोर्ट प्राप्त व्यापारियों के साथ जिन-जिन व्यक्तियों को आने की अनुमति मिल गई हो, वे ही देश में प्रवेश कर सकते हैं ।

( ३ ) किसी की स्त्री, कन्या या किसी का धन चुरा कर भागने वाले व्यक्ति को आगे बताये हुए लक्षणों से पहिचान कर फौरन गिरफ्तार करवा देना चाहिए । वे लक्षण इस प्रकार हैं : यदि वह चौकन्ना-सा नजर आये, ताकत से अधिक बोझा उठाये हो, सिर पर इस प्रकार घास-फूस फैलाये हो कि शक्ल न दिखाई दे, नकली संन्यासी का वेष बनाये हो, संन्यासी वेश बदल कर सादा वेष धारण कर ले, बीमारी का कोई चिह्न न होने पर भी अपने को बीमार जैसा लगाये, डर से मुख की रौनक उतरी हुई हो, बहुमूल्य वस्तुओं को छिपाये हो, गुप्त कागजातों को रखे हो, हथियार छिपाकर रखे हो, जहर आदि को रखे हो, अग्नियोग को छिपाये हो, दूर का सफर करता हो और पासपोर्ट प्राप्त किए बिना ही यात्रा करता हो ।

( ४ ) भेड़, बकरी आदि छोटे जानवरों का और जिस मनुष्य के पास हाथ में उठाने भर का बोझा हो, एक माषक भाड़ा दे । जिस पुरुष के पास सिर अथवा पीठ से उठाने योग्य बोझा हो और गाय, घोड़ा आदि पशुओं का, दो माषक भाड़ा दिया जाय । ऊँट और भैंस का चार माषक भाड़ा दिया जाना चाहिए । इसी प्रकार

प्र० ४४ : अ० २८ ] नौकाध्यक्ष २१५

(१) तेन भाण्डभारो व्याख्यातः । द्विगुणो महानदीषु तरः । (२) कॢप्तमानूपग्रामा भक्तवेतनं दद्युः । (३) प्रत्यन्तेषु तराः शुल्कमातिवाहिकं वर्तनीं च गृह्णीयुः । निर्गच्छतश्चासमुद्रस्य भाण्डं हरेयुः । अतिभारेणावेलायामतीर्थे तरतश्च । (४) पुरुषोपकरणहीनायामसंस्कृतायां वा नावि विपन्नायां नावध्यक्षो नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेत् । (५) सप्ताहवृत्तामाषाढीं कार्त्तिकीं चान्तरा तरः । कार्मिकप्रत्ययं दद्यान्नित्यं चाह्निकमावहेत् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे नावध्यक्षो नाम अष्टाविंशोऽध्यायः, आदितोऽष्टपञ्चाशः । — : ० : —


छोटी गाड़ी का पाँच माषक, मझौली गाड़ी छह माषक, और बड़ी बैलगाड़ी का सात माषक भाड़ा देना चाहिए । बीस तुला बोझ का ३/४ पण भाड़ा निर्धारित है ।

( १ ) इसी हिसाब से भैंस या ऊँट आदि पर ढोये जाने वाले बोझा का भाड़ा समझ लेना चाहिए । बड़ी-बड़ी नदियों की उतराई इससे दुगुनी होनी चाहिए ।

( २ ) नदियों के किनारे बसे हुए लोग सरकारी टैक्स के अतिरिक्त कुछ निर्धारित भत्ता या वेतन भी मल्लाहों को दें ।

( ३ ) पार उतारने वाले राजकीय मल्लाह सीमाप्रदेशों में व्यापारियों से मार्ग का टैक्स और अन्तपाल को दिया जाने वाला शुल्क भी अदा करें । जो व्यापारी बिना मुहर के माल को निकालते पकड़ा जाय उसका सारा माल जब्त कर लिया जाय । जो व्यक्ति, अनिमियत बोझा असमय और बिना घाट के ही पार उतारने की कोशिश करे उसका भी सारा माल जब्त कर लिया जाय ।

( ४ ) मल्लाहों की असावधानी, अन्य आवश्यक साधनों से हीन और बिना मरम्मत की सरकारी नौका यदि डूब जाय तो यात्रियों का सारा हर्जाना नौकाध्यक्ष पूरा करे ।

( ५ ) आषाढ़ी पूर्णिमा से लेकर कार्त्तिकी पूर्णिमा के एक सप्ताह बाद तक की अवधि के बीच बरसाती नदियों में नौका-कर लिया जाना चाहिए ( किन्तु सदा बहने वाली नदियों में तो हमेशा ही टैक्स लेना चाहिए ) । प्रत्येक मल्लाह को चाहिए कि वह प्रतिदिन के कार्य का विवरण और दैनिक भाग नौकाध्यक्ष के सुपुर्द कर दे ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में नौकाध्यक्ष नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४५
अध्याय २९

गोऽध्यक्षः


(१) गोऽध्यक्षो वेतनोपग्राहिकं करप्रतिकरं भग्नॊत्सृष्टकं भागानुप्रविष्टकं व्रजपर्यग्रं नष्टं विनष्टं क्षीरघृतसञ्जातं चोपलभेत । (२) गोपालकपिण्डारकदोमन्थकलुब्धकाः शतं शतं धेनूनां हिरण्यभृताः पालयेयुः । क्षीरघृतभृता हि वत्सानुपहन्युरिति वेतनोपग्राहिकम् । (३) जरद्गुधेनुगर्भिणीपष्ठौहीवत्सतरीणां समविभागं रूपशतमेकः पालयेत् । घृतस्याष्टौ वारकान् पणिकं पुच्छं अङ्कचर्म च वार्षिकं दद्यादिति करप्रतिकरः । (४) व्याधितान्त्यङ्गान्यन्यदोहीदुर्दोहापुत्रघ्नीनां च समविभागं रूपशतं पालयन्तस्तज्जातिकं भागं दद्युरिति भग्नॊत्सृष्टकम् ।


पशुविभाग का अध्यक्ष

( १ ) गो, भैंस आदि पालतू पशुओं की देख-रेख में नियुक्त अधिकारी (गोऽध्यक्ष) को चाहिए कि वह १. वेतनीपग्राहिक, २. करप्रतिकर, ३. भग्नॊत्सृष्टक ४. भागानुप्रविष्टक ५. व्रजपर्यग्र, ६. नष्ट, ७. विनष्ट और ८. क्षीरघृतसञ्जात, इन आठों के सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त करे ।

( २ ) गायों को पालने वाले ( गोपालक ), भैंसों को पालने वाले (पिण्डारक), गाय, भैंस को दुहने वाले ( दोहक ), दही को मथने वाले ( मंथक ) और हिंसक पशुओं से गाय, भैंस की रक्षा करने वाले ( लुब्धक ), ये पाँच-पाँच व्यक्ति मिलकर सौ-सौ गाय, भैंसों का पालन करें । वेतन के रूप में इनको या तो नकद रुपया दिया जाय अथवा अन्न-वस्त्र दिये जाँय; दूध, दही आदि में इनका कोई हिस्सा नहीं होना चाहिए, क्योंकि दूध, दही में इनका हिस्सा होने के कारण ये लोग बछड़ों को मार देते हैं । गाय, भैंस आदि की रक्षा के इस उपाय का नाम वेतनोपग्राहिक है ।

( ३ ) बूढी, दूध देने वाली, गाभिन, पठोरी और बछिया, इन पाँच प्रकार की गायों को बीस-बीस के क्रम से सौ बनाकर उन्हें किसी चरवाहे को ठेके पर दिया जाय । इसके बदले में चरवाहा गौओं के मालिक को आठ वारक घी, एक-एक पशु के पीछे एक-एक पण, और सरकारी मुहर से युक्त मरे हुए पशु का एक अदद चमड़ा प्रतिवर्ष दिया करे; रक्षा के इस उपाय को करप्रतिकर कहते हैं ।

( ४ ) बीमार, कानी, लंगड़ी, एकहथी ( अनन्यदोही ), मुश्किल से दुही जाने