कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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के आरंभिक अंश में हमें चार बातों की जानकारी होती है। पहली बात तो यह कि कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना की, दूसरी बात यह कि कामन्दक के नीति-ग्रंथ का आधारभूत वही अर्थशास्त्र था, तीसरी बात यह कि कौटिल्य ने नन्द-वंश का उन्मूलन कर उसकी जगह मौर्य-वंश को प्रतिष्ठित किया और चौथी बात यह कि कौटिल्य का असली नाम विष्णुगुप्त था। नीतिसार का सारांश इस प्रकार है :
नीतिसार उसी विद्वान् के ग्रन्थ का आधार है, जिसके वज्र ने पर्वत की तरह अविचल, अडिग नन्द-वंश को उखाड़ फेंका था, जिसने चन्द्रगुप्त को पृथ्वी का स्वामित्व दिया और जिसने अर्थशास्त्र रूपी महार्णव से नीतिशास्त्र रूपी नवनीत का दोहन किया, ऐसे उस महामति विष्णुगुप्त नामक विद्वान् को नमस्कार है।
नीतिशास्त्रामृतं धीमानर्थशास्त्र महोदधे ।
समुद्दध्रे नमस्तस्मै विष्णुगुप्ताय वेधसे ॥
—नीतिसार
विष्णुगुप्तस्तु कौटिल्यश्चाणक्यो द्रामिलो गुलः ।
वात्स्यायनो मल्लनागः पाक्षिलस्वामिनावपि ॥
वात्स्यायनो मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः ।
द्रामिलः पाक्षिलः स्वामी विष्णुगुप्तो गुलश्च स ।
—हेमचन्द्र
वात्स्यायनस्तु कौटिल्यो विष्णुगुप्तो वराणकः ।
द्रामिल पाक्षिल स्वामी मल्लनागो वलोऽपि च ॥
—यादवप्रकाश-वैजयन्ती
कात्यायनो वररुचिर्मेयजिच्य पुनर्वसुः ।
कात्यायनस्तुकौटिल्यो विष्णुगुप्तो वराणकः ॥
द्रामिलपाक्षिल स्वामी मल्लनागो गुलोऽपि च ।
—भोजराज नाममल्लिका
नीतिसार के अतिरिक्त संस्कृत के कतिपय कोष-ग्रन्थों से भी आचार्य विष्णुगुप्त के पर्यायवाची नामों का पता लगता है, जिनमें कौटिल्य और चाणक्य के अतिरिक्त अनेक अप्रचलित नाम देखने को मिलते हैं। ये नाम प्राचीन और मध्यकालीन सभी ग्रन्थों में मिलते हैं। विभिन्न कोष-ग्रन्थों की इस नामावली की उपलब्धि से आचार्य कौटिल्य के वास्तविक नाम और उनके लिए प्रयुक्त होने वाले दूसरे नामों का स्वतः ही निराकरण हो जाता है।
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अर्थशास्त्र का प्रणेता
कामन्दकीय नीतिसार के पूर्वोक्त प्रमाणों से सुनिश्चित है कि अर्थशास्त्र का निर्माण आचार्य कौटिल्य ने किया। कुछ दिन पूर्व विदेशी विद्वानों के एक वर्ग ने यहाँ तक सिद्ध करने की चेष्टा की थी कि अर्थशास्त्र एक जाली ग्रन्थ है और जिसके नाम को उसके साथ जोड़ा गया है, वह कौटिल्य भी एक कल्पित नाम है। विदेशी विद्वानों की इन भ्रांत धारणाओं को व्यर्थ सिद्ध करने वाली नयी खोजों का सविस्तार उल्लेख आगे किया जायेगा। यहाँ तो इतना ही बता देना यथेष्ट है कि अर्थशास्त्र का प्रणेता विष्णुगुप्त कौटिल्य ही था।
अर्थशास्त्र में समाप्ति-सूचक एक श्लोक आता है, जिसका निष्कर्ष है कि इस ग्रन्थ की रचना उसने की, जिसने की शस्त्र, शास्त्र और नन्द राजा द्वारा शासित पृथ्वी का एक साथ उद्धार किया—
येन शास्त्रं च शस्त्रं च नन्दराजगता च भूः ।
अमर्षेणोद्धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदं कृतम् ॥
—अर्थशास्त्र, पृ० ७७१
अर्थशास्त्र के इस श्लोक में वर्णित नन्दराज द्वारा शासित राजसत्ता को विनष्ट कर उसकी जगह मौर्य साम्राज्य की प्रतिष्ठा करने वाले अद्भुत राजनीति-विशारद आचार्य कौटिल्य का निर्देश पुराण और नीति ग्रन्थों के अनुसार पहिले किया जा चुका है। इससे प्रमाणित है कि अर्थशास्त्र का निर्माता कौटिल्य ही था। उक्त श्लोक में कौटिल्य की अहंवादिता का आभास मिलता है, जो कि सर्वथा युक्त है। ऐसा विदित होता है कि आचार्य कौटिल्य अर्थशास्त्र के निष्णात पंडित तो थे ही, साथ ही दूसरे शास्त्रों और शस्त्र-विद्याओं में भी कुशल थे।
अर्थशास्त्र और कौटिल्य के सम्बन्ध में कुछ दिन पूर्व जो विवाद चल पड़ा था, आधुनिकतम अनुसन्धानों ने उसको सर्वथा व्यर्थ सिद्ध कर अन्तिम रूप से यह प्रमाणित कर दिया है कि अर्थशास्त्र का निर्माता आचार्य विष्णुगुप्त कौटिल्य ही था।
अर्थशास्त्र का उद्धार
अर्थशास्त्र और उसके निर्माता कौटिल्य के सम्बन्ध में जितना विवाद रहा, उससे कहीं अधिक भ्रमपूर्ण धारणाएँ उसके स्थिति-काल के सम्बन्ध में प्रचारित हुईं। आचार्य कौटिल्य की जीवन-सम्बन्धी जानकारी और उनके अद्भुत ग्रन्थ अर्थशास्त्र की छान-बीन करने में विदेशी विद्वानों का वर्षों तक
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घोर विवाद चलता रहा। इस तर्क-वितर्क और वाद-विवाद की परंपरा में जिन देशी-विदेशी विद्वानों का भरपूर हाथ रहा उनमें पं० शामशास्त्री, महामहोपाध्याय पं० गणपतिशास्त्री, श्री काशीप्रसाद जायसवाल, श्री नरेन्द्रनाथ लाहा, श्री राधाकुमुद मुकर्जी, श्री देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर, श्री रमेश मजूमदार, श्री उपेन्द्र घोषाल, श्री प्राणनाथ विद्यालंकार, श्री विनयकुमार सरकार और श्री जयचन्द विद्यालंकार प्रमुख हैं। इसी प्रकार विदेशी विद्वानों में श्री हिलेब्रांट, श्री हर्टेल, याकोबी साहब, श्री विंसेंट स्मिथ, श्री औटो स्टाइन, डा० जोली, डा० विंटरनित्स और डा० कीथ के नाम उल्लेखनीय हैं।
कौटिल्य अर्थशास्त्र के उद्धारक के रूप में पं० शामशास्त्री का नाम अर्थशास्त्र की महानता के साथ अमर हो चुका है। श्री शास्त्री जी ने मैसूर राज्य से प्राप्त कर इस महाग्रन्थ के कुछ अंशों को पहले-पहल १९०५ ई० में इण्डियन एण्टीक्वेरी में सानुवाद प्रकाशित किया और बाद में १९०९ ई० में सम्पूर्ण ग्रन्थ को बड़ी शुद्धता के साथ प्रकाशित भी किया। पं० शामशास्त्री ने ग्रन्थ के विस्तृत उपोद्घात में बड़े पाण्डित्यपूर्ण प्रमाणों के आधार पर अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया। पहली बात तो उन्होंने यह बतायी कि आचार्य कौटिल्य चन्द्रगुप्त मौर्य के आमात्य थे, दूसरी बात उन्होंने यह दिखायी कि अर्थशास्त्र कौटिल्य की ही कृति है और तीसरा निराकरण उन्होंने यह भी किया है कि अर्थशास्त्र का यही प्रामाणिक मूलपाठ है। पं० शामशास्त्री ने अर्थशास्त्र के जिस अनुवाद को प्रकाशित किया था, ट्रावनकोर राज्य से प्रकाशित कामन्दकीय नीतिसार की टीका में उद्धृत अर्थशास्त्र के अंशों से उनका मिलान ठीक नहीं बैठता है।
अर्थशास्त्र विषयक विवाद
पं० शामशास्त्री की दो बातों का, कि अर्थशास्त्र कौटिल्य की ही कृति है और वह अपने मूलरूप में उपलब्ध है, समर्थन हिलब्रांट, हर्टेल, याकोबी ( १९१२ ई० ) और स्मिथ ने भी किया। श्री विंसेंट स्मिथ ने अपने प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया के तीसरे संस्करण ( १९१४ ई० ) में शास्त्री जी की उक्त स्थापनाओं को मान्यता देकर उन पर अपने समर्थन की अन्तिम मुहर लगायी।
स्मिथ साहब के उक्त इतिहास-ग्रन्थ के लगभग आठ वर्ष बाद विदेशी विद्वानों के एक वर्ग ने कौटिल्य, उनके अर्थशास्त्र और उसकी प्रामाणिकता एवं रचना-काल के बारे में अविश्वास की नयी मान्यताओं को स्थापित किया। उनके मतानुसार कौटिल्य, ग्रन्थकार का वास्तविक नाम न होकर
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एक कल्पित नाम है एवं अर्थशास्त्र तीसरी शती का रचा हुआ एक जाली ग्रन्थ है। ओटोस्टाइन महोदय ने मेगस्थनीज ऐण्ड कौटिल्य नामक अपनी तुलनात्मक पुस्तक में मेगस्थनीज और कौटिल्य के सम्बन्ध में पारस्परिक विरोध दिखाने की चेष्टा की है। ओटोस्टाइन के बाद डा० जोली ने इस क्षेत्र को संभाला और उन्होंने जिन नयी सूझों की उद्भावना की वे आज भी हमारे सामने हैं।
१९२३ ई० में डा० जोली की, पंजाबी संस्कृत सीरीज, लाहौर से एक पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसका नाम है—अर्थशास्त्र ऑफ कौटिल्य। अपनी इस पुस्तक की प्रस्तावना में डाक्टर साहब ने यह सिद्ध किया कि अर्थशास्त्र तीसरी सदी में लिखा गया एक जाली ग्रन्थ है। उसके रचयिता कौटिल्य को डा० जोली ने एक कल्पित राज-मन्त्री कहा है।
डा० जोली के उक्त मत को अतर्क्य कहकर डा० विंटरनित्स ने अपने ग्रन्थ ए हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर (१९२७ ई०) में जोली साहब के मत की ही पुष्टि की। इसके पश्चात् डा० कीथ ने १९२८ ई० में सर आशुतोष स्मारक ग्रन्थ के प्रथम भाग में एक लेख लिखकर भरपूर शब्दों में यह सिद्ध किया कि अर्थशास्त्र की रचना ३०० ई० से पहले की कदापि नहीं हो सकती है। इससे भी आगे बढ़कर उक्त लेख में एक नयी बात उन्होंने यह भी जोड़ दी कि सम्पूर्ण अर्थशास्त्र एक अप्रामाणिक रचना है।
डा० जोली के भ्रमपूर्ण प्रचार और प्रस्तावना में उद्धृत उनके तर्कों को डा० जायसवाल ने खंडित किया और प्रामाणिक आधारों को साक्षी रखकर स्पष्ट किया कि अर्थशास्त्र जैसा संस्कृत साहित्य का महान् ग्रन्थ जाली नहीं है। उसका रचयिता कौटिल्य एक कल्पित व्यक्ति न होकर सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य का महामात्य था। अर्थशास्त्र उसी की कृति है, जो प्रामाणिक रूप में संप्रति उपलब्ध है और जिसकी रचना ४०० ई० पू० में हुई (विस्तृत विवरण के लिए डा० जायसवाल-हिन्दू-राजतन्त्र परिशिष्ट 'ग' 'पहिले खण्ड के अतिरिक्त नोट' पृ० ३२७-३६७) ।
इसी प्रकार श्री जयचंद विद्यालंकार ने डा० कीथ द्वारा अपने निबन्ध में उपस्थित किये गये तर्कों एवं उनकी युक्तियों की विस्तृत आलोचना करके दूसरे इतिहासकारों की इस राय से कि कौटिल्य चन्द्रगुप्त मौर्य (३२५-२७३ ई० पूर्व) के राजमन्त्री थे और अर्थशास्त्र उन्हीं की कृति है, जो अपने प्रामाणिक रूप में उपलब्ध है, अपना अभिमत कौटिल्य अर्थशास्त्र के ३०० ई० पू० के लगभग रचे जाने के समर्थन में पेश किया (चन्द्रगुप्त विद्यालंकार : भारतीय इतिहास की रूपरेखा २, पृ० ५४७, ६७३-७००) ।
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अर्थशास्त्र का व्यापक प्रभाव
संस्कृत-साहित्य के कतिपय ग्रन्थकारों की कृतियों पर अर्थशास्त्र का पर्याप्त प्रभाव है, जिससे उसकी सार्वभौम मान्यता का सहज में ही पता चलता है। ईसवी पूर्व प्रथम शताब्दी में वर्तमान संस्कृत के सुपरिचित महाकवि कालिदास से लेकर याज्ञवल्क्य, वात्स्यायन, विष्णुशर्मा, विशाखदत्त तथा बाण प्रभृति महाकवियों, स्मृतिकारों, गद्यकारों और नाटककारों की सातवीं शताब्दी ई० तक की रची गयी कृतियाँ अर्थशास्त्र से प्रभावित हैं। वैसे भी स्वतन्त्र रूप से अर्थशास्त्र का दाय लेकर अनेक तद्विषयक कृतियाँ संस्कृत में निर्मित हुईं, किन्तु दूसरे विषय के जिन ग्रन्थों में कौटिल्य अर्थशास्त्र का महत्त्व एवं उसकी शैली का अनुकरण है, उनकी संख्या भी पर्याप्त है।
महाकवि कालिदास (१०० ई० पू०) के रघुवंश, कुमारसंभव और शाकुन्तल अत्यधिक रूप से अर्थशास्त्र से प्रभावित हैं। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य-स्मृति (१५० ई०) भी अर्थशास्त्र के प्रभाव से अछूती नहीं। आचार्य वात्स्यायन (३०० ई०) ने तो अपने कामसूत्र का एकमात्र आधार कौटिल्य का अर्थशास्त्र स्वीकार किया है और इसी हेतु इन दोनों का प्रकरण-विभाजन भी एक जैसा है। (मिलाइये, अर्थशास्त्र २।१, १०।७, १७।५५, १०।७३, ९।१, ७।१५, १।२, ८।३ क्रमशः रघुवंश १५।९, कुमारसंभव ६।७३, रघुवंश १७।४९, १२।५५, १७।५६, १७।७६, १७।८९, १८।५० तथा शाकुन्तल २।५ कामसूत्रमिदं प्रणीतम्। तस्यायं प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः; कामसूत्र १।१)।
संस्कृत के जन्तु-विषयक कथाओं का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ पञ्चतन्त्र संप्रति अपने मूल में उपलब्ध नहीं है, जिसकी रचना ३०० ई० पू० मानी जाती है और अपने विषय का जिसे दुनिया के जन्तु-कथा-काव्यों में पहिला स्थान प्राप्त है, तथापि उसके विभिन्न छायारूपों में विष्णु शर्मा कृत पञ्चतन्त्र ही प्रधान माना जाता है, जिनकी रचना कथमपि ३०० ई० के बाद की नहीं है। इस कथा-ग्रन्थ में चाणक्य के अर्थशास्त्र को मनुस्मृति और कामसूत्र की भाँति अपने विषय का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ कह कर स्मरण किया गया है। (ततो धर्मशास्त्राणि मन्वादीनि, अर्थशास्त्राणि चाणक्यादीनि, कामशास्त्राणि वात्स्यायनादीनि।) पञ्चतन्त्र के प्रथम अध्याय में एक दूसरे स्थल पर अर्थशास्त्र को 'नयशास्त्र' नाम से भी अभिहित किया गया है।
संस्कृत-साहित्य का एक नाटक मुद्राराक्षस है, जिसके रचयिता विशाख-दत्त ६०० ई० के लगभग हुए। यह नाटक एक प्रकार से आचार्य कौटिल्य
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की आंशिक जीवनी है। मुद्राराक्षस से महामति कौटिल्य के अतुल व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त किया जा सकता है।
विशाखदत्त के समकालीन कथाकार एवं काव्यशास्त्री आचार्य दण्डी ने कौटिलीय दण्डनीति के अध्ययन पर जोर दिया ही है, वरन् उस दण्डनीति के स्वरूप के सम्बन्ध में भी एक ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया है। दण्डी का कथन है कि 'आचार्य विष्णुगुप्त निर्मित उस दण्डनीति का अध्ययन करो, जिसको उन्होंने मौर्य ( चन्द्रगुप्त ) के लिये छः हजार श्लोकों में संक्षिप्त किया था। जो भी इस उत्तम ग्रन्थ को पढ़ेगा उसको उत्तम फल मिलेगा।' (अधीष्व तावद्दण्डनीतिम्। तदिदमिदानीमाचार्यविष्णुगुप्तेन मौर्यार्थे षड्भिः श्लोकसहस्रैः संक्षिप्ता। सैवेयमधीत्य सम्यगनुष्ठीयमानयथोक्तकार्यक्षमेति )।
कादम्बरी जैसे वृहत्कथा काव्य के निर्माता बाणभट्ट ( ७०० ई० ) ने कौटिल्य शास्त्र का उल्लेख तो किया है, किन्तु मालूम नहीं किस दृष्टि से उन्होंने उसको निकृष्ट शास्त्र की संज्ञा दी है। बाण का कथन है कि 'उन लोगों के लिये क्या कहा जाय जो अति नृशंस कार्य को उचित बताने वाले कौटिल्य के शास्त्र को प्रमाण मानते हैं'। ( किं वा तेषां सांप्रतं येषामतिनृशंसप्रायोपदेशे कौटिल्यशास्त्रप्रमाणम् ।
अर्थशास्त्र और उसकी परंपरा
बृहद् हिन्दू जाति के राजनीतिशास्त्र-विषयक साहित्य का निर्माण लगभग ६५० ई० पूर्व में हो चुका था। यह कल्पसूत्रों की रचना का समय था। कौटिलीय अर्थशास्त्र के सैकड़ों शब्दों में एवं उसकी लेखन-शैली पर कल्पसूत्रों की शब्दावली एवं उनकी रचना-शैली का प्रभाव स्पष्ट लक्षित होता है। ( प्रो० प्राणनाथ विद्यालंकार, कौटिल्य अर्थशास्त्र की प्रस्तावना )।
इससे प्रतीत होता है कि अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थों का निर्माण कल्पसूत्रों ( ७०० ई० पू० ) के बाद और विशेष रूप से बौधायन-धर्मसूत्र ( ५०० ई० पू० ) के बाद होना आरम्भ हो गया था। बौद्ध-धर्म के प्राण-सर्वस्व जातक-ग्रन्थों का रचनाकाल तथागत बुद्ध से पूर्व अर्थात् लगभग ६०० ई० पू० बैठता है। इन जातकों के अध्ययन से स्पष्ट है कि उस समय तक अर्थशास्त्र को एक प्रमुख विज्ञान के रूप में परिगणित किया जाने लगा था। ( फासबोल जातक, जिल्द २, पृष्ठ ३०, ७४ )।
सूत्रकाल की समाप्ति ( २०० ई० पू० ) के लगभग अर्थशास्त्र एक प्रामाणिक शास्त्र के रूप में समाहित हो चुका था। सूत्र-ग्रन्थों में अर्थशास्त्र-विषयक चर्चाओं को देख कर उसकी मान्यता का सहसा अनुमान लगाया जा सकता है
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( आपस्तंब-धर्मसूत्र २, ५, १०, १४ ) । गृह्यसूत्र में तो आदित्य नामक एक अर्थशास्त्रविद् आचार्य का उल्लेख तक मिलता है ( आश्वलायन गृह्यसूत्र ३, १३, १६ )। महाभारत में हिन्दू राजनीतिशास्त्र का सिलसिलेवार इतिहास मिलता है और इस परंपरा के कतिपय प्राचीन आचार्यों की सूची भी उसमें उल्लिखित है ( महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय ५८, ५९ )।
अर्थशास्त्र की प्राचीन परम्परा का अध्ययन करते समय इस सम्बन्ध में एक बात जानने योग्य यह है कि आरम्भ में दण्डनीति और शासन-सम्बन्धी कार्यों का उल्लेख भी अर्थशास्त्र के लिए ही होता था, किन्तु कौटिल्य के बाद अर्थशास्त्र से केवल जनपद-सम्बन्धी कार्यों का ही विधान होने लगा था । अर्थ की व्याख्या करते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि 'अर्थ का अभिप्राय है मनुष्यों की बस्ती, अर्थात् वह प्रदेश जिसमें मनुष्य बसते हों । अर्थशास्त्र उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें राज्य की प्राप्ति और उसके पालन के उपायों का वर्णन हो ।' ( अर्थशास्त्र, पृ० ७६५ ) । आचार्य उषण के राजनीतिशास्त्र-विषयक ग्रन्थ को दण्डनीतिशास्त्र ( विशाखदत्त : मुद्राराक्षस १।७ ) और आचार्य बृहस्पति के ग्रन्थ को अर्थशास्त्र ( वात्स्यायन : कामसूत्र १ ) इसी लिए कहा जाने लगा था । इसी परम्परा के अनुसार महाभारतकार ने भी प्रजापति के ग्रन्थ को राजशास्त्र कहकर स्मरण किया है (महाभारत, शांतिपर्व, अ०५९) । इसी प्रकार कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जो ग्रन्थकार ऐतिहासिक व्यक्ति माने गये हैं, वे शांतिपर्व में देवी-विभूति तथा पौराणिक रूप में स्मरण किये गये हैं ( जायसवाल : हिन्दू-राजतन्त्र १, पृ० ६ का फुटनोट ) ।
समस्त पूर्ववर्ती आचार्य-परंपरा के सिद्धान्तों और उनकी वे कृतियाँ, जो कि सम्प्रति अनुपलब्ध हैं, उन सब का एक साथ निष्कर्ष हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पाते हैं। कौटिल्य ने अपने पूर्ववर्ती लगभग अठारह-उन्नीस अर्थ-शास्त्रविद् आचार्यों का उल्लेख किया है; जिनसे विचार ग्रहण कर उन्होंने अपने अद्भुत ग्रन्थ का निर्माण किया। इस प्राचीन आचार्य-परंपरा के परिचय से ऐसा प्रतीत होता है कि अर्थशास्त्र का निर्माण बहुत पहले से होने लगा था और विभिन्न ग्रन्थों में आदर के साथ उल्लेख किया जाने लगा था, जिसकी व्यापक व्याख्या हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पाते हैं।
ई० पूर्व ४०० के अनन्तर और ४०० के बीच में रचे गये धर्मशास्त्र-विषयक ग्रन्थों में सर्वत्र ही हमें अर्थशास्त्र की विस्तृत चर्चाएँ और प्राचीन अर्थशास्त्रियों के सिद्धान्तों का उल्लेख देखने को मिलता है। किन्तु ये सभी चर्चाएँ बिखरी हालत में उपलब्ध होती हैं। आचार्य कामन्दक ने ४०० ई० के लगभग एक
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पद्यमय ग्रन्थ नीतिसार लिखा, जो कि आचार्य शुक्र कृत शुक्रनीतिसार का संस्करण मात्र था और आधुनिक विद्वानों ने कामन्दकीय नीतिसार के उन उद्धरणों को, जिनको कि मध्ययुग के बाद वाले स्मृतिशास्त्र के टीकाकारों ने उद्धृत किया है, मिलान करने पर पता लगाया कि कामन्दक के नीतिसार का १७वीं शताब्दी के लगभग पुनः संस्करण हुआ।
ईसा की छठीं और सातवीं शताब्दी में विरचित अग्नि और मत्स्य आदि पुराणों में भी यद्यपि अर्थशास्त्र सम्बन्धी चर्चाएँ और तत्सम्बन्धी कुछ आचार्यों के नाम उपलब्ध होते हैं, तथापि वे विशेष महत्त्व के नहीं हैं। नवम-दशम शताब्दी के दो ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। पहिले अर्थशास्त्र विषयक ग्रन्थ बृहस्पतिसूत्र को डा० एफ० डब्ल्यू० थामस ने खोज कर सम्पादित एवं प्रकाशित किया। यह ग्रन्थ अपने मूलरूप में बहुत प्राचीन था, किन्तु जिस रूप में आज वह उपलब्ध है, वह नवम-दशम शताब्दी का पुनः संस्करण है। इसी प्रकार दूसरा ग्रन्थ दसवीं शताब्दी में विरचित सूत्रात्मक शैली का नीतिवाक्यामृत है, जिसके रचयिता का नाम सोमदेव था। यह सोमदेव कथासरित्सागर का रचयिता ११वीं शताब्दी के काश्मीर देशीय सोमदेव से पृथक् व्यक्ति था।
तदनन्तर १०वीं शताब्दी से लेकर १४वीं शताब्दी तक की कोई कृति उपलब्ध नहीं होती। अर्थशास्त्र विषयक ग्रंथों की निर्माण-परम्परा लगभग १८वीं शताब्दी तक पहुँचती है। अर्थशास्त्र का यह अन्तिम समय नितान्त अवनति का रहा है। १४वीं से १८वीं शताब्दी तक के ग्रन्थकारों में चन्द्रशेखर, मित्रमिश्र और नीलकंठ प्रमुख हैं, जिनके ग्रन्थों का नाम क्रमशः राजनीति रत्नाकर (जायसवाल, बिहार, उड़ीसा, रिसर्च सोसाइटी), वीरमित्रोदय (चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी से प्रकाशित) और राजनीतिमयूख (स्व० बा० गोविन्ददास, वाराणसी के पुस्तकालय में सुरक्षित) है। चन्द्रशेखर के ग्रंथ में दो अन्य अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थों के नाम उद्धृत हैं, जिनमें से एक ग्रन्थ राजनीतिकल्पतरु के रचयिता का नाम लक्ष्मीधर और दूसरे विलुप्त नामक ग्रन्थकार का राजनीतिकाकामधेनु है।
इस प्रकार आचार्य कौटिल्य, उनका अर्थशास्त्र और उस परम्परा का आकण्ठ अध्ययन करने के पश्चात् हमें विदित होता है कि संस्कृत-साहित्य की अभिवृद्धि में अर्थशास्त्र का महत्त्वपूर्ण योग रहा है और आचार्य कौटिल्य काल्पनिक व्यक्ति न होकर एक युगविधायक महारथी के रूप में संस्कृत भाषा की महानताओं के साथ अजर एवं अमर हो चुके हैं।
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प्रस्तुत संस्करण
'कौटिलीय अर्थशास्त्र' के साथ डॉ० शाम शास्त्री और महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री का नाम अमर है। डॉ० शाम शास्त्री का अंग्रेजी अनुवाद और म० म० गणपति शास्त्री का संस्कृतानुवाद इस विषय की सर्वांगीण, शोधपूर्ण और प्रामाणिक कृतियां हैं।
'कौटिलीय अर्थशास्त्र' का प्रस्तुत संस्करण म० म० गणपति शास्त्री के संस्करण पर आधारित है। स्व० शास्त्री जी ने 'अर्थशास्त्र' का गम्भीर अध्ययन करने के उपरान्त उसके मूल भाग को विषय और प्रसङ्ग के अनुसार अलग-अलग वर्गों, वाक्यों और वाक्यखण्डों में विभाजित किया है। उनकी यह स्वतन्त्र देन है।
प्रत्येक सूत्र के आगे संख्या डालने की अवैज्ञानिक पद्धति स्व० शास्त्री जी के संस्करण में नहीं अपनायी गयी है। बल्कि उन्होंने मूल पाठ के प्रत्येक पैराग्राफ को इस ढङ्ग से संयोजित किया है कि अर्थसङ्गति की दृष्टि से वह भग्नतया विच्छिन्न न होने पावे। डॉ० शाम शास्त्री का दृष्टिकोण भी यही रहा है।
प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद के प्रत्येक पैराग्राफ पर संख्या का उल्लेख इसलिये किया है कि नीचे उसका अनुवाद पढ़ने में सुगमता हो। अधिकरण, प्रकरण और अध्याय का जो क्रम सभी संस्करणों में है वही इस संस्करण में भी देखने को मिलेगा।
पुस्तक के अन्त में चाणक्य-सूत्रों को भी जोड़ दिया गया है। आचार्य कौटिल्य के नाम पर चाणक्य सूत्रों को जोड़ना ऐतिहासिक दृष्टि से यद्यपि असङ्गत है, किन्तु अध्येताओं की सुविधा के लिये उनका समावेश करना भी आवश्यक समझा गया है।
डॉ० शाम शास्त्री और म० म० गणपति शास्त्री के संस्करणों के अतिरिक्त उदयवीर शास्त्री के हिन्दी अनुवाद से भी मैंने सहायता ली है। इस हेतु इन सभी महानुभावों का मैं विशेष रूप से आभारी हूँ। श्रद्धेय श्री रामचंद्र झा के सत्परामर्शों के लिये मैं अनुगृहीत हूँ।
—वाचस्पति गैरोला
( १ ) विनयाधिकारिक : पहला अधिकरण
( ३७ )
विषय-सूची
( १ ) विनयाधिकारिक : पहला अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्रकरण और अधिकरण का निरूपण | १ |
| १ : विद्या-विषयक विचार : आन्वीक्षकी | ८ |
| २ : विद्या-विषयक विचार : त्रयी | १० |
| ३ : विद्या-विषयक विचार : वार्ता और दण्डनीति | १२ |
| ४ : वृद्धजनों की संगति | १४ |
| ५ : काम-क्रोधादि छह शत्रुओं का परित्याग | १६ |
| ६ : साधु स्वभाव राजा की जीवनचर्या | १८ |
| ७ : अमात्यों की नियुक्ति | २० |
| ८ : मन्त्री और पुरोहित की नियुक्ति | २३ |
| ९ : गुप्त उपायों से अमात्यों के आचरणों की परीक्षा | २५ |
| १० : गुप्तचरों की नियुक्ति ( स्थायी गुप्तचर ) | २९ |
| ११ : गुप्तचरों की नियुक्ति ( भ्रमणशील गुप्तचर ) | ३२ |
| १२ : अपने देश में कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा | ३७ |
| १३ : शत्रु-देश के कृत्य-अकृत्य पक्ष को मिलाना | ४० |
| १४ : मन्त्राधिकार | ४३ |
| १५ : सन्देश देकर राजदूतों को शत्रुदेश में भेजना | ४९ |
| १६ : राजपुत्रों से राजा की रक्षा | ५३ |
| १७ : नजरबन्द राजकुमार और राजा का पारस्परिक व्यवहार | ५८ |
| १८ : राजा के कार्य-व्यापार | ६१ |
| १९ : राज-भवन का निर्माण और राजा के कर्तव्य | ६५ |
| २० : आत्मरक्षा का प्रबन्ध | ६९ |
( २ ) अध्यक्षप्रचार : दूसरा अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १ : जनपदों की स्थापना | ७७ |
| २ : ऊसर भूमि को उपयोगी बनाने का विधान | ८२ |
| ३ : दुर्गों का निर्माण | ८५ |
| ४ : दुर्ग से सम्बन्धित राजभवनों तथा नगर के प्रमुख स्थानों का निर्माण | ९१ |
| ५ : कोष-गृह का निर्माण और कोषाध्यक्ष के कर्तव्य | ९५ |
( ७६ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ६ : समाहर्त्ता का कर-संग्रह कार्य | ९९ |
| ७ : अक्षपटल में गाणनिक के कार्यों का निरूपण | १०३ |
| ८ : अध्यक्षों द्वारा गबन किये गये धन की पुनः प्राप्ति | १०९ |
| ९ : राजकीय उच्चाधिकारियों के चालचलन की परीक्षा | ११४ |
| १० : शासनाधिकार | ११६ |
| ११ : कोष में रखने योग्य रत्नों की परीक्षा | १२५ |
| १२ : खान एवं खनिज पदार्थों की पहिचान और उनके विक्रय की व्यवस्था | १३६ |
| १३ : अक्षशाला में सुवर्णाध्यक्ष के कार्य | १४३ |
| १४ : राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य | १५० |
| १५ : कोष्ठागार का अध्यक्ष | १५७ |
| १६ : पण्य का अध्यक्ष | १६४ |
| १७ : कुप्य का अध्यक्ष | १६७ |
| १८ : आयुधागार का अध्यक्ष | १७० |
| १९ : तौल और माप का अध्यक्ष | १७४ |
| २० : देश और काल का मान | १८० |
| २१ : शुल्क का अध्यक्ष | १८४ |
| २२ : कर-वसूली के नियम | १८९ |
| २३ : सूत-व्यवसाय का अध्यक्ष | १९२ |
| २४ : कृषि-विभाग का अध्यक्ष | १९५ |
| २५ : आबकारी विभाग का अध्यक्ष | २०० |
| २६ : वध-स्थान का अध्यक्ष | २०५ |
| २७ : वेश्यालयों का अध्यक्ष | २०७ |
| २८ : नौकाध्यक्ष | २१२ |
| २९ : पशुविभाग का अध्यक्ष | २१६ |
| ३० : अश्वविभाग का अध्यक्ष | २२२ |
| ३१ : गजशाला का अध्यक्ष | २२६ |
| ३२ : हाथियों की श्रेणियां तथा उनके कार्य | २३२ |
| ३३ : रथसेना तथा पैदल-सेना के अध्यक्षों और सेनापति के कार्यों का निरूपण | २३६ |
| ३४ : मुद्राविभाग और चारागाह विभाग के अध्यक्ष | २३९ |
| ३५ : समाहर्त्ता और गुप्तचरों के कार्यों का निरूपण | २४१ |
| ३६ : नागरिक के कार्य | २४५ |
( ३ ) धर्मस्थीय : तीसरा अधिकरण
( ७७ )
( ३ ) धर्मस्थीय : तीसरा अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १ : शर्तनामों का लेखन-प्रकार और तत्सम्बन्धी विवादों का निर्णय | २५५ |
| २ : विवाह-सम्बन्ध : (१) धर्म-विवाह : स्त्री का धन : स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार : पुरुष को पुनर्विवाह का अधिकार | २६१ |
| ३ : विवाह-सम्बन्ध : ( २ ) स्त्री की परवरिश : कठोर स्त्री के साथ व्यवहार : पति-पत्नी का द्वेष : पति-पत्नी का अतिचार : अतिचार पर प्रतिषेध | २६६ |
| ४ : विवाह-सम्बन्ध : (३) परिणीता का निष्पतन : पर पुरुष का अनुसरण : पुनर्विवाह की स्थिति | २७० |
| ५ : दाय-विभाग : उत्तराधिकार का सामान्य नियम | २७५ |
| ६ : दाय-विभाग : पैतृक क्रम से विशेषाधिकार | २७९ |
| ७ : दाय-विभाग : पुत्रक्रम से उत्तराधिकार | २८२ |
| ८ : वास्तुक : गृह-निर्माण | २८६ |
| ९ : वास्तुक : मकान बेचना : सीमा-विवाद : खेतों की सीमाएँ : मिश्रित विवाद : कर की छूट | २८९ |
| १० : वास्तुक : रास्तों का रोकना : गावों का बन्दोबस्त : चारागाहों का प्रबन्ध : सामूहिक कार्यों में शामिल न होने का मुआवजा | २९४ |
| ११ : ऋण लेना | २९९ |
| १२ : धरोहरसम्बन्धी नियम | ३०५ |
| १३ : दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम | ३११ |
| १४ : मजदूरी के नियम और साझीदारी का हिस्सा | ३१६ |
| १५ : क्रय-विक्रय का बयाना | ३२० |
| १६ : दान किये हुये धन को न देना; अस्वामि-विक्रय, स्व-स्वामि-सम्बन्ध | ३२३ |
| १७ : साहस | ३२८ |
| १८ : वाक्पारुष्य | ३३१ |
| १९ : दण्डपारुष्य | ३३४ |
| २० : द्यूत-समाह्वय और प्रकीर्णक | ३३९ |
( ४ ) कण्टक-शोधन : चौथा अधिकरण
१ : शिल्पियों से प्रजा की रक्षा | ३४५ २ : व्यापारियों से प्रजा की रक्षा | ३५२ ३ : दैवी आपत्तियों से प्रजा की रक्षा के उपाय | ३५६
( ५ ) योग-वृत्त : पाँचवाँ अधिकरण
( ७८ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ४ : गुप्त षड्यन्त्रकारियों से प्रजा की रक्षा के उपाय | ३६१ |
| ५ : सिद्धवेषधारी गुप्तचरों द्वारा दुष्टों का दमन | ३६४ |
| ६ : शंकित पुरुषों की पहिचान, चोरी के माल की पहिचान और चोर की पहिचान | ३६७ |
| ७ : आशुमृतक की परीक्षा | ३७२ |
| ८ : जाँच और यातना के द्वारा चोरी को अंगीकार करना | ३७६ |
| ९ : सरकारी विभागों और छोटे-बड़े कर्मचारियों की निगरानी | ३८० |
| १० : एकांग वध अथवा उसकी जगह द्रव्य-दण्ड | ३८६ |
| ११ : शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड | ३८८ |
| १२ : कुँवारी कन्या से संभोग करने का दण्ड | ३६३ |
| १३ : अतिचार का दण्ड | ३९८ |
( ५ ) योग-वृत्त : पाँचवाँ अधिकरण
| १ : राजद्रोही उच्चाधिकारियों के सम्बन्ध में दण्ड-व्यवस्था | ४०५ |
| २ : कोष का अधिकाधिक संग्रह | ४१२ |
| ३ : भृत्यों का भरण-पोषण | ४२० |
| ४ : राजकर्मचारियों का राजा के प्रति व्यवहार | ४२५ |
| ५ : व्यवस्था का यथोचित पालन | ४२८ |
| ६ : विपत्तिकाल में राज-पुत्र का अभिषेक और एकछत्र राज्य की प्रतिष्ठा | ४३२ |
( ६ ) मण्डल-योनि : छठा अधिकरण
| १ : प्रकृतियों के गुण | ४४१ |
| २ : शान्ति और उद्योग | ४४५ |
( ७ ) षाड्गुण्य : सातवाँ अधिकरण
| १ : छह गुणों का उद्देश्य और क्षय, स्थान तथा वृद्धि का निश्चय | ४५३ |
| २ : बलवान् का आश्रय | ४५८ |
| ३ : सम, हीन तथा बलवान् राजाओं के चरित्र और हीन राजा के साथ संबन्ध | ४६१ |
| ४ : विग्रह करके आसन और यान का अवलंबन | ४६६ |
| ५ : यान संबन्धी विचार, प्रकृतिमण्डल के क्षय, लोभ तथा विराग के हेतु और सहयोगी समवायिकों का हिस्सा | ४७० |
| ६ : सामूहिक प्रयाण और देश, काल तथा कार्य के अनुसार संधियाँ | ४७७ |
( ८ ) व्यसनाधिकारिक : आठवाँ अधिकरण
( ७९ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ७ : द्वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम | ४८४ |
| ८ : यातव्य सम्बन्धी व्यवहार और अनुग्रह करने वाले मित्रों के प्रति कर्तव्य | ४८९ |
| ९ : मित्र-सन्धि और हिरण्य-सन्धि ( सन्धिविचार १ ) | ४९३ |
| १० : भूमि-सन्धि ( सन्धि-विचार २ ) | ५०० |
| ११ : अनवसित सन्धि ( सन्धि-विचार ३ ) | ५०५ |
| १२ : कर्म-सन्धि ( सन्धि-विचार ४ ) | ५११ |
| १३ : पाष्णिग्राह-चिन्ता | ५१६ |
| १४ : दुर्बल विजिगीषु के लिये शक्तिसंचय के साधन | ५२२ |
| १५ : बलवान् शत्रु और विजित शत्रु के साथ व्यवहार | ५२७ |
| १६ : अधीनस्थ राजाओं के प्रति विजेता विजिगीषु का व्यवहार | ५३२ |
| १७ : सन्धि-कर्म और सन्धि-मोक्ष | ५३७ |
| १८ : मध्यम, उदासीन और मण्डलचरित | ५४४ |
( ८ ) व्यसनाधिकारिक : आठवाँ अधिकरण
| १ : प्रकृतियों के व्यसन और उनका प्रतीकार | ५५५ |
| २ : राजा और राज्य के व्यसनों पर विचार | ५६२ |
| ३ : सामान्य पुरुषों के व्यसन | ५६६ |
| ४ : पीडनवर्ग, स्तम्भवर्ग और कोषसङ्गवर्ग | ५७३ |
| ५ : सेना-व्यसन और मित्र-व्यसन | ५८१ |
( ९ ) अभियास्यत्कर्म : नौवाँ अधिकरण
| १ : शक्ति, देश, काल, बल-अबल का ज्ञान और आक्रमण का समय | ५८९ |
| २ : सैन्य-संग्रह का समय, सैन्य-संगठन और शत्रुसेना से मुकाबला | ५९५ |
| ३ : पश्चात्कोपचिन्ता और बाह्याभ्यन्तर प्रकृति के कोप का प्रतीकार | ६०२ |
| ४ : क्षय, व्यय और लाभ का विचार | ६०६ |
| ५ : बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ | ६१३ |
| ६ : राजद्रोही और शत्रुजन्य आपत्तियाँ | ६१७ |
| ७ : अर्थ, अनर्थ तथा संशय सम्बन्धी आपत्तियाँ और उनके प्रतीकार के उपायों से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ | ६२५ |
( १० ) साङ्ग्रामिक : दसवाँ अधिकरण
| १ : छावनी का निर्माण | ६३७ |
| २ : छावनी-प्रयाण और आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा | ६४० |
| ३ : कूट-युद्ध के भेद : अपनी सेना का प्रोत्साहन और अपनी तथा पराई सेना का प्रयोग | ६४४ |
( ११ ) वृत्तसंघ : ग्यारहवाँ अधिकरण
( ८० )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ४ : युद्धयोग्य भूमि और पदाति, अश्व, रथ तथा हाथी आदि सेनाओं के कार्य | ६५१ |
| ५ : पक्ष, कक्ष तथा उरस्य आदि विशेष व्यूहों का सेना के परिणाम के अनुसार व्यूह विभाग, सार तथा फल्गु वलों का विभाग और चतुरङ्ग सेना का युद्ध | ६५५ |
| ६ : प्रकृतिव्यूह, विकृतिव्यूह और प्रतिव्यूह की रचना | ६६२ |
( ११ ) वृत्तसंघ : ग्यारहवाँ अधिकरण
१ : भेदक प्रयोग और उपांशुदण्ड | ६६९
( १२ ) आबलीयस : बारहवाँ अधिकरण
१ : दूतकर्म | ६७९ २ : मन्त्र-युद्ध | ६८३ ३ : सेनापतियों का वध और राजमण्डल की सहायता | ६८८ ४ : शस्त्र, अग्नि तथा रसों का गूढ़ प्रयोग और वीवध, आसार तथा प्रसार का नाश | ६९२ ५ : कपट उपायों या दण्ड-प्रयोगों द्वारा और आक्रमण के द्वारा विजयोपलब्धि | ६९६
( १३ ) दुर्गलम्भोपाय : तेरहवाँ अधिकरण
१ : उपजाप | ७०५ २ : कपट उपायों द्वारा राजा को लुभाना | ७०६ ३ : गुप्तचरों का शत्रु-देश में निवास | ७१५ ४ : शत्रु के दुर्ग को घेरकर अपने अधिकार में करना | ७२२ ५ : विजित देश में शान्ति की स्थापना | ७३१
( १४ ) औपनिषदिक : चौदहवाँ अधिकरण
१ : शत्रु-वध के प्रयोग | ७३७ २ : प्रलम्भन योग में अद्भुत उत्पादन | ७४४ ३ : प्रलम्भन योग में औषधि तथा मन्त्र का प्रयोग | ७५१ ४ : शत्रु द्वारा किये गये घातक प्रयोगों का प्रतीकार | ७६०
( १५ ) तन्त्रयुक्ति : पन्द्रहवाँ अधिकरण
१ : अर्थशास्त्र की युक्तियाँ | ७६५ चाणक्य-सूत्र | ७७५ पारिभाषिक शब्दकोश | ८०१ शब्द-सूची | ८१७
— : ० : —
॥ श्रीः ॥
कौटिलीयम्
अर्थशास्त्रम्
ॐ
नमः शुक्रबृहस्पतिभ्याम् । (१) पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्था- पितानि प्रायशस्तानि संहृत्यैकमिदमर्थशास्त्रं कृतम् । (२) तस्यायं प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः ।
कौटिल्य का
अर्थशास्त्र
ॐ
शुक्राचार्य और बृहस्पति के लिए नमस्कार है ।
( १ ) पृथिवी की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए पुरातन आचार्यों ने जितने भी अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थों का निर्माण किया उन सबका सार-संकलन कर प्रस्तुत अर्थशास्त्र की रचना की गई है ।
( २ ) इस अर्थशास्त्र के प्रकरणों और अधिकरणों का निरूपण इस प्रकार है :
पहला अधिकरण : विनयाधिकारिक-( राजवृत्ति )-निरूपण
२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
(१) विद्यासमुद्देशः ॥ १ ॥ वृद्धसंयोगः ॥ २ ॥ इन्द्रियजयः ॥ ३ ॥ अमात्योत्पत्तिः ॥ ४ ॥ मन्त्रिपुरोहितोत्पत्तिः ॥ ५ ॥ उपधाभिः शौचाशौचज्ञानममात्यानाम् ॥ ६ ॥ गूढपुरुषोत्पत्तिः ॥ ७ ॥ गूढपुरुषप्रणिधिः ॥ ८ ॥ स्वविषये कृत्याकृत्यपक्षरक्षणम् ॥ ९ ॥ परविषये कृत्याकृत्यपक्षोपग्रहः ॥ १० ॥ मन्त्राधिकारः ॥ ११ ॥ दूतप्रणिधिः ॥ १२ ॥ राजपुत्ररक्षणम् ॥ १३ ॥ अवरुद्धवृत्तम् ॥ १४ ॥ अवरुद्धे च वृत्तिः ॥ १५ ॥ राजप्रणिधिः ॥ १६ ॥ निशान्तप्रणिधिः ॥१७॥ आत्मरक्षितकम् ॥१८॥
इति विनयाधिकारिकं प्रथममधिकरणम् ।
(२) जनपदविनिवेशः ॥ १ ॥ भूमिच्छिद्रविधानम् ॥ २ ॥ दुर्गविधानम् ॥ ३ ॥ दुर्गविनिवेशः ॥ ४ ॥ संनिधातृनिचयकर्म ॥ ५ ॥ समाहर्तृसमुदयप्रस्थापनम् ॥ ६ ॥ अक्षपटलेगाणनिक्याधिकारः ॥ ७ ॥ समुदयस्य युक्तापहृतस्य प्रत्यानयनम् ॥ ८ ॥ उपयुक्तपरीक्षा ॥ ९ ॥ शासनाधिकारः ॥ १० ॥ कोशप्रवेश्यरत्नपरीक्षा ॥ ११ ॥ आकरकर्मान्तप्रवर्तनम् ॥१२॥ अक्षशालायां सुवर्णाध्यक्षः ॥ १३ ॥ विशिखायां सौवर्णिकप्रचारः ॥ १४ ॥ कोष्ठागाराध्यक्षः ॥ १५ ॥ पण्याध्यक्षः ॥ १६ ॥ कुप्याध्यक्षः ॥ १७ ॥ आयुधागाराध्यक्षः ॥ १८ ॥ तुलामानपौतवम् ॥ १९ ॥ देशकालमानम्
पहला अधिकरण : विनयाधिकारिक-( राजवृत्ति )-निरूपण
( १ ) १. विद्या-विषयक विचार; २. वृद्धजनों की संगति; ३. इन्द्रियजय; ४. अमात्यों की नियुक्ति; ५. मन्त्री और पुरोहित की नियुक्ति; ६. गुप्त उपायों से अमात्यों के आचरणों की परीक्षा; ७. गुप्तचरों का निरूपण; ८. गुप्तचरों की कार्यों पर नियुक्ति; ६. अपने देश में कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा; १०. शत्रुदेश में कृत्य-अकृत्य पक्ष को मिलाना; ११. मंत्राधिकार; १२. दूतों की कार्यों पर नियुक्ति; १३. राजपुत्र की रक्षा; १४. नजरबन्द राजकुमार का व्यवहार; १५. नजरबन्द ( राजकुमार ) के प्रति राजा का व्यवहार; १६. राजा के कार्य-व्यापार; १७. राजभवन का निर्माण; १८. आत्मरक्षा का प्रबन्ध ।
दूसरा अधिकरण : अध्यक्षों का निरूपण
( २ ) १. जनपदों की स्थापना; २. भूमि को उपयोगी बनाने का विधान; ३. दुर्गों का निर्माण; ४. दुर्गविनिवेश; ५. सन्निधाता के कार्य; ६. समाहर्त्ता का कर-संग्रह कार्य; ७. अक्षपटल में गाणनिक के कार्य; ८. गबन किए गये राजधन को पुनः प्राप्त करना; ६. उपयुक्त परीक्षा; १०. शासनाधिकार; ११. कोष में रखने योग्य रत्नों की परीक्षा; १२. खान के कार्यों का संचालन; १३. अक्षशाला में स्वर्णाध्यक्ष का कार्य; १४. विशिखा में सौवर्णिक का व्यापार; १५. कोष्ठागार का अध्यक्ष; १६. पण्य का अध्यक्ष; १७. कुप्य का अध्यक्ष; १८. आयुधागार का अध्यक्ष;
तीसरा अधिकरण : न्याय का निरूपण
प्रकरणाधिकरण-विभाजन ३
॥ २० ॥ शुल्काध्यक्षः ॥ २१ ॥ सूत्राध्यक्षः ॥ २२ ॥ सीताध्यक्षः ॥२३॥ सुराध्यक्षः ॥ २४ ॥ सूनाध्यक्षः ॥ २५ ॥ गणिकाध्यक्षः ॥ २६ ॥ नावध्यक्षः ॥ २७ ॥ गोऽध्यक्षः ॥ २८ ॥ अश्वाध्यक्षः ॥ २९ ॥ हस्त्यध्यक्षः ॥ ३० ॥ रथाध्यक्षः ॥ ३१ ॥ पत्त्यध्यक्षः ॥३२॥ सेनापतिप्रचारः ॥३३॥ मुद्राध्यक्षः ॥ ३४ ॥ विवीताध्यक्षः ॥ ३५ ॥ समाहर्तृप्रचारः ॥ ३६ ॥ गृहपतिवैदेहकतापसव्यञ्जनाः प्रणिधयः ॥३७॥ नागरिकप्रणिधिः ॥३८॥
इत्यध्यक्षप्रचारो द्वितीयमधिकरणम् ।
(१) व्यवहारस्थापना ॥ १ ॥ विवादपदनिबन्धः ॥ २ ॥ विवाहसंयुक्तम् ॥ ३ ॥ दायविभागः ॥ ४ ॥ वास्तुकम् ॥ ५ ॥ समयस्यानपाकर्म ॥ ६ ॥ ऋणादानम् ॥ ७ ॥ औपनिधिकम् ॥ ८ ॥ दासकर्मकरकल्पः ॥ ९ ॥ संभूयसमुत्थानम् ॥ १० ॥ विक्रीतक्रीतानुशयः ॥ ११ ॥ दत्तस्यानपाकर्म ॥ १२ ॥ अस्वामिविक्रयः ॥ १३ ॥ स्वस्वामिसंबन्धः ॥ १४ ॥ साहसम् ॥ १५ ॥ वाक्पारुष्यम् ॥ १६ ॥ दण्डपारुष्यम् ॥ १७ ॥ द्यूतसमाह्वयम् ॥ १८ ॥ प्रकीर्णकानि ॥ १९ ॥
इति धर्मस्थीयं तृतीयमधिकरणम् ।
(२) कारुकरक्षणम् ॥ १ ॥ वैदेहकरक्षणम् ॥ २ ॥ उपनिपातप्रतीकारः
१६. तोल-माप का निश्चय; २०. देश और काल का मान; २१. शुल्क का अध्यक्ष; २२. सूत का अध्यक्ष; २३. कृषि का अध्यक्ष; २४. आबकारी का अध्यक्ष; २५. वधस्थान का अध्यक्ष; २६. वेश्यालयों का अध्यक्ष; २७. परिवहन का अध्यक्ष; २८. पशुओं का अध्यक्ष; २९. अश्वशाला का अध्यक्ष; ३०. गजशाला का अध्यक्ष; ३१. रथसेना का अध्यक्ष; ३२. पैदल सेना का अध्यक्ष; ३३. सेनापति का कार्य; ३४. मुद्रा-विभाग का अध्यक्ष; ३५. चरागाह का अध्यक्ष; ३६. समाहर्त्ता का कार्य; ३७. गृहपति, वैदेहक तथा तापस के वेष में गुप्तचर; और ३८. नागरिक के कार्य ।
तीसरा अधिकरण : न्याय का निरूपण
(१) १. व्यवहार की स्थापना; २. विवाद पदों का विचार; ३. विवाह-सम्बन्धी विचार; ४. दाय-विभाग; ५. वास्तुक; ६. समय (प्रतिज्ञा) का न छोड़ना; ७. ऋण लेना; ८. धरोहर-सम्बन्धी नियम; ९. दास और श्रमिकों के नियम; १०. साझेदारी का हिस्सा; ११. क्रय-विक्रय-सम्बन्धी बयाना; १२. देने का वचन देकर फिर न देना; १३. अस्वामि-विक्रय; १४. स्व-स्वामि-सम्बन्ध; १५. साहस; १६. वाक्पारुष्य; १७. दण्डपारुष्य; १८. द्यूत-समाह्वय; और १९. प्रकीर्णक ।
चौथा अधिकरण : कण्टक-शोधन
(२) १. शिल्पियों से देश की रक्षा; २. व्यापारियों से देश की रक्षा; ३. दैवी
पाँचवाँ अधिकरण : योगवृत्त-निरूपण
४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
॥ ३ ॥ गूढाजीविनां रक्षा ॥ ४ ॥ सिद्धव्यञ्जनैर्माणवप्रकाशनम् ॥ ५ ॥ शङ्कारूपकर्माभिग्रहः ॥ ६ ॥ आशुमृतकपरीक्षा ॥ ७ ॥ वाक्यकर्मानुयोगः ॥ ८ ॥ सर्वाधिकरणरक्षणम् ॥ ९ ॥ एकाङ्गवधनिष्क्रयः ॥ १० ॥ शुद्ध-श्चित्रश्च दण्डकल्पः ॥ ११ ॥ कन्याप्रकर्म ॥ १२ ॥ अतिचारदण्डः ॥ १३ ॥
इति कण्टकशोधनं चतुर्थमधिकरणम् ।
(१) दाण्डकर्मिकम् ॥ १ ॥ कोशाभिसंहरणम् ॥ २ ॥ भृत्यभरणीयम् ॥ ३ ॥ अनुजीविवृत्तम् ॥ ४ ॥ सामयाचारिकम् ॥ ५ ॥ राज्यप्रतिसंधा-नम् ॥ ६ ॥ एकैश्वर्यम् ॥ ७ ॥
इति योगवृत्तं पञ्चममधिकरणम् ।
(२) प्रकृतसम्पदः ॥ १ ॥ शमव्यायामिकम् ॥ २ ॥
इति मण्डलयोनिः षष्ठमधिकरणम् ।
(३) षाड्गुण्यसमुद्देशः ॥ १ ॥ क्षयस्थानवृद्धिनिश्चयः ॥ २ ॥ संश्रय-वृत्तिः ॥ ३ ॥ समहीनज्यायसां गुणाभिनिवेशः ॥ ४ ॥ हीनसंधयः ॥ ५ ॥ विगृह्यासनम् ॥ ६ ॥ संधायासनम् ॥ ७ ॥ विगृह्ययानम् ॥ ८ ॥ संधाय-यानम् ॥ ९ ॥ संभूयप्रयाणम् ॥ १० ॥ यातव्यामित्रयोरभिग्रहचिन्ता ॥ ११ ॥ क्षयलोभविरागहेतवः प्रकृतीनाम् ॥ १२ ॥ सामवायिकविपरि-
आपत्तियों का प्रतीकार; ४. गुप्त षड्यन्त्रकारियों से देश की रक्षा; ५. सिद्ध पुरुषों के बहाने प्रलोभन-विद्याओं का प्रकाशन; ६. सन्देह, वस्तु और कार्य के द्वारा चोरों को पकड़ना; ७. आशुमृत की परीक्षा; ८. वाक्यकर्मानुयोग; ६. सभी राजकीय विभागों की रक्षा; १०. एक अङ्ग का वध या उसकी जगह द्रव्यदण्ड; ११. शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड; १२. कुंवारी कन्या से सम्भोग करने का दण्ड; और १३. अतिचार का दण्ड ।
पाँचवाँ अधिकरण : योगवृत्त-निरूपण
(१) १. दंडव्यवस्था; २. कोश का संग्रह; ३. भृत्यों का भरण-पोषण; ४. राज्य-कर्मचारियों का व्यवहार; ५. व्यवस्था का यथोचित पालन; ६. राज्य का प्रतिसंधान और ७. एकैश्वर्य ।
छठा अधिकरण : प्रकृतियों का निरूपण
(२) १. प्रकृतियों के गुण; और २. शांति तथा उद्योग ।
सातवाँ अधिकरण : छह गुणों का निरूपण
(३) १. छह गुणों का उद्देश्य; २. क्षय, स्थान तथा वृद्धि का निश्चय; ३. बल-वान् का आश्रय; ४. सम, हीन तथा बलवान् आदि राजाओं का चरित; ५. हीन संधि; ६. विग्रह कर के आसन; ७. संधि कर के आसन; ८. विग्रह कर के यान; ६. संधि कर के यान; १०. सामूहिक प्रयाण; ११. यातव्य और शत्रु के प्रति यान का
आठवाँ अधिकरण : व्यसनों का निरूपण
प्रकरणाधिकरण-विभाजन ५
मर्शः ॥ १३ ॥ संहितप्रयाणिकम् ॥ १४ ॥ परिपणितापरिपणितापसृताश्च संधयः ॥ १५ ॥ द्वैधीभाविकाः संधिविक्रमाः ॥ १६ ॥ यातव्यवृत्तिः ॥ १७ ॥ अनुग्राह्यमित्रविशेषाः ॥ १८ ॥ मित्रहिरण्यभूमिकर्मसंधय ॥ १९ ॥ पाष्णिग्राहचिन्ता ॥ २० ॥ हीनशक्तिपूरणम् ॥ २१ ॥ बलवता विगृह्यो-परोधहेतवः ॥ २२ ॥ दण्डोपनतवृत्तम् ॥ २३ ॥ दण्डोपनायिवृत्तम् ॥ २४ ॥ संधिकर्म ॥ २५ ॥ संधिमोक्षः ॥ २६ ॥ मध्यमचरितम् ॥ २७ ॥ उदासीन-चरितम् ॥ २८ ॥ मण्डलचरितम् ॥ २९ ॥
इति षाड्गुण्यं सप्तममधिकरणम् ।
(१) प्रकृतिव्यसनवर्गः ॥ १ ॥ राजराज्ययोर्व्यसनचिन्ता ॥ २ ॥ पुरुष-व्यसनवर्गः ॥ ३ ॥ पीडनवर्गः ॥ ४ ॥ स्तम्भनवर्गः ॥ ५ ॥ कोशसङ्गवर्गः ॥ ६ ॥ बलव्यसनवर्गः ॥ ७ ॥ मित्रव्यसनवर्गः ॥ ८ ॥
इति व्यसनाधिकारिकमष्टममधिकरणम् ।
(२) शक्तिदेशकालबलाबलज्ञानम् ॥ १ ॥ यात्राकालाः ॥ २ ॥ बलो-पादानकालाः ॥ ३ ॥ संनाहगुणाः ॥ ४ ॥ प्रतिबलकर्म ॥ ५ ॥ पश्चात्कोप-चिन्ता ॥ ६ ॥ बाह्याभ्यन्तरप्रकृतिकोपप्रतीकारः ॥ ७ ॥ क्षयव्ययलाभ-विपरिमर्शः ॥ ८ ॥ बाह्याभ्यन्तराश्चापदः ॥ ९ ॥ दूष्यशत्रुसंयुक्ताः ॥ १० ॥
निर्णय; १२. प्रकृतियों के क्षय, लोभ और विराग के हेतु; १३. सामवायिक राजाओं का विचार; १४. मिलकर आक्रमण; १५. परिपणित, अपरिपणित और अपसृत संधि; १६. द्वैधीभाव-सम्बन्धी सन्धि और विक्रम; १७. यातव्य-सम्बन्धी व्यवहार; १८. अनुग्राह्य मित्रविशेष; १९. मित्रसंधि, हिरण्यसंधि, भूमिसंधि और कर्मसंधि; २०. पाष्णिग्राह-चिन्ता; २१. दुर्बल का शक्ति-संचय; २२. बलवान् से विरोध कर के दुर्ग-प्रवेश के कारण; २३. दंडोपनतवृत्त; २४. दंडोपनायिवृत्त; २५. सन्धकर्म; २६. सन्धि-मोक्ष; २७. मध्यम का चरित; २८. उदासीन का चरित; और २९. राजमंडल का चरित ।
आठवाँ अधिकरण : व्यसनों का निरूपण
(१) १. प्रकृतियों के व्यसन; २. राजा और राज्य के व्यसनों पर विचार; ३. सामान्य पुरुषों के व्यसन; ४. पीडनवर्ग; ५. स्तम्भनवर्ग; ६. कोषसंगवर्ग; ७. बलव्यसनवर्ग और ८. मित्रव्यसनवर्ग ।
नवाँ अधिकरण : आक्रमण का निरूपण
(२) १. शक्ति, देश और काल के बलाबल का ज्ञान; २. आक्रमण का समय; ३. सेनाओं के तैयार होने का समय; ४. सैन्य-संगठन ५. शत्रुसेना से मुकाबला; ६. पश्चात्कोपचिन्ता; ७. बाह्य और आभ्यन्तर प्रकृति के कोप का प्रतीकार; ८. क्षय, व्यय और लाभ का विचार; ९. बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ; १०. राजद्रोही