भारतकोश
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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

कवितावली १३६ पातक-पीन, कुदारिद-दीन मलीन धरें कथरी-करवा है। लोकु कहै, विधिहूँ न लिख्यो सपनेहूँ नहीं अपने बर बाहैं ॥ रामको किंकरु सो तुलसी, समुझेंहि भलो, कहिबो न रवा है। ऐसेको ऐसो भयो कबहुँ न भजे बिनु बानरके चरवाहै ॥ लोक [ मेरे विषयमें ] कहता था कि यह पापोंमें बढ़ा हुआ एवं कुत्सित दरिद्रताके कारण दीन है तथा मलिन कन्था और करवा धारण किये है । विधाताने इसके भाग्यमें कुछ भी नहीं लिखा तथा यह सपनेमें भी अपने बलपर नहीं चलता था । परन्तु आज वही तुलसी श्रीरामचन्द्रजीका किंकर हो गया । इस बातको समझना ही अच्छा है, कहना उचित नहीं है । वह ऐसे ( दीन और पापी ) से ऐसा ( महामुनि ) बिना वानरोंके चरवाहे (श्रीरामचन्द्रजी) को भजे नहीं हुआ । मातु-पिताँ जग जाइ तज्यो, बिधिहूँ न लिखी कछु भाल भलाई । नीच, निरादरभाजन, कादर, कूकर-टूकन लागि ललाई ॥ राम-सुभाउ सुन्यो तुलसीं, प्रभुसों कह्यो बारक पेटु खलाई । स्वारथको परमारथको रघुनाथु सो साहेबु, खोरि न लाई ॥ माता-पिताने जिसको संसारमें जन्म देकर त्याग दिया, ब्रह्माने भी जिसके भाग्यमें कुछ भलाई नहीं लिखी, उस नीच, निरादरके पात्र कायर, कुक्कुरके मुँहके टुकड़ेके लिये ललचानेवाले तुलसीदास- ने जब श्रीरामचन्द्रका स्वभाव सुना और एक बार पेट खोलकर [ अपना सारा दुःख ] कहा तो प्रभु रघुनाथजीने उसके स्वार्थ और परमार्थको सुधारनेमें तनिक भी कोर-कसर नहीं रक्खी ।

१३७ उत्तरकाण्ड पाप हरे, परिताप हरे, तनु पूजि भो हीतल सीतलताई । हंसु कियो बकतें, बलि जाउँ, कहाँ लौं कहौं करुना-अधिकाई ॥ कालु विलोकि कहैं तुलसी, मनमें प्रभुकी परतीति अघाई । जन्मु जहाँ, तहँ रावरे सों निवहैं भरि देह सनेह-सगाई ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—हे श्रीराम ! आपने मेरे पाप नष्ट कर दिये, सारे सन्ताप हर लिये, शरीर पूज्य बन गया । हृदयमें शीतलता आ गयी । और मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे बगुले (दंभी) से हंस (विवेकी) बना दिया, आपकी कृपाकी अधिकताका कहाँतक वर्णन करूँ । अब समय देखकर तुलसी कहता है कि मेरे मनमें प्रभुका पूरा भरोसा है, अतः जहाँ कहीं भी मेरा जन्म हो वहाँ आपसे शरीर रहनेतक प्रेमके सम्बन्धका निर्वाह होता रहे । लोग कहैं, अरु हौंहु कहौं, जनु खोटो-खरो रघुनायकही को । रावरी राम ! बड़ी लघुता, जसु मेरो भयो सुखदायक हीको ॥ कै यह हानि सहौ, बलि जाउँ, कि मोहू करौ निज लायकहीको । आनि हिएँ हित जानि करौ, ज्यों हों ध्यानु धरौं धनु-सायकही को॥ लोग कहते हैं और मैं भी कहता हूँ कि खोटा या खरा मैं श्रीरामचन्द्रजीहीका सेवक हूँ । हे राम ! इससे आपकी तो बड़ी तौहीन हुई, परन्तु आपके सदृश स्वामीका सेवक होनेका जो यश मुझे प्राप्त हुआ वह मेरे हृदयको तो सुख देनेवाला ही है । मैं बलिहारी जाऊँ, अब या तो आप इस हानिको सहिये अथवा मुझे ही अपनी सेवाके योग्य बना लीजिये । अपने हृदयमें विचारकर और मेरे लिये हितकारी जानकर ऐसा ही कीजिये जिससे मैं आपके

७. उत्तरकाण्ड (राम राज्याभिषेक व कलियुग वर्णन)

कवितावली १३८ धनुषधारी रूपका ही ध्यान कर सकूँ [ अर्थात् आपको छोड़कर किसी और पदार्थकी ओर मेरा चित्त ही न जाय ] । आपु हौं आपुको नीकें कै जानत, रावरो राम ! भरायौ-गढायो । कीरु ज्यों नामु रटै तुलसी, सो कहै जगु जानकीनाथ पढ़ायो ॥ सोई है खेदु, जो बेदु कहै, न घटै जनु जो रघुबीर बढ़ायो । हौं तौ सदा खरको असवार, तिहारोइ नामु गयंद चढ़ायो ॥ मैं स्वयं अपनेको अच्छी तरह जानता हूँ । हे राम ! मैं तो आपहीका रचा और बढ़ाया हुआ हूँ । यह तुलसीदास सुग्गेकी भाँति नाम रटता है, उसपर संसार यही कहता है कि यह पढ़ाया हुआ है । इसीका मुझे खेद है । किन्तु वेद कहता है कि जिस मनुष्यको रघुनाथजीने बढ़ा दिया वह कभी घट नहीं सकता । मैं सदासे गधे- पर ही चढ़नेवाला (अत्यन्त निन्दनीय आचरणोंवाला) था, आपके नामने ही मुझे हाथीपर चढ़ा दिया है (अर्थात् इतना गौरव प्रदान किया है) । छारतें सँवारि कै पहारहू तें भारी कियो, गारो भयो पंचमें पुनीत पच्छु पाइ कै । हौं तौ जैसो तब तैसो अब अधमाई कै कै, पेटु भरौं, राम ! रावरोई गुनु गाइकै ॥ आपने निवाजेकी पै कीजै लाज, महाराज ! मेरी ओर हेरि कै न बैठिए रिसाइ कै । पालि कै कृपाल ! ब्याल-बालको न मारिए, औ काटिए न नाथ ! विषहूको रूखु लाइ कै ॥६१॥

१३९ उत्तरकाण्ड आपने मुझ धूलके समान तुच्छ प्राणीको सँभालकर पहाड़से भी भारी (गौरवान्वित) बना दिया और आपका पवित्र पक्ष पाकर मैं पंचोंमें बड़ा हो गया। मैं तो अपनी अधमतामें जैसा पहले था वैसा ही अब भी हूँ। हे राम! बस, आपका ही गुण गाकर पेट पालता हूँ। परन्तु हे महाराज! आप अपनी कृपाकी लाज रखिये और मेरी ओर देखकर क्रोध करके न बैठ जाइये। हे कृपालु! सर्पके बालकको भी पाल-पोषकर नहीं मारना चाहिये और न विषका वृक्ष भी लगाकर उसे काटना चाहिये। वेद न पुरान-गानु, जानौं न बिग्यानु ग्यानु, ध्यान-धारना-समाधि-साधन-प्रवीनता । नाहिन विरागु, जोग, जाग भाग तुलसीकें, दया-दान-दूवरो हौं, पापही की पीनता ॥ लोभ-मोह-काम-कोह-दोस-कोसु मोसो कौन ? कलिहूँ जो सीखि लई मेरियै मलीनता । एकु ही भरोसो राम ! रावरो कहावत हौं, रावरे दयालु दीनबंधु ! मेरी दीनता ॥६२॥ मैं न तो वेद या पुराणोंका गान जानता हूँ और न विज्ञान अथवा ज्ञान ही जानता हूँ, और न मैं ध्यान, धारणा, समाधि आदि साधनोंमें प्रवीणता ही रखता हूँ। तुलसीके भाग्यमें वैराग्य, योग और यज्ञादि नहीं हैं। मैं दया और दानमें दुर्बल हूँ [अर्थात् दान और दयासे रहित हूँ] तथा पापमें पुष्ट हूँ। मेरे समान लोभ, मोह, काम और क्रोधरूप दोषोंका भण्डार कौन है? कलियुगने भी मुझसे ही मलिनता सीखी है। हाँ, एक ही भरोसा मुझे है कि मैं आपका

कहलाता हूँ। आप दीनोंके बन्धु और दयालु हैं मेरी यह दीनता है। रावरो कहावौं, गुनु गावौं राम ! रावरोई, रोटी द्वै हौं पावौं राम ! रावरी हीं कानि हौं। जानत जहानु, मन मेरेहूँ गुमानु बड़ो, मान्यो मैं न दूसरो, न मानत, न मानिहौं ॥ पाँचकी प्रतीति न भरोसो मोहि आपनोई, तुम्ह अपनायो हौं तबै हीं परि जानिहौं। गढ़ि-गुढ़ि, छोलि-छालि कुंदकी-सी भाईं वातैं जैसी मुख कहौं, तैसी जीयँ जब आनिहौं ॥६३॥ हे राम ! मैं आपका कहलाता हूँ और आपहींका गुण गाता हूँ और हे रघुनाथजी ! आपहीके लिहाजसे मुझे दो रोटियाँ भी मिल जाती हैं। संसार जानता है और मेरे मनमें भी बड़ा अभिमान है कि मैंने दूसरेको न माना, न मानता हूँ और न मानूँगा। मुझे न पंचोंका ही विश्वास है और न अपना ही भरोसा है, मैं गढ़-गुढ़ और छील-छालकर खरादपर चढ़ाई हुई-सी चिकनी-चुपड़ी बातें बनाता हूँ। वैसी ही जब हृदयमें भी ले आऊँगा तब समझूँगा कि आपने मुझे अपनाया है। बचन बिकारु, करतबउ खुआर, मनु बिगत-बिचार, कलिमलको निधानु है। रामको कहाइ, नामु बेचि-बेचि खाइ, सेवा- संगति न जाइ, पाछिलेको उपखानु है॥ तेहू तुलसीको लोगु भलो-भलो कहै, ताको

१४१ उत्तरकाण्ड दूसरो न हेतु, एकु नीकें कै निदानु है। लोकरीति विदित बिलोकिअत जहाँ-तहाँ, स्वामीकें सनेहँ स्वानहू को सनमानु है ॥६४॥ (जिसकी) बोलीमें विकार है, करनी भी बहुत बुरी है तथा मन भी विवेकशून्य और कलिमलका भण्डार है। जो श्रीरामचंद्र- जीका कहलाकर नामको बेंच-बेंचकर खाता है और जैसी कि पुरानी कहावत है, सेवा और सत्संगमें प्रवृत्त नहीं होता। उस तुलसीको भी लोग भला कहते हैं। इसका कोई दूसरा कारण नहीं है, केवल एक निश्चित हेतु है यह प्रसिद्ध लोकरीति और जहाँ-तहाँ देखनेमें भी आता है कि स्वामीका जहाँ-तहाँ स्नेह होनेपर उसके कुत्तेका भी सम्मान होता है। नाम-विश्वास स्वारथको साजु न समाजु परमारथको, मोसो दगाबाज दूसरो न जगजाल है। कै न आयौं, करौं न करौंगो करतूति भली, लिखी न बिरंचिहूँ भलाई भूलि भाल है ॥ रावरी सपथ, रामनामही की गति मेरें, इहाँ झूठो, झूठो सो तिलोक तिहूँ काल है। तुलसी को भलो पै तुम्हारें ही किएँ कृपाल, कीजै न बिलंबु, बलि, पानीभरी खाल है ॥६५॥ मेरे पास न तो कोई स्वार्थसाधनका ही सामान है और न परमार्थकी ही सामग्री है। विश्व ब्रह्माण्डमें मेरे समान कोई दूसरा दगाबाज भी नहीं है। सुकर्म तो न मैं करके आया हूँ, न करता

कवितावली १४२ हूँ और न करूँगा ही ! ब्रह्माने भूलकर भी मेरे भाग्यमें भलाई नहीं लिखी। आपकी शपथ है, हे रामजी ! मुझको केवल आपके नाम- हीकी गति है। जो यहाँ (आपके सामने) झूठा है वह तो तीनों लोक और तीनों कालमें झूठा ही है। हे कृपालो ! तुलसीकी भलाई तो तुम्हारे ही किये होगी; बलिहारी जाऊँ, अब विलम्ब न कीजिये, क्योंकि मेरी दशा ठीक पानीसे भरी हुई खालके समान है। अर्थात् जैसे पानीभरी खाल बहुत जल्दी सड़ जाती है वैसे ही मेरे भी नष्ट होनेमें देरी नहीं है। रागको न साजु, न बिरागु, जोग, जाग जियँ, काया नहि छाड़ि देत ठाटिबो कुठाटको। मनोराजु करत अकाजु भयो आजु लगि, चाहै चारु चीर, पै लहै न टूकु टाटको ॥ भयो करतारु बड़े कूरको कृपालु, पायो नामप्रेमु-पारसु, हौं लालची बराटको । ‘तुलसी’ बनी है राम ! रावरें बनाएँ, ना तो धोबी-कौसो कूकरु, न घरको, न घाटको ॥६६॥ मेरे पास न तो राग अर्थात् सांसारिक सुख-भोगकी सामग्री है और न मेरे जीमें वैराग्य, योग या यज्ञ ही है; और यह शरीर कुचाल चलना नहीं छोड़ता । मनोराज्य (वासनाएँ) करते-करते आजतक हानि ही होती रही। यह चाहता तो अच्छे-अच्छे वस्त्र है, परन्तु इसे मिलता टाटका टुकड़ा भी नहीं । हे जगत्कर्ता प्रभो ! आप इस अत्यन्त कुटिलपर भी कृपालु हुए, मुझ कौड़ी (तुच्छ भोगों) के लालचीने भगवन्नामका प्रेमरूप पारस पाया। हे श्रीरामजी ! यह सब आपके बनाये बनी है, नहीं तो धोबीके कुत्तेके समान

१४३ उत्तरकाण्ड मैं न घरका था और न घाटका ही (अर्थात् न मैं इस लोकको सुधार सकता था, न परलोकको)। ऊँचो मनु, ऊँची रुचि, भागु नीचो निपट ही, लोकरीति-लायक न, लंगर लवारु है। स्वारथु अगमु, परमारथकी कहा चली, पेटकीं कठिन जगु जीवको जवारु है॥ चाकरी न आकरी, न खेती, न बनिज-भीख, जानत न कूर कछु किसब कबारु है। तुलसीकी बाजी राखी रामहीकें नाम, नतु भेंट पितरन को न मूड़हू में बारु है॥६७॥ इसका मन ऊँचा है तथा रुचि भी ऊँची है, परन्तु भाग्य इसका अत्यन्त खोटा है। यह लोक-व्यवहारके लायक भी नहीं है तथा बड़ा ही नटखट और गप्पी है। इसके लिये तो स्वार्थ भी अगम है, परमार्थकी तो बात ही क्या है! पेटकी कठिनाईके कारण इसे संसार जीका जंजाल हो रहा है। यह न तो कोई चाकरी ही करता है और न खान खोदनेका काम करता है; इसके न खेती है, न व्यापार है; न यह भीख माँगता है और न कोई अन्य प्रकार- का धंधा या पेशा ही जानता है। तुलसीकी बाजी रामनामहीने रक्खी है, अन्यथा इसके पास तो पितरोंको भेंट चढ़ानेके लिये सिरपर बाल भी नहीं है। अपत-उतार, अपकारको अगारु, जग जाकी छाँह छुएँ सहमत ब्याध-बाधको। पातक-पुहुमि पालिबेको सहसाननु सो,

कवितावली १४४ काननु कपटको, पयोधि अपराधको ॥ तुलसी-से वामको भो दाहिनो दयानिधानु, सुनत सिहात सब सिद्ध, साधु, साधको । रामनाम ललित ललामु कियो लाखनि को, बड़ो क्रूर कायर कपूत कौड़ी आधको ॥६८॥ यह नीच निर्लज्जोंकी न्यौछावर और अपकारोंका आगार है, जिसकी छायाका स्पर्श होनेपर संसारमें व्याध और हिंसक जीव भी सहम जाते हैं। पापरूप पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये यह शेषजीके समान है तथा कपटका वन और अपराधोंका समुद्र है। तुलसी-जैसे उलटी प्रकृतिके पुरुषके लिये दयानिधान (श्रीरामचन्द्र- जी) दाहिने हो गये—यह सुनकर सब सिद्ध, साधु और साधक- लोग सिहाते हैं। रामनामने बड़े कुटिल, कायर, कपूत और आधी कौड़ीके मनुष्यको भी लाखोंका सुन्दर रत्न बना दिया। सब अँग हीन, सब साधन विहीन, मन- बचन मलीन, हीन कुल-करतूति हौं । बुधि-बल-हीन, भाव-भगति-विहीन, हीन गुन, ग्यानहीन, हीन भाग हूँ, बिभूति हौं ॥ तुलसी गरीब की गई-बहोर रामनामु, जाहि जपि जीहँ रामहू को बैठो धूति हौं । प्रीति रामनामसों, प्रतीति रामनामकी, प्रसाद रामनामकें पसारि पाय सूतिहौं ॥६९॥

१४५ उत्तरकाण्ड मैं (योगके आठों) अङ्गोंसे हीन हूँ, सब साधनोंसे रहित हूँ, मन-वचनसे मलिन हूँ तथा कुल और कर्मोंमें भी बड़ा पतित हूँ। मैं बुद्धि-बलहीन, भाव और भक्तिमे रहित, गुणहीन, ज्ञानहीन तथा भाग्य और ऐश्वर्यसे भी रहित हूँ। इस दीन तुलसीदासकी हीन अवस्थाका उद्धार करनेवाला तो रामका नाम ही है जिसे जिह्वासे जपकर मैं रामजीको भी छल चुका हूँ। मुझे रामनामसे ही प्रीति है, रामनाममें ही विश्वास है और मैं रामनामके ही कृपासे पैर पसारकर (निश्चिन्त होकर) सोता हूँ। मेरें जान जबतें हौं जीव है जनम्यो जग, तबतें बेसाह्यो दाम लोभ, कोह कामको। मन तिन्हीकी सेवा, तिन्ही सों भाउ नीको, बचन बनाइ कहौं 'हौं गुलामु रामको'॥ नाथहूँ न अपनायो, लोक झूठी है परी, पै प्रभुहू तें प्रबल प्रतापु प्रभुनामको। आपनीं भलाई भलो कीजै तौ भलाई, न तौ तुलसीको खुलैगो खजानो खोटे दामको ॥७०॥ मेरी समझसे जबसे मैं जगत्में जीव होकर जन्मा हूँ तबसे मुझे लोभ, क्रोध और कामने दाम देकर मोल ले लिया है। (अतएव) मनसे उन्हींकी सेवा होती है और उन्हींसे गहरा प्रेम है; परन्तु बात बनाकर कहता हूँ कि मैं तो श्रीरामका गुलाम हूँ। हे नाथ! आपने भी (अयोग्य समझकर) नहीं अपनाया; किन्तु लोकमें झूठी प्रसिद्धि हो गयी (कि मैं रामका गुलाम हूँ)। परन्तु प्रभुसे भी प्रभुके नामका प्रताप अधिक प्रचण्ड है। (अतः) क० १०-

कवितावली १४६ अपनी भलाईसे यदि आप मेरा भला कर दें तो अच्छा ही है, नहीं तो तुलसीके कपटका खजाना खुलेगा ही । जोग न बिरागु,जप, जाग, तप, त्यागु,ब्रत, तीरथ न धर्म जानौं, वेदविधि किमि है । तुलसी-सो पोच न भयो है, नहिं हैहै कहूँ, सोचैं सब, याके अघ कैसे प्रभु छमिहैं ॥ मेरें तौ न डरु, रघुवीर ! सुनौ, साँची कहौं, खल अनखैहैं तुम्हें, सज्जन न गंमिहैं । भले सुकृतीके संग मोहि तुलाँ तौलिए तौ, नामकें प्रसाद भारु मेरी ओर नमिहै ॥७१॥ मैं न तो अष्टाङ्गयोग जानता हूँ और न वैराग्य, जप, यज्ञ, तप, त्याग, व्रत, तीर्थ अथवा धर्म ही जानता हूँ । मैं यह भी नहीं जानता कि वेदका विधान कैसा है । तुलसीके समान पामर न तो कोई हुआ है और न कहीं होगा । ( इसीलिये ) सभी सोचते हैं, न जाने, प्रभु इसके पापोंको कैसे क्षमा करेंगे । किन्तु हे रघुनाथजी ! सुनिये, मैं ( आपसे ) सच कहता हूँ, मुझे कुछ भी डर नहीं है । ( यदि आप मुझे क्षमा कर देंगे तो ) दुष्ट लोग तो अवश्य आपसे अप्रसन्न होंगे, किन्तु सज्जनोंको इससे कुछ भी दुःख नहीं होगा । यदि आप मुझे किसी बड़े पुण्यवान्के साथ तराजू- पर तोलेंगे तो आपके नामकी कृपासे मेरी ओरका पलड़ा ही झुकता हुआ रहेगा । जातिके, सुजातिके, कुजातिके पेटागि बस खाए टूक सबके, बिदित बात दुनीं सो ।

१४७ उत्तरकाण्ड मानस-वचन-कायँ किए पाप सतिभायँ, रामको कहाइ दासु दगाबाज पुनी सो ॥ रामनामको प्रभाउ, पाउ, महिमा, प्रतापु, तुलसी-सो जग मनिअत महामुनी-सो । अतिहीं अभागो, अनुरागत न रामपद, मूढ़ ! एतो बड़ो अचिरिजु देखि-सुनी सो ॥७२॥ मैंने पेटकी आगके कारण ( अपनी ) जाति, सुजाति, कुजाति, सभीके टुकड़े ( माँग-माँगकर ) खाये हैं—यह बात संसारमें ( सबको ) विदित है; मन, वचन और कर्मसे सच्चे भावसे अर्थात् स्वाभाविक ही ( बहुत-से ) पाप किये और रामजीका दास कहलाकर भी दगाबाज ही बना रहा । अब रामनामका प्रभाव, पैठ, महिमा और प्रताप देखिये, जिसके कारण तुलसी-जैसे ( दुष्ट ) को भी लोग महामुनि ( वाल्मीकि ) के समान मानते हैं। रे मूढ़ ! तू बड़ा ही अभागा है; इतना बड़ा अचरज देख-सुनकर भी श्रीरामके चरणोंमें प्रीति नहीं करता । जायो कुल मंगन, बधावनो बजायो, सुनि भयो परितापु पापु जननी-जनकको । बारेतें ललात-बिललात द्वार-द्वार दीन, जानत हो चारि फल चारि ही चनकको ॥ तुलसी सो साहेब समर्थको सुसेवकु है, सुनत सिहात सोचु बिधिहू गनकको । नामु राम ! रावरो सयानो किधौं बावरो, जो करत गिरोतें गरु तृनतें तनकको ॥७३॥

कवितावली १४८ भिक्षा माँगनेवाले (ब्राह्मण) कुलमें तो उत्पन्न हुआ, जिसके उपलक्षमें बधावा बजाया गया । यह सुनकर माता-पिताको परिताप और कष्ट हुआ । फिर बालपनसे ही अत्यन्त दीन होनेके कारण द्वार-द्वार ललचाता और बिलबिलाता फिरा, चनेके चार दानोंको ही अर्थ, धर्म, काम और मोक्षरूप चार फल समझता था । वही तुलसी अब समर्थ स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका सुसेवक है—यह सुनकर ब्रह्मा-जैसे गणक (ज्योतिषी) को भी चिन्ता और ईर्ष्या होती है । हे राम ! मालूम नहीं, आपका नाम चतुर है या पागल जो तृणसे भी तुच्छ पुरुषको पर्वतसे भी भारी बना देता है। वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, रामनाम ही सों रीझें सकल भलाई है । कासीहूँ मरत उपदेसत महेसु सोई, साधना अनेक चितई न चित लाई हैं ॥ छाछीको ललात जे, ते रामनामकें प्रसाद, खात खुनसात सोंधे दूधकी मलाई है। रामराज सुनिअत राजनीतिकी अवधि, नामु राम ! रावरो तौ चामकी चलाई है ॥७४॥ वेद-पुराण भी कहते हैं और लोकमें भी देखा जाता है कि रामनामहीसे प्रेम करनेमें सब तरहकी भलाई है । काशीमें मरनेपर महादेवजी भी जीवोंको उसीका उपदेश करते हैं। उन्होंने अनेकों साधनोंकी ओर न दृष्टि दी है और न उन्हें चित्तहीमें स्थान दिया है । जो छाछको ललचाते थे वे रामनामके प्रसादसे सुगन्धित दूधकी मलाई खानेमें भी नाक-भौ सिकोड़ते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके

१४९ उत्तरकाण्ड राज्यमें राजनीतिकी पराकाष्ठा सुनी जाती है; किन्तु हे रामजी ! आपके नामने तो चमड़ेका सिक्का चला दिया ( अर्थात् अधमोंको भी उत्तम बना दिया ) । सोच-संकटनि सोचु संकटु परत, जर जरत, प्रभाउ नाम ललित ललामको। बूड़िऔ तरति, बिगरीऔ सुधरति बात, होत देखि दाहिनो सुभाउ बिधि बामको ॥ भागत अभागु, अनुरागत बिरागु, भागु, जागत आलसि तुलसीहू-से निकामको। भाई धारि फिरि कै गोहारि हितकारी होति, आई मीचु मिटति जपत रामनामको ॥७५॥ अति सुन्दर और श्रेष्ठ रामनामका ऐसा प्रभाव है कि उससे सोच और संकटोंको सोच और संकट पड़ जाता है, ज्वर भी जलने लगते हैं, डूबी हुई ( नौका ) भी तर जाती है, बिगड़ी हुई बात भी सुधर जाती है, ऐसे पुरुषको देखकर वाम विधाताका स्वभाव भी अनुकूल हो जाता है, अभाग्य भाग जाता है, वैराग्य प्रेम करने लगता है और तुलसी-से निकम्मे और आलसीका भी भाग्य जाग जाता है । ( लूटनेको आयी हुई लुटेरोंकी ) सेना भी उलटे रक्षक और हितकारी बन जाती है तथा राम-नामका जप करनेसे आयी हुई मृत्यु भी टल जाती है। आँधरो अधम जड़ जाजरो जराँ जवनु सूकरकें सावक ढकाँ ढकेल्यो मगमं ।

कवितावली १५० गिरो हियँ हहरि 'हराम हो, हराम हन्यो', हाय ! हाय ! करत परीगो कालफगमें ॥ 'तुलसी' बिसोक ह्वै त्रिलोकपतिलोक गयो नामकें प्रताप, बात बिदित है जगमें । सोई रामनामु जो सनेहसों जपत जनु, ताकी महिमा क्यों कही है जाति अगमैं ॥७६॥ एक सूअरके बच्चेने किसी अधम, अंधे, मूर्ख और बुढ़ापेसे जर्जर यवनको राहमें धक्का देकर ढकेल दिया । इससे वह गिर गया और हृदयमें भयभीत होकर 'अरे ! हरामने मार डाला, हरामने मार डाला' इस प्रकार हाय-हाय करते-करते कालके फंदेमें पड़ गया अर्थात् मर गया । गोसाईंजी कहते हैं कि वह यवन नामके प्रतापसे सब प्रकारके शोकोंसे छूटकर त्रिलोकीनाथ भगवान् रामके धामको चला गया, यह बात जगत्में प्रसिद्ध है । उसी रामनामको जो मनुष्य प्रेमपूर्वक जपता है, उसकी अगाध महिमा कैसे कही जा सकती है । जाप की न तप-खपु कियो, न तमाइ जोग, जाग न विराग, त्याग, तीरथ न तनको । भाईको भरोसो न खरो-सो वैरु बैरीहू सों, बलु अपनो न, हितू जननी न जनको ॥ लोकको न डरु, परलोकको न सोचु, देव- सेवा न सहाय, गर्बु धामको न धनको । रामही के नामतें जो होइ सोइ नीको लागै, ऐसोई सुभाउ कछु तुलसीके मनको ॥७७॥

१५१ उत्तरकाण्ड मैंने न तो जप किया, न तपस्याका क्लेश सहा और न मुझे योग, यज्ञ, वैराग्य, त्याग अथवा तीर्थकी ही इच्छा है। मुझे भाईका भी भरोसा नहीं है, और न वैरीसे भी जरा-सी शत्रुता है। मुझे अपना बल नहीं है और माता-पिता भी अपने हितैषी नहीं हैं, परन्तु मुझे न तो इस लोकका डर है और न परलोकका ही सोच है। देवसेवाका भी मुझे बल नहीं है और न मुझे धन-धामका ही गर्व है। तुलसीके मनका कुछ इसी तरहका स्वभाव है कि भगवान् रामके नामसे ही जो कुछ होगा वही उसे अच्छा लगता है।

ईसु न, गनेसु न, दिनेसु न, धनेसु न, सुरेसु, सुर, गौरि, गिरापति नहि जपने। तुम्हरेई नामको भरोसो भव तरिबेको, बैठें-उठें 'जागत-बागत, सोएँ, सपनें॥ तुलसी है बावरो सो रावरोई, रावरी सौं, रावरेऊ जानि जियँ कीजिए जु अपने। जानकीरमन मेरे ! रावरें बदनु फेरें, ठाउँ न समाउँ कहाँ, सकल निरपने ॥७८॥

मुझे शिव, गणेश, सूर्य, कुवेर, इन्द्रादि देवता, गौरी अथवा ब्रह्माको नहीं जपना है। संसारसे तरनेके लिये उठते-बैठते, जागते- घूमते, सोने एवं स्वप्न देखते—बस, आपके नामका ही भरोसा है। तुलसी यद्यपि बावला है, परन्तु आपकी सौगंध, है आपका ही। इस बातको अपने चित्तमें जानकर आप भी उसे अपना लीजिये। हे मेरे जानकीनाथ ! आपके मुख फेर लेनेपर मेरे लिये कहीं ठौर- ठिकाना नहीं रहेगा, मैं कहाँ रहूँगा? सभी बिराने हैं।

कवितावली १५२ जाहिर जहानमें जमानो एक भाँति भयो, बेंचिए विबुधधेनु, गसभी बेसाहिए। ऐसेऊ कराल कलिकालमें कृपाल! तेरे नामकें प्रताप न त्रिताप तन दाहिए॥ तुलसी तिहारो मन-बचन-करम, तॉहि नातें नेह-नेमु निज ओरतें निबाहिए। रंकके नेवाज रघुराज! राजा राजनिके, उमरि दराज महाराज तेरी चाहिए ॥७९॥ यह जमाना संसारमें इस बातके लिये प्रसिद्ध हो गया है कि कामधेनुको बेंचकर गधी खरीदी जाने लगी। ऐसे भयंकर कलिकालमें भी, हे कृपालो ! आपके नामके प्रतापसे त्रिताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) से शरीर दग्ध नहीं होता। गोसाईं- जी कहते हैं, मन-वचन-कर्मसे मैं आपका (भक्त) हूँ। इसी नाते आप अपनी ओरसे भी स्नेहके नियमको निभाइये। हे रंकोंपर कृपा करनेवाले, राजाओंके राजा महाराज रघुनाथजी! हमें तो आपकी उमर बड़ी चाहिये [फिर कोई खटका नहीं है]। स्वारथ सयानप, प्रपंचु, परमारथ कहायो राम! रावरो हौं, जानत जहान है। नामकें प्रताप, बाप! आजु लौं निबाही नीकें, आगेको गोसाईं! स्वामी सबल सुजान है॥ कलिकी कुचालि देखि दिन-दिन दूनी, देव! पाहरूई चोर हेरि हिय हहरान है।

१५३ उत्तरकाण्ड तुलसीकी, बलि, बार-बारहीं सँभार कीबी, जद्यपि कृपानिधानु सदा सावधान है ॥८०॥ मेरे स्वार्थके कामोंमें चतुराई और परमार्थके कामोंमें पाखण्ड भरा हुआ है । हे रामजी ! तो भी मैं आपका कहलाता हूँ और सारा संसार भी यही जानता है । हे पिता ! आपने नामके प्रतापसे आजतक अच्छी निभा दी और हे स्वामिन् ! आगेके लिये भी प्रभु समर्थ और सर्वज्ञ हैं । हे देव ! कलियुगकी कुचालको दिन- दिन दूनी बढ़ती देखकर और पहरेदारको भी चोर देखकर मेरा हृदय दहल गया है । हे कृपानिधान ! यद्यपि आप सदा ही सावधान हैं तथापि तुलसी बलिहारी जाता है, आप इसकी बार- बार सँभाल करते रहियेगा ( ताकि इसके मनमें विकार न आने पावे ) । दिन-दिन दूनो देखि दारिदु, दुकालु, दुख, दुरितु, दुराजु सुख-सुकृत सकोच है । मागें पैंत पावत पचारि पातकी प्रचंड, कालकी करालता, भलेको होत पोच है ॥ आपनें तौ एकु अवलंबु अंब डिंभ ज्यों, समर्थ सीतानाथ सब संकट त्रिमोच है । तुलसीकी साहसी सराहिए कृपाल राम ! नामकें भरोसें परिनामको निसोच है ॥८१॥ दिनोंदिन दरिद्रता, दुष्काल ( दुर्भिक्ष ), दुःख, पाप और कुराज्यको दूना होता देखकर सुख और सुकृत संकुचित हो रहे हैं । समय ऐसा भयंकर आ गया है कि बड़े-बड़े पापी तो डाँट-

कवितावली १५४ डपटकर माँगनेसे अपना दाँव पा लेते हैं और भले आदमीका बुरा हो जाता है । जैसे बालकको एकमात्र माँका ही सहारा होता है वैसे ही अपने तो एकमात्र सहारा सर्वसंकटोंसे छुड़ानेवाले और समर्थ श्रीसीतानाथका ही है । हे कृपालु रामजी ! तुलसीके साहसकी सराहना कीजिये कि वह ( आपके ) नामके भरोसे परिणामकी ओरसे निश्चिन्त हो गया है । मोह-मद मात्यो, रात्यो कुमति-कुनारिसों, बिसारि वेद-लोक-लाज, आँकरो अचेतु है । भावै सो करत, मुहँ आवै सो कहत, कछु काहूकी सहत नाहिं, सरकस हेतु है ॥ तुलसी अधिक अधमाई हू अजामिलतें, ताहूमैं सहाय कलि कपटनिकेतु है । जैबेको अनेक टेक, एक टेक ह्वैवेकी, जो पेट-प्रियपूत हित रामनामु लेतु है ॥८२॥ यह मोहरूपी मदसे उन्मत्त हो गया है, कुमतिरूपी कुलटा स्त्रीमें रत है, लोक और वेदकी लज्जाको त्याग कर बड़ा अचेत ( बेपरवाह ) हो गया है । मनमानी करता है और मुँहमें जो आता है वही [ बिना विचारे ] कह डालता है और उद्दण्डताके कारण किसीकी कोई बात सहता नहीं। गोसाईंजी कहते हैं कि इस प्रकार मुझमें अजामिलसे भी अधिक अधमता है; तिसपर भी कपटनिधान कलि मेरा सहायक है । बिगड़नेके तो अनेक मार्ग हैं परन्तु बननेका केवल एक रास्ता है; वह यह है कि यह पेटरूपी पुत्रके लिये रामनाम लेता है [ भाव यह है कि अधम अजामिल-

१५५ उत्तरकाण्ड ने पुत्रके मिससे भगवान्‌का नाम लिया था। मैंने भी पेटरूपी पुत्रके लिये उसीका आश्रय लिया है ]। कलिवर्णन जागिए न सोइए, बिगोइए जनमु जायँ, दुख, रोग रोइए, कलेसु कोह-कामको। राजा-रंक, रागी और विरागी, भूरिभागी,ये अभागी जीव जरत, प्रभाउ कलि बामको ॥ तुलसी ! कबंध-कैसो धाइबो,विचारु, अंध ! धंध देखिअत जग, सोचु परिनामको । सोइबो जो रामके सनेहकी समाधि-सुखु, जागिबो जो जीह जपै नीकें रामनामको ॥८३॥ (इस संसारमें) न तो हम जागते हैं, न सोते हैं; जीवनको व्यर्थ खो रहे हैं। दुःख और रोगके कारण रोते हैं और काम- क्रोधका क्लेश (मानसिक व्यथा) सहते हैं। राजा-रंक, रागी- विरागी और महाभाग्यवान् तथा अभागी, सभी जीव जल रहे हैं; कुटिल कलियुगका ऐसा ही प्रभाव है। गोसाईंजी अपने लिये कहते हैं कि अरे अंधे ! विचार कर, इस जगत्‌में जितने धंधे दिखायी देते हैं वे सब कबन्ध (बिना सिरवाले रुण्ड) की दौड़के समान हैं, जिनका अन्त चिन्ता ही है। श्रीरामप्रेमकी समाधिका जो सुख है वही सोना है और जिह्वा भलीभाँति रामनाम जपे—यही जागना है। बरन-धरमु गयो, आश्रम निवासु तज्यो, त्रासन चकित सो परावनो परो-सो हैं ।