लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
( १८० ) लीलावती। अन्वयः-हे सखे ! किल यत्र विष्कम्भमानं सप्त तत्र परिधेः प्रमाणं तथा यत्परि- धिप्रमाणं द्वाविंशतिः तद्व्याससंख्यां च विचिन्त्य प्रचक्ष्व ॥ २४ ॥ अर्थः-हे मित्र ! निश्चय जहाँ वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण ७ है तहां परिधिका प्रमाण क्या होगा ? तथा जिस वृत्तक्षेत्रकी परिधिका प्रमाण २२ है उसके व्यासका क्या प्रमाण होगा ? सो कहो ॥ २४ ॥ न्यासः- व्यासमानम् ७ लब्धं परिधिप्रमाणम् २१ १२३९/१२५० स्थूलो वा परिधिः लब्धः २२ अथवा परिधितो व्यासानयनाय गुणहारविपर्ययेण व्यासमानम् सूक्ष्मम् ७ ११/३९२७ स्थूलं वा ७ फैलाव-इस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका मान ७ सात है; इस व्यास मानको जानकर परिधिका मान जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई "व्यासे भनन्दाग्नीत्यादि" रीतिके अनुसार इष्ट माने हुए व्यासमान ७ सातको ३९२७ तीन हजार नौसौ सत्ताईससे गुणा किया तब २७४८९ हुए; इसमें १२५० एक हजार दोसौ पचासका भाग दिया; तब २१ १२३९/१२५० मिले; यही परिधिका प्रमाण है; परन्तु यह सूक्ष्मपरिधिका प्रमाण है, स्थूलपरिधि जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यासमान ७ सातको २२ बाईससे गुणा किया तब १५४ हुए; इनमें ७ सातका भाग दिया तब २२ लब्ध हुए यह भी परिधिका ही प्रमाण है परन्तु यह स्थूल अर्थात व्यवहार योग्य परिधिका मान है ॥
क्षेत्रव्यवहारः। (१८१) जब परिधि जानकर व्यासमान जाननेका प्रश्न है तब गुणक और हरका पलटा करलिया अर्थात् सूक्ष्म व्यास जाननेकी रीतिमें तो जो पहले ३९२७ तीन हजार नौसौ सत्ताईस गुणक था, उसको हर माना और जो १२५० एक हजार दोसौ पचास हर था; उसको गुणक मान लिया, तिसी प्रकार स्थूल व्यास लानेके निमित्त पहले कही हुई रीतिमें गुणक २२ बाईसको हर माना और हर ७ सातको गुणक माना जैसे जहां २२ बाईस परिधि है तहां व्यास लानेके लिये परिधि २२ को १२५० से गुणा किया तब २७५०० हुए इनमें ३९२७ का भाग दिया तब मिले ७ ११/३९२७ यह सूक्ष्मव्या- सका मान मिला अब स्थूल मान जाननेके निमित्त परिधि २२ को ७ सातसे गुणा किया तब १५४ हुए इनमें २२ का भाग दिया तब ७ सातसे गुणा किया तब १५४ हुए इनमें २२ का भाग दिया तब ७ सात लब्धि हुए यही व्यवहार योग्य स्थूलव्यासका मान मिला. वृत्तगोलयोः फलानयने करणसूत्रं वृत्तम्-- समभूमिमें जो गोल आकार वृत्तक्षेत्र है और नीम्बूकी आकारका जो गोल है उसका फल जाननेकी रीति एक श्लोकमें- वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलं तत् क्षुण्णं वेदैरुपरि परितः कन्दुकस्येव जालम् ॥ गोलस्यैवं तदपि च फलं पृष्ठजं व्यासनिघ्नम् षड्भिर्भक्तं भवति नियतं गोलगर्भे घनाख्यम् ॥ ४२ ॥ अन्वयः-वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलं स्यात्। तत् वेदैः क्षुण्णं कन्दुकस्य उपरि परितः जालम् इव फलम् भवति । एवं यत् गोलस्य पृष्ठजम् फलं जातं तत् अपि च व्यासनिघ्नं षड्भिः भक्तं गोलगर्भे घनाख्यं नियतम् फलम् भवति ॥ ४२ ॥ अर्थः-वृत्तक्षेत्रमें व्यासके चौथे भागको परिधिसे गुणनेपर जो अङ्क हों वह फल होता है, उसी फलको चारसे गुणा करनेपर जो अङ्क हो वह गोलके ऊपर चारों ओर गुँथा हुआ गेंदके जालके समान क्षेत्रफल होता है, इस प्रकार गोलके ऊपरका गेंदके जालके समान जो फल मिलता है, उसको व्याससे गुणाकर छ ६ का भाग देनेसे जो फल मिले वह गोलके भीतरका घन नामवाला नियत फल होता है॥४२॥ उदाहरणम्- यद्व्यासस्तुरगैर्मितः किल फलं क्षेत्रे समे तत्र किं व्यासः सप्तमितश्च यस्य सुगते गोलस्य तस्यापि किम् ॥
( १८२ ) लीलावती। पृष्ठे कन्दुकजालसन्निभफलं गोलस्य तस्यापि किं मध्ये ब्रूहि घनं फलं चे विमलां चेद्वेत्सि लीलावतीम् ॥२५॥ अन्वयः-हे सुमते! चेद्विमलां लीलावतीं वेत्सि तर्हि किल यद्व्यासः तुरगैःमितः तत्र समे क्षेत्रे फलं किम् ? यस्य च गोलस्य सप्तमितः व्यासः तस्य अपि पृष्ठे कन्दुकजाल- सन्निभफलं किम् ? तथा तस्य अपि गोलस्य मध्ये घनम् फलं किम्? इति मे ब्रूहि ॥२५॥ अर्थः-चतुरधुरीण ! यदि अच्छी तरह लीलावतीको जानते हो तो निश्चय करके कहो कि, जहां व्यासका प्रमाण तुरग कहिये ७ सात है, तिस समवृत्त क्षेत्रमें फल क्या होगा ? और जिस गोल क्षेत्रके व्यासका प्रमाण सात है, उसकी पीठपर गेंदके जालके समान क्या फल होगा ? तथा उसी गोलके भीतर घनफल क्या होगा ? यह सब मुझसे कहो ॥ २५ ॥ वृत्तक्षेत्रफलदर्शनाय- २४२३ / ३८ ५००० न्यासः- व्यासः- ७ परिधिः २१ १२३९/१२५० क्षेत्रफलम् ३८ २४२३/५००० गोलपृष्ठफलदर्शनाय- व्यासः-७ ७ गोलपृष्ठफलम् १५३ ११७३/१२५० न्यासः- १५३ ११७३/१२५० गोलान्तर्गतघनफलदर्शनाय- व्यासः ७ गोलस्यान्तर्गतघन- फलम् १७९ १४८७/२५०० न्यासः- ७ १७९ १४८७/२५०० CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
क्षेत्रव्यवहारः । ( १८४ ) फैलाव-जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण ७ सात है, वहाँ फल जाननेके लिये पहिले कही हुई रीति के अनुसार परिधिके प्रमाण लाये तो $\frac{८७४८०}{१२५००}$ मिले, इसको ऊपर कही हुई रीति के अनुसार व्यासकी चौथाइ $\frac{७}{४}$ से गुणा किया तो हुए $\frac{१९२४२३}{५०००}$ इसके अंशमें हरका भाग दिया तब ३८ $\frac{२४२३}{५०००}$ मिले; यही वृत्तक्षेत्रका फल हुआ अब गोलके ऊपर जो गेंदका जालके समान फल है, उसके जाननेके लिये व्यास ७ का ऊपर कही हुई रीति के अनुसार जो वृत्तक्षेत्रका फल आया है, ३८ $\frac{२४२३}{५०००}$ इसको चौगुना किया तो १६३ $\frac{११७३}{१२५०}$ हुए. यही गोलके ऊपर गेंदके जालके समान क्षेत्रफल हुआ, अब गोलके भीतरका घनफल लानेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार व्यास ७ से गेंदके जालके समान जो फल मिला है, १६३ $\frac{११७३}{१२५०}$ उसको व्यास ७ से गुणा किया, फिर ६ ६ का भाग दिया तब १७९ $\frac{१४८७}{२५००}$ मिले, यही गोलके भीतरका घननामवाला फल हुआ. अथ प्रकारान्तरेण तत्फलानयने करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- अब दूसरी रीति से वृत्तक्षेत्रका फल लानेके लिये डेढ श्लोक लिखते हैं- व्यासस्य वर्गे भनवाग्निनिघ्ने सूक्ष्मं फलं पंचसहस्रभक्ते ॥ रुद्राहते शक्रहतेऽथवा स्यात्स्थूलं फलं तद्व्यवहारयोग्यम् ४३॥ घनीकृतव्यासदलं निजैकविंशांशयुग्गोलघनं फलं स्यात्॥ अन्वयः-भनवाग्निनिघ्ने व्यासस्य वर्गे पञ्चसहस्रभक्ते सति सूक्ष्मम् फलम् भवति अथवा रुद्राहते व्यासस्य वर्गे शक्रहृते सति यत् फलं तत् व्यवहारयोग्यं स्थूलम् फलं स्यात् । निजैकविंशांशयुक् घनीकृतव्यासदलं गोलघनम् फलं स्यात् ॥ ४३ ॥ ss ॥ अर्थः-व्यासके वर्गको ३९२७ तीन हजार नौसौ सत्ताईससे गुणा करके जो गुणनफल हो उसमें पांचहजारका भाग देनेसे जो मिले वह वृत्तक्षेत्रका सूक्ष्म फल होता है और व्यासके वर्गको ११ ग्यारहसे गुणा करके जो गुणनफल हो उसमें १४ चौदहका भाग देनेसे जो फल मिले वह वृत्तक्षेत्रमें व्यवहारके योग्य स्थूल फल
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( १८४ ) लीलावती । होता है और व्यासका घन करके उसको आधा करके जो अङ्क हो उसमें उसका एकीसवाँ भाग जोड दे, तब जो अंक हो वह वृत्तक्षेत्रके भीतरका घनफल होता है ॥ ४३ ॥ ऽऽ ॥ उदाहरण पहले कहा हुआ ही जानना । व्यासः ७ अस्य वर्गे ४९ भनवाग्नि ३९२७ निघ्ने पञ्च- सहस्र ५००० भक्ते तदेव सूक्ष्मं फलम् ३८ २४०३/५००० अथवा व्यासस्य वर्गे ४९ रुद्रा ११ हते ५३९ शक्र १४ हते लब्धं स्थूलं फलम् ३८ १/२ घनीकृतव्यासदलम् ३४३/२ निजै- कविंशांशयुक् गोलस्य घनफलं स्थूलम् १७९ १/२ फैलाव-पहले उदाहरणमें दिये हुए वृत्तक्षेत्रके व्यासका प्रमाण ७ है, उसकी ऊपर कही हुई रीति के अनुसार वर्ग किया तो ४९ उनचास हुए इनको ३९२७ तीन हजार नौसौ सत्ताईससे गुणा किया तब १९२४२३ हुए इनमें ५००० पांच हजारका भाग दिया तो ३८ २४०३/५००० मिले, यह वृत्तक्षेत्रका वही सूक्ष्म फल मिला, जो कि, पहली रीतिसे मिला था और उसी व्यास ७ के वर्ग ४९ को ११ ग्यारहसे गुणा किया तब ५३९ पांचसौ उन्तालीस हुए, इसमें १४ चौदहका भाग दिया तो ३८ १/२ मिले, यह स्थूलफल हुआ और व्यास ७ के घन ३४३ के आधे ३४३/२ को अपने इक्कीसवें भाग ३४३/४२ से युक्त किया तो ७५४६/४२ हरका भाग देनेसे १७९ १/२ मिले, यही घनफल हुआ. (स्थूल है, ) ॥ शरजीवानयनाय करणसूत्रं सार्द्ध वृत्तम्- शर और जीवा (ज्या) लानेकी रीति डेढ श्लोकमें- वृत्तक्षेत्रके बीचमें जो आडी लकीर खेंची जाती है; उसको जीवा कहते है और उसीको 'ज्या' कहते हैं, इस रेखाके खेंचनेसे वृत्तक्षेत्रमें धनुषका आकार बनजाता है और जीवाके बीचमेंसे परिधिकी रेखापर्यन्त एक ही रेखा खेंची जाती है, उसको शर कहते हैं, जीवाकी रेखा और शरकी रेखा खेंचनेसे वृत्तक्षेत्रमें बाण चढे हुए धनुषकेसा आकार बन जाता है ॥ ज्याव्यासयोगान्तरघातमूलं व्यासस्तदूनो दलितः शरः स्यात् ॥ ४४ ॥ व्यासाच्छरोनाच्छर संगुणाच्च मूलं द्विनि- घ्नं भवतीह जीवा ॥ जीवाद्धवर्गे शरभक्तयुक्ते व्यासप्रमाणं प्रवदन्ति वृत्ते ॥ ४५ ॥
क्षेत्रव्यवहारः। (१८६) अन्वयः-यत् ज्याव्यासयोगान्तरघातमूलं तदूनः व्यासः दलितः कार्यः तदा शरः स्यात् ! शरोनात् शरसंगुणात् च व्यासात् यत् मूलं लभ्येत तत् द्विनिघ्नम् इह जीवा भवति । जीवाद्धेवर्गे शरभक्तयुक्ते सति वृत्ते व्यासप्रमाणम् प्रवदन्ति ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ अर्थः- जीवा और व्यासके योगको जीवा और व्यासके अन्तरसे गुणा करे तब जो अंक हों उनका जो मूल मिले उसे व्यासमें घटा दे तब जो शेष रहे उसको आधा करनेसे जो अंक मिले, वह शरका प्रमाण होता है. व्यासके प्रमाणमें शरका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहे, उसे शरके प्रमाणसे गुणा करे तब जो अंक हों उनका मूल ले जो अंक मिलें उनको दोसे गुणा करे तो वृत्तक्षेत्रमें जीवाका प्रमाण होता है और जीवाको आधा कर उसका वर्ग करे, उसमें शरका भाग देनेसे जो अंक मिले उनको शरमें जोड दे तो वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण मालूम हो जाता है, ऐसा गणितके जाननेवाले कहते हैं ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ उदाहरणम्- दशविस्तृतिवृत्तान्तर्यत्र ज्या षण्मिता सखे ॥ तत्रेषुं वद बाणाज्ज्यां ज्याबाणाभ्याञ्च विस्तृतिम् ॥ २६ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यत्र दशविस्तृतिवृत्तांतः ज्या षण्मिता अस्ति तत्र इषुं वद । बाणात् ज्यां वद, ज्याबाणाभ्यां विस्तृतिं च वद ॥ २६ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण दश १० है ज्याका प्रमाण छ ६ हैतहां शरका प्रमाण कहो और बाण ( शर ) का प्रमाण जानकर ज्याका प्रमाण कहो, ज्या और शरका प्रमाण जानकर व्यासका प्रमाण भी कहो ॥ २६ ॥ व्यासः- १० ज्या ६ योगः १६ न्यासः- अन्तरम् ४ घातः ६४ अस्य मूलम् ८ एतदूनो व्यासः २ दलितः १ जातः शरः १ ॥ फैलाव-जहां वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण १० है और ज्याका प्रमाण ६ छ है, वहां शरका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यास १० और ज्या ६ का योग किया तो सोलह १६ हुए, इन ही १० । ६ दोनोंका अन्तर किया तब ४ हुए, इससे व्यास और ज्याके योग १६ को गुणा किया तो ६४ चौसठ हुए इसका मूल लिया तो ८ आठ मिले इसको व्यासमें घटाया तो २ शेष रहे इसका आधा किया तो १ रहा, यही शरका प्रमाण है ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
( १८६ ) लीलावती । अब व्यासका प्रमाण १० और शरका प्रमाण १ जानकर जीवाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यास और शर १० । १ के अन्तर ९ नौको शर १ से गुणा किया तो ९ नौ ही हुए, इसका मूल लिया तो ३ तीन मिले इनको दुगुना किया तो ६ छह हुए यही जीवाका प्रमाण है ॥ अब शर और जीवाका प्रमाण जानकर व्यासका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार जीवा ६ का आधा किया तो तीन ३ हुए, इसका वर्ग किया तो ९ हुए इसमें शर १ का भाग दिया तो मिले ९ इसमें शर १ को जोडा तो हुए १० दश यही व्यासका प्रमाण है। अथ वृत्तान्तरुत्र्यस्रादिनवास्रान्तक्षेत्राणां भुजमानानयनाय करणसूत्रं वृत्तत्रयम्– वृत्तक्षेत्रके भीतर समत्रिकोणको आदि ले नवकोणपर्यन्त क्षेत्रोंके भुजका प्रमाण लानेके लिये रीति तीन श्लोकोंमें– त्रिद्व्यङ्काग्निभश्चन्द्रै १०३९२३ स्त्रिबाणाष्टयुगाष्टभिः ॥ ८४८५३ ॥ वेदाग्निबाणखाश्वैश्च ७०५३४ खखाभ्राभ्र- रसैः ६०००० क्रमात् ॥ ४६ ॥ बाणेषुनखबाणैश्च ५२०५५ द्विद्विनन्देषुसागरैः ४५९२२ ॥ कुरामदशवेदैश्च ४१०३१ वृत्ते व्यासे समाहते ॥ ४७ ॥ खखखाभ्रार्क- १२०००० सम्भक्ते लभ्यंते क्रमशोग्भुजाः ॥ वृत्तान्तरुय- स्रपूर्वाणां नवास्रान्तं पृथक्पृथक् ॥ ४८ ॥ अन्वयः–त्रिद्व्यङ्काग्निभश्चन्द्रैः त्रिबाणाष्टयुगाष्टभिः वेदाग्निबाणखाश्वैः खखा भ्राम्ररसैः बाणेषुनखवाणैः द्विद्विनन्देषुसागरैः तथा कुरामदशवेदैः च क्रमात् वृत्तव्यासे समाहते ततः खखखाभ्रार्कसम्भक्ते सति वृत्तान्तः ऽत्र्यस्रपूर्वाणां नवास्रान्तं क्रमशः पृथक्पृथक् भुजा लभ्यंते ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ अर्थः–१०३९२३ एक लाख तीन हजार नौसौ तेईससे और ८४८५३ चौरासी हजार आठसौ तिरपनसे, ७०५३४ सत्तर हजार पांचसौ चौंतीससे, ६०००० साठ हजारसें, ५२०५५ बावन हजार पचपनसे, ४५९२२ पैंतालीस हजार नौसौ वाईससे और ४१०३१ इकतालीस हजार इकतीससे क्रमसे वृत्तक्षेत्रके व्यासको अलग २ गुणा करे, फिर सब स्थानोंमें १२०००० एक लाख बीस हजारका भाग दे तो
क्षेत्रव्यवहारः । ( १८७ ) वृत्तक्षेत्रके भीतरके त्रिकोणसे लेकर नवकोणपर्य्यन्त की भुजा क्रमसे अलग २ मिलती हैं ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ उदाहरणम्- सहस्रद्वितयव्यासं यद्वृत्तं तस्य मध्यतः ॥ समत्र्यस्रादिकानां मे भुजान्वद पृथक्पृथक् ॥ २७ ॥ अन्वयः-यद्वृत्तं सहस्रद्वितयव्यासं तस्य मध्यतः समत्र्यस्रादिकानाम् भुजान् मे पृथक्पृथक् वद ॥ २७ ॥ अर्थः-जिस वृत्तक्षेत्रका व्यास २००० दो हजार है; उसके भीतर समत्रिकोणको आदि ले नवकोणपर्य्यन्त क्षेत्रोंके भुजाओंका प्रमाण मुझसे अलग २ कहो ॥ २७ ॥ अथ वृत्तान्तस्त्रिभुजे भुजमानायननाय- न्यासः- व्यासः २००० त्रिद्व्यंकाग्निन- भश्चन्द्रै १०३९२३ गुणितः २०७८४६००० खखखाभ्रा- कै १२०००० भक्ते लब्धं त्र्यस्रे भुजमानम् १७३२ ३/६० वृत्तान्तश्चतुर्भुजे भुजमानायननाय । न्यासः- व्यासः २००० त्रिबाणाष्टयु- गाष्टभि ८४८५३ गुणितैः १६९७०६००० खखखाभ्रा- कै १२०००० भक्ते लब्धं च- तुरस्रे भुजमानम् १४१४ १३/६०
( १८८ ) लीलावती । वृत्तान्तः पञ्चभुजे भुजमानानानयनाय । न्यासः- व्यासः २००० वेदाग्निबाण- खाश्वै ७०५३४ गुणितः १४१०६८००० खखखाभ्राकैं १२०००० भक्ते लब्धं पंचा- स्रे भुजमानम् ११७५ १७/३० वृत्तान्तः षड्भुजे भुजमानानानयनाय । न्यासः- व्यासः २००० खखाभ्राभ्र- रसै ६०००० गुणितः १२००००००० खखखा- भ्राकैं १२०००० भक्ते लब्धं षडस्रे भुजमानम् १००० वृत्तान्तः सप्तभुजे भुजमानानानयनाय । व्यासः २००० बाणेषुनखबाणै ५२०५५ गुणितः १०४११०००० खखखाभ्राकैं १२०००० भक्ते लब्धं सप्तास्रे भुजमानम् ८६७ ९/१३ वृत्तान्तरष्टभुजे भुजमानानानयनाय । व्यासः २००० द्विद्विनन्देषुसागरै- ४५९२२ गुणितः ९१८४४००० खखखाभ्राकैं १२०००० भक्ते लब्धमष्टास्रे भुजमानम् ७६५ ११/३०
क्षेत्रव्यवहारः। (१८९) वृत्तान्तर्नवसुजे भुजमानाऽऽनयनाय । व्यासः २००० कुरामदशवेदै- ४१०३१गुणितः ८२०६२००० खखखाभ्रार्कै १२०००० भक्ते लब्धं नवास्त्रे भुजमानम् ६८३ १७/२० एवमिष्टव्यासादिभ्योऽन्या अपि जीवाः सिद्धयन्तीति तास्तु गोले ज्योत्पत्तौ वक्ष्ये ॥ फैलाव—जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण २००० दो हजार है, उसके भीतर खेंचे हुए त्रिभुज क्षेत्रकी भुजाओंका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई राशिके अनुसार व्यासके प्रमाण २००० को एक लाख तीन हजार नौसौ तेईस १०३९२३ से गुणा किया तो २०७८४६००० बीस करोड अठत्तर लाख छियालीस हजार हुए, इसमें १२०००० एक लाख बीस हजारका भाग दिया तो १७३२ ९/२० मिले, यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत त्रिभुजकी भुजाका प्रमाण है ॥ अब उसी २००० व्यासवाले वृत्तक्षेत्रमें चतुष्कोण क्षेत्रके भुजका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार व्यास प्रमाण २००० को चौरासी हजार आठसौ तिरपन ८४८५३ से गुणा किया तब १६९७० ६००० सोलह कोटि सतानबे लाख छ हजार हुए, इसमें एक लाख बीस हजार १२०००० का भाग दिया तब १४१४ १३/६० लब्धि हुए; यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत चतुर्भुजका भुजकी प्रमाण है ॥ अब उसी व्यास २०० वाले वृत्तक्षेत्रमें होनेवाले पंच कोण क्षेत्रकी भुजाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कहीं हुई रीति के अनुसार व्यास प्रमाण २००० का सत्तर हजार पाँचसौ चौंतीस ७०५३४ से गुणा किया तब १४१०६८००० चौदह कोटि दशलाख अडसठ हजार हुए; इसमें १२००० एक लाख बीस हजारका भाग दिया तब ११७५ १७/३० लब्धि हुए; यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत पंच- कोणका भुजाका प्रमाण है ॥
( १९० ) लीलावती । अब उसी व्यास २०० वाले वृत्तक्षेत्रके भीतर होनेवाले षट्कोणक्षेत्रके भुजका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यासके प्रमाण २००० का साठ हजार ६००० से गुणा किया तो १२००००००० बारहकोटि हुए इसमें एक लाख बीसहजार १२०००० का भाग दिया तबकी १००० लब्धि हुए, यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत षट्कोण भुजाका प्रमाण है. उसी वृत्तक्षेत्रकी भीतर होनेवाला सप्तकोण क्षेत्रका भुजका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यास २००० को बावन हजार पचपन ५२०५५ से गुणा किया तब १०४११०००० दशकोटि इकतालीस लाख दश हजार हुए; इसमें एक लाख बीस हजार १२०००० का भाग दिया तब ८६७,७/१२ लब्धि हुए यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत सप्तकोणकी भुजका प्रमाण है॥ उसी २००० व्यासवाले वृत्तक्षेत्रके भीतर होनेवाले अष्टकोणक्षेत्रकी भुजाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यास २००० का पैंतालीस हजार नौसौ बाईससे गुणा किया तब ९१८४२००० नौ कोटि अठारह लाख चौवालीस हजार हुए इसमें एक लाख बीस हजार १२०००० का भाग दिया तब ७६५,११/३० लब्धि हुए; यही वृत्तक्षेत्रान्तर्गत अष्टकोण क्षेत्रकी भुजाका प्रमाण हुआ ॥
क्षेत्रव्यवहारः। ( १९१ ) उसी २००० व्यासवाले वृत्तक्षेत्रमें होनेवाले नवकोण क्षेत्रके भुजाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यास २००० का इकतालीस हजार [चित्र: नवकोण. व्यास २०००, ६८३ १७/३०] इकतीस ४१०३१ से गुणा किया तो आठ करोड बीस लाख बासठ हजार ८२०६२००० हुए; इसमें एक लाख बीस हजार १२०००० का भाग दिया तब ६८३ १७/३० लब्धि हुए, यही ऊपर कहे हुए वृत्तक्षेत्रके अन्तर्गत नवकोणक्षेत्रकी भुजाका प्रमाण है ॥ इस प्रकार इष्टव्यास कल्पना करके इन व्यासोंसे और भी अनेक प्रकारकी जीवा सिद्ध हो सकती है; परन्तु वह गोलाध्यायकी जीवा उत्पत्तिके विषयमें कहेंगे ॥ अथ स्थूलजीवाज्ञानार्थं लघुक्रियया करणसूत्रं वृत्तम्- अब स्थूलजीवाओंके जाननेके लिये सरल रीति कहते हैं एक श्लोकमें- चापोननिघ्नपरिधिः प्रथमाह्वयः स्यात्पञ्चाहतः परिधिवर्ग- चतुर्थभागः ॥ आद्योनितेन खलु तेन भजेच्चतुर्घ्नव्यासाहतं प्रथममाप्तमिह ज्यका स्यात् ॥ ४९ ॥ अन्वयः-चापोननिघ्नपारिधिः प्रथमाह्वयः स्यात् । परिधिवर्गचतुर्थभागः पञ्चाहतः कार्य्यः । आद्योनितेन तेन चतुर्घ्नव्यासाहतं प्रथमम् भजेत् तदा यत् आप्तं तत् खलु इह ज्यका स्यात् ॥ ४९ ॥ अर्थः-धनुषको परिधिमें घटावे; जो बाकी रहे उससे परिधिको गुणा करे; तब जो गुणनफलके अङ्क हों उनको "प्रथम" कहते हैं; परिधिका वर्ग करनेसे जो अङ्क हों उनके चौथे भागको पांचसे गुणा करे तब जो अङ्क हो उसमें प्रथमको घटावे; जो शेष रहे, उसको चतुर्गुण व्याससे गुणा करे हुए प्रथममें भाग ले; जो लब्धि हो वह निश्चय करके वृत्तक्षेत्रमें जीवाका प्रमाण होता है; परन्तु यह जीवा स्थूल होती है ॥ ४९ ॥ उदाहरणम्- अष्टादशांशेन वृत्तेःसमानमेकादिनिघ्नेन च यत्र चापम् ॥ पृथक्पृथक्तत्र वदाशु जीवां खार्कैर्मितं व्यासदलं च यत्र ॥२८॥
( १९२ ) लीलावती । अन्वयः-यत्र व्यासदलं खार्कैः मितम् यत्र चापं च वृत्तेः अष्टादशांशेन समानम् । तत्र एकादिनिघ्नेन वृत्तेः अष्टादशांशेन समानं चापं तथा जीवां च पृथक् पृथक् आशु वद ॥ २८ ॥ अर्थः-जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका आधा १२० है. अर्थात् व्यासका प्रमाण २४० दोसौ चालीस है और धनुषका प्रमाण परिधिके अठारहमें भागके समान है; तहां उस धनुषकी जीवा कहो और एक, दो, तीन, चार, पांच, छ, सात, आठ और नौ आदिसे गुणा किये हुए उसी धनुषकी जीवा भी अलग अलग कहो ॥ २८ ॥ व्यासः व्यासदलम् १२० व्यासः २४० धनुः ४२ अत्र किलांकलाघवाय विंशतेः १२० सार्द्धार्कशतांश २०/१२६० मिलितः व्यासार्द्ध. सूक्ष्मपरिधिः ७५४ अस्याष्टा- २४० दशांशः ४२ अत्राप्यंकला- २३६ घवाय द्वयोरष्टादशांश २/१८ २२६ युतो गृहीतः अनेन पृथक् २०८ १८४ १५४ १२० ८२ ४२ पृथगेकादिगुणितेन तुल्ये धनुषि कल्पिते ज्याः साध्याः ॥ अथवाऽत्र सुखार्थं परिधेरष्टादशांशेन परिधिं धनुषि चापव- र्ग्य ज्याः साध्यास्तथापि ता एव भवंति अपवर्तिते न्यासः- परिधिः १८ चापानि च १। २। ३। ४। ५। ६। ७। ८। ९ यथोक्तकरणेन लब्धा जीवाः ४२। ८२ । १२०। १५४। १८४। २०८। २२६। २३६। २४० ॥ फैलाव-इस वृत्तक्षेत्रके व्यासका प्रमाण २४० है अब इसी व्याससे परिधि जान- नेके लिये पहले कही हुई "व्यासे भनंदाग्नि'-इत्यादि क्रिया करी तो परिधिका प्रमाण ७५४. मिला, परन्तु यहाँ ७५४ परिधि, २०/१२६० यह भाग अर्थात् बीसका
क्षेत्रव्यवहारः। (१९३) न्यास: साढे बारहसौमा भाग कमती रहता तो भी अङ्क लाघवके अर्थ ७५४ कोई सूक्ष्म परिधि माना, इस परिधिका अठारहमा भाग ४२ बयालीस हुआ यही पहिला धनुष हुआ परन्तु इस धनुषमें भी १/२८ दोका अठारहवां भाग हीन है तथापि गणितकी सुग- मताके अर्थ इसको ही ४२ पहिला धनुष माना यही अङ्क दुगुना कर- नसे दूसरा तिगुना करनैसे तीसरा; चौगुना करनेसे चौथा, पँचगुना करनेसे पांचवां; छ गुणा करनेसे छठा सात गुना करनेसे, सातवां आठ गुना करनेसे और आठवाँ नौगुणा करनेसे नौव धनुष होता है; अथवा क्रियालाघवके अर्थ परिधिके अठारहवें भाग अर्थात् प्रथम धनुष४२ का परिधि हुआ तथा सब धनुषोंका परिवर्तन दिया तब परिधिका प्रमाण १८ हुआ; तथा अपवर्तित धनुषोंके प्रमाण १। २। ३। ४। ५। ६। ७। ८। ९। हुए; अब इन ही धनुषोंसे जीवाओंके प्रमाण जाननेके लिये; ऊपर कही हुई रीति के अनुसार प्रथम धनुषको परिधि १८ मेंसे घटाया तो १७ शेष रहे; इनको धनुष १ से गुणा किया तो १७ हुए; इस अंककी प्रथम संज्ञा है फिर परिधि १८ का वर्ग किया तो ३२४ हुए; इसका चौथाई ८१ हुआ इसको पांचसे गुणा किया तो ४०५ हुए; इसमें पहले साधे हुए प्रथम १७ को घटाया तो ३८८ बचे; इसका चौगुने व्यास ९६० से गुणा करे हुए प्रथमसंज्ञक अंक १६३२० में भाग दिया तब ४२मिले; यह पहिली जीवाका प्रमाण हुआ; यहां भाग देनेके अनन्तर २४ शेष रह जाता है; परन्तु थोडे अन्तरके कारण सावयव नहीं लेते हैं; इसी प्रकार प्रथमसंज्ञक अंकको सिद्ध कर ऊपर कही हुई रीति के अनुसार सब धनुषोंकी जीवा क्रमसे ४२। ८२। १२०। १५४। १८४। २०८। २२६। २३६। २४० हुई॥ अथ चापानयनाय करणसूत्रं वृत्तम्- व्यास और जीवा जानकर चापजाननेकी रीति एक श्लोकमें- व्यासाब्धिघातयुतमौर्विकया विभक्तो जीवांघ्रिपञ्चगुणितः परिधेस्तु वर्गः ॥ लब्धोनितात्परिधिवर्गचतुर्थभागादात्ते पदे वृतिदलात्पतिते धनुः स्यात् ॥ ५० ॥ १३
( १९४ ) लीलावती । अन्वयः-जीवांघ्रिपञ्चगुणितः परिधेः वर्गः व्यासाब्धिघातयुतमौर्विकया विभक्तः कार्य्यः ततः लब्धोनितात् परिधिवर्गचतुर्थभागात् आप्ते पदे ततः वृतिदलात् पतितं शेषं धनुः स्यात् ॥ ५० ॥ अर्थः-जीवाके चौथे भागसे और पांचसे परिधिके वर्गको गुणा करे तब जो अंक हों उनमें चारसें गुणा करे हुए व्याससे युक्त जीवाका भाग दे तब जो लब्धि हो उसको परिधिके वर्गके चौथे भागमें घटावे जो शेष रहे उसका मूल ले उस मूलको परिधिके आधेमें घटावे तब जो शेष रहे वह धनुष होता है ॥ ५०॥ उदाहरणम्- विहिता इह ये गुणास्ततो वद तेषामधुना धनुर्मितिम् ॥ यदि तेऽस्ति धनुर्गुणक्रियागणिते गाणितिकातिनैपुणम् २९ ॥ अन्वयः-हे गाणितिक ! यदि ते धनुर्गुणक्रियागणिते अतिनैपुणम् अस्ति तर्हि इह ये गुणाः विहिताः अधुना ततः तेषां धनुर्मितिम् वद ॥ २९ ॥ अर्थः-हे गणितशास्त्रके जाननेवाले ! यदि तुम्हारी चाप और ज्याकी गणितमें कुछ चतुरता हो तो जो ज्या ४२ । ८२ । १२० । १५४ । १८४ । २०८ २२६ । २३६ । २४० पीछे उदाहरणमें कह आये हैं अब उनही ज्याओंके चापोंका प्रमाण कहो ॥ २९ ॥ न्यासः-पूर्वसाधिता ज्याः ४२ । ८२ । १२० । १५४ । १८४ । २०८ । २२६ । २३६ । २४० स एवापवर्तितपरिधिः १८ । जीवांघ्रिणा ४२/४ पंचभिश्च परिधे १८ वर्गो ३२४ गुणितः ५७०१० व्यासा २४० ब्धि ४ घात ९६० युत- मौर्विकयानया १०००२ विभक्तो लब्धः १७ अत्रांक- लाघवाय चतुर्विंशतेर्द्वयधिकसहस्रांश २४/१००२ युतो गृहीतो- ऽनेनोनितात्परिधिवर्ग३२४चतुर्थभागा८१ त् ८ वति १८दलात् ९ पतिते १ जातं धनुः एवं जातानि धनूंषि १ । २ । ३ । ४ । ५ । ६ । ७ । ८ । ९ एतानि परिधिष्वष्टादशांशेन गुणितानि स्युः ॥ ॥ इति श्रीसुप्रसिद्धानैकतन्त्रश्रीपाण्डितभास्कराचार्य्यविरचितायां लीलावत्यां क्षेत्रव्यवहारनिरूपणं नाम प्रकरणं समाप्तम् ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
क्षेत्रव्यवहारः। (१९६) फैलाव-पहलें उदाहरणमें साधी हुई जीवाओंसे चापोंका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार परिधि १८ के वर्ग ३२४ को जीवाके चौथे भाग २१/२ से और पांचसे; अथवा पांचसे गुणा किये हुए जीवाके चौथे भाग १०५/२ से गुणा किया तो १७०१० हुए; इसमें चार ४ से गुणा करे हुए व्यास ९६० से युक्त जीवा १००२ का भाग दिया तब १७ सत्रह लब्धि हुए; भाग देनेपर इसमें २४/१००२ न्यून था तथा गणितमें सुगमता हो इसलिये पूरा १७ ही ले लिया इसको परिधि वर्ग ३२४ के चौथे भाग ८१ में घटाया तो ६४ चौंसठ बचे, इसका मूल लिया तो ८ आठ मिले, इसको परिधि १८ के आधे ९ नौमें घटाया तब १ एक शेष रहा, यही ४२ जीवाके धनुषका प्रमाण है, इसी रीतिसे अन्य जीवाओं ८२ । १२० । १५४ । १८४ । २०८ । २२६ । २३६ । २४० । के भी धनुषोंका प्रमाण मिला, क्रमसे २ । ३ । ४ । ५ । ६ । ७ । ८ । ९। यह अपवर्तित रूप हैं; इस कारण इन्हें परिधिके अठारहवें भागसे गुणा किया तो सब धनुषोंके यथावत् प्रमाण हुए, क्रमसे ४२ । ८४ । १२६ । १६८ । २१० । २५२ । २८४ । ३३६ । ३७८ हुए ॥ इति श्रीभास्कराचार्य्यविरचितलीलावत्याः सान्वयभाषाटीकायां स्वरूपप्रकाशिकायां मुरादाबादवास्तव्यपण्डितरामस्वरूपशर्म्मविरचितायां क्षेत्रव्यवहारः ॥ इति लीलावत्यां द्वितीयः खंडः ॥
( १९६ ) लीलावती । अथ खातव्यवहारे करणसूत्रं सार्द्धार्या- अब खातव्यवहार ( गढेकी लम्बाई चौडाई घनफल आदि ) की रीति लिखते हैं, डेढ़ श्लोक आर्याछन्दमें- गणयित्वा विस्तारं बहुषु स्थानेषु तद्युतिर्भाज्या ॥ स्थानकमित्या सममितिरेवं दैर्घ्ये च वेधे च ॥ ५१ ॥ क्षेत्रफल वेधगुणं खाते घनहस्तसंख्या स्यात् ॥ SS ॥ अन्वयः-विस्तारम् बहुषु स्थानेषु गणयित्वा तद्युतिः स्थानकमित्या भाज्या एवं दैर्घ्ये वेधे च सममितिः स्यात् । वेधगुणं क्षेत्रफल खाते घनहस्तसंख्या स्यात् ॥ ५१ ॥ SS अर्थः-जिस खातमें अनेक लम्बाई अनेक चौडाई तथा अनेक नीचाई हो, तहाँ सब चौडाईके प्रमाणोंको एक स्थानमें लिखकर जोड ले, उसमें जितने स्थानोंमें चौडाईका प्रमाण लिखा हो उस संख्याका भाग दे तब जो लब्धि हो वही चौडा- ईका प्रमाण है, इसी प्रकार लंबाई नीचाईमें भी जितने स्थान हों उनको एक स्थानमें लिखकर जोडे जो अङ्क हों उनमें जितने स्थानोंमें प्रमाण लिखे हैं, उस स्थानसंख्याका भाग दे जो लब्धि हो उसको प्रमाण जाने, क्षेत्रफल अर्थात् लम्बाई चौडाईके घातको नीचाईके प्रमाणसे गुणा करे तब खातमें घनहस्तका प्रमाण मालूम होता है ॥ ५१ ॥ SS उदाहरणम्- भुजवक्रतया दैर्ध्यं दशेशार्ककरैर्मितम् ॥ त्रिषु स्थानेषु षट्पञ्चसप्तहस्ता च विस्तृतिः ॥३०॥ यस्य खातस्य वेधोऽपि द्विचतुस्त्रिकरः सखे ॥ तत्र खाते कियन्तः स्यु- र्घनहस्ताः प्रचक्ष्व मे ॥ ३१ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यस्य खातस्य त्रिषु स्थानेषु भुजवक्रतया दैर्ध्य दशेशार्ककरैः मितम् विस्तृतिः च षट्पंचसप्तहस्ता वेधः अपि द्विचतुस्त्रिकरः तत्र खाते कियन्तः घनहस्ताः स्युः इति मे प्रचक्ष्व ॥ ३० ॥ ३१ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जिस खातके तीन स्थानोंमें भुजांके टेढा होनेसे लम्बाई दश, ग्यारह और बारह के मापकी है और चौडाई छ पाँच सातके मापकी है और नाचाई भी दो चार तीन है; उस खातमें घनहस्त कितने होंगे ? यह मुझको कहो ॥ ३० ॥ ३१ ॥
खातव्यवहारः। ( १९७ ) अत्र सममितिकरणेन वि- स्तारे हस्ताः ६ दैर्घ्ये ११ वेधे ३ तत्क्षेत्रदर्शनं यथा-
यथोक्तकरणेन लब्धा घनहस्तसंख्या १९८ ॥ फैलाव-यह विषममिति खात है अर्थात् इसकी भुजाओंके तीन स्थानोंमे टेढे होनेसे तीनों स्थानपै माप करनेपर लंबाई चौडाई और गहराई तीन प्रकारकी होती है इस कारण यह विषमखात कहलाता है, अब इसकी सममिति अर्थात् तीनों लंबाई, चौडाई और गहराइयोंको सम करके प्रमाण जाननेके लिये अर्थात् यह तो विषम खात है और यदि हम समखात खोदकर इसीके अनुसार लंबाई और चौडाई और गहराई लाना चाहें तो वह समखात कितना लंबा, कितना चौडा और कितना गहरा खोदना चाहिये- इस प्रश्नका उत्तर जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार तीनों स्थानकी लंबाइयों १० । ११ । १२ को जोडा तो ३३ तैंतीस हुए, यह लंबाई तीन स्थानकी है, इस कारण स्थान संख्या ३ तीनका लंबाईके योग ३३ में भाग दिया तो ११ ग्यारह लब्धि हुए; यही सममिति करनेपर लंबाई होगी, इसी प्रकार तीनों स्थानकी चौडा- इयों ५ । ६ । ७ को जोडा तो १८ हुए, इसमें चौडाइयाँ तीन स्थानोंमें थीं, इस कारण स्थान संख्या ३ तीनका भाग दिया तब ६ छ लब्धि हुए, सममिति करने पर यही चौडाईका प्रमाण होगा, इसी प्रकार तीनों स्थानोंकी गहराइयों २।३।४ को जोड तो ९ नौ हुए इसमें स्थानसंख्या ३ का भाग दिया तो तीन लब्धि हुए यही उपरोक्त विषम मिति खातकी सममिति करनेपर गहराई होगी अर्थात् उपरोक्त विषममिति खातको यदि सममिति किया जाय तो लंबाईका प्रमाण ११ ग्यारह चौडाईका प्रमाण ६ छ
(१९८) लीलावती । और गहराईका प्रमाण ३ तीन होगा, वही आकार क्षेत्रमें देख लो, अब पहले कही हुई समचतुर्भुजक्षेत्रका फल लानेकी रीतिके अनुसार लम्बाई ११ और चौडाई ६ का घात किया तो ६६ छियासठ हुए, इसका गहराई ३ से गुणा किया तो १९८ एकसौ अठानवे हुए; यही ऊपरके खातमें घनहस्तका प्रमाण है ॥ खातान्तरे करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- अब अन्य खातकी रीति लिखते हैं डेढ श्लोकमें- मुखजतलजतद्युतिक्षेत्रफलैक्यं हृतं षड्भिः ॥ ५२ ॥ क्षेत्रफलं सममेतद्वेधगुणं घनफलं स्पष्टम् ॥ समखातफलय्र्यंशः सूचीखाते फलं भवति ॥ ५३ ॥ अन्वयः-मुखजतलजतद्युतिक्षेत्रफलैक्यं षड्भिः हृतं समं क्षेत्रफल भवति।एतत् वेधगुणं स्पष्टं घनफलं भवति । सूचीखाते समखातफलय्र्यंशः फलं भवति॥५२॥५३॥ अर्थः-मुखके लंबान, चौडानसे जो क्षेत्रफल आवे तथा तलके लंबान, चौडानसे जो क्षेत्रफल आवे और मुखतलके योग तथा चौडानके योगसे जो क्षेत्रफल आवे इन तीनों क्षेत्रफलोंको जोड ले तब जो अङ्क हो उसमें छका भाग दे तब जो लब्धि हो उसको सम क्षेत्रफल कहते हैं और यदि इसको गहराईसे गुणा किया जाय तो स्पष्ट घनफल होता है, ( जहां मुखके लंबाईसे चौडाईको गुणाकर जो गुणित अङ्क हो उनको गहराईसे गुणा करनेसे जो अङ्क हो उसको खातफल कहते हैं और यही समखात है ) समखातके फलका तीसरा भाग सूचीखातमें फल होता है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ उदाहरणम्- मुखे दशद्वादशहस्ततुल्यं विस्तारदैर्घ्यं तु तले तदर्द्धम् ॥ यस्याः सखे सप्तकरश्च वेधः का खातसंख्या वद तत्र वाप्याम् ॥ ३२ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यस्याः मुखे विस्तारदैर्घ्यं दशद्वादशहस्ततुल्यं तले तु तदर्द्धम् वेधः च सप्तकरः तत्र वाप्यां खातसंख्या का स्यात् इति त्वं वद ॥ ३२ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जिस बावडीके मुखपर चौडाई १० है और लम्बाई १२ है, उसी बावडीके तलमें चौडाई ५ और लंबाई ६ छ तथा गहराई सात है तो उस बावडीमें खातसंख्या अर्थात् घनहस्तफल क्या होगा ? यह तुम कहो ॥ ३२ ॥
खातव्यवहारः। (१९९) मुखजं क्षेत्रफलम् १२० तलजम् ३० तद्युतिजम् २७० एषामैक्यम् ४२० षड्भि ६ र्हतं जातं सम- फलम् ७० वेध ७ हतं ४९० जातं खातफलं घनहस्ताः ॥ फैलाव-यहां बावडीमें मुखपर लंबाई १२ हाथ है, चौडाई १० हाथ है और तलीमें लंबाई ६ हाथ है और चौडाई ५ हाथ है और वेध सात हाथ है अब यहां घनहस्तफल जाननेके लिये ऊपर कहीहुई रीतिके अनुसार मुखकी लम्बाई १२ और चौडाई १० का घात किया तो १२० हुआ, यही मुखका क्षेत्रफल है. फिर तलकी लंबाई ६ चौडाई ५ का घात किया तो ३० तलीका क्षेत्रफल हुआ, फिर मुखतलकी लम्बाईके योग १८ और मुखतलकी चौडाईके योग १५ का घात किया तो २७० हुए, यही युतिज (दोनोंके योगका) क्षेत्रफल हुआ, इन तीनों क्षेत्रफलोंका योग किया तो ४२० हुए; इसमें ६ छका भाग दिया तब ७० लब्धि हुए इसको समक्षेत्रफल कहते हैं. फिर इसको गहराई ७ से गुणा किया तब ४९० हुए, यही इस खातमें घनहस्त मान है ॥ द्वितीयोदाहरणम्- खातेऽथ तिग्मकरतुल्यचतुर्भुजे च किं स्यात्फलं नवमितः किल यत्र वेधः ॥ वृत्ते तथैव दशविस्तृतिपञ्चवेधे सूचीफलं वद तयोश्च पृथक्पृथङ्गे ॥ ३३ ॥ अन्वयः-अथ किल यत्र तिग्मकरतुल्यचतुर्भुजे खाते वेधः नवमितः । तत्र तथा एव दशविस्तृतिपंचवेधे वृत्ते खाते सूचीफलं किं स्यात् । तयोः पृथक् पृथक् च किम् फलं स्यात् इति मे वद ॥ ३३ ॥