लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
( २०० ) लीलावती। अर्थः- अब १२ बारह प्रमाण चारभुजवाले खातमें अर्थात् जहां भुजका प्रमाण १२ बारह हाथ हो, ऐसे चतुर्भुजखातमें वेध नौ हाथ है, तहां तथा जिसका विस्तार दश हाथ है और जिसमें वेध (गहराई) पांच हाथ है, ऐसे गोल खातमें सूचीफल क्या होगा और दोनों क्षेत्रोंका अलग२ घनहस्तफल क्या होगा? सो मुझसे कहो॥३३॥ भुजः १२ वेधः ९ जातं यथोक्तकरणेन खातफलम्। घनहस्ताः १२९६ सूची- फलम् ४३२ १२ वेधः ९ १२ १२ समचतुर्भुजखात. १२ न्यासः- न्यासः- वृत्तखातदर्शनाय- व्यासः १० वेधः ५ अत्र सूक्ष्मपरिधिः ३९२७०/१२५० सूक्ष्मक्षेत्रफलम् ३९२७/५० वेधगुणं जातं सूक्ष्मखातफलम्- ३९२७/१० सूक्ष्मसूचीफलम् १३०९/१० यद्वा स्थूल- खातफलम् ७५० सूचीफलं स्थूलं वा ७५०/३ वेधः ५ वृत्तखातम्. व्यासः १० फैलाव- यह समचतुर्भुज खात है, इस कारण यहां भुज १२।१२ का घात किया तो हुए १४४ इसको गहराईके प्रमाण ९ से गुणा करा तो १२९६एकहजार दोसौ छियानवे हुए यह समखातफल हुआ,अब इसी क्षेत्रपर सूची आकार डाला तो क्षेत्रफल लानेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार ऊपर लाये हुए समखातफल १२९६का १२ वेध अर्थात् १२ गहराई ९ १२ १२
खातव्यवहारः। (२०१) तीसरा भाग लिया तो ४३२ हुए यही सूची चतुर्भुजके खातका फल हुआ, समवृत्त- खातका फल जाननेके लिये पहले कही हुई "व्यासे भनन्दाग्नि" इत्यादि रीतिके अनुसार व्यास १० दशसे परिधि लाये, तो परिधिका सूक्ष्म प्रमाण ३९२७०/१२५० मिला और सूक्ष्मक्षेत्र फल ३९२७/५० मिला इसको गहराईसे गुणा करा तो ३९२७/१० हुए यही वृत्तसमखातका फल हुआ; अब इसी वृत्तखातका सूचीका आकार करा तो क्या फल होगा? इस बातके जाननेके लिये वृत्तके समखात फल ३९२७/१० का तीसरा भाग लिया तो १३०९/१० मिला. यही सूची वृत्तखातका फल है॥ इति श्रीभास्कराचार्यविरचितलीलावत्याः स्वरूपप्रका- शिकाभाषाटीकायां खातव्यवहारनिरूपणम् ॥ अथ चितिव्यवहारः । अब ईंटोंकी चुनाईका हिसाब लिखते हैं । चितिकरणसूत्रं सार्द्ध वृत्तम्- चुनाईके हिसाबको जाननेकी रीति डेढ श्लोकमें- उच्छ्रयेण गुणितं चितेः किल क्षेत्रसम्भवफलं घनं भवेत् ॥ इष्टिकाघनहते घने चितेरिष्टिकापरिमितिश्च लभ्यते ॥ ५४ ॥ इष्टिकोच्छ्रयहृदुच्छ्रितिश्चितेः स्युः स्तराश्च दृषदां चितेरपिऽऽ अन्वयः-किल चितेः क्षेत्रसम्भवफलं चितेः उच्छ्रयेण गुणितं घनं भवेत् । चितेः घने इष्टिकाघनहते इष्टिकापरिमितिः लभ्यते। चितेः उच्छ्रितिः इष्टिकोच्छ्रयहृत च स्तराः स्युः। दृषदां चितेः अपि एवम् ॥ ५४ ॥ ऽऽ ॥ अर्थः-चुनाई (चौतरे ) के क्षेत्रफलको चुनाईका उँचाईसे गुणा करे तब जो अंक हो वह चुनाईका घनफल होता है चुनाईके घनफलमें इष्टिका (ईंट) ओंके घनफलका भाग दे तब ईंटोंका प्रमाण (संख्या) मालूम हो जाती है और चुन- ईकी उँचाईमें ईंटकी उँचाईका भाग दे तब ईंटोंके चुनाईके तरों (रद्दों) की
( २०२ ) लीलावती । संख्या होती है ईंटके लम्बाव और चौडावके घातको ईंटकी उँचाईसे गुणा करे तो ईंटका घनफल मिलता है इसी तरहसे प्रस्तरकी चितिमें भी जानना ॥ ५४ ॥ उदाहरणम्- अष्टादशांगुलं दैर्घ्यं विस्तारो द्वादशांगुलः ॥ उच्छ्रितित्र्यंगुला यासामिष्टिकास्ताश्चितौ किल ॥ ३४ ॥ यद्विस्तृतिः पञ्चकराष्टहस्तं दैर्घ्यं च यस्यां त्रिकरोच्छ्रितिश्च ॥ तस्यां चितौ किं फलमिष्टिकानां संख्या च का ब्रूहि कति स्तराश्च ॥ ३५ ॥ अन्वयः-यासां दैर्घ्यम् अष्टादशांगुलम् विस्तारः द्वादशांगुलः उच्छ्रितिः त्र्यंगुला ताः इष्टिकाः चितौ सन्ति । यद्विस्तृतिः पञ्चकरा यस्यां दैर्घ्यम् अष्टहस्तम् उच्छ्रितिः च त्रिकरा तस्यां चितौ फलं किम्, इष्टिकानां संख्या च का, स्तराः च कति ? इति ब्रूहि ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ अर्थः-जिन ईंटोंकी लम्बाई अठारह १८ अंगुल है, चौडाई बारह १२ अंगुल है उँचाई ३ तीन अंगुल है, ऐसी ईंटें जिस चौतरेमें हैं उसकी चौडाई पांच ५ हाथ है, लम्बाई ८ हाथ है, उँचाई ३ हाथ है, तो उस चौतरेमें फल क्या होगा ? ईंटोंकी संख्या क्या होगी ? और तर कितने होंगे ? यह कहो ३४ ॥ ३५ ॥ न्यासः- इष्टिकाया घनहस्तमानम् ३/६४ चितेः क्षेत्रफलम् ४० उच्छ्रयेण गुणितं चितेर्घनफलं १२० लब्धा इष्टिकासंख्या २५६० स्तरसंख्या २४ एवं पाषाणचयेऽपि ॥ इति चितिव्यवहारः ॥ फैलाव-यहां चौतरेका घनफल जाननेके लिये पहले कहे हुए सम चतुर्भुज क्षेत्रफ- लं ३ लको लानेके नियमके अनुसार चौतरे लम्बाई ८ और चौडाई ५ का घात किया तो ४० चालीस हुए, फिर इसकी ऊँचा ३ से गुणा किया तो १२० हुए यही चौतरेका घनफल हुआ, इस १२० में ईंटोंके घनफल अर्थात् ईंटोंकी लम्बाई
क्रकचव्यवहारः। (२०३) चौडाईके घातको ऊँचाईसे गुणा किया तो ३/२४ हुए इसका भाग दिया तो २५६० दो हजार पाँचसौ साठ लब्धि हुए, यही ईंटोंकी संख्या है, फिर चौतरेकी ऊँचाई ३ में ईंटोंकी ऊँचाई १/८ का भाग दिया तो २४ लब्धि हुए, यही तर अर्थात् रद्दोंकी संख्या है ॥ इति लीलावत्याः स्वरूपप्र० भाषाटीकायां चितिव्यवहारः । अथ क्रकचव्यवहारः । अब लकड़ीकी चिराईका हिसाब लिखते हैं। अथ क्रकचव्यवहारे करणसूत्रं वृत्तम्- अब काष्ठकी चिराईका हिसाब जाननेकी रीति लिखते हैं श्लोक एक- पिण्डयोगदल मग्रमूलयोर्देर्घ्यसंगुणितमंगुलात्मकम् ॥ दारुदारणपथैः समाहतं षट्स्वरैषु विहृतं करात्मकम् ॥ ५५ ॥ अन्वयः-अग्रमूलयोः पिण्डयोगदलं दैर्घ्यसंगुणितम् अंगुलात्मकम् फलम् भवति। तत् दारुदारणपथैः समाहतं षट्स्वरैषु विहृतं करात्मकम् फलम् भवति ॥ ५५ ॥ अर्थः-यदि चीरनेकी लकड़ीकी मोटाई ऊपर नीचेसे कमती बढती हो तो ऊपर नीचेकी मोटाईके प्रमाणका योग करके उसमें दोका भाग दे जो लब्धि हो उसको लंबाईसे गुणा कर दे जो गुणनफल हो वह अंगुलात्मक फल होता है और उसी अंगुलात्मक फलको जितने स्थानोंपर उस काष्ठको चीरा हो उस स्थानकी संख्यासे गुणा करके ५७६ पांचसौ छियत्तरका भाग दे जो लब्धि हो वह चिराईका हस्तात्मक फल होता है ॥ ५५ ॥ उदाहरणम्- मूले नखांगुलमितोऽथ नृपांगुलोऽग्रे पिण्डः शतांगुल- मितं किल यस्य दैर्घ्यम् ॥ तद्दारुदारणपथेषु चतुर्षु किं स्याद्धस्तात्मकं वद सखे गणितं द्रुतं मे ॥ ३६ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यस्य पिण्डः मूले नखांगुलमितः अथ अग्रे नृपांगुलमितः किलः दैर्घ्यं शतांगुलमितं तद्दारुदारणपथेषु चतुर्षु हस्तात्मकं गणितं किं स्यात्? इति मे द्रुतम् वद् ॥ ३६ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जिस कोष्ठकी मोटाई मूलमें २० बीस अंगुलके प्रमाण है और अग्रभागमें सोलह १६ अंगुल मोटी है और जिसका लम्बत्व सौ १०० अंगुल है, उस काष्ठको यदि चार स्थानोंमें चीरा तो शीघ्र कहो कि, उसकाष्ठकी हस्तात्मक चिराई क्या होगी ? ॥ ३६ ॥
( २०४ ) लीलावती । न्यासः-मूले पिण्डः २० अग्रे पिण्डः १६ दैर्घ्यम् १०० पिण्डयोगः ३६ पिण्ड- योगदलम् १८ दैर्घ्येण १०० संगुणितं जातम् १८००दारु- दारणपथै ४ गुणितं ७२००षट्- ष्वरेषु ५७६ विहृतं जातं करात्मकं गणितं २५/२ फैलाव-यहां काष्ठका प्रमाण मूल और अग्र भागमें समान नहीं है, यह हस्तात्मक चिराईका फल जाननेके लिये ऊपर कहे हुए नियमके अनुसार मूलकी मोटाई २० और अग्रभागकी मोटाई १६ का योग किया तो ३६ हुए इसमें दोका भाग दिया तो १८ मिला इसकी लम्बाई १०० से गुणा करा तो १८०० हुए, इसको चीरनेकी स्थानसंख्या चारसे ४ से गुणा किया तो ७२०० हुए, इसमें ५७६ का भाग दिया तो लब्धि हुए, २५/२ यह हस्तात्मक फल हुआ. क्रकचान्तरे करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- तिरछी चिराईका फल जाननेकी रीति डेड श्लोकमें- छिद्यते तु यदि तिर्य्यगुक्तवत्पिण्डविस्तृतिहतेः फलं तदा ॥ ५६ ॥ इष्टिकाचितिदृषच्चितिखातक्राकचव्यवहृतौ खलु मूल्यम् ॥ कर्मकारजनसंप्रतिपत्त्या तन्मृदुत्वकठिनत्व- वशेन ॥ ५७ ॥ अन्वयः-यदि तु तिर्य्यक् छिद्यते तदा उक्तवत् पिण्डविस्तृतिहतेः फलम् भवति । खलु इष्टिकाचितिदृषच्चितिखातक्राकचव्यवहृतौ कर्मकारजनसम्मतिपत्त्या तन्मृदुत्व- कठिनत्ववशेन च मूल्यं भवति ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ अर्थः-यदि काष्ठ तिर्च्छा काटा जाय तो मोटाई और चौडाईका घात करके पहलेके अनुसार चौडाव और लम्बावका परस्पर गुणा करनेसे जो गुणनफल मिले उसको चीरनेके स्थानोंकी संख्यासे गुणा करके उसमें पांचसौ छियत्तरका भाग देतव जो
राशिव्यवहारः । (२०६) लब्धि हो उसको हस्तात्मक फल जाने, ईंटोंकी चुनाई पत्थरोंकी चुनाई और काठकी चिराईका जो कारीगरसे ठहर जाय अथवा पत्थरकाष्ठादिकके करडे पन और नरम- पनको देखकर मूल्य (मजूरी) देना चाहिये, मजूरीका भाव नियत नहीं है, इस कारण यहां रीति नहीं लिखी है ॥५६॥५७॥ उदाहरणम्- तद्विस्तृतिर्दन्तमित्रांगुलानि पिंडस्तथा षोडश यत्र काष्ठे ॥ छेदेषु तिर्यङ्ङ्नवसु प्रचक्ष्व किं स्यात्फलं तत्र करात्मकं मे ॥३७॥ अन्वयः-यत्र काष्ठे पिंडः षोडश तथा तद्विस्तृतिः दंतमितांगुलानि तिर्यक् नवसु छेदेषु तत्र करात्मकं किं फलं स्यात् तत् मे प्रचक्ष्व ॥३७॥ अर्थः-जिस काष्ठमें मोटाई सोलह १६ अंगुल है और चौडाई ३२ बत्तिस अंगुल है, उसको यदि तिरछा करके नौ स्थानोंमें चीरा जाय तो उस काष्ठका करात्मक क्या फल होगा ? सो मुझसे कहो ॥३७॥ न्यासः विस्तारः ३२ पिंडः १६ पिंड- ३२ विस्तृतिहतिः ५१२ मार्ग ९ ९ १६ घ्ना ४६०८ षट्स्वरैषु ५७६ विहृतं जातं फलं हस्ताः ८ ॥ इति क्रकचव्यवहारः ॥ फैलाव- यहां मोटाई १६ अंगुल है, चौडाई ३२ अंगुल है, इन दोनोंका परस्पर ३२ ९ १६ घात करा तो ५१२ पांच सौ बारह हुए; इसको चिराईकी स्थान संख्या ९ से गुणा करा तब ४६०८ हुए इसमें ५७६ का भाग दिया तब ८ लब्धि हुए, यही तिरछी चिराईका यहां हस्तात्मक प्रमाण है ॥३७॥ इति भा० ली० स्व० प्र० भा टीका क्रकचव्यवहारः॥ अथ राशिव्यवहारः । अथ राशिव्यवहारे करणसूत्रं वृत्तम्- अन्नकी ढेरीका प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें- अनणुषु दशमांशोऽणुष्वथैकादशांशः परिधिनवमभागः
( २०६ ) लीलावती । शूकधान्येषु वेधः ॥ भवति परिधिषष्ठे वर्ग्गिते वेधनिघ्ने घनगणितकराः स्युर्भागधास्ताश्च खार्य्यः ॥ ५८ ॥ अन्वयः-अनणुषु दशमांशः वेधः भवति अथ अणुषु एकादशांशः वेधः भवति शूकधान्येषु परिधिनवमभागः वेधः भवति परिधिषष्ठे वर्ग्गिते वेधनिघ्ने घनगणित- कराः स्युः ताः एव च मागधाः खार्य्यः भवन्ति ॥ ५८ ॥ अर्थः- (अन्नके ढेरमें जो बीचकी उँचाई है उसको वेध कहते हैं; ) मोटे अन्न (चनाआदि) की ढेरीमें परिधिका दशवां भाग वेध होता है और नन्हे नाजकी ढेरीमें परिधिका ग्यारहवां भाग वेध होता है और शूकधान्य (साठी आदि) की ढेरीमें परिधिका नवाँ भाग वेध होता है; (परिधिके) छठे भागका वर्ग कर जो अङ्क मिले उनको वेधसे गुणा कर दे जो गुणनफल हो वही ढेरीमें घनहस्तोंका प्रमाण होगा; वही घनहस्त मगधदेशमें खारी कहलाते हैं ॥ ५८ ॥ उदाहरणम्- समभुवि किल राशियः स्थितः स्थूलधान्यः परिधिपरिमितिः स्याद्धस्तषष्टिर्यदीया ॥ प्रवद गणक खार्य्यः किंमिताः सन्ति तस्मिन्रथ पृथगणुधान्यैः शूकधान्यैश्च शीघ्रम् ॥ ३८ ॥ अन्वयः-हे गणक ! किल यः समभुवि स्थूलधान्यः राशिः स्थितः यदीया परि- धिपरिमितिः हस्तषष्टिः स्यात् तस्मिन् किंमिताः खार्य्यः सन्ति । अथ अणुधान्यैः शूकधान्यैः च पृथक् किंमिताः खार्य्यः स्युः इति शीघ्रम् प्रवद ॥ ३८ ॥ अर्थः-हे गणितके जाननेवाले ! जिस समान भूमिमें जो मोटे अन्नकी ढेरी है उसकी परिधि साठ हाथ है; तो कहो उसमें कितनी खारी (घनहस्त) होंगी और उसी समभूमिपर जो साठ २ परिधिवाली महीन और शूक अन्नकी ढेरी हैं, उनमें भी कितनी खारी होंगी ? ॥ ३८ ॥ अथ स्थूलधान्यराशिमानावबोधनाय । (प० ६०, अनणुधान्यराशिः, वेधः ६) परिधिः ६० वेधः ६ परिधेः षष्ठांशः १० वर्गितः १०० वेधनिघ्नः लब्धाः खार्य्यः॥ ६०० ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
क्रकचव्यवहारः। (२०७) अथाणुधान्यराशिमानाऽऽनयनाय । न्या० [परिधिः ६०, अणुकधान्यराशिः, वेधः ६०/११] परिधिः ६० वेधः ६०/११ जातं फलम् ५४५ ५/११ ॥ अथ शूकधान्यराशिमानानानयनाय न्यासः- [परिधिः ६०, शूकधान्यराशिः, वेधः २०/३] प० ६० वे० २०/३ जातं फलं खार्य्यः ६६६ २/३ फैलाव-स्थूल (मोटे) अन्नकी ढेरीका प्रमाण ६० हाथ है अब यह वेधका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के [प० ६०, मोटेअन्नकीढेरी, वेधः ६, खारी प्र. ६००] अनुसार परिधि ६० साठका दशवां भाग लिया तो ६ छ मिले; यही इस मोटे अन्नकी राशिमें वेध है फिर परिधिके छठे भाग १० का वर्ग किया तो १०० हुए; इसको वेधसे गुणा करा तो ६०० हुए; यही इस परि- थिका घनहस्तफल अर्थात् खारियोंकी संख्या है. अब अणुधान्यकी ढेरीकी परिधिका प्रमाण ६० है तहां उपरोक्त नियमानुसार वेध मिला ६०/११ फिर परिधिके [परिधिः ६०, सूक्ष्मअन्नकीराशि., वेधः ६०/११, खारी प्र. ५४५ ५/११] छठे भागका वर्ग किया तब १०० हुए; ६०/११ से गुणा किया तब ६०००/११ हुए; हरका भाग दिया तब ५४५ ५/११ हुए, यही खारियोंका प्रमाण अर्थात् घनहस्तात्मक फल है ॥ अब शूकधान्यकी ढेरीकी भी परिधि ६० हस्त है; यहां ऊपर कही हुई रीति के अनुसार परिधि ६० का [परिधि ६०, खारी प्र. ६६६ २/३, साठी आदि शूक धान्यका ढेरी., वेधः ६०/९] नवां भाग ६०/९ वेध होता है इसमें तीनका अपवर्तन देनें पर २०/३ परिधिका प्रमाण रहता है, अब शूक धान्यके ढेरका प्रमाण जाननेके लिये परिधि ६० के छठे भाग
( २०८ ) लीलावती । १० का वर्ग किया तो १०० हुए; इसको वेध ३ \frac{०}{ } से गुणा करां तब \frac{२०००}{३} हुए हरका भाग दिया तब ६६६ \frac{२}{३} हुए; यही घनहस्त फल अर्थात् खारियोंका प्रमाण है ॥ अथ भित्त्यन्तर्बाह्यकोणसंलग्नराशिप्रमाणानयने करणसूत्रं वृत्तम्- अब मकानके भीतर दो दीवारोंके जोडके कोनेमें डाली हुई, एक दीवारसे लगाकर डाली हुई, दीवारके बाहरके कोनेसे लगाकर डाली हुई, स्थूलधान्य और अणुधान्य शूकधान्यकी ढेरीका प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें- द्विवेदसत्रिभागैकनिघ्नात्तु परिधेः फलम् ॥ भित्त्यन्तर्बाह्यकोणस्थराशेः स्वगुणभाजितम् ॥ ५९ ॥ अन्वयः-भित्त्यन्तर्बाह्यकोणस्थराशेः परिधिः द्विवेदसत्रिभागैकनिघ्नः कार्य्यः स एव परिधिः कल्प्यः । परिधेः पूर्ववत् फलं साध्यं तत् स्वगुणभाजितम् फलम् भवति ॥ ५९ ॥ अर्थः-जो ढेर दीवारसे लगा हो, या दीवारके भीतर कोनेमें लगा हो या दीवारके बाहर कोनेमें लगा हो उसकी परिधिको यदि स्थूलधान्यकी ढेरी हो तो दोसे गुणा करे; सूक्ष्म ढेरी हो तो चारसे गुणा करे; और शूकधान्यकी ढेरी हो तो १ \frac{१}{३} तीसरा भागयुक्त एकसे गुणा करे, जो गुणनफल हो उसीको क्रमसे परिधि माने; फिर परिधिसे पहली रीतिके अनुसार फल लावे जो फल आवे उसमें जिस जिस अङ्कसे परिधिको गुणा करा था उन ही उन अंकोंका भाग दे जो लब्धि हो उसको फल जाने ॥ ५९ ॥ उदाहरणम्- परिधिर्भित्तिलग्नस्य राशेत्रिंशत्करः किल ॥ अंतःकोणस्थितस्यापि तिथितुल्यकरः सखे ॥ ३९ ॥ बहिःकोणस्थितस्यापि पंचघ्ननवसम्मितः ॥ तेषामाचक्ष्व मे क्षिप्रं घनहस्तान् पृथक्पृथक् ॥ ४० ॥ अन्वयः- हे सखे ! किल भित्तिलग्नस्य राशेः त्रिंशत्करः परिधिः अन्तकोण- स्थितस्य अपि राशेः तिथितुल्यकरः परिधिः बहिः कोणस्थितस्य अपि राशेः पंचघ्ननवसंमितिः परिधिः अस्ति तेषां घनहस्तान् मे पृथक्पृथक् क्षिप्रम् आचक्ष्व ॥ ३९ ॥ ४० ॥
राशिव्यवहारः । (२०९) अर्थः--हे मित्र ! जो ढेर नाजका दीवारसे लगा हुआ पडा है उसका परिधिका प्रमाण ३० तीस हाथ है, जो अन्नका ढेर दीवारके भीतर कोनेमें लगा हुआ पडा है उसकी परिधिका प्रमाण १५ हाथ है और जो अन्नका ढेर दीवारके बाहर कोनेसे लगा हुआ पडा है उसकी परिधिका प्रमाण ४५ पैंतालीस हाथ है, तो उन अन्नके ढेरोंका घनहस्तफल मुझसे अलग अलग शीघ्र कहो ॥ ३९ ॥ ४० ॥ अत्रापि स्थूलादिधान्यानां राशिमानावबोधनाय स्पष्टं क्षेत्रत्रयम्- यहाँ भी स्थूल सूक्ष्म और शूकधान्य इन तीनोंके ढेरोंका अलग २ प्रमाण जाननेके लिये तीन क्षेत्र दिखाये हैं- तत्रादावणुधान्यराशिमानावबोधकं क्षेत्रमाह- न्यासः-- अत्राद्यस्य परिधिः ३० द्विनिघ्नः ६० अन्यश्चतुर्घ्नः ६० अपरः ४५ सत्रिभागैक ४/३ निघ्नः ६० एषां वेधः ६ एभ्यः फलं तुल्य- मेतावन्त्यः खार्य्यः ६०० एतत्स्व- [चित्र १: अनणुधान्यराशिः | बहिःकोणरा०, वेधः ६, परि ४५ | परिधिः ३०, भित्तिलग्नराशि., वेधः ६ | परिधि. १५, वेधः ६, अन्तःकोणराशिः] स्वगुणेन भक्तं जातं पृथक्पृथक् फलम् ३०० । १५० । ४५० अथाणुधान्यराशिमानानयनाय क्षेत्रम्- पूर्ववत्क्षेत्रत्रयाणां स्वगुण- [चित्र २: अणुधान्यराशिः | बहिःकोणराशिः, परिधिः ४५, वेधः ६३०/११ | परिधिः ३०, भित्तिलग्नरा० वेधः ७१/२ | परिधि १५, अंतःकोणरा०, वेधः १३१/२] गणितः परिधिः ६० वेधः ६३०/११ फलानि २७२८/११, १३६ ४/११ ४०९ १/११ ॥ १४
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तो ३०० मिले, यही दीवारसे लगी हुई राशिका घनहस्तफल हुआ इसी प्रकार वेधसे गुणा किये हुए परिधिके छठे भागके वर्ग ६०० में चारका भाग दिया तो १५० मिले यही भीतरके कोनेसे लगी हुई जो राशि पडी है, उसका घनहस्तात्मक फल हुआ, फिर इसी प्रकार वेधसे गुणा कर हुए परिधिके छठे भागके वर्ग ६०० में $\frac{४}{३}$ तीसरे भागयुक्त एकका भाग दिया तब ४५० मिले, यही बाहर कानेसे लगी हुई जो राशि पडी हुई है, उसका घनहस्तात्मक फल हुआ. अब जहां छोटे अन्नकी राशि है तहां वेध जाननेके लिये पहली कही हुई रीतिके अनुसार इन परिधियों ३० । १५ । ४५ को पूरा करनेके लिये अपने २ गुणक २ । ४ । $\frac{४}{३}$ से अलग २ गुणा करा तब पूरी परिधि हुई ६० । ६० । ६० । यह छोटे अन्नकी राशि है इस कारण यही परिधि ६० का ग्यारहवाँ भाग $\frac{६०}{११}$ वेध हुआ । फिर परि- धिके छठे भाग १० के वर्ग १०० को वेध $\frac{६०}{११}$ से गुणा किया तब $\frac{६०००}{११}$ हुए, इसमें अपने अपने गुणक २ । ४ । $\frac{४}{३}$ का भाग दिया तब $\frac{६०००}{२२}$ । $\frac{६०००}{४४}$ । $\frac{१८०००}{४४}$ हुए इनमें हरका भाग दिया तब तीनों राशियोंका घनहस्तात्मक फल हुआ, २७२ $\frac{८}{११}$ । १३६ $\frac{४}{११}$ । ४०९ $\frac{१}{११}$ शूकधान्य (छिलके वाला सांठी आदि अन्न) की राशियोंका प्रमाण जाननेके लिये यहाँ भी पहले कही हुई रीतिके अनुसार तीनों परि- धियों ३० । १५ । ४५ कों पूरा करनेके लिये अपने अपने गुणक २ । ४ । $\frac{४}{३}$ से अलग २ गुणा किया तब ६० । ६० । ६० पूरी परिधि हुई, यहां शूकधान्यकी राशि है इस कारण परिधिका नवां भाग $\frac{६०}{९}$ तीनसे परिवर्तन देनेसे $\frac{२०}{३}$ वेध होता है; फिर परिधि ६० के छठे भाग १० के वर्ग १०० को वेध $\frac{२०}{३}$ से गुणा करा
तो २०००/३ हुए, इसमें अपने अपने गुणक २ । ४ । १ १/३ का भाग दिया तब २०००/६ २०००/१२ । ६०००/१२ हुए; इनमें हरका भाग दिया, तब ३३३ १/३ । १६६ २/३ । ५०० । हुए,यह क्रमसे तीनों ३० । १५ । ४५ । परिधिका खारीप्रमाण अर्थात् घनहस्त फल हुआ। इति राशिव्यवहारः ॥ अथ छायाव्यवहारः । —-—•✦•—-— अथ छायाव्यवहारे करणसूत्रं वृत्तम्- दीपकके बालनेसे जो छाया पडती है; उसके मापनेकी रीति एक श्लोकमें कहते हैं:- छाययोः कर्णयोरंतरे ये तयोर्वर्गविश्लेषभक्ता रसाङ्गीषवः ॥ सैकलब्धेः पदघ्नं तु कर्णान्तरं भांतरेणोनयुक्तं दले स्तः प्रभे॥६०॥ अन्वयः-छाययोः कर्णयोः च य अन्तरे तयोः वर्गाविश्लेषभक्ताः रसाङ्गीषद्वः। कार्याः । सैकलब्धेः पदघ्नं कर्णान्तरम् भांतरेण ऊनयुक्तं कार्यं तयोः दले प्रभे स्तः। अर्थः-दोनों छायाओंके अन्तरका वर्ग करें और दोनों कर्णोंके अन्तरका भी वर्ग करें; फिर इन दोनों वर्गोंका भी अंतर करें, जो शेष रहे, उसका ५७६ पांचसौ छियत्तरमें भाग दे तब जो लब्धि मिले उसमें एक और जोड ले उसका वर्गमूल ले उससे कर्णोंके अंतरको गुणा करें; जो गुणनफल हो उसको दो स्थानोंमें लिखे एक स्थानमें छायाओंके अन्तरको घटा दे और एक स्थानमें जोड दे फिर दोनों स्थानोंके अङ्कोंको आधा कर ले वही दोनों छायाओंके प्रमाण होंगे ॥ ६० ॥ उदाहरणम्- नंदचंद्रैर्मितं छाययोरंतरं कर्णयोश्चान्तरं विश्वतुल्यं ययोः ॥ ते प्रभे वक्ति यो युक्तिमान्वेत्त्यसौ व्यक्तमव्यक्तयुक्तं हि मन्येऽ खिलम् ॥ ४१ ॥ अन्वयः-ययोः छाययोः अन्तरं नंदचन्द्रैः मितम्। कर्णयोः अंतरं च विश्वतुल्यम्। ते प्रभे यः युक्तिमान् वक्ति हि मन्ये असौ अव्यक्तयुक्तम् अखिलं व्यक्तं वेत्ति ४१॥ अर्थः-जिन छायाओंका अन्तर १९ उन्नीस है और कर्णोंका अन्तर १३ है, उन छायाओंके प्रमाणको जो बुद्धिमान् कहता है जानता हूं, वह निश्चय करके बीज- गणितसहित सम्पूर्ण पाटीगणितको जानता है ॥ ४१ ॥
छायाव्यवहारः । ( २१३ ) न्यासः-छायान्तरं १९ कर्णा- न्तरम् १३ अनयोर्वर्गान्त- रेण १९२ भक्ता रसाद्रीषवः ५७६ लब्धं ३ सैकस्या ४ स्य मूलम् २ अनेन कर्णान्तरं गुणितम् २६ द्विःस्थं २६ छायान्तरेण १९ ऊनयुते ७ । ४५ तदर्द्धे लब्धे छाये ७/२ ४५/२ तत्कृत्योर्योगपदमित्यादिना जातौ कर्णौ २५/२ ५१/२ फैलाव-छायाओं और कर्णोंका अन्तर जानकर छायाओंका और कर्णोंका प्रमाण जानना है; तहां पहले छायाओंका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार छायाओंके अन्तर १९ का वर्ग किया तब ३६१ हुए और कर्णोंके अन्तर १३ का वर्ग किया तब १६९ हुए; इन दोनों ३६१ । १६९ का अन्तर किया तो १९२ हुए, इसका पांचसौ छियत्तर ५७६ में भाग दिया तब ३ लब्धि हुए, इसमें १ एक जोडा तब ४ चार हुए, इसका मूल लिया तब २ मिले, इससे कर्णान्तर १३ को गुणा करा तब २६ हुए, इसको दो स्थानोंमें २६ । २६ लिखा एक स्थान छायांतर १९ को घटाया तो ७ सात शेष रहे, फिर दूसरे स्थानमें छायांतर १९ को जोडा तब ४५ हुए, इन दोनोंको आधा करा तब ७/२ ४५/२ हुए, यही दोनों छायाओंका प्रमाण है, फिर छाया और शंकुसे “तत्कृत्योर्योगपदम्” इस पहले कही हुई रीतिके अनुसार कर्णोंका प्रमाण २५/२ ५१/२ मिला ॥ छायांतरे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- छाया जाननेकी दूसरी रीति आधा श्लोक- शंकुः प्रदीपतलशंकुतलान्तरघ्न- श्चाया भवेद्विनरदीपशिखौच्यभक्तः ॥ऽऽ॥ अन्वयः-प्रदीपतलशंकुतलांतरघ्नः शंकुः विनिरदीपशिखौच्यभक्तः कार्य्यः तदा छाया भवेत् ॥ ऽ ऽ ॥
( २१४ ) लीलावती । अर्थ:-दीपकके तलेके और शंकुके तलेके मध्यकी भूमिके प्रमाणसे शंकुको गुणा करे, जो गुणन फल हो, उसमें शंकु और दीपककी शिखाकी उँचाईके अंतरका भाग दे जो लब्धि मिले वह शंकुकी छायाका प्रमाण होगा ॥ ९९ ॥ उदाहरणम्- शंकुप्रदीपांतरभूस्त्रिहस्ता दीपोच्छ्रितिः सार्द्धकरत्रया चेत् ॥ शंकोस्तदार्कांगुलसम्मितस्य तस्य प्रभा स्यात्कियती वदाशु ४२ ॥ अन्वयः-चेत् शंकुप्रदीपान्तरभूमिः त्रिहस्ता दीपोच्छ्रितिः च सार्द्धकरत्रया तदा अर्कांगुलसाम्मितस्य तस्य शंकोः कियती प्रभा स्यात् इति आशु वद ॥ ४२ ॥ अर्थः-यदि शंकुके और दीपके मध्यकी भूमिका प्रमाण तीन हाथ है और दीपककी उँचाई साढ़ेतीन ७/२ हाथ है तो बारह अंगुलके शंकुकी कितनी छाया होगी ? यह शीघ्र कहो ॥ ४२ ॥ न्यासः-शंकुः १/२ प्रदीपशंकुतलांतरम् ३ अन- योर्घातः ३/२ विनरदीपशिखौच्येन ३ भक्तो लब्धानि छायांगुलानि ॥ १२ ॥ फैलाव- यहां छायाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार शंकु १/२ को शंकुतल और दीपतलके मध्यकी भूमि ३ से गुणा किया तब ३/२ हुए; इसमें शंकु १/२ और दीपककी उँचाई ७/२ के अंतर ३का भाग दिया तब १/२ मिले यही छायाका प्रमाण है. अथ दीपोच्छ्रित्यानयनाय करणसूत्रं वृत्तार्- र्द्धम्- दीपककी उँचाईका प्रमाण जाननेकी रीति आधा श्लोकमें लिखते हैं- छायाहते तु नरदीप्तलांतरघ्ने शङ्कौ भवेन्नरयुते खलु दीपकोच्च्यम् ॥ ६१ ॥ अन्वयः-खलु शंकौ नरदीप्तलांतरघ्ने छायाहते नरयुते च दीपकोच्च्यं भवत् ॥ ६१ ॥
५. छाया-व्यवहार, कुट्टक व अंकपाश (क्रमचय-संचय)
छायाव्यवहारः । (२१६) अर्थः-दीपककी उँचाई जाननेके लिये शंकुको शंकु और दीपकके मध्यकी भूमिके प्रमाणसे गुणा करे, फिर छायाके प्रमाणका भाग दे जो लब्धि मिले उसमें शंकुके प्रमाणको जोड दे तब दीपककी उँचाई मिलती है ॥ ६१ ॥ उदाहरणम्- प्रदीपशंकन्तरभूमित्रिहस्ता छायांगुलैः षोडशभिः समाचेत् ॥ दीपोच्छ्रितिरस्यात्कियती वदाऽऽशु प्रदीपशंकन्तरमुच्यतां मे ॥ ४२ ॥ अन्वयः-चेत् प्रदीपशंकंतरभूमिः त्रिहस्ता षोडशभिः अंगुलैः समा छाया तदा दीपोच्छ्रितिः कियती स्यात् इति मे आशु वद प्रदीपशंकन्तरं च उच्यताम् ॥ ४२ ॥ अर्थः-यदि दीपक और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण ३ हाथ है और १६ सोलह अंगुलके प्रमाणकी छाया है, तो दीपककी उँचाई कितनी होगी ? यह मुझसे शीघ्र कहो और दीपक और शंकुका अन्तर भी कहो ॥ ४२ ॥ न्यासः- शंकुः १२ छायांगुलानि १६ । शंकुप्रदीपान्तरहस्ताः ३ । लब्धं दीपकोच्च्यं हस्ताः ११/४ । फैलाव-छायाका प्रमाण तथा दीपक और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण जान- कर दीपककी उँचाई जाननेके लिये शंकु १/२ को शंकु और दीपके मध्यकी भूमि ३ से गुणा किया तब ३/२ हुए; इसमें छाया २/३ का भाग दिया तब ९/४ हुए; इसमें शंकु १/२ को जोडा तब ११/४ हुए; यही दीपककी उँचाई है. प्रदीपशंकंतरभूमानानयनाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- दीपक और शंकुके बीचकी भूमिका प्रमाण जाननेके लिये रीति आधा श्लोक- विशंकुदीपोच्छ्रयसंगुणा भा शंकूद्धता दीपनरान्तरं स्यात् ॥ ऽऽ ॥ अन्वयः-भा विशंकुदीपोच्छ्रयसंगुणा शंकूद्धता दीपनरान्तरं स्यात् ॥ ऽऽ ॥
( २१६ ) लीलावती । अर्थ:-छायाको शंकु और दीपककी उँचाईके अन्तरसे गुणा करे तब जो गुणन- फल हो उसमें शंकुको घटा दे तब जो शेष बचे वह शंकु और दीपककी मध्यकी भूमिका प्रमाण होता है ॥ ८५ ॥ उदाहरणं पूर्वोक्तमेव- जो कि पहिले उदाहरणमें छायाका प्रमाण सोलह १६ अंगुल कहा है और दीपककी उँचाई ११०/२४ है; शंकु १६ सोलह अंगुल है तहां दीपक और शंकुकी मध्यकी भूमिका प्रमाण कहो. दीपोच्छ्राय: ११०/२४ शंक्वंगुलानि १२ छाया १६ लब्धा: शंकुप्रदी- पान्तरहस्ताः ३ ॥ दीपोच्छ्रितिः ११०/२४ शंकुः १/२ भू. ३ छा. २/३ फैलाव-अब दीपककी उँचाई तथा शंकु प्रमाण और छाया जानकर दीपक और शंकुके बीचकी भूमिका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार दीपककी उँचाई ११०/२४ और शंकु १/२ अंतर छाया २/३ को दीपककी उंचाई ११०/२४ शंकुः १/२ भू. अंतर ३ छा. २/३ गुणा करा तब ३/२ हुआ, इसमें शंकु १/२ का भाग लिया तब ३ मिले, यही दपिकके और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण है ॥ छायाप्रदीपांतरदीपौच्च्यानयनाय करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- दो शंकु और उनकी छाया और पहले शंकुतलसे दूसरे शंकुतलकी छायाके अन्त- पर्यन्तकी भूमि जानकर दीपककी उँचाई और दीपतल शंकुके मध्यकी भूमिके जाननेकी रीति डेढ़ श्लोकमें- छायाग्रयोरन्तरसंगुणा भा छायाप्रमाणांतरहृद्भवेद्भूः ॥ ६२ ॥ भूशंकुघातः प्रभया विभक्तः प्रजायते दीपशिखोच्चयमेवम् ॥ त्रैराशिकेनैव यदेतदुक्तं व्याप्तं स्वभेदैर्हरिणेव विश्वम् ॥ ६३ ॥ अन्वयः-छायाग्रयोः अंतरसंगुणा भा छायाप्रमाणांतरहत् भूः भवेत् । भूशंकु- घातः प्रभया विभक्तः कार्य्यः एवं दीपशिखोच्चयं जायते हरिणा स्वभेदैः व्याप्तम् विश्वम् इव यत् उक्तम् एतत् सर्वं त्रैराशिकेन एव व्याप्तम् ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
छायाव्यवहारः । ( २१७ ) अर्थः-पहली छायाके अग्रसे दूसरे छायाके अग्रपर्यन्त जो मध्यकी भूमि है उससे अलग २ दोनों छायाओंको गुणा करे जो गुणन फल हो उसमें दोनो छाया- ओंको अन्तरका भाग दे जो लब्धि हो वह उसी उस छायाके अग्रसे दीपकके तलेपर्यन्तकी भूमिका प्रमाण होता है; फिर भूमि और शंकुका घात करे उसमें छायाका भाग दे. इस प्रकार दीपककी शिखाकी ऊँचाई मालूम होजाती है; जिस प्रकार अपने अनेक भेदोंसे ईश्वर करके यह संसार व्याप्त है तिसी प्रकार यहाँ- पर्यन्त लीलावतीमें जो कुछ गणित कहा वह सब त्रैराशिकसे व्याप्त है॥ ६२॥ ६३॥ उदाहरणम्- शंकोर्भार्कमितांगुलस्य सुमते दृष्टा किलाष्टांगुला छायाग्राभिमुखे करद्वयमिते न्यस्तस्य देशे पुनः ॥ तस्यैवार्कमितांगुला यदि तदा छायाप्रदीपांतरं दीपोच्चञ्च कियद्वद व्यवहृतिं छायाभिधां वेत्सि चेत् ॥४३॥ अन्वयः-हे सुमते ! किल यदि अर्कमितांगुलस्य शंकोः भा अष्टांगुला पुनः छाया ग्राभिमुखे करद्वयमिते देशे न्यस्तस्य तस्य एव छाया अर्कमितांगुला तदा प्रदीपा- न्तरं दीपोच्चयं च कियत् इति वद चेत् छायाभिधां व्यवहृतिं वेत्सि ॥ ४३ ॥ अर्थः-दीपककी चाँदनीमें दीपकसे कुछ दूरपर एक शंकु गढा है, वह १२ बारह गिरेका है; उस शंकुकी छायाका प्रमाण ८ अंगुल है, उसी छायाकी मूधपर पहिले शंकुसे दो २ हाथ आगे उसी शंकुको गाडा तो उस शंकुकी छाया १२ बारह अंगुल मिली तो कहो कि वह शंकु दीपकसे कितनी कितनी दूर पर थे और दीपक कितना ऊँचा था ? यदि छायाव्यवहारको जानते हो तो शीघ्र बताओ॥४३॥ न्यासः-अत्र छायाय- योरन्तर मंगुलात्मकं ५२ छाये च ८।१२। अनयोराद्या ८इयमने- न ५२ गुणिता ४१६ छाया प्रमाणांतरेण ४ भक्ता लब्धं भूमानम्
[चित्र-विवरण (Diagram Text): दीपकशिखोन्नतिः । शं. १/२, शं. १/२ भूः १३/३ छा. १/३ भूः १३/२ छा. १/२ शंकुवंतरभूः २]
(२१८) लीलावती।
१०४ इदं प्रथमच्छायाग्रदीप्तलयोरन्तरमित्यर्थः । एवं द्वितीयाग्रान्तरभूमानम् १५६ भूशंकुघातः प्रभया विभक्त इति जातमुभयतोऽपि दीपोच्चं सममेव हस्ताः ६ ३/८ ॥ फैलाव-अब यहां दीपकसे शंकुओंका अन्तर और दीपककी उँचाई जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार क्रिया करनेके अर्थ पहली छायाके अग्रभागसे दूसरी छायाके अग्रभागका अन्तर लिया तो ५२ बावन अंगुल मिले, इससे दोनों छायाओं ८। १२ को गुणा किया तो ४१६। ६२४ हुए; इनमें छायाओं ८ । १२ के अंतर ४ का भाग दिया तब १०४। १५६ मिले, यह अपनी अपनी छायाके अग्र- भागसे दीपकके तलेतककी भूमिका प्रमाण हुआ,परन्तु यह अंगुलात्मक है इसमें २४ का भाग दिया तब हस्तात्मक प्रमाण मिला १३/३ । १३/२ ॥ फिर अपनी अपनी छायाके अग्रभाग- पर्यन्तकी भूमि १३/३ १३/२ से अपने अपने शंकुको गुणा
करा तब १३/६ । १३/४ मिले, इनमें अपनी अपनी छाया १/३ । १/२ का भाग दिया तब १३/२ । १३/२ मिले; यही दीपककी उँचाई है, दोनों भूमियोंसे तुल्य ही मिली ॥ एवमित्यत्र छायाव्यवहारे त्रैराशिककल्पनयानयनं वर्तते । तद्यथा-प्रथमच्छाया ८ तो द्वितीयच्छाया १२ यावता- धिका तावता छायावयवेन यदि छायाग्रान्तरतुल्या भूर्ल- भ्यते तदा छायया किं किमिति एवं पृथक्पृथक् छायाप्र- दीपांतरप्रमाणं लभ्यते । ततो द्वितीयं त्रैराशिकम् । यदि छायातुल्ये भुजे शंकुः कोटिस्तदा भूतुल्ये भुजे किमिति लब्धं दीपकोच्चमुभयतोऽपि तुल्यमेव । एवं पंचराशिका- दिकमखिलं त्रैराशिककल्पनयैव सिद्धम् ॥ यथा भग- वता श्रीनारायणेन जननमरणक्लेशाऽपहारिणा निखिल-
८ छायाव्यवहारः । ( २१९ ) जगज्जननैकबीजेन सकलभुवनभावनेन गिरिसरित्सुर- नरासुरादिभिः स्वभेदैरिदं जगद्व्याप्तं तथेदमखिलं गणित- जातं त्रैराशिकेन व्याप्तम् ॥ अर्थ:-इसी प्रकार इस छाया व्यवहारमें दीपककी उँचाई आदि त्रैराशिक कल्पना करनेसे भी मिलती है सोई दिखाते हैं-प्रथम छाया ८ से दूसरी छाया १२ जितनी अधिक है उतने छायाके अवयव ४ से यदि छायाओंके अग्रभागोंके अन्तर ५२ की तुल्य भूमि मिलती है तो पहली छाया ८ से क्या मिलेगी ? यहां छायावयवको प्रमाण माना और उसको आदिमें लिखा और छाया ८ को इच्छा माना और अन्य जाति भूमि ५२ को फल मानके फल इच्छाका घात कर प्रमाणका भाग दिया तब १०४ लब्धि हुए; यही पहली छायाके अग्रभागसे दपिक | प्र. फ. इ. पर्यन्तकी भूमिका प्रमाण है; इसी प्रकार दूसरी छाया १२ | ४ ५२ ८ को इच्छा मान कर त्रैराशिक किया तब दूसरी छायाके अग्र- | ५२ गुणा भागसे दीपकके नीचे पर्यन्तकी भूमिका अंगुलात्मक प्रमाण | ८ १५६ मिला तदनन्तर दूसरा त्रैराशिक किया, यदि छाया | भा.४ ) ४१६ ( १०४ तुल्यभुजासे शंकुप्रमाण कोटि मिलता है, तो भूमितुल्य | लब्धि भुजामें क्या मिलेगा इस प्रकार त्रैराशिक करनेसे दीपककी उँचाई मिलती है यह उँचाई दोनों भूमियोंसे तुल्य ही मिलती है । इसी प्रकार पंचराशिकादि भी त्रैराशि- ककी कल्पनासे ही सिद्ध होता है; जिस प्रकार जन्ममरणरूप संसारके दुःख दूर करनेवाले सम्पूर्ण संसारकी उत्पत्तिके आदिकारण श्रीनारायण विष्णुभगवान करके संपूर्ण संसारके पर्वत नदी देवता मनुष्य और दैत्यादि अपने ही भेदोंसे यह संसार व्याप्त है तिसी प्रकार सम्पूर्ण गणितमात्र त्रैराशिकसे व्याप्त है ॥ यद्येवं तर्हि बहुभिः किमित्याशंक्याऽऽह- यदि त्रैराशिकसे ही सम्पूर्ण गणितमात्र सिद्ध हो जाता है तो फिर पूर्वोक्त बहुतसी रीतियें किस कारण वृथा बनाईं हैं ? इस प्रकार शंका करके उत्तर देते हैं- यत्किंचिद्गुणभागहारविधिना बीजेऽत्र वा गण्यते तत्रैराशिकमेव निर्मलधियामेवावगम्यं विदाम् ॥ एतद्बह्वथास्मदादिजडधीधीवृद्धिवुद्ध्या बुधैस्तद्भे- दान्सुगमान्विधाय रचितं प्राज्ञैः प्रकीर्णादिकम् ॥ ६४ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri