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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1936)

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भूमिका भगवान्‌को अदितिके कुण्डल देना

भीष्म उवाच

निहत्य नरकं भौमं सत्यभामासहायवान् ।
सहितो लोकपालैश्च ददर्श नरकालयम् ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर सत्यभामासहित भगवान् श्रीकृष्णने लोकपालोंके साथ जाकर नरकासुरके घरको देखा।
अथास्य गृहमासाद्य नरकस्य यशस्विनः ।
ददर्श धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ॥
यशस्वी नरकके घरमें जाकर उन्होंने नाना प्रकारके रत्न और अक्षय धन देखा।
मणिमुक्ताप्रवालानि वैडूर्यविकृतानि च ।
अश्मसारानर्कमणीन् विमलान् स्फाटिकानपि ॥
मणि, मोती, मूँगे, वैडूर्यमणिकी बनी हुई वस्तुएँ, पुखराज, सूर्यकान्तमणि और निर्मल स्फटिकमणिकी वस्तुएँ भी वहाँ देखनेमें आयीं।
जाम्बूनदमयान्येव शातकुम्भमयानि च ।
प्रदीप्तज्वलनाभानि शीतरश्मिप्रभाणि च ॥
जाम्बूनद तथा शातकुम्भसंज्ञक सुवर्णकी बनी हुई बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ वहाँ दृष्टिगोचर हुईं, जो प्रज्वलित अग्नि और शीतरश्मि चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रही थीं।
हिरण्यवर्णं रुचिरं श्वेतमभ्यन्तरं गृहम् ।
यदक्षयं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ॥
न हि राज्ञः कुबेरस्य तावद् धनसमुच्चयः ।
दृष्टपूर्वः पुरा साक्षान्महेन्द्रसदनेष्वपि ॥
नरकासुरका भीतरी भवन सुवर्णके समान सुन्दर, कान्तिमान् एवं उज्ज्वल था। उसके घरमें जो असंख्य एवं अक्षय धन दिखायी दिया, उतनी धनराशि राजा कुबेरके घरमें भी नहीं है। देवराज इन्द्रके भवनमें भी पहले कभी उतना वैभव नहीं देखा गया था।

इन्द्र उवाच

इमानि मणिरत्नानि विविधानि वसूनि च ॥
हेमसूत्रा महाकक्ष्यास्तोमरैर्वीर्यशालिनः ।
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रवालविकृताः कुथाः ॥
विमलाभिः पताकाभिर्वासांसि विविधानि च ।
ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्यः करेणवः ॥
इन्द्र बोले— जनार्दन! ये जो नाना प्रकारके माणिक्य, रत्न, धन तथा सोनेकी जालियोंसे सुशोभित बड़े-बड़े हौदोंवाले, तोमरसहित पराक्रमशाली बड़े भारी गजराज एवं उनपर बिछानेके लिये मूँगेसे विभूषित कम्बल, निर्मल पताकाओंसे युक्त नाना प्रकारके वस्त्र

आदि हैं, इन सबपर आपका अधिकार है। इन गजराजोंकी संख्या बीस हजार है तथा इससे दूनी हथिनियाँ हैं। अष्टौ शतसहस्राणि देशजाश्चोत्तमा हयाः ।
गोभिश्चाविकृतैर्यानैः कामं तव जनार्दन ।।
जनार्दन! यहाँ आठ लाख उत्तम देशी घोड़े हैं और बैल जुते हुए नये-नये वाहन हैं। इनमेंसे जिनकी आपको आवश्यकता हो, वे सब आपके यहाँ जा सकते हैं।
आविकानि च सूक्ष्माणि शयनान्यासनानि च ।
कामव्याहारिणश्चैव पक्षिणः प्रियदर्शनाः ।।
चन्दनागुरुमिश्राणि यानानि विविधानि च ।
एतत् ते प्रापयिष्यामि वृष्ण्यावासमरिंदम ।।
शत्रुदमन! ये महीन ऊनी वस्त्र, अनेक प्रकारकी शय्याएँ, बहुत-से आसन, इच्छानुसार बोली बोलनेवाले देखनेमें सुन्दर पक्षी, चन्दन और अगुरुमिश्रित नाना प्रकारके रथ—ये सब वस्तुएँ मैं आपके लिये वृष्णियोंके निवासस्थान द्वारकामें पहुँचा दूँगा।

भीष्म उवाच

देवगन्धर्वरत्नानि दैतेयासुरजानि च ।
यानि सन्तीह रत्नानि नरकस्य निवेशने ।।
एतत् तु गरुडे सर्वं क्षिप्रमारोप्य वासवः ।
दाशार्हपतिना सार्धमुपायान्मणिपर्वतम् ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! देवता, गन्धर्व, दैत्य और असुरसम्बन्धी जितने भी रत्न नरकासुरके घरमें उपलब्ध हुए, उन्हें शीघ्र ही गरुड़पर रखकर देवराज इन्द्र दाशार्हवंशके अधिपति भगवान् श्रीकृष्णके साथ मणिपर्वतपर गये।
तत्र पुण्या ववुर्वाताः प्रभाश्चित्राः समुज्ज्वलाः ।
प्रेक्षतां सुरसङ्घानां विस्मयः समपद्यत ।।
वहाँ बड़ी पवित्र हवा बह रही थी तथा विचित्र एवं उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली हुई थी। यह सब देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ।
त्रिदशा ऋषयश्चैव चन्द्रादित्यौ यथा दिवि ।
प्रभया तस्य शैलस्य निर्विशेषमिवाभवत् ।।
आकाशमण्डलमें प्रकाशित होनेवाले देवता, ऋषि, चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वहाँ आये हुए देवगण उस पर्वतकी प्रभासे तिरस्कृत हो साधारण-से प्रतीत हो रहे थे।
अनुज्ञातस्तु रामेण वासवेन च केशवः ।
प्रीयमाणो महाबाहुर्विवेश मणिपर्वतम् ।।

तदनन्तर बलरामजी तथा देवराज इन्द्रकी आज्ञासे महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरके मणिपर्वतपर बने हुए अन्तःपुरमें प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया। तत्र वैदूर्यवर्णानि ददर्श मधुसूदनः । सतोरणपताकानि द्वाराणि शरणानि च ॥ मधुसूदनने देखा; उस अन्तःपुरके द्वार और गृह वैदूर्यमणिके समान प्रकाशित हो रहे हैं। उनके फाटकोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। चित्रग्रथितमेघाभः प्रबभौ मणिपर्वतः । हेमचित्रपताकैश्च प्रासादैरुपशोभितः ॥ सुवर्णमय विचित्र पताकाओंवाले महलोंसे सुशोभित वह मणिपर्वत चित्रलिखित मेघोंके समान प्रतीत होता था। हर्म्याणि च विशालानि मणिसोपानवन्ति च । तत्रस्था वरवर्णाभा ददृशुर्मधुसूदनम् ॥ गन्धर्वसुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तदा । त्रिविष्टपसमे देशे तिष्ठन्तमपराजितम् ॥ उन महलोंमें विशाल अट्टालिकाएँ बनी थीं, जिनपर चढ़नेके लिये मणिनिर्मित सीढ़ियाँ सुशोभित हो रही थीं। वहाँ रहनेवाली प्रधान-प्रधान गन्धर्वों और सुरोंकी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियोंने उस स्वर्गके समान प्रदेशमें खड़े हुए अपराजित वीर भगवान् मधुसूदनको देखा। परिवव्रुर्महाबाहुमेकवेणीधराः स्त्रियः । सर्वाः काषायवासिन्यः सर्वाश्च नियतेन्द्रियाः ॥ देखते-देखते ही उन सबने महाबाहु श्रीकृष्णको घेर लिया। वे सभी स्त्रियाँ एक वेणी धारण किये गेरुए वस्त्र पहने इन्द्रियसंयमपूर्वक वहाँ तपस्या करती थीं। व्रतसंतापजः शोको नात्र काश्चिदपीडयत् । अरजांसि च वासांसि बिभ्रत्यः कौशिकान्यपि ॥ समेत्य यदुसिंहस्य चक्रुरस्याञ्जलिं स्त्रियः । ऊचुश्चैनं हृषीकेशं सर्वास्ताः कमलेक्षणाः ॥ उस समय व्रत और संतापजनित शोक उनमेंसे किसीको पीड़ा नहीं दे सका। वे निर्मल रेशमी वस्त्र पहने हुए यदुवीर श्रीकृष्णके पास जा उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं। उन कमलनयनी कामिनियोंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी श्रीहरिसे इस प्रकार कहा।

कन्यका ऊचुः

नारदेन समाख्यातमस्माकं पुरुषोत्तम । आगमिष्यति गोविन्दः सुरकार्यार्थसिद्धये ॥ कन्याएँ बोलीं— पुरुषोत्तम! देवर्षि नारदने हमसे कह रखा था कि 'देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये भगवान् गोविन्द यहाँ पधारेंगे। सोऽसुरं नरकं हत्वा निशुम्भं मुरमेव च । भौमं च सपरीवारं हयग्रीवं च दानवम् ॥ तथा पञ्चजनं चैव प्राप्स्यते धनमक्षयम् । 'एवं वे सपरिवार नरकासुर, निशुम्भ, मुर, दानव हयग्रीव तथा पंचजनको मारकर अक्षय धन प्राप्त करेंगे। सोऽचिरेणैव कालेन युष्मन्मोक्ता भविष्यति ॥ एवमुक्त्वागमद् धीमान् देवर्षिर्नारदस्तथा । 'थोड़े ही दिनोंमें भगवान् यहाँ पधारकर तुम सब लोगोंका इस संकटसे उद्धार करेंगे।' ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् देवर्षि नारद यहाँसे चले गये। त्वां चिन्तयानाः सततं तपो घोरमुपास्महे ।। कालेऽतीते महाबाहुं कदा द्रक्ष्याम माधवम् । हम सदा आपका ही चिन्तन करती हुई घोर तपस्यामें लग गयीं। हमारे मनमें यह संकल्प उठता रहता था कि कितना समय बीतनेपर हमें महाबाहु माधवका दर्शन प्राप्त होगा।

इत्येवं हृदि संकल्पं कृत्वा पुरुषसत्तम ।।
तपश्चराम सततं रक्ष्यमाणा हि दानवैः ।
पुरुषोत्तम! यही संकल्प लेकर दानवोंद्वारा सुरक्षित हो हम सदा तपस्या करती आ रही हैं।
गान्धर्वेण विवाहेन विवाहं कुरु नः प्रियम् ।।
ततोऽस्मत्प्रियकामार्थं भगवान् मारुतोऽब्रवीत् ।
यथोक्तं नारदेनाद्य न चिरात् तद् भविष्यति ।।
भगवन्! आप गान्धर्व विवाहकी रीतिसे हमारे साथ विवाह करके हमारा प्रिय करें। हमारे पूर्वोक्त मनोरथको जानकर भगवान् वायुदेवने भी हम सबके प्रिय मनोरथकी सिद्धिके लिये कहा था कि ‘देवर्षि नारदजीने जो कहा है, वह शीघ्र ही पूर्ण होगा’।

भीष्म उवाच

तासां परमनारीणामृषभाक्षं पुरस्कृतम् ।
ददृशुर्देवगन्धर्वा गृष्टीनामिव गोपतिम् ।।
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! देवताओं तथा गन्धर्वोंने देखा, वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण उन परम सुन्दरी नारियोंके समक्ष वैसे ही खड़े थे, जैसे नयी गायोंके आगे साँड़ हो।
तस्य चन्द्रोपमं वक्त्रमुदीक्ष्य मुदितेन्द्रियाः ।
सम्प्रहृष्टा महाबाहुमिदं वचनमब्रुवन् ।।
भगवान्‌के मुखचन्द्रको देखकर उन सबकी इन्द्रियाँ उल्लसित हो उठीं और वे हर्षमें भरकर महाबाहु श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार बोलीं।

कन्यका ऊचुः

सत्यं बत पुरा वायुरिदमस्मानिहाब्रवीत् ।
सर्वभूतकृतज्ञश्च महर्षिरपि नारदः ।।
कन्याओंने कहा— बड़े हर्षकी बात है कि पूर्व-कालमें वायुदेवने तथा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति कृतज्ञता रखनेवाले महर्षि नारदजीने जो बात कही थी, वह सत्य हो गयी।
विष्णुर्नारायणो देवः शङ्खचक्रगदासिधृक् ।
स भौमं नरकं हत्वा भर्ता वो भविता ह्यतः ।।
उन्होंने कहा था कि ‘शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले सर्वव्यापी नारायण भगवान् विष्णु भूमिपुत्र नरकको मारकर तुमलोगोंके पति होंगे’।
दिष्ट्या तस्यर्षिमुख्यस्य नारदस्य महात्मनः ।
वचनं दर्शनादेव सत्यं भवितुमर्हति ।।

ऋषियोंमें प्रधान महात्मा नारदका वह वचन आज आपके दर्शनमात्रसे सत्य होने जा रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है।

यत् प्रियं बत पश्याम वक्त्रं चन्द्रोपमं तु ते ।
दर्शनेन कृतार्थाः स्मो वयमद्य महात्मनः ॥
तभी तो आज हम आपके परम प्रिय चन्द्रतुल्य मुखका दर्शन कर रही हैं। आप परमात्माके दर्शनमात्रसे ही हम कृतार्थ हो गयीं।

भीष्म उवाच

उवाच स यदुश्रेष्ठः सर्वास्ता जातमन्मथाः ।
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! भगवान्‌के प्रति उन सबके हृदयमें कामभावका संचार हो गया था। उस समय यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे कहा।

श्रीभगवानुवाच

यथा ब्रूत विशालाक्ष्यस्तत् सर्वं वो भविष्यति ॥
**श्रीभगवान् बोले—**विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियो! जैसा तुम कहती हो, उसके अनुसार तुम्हारी सारी अभिलाषा पूर्ण हो जायगी।

भीष्म उवाच

तानि सर्वाणि रत्नानि गमयित्वाथ किङ्करैः ।
स्त्रियश्च गमयित्वाथ देवतानृपकन्यकाः ॥
वैनतेयभुजे कृष्णो मणिपर्वतमुत्तमम् ।
क्षिप्रमारोपयाञ्चक्रे भगवान् देवकीसुतः ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! सेवकोंद्वारा उन सब रत्नोंको तथा देवताओं एवं राजाओं आदिकी कन्याओंको द्वारका भेजकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उस उत्तम मणिपर्वतको शीघ्र ही गरुड़की बाँह (पंख या पीठ)-पर चढ़ा दिया।

सपक्षिगणमातङ्गं सव्यालमृगपन्नगम् ।
शाखामृगगणैर्जुष्टं सप्रस्तरशिलातलम् ॥
न्यङ्कुभिश्च वराहेश्च रुरुभिश्च निषेवितम् ।
सप्रपातमहासानुं विचित्रशिखिसंकुलम् ॥
तं महेन्द्रानुजः शौरिश्चकार गरुडोपरि ।
पश्यतां सर्वभूतानामुत्पाट्य मणिपर्वतम् ॥
केवल पर्वत ही नहीं, उसपर रहनेवाले जो पक्षियोंके समुदाय, हाथी, सर्प, मृग, नाग, बंदर, पत्थर, शिला, न्यंकु, वराह, रुरु मृग, झरने, बड़े-बड़े शिखर तथा विचित्र मोर आदि

थे, उन सबके साथ मणिपर्वतको उखाड़कर इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने सब प्राणियोंके देखते-देखते गरुड़पर रख लिया। उपेन्द्रं बलदेवं च वासवं च महाबलम् । तं च रत्नौघमतुलं पर्वतं च महाबलः ।। वरुणस्यामृतं दिव्यं छत्रं चन्द्रोपमं शुभम् । स्वपक्षबलविक्षेपैर्महाद्रिशिखरोपमः ।। दिक्षु सर्वासु संरावं स चक्रे गरुडो वहन् । महाबली गरुड़ श्रीकृष्ण, बलराम तथा महाबलवान् इन्द्रको, उस अनुपम रत्नराशि तथा पर्वतको, वरुणदेवताके दिव्य अमृत तथा चन्द्रतुल्य उज्ज्वल शुभकारक छत्रको वहन करते हुए चल दिये। उनका शरीर विशाल पर्वतशिखरके समान था। वे अपनी पाँखोंको बलपूर्वक हिला-हिलाकर सब दिशाओंमें भारी शोर मचाते जा रहे थे। आरुजन् पर्वताग्राणि पादपांश्च समुत्क्षिपन् ।। संजहार महाभ्राणि वैश्वानरपथं गतः । उड़ते समय गरुड़ पर्वतोंके शिखर तोड़ डालते थे, पेड़ोंको उखाड़ फेंकते थे और ज्योतिषपथ (आकाश)-में चलते समय बड़े-बड़े बादलोंको अपने साथ उड़ा ले जाते थे। ग्रहनक्षत्रताराणां सप्तर्षीणां स्वतेजसा ।। प्रभाजालमतिक्रम्य चन्द्रसूर्यपथं ययौ । वे अपने तेजसे ग्रह, नक्षत्र, तारों और सप्तर्षियोंके प्रकाशपुंजको तिरस्कृत करते हुए चन्द्रमा और सूर्यके मार्गपर जा पहुँचे। मेरोः शिखरमासाद्य मध्यमं मधुसूदनः ।। देवस्थानानि सर्वाणि ददर्श भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मधुसूदनने मेरुपर्वतके मध्यम शिखरपर पहुँचकर समस्त देवताओंके निवासस्थानोंका दर्शन किया। विश्वेषां मरुतां चैव साध्यानां च युधिष्ठिर ।। भ्राजमानान्यतिक्रम्य अश्विनोश्च परंतप । प्राप्य पुण्यतमं स्थानं देवलोकमरिंदमः ।। युधिष्ठिर! उन्होंने विश्वेदेवों, मरुद्गणों और साध्योंके प्रकाशमान स्थानोंको लाँघकर अश्विनीकुमारोंके पुण्यतम लोकमें पदार्पण किया। परंतप! तत्पश्चात् शत्रुहन्ता भगवान् श्रीकृष्ण देवलोकमें जा पहुँचे। शक्रसद्म समासाद्य चावरुह्य जनार्दनः । सोऽभिवाद्यादितेः पादावर्चिताः सर्वदैवतैः ।। ब्रह्मदक्षपुरोगैश्च प्रजापतिभिरेव च ।

इन्द्रभवनके निकट जाकर भगवान् जनार्दन गरुड़परसे उतर पड़े। वहाँ उन्होंने देवमाता अदितिके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर ब्रह्मा और दक्ष आदि प्रजापतियोंने तथा सम्पूर्ण देवताओंने उनका भी स्वागत-सत्कार किया।

अदितेः कुण्डले दिव्ये ददावथ तदा विभुः ॥
रत्नानि च परार्घ्याणि रामेण सह केशवः ।
उस समय बलरामसहित भगवान् केशवने माता अदितिको दोनों दिव्य कुण्डल और बहुमूल्य रत्न भेंट किये।

प्रतिगृह्य च तत् सर्वमदितिर्वासवानुजम् ॥
पूजयामास दाशार्हं रामं च विगतज्वरा ।
वह सब ग्रहण करके माता अदितिका मानसिक दुःख दूर हो गया और उन्होंने इन्द्रके छोटे भाई यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण और बलरामका बहुत आदर-सत्कार किया।

शची महेन्द्रमहिषी कृष्णस्य महिषीं तदा ॥
सत्यभामां तु संगृह्य अदित्यै वै न्यवेदयत् ।
इन्द्रकी महारानी शचीने उस समय भगवान् श्रीकृष्णकी पटरानी सत्यभामाका हाथ पकड़कर उन्हें माता अदितिकी सेवामें पहुँचाया।

सा तस्याः सत्यभामायाः कृष्णप्रियचिकीर्षया ॥
वरं प्रादाद् देवमाता सत्यायै विगतज्वरा ।
देवमाताकी सारी चिन्ता दूर हो गयी थी। उन्होंने श्रीकृष्णका प्रिय करनेकी इच्छासे सत्यभामाको उत्तम वर प्रदान किया।

अदितिरुवाच

जरां न यास्यसि वधूर्यावद् वै कृष्णमानुषम् ॥
सर्वगन्धगुणोपेता भविष्यसि वरानने ।
अदिति बोलीं— सुन्दर मुखवाली बहू! जबतक श्रीकृष्ण मानव-शरीरमें रहेंगे, तबतक तू वृद्धावस्थाको प्राप्त न होगी और सब प्रकारकी दिव्य सुगन्ध एवं उत्तम गुणोंसे सुशोभित होती रहेगी।

भीष्म उवाच

विहृत्य सत्यभामा वै सह शच्या सुमध्यमा ॥
शच्यापि समनुज्ञाता ययौ कृष्णनिवेशनम् ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! सुन्दरी सत्यभामा शचीदेवीके साथ घूम-फिरकर उनकी आज्ञा ले भगवान् श्रीकृष्णके विश्रामगृहमें चली गयीं।

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैर्महर्षिगणसेवितः ।
द्वारकां प्रययौ कृष्णो देवलोकादरिंदमः ॥

तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण महर्षियोंसे सेवित और देवताओंद्वारा पूजित होकर देवलोकसे द्वारकाको चले गये। सोऽतिपत्य महाबाहुर्दीर्घमध्वानमच्युतः । वर्धमानपुरद्वारमाससाद पुरोत्तमम् ।। महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण लंबा मार्ग तय करके उत्तम द्वारका नगरीमें, जिसके प्रधान द्वारका नाम वर्धमान था, जा पहुँचे। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश]

भीष्म उवाच

तां पुरीं द्वारकां दृष्ट्वा विभुर्नारायणो हरिः ।
हृष्टः सर्वार्थसम्पन्नां प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! सर्वव्यापी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने सब प्रकारके मनोवांछित पदार्थोंसे भरी-पूरी द्वारकापुरीको देखकर प्रसन्नतापूर्वक उसमें प्रवेश करनेकी तैयारी की।

सोऽपश्यद् वृक्षषण्डांश्च रम्यानारामजान् बहून् ।
समन्ततो द्वारवत्यां नानापुष्पफलान्वितान् ॥
उन्होंने देखा, द्वारकापुरीके सब ओर बगीचोंमें बहुत-से रमणीय वृक्षसमूह शोभा पा रहे हैं, जिनमें नाना प्रकारके फल और फूल लगे हुए हैं।

अर्कचन्द्रप्रतीकाशैर्मेरु कूटनिभैर्गृहैः ।
द्वारका रचिता रम्यैः सुकृता विश्वकर्मणा ॥
वहाँके रमणीय राजसदन सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान तथा मेरु पर्वतके शिखरोंकी भाँति गगनचुम्बी थे। उन भवनोंसे विभूषित द्वारकापुरीकी रचना साक्षात् विश्वकर्माने की थी।

पद्मषण्डाकुलाभिश्च हंससेवितवारिभिः ।
गङ्गासिन्धुप्रकाशाभिः परिखाभिरलंकृता ॥
उस पुरीके चारों ओर बनी हुई चौड़ी खाइयाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उनमें कमलके फूल खिले हुए थे। हंस आदि पक्षी उनके जलका सेवन करते थे। वे देखनेमें गंगा और सिन्धुके समान जान पड़ती थीं।

प्राकारेणार्कवर्णेन पाण्डरेण विराजिता ।
वियन्मूर्ध्नि निविष्टेन द्यौरिवाभ्रपरिच्छदा ॥
सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाली ऊँची गगनचुम्बिनी श्वेत चहारदीवारीसे सुशोभित द्वारकापुरी सफेद बादलोंसे घिरी हुई देवपुरी (अमरावती)-के समान जान पड़ती थी।

नन्दनप्रतिमैश्चापि मिश्रकप्रतिमैर्वनैः ।
भाति चैत्ररथं दिव्यं पितामहवनं यथा ॥
वैभ्राजप्रतिमैश्चैव सर्वर्तुकुसुमोत्कटैः ।
भाति तारापरिक्षिप्ता द्वारका द्यौरिवाम्बरे ॥
नन्दन और मिश्रक-जैसे वन उस पुरीकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँका दिव्य चैत्ररथ वन ब्रह्माजीके अलौकिक उद्यानकी भाँति शोभित था। सभी ऋतुओंके फूलोंसे भरे हुए वैभ्राज

नामक वनके सदृश मनोहर उपवनोंसे घिरी हुई द्वारकापुरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो आकाशमें तारिकाओंसे व्याप्त स्वर्गपुरी शोभा पा रही हो।

भाति रैवतकः शैलो रम्यसानुर्महाजिरः ।
पूर्वस्यां दिशि रम्यायां द्वारकायां विभूषणम् ॥
रमणीय द्वारकापुरीकी पूर्वदिशामें महाकाय रैवतक पर्वत, जो उस पुरीका आभूषणरूप था, सुशोभित हो रहा था। उसके शिखर बड़े मनोहर थे।

दक्षिणस्यां लतावेष्टः पञ्चवर्णो विराजते ।
इन्द्रकेतुप्रतीकाशः पश्चिमां दिशमाश्रितः ॥
सुकक्षो राजतः शैलश्चित्रपुष्पमहावनः ।
उत्तरस्यां दिशि तथा वेणुमन्तो विराजते ॥
मन्दराद्रिप्रतीकाशः पाण्डरः पाण्डवर्षभ ।
पुरीके दक्षिण भागमें लतावेष्ट नामक पर्वत शोभा पा रहा था, जो पाँच रंगका होनेके कारण इन्द्रध्वज-सा प्रतीत होता था। पश्चिमदिशामें सुकक्ष नामक रजत-पर्वत था, जिसके ऊपर विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित महान् वन शोभा पा रहा था। पाण्डवश्रेष्ठ! इसी प्रकार उत्तरदिशामें मन्दराचलके सदृश श्वेत वर्णवाला वेणुमन्त पर्वत शोभायमान था।

चित्रकम्बलवर्णाभं पाञ्चजन्यवनं तथा ॥
सर्वर्तुकवनं चैव भाति रैवतकं प्रति ।
रैवतक पर्वतके पास चित्रकम्बलके-से वर्णवाले पांचजन्यवन तथा सर्वर्तुकवनकी भी बड़ी शोभा होती थी।

लतावेष्टं समन्तात् तु मेरुप्रभवनं महत् ॥
भाति तालवनं चैव पुष्पकं पुण्डरीकवत् ।
लतावेष्ट पर्वतके चारों ओर मेरुप्रभ नामक महान् वन, तालवन तथा कमलोंसे सुशोभित पुष्पकवन शोभा पा रहे हैं।

सुकक्षं परिवार्यैनं चित्रपुष्पं महावनम् ॥
शतपत्रवनं चैव करवीरकुसुम्भि च ।
सुकक्ष पर्वतको चारों ओरसे घेरकर चित्रपुष्प नामक महावन, शतपत्रवन, करवीरवन और कुसुम्भिवन सुशोभित होते हैं।

भाति चैत्ररथं चैव नन्दनं च महावनम् ॥
रमणं भावनं चैव वेणुमन्तं समन्ततः ।
वेणुमन्त पर्वतके सब ओर चैत्ररथ, नन्दन, रमण और भावन नामक महान् वन शोभा पाते हैं।

भाति पुष्करिणी रम्या पूर्वस्यां दिशि भारत ॥
धनुः शतपरीणाहा केशवस्य महात्मनः ।

भारत! महात्मा केशवकी उस पुरीमें पूर्वदिशाकी ओर एक रमणीय पुष्करिणी शोभा पाती है, जिसका विस्तार सौ धनुष है।
महापुरीं द्वारवतीं पञ्चाशद्भिर्मुखैर्युताम् ।
प्रविशे द्वारकां रम्यां भासयन्तीं समन्ततः ॥
पचास दरवाजोंसे सुशोभित और सब ओरसे प्रकाशमान उस सुरम्य महापुरी द्वारकामें श्रीकृष्णने प्रवेश किया।
अप्रमेयां महोत्सेधां महागाधपरिप्लवाम् ।
प्रासादवरसम्पन्नां श्वेतप्रासादशालिनीम् ॥
वह कितनी बड़ी है, इसका कोई माप नहीं था। उसकी ऊँचाई भी बहुत अधिक थी। वह पुरी चारों ओर अत्यन्त अगाध जलराशिसे घिरी हुई थी। सुन्दर-सुन्दर महलोंसे भरी हुई द्वारका श्वेत अट्टालिकाओंसे सुशोभित होती थी।
तीक्ष्णयन्त्रशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैः समन्विताम् ।
आयसैश्च महाचक्रैर्ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥
तीखे यन्त्र, शतघ्नी, विभिन्न यन्त्रोंके समुदाय और लोहेके बने हुए बड़े-बड़े चक्रोंसे सुरक्षित द्वारकापुरीको भगवान्ने देखा।
अष्टौ रथसहस्राणि प्राकारे किङ्किणीकिनः ।
समुच्छ्रितपताकानि यथा देवपुरे तथा ॥
देवपुरीकी भाँति उसकी चहारदीवारीके निकट क्षुद्रघण्टिकाओंसे सुशोभित आठ हजार रथ शोभा पाते थे, जिनमें पताकाएँ फहराती रहती थीं।
अष्टयोजनविस्तीर्णामचलां द्वादशायताम् ।
द्विगुणोपनिवेशां च ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥
द्वारकापुरीकी चौड़ाई आठ योजन है एवं लम्बाई बारह योजन है अर्थात् वह कुल ९६ योजन विस्तृत है। उसका उपनिवेश (समीपस्थ प्रदेश) उससे दुगुना अर्थात् १९२ योजन विस्तृत है। वह पुरी सब प्रकारसे अविचल है। श्रीकृष्णने उस पुरीको देखा।
अष्टमार्गां महाकक्ष्यां महाषोडशचत्वराम् ।
एवं मार्गपरिक्षिप्तां साक्षादुशनसा कृताम् ॥
उसमें जानेके लिये आठ मार्ग हैं, बड़ी-बड़ी ड्योढ़ियाँ हैं और सोलह बड़े-बड़े चौराहे हैं। इस प्रकार विभिन्न मार्गोंसे परिष्कृत द्वारकापुरी साक्षात् शुक्राचार्यकी नीतिके अनुसार बनायी गयी है।
व्यूहानामान्तरा मार्गाः सप्त चैव महापथाः ।
तत्र सा विहिता साक्षान्नगरी विश्वकर्मणा ॥
व्यूहोंके बीच-बीचमें मार्ग बने हैं, सात बड़ी-बड़ी सड़कें हैं। साक्षात् विश्वकर्माने इस द्वारकानगरीका निर्माण किया है।

काञ्चनैर्मणिसोपानैरुपैता जनहर्षिणी।
गीतघोषमहाघोषैः प्रासादप्रवरैः शुभा॥
सोने और मणियोंकी सीढ़ियोंसे सुशोभित यह नगरी जन-जनको हर्ष प्रदान करनेवाली है। यहाँ गीतके मधुर स्वर तथा अन्य प्रकारके घोष गूँजते रहते हैं। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंके कारण वह पुरी परम सुन्दर प्रतीत होती है।
तस्मिन् पुरवरश्रेष्ठे दाशार्हाणां यशस्विनाम्।
वेश्मानि जहृषे दृष्ट्वा भगवान् पाकशासनः॥
नगरोंमें श्रेष्ठ उस द्वारकामें यशस्वी दशार्हवंशियोंके महल देखकर भगवान् पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई।
समुच्छ्रितपताकानि पारिप्लवनिभानि च।
काञ्चनाभानि भास्वन्ति मेरुकूटनिभानि च॥
उन महलोंके ऊपर ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मनोहर भवन मेघोंके समान जान पड़ते थे और सुवर्णमय होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान थे। वे मेरुपर्वतके उत्तुंग शिखरोंके समान आकाशको चूम रहे थे।
सुधापाण्डरशृङ्गैश्च शातकुम्भपरिच्छदैः।
रत्नसानुगुहाशृङ्गैः सर्वरत्नविभूषितैः॥
उन गृहोंके शिखर चूनेसे लिपे-पुते और सफेद थे। उनकी छतें सुवर्णकी बनी हुई थीं। वहाँके शिखर, गुफा और शृंग—सभी रत्नमय थे। उस पुरीके भवन सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे।
सहर्म्यैः सार्धचन्द्रैश्च सनिर्यूहैः सपञ्जरैः।
सयन्त्रगृहसम्बाधैः सधातुभिरिवाद्रिभिः॥
(भगवान्ने देखा) वहाँ बड़े-बड़े महल, अटारी तथा छज्जे हैं और उन छज्जोंमें लटकते हुए पक्षियोंके पिंजड़े शोभा पाते हैं। कितने ही यन्त्रगृह वहाँके महलोंकी शोभा बढ़ाते हैं। अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटिल होनेके कारण द्वारकाके भवन विविध धातुओंसे विभूषित पर्वतोंके समान शोभा धारण करते हैं
मणिकाञ्चनभौमैश्च सुधामृष्टतलैस्तथा।
जाम्बूनदमयैर्द्वारैर्वैदूर्यविकृतार्गलैः॥
कुछ गृह तो मणिके बने हैं, कुछ सुवर्णसे तैयार किये गये हैं और कुछ पार्थिव पदार्थों (ईंट, पत्थर आदि) द्वारा निर्मित हुए हैं। उन सबके निम्नभाग चूनेसे स्वच्छ किये गये हैं। उनके दरवाजे (चौखट-किंवाड़े) जाम्बूनद सुवर्णके बने हैं और अर्गलाएँ (सिटकनियाँ) वैदूर्यमणिसे तैयार की गयी हैं।
सर्वर्तुसुखसंस्पर्शैर्महाधनपरिच्छदैः।
रम्यसानुगुहाशृङ्गैर्विचित्रैरिव पर्वतैः॥

उन गृहोंका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुख देनेवाला है। वे सभी बहुमूल्य सामानोंसे भरे हैं। उनकी समतल भूमि, गुफा और शिखर सभी अत्यन्त मनोहर हैं। इससे उन भवनोंकी शोभा विचित्र पर्वतोंके समान जान पड़ती है। पञ्चवर्णसुवर्णैश्च पुष्पवृष्टिसमप्रभैः । तुल्यपर्जन्यनिर्घोषैर्नानावर्णैरिवाम्बुदैः ॥ उन गृहोंमें पाँच रंगोंके सुवर्ण मढ़े गये हैं। उनसे जो बहुरंगी आभा फैलती है, वह फुलझड़ी-सी जान पड़ती है। उन गृहोंसे मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान शब्द होते रहते हैं। वे देखनेमें अनेक वर्णोंके बादलोंके समान जान पड़ते हैं। महेन्द्रशिखरप्रख्यैर्विहितैर्विश्वकर्मणा । आलिखद्भिरिवाकाशमतिचन्द्रार्कभास्वरैः ॥ विश्वकर्माके बनाये हुए वे (ऊँचे और विशाल) भवन महेन्द्र पर्वतके शिखरोंकी शोभा धारण करते हैं। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो वे आकाशमें रेखा खींच रहे हों। उनका प्रकाश चन्द्रमा और सूर्यसे भी बढ़कर है। तैर्दाशार्हमहाभागैर्बभासे भवनह्रदैः । चण्डनागाकुलैर्घोरैर्ह्रदैर्भोगवती यथा ॥ जैसे भोगवती गङ्गा प्रचण्ड नागगणोंसे भरे हुए भयंकर कुण्डोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी दशार्हकुलके महान् सौभाग्यशाली पुरुषोंसे भरे हुए उपर्युक्त भवनरूपी ह्रदोंके द्वारा शोभा पा रही है। कृष्णध्वजोपवाह्यैश्च दाशार्हायुधरोहितैः । वृष्णिमत्तमयूरैश्च स्त्रीसहस्रप्रभाकुलैः ॥ वासुदेवेन्द्रपर्जन्यैर्गृहमेघैरलङ्कृता । ददृशे द्वारकातीव मेघैर्द्यौरिव संवृता । जैसे आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित होता है, उसी प्रकार द्वारकापुरी मनोहर भवनरूपी मेघोंसे अलंकृत दिखायी देती है। ये भगवान् श्रीकृष्ण ही वहाँ इन्द्र एवं पर्जन्य (प्रमुख मेघ)-के समान हैं। वृष्णिवंशी युवक मतवाले मयूरोंके समान उन भवनरूपी मेघोंको देखकर हर्षसे नाच उठते हैं। सहस्रों स्त्रियोंकी कान्ति विद्युत्‌की प्रभाके समान उनमें व्याप्त है। जैसे मेघ कृष्णध्वज (अग्नि या सूर्यकिरण)-के उपबाह्य (आधेय अथवा कार्य) हैं, उसी प्रकार द्वारकाके भवन भी कृष्णध्वजसे विभूषित उपबाह्य (वाहनों)-से सम्पन्न हैं। यदुवंशियोंके विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उन मेघसदृश महलोंमें इन्द्रधनुषकी बहुरंगी छटा छिटकाते हैं। साक्षाद् भगवतो वेश्म विहितं विश्वकर्मणा ।। ददृशुर्देवदेवस्य चतुर्योजनमायतम् । तावदेव च विस्तीर्णमप्रमेयं महाधनैः ।।

प्रासादवरसम्पन्नं युक्तं जगति पर्वतैः ।
भारत! देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका भवन, जिसे साक्षात् विश्वकर्माने अपने हाथों बनाया है, चार योजन लम्बा और उतना ही चौड़ा दिखायी देता है। उसमें कितनी बहुमूल्य सामग्रियाँ लगी हैं! इसका अनुमान लगाना असम्भव है। उस विशाल भवनके भीतर सुन्दर-सुन्दर महल और अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं। वह प्रासाद जगत्‌के सभी पर्वतीय दृश्योंसे युक्त है। श्रीकृष्ण, बलराम और इन्द्रने उस द्वारकाको देखा।

यं चकार महाबाहुस्त्वष्टा वासवचोदितः ।।
प्रासादं पद्मनाभस्य सर्वतो योजनायतम् ।
मेरोरिव गिरेः शृङ्गमूच्छ्रितं काञ्चनायुतम् ।
रुक्मिण्याः प्रवरो वासो विहितः सुमहात्मना ।।
महाबाहु विश्वकर्माने इन्द्रकी प्रेरणासे भगवान् पद्मनाभके लिये जिस मनोहर प्रासादका निर्माण किया है, उसका विस्तार सब ओरसे एक-एक योजनका है। उसके ऊँचे शिखरपर सुवर्ण मढ़ा गया है, जिससे वह मेरुपर्वतके उत्तुंग शृंगकी शोभा धारण कर रहा है। वह प्रासाद महात्मा विश्वकर्माने महारानी रुक्मिणीके रहनेके लिये बनाया है। यह उनका सर्वोत्तम निवास है।

सत्यभामा पुनर्वेश्म सदा वसति पाण्डरम् ।
विचित्रमणिसोपानं यं विदुः शीतवानिति ।।
श्रीकृष्णकी दूसरी पटरानी सत्यभामा सदा श्वेत-रंगके प्रासादमें निवास करती हैं, जिसमें विचित्र मणियोंके सोपान बनाये गये हैं। उसमें प्रवेश करनेपर लोगोंको (ग्रीष्म-ऋतुमें

भी) शीतलताका अनुभव होता है।
विमलादित्यवर्णाभिः पताकाभिरलङ्कृतम्।
व्यक्तबद्धं वनोद्देशे चतुर्दिशि महाध्वजम्॥
निर्मल सूर्यके समान तेजस्विनी पताकाएँ उस मनोरम प्रासादकी शोभा बढ़ाती हैं। एक सुन्दर उद्यानमें उस भवनका निर्माण किया गया है। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहराती रहती हैं।
स च प्रासादमुख्योऽत्र जाम्बवत्या विभूषितः।
प्रभया भूषणैश्चित्रैस्त्रैलोक्यमिव भासयन्॥
यस्तु पाण्डरवर्णभस्तयोरन्तरमाश्रितः।
विश्वकर्माकरोदेनं कैलासशिखरोपमम्॥
इसके सिवा वह प्रमुख प्रासाद, जो रुक्मिणी तथा सत्यभामाके महलोंके बीचमें पड़ता है और जिसकी उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली रहती है, जाम्बवतीदेवीद्वारा विभूषित किया गया है। वह अपनी दिव्य प्रभा और विचित्र सजावटसे मानो तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रहा है। उसे भी विश्वकर्माने ही बनाया है। जाम्बवतीका वह विशाल भवन कैलास-शिखरके समान सुशोभित होता है।
जाम्बूनदप्रदीप्ताग्रः प्रदीप्तज्वलनोपमः।
सागरप्रतिमोऽतिष्ठन्मेरुरित्यभिविश्रुतः॥
तस्मिन् गान्धारराजस्य दुहिता कुलशालिनी।
सुकेशी नाम विख्याता केशवेन निवेशिता॥
जिसका दरवाजा जाम्बूनद सुवर्णके समान उद्दीप्त होता है, जो देखनेमें प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता है। विशालतामें समुद्रसे जिसकी उपमा दी जाती है, जो मेरुके नामसे विख्यात है, उस महान् प्रासादमें गान्धारराजकी कुलीन कन्या सुकेशीको भगवान् श्रीकृष्णने ठहराया है।
पद्मकूट इति ख्यातः पद्मवर्णो महाप्रभः।
सुप्रभाया महाबाहो निवासः परमार्चितः॥
महाबाहो! पद्मकूट नामसे विख्यात जो कमलके समान कान्तिवाला प्रासाद है, वह महारानी सुप्रभाका परम पूजित निवासस्थान है।
यस्तु सूर्यप्रभो नाम प्रासादवर उच्यते।
लक्ष्मणायाः कुरुश्रेष्ठ स दत्तः शार्ङ्गधन्वना॥
कुरुश्रेष्ठ! जिस उत्तम प्रासादकी प्रभा सूर्यके समान है, उसे शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णने महारानी लक्ष्मणाको दे रखा है।
वैडूर्यवरवर्णाभः प्रासादो हरितप्रभः।
यं विदुः सर्वभूतानि हरिरित्येव भारत।

वासः स मित्रविन्दाया देवर्षिगणपूजितः ।। महिष्या वासुदेवस्य भूषणं सर्ववेश्मनाम् । भारत! वैदूर्यमणिके समान कान्तिमान् हरे रंगका महल, जिसे देखकर सब प्राणियोंको ‘श्रीहरि’ ही हैं, ऐसा अनुभव होता है, वह मित्रविन्दाका निवासस्थान है। उसकी देवगण भी सराहना करते हैं। भगवान् वासुदेवकी रानी मित्रविन्दाका यह भवन अन्य सब महलोंका आभूषणरूप है। यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र विहितः सर्वशिल्पिभिः ।। अतीव रम्यः सोऽप्यत्र प्रहसन्निव तिष्ठति । सुदत्तायाः सुवासस्तु पूजितः सर्वशिल्पिभिः ।। महिष्या वासुदेवस्य केतुमानिति विश्रुतः । युधिष्ठिर! द्वारकामें जो दूसरा प्रमुख प्रासाद है, उसे सम्पूर्ण शिल्पियोंने मिलकर बनाया है। वह अत्यन्त रमणीय भवन हँसता-सा खड़ा है। सभी शिल्पी उसके निर्माण-कौशलकी सराहना करते हैं। उस प्रासादका नाम है केतुमान्। वह भगवान् वासुदेवकी महारानी सुदत्तादेवीका सुन्दर निवासस्थान है। प्रासादो विरजो नाम विरजस्को महात्मनः ।। उपस्थानगृहं तात केशवस्य महात्मनः । वहीं ‘विरज’ नामसे प्रसिद्ध एक प्रासाद है, जो निर्मल एवं रजोगुणके प्रभावसे शून्य है। वह परमात्मा श्रीकृष्णका उपस्थानगृह (खास रहनेका स्थान) है। यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र यं त्वष्टा व्यदधात् स्वयम् ।। योजनायतविष्कम्भं सर्वरत्नमयं विभोः । इसी प्रकार वहाँ एक और भी प्रमुख प्रासाद है, जिसे स्वयं विश्वकर्माने बनाया है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी है। भगवान्का वह भवन सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्मित हुआ है। तेषां तु विहिताः सर्वे रुक्मदण्डाः पताकिनः । सदने वासुदेवस्य मार्गसंजनना ध्वजाः ।। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके सुन्दर सदनमें जो मार्गदर्शक ध्वज हैं, उन सबके दण्ड सुवर्णमय बनाये गये हैं। उन सबपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। घण्टाजालानि तत्रैव सर्वेषां च निवेशने । आहृत्य यदुसिंहेन वैजयन्त्यचलो महान् ।। द्वारकापुरीमें सभीके घरोंमें घंटा लगाया गया है। यदुसिंह श्रीकृष्णने वहाँ लाकर वैजयन्ती पताकाओंसे युक्त पर्वत स्थापित किया है। हंसकूटस्य यच्छृङ्गमिन्रद्युम्नसरो महत् । षष्टितालसमुत्सेधमर्धयोजनविस्तृतम् ।।

वहाँ हंसकूट पर्वतका शिखर है, जो साठ ताड़के बराबर ऊँचा और आधा योजन चौड़ा है। वहीं इन्द्रद्युम्नसरोवर भी है, जिसका विस्तार बहुत बड़ा है। सकिन्नरमहानादं तदप्यमिततेजसः । पश्यतां सर्वभूतानां त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ वहाँ सब भूतोंके देखते-देखते किन्नरोंके संगीतका महान् शब्द होता रहता है। वह भी अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका ही लीलास्थल है। उसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। आदित्यपथगं यत् तन्मेरोः शिखरमुत्तमम् । जाम्बूनदमयं दिव्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ तदप्युत्पाट्य कृच्छ्रेण स्वं निवेशनमाहृतम् । भ्राजमानं पुरा तत्र सर्वौषधिविभूषितम् ॥ मेरुपर्वतका जो सूर्यके मार्गतक पहुँचा हुआ जाम्बूनदमय दिव्य और त्रिभुवनविख्यात उत्तम शिखर है, उसे उखाड़कर भगवान् श्रीकृष्ण कठिनाई उठाकर भी अपने महलमें ले आये हैं। सब प्रकारकी ओषधियोंसे अलंकृत वह मेरुशिखर द्वारकामें पूर्ववत् प्रकाशित है। यमिन्द्रभवनाच्छौरिराजहार परंतपः । पारिजातः स तत्रैव केशवेन निवेशितः ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिसे इन्द्रभवनसे हर ले आये थे, वह पारिजातवृक्ष भी उन्होंने द्वारकामें ही लगा रखा है। विहिता वासुदेवेन ब्रह्मस्थलमहाद्रुमाः ॥ शालतालाश्वकर्णाश्चशतशाखाश्च रोहिणाः । भल्लातककपित्थाश्च चन्द्रवृक्षाश्च चम्पकाः ॥ खर्जूराः केतकाश्चैव समन्तात् परिरोपिताः । भगवान् वासुदेवने ब्रह्मलोकके बड़े-बड़े वृक्षोंको भी लाकर द्वारकामें लगाया है। साल, ताल, अश्वकर्ण (कनेर), सौ शाखाओंसे सुशोभित वटवृक्ष, भल्लातक (भिलावा), कपित्थ (कैथ), चन्द्र (बड़ी इलायचीके) वृक्ष, चम्पा, खजूर और केतक (केवड़ा)—ये वृक्ष वहाँ सब ओर लगाये गये थे। पद्माकुलजलोपेता रक्ताः सौगन्धिकोत्पलाः ॥ मणिमौक्तिकवालूकाः पुष्करिण्यः सरांसि च । तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमाः ॥ द्वारकामें जो पुष्करिणियाँ और सरोवर हैं, वे कमलपुष्पोंसे सुशोभित स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं। उनकी आभा लाल रंगकी है। उनमें सुगन्धयुक्त उत्पल खिले हुए हैं। उनमें स्थित बालूके कण मणियों और मोतियोंके चूर्ण-जैसे जान पड़ते हैं। वहाँ लगाये हुए बड़े-बड़े वृक्ष उन सरोवरोंके सुन्दर तटोंकी शोभा बढ़ाते हैं। ये च हैमवता वृक्षा ये च नन्दनजास्तथा ।

आहृत्य यदुसिंहेन तेऽपि तत्र निवेशिताः ॥ जो वृक्ष हिमालयपर उगते हैं तथा जो नन्दनवनमें उत्पन्न होते हैं, उन्हें भी यदुप्रवर श्रीकृष्णने वहाँ लाकर लगाया है। रक्तपीतारुणप्रख्याः सितपुष्पाश्च पादपाः । सर्वर्तुफलपूर्णास्ते तेषु काननसंधिषु ॥ कोई वृक्ष लाल रंगके हैं, कोई पीत वर्णके हैं और कोई अरुण कान्तिसे सुशोभित हैं तथा बहुत-से वृक्ष ऐसे हैं, जिनमें श्वेत रंगके पुष्प शोभा पाते हैं। द्वारकाके उपवनोंमें लगे हुए पूर्वोक्त सभी वृक्ष सम्पूर्ण ऋतुओंके फलोंसे परिपूर्ण हैं। सहस्रपत्रपद्माश्च मन्दराश्च सहस्रशः । अशोकाः कर्णिकाराश्च तिलका नागमल्लिकाः ॥ कुरवा नागपुष्पाश्च चम्पकास्तृणगुल्मकाः । सप्तपर्णाः कदम्बाश्च नीपाः कुरबकास्तथा ॥ केतक्यः केसराश्चैव हिन्तालतलताटकाः । तालाः प्रियङ्गुवकुलाः पिण्डिका बीजपूरकाः ॥ द्राक्षामलकखर्जूरा मृद्वीका जम्बुकास्तथा । आम्राः पनसवृक्षाश्च अङ्कोलास्तिलतिन्दुकाः ॥ लिकुचाम्रातकाश्चैव क्षीरिका कण्टकी तथा । नालिकेरेङ्गुदाश्चैव उत्क्रोशकवनानि च ॥ वनानि च कदल्याश्च जातिमल्लिकपाटलाः । भल्लातककपित्थाश्च तैतभा बन्धुजीवकाः ॥ प्रवाला शोककाश्मर्यः प्राचीनाश्चैव सर्वशः । प्रियङ्गुबदरीभिश्च यवैः स्पन्दनचन्दनैः ॥ शमीबिल्वपलाशैश्च पाटलावटपिप्पलैः । उदुम्बरैश्च द्विदलैः पालाशैः पारिभद्रकैः ॥ इन्द्रवृक्षार्जुनैश्चैव अश्वत्थैश्चिरिबिल्वकैः । सौभञ्जनकवृक्षैश्च भल्लटैरृक्षसाह्वयैः ॥ सर्जैस्ताम्बूलवल्लीभिर्लवङ्गैः क्रमुकैस्तथा । वंशैश्च विविधैस्तत्र समन्तात् परिरोपितैः ॥ सहस्रदल कमल, सहस्रों मन्दार, अशोक, कर्णिकार, तिलक, नागमल्लिका, कुरव (कटसरैया), नागपुष्प, चम्पक, तृण, गुल्म, सप्तपर्ण (छितवन), कदम्ब, नीप, कुरबक, केतकी, केसर, हिंताल, तल, ताटक, ताल, प्रियंगु, वकुल (मौलसिरी), पिण्डिका, बीजपूर (बिजौरा), दाख, आँवला, खजूर, मुनक्का, जामुन, आम, कटहल, अंकोल, तिल, तिन्दुक, लिकुच (लीची), आमड़ा, क्षीरिका (काकोली नामकी जड़ी या पिंडखजूर), करटकी (बेर),