महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
एतया संख्यया ह्यासन् कुरुपाण्डवसेनयोः ।
अक्षौहिण्यो द्विजश्रेष्ठाः पिण्डिताष्टादशैव तु ॥ २८ ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसी गणनाके अनुसार कौरव-पाण्डव दोनों सेनाओंकी संख्या अठारह अक्षौहिणी थी ॥ २८ ॥
समेतास्तत्र वै देशे तत्रैव निधनं गताः ।
कौरवान् कारणं कृत्वा कालेनाद्भुतकर्मणा ॥ २९ ॥
अद्भुत कर्म करनेवाले कालकी प्रेरणासे समन्तपञ्चकक्षेत्रमें कौरवोंको निमित्त बनाकर इतनी सेनाएँ इकट्ठी हुईं और वहीं नाशको प्राप्त हो गयीं ॥ २९ ॥
अहानि युयुधे भीष्मो दशैव परमास्त्रवित् ।
अहानि पञ्च द्रोणस्तु ररक्ष कुरुवाहिनीम् ॥ ३० ॥
अस्त्र-शस्त्रोंके सर्वोपरि मर्मज्ञ भीष्मपितामहने दस दिनोंतक युद्ध किया, आचार्य द्रोणने पाँच दिनोंतक कौरव-सेनाकी रक्षा की ॥ ३० ॥
अहनी युयुधे द्वे तु कर्णः परबलार्दनः ।
शल्योऽर्धदिवसं चैव गदायुद्धमतः परम् ॥ ३१ ॥
शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले वीरवर कर्णने दो दिन युद्ध किया और शल्यने आधे दिनतक। इसके पश्चात् (दुर्योधन और भीमसेनका परस्पर) गदायुद्ध आधे दिनतक होता रहा ॥ ३१ ॥
तस्यैव दिवसस्यान्ते द्रौणिहार्दिक्यगौतमाः ।
प्रसुप्तं निशि विश्वस्तं जघ्नुर्यौधिष्ठिरं बलम् ॥ ३२ ॥
अठारहवाँ दिन बीत जानेपर रात्रिके समय अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यने निःशंक सोते हुए युधिष्ठिरके सैनिकोंको मार डाला ॥ ३२ ॥
यत्तु शौनक सत्रे ते भारताख्यानमुत्तमम् ।
जनमेजयस्य तत् सत्रे व्यासशिष्येण धीमता ॥ ३३ ॥
कथितं विस्तरार्थं च यशो वीर्यं महीक्षिताम् ।
पौष्यं तत्र च पौलोममास्तीकं चादितः स्मृतम् ॥ ३४ ॥
शौनकजी! आपके इस सत्संग-सत्रमें मैं यह जो उत्तम इतिहास महाभारत सुना रहा हूँ, यही जनमेजयके सर्पयज्ञमें व्यासजीके बुद्धिमान् शिष्य वैशम्पायनजीके द्वारा भी वर्णन किया गया था। उन्होंने बड़े-बड़े नरपतियोंके यश और पराक्रमका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये प्रारम्भमें पौष्य, पौलोम और आस्तीक—इन तीन पर्वोंका स्मरण किया है ॥ ३३-३४ ॥
विचित्रार्थपदाख्यानमनेकसमयान्वितम् ।
प्रतिपन्नं नरैः प्राज्ञैर्वैराग्यमिव मोक्षिभिः ॥ ३५ ॥
जैसे मोक्ष चाहनेवाले पुरुष पर-वैराग्यकी शरण ग्रहण करते हैं, वैसे ही प्रज्ञावान् मनुष्य अलौकिक अर्थ, विचित्र पद, अद्भुत आख्यान और भाँति-भाँतिकी परस्पर विलक्षण मर्यादाओंसे युक्त इस महाभारतका आश्रय ग्रहण करते हैं ॥ ३५ ॥
आत्मैव वेदितव्येषु प्रियेष्ठिव हि जीवितम् ।
इतिहासः प्रधानार्थः श्रेष्ठः सर्वागमेष्वयम् ॥ ३६ ॥
जैसे जाननेयोग्य पदार्थोंमें आत्मा, प्रिय पदार्थोंमें अपना जीवन सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप प्रयोजनको पूर्ण करनेवाला यह इतिहास श्रेष्ठ है ॥ ३६ ॥
अनाश्रित्येदमाख्यानं कथा भुवि न विद्यते ।
आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ॥ ३७ ॥
जैसे भोजन किये बिना शरीर-निर्वाह सम्भव नहीं है, वैसे ही इस इतिहासका आश्रय लिये बिना पृथ्वीपर कोई कथा नहीं है ॥ ३७ ॥
तदेतद् भारतं नाम कविभिस्तूपजीव्यते ।
उदयप्रेप्सुभिर्भृत्यैरभिजात इवेश्वरः ॥ ३८ ॥
जैसे अपनी उन्नति चाहनेवाले महत्त्वाकांक्षी सेवक अपने कुलीन और सद्भावसम्पन्न स्वामीकी सेवा करते हैं, इसी प्रकार संसारके श्रेष्ठ कवि इस महाभारतकी सेवा करके ही अपने काव्यकी रचना करते हैं ॥ ३८ ॥
इतिहासोत्तमे यस्मिन्नर्पिता बुद्धिरुत्तमा ।
स्वरव्यञ्जनयोः कृत्स्ना लोकवेदाश्रयेव वाक् ॥ ३९ ॥
जैसे लौकिक और वैदिक सब प्रकारके ज्ञानको प्रकाशित करनेवाली सम्पूर्ण वाणी स्वरों एवं व्यंजनोंमें समायी रहती है, वैसे ही (लोक, परलोक एवं परमार्थसम्बन्धी) सम्पूर्ण उत्तम विद्या-बुद्धि इस श्रेष्ठ इतिहासमें भरी हुई है ॥ ३९ ॥
तस्य प्रज्ञाभिपन्नस्य विचित्रपदपर्वणः ।
सूक्ष्मार्थन्याययुक्तस्य वेदार्थैर्भूषितस्य च ॥ ४० ॥
भारतस्येतिहासस्य श्रूयतां पर्वसंग्रहः ।
पर्वानुक्रमणी पूर्वं द्वितीयः पर्वसंग्रहः ॥ ४१ ॥
यह महाभारत इतिहास ज्ञानका भण्डार है। इसमें सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थ और उनका अनुभव करानेवाली युक्तियाँ भरी हुई हैं। इसका एक-एक पद और पर्व आश्चर्यजनक है तथा यह वेदोंके धर्ममय अर्थसे अलंकृत है। अब इसके पर्वोंकी संग्रह-सूची सुनिये। पहले अध्यायमें पर्वानुक्रमणी है और दूसरेमें पर्वसंग्रह ॥ ४०-४१ ॥
पौष्यं पौलोममास्तीकमादिरंशावतारणम् ।
ततः सम्भवपर्वोक्तमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ४२ ॥
इसके पश्चात् पौष्य, पौलोम, आस्तीक और आदिअंशावतरण पर्व हैं। तदनन्तर सम्भवपर्वका वर्णन है, जो अत्यन्त अद्भुत और रोमांचकारी है ॥ ४२ ॥ दाहो जतुगृहस्यात्र हैडिम्बं पर्व चोच्यते । ततो बकवधः पर्व पर्व चैत्ररथं ततः ॥ ४३ ॥ इसके पश्चात् जतुगृह (लाक्षाभवन) दाहपर्व है। तदनन्तर हिडिम्बवधपर्व है, फिर बकवध और उसके बाद चैत्ररथपर्व है ॥ ४३ ॥ ततः स्वयंवरो देव्याः पाञ्चाल्याः पर्व चोच्यते । क्षात्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् ॥ ४४ ॥ उसके बाद पांचालराजकुमारी देवी द्रौपदीके स्वयंवरपर्वका तथा क्षत्रियधर्मसे सब राजाओंपर विजय-प्राप्तिपूर्वक वैवाहिकपर्वका वर्णन है ॥ ४४ ॥ विदुरागमनं पर्व राज्यलम्भस्तथैव च । अर्जुनस्य वने वासः सुभद्राहरणं ततः ॥ ४५ ॥ विदुरागमन, राज्यलम्भपर्व, तत्पश्चात् अर्जुन-वनवासपर्व और फिर सुभद्राहरणपर्व है ॥ ४५ ॥ सुभद्राहरणादूर्ध्व ज्ञेया हरणहारिका । ततः खाण्डवदाहाख्यं तत्रैव मयदर्शनम् ॥ ४६ ॥ सुभद्राहरणके बाद हरणाहरणपर्व है, पुनः खाण्डवदाह-पर्व है, उसीमें मयदानवके दर्शनकी कथा है ॥ ४६ ॥ सभापर्व ततः प्रोक्तं मन्त्रपर्व ततः परम् । जरासन्धवधः पर्व पर्व दिग्विजयं तथा ॥ ४७ ॥ इसके बाद क्रमशः सभापर्व, मन्त्रपर्व, जरासन्ध-वधपर्व और दिग्विजयपर्वका प्रवचन है ॥ ४७ ॥ पर्व दिग्विजयादूर्ध्वं राजसूयिकमुच्यते । ततश्चार्घाभिहरणं शिशुपालवधस्ततः ॥ ४८ ॥ तदनन्तर राजसूय, अर्घाभिहरण और शिशुपाल-वधपर्व कहे गये हैं ॥ ४८ ॥ द्यूतपर्व ततः प्रोक्तमनुद्यूतमतः परम् । तत आरण्यकं पर्व किर्मीरवध एव च ॥ ४९ ॥ इसके बाद क्रमशः द्यूत एवं अनुद्यूतपर्व हैं। तत्पश्चात् वनयात्रापर्व तथा किर्मीरवधपर्व है ॥ ४९ ॥ अर्जुनास्याभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । ईश्वरार्जुनयोर्युद्धं पर्व कैरातसंज्ञितम् ॥ ५० ॥ इसके बाद अर्जुनाभिगमनपर्व जानना चाहिये और फिर कैरातपर्व आता है, जिसमें सर्वेश्वर भगवान् शिव तथा अर्जुनके युद्धका वर्णन है ॥ ५० ॥
इन्द्रलोकाभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । नलोपाख्यानमपि च धार्मिकं करुणोदयम् ॥ ५१ ॥ तत्पश्चात् इन्द्रलोकाभिगमनपर्व है, फिर धार्मिक तथा करुणोत्पादक नलोपाख्यानपर्व है ॥ ५१ ॥ तीर्थयात्रा ततः पर्व कुरुराजस्य धीमतः । जटासुरवधः पर्व यक्षयुद्धमतः परम् ॥ ५२ ॥ तदनन्तर बुद्धिमान् कुरुराजका तीर्थयात्रापर्व, जटासुरवधपर्व और उसके बाद यक्षयुद्धपर्व है ॥ ५२ ॥ निवातकवचैर्युद्धं पर्व चाजगरं ततः । मार्कण्डेयसमस्या च पर्वानन्तरमुच्यते ॥ ५३ ॥ इसके पश्चात् निवातकवचयुद्ध, आजगर और मार्कण्डेयसमस्यापर्व क्रमशः कहे गये हैं ॥ ५३ ॥ संवादश्च ततः पर्व द्रौपदीसत्यभामयोः । घोषयात्रा ततः पर्व मृगस्वप्नोद्भवं ततः ॥ ५४ ॥ व्रीहिद्रौणिकमाख्यानमैन्द्रद्युम्नं तथैव च । द्रौपदीहरणं पर्व जयद्रथविमोक्षणम् ॥ ५५ ॥ इसके बाद आता है द्रौपदी और सत्यभामाके संवादका पर्व, इसके अनन्तर घोषयात्रापर्व है, उसीमें मृगस्वप्नोद्भव और व्रीहिद्रौणिक उपाख्यान है। तदनन्तर इन्द्रद्युम्नका आख्यान और उसके बाद द्रौपदीहरणपर्व है। उसीमें जयद्रथविमोक्षणपर्व है ॥ ५४-५५ ॥ पतिव्रताया माहात्म्यं सावित्र्याश्चैवमद्भुतम् । रामोपाख्यानमत्रैव पर्व ज्ञेयमतः परम् ॥ ५६ ॥ इसके बाद पतिव्रता सावित्रीके पातिव्रत्यका अद्भुत माहात्म्य है। फिर इसी स्थानपर रामोपाख्यानपर्व जानना चाहिये ॥ ५६ ॥ कुण्डलाहरणं पर्व ततः परमिहोच्यते । आरणेयं ततः पर्व वैराटं तदनन्तरम् । पाण्डवानां प्रवेशश्च समयस्य च पालनम् ॥ ५७ ॥ इसके बाद क्रमशः कुण्डलाहरण और आरणेय-पर्व कहे गये हैं। तदनन्तर विराटपर्वका आरम्भ होता है, जिसमें पाण्डवोंके नगरप्रवेश और समयपालन-सम्बन्धीपर्व हैं ॥ ५७ ॥ कीचकानां वधः पर्व पर्व गोग्रहणं ततः । अभिमन्योश्च वैराट्याः पर्व वैवाहिकं स्मृतम् ॥ ५८ ॥ इसके बाद कीचकवधपर्व, गोग्रहण (गोहरण)-पर्व तथा अभिमन्यु और उत्तराके विवाहका पर्व है ॥ ५८ ॥ उद्योगपर्व विज्ञेयमत ऊर्ध्वं महाद्भुतम् ।
ततः संजययानाख्यं पर्व ज्ञेयमतः परम् ।। ५९ ।।
प्रजागरं तथा पर्व धृतराष्ट्रस्य चिन्तया ।
पर्व सानत्सुजातं वै गुह्यमध्यात्मदर्शनम् ।। ६० ।।
इसके पश्चात् परम अद्भुत उद्योगपर्व समझना चाहिये। इसीमें संजययानपर्व कहा गया है। तदनन्तर चिन्ताके कारण धृतराष्ट्रके रातभर जागनेसे सम्बन्ध रखनेवाला प्रजागरपर्व समझना चाहिये। तत्पश्चात् वह प्रसिद्ध सनत्सुजातपर्व है, जिसमें अत्यन्त गोपनीय अध्यात्मदर्शनका समावेश हुआ है ।। ५९-६० ।।
यानसन्धिस्ततः पर्व भगवद्यानमेव च ।
मातलीयमुपाख्यानं चरितं गालवस्य च ।। ६१ ।।
सावित्रं वामदेव्यं च वैन्योपाख्यानमेव च ।
जामदग्न्यमुपाख्यानं पर्व षोडशराजिकम् ।। ६२ ।।
इसके पश्चात् यानसन्धि तथा भगवद्यानपर्व है, इसीमें मातलि का उपाख्यान, गालव-चरित, सावित्र, वामदेव तथा वैन्य-उपाख्यान, जामदग्न्य और षोडशराजिक-उपाख्यान आते हैं ।। ६१-६२ ।।
सभाप्रवेशः कृष्णस्य विदुलापुत्रशासनम् ।
उद्योगः सैन्यनिर्याणं विश्वोपाख्यानमेव च ।। ६३ ।।
फिर श्रीकृष्णका सभाप्रवेश, विदुलाका अपने पुत्रके प्रति उपदेश, युद्धका उद्योग, सैन्यनिर्याण तथा विश्वोपाख्यान—इनका क्रमशः उल्लेख हुआ है ।। ६३ ।।
ज्ञेयं विवादपर्वात्र कर्णस्यापि महात्मनः ।
निर्याणं च ततः पर्व कुरुपाण्डवसेनयोः ।। ६४ ।।
इसी प्रसंगमें महात्मा कर्णका विवादपर्व है। तदनन्तर कौरव एवं पाण्डव-सेनाका निर्याणपर्व है ।। ६४ ।।
रथातिरथसंख्या च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ।
उलूकदूतागमनं पर्वामर्षविवर्धनम् ।। ६५ ।।
तत्पश्चात् रथातिरथसंख्यापर्व और उसके बाद क्रोधकी आग प्रज्वलित करनेवाला उलूकदूतागमनपर्व है ।। ६५ ।।
अम्बोपाख्यानमत्रैव पर्व ज्ञेयमतः परम् ।
भीष्माभिषेचनं पर्व ततश्चाद्भुतमुच्यते ।। ६६ ।।
इसके बाद ही अम्बोपाख्यानपर्व है। तत्पश्चात् अद्भुत भीष्माभिषेचनपर्व कहा गया है ।। ६६ ।।
जम्बूखण्डविनिर्माणं पर्वोक्तं तदनन्तरम् ।
भूमिपर्व ततः प्रोक्तं द्वीपविस्तारकीर्तनम् ।। ६७ ।।
इसके आगे जम्बूखण्ड विनिर्माणपर्व है। तदनन्तर भूमिपर्व कहा गया है, जिसमें द्वीपोंके विस्तारका कीर्तन किया गया है ।। ६७ ।। पर्वोक्तं भगवद्गीता पर्व भीष्मवधस्ततः । द्रोणाभिषेचनं पर्व संशप्तकवधस्ततः ।। ६८ ।। इसके बाद क्रमशः भगवद्गीता, भीष्मवध, द्रोणाभिषेक तथा संशप्तकवधपर्व हैं ।। ६८ ।। अभिमन्युवधः पर्व प्रतिज्ञापर्व चोच्यते । जयद्रथवधः पर्व घटोत्कचवधस्ततः ।। ६९ ।। इसके बाद अभिमन्युवधपर्व, प्रतिज्ञापर्व, जयद्रथवधपर्व और घटोत्कचवधपर्व हैं ।। ६९ ।। ततो द्रोणवधः पर्व विज्ञेयं लोमहर्षणम् । मोक्षो नारायणास्त्रस्य पर्वानन्तरमुच्यते ।। ७० ।। फिर रोंगटे खड़े कर देनेवाला द्रोणवधपर्व जानना चाहिये। तदनन्तर नारायणास्त्रमोक्षपर्व कहा गया है ।। ७० ।। कर्णपर्व ततो ज्ञेयं शल्यपर्व ततः परम् । ह्रदप्रवेशनं पर्व गदायुद्धमतः परम् ।। ७१ ।। फिर कर्णपर्व और उसके बाद शल्यपर्व है। इसी पर्वमें ह्रदप्रवेश और गदायुद्धपर्व भी हैं ।। ७१ ।। सारस्वतं ततः पर्व तीर्थवंशानुकीर्तनम् । अत ऊर्ध्वं सुबीभत्सं पर्व सौप्तिकमुच्यते ।। ७२ ।। तदनन्तर सारस्वतपर्व है, जिसमें तीर्थों और वंशोंका वर्णन किया गया है। इसके बाद है अत्यन्त बीभत्स सौप्तिकपर्व ।। ७२ ।। ऐषीकं पर्व चोद्दिष्टमत ऊर्ध्वं सुदारुणम् । जलप्रदानिकं पर्व स्त्रीविलापस्ततः परम् ।। ७३ ।। इसके बाद अत्यन्त दारुण ऐषीकपर्वकी कथा है। फिर जलप्रदानिक और स्त्रीविलापपर्व आते हैं ।। ७३ ।। श्राद्धपर्व ततो ज्ञेयं कुरूणामौर्ध्वदेहिकम् । चार्वाकनिग्रहः पर्व रक्षसो ब्रह्मरूपिणः ।। ७४ ।। तत्पश्चात् श्राद्धपर्व है, जिसमें मृत कौरवोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका वर्णन है। उसके बाद ब्राह्मण-वेषधारी राक्षस चार्वाकके निग्रहका पर्व है ।। ७४ ।। आभिषेचनिकं पर्व धर्मराजस्य धीमतः । प्रविभागो गृहाणां च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ।। ७५ ।।
तदनन्तर धर्मबुद्धिसम्पन्न धर्मराज युधिष्ठिरके अभिषेकका पर्व है तथा इसके पश्चात् गृहप्रविभागपर्व है ॥ ७५ ॥
शान्तिपर्व ततो यत्र राजधर्मानुशासनम् ।
आपद्धर्मश्च पूर्वोक्तं मोक्षधर्मस्ततः परम् ॥ ७६ ॥
इसके बाद शान्तिपर्व प्रारम्भ होता है; जिसमें राजधर्मानुशासन, आपद्धर्म और मोक्षधर्मपर्व हैं ॥ ७६ ॥
शुकप्रश्नाभिगमनं ब्रह्मप्रश्नानुशासनम् ।
प्रादुर्भावश्च दुर्वासः संवादश्चैव मायया ॥ ७७ ॥
फिर शुकप्रश्नाभिगमन, ब्रह्मप्रश्नानुशासन, दुर्वासाका प्रादुर्भाव और मायासंवादपर्व हैं ॥ ७७ ॥
ततः पर्व परिज्ञेयमानुशासनिकं परम् ।
स्वर्गारोहणिकं चैव ततो भीष्मस्य धीमतः ॥ ७८ ॥
इसके बाद धर्माधर्मका अनुशासन करनेवाला आनुशासनिकपर्व है, तदनन्तर बुद्धिमान् भीष्मजीका स्वर्गारोहणपर्व है ॥ ७८ ॥
ततोऽश्वमेधिकं पर्व सर्वपापप्रणाशनम् ।
अनुगीता ततः पर्व ज्ञेयमध्यात्मवाचकम् ॥ ७९ ॥
अब आता है आश्वमेधिकपर्व, जो सम्पूर्ण पापोंका नाशक है। उसीमें अनुगीतापर्व है, जिसमें अध्यात्मज्ञानका सुन्दर निरूपण हुआ है ॥ ७९ ॥
पर्व चाश्रमवासाख्यं पुत्रदर्शनमेव च ।
नारदागमनं पर्व ततः परमिहोच्यते ॥ ८० ॥
इसके बाद आश्रमवासिक, पुत्रदर्शन और तदनन्तर नारदागमनपर्व कहे गये हैं ॥ ८० ॥
मौसलं पर्व चोद्दिष्टं ततो घोरं सुदारुणम् ।
महाप्रस्थानिकं पर्व स्वर्गारोहणिकं ततः ॥ ८१ ॥
इसके बाद है अत्यन्त भयानक एवं दारुण मौसलपर्व। तत्पश्चात् महाप्रस्थानपर्व और स्वर्गारोहण-पर्व आते हैं ॥ ८१ ॥
हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम् ।
विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णोः कंसवधस्तथा ॥ ८२ ॥
इसके बाद हरिवंशपर्व है, जिसे खिल (परिशिष्ट) पुराण भी कहते हैं, इसमें विष्णुपर्व, श्रीकृष्णकी बाललीला एवं कंसवधका वर्णन है ॥ ८२ ॥
भविष्यपर्व चाप्युक्तं खिलेष्वेवाद्भुतं महत् ।
एतत् पर्वशतं पूर्णं व्यासेनोक्तं महात्मना ॥ ८३ ॥
इस खिलपर्वमें भविष्यपर्व भी कहा गया है, जो महान् अद्भुत है। महात्मा श्रीव्यासजीने इस प्रकार पूरे सौ पर्वोंकी रचना की है ॥ ८३ ॥
यथावत् सूरपुत्रेण लौमहर्षणिना ततः। उक्तानि नैमिषारण्ये पर्वाण्यष्टादशैव तु ॥ ८४ ॥
सूतवंशशिरोमणि लोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवाजीने व्यासजीकी रचना पूर्ण हो जानेपर नैमिषारण्यक्षेत्रमें इन्हीं सौ पर्वोंको अठारह पर्वोंके रूपमें सुव्यवस्थित करके ऋषियोंके सामने कहा ॥ ८४ ॥
समासो भारतस्यायमत्रोक्तः पर्वसंग्रहः । पौष्यं पौलोममास्तीकमादिरंशावतारणम् ॥ ८५ ॥ सम्भवो जतुवेश्माख्यं हिडिम्बबकयोर्वधः। तथा चैत्ररथं देव्याः पाञ्चाल्याश्च स्वयंवरः ॥ ८६ ॥ क्षात्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् । विदुरागमनं चैव राज्यलम्भस्तथैव च ॥ ८७ ॥ वनवासोऽर्जुनस्यापि सुभद्राहरणं ततः । हरणाहरणं चैव दहनं खाण्डवस्य च ॥ ८८ ॥ मयस्य दर्शनं चैव आदिपर्वणि कथ्यते ।
इस प्रकार यहाँ संक्षेपसे महाभारतके पर्वोंका संग्रह बताया गया है। पौष्य, पौलोम, आस्तीक, आदिअंशावतरण, सम्भव, लाक्षागृह, हिडिम्बवध, बकवध, चैत्ररथ, देवी द्रौपदीका स्वयंवर, क्षत्रियधर्मसे राजाओंपर विजयप्राप्तिपूर्वक वैवाहिक विधि, विदुरागमन, राज्यलम्भ, अर्जुनका वनवास, सुभद्राका हरण, हरणाहरण, खाण्डवदाह तथा मयदानवसे मिलनेका प्रसंग—यहाँतककी कथा आदिपर्वमें कही गयी है ॥ ८५-८८ १/२ ॥
पौष्ये पर्वणि माहात्म्यमुत्तङ्कस्योपवर्णितम् ॥ ८९ ॥ पौलोमे भृगुवंशस्य विस्तारः परिकीर्तितः। आस्तीके सर्वनागानां गरुडस्य च सम्भवः ॥ ९० ॥
पौष्यपर्वमें उत्तंकके माहात्म्यका वर्णन है। पौलोमपर्वमें भृगुवंशके विस्तारका वर्णन है। आस्तीकपर्वमें सब नागों तथा गरुड़की उत्पत्तिकी कथा है ॥ ८९-९० ॥
क्षीरोदमथनं चैव जन्मोच्चैःश्रवसस्तथा । यजतः सर्पसत्रेण राज्ञः पारीक्षितस्य च ॥ ९१ ॥ कथेयमभिनिर्वृत्ता भरतानां महात्मनाम् । विविधाः सम्भवा राज्ञामुक्ताः सम्भवपर्वणि ॥ ९२ ॥ अन्येषां चैव शूराणामृषेर्द्वैपायनस्य च । अंशावतरणं चात्र देवानां परिकीर्तितम् ॥ ९३ ॥
इसी पर्वमें क्षीरसागरके मन्थन और उच्चैःश्रवा घोड़ेके जन्मकी भी कथा है। परीक्षित्नन्दन राजा जनमेजयके सर्पयज्ञमें इन भरतवंशी महात्मा राजाओंकी कथा कही गयी है। सम्भवपर्वमें राजाओंके भिन्न-भिन्न प्रकारके जन्मसम्बन्धी वृत्तान्तोंका वर्णन है। इसीमें दूसरे शूरवीरों तथा महर्षि द्वैपायनके जन्मकी कथा भी है। यहीं देवताओंके अंशावतरणकी कथा कही गयी है ।। ९१—९३ ।।
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणां च महौजसाम् ।
नागानामथ सर्पाणां गन्धर्वाणां पतत्त्रिणाम् ।। ९४ ।।
अन्येषां चैव भूतानां विविधानां समुद्भवः ।
महर्षेराश्रमपदे कण्वस्य च तपस्विनः ।। ९५ ।।
शकुन्तलायां दुष्यन्ताद् भरतश्चापि जज्ञिवान् ।
यस्य लोकेषु नाम्नेदं प्रथितं भारतं कुलम् ।। ९६ ।।
इसी पर्वमें अत्यन्त प्रभावशाली दैत्य, दानव, यक्ष, नाग, सर्प, गन्धर्व और पक्षियों तथा अन्य विविध प्रकारके प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन है। परम तपस्वी महर्षि कण्वके आश्रममें दुष्यन्तके द्वारा शकुन्तलाके गर्भसे भरतके जन्मकी कथा भी इसीमें है। उन्हीं महात्मा भरतके नामसे यह भरतवंश संसारमें प्रसिद्ध हुआ है ।। ९४—९६ ।।
वसूनां पुनरुत्पत्तिर्भागीरथ्यां महात्मनाम् ।
शान्तनोर्वेश्मनि पुनस्तेषां चारोहणं दिवि ।। ९७ ।।
इसके बाद महाराज शान्तनुके गृहमें भागीरथी गंगाके गर्भसे महात्मा वसुओंकी उत्पत्ति एवं फिरसे उनके स्वर्गमें जानेका वर्णन किया गया है ।। ९७ ।।
तेजोंऽशानां च सम्पातो भीष्मस्याप्यत्र सम्भवः ।
राज्यान्निवर्तनं तस्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थितिः ।। ९८ ।।
प्रतिज्ञापालनं चैव रक्षा चित्राङ्गदस्य च ।
हते चित्राङ्गदे चैव रक्षा भ्रातुर्यवीयसः ।। ९९ ।।
विचित्रवीर्यस्य तथा राज्ये सम्प्रतिपादनम् ।
धर्मस्य नृषु सम्भूतिरणीमाण्डव्यशापजा ।। १०० ।।
कृष्णद्वैपायनाच्चैव प्रसूतिर्वरदानजा ।
धृतराष्ट्रस्य पाण्डोश्च पाण्डवानां च सम्भवः ।। १०१ ।।
इसी पर्वमें वसुओंके तेजके अंशभूत भीष्मके जन्मकी कथा भी है। उनकी राज्यभोगसे निवृत्ति, आजीवन ब्रह्मचर्यव्रतमें स्थित रहनेकी प्रतिज्ञा, प्रतिज्ञापालन, चित्रांगदकी रक्षा और चित्रांगदकी मृत्यु हो जानेपर छोटे भाई विचित्रवीर्यकी रक्षा, उन्हें राज्य-समर्पण, अणीमाण्डव्यके शापसे भगवान् धर्मकी विदुरके रूपमें मनुष्योंमें उत्पत्ति, श्रीकृष्णद्वैपायनके वरदानके कारण धृतराष्ट्र एवं पाण्डुका जन्म और इसी प्रसंगमें पाण्डवोंकी उत्पत्ति-कथा भी है ।। ९८—१०१ ।।
वारणावतयात्रायां मन्त्रो दुर्योधनस्य च । कूटस्य धार्तराष्ट्रेण प्रेषणं पाण्डवान् प्रति ॥ १०२ ॥ हितोपदेशश्च पथि धर्मराजस्य धीमतः । विदुरेण कृतो यत्र हितार्थं म्लेच्छभाषया ॥ १०३ ॥ लाक्षागृहदाहपर्वमें पाण्डवोंकी वारणावत-यात्राके प्रसंगमें दुर्योधनके गुप्त षड्यन्त्रका वर्णन है। उसका पाण्डवोंके पास कूटनीतिज्ञ पुरोचनको भेजनेका भी प्रसंग है। मार्गमें विदुरजीने बुद्धिमान् युधिष्ठिरके हितके लिये म्लेच्छभाषामें जो हितोपदेश किया, उसका भी वर्णन है ॥ १०२-१०३ ॥
विदुरस्य च वाक्येन सुरङ्गोपक्रमक्रिया । निषाद्याः पञ्चपुत्रायाः सुप्ताया जतुवेश्मनि ॥ १०४ ॥ पुरोचनस्य चात्रैव दहनं सम्प्रकीर्तितम् । पाण्डवानां वने घोरे हिडिम्बायाश्च दर्शनम् ॥ १०५ ॥ तत्रैव च हिडिम्बस्य वधो भीमन्महाबलात् । घटोत्कचस्य चोत्पत्तिरत्रैव परिकीर्तिता ॥ १०६ ॥ फिर विदुरकी बात मानकर सुरंग खुदवानेका कार्य आरम्भ किया गया। उसी लाक्षागृहमें अपने पाँच पुत्रोंके साथ सोती हुई एक भीलनी और पुरोचन भी जल मरे—यह सब कथा कही गयी है। हिडिम्बवधपर्वमें घोर वनके मार्गसे यात्रा करते समय पाण्डवोंको हिडिम्बाके दर्शन, महाबली भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासुरके वध तथा घटोत्कचके जन्मकी कथा कही गयी है ॥ १०४—१०६ ॥
महर्षेर्दर्शनं चैव व्यासस्यामिततेजसः । तदाज्ञयैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ १०७ ॥ अज्ञातचर्यया वासो यत्र तेषां प्रकीर्तितः । बकस्य निधनं चैव नागराणां च विस्मयः ॥ १०८ ॥ अमिततेजस्वी महर्षि व्यासका पाण्डवोंसे मिलना और उनकी आज्ञासे एकचक्रा नगरीमें ब्राह्मणके घर पाण्डवोंके गुप्त निवासका वर्णन है। वहीं रहते समय उन्होंने बकासुरका वध किया, जिससे नागरिकोंको बड़ा भारी आश्चर्य हुआ ॥ १०७-१०८ ॥
सम्भवश्चैव कृष्णाया धृष्टद्युम्नस्य चैव ह । ब्राह्मणात् समुपश्रुत्य व्यासवाक्यप्रचोदिताः ॥ १०९ ॥ द्रौपदीं प्रार्थयन्तस्ते स्वयंवरदिदृक्षया । पञ्चालानभितो जग्मुर्यत्र कौतूहलान्विताः ॥ ११० ॥ इसके अनन्तर कृष्णा (द्रौपदी) और उसके भाई धृष्टद्युम्नकी उत्पत्तिका वर्णन है। जब पाण्डवोंको ब्राह्मणके मुखसे यह संवाद मिला, तब वे महर्षि व्यासकी आज्ञासे द्रौपदीकी
प्राप्तिके लिये कौतूहलपूर्ण चित्तसे स्वयंवर देखने पांचालदेशकी ओर चल पड़े॥ १०९-११०॥
अङ्गारपर्णं निर्जित्य गङ्गाकूलेऽर्जुनस्तदा । सख्यं कृत्वा ततस्तेन तस्मादेव च शुश्रुवे ॥ १११ ॥ तापत्यमथ वासिष्ठमौर्वं चाख्यानमुत्तमम् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पञ्चालानभितो ययौ ॥ ११२ ॥ पाञ्चालनगरे चापि लक्ष्यं भित्त्वा धनंजयः । द्रौपदीं लब्धवानत्र मध्ये सर्वमहीक्षिताम् ॥ ११३ ॥ भीमसेनार्जुनौ यत्र संरब्धान् पृथिवीपतीन् । शल्यकर्णौ च तरसा जितवन्तौ महामृधे ॥ ११४ ॥ चैत्ररथपर्वमें गंगाके तटपर अर्जुनने अंगारपर्ण गन्धर्वको जीतकर उससे मित्रता कर ली और उसीके मुखसे तपती, वसिष्ठ और और्वके उत्तम आख्यान सुने। फिर अर्जुनने वहाँसे अपने सभी भाइयोंके साथ पांचालकी ओर यात्रा की। तदनन्तर अर्जुनने पांचालनगरके बड़े-बड़े राजाओंसे भरी सभामें लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त किया—यह कथा भी इसी पर्वमें है। वहीं भीमसेन और अर्जुनने रणांगणमें युद्धके लिये संनद्ध क्रोधान्ध राजाओंको तथा शल्य और कर्णको भी अपने पराक्रमसे पराजित कर दिया॥ १११—११४॥
दृष्ट्वा तयोश्च तद्वीर्यमप्रमेयममानुषम् । शङ्कमानौ पाण्डवांस्तान् रामकृष्णौ महामती ॥ ११५ ॥ जग्मतुस्तैः समागन्तुं शालां भार्गववेश्मनि । पञ्चानामेकपत्नीत्वे विमर्शो द्रुपदस्य च ॥ ११६ ॥ महामति बलराम एवं भगवान् श्रीकृष्णने जब भीमसेन एवं अर्जुनके अपरिमित और अतिमानुष बल-वीर्यको देखा, तब उन्हें यह शंका हुई कि कहीं ये पाण्डव तो नहीं हैं। फिर वे दोनों उनसे मिलनेके लिये कुम्हारके घर आये। इसके पश्चात् द्रुपदने ‘पाँचों पाण्डवोंकी एक ही पत्नी कैसे हो सकती है’—इस सम्बन्धमें विचार-विमर्श किया॥ ११५-११६॥
पञ्चेन्द्राणामुपाख्यानमत्रैवाद्भुतमुच्यते । द्रौपद्या देवविहितो विवाहश्चाप्यमानुषः ॥ ११७ ॥ इसी वैवाहिकपर्वमें पाँच इन्द्रोंका अद्भुत उपाख्यान और द्रौपदीके देवविहित तथा मनुष्य-परम्पराके विपरीत विवाहका वर्णन हुआ है॥ ११७॥
क्षत्तुश्च धृतराष्ट्रेण प्रेषणं पाण्डवान् प्रति । विदुरस्य च सम्प्राप्तिर्दर्शनं केशवस्य च ॥ ११८ ॥ इसके बाद धृतराष्ट्रने पाण्डवोंके पास विदुरजीको भेजा है, विदुरजी पाण्डवोंसे मिले हैं तथा उन्हें श्रीकृष्णका दर्शन हुआ है॥ ११८॥
खाण्डवप्रस्थवासश्च तथा राज्यार्धसर्जनम् ।
नारदस्याज्ञया चैव द्रौपद्याः समयक्रिया ॥ ११९ ॥ इसके पश्चात् धृतराष्ट्रका पाण्डवोंको आधा राज्य देना, इन्द्रप्रस्थमें पाण्डवोंका निवास करना एवं नारदजीकी आज्ञासे द्रौपदीके पास आने-जानेके सम्बन्धमें समय-निर्धारण आदि विषयोंका वर्णन है ॥ ११९ ॥
सुन्दोपसुन्दयोस्तद्वदाख्यानं परिकीर्तितम् । अनन्तरं च द्रौपद्या सहासीनं युधिष्ठिरम् ॥ १२० ॥ अनुप्रविश्य विप्रार्थे फाल्गुनो गृह्य चायुधम् । मोक्षयित्वा गृहं गत्वा विप्रार्थं कृतनिश्चयः ॥ १२१ ॥ समयं पालयन् वीरो वनं यत्र जगाम ह । पार्थस्य वनवासे च उलूप्या पथि संगमः ॥ १२२ ॥ इसी प्रसंगमें सुन्द और उपसुन्दके उपाख्यानका भी वर्णन है। तदनन्तर एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर द्रौपदीके साथ बैठे हुए थे। अर्जुनने ब्राह्मणके लिये नियम तोड़कर वहाँ प्रवेश किया और अपने आयुध लेकर ब्राह्मणकी वस्तु उसे प्राप्त करा दी और दृढ़ निश्चय करके वीरताके साथ मर्यादापालनके लिये वनमें चले गये। इसी प्रसंगमें यह कथा भी कही गयी है कि वनवासके अवसरपर मार्गमें ही अर्जुन और उलूपीका मेल-मिलाप हो गया ॥ १२०-१२२ ॥
पुण्यतीर्थानुसंयानं बभ्रुवाहनजन्म च । तत्रैव मोक्षयामास पञ्च सोऽप्सरसः शुभाः ॥ १२३ ॥ शापाद् ग्राहत्वमापन्ना ब्राह्मणस्य तपस्विनः । प्रभासतीर्थे पार्थेन कृष्णस्य च समागमः ॥ १२४ ॥ इसके बाद अर्जुनने पवित्र तीर्थोंकी यात्रा की है। इसी समय चित्रांगदाके गर्भसे बभ्रुवाहनका जन्म हुआ है और इसी यात्रामें उन्होंने पाँच शुभ अप्सराओंको मुक्तिदान किया, जो एक तपस्वी ब्राह्मणके शापसे ग्राह हो गयी थीं। फिर प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्ण और अर्जुनके मिलनका वर्णन है ॥ १२३-१२४ ॥
द्वारकायां सुभद्रा च कामयानेन कामिनी । वासुदेवस्यानुमते प्राप्ता चैव किरीटिना ॥ १२५ ॥ तत्पश्चात् यह बताया गया है कि द्वारकामें सुभद्रा और अर्जुन परस्पर एक-दूसरेपर आसक्त हो गये, उसके बाद श्रीकृष्णकी अनुमतिसे अर्जुनने सुभद्राको हर लिया ॥ १२५ ॥
गृहीत्वा हरणं प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने । अभिमन्योः सुभद्रायां जन्म चोत्तमतेजसः ॥ १२६ ॥ तदनन्तर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके दहेज लेकर पाण्डवोंके पास पहुँचनेकी और सुभद्राके गर्भसे परम तेजस्वी वीर बालक अभिमन्युके जन्मकी कथा है ॥ १२६ ॥
द्रौपद्यास्तनयानां च सम्भवोऽनुप्रकीर्तितः ।
विहारार्थं च गतयोः कृष्णयोर्यमुनामनु ॥ १२७ ॥ सम्प्राप्तिश्चक्रधनुषोः खाण्डवस्य च दाहनम् । मयस्य मोक्षो ज्वलनाद् भुजङ्गस्य च मोक्षणम् ॥ १२८ ॥ इसके पश्चात् द्रौपदीके पुत्रोंकी उत्पत्तिकी कथा है। तदनन्तर जब श्रीकृष्ण और अर्जुन यमुनाजीके तटपर विहार करनेके लिये गये हुए थे, तब उन्हें जिस प्रकार चक्र और धनुषकी प्राप्ति हुई, उसका वर्णन है। साथ ही खाण्डववनके दाह, मयदानवके छुटकारे और अग्निकाण्डसे सर्पके सर्वथा बच जानेका वर्णन हुआ है ॥ १२७-१२८ ॥
महर्षेर्मन्दपालस्य शार्ङ्ग्या तनयसम्भवः । इत्येतदादिपर्वोक्तं प्रथमं बहुविस्तरम् ॥ १२९ ॥ इसके बाद महर्षि मन्दपालका शार्ङ्गी पक्षीके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करनेकी कथा है। इस प्रकार इस अत्यन्त विस्तृत आदिपर्वका सबसे प्रथम निरूपण हुआ है ॥ १२९ ॥
अध्यायानां शते द्वे तु संख्याते परर्षिणा । सप्तविंशतिरध्याया व्यासेनोत्तमतेजसा ॥ १३० ॥ परमर्षि एवं परम तेजस्वी महर्षि व्यासने इस पर्वमें दो सौ सत्ताईस (२२७) अध्यायोंकी रचना की है ॥ १३० ॥
अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च । श्लोकाश्च चतुराशीतिर्मुनिनोक्ता महात्मना ॥ १३१ ॥ महात्मा व्यास मुनिने इन दो सौ सत्ताईस (२२७) अध्यायोंमें आठ हजार आठ सौ चौरासी (८,८८४) श्लोक कहे हैं ॥ १३१ ॥
द्वितीयं तु सभापर्व बहुवृत्तान्तमुच्यते । सभाक्रिया पाण्डवानां किङ्कराणां च दर्शनम् ॥ १३२ ॥ लोकपालसभाख्यानं नारदाद् देवदर्शिनः । राजसूयस्य चारम्भो जरासन्धवधस्तथा ॥ १३३ ॥ गिरिव्रजे निरुद्धानां राज्ञां कृष्णेन मोक्षणम् । तथा दिग्विजयोऽत्रैव पाण्डवानां प्रकीर्तितः ॥ १३४ ॥ दूसरा सभापर्व है। इसमें बहुत-से वृत्तान्तोंका वर्णन है। पाण्डवोंका सभानिर्माण, किंकर नामक राक्षसोंका दीखना, देवर्षि नारदद्वारा लोकपालोंकी सभाका वर्णन, राजसूययज्ञका आरम्भ एवं जरासन्धवध, गिरिव्रजमें बंदी राजाओंका श्रीकृष्णके द्वारा छुड़ाया जाना और पाण्डवोंकी दिग्विजयका भी इसी सभापर्वमें वर्णन किया गया है ॥ १३२—१३४ ॥
राज्ञामागमनं चैव सार्हणानां महाक्रतौ । राजसूयेऽर्घसंवादे शिशुपालवधस्तथा ॥ १३५ ॥
राजसूय महायज्ञमें उपहार ले-लेकर राजाओंके आगमन तथा पहले किसकी पूजा हो इस विषयको लेकर छिड़े हुए विवादमें शिशुपालके वधका प्रसंग भी इसी सभापर्वमें आया है ।। १३५ ।।
यज्ञे विभूतिं तां दृष्ट्वा दुःखामर्षान्वितस्य च ।
दुर्योधनस्यावहासो भीमेन च सभातले ।। १३६ ।।
यज्ञमें पाण्डवोंका यह वैभव देखकर दुर्योधन दुःख और ईर्ष्यासे मन-ही-मनमें जलने लगा। इसी प्रसंगमें सभाभवनके सामने समतल भूमिपर भीमसेनने उसका उपहास किया ।। १३६ ।।
यत्रास्य मन्युरुद्भूतो येन द्यूतमकारयत् ।
यत्र धर्मसुतं द्यूते शकुनिः कितवोऽजयत् ।। १३७ ।।
उसी उपहासके कारण दुर्योधनके हृदयमें क्रोधाग्नि जल उठी। जिसके कारण उसने जूएके खेलका षड्यन्त्र रचा। इसी जूएमें कपटी शकुनिने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको जीत लिया ।। १३७ ।।
यत्र द्यूतार्णवे मग्नां द्रौपदीं नौरिवार्णवात् ।
धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः स्नुषां परमदुःखिताम् ।। १३८ ।।
तारयामास तांस्तीर्णान् ज्ञात्वा दुर्योधनो नृपः ।
पुनरेव ततो द्यूते समाह्वयत पाण्डवान् ।। १३९ ।।
जैसे समुद्रमें डूबी हुई नौकाको कोई फिरसे निकाल ले, वैसे ही द्यूतके समुद्रमें डूबी हुई परमदुःखिनी पुत्रवधू द्रौपदीको परम बुद्धिमान् धृतराष्ट्रने निकाल लिया। जब राजा दुर्योधनको जूएकी विपत्तिसे पाण्डवोंके बच जानेका समाचार मिला, तब उसने पुनः उन्हें (पितासे आग्रह करके) जूएके लिये बुलवाया ।। १३८-१३९ ।।
जित्वा स वनवासाय प्रेषयामास तांस्ततः ।
एतत् सर्वं सभापर्व समाख्यातं महात्मना ।। १४० ।।
दुर्योधनने उन्हें जूएमें जीतकर वनवासके लिये भेज दिया। महर्षि व्यासने सभापर्वमें यही सब कथा कही है ।। १४० ।।
अध्यायाः सप्ततिर्ज्ञेयास्तथा चाष्टौ प्रसंख्यया ।
श्लोकानां द्वे सहस्रे तु पञ्च श्लोकशतानि च ।। १४१ ।।
श्लोकाश्चैकादश ज्ञेयाः पर्वण्यस्मिन् द्विजोत्तमाः ।
अतः परं तृतीयं तु ज्ञेयमारण्यकं महत् ।। १४२ ।।
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस पर्वमें अध्यायोंकी संख्या अठहत्तर (७८) है और श्लोकोंकी संख्या दो हजार पाँच सौ ग्यारह (२,५११) बतायी गयी है। इसके पश्चात् महत्त्वपूर्ण वनपर्वका आरम्भ होता है ।। १४१-१४२ ।।
वनवासं प्रयातेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
पौरानुगमनं चैव धर्मपुत्रस्य धीमतः ॥ १४३ ॥ जिस समय महात्मा पाण्डव वनवासके लिये यात्रा कर रहे थे, उस समय बहुत-से पुरवासी लोग बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ १४३ ॥ अन्नौषधीनां च कृते पाण्डवेन महात्मना । द्विजानां भरणार्थं च कृतमाराधनं रवेः ॥ १४४ ॥ महात्मा युधिष्ठिरने पहले अनुयायी ब्राह्मणोंके भरण-पोषणके लिये अन्न और ओषधियाँ प्राप्त करनेके उद्देश्यसे सूर्यभगवान्की आराधना की ॥ १४४ ॥ धौम्योपदेशात् तिग्मांशुप्रसादादन्नसम्भवः । हितं च ब्रुवतः क्षत्तुः परित्यागोऽम्बिकासुतात् ॥ १४५ ॥ त्यक्तस्य पाण्डुपुत्राणां समीपगमनं तथा । पुनरागमनं चैव धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ १४६ ॥ कर्णप्रोत्साहनाच्चैव धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । वनस्थान् पाण्डवान् हन्तुं मन्त्रों दुर्योधनस्य च ॥ १४७ ॥ महर्षि धौम्यके उपदेशसे उन्हें सूर्यभगवान्की कृपा प्राप्त हुई और अक्षय अन्नका पात्र मिला। उधर विदुरजी धृतराष्ट्रको हितकारी उपदेश कर रहे थे, परंतु धृतराष्ट्रने उनका परित्याग कर दिया। धृतराष्ट्रके परित्यागपर विदुरजी पाण्डवोंके पास चले गये और फिर धृतराष्ट्रका आदेश प्राप्त होनेपर उनके पास लौट आये। धृतराष्ट्रनन्दन दुर्मति दुर्योधनने कर्णके प्रोत्साहनसे वनवासी पाण्डवोंको मार डालनेका विचार किया ॥ १४५—१४७ ॥ तं दुष्टभावं विज्ञाय व्यासस्यागमनं द्रुतम् । निर्याणप्रतिषेधश्च सुरभ्याख्यानमेव च ॥ १४८ ॥ दुर्योधनके इस दूषित भावको जानकर महर्षि व्यास झटपट वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने दुर्योधनकी यात्राका निषेध कर दिया। इसी प्रसंगमें सुरभिका आख्यान भी है ॥ १४८ ॥ मैत्रेयागमनं चात्र राज्ञश्चैवानुशासनम् । शापोत्सर्गश्च तेनैव राज्ञो दुर्योधनस्य च ॥ १४९ ॥ मैत्रेय ऋषिने आकर राजा धृतराष्ट्रको उपदेश किया और उन्होंने ही राजा दुर्योधनको शाप दे दिया ॥ १४९ ॥ किर्मीरस्य वधश्चात्र भीमसेनेन संयुगे । वृष्णीनामागमश्चात्र पञ्चालानां च सर्वशः ॥ १५० ॥ इसी पर्वमें यह कथा है कि युद्धमें भीमसेनने किर्मीरको मार डाला। पाण्डवोंके पास वृष्णिवंशी और पांचाल आये। पाण्डवोंने उन सबके साथ वार्तालाप किया ॥ १५० ॥ श्रुत्वा शकुनिना द्यूते निकृत्या निर्जितांश्च तान् । क्रुद्धस्यानुप्रशमनं हरेश्चैव किरीटिना ॥ १५१ ॥
जब श्रीकृष्णने यह सुना कि शकुनिने जूएमें पाण्डवोंको कपटसे हरा दिया है, तब वे अत्यन्त क्रोधित हुए; परंतु अर्जुनने हाथ जोड़कर उन्हें शान्त किया ॥ १५१ ॥ परिदेवनं च पाञ्चाल्या वासुदेवस्य संनिधौ । आश्वासनं च कृष्णेन दुःखार्तायाः प्रकीर्तितम् ॥ १५२ ॥ द्रौपदी श्रीकृष्णके पास बहुत रोयी-कलपी। श्रीकृष्णने दुःखार्त द्रौपदीको आश्वासन दिया। यह सब कथा वनपर्वमें है ॥ १५२ ॥ तथा सौभवधाख्यानमत्रैवोक्तं महर्षिणा । सुभद्रायाः सपुत्रायाः कृष्णेन द्वारकां पुरीम् ॥ १५३ ॥ नयनं द्रौपदेयानां धृष्टद्युम्नेन चैव ह । प्रवेशः पाण्डवेयानां रम्ये द्वैतवने ततः ॥ १५४ ॥ इसी पर्वमें महर्षि व्यासने सौभवधकी कथा कही है। श्रीकृष्ण सुभद्राको पुत्रसहित द्वारकामें ले गये। धृष्टद्युम्न द्रौपदीके पुत्रोंको अपने साथ लिवा ले गये। तदनन्तर पाण्डवोंने परम रमणीय द्वैतवनमें प्रवेश किया ॥ १५३-१५४ ॥ धर्मराजस्य चात्रैव संवादः कृष्णया सह । संवादश्च तथा राज्ञा भीमस्यापि प्रकीर्तितः ॥ १५५ ॥ इसी पर्वमें युधिष्ठिर एवं द्रौपदीका संवाद तथा युधिष्ठिर और भीमसेनके संवादका भलीभाँति वर्णन किया गया है ॥ १५५ ॥ समीपं पाण्डुपुत्राणां व्यासस्यागमनं तथा । प्रतिस्मृत्याथ विद्याया दानं राज्ञो महर्षिणा ॥ १५६ ॥ महर्षि व्यास पाण्डवोंके पास आये और उन्होंने राजा युधिष्ठिरको प्रतिस्मृति नामक मन्त्रविद्याका उपदेश दिया ॥ १५६ ॥ गमनं काम्यके चापि व्यासे प्रतिगते ततः । अस्त्रहेतोर्विवासश्च पार्थस्यामिततेजसः ॥ १५७ ॥ व्यासजीके चले जानेपर पाण्डवोंने काम्यकवनकी यात्रा की। इसके बाद अमिततेजस्वी अर्जुन अस्त्र प्राप्त करनेके लिये अपने भाइयोंसे अलग चले गये ॥ १५७ ॥ महादेवेन युद्धं च किरातवपुषा सह । दर्शनं लोकपालाना मस्त्रप्राप्तिस्तथैव च ॥ १५८ ॥ वहीं किरातवेशधारी महादेवजीके साथ अर्जुनका युद्ध हुआ, लोकपालोंके दर्शन हुए और अस्त्रकी प्राप्ति हुई ॥ १५८ ॥ महेन्द्रलोकगमनमस्त्रार्थे च किरीटिनः । यत्र चिन्ता समुत्पन्ना धृतराष्ट्रस्य भूयसी ॥ १५९ ॥ इसके बाद अर्जुन अस्त्रके लिये इन्द्रलोकमें गये यह सुनकर धृतराष्ट्रको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १५९ ॥
दर्शनं बृहदश्वस्य महर्षेर्भावितात्मनः । युधिष्ठिरस्य चार्तस्य व्यसनं परिदेवनम् ॥ १६० ॥
इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिरको शुद्धहृदय महर्षि बृहदश्वका दर्शन हुआ। युधिष्ठिरने आर्त होकर उन्हें अपनी दुःखगाथा सुनायी और विलाप किया ॥ १६० ॥
नलोपाख्यानमत्रैव धर्मिष्ठं करुणोदयम् । दमयन्त्याः स्थितैर्यत्र नलस्य चरितं तथा ॥ १६१ ॥
इसी प्रसंगमें नलोपाख्यान आता है, जिसमें धर्मनिष्ठाका अनुपम आदर्श है और जिसे पढ़-सुनकर हृदयमें करुणाकी धारा बहने लगती है। दमयन्तीका दृढ़ धैर्य और नलका चरित्र यहीं पढ़नेको मिलते हैं ॥ १६१ ॥
तथाक्षहृदयप्राप्तिस्तस्मादेव महर्षितः । लोमशस्यागमस्तत्र स्वर्गात् पाण्डुसुतान् प्रति ॥ १६२ ॥ वनवासगतानां च पाण्डवानां महात्मनाम् । स्वर्गे वृत्तिराख्याता लोमशेनार्जुनस्य वै ॥ १६३ ॥
उन्हीं महर्षिसे पाण्डवोंको अक्षहृदय (जूएके रहस्य)-की प्राप्ति हुई। यहीं स्वर्गसे महर्षि लोमश पाण्डवोंके पास पधारे। लोमशने ही वनवासी महात्मा पाण्डवोंको यह बात बतलायी कि अर्जुन स्वर्गमें किस प्रकार अस्त्र-विद्या सीख रहे हैं ॥ १६२-१६३ ॥
संदेशादर्जुनस्यात्र तीर्थाभिगमनक्रिया । तीर्थानां च फलप्राप्तिः पुण्यत्वं चापि कीर्तितम् ॥ १६४ ॥
इसी पर्वमें अर्जुनका संदेश पाकर पाण्डवोंने तीर्थयात्रा की। उन्हें तीर्थयात्राका फल प्राप्त हुआ और कौन तीर्थ कितने पुण्यप्रद होते हैं—इस बातका वर्णन हुआ है ॥ १६४ ॥
पुलस्त्यतीर्थयात्रा च नारदेन महर्षिणा । तीर्थयात्रा च तत्रैव पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १६५ ॥ कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात् । तथा यज्ञविभूतिश्च गयस्यात्र प्रकीर्तिता ॥ १६६ ॥
इसके बाद महर्षि नारदने पुलस्त्यतीर्थकी यात्रा करनेकी प्रेरणा दी और महात्मा पाण्डवोंने वहाँकी यात्रा की। यहीं इन्द्रके द्वारा कर्णको कुण्डलोंसे वंचित करनेका तथा राजा गयके यज्ञवैभवका वर्णन किया गया है ॥ १६५-१६६ ॥
आगस्त्यमपि चाख्यानं यत्र वातापिभक्षणम् । लोपामुद्राभिगमनमपत्यार्थमृषेस्तथा ॥ १६७ ॥
इसके बाद अगस्त्य-चरित्र है, जिसमें उनके वातापिभक्षण तथा संतानके लिये लोपामुद्राके साथ समागमका वर्णन है ॥ १६७ ॥
ऋष्यशृङ्गस्य चरितं कौमारब्रह्मचारिणः । जामदग्न्यस्य रामस्य चरितं भूरितेजसः ॥ १६८ ॥
इसके पश्चात् कौमार ब्रह्मचारी ऋष्यशृंगका चरित्र है। फिर परम तेजस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामका चरित्र है ।। १६८ ।।
कार्तवीर्यवधो यत्र हैहयानां च वर्ण्यते ।
प्रभासतीर्थे पाण्डूनां वृष्णिभिश्च समागमः ।। १६९ ।।
इसी चरित्रमें कार्तवीर्य अर्जुन तथा हैहयवंशी राजाओंके वधका वर्णन किया गया है। प्रभासतीर्थमें पाण्डवों एवं यादवोंके मिलनेकी कथा भी इसीमें है ।। १६९ ।।
सीकन्यमपि चाख्यानं च्यवनो यत्र भार्गवः ।
शर्यांतियज्ञे नासत्यौ कृतवान् सोमपीतिनौ ।। १७० ।।
इसके बाद सुकन्याका उपाख्यान है। इसीमें यह कथा है कि भृगुनन्दन च्यवनने शर्यातिके यज्ञमें अश्विनीकुमारोंको सोमपानका अधिकारी बना दिया ।। १७० ।।
ताभ्यां च यत्र स मुनिर्यौवनं प्रतिपादितः ।
मान्धातुश्चाप्युपाख्यानं राज्ञोऽत्रैव प्रकीर्तितम् ।। १७१ ।।
उन्हीं दोनोंने च्यवन मुनिको बूढ़ेसे जवान बना दिया। राजा मान्धाताकी कथा भी इसी पर्वमें कही गयी है ।। १७१ ।।
जन्तूपाख्यानमत्रैव यत्र पुत्रेण सोमकः ।
पुत्रार्थमयजद् राजा लेभे पुत्रशतं च सः ।। १७२ ।।
यहीं जन्तूपाख्यान है। इसमें राजा सोमकने बहुत-से पुत्र प्राप्त करनेके लिये एक पुत्रसे यजन किया और उसके फलस्वरूप सौ पुत्र प्राप्त किये ।। १७२ ।।
ततः श्येनकपोतीयमुपाख्यानमनुत्तमम् ।
इन्द्राग्नी यत्र धर्मस्य जिज्ञासार्थं शिबिं नृपम् ।। १७३ ।।
इसके बाद श्येन (बाज) और कपोत (कबूतर)-का सर्वोत्तम उपाख्यान है। इसमें इन्द्र और अग्नि राजा शिबिके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये आये हैं ।। १७३ ।।
अष्टावक्रीयमत्रैव विवादो यत्र बन्दिना ।
अष्टावक्रस्य विप्रर्षेर्जनकस्याध्वरेऽभवत् ।। १७४ ।।
नैयायिकानां मुख्येन वरुणस्यात्मजेन च ।
पराजितो यत्र बन्दी विवादेन महात्मना ।। १७५ ।।
विजित्य सागरं प्राप्तं पितरं लब्धवानृषिः ।
यवक्रीतस्य चाख्यानं रैभ्यस्य च महात्मनः ।
गन्धमादनयात्रा च वासो नारायणाश्रमे ।। १७६ ।।
इसी पर्वमें अष्टावक्रका चरित्र भी है। जिसमें बन्दीके साथ जनकके यज्ञमें ब्रह्मर्षि अष्टावक्रके शास्त्रार्थका वर्णन है। वह बन्दी वरुणका पुत्र था और नैयायिकोंमें प्रधान था। उसे महात्मा अष्टावक्रने वाद-विवादमें पराजित कर दिया। महर्षि अष्टावक्रने बन्दीको हराकर समुद्रमें डाले हुए अपने पिताको प्राप्त कर लिया। इसके बाद यवक्रीत और महात्मा
रैभ्यका उपाख्यान है। तदनन्तर पाण्डवोंकी गन्धमादनयात्रा और नारायणाश्रममें निवासका वर्णन है ॥ १७४—१७६ ॥
नियुक्तो भीमसेनश्च द्रौपद्या गन्धमादने ।
व्रजन् पथि महाबाहुर्दृष्टवान् पवनात्मजम् ॥ १७७ ॥
कदलीखण्डमध्यस्थं हनूमन्तं महाबलम् ।
यत्र सौगन्धिकार्थेऽसौ नलिनीं तामधर्षयत् ॥ १७८ ॥
द्रौपदीने सौगन्धिक कमल लानेके लिये भीमसेनको गन्धमादन पर्वतपर भेजा। यात्रा करते समय महाबाहु भीमसेनने मार्गमें कदलीवनमें महाबली पवननन्दन श्रीहनुमान्जीका दर्शन किया। यहीं सौगन्धिक कमलके लिये भीमसेनने सरोवरमें घुसकर उसे मथ डाला ॥ १७७-१७८ ॥
यत्रास्य युद्धमभवत् सुमहद् राक्षसैः सह ।
यक्षैश्चैव महावीर्यैर्मणिमत्प्रमुखैस्तथा ॥ १७९ ॥
वहीं भीमसेनका राक्षसों एवं महाशक्तिशाली मणिमान् आदि यक्षोंके साथ घमासान युद्ध हुआ ॥ १७९ ॥
जटासुरस्य च वधो राक्षसस्य वृकोदरात् ।
वृषपर्वणश्च राजर्षेस्ततोऽभिगमनं स्मृतम् ॥ १८० ॥
आर्ष्टिषेणाश्रमे चैषां गमनं वास एव च ।
प्रोत्साहनं च पाञ्चाल्या भीमस्यात्र महात्मनः ॥ १८१ ॥
कैलासारोहणं प्रोक्तं यत्र यक्षैर्बलोत्कटैः ।
युद्धमासीन्महाघोरं मणिमत्प्रमुखैः सह ॥ १८२ ॥
तत्पश्चात् भीमसेनके द्वारा जटासुर राक्षसका वध हुआ। फिर पाण्डव क्रमशः राजर्षि वृषपर्वा और आर्ष्टिषेणके आश्रमपर गये और वहीं रहने लगे। यहीं द्रौपदी महात्मा भीमसेनको प्रोत्साहित करती रही। भीमसेन कैलासपर्वतपर चढ़ गये। यहीं अपनी शक्तिके नशेमें चूर मणिमान् आदि यक्षोंके साथ उनका अत्यन्त घोर युद्ध हुआ ॥ १८०-१८२ ॥
समागमश्च पाण्डूनां यत्र वैश्रवणेन च ।
समागमश्चार्जुनस्य तत्रैव भ्रातृभिः सह ॥ १८३ ॥
यहीं पाण्डवोंका कुबेरके साथ समागम हुआ। इसी स्थानपर अर्जुन आकर अपने भाइयोंसे मिले ॥ १८३ ॥
अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि गुर्वर्थं सव्यसाचिना ।
निवातकवचैर्युद्धं हिरण्यपुरवासिभिः ॥ १८४ ॥
इधर सव्यसाची अर्जुनने अपने बड़े भाईके लिये दिव्य अस्त्र प्राप्त कर लिये और हिरण्यपुरवासी निवातकवच दानवोंके साथ उनका घोर युद्ध हुआ ॥ १८४ ॥
निवातकवचैर्घोरैर्दानवैः सुरशत्रुभिः ।
पौलोमैः कालकेयैश्च यत्र युद्धं किरीटिनः ॥ १८५ ॥ वधश्चैषां समाख्यातों राज्ञस्तेनैव धीमता । अस्त्रसंदर्शनारम्भो धर्मराजस्य संनिधौ ॥ १८६ ॥ वहाँ देवताओंके शत्रु भयंकर दानव निवातकवच, पौलोम और कालकेयोंके साथ अर्जुनने जैसा युद्ध किया और जिस प्रकार उन सबका वध हुआ था, वह सब बुद्धिमान् अर्जुनने स्वयं राजा युधिष्ठिरको सुनाया। इसके बाद अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरके पास अपने अस्त्र-शस्त्रोंका प्रदर्शन करना चाहा ॥ १८४-१८६ ॥ पार्थस्य प्रतिषेधश्च नारदेन सुरर्षिणा । अवरोहणं पुनश्चैव पाण्डूनां गन्धमादनात् ॥ १८७ ॥ इसी समय देवर्षि नारदने आकर अर्जुनको अस्त्र-प्रदर्शनसे रोक दिया। अब पाण्डव गन्धमादन पर्वतसे नीचे उतरने लगे ॥ १८७ ॥ भीमस्य ग्रहणं चात्र पर्वताभोगवर्ष्मणा । भुजगेन्द्रेण बलिना तस्मिन् सुगहने वने ॥ १८८ ॥ फिर एक बीहड़ वनमें पर्वतके समान विशाल शरीरधारी बलवान् अजगरने भीमसेनको पकड़ लिया ॥ १८८ ॥ अमोक्षयद् यत्र चैनं प्रश्नानुक्त्वा युधिष्ठिरः । काम्यकागमनं चैव पुनस्तेषां महात्मनाम् ॥ १८९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरने अजगर-वेशधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देकर भीमसेनको छुड़ा लिया। इसके बाद महानुभाव पाण्डव पुनः काम्यकवनमें आये ॥ १८९ ॥ तत्रस्थांश्च पुनर्द्रष्टुं पाण्डवान् पुरुषर्षभान् । वासुदेवस्यागमनमत्रैव परिकीर्तितम् ॥ १९० ॥ जब नरपुंगव पाण्डव काम्यकवनमें निवास करने लगे, तब उनसे मिलनेके लिये वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण उनके पास आये—यह कथा इसी प्रसंगमें कही गयी है ॥ १९० ॥ मार्कण्डेयसमास्यायामुपाख्यानानि सर्वशः । पृथौर्वैन्यस्य यत्रोक्तमाख्यानं परमर्षिणा ॥ १९१ ॥ पाण्डवोंका महामुनि मार्कण्डेयके साथ समागम हुआ। वहाँ महर्षिने बहुत-से उपाख्यान सुनाये। उनमें वेनपुत्र पृथुका भी उपाख्यान है ॥ १९१ ॥ संवादश्च सरस्वत्यास्तार्क्ष्यर्षेः सुमहात्मनः । मत्स्योपाख्यानमत्रैव प्रोच्यते तदनन्तरम् ॥ १९२ ॥ इसी प्रसंगमें प्रसिद्ध महात्मा महर्षि तार्क्ष्य और सरस्वतीका संवाद है। तदनन्तर मत्स्योपाख्यान भी कहा गया है ॥ १९२ ॥ मार्कण्डेयसमास्या च पुराणं परिकीर्त्यते । ऐन्द्रद्युम्नमुपाख्यानं धौन्धुमारं तथैव च ॥ १९३ ॥