महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तस्माद् धर्मार्थयोर्नित्यं न प्रमाद्यन्ति पण्डिताः । प्रकृतिः सा हि कामस्य पावकस्यारणैर्यथा ॥ २८ ॥ ‘इसलिये विद्वान् पुरुष कभी धर्म और अर्थके सम्पादनमें प्रमाद नहीं करते हैं। धर्म और अर्थ कामकी उत्पत्तिके स्थान हैं (अर्थात् धर्म और अर्थसे ही कामकी सिद्धि होती है) जैसे अरणि अग्निका उत्पत्तिस्थान है ॥ २८ ॥
सर्वथा धर्ममूलोऽर्थो धर्मश्चार्थपरिग्रहः । इतरेतरयोर्नीतौ विद्धि मेघोदधी यथा ॥ २९ ॥ ‘अर्थका कारण है धर्म और धर्म सिद्ध होता है अर्थसंग्रहसे। जैसे मेघसे समुद्रकी पुष्टि होती है और समुद्रसे मेघकी पूर्ति। इस प्रकार धर्म और अर्थको एक-दूसरेके आश्रित समझना चाहिये ॥ २९ ॥
द्रव्यार्थस्पर्शसंयोगे या प्रीतिरूपजायते । स कामश्चित्तसंकल्पः शरीरं नास्य दृश्यते ॥ ३० ॥ ‘स्त्री, माला, चन्दन आदि द्रव्योंके स्पर्श और सुवर्ण आदि धनके लाभसे जो प्रसन्नता होती है, उसके लिये जो चित्तमें संकल्प उठता है, उसीका नाम काम है। उस कामका शरीर नहीं देखा जाता (इसीलिये वह ‘अनंग’ कहलाता है) ॥ ३० ॥
अर्थार्थी पुरुषो राजन् बृहन्तं धर्ममिच्छति । अर्थमिच्छति कामार्थी न कामादन्यमिच्छति ॥ ३१ ॥ ‘राजन्! धनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष महान् धर्मकी अभिलाषा रखता है और कामार्थी मनुष्य धन चाहता है। जैसे धर्मसे धनकी और धनसे कामकी इच्छा करता है, उस प्रकार वह कामसे किसी दूसरी वस्तुकी इच्छा नहीं करता है ॥ ३१ ॥
न हि कामेन कामोऽन्यः साध्यते फलमेव तत् । उपयोगात् फलस्यैव काष्ठाद् भस्मेव पण्डितैः ॥ ३२ ॥ ‘जैसे फल उपभोगमें आकर कृतार्थ हो जाता है, उससे दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता तथा जिस प्रकार काष्ठसे भस्म बन सकता है, परंतु उस भस्मसे दूसरा कोई पदार्थ नहीं बन सकता; इसी तरह बुद्धिमान् पुरुष एक कामसे किसी दूसरे कामकी सिद्धि नहीं मानते, क्योंकि वह साधन नहीं, फल ही है ॥ ३२ ॥
इमाञ्छकुनकान् राजन् हन्ति वैतंसिको यथा । एतद् रूपमधर्मस्य भूतेषु हि विहिंसता ॥ ३३ ॥ कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रकृतिं यो न पश्यति । स वध्यः सर्वभूतानां प्रेत्य चेह च दुर्मतिः ॥ ३४ ॥ ‘राजन्! जैसे पक्षियोंको मारनेवाला व्याध इन पक्षियोंको मारता है, यह विशेष प्रकारकी हिंसा ही अधर्मका स्वरूप है (अतः वह हिंसक सबके लिये वध्य है)। वैसे ही जो
खोटी बुद्धिवाला मनुष्य काम और लोभके वशीभूत होकर धर्मके स्वरूपको नहीं जानता, वह इहलोक और परलोकमें भी सब प्राणियोंका वध्य होता है ॥ ३३-३४ ॥
व्यक्तं ते विदितो राजन्नर्थो द्रव्यपरिग्रहः । प्रकृतिं चापि वेत्थास्य विकृतिं चापि भूयसीम् ॥ ३५ ॥ 'राजन्! आपको यह अच्छी तरह ज्ञात है कि धनसे ही भोग्य-सामग्रीका संग्रह होता है। धनका जो कारण है, उससे भी आप परिचित हैं और धनके द्वारा जो बहुत-से कार्य सिद्ध होते हैं, उसे भी आप जानते हैं ॥ ३५ ॥
तस्य नाशे विनाशे वा जरया मरणेन वा । अनर्थ इति मन्यन्ते सोऽयमस्मासु वर्तते ॥ ३६ ॥ 'उस धनका अभाव होनेपर अथवा प्राप्त हुए धनका नाश होनेपर अथवा स्त्री आदि धनके जरा-जीर्ण एवं मृत्युग्रस्त होनेपर मनुष्यकी जो दशा होती है, उसीको सब लोग अनर्थ मानते हैं। वही इस समय हमलोगोंको भी प्राप्त हुआ है ॥ ३६ ॥
इन्द्रियाणां च पञ्चानां मनसो हृदयस्य च । विषये वर्तमानानां या प्रीतिरूपजायते ॥ ३७ ॥ स काम इति मे बुद्धिः कर्मणां फलमुत्तमम् । 'पाँचों ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धिकी अपने विषयोंमें प्रवृत्त होनेके समय जो प्रीति होती है, वही मेरी समझमें काम है। वह कर्मोंका उत्तम फल है ॥ ३७ १/२ ॥
एवमेव पृथग् दृष्ट्वा धर्मार्थौ काममेव च ॥ ३८ ॥ न धर्मपर एव स्यान्न चार्थपरमो नरः । न कामपरमो वा स्यात् सर्वान् सेवेत सर्वदा ॥ ३९ ॥ धर्मं पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये काममाचरेत् । अहन्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ॥ ४० ॥ 'इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम तीनोंको पृथक्-पृथक् समझकर मनुष्य केवल धर्म, केवल अर्थ अथवा केवल कामके ही सेवनमें तत्पर न रहे। उन सबका सदा इस प्रकार सेवन करे, जिससे इनमें विरोध न हो। इस विषयमें शास्त्रोंका यह विधान है कि दिनके पूर्वभागमें धर्मका, दूसरे भागमें अर्थका और अन्तिम भागमें कामका सेवन करे ॥ ३८—४० ॥
कामं पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये धर्ममाचरेत् । वयस्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ॥ ४१ ॥ 'इसी प्रकार अवस्था-क्रममें शास्त्रका विधान यह है कि आयुके पूर्वभागमें (युवावस्थामें) कामका, मध्यभाग (प्रौढ़ावस्था)-में धनका तथा अन्तिम भाग (वृद्धावस्था)-में धर्मका पालन करे ॥ ४१ ॥
धर्मं चार्थं च कामं च यथावद् वदतां वर ।
विभज्य काले कालज्ञः सर्वान् सेवेत पण्डितः ॥ ४२ ॥
'वक्ताओंमें श्रेष्ठ! उचित कालका ज्ञान रखनेवाला विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ और काम तीनोंका यथावत् विभाग करके उपयुक्त समयपर उन सबका सेवन करे ॥ ४२ ॥
मोक्षो वा परमं श्रेय एष राजन् सुखार्थिनाम् ।
प्राप्तिर्वा बुद्धिमास्थाय सोपायां कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥
तद् वाऽऽशु क्रियतां राजन् प्राप्तिर्वाप्यधिगम्यताम् ।
जीवितं ह्यातुरस्येव दुःखमन्तरवर्तिनः ॥ ४४ ॥
'कुरुनन्दन! निरतिशय सुखकी इच्छा रखनेवाले मुमुक्षुओंके लिये यह मोक्ष ही परम कल्याणप्रद है। राजन्! इसी प्रकार लौकिक सुखकी इच्छावालोंके लिये धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्ति ही परम श्रेय है। अतः महाराज! भक्ति और योगसहित ज्ञानका आश्रय लेकर आप शीघ्र ही या तो मोक्षकी प्राप्ति कर लीजिये अथवा धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्तिके उपायका अवलम्बन कीजिये। जो इन दोनोंके बीचमें रहता है, उसका जीवन तो आर्त मनुष्यके समान दुःखमय ही है ॥ ४३-४४ ॥
विदितश्चैव मे धर्मः सततं चरितश्च ते ।
जानन्तस्त्वयि शंसन्ति सुहृदः कर्मचोदनाम् ॥ ४५ ॥
'मुझे मालूम है कि आपने सदा धर्मका ही आचरण किया है, इस बातको जानते हुए भी आपके हितैषी, सगे-सम्बन्धी आपको (धर्मयुक्त) कर्म एवं पुरुषार्थके लिये ही प्रेरित करते हैं ॥ ४५ ॥
दानं यज्ञाः सतां पूजा वेदधारणमार्जवम् ।
एष धर्मः परो राजन् बलवान् प्रेत्य चेह च ॥ ४६ ॥
'महाराज! इहलोक और परलोकमें भी दान, यज्ञ, संतोंका आदर, वेदोंका स्वाध्याय और सरलता आदि ही उत्तम एवं प्रबल धर्म माने गये हैं ॥ ४६ ॥
एष नार्थविहीनेन शक्यो राजन् निषेवितुम् ।
अखिलाः पुरुषव्याघ्र गुणाः स्युर्यद्यपीतरे ॥ ४७ ॥
'पुरुषसिंह राजन्! यद्यपि मनुष्यमें दूसरे सभी गुण मौजूद हों तो भी यह यज्ञ आदि रूप धर्म धनहीन पुरुषके द्वारा नहीं सम्पादित किया जा सकता ॥ ४७ ॥
धर्ममूलं जगद् राजन् नान्यद् धर्माद् विशिष्यते ।
धर्मश्चार्थेन महता शक्यो राजन् निषेवितुम् ॥ ४८ ॥
'महाराज! इस जगत्का मूल कारण धर्म ही है। इस जगत्में धर्मसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। उस धर्मका अनुष्ठान भी महान् धनसे ही हो सकता है ॥ ४८ ॥
न चार्थो भैक्ष्यचर्येण नापि क्लैब्येन कर्हिचित् ।
वेत्तुं शक्यः सदा राजन् केवलं धर्मबुद्धिना ॥ ४९ ॥
‘राजन्! भीख माँगनेसे, कायरता दिखानेसे अथवा केवल धर्ममें ही मन लगाये रहनेसे धनकी प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती ।। ४९ ।। प्रतिषिद्धा हि ते याच्ञा यया सिद्ध्यति वै द्विजः । तेजसैवार्थलिप्सायां यतस्व पुरुषर्षभ ।। ५० ।। ‘नरश्रेष्ठ! ब्राह्मण जिस याचनाके द्वारा कार्यसिद्धि कर लेता है वह तो आप कर नहीं सकते, क्योंकि क्षत्रियके लिये उसका निषेध है। अतः आप अपने तेजके द्वारा ही धन पानेका प्रयत्न कीजिये ।। ५० ।। भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका । क्षत्रियस्य विशेषेण धर्मस्तु बलमौरसम् ।। ५१ ।। ‘क्षत्रियके लिये न तो भीख माँगनेका विधान है और न वैश्य और शूद्रकी जीविका करनेका ही। उसके लिये तो बल और उत्साह ही विशेष धर्म हैं ।। ५१ ।। स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व जहि शत्रून् समागतान् । धार्तराष्ट्रवनं पार्थ मया पार्थेन नाशय ।। ५२ ।। ‘पार्थ! अपने धर्मका आश्रय लीजिये, प्राप्त हुए शत्रुओंका वध कीजिये। मेरे तथा अर्जुनके द्वारा धृतराष्ट्रपुत्ररूपी जंगलको कटवा डालिये ।। ५२ ।। उदारमेव विद्वांसो धर्मं प्राहर्मनीषिणः । उदारं प्रतिपद्यस्व नावरे स्थातुमर्हसि ।। ५३ ।। ‘मनीषी विद्वान् दानशीलताको ही धर्म कहते हैं, अतः आप उस दानशीलताको ही प्राप्त कीजिये। आपको इस दयनीय अवस्थामें नहीं रहना चाहिये ।। ५३ ।। अनुबुध्यस्व राजेन्द्र वेत्थ धर्मान् सनातनात् । क्रूरकर्माभिजातोऽसि यस्मादुद्विजते जनः ।। ५४ ।। ‘महाराज! आप सनातनधर्मोंको जानते हैं, आप कठोर कर्म करनेवाले क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए हैं, जिससे सब लोग भयभीत रहते हैं; अतः अपने स्वरूप और कर्तव्यकी ओर ध्यान दीजिये ।। ५४ ।। प्रजापालनसम्भूतं फलं तव न गर्हितम् । एष ते विहितो राजन् धात्रा धर्मः सनातनः ।। ५५ ।। ‘जब आप राज्य प्राप्त कर लेंगे, उस समय प्रजापालनरूप धर्मसे आपको जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होगी, वह आपके लिये गर्हित नहीं होगा। महाराज! विधाताने आप-जैसे क्षत्रियका यही सनातनधर्म नियत किया है ।। ५५ ।। तस्मादपचितः पार्थ लोके हास्यं गमिष्यसि । स्वधर्माद्धि मनुष्याणां चलनं न प्रशस्यते ।। ५६ ।। ‘पार्थ! उस धर्मसे हीन होनेपर तो संसारमें आप उपहासके पात्र हो जायेंगे। मनुष्योंका अपने धर्मसे भ्रष्ट होना कुछ प्रशंसाकी बात नहीं है ।। ५६ ।।
स क्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेदं शिथिलं मनः। वीर्यमास्थाय कौरव्य धुरमुद्वह धुर्यवत्॥ ५७॥ ‘कुरुनन्दन! अपने हृदयको क्षत्रियोचित उत्साहसे भरकर मनकी इस शिथिलताको दूर करके पराक्रमका आश्रय ले आप एक धुरन्धर वीर पुरुषकी भाँति युद्धका भार वहन कीजिये॥ ५७॥
न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन। पार्थिवो व्यजयद् राजन् न भूतिं न पुनः श्रियम्॥ ५८॥ ‘महाराज! केवल धर्ममें ही लगे रहनेवाले किसी भी नरेशने आजतक न तो कभी पृथ्वीपर विजय पायी है और न ऐश्वर्य तथा लक्ष्मीको ही प्राप्त किया है॥ ५८॥
जिह्वां दत्त्वा बहूनां हि क्षुद्राणां लुब्धचेतसाम्। निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यकः॥ ५९॥ ‘जैसे बहेलिया लुब्ध हृदयवाले छोटे-छोटे मृगोंको कुछ खानेकी वस्तुओंका लोभ देकर छलसे उन्हें पकड़ लेता है, उसी प्रकार नीतिज्ञ राजा शत्रुओंके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करके उनसे राज्यको प्राप्त कर लेता है॥ ५९॥
भ्रातरः पूर्वजाताश्च सुसमृद्धाश्च सर्वशः। निकृत्या निर्जिता देवैरसुराः पार्थिवर्षभ॥ ६०॥ ‘नृपश्रेष्ठ! आप जानते हैं कि असुरगण देवताओंके बड़े भाई हैं, उनसे पहले उत्पन्न हुए हैं और सब प्रकारसे समृद्धिशाली हैं तो भी देवताओंने छलसे उन्हें जीत लिया॥ ६०॥
एवं बलवतः सर्वमिति बुद्ध्वा महीपते। जहि शत्रून् महाबाहो परां निकृतिमास्थितः॥ ६१॥ ‘महाराज! महाबाहो! इस प्रकार बलवान्का ही सबपर अधिकार होता है, यह समझकर आप भी कूटनीतिका आश्रय ले अपने शत्रुओंको मार डालिये॥ ६१॥
न ह्यर्जुनसमः कश्चिद् युधि योद्धा धनुर्धरः। भविता वा पुमान् कश्चिन्मत्समो वा गदाधरः॥ ६२॥ ‘युद्धमें अर्जुनके समान कोई धनुर्धर अथवा मेरे समान गदाधारी योद्धा न तो है और न आगे होनेकी ही सम्भावना है॥ ६२॥
सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन् सुबलवानपि। अप्रमादी महोत्साही सत्त्वस्थो भव पाण्डव॥ ६३॥ ‘पाण्डुनन्दन! अत्यन्त बलवान् पुरुष भी आत्मबलसे ही युद्ध करता है, इसलिये आप सावधानीपूर्वक महान् उत्साह और आत्मबलका आश्रय लीजिये॥ ६३॥
सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा। न तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छायेव हैमनी॥ ६४॥
‘आत्मबल ही धनका मूल है, इसके विपरीत जो कुछ है, वह मिथ्या है; क्योंकि हेमन्त-ऋतुमें वृक्षोंकी छायाके समान वह आत्माकी दुर्बलता किसी भी कामकी नहीं है ।। ६४ ।। अर्थत्यागोऽपि कार्यः स्वार्थं श्रेयांसमिच्छता । बीजौपम्येन कौन्तेय मा ते भूदत्र संशयः ॥ ६५ ॥ ‘कुन्तीकुमार! जैसे किसान अधिक अन्नराशि उपजानेकी लालसासे धान्य आदिके अल्प बीजोंका भूमिमें परित्याग कर देता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ अर्थ पानेकी इच्छासे अल्प अर्थका त्याग किया जा सकता है। आपको इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये ॥ ६५ ॥ अर्थेन तु समो नार्थो यत्र लभ्येत नोदयः । न तत्र विषणः कार्यः खरकण्डूयनं हि तत् ॥ ६६ ॥ ‘जहाँ अर्थका उपयोग करनेपर उससे अधिक या समान अर्थकी प्राप्ति न हो वहाँ उस अर्थको नहीं लगाना चाहिये, क्योंकि वह (परस्पर) गधोंके शरीरको खुजलानेके समान व्यर्थ है ॥ ६६ ॥ एवमेव मनुष्येन्द्र धर्मं त्यक्त्वल्पकं नरः । बृहन्तं धर्ममाप्नोति स बुद्ध इति निश्चितम् ॥ ६७ ॥ ‘नरेश्वर! इसी प्रकार जो मनुष्य अल्प धर्मका परित्याग करके महान् धर्मकी प्राप्ति करता है, वह निश्चय ही बुद्धिमान् है ॥ ६७ ॥ अमित्रं मित्रसम्पन्नं मित्रैर्भिन्दन्ति पण्डिताः । भिन्नैर्मित्रैः परित्यक्तं दुर्बलं कुर्वते वशम् ॥ ६८ ॥ ‘मित्रोंसे सम्पन्न शत्रुको विद्वान् पुरुष अपने मित्रोंद्वारा भेदनीतिसे उसमें और उसके मित्रोंमें फूट डाल देते हैं, फिर भेदभाव होनेपर मित्र जब उसको त्याग देते हैं, तब वे उस दुर्बल शत्रुको अपने वशमें कर लेते हैं ॥ ६८ ॥ सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन् सुबलवानपि । नोद्यमेन न होत्राभिः सर्वाः स्वीकुरुते प्रजाः ॥ ६९ ॥ ‘राजन्! अत्यन्त बलवान् पुरुष भी आत्मबलसे ही युद्ध करता है, वह किसी अन्य प्रयत्नसे या प्रशंसाद्वारा सब प्रजाको अपने वशमें नहीं करता ॥ ६९ ॥ सर्वथा संहतैरेव दुर्बलैर्बलवानपि । अमित्रः शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव ॥ ७० ॥ ‘जैसे मधुमक्खियाँ संगठित होकर मधु निकालने-वालेको मार डालती हैं, उसी प्रकार सर्वथा संगठित रहनेवाले दुर्बल मनुष्योंद्वारा बलवान् शत्रु भी मारा जा सकता है ॥ ७० ॥ यथा राजन् प्रजाः सर्वाः सूर्यः पाति गभस्तिभिः । अत्ति चैव तथैव त्वं सदृशः सवितुर्भव ॥ ७१ ॥
राजन्! जैसे भगवान् सूर्य पृथ्वीके रसको ग्रहण करते और अपनी किरणोंद्वारा वर्षा करके उन सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी प्रजाओंसे कर लेकर उनकी रक्षा करते हुए सूर्यके ही समान हो जाइये॥ ७१॥
एतच्चापि तपो राजन् पुराणमिति नः श्रुतम्।
विधिना पालनं भूमेर्यत् कृतं नः पितामहैः॥ ७२॥
‘राजेन्द्र! हमारे बाप-दादोंने जो किया है, वह धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन भी प्राचीनकालसे चला आनेवाला तप ही है; ऐसा हमने सुना है॥ ७२॥
न तथा तपसा राजँल्लोकान् प्राप्नोति क्षत्रियः।
यथा सृष्टेन युद्धेन विजयेनेतरेण वा॥ ७३॥
‘धर्मराज! क्षत्रिय तपस्याके द्वारा वैसे पुण्य-लोकोंको नहीं प्राप्त होता, जिन्हें वह अपने लिये विहित युद्धके द्वारा विजय अथवा मृत्युको अंगीकार करनेसे प्राप्त करता है॥ ७३॥
अपयात् किल भाः सूर्याल्लक्ष्मीश्चन्द्रमसस्तथा।
इति लोको व्यवसितो दृष्ट्वेमां भवतो व्यथाम्॥ ७४॥
‘आपपर जो यह संकट आया है, इस असम्भव-सी घटनाको देखकर लोग यह निश्चयपूर्वक मानने लगे हैं कि सूर्यसे उसकी प्रभा और चन्द्रमासे उसकी चाँदनी भी दूर हो सकती है॥ ७४॥
भवतश्च प्रशंसाभिर्निन्दाभिरितरस्य च।
कथायुक्ताः परिषदः पृथग् राजन् समागताः॥ ७५॥
‘राजन्! साधारण लोग भिन्न-भिन्न सभाओंमें सम्मिलित होकर अथवा अलग-अलग समूह-के-समूह इकट्ठे होकर आपकी प्रशंसा और दुर्योधनकी निन्दासे ही सम्बन्ध रखनेवाली बातें करते हैं॥ ७५॥
इदमभ्यधिकं राजन् ब्राह्मणाः कुरवश्च ते।
समेताः कथयन्तीह मुदिताः सत्यसंधताम्॥ ७६॥
‘महाराज! इसके सिवा, यह भी सुननेमें आया है कि ब्राह्मण और कुरुवंशी एकत्र होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आपकी सत्यप्रतिज्ञताका वर्णन करते हैं॥ ७६॥
यन्न मोहान्न कार्पण्यान्न लोभान्न भयादपि।
अनृतं किंचिदुक्तं ते न कामान्नार्थकारणात्॥ ७७॥
‘उनका कहना है कि आपने कभी न तो मोहसे, न दीनतासे, न लोभसे, न भयसे, न कामनासे और न धनके ही कारणसे किंचिन्मात्र भी असत्य भाषण किया है॥ ७७॥
यदेनः कुरुते किंचिद् राजा भूमिमवाप्नुवन्।
सर्वं तन्नुदते पश्चाद् यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः॥ ७८॥
‘राजा पृथ्वीको अपने अधिकारमें करते समय युद्धजनित हिंसा आदिके द्वारा जो कुछ पाप करता है, वह सब राज्यप्राप्तिके पश्चात् भारी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा नष्ट कर देता
है ॥ ७८ ॥
ब्राह्मणेभ्यो ददद् ग्रामान् गाश्च राजन् सहस्रशः ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यस्तमोभ्य इव चन्द्रमाः ॥ ७९ ॥
‘जनेश्वर! ब्राह्मणोंको बहुत-से गाँव और सहस्रों गौएँ दानमें देकर राजा अपने समस्त पापोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा अन्धकारसे ॥ ७९ ॥
पौरजानपदाः सर्वे प्रायशः कुरुनन्दन ।
सवृद्धबालसहिताः शंसन्ति त्वां युधिष्ठिर ॥ ८० ॥
‘कुरुनन्दन युधिष्ठिर! प्रायः नगर और जनपदमें निवास करनेवाले आबालवृद्ध सब लोग आपकी प्रशंसा करते हैं ॥ ८० ॥
श्वदृतौ क्षीरमासक्तं ब्रह्म वा वृषले यथा ।
सत्यं स्तेने बलं नार्यां राज्यं दुर्योधने तथा ॥ ८१ ॥
‘कुत्तेके चमड़ेकी कुप्पीमें रखा हुआ दूध, शूद्रमें स्थित वेद, चोरमें सत्य और नारीमें स्थित बल जैसे अनुचित है, उसी प्रकार दुर्योधनमें स्थित राजत्व भी संगत नहीं है ॥ ८१ ॥
इति लोके निर्वचनं पुरश्चरति भारत ।
अपि चैताः स्त्रियो बालाः स्वाध्यायमधिकुर्वते ॥ ८२ ॥
‘भारत! लोकमें यह उपर्युक्त सत्य प्रवाद पहलेसे चला आ रहा है । स्त्रियाँ और बच्चेतक इसे नित्य किये जानेवाले पाठकी तरह दोहराते रहते हैं ॥ ८२ ॥
इमामवस्थां च गते सहास्माभिररिंदम ।
हन्त नष्टाः स्म सर्वे वै भवतोपद्रवे सति ॥ ८३ ॥
‘शत्रुदमन! बड़े दुःखकी बात है कि हमारे साथ ही आज आप इस दुरवस्थामें पहुँच गये हैं और आपहीके कारण ऐसा उपद्रव आया कि हम सब लोग नष्ट हो गये ॥ ८३ ॥
स भवान् रथमास्थाय सर्वोपकरणान्वितम् ।
त्वरमाणोऽभिनिर्यातु विप्रेभ्योऽर्थविभावकः ॥ ८४ ॥
‘महाराज! आप विजयमें प्राप्त हुए धनका ब्राह्मणोंको दान करनेके लिये अस्त्र-शस्त्र आदि सभी आवश्यक सामग्रियोंसे सुसज्जित रथपर बैठकर शीघ्र यहाँसे युद्धके लिये निकलिये ॥ ८४ ॥
वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठानद्यैव गजसाह्वयम् ।
अस्त्रविद्भिः परिवृतो भ्रातृभिर्दृढधन्विभिः ॥ ८५ ॥
आशीविषसमैर्वीरैर्मरुद्भिरिव वृत्रहा ।
अमित्रांस्तेजसा मृद्नन्नसुरानिव वृत्रहा ।
श्रियमादत्स्व कौन्तेय धार्तराष्ट्रान् महाबल ॥ ८६ ॥
‘जैसे सर्पोंके समान भयंकर शूरवीर देवताओंसे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्र असुरोंपर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार अस्त्र-विद्याके ज्ञाता और सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले हम
सब भाइयोंसे घिरे हुए आप श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर आज ही हस्तिनापुरपर चढ़ाई कीजिये। महाबली कुन्तीकुमार! जैसे इन्द्र अपने तेजसे दैत्योंको मिट्टीमें मिला देते हैं, उसी प्रकार आप अपने प्रभावसे शत्रुओंको मिट्टीमें मिलाकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे अपनी राजलक्ष्मीको ले लीजिये ।। ८५-८६ ।।
न हि गाण्डीवमुक्तानां शराणां गार्ध्रवाससाम् ।
स्पर्शामाशीविषाभानां मर्त्यः कश्चन संसहेत् ॥ ८७ ॥
‘मनुष्योंमें कोई ऐसा नहीं है, जो गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए विषैले सर्पोंके समान भयंकर गृध्रपंखयुक्त बाणोंका स्पर्श सह सके ।। ८७ ।।
न स वीरो न मातङ्गो न च सोऽश्वोऽस्ति भारत ।
यः सहेत गदावेगं मम क्रुद्धस्य संयुगे ॥ ८८ ॥
‘भारत! इसी प्रकार जगत्में ऐसा कोई अश्व या गजराज या कोई वीर पुरुष भी नहीं है, जो रणभूमिमें क्रोधपूर्वक विचरनेवाले मुझ भीमसेनकी गदाका वेग सह सके ।। ८८ ।।
सृञ्जयैः सह कैकेयैर्वृष्णीनां वृषभेण च ।
कथंस्विद् युधि कौन्तेय न राज्यं प्राप्नुयामहे ॥ ८९ ॥
‘कुन्तीनन्दन! सृंजय और कैकयवंशी वीरों तथा वृष्णिवंशावतंस भगवान् श्रीकृष्णके साथ होकर हम संग्राममें अपना राज्य कैसे नहीं प्राप्त कर लेंगे? ।। ८९ ।।
शत्रुहस्तगतां राजन् कथंस्विन्नाहरेर्महीम् ।
इह यत्नमुपाहृत्य बलेन महतान्वितः ॥ ९० ॥
‘राजन्! आप विशाल सेनासे सम्पन्न हो यहाँ प्रयत्नपूर्वक युद्ध ठानकर शत्रुओंके हाथमें गयी हुई पृथ्वीको उनसे छीन क्यों नहीं लेते?’ ।। ९० ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि भीमवाक्ये त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें भीमवाक्यविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 265)
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा
वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्तस्तु महानुभावः
सत्यव्रतो भीमसेनेन राजा ।
अजातशत्रुस्तदनन्तरं वै
धैर्यान्वितो वाक्यमिदं बभाषे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीमसेन जब इस प्रकार अपनी बात पूरी कर चुके, तब महानुभाव, सत्यप्रतिज्ञ एवं अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरने धैर्यपूर्वक उनसे यह बात कही— ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
असंशयं भारत सत्यमेतद्
यन्मां तुदन् वाक्यशल्यैः क्षिणोषि ।
न त्वां विगर्हे प्रतिकूलमेव
ममानयाद्धि व्यसनं व आगात् ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भरतकुलनन्दन! तुम मुझे पीड़ा देते हुए अपने वाग्बाणोंद्वारा मेरे हृदयको जो विदीर्ण कर रहे हो, यह निःसंदेह ठीक ही है। मेरे प्रतिकूल होनेपर भी इन बातोंके लिये मैं तुम्हारी निन्दा नहीं करता; क्योंकि मेरे ही अन्यायसे तुमलोगोंपर यह विपत्ति आयी है ॥ २ ॥
अहं ह्यक्षानन्वपद्यं जिहीर्षन्
राज्यं सराष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पुत्रात् ।
तन्मां शठः कितवः प्रत्यदेवीत्
सुयोधनार्थं सुबलस्य पुत्रः ॥ ३ ॥
उन दिनों धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके हाथसे उसके राष्ट्र तथा राजपद्का अपहरण करनेकी इच्छा रखकर ही मैं द्यूतक्रीड़ामें प्रवृत्त हुआ था; किंतु उस समय धूर्त जुआरी सुबलपुत्र शकुनि दुर्योधनके लिये उसकी ओरसे मेरे विपक्षमें आकर जूआ खेलने लगा ॥ ३ ॥
महामायः शकुनिः पर्वतीयः
सभामध्ये प्रवपन्नक्षपूगान् ।
अमायिनं मायया प्रत्यजैषीत्
ततोऽपश्यं वृजिनं भीमसेन ॥ ४ ॥ भीमसेन! पर्वतीय प्रदेशका निवासी शकुनि बड़ा मायावी है। उसने द्यूतसभामें पासे फेंककर अपनी मायाद्वारा मुझे जीत लिया; क्योंकि मैं माया नहीं जानता था; इसीलिये मुझे यह संकट देखना पड़ा है ॥ ४ ॥
अक्षांश्च दृष्ट्वा शकुनेर्यथावत् कामानुकूलानयुजो युजश्च । शक्यो नियन्तुमभविष्यदात्मा मन्युस्तु हन्यात् पुरुषस्य धैर्यम् ॥ ५ ॥ शकुनिके सम और विषम सभी पासोंको उसकी इच्छाके अनुसार ही ठीक-ठीक पड़ते देखकर यदि अपने मनको जूएकी ओरसे रोका जा सकता तो यह अनर्थ न होता, परंतु क्रोधावेश मनुष्यके धैर्यको नष्ट कर देता है (इसीलिये मैं जूएसे अलग न हो सका) ॥ ५ ॥
यन्तुं नात्मा शक्यते पौरुषेण मानेन वीर्येण च तात नद्धः । न ते वाचो भीमसेनाभ्यसूये मन्ये तथा तद् भवितव्यमासीत् ॥ ६ ॥ तात भीमसेन! किसी विषयमें आसक्त हुए चित्तको पुरुषार्थ, अभिमान अथवा पराक्रमसे नहीं रोका जा सकता (अर्थात् उसे रोकना बहुत ही कठिन है), अतः मैं तुम्हारी बातोंके लिये बुरा नहीं मानता। मैं समझता हूँ, वैसी ही भवितव्यता थी ॥ ६ ॥
स नो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो न्यपातयद् व्यसने राज्यमिच्छन् । दास्यं च नोऽगमयद् भीमसेन यत्राभवच्छरणं द्रौपदी नः ॥ ७ ॥ भीमसेन! धृतराष्ट्रके पुत्र राजा दुर्योधनने राज्य पानेकी इच्छासे हमलोगोंको विपत्तिमें डाल दिया। हमें दासतक बना लिया था, किंतु उस समय द्रौपदी हमलोगोंकी रक्षक हुई ॥ ७ ॥
त्वं चापि तद् वेत्थ धनंजयश्च पुनर्द्यूतायागतानां सभां नः । यन्माऽब्रवीद् धृतराष्ट्रस्य पुत्र एकग्लहार्थं भरतानां समक्षम् ॥ ८ ॥ तुम और अर्जुन दोनों इस बातको जानते हो कि जब हम पुनः द्यूतके लिये बुलाये जानेपर उस सभामें आये तो उस समय समस्त भरतवंशियोंके समक्ष धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने मुझसे एक ही दाँव लगानेके लिये इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥
वने समा द्वादश राजपुत्र
यथाकामं विदितमजातशत्रो । अथापरं चाविदितं चरेथाः सर्वैः सह भ्रातृभिश्च्छन्नगूढः ॥ ९ ॥ ‘राजकुमार अजातशत्रो! (यदि आप हार जायें तो) आपको बारह वर्षोंतक इच्छानुसार सबकी जानकारीमें और पुनः एक वर्षतक गुप्त वेषमें छिपे रहकर अपने भाइयोंके साथ वनमें निवास करना पड़ेगा ॥ ९ ॥
त्वां चेच्छ्रुत्वा तात तथा चरन्त- मवभोत्स्यन्ते भरतानां चराश्च । अन्यांश्चरेथास्तावतोऽब्दांस्तथा त्वं निश्चित्य तत् प्रतिजानीहि पार्थ ॥ १० ॥ ‘कुन्तीकुमार! यदि भरतवंशियोंके गुप्तचर आपके गुप्त निवासका समाचार सुनकर पता लगाने लगें और उन्हें यह मालूम हो जाय कि आपलोग अमुक जगह अमुक रूपमें रह रहे हैं, तब आपको पुनः उतने (बारह) ही वर्षोंतक वनमें रहना पड़ेगा। इस बातको निश्चय करके इसके विषयमें प्रतिज्ञा कीजिये ॥ १० ॥
चरेश्चेन्नोऽविदितः कालमेतं युक्तो राजन् मोहयित्वा मदीयान् । ब्रवीमि सत्यं कुरुसंसदीह तवैव ता भारत पञ्च नद्यः ॥ ११ ॥ ‘भरतवंशी नरेश! यदि आप सावधान रहकर इतने समयतक मेरे गुप्तचरोंको मोहित करके अज्ञात-भावसे ही विचरते रहें तो मैं यहाँ कौरवोंकी सभामें यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि उस सारे पंचनदप्रदेशपर फिर तुम्हारा ही अधिकार होगा ॥ ११ ॥
वयं चैतद् भारत सर्व एव त्वया जिताः कालमपास्य भोगान् । वसेम इत्याह पुरा स राजा मध्ये कुरूणां स मयोक्तस्तथेति ॥ १२ ॥ ‘भारत! यदि आपने ही हम सब लोगोंको जीत लिया तो हम भी उतने ही समयतक सारे भोगोंका परित्याग करके उसी प्रकार वास करेंगे।' राजा दुर्योधनने जब समस्त कौरवोंके बीच इस प्रकार कहा, तब मैंने भी 'तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली ॥ १२ ॥
तत्र द्यूतमभवन्नो जघन्यं तस्मिञ्जिताः प्रव्रजिताश्च सर्वे । इत्थं तु देशाननुसंचरामो वनानि कृच्छ्राणि च कृच्छ्ररूपाः ॥ १३ ॥
फिर वहाँ हमलोगोंका अन्तिम बार निन्दनीय जूआ हुआ। उसमें हम सब लोग हार गये और घर छोड़कर वनमें निकल आये। इस प्रकार हम कष्टप्रद वेष धारण करके कष्टदायक वनों और विभिन्न प्रदेशोंमें घूम रहे हैं॥ १३॥
सुयोधनश्चापि न शान्तिमिच्छन्
भूयः स मन्योर्वशमन्वगच्छत्।
उद्योजयामास कुरूंश्च सर्वान्
ये चास्य केचिद् वशमन्वगच्छन्॥ १४॥
उधर दुर्योधन भी शान्तिकी इच्छा न रखकर और भी क्रोधके वशीभूत हो गया है। उसने हमें तो कष्टमें डाल दिया और दूसरे समस्त कौरवोंको जो उसके वशमें होकर उसीका अनुसरण करते रहे हैं, (देशशासक और दुर्गरक्षक आदि) ऊँचे पदोंपर प्रतिष्ठित कर दिया है॥ १४॥
तं संधिमास्थाय सतां सकाशे
को नाम जह्यादिह राज्यहेतोः।
आर्यस्य मन्ये मरणाद् गरीयो
यद्धर्ममुत्क्रम्य महीं प्रशासेत्॥ १५॥
कौरव-सभामें साधु पुरुषोंके समीप वैसी सन्धिका आश्रय लेकर यानी प्रतिज्ञा करके अब यहाँ राज्यके लिये उसे कौन तोड़े? धर्मका उल्लंघन करके पृथिवीका शासन करना तो किसी श्रेष्ठ पुरुषके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायक है—ऐसा मेरा मत है॥ १५॥
तदैव चेद् वीर कर्माकरिष्यो
यदा द्यूते परिघं पर्यमृक्षः।
बाहू दिधक्षन् वारितः फाल्गुनेन
किं दुष्कृतं भीम तदाभविष्यत्॥ १६॥
प्रागेव चैवं समयक्रियायाः
किं नाब्रवीः पौरुषमाविदानः।
प्राप्तं तु कालं त्वभिपद्य पश्चात्
किं मामिदानीमतिवेलमात्थ॥ १७॥
वीर भीमसेन! द्यूतके समय जब तुमने मेरी दोनों बाँहोंको जला देनेकी इच्छा प्रकट की और अर्जुनने तुम्हें रोका, उस समय तुम शत्रुओंपर आघात करनेके लिये अपनी गदापर हाथ फेरने लगे थे। यदि उसी समय तुमने शत्रुओंपर आघात कर दिया होता तो कितना अनर्थ हो जाता। तुम अपना पुरुषार्थ तो जानते ही थे। जब मैं पूर्वोक्त प्रकारकी प्रतिज्ञा करने लगा उससे पहले ही तुमने ऐसी बात क्यों नहीं कही? जब प्रतिज्ञाके अनुसार वनवासका समय स्वीकार कर लिया, तब पीछे चलकर इस समय क्यों मुझसे अत्यन्त कठोर बातें कहते हो?॥ १६-१७॥
भूयोऽपि दुःखं मम भीमसेन दूये विषस्येव रसं हि पीत्वा । यद् याज्ञसेनीं परिक्लिश्यमानां संदृश्य तत् क्षान्तमिति स्म भीम ॥ १८ ॥ भीमसेन! मुझे इस बातका भी बड़ा दुःख है कि द्रौपदीको शत्रुओंद्वारा क्लेश दिया जा रहा था और हमने अपनी आँखों देखकर भी उसे चुपचाप सह लिया। जैसे कोई विष घोलकर पी ले और उसकी पीड़ासे कराहने लगे, वैसी ही वेदना इस समय मुझे हो रही है ॥ १८ ॥
न त्वद्य शक्यं भरतप्रवीर कृत्वा यदुक्तं कुरुवीरमध्ये । कालं प्रतीक्षस्व सुखोदयस्य पक्तिं फलानाभिव बीजवापः ॥ १९ ॥ भरतवंशके प्रमुख वीर! कौरव वीरोंके बीच मैंने जो प्रतिज्ञा की है, उसे स्वीकार कर लेनेके बाद अब इस समय आक्रमण नहीं किया जा सकता। जैसे बीज बोनेवाला किसान अपनी खेतीके फलोंके पकनेकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार तुम भी उस समयकी प्रतीक्षा करो, जो हमारे लिये सुखकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ १९ ॥
यदा हि पूर्वं निकृतो निकृन्तेद् वैरं सपुष्पं सफलं विदित्वा । महागुणं हरति हि पौरुषेण तदा वीरो जीवति जीवलोके ॥ २० ॥ जब पहले शत्रुके द्वारा धोखा खाया हुआ वीर पुरुष उसे फूलता-फलता जानकर अपने पुरुषार्थके द्वारा उसका मूलोच्छेद कर डालता है, तभी उस शत्रुके महान् गुणोंका अपहरण कर लेता है और इस जगत्में सुखपूर्वक जीवित रहता है ॥ २० ॥
श्रियं च लोके लभते समग्रां मन्ये चास्मै शत्रवः संनमन्ते । मित्राणि चैनमचिराद् भजन्ते देवा इवेन्द्रमुपजीवन्ति चैनम् ॥ २१ ॥ वह वीर पुरुष लोकमें सम्पूर्ण लक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है। मैं यह भी मानता हूँ कि सभी शत्रु उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं। फिर थोड़े ही दिनोंमें उसके बहुत-से मित्र बन जाते हैं और जैसे देवता इन्द्रके सहारे जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार वे मित्रगण उस वीरकी छत्रछायामें रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ २१ ॥
मम प्रतिज्ञां च निबोध सत्यां वृणे धर्मममृताज्जीविताच्च ।
राज्यं च पुत्राश्च यशो धनं च सर्वं न सत्यस्य कलामुपैति ॥ २२ ॥
किंतु भीमसेन! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो। मैं जीवन और अमरत्वकी अपेक्षा भी धर्मको ही बढ़कर समझता हूँ। राज्य, पुत्र, यश और धन—ये सब-के-सब सत्यधर्मकी सोलहवीं कलाको भी नहीं पा सकते ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 271)
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
दुःखित भीमसेनका युधिष्ठिरको युद्धके लिये उत्साहित करना
भीमसेन उवाच
संधिं कृत्वैव कालेन ह्यन्तकेन पतत्रिणा ।
अनन्तेनाप्रमेयेण स्रोतसा सर्वहारिणा ॥ १ ॥
प्रत्यक्षं मन्यसे कालं मर्त्यः सन् कालबन्धनः ।
फेनधर्मा महाराज फलधर्मा तथैव च ॥ २ ॥
**भीमसेन बोले—**महाराज! आप फेनके समान नश्वर, फलके समान पतनशील तथा कालके बन्धनमें बँधे हुए मरणधर्मा मनुष्य हैं तो भी आपने सबका अन्त और संहार करनेवाले, बाणके समान वेगवान्, अनन्त, अप्रमेय एवं जलस्रोतके समान प्रवाहशील लंबे कालको बीचमें देकर दुर्योधनके साथ सन्धि करके उस कालको अपनी आँखोंके सामने आया हुआ मानते हैं ॥ १-२ ॥
निमेषादपि कौन्तेय यस्यायुरपचीयते ।
सूच्येवाञ्जनचूर्णस्य किमिति प्रतिपालयेत् ॥ ३ ॥
किंतु कुन्तीकुमार! सलाईसे थोड़ा-थोड़ा करके उठाये जानेवाले अंजनचूर्ण (सुरमे)-की भाँति एक-एक निमेषमें जिसकी आयु क्षीण हो रही है, वह क्षणभंगुर मानव समयकी प्रतीक्षा क्या कर सकता है? ॥ ३ ॥
यो नूनममितायुः स्वादथवापि प्रमाणवित् ।
स कालं वै प्रतीक्षेत सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ४ ॥
अवश्य ही जिसकी आयुकी कोई माप नहीं है अथवा जो आयुकी निश्चित संख्याको जानता है तथा जिसने सब कुछ प्रत्यक्ष देख लिया है। वही समयकी प्रतीक्षा कर सकता है ॥ ४ ॥
प्रतीक्ष्यमाणः कालो नः समा राजंस्त्रयोदश ।
आयुषोऽपचयं कृत्वा मरणायोपनेष्यति ॥ ५ ॥
राजन्! तेरह वर्षोंतक हमें जिसकी प्रतीक्षा करनी है, वह काल हमारी आयुको क्षीण करके हम सबको मृत्युके निकट पहुँचा देगा ॥ ५ ॥
शरीरिणां हि मरणं शरीरे नित्यमाश्रितम् ।
प्रागेव मरणात् तस्माद् राज्यायैव घटामहे ॥ ६ ॥
देहधारीकी मृत्यु सदा उसके शरीरमें ही निवास करती है, अतः मृत्युके पहले ही हमें राज्य-प्राप्तिके लिये चेष्टा करनी चाहिये ॥ ६ ॥
यो न याति प्रसंख्यानमस्पष्टो भूमिवर्धनः ।
अयातयित्वा वैराणि सोऽवसीदति गौरिव ॥ ७ ॥
जिसका प्रभाव छिपा हुआ है, वह भूमिके लिये भाररूप ही है, क्योंकि वह जनसाधारणमें ख्याति नहीं प्राप्त कर सकता। वह वैरका प्रतिशोध न लेनेके कारण बैलकी भाँति दुःख उठाता रहता है ॥ ७ ॥
यो न यातयते वैरमल्पसत्त्वोद्यमः पुमान् ।
अफलं जन्म तस्याहं मन्ये दुर्जातजायिनः ॥ ८ ॥
जिसका बल और उद्यम बहुत कम है, जो वैरका बदला नहीं ले सकता, उस पुरुषका जन्म अत्यन्त घृणित है। मैं तो उसके जन्मको निष्फल मानता हूँ ॥ ८ ॥
हैरण्यौ भवतो बाहू श्रुतिर्भवति पार्थिवी ।
हत्वा द्विषन्तं संग्रामे भुङ्क्ष्व बाहुजितं वसु ॥ ९ ॥
महाराज! आपकी दोनों भुजाएँ सुवर्णकी अधिकारिणी हैं। आपकी कीर्ति राजा पृथुके समान है। आप युद्धमें शत्रु का संहार करके अपने बाहुबलसे उपार्जित धनका उपभोग कीजिये ॥ ९ ॥
हत्वा वै पुरुषो राजन् निकर्तारमरिंदम ।
अह्नाय नरकं गच्छेत् स्वर्गेणास्य स संमितः ॥ १० ॥
शत्रुदमन नरेश! यदि मनुष्य अपनेको धोखा देनेवाले शत्रु का वध करके तुरंत ही नरकमें पड़ जाय तो उसके लिये वह नरक भी स्वर्गके तुल्य है ॥ १० ॥
अमर्षजो हि संतापः पावकाद् दीप्तिमत्तरः ।
येनाहमभिसंतप्तो न नक्तं न दिवा शये ॥ ११ ॥
अमर्षसे जो संताप होता है, वह आगसे भी बढ़कर जलानेवाला है। जिससे संतप्त होकर मुझे न तो रातमें नींद आती है और न दिनमें ॥ ११ ॥
अयं च पार्थो बीभत्सुर्वरिष्ठो ज्याविकर्षणे ।
आस्ते परमसंतप्तो नूनं सिंह इवाशये ॥ १२ ॥
ये हमारे भाई अर्जुन धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेमें सबसे श्रेष्ठ हैं; परंतु ये भी निश्चय ही अपनी गुफामें दुःखी होकर बैठे हुए सिंहकी भाँति सदा अत्यन्त संतप्त होते रहते हैं ॥ १२ ॥
योऽयमेकोऽभिमनुते सर्वान् लोके धनुर्भृतः ।
सोऽयमात्मजमूष्माणं महाहस्तीव यच्छति ॥ १३ ॥
जो अकेले ही संसारके समस्त धनुर्धर वीरोंका सामना कर सकते हैं, वे ही अर्जुन महान् गजराजकी भाँति अपने मानसिक क्रोधजनित संतापको किसी प्रकार रोक रहे
हैं॥ १३॥ नकुलः सहदेवश्च वृद्धा माता च वीरसूः। तवैव प्रियमिच्छन्त आसते जडमूकवत्॥ १४॥ नकुल, सहदेव तथा वीरपुत्रोंको जन्म देनेवाली हमारी बूढ़ी माता कुन्ती—ये सब-के-सब आपका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर ही मूर्खों और गूँगोंकी भाँति चुप रहते हैं॥ १४॥ सर्वे ते प्रियमिच्छन्ति बान्धवाः सह सृञ्जयैः। अहमेकश्च संतप्तो माता च प्रतिविन्ध्यतः॥ १५॥ आपके सभी बन्धु-बान्धव और सृंजयवंशी योद्धा भी आपका प्रिय करना चाहते हैं। केवल हम दो व्यक्तियोंको ही विशेष कष्ट है। एक तो मैं संतप्त होता हूँ और दूसरी प्रतिविन्ध्यकी माता द्रौपदी॥ १५॥ प्रियमेव तु सर्वेषां यद् ब्रवीम्युत किंचन। सर्वे हि व्यसनं प्राप्ताः सर्वे युद्धाभिनन्दिनः॥ १६॥ मैं जो कुछ कहता हूँ, वह सबको प्रिय है। हम सब लोग संकटमें पड़े हैं और सभी युद्धका अभिनन्दन करते हैं॥ १६॥ नातः पापीयसी काचिदापद् राजन् भविष्यति। यन्नो नीचैरल्पबलै राज्यमाच्छिद्य भुज्यते॥ १७॥ राजन्! इससे बढ़कर अत्यन्त दुःखदायिनी विपत्ति और क्या होगी कि नीच और दुर्बल शत्रु हम बलवानोंका राज्य छीनकर उसका उपभोग कर रहे हैं॥ १७॥ शीलदोषाद् घृणाविष्ट आनृशंस्यात् परंतप। क्लेशांस्तितिक्षसे राजन् नान्यः कश्चित् प्रशंसति॥ १८॥ परंतप युधिष्ठिर! आप शील-स्वभावके दोष और कोमलतासे एवं दयाभावसे युक्त होनेके कारण इतने क्लेश सह रहे हैं, परंतु महाराज! इसके लिये आपकी कोई प्रशंसा नहीं करता है॥ १८॥ श्रोत्रियस्येव ते राजन् मन्दकस्याविपश्चितः। अनुवाकहता बुद्धिर्नैषा तत्त्वार्थदर्शिनी॥ १९॥ राजन्! आपकी बुद्धि अर्थज्ञानसे रहित वेदोंके अक्षरमात्रको रटनेवाले मन्दबुद्धि श्रोत्रियकी तरह केवल गुरुकी वाणीका अनुसरण करनेके कारण नष्ट हो गयी है। यह तात्त्विक अर्थको समझने या समझानेवाली नहीं है॥ १९॥ घृणी ब्राह्मणरूपोऽसि कथं क्षत्रेऽभ्यजायथाः। अस्यां हि योनौ जायन्ते प्रायशः क्रूरबुद्धयः॥ २०॥ आप दयालु ब्राह्मणरूप हैं। पता नहीं, क्षत्रियकुलमें कैसे आपका जन्म हो गया; क्योंकि क्षत्रिय योनिमें तो प्रायः क्रूर बुद्धिके ही पुरुष उत्पन्न होते हैं॥ २०॥ अश्रौषीस्त्वं राजधर्मान् यथा वै मनुरब्रवीत्।
क्रूरान् निकृतिसम्पन्नान् विहितानशमात्मकान् ।। २१ ।।
धार्तराष्ट्रान् महाराज क्षमसे किं दुरात्मनः ।
कर्तव्ये पुरुषव्याघ्र किमास्से पीठसर्पवत् ।। २२ ।।
बुद्ध्या वीर्येण संयुक्तः श्रुतेनाभिजनेन च ।
महाराज! आपने राजधर्मका वर्णन तो सुना ही होगा, जैसा मनुजीने कहा है। फिर क्रूर, मायावी, हमारे हितके विपरीत आचरण करनेवाले तथा अशान्तचित्तवाले दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंका अपराध आप क्यों क्षमा करते हैं? पुरुषसिंह! आप बुद्धि, पराक्रम, शास्त्रज्ञान तथा उत्तम कुलसे सम्पन्न होकर भी जहाँ कुछ काम करना है, वहाँ अजगरकी भाँति चुपचाप क्यों बैठे हैं? ।। २१-२२ १/२ ।।
तृणानां मुष्टिनैकेन हिमवन्तं च पर्वतम् ।। २३ ।।
छन्नमिच्छसि कौन्तेय योऽस्मान् संवर्तुमिच्छसि ।
कुन्तीनन्दन! आप अज्ञातवासके समय जो हम-लोगोंको छिपाकर रखना चाहते हैं, इससे जान पड़ता है कि आप एक मुट्ठी तिनकेसे हिमालय पर्वतको ढक देना चाहते हैं ।। २३ १/२ ।।
अज्ञातचर्या गूढेन पृथिव्यां विश्रुतेन च ।। २४ ।।
दिवीव पार्थ सूर्येण न शक्याचरितुं त्वया ।
पार्थ! आप इस भूमण्डलमें विख्यात हैं, जैसे सूर्य आकाशमें छिपकर नहीं रह सकते, उसी प्रकार आप भी कहीं छिपे रहकर अज्ञातवासका नियम नहीं पूरा कर सकते ।। २४ १/२ ।।
बृहच्छाल इवानूपे शाखापुष्पपलाशवान् ।। २५ ।।
हस्ती श्वेत इवाज्ञातः कथं जिष्णुश्चरिष्यति ।
जहाँ जलकी अधिकता हो, ऐसे प्रदेशमें शाखा, पुष्प और पत्तोंसे सुशोभित विशाल शालवृक्षके समान अथवा श्वेत गजराज ऐरावतके सदृश ये अर्जुन कहीं भी अज्ञात कैसे रह सकेंगे? ।। २५ १/२ ।।
इमौ च सिंहसंकाशौ भ्रातरौ सहितौ शिशू ।। २६ ।।
नकुलः सहदेवश्च कथं पार्थ चरिष्यतः ।
कुन्तीकुमार! ये दोनों भाई बालक नकुल-सहदेव सिंहके समान पराक्रमी हैं। ये दोनों कैसे छिपकर विचर सकेंगे? ।। २६ १/२ ।।
पुण्यकीर्ती राजपुत्री द्रौपदी वीरसूरियम् ।। २७ ।।
विश्रुता कथमज्ञाता कृष्णा पार्थ चरिष्यति ।
पार्थ! यह वीरजननी पवित्रकीर्ति राजकुमारी द्रौपदी सारे संसारमें विख्यात है। भला, यह अज्ञातवासके नियम कैसे निभा सकेगी ।। २७ १/२ ।।
मां चापि राजञ्जानन्ति ह्याकुमारमिमाः प्रजाः ॥ २८ ॥ नाज्ञातचर्यां पश्यामि मेरोरिव निगूहनम् । महाराज! मुझे भी प्रजावर्गके बच्चेतक पहचानते हैं, जैसे मेरुपर्वतको छिपाना असम्भव है, उसी प्रकार मुझे अपनी अज्ञातचर्या भी सम्भव नहीं दिखायी देती ॥ २८ १/२ ॥ तथैव बहवोऽस्माभी राष्ट्रेभ्यो विप्रवासिताः ॥ २९ ॥ राजानो राजपुत्राश्च धृतराष्ट्रमनुव्रताः । न हि तेऽप्युपशाम्यन्ति निकृता वा निराकृताः ॥ ३० ॥ राजन्! इसके सिवा एक बात और है, हमलोगोंने भी बहुत-से राजाओं तथा राजकुमारोंको उनके राज्यसे निकाल दिया है। वे सब आकर राजा धृतराष्ट्रसे मिल गये होंगे, हमने जिनको राज्यसे वंचित किया अथवा निकाला है, वे कदापि हमारे प्रति शान्तभाव नहीं धारण कर सकते ॥ २९-३० ॥ अवश्यं तैर्निकर्तव्यमस्माकं तत्प्रियैषिभिः । तेऽप्यस्मासु प्रयुञ्जीरन् प्रच्छन्नान् सुबहूञ्छरान् । आचक्षीरंश्च नो ज्ञात्वा ततः स्यात् सुमहद् भयम् ॥ ३१ ॥ अवश्य ही दुर्योधनका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर वे राजालोग भी हमलोगोंको धोखा देना उचित समझकर हमलोगोंकी खोज करनेके लिये बहुत-से छिपे हुए गुप्तचर नियुक्त करेंगे और पता लग जानेपर निश्चय ही दुर्योधनको सूचित कर देंगे। उस दशामें हमलोगोंपर बड़ा भारी भय उपस्थित हो जायगा ॥ ३१ ॥ अस्माभिरुषिताः सम्यग्वने मासास्त्रयोदश । परिमाणेन तान् पश्य तावतः परिवत्सरान् ॥ ३२ ॥ हमने अबतक वनमें ठीक-ठीक तेरह महीने व्यतीत कर लिये हैं, आप इन्हींको परिमाणमें तेरह वर्ष समझ लीजिये ॥ ३२ ॥ अस्ति मासः प्रतिनिधिर्यथा प्राहुर्मनीषिणः । पूतिकामिव सोमस्य तथेदं क्रियतामिति ॥ ३३ ॥ मनीषी पुरुषोंका कहना है कि मास संवत्सरका प्रतिनिधि है। जैसे पूतिका सोमलताके स्थानपर यज्ञमें काम देती है, उसी प्रकार आप इन तेरह मासोंको ही तेरह वर्षोंका प्रतिनिधि स्वीकार कर लीजिये ॥ ३३ ॥ अथवानडुहे राजन् साधवे साधुवाहिने । सौहित्यदानादेतस्मादेनसः प्रतिमुच्यते ॥ ३४ ॥ राजन्! अथवा अच्छी तरह बोझ ढोनेवाले उत्तम बैलको भरपेट भोजन दे देनेपर इस पापसे आपको छुटकारा मिल सकता है ॥ ३४ ॥ तस्माच्छत्रुवधे राजन् क्रियतां निश्चयस्त्वया । क्षत्रियस्य हि सर्वस्य नान्यो धर्मोऽस्ति संयुगात् ॥ ३५ ॥