महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
'पतिदेवके बिना किसी भी स्थानमें अकेली रहना मुझे बिलकुल पसंद नहीं है। मेरे स्वामी जब कभी कुटुम्बके कार्यसे कभी परदेश चले जाते हैं, उन दिनों मैं फूलोंका शृंगार नहीं धारण करती, अंगराग नहीं लगाती और निरन्तर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करती हूँ ।। ३० १/२ ।।
यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न सेवते ।। ३१ ।। यच्च नाश्नाति मे भर्ता सर्वं तद् वर्जयाम्यहम् । 'मेरे पतिदेव जिस चीजको नहीं खाते, नहीं पीते अथवा नहीं सेवन करते, वह सब मैं भी त्याग देती हूँ ।। ३१ १/२ ।।
यथोपदेशं नियता वर्तमाना वराङ्गने ।। ३२ ।। स्वलंकृता सुप्रयता भर्तुः प्रियहिते रता । ये च धर्माः कुटुम्बेषु श्वश्र्वा मे कथिताः पुरा ।। ३३ ।। (अनुतिष्ठामि तत् सर्वं नित्यकालमतन्द्रिता ।।) 'सुन्दरी! शास्त्रोंमें स्त्रियोंके लिये जिन कर्तव्योंका उपदेश किया गया है, उन सबका मैं नियमपूर्वक पालन करती हूँ। अपने अंगोंको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित रखकर पूरी सावधानीके साथ मैं पतिके प्रिय एवं हित-साधनमें संलग्न रहती हूँ। मेरी सासने अपने परिवारके लोगोंके साथ बर्तावमें लानेयोग्य जो धर्म पहले मुझे बताये थे, उन सबका मैं निरन्तर आलस्यरहित होकर पालन करती हूँ ।। ३२-३३ ।।
भिक्षाबलिश्राद्धमिति स्थालीपाकांश्च पर्वसु । मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मम ।। ३४ ।। तान् सर्वाननुवर्तेऽहं दिवारात्रमतन्द्रिता । विनयान् नियमांश्चैव सदा सर्वात्मना श्रिता ।। ३५ ।। 'मैं दिन-रात आलस्य त्यागकर भिक्षा-दान, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध, पर्वकालोचित स्थालीपाकयज्ञ, मान्य पुरुषोंका आदर-सत्कार, विनय, नियम तथा अन्य जो-जो धर्म मुझे ज्ञात हैं, उन सबका सब प्रकारसे उद्यत होकर पालन करती हूँ ।। ३४-३५ ।।
मृदून् सतः सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालिनः । आशीविषानिव क्रुद्धान् पतीन् परिचराम्यहम् ।। ३६ ।। 'मेरे पति बड़े ही सज्जन और मृदुल स्वभावके हैं। सत्यवादी तथा सत्यधर्मका निरन्तर पालन करनेवाले हैं; तथापि क्रोधमें भरे हुए विषैले सर्पोंसे जिस प्रकार लोग डरते हैं, उसी प्रकार मैं अपने पतियोंसे डरती हुई उनकी सेवा करती हूँ ।। ३६ ।।
पत्याश्रयो हि मे धर्मो मतः स्त्रीणां सनातनः । स देवः सा गतिर्नान्या तस्य का विप्रियं चरेत् ।। ३७ ।। 'मैं यह मानती हूँ कि पतिके आश्रयमें रहना ही स्त्रियोंका सनातन धर्म है। पति ही उनका देवता है और पति ही उनकी गति है। पतिके सिवा नारीका दूसरा कोई सहारा नहीं
है, ऐसे पतिदेवताका भला कौन स्त्री अप्रिय करेगी? ।। ३७ ।। अहं पतीन् नातिशये नात्यश्ने नातिभूषये । नापि श्वश्रूं परिवदे सर्वदा परियन्त्रिता ॥ ३८ ॥ 'पतियोंके शयन करनेसे पहले मैं कभी शयन नहीं करती, उनसे पहले भोजन नहीं करती, उनकी इच्छाके विरुद्ध कोई आभूषण नहीं पहनती, अपनी सासकी कभी निन्दा नहीं करती और अपने-आपको सदा नियन्त्रणमें रखती हूँ ।। ३८ ।। अवधानेन सुभगे नित्यमुत्थिततयैव च । भर्तारो वशगा मह्यं गुरुशुश्रूषयैव च ॥ ३९ ॥ 'सौभाग्यशालिनी सत्यभामे! मैं सावधानीसे सर्वदा सबेरे उठकर समुचित सेवाके लिये सन्नद्ध रहती हूँ। गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषासे ही मेरे पति मेरे अनुकूल रहते हैं ।। ३९ ।। नित्यमार्यामहं कुन्तीं वीरसूं सत्यवादिनीम् । स्वयं परिचराम्येतां पानाच्छादनभोजनैः ॥ ४० ॥ 'मैं वीरजननी सत्यवादिनी आर्या कुन्तीदेवीकी भोजन, वस्त्र और जल आदिसे सदा स्वयं सेवा करती रहती हूँ ।। ४० ।। नैतामतिशये जातु वस्त्रभूषणभोजनैः । नापि परिवदे चाहं तां पृथां पृथिवीसमाम् ॥ ४१ ॥ 'वस्त्र, आभूषण और भोजन आदिमें मैं कभी सासकी अपेक्षा अपने लिये कोई विशेषता नहीं रखती। मेरी सास कुन्तीदेवी पृथ्वीके समान क्षमाशील हैं। मैं कभी उनकी निन्दा नहीं करती ।। ४१ ।। अष्टावग्रे ब्राह्मणानां सहस्राणि स्म नित्यदा । भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ४२ ॥ 'पहले महाराज युधिष्ठिरके महलमें प्रतिदिन आठ हजार ब्राह्मण सोनेकी थालियोंमें भोजन किया करते थे ।। ४२ ।। अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः । त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ॥ ४३ ॥ 'महाराज युधिष्ठिरके यहाँ अठासी हजार ऐसे स्नातक गृहस्थ थे, जिनका वे भरण-पोषण करते थे। उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दासियाँ रहती थीं ।। ४३ ।। दशान्यानि सहस्राणि येषामन्नं सुसंस्कृतम् । ह्रियते रुक्मपात्रीभिर्यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ४४ ॥ 'इनके सिवा दूसरे दस हजार और ऊर्ध्वरेता यति उनके यहाँ रहते थे, जिनके लिये सुन्दर ढंगसे तैयार किया हुआ अन्न सोनेकी थालियोंमें परोसकर पहुँचाया जाता था ।। ४४ ।। तान् सर्वानग्रहारेण ब्राह्मणान् वेदवादिनः ।
यथार्हं पूजयामि स्म पानाच्छादनभोजनैः ॥ ४५ ॥ ‘मैं उन सब वेदवादी ब्राह्मणोंको अग्रहार (बलिवैश्वदेवके अन्तमें अतिथिको दिये जानेवाले प्रथम अन्न)-का अर्पण करके भोजन, वस्त्र और जलके द्वारा उनकी यथायोग्य पूजा करती थी’ ॥ ४५ ॥
शतं दासीसहस्राणि कौन्तेयस्य महात्मनः । कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलङ्कृताः ॥ ४६ ॥ ‘कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके एक लाख दासियाँ थीं, जो हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ, भुजाओंमें बाजूबंद और कण्ठमें सुवर्णके हार पहनकर बड़ी सजधजके साथ रहती थीं’ ॥ ४६ ॥
महार्हमाल्याभरणाः सुवर्णाश्चन्दनोक्षिताः । मणीन् हेम च बिभ्रत्यो नृत्यगीतविशारदाः ॥ ४७ ॥ ‘उनकी मालाएँ तथा आभूषण बहुमूल्य थे, अंगकान्ति बड़ी सुन्दर थी। वे चन्दनमिश्रित जलसे स्नान करती और चन्दनका ही अंगराग लगाती थीं, मणि तथा सुवर्णके गहने पहना करती थीं। नृत्य और गीतकी कलामें उनका कौशल देखने ही योग्य था’ ॥ ४७ ॥
तासां नाम च रूपं च भोजनाच्छादनानि च । सर्वासामेव वेदाहं कर्म चैव कृताकृतम् ॥ ४८ ॥ ‘उन सबके नाम, रूप तथा भोजन-आच्छादन आदि सभी बातोंकी मुझे जानकारी रहती थी। किसने क्या काम किया और क्या नहीं किया? यह बात भी मुझसे छिपी नहीं रहती थी’ ॥ ४८ ॥
शतं दासीसहस्राणि कुन्तीपुत्रस्य धीमतः । पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत ॥ ४९ ॥ ‘बुद्धिमान् कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी पूर्वोक्त एक लाख दासियाँ हाथोंमें (भोजनसे भरी हुई) थाली लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन कराती थीं’ ॥ ४९ ॥
शतमश्वसहस्राणि दशनागायुतानि च । युधिष्ठिरस्यानुयात्रमिन्द्रप्रस्थनिवासिनः ॥ ५० ॥ एतदासीत् तदा राज्ञो यन्महीं पर्यपालयत् । येषां संख्याविधिं चैव प्रदिशामि शृणोमि च ॥ ५१ ॥ ‘जिन दिनों महाराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थमें रहकर इस पृथ्वीका पालन करते थे, उस समय प्रत्येक यात्रामें उनके साथ एक लाख घोड़े और एक लाख हाथी चलते थे। मैं ही उनकी गणना करती, आवश्यक वस्तुएँ देती और उनकी आवश्यकताएँ सुनती थी’ ॥ ५०-५१ ॥
अन्तःपुराणां सर्वेषां भृत्यानां चैव सर्वशः । आगोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ॥ ५२ ॥
'अन्तःपुरके, नौकरोंके तथा ग्वालों और गड़रियोंसे लेकर समस्त सेवकोंके सभी कार्योंकी देखभाल मैं ही करती थी और किसने क्या काम किया अथवा कौन काम अधूरा रह गया—इन सब बातोंकी जानकारी भी रखती थी ।। ५२ ।।
सर्वं राज्ञः समुदायमायं च व्ययमेव च ।
एकाहं वेद्मि कल्याणि पाण्डवानां यशस्विनि ।। ५३ ।।
'कल्याणी एवं यशस्विनी सत्यभामे! महाराज तथा अन्य पाण्डवोंको जो कुछ आय, व्यय और बचत होती थी, उस सबका हिसाब मैं अकेली ही रखती और जानती थी ।। ५३ ।।
मयि सर्वं समासज्य कुटुम्बं भरतर्षभाः ।
उपासनरताः सर्वे घटयन्ति वरानने ।। ५४ ।।
'वरानने! भरतश्रेष्ठ पाण्डव कुटुम्बका सारा भार मुझपर ही रखकर उपासनामें लगे रहते और तदनुरूप चेष्टा करते थे ।। ५४ ।।
तमहं भारमासक्तमनाधृष्यं दुरात्मभिः ।
सुखं सर्वं परित्यज्य रात्र्यहानि घटामि वै ।। ५५ ।।
'मुझपर जो भार रखा गया था, उसे दुष्ट स्वभावके स्त्री-पुरुष नहीं उठा सकते थे। परंतु मैं सब प्रकारका सुख-भोग छोड़कर रात-दिन उस दुर्बह भारको वहन करनेकी चेष्टा किया करती थी ।। ५५ ।।
अधृष्यं वरुणस्येव निधिपूर्णमिवोदधिम् ।
एकाहं वेद्मि कोशं वै पतीनां धर्मचारिणाम् ।। ५६ ।।
'मेरे धर्मात्मा पतियोंका भरा-पूरा खजाना वरुणके भण्डार और परिपूर्ण महासागरके समान अक्षय एवं अगम्य था। केवल मैं ही उनके विषयकी ठीक जानकारी रखती थी ।। ५६ ।।
अनिशायां निशायां च सहा या क्षुत्पिपासयोः ।
आराधयन्त्याः कौरव्यांस्तुल्या रात्रिरहश्च मे ।। ५७ ।।
'रात हो या दिन, मैं सदा भूख-प्यासके कष्ट सहन करके निरन्तर कुरुकुलरत्न पाण्डवोंकी आराधनामें लगी रहती थी। इससे मेरे लिये दिन और रात समान हो गये थे ।। ५७ ।।
प्रथमं प्रतिबुध्यामि चरमं संविशामि च ।
नित्यकालमहं सत्ये एतत् संवननं मम ।। ५८ ।।
'सत्ये! मैं प्रतिदिन सबसे पहले उठती और सबसे पीछे सोती थी। यह पतिभक्ति और सेवा ही मेरा वशीकरण मन्त्र है ।। ५८ ।।
एतज्जानाम्यहं कर्तुं भर्तृसंवननं महत् ।
असत्स्त्रीणां समाचारं नाहं कुर्यां न कामये ।। ५९ ।।
‘पतिको वशमें करनेका यही सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय मैं जानती हूँ। दुराचारिणी स्त्रियाँ जिन उपायोंका अवलम्बन करती हैं, उन्हें न तो मैं करती हूँ और न चाहती ही हूँ’ ॥ ५९ ॥
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा धर्मसहितं व्याहृतं कृष्णया तदा ।
उवाच सत्या सत्कृत्य पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् ॥ ६० ॥
अभिपन्नास्मि पाञ्चालि याज्ञसेनि क्षमस्व मे ।
कामकारः सखीनां हि सोपहासं प्रभाषितम् ॥ ६१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! द्रौपदीकी ये धर्मयुक्त बातें सुनकर सत्यभामाने उस धर्मपरायणा पाञ्चालीका समादर करते हुए कहा—‘पाञ्चालराजकुमारी! याज्ञसेनी! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ; (मैंने जो अनुचित प्रश्न किया है), उसके लिये मुझे क्षमा कर दो। सखियोंमें परस्पर स्वेच्छापूर्वक ऐसी हास-परिहासकी बातें हो जाया करती हैं’ ॥ ६०-६१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि
त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामा-संवादपर्वमें दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं)
२३४-
चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय—पतिकी अनन्यभावसे सेवा
द्रौपद्युवाच
इमं तु ते मार्गमपेतमोहं
वक्ष्यामि चित्तग्रहणाय भर्तुः ।
अस्मिन् यथावत् सखि वर्तमाना
भर्तारमाच्छेत्स्यसि कामिनीभ्यः ॥ १ ॥
द्रौपदी बोली— सखी! मैं स्वामीके मनका आकर्षण करनेके लिये तुम्हें एक ऐसा मार्ग बता रही हूँ, जिसमें भ्रम अथवा छल-कपटके लिये तनिक भी स्थान नहीं है। यदि तुम यथावत्रूपसे इसी पथपर चलती रहोगी तो स्वामीके चित्तको अपनी सौतोंसे हटाकर अपनी ओर अवश्य खींच सकोगी ॥ १ ॥
नैतादृशं दैवतमस्ति सत्ये
सर्वेषु लोकेषु सदेवकेषु ।
यथा पतिस्तस्य तु सर्वकामा
लभ्याः प्रसादात् कुपितश्च हन्यात् ॥ २ ॥
सत्ये! स्त्रियोंके लिये देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें पतिके समान दूसरा कोई देवता नहीं है। पतिके प्रसादसे नारीकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं, और यदि पति ही कुपित हो जाय तो वह नारीकी सभी आशाओंको नष्ट कर सकता है ॥ २ ॥
तस्मादपत्यं विविधाश्च भोगाः
शय्यासनान्युत्तमदर्शनानि ।
वस्त्राणि माल्यानि तथैव गन्धाः
स्वर्गश्च लोको विपुला च कीर्तिः ॥ ३ ॥
सेवाद्वारा प्रसन्न किये हुए पतिसे स्त्रियोंको (उत्तम) संतान, भाँति-भाँतिके भोग, शय्या, आसन, सुन्दर दिखायी देनेवाले वस्त्र, माला, सुगन्धित पदार्थ, स्वर्गलोक तथा महान् यशकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥
सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं
दुःखेन साध्वी लभते सुखानि ।
सा कृष्णमाराधय सौहृदेन
प्रेम्णा च नित्यं प्रतिकर्मणा च ॥ ४ ॥
तथाऽऽसनैश्चारुभिरग्रमाल्यै- दाक्षिण्ययोगैर्विविधैश्च गन्धैः । अस्याः प्रियोऽस्मीति यथा विदित्वा त्वामेव संश्लिष्यति तद् विधत्स्व ॥ ५ ॥
सखी! इस जगत्में कभी सुखके द्वारा सुख नहीं मिलता। पतिव्रता स्त्री दुःख उठाकर ही सुख पाती है। तुम सौहार्द, प्रेम, सुन्दर वेश-भूषा-धारण, सुन्दर आसन-समर्पण, मनोहर पुष्पमाला, उदारता, सुगन्धित द्रव्य एवं व्यवहारकुशलतासे श्यामसुन्दरकी निरन्तर आराधना करती रहो। उनके साथ ऐसा बर्ताव करो, जिससे वे यह समझकर 'कि सत्यभामाको मैं ही अधिक प्रिय हूँ' तुम्हें ही हृदयसे लगाया करें ॥ ४-५ ॥
श्रुत्वा स्वरं द्वारगतस्य भर्तुः प्रत्युत्थिता तिष्ठ गृहस्य मध्ये । दृष्ट्वा प्रविष्टं त्वरिताऽऽसनेन पाद्येन चैनं प्रतिपूजयस्व ॥ ६ ॥
जब महलके द्वारपर पधारे हुए प्राणवल्लभका स्वर सुनायी पड़े, तब तुम उठकर घरके आँगनमें आ जाओ और उनकी प्रतीक्षामें खड़ी रहो। जब देखो कि वे भीतर आ गये, तब तुरंत आसन और पाद्यके द्वारा उनका यथावत् पूजन करो ॥ ६ ॥
सम्प्रेषितायामथ चैव दास्या- मुत्थाय सर्वं स्वयमेव कार्यम् । जानातु कृष्णस्तव भावमेतं सर्वात्मना मां भजतीति सत्ये ॥ ७ ॥
सत्ये! यदि श्यामसुन्दर किसी कार्यके लिये दासीको भेजते हों तो तुम्हें स्वयं उठकर वह सब काम कर लेना चाहिये; जिससे श्रीकृष्णको तुम्हारे इस सेवा-भावका अनुभव हो जाय कि सत्यभामा सम्पूर्ण हृदयसे मेरी सेवा करती है ॥ ७ ॥
त्वत्संनिधौ यत् कथयेत् पतिस्ते यद्यप्यगुह्यं परिरक्षितव्यम् । काचित् सपत्नी तव वासुदेवं प्रत्यादिशेत् तेन भवेद् विरागः ॥ ८ ॥
तुम्हारे पति तुम्हारे निकट जो भी बात कहें, वह छिपानेयोग्य न हो, तो भी तुम्हें उसे गुप्त ही रखना चाहिये। अन्यथा तुम्हारे मुखसे उस बातको सुनकर यदि कोई सौत उसे श्यामसुन्दरके सामने कह दे, तो इससे उनके मनमें तुम्हारी ओरसे विरक्ति हो सकती है ॥ ८ ॥
प्रियांश्च रक्तांश्च हितांश्च भर्तु- स्तान् भोजयेथा विविधैरुपायैः ।
द्वेष्यैरुपेक्ष्यैरहितैश्च तस्य भिद्यस्व नित्यं कुहकोद्यतैश्च ॥ ९ ॥ पतिदेवके जो प्रिय, अनुरक्त एवं हितैषी सुहृद् हों, उन्हें तरह-तरहके उपायोंसे खिलाओ-पिलाओ तथा जो उनके शत्रु, उपेक्षणीय और अहितकारक हों अथवा जो उनसे छल-कपट करनेके लिये उद्यत रहते हों; उनसे सदा दूर रहो ॥ ९ ॥
मदं प्रमादं पुरुषेषु हित्वा संयच्छ भावं प्रतिगृह्य मौनम् । प्रद्युम्नसाम्बावपि ते कुमारौ नोपासितव्यौ रहिते कदाचित् ॥ १० ॥ दूसरे पुरुषोंके समीप घमंड और प्रमादका परित्याग करके मौन रहकर अपने मनोभावको प्रकट न होने दो। कुमार प्रद्युम्न और साम्ब यद्यपि तुम्हारे पुत्र हैं, तथापि तुम्हें एकान्तमें कभी उनके पास भी नहीं बैठना चाहिये ॥ १० ॥
महाकुलीनाभिरपापिकाभिः स्त्रीभिः सतीभिस्तव सख्यमस्तु । चण्डाश्च शौण्डाश्च महाशनाश्च चौराश्च दुष्टाश्चपलाश्च वर्ज्याः ॥ ११ ॥ अत्यन्त ऊँचे कुलमें उत्पन्न और पापाचारसे दूर रहनेवाली सती स्त्रियोंके साथ ही तुम्हें सखीभाव स्थापित करना चाहिये। जो अत्यन्त क्रोधी, नशेमें चूर रहनेवाली, अधिक खानेवाली, चोरीकी लत रखनेवाली, दुष्ट और चञ्चल स्वभावकी स्त्रियाँ हों, उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ११ ॥
एतद् यशस्यं भगदैवतं च स्वार्थ्यं तथा शत्रुनिबर्हणं च । महार्हमाल्याभरणाङ्गरागा भर्तारमाराधय पुण्यगन्धा ॥ १२ ॥ तुम बहुमूल्य हार, आभूषण और अंगराग धारण करके पवित्र सुगन्धित वस्तुओंसे सुवासित हो अपने प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी आराधना करो। इससे तुम्हारे यश और सौभाग्यकी वृद्धि होगी। तुम्हारे मनोरथकी सिद्धि तथा शत्रुओंका नाश होगा ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि द्रौपदीकर्तव्यकथने चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वमें द्रौपदीद्वारा स्त्रीकर्तव्यकथनविषयक दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३४ ॥
कथाभिरनुकूलाभिः सह स्थित्वा जनार्दनः ॥ १ ॥
पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
सत्यभामाका द्रौपदीको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैः पाण्डवैश्च महात्मभिः ।
कथाभिरनुकूलाभिः सह स्थित्वा जनार्दनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय भगवान् श्रीकृष्ण मार्कण्डेय आदि ब्रह्मर्षियों तथा महात्मा पाण्डवोंके साथ अनुकूल बातें करते हुए कुछ कालतक वहाँ रहकर (द्वारका जानेको उद्यत हुए) ॥ १ ॥
ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः ।
आरुरुक्षू रथं सत्यामाह्वयामास केशवः ॥ २ ॥
मधुसूदन केशवने उन सबसे यथावत् वार्तालापके अनन्तर विदा लेकर रथपर चढ़नेकी इच्छासे सत्यभामाको बुलाया ॥ २ ॥
सत्यभामा ततस्तत्र स्वजित्वा द्रुपदात्मजाम् ।
उवाच वचनं हृद्यं यथाभावं समाहितम् ॥ ३ ॥
तब सत्यभामा वहाँ द्रुपदकुमारीसे गले मिलकर अपने हार्दिक भावके अनुसार एकाग्रतापूर्वक मधुर वचन बोली— ॥ ३ ॥
कृष्णे मा भूत् तवोत्कण्ठा मा व्यथा मा प्रजागरः ।
भर्तृभिर्देवसंकाशैर्जितां प्राप्स्यसि मेदिनीम् ॥ ४ ॥
‘सखी कृष्णे! तुम्हें राज्यके लिये चिन्तित और व्यथित नहीं होना चाहिये। तुम इस प्रकार रात-रातभर जागना छोड़ दो। तुम्हारे देवतुल्य पतियोंद्वारा जीती हुई इस पृथ्वीका राज्य तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा ॥ ४ ॥
न ह्येवं शीलसम्पन्ना नैवं पूजितलक्षणाः ।
प्राप्नुवन्ति चिरं क्लेशं यथा त्वमसितेक्षणे ॥ ५ ॥
‘श्यामलोचने! तुम्हें जैसा क्लेश सहन करना पड़ा है, वैसा कष्ट तुम्हारे-जैसी सुशीला तथा श्रेष्ठ लक्षणोंवाली देवियाँ अधिक दिनोंतक नहीं भोगा करती हैं ॥ ५ ॥
अवश्यं च त्वया भूमिरियं निहतकण्टका ।
भर्तृभिः सह भोक्तव्या निर्द्वन्द्वेति श्रुतं मया ॥ ६ ॥
‘मैंने (महात्माओंसे) सुना है कि तुम अपने पतियोंके साथ निश्चय ही इस पृथ्वीका निर्द्वन्द्व तथा निष्कण्टक राज्य भोगोगी ॥ ६ ॥
धार्तराष्ट्रवधं कृत्वा वैराणि प्रतियात्य च ।
युधिष्ठिरस्थां पृथिवीं द्रक्ष्यसि द्रुपदात्मजे ॥ ७ ॥
‘द्रुपदकुमारी! तुम शीघ्र ही देखोगी कि धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारकर और पहलेके वैरका भरपूर बदला चुकाकर तुम्हारे पतियोंने विजय पायी है और इस पृथ्वीपर महाराज युधिष्ठिरका अधिकार हो गया है।। ७।। यास्ताः प्रव्रजमानां त्वां प्राहसन् दर्पमोहिताः । ताः क्षिप्रं हतसंकल्पा द्रक्ष्यसि त्वं कुरुस्त्रियः ।। ८ ।। ‘तुम्हारे वन जाते समय अभिमानसे मोहित हो कुरुकुलकी जिन स्त्रियोंने तुम्हारी हँसी उड़ायी थी, उनकी आशाओंपर पानी फिर जायगा और तुम उन्हें शीघ्र ही दुरवस्थामें पड़ी हुई देखोगी ।। ८ ।। तव दुःखोपपन्नाया यैराचरितमप्रियम् । विद्धि सम्प्रस्थितान् सर्वान्स्तान् कृष्णे यमसादनम् ।। ९ ।। ‘कृष्णे! तुम दुःखमें पड़ी हुई थी, उस दशामें जिन लोगोंने तुम्हारा अप्रिय किया है, उन सबको तुम यमलोकमें गया हुआ ही समझो ।। ९ ।। पुत्रस्ते प्रतिविन्ध्यश्च सुतसोमस्तथाविधः । श्रुतकर्मार्जुनिश्चैव शतानीकश्च नाकुलिः ।। १० ।। सहदेवाच्च यो जातः श्रुतसेनस्तवात्मजः । सर्वे कुशलिनो वीराः कृतास्त्राश्च सुतास्तव ।। ११ ।। ‘युधिष्ठिरकुमार प्रतिविन्ध्य, भीमसेननन्दन सुतसोम, अर्जुनकुमार श्रुतकर्मा, नकुलनन्दन शतानीक तथा सहदेवकुमार श्रुतसेन—तुम्हारे ये सभी वीर पुत्र शस्त्रविद्यामें निपुण हो गये हैं और कुशलपूर्वक द्वारकापुरीमें रहते हैं ।। १०-११ ।। अभिमन्युरिव प्रीता द्वारवत्यां रता भृशम् । त्वमिवैषां सुभद्रा च प्रीत्या सर्वात्मना स्थिता ।। १२ ।। ‘वे सबके सब अभिमन्युकी भाँति बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ रहते हैं। द्वारकामें उनका मन बहुत लगता है। सुभद्रादेवी तुम्हारी ही तरह उन सबके साथ सब प्रकारसे प्रेमपूर्ण बर्ताव करती हैं ।। १२ ।। प्रीयते तव निर्द्वन्द्वा तेभ्यश्च विगतज्वरा । दुःखिता तेन दुःखेन सुखेन सुखिता तथा ।। १३ ।। ‘वे किसीके प्रति भेदभाव न रखकर उन सबके प्रति निश्छल स्नेह रखती हैं। वे उन बालकोंके दुःखसे ही दुःखी और उन्हींके सुखसे सुखी होती हैं ।। १३ ।। भजेत् सर्वात्मना चैव प्रद्युम्नजननी तथा । भानुप्रभृतिभिश्चैनान् विशिनष्टि च केशवः ।। १४ ।। ‘प्रद्युम्नकी माताजी भी उनकी सब प्रकारसे सेवा और देखभाल करती हैं। श्यामसुन्दर अपने भानु आदि पुत्रोंसे भी बढ़कर तुम्हारे पुत्रोंको मानते हैं ।। १४ ।। भोजनाच्छादने चैषां नित्यं मे श्वशुरः स्थितः ।
रामप्रभृतयः सर्वे भजन्त्यन्धकवृष्णयः ॥ १५ ॥
‘मेरे श्वशुरजी प्रतिदिन इनके भोजन-वस्त्र आदिकी समुचित व्यवस्थापर दृष्टि रखते हैं। बलरामजी आदि सभी अन्धकवंशी तथा वृष्णिवंशी यादव उनकी सुख-सुविधाका ध्यान रखते हैं ॥ १५ ॥
तुल्यो हि प्रणयस्तेषां प्रद्युम्नस्य च भाविनि ।
एवमादि प्रियं सत्यं हृद्यमुक्तवा मनोऽनुगम् ॥ १६ ॥
गमनाय मनश्चक्रे वासुदेवरथं प्रति ।
तां कृष्णां कृष्णमहिषी चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥ १७ ॥
‘भामिनि! उन सबका और प्रद्युम्नका भी तुम्हारे पुत्रोंपर समान प्रेम है।’ इस प्रकार हृदयको प्रिय लगनेवाले, सत्य एवं मनके अनुकूल वचन कहकर श्रीकृष्णमहिषी सत्यभामाने अपने स्वामीके रथकी ओर जानेका विचार किया और द्रौपदीकी परिक्रमा की ॥ १६-१७ ॥
आरुरोह रथं शौरेः सत्यभामाथ भामिनी ।
स्मयित्वा तु यदुश्रेष्ठो द्रौपदीं परिसान्त्व्य च ।
उपावर्त्य ततः शीघ्रैर्हयैः प्रायात् पुरं स्वकम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भामिनी सत्यभामा श्रीकृष्णके रथपर आरूढ़ हो गयी। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने मुसकराकर द्रौपदीको सान्त्वना दी और उसे लौटाकर शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा अपनी पुरी द्वारकाको प्रस्थान किया ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि कृष्णगमने
पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाको प्रस्थानविषयक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३५ ॥
(घोषयात्रापर्व)
(घोषयात्रापर्व)
षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्गार
जनमेजय उवाच
एवं वने वर्तमाना नराग्र्याः
शीतोष्णवातातपकर्शिताङ्गाः ।
सरस्तदासाद्य वनं च पुण्यं
ततः परं किमकुर्वन्त पार्थाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! इस प्रकार वनमें रहकर सर्दी, गर्मी, हवा और धूपका कष्ट सहनेके कारण जिनके शरीर अत्यन्त कृश हो गये थे, उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने पवित्र द्वैतवनमें पूर्वोक्त सरोवरके पास पहुँचकर फिर कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
सरस्तदासाद्य तु पाण्डुपुत्रा
जनं समुत्सृज्य विधाय वेश्म ।
वनानि रम्याण्यथ पर्वतांश्च
नदीप्रदेशांश्च तदा विचेरुः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**राजन्! उस (रमणीय) सरोवरपर आकर पाण्डवोंने वहाँ आये हुए जनसमुदायको विदा कर दिया और अपने रहनेके लिये कुटी बनाकर वे आस-पासके रमणीय वनों, पर्वतों तथा नदीके तटप्रदेशोंमें विचरने लगे ॥ २ ॥
तथा वने तान् वसतः प्रवीरान्
स्वाध्यायवन्तश्च तपोधनाश्च ।
अभ्याययुर्वेदविदः पुराणा-
स्तान् पूजयामासुरथो नराग्र्याः ॥ ३ ॥
इस तरह वनमें रहते हुए उन वीरशिरोमणि पाण्डवोंके पास बहुत-से स्वाध्यायशील, वेदवेत्ता एवं पुरातन तपस्वी ब्राह्मण आते थे और वे नरश्रेष्ठ पाण्डव उनकी यथोचित सेवा-पूजा करते थे ॥ ३ ॥
ततः कदाचित् कुशलः कथासु
विप्रोऽभ्यगच्छद् भुवि कौरवेयान् ।
स तैः समेत्याथ यदृच्छयैव
वैचित्रवीर्यं नृपमभ्यगच्छत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर किसी समय कथा-वार्तामें कुशल एक ब्राह्मण उस वन्यभूमिमें पाण्डवोंके पास आया और उनसे मिलकर वह घूमता-घामता अकस्मात् राजा धृतराष्ट्रके दरबारमें जा पहुँचा ॥ ४ ॥
अथोपविष्टः प्रतिसत्कृतश्च
वृद्धेन राज्ञा कुरुसत्तमेन ।
प्रचोदितः संकथयाम्बभूव
धर्मानिलेन्द्रप्रभवान् यमौ च ॥ ५ ॥
कुरुकुलमें श्रेष्ठ एवं वयोवृद्ध राजा धृतराष्ट्रने उसका बहुत आदर-सत्कार किया। जब वह आसनपर बैठ गया, तब महाराजके पूछनेपर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेवके समाचार सुनाने लगा ॥ ५ ॥
कृशांश्च वातातपकर्शिताङ्गान्
दुःखस्य चोग्रस्य मुखे प्रपन्नान् ।
तां चाप्यनाथामिव वीरनाथां
कृष्णां परिक्लेशगुणेन युक्ताम् ॥ ६ ॥ उसने बताया—‘इस समय पाण्डव हवा और गर्मी आदिका कष्ट सहन करनेके कारण अत्यन्त कृश हो गये हैं। भयंकर दुःखके मुँहमें पड़ गये हैं और वीरपत्नी द्रौपदी भी अनाथकी भाँति सब ओरसे क्लेश-ही-क्लेश भोग रही है’ ॥ ६ ॥
ततः कथास्तस्य निशम्य राजा वैचित्रवीर्यः कृपयाभितप्तः । वने तथा पार्थिवपुत्रपौत्रान् श्रुत्वा तथा दुःखनदीं प्रपन्नान् ॥ ७ ॥ प्रोवाच दैन्याभिहतान्तरात्मा निःश्वासवातोपहतस्तदानीम् । वाचं कथंचित् स्थिरतामुपेत्य तत् सर्वमात्मप्रभवं विचिन्त्य ॥ ८ ॥ ब्राह्मणकी ये बातें सुनकर विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्र दयासे द्रवित हो बहुत दुःखी हो गये। जब उन्होंने सुना कि राजाके पुत्र और पौत्र होकर भी पाण्डव इस प्रकार दुःखकी नदीमें डूबे हुए हैं, तब उनका हृदय करुणासे भर आया और वे लंबी-लंबी साँसे खींचते हुए किसी प्रकार धैर्य धारण करके सब कुछ अपनी ही करतूतका परिणाम समझकर यों बोले — ॥ ७-८ ॥
कथं नु सत्यः शुचिरार्यवृत्तो ज्येष्ठः सुतानां मम धर्मराजः । अजातशत्रुः पृथिवीतले स्म शेते पुरा राङ्कवकूटशायी ॥ ९ ॥ ‘अहो! जो मेरे सभी पुत्रोंमें बड़े तथा सत्यवादी, पवित्र और सदाचारी हैं तथा जो पहले रंकु मृगके (नरम) रोओंसे बने हुए बिछौनोंपर सोया करते थे, वे अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर आजकल भूमिपर कैसे शयन करते होंगे? ॥ ९ ॥
प्रबोध्यते मागधसूतपूगै- र्नित्यं स्तुवद्भिः स्वयमिन्द्रकल्पः । पतत्रिसङ्घैः स जघन्यरात्रे प्रबोध्यते नूनमिडातलस्थः ॥ १० ॥ ‘जिन्हें कभी मागधों और सूतोंका समुदाय प्रतिदिन स्तुति-पाठ करके जगाता था, जो साक्षात् इन्द्रके समान तेजस्वी और पराक्रमी हैं, वे ही राजा युधिष्ठिर निश्चय ही अब भूमिपर सोते और पक्षियोंके कलरव सुनकर रातके पिछले पहरमें जागते होंगे’ ॥ १० ॥
कथं नु वातातपकर्शिताङ्गो वृकोदरः कोपपरिप्लुताङ्गः ।
शेते पृथिव्यामतथोचिताङ्गः
कृष्णासमक्षं वसुधातलस्थः ॥ ११ ॥
'भीमसेनका शरीर हवा और धूपका कष्ट सहन करनेसे अत्यन्त दुर्बल हो गया होगा। उनका अंग-अंग क्रोधसे काँपता और फड़कता होगा। वे द्रौपदीके सामने कैसे धरतीपर शयन करते होंगे? उनका शरीर ऐसा कष्ट भोगनेयोग्य नहीं है ॥ ११ ॥
तथार्जुनः सुकुमारो मनस्वी
वशे स्थितो धर्मसुतस्य राज्ञः ।
विदूयमानैरिव सर्वगात्रै-
र्ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ॥ १२ ॥
'इसी प्रकार सुकुमार एवं मनस्वी अर्जुन, जो सदा धर्मराज युधिष्ठिरके अधीन रहते हैं, अमर्षके कारण उनके सारे अंगोंमें संताप हो रहा होगा और निश्चय ही उन्हें अपनी कुटियामें अच्छी तरह नींद नहीं आती होगी ॥ १२ ॥
यमौ च कृष्णां च युधिष्ठिरं च
भीमं च दृष्ट्वा सुखविप्रयुक्तम् ।
विनिःश्वसन् सर्प इवोग्रतेजा
ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ॥ १३ ॥
'अर्जुनका तेज बड़ा ही भयंकर है। वे नकुल, सहदेव, द्रौपदी, युधिष्ठिर तथा भीमसेनको सुखसे वंचित देखकर सर्पके समान फुककारते होंगे और अमर्षके कारण निश्चय ही उन्हें नींद नहीं आती होगी ॥ १३ ॥
तथा यमौ चाप्यसुखौ सुखार्हौ
समृद्धरूपावमरौ दिवीव ।
प्रजागरस्थौ ध्रुवमप्रशान्तौ
धर्मेण सत्येन च वार्यमाणौ ॥ १४ ॥
'इसी प्रकार सुख भोगनेके योग्य नकुल और सहदेवका भी सुख छिन गया है। वे दोनों भाई स्वर्गके देवता अश्विनीकुमारोंकी भाँति रूपवान् हैं। वे भी निश्चय ही अशान्तभावसे सारी रात जागते हुए भूमिपर सोते होंगे। धर्म और सत्य ही उन्हें तत्काल आक्रमण करनेसे रोके हुए हैं ॥ १४ ॥
समीरणेनाथ समो बलेन
समीरणस्यैव सुतो बलीयान् ।
स धर्मपाशेन सितोऽग्रजेन
ध्रुवं विनिःश्वस्य सहत्यमर्षम् ॥ १५ ॥
'जो बलमें वायुके समान हैं, वायुदेवताके ही अत्यन्त बलवान् पुत्र हैं, वे भीमसेन भी अपने बड़े भाईके द्वारा धर्मके बन्धनमें बाँध लिये गये हैं। निश्चय ही इसीलिये चुपचाप लम्बी
साँसें खींचते हुए वे क्रोधको सहन करते हैं ।। १५ ।। स चापि भूमौ परिवर्तमानो वधं सुतानां मम काङ्क्षमाणः । सत्येन धर्मेण च वार्यमाणः कालं प्रतीक्षत्यधिको रणेऽन्यैः ॥ १६ ॥ ‘रणभूमिमें भीमसेन दूसरोंकी अपेक्षा सदा अधिक पराक्रमी सिद्ध होते हैं। वे मेरे पुत्रोंके वधकी कामना करते हुए धरतीपर करवटें बदल रहे होंगे। सत्य और धर्मने ही उन्हें रोक रखा है; अतः वे भी अवसरकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं ।। १६ ।। अजातशत्रौ तु जिते निकृत्या दुःशासनो यत् परुषाण्यवोचत् । तानि प्रविष्टानि वृकोदराङ्गं दहन्ति कक्षाग्निरिवेन्धनानि ॥ १७ ॥ ‘अजातशत्रु युधिष्ठिरको जूएमें छलपूर्वक हरा दिये जानेपर दुःशासनने जो कड़वी बातें कही थीं, वे भीमसेनके शरीरमें घुसकर जैसे आग तृण और काष्ठके समूहको जला डालती है, उसी प्रकार उन्हें दग्ध कर रही होंगी ।। १७ ।। न पापकं ध्यास्यति धर्मपुत्रो धनंजयश्चाप्यनुवत्स्यते तम् । अरण्यवासेन विवर्धते तु भीमस्य कोपोऽग्निरिवानिलेन ॥ १८ ॥ ‘धर्मपुत्र युधिष्ठिर मेरे अपराधपर ध्यान नहीं देंगे। अर्जुन भी उन्हींका अनुसरण करेंगे। परंतु इस वनवाससे भीमसेनका क्रोध तो उसी प्रकार बढ़ रहा होगा, जैसे हवा लगनेसे आग धधक उठती है ।। १८ ।। स तेन कोपेन विदह्यमानः करं करेणाभिनिपीड्य वीरः । विनिःश्वसत्युष्णमतीव घोरं दहन्निवेमान् मम पुत्रपौत्रान् ॥ १९ ॥ ‘उस क्रोधसे जलते हुए वीरवर भीमसेन हाथसे हाथ मलकर इस प्रकार अत्यन्त भयंकर गर्म-गर्म साँस खींच रहे होंगे, मानो मेरे इन पुत्रों और पौत्रोंको अभी भस्म कर डालेंगे ।। १९ ।। गाण्डीवधन्वा च वृकोदरश्च संरम्भिणावन्तककालकल्पौ । न शेषयेतां युधि शत्रुसेनां शरान् किरन्तावशनिप्रकाशान् ॥ २० ॥
'गाण्डीवधारी अर्जुन तथा भीमसेन जब क्रोधमें भर जायँगे, उस समय यमराज और कालके समान हो जायँगे। वे रणभूमिमें विद्युत्के समान चमकनेवाले बाणोंकी वर्षा करके शत्रुसेनामेंसे किसीको भी जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥
दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रो
दुःशासनश्चापि सुमन्दचेताः ।
मधु प्रपश्यन्ति न तु प्रपातं
यद् द्यूतमालम्ब्य हरन्ति राज्यम् ॥ २१ ॥
'दुर्योधन, शकुनि, सूतपुत्र कर्ण तथा दुःशासन—ये बड़े ही मूढ़बुद्धि हैं, क्योंकि जूएके सहारे दूसरेके राज्यका अपहरण कर रहे हैं। (ये अपने ऊपर आनेवाले संकटको नहीं देखते हैं) इन्हें वृक्षकी शाखासे टपकता हुआ केवल मधु ही दिखायी देता है, वहाँसे गिरनेका जो भारी भय है, उधर इनकी दृष्टि नहीं है ॥ २१ ॥
शुभाशुभं कर्म नरो हि कृत्वा
प्रतीक्षते तस्य फलं स्म कर्ता ।
स तेन मुह्यत्यवशः फलेन
'मोक्षः कथं स्यात् पुरुषस्य तस्मात् ॥ २२ ॥
मनुष्य शुभ और अशुभ कर्म करके उसके स्वर्ग-नरकरूप फलकी प्रतीक्षा करता है। वह उस फलसे विवश होकर मोहित होता है। ऐसी दशामें मूढ़ पुरुषका उस मोहसे कैसे छुटकारा हो सकता है? ॥ २२ ॥
क्षेत्रे सुकृष्टे ह्युपिते च बीजे
देवे च वर्षत्यृतुकालयुक्तम् ।
न स्यात् फलं तस्य कुतः प्रसिद्धि-
रन्यत्र दैवादिति चिन्तयामि ॥ २३ ॥
'मैं सोचता हूँ कि अच्छी तरह जोते हुए खेतमें बीज बोया जाय तथा ऋतुके अनुसार ठीक समयपर वर्षा भी हो, फिर भी उसमें फल न लगे, तो इसमें प्रारब्धके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी सिद्धि कैसे की जा सकती है? ॥ २३ ॥
कृतं मताक्षेण यथा न साधु
साधुप्रवृत्तेन च पाण्डवेन ।
मया च दुष्पुत्रवशानुगेन
तथा कुरूणामयमन्तकालः ॥ २४ ॥
'द्यूतप्रेमी शकुनिने जूआ खेलकर कदापि अच्छा नहीं किया। साधुतामें लगे हुए युधिष्ठिरने भी जो उसे तत्काल नहीं मार डाला, यह भी अच्छा नहीं किया। इसी प्रकार कुपुत्रके वशमें पड़कर मैंने भी कोई अच्छा काम नहीं किया है। इसीका फल है कि यह कौरवोंका अन्तकाल आ पहुँचा है ॥ २४ ॥
ध्रुवं प्रवास्यत्यसमीरितोऽपि ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या। ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाश- स्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः॥ २५॥ 'निश्चय ही बिना किसी प्रेरणाके भी हवा चलेगी ही, जो गर्भिणी है, वह समयपर अवश्य ही बच्चा जनेगी। दिनके आदिमें रजनीका नाश अवश्यम्भावी है तथा रात्रिके प्रारम्भमें दिनका भी अन्त होना निश्चित है। (इसी प्रकार पापका फल भी किसीके टाले नहीं टल सकता)॥ २५॥ क्रियेत कस्मादपरे च कुर्यु- र्वित्तं न दद्युः पुरुषाः कथंचित्। प्राप्यार्थकालं च भवेदनर्थः कथं न तत् स्यादिति तत् कुतः स्यात्॥ २६॥ 'यदि यह विश्वास हो जाय तो हम लोभके वश होकर न करनेयोग्य काम क्यों करें और दूसरे भी क्यों करें एवं बुद्धिमान् मनुष्य भी उपार्जित धनका दान क्यों न करें? अर्थके उपयोगका समय प्राप्त होनेपर यदि उसका सदुपयोग न किया जाय तो वह अनर्थका हेतु हो जाता है। अतः विचार करना चाहिये कि उस धनका सदुपयोग क्यों नहीं होता और कैसे हो?॥ २६॥ कथं न भिद्येत न च स्रवेत न च प्रसिच्येदिति रक्षितव्यम्। अरक्ष्यमाणं शतधा प्रकीर्येद् ध्रुवं न नाशोऽस्ति कृतस्य लोके॥ २७॥ 'यदि प्राप्त हुए धनका यथावत् वितरण न किया जायगा तो वह कच्चे घड़ेमें रखे हुए जलकी भाँति चूकर व्यर्थ नष्ट क्यों न होगा? यह सोचकर उसकी रक्षा करना ही कर्तव्य है। यदि यथायोग्य विभाजनके द्वारा धनकी रक्षा न की जायगी तो वह सैकड़ों प्रकारसे बिखर जायगा। जगत्में किये हुए कर्म-फलका नाश नहीं होता—यह निश्चित है। (इससे यही सिद्ध होता है कि उसका यथायोग्य वितरण कर देना ही उचित है)'॥ २७॥ गतो ह्यरण्यादपि शक्रलोकं धनंजयः पश्यत वीर्यमस्य। अस्त्राणि दिव्यानि चतुर्विधानि ज्ञात्वा पुनर्लोकमिमं प्रपन्नः॥ २८॥ 'देखो, अर्जुनमें कितनी शक्ति है! वे वनसे भी इन्द्रलोकको चले गये और वहाँसे चारों प्रकारके दिव्यास्त्र सीखकर पुनः इस लोकमें लौट आये॥ २८॥ स्वर्गं हि गत्वा सशरीर एव
को मानुषः पुनरागन्तुमिच्छेत् ।
अन्यत्र कालोपहताननेकान्
समीक्षमाणस्तु कुरून् मुमूर्षून् ॥ २९ ॥
‘सदेह स्वर्गमें जाकर कौन मनुष्य इस संसारमें पुनः लौटना चाहेगा। अर्जुनके पुनः मर्त्यलोकमें लौटनेका कारण इसके सिवा दूसरा नहीं है कि ये बहुसंख्यक कौरव कालके वशीभूत हो मृत्युके निकट पहुँच गये हैं और अर्जुन इनकी इस अवस्थाको अच्छी तरह देख रहे हैं’॥ २९ ॥
धनुर्ग्राहश्चार्जुनः सव्यसाची
धनुश्च तद् गाण्डिवं भीमवेगम् ।
अस्त्राणि दिव्यानि च तानि तस्य
त्रयस्य तेजः प्रसहेत कोऽत्र ॥ ३० ॥
‘सव्यसाची अर्जुन अद्वितीय धनुर्धर हैं। उनके उस गाण्डीव धनुषका वेग भी बड़ा भयानक है, और अब तो अर्जुनको वे दिव्यास्त्र भी प्राप्त हो गये हैं। इस समय इन तीनोंके सम्मिलित तेजको यहाँ कौन सह सकता है?’॥ ३० ॥
निशम्य तद् वचनं पार्थिवस्य
दुर्योधनं रहिते सौबलोऽथ ।
अबोधयत् कर्णमुपेत्य सर्वं
स चाप्यहृष्टोऽभवदल्पचेताः ॥ ३१ ॥
एकान्तमें कही हुई राजा धृतराष्ट्रकी उपर्युक्त सारी बातें सुनकर सुबलपुत्र शकुनिने दुर्योधन और कर्णके पास जाकर ज्यों-की-त्यों कह सुनायी। इससे मन्दमति दुर्योधन उदास एवं चिन्तित हो गया ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि धृतराष्ट्रखेदवाक्ये
षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें धृतराष्ट्रके खेदयुक्त वचनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३६ ॥