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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

महीपाल! मैंने दैत्यों और दानवोंको अधर्मके द्वारा बढ़ते और पुनः नष्ट होते भी देखा है॥ ५॥

पुरा देवयुगे चैव दृष्टं सर्वं मया विभो।
अरोचयन् सुरा धर्मं धर्मं तत्यजिरेऽसुराः ॥ ६॥
प्रभो! पहले देवयुगमें ही मैंने यह सब अपनी आँखों देखा है। देवताओंने धर्मके प्रति अनुराग किया और असुरोंने उसका परित्याग कर दिया॥ ६॥

तीर्थानि देवा विविशुर्नाविशन् भारतासुराः।
तानधर्मकृतो दर्पः पूर्वमेव समाविशत्॥ ७॥
भरतनन्दन! देवताओंने स्नानके लिये तीर्थोंमें प्रवेश किया, परंतु असुर उनमें नहीं गये। अधर्मजनित दर्प असुरोंमें पहलेसे ही समा गया था॥ ७॥

दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत।
क्रोधाद्ध्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत्॥ ८॥
दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ। क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया॥ ८॥

तानलज्जान् गतह्रीकान् हीनवृत्तान् वृथाव्रतान्।
क्षमा लक्ष्मीः स्वधर्मश्च न चिरात् प्रजहुस्ततः ॥ ९॥
लक्ष्मीस्तु देवानगमदलक्ष्मीरसुरान् नृप।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दर्पोपहतचेतसः ॥ १०॥
दैतेयान् दानवांश्चैव कलिरप्याविशत् ततः।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दानवान् कलिना हतान् ॥ ११॥
दर्पाभिभूतान् कौन्तेय क्रियाहीनानचेतसः।
मानाभिभूतानचिराद् विनाशः समपद्यत॥ १२॥
इस प्रकार लज्जा, संकोच और सदाचारसे हीन एवं निष्फल व्रतका आचरण करनेवाले उन असुरोंको क्षमा, लक्ष्मी और स्वधर्मने शीघ्र त्याग दिया। राजन्! लक्ष्मी देवताओंके पास चली गयी और अलक्ष्मी असुरोंके यहाँ। अलक्ष्मीके आवेशसे युक्त होनेपर उनका चित्त दर्प और अभिमानसे दूषित हो गया। उस दशामें उन दैत्यों और दानवोंमें कलिका भी प्रवेश हो गया। जब वे दानव अलक्ष्मीसे संयुक्त, कलिसे तिरस्कृत और अभिमानसे अभिभूत हो सत्कर्मोंसे शून्य, विवेकरहित और मानसे उन्मत्त हो गये, तब शीघ्र ही उनका विनाश हो गया॥ ९—१२॥

निर्यशस्कास्तथा दैत्याः कृत्स्नशो विलयं गताः।
देवास्तु सागरांश्चैव सरितश्च सरांसि च॥ १३॥
अभ्यगच्छन् धर्मशीलाः पुण्यान्यायतनानि च।
तपोभिः क्रतुभिर्दानैराशीर्वादैश्च पाण्डव॥ १४॥

प्रजहुः सर्वपापानि श्रेयश्च प्रतिपेदिरे । एवमादानवन्तश्च निरादानाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥ तीर्थान्यगच्छन् विबुधास्तेनापुर्भूतिमुत्तमाम् । (यत्र धर्मेण वर्तन्ते राजानो राजसत्तम । सर्वान् सपत्नान् बाधन्ते राज्यं चैषां विवर्धते ॥) तथा त्वमपि राजेन्द्र स्नात्वा तीर्थेषु सानुजः ॥ १६ ॥ पुनर्वेत्स्यसि तां लक्ष्मीमेष पन्थाः सनातनः । यशोहीन दैत्य पूर्णतः विनष्ट हो गये, किंतु धर्मशील देवताओंने पवित्र समुद्रों, सरिताओं, सरोवरों और पुण्यप्रद आश्रमोंकी यात्रा की। पाण्डुनन्दन! वहाँ तपस्या, यज्ञ और दान आदि करके महात्माओंके आशीर्वादसे वे सब पापोंसे मुक्त हो कल्याणके भागी हुए। इस प्रकार उत्तम नियम ग्रहण करके किसीसे भी कोई प्रतिग्रह न लेकर देवताओंने तीर्थोंमें विचरण किया; इससे उन्हें उत्तम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। नृपश्रेष्ठ! जहाँ राजा धर्मके अनुसार बर्ताव करते हैं वहाँ वे सब शत्रुओंको नष्ट कर देते हैं और उनका राज्य भी बढ़ता रहता है। राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भाइयोंसहित तीर्थोंमें स्नान करके खोयी हुई राजलक्ष्मी प्राप्त कर लोगे। यही सनातन मार्ग है ॥ १३—१६ १/२ ॥

यथैव हि नृगो राजा शिबिरौशीनरो यथा ॥ १७ ॥ भगीरथो वसुमना गयः पूरुः पुरूरवाः । चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते ॥ १८ ॥ तीर्थाभिगमनात् पूता दर्शनाच्च महात्मनाम् । अलभन्त यशः पुण्यं धनानि च विशाम्पते ॥ १९ ॥ तथा त्वमपि राजेन्द्र लब्धासि विपुलां श्रियम् । जैसे राजा नृग, उशीनरपुत्र शिबि, भगीरथ, वसुमना, गय, पूरु तथा पुरूरवा आदि नरेशोंने सदा तपस्यापूर्वक तीर्थयात्रा करके वहाँके जलके स्पर्श और महात्माओंके दर्शनसे पावन यश और प्रचुर धन प्राप्त किये थे; उसी प्रकार तुम भी तीर्थयात्राके पुण्यसे विपुल सम्पत्ति प्राप्त कर लोगे ॥ १७—१९ १/२ ॥

यथा चेक्ष्वाकुरभवत् सपुत्रजनबान्धवः ॥ २० ॥ मुचुकुन्दोऽथ मान्धाता मरुत्तश्च महीपतिः । कीर्तिं पुण्यामविन्दन्त यथा देवास्तपोबलात् ॥ २१ ॥ देवर्षयश्च कार्त्स्न्येन तथा त्वमपि वेत्स्यसि । धार्तराष्ट्रास्त्वधर्मेण मोहेन च वशीकृताः । न चिराद् वै विनङ्क्ष्यन्ति दैत्या इव न संशयः ॥ २२ ॥ जैसे पुत्र, सेवक तथा बन्धु-बान्धवोंसहित राजा इक्ष्वाकु, मुचुकुन्द, मान्धाता तथा महाराज मरुत्तने पुण्यकीर्ति प्राप्त की थी, जैसे देवताओं और देवर्षियोंने तपोबलसे यश

और ऐश्वर्य प्राप्त किया था; उसी प्रकार तुम भी पूर्णरूपसे यश और धन-सम्पत्ति प्राप्त करोगे। धृतराष्ट्रके पुत्र पाप और मोहके वशीभूत हैं; अतः वे दैत्योंकी भाँति शीघ्र नष्ट हो जायँगे; इसमें संशय नहीं है ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां
चतुर्नवतितमोऽध्यायः ।। ९४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 686)

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पञ्चनवतितमोऽध्यायः

पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना

वैशम्पायन उवाच

ते तथा सहिता वीरा वसन्तस्तत्र तत्र ह ।
क्रमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यमागताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार वे वीर पाण्डव विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हुए क्रमशः नैमिषारण्यतीर्थमें आये ॥ १ ॥
ततस्तीर्थेषु पुण्येषु गोमत्याः पाण्डवा नृप ।
कृताभिषेकाः प्रददुर्गाश्च वित्तं च भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! नरेश्वर! तदनन्तर गोमतीके पुण्य तीर्थोंमें स्नान करके पाण्डवोंने वहाँ गोदान और धनदान किया* ॥ २ ॥
तत्र देवान् पितॄन् विप्रांस्तर्पयित्वा पुनः पुनः ।
कन्यातीर्थेऽश्वतीर्थे च गवां तीर्थे च भारत ।
कालकोट्यां वृषप्रस्थे गिरावुष्य च पाण्डवाः ॥ ३ ॥
बाहुदायां महीपाल चक्रुः सर्वेऽभिषेचनम् ।
प्रयागे देवयजने देवानां पृथिवीपते ॥ ४ ॥
ऊषुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चातस्थुरुत्तमम् ।
गङ्गायमुनयोश्चैव संगमे सत्यसंगराः ॥ ५ ॥
भारत! भूपाल! वहाँ देवताओं, पितरों तथा ब्राह्मणोंको बार-बार तृप्त करके कन्यातीर्थ, अश्वतीर्थ, गोतीर्थ, कालकोटि तथा वृषप्रस्थगिरिमें निवास करते हुए उन सब पाण्डवोंने बाहुदा नदीमें स्नान किया। पृथ्वीपते! तदनन्तर उन्होंने देवताओंकी यज्ञभूमि प्रयागमें पहुँचकर वहाँ गंगा-यमुनाके संगममें स्नान किया। सत्यप्रतिज्ञ पाण्डव वहाँ स्नान करके कुछ दिनोंतक उत्तम तपस्यामें लगे रहे ॥ ३—५ ॥
विपाप्मानो महात्मानो विप्रेभ्यः प्रददुर्वसु ।
तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदीं प्रजापतेः ॥ ६ ॥
जग्मुः पाण्डुसुता राजन् ब्राह्मणैः सह भारत ।
तत्र ते न्यवसन् वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम् ॥ ७ ॥
संतर्पयन्तः सततं वन्येन हविषा द्विजान् ।

उन पापरहित महात्माओंने (त्रिवेणीतटपर) ब्राह्मणोंको धन दान किया। भरतनन्दन! तत्पश्चात् पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीकी वेदीपर गये, जो तपस्वीजनोंसे सेवित है। वहाँ उन वीरोंने उत्तम तपस्या करते हुए निवास किया। वे सदा कन्द-मूल-फल आदि वन्य हविष्यद्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करते रहते थे ।। ६-७१/२ ।।

ततो महीधरं जग्मुर्धर्मज्ञेनाभिसंस्कृतम् ।। ८ ।। राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते । अनुपम तेजस्वी जनमेजय! प्रयागसे चलकर पाण्डव पुण्यात्मा एवं धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा यज्ञ करके शुद्ध किये हुए उत्तम पर्वतसे उपलक्षित गयातीर्थमें गये ।। ८१/२ ।।

नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी ।। ९ ।। वानीरमालिनी रम्या नदी पुलिनशोभिता । जहाँ गयशिर नामक पर्वत और बेंतकी पंक्तियोंसे घिरी हुई रमणीय महानदी है, जो अपने दोनों तटोंसे विशेष शोभा पाती है ।। ९१/२ ।।

दिव्यं पवित्रकूटं च पवित्रं धरणीधरम् ।। १० ।। ऋषिजुष्टं सुपुण्यं तत् तीर्थं ब्रह्मसरोत्तमम् । अगस्त्यो भगवान् यत्र गतो वैवस्वतं प्रति ।। ११ ।। वहाँ महर्षियोंसे सेवित, पावन शिखरोंवाला, दिव्य एवं पवित्र दूसरा पर्वत भी है जो अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ है। वहीं उत्तम ब्रह्मसरोवर है जहाँ भगवान् अगस्त्यमुनि वैवस्वत यमसे मिलनेके लिये पधारे थे ।। १०-११ ।।

उवास च स्वयं तत्र धर्मराजः सनातनः । सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशाम्पते ।। १२ ।। क्योंकि सनातन धर्मराज वहाँ स्वयं निवास करते हैं। राजन्! वहाँ सम्पूर्ण नदियोंका प्राकट्य हुआ है ।।

यत्र संनिहितो नित्यं महादेवः पिनाकधृक् । तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे ।। १३ ।। ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान् । पिनाकपाणि भगवान् महादेव उस तीर्थमें नित्य निवास करते हैं। वहाँ वीर पाण्डवोंने उन दिनों चातुर्मास्यव्रत ग्रहण करके महान् ऋषियज्ञ अर्थात् वेदादि सत्शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा भगवान्‌की आराधना की। वहीं महान् अक्षयवट है ।। १३१/२ ।।

अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम् ।। १४ ।। देवताओंकी वह यज्ञभूमि अक्षय है और वहाँ किये हुए प्रत्येक सत्कर्मका फल अक्षय होता है ।। १४ ।।

ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नि Schweit... ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नेश्चितमानसाः । ब्राह्मणास्तत्र शतशः समाजग्मुस्तपोधनाः ।। १५ ।।

अविचल चित्तवाले पाण्डवोंने उस तीर्थमें कई उपवास किये। उस समय वहाँ सैकड़ों तपस्वी ब्राह्मण पधारे ।। १५ ।।

चातुर्मास्येनायजन्त आर्षेण विधिना तदा ।
तत्र विद्यातपोवृद्धा ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
कथां प्रचक्रिरे पुण्यां सदसिस्था महात्मनाम् ।। १६ ।।
उन्होंने शास्त्रोक्त विधिपूर्वक चातुर्मास्य यज्ञ किया। वहाँ आये हुए ब्राह्मण विद्या और तपस्यामें बढ़े-चढ़े तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। उन्होंने परस्पर मिलकर सभामें बैठकर महात्मा पुरुषोंकी पवित्र कथाएँ कहीं ।। १६ ।।

तत्र विद्याव्रतस्नातः कौमारं व्रतमास्थितः ।
शमठोऽकथयद् राजन्नामूर्तरयसं गयम् ।। १७ ।।
उनमें शमठ नामक एक विद्वान् ब्राह्मण थे जो विद्याध्ययनका व्रत समाप्त करके स्नातक हो चुके थे। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्यपालनका व्रत ले रखा था। राजन्! शमठने वहाँ अमूर्तरयाके पुत्र महाराज गयकी कथा इस प्रकार कही ।। १७ ।।

शमठ उवाच

अमूर्तरयसः पुत्रो गयो राजर्षिसत्तमः ।
पुण्यानि यस्य कर्माणि तानि मे शृणु भारत ।। १८ ।।
**शमठ बोले—**भरतनन्दन युधिष्ठिर! अमूर्तरयाके पुत्र गय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ थे। उनके कर्म बड़े ही पवित्र एवं पावन थे। मैं उनका वर्णन करता हूँ, सुनो— ।।

यस्य यज्ञो बभूवेह बह्वन्नो बहुदक्षिणः ।
यत्रान्नपर्वता राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ।। १९ ।।
घृतकुल्याश्च दध्नश्च नद्यो बहुशतास्तथा ।
व्यञ्जनानां प्रवाहाश्च महार्हाणां सहस्रशः ।। २० ।।
राजन्! यहाँ राजा गयने बड़ा भारी यज्ञ किया था। उसमें बहुत अन्न खर्च हुआ था और असंख्य दक्षिणा बाँटी गयी थी। उस यज्ञमें अन्नके सैकड़ों और हजारों पर्वत लग गये थे। घीके कई सौ कुण्ड और दहीकी नदियाँ बहती थीं। सहस्रों प्रकारके उत्तमोत्तम व्यञ्जनोंकी बाढ़-सी आ गयी थी ।। १९-२० ।।

अहन्यहनि चाप्येवं याचतां सम्प्रदीयते ।
अन्ये च ब्राह्मणा राजन् भुञ्जतेऽन्नं सुसंस्कृतम् ।। २१ ।।
याचकोंको प्रतिदिन इसी प्रकार भोजन और दान दिया जाता था। राजन्! अन्यान्य ब्राह्मण भी वहाँ उत्तम रीतिसे तैयारकी हुई रसोई जीमते थे ।। २१ ।।

तत्र वै दक्षिणाकाले ब्रह्मघोषो दिवं गतः ।
न च प्रज्ञायते किंचिद् ब्रह्मशब्देन भारत ।। २२ ।।

भरतनन्दन! उस यज्ञमें दक्षिणा देते समय जो वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होती थी वह स्वर्गलोकतक गूँज उठती थी। उस वेदध्वनिके सामने दूसरा कोई शब्द नहीं सुनायी पड़ता था ॥ २२ ॥

पुण्येन चरता राजन् भूर्दिशः खं नभस्तथा । आपूर्णामासीच्छब्देन तदप्यासीन्महाद्भुतम् ॥ २३ ॥ यत्र स्म गाथा गायन्ति मनुष्या भरतर्षभ । अन्नपानैः शुभैस्तृप्ता देशे देशे सुवर्चसः ॥ २४ ॥ राजन्! वहाँ सब ओर फैले हुए पुण्यमय शब्दसे पृथ्वी, दिशाएँ, स्वर्ग और आकाश परिपूर्ण हो गये। यह बड़ी ही अद्भुत बात थी। भरतश्रेष्ठ! उस यज्ञमें सब मनुष्य यह गाथा गाते रहते थे कि ‘इस यज्ञमें देश-देशके अत्यन्त तेजस्वी पुरुष उत्तम अन्नपानसे तृप्त हो रहे हैं’ ॥ २३-२४ ॥

गयस्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः । तत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ॥ २५ ॥ ‘गयके यज्ञमें लोग यही पूछते फिरते थे कि ‘कौन-कौन ऐसे प्राणी रह गये हैं जो अभी भोजन करना चाहते हैं?’ वहाँ खानेसे बचे हुए अन्नके पचीस पर्वत शेष रह गये थे ॥ २५ ॥

न तत् पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । गयो यदकरोद् यज्ञे राजर्षिरमितद्युतिः ॥ २६ ॥ ‘अमिततेजस्वी राजर्षि गयने अपने यज्ञमें जो व्यय किया था, वह पहलेके राजाओंने भी नहीं किया था और भविष्यमें भी कोई दूसरे कर सकेंगे, ऐसा सम्भव नहीं है ॥

कथं तु देवा हविषा गयेन परितर्पिताः । पुनः शक्ष्यन्त्युपादातुमन्यैर्दत्तानि कानिचित् ॥ २७ ॥ ‘गयने सम्पूर्ण देवताओंको हविष्यसे भलीभाँति तृप्त कर दिया है, अब वे दूसरोंके दिये हुए हविष्यको कैसे ग्रहण कर सकेंगे? ॥ २७ ॥

सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः । यथा वा वर्षतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् । तथा गणयितुं शक्या गययज्ञे न दक्षिणाः ॥ २८ ॥ ‘जैसे लोकमें बालूके कण, आकाशके तारे और बरसते हुए बादलोंकी जलधाराएँ किसीके द्वारा भी गिनी नहीं जा सकतीं, उसी प्रकार गयके यज्ञमें दी हुई दक्षिणाओंकी भी कोई गणना नहीं कर सकता था ॥ २८ ॥

एवंविधाः सुबहवस्तस्य यज्ञा महीपतेः । बभूवुरस्य सरसः समीपे कुरुनन्दन ॥ २९ ॥ कुरुनन्दन! महाराज गयके ऐसे ही बहुत-से यज्ञ इस ब्रह्मसरोवरके समीप सम्पन्न हुए हैं ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गययज्ञकथने पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमश-तीर्थयात्राके प्रसंगमें ‘गयके यज्ञका वर्णन’-विषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।


* यहाँ पाण्डवोंके द्वारा गोदान और धनदान करनेके विषयमें यह शंका होती है कि इनके पास ये सब कहाँसे आये पर ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वनपर्वके बारहवें अध्यायमें आता है कि काम्यकवनमें पाण्डवोंसे मिलनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण एवं भोजवंशी, वृष्णिवंशी और अन्धककुलके राजागण तथा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु एवं केकय राजकुमार आये थे। उनका पाण्डवोंसे मिलकर अपने-अपने राज्यमें लौट जानेका भी वर्णन वनपर्वके बाईसवें अध्यायमें आया है। इससे अनुमान होता है कि इन राजाओंने पाण्डवोंको भेंटमें प्रचुर धन दिया होगा।

इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना

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षण्णवतितमोऽध्यायः

इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना

वैशम्पायन उवाच

ततः सम्प्रस्थितो राजा कौन्तेयो भूरिदक्षिणः ।
अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवास ह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर प्रचुर दक्षिणा देनेवाले कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने गयासे प्रस्थान किया और अगस्त्याश्रममें जाकर दुर्जय मणिमती नगरीमें निवास किया ॥ १ ॥

तत्रैव लोमशं राजा पप्रच्छ वदतां वरः ।
अगस्त्येनेह वातापिः किमर्थमुपशामितः ॥ २ ॥
वहीं वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने महर्षि लोमशसे पूछा—‘ब्रह्मन्! अगस्त्यजीने यहाँ वातापिको किसलिये नष्ट किया? ॥ २ ॥

आसीद्वा किं प्रभावश्च स दैत्यो मानवान्तकः ।
किमर्थं चोदितो मन्युरगस्त्यस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
‘मनुष्योंका विनाश करनेवाले उस दैत्यका प्रभाव कैसा था? और महात्मा अगस्त्यजीके मनमें क्रोधका उदय कैसे हुआ’? ॥ ३ ॥

लोमश उवाच

इल्वलो नाम दैतेय आसीत् कौरवनन्दन ।
मणिमत्यां पुरि पुरा वातापिस्तस्य चानुजः ॥ ४ ॥
लोमशजीने कहा—कौरवनन्दन! पूर्वकालकी बात है, इस मणिमती नगरीमें इल्वल नामक दैत्य रहता था। वातापि उसीका छोटा भाई था ॥ ४ ॥

स ब्राह्मणं तपोयुक्तमुवाच दितिनन्दनः ।
पुत्रं मे भगवानेकमिन्द्रतुल्यं प्रयच्छतु ॥ ५ ॥
तस्मै स ब्राह्मणो नादात् पुत्रं वासवसम्मितम् ।
चुक्रोध सोऽसुरस्तस्य ब्राह्मणस्य ततो भृशम् ॥ ६ ॥
तदाप्रभृति राजेन्द्र इल्वलो ब्रह्महासुरः ।
मन्युमान् भ्रातरं छागं मायावी ह्यकरोत् ततः ॥ ७ ॥
मेषरूपी च वातापिः कामरूप्यभवत् क्षणात् ।

संस्कृत्य च भोजयति ततो विप्रं जिघांसति ॥ ८ ॥ एक दिन दितिनन्दन इल्वलने एक तपस्वी ब्राह्मणसे कहा—'भगवन्! आप मुझे ऐसा पुत्र दें, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हो।' उन ब्राह्मणदेवताने इल्वलको इन्द्रके समान पुत्र नहीं दिया। इससे वह असुर उन ब्राह्मणदेवतापर बहुत कुपित हो उठा। राजन्! तभीसे इल्वल दैत्य क्रोधमें भरकर ब्राह्मणोंकी हत्या करने लगा। वह मायावी अपने भाई वातापिको मायासे बकरा बना देता था। वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ था! अतः वह क्षणभरमें भेड़ा और बकरा बन जाता था। फिर इल्वल उस भेड़ या बकरेको पकाकर उसका मांस राँधता और किसी ब्राह्मणको खिला देता था। इसके बाद वह ब्राह्मणको मारनेकी इच्छा करता था ॥ ५—८ ॥

स चाह्वयति यं वाचा गतं वैवस्वतक्षयम् । स पुनर्देहमास्थाय जीवन् स्म प्रत्यदृश्यत ॥ ९ ॥ इल्वलमें यह शक्ति थी कि वह जिस किसी भी यमलोकमें गये हुए प्राणीको उसका नाम लेकर बुलाता वह पुनः शरीर धारण करके जीवित दिखायी देने लगता था ॥ ९ ॥

ततो वातापिमसुरं छागं कृत्वा सुसंस्कृतम् । तं ब्राह्मणं भोजयित्वा पुनरेव समाह्वयत् ॥ १० ॥ उस दिन वातापि दैत्यको बकरा बनाकर इल्वल उसके मांसका संस्कार किया और उन ब्राह्मणदेवको वह मांस खिलाकर पुनः अपने भाईको पुकारा ॥ १० ॥

तामिल्वलेन महता स्वरेण वाचमीरिताम् । श्रुत्वातिमायो बलवान् क्षिप्रं ब्राह्मणकण्टकः ॥ ११ ॥ तस्य पार्श्वं विनिर्भिद्य ब्राह्मणस्य महासुरः । वातापिः प्रहसन् राजन् निश्चक्राम विशाम्पते ॥ १२ ॥ राजन्! इल्वलके द्वारा उच्चस्वरसे बोली हुई वाणी सुनकर वह अत्यन्त मायावी ब्राह्मणशत्रु बलवान् महादैत्य वातापि उस ब्राह्मणकी पसलीको फाड़कर हँसता हुआ निकल आया ॥ ११-१२ ॥

एवं स ब्राह्मणान् राजन् भोजयित्वा पुनः पुनः । हिंसयामास दैतेय इल्वलो दुष्टचेतनः ॥ १३ ॥ राजन्! इस प्रकार दुष्टहृदय इल्वल दैत्य बार-बार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपने भाईद्वारा उनकी हिंसा करा देता था (इसीलिये अगस्त्यमुनिने वातापिको नष्ट किया था) ॥ १३ ॥

अगस्त्यश्चापि भगवानेतस्मिन् काल एव तु । पितॄन् ददर्श गर्ते वै लम्बमानानधोमुखान् ॥ १४ ॥ इन्हीं दिनों भगवान् अगस्त्यमुनि कहीं चले जा रहे थे। उन्होंने एक जगह अपने पितरोंको देखा जो एक गड्ढेमें नीचे मुँह किये लटक रहे थे ॥ १४ ॥

सोऽपृच्छल्लम्बमानांस्तान् भवन्त इव कम्पिताः ।
(किमर्थं वेह लम्बध्वं गर्ते यूयमधोमुखाः ।)
संतानहेतोरिति ते प्रत्यूचुर्ब्रह्मवादिनः ।। १५ ।।

तब उन लटकते हुए पितरोंसे अगस्त्यजीने पूछा—'आपलोग यहाँ किसलिये नीचे मुँह किये काँपते हुए-से लटक रहे हैं?' यह सुनकर उन वेदवादी पितरोंने उत्तर दिया—'संतानपरम्पराके लोपकी सम्भावनाके कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है' ।। १५ ।।
ते तस्मै कथयामासुर्वयं ते पितरः स्वकाः ।
गर्तमेतमनुप्राप्ता लम्बामः प्रसवार्थिनः ।। १६ ।।

उन्होंने अगस्त्यके पूछनेपर बताया कि 'हम तुम्हारे ही पितर हैं। संतानके इच्छुक होकर इस गड्ढेमें लटक रहे हैं' ।। १६ ।।
यदि नो जनयेथास्त्वमगस्त्यापत्यमुत्तमम् ।
स्यान्नोऽस्मान्निरयान्मोक्षस्त्वं च पुत्राप्नुया गतिम् ।। १७ ।।

'अगस्त्य! यदि तुम हमारे लिये उत्तम संतान उत्पन्न कर सको तो हम इस नरकसे छुटकारा पा सकते हैं और बेटा! तुम्हें भी सद्गति प्राप्त होगी' ।। १७ ।।
स तानुवाच तेजस्वी सत्यधर्मपरायणः ।

करिष्ये पितरः कामं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥ १८ ॥ तब सत्यधर्मपरायण तेजस्वी अगस्त्यने उनसे कहा—'पितरो! मैं आपकी इच्छा पूर्ण करूँगा। आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये' ॥ १८ ॥

ततः प्रसवसंतानं चिन्तयन् भगवानृषिः । आत्मनः प्रसवस्यार्थे नापश्यत् सदृशीं स्त्रियम् ॥ १९ ॥ तब भगवान् महर्षि अगस्त्यने संतानोत्पादनकी चिन्ता करते हुए अपने अनुरूप संतानको गर्भमें धारण करनेके लिये योग्य पत्नीका अनुसंधान किया, परंतु उन्हें कोई योग्य स्त्री दिखायी नहीं दी ॥ १९ ॥

स तस्य तस्य सत्त्वस्य तत् तदङ्गमनुत्तमम् । संगृह्य तत्समैरङ्गैर्निर्ममे स्त्रियमुत्तमाम् ॥ २० ॥ तब उन्होंने एक-एक जन्तुके उत्तमोत्तम अंगोंका भावनाद्वारा संग्रह करके उन सबके द्वारा एक परम सुन्दर स्त्रीका निर्माण किया ॥ २० ॥

स तां विदर्भराजस्य पुत्रार्थं तप्यतस्तपः । निर्मितामात्मनोऽर्थाय मुनिः प्रादान्महातपाः ॥ २१ ॥ उन दिनों विदर्भराज पुत्रके लिये तपस्या कर रहे थे। महातपस्वी अगस्त्यमुनिने अपने लिये निर्मित की हुई वह स्त्री राजाको दे दी ॥ २१ ॥

सा तत्र जज्ञे सुभगा विद्युत् सौदामनी यथा । विभ्राजमाना वपुषा व्यवर्धत शुभानना ॥ २२ ॥ उस सुन्दरी कन्याका उस राजभवनमें बिजलीके समान प्रादुर्भाव हुआ। वह शरीरसे प्रकाशमान हो रही थी। उसका मुख बहुत सुन्दर था, वह राजकन्या वहाँ दिनोदिन बढ़ने लगी ॥ २२ ॥

जातमात्रां च तां दृष्ट्वा वैदर्भः पृथिवीपतिः । प्रहर्षेण द्विजातिभ्यो न्यवेदयत भारत ॥ २३ ॥ भरतनन्दन! राजा विदर्भने उस कन्याके उत्पन्न होते ही हर्षमें भरकर ब्राह्मणोंको यह शुभ संवाद सुनाया ॥

अभ्यनन्दन्त तां सर्वे ब्राह्मणा वसुधाधिप । लोपामुद्रेति तस्याश्च चक्रिरे नाम ते द्विजाः ॥ २४ ॥ राजन्! उस समय सब ब्राह्मणोंने राजाका अभिनन्दन किया और उस कन्याका नाम 'लोपामुद्रा' रख दिया ॥ २४ ॥

ववृधे सा महाराज बिभ्रती रूपमुत्तमम् । अप्सुवोत्पलिनी शीघ्रमग्नेरिव शिखा शुभा ॥ २५ ॥ महाराज! उत्तम रूप धारण करनेवाली वह राजकुमारी जलमें कमलिनी तथा यज्ञवेदीपर प्रज्वलित शुभ्र अग्निशिखाकी भाँति शीघ्रतापूर्वक बढ़ने लगी ॥ २५ ॥

तां यौवनस्थां राजेन्द्र शतं कन्याः स्वलंकृताः ।
दास्यः शतं च कल्याणीमुपातस्थुर्वशानुगाः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! जब उसने युवावस्थामें पदार्पण किया, उस समय उस कल्याणी कन्याको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सौ सुन्दरी कन्याएँ और सौ दासियाँ उसकी आज्ञाके अधीन होकर घेरे रहतीं और उसकी सेवा किया करती थीं ॥ २६ ॥
सा स्म दासीशतवृता मध्ये कन्याशतस्य च ।
आस्ते तेजस्विनी कन्या रोहिणीव दिवि प्रभा ॥ २७ ॥
सौ दासियों और सौ कन्याओंके बीचमें वह तेजस्विनी कन्या आकाशमें सूर्यकी प्रभा तथा नक्षत्रोंमें रोहिणीके समान सुशोभित होती थी ॥ २७ ॥
यौवनस्थामपि च तां शीलाचारसमन्विताम् ।
न वव्रे पुरुषः कश्चिद् भयात् तस्य महात्मनः ॥ २८ ॥
यद्यपि वह युवती और शील एवं सदाचारसे सम्पन्न थी तो भी महात्मा अगस्त्यके भयसे किसी राजकुमारने उसका वरण नहीं किया ॥ २८ ॥
सा तु सत्यवती कन्या रूपेणाप्सरसोऽप्यति ।
तोषयामास पितरं शीलेन स्वजनं तथा ॥ २९ ॥
वह सत्यवती राजकुमारी रूपमें अप्सराओंसे भी बढ़कर थी। उसने अपने शील-स्वभावसे पिता तथा स्वजनोंको संतुष्ट कर दिया था ॥ २९ ॥
वैदर्भीं तु तथायुक्तां युवतीं प्रेक्ष्य वै पिता ।
मनसा चिन्तयामास कस्मै दद्यामिमां सुताम् ॥ ३० ॥
पिता विदर्भराजकुमारीको युवावस्थामें प्रविष्ट हुई देख मन-ही-मन यह विचार करने लगे कि ‘इस कन्याका किसके साथ विवाह करूँ’ ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां अगस्त्योपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३० १/३ श्लोक हैं]

अध्याय (पृष्ठ 696)

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सप्तनवतितमोऽध्यायः

महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गङ्गाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान

लोमश उवाच

यदा त्वमन्यतागस्त्यो गार्हस्थ्ये तां क्षमामिति ।
तदाभिगम्य प्रोवाच वैदर्भं पृथिवीपतिम् ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जब मुनिवर अगस्त्यजीको यह मालूम हो गया कि विदर्भराजकुमारी मेरी गृहस्थी चलानेके योग्य हो गयी है, तब वे विदर्भ-नरेशके पास जाकर बोले— ॥ १ ॥

राजन् निवेशे बुद्धिर्मे वर्तते पुत्रकारणात् ।
वरये त्वां महीपाल लोपामुद्रां प्रयच्छ मे ॥ २ ॥
‘राजन्! पुत्रोत्पत्तिके लिये मेरा विवाह करनेका विचार है। अतः महीपाल! मैं आपकी कन्याका वरण करता हूँ। आप लोपामुद्राको मुझे दे दीजिये’ ॥ २ ॥

एवमुक्तः स मुनिना महीपालो विचेतनः ।
प्रत्याख्यानाय चाशक्तः प्रदातुं चैव नैच्छत ॥ ३ ॥
मुनिवर अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विदर्भराजके होश उड़ गये। वे न तो अस्वीकार कर सके और न उन्होंने अपनी कन्या देनेकी इच्छा ही की ॥ ३ ॥

ततः स भार्यामभ्येत्य प्रोवाच पृथिवीपतिः ।
महर्षिर्वीर्यवानेष क्रुद्धः शापाग्निना दहेत् ॥ ४ ॥
तब विदर्भनरेश अपनी पत्नीके पास जाकर बोले—‘प्रिये! ये महर्षि अगस्त्य बड़े शक्तिशाली हैं। यदि कुपित हों तो हमें शापकी अग्निसे भस्म कर सकते हैं’ ॥ ४ ॥

तं तथा दुःखितं दृष्ट्वा सभार्यं पृथिवीपतिम् ।
लोपामुद्राभिगम्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
रानीसहित महाराजको इस प्रकार दुःखी देख लोपामुद्रा उनके पास गयी और समयके अनुसार इस प्रकार बोली— ॥ ५ ॥

न मत्कृते महीपाल पीडामभ्येतुमर्हसि ।
प्रयच्छ मामगस्त्याय त्राह्यात्मानं मया पितः ॥ ६ ॥
‘राजन्! आपको मेरे लिये दुःख नहीं मानना चाहिये। पिताजी! आप मुझे अगस्त्यजीकी सेवामें दे दें और मेरे द्वारा अपनी रक्षा करें’ ॥ ६ ॥

दुहितुर्वचनाद् राजा सोऽगस्त्याय महात्मने ।

लोपामुद्रां ततः प्रादाद् विधिपूर्वं विशाम्पते ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर! पुत्रीकी यह बात सुनकर राजाने महात्मा अगस्त्यमुनिको विधिपूर्वक अपनी कन्या लोपामुद्रा ब्याह दी ॥ ७ ॥

प्राप्य भार्यामगस्त्यस्तु लोपामुद्रामभाषत । महार्हाण्युत्सृजैतानि वासांस्याभरणानि च ॥ ८ ॥ लोपामुद्राको पत्नीरूपमें पाकर महर्षि अगस्त्यने उससे कहा—'ये तुम्हारे वस्त्र और आभूषण बहुमूल्य हैं। इन्हें उतार दो' ॥ ८ ॥

ततः सा दर्शनीयानि महार्हाणि तनूनि च । समुत्ससर्ज रम्भोरूर्वसनान्यायतेक्षणा ॥ ९ ॥ ततश्चीराणि जग्राह वल्कलाान्यजिनानि च । समानव्रतचर्या च बभूवायतलोचना ॥ १० ॥ तब कदलीके समान जाँघ तथा विशाल नेत्रोंवाली लोपामुद्राने अपने बहुमूल्य, महीन एवं दर्शनीय वस्त्र उतार दिये और फटे-पुराने वस्त्र तथा वल्कल और मृगचर्म धारण कर लिये। वह विशालनयनी बाला पतिके समान ही व्रत और आचारका पालन करनेवाली हो गयी ॥ ९-१० ॥

गङ्गाद्वारमथागम्य भगवानृषिसत्तमः । उग्रमातिष्ठत तपः सह पत्यानुकूलया ॥ ११ ॥ तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ भगवान् अगस्त्य अपनी अनुकूल पत्नीके साथ गंगाद्वार (हरिद्वार)-में आकर घोर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ ११ ॥

सा प्रीता बहुमानाच्च पतिं पर्यचरत् तदा । अगस्त्यश्च परां प्रीतिं भार्यायामचरत् प्रभुः ॥ १२ ॥ लोपामुद्रा बड़ी ही प्रसन्नता और विशेष आदरके साथ पतिदेवकी सेवा करने लगी। शक्तिशाली महर्षि अगस्त्यजी भी अपनी पत्नीपर बड़ा प्रेम रखते थे ॥ १२ ॥

ततो बहुतिथे काले लोपामुद्रां विशाम्पते । तपसा द्योतितां स्नातां ददर्श भगवानृषिः ॥ १३ ॥ स तस्याः परिचारेण शौचेन च दमेन च । श्रिया रूपेण च प्रीतो मैथुनायाजुहाव ताम् ॥ १४ ॥ राजन्! जब इसी प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया, तब एक दिन भगवान् अगस्त्यमुनिने ऋतुस्नानसे निवृत्त हुई पत्नी लोपामुद्राको देखा। वह तपस्याके तेजसे प्रकाशित हो रही थी। महर्षिने अपनी पत्नीकी सेवा, पवित्रता, इन्द्रियसंयम, शोभा तथा रूप-सौन्दर्यसे प्रसन्न होकर उसे मैथुनके लिये पास बुलाया ॥ १३-१४ ॥

ततः सा प्राञ्जलिर्भूत्वा लज्जमानेव भाविनी । तदा सप्रणयं वाक्यं भगवन्तमथाब्रवीत् ॥ १५ ॥

तब अनुरागिणी लोपामुद्रा कुछ लज्जित-सी हो हाथ जोड़कर बड़े प्रेमसे भगवान् अगस्त्यसे बोली— ॥ १५ ॥

असंशयं प्रजाहेतोर्भार्यां पतिरविन्दत । या तु त्वयि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमर्हसि ॥ १६ ॥

‘महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि पतिदेवने अपनी इस पत्नीको संतानके लिये ही ग्रहण किया है, परंतु आपके प्रति मेरे हृदयमें जो प्रीति है, वह भी आपको सफल करनी चाहिये ॥ १६ ॥

यथा पितुर्गृहे विप्र प्रासादे शयनं मम । तथाविधे त्वं शयने मामुपैतुमिहार्हसि ॥ १७ ॥

‘ब्रह्मन्! मैं अपने पिताके घर उनके महलमें जैसी शय्यापर सोया करती थी, वैसी ही शय्यापर आप मेरे साथ समागम करें ॥ १७ ॥

इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूषणैश्च विभूषितम् । उपसर्तुं यथाकामं दिव्याभरणभूषिता ॥ १८ ॥

‘मैं चाहती हूँ कि आप सुन्दर हार और आभूषणोंसे विभूषित हों और मैं भी दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत हो इच्छानुसार आपके साथ समागम-सुखका अनुभव करूँ ॥ १८ ॥

अन्यथा नोपतिष्ठेयं चरिकाषायवासिनी । नैवापवित्रो विप्रर्षे भूषणोऽयं कथंचन ॥ १९ ॥ ‘अन्यथा मैं यह जीर्ण-शीर्ण काषाय-वस्त्र पहनकर आपके साथ समागम नहीं करूँगी। ब्रह्मर्षे! तपस्वीजनोंका यह पवित्र आभूषण किसी प्रकार सम्भोग आदिके द्वारा अपवित्र नहीं होना चाहिये’ ॥ १९ ॥

अगस्त्य उवाच

न ते धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम । यथाविधानि कल्याणि पितुस्तव सुमध्यमे ॥ २० ॥ अगस्त्यजीने कहा—सुन्दर कटिप्रदेशवाली कल्याणी लोपामुद्रे! तुम्हारे पिताके घरमें जैसे धन-वैभव हैं, वे न तो तुम्हारे पास हैं और न मेरे ही पास (फिर ऐसा कैसे हो सकता है?) ॥ २० ॥

लोपामुद्रोवाच

ईशोऽसि तपसा सर्वं समाहर्तुं तपोधन । क्षणेन जीवलोके यद् वसु किंचन विद्यते ॥ २१ ॥ लोपामुद्रा बोली—तपोधन! इस जीव-जगत्में जो कुछ भी धन है, वह सब क्षणभरमें आप अपनी तपस्याके प्रभावसे जुटा लेनेमें समर्थ हैं ॥ २१ ॥

अगस्त्य उवाच

एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं तपोव्ययकरं तु तत् । यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय ॥ २२ ॥ अगस्त्यजीने कहा—प्रिये! तुम्हारा कथन ठीक है। परंतु ऐसा करनेसे तपस्याका क्षय होगा। मुझे ऐसा कोई उपाय बताओ, जिससे मेरी तपस्या क्षीण न हो ॥ २२ ॥

लोपामुद्रोवाच

अल्पावशिष्टः कालोऽयमृतोर्मम तपोधन । न चान्यथाहमिच्छामि त्वामुपैतुं कथंचन ॥ २३ ॥ लोपामुद्रा बोली—तपोधन! मेरे ऋतुकालका थोड़ा ही समय शेष रह गया है। मैं जैसा बता चुकी हूँ, उसके सिवा और किसी तरह आपसे समागम नहीं करना चाहती ॥ २३ ॥ न चापि धर्ममिच्छामि विलोप्तुं ते कथंचन । एवं तु मे यथाकामं सम्पादयितुमर्हसि ॥ २४ ॥ साथ ही मेरी यह भी इच्छा नहीं है कि किसी प्रकार आपके धर्मका लोप हो। इस प्रकार अपने तप एवं धर्मकी रक्षा करते हुए जिस तरह सम्भव हो उसी तरह आप मेरी इच्छा पूर्ण करें ॥ २४ ॥

अगस्त्य उवाच
यद्येष कामः सुभगे तव बुद्ध्या विनिश्चितः ।
हर्तुं गच्छाम्यहं भद्रे चर काममिह स्थिता ॥ २५ ॥
**अगस्त्यजीने कहा—**सुभगे! यदि तुमने अपनी बुद्धिसे यही मनोरथ पानेका निश्चय कर लिया है तो मैं धन लानेके लिये जाता हूँ, तुम यहीं रहकर इच्छानुसार धर्माचरण करो ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने
सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 701)

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अष्टनवतितमोऽध्यायः

धन प्राप्त करनेके लिये अगस्त्यका श्रुतर्वा, ब्रध्नश्व और त्रसदस्यु आदिके पास जाना

लोमश उवाच

ततो जगाम कौरव्य सोऽगस्त्यो भिक्षितुं वसु ।
श्रुतर्वाणं महीपालं यं वेदाभ्यधिकं नृपैः ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**कुरुनन्दन! तदनन्तर अगस्त्यजी धन माँगनेके लिये महाराज श्रुतर्वाके पास गये, जिन्हें वे सब राजाओंसे अधिक वैभवसम्पन्न समझते थे ॥ १ ॥

स विदित्वा तु नृपतिः कुम्भयोनिमुपागतम् ।
विषयान्ते सहामात्यः प्रत्यगृह्णात् सुसत्कृतम् ॥ २ ॥
राजाको जब यह मालूम हुआ कि महर्षि अगस्त्य मेरे यहाँ आ रहे हैं, तब वे मन्त्रियोंके साथ अपने राज्यकी सीमापर चले आये और बड़े आदर-सत्कारसे उन्हें अपने साथ लिवा ले गये ॥ २ ॥

तस्मै चार्घ्यं यथान्यायमानीय पृथिवीपतिः ।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ॥ ३ ॥
भूपाल श्रुतर्वाने उनके लिये यथायोग्य अर्घ्य निवेदन करके विनीतभावसे हाथ जोड़कर उनके पधारनेका प्रयोजन पूछा ॥ ३ ॥

अगस्त्य उवाच

वित्तार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां पृथिवीपते ।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ मे ॥ ४ ॥
**तब अगस्त्यजीने कहा—**पृथिवीपते! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं धन माँगनेके लिये आपके यहाँ आया हूँ। दूसरे प्राणियोंको कष्ट न देते हुए यथाशक्ति अपने धनका जितना अंश मुझे दे सकें, दे दें ॥ ४ ॥

लोमश उवाच

तत आयव्ययौ पूर्णौ तस्मै राजा न्यवेदयत् ।
अतो विद्वन्नुपादत्स्व यदत्र वसु मन्यसे ॥ ५ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब राजा श्रुतर्वाने महर्षिके सामने अपने आय-व्ययका पूरा ब्योरा रख दिया और कहा—'ज्ञानी महर्षे! इस धनमेंसे जो आप ठीक समझें, वह ले लें' ॥ ५ ॥

तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः ।

सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ६ ॥ ब्रह्मर्षि अगस्त्यकी बुद्धि सम थी। उन्होंने आय और व्यय दोनोंको बराबर देखकर यह विचार किया कि इसमेंसे थोड़ा-सा भी धन लेनेपर दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ ६ ॥ स श्रुतर्वाणमादाय ब्रध्नश्वमगमत् ततः । स च तौ विषयस्यान्ते प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ॥ ७ ॥ तब वे श्रुतर्वाको साथ लेकर राजा ब्रध्नश्वके पास गये। उन्होंने भी अपने राज्यकी सीमापर आकर उन दोनों सम्माननीय अतिथियोंकी अगवानी की और विधिपूर्वक उन्हें अपनाया ॥ ७ ॥ तयोरर्घ्यं च पाद्यं च ब्रध्नश्वः प्रत्यवेदयत् । अनुज्ञाप्य च पप्रच्छ प्रयोजनमुपक्रमे ॥ ८ ॥ ब्रध्नश्वने उन दोनोंको अर्घ्य और पाद्य निवेदन किये, फिर उनकी आज्ञा ले अपने यहाँ पधारनेका प्रयोजन पूछा ॥ ८ ॥

अगस्त्य उवाच वित्तकामाविह प्राप्तौ विद्ध्यावां पृथिवीपते । यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नौ ॥ ९ ॥ अगस्त्यजीने कहा— पृथिवीपते! आपको विदित हो कि हम दोनों आपके यहाँ धनकी इच्छासे आये हैं। दूसरे प्राणियोंको कष्ट न देते हुए जो धन आपके पास बचता हो, उसमेंसे यथाशक्ति कुछ भाग हमें भी दीजिये ॥ ९ ॥

लोमश उवाच तत आयव्ययौ पूर्णौ ताभ्यां राजा न्यवेदयत् । अतो ज्ञात्वा तु गृह्णीतं यदत्र व्यतिरिच्यते ॥ १० ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब राजा ब्रध्नश्वने भी उन दोनोंके सामने आय और व्ययका पूरा विवरण रख दिया और कहा—'आप दोनोंको इसमें जो धन अधिक जान पड़ता हो, वह ले लें' ॥ १० ॥ तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः । सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ११ ॥ तब समान बुद्धिवाले ब्रह्मर्षि अगस्त्यने उस विवरणमें आय और व्यय बराबर देखकर यह निश्चय किया कि इसमेंसे यदि थोड़ा-सा भी धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ ११ ॥ पौरुकुत्सं ततो जग्मुस्त्रसदस्युं महाधनम् । अगस्त्यश्च श्रुतर्वा च ब्रध्नश्वश्च महीपतिः ॥ १२ ॥