महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! कश्यपनन्दन विभाण्डकके पुत्र ऋष्यशृंग मृगीके पेटसे कैसे उत्पन्न हुए? मनुष्यका पशुयोनिसे संसर्ग करना तो शास्त्र और व्यवहार दोनों ही दृष्टियोंसे विरुद्ध है। ऐसे विरुद्ध योनि-संसर्गसे उत्पन्न हुआ बालक तपस्वी कैसे हो सका? उस बुद्धिमान् बालकके भयसे बल और वृत्रासुरका विनाश करनेवाले देवराज इन्द्रने अनावृष्टिके समय वर्षा कैसे की? ।। २७-२८ ।।
कथंरूपा च सा शान्ता राजपुत्री यतव्रता ।
लोभयामास या चेतो मृगभूतस्य तस्य वै ।। २९ ।।
लोमपादश्च राजर्षिर्यदाश्रूयत धार्मिकः ।
कथं वै विषये तस्य नावर्षत् पाकशासनः ।। ३० ।।
नियम और व्रतका पालन करनेवाली राजकुमारी शान्ता भी कैसी थी, जिसने मृगस्वरूप मुनिका भी मन मोह लिया। राजर्षि लोमपाद तो बड़े धर्मात्मा सुने गये हैं, फिर उनके राज्यमें इन्द्र वर्षा क्यों नहीं करते थे? ।। २९-३० ।।
एतन्मे भगवन् सर्वं विस्तरेण यथातथम् ।
वक्तुमर्हसि शुश्रूषोर्ऋष्यशृङ्गस्य चेष्टितम् ।। ३१ ।।
भगवन्! ये सब बातें आप विस्तारपूर्वक यथार्थ-रूपसे बताइये। मैं महर्षि ऋष्यशृंगके चरित्रको सुनना चाहता हूँ ।। ३१ ।।
लोमश उवाच
विभाण्डकस्य विप्रर्षेस्तपसा भावितात्मनः ।
अमोघवीर्यस्य सतः प्रजापतिसमद्युतेः ।। ३२ ।।
शृणु पुत्रो यथा जात ऋष्यशृङ्ग प्रतापवान् ।
महार्हस्य महातेजा बालः स्थविरसम्मतः ।। ३३ ।।
लोमशजीने कहा— राजन्! ब्रह्मर्षि विभाण्डकका अन्तःकरण तपस्यासे पवित्र हो गया था। वे प्रजापतिके समान तेजस्वी और अमोघवीर्य महात्मा थे। उनके प्रतापी पुत्र ऋष्यशृंगका जन्म कैसे हुआ, यह बताता हूँ, सुनो। जैसे विभाण्डक मुनि परम पूजनीय थे, वैसे ही उनका पुत्र भी बड़ा तेजस्वी हुआ। वह बाल्यावस्थामें भी वृद्ध पुरुषोंद्वारा सम्मानित होता था ।। ३२-३३ ।।
महाह्रदं समासाद्य काश्यपस्तपसि स्थितः ।
दीर्घकालं परिश्रान्त ऋषिः स देवसम्मितः ।। ३४ ।।
कश्यपगोत्रीय विभाण्डक मुनि देवताओंके समान सुन्दर थे। वे एक बहुत बड़े कुण्डमें प्रविष्ट होकर तपस्या करने लगे। उन्होंने दीर्घकालतक महान् क्लेश सहन किया ।। ३४ ।।
तस्य रेतः प्रचस्कन्द दृष्ट्वाप्सरसमुर्वशीम् ।
अप्सूपस्पृशतो राजन् मृगी तच्चापिबत् तदा ।। ३५ ।।
सह तोयेन तृषिता गर्भिणी चाभवत् ततः । सा पुरोक्ता भगवता ब्रह्मणा लोककर्तृणा ॥ ३६ ॥ देवकन्या मृगी भूत्वा मुनिं सूय विमोक्ष्यसे । अमोघत्वाद् विधेश्चैव भावित्वाद् दैवनिर्मितात् ॥ ३७ ॥ तस्यां मृग्यां समभवत् तस्य पुत्रो महानृषिः । ऋष्यशृङ्गस्तपोनित्यो वन एवाभ्यवर्तत ॥ ३८ ॥
राजन्! एक दिन जब वे जलमें स्नान कर रहे थे, उर्वशी अप्सराको देखकर उनका वीर्य स्खलित हो गया। उसी समय प्याससे व्याकुल हुई एक मृगी वहाँ आयी और पानीके साथ उस वीर्यको भी पी गयी। इससे उसके गर्भ रह गया। वह पूर्वजन्ममें एक देवकन्या थी। लोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माने उसे यह वचन दिया था कि तू मृगी होकर एक मुनिको जन्म देनेके पश्चात् उस योनिसे मुक्त हो जायगी। ब्रह्माजीकी वाणी अमोघ है और दैवके विधानको कोई टाल नहीं सकता, इसलिये विभाण्डकके पुत्र महर्षि ऋष्यशृंगका जन्म मृगीके ही पेटसे हुआ। वे सदा तपस्यामें संलग्न रहकर वनमें ही निवास करते थे ॥ ३५-३८ ॥
तस्यर्षेः शृङ्गं शिरसि राजन्नासीन्महात्मनः ।
तेनर्ष्यशृङ्ग इत्येवं तदा स प्रथितोऽभवत् ॥ ३९ ॥ राजन्! उन महात्मा मुनिके सिरपर एक सींग था, इसलिये उस समय उनका ऋष्यशृंग नाम प्रसिद्ध हुआ ॥ ३९ ॥
न तेन दृष्टपूर्वोऽन्यः पितुरन्यत्र मानुषः । तस्मात् तस्य मनो नित्यं ब्रह्मचर्येऽभवन्नृप ॥ ४० ॥ नरेश्वर! उन्होंने अपने पिताके सिवा दूसरे किसी मनुष्यको पहले कभी नहीं देखा था, इसलिये उनका मन सदा स्वभावसे ही ब्रह्मचर्यमें संलग्न रहता था ॥ ४० ॥
एतस्मिन्नेव काले तु सखा दशरथस्य वै । लोमपाद इति ख्यातो ह्यङ्गानामीश्वरोऽभवत् ॥ ४१ ॥ इन्हीं दिनों राजा दशरथके मित्र लोमपाद अंगदेशके राजा हुए ॥ ४१ ॥
तेन कामात् कृतं मिथ्या ब्राह्मणस्येति नः श्रुतिः । स ब्राह्मणैः परित्यक्तस्ततो वै जगतः पतिः ॥ ४२ ॥ पुरोहितापहाराच्च तस्य राज्ञो यदृच्छया । न ववर्ष सहस्राक्षस्ततोऽपीड्यन्त वै प्रजाः ॥ ४३ ॥ उन्होंने जान-बूझकर एक ब्राह्मणके साथ मिथ्या व्यवहार किया—यह बात हमारे सुननेमें आयी है। इसी अपराधके कारण ब्राह्मणोंने राजा लोमपादको त्याग दिया था। राजाने पुरोहितपर मनमाना दोषारोपण किया था, इसलिये इन्द्रने उनके राज्यमें वर्षा बंद कर दी। इस अनावृष्टिके कारण प्रजाको बड़ा कष्ट होने लगा ॥ ४२-४३ ॥
स ब्राह्मणान् पर्यपृच्छत् तपोयुक्तान् मनीषिणः । प्रवर्षणे सुरेन्द्रस्य समर्थान् पृथिवीपते ॥ ४४ ॥ युधिष्ठिर! तब राजाने तपस्वी, मेधावी और इन्द्रसे वर्षा करवानेमें समर्थ ब्राह्मणोंको बुलाकर इस संकटके निवारणका उपाय पूछा ॥ ४४ ॥
कथं प्रवर्षेत् पर्जन्य उपायः परिदृश्यताम् । तमूचुश्चोदितास्ते तु स्वमतानि मनीषिणः ॥ ४५ ॥ 'विप्रगण! मेघ कैसे वर्षा करे—यह उपाय सोचिये।' उनके पूछनेपर मनीषी महात्माओंने अपना-अपना विचार बताया ॥ ४५ ॥
तत्र त्वेको मुनिवरस्तं राजानमुवाच ह । कुपितास्तव राजेन्द्र ब्राह्मणा निष्कृतिं चर ॥ ४६ ॥ उन्हीं ब्राह्मणोंमें एक श्रेष्ठ महर्षि भी थे। उन्होंने राजासे कहा—'राजेन्द्र! तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण कुपित हैं; इसके लिये तुम प्रायश्चित्त करो' ॥ ४६ ॥
ऋष्यशृङ्गं मुनिसुतमानयस्व च पार्थिव । वानेयमनभिज्ञं च नारीणामार्जवे रतम् ॥ ४७ ॥ स चेदवतरेद् राजन् विषयं ते महातपाः ।
सद्यः प्रवर्षेत् पर्जन्य इति मे नात्र संशयः ॥ ४८ ॥ 'भूपाल! साथ ही हम तुम्हें यह सलाह देते हैं कि अपने राज्यमें महर्षि विभाण्डकके पुत्र वनवासी ऋष्यशृंगको बुलाओ। वे स्त्रियोंसे सर्वथा अपरिचित हैं और सदा सरल व्यवहारमें ही तत्पर रहते हैं। महाराज! वे महातपस्वी ऋष्यशृङ्ग यदि आपके राज्यमें पदार्पण करें तो तत्काल ही मेघ वर्षा करेगा इस विषयमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है' ॥ ४७-४८ ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो राजन् कृत्वा निष्कृतिमात्मनः । स गत्वा पुनरागच्छत् प्रसन्नेषु द्विजातिषु ॥ ४९ ॥ 'राजन्! यह सुनकर राजा लोमपाद अपने अपराधका प्रायश्चित्त करके ब्राह्मणोंके पास गये और जब वे प्रसन्न हो गये तब पुनः अपनी राजधानीको लौट आये' ॥ ४९ ॥
राजानमागतं श्रुत्वा प्रतिसंजहृषुः प्रजाः । ततोऽङ्गपतिराहूय सचिवान् मन्त्रकोविदान् ॥ ५० ॥ ऋष्यशृङ्गागमे यत्नमकरोन्मन्त्रनिश्चये । सोऽध्यगच्छदुपायं तु तैरमात्यैः सहाच्युतः ॥ ५१ ॥ शास्त्रज्ञैरलमर्थज्ञैर्नीत्यां च परिनिष्ठितैः । ततश्चानाययामास वारमुख्या महीपतिः ॥ ५२ ॥ वेश्याः सर्वत्र निष्णातास्ता उवाच स पार्थिवः । ऋष्यशृङ्गमृषेः पुत्रमानयध्वमुपायतः ॥ ५३ ॥ राजाका आगमन सुनकर प्रजाजनोंको बड़ा हर्ष हुआ। तदनन्तर अंगराज मन्त्रकुशल मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे सलाह करके एक निश्चयपर पहुँच जानेके बाद मुनिकुमार ऋष्यशृंगको अपने यहाँ ले आनेके प्रयत्नमें लग गये। राजाके मन्त्री शास्त्रज्ञ, अर्थशास्त्रके विद्वान् और नीतिनिपुण थे। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेशने उन मन्त्रियोंके साथ विचार करके एक उपाय जान लिया। तत्पश्चात् भूपाल लोमपादने दूसरोंको लुभानेकी सब कलाओंमें कुशल प्रधान-प्रधान वेश्याओंको बुलाया और कहा—'तुमलोग कोई उपाय करके मुनिकुमार ऋष्यशृंगको यहाँ ले आओ ॥ ५०—५३ ॥
लोभयित्वाभिविश्वास्य विषयं मम शोभनाः । ता राजभयभीताश्च शापभीताश्च योषितः ॥ ५४ ॥ अशक्यमूचुस्तत् कार्यं विवर्णा गतचेतसः । तत्र त्वेका जरद्योषा राजानमिदमब्रवीत् ॥ ५५ ॥ 'सुन्दरियो! तुम लुभाकर उन्हें सब प्रकारसे सुख-सुविधाका विश्वास दिलाकर मेरे राज्यमें ले आना।' महाराजकी यह बात सुनते ही वेश्याओंका रंग फीका पड़ गया। वे अचेत-सी हो गयीं। एक ओर तो उन्हें राजाका भय था और दूसरी ओर वे मुनिके शापसे
डरी हुई थीं; अतः उन्होंने इस कार्यको असम्भव बताया। उन सबमें एक बूढ़ी स्त्री थी। उसने राजासे इस प्रकार कहा— ।। ५४-५५ ।।
प्रयतिष्ये महाराज तमानेतुं तपोधनम् ।
अभिप्रेतांस्तु मे कामांस्त्वमनुज्ञातुमर्हसि ।। ५६ ।।
ततः शक्ष्याम्यानयितुमृष्यशृङ्गमृषेः सुतम् ।
तस्याः सर्वमभिप्रेतमन्वजानात् स पार्थिवः ।। ५७ ।।
‘महाराज! मैं उन तपोधन मुनिकुमारको लानेका प्रयत्न करूँगी; परंतु आप यह आज्ञा दें कि मैं इसके लिये मनचाही व्यवस्था कर सकूँ। यदि मेरी इच्छा पूर्ण हुई तो मैं मुनिपुत्र ऋष्यशृंगको यहाँ लानेमें सफल हो सकूँगी।’ राजाने उसकी इच्छाके अनुसार व्यवस्था करनेकी आज्ञा दे दी ।। ५६-५७ ।।
धनं च प्रददौ भूरि रत्नानि विविधानि च ।
ततो रूपेण सम्पन्ना वयसा च महीपते ।
स्त्रिय आदाय काश्चित् सा जगाम वनमञ्जसा ।। ५८ ।।
साथ ही उसे प्रचुर धन और नाना प्रकारके रत्न भी दिये। युधिष्ठिर! तदनन्तर वह वेश्या रूप और यौवनसे सम्पन्न कुछ सुन्दरी स्त्रियोंको साथ लेकर शीघ्रतापूर्वक वनकी ओर चल दी ।। ५८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृंगोपाख्याने दशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृंगोपाख्यानविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११० ।।
१११-
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
वेश्याका ऋष्यशृंगको लुभाना और विभाण्डक मुनिका आश्रमपर आकर अपने पुत्रकी चिन्ताका कारण पूछना
लोमश उवाच
सा तु नाव्याश्रमं चक्रे राजकार्यार्थसिद्धये ।
संदेशाच्चैव नृपतेः स्वबुद्ध्या चैव भारत ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**भरतनन्दन! उस वेश्याने राजाकी आज्ञाके अनुसार और अपनी बुद्धिसे भी उनका कार्य सिद्ध करनेके लिये नावपर एक सुन्दर आश्रम बनाया ॥ १ ॥
नानापुष्पफलैर्वृक्षैः कृत्रिमैरुपशोभितैः ।
नानागुल्मलतोपेतैः स्वादुकामफलप्रदैः ॥ २ ॥
वह आश्रम भाँति-भाँतिके पुष्प और फलोंसे सुशोभित कृत्रिम वृक्षोंसे घिरा हुआ था। उन वृक्षोंपर नाना प्रकारके गुल्म और लतासमूह फैले हुए थे और वे वृक्ष स्वादिष्ट एवं वांछनीय फल देनेवाले थे ॥ २ ॥
अतीव रमणीयं तदतीव च मनोहरम् ।
चक्रे नाव्याश्रमं रम्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥ ३ ॥
उन वृक्षोंके कारण वह आश्रम अत्यन्त रमणीय और परम मनोहर दिखायी देता था। वेश्याने उस नावपर जिस सुन्दर आश्रमका निर्माण किया था, वह देखनेमें अद्भुत-सा था ॥ ३ ॥
ततो निबध्य तां नावमदूरे काश्यपाश्रमात् ।
चारयामास पुरुषैर्विहारं तस्य वै मुनेः ॥ ४ ॥
तदनन्तर उसने अपनी उस नावको काश्यप गोत्रीय विभाण्डक मुनिके आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर बाँध दिया और गुप्तचरोंको भेजकर यह पता लगा लिया कि इस समय विभाण्डक मुनि अपनी कुटियासे बाहर गये हैं ॥ ४ ॥
ततो दुहितरं वेश्यां समाधायेतिकार्यताम् ।
दृष्ट्वान्तरं काश्यपस्य प्राहिणोद् बुद्धिसम्मताम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर विभाण्डक मुनिको दूर गया देख उस वेश्याने अपनी परम बुद्धिमती पुत्रीको जो उसीकी भाँति वेश्यावृत्ति अपनाये हुए थी, कर्तव्यकी शिक्षा देकर मुनिके आश्रमपर भेजा ॥ ५ ॥
सा तत्र गत्वा कुशला तपोनित्यस्य संनिधौ ।
आश्रमं तं समासाद्य ददर्श तमृषेः सुतम् ॥ ६ ॥
वह भी कार्यसाधनमें कुशल थी। उसने वहाँ जाकर निरन्तर तपस्यामें लगे रहनेवाले ऋषिकुमार ऋष्यशृंगके समीप उस आश्रममें पहुँचकर उनको देखा ॥ ६ ॥
वेश्योवाच
कच्चिन्मुने कुशलं तापसानां कच्चिच्च वो मूलफलं प्रभूतम् । कच्चिद् भवान् रमते चाश्रमेऽस्मिं- स्त्वां वै द्रष्टुं साम्प्रतमागतोऽस्मि ॥ ७ ॥ ‘तत्पश्चात्' वेश्याने कहा—मुने! तपस्वीलोग कुशलसे तो हैं न? आपलोगोंको पर्याप्त फल-मूल तो मिल जाते हैं न? आप इस आश्रममें प्रसन्न तो हैं न? मैं इस समय आपके दर्शनके लिये ही यहाँ आयी हूँ ॥ ७ ॥
कच्चित् तपो वर्धते तापसानां पिता च ते कच्चिदहीनतेजाः । कच्चित् त्वया प्रीयते चैव विप्र कच्चित् स्वाध्यायः क्रियते चर्ष्यशृङ्ग ॥ ८ ॥ क्या तपस्वीलोगोंकी तपस्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है? आपके पिताका तेज क्षीण तो नहीं हो रहा है? ब्रह्मन्! आप मजेमें हैं न? ऋष्यशृंगजी! आपके स्वाध्यायका क्रम चल रहा है न? ॥ ८ ॥
ऋष्यशृङ्ग उवाच
ऋद्ध्या भवाञ्ज्योतिरिव प्रकाशते मन्ये चाहं त्वामभिवादनीयम् । पाद्यं वै ते सम्प्रदास्यामि कामाद् यथाधर्मं फलमूलानि चैव ॥ ९ ॥ ऋष्यशृंग बोले—ब्रह्मन्! आप अपनी समृद्धिसे ज्योतिकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। मैं आपको अपने लिये वन्दनीय मानता हूँ और स्वेच्छासे धर्मके अनुसार आपके लिये पाद्य-अर्घ्य एवं फल-मूल अर्पण करता हूँ ॥ ९ ॥
कौश्यां बृष्यामास्स्व यथोपजोषं कृष्णाजिनेनावृतायां सुखायाम् । क्व चाश्रमस्तव किं नाम चेदं व्रतं ब्रह्मंश्चरसि हि देववत् त्वम् ॥ १० ॥ इस कुशासनपर आप सुखपूर्वक बैठें। इसपर काला मृगचर्म बिछाया गया है, इसलिये इसपर बैठनेमें आराम रहेगा। आपका आश्रम कहाँ है? और आपका नाम क्या है? ब्रह्मन्! आप देवताके समान यह किस व्रतका आचरण कर रहे हैं? ॥ १० ॥
वेश्योवाच
ममाश्रमः काश्यपपुत्र रम्य-
स्त्रियोजनं शैलमिमं परेण ।
तत्र स्वधर्मो नाभिवादनं मे
न चोदकं पाद्यमुपस्पृशामि ॥ ११ ॥
**वेश्या बोली—**काश्यपनन्दन! मेरा आश्रम बड़ा मनोहर है। वह इस पर्वतके उस पार तीन योजनकी दूरीपर स्थित है। वहाँ मेरा जो अपना धर्म है उसके अनुसार आपको मेरा अभिवादन (प्रणाम) नहीं करना चाहिये। मैं आपके दिये हुए अर्घ्य और पाद्यका स्पर्श नहीं करूँगी ॥ ११ ॥
भवता नाभिवाद्योऽहमभिवाद्यो भवान् मया ।
व्रतमेतादृशं ब्रह्मन् परिष्वज्यो भवान् मया ॥ १२ ॥
मैं आपके लिये वन्दनीय नहीं हूँ। आप ही मेरे वन्दनीय हैं। ब्रह्मन्! मेरा यह नियम है, जिसके अनुसार मुझे आपका आलिंगन करना चाहिये ॥ १२ ॥
ऋष्यशृङ्ग उवाच
फलानि पक्वानि ददानि तेऽहं
भल्लातकान्यामलकानि चैव ।
करूषकाणीङ्गुदधन्वनानि
पिप्पलानां कामकारं कुरुष्व ॥ १३ ॥
**ऋष्यशृंगने कहा—**ब्रह्मन्! मैं तुम्हें पके फल दे रहा हूँ। ये भिलावा, आँवले, करूषक (फालसा), इंगुद (हिंगोट), धन्वन (धामिन) और पीपलके फल प्रस्तुत हैं—इन सबका इच्छानुसार उपयोग कीजिये ॥ १३ ॥
लोमश उवाच
सा तानि सर्वाणि विवर्जयित्वा
भक्ष्याण्यनर्हाणि ददौ ततोऽस्य ।
तान्यृष्यशृङ्गस्य महारसानि
भृशं सुरूपाणि रुचिं ददुर्हि ॥ १४ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वेश्याने उन सब फलोंको छोड़कर स्वयं ऋष्यशृंगको अत्यन्त सुन्दर और अमूल्य भक्ष्य पदार्थ (फल आदि) दिये। उन परम सरस फलोंने उनकी रुचिको बढ़ाया ॥ १४ ॥
ददौ च माल्यानि सुगन्धवन्ति
चित्राणि वासांसि च भानुमन्ति ।
पेयानि चाग्र्याणि ततो मुमोद
चिक्रीड चैव प्रजहास चैव ॥ १५ ॥ सा कन्दुकेनारमतास्य मूले विभज्यमाना फलिता लतेव । गात्रैश्च गात्राणि निषेवमाणा समाश्लिषच्चासकृदृष्यशृङ्गम् ॥ १६ ॥ साथ ही सुगन्धित मालाएँ तथा विचित्र एवं चमकीले वस्त्र प्रदान किये। इतना ही नहीं, उसने मुनिकुमारको अच्छी श्रेणीके पेय पिलाये जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए। वे उसके साथ खेलने और जोर-जोरसे हँसने लगे। वेश्या ऋष्यशृंगके पास ही गेंद खेलने लगी। वह अपने अंगोंको मोड़ती हुई फलोंके भारसे लदी लताकी भाँति झुक जाती और ऋष्यशृंग मुनिको बार-बार अपने अंकमें भर लेती थी। साथ ही अपने अंगोंसे उनके अंगोंको इस प्रकार दबाती मानो उनके भीतर समा जायगी ॥ १५-१६ ॥
सर्जानिशोकांस्तिलकांश्च वृक्षान् सुपुष्पितानवनाम्यावभज्य । विलज्जमानेव मदाभिभूता प्रलोभयामास सुतं महर्षेः ॥ १७ ॥ वहाँ शाल, अशोक और तिलकके वृक्ष खूब फूले हुए थे। उनकी डालियोंको झुकाकर वह मदोन्मत्त वेश्या लज्जाका नाट्य-सा करती हुई महर्षिके उस पुत्रको लुभाने लगी ॥ १७ ॥
अथर्ष्यशृङ्गं विकृतं समीक्ष्य पुनः पुनः पीड्य च कायमस्र्य । अवेक्ष्यमाणा शनकैर्र्जगाम कृत्वाग्निहोत्रस्य तदापदेशम् ॥ १८ ॥ ऋष्यशृंगकी आकृतिमें किंचित् विकार देखकर उसने बार-बार उनके शरीरको आलिंगनके द्वारा दबाया और अग्निहोत्रका बहाना बनाकर वह उनके द्वारा देखी जाती हुई धीरे-धीरे वहाँसे चली गयी ॥ १८ ॥
तस्यां गतायां मदनेन मत्तो विचेतनश्चाभवदृष्यशृङ्गः । तामेव भावेन गतेन शून्ये विनिःश्वसन्नार्तरूपो बभूव ॥ १९ ॥ उसके चले जानेपर उसके अनुरागसे उन्मत्त मुनिकुमार ऋष्यशृंग अचेत-से हो गये। उस निर्जन स्थानमें उनकी मनोवृत्ति उसीकी ओर लगी रही और वे लंबी साँस खींचते हुए अत्यन्त व्यथित हो उठे ॥ १९ ॥
ततो मुहूर्ताद्धरिपिङ्गलाक्षः प्रवेष्टितो रोमभिरानखाग्रात् । स्वाध्यायवान् वृत्तसमाधियुक्तो विभाण्डकः काश्यपः प्रादुरासीत् ॥ २० ॥ तदनन्तर दो घड़ीके बाद हरे-पीले नेत्रोंवाले काश्यपनन्दन विभाण्डक मुनि वहाँ आ पहुँचे। वे सिरसे लेकर पैरोंके नखोंतक रोमावलियोंसे भरे हुए थे। महात्मा विभाण्डक स्वाध्यायशील, सदाचारी तथा समाधिनिष्ठ महर्षि थे ॥ २० ॥
सोऽपश्यदासीनमुपेत्य पुत्रं ध्यायन्तमेकं विपरीतचित्तम् । विनिःश्वसन्तं मुहुरूर्ध्वदृष्टिं विभाण्डकः पुत्रमुवाच दीनम् ॥ २१ ॥
न कल्प्यन्ते समिधः किं नु तात कच्चिद्धुतं चाग्निहोत्रं त्वयाद्य । सुनिर्णिंक्तं स्रुक्स्रुवं होमधेनुः कच्चित् सवत्साद्य कृता त्वया च ॥ २२ ॥
न वै यथापूर्वमिवासि पुत्र चिन्तापरश्चासि विचेतनश्च । दीनोऽतिमात्रं त्वमिहाद्य किं नु पृच्छामि त्वां क इहाद्यागतोऽभूत् ॥ २३ ॥
निकट आनेपर उन्होंने अपने पुत्रको अकेला उदासीन भावसे चिन्तामग्न होकर बैठा देखा। उसके चित्तकी दशा विपरीत थी। वह बार-बार ऊपरकी ओर दृष्टि किये उच्छ्वास ले रहा था। इस दयनीय दशामें पुत्रको देखकर विभाण्डक मुनिने पूछा—‘तात! आज तुम अग्निकुण्डमें समिधाएँ क्यों नहीं रख रहे हो! क्या तुमने अग्निहोत्र कर लिया? स्रुक् और स्रुवा आदि यज्ञपात्रोंको भलीभाँति शुद्ध करके रखा है न? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि तुमने हवनके लिये दूध देनेवाली गायका बछड़ा खोल दिया हो जिससे वह सारा दूध पी गया हो। बेटा! आज तुम पहले-जैसे दिखायी नहीं देते। किसी भारी चिन्तामें निमग्न हो, अपनी सुध-बुध खो बैठे हो। क्या कारण है जो आज तुम अत्यन्त दीन हो रहे हो। मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, आज यहाँ कौन आया था?’ ।। २१—२३ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। १११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृंगोपाख्यानविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १११ ।।
ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन
ऋष्यशृङ्ग उवाच
इहागतो जटिलो ब्रह्मचारी
न वै ह्रस्वो नातिदीर्घो मनस्वी।
सुवर्णवर्णः कमलायताक्षः
स्वतः सुराणामिव शोभमानः॥ १॥
ऋष्यशृंगने कहा— पिताजी! यहाँ एक जटाधारी ब्रह्मचारी आया था। वह न तो छोटा था और न बहुत बड़ा ही। उसका हृदय बहुत उदार था। उसके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी और बड़ी-बड़ी आँखें कमलोंके सदृश जान पड़ती थीं। वह स्वयं देवताओंके समान सुशोभित हो रहा था॥ १॥
समृद्धरूपः सवितेव दीप्तः
सुश्लक्ष्णकृष्णाक्षिरतीव गौरः।
नीलः प्रसन्नाश्च जटाः सुगन्धा
हिरण्यरज्जुग्रथिताः सुदीर्घाः॥ २॥
उसका रूप बड़ा सुन्दर था। वह सूर्यदेवकी भाँति उद्भासित हो रहा था। उसके नेत्र स्वच्छ, चिकने एवं कजरारे थे। वह बड़ा गोरा दिखाई देता था। उसकी जटाएँ बहुत लम्बी, साफ-सुथरी और नीले रंगकी थीं। उनसे बड़ी मधुर गन्ध फैल रही थी। वे सारी जटाएँ एक सुनहरी रस्सीसे गुँथी हुई थीं॥ २॥
आश्चर्यरूपा पुनरस्य कण्ठे
विभ्राजते विद्युदिवान्तरिक्षे।
द्वौ चास्य पिण्डावधरेण कण्ठा-
दजातरौमौ सुमनोहरौ च॥ ३॥
उसके गलेमें एक ऐसा आश्चर्यजनक आभूषण (कण्ठा) था, जो आकाशमें बिजलीकी भाँति चमक रहा था। उसके गलेसे नीचे (वक्षःस्थलपर) दो मांसपिण्ड थे, जिनपर रोएँ नहीं उगे थे। वे अत्यन्त मनोहर जान पड़ते थे॥ ३॥
विलग्नमध्यश्च स नाभिदेशे
कटिश्च तस्यातिकृतप्रमाणा।
तथास्य चीरान्तरतः प्रभाति
हिरण्मयी मेखला मे यथेयम् ॥ ४ ॥ उस ब्रह्मचारीके नाभिदेशके समीप जो शरीरका मध्य भाग था, वह बहुत पतला था और उसका नितम्बभाग अत्यन्त स्थूल था। जैसे मेरे कौपीनके नीचे यह मूँजकी मेखला बँधी है, इसी प्रकार उसके कटि-प्रदेशमें भी एक सोनेकी मेखला (करधनी) थी, जो उसके चीरके भीतरसे चमकती रहती थी ॥ ४ ॥
अन्यच्च तस्याद्भुतदर्शनीयं विकूजितं पादयोः सम्प्रभाति । पाण्योश्च तद्वत् स्वनवन्निबद्धौ कलापकावक्षमाला यथेयम् ॥ ५ ॥ उसकी अन्य सब बातें भी अद्भुत एवं दर्शनीय थीं। पैरोंमें (पायलकी) छम-छम ध्वनि बड़ी मधुर प्रतीत होती थी। इसी प्रकार हाथोंकी कलाइयोंमें मेरी इस रुद्राक्षकी मालाकी भाँति उसने दो कलापक (कंगन) बाँध रखे थे, उनसे भी बड़ी मधुर ध्वनि होती रहती थी ॥ ५ ॥
विचेष्टमानस्य च तस्य तानि कूजन्ति हंसाः सरसीव मत्ताः । चीराणि तस्याद्भुतदर्शनानि नेमानि तद्वन्मम रूपवन्ति ॥ ६ ॥ वह ब्रह्मचारी जब तनिक भी चलता-फिरता या हिलता-डुलता था, उस समय उसके आभूषण बड़ी मनोहर झनकार उत्पन्न करते थे, मानो सरोवरमें मतवाले हंस कलरव कर रहे हों। उसके चीर भी अद्भुत दिखायी देते थे। मेरी कौपीनके ये वल्कलवस्त्र वैसे सुन्दर नहीं हैं ॥ ६ ॥
वक्त्रं च तस्याद्भुतदर्शनीयं प्रव्याहृतं ह्लादयतीव चेतः । पुंस्कोकिलस्येव च तस्य वाणी तां शृण्वतो मे व्यथितोऽन्तरात्मा ॥ ७ ॥ उसका मुख भी देखने ही योग्य था। उसकी अद्भुत शोभा थी। ब्रह्मचारीकी एक-एक बात मनको आनन्द-सिन्धुमें निमग्न-सा कर देती थी। उसकी वाणी कोकिलके समान थी, जिसे एक बार सुन लेनेपर अब पुनः सुननेके लिये मेरी अन्तरात्मा व्यथित हो उठी है ॥ ७ ॥
यथा वनं माधवमासि मध्ये समीरितं श्वसनेनेव भाति । तथा स भात्युत्तमपुण्यगन्धी निषेव्यमाणः पवनेन तात ॥ ८ ॥
तात! जैसे माधवमास (वैशाख या वसंत ऋतु) में (सौरभयुक्त मलय-) समीरसे सेवित वन-उपवनकी शोभा होती है, उसी प्रकार पवनदेवसे सेवित वह ब्रह्मचारी उत्तम एवं पवित्र गन्धसे सुवासित और सुशोभित हो रहा था ॥ ८ ॥ सुसंयताश्चापि जटा विषक्ता द्वैधीकृता नातिसमा ललाटे । कर्णौ च चित्रैरिव चक्रवाकैः समावृतौ तस्य सुरूपवद्भिः ॥ ९ ॥ उसकी जटा सटी हुई और अच्छी प्रकार बँधी हुई थी, जो ललाटप्रदेशमें दो भागोंमें विभक्त थी; किंतु बराबर नहीं थी। उसके कुण्डलमण्डित कान सुन्दर एवं विचित्र चक्रवाकोंसे घिरे हुए-से जान पड़ते थे ॥ ९ ॥ तथा फलं वृत्तमथो विचित्रं समाहरत् पाणिना दक्षिणेन । तद् भूमिमासाद्य पुनः पुनश्च समुत्पतत्यद्भुतरूपमुच्चैः ॥ १० ॥ उसके पास एक विचित्र गोलाकार फल (गेंद) था, जिसपर वह अपने दाहिने हाथसे आघात करता था। वह फल (गेंद) पृथ्वीपर जाकर बार-बार ऊँचेकी ओर उछलता था; उस समय उसका रूप अद्भुत दिखायी देता था ॥ १० ॥ तच्चाभिहत्य परिवर्ततेऽसौ वातेरितो वृक्ष इवावघूर्णन् । तं प्रेक्षतः पुत्रमिवामराणां प्रीतिः परा तात रतिश्च जाता ॥ ११ ॥ उस फल (गेंद) को मारकर वह चारों ओर घूमने लगता था, मानो वृक्ष हवाका झोंका खाकर झूम रहा हो। तात! देवपुत्रके समान उस ब्रह्मचारीको देखते समय मेरे हृदयमें बड़ा प्रेम और आनन्द उमड़ रहा था और मेरी उसके प्रति आसक्ति हो गयी है ॥ ११ ॥ स मे समाश्लिष्य पुनः शरीरं जटासु गृह्याभ्यवनाम्य वक्त्रम् । वक्त्रेण वक्त्रं प्रणिधाय शब्दं चकार तन्मेऽजनयत् प्रहर्षम् ॥ १२ ॥ वह बार-बार मेरे शरीरका आलिंगन करके मेरी जटा पकड़ लेता और मेरे मुखको झुकाकर उसपर अपना मुख रख देता था, इस प्रकार मुख-से-मुख मिलाकर उससे एक ऐसा शब्द किया, जिसने मेरे हृदयमें अत्यन्त आनन्द उत्पन्न कर दिया ॥ १२ ॥ न चापि पाद्यं बहु मन्यतेऽसौ फलानि चेमानि मयाऽऽहृतानि ।
एवंव्रतोऽस्मीति च मामवोचत्
फलानि चान्यानि समाददन्मे ॥ १३ ॥
मैंने जो पाद्य अर्पण किया, उसको उसने बहुत महत्त्व नहीं दिया। मेरे दिये हुए ये फल भी उसने स्वीकार नहीं किये और मुझसे कहा—'मेरा ऐसा ही नियम है।' साथ ही उसने मेरे लिये दूसरे-दूसरे फल दिये ॥ १३ ॥
मयोपयुक्तानि फलानि यानि
नेमानि तुल्यानि रसेन तेषाम् ।
न चापि तेषां त्वगियं यथैषां
साराणि नैषामिव सन्ति तेषाम् ॥ १४ ॥
मैंने उसके दिये हुए जिन फलोंका उपयोग किया है, उनके समान रस हमारे इन फलोंमें नहीं है। उन फलोंके छिलके भी ऐसे नहीं थे, जैसे इन जंगली फलोंके हैं। इन फलोंके गूदे जैसे हैं, वैसे उसके दिये हुए फलोंके नहीं थे (वे सर्वथा विलक्षण थे) ॥ १४ ॥
तोयानि चैवातिरसानि मह्यं
प्रादात् स वै पातुमुदाररूपः ।
पीत्वैव यान्यभ्यधिकः प्रहर्षो
ममाभवद् भूश्चलितेव चासीत् ॥ १५ ॥
उदारताके मूर्तिमान् स्वरूप उस ब्रह्मचारीने मुझे पीनेके लिये अत्यन्त स्वादिष्ट जल भी दिया था। उस जलको पीते ही मेरे हर्षकी सीमा न रही। मुझे यह धरती डोलती-सी जान पड़ने लगी ॥ १५ ॥
इमानि चित्राणि च गन्धवन्ति
माल्यानि तस्योद्ग्रथितानि पट्टैः ।
यानि प्रकीर्येह गतः स्वमेव
स आश्रमं तपसा द्योतमानः ॥ १६ ॥
ये विचित्र सुगन्धित मालाएँ उसीने रेशमी डोरोंसे गूँथकर बनायी थीं, जिन्हें यहाँ बिखेरकर तपस्यासे प्रकाशित होनेवाला वह ब्रह्मचारी अपने आश्रमको चला गया था ॥ १६ ॥
गतेन तेनास्मि कृतो विचेता
गात्रं च मे सम्परिदह्यतीव ।
इच्छामि तस्यान्तिकमाशु गन्तुं
तं चेह नित्यं परिवर्तमानम् ॥ १७ ॥
उसके चले जानेसे मैं अचेत हो गया हूँ। मेरा शरीर जलता-सा जान पड़ता है। मैं चाहता हूँ, शीघ्र उसके पास ही चला जाऊँ अथवा वही यहाँ नित्य मेरे पास रहे ॥ १७ ॥
गच्छामि तस्यान्तिकमेव तात
का नाम सा ब्रह्मचर्या च तस्य । इच्छाम्यहं चरितुं तेन सार्धं यथा तपः स चरत्यार्यधर्मा ॥ १८ ॥ पिताजी! मैं उसीके पास जाता हूँ, देखूँ, उसकी ब्रह्मचर्यकी साधना कैसी है? वह आर्यधर्मका पालन करनेवाला ब्रह्मचारी जिस प्रकार तप करता है, उसके साथ रहकर मैं भी वैसी ही तपस्या करना चाहता हूँ ॥ १८ ॥ चर्तुं तथेच्छा हृदये ममास्ति दुनोति चित्तं यदि तं न पश्ये ॥ १९ ॥ वैसा ही तप करनेकी इच्छा मेरे हृदयमें भी है। यदि उसे नहीं देखूँगा तो मेरा यह चित्त संतप्त होता रहेगा ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृङ्गोपाख्यानविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥
११३-
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना
विभाण्डक उवाच
रक्षांसि चैतानि चरन्ति पुत्र
रूपेण तेनाद्भुतदर्शनेन ।
अतुल्यवीर्याण्यभिरूपवन्ति
विघ्नं सदा तपसश्चिन्तयन्ति ॥ १ ॥
विभाण्डकने कहा— बेटा! इस प्रकार अद्भुत दर्शनीय रूप धारण करके तो राक्षस ही इस वनमें विचरा करते हैं। ये अनुपम पराक्रमी और मनोहर रूप धारण करनेवाले होते हैं, तथा ऋषि-मुनियोंकी तपस्यामें सदा विघ्न डालनेका ही उपाय सोचते रहते हैं ॥ १ ॥
सुरूपरूपाणि च तानि तात
प्रलोभयन्ते विविधैरुपायैः ।
सुखाच्च लोकाच्च निपातयन्ति
तान्युग्ररूपाणि मुनीन् वनेषु ॥ २ ॥
तात! वे मनोहर रूपधारी राक्षस नाना प्रकारके उपायोंद्वारा मुनिलोगोंको प्रलोभनमें डालते रहते हैं। फिर वे ही भयानक रूप धारण करके वनमें निवास करनेवाले मुनियोंको आनन्दमय लोकोंसे नीचे गिरा देते हैं ॥ २ ॥
न तानि सेवेत मुनिर्यतात्मा
सतां लोकान् प्रार्थयानः कथंचित् ।
कृत्वा विघ्नं तापसानां रमन्ते
पापाचारास्तापसस्तान् न पश्येत् ॥ ३ ॥
अतः जो साधु पुरुषोंको मिलनेवाले पुण्यलोकोंको पाना चाहता है, वह मुनि मनको संयममें रखकर उन राक्षसोंका (जो मोहक रूप बनाकर धोखा देनेके लिये आते हैं) किसी प्रकार सवेन न करे। वे पापाचारी निशाचर तपस्वी मुनियोंके तपमें विघ्न डालकर प्रसन्न होते हैं, अतः तपस्वीको चाहिये कि वह उनकी ओर आँख उठाकर देखे ही नहीं ॥ ३ ॥
असज्जनेनाचरितानि पुत्र
पापान्यपेयानि मधूनि तानि ।
माल्यानि चैतानि न वै मुनीनां
स्मृतानि चित्रोज्ज्वलगन्धवन्ति ॥ ४ ॥ वत्स! जिसे तुम जल समझते थे, वह मद्य था। वह पापजनक और अपेय है, उसे कभी नहीं पीना चाहिये। दुष्ट पुरुष उसका उपयोग करते हैं तथा ये विचित्र, उज्ज्वल और सुगन्धित पुष्पमालाएँ भी मुनियोंके योग्य नहीं बतायी गयी हैं ॥ ४ ॥ रक्षांसि तानीति निवार्य पुत्रं विभाण्डकस्तां मृगयाम्बभूव । नासादयामास यदा त्र्यहेण तदा स पर्याववृतेऽऽश्रमाय ॥ ५ ॥ 'ऐसी वस्तुएँ लानेवाले राक्षस ही हैं।' ऐसा कहकर विभाण्डक मुनिने पुत्रको उससे मिलने-जुलनेसे मना कर दिया और स्वयं उस वेश्याकी खोज करने लगे। तीन दिनोंतक ढूँढ़नेपर भी जब वे उसका पता न लगा सके, तब आश्रमपर लौट आये ॥ ५ ॥ यदा पुनः काश्यपो वै जगाम फलान्याहर्तुं विधिनाऽऽश्रमात् सः । तदा पुनर्लोभयितुं जगाम सा वेशयोषा मुनिमृष्यशृङ्गम् ॥ ६ ॥ जब काश्यपनन्दन विभाण्डक मुनि आश्रमसे पुनः विधिके अनुसार फल लानेके लिये वनमें गये, तब वह वेश्या ऋष्यशृंग मुनिको लुभानेके लिये फिर उनके आश्रमपर आयी ॥ ६ ॥ दृष्ट्वैव तामृष्यशृङ्गः प्रहृष्टः सम्भ्रान्तरूपोऽभ्यपतत् तदानीम् । प्रोवाच चैनां भवतः श्रमाय गच्छाव यावन्न पिता ममैति ॥ ७ ॥ उसे देखते ही ऋष्यशृंग मुनि हर्ष-विभोर हो उठे और घबराकर तुरंत उसके पास दौड़ गये। निकट जाकर उन्होंने कहा—'ब्रह्मन्! मेरे पिताजी जबतक लौटकर नहीं आते, तभीतक मैं और आप—दोनों आपके आश्रमकी ओर चल दें' ॥ ७ ॥ ततो राजन् काश्यपस्यैकपुत्रं प्रवेश्य योगेन विमुच्य नावम् । प्रमोदयन्त्यो विविधैरुपायै- राजग्मुरङ्गाधिपतेः समीपम् ॥ ८ ॥ राजन्! तदनन्तर विभाण्डक मुनिके इकलौते पुत्रको युक्तिसे नावमें ले जाकर वेश्याने नाव खोल दी। फिर सभी युवतियाँ भाँति-भाँतिके उपायोंद्वारा उनका मनोरंजन करती हुई अंगराजके समीप आयीं ॥ ८ ॥ संस्थाप्य तामाश्रमदर्शने तु
सन्तारितां नावमथातिशुभ्राम् । नीरादुपादाय तथैव चक्रे नाव्याश्रमं नाम वनं विचित्रम् ॥ ९ ॥ नाविकोंद्वारा संचालित उस अत्यन्त उज्ज्वल नौकाको जलसे बाहर निकालकर राजाने एक स्थानपर स्थापित कर दिया और जितनी दूरीसे वह नौकागत आश्रम दिखायी देता था, उतनी दूरीके विस्तृत मैदानमें उन्होंने ऋष्यशृंग मुनिके आश्रम-जैसे ही एक विचित्र वनका निर्माण करा दिया, जो ‘नाव्याश्रम’ के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ९ ॥
अन्तःपुरे तं तु निवेश्य राजा विभाण्डकस्यात्मजमेकपुत्रम् । ददर्श देवं सहसा प्रवृष्ट- मापूर्यमाणं च जगज्जलेन ॥ १० ॥ राजा लोमपादने विभाण्डक मुनिके इकलौते पुत्रको महलके भीतर रनिवासमें ठहरा दिया और देखा, सहसा उसी क्षण इन्द्रदेवने वर्षा आरम्भ कर दी तथा सारा जगत् जलसे परिपूर्ण हो गया ॥ १० ॥
स लोमपादः परिपूर्णकामः सुतां ददावृष्यशृङ्गाय शान्ताम् । क्रोधप्रतीकारकरं च चक्रे गाश्चैव मार्गेषु च कर्षणानि ॥ ११ ॥ लोमपादकी कामना पूरी हुई। उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंग मुनिको ब्याह दी। फिर विभाण्डक मुनिके क्रोधके निवारणका भी उपाय कर दिया। जिस रास्तेसे महर्षि आनेवाले थे, उसमें स्थान-स्थानपर बहुत-से गाय-बैल रखवा दिये और किसानोंद्वारा खेतोंकी जुताई आरम्भ करा दी ॥ ११ ॥
विभाण्डकस्याव्रजतः स राजा पशून् प्रभूतान् पशूपांश्च वीरान् । समादिशत् पुत्रगृद्धी महर्षि- र्विभाण्डकः परिपृच्छेद् यदा वः ॥ १२ ॥ स वक्तव्यः प्राञ्जलिभिर्भवद्भिः पुत्रस्य ते पशवः कर्षणं च । किं ते प्रियं वै क्रियतां महर्षे दासाः स्म सर्वे तव वाचि बद्धाः ॥ १३ ॥ राजाने विभाण्डक मुनिके आगमन-पथमें बहुत-से पशु तथा वीर पशुरक्षक भी नियुक्त कर दिये और सबको यह आदेश दे दिया था कि जब पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले महर्षि विभाण्डक तुमसे पूछें तब हाथ जोड़कर उन्हें इस प्रकार उत्तर देना—‘ये सब आपके पुत्रके
ही पशु हैं, ये खेत भी उन्हींके जोते जा रहे हैं। महर्षे! आज्ञा दें, हम आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें। हम सब लोग आपके आज्ञापालक दास हैं' ॥ १२-१३ ॥
अथोपायात् स मुनिश्चण्डकोपः
स्वमाश्रमं मूलफलं गृहीत्वा ।
अन्वेषमाणश्च न तत्र पुत्रं
ददर्श चुक्रोध ततो भृशं सः ॥ १४ ॥
इधर प्रचण्ड कोपधारी महात्मा विभाण्डक फल-मूल लेकर अपने आश्रमपर आये। वहाँ बहुत खोज करनेपर भी जब अपना पुत्र उन्हें दिखायी न दिया, तब वे अत्यन्त क्रोधमें भर गये ॥ १४ ॥
ततः स कोपेन विदीर्यमाण
आशङ्कमानो नृपतेर्विधानम् ।
जगाम चम्पां प्रति धक्ष्यमाण-
स्तमङ्गराजं सपुरं सराष्ट्रम् ॥ १५ ॥
कोपसे उनका हृदय विदीर्ण-सा होने लगा। उनके मनमें यह संदेह हुआ कि कहीं राजा लोमपादकी तो यह करतूत नहीं है। तब वे चम्पानगरीकी ओर चल दिये, मानो अंगराजको उनके राष्ट्र और नगरसहित जला देना चाहते हों ॥ १५ ॥
स वै श्रान्तः क्षुधितः काश्यपस्तान्
घोषान् समासादितवान् समृद्धान् ।
गोपैश्च तैर्विधिवत् पूज्यमानो
राजेव तां रात्रिमुवास तत्र ॥ १६ ॥
थककर भूखसे पीड़ित होनेपर विभाण्डक मुनि सायंकालमें उन्हीं समृद्धिशाली गोष्ठोंमें गये। गोपगणोंने उनकी विधिपूर्वक पूजा की। वे राजाकी भाँति सुख-सुविधाके साथ वहीं रातभर रहे ॥ १६ ॥
अवाप्य सत्कारमतीव तेभ्यः
प्रोवाच कस्य प्रथिताः स्थ गोपाः ।
ऊचुस्ततस्तेऽभ्युपगम्य सर्वे
धनं तवेदं विहितं सुतस्य ॥ १७ ॥
गोपगणोंसे अत्यन्त सत्कार पाकर मुनिने पूछा—'तुम किसके गोपालक हो?' तब उन सबने निकट आकर कहा—'यह सारा धन आपके पुत्रका ही है' ॥
देशेषु देशेषु स पूज्यमान-
स्तांश्चैव शृण्वन् मधुरान् प्रलापान् ।
प्रशान्तभूयिष्ठरजाः प्रहृष्टः
समाससादाङ्गपतिं पुरस्थम् ॥ १८ ॥