भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

भगवान्‌ने हस्तिनापुर जाकर धृतराष्ट्रसे भेंट की और उनसे सबके लिये विशेष हितकारक एवं यथार्थ बातें कहीं॥ ६ १/२ ॥

न च तत् कृतवान् राजा यथा ख्यातं हि तत् पुरा ॥ ७ ॥
अनवाप्य शमं तत्र कृष्णः पुरुषसत्तमः ।
आगच्छत महाबाहुरुपप्लव्यं जनाधिप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! किंतु राजा धृतराष्ट्रने भगवान्‌का कहना नहीं माना। यह सब बात पहले यथार्थरूपसे बतायी गयी है। महाबाहु पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ संधि करानेमें सफलता न मिलनेपर पुनः उपप्लव्यमें ही लौट आये ॥ ७-८ ॥

ततः प्रत्यागतः कृष्णो धार्तराष्ट्रविसर्जितः ।
अक्रियायां नरव्याघ्र पाण्डवानिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
नरव्याघ्र! कार्य न होनेपर धृतराष्ट्रसे विदा ले वहाँसे लौटे हुए श्रीकृष्णने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥

न कुर्वन्ति वचो मह्यं कुरवः कालनोदिताः ।
निर्गच्छध्वं पाण्डवेयाः पुष्येण सहिता मया ॥ १० ॥
‘कौरव कालके अधीन हो रहे हैं, इसलिये वे मेरा कहना नहीं मानते हैं। पाण्डवो! अब तुमलोग मेरे साथ पुष्य नक्षत्रमें युद्धके लिये निकल पड़ो, ॥ १० ॥

ततो विभज्यमानेषु बलेषु बलिनां वरः ।
प्रोवाच भ्रातरं कृष्णं रौहिणेयो महामनाः ॥ ११ ॥
इसके बाद जब सेनाका बँटवारा होने लगा, तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महामना बलदेवजीने अपने भाई श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ११ ॥

तेषामपि महाबाहो साहाय्यं मधुसूदन ।
क्रियतामिति तत् कृष्णो नास्य चक्रे वचस्तदा ॥ १२ ॥
‘महाबाहु मधुसूदन! उन कौरवोंकी भी सहायता करना। परंतु श्रीकृष्णने उस समय उनकी यह बात नहीं मानी’ ॥ १२ ॥

ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दनः ।
तीर्थयात्रां हलधरः सरस्वत्यां महायशाः ॥ १३ ॥
इससे मन-ही-मन कुपित और खिन्न होकर महायशस्वी यदुनन्दन हलधर सरस्वतीके तटपर तीर्थयात्राके लिये चल दिये ॥ १३ ॥

मैत्रनक्षत्रयोगे स्म सहितः सर्वयादवैः ।
आश्रयामास भोजस्तु दुर्योधनमरिंदमः ॥ १४ ॥
इसके बाद शत्रुओंका दमन करनेवाले कृतवर्माने सम्पूर्ण यादवोंके साथ अनुराधानक्षत्रमें दुर्योधनका पक्ष ग्रहण किया ॥ १४ ॥

युयुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् ।

रौहिणेये गते शूरे पुष्येण मधुसूदनः ।। १५ ।।
पाण्डवेयान् पुरस्कृत्य ययावभिमुखः कुरून् ।
सात्यकिसहित भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंका पक्ष लिया। रोहिणीनन्दन शूरवीर बलरामजीके चले जानेपर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंको आगे करके पुष्यनक्षत्रमें कुरुक्षेत्रकी ओर प्रस्थान किया ।। १५ १/२ ।।
गच्छन्नेव पथिस्थस्तु रामः प्रेष्यानुवाच ह ।। १६ ।।
सम्भारांस्तीर्थयात्रायां सर्वोपकरणानि च ।
आनयध्वं द्वारकायामग्नीन् वै याजकांस्तथा ।। १७ ।।
यात्रा करते हुए बलरामजीने स्वयं मार्गमें ही रहकर अपने सेवकोंसे कहा—'तुमलोग शीघ्र ही द्वारका जाकर वहाँसे तीर्थयात्रामें काम आनेवाली सब सामग्री, समस्त आवश्यक उपकरण, अग्निहोत्रकी अग्नि तथा पुरोहितोंको ले आओ ।। १६-१७ ।।
सुवर्णं रजतं चैव धेनूर्वासांसि वाजिनः ।
कुञ्जरांश्च रथांश्चैव खरोष्ट्रं वाहनानि च ।। १८ ।।
क्षिप्रमानीयतां सर्वं तीर्थहेतोः परिच्छदम् ।
'सोना, चाँदी, दूध देनेवाली गायें, वस्त्र, घोड़े, हाथी, रथ, गदहा और ऊँट आदि वाहन एवं तीर्थोपयोगी सब सामान शीघ्र ले आओ ।। १८ १/२ ।।
प्रतिस्रोतः सरस्वत्या गच्छध्वं शीघ्रगामिनः ।। १९ ।।
ऋत्विजश्चानयध्वं वै शतशश्च द्विजर्षभान् ।
'शीघ्रगामी सेवको! तुम सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलो और सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको ले आओ' ।।
एवं संदिश्य तु प्रेष्यान् बलदेवो महाबलः ।। २० ।।
तीर्थयात्रां ययौ राजन् कुरूणां वैशसे तदा ।
सरस्वतीं प्रतिस्रोतः समन्तादभिजग्मिवान् ।। २१ ।।
ऋत्विग्भिश्च सुहृद्भिश्च तथान्यैर्द्विजसत्तमैः ।
रथैर्गजैस्तथाश्वैश्च प्रेष्यैश्च भरतर्षभ ।। २२ ।।
गोखरोष्ट्रप्रयुक्तैश्च यानैश्च बहुभिर्वृतः ।
राजन्! महाबली बलदेवजीने सेवकोंको ऐसी आज्ञा देकर उस समय कुरुक्षेत्रमें ही तीर्थयात्रा आरम्भ कर दी। भरतश्रेष्ठ! वे सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलकर उसके दोनों तटोंपर गये। उनके साथ ऋत्विज, सुहृद्, अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मण, रथ, हाथी, घोड़े और सेवक भी थे। बैल, गदहा और ऊँटोंसे जुते हुए बहुसंख्यक रथोंसे बलरामजी घिरे हुए थे ।। २०—२२ १/२ ।।
श्रान्तानां क्लान्तवपुषां शिशूनां विपुलायुषाम् ।। २३ ।।
देशे देशे तु देयानि दानानि विविधानि च ।

अर्चायै चार्थिनां राजन् कॢप्तानि बहुशस्तथा ॥ २४ ॥ राजन्! उस समय उन्होंने देश-देशमें थके-माँदे रोगी, बालक और वृद्धोंका सत्कार करनेके लिये नाना प्रकारकी देनेयोग्य वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें तैयार करा रखी थीं॥ तानि यानीह देशेषु प्रतीक्षन्ति स्म भारत । बुभुक्षितानामर्थाय कॢप्तमन्नं समन्ततः ॥ २५ ॥ भारत! विभिन्न देशोंमें लोग जिन वस्तुओंकी इच्छा रखते थे, उन्हें वे ही दी जाती थीं। भूखोंको भोजन करानेके लिये सर्वत्र अन्नका प्रबन्ध किया गया था॥ यो यो यत्र द्विजो भोज्यं भोक्तुं कामयते तदा । तस्य तस्य तु तत्रैवमुपजहुस्तदा नृप ॥ २६ ॥ नरेश्वर! जिस किसी देशमें जो-जो ब्राह्मण जब कभी भोजनकी इच्छा प्रकट करता, बलरामजीके सेवक उसे वहीं तत्काल खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित करते थे॥ २६॥ तत्र तत्र स्थिता राजन् रौहिणेयस्य शासनात् । भक्ष्यपेयस्य कुर्वन्ति राशींस्तत्र समन्ततः ॥ २७ ॥ राजन्! रोहिणीकुमार बलरामजीकी आज्ञासे उनके सेवक विभिन्न तीर्थस्थानोंमें खाने-पीनेकी वस्तुओंके ढेर लगाये रखते थे॥ २७॥ वासांसि च महार्हाणि पर्यङ्कास्तरणानि च । पूजार्थं तत्र कॢप्तानि विप्राणां सुखमिच्छताम् ॥ २८ ॥ सुख चाहनेवाले ब्राह्मणोंके सत्कारके लिये बहुमूल्य वस्त्र, पलंग और बिछौने तैयार रखे जाते थे॥ २८॥ यत्र यः स्वपते विप्रो यो वा जागर्ति भारत । तत्र तत्र तु तस्यैव सर्वं कॢप्तमदृश्यत ॥ २९ ॥ भारत! जो ब्राह्मण जहाँ भी सोता या जागता था, वहाँ-वहाँ उसके लिये सारी आवश्यक वस्तुएँ सदा प्रस्तुत दिखायी देती थीं॥ २९॥ यथासुखं जनः सर्वो याति तिष्ठति वै तदा । यातुकामस्य यानानि पानानि तृषितस्य च ॥ ३० ॥ बुभुक्षितस्य चान्नानि स्वादूनि भरतर्षभ । उपजहुर्नरास्तत्र वस्त्राण्याभरणानि च ॥ ३१ ॥ भरतश्रेष्ठ! इस यात्रामें सब लोग सुखपूर्वक चलते और विश्राम करते थे। यात्रीकी इच्छा हो तो उसे सवारियाँ दी जाती थीं, प्यासेको पानी और भूखेको स्वादिष्ट अन्न दिये जाते थे। साथ ही वहाँ बलरामजीके सेवक वस्त्र और आभूषण भी भेंट करते थे॥ ३०-३१॥ स पन्थाः प्रभभौ राजन् सर्वस्यैव सुखावहः । स्वर्गोपमस्तदा वीर नराणां तत्र गच्छताम् ।

नित्यप्रमुदितोपेतः स्वादुभक्ष्यः शुभान्वितः ॥ ३२ ॥
वीर नरेश! वहाँ यात्रा करनेवाले सब लोगोंको वह मार्ग स्वर्गके समान सुखदायक प्रतीत होता था। उस मार्गमें सदा आनन्द रहता, स्वादिष्ट भोजन मिलता और शुभकी ही प्राप्ति होती थी ॥ ३२ ॥

विपण्यापणपण्यानां नानाजनशतैर्वृतः ।
नानाद्रुमलतोपेतो नानारत्नविभूषितः ॥ ३३ ॥
उस पथपर खरीदने-बेचनेकी वस्तुओंका बाजार भी साथ-साथ चलता था, जिसमें नाना प्रकारके सैकड़ों मनुष्य भरे रहते थे। वह हाट भाँति-भाँतिके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित तथा अनेकानेक रत्नोंसे विभूषित दिखायी देता था ॥ ३३ ॥

ततो महात्मा नियमे स्थितात्मा
पुण्येषु तीर्थेषु वसूनि राजन् ।
ददौ द्विजेभ्यः क्रतुदक्षिणाश्च
यदुप्रवीरो हलभृत् प्रतीतः ॥ ३४ ॥
राजन्! यदुकुलके प्रमुख वीर हलधारी महात्मा बलराम नियमपूर्वक रहकर प्रसन्नताके साथ पुण्यतीर्थोंमें ब्राह्मणोंको धन और यज्ञकी दक्षिणाएँ देते थे ॥ ३४ ॥

दोग्ध्रीश्च धेनूश्च सहस्रशो वै
सुवाससः काञ्चनबद्धशृङ्गीः ।
हयांश्च नानाविधदेशजातान्
यानानि दासांश्च शुभान् द्विजेभ्यः ॥ ३५ ॥
रत्नानि मुक्तामणिविद्रुमं चा-
प्यग्र्यं सुवर्णं रजतं सुशुद्धम् ।
अयस्मयं ताम्रमयं च भाण्डं
ददौ द्विजातिप्रवरेषु रामः ॥ ३६ ॥
बलरामने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सहस्रों दूध देनेवाली गौएँ दान कीं, जिन्हें सुन्दर वस्त्रोंसे सुसज्जित करके उनके सींगोंमें सोनेके पत्र जड़े गये थे। साथ ही उन्होंने अनेक देशोंमें उत्पन्न घोड़े, रथ और सुन्दर वेश-भूषावाले दास भी ब्राह्मणोंकी सेवामें अर्पित किये। इतना ही नहीं, बलरामने भाँति-भाँतिके रत्न, मोती, मणि, मूँगा, उत्तम सुवर्ण, विशुद्ध चाँदी तथा लोहे और ताँबेके बर्तन भी बाँटे थे ॥ ३५-३६ ॥

एवं स वित्तं प्रददौ महात्मा
सरस्वतीतीर्थवरेषु भूरि ।
ययौ क्रमेणाप्रतिमप्रभाव-
स्ततः कुरुक्षेत्रमुदारवृत्तिः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार उदार वृत्तिवाले अनुपम प्रभावशाली महात्मा बलरामने सरस्वतीके श्रेष्ठ

तीर्थोंमें बहुत धन दान किया और क्रमशः यात्रा करते हुए वे कुरुक्षेत्रमें आये ।।

जनमेजय उवाच

सारस्वतानां तीर्थानां गुणोत्पत्तिं वदस्व मे ।

फलं च द्विपदां श्रेष्ठ कर्मनिर्वृत्तिमेव च ।। ३८ ।।

यथाक्रमेण भगवंस्तीर्थानामनुपूर्वशः ।

ब्रह्मन् ब्रह्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे ।। ३९ ।।

जनमेजय बोले—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और मनुष्योंमें उत्तम ब्राह्मणदेव! अब आप मुझे

सरस्वती-तटवर्ती तीर्थोंके गुण, प्रभाव और उत्पत्तिकी कथा सुनाइये। भगवन्! क्रमशः उन

तीर्थोंके सेवनका फल और जिस कर्मसे वहाँ सिद्धि प्राप्त होती है, उसका अनुष्ठान भी

बताइये, मेरे मनमें यह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ।। ३८-३९ ।।

वैशम्पायन उवाच

तीर्थानां च फलं राजन् गुणोत्पत्तिं च सर्वशः ।

मयोच्यमानं वै पुण्यं शृणु राजेन्द्र कृत्स्नशः ।। ४० ।।

वैशम्पायनजीने कहा—राजेन्द्र! मैं तुम्हें तीर्थोंके गुण, प्रभाव, उत्पत्ति तथा उनके

सेवनका पुण्य-फल बता रहा हूँ। वह सब तुम ध्यानसे सुनो ।। ४० ।।

पूर्वं महाराज यदुप्रवीर

ऋत्विक्सुहृद्विप्रगणैश्च सार्धम् ।

पुण्यं प्रभासं समुपाजगाम

यत्रोडुराड् यक्ष्मणा क्लिश्यमानः ।। ४१ ।।

विमुक्तशापः पुनराप्य तेजः

सर्वं जगद् भासयते नरेन्द्र ।

एवं तु तीर्थप्रवरं पृथिव्यां

प्रभासनात् तस्य ततः प्रभासः ।। ४२ ।।

महाराज! यदुकुलके प्रमुख वीर बलरामजी सबसे पहले ऋत्विजों, सुहृदों और

ब्राह्मणोंके साथ पुण्यमय प्रभासक्षेत्रमें गये, जहाँ राजयक्ष्मासे कष्ट पाते हुए चन्द्रमाको

शापसे छुटकारा मिला था। नरेन्द्र! वे वहीं पुनः अपना तेज प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को

प्रकाशित करते हैं। इस प्रकार चन्द्रमाको प्रभासित करनेके कारण ही वह प्रधान तीर्थ इस

पृथ्वीपर प्रभास नामसे विख्यात हुआ ।। ४१-४२ ।।

जनमेजय उवाच

कथं तु भगवन् सोमो यक्ष्मणा समगृह्यत ।

कथं च तीर्थप्रवरे तस्मिंश्चन्द्रो न्यमज्जत ॥ ४३ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! चन्द्रमा कैसे राजयक्ष्मासे ग्रस्त हो गये और उस उत्तम तीर्थमें किस प्रकार उन्होंने स्नान किया? ॥ ४३ ॥
कथमाप्लुत्य तस्मिंस्तु पुनराप्यायितः शशी ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने ॥ ४४ ॥
महामुने! उस तीर्थमें गोता लगाकर चन्द्रमा पुनः किस प्रकार हृष्ट-पुष्ट हुए? यह सब प्रसंग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ४४ ॥

वैशम्पायन उवाच

दक्षस्य तनयास्तात प्रादुरासन् विशाम्पते ।
स सप्तविंशतिं कन्या दक्षः सोमाय वै ददौ ॥ ४५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— तात! प्रजानाथ! प्रजापति दक्षके बहुत-सी संतानें उत्पन्न हुई थीं। उनमेंसे अपनी सत्ताईस कन्याओंका विवाह उन्होंने चन्द्रमाके साथ कर दिया था ॥ ४५ ॥
नक्षत्रयोगनिरताः संख्यानार्थं च ताभवन् ।
पत्न्यो वै तस्य राजेन्द्र सोमस्य शुभकर्मणः ॥ ४६ ॥
राजेन्द्र! शुभ कर्म करनेवाले सोमकी वे पत्नियाँ समयकी गणनाके लिये नक्षत्रोंसे सम्बन्ध रखनेके कारण उसी नामसे विख्यात हुईं ॥ ४६ ॥
तास्तु सर्वा विशालाक्ष्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
अत्यरिच्यत तासां तु रोहिणी रूपसम्पदा ॥ ४७ ॥
वे सब-की-सब विशाल नेत्रोंसे सुशोभित होती थीं। इस भूतलपर उनके रूपकी समानता करनेवाली कोई स्त्री नहीं थी। उनमें भी रोहिणी अपने रूप-वैभवकी दृष्टिसे सबकी अपेक्षा बढ़ी-चढ़ी थी ॥ ४७ ॥
ततस्तस्यां स भगवान् प्रीतिं चक्रे निशाकरः ।
सास्य हृद्या बभूवाथ तस्मात् तां बुभुजे सदा ॥ ४८ ॥
इसलिये भगवान् चन्द्रमा उससे अधिक प्रेम करने लगे, वही उनकी हृदयवल्लभा हुई; अतः वे सदा उसीका उपभोग करते थे ॥ ४८ ॥
पुरा हि सोमो राजेन्द्र रोहिण्यामवसत् परम् ।
ततस्ताः कुपिताः सर्वा नक्षत्राख्या महात्मनः ॥ ४९ ॥
राजेन्द्र! पूर्वकालमें चन्द्रमा सदा रोहिणीके ही समीप रहते थे; अतः नक्षत्रनामसे प्रसिद्ध हुई महात्मा सोमकी वे सारी पत्नियाँ उनपर कुपित हो उठीं ॥ ४९ ॥
ता गत्वा पितरं प्राहुः प्रजापतिमतन्द्रिताः ।
सोमो वसति नास्मासु रोहिणीं भजते सदा ॥ ५० ॥

और आलस्य छोड़कर अपने पिताके पास जाकर बोलीं—‘प्रभो! चन्द्रमा हमारे पास नहीं आते। वे सदा रोहिणीका ही सेवन करते हैं ॥ ५० ॥ ता वयं सहिताः सर्वास्त्वत्सकाशे प्रजेश्वर । वत्स्यामो नियताहारास्तपश्चरणतत्पराः ॥ ५१ ॥ ‘अतः प्रजेश्वर! हम सब बहिनें एक साथ नियमित आहार करके तपस्यामें संलग्न हो आपके ही पास रहेंगी’ ॥ श्रुत्वा तासां तु वचनं दक्षः सोममथाब्रवीत् । समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वाधर्मो महान् स्पृशेत् ॥ ५२ ॥ उनकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्षने चन्द्रमासे कहा—‘सोम! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समानतापूर्ण बर्ताव करो, जिससे तुम्हें महान् पाप न लगे’ ॥ ५२ ॥ तास्तु सर्वाब्रवीद् दक्षो गच्छध्वं शशिनोऽन्तिकम् । समं वत्स्यति सर्वासु चन्द्रमा मम शासनात् ॥ ५३ ॥ फिर दक्षने उन सभी कन्याओंसे कहा—‘अब तुमलोग चन्द्रमाके पास ही जाओ। वे मेरी आज्ञासे तुम सब लोगोंके प्रति समानभाव रखेंगे’ ॥ ५३ ॥ विसृष्टास्तास्तथा जग्मुः शीतांशुभवनं तदा । तथापि सोमो भगवान् पुनरेव महीपते ॥ ५४ ॥ रोहिणीं निवसत्येव प्रीयमाणो मुहुर्मुहुः । पृथ्वीनाथ! पिताके विदा करनेपर वे पुनः चन्द्रमाके घरमें लौट गयीं, तथापि भगवान् सोम फिर रोहिणीके पास ही अधिकाधिक प्रेमपूर्वक रहने लगे ॥ ५४ १/२ ॥ ततस्ताः सहिताः सर्वा भूयः पितरमब्रुवन् ॥ ५५ ॥ तव शुश्रूषणे युक्ता वत्स्यामो हि तवान्तिके । सोमो वसति नास्मासु नाकरोद् वचनं तव ॥ ५६ ॥ तब वे सब कन्याएँ पुनः एक साथ अपने पिताके पास जाकर बोलीं—‘हम सब लोग आपकी सेवामें तत्पर रहकर आपके ही समीप रहेंगी। चन्द्रमा हमारे साथ नहीं रहते। उन्होंने आपकी बात नहीं मानी’ ॥ ५५-५६ ॥ तासां तद् वचनं श्रुत्वा दक्षः सोममथाब्रवीत् । समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वां शप्स्ये विरोचन ॥ ५७ ॥ उनकी बात सुनकर दक्षने पुनः सोमसे कहा—‘प्रकाशमान चन्द्रदेव! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समान बर्ताव करो, नहीं तो तुम्हें शाप दे दूँगा’ ॥ ५७ ॥ अनादृत्य तु तद् वाक्यं दक्षस्य भगवान् शशी । रोहिण्या सार्धमवसत् ततस्ताः कुपिताः पुनः ॥ ५८ ॥ गत्वा च पितरं प्राहुः प्रणम्य शिरसा तदा । सोमो वसति नास्मासु तस्मान्नः शरणं भव ॥ ५९ ॥

दक्षके इतना कहनेपर भी भगवान् चन्द्रमा उनकी बातकी अवहेलना करके केवल रोहिणीके ही साथ रहने लगे। यह देख दूसरी स्त्रियाँ पुनः क्रोधसे जल उठीं और पिताके पास जा उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर प्रणाम करनेके अनन्तर बोलीं—'भगवन्! सोम हमारे पास नहीं रहते। अतः आप हमें शरण दें।।

रोहिण्यामेव भगवान् सदा वसति चन्द्रमाः ।
न त्वद्वचो गणयति नास्मासु स्नेहमिच्छति ॥ ६० ॥
तस्मान्नस्त्राहि सर्वा वै यथा नः सोम आविशेत् ।
'भगवान् चन्द्रमा सदा रोहिणीके ही समीप रहते हैं। वे आपकी बातको कुछ गिनते ही नहीं हैं। हमलोगोंपर स्नेह रखना नहीं चाहते हैं, अतः आप हम सब लोगोंकी रक्षा करें, जिससे चन्द्रमा हमारे साथ भी सम्बन्ध रखें' ।। ६० १/२ ।।

तच्छ्रुत्वा भगवान् क्रुद्धो यक्ष्माणं पृथिवीपते ॥ ६१ ॥
ससर्ज रोषात् सोमाय स चोडुपतिमाविशत् ।
पृथिवीनाथ! यह सुनकर भगवान् दक्ष कुपित हो उठे। उन्होंने चन्द्रमाके लिये रोषपूर्वक राजयक्ष्माकी सृष्टि की। वह चन्द्रमाके भीतर प्रविष्ट हो गया ।। ६१ १/२ ।।

स यक्ष्मणाभिभूतात्माक्षीयताहरहः शशी ॥ ६२ ॥
यत्नं चाप्यकरोद् राजन् मोक्षार्थं तस्य यक्ष्मणः ।
यक्ष्मासे शरीर ग्रस्त हो जानेके कारण चन्द्रमा प्रतिदिन क्षीण होने लगे। राजन्! उस यक्ष्मासे छूटनेके लिये उन्होंने बड़ा यत्न किया ।। ६२ १/२ ।।

इष्ट्वेष्टिभिर्महाराज विविधाभिर्निशाकरः ॥ ६३ ॥
न चामुच्यत शापाद् वै क्षयं चैवाभ्यगच्छत ।
महाराज! नाना प्रकारके यज्ञ-यागोंका अनुष्ठान करके भी चन्द्रमा उस शापसे मुक्त न हो सके और धीरे-धीरे क्षीण होते चले गये ।। ६३ १/२ ।।

क्षीयमाणे ततः सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे ॥ ६४ ॥
निरास्वादरसाः सर्वा हतवीर्याश्च सर्वशः ।
चन्द्रमाके क्षीण होनेसे अन्न आदि ओषधियाँ उत्पन्न नहीं होती थीं। उन सबके स्वाद, रस और प्रभाव नष्ट हो गये ।। ६४ १/२ ।।

ओषधीनां क्षये जाते प्राणिनामपि संक्षयः ॥ ६५ ॥
कृशाश्चासन् प्रजाः सर्वाः क्षीयमाणे निशाकरे ।
ओषधियोंके क्षीण होनेसे समस्त प्राणियोंका भी क्षय होने लगा। इस प्रकार चन्द्रमाके क्षयके साथ-साथ सारी प्रजा अत्यन्त दुर्बल हो गयी ।। ६५ १/२ ।।

ततो देवाः समागम्य सोममूचुर्महीपते ॥ ६६ ॥
किमिदं भवतो रूपमीदृशं न प्रकाशते ।

कारणं ब्रूहि नः सर्वं येनेदं ते महत् भयम् ॥ ६७ ॥ श्रुत्वा तु वचनं त्वत्तो विधास्यामस्ततो वयम्। पृथ्वीनाथ! उस समय देवताओंने चन्द्रमासे मिलकर पूछा—‘आपका रूप ऐसा कैसे हो गया? यह प्रकाशित क्यों नहीं होता है? हमलोगोंसे सारा कारण बताइये, जिससे आपको महान् भय प्राप्त हुआ। आपकी बात सुनकर हमलोग इस संकटके निवारणका कोई उपाय करेंगे’ ॥ ६६-६७ १/२ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच सर्वांस्तान् शशलक्षणः ॥ ६८ ॥ शापस्य लक्षणं चैव यक्ष्माणं च तथाऽऽत्मनः। उनके इस प्रकार पूछनेपर चन्द्रमाने उन सबको उत्तर देते हुए अपनेको प्राप्त हुए शापके कारण राजयक्ष्माकी उत्पत्ति बतलायी ॥ ६८ १/२ ॥ देवास्तथा वचः श्रुत्वा गत्वा दक्षमथाब्रुवन् ॥ ६९ ॥ प्रसीद भगवन् सोमे शापोऽयं विनिवर्त्यताम्। उनका वचन सुनकर देवता दक्षके पास जाकर बोले—‘भगवन्! आप चन्द्रमापर प्रसन्न होइये और यह शाप हटा लीजिये ॥ ६९ १/२ ॥ असौ हि चन्द्रमाः क्षीणः किञ्चिच्छेषो हि लक्ष्यते ॥ ७० ॥ क्षयाच्चैवास्य देवेश प्रजाश्चैव गताः क्षयम्। वीरुदोषधयश्चैव बीजानि विविधानि च ॥ ७१ ॥ ‘चन्द्रमा क्षीण हो चुके हैं और उनका कुछ ही अंश शेष दिखायी देता है। देवेश्वर! उनके क्षयसे लता, वीरुत्, ओषधियाँ भाँति-भाँतिके बीज और सम्पूर्ण प्रजा भी क्षीण हो गयी है ॥ ७०-७१ ॥ तेषां क्षये क्षयोऽस्माकं विनास्माभिर्जगच्च किम्। इति ज्ञात्वा लोकगुरो प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ७२ ॥ ‘उन सबके क्षीण होनेपर हमारा भी क्षय हो जायगा। फिर हमारे बिना संसार कैसे रह सकता है? लोकगुरो! ऐसा जानकर आपको चन्द्रदेवपर अवश्य कृपा करनी चाहिये’ ॥ ७२ ॥ एवमुक्तस्ततो देवान् प्राह वाक्यं प्रजापतिः। नैतच्छक्यं मम वचो व्यावर्तयितुमन्यथा ॥ ७३ ॥ हेतुना तु महाभागा निवर्तिष्यति केनचित्। उनके ऐसा कहनेपर प्रजापति दक्ष देवताओंसे इस प्रकार बोले—‘महाभाग देवगण! मेरी बात पलटी नहीं जा सकती। किसी विशेष कारणसे वह स्वतः निवृत्त हो जायगी ॥ ७३ १/२ ॥ समं वर्ततु सर्वासु शशी भार्यासु नित्यशः ॥ ७४ ॥ सरस्वत्या वरे तीर्थे उन्मज्जन् शशलक्षणः।

पुनर्वर्धिष्यते देवास्तद् वै सत्यं वचो मम ॥ ७५ ॥
‘यदि चन्द्रमा अपनी सभी पत्नियोंके प्रति सदा समान बर्ताव करें और सरस्वतीके श्रेष्ठ तीर्थमें गोता लगायें तो वे पुनः बढ़कर पुष्ट हो जायेंगे। देवताओ! मेरी यह बात अवश्य सच होगी’ ॥ ७४-७५ ॥
मासार्धं च क्षयं सोमो नित्यमेव गमिष्यति ।
मासार्धं तु सदा वृद्धिं सत्यमेतद् वचो मम ॥ ७६ ॥
‘सोम आधे मासतक प्रतिदिन क्षीण होंगे और आधे मासतक निरन्तर बढ़ते रहेंगे। मेरी यह बात अवश्य सत्य होगी’ ॥ ७६ ॥
समुद्रं पश्चिमं गत्वा सरस्वत्यब्धिसङ्गमम् ।
आराधयतु देवेशं ततः कान्तिमवाप्स्यति ॥ ७७ ॥
‘पश्चिमी समुद्रके तटपर जहाँ सरस्वती और समुद्रका संगम हुआ है, वहाँ जाकर चन्द्रमा देवेश्वर महादेवजीकी आराधना करें तो पुनः वे अपनी कान्ति प्राप्त कर लेंगे’ ॥ ७७ ॥
सरस्वतीं ततः सोमः स जगामर्षिशासनात् ।
प्रभासं प्रथमं तीर्थं सरस्वत्या जगाम ह ॥ ७८ ॥
ऋषि (दक्ष प्रजापति)-के इस आदेशसे सोम सरस्वतीके प्रथम तीर्थ प्रभासक्षेत्रमें गये ॥ ७८ ॥
अमावास्यां महातेजास्तत्रोन्मज्जन् महाद्युतिः ।
लोकान् प्रभासयामास शीतांशुत्वमवाप च ॥ ७९ ॥
महातेजस्वी महाकान्तिमान् चन्द्रमाने अमावास्याको उस तीर्थमें गोता लगाया। इससे उन्हें शीतल किरणें प्राप्त हुईं और वे सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करने लगे ॥ ७९ ॥
देवास्तु सर्वे राजेन्द्र प्रभासं प्राप्य पुष्कलम् ।
सोमेन सहिता भूत्वा दक्षस्य प्रमुखेऽभवन् ॥ ८० ॥
राजेन्द्र! फिर सम्पूर्ण देवता सोमके साथ महान् प्रकाश प्राप्त करके पुनः दक्षप्रजापतिके सामने उपस्थित हुए ॥ ८० ॥
ततः प्रजापतिः सर्वा विससर्जाथ देवताः ।
सोमं च भगवान् प्रीतो भूयो वचनमब्रवीत् ॥ ८१ ॥
तब भगवान् प्रजापतिने समस्त देवताओंको विदा कर दिया और सोमसे पुनः प्रसन्नतापूर्वक कहा— ॥ ८१ ॥
मावमंस्थाः स्त्रियः पुत्र मा च विप्रान् कदाचन ।
गच्छ युक्तः सदा भूत्वा कुरु वै शासनं मम ॥ ८२ ॥
‘बेटा! अपनी स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंकी कभी अवहेलना न करना। जाओ, सदा सावधान रहकर मेरी आज्ञाका पालन करते रहो’ ॥ ८२ ॥

स विसृष्टो महाराज जगामाथ स्वमालयम् । प्रजाश्च मुदिता भूत्वा पुनस्तस्थुर्यथा पुरा ॥ ८३ ॥ महाराज! ऐसा कहकर प्रजापतिने उन्हें विदा कर दिया। चन्द्रमा अपने स्थानको चले गये और सारी प्रजा पूर्ववत् प्रसन्न रहने लगी ॥ ८३ ॥ एवं ते सर्वमाख्यातं यथा शप्तो निशाकरः । प्रभासं च यथा तीर्थं तीर्थानां प्रवरं महत् ॥ ८४ ॥ इस प्रकार चन्द्रमाको जैसे शाप प्राप्त हुआ था और महान् प्रभासतीर्थ जिस प्रकार सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया, वह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ ८४ ॥ अमावास्यां महाराज नित्यशः शशलक्षणः । स्नात्वा ह्याप्यायते श्रीमान् प्रभासे तीर्थ उत्तमे ॥ ८५ ॥ महाराज! चन्द्रमा उत्तम प्रभासतीर्थमें प्रत्येक अमावास्याको स्नान करके कान्तिमान् एवं पुष्ट होते हैं ॥ अतश्चैतत् प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप । प्रभां हि परमां लेभे तस्मिन्निमज्ज्य चन्द्रमाः ॥ ८६ ॥ भूमिपाल! इसीलिये सब लोग इसे प्रभासतीर्थके नामसे जानते हैं; क्योंकि उसमें गोता लगाकर चन्द्रमाने उत्कृष्ट प्रभा प्राप्त की थी ॥ ८६ ॥ ततस्तु चमसोद्भेदमच्युतस्त्वगमद् बली । चमसोद्भेद इत्येवं यं जनाः कथयन्त्युत ॥ ८७ ॥ तदनन्तर भगवान् बलराम चमसोद्भेद नामक तीर्थमें गये। उस तीर्थको सब लोग चमसोद्भेदके नामसे ही पुकारते हैं ॥ ८७ ॥ तत्र दत्त्वा च दानानि विशिष्टानि हलायुधः । उषित्वा रजनीमेकां स्नात्वा च विधिवत्तदा ॥ ८८ ॥ उदपानमथागच्छत्त्वरावान् केशवाग्रजः । आद्यं स्वस्त्ययनं चैव यत्रावाप्य महत् फलम् ॥ ८९ ॥ स्निग्धत्वादोषधीनां च भूमेश्च जनमेजय । जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र नष्टामपि सरस्वतीम् ॥ ९० ॥ श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधारी बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उत्तम दान दे एक रात रहकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँसे उदपानतीर्थको प्रस्थान किया, जो मंगलकारी आदि तीर्थ है। राजेन्द्र जनमेजय! उदपान वह तीर्थ है, जहाँ उपस्थित होनेमात्रसे महान् फलकी प्राप्ति होती है। सिद्ध पुरुष वहाँ ओषधियों (वृक्षों और लताओं)-की स्निग्धता और भूमिकी आर्द्रता देखकर अदृश्य हुई सरस्वतीको भी जान लेते हैं ॥ ८८—९० ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां प्रभासोत्पत्तिकथने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासतीर्थका वर्णनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

उदपानतीर्थकी उत्पत्तिका तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा

⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्त्रिंशोऽध्यायः

उदपानतीर्थकी उत्पत्तिका तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा

वैशम्पायन उवाच

तस्मान्नदीगतं चापि ह्युदपानं यशस्विनः ।
त्रितस्य च महाराज जगामाथ हलायुधः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! उस चमसोद्भेद-तीर्थसे चलकर बलरामजी यशस्वी त्रितमुनिके उदपान तीर्थमें गये, जो सरस्वती नदीके जलमें स्थित है ॥ १ ॥

तत्र दत्त्वा बहु द्रव्यं पूजयित्वा तथा द्विजान् ।
उपस्पृश्य च तत्रैव प्रहृष्टो मुसलायुधः ॥ २ ॥
मुसलधारी बलरामजीने वहाँ जलका स्पर्श, आचमन एवं स्नान करके बहुत-सा द्रव्य दान करनेके पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजन किया। फिर वे बहुत प्रसन्न हुए ॥ २ ॥

तत्र धर्मपरो भूत्वा त्रितः स सुमहातपाः ।
कूपे च वसता तेन सोमः पीतो महात्मना ॥ ३ ॥
वहाँ महातपस्वी त्रितमुनि धर्मपरायण होकर रहते थे। उन महात्माने कुएँमें रहकर ही सोमपान किया था ॥

तत्र चैनं समुत्सृज्य भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् ।
ततस्तौ वै शशापाथ त्रितो ब्राह्मणसत्तमः ॥ ४ ॥
उनके दो भाई उस कुएँमें ही उन्हें छोड़कर घरको चले गये थे। इससे ब्राह्मणश्रेष्ठ त्रितने दोनोंको शाप दे दिया था ॥ ४ ॥

जनमेजय उवाच

उदपानं कथं ब्रह्मन् कथं च सुमहातपाः ।
पतितः किं च संत्यक्तो भ्रातृभ्यां द्विजसत्तम ॥ ५ ॥
कूपे कथं च हित्वाैनं भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् ।
कथं च याजयामास पपौ सोमं च वै कथम् ॥ ६ ॥
एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन् श्रोतव्यं यदि मन्यसे ।
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! उदपान तीर्थ कैसे हुआ? वे महातपस्वी त्रितमुनि उसमें कैसे गिर पड़े और द्विजश्रेष्ठ! उनके दोनों भाइयोंने उन्हें क्यों वहीं छोड़ दिया था? क्या कारण था, जिससे वे दोनों भाई उन्हें कुएँमें ही त्यागकर घर चले गये थे? वहाँ रहकर

उन्होंने यज्ञ और सोमपान कैसे किया? ब्रह्मन्! यदि यह प्रसंग मेरे सुननेयोग्य समझें तो अवश्य मुझे बतावें।। ५-६ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

आसन् पूर्वयुगे राजन् मुनयो भ्रातरस्त्रयः ।। ७ ।।
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ।
सर्वे प्रजापतिसमाः प्रजावन्तस्तथैव च ।। ८ ।।
ब्रह्मलोकजितः सर्वे तपसा ब्रह्मवादिनः ।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! पहले युगमें तीन सहोदर भाई रहते थे। वे तीनों ही मुनि थे। उनके नाम थे एकत, द्वित और त्रित। वे सभी महर्षि सूर्यके समान तेजस्वी, प्रजापतिके समान संतानवान् और ब्रह्मवादी थे। उन्होंने तपस्याद्वारा ब्रह्मलोकपर विजय प्राप्त की थी।। ७-८ १/२ ।।

तेषां तु तपसा प्रीतो नियमेन दमेन च ।। ९ ।।
अभवद् गौतमो नित्यं पिता धर्मरतः सदा ।
उनकी तपस्या, नियम और इन्द्रियनिग्रहसे उनके धर्म-परायण पिता गौतम सदा ही प्रसन्न रहा करते थे।। ९ १/२ ।।

स तु दीर्घेण कालेन तेषां प्रीतिमवाप्य च ।। १० ।।
जगाम भगवान् स्थानमनुरूपमिवात्मनः ।
उन पुत्रोंकी त्याग-तपस्यासे संतुष्ट रहते हुए वे पूजनीय महात्मा गौतम दीर्घकालके पश्चात् अपने अनुरूप स्थान (स्वर्गलोक)-में चले गये।। १० १/२ ।।

राजानस्तस्य ये ह्यासन् याज्या राजन् महात्मनः ।। ११ ।।
ते सर्वे स्वर्गते तस्मिंस्तस्य पुत्रानपूजयन् ।
राजन्! उन महात्मा गौतमके यजमान जो राजा लोग थे, वे सब उनके स्वर्गवासी हो जानेपर उनके पुत्रोंका ही आदर-सत्कार करने लगे।। ११ १/२ ।।

तेषां तु कर्मणा राजंस्तथा चाध्ययनेन च ।। १२ ।।
त्रितः स श्रेष्ठतां प्राप यथैवास्य पिता तथा ।
नरेश्वर! उन तीनोंमें भी अपने शुभ कर्म और स्वाध्यायके द्वारा महर्षि त्रितने सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया! जैसे उनके पिता सम्मानित थे, वैसे ही वे भी हो गये।। १२ १/२ ।।

तथा सर्वे महाभागा मुनयः पुण्यलक्षणाः ।। १३ ।।
अपूजयन् महाभागं यथास्य पितरं तथा ।
महान् सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा सभी महर्षि भी महाभाग त्रितका उनके पिताके तुल्य ही सम्मान करते थे।।

कदाचिद्धि ततो राजन् भ्रातरावैकतद्वितौ ।। १४ ।।

यज्ञार्थं चक्रतुश्चिन्तां तथा वित्तार्थमेव च ।
तयोर्बुद्धिः समभवत् त्रितं गृह्य परंतप ॥ १५ ॥
याज्यान् सर्वानुपादाय प्रतिगृह्य पशूंस्ततः ।
सोमं पास्यामहे हृष्टाः प्राप्य यज्ञं महाफलम् ॥ १६ ॥
राजन्! एक दिनकी बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धनके लिये चिन्ता करने लगे। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रितको साथ लेकर यजमानोंका यज्ञ करावें और दक्षिणाके रूपमें बहुत-से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञका अनुष्ठान करें और उसीमें प्रसन्नतापूर्वक सोमरसका पान करें ॥ १४—१६ ॥

चक्रुश्चैवं तथा राजन् भ्रातरस्त्रय एव च ।
तथा ते तु परिक्रम्य याज्यान् सर्वान् पशून् प्रति ॥ १७ ॥
याजयित्वा ततो याज्याँल्लब्ध्वा तु सुबहून् पशून् ।
याज्येन कर्मणा तेन प्रतिगृह्य विधानतः ॥ १८ ॥
प्राचीं दिशं महात्मान आजग्मुस्ते महर्षयः ।
राजन्! ऐसा विचार करके उन तीनों भाइयोंने वही किया। वे सभी यजमानोंके यहाँ पशुओंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे गये और उनसे विधिपूर्वक यज्ञ करवाकर उस याज्यकर्मके द्वारा उन्होंने बहुतेरे पशु प्राप्त कर लिये। तत्पश्चात् वे महात्मा महर्षि पूर्वदिशाकी ओर चल दिये ॥ १७-१८ १/२ ॥

त्रितस्तेषां महाराज पुरस्ताद् याति हृष्टवत् ॥ १९ ॥
एकतश्च द्वितश्चैव पृष्ठतः कालयन् पशून् ।
महाराज! उनमें त्रित मुनि तो प्रसन्नतापूर्वक आगे-आगे चलते थे और एकत तथा द्वित पीछे रहकर पशुओंको हाँकते जाते थे ॥ १९ १/२ ॥

तयोश्चिन्ता समभवद् दृष्ट्वा पशुगणं महत् ॥ २० ॥
कथं च स्युरिमा गाव आवाभ्यां हि विना त्रितम् ।
पशुओंके उस महान् समुदायको देखकर एकत और द्वितके मनमें यह चिन्ता समायी कि किस उपायसे ये गौएँ त्रितको न मिलकर हम दोनोंके ही पास रह जायँ ॥ २० १/२ ॥

तावन्योन्यं समाभाष्य एकतश्च द्वितश्च ह ॥ २१ ॥
यदूचतुर्मिथः पापौ तन्निबोध जनेश्वर ।
जनेश्वर! उन एकत और द्वित—दोनों पापियोंने एक-दूसरेसे सलाह करके परस्पर जो कुछ कहा, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २१ १/२ ॥

त्रितो यज्ञेषु कुशलस्त्रितो वेदेषु निष्ठितः ॥ २२ ॥
अन्यास्तु बहुला गावस्त्रितः समुपलप्स्यते ।
तदावां सहितौ भूत्वा गाः प्रकाल्य व्रजावहे ॥ २३ ॥

त्रितोऽपि गच्छतां काममावाभ्यां वै विना कृतः । ‘त्रित यज्ञ करानेमें कुशल हैं, त्रित वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान् हैं, अतः वे और बहुत-सी गौएँ प्राप्त कर लेंगे। इस समय हम दोनों एक साथ होकर इन गौओंको हाँक ले चलें और त्रित हमसे अलग होकर जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जायँ’ ॥ २२-२३ १/२ ॥

तेषामागच्छतां रात्रौ पथिस्थानां वृकोऽभवत् ॥ २४ ॥ तत्र कूपोऽविदूरेऽभूत् सरस्वत्यास्तटे महान् । रात्रिका समय था और वे तीनों भाई रास्ता पकड़े चले आ रहे थे। उनके मार्गमें एक भेड़िया खड़ा था। वहाँ पास ही सरस्वतीके तटपर एक बहुत बड़ा कुआँ था ॥

अथ त्रितो वृकं दृष्ट्वा पथि तिष्ठन्तमग्रतः ॥ २५ ॥ तद्भयादपसर्पन् वै तस्मिन् कूपे पपात ह । अगाधे सुमहाघोरे सर्वभूतभयंकरे ॥ २६ ॥ त्रित अपने आगे रास्तेमें खड़े हुए भेड़ियेको देखकर उसके भयसे भागने लगे। भागते-भागते वे समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस महाघोर अगाध कूपमें गिर पड़े ॥ २५-२६ ॥

त्रितस्ततो महाराज कूपस्थो मुनिसत्तमः । आर्तनादं ततश्चक्रे तौ तु शुश्रुवतुर्मुनी ॥ २७ ॥ महाराज! कुएँमें पहुँचनेपर मुनिश्रेष्ठ त्रितने बड़े जोरसे आर्तनाद किया, जिसे उन दोनों मुनियोंने सुना ॥ २७ ॥

तं ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ । वृकत्रासाच्च लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतुः ॥ २८ ॥ अपने भाईको कुएँमें गिरा हुआ जानकर भी दोनों भाई एकत और द्वित भेड़ियेके भय और लोभसे उन्हें वहीं छोड़कर चल दिये ॥ २८ ॥

भ्रातृभ्यां पशुलुब्धाभ्यामुत्सृष्टः स महातपाः । उदपाने तदा राजन् निर्जले पांसुसंवृते ॥ २९ ॥ राजन्! पशुओंके लोभमें आकर उन दोनों भाइयोंने उस समय उन महातपस्वी त्रितको धूलिसे भरे हुए उस निर्जल कूपमें ही छोड़ दिया ॥ २९ ॥

त्रित आत्मानमालक्ष्य कूपे वीरुत्तृणावृते । निमग्नं भरतश्रेष्ठ नरके दुष्कृती यथा ॥ ३० ॥ स बुद्ध्यागणयत् प्राज्ञो मृत्योर्भीतो ह्यसोमपः । सोमः कथं तु पातव्य इहस्थेन मया भवेत् ॥ ३१ ॥ भरतश्रेष्ठ! जैसे पापी मनुष्य अपने-आपको नरकमें डूबा हुआ देखता है, उसी प्रकार तृण, वीरुध और लताओंसे व्याप्त हुए उस कुएँमें अपने-आपको गिरा देख मृत्युसे डरे और सोमपानसे वंचित हुए विद्वान् त्रित अपनी बुद्धिसे सोचने लगे कि ‘मैं इस कुएँमें रहकर कैसे सोमरसका पान कर सकता हूँ?’ ॥ ३०-३१ ॥

स एवमभिनिश्चित्य तस्मिन् कूपे महातपाः । ददर्श वीरुधं तत्र लम्बमानां यदृच्छया ॥ ३२ ॥ इस प्रकार विचार करते-करते महातपस्वी त्रितने उस कुएँमें एक लता देखी, जो दैवयोगसे वहाँ फैली हुई थी ॥ ३२ ॥ पांसुग्रस्ते ततः कूपे विचिन्त्य सलिलं मुनिः । अग्नीन् संकल्पयामास होतॄनात्मानमेव च ॥ ३३ ॥ मुनिने उस बालूभरे कूपमें जलकी भावना करके उसीमें संकल्पद्वारा अग्निकी स्थापना की और होता आदिके स्थानपर अपने-आपको ही प्रतिष्ठित किया ॥ ३३ ॥ ततस्तां वीरुधं सोमं संकल्प्य सुमहातपाः । ऋचो यजूंषि सामानि मनसा चिन्तयन् मुनिः ॥ ३४ ॥ ग्रावाणः शर्कराः कृत्वा प्रचक्रेऽभिषवं नृप । आज्यं च सलिलं चक्रे भागांश्च त्रिदिवौकसाम् ॥ ३५ ॥ सोमस्याभिषवं कृत्वा चकार विपुलं ध्वनिम् । तत्पश्चात् उन महातपस्वी त्रितने उस फैली हुई लतामें सोमकी भावना करके मन-ही-मन ऋग्, यजु और सामका चिन्तन किया। नरेश्वर! इसके बाद कंकड़ या बालू-कणोंमें सिल और लोढ़ेकी भावना करके उसपर पीसकर लतासे सोमरस निकाला। फिर जलमें घीका संकल्प करके उन्होंने देवताओंके भाग नियत किये और सोमरस तैयार करके उसकी आहुति देते हुए वेद-मन्त्रोंकी गम्भीर ध्वनि की ॥ ३४-३५ १/२ ॥ स चाविशद् दिवं राजन् पुनः शब्दस्त्रितस्य वै ॥ ३६ ॥ समवाप्य च तं यज्ञं यथोक्तं ब्रह्मवादिभिः । राजन्! ब्रह्मवादियोंने जैसा बताया है, उसके अनुसार ही उस यज्ञका सम्पादन करके की हुई त्रितकी वह वेदध्वनि स्वर्गलोकतक गूँज उठी ॥ ३६ १/२ ॥ वर्तमाने महायज्ञे त्रितस्य सुमहात्मनः ॥ ३७ ॥ आविग्नं त्रिदिवं सर्वं कारणं च न बुद्ध्यते । महात्मा त्रितका वह महान् यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय सारा स्वर्गलोक उद्विग्न हो उठा, परंतु किसीको इसका कोई कारण नहीं जान पड़ा ॥ ३७ १/२ ॥ ततः सुतुमुलं शब्दं शुश्रावाथ बृहस्पतिः ॥ ३८ ॥ श्रुत्वा चैवाब्रवीत् सर्वान् देवान् देवपुरोहितः । त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुराः ॥ ३९ ॥ तब देवपुरोहित बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंके उस तुमुलनादको सुनकर देवताओंसे कहा—‘देवगण! त्रित मुनिका यज्ञ हो रहा है, वहाँ हमलोगोंको चलना चाहिये ॥ स हि क्रुद्धः सृजेदन्यान् देवानपि महातपाः ।

‘वे महान् तपस्वी हैं। यदि हम नहीं चलेंगे तो वे कुपित होकर दूसरे देवताओंकी सृष्टि कर लेंगे’ ।। तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सहिताः सर्वदेवताः ।। ४० ।। प्रययुस्तत्र यत्रासौ त्रितयज्ञः प्रवर्तते । बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर सब देवता एक साथ हो उस स्थानपर गये, जहाँ त्रितमुनिका यज्ञ हो रहा था ।। ते तत्र गत्वा विबुधास्तं कूपं यत्र स त्रितः ।। ४१ ।। ददृशुस्तं महात्मानं दीक्षितं यज्ञकर्मसु । दृष्ट्वा चैनं महात्मानं श्रिया परमया युतम् ।। ४२ ।। ऊचुश्चैनं महाभागं प्राप्ता भागार्थिनो वयम् । वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस कूपको देखा, जिसमें त्रित मौजूद थे। साथ ही उन्होंने यज्ञमें दीक्षित हुए महात्मा त्रितमुनिका भी दर्शन किया। वे बड़े तेजस्वी दिखायी दे रहे थे। उन महाभाग मुनिका दर्शन करके देवताओंने उनसे कहा—‘हमलोग यज्ञमें अपना भाग लेनेके लिये आये हैं’ ।। ४१-४२ १/२ ।। अथाब्रवीदृषिर्देवान् पश्यध्वं मा दिवौकसः ।। ४३ ।। अस्मिन् प्रतिभये कूपे निमग्नं नष्टचेतसम् । उस समय महर्षिने उनसे कहा—‘देवताओ! देखो, मैं किस दशामें पड़ा हूँ। इस भयानक कूपमें गिरकर अपनी सुध-बुध खो बैठा हूँ’ ।। ४३ १/२ ।। ततस्त्रितो महाराज भागांस्तेषां यथाविधि ।। ४४ ।। मन्त्रयुक्तान् समददत् ते च प्रीतास्तदाभवन् । महाराज! तदनन्तर त्रितने देवताओंको विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारण करते हुए उनके भाग समर्पित किये। इससे वे उस समय बड़े प्रसन्न हुए ।। ४४ १/२ ।। ततो यथाविधि प्राप्तान् भागान् प्राप्य दिवौकसः ।। ४५ ।। प्रीतात्मानो ददुस्तस्मै वरान् यान् मनसेच्छति । विधिपूर्वक प्राप्त हुए उन भागोंको ग्रहण करके प्रसन्नचित्त हुए देवताओंने उन्हें मनोवांछित वर प्रदान किया ।। ४५ १/२ ।। स तु वव्रे वरं देवांस्त्रातुमर्हथ मामितः ।। ४६ ।। यश्चैहोपस्पृशेत् कूपे स सोमपगतिं लभेत् । मुनिने देवताओंसे वर माँगते हुए कहा—‘मुझे इस कूपसे आपलोग बचावें तथा जो मनुष्य इसमें आचमन करे, उसे यज्ञमें सोमपान करनेवालोंकी गति प्राप्त हो’ ।। ४६ १/२ ।। तत्र चोर्मिमती राजन्नुत्पपात सरस्वती ।। ४७ ।। तयोत्क्षिप्तः समुत्तस्थौ पूजयंस्त्रिदिवौकसः ।

राजन्! मुनिके इतना कहते ही कुएँमें तरंगमालाओंसे सुशोभित सरस्वती लहरा उठी। उसने अपने जलके वेगसे मुनिको ऊपर उठा दिया और वे बाहर निकल आये। फिर उन्होंने देवताओंका पूजन किया ।। ४७ १/२ ।।

तथेति चोक्त्वा विबुधा जग्मू राजन् यथागताः ।। ४८ ।।
त्रितश्चाभ्यागमत् प्रीतः स्वमेव निलयं तदा ।
नरेश्वर! मुनिके माँगे हुए वरके विषयमें ‘तथास्तु’ कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। फिर त्रित भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको ही लौट गये ।। ४८ १/२ ।।

क्रुद्धस्तु स समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा ।। ४९ ।।
उवाच परुषं वाक्यं शशाप च महातपाः ।
पशुलुब्धौ युवां यस्मान्मामुत्सृज्य प्रधावितौ ।। ५० ।।
तस्माद् वृकाकृती रौद्रौ दंष्ट्रिणावभितश्चरौ ।
भवितारौ मया शप्तौ पापेनानेन कर्मणा ।। ५१ ।।
प्रसवश्चैव युवयोर्गोलाङ्गूलर्क्षवानराः ।
उन महातपस्वीने कुपित हो अपने उन दोनों ऋषि भाइयोंके पास पहुँचकर कठोर वाणीमें शाप देते हुए कहा—‘तुम दोनों पशुओंके लोभमें फँसकर मुझे छोड़कर भाग आये। इसलिये इसी पापकर्मके कारण मेरे शापसे तुम दोनों भाई महाभयंकर भेड़ियेका शरीर धारण करके दाँढ़ोंसे युक्त हो इधर-उधर भटकते फिरोगे। तुम दोनोंकी संतानके रूपमें गोलांगूल, रीछ और वानर आदि पशुओंकी उत्पत्ति होगी’ ।। ४९—५१ १/२ ।।

इत्युक्तेन तदा तेन क्षणादेव विशाम्पते ।। ५२ ।।
तथाभूतावदृश्येतां वचनात् सत्यवादिनः ।
प्रजानाथ! उनके इतना कहते ही वे दोनों भाई उस सत्यवादीके वचनसे उसी क्षण भेड़ियेकी शक्लमें दिखायी देने लगे ।। ५२ १/२ ।।

तत्राप्यमितविक्रान्तः स्पृष्ट्वा तोयं हलायुधः ।। ५३ ।।
दत्त्वा च विविधान् दायान् पूजयित्वा च वै द्विजान् ।
अमित पराक्रमी बलरामजीने उस तीर्थमें भी जलका स्पर्श किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें नाना प्रकारके धन प्रदान किये ।। ५३ १/२ ।।

उदपानं च तं वीक्ष्य प्रशस्य च पुनः पुनः ।। ५४ ।।
नदीगतमदीनात्मा प्राप्तो विनशनं तदा ।। ५५ ।।
उदार चित्तवाले बलरामजी सरस्वती नदीके अन्तर्गत उदपानतीर्थका दर्शन करके उसकी बारंबार स्तुति-प्रशंसा करते हुए वहाँसे विनशनतीर्थमें चले गये ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां त्रिताख्याने षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें त्रितका उपाख्यानविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६ ।।