महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत तथा सुवर्णमय दण्डवाले सुन्दर शोभाशाली अनेक चँवर डुलाये जा रहे थे। उनसे राजा युधिष्ठिरकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे बिजलियोंसे मेघ सुशोभित होता है॥ २७॥
संस्तूयमानः सूतैश्च वन्द्यमानश्च वन्दिभिः।
उपगीयमानो गन्धर्वैरास्ते स्म कुरुनन्दनः॥ २८॥
उस समय सूतगण स्तुति करते थे, वन्दीजन वन्दना कर रहे थे और गन्धर्वगण उनके सुयशके गीत गाते थे। इन सबसे घिरे हुए युधिष्ठिर वहाँ सिंहासनपर विराजमान थे॥ २८॥
ततो मुहूर्तादासीत् तु स्यन्दनानां स्वनो महान्।
नेमिघोषश्च रथिनां खुरघोषश्च वाजिनाम्॥ २९॥
तदनन्तर दो ही घड़ीमें रथोंका महान् शब्द गूँज उठा। रथियोंके रथोंके पहियोंकी घरघराहट और घोड़ोंकी टापोंके शब्द सुनायी देने लगे॥ २९॥
ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च।
नराणां पदशब्दैश्च कम्पतीव स्म मेदिनी॥ ३०॥
हाथियोंके घंटोंकी घनघनाहट, शंखोंकी ध्वनि तथा पैदल चलनेवाले मनुष्योंके पैरोंकी धमकसे यह पृथ्वी काँपती-सी जान पड़ती थी॥ ३०॥
ततः शुद्धान्तमासाद्य जानुभ्यां भूतले स्थितः।
शिरसा वन्दनीयं तमभिवाद्य जनेश्वरम्॥ ३१॥
कुण्डली बद्धनिस्त्रिंशः संनद्धकवचो युवा।
अभिप्रणम्य शिरसा द्वाःस्थो धर्मात्मजाय वै॥ ३२॥
न्यवेदयद्धृषीकेशमुपयान्तं महात्मने।
इसी समय कानोंमें कुण्डल पहने, कमरमें तलवार बाँधे और वक्षःस्थलपर कवच धारण किये एक तरुण द्वारपालने उस ड्योढ़ीके भीतर प्रवेश करके धरतीपर दोनों घुटने टेक दिये और वन्दनीय महाराज युधिष्ठिरको मस्तक नवाकर प्रणाम किया। इस प्रकार सिरसे प्रणाम करके उसने धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरको यह सूचना दी कि भगवान् श्रीकृष्ण पधार रहे हैं॥ ३१-३२ १/२॥
सोऽब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः स्वागतेनैव माधवम्॥ ३३॥
अर्घ्यं चैवासनं चास्मै दीयतां परमार्चितम्।
तब पुरुषसिंह युधिष्ठिरने द्वारपालसे कहा—'तुम माधवको स्वागतपूर्वक ले आओ और उन्हें अर्घ्य तथा परम उत्तम आसन अर्पित करो'॥ ३३ १/२॥
ततः प्रवेश्य वार्ष्णेयमुपवेश्य वरासने।
पूजयामास विधिवद् धर्मराजो युधिष्ठिरः॥ ३४॥
तब द्वारपालने भगवान् श्रीकृष्णको भीतर ले आकर एक श्रेष्ठ आसनपर बैठा दिया। तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिरने स्वयं ही विधिपूर्वक उनका पूजन किया ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि युधिष्ठिरसज्जतायां
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें युधिष्ठिरके सुसज्जित होनेसे
सम्बन्ध रखनेवाला बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 546)
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
अर्जुनकी प्रतिज्ञाको सफल बनानेके लिये युधिष्ठिरकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना और श्रीकृष्णका उन्हें आश्वासन देना
संजय उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा प्रतिनन्द्य जनार्दनम् ।
उवाच परमप्रीतः कौन्तेयो देवकीसुतम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरने अत्यन्त प्रसन्न हो देवकीनन्दन जनार्दनका अभिनन्दन करके पूछा— ॥ १ ॥
सुखेन रजनी व्युष्टा कच्चित् ते मधुसूदन ।
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत ॥ २ ॥
‘मधुसूदन! क्या आपकी रात सुखपूर्वक बीती है? अच्युत! क्या आपकी सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न हैं?’ ॥ २ ॥
वासुदेवोऽपि तद्युक्तं पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरम् ।
ततश्च प्रकृतीः क्षत्ता न्यवेदयदुपस्थिताः ॥ ३ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने भी उनसे समयोचित प्रश्न किये। तत्पश्चात् सेवकने आकर सूचना दी कि मन्त्री, सेनापति आदि उपस्थित हैं ॥ ३ ॥
अनुज्ञातश्च राज्ञा स प्रावेशयत तं जनम् ।
विराटं भीमसेनं च धृष्टद्युम्नं च सात्यकिम् ॥ ४ ॥
चेदिपं धृष्टकेतुं च द्रुपदं च महारथम् ।
शिखण्डिनं यमौ चैव चेकितानं सकेकयम् ॥ ५ ॥
युयुत्सुं चैव कौरव्यं पाञ्चाल्यं चोत्तमौजसम् ।
युधामन्युं सुबाहुं च द्रौपदेयांश्च सर्वशः ॥ ६ ॥
उस समय महाराजकी अनुमति पाकर विराट, भीमसेन, धृष्टद्युम्न, सात्यकि, चेदिराज धृष्टकेतु, महारथी द्रुपद, शिखण्डी, नकुल, सहदेव, चेकितान, केकयराजकुमार, कुरुवंशी युयुत्सु, पांचालवीर उत्तमौजा, युधामन्यु, सुबाहु तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र—इन सब लोगोंको द्वारपाल भीतर ले आया ॥ ४—६ ॥
एते चान्ये च बहवः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ।
उपतस्थुर्महात्मानं विविशुश्चासने शुभे ॥ ७ ॥
ये तथा और भी बहुत-से क्षत्रियशिरोमणि महात्मा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हुए और सुन्दर आसनपर बैठे ॥ ७ ॥
एकस्मिन्नासने वीरावुपविष्टौ महाबलौ । कृष्णश्च युयुधानश्च महात्मानौ महाद्युती ॥ ८ ॥ महाबली और महातेजस्वी महात्मा श्रीकृष्ण और सात्यकि ये दोनों वीर एक ही आसनपर बैठे थे ॥ ८ ॥
ततो युधिष्ठिरस्तेषां शृण्वतां मधुसूदनम् । अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षमभाष्य मधुरं वचः ॥ ९ ॥ तब युधिष्ठिरने उन सब लोगोंके सुनते हुए कमलनयन भगवान् मधुसूदनको सम्बोधित करके मधुर वाणीमें कहा— ॥ ९ ॥
एकं त्वां वयमाश्रित्य सहस्राक्षमिवामराः । प्रार्थयामो जयं युद्धे शाश्वतानि सुखानि च ॥ १० ॥ 'प्रभो! जैसे देवता इन्द्रका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार हमलोग एकमात्र आपका सहारा लेकर युद्धमें विजय और शाश्वत सुख पाना चाहते हैं ॥ १० ॥
त्वं हि राज्यविनाशं च द्विषद्भिश्च निराक्रियाम् । क्लेशांश्च विविधान् कृष्ण सर्वांस्तानपि वेद नः ॥ ११ ॥ 'श्रीकृष्ण! शत्रुओंने जो हमारे राज्यका नाश करके हमारा तिरस्कार किया और भाँति-भाँतिके क्लेश दिये, उन सबको आप अच्छी तरह जानते हैं ॥ ११ ॥
त्वयि सर्वेश सर्वेषामस्माकं भक्तवत्सल । सुखमायत्तमत्यर्थं यात्रा च मधुसूदन ॥ १२ ॥ 'भक्तवत्सल सर्वेश्वर! मधुसूदन! हम सब लोगोंका सुख और जीवन-निर्वाह पूर्णरूपसे आपके ही अधीन है ॥ १२ ॥
स तथा कुरु वार्ष्णेय यथा त्वयि मनो मम । अर्जुनस्य यथा सत्या प्रतिज्ञा स्याच्चिकीर्षिता ॥ १३ ॥ 'वार्ष्णेय! हमारा मन आपमें ही लगा हुआ है। अतः आप ऐसा करें, जिससे अर्जुनकी अभीष्ट प्रतिज्ञा सत्य होकर रहे ॥ १३ ॥
स भवांस्तारयत्वस्माद् दुःखामर्षमहार्णवात् । पारं तितीर्षतामद्य प्लवो नो भव माधव ॥ १४ ॥ 'माधव! आज इस दुःख और अमर्षके महासागरसे पार होनेकी इच्छावाले हम सब लोगोंके लिये आप नौका बन जाइये। आप ही इस संकटसे हमारा उद्धार कीजिये ॥ १४ ॥
न हि तत् कुरुते संख्ये रथी रिपुवधोद्यतः । यथा वै कुरुते कृष्ण सारथिर्यत्नमास्थितः ॥ १५ ॥ 'श्रीकृष्ण! संग्राममें शत्रुवधके लिये उद्यत हुआ रथी भी वैसा कार्य नहीं कर पाता, जैसा कि प्रयत्नशील सारथि कर दिखाता है ॥ १५ ॥
यथैव सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीन् जनार्दन ।
तथैवास्मान् महाबाहो वृजिनात् त्रातुमर्हसि ॥ १६ ॥ ‘महाबाहु जनार्दन! जैसे आप वृष्णिवंशियोंको सम्पूर्ण आपत्तियोंसे बचाते हैं, उसी प्रकार हमारी भी इस संकटसे रक्षा कीजिये ॥ १६ ॥
त्वमगाधेऽप्लवे मग्नान् पाण्डवान् कुरुसागरे । समुद्धर प्लवो भूत्वा शङ्खचक्रगदाधर ॥ १७ ॥ ‘शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले परमेश्वर! नौकारहित अगाध कौरव-सागरमें निमग्न पाण्डवोंका आप स्वयं ही नौका बनकर उद्धार कीजिये ॥ १७ ॥
नमस्ते देवदेवेश सनातन विशातन । विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥ १८ ॥ ‘शत्रुनाशक! सनातन देवदेवेश्वर! विष्णो! जिष्णो! हरे! कृष्ण! वैकुण्ठ! पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है ॥ १८ ॥
नारदस्तवां समाचख्यौ पुराणमृषिसत्तमम् । वरदं शार्ङ्गिणं श्रेष्ठं तत् सत्यं कुरु माधव ॥ १९ ॥ ‘माधव! देवर्षि नारदने बताया है कि आप शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, सर्वोत्तम वरदायक, पुरातन ऋषिश्रेष्ठ नारायण हैं, उनकी वह बात सत्य कर दिखाइये ॥ १९ ॥
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षो धर्मराजेन संसदि । तोयमेघस्वनो वाग्मी प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ २० ॥ उस राजसभामें धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उत्तम वक्ता कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने सजल मेघके समान गम्भीर वाणीमें उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २० ॥
वासुदेव उवाच
सामरेष्वपि लोकेषु सर्वेषु न तथाविधः । शरासनधरः कश्चिद् यथा पार्थो धनञ्जयः ॥ २१ ॥ श्रीकृष्ण बोले—राजन्! देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें कोई भी वैसा धनुर्धर नहीं है, जैसे आपके भाई कुन्तीकुमार धनंजय हैं ॥ २१ ॥
वीर्यवानस्त्रसम्पन्नः पराक्रान्तो महाबलः । युद्धशौण्डः सदामर्षी तेजसा परमो नृणाम् ॥ २२ ॥ वे शक्तिशाली, अस्त्रज्ञानसम्पन्न, पराक्रमी, महाबली, युद्धकुशल, सदा अमर्षशील और मनुष्योंमें परम तेजस्वी हैं ॥ २२ ॥
स युवा वृषभस्कन्धो दीर्घबाहुर्महाबलः । सिंहर्षभगतिः श्रीमान् द्विषतस्ते हनिष्यति ॥ २३ ॥ अर्जुनके कंधे वृषभके समान सुपुष्ट हैं, भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं, उनकी चाल भी श्रेष्ठ सिंहके सदृश है, वे महान् बलवान् युवक और श्रीसम्पन्न हैं, अतः आपके शत्रुओंको अवश्य
मार डालेंगे ॥ २३ ॥
अहं च तत् करिष्यामि यथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः । धार्तराष्ट्रस्य सैन्यानि धक्ष्यत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ २४ ॥
मैं भी वही करूँगा, जिससे कुन्तीपुत्र अर्जुन दुर्योधनकी सारी सेनाओंको उसी प्रकार जला डालेंगे, जैसे आग ईंधनको जलाती है ॥ २४ ॥
अद्य तं पापकर्माणं क्षुद्रं सौभद्रघातिनम् । अपुनर्दर्शनं मार्गमिषुभिः क्षेप्स्यतेऽर्जुनः ॥ २५ ॥
आज सुभद्राकुमार अभिमन्युकी हत्या करनेवाले उस नीच पापी जयद्रथको अर्जुन अपने बाणोंद्वारा उस मार्गपर डाल देंगे, जहाँ जानेपर उस जीवका पुनः इस लोकमें दर्शन नहीं होता ॥ २५ ॥
तस्याद्य गृध्राः श्येनाश्च चण्डगोमायवस्तथा । भक्षयिष्यन्ति मांसानि ये चान्ये पुरुषादकाः ॥ २६ ॥
आज गीध, बाज, क्रोधमें भरे हुए गीदड़ तथा अन्य नरभक्षी जीव-जन्तु जयद्रथका मांस खायेंगे ॥ २६ ॥
यद्यस्य देवा गोप्तारः सेन्द्राः सर्वे तथाप्यसौ । राजधानीं यमस्याद्य हतः प्राप्स्यति संकुले ॥ २७ ॥
यदि इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उसकी रक्षाके लिये आ जायँ तथापि वह आज संग्राममें मारा जाकर यमराजकी राजधानीमें अवश्य जा पहुँचेगा ॥ २७ ॥
निहत्य सैन्धवं जिष्णुरद्य त्वामुपयास्यति । विशोको विज्वरो राजन् भव भूतिपुरस्कृतः ॥ २८ ॥
राजन्! आज विजयशील अर्जुन जयद्रथको मारकर ही आपके पास आयेंगे, आप ऐश्वर्यसे सम्पन्न रहकर शोक और चिन्ताको त्याग दीजिये ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 550)
चतुरशीतितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका अर्जुनको आशीर्वाद, अर्जुनका स्वप्न सुनकर समस्त सुहृदोंकी प्रसन्नता, सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ रथपर बैठकर अर्जुनकी रणयात्रा तथा अर्जुनके कहनेसे सात्यकिका युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये जाना
संजय उवाच
तथा तु वदतां तेषां प्रादुरासीद् धनंजयः ।
दिदृक्षुर्भरतश्रेष्ठं राजानं ससुहृद्गणम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार उन लोगोंमें बातचीत हो ही रही थी कि सुहृदोंसहित भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरका दर्शन करनेकी इच्छासे अर्जुन वहाँ आ गये ॥ १ ॥
तं निविष्टं शुभां कक्ष्यामभिवन्द्याग्रतः स्थितम् ।
तमुत्थायार्जुनं प्रेम्णा सस्वजे पाण्डवर्षभः ॥ २ ॥
उस सुन्दर ड्योढ़ीमें प्रवेश करके राजाको प्रणाम करनेके पश्चात् उनके सामने खड़े हुए अर्जुनको पाण्डव-श्रेष्ठ युधिष्ठिरने उठकर प्रेमपूर्वक हृदयसे लगा लिया ॥ २ ॥
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय परिष्वज्य च बाहुना ।
आशिषः परमाः प्रोच्य स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ ३ ॥
उनका मस्तक सूँघकर और एक बाँहसे उनका आलिंगन करके उन्हें उत्तम आशीर्वाद देते हुए राजाने मुसकराकर कहा— ॥ ३ ॥
व्यक्तमर्जुन संग्रामे ध्रुवस्ते विजयो महान् ।
यादृग्रूपा च ते च्छाया प्रसन्नश्च जनार्दनः ॥ ४ ॥
‘अर्जुन! आज संग्राममें तुम्हें निश्चय ही महान् विजय प्राप्त होगी, यह बात स्पष्टरूपसे दृष्टिगोचर हो रही है; क्योंकि इसीके अनुरूप तुम्हारे मुखकी कान्ति है और भगवान् श्रीकृष्ण भी प्रसन्न हैं’ ॥ ४ ॥
तमब्रवीत् ततो जिष्णुर्महदाश्चर्यमुत्तमम् ।
दृष्टवानस्मि भद्रं ते केशवस्य प्रसादजम् ॥ ५ ॥
‘तब विजयशील अर्जुनने उनसे कहा—राजन्! आपका कल्याण हो। आज मैंने बहुत उत्तम और आश्चर्यजनक स्वप्न देखा है। भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे ही वैसा स्वप्न प्रकट हुआ था’ ॥ ५ ॥
ततस्तत् कथयामास यथा दृष्टं धनंजयः ।
आश्वासनार्थं सुहृदां त्र्यम्बकेण समागमम् ॥ ६ ॥
यों कहकर अर्जुनने अपने सुहृदोंके आश्वासनके लिये जिस प्रकार भगवान् शंकरसे मिलनका स्वप्न देखा था, वह सब कह सुनाया ।। ६ ।। ततः शिरोभिरवनिं स्पृष्ट्वा सर्वे च विस्मिताः । नमस्कृत्य वृषाङ्काय साधु साध्वित्यथाब्रुवन् ।। ७ ।। यह स्वप्न सुनकर वहाँ आये हुए सब लोग आश्चर्यचकित हो उठे और सबने धरतीपर मस्तक टेककर भगवान् शंकरको प्रणाम करके कहा—'यह तो बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ' ।। ७ ।। अनुज्ञातास्ततः सर्वे सुहृदो धर्मसूनुना । त्वरमाणाः सुसंनद्धा हृष्टा युद्धाय निर्ययुः ।। ८ ।। तदनन्तर धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर कवच धारण किये हुए समस्त सुहृद् हर्षमें भरकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे युद्धके लिये निकले ।। ८ ।। अभिवाद्य तु राजानं युयुधानाच्युतार्जुनाः । हृष्टा विनिर्ययुस्ते वै युधिष्ठिरनिवेशनात् ।। ९ ।। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरको प्रणाम करके सात्यकि, श्रीकृष्ण और अर्जुन बड़े हर्षके साथ उनके शिविरसे बाहर निकले ।। ९ ।। रथेनैकेन दुर्धर्षौ युयुधानजनार्दनौ । जग्मतुः सहितौ वीरावर्जुनस्य निवेशनम् ।। १० ।। दुर्धर्ष वीर सात्यकि और श्रीकृष्ण एक रथपर आरूढ़ हो एक साथ अर्जुनके शिविरमें गये ।। १० ।। तत्र गत्वा हृषीकेशः कल्पयामास सूतवत् । रथं रथवरस्याजौ वानरर्षभलक्षणम् ।। ११ ।। वहाँ पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने एक सारथिके समान रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनके वानरश्रेष्ठ हनुमान्के चिह्नसे युक्त ध्वजावाले रथको युद्धके लिये सुसज्जित किया ।। ११ ।। स मेघसमनिर्घोषस्तप्तकाञ्चनसप्रभः । बभौ रथवरः क्लृप्तः शिशुर्दिवसकृद् यथा ।। १२ ।। मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाला और तपाये हुए सुवर्णके समान प्रभासे उद्भासित होनेवाला वह सजाया हुआ श्रेष्ठ रथ प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था ।। १२ ।। ततः पुरुषशार्दूलः सज्जं सज्जपुरःसरः । कृताह्निकाय पार्थाय न्यवेदयत तं रथम् ।। १३ ।। तदनन्तर युद्धके लिये सुसज्जित पुरुषोंमें सर्वश्रेष्ठ पुरुषसिंह श्रीकृष्णने नित्य-कर्म सम्पन्न करके बैठे हुए अर्जुनको यह सूचित किया कि रथ तैयार है ।। १३ ।। तं तु लोकवरः पुंसां किरीटी हेमवर्मभृत् ।
चापबाणधरो वाहं प्रदक्षिणमवर्तत ॥ १४ ॥ तब पुरुषोंमें श्रेष्ठ लोकप्रवर अर्जुनने सोनेके कवच और किरीट धारण करके धनुष-बाण लेकर उस रथकी परिक्रमा की ॥ १४ ॥
तपोविद्यावयोवृद्धैः क्रियावद्भिर्जितेन्द्रियैः । स्तूयमानो जयाशीर्भिरारुरोह महारथम् ॥ १५ ॥ उस समय तपस्या, विद्या तथा अवस्थामें बड़े-बूढ़े, क्रियाशील, जितेन्द्रिय ब्राह्मण उन्हें विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए उनकी स्तुति-प्रशंसा कर रहे थे। उनकी की हुई वह स्तुति सुनते हुए अर्जुन उस विशाल रथपर आरूढ़ हुए ॥ १५ ॥
जैत्रैः सांग्रामिकैर्मन्त्रैः पूर्वमेव रथोत्तमम् । अभिमन्त्रितमर्चिष्मानुदयं भास्करो यथा ॥ १६ ॥ उस उत्तम रथको पहलेसे ही विजयसाधक युद्धसम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किया गया था। उसपर आरूढ़ हुए तेजस्वी अर्जुन उदयाचलपर चढ़े हुए सूर्यके समान जान पड़ते थे ॥ १६ ॥
स रथे रथिनां श्रेष्ठः काञ्चने काञ्चनावृतः । विबभौ विमलोऽर्चिष्मान् मेराविव दिवाकरः ॥ १७ ॥ सुवर्णमय कवचसे आवृत हो उस स्वर्णमय रथपर आरूढ़ हुए रथियोंमें श्रेष्ठ उज्ज्वल कान्तिधारी तेजस्वी अर्जुन मेरु पर्वतपर प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान शोभा पा रहे थे ॥ १७ ॥
अन्वारुरुहतुः पार्थं युयुधानजनार्दनौ । शर्यातेर्यज्ञमायान्तं यथेन्द्रं देवमश्विनौ ॥ १८ ॥ अर्जुनके बैठनेके बाद सात्यकि और श्रीकृष्ण भी उस रथपर आरूढ़ हो गये, मानो राजा शर्यातिके यज्ञमें आते हुए इन्द्रदेवके साथ दोनों अश्विनीकुमार आ रहे हों ॥ १८ ॥
अथ जग्राह गोविन्दो रश्मीन् रश्मिविदां वरः । मातलिर्वासवस्येव वृत्रं हन्तुं प्रयास्यतः ॥ १९ ॥ उन घोड़ोंकी रास पकड़नेकी कलामें सर्वश्रेष्ठ भगवान् गोविन्दने रथकी बागडोर अपने हाथमें ले ली, ठीक उसी प्रकार जैसे, वृत्रासुरका वध करनेके लिये जानेवाले इन्द्रके रथकी बागडोर मातलिने पकड़ी थी ॥ १९ ॥
स ताभ्यां सहितः पार्थो रथप्रवरमास्थितः । सहितो बुधशुक्राभ्यां तमो निघ्नन् यथा शशी ॥ २० ॥ सात्यकि और श्रीकृष्ण दोनोंके साथ उस श्रेष्ठ रथपर बैठे हुए अर्जुन बुध और शुक्रके साथ स्थित हुए अन्धकारनाशक चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे ॥ २० ॥
सैन्धवस्य वधं प्रेप्सुः प्रयातः शत्रुपुंगहा । सहाम्बुपतिमित्राभ्यां यथेन्द्रस्तारकामये ॥ २१ ॥
शत्रुसमूहका नाश करनेवाले अर्जुन जब सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ सिंधुराज जयद्रथका वध करनेकी इच्छासे प्रस्थित हुए, उस समय वरुण और मित्रके साथ तारकामय संग्राममें जानेवाले इन्द्रके समान सुशोभित हुए ॥ २१ ॥ ततो वादित्रनिर्घोषैर्माङ्गल्यैश्च स्तवैः शुभैः । प्रयान्तमर्जुनं वीरं मागधाश्चैव तुष्टुवुः ॥ २२ ॥ तदनन्तर रणवाद्योंके घोष तथा शुभ एवं मांगलिक स्तुतियोंके साथ यात्रा करते हुए वीर अर्जुनकी मागधजन स्तुति करने लगे ॥ २२ ॥ सजयाशीः सपुण्याहः सूतमागधनिःस्वनः । युक्तो वादित्रघोषेण तेषां रतिकरोऽभवत् ॥ २३ ॥ विजयसूचक आशीर्वाद तथा पुण्याहवाचनके साथ सूत, मागध एवं वन्दीजनोंका शब्द रणवाद्योंकी ध्वनिसे मिलकर उन सबकी प्रसन्नताको बढ़ा रहा था ॥ २३ ॥ तमनुप्रयतो वायुः पुण्यगन्धवहः शुभः । ववौ संहर्षयन् पार्थं द्विषतश्चापि शोषयन् ॥ २४ ॥ अर्जुनके प्रस्थान करनेपर पीछेसे मंगलमय पवित्र एवं सुगन्धयुक्त वायु बहने लगी, जो अर्जुनका हर्ष बढ़ाती हुई उनके शत्रुओंका शोषण कर रही थी ॥ २४ ॥ ततस्तस्मिन् क्षणे राजन् विविधानि शुभानि च । प्रादुरासन् निमित्तानि विजयाय बहूनि च । पाण्डवानां त्वदीयानां विपरीतानि मारिष ॥ २५ ॥ माननीय महाराज! उस समय बहुत-से ऐसे शुभ शकुन प्रकट हुए, जो पाण्डवोंकी विजय और आपके सैनिकोंकी पराजयकी सूचना दे रहे थे ॥ २५ ॥ दृष्ट्वार्जुनो निमित्तानि विजयाय प्रदक्षिणम् । युयुधानं महेष्वासमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥ अर्जुनने अपने दाहिने प्रकट होनेवाले उन विजयसूचक शुभ लक्षणोंको देखकर महाधनुर्धर सात्यकिसे इस प्रकार कहा— ॥ २६ ॥ युयुधानाद्य युद्धे मे दृश्यते विजयो ध्रुवः । यथा हीमानि लिङ्गानि दृश्यन्ते शिनिपुङ्गव ॥ २७ ॥ ‘शिनिप्रवर युयुधान! आज जैसे ये शुभ लक्षण दिखायी देते हैं, उनसे युद्धमें मेरी निश्चित विजय दृष्टिगोचर हो रही है’ ॥ २७ ॥ सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र सैन्धवको नृपः । यियासुर्यमलोकाय मम वीर्यं प्रतीक्षते ॥ २८ ॥ ‘अतः मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ सिंधुराज जयद्रथ यमलोकमें जानेकी इच्छासे मेरे पराक्रमकी प्रतीक्षा कर रहा है ॥ २८ ॥ यथा परमकं कृत्यं सैन्धवस्य वधो मम ।
तथैव सुमहत् कृत्यं धर्मराजस्य रक्षणम् ॥ २९ ॥
‘मेरे लिये सिंधुराज जयद्रथका वध जैसे अत्यन्त महान् कार्य है, उसी प्रकार धर्मराजकी रक्षा भी परम महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है ॥ २९ ॥
स त्वमद्य महाबाहो राजानं परिपालय ।
यथैव हि मया गुप्तस्त्वया गुप्तो भवेत् तथा ॥ ३० ॥
‘महाबाहो! आज तुम्हीं राजा युधिष्ठिरकी सब ओरसे रक्षा करो। जिस प्रकार वे मेरे द्वारा सुरक्षित होते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे द्वारा भी उनकी सुरक्षा हो सकती है ॥ ३० ॥
न पश्यामि च तं लोके यस्त्वां युद्धे पराजयेत् ।
वासुदेवसमं युद्धे स्वयमप्यमरेश्वरः ॥ ३१ ॥
‘मैं संसारमें ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें तुम्हें पराजित कर सके। तुम संग्रामभूमिमें साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके समान हो। साक्षात् देवराज इन्द्र भी तुम्हें नहीं जीत सकते ॥ ३१ ॥
त्वयि चाहं पराश्वस्तः प्रद्युम्ने वा महारथे ।
शक्नुयां सैन्धवं हन्तुमनपेक्षो नरर्षभ ॥ ३२ ॥
‘नरश्रेष्ठ! इस कार्यके लिये मैं तुमपर अथवा महारथी प्रद्युम्नपर ही पूरा भरोसा करता हूँ। सिंधुराज जयद्रथका वध तो मैं किसीकी सहायताकी अपेक्षा किये बिना ही कर सकता हूँ ॥ ३२ ॥
मय्यपेक्षा न कर्तव्या कथंचिदपि सात्वत ।
राजन्येष परा गुप्तिः कार्या सर्वात्मना त्वया ॥ ३३ ॥
‘सात्वतवीर! तुम किसी प्रकार भी मेरा अनुसरण न करना। तुम्हें सब प्रकारसे राजा युधिष्ठिरकी ही पूर्णरूपसे रक्षा करनी चाहिये ॥ ३३ ॥
न हि यत्र महाबाहुर्वासुदेवो व्यवस्थितः ।
किंचिद् व्यापद्यते तत्र यत्राहमपि च ध्रुवम् ॥ ३४ ॥
‘जहाँ महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान हैं और मैं भी उपस्थित हूँ, वहाँ अवश्य ही कोई कार्य बिगड़ नहीं सकता है’ ॥ ३४ ॥
एवमुक्तस्तु पार्थेन सात्यकिः परवीरहा ।
तथेत्युक्त्वागमत् तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥ ३५ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सात्यकि ‘बहुत अच्छा’ कहकर जहाँ राजा युधिष्ठिर थे, वहीं चले गये ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनवाक्ये चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
(जयद्रथवधपर्व)
(जयद्रथवधपर्व)
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका विलाप
धृतराष्ट्र उवाच
श्वोभूते किमकार्षुस्ते दुःखशोकसमन्विताः ।
अभिमन्यौ हते तत्र के वायुध्यन्त मामकाः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! अभिमन्युके मारे जानेपर दुःख और शोकमें डूबे हुए पाण्डवोंने सबेरा होनेपर क्या किया? तथा मेरे पक्षवाले योद्धाओंमेंसे किन लोगोंने युद्ध किया? ॥ १ ॥
जानन्तस्तस्य कर्माणि कुरवः सव्यसाचिनः ।
कथं तत् किल्बिषं कृत्वा निर्भया ब्रूहि मामकाः ॥ २ ॥
सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमको जानते हुए भी मेरे पक्षवाले कौरव योद्धा उनका अपराध करके कैसे निर्भय रह सके? यह बताओ ॥ २ ॥
पुत्रशोकाभिसंतप्तं क्रुद्धं मृत्युमिवान्तकम् ।
आयान्तं पुरुषव्याघ्रं कथं ददृशुराहवे ॥ ३ ॥
पुत्रशोकसे संतप्त हो क्रोधमें भरे हुए प्राणान्तकारी मृत्युके समान आते हुए पुरुषसिंह अर्जुनकी ओर मेरे पुत्र युद्धमें कैसे देख सके? ॥ ३ ॥
कपिराजध्वजं संख्ये विधुन्वानं महद् धनुः ।
दृष्ट्वा पुत्रपरिद्यूनं किमकुर्वत मामकाः ॥ ४ ॥
जिनकी ध्वजामें कपिराज हनुमान् विराजमान हैं, उन पुत्रवियोगसे व्यथित हुए अर्जुनको युद्धस्थलमें अपने विशाल धनुषकी टंकार करते देख मेरे पुत्रोंने क्या किया? ॥ ४ ॥
किं नु संजय संग्रामे वृत्तं दुर्योधनं प्रति ।
परिदेवो महानद्य श्रुतो मे नाभिनन्दनम् ॥ ५ ॥
संजय! संग्रामभूमिमें दुर्योधनपर क्या बीता है? इन दिनों मैंने महान् विलापकी ध्वनि सुनी है। आमोद-प्रमोदके शब्द मेरे कानोंमें नहीं पड़े हैं ॥ ५ ॥
बभूवुर्ये मनोग्राहाः शब्दाः श्रुतिसुखावहाः ।
न श्रूयन्तेऽद्य सर्वे ते सैन्धवस्य निवेशने ॥ ६ ॥
पहले सिंधुराजके शिविरमें जो मनको प्रिय लगनेवाले और कानोंको सुख देनेवाले शब्द होते रहते थे, वे सब अब नहीं सुनायी पड़ते हैं ।। ६ ।। स्तुवतां नाद्य श्रूयन्ते पुत्राणां शिबिरे मम । सूतमागधसंघानां नर्तकानां च सर्वशः ।। ७ ।। मेरे पुत्रोंके शिविरमें अब स्तुति करनेवाले सूतों, मागधों एवं नर्तकोंके शब्द सर्वथा नहीं सुनायी पड़ते हैं ।। ७ ।। शब्देन नादिताभीक्ष्णमभवद् यत्र मे श्रुतिः । दीनानामद्य तं शब्दं न शृणोमि समीरितम् ।। ८ ।। जहाँ मेरे कान निरन्तर स्वजनोंके आनन्द-कोलाहलसे गूँजते रहते थे, वहीं आज मैं अपने दीन-दुःखी पुत्रोंके द्वारा उच्चारित वह हर्षसूचक शब्द नहीं सुन रहा हूँ ।। निवेशने सत्यधृतेः सोमदत्तस्य संजय । आसीनोऽहं पुरा तात शब्दमश्रौषमुत्तमम् ।। ९ ।। तात संजय! पहले मैं यथार्थ धैर्यशाली सोमदत्तके भवनमें बैठा हुआ उत्तम शब्द सुना करता था ।। ९ ।। तदद्य पुण्यहीनोऽहमार्तस्वरनिनादितम् । निवेशनं गतोत्साहं पुत्राणां मम लक्षये ।। १० ।। परंतु आज पुण्यहीन मैं अपने पुत्रोंके घरको उत्साहशून्य एवं आर्तनादसे गूँजता हुआ देख रहा हूँ ।। विविंशतेर्दुर्मुखस्य चित्रसेनविकर्णयोः । अन्येषां च सुतानां मे न तथा श्रूयते ध्वनिः ।। ११ ।। विविंशति, दुर्मुख, चित्रसेन, विकर्ण तथा मेरे अन्य पुत्रोंके घरोंमें अब पूर्ववत् आनन्दित ध्वनि नहीं सुनी जाती है ।। ११ ।। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या यं शिष्याः पर्युपासते । द्रोणपुत्रं महेष्वासं पुत्राणां मे परायणम् ।। १२ ।। वितण्डालापसंलापैर्द्रुतवादित्रवादितैः । गीतैश्च विविधैरिष्टै रमते यो दिवानिशम् ।। १३ ।। उपास्यमानो बहुभिः कुरुपाण्डवसात्वतैः । सूत तस्य गृहे शब्दो नाद्य द्रौणेर्यथा पुरा ।। १४ ।। सूत संजय! मेरे पुत्रोंके परम आश्रय जिस महाधनुर्धर द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सभी जातियोंके शिष्य उपासना (निकट रहकर सेवा) करते रहे हैं, जो वितण्डावाद, भाषण, पारस्परिक बातचीत, द्रुतस्वरमें बजाये हुए वाद्योंके शब्दों तथा भाँति-भाँतिके अभीष्ट गीतोंसे दिन-रात मन बहलाया करता था, जिसके पास बहुत-से कौरव,
पाण्डव और सात्वतवंशी वीर बैठा करते थे, उस अश्वत्थामाके घरमें आज पहलेके समान हर्षसूचक शब्द नहीं हो रहा है ॥ १२—१४ ॥
द्रोणपुत्रं महेष्वासं गायना नर्तकाश्च ये ।
अत्यर्थमुपतिष्ठन्ति तेषां न श्रूयते ध्वनिः ॥ १५ ॥
महाधनुर्धर द्रोणपुत्रकी सेवामें जो गायक और नर्तक अधिक उपस्थित होते थे, उनकी ध्वनि अब नहीं सुनायी देती है ॥ १५ ॥
विन्दानुविन्दयोः सायं शिबिरे यो महाध्वनिः ॥ १६ ॥
श्रूयते सोऽद्य न तथा केकयानां च वेश्मसु ।
नित्यं प्रमुदितानां च तालगीतस्वनो महान् ॥ १७ ॥
नृत्यतां श्रूयते तात गणानां सोऽद्य न स्वनः ।
विन्द और अनुविन्दके शिविरमें संध्याके समय जो महान् शब्द सुनायी पड़ता था, वह अब नहीं सुननेमें आता है। तात सदा आनन्दित रहनेवाले केकयोंके भवनोंमें झुंड-के-झुंड नर्तकोंका ताल स्वरके साथ गीतका जो महान् शब्द सुनायी पड़ता था, वह अब नहीं सुना जाता है ॥ १६-१७ १/२ ॥
सप्त तन्तून् वितन्वाना याजका यमुपासते ॥ १८ ॥
सौमदत्तिं श्रुतनिधिं तेषां न श्रूयते ध्वनिः ।
वेद-विद्याके भण्डार जिस सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवाके यहाँ सातों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले याजक सदा रहा करते थे, अब वहाँ उन ब्राह्मणोंकी आवाज नहीं सुनायी देती है ॥ १८ १/२ ॥
ज्याघोषो ब्रह्मघोषश्च तोमरासिरथध्वनिः ॥ १९ ॥
द्रोणस्यासीदविरतो गृहे तं न शृणोम्यहम् ।
द्रोणाचार्यके घरमें निरन्तर धनुषकी प्रत्यंचाका घोष, वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी ध्वनि तथा तोमर, तलवार एवं रथके शब्द गूँजते रहते थे; परंतु अब मैं वहाँ वहाँ वह शब्द नहीं सुन रहा हूँ ॥ १९ १/२ ॥
नानादेशसमुत्थानां गीतानां योऽभवत् स्वनः ॥ २० ॥
वादित्रनादितानां च सोऽद्य न श्रूयते महान् ।
नाना प्रदेशोंसे आये हुए लोगोंके गाये हुए गीतोंका और बजाये हुए बाजोंका भी जो महान् शब्द श्रवण-गोचर होता था, वह अब नहीं सुनायी देता है ॥ २० १/२ ॥
यदा प्रभृत्युपप्लव्याच्छान्तिमिच्छञ्जनार्दनः ॥ २१ ॥
आगतः सर्वभूतानामनुकम्पार्थमच्युतः ।
ततोऽहमब्रुवं सूत मन्दं दुर्योधनं तदा ॥ २२ ॥
संजय! जब अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् जनार्दन समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये शान्ति स्थापित करनेकी इच्छा लेकर उपप्लव्यसे
हस्तिनापुरमें पधारे थे, उस समय मैंने अपने मूर्ख पुत्र दुर्योधनसे इस प्रकार कहा था — ॥ २१-२२ ॥
वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवैः ।
कालप्राप्तमहं मन्ये मा त्वं दुर्योधनातिगाः ॥ २३ ॥
‘बेटा! भगवान् श्रीकृष्णको साधन बनाकर पाण्डवोंके साथ संधि कर लो। मैं इसीको समयोचित कर्तव्य मानता हूँ। दुर्योधन! तुम इसे टालो मत ॥ २३ ॥
शमं चेद् याचमानं त्वं प्रत्याख्यास्यसि केशवम् ।
हितार्थमभिजल्पन्तं न तवास्ति रणे जयः ॥ २४ ॥
‘भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे हितकी ही बात कहते हैं और स्वयं संधिके लिये याचना कर रहे हैं। ऐसी दशामें यदि तुम इनकी बात नहीं मानोगे तो युद्धमें तुम्हारी विजय नहीं होगी' ॥ २४ ॥
प्रत्याचष्ट स दाशार्हमृषभं सर्वधन्विनाम् ।
अनुनेयानि जल्पन्तमनयान्वपद्यत ॥ २५ ॥
परंतु उसने सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णकी बात माननेसे इनकार कर दिया। यद्यपि वे अनुनयपूर्ण वचन बोलते थे, तथापि दुर्योधनने अन्यायवश उन्हें नहीं माना ॥ २५ ॥
(कर्णदुःशासनमते सौबलस्य च दुर्मतेः ।
प्रत्याख्यातो महाबाहुः कुलान्तकरणेन मे ॥)
कर्ण, दुःशासन और खोटी बुद्धिवाले शकुनिके मतमें आकर मेरे कुलका नाश करनेवाले दुर्योधनने महाबाहु श्रीकृष्णका तिरस्कार कर दिया।
ततो दुःशासनस्यैव कर्णस्य च मतं द्वयोः ।
अन्ववर्तत मां हित्वा कृष्टः कालेन दुर्मतिः ॥ २६ ॥
फिर तो कालसे आकृष्ट हुए दुर्बुद्धि दुर्योधनने मुझे छोड़कर दुःशासन और कर्ण इन्हीं दोनोंके मतका अनुसरण किया ॥ २६ ॥
न ह्यहं द्यूतमिच्छामि विदुरो न प्रशंसति ।
सैन्धवो नेच्छति द्यूतं भीष्मो न द्यूतमिच्छति ॥ २७ ॥
मैं जूआ खेलना नहीं चाहता था, विदुर भी उसकी प्रशंसा नहीं करते थे, सिंधुराज जयद्रथ भी जूआ नहीं चाहते थे और भीष्मजी भी द्यूतकी अभिलाषा नहीं रखते थे ॥ २७ ॥
शल्यो भूरिश्रवाश्चैव पुरुमित्रो जयस्तथा ।
अश्वत्थामा कृपो द्रोणो द्यूतं नेच्छन्ति संजय ॥ २८ ॥
संजय! शल्य, भूरिश्रवा, पुरुमित्र, जय, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और द्रोणाचार्य भी जूआ होने नहीं देना चाहते थे ॥ २८ ॥
एतेषां मतमादाय यदि वर्तेत पुत्रकः । सज्ञातिमित्रः ससुहृच्चिरं जीवेदनामयः ॥ २९ ॥ यदि बेटा दुर्योधन इन सबकी राय लेकर चलता तो भाई-बन्धु, मित्र और सुहृदोंसहित दीर्घकालतक नीरोग एवं स्वस्थ रहकर जीवन धारण करता ॥ २९ ॥
श्लक्ष्णा मधुरसम्भाषा ज्ञातिबन्धुप्रियंवदाः । कुलीनाः सम्मताः प्राज्ञाः सुखं प्राप्स्यन्ति पाण्डवाः ॥ ३० ॥ ‘पाण्डव सरल, मधुरभाषी, भाई-बन्धुओंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले, कुलीन, सम्मानित और विद्वान् हैं; अतः उन्हें सुखकी प्राप्ति होगी ॥ ३० ॥
धर्मापेक्षी नरो नित्यं सर्वत्र लभते सुखम् । प्रेत्यभावे च कल्याणं प्रसादं प्रतिपद्यते ॥ ३१ ॥ ‘धर्मकी अपेक्षा रखनेवाला मनुष्य सदा सर्वत्र सुखका भागी होता है। मृत्युके पश्चात् भी उसे कल्याण एवं प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ ३१ ॥
अर्हास्ते पृथिवीं भोक्तुं समर्थाः साधनेऽपि च । तेषामपि समुद्रान्ता पितृपैतामही मही ॥ ३२ ॥ ‘पाण्डव पृथ्वीका राज्य भोगनेमें और उसे प्राप्त करनेमें भी समर्थ हैं। यह समुद्रपर्यन्त पृथ्वी उनके बाप-दादोंकी भी है ॥ ३२ ॥
नियुज्यमानाः स्थास्यन्ति पाण्डवा धर्मवर्त्मनि । सन्ति मे ज्ञातयस्तात येषां श्रोष्यन्ति पाण्डवाः ॥ ३३ ॥ ‘तात! पाण्डवोंको यदि आदेश दिया जाय तो वे उसे मानकर सदा धर्ममार्गपर ही स्थिर रहेंगे। मेरे अनेक ऐसे भाई-बन्धु हैं, जिनकी बात पाण्डव सुनेंगे ॥ ३३ ॥
शल्यस्य सोमदत्तस्य भीष्मस्य च महात्मनः । द्रोणस्याथ विकर्णस्य बाह्लीकस्य कृपस्य च ॥ ३४ ॥ अन्येषां चैव वृद्धानां भरतानां महात्मनाम् । त्वदर्थं ब्रुवतां तात करिष्यन्ति वचो हि ते ॥ ३५ ॥ ‘वत्स! शल्य, सोमदत्त, महात्मा भीष्म, द्रोणाचार्य, विकर्ण, बाह्लीक, कृपाचार्य तथा अन्य जो बड़े-बूढ़े महामना भरतवंशी हैं, वे यदि तुम्हारे लिये उनसे कुछ कहेंगे तो पाण्डव उनकी बात अवश्य मानेंगे ॥ ३४-३५ ॥
कं वा त्वं मन्यसे तेषां यस्तान् ब्रूयादतोऽन्यथा । कृष्णो न धर्मं संजह्यात् सर्वे ते हि तदन्वयाः ॥ ३६ ॥ ‘बेटा दुर्योधन! तुम उपर्युक्त व्यक्तियोंमेंसे किसको ऐसा मानते हो जो पाण्डवोंके विषयमें इसके विपरीत कह सके। श्रीकृष्ण कभी धर्मका परित्याग नहीं कर सकते और समस्त पाण्डव उन्हींके मार्गका अनुसरण करनेवाले हैं ॥ ३६ ॥
मयापि चोक्तास्ते वीरा वचनं धर्मसंहितम् ।
नान्यथा प्रकरिष्यन्ति धर्मात्मानो हि पाण्डवाः ॥ ३७ ॥
‘मेरे कहनेपर भी वे मेरे धर्मयुक्त वचनकी अवहेलना नहीं करेंगे; क्योंकि वीर पाण्डव धर्मात्मा हैं’ ॥ ३७ ॥
इत्यहं विलपन् सूत बहुशः पुत्रमुक्तवान् ।
न च मे श्रुतवान् मूढो मन्ये कालस्य पर्ययम् ॥ ३८ ॥
सूत! इस प्रकार विलाप करते हुए मैंने अपने पुत्र दुर्योधनसे बहुत कुछ कहा, परंतु उस मूर्खने मेरी एक नहीं सुनी। अतः मैं समझता हूँ कि कालचक्रने पलटा खाया है ॥ ३८ ॥
वृकोदरार्जुनौ यत्र वृष्णिवीरश्च सात्यकिः ।
उत्तमौजाश्च पाञ्चाल्यो युधामन्युश्च दुर्जयः ॥ ३९ ॥
धृष्टद्युम्नश्च दुर्धर्षः शिखण्डी चापराजितः ।
अश्मकाः केकयाश्चैव क्षत्रधर्मा च सौमकिः ॥ ४० ॥
चैद्यश्च चेकितानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ।
द्रौपदेया विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ ४१ ॥
यमौ च पुरुषव्याघ्रौ मन्त्री च मधुसूदनः ।
क एताञ्जातु युध्येत लोकेऽस्मिन् वै जिजीविषुः ॥ ४२ ॥
जिस पक्षमें भीमसेन, अर्जुन, वृष्णिवीर सात्यकि, पांचालवीर उत्तमौजा, दुर्जय युधामन्यु, दुर्धर्ष धृष्टद्युम्न, अपराजित वीर शिखण्डी, अश्मक, केकयराजकुमार, सोमकपुत्र क्षत्रधर्मा, चेदिराज धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराजके पुत्र अभिभू, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, राजा विराट और महारथी द्रुपद हैं, जहाँ पुरुषसिंह नकुल, सहदेव और मन्त्रदाता मधुसूदन हैं, वहाँ इस संसारमें कौन ऐसा वीर है, जो जीवित रहनेकी इच्छा रखकर इन वीरोंके साथ कभी युद्ध करेगा ॥ ३९—४२ ॥
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणान् प्रसहेद् वा परान् मम ।
अन्यो दुर्योधनात् कर्णाच्छकुनेश्चापि सौबलात् ॥ ४३ ॥
दुःशासनचतुर्थानां नान्यं पश्यामि पञ्चमम् ।
अथवा दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा चौथे दुःशासनके सिवा मैं पाँचवें किसी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो दिव्यास्त्र प्रकट करनेवाले मेरे इन शत्रुओंका वेग सह सके ॥ ४३ १/२ ॥
येषामभीषुहस्तः स्याद् विष्वक्सेनो रथे स्थितः ॥ ४४ ॥
संनद्धश्चार्जुनो योद्धा तेषां नास्ति पराजयः ।
रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण हाथोंमें बागडोर लेकर जितना सारथ्य करते हैं तथा जिनकी ओरसे कवचधारी अर्जुन युद्ध करनेवाले हैं, उनकी कभी पराजय नहीं हो सकती ॥ ४४ १/२ ॥
तेषामथ विलापानां नायं दुर्योधनः स्मरेत् ॥ ४५ ॥
हतौ हि पुरुषव्याघ्रौ भीष्मद्रोणौ त्वमात्थ वै ।
संजय! यह दुर्योधन मेरे उन विलापोंको कभी याद नहीं करेगा। तुम कहते हो कि 'पुरुषसिंह भीष्म और द्रोणाचार्य मारे गये' ।। ४५ १/२ ।।
तेषां विदुरवाक्यानामुक्तानां दीर्घदर्शनात् ।। ४६ ।।
दृष्ट्वेमां फलनिर्वृत्तिं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।
सेनां दृष्ट्वाभिभूतां मे शैनेयेनार्जुनेन च ।। ४७ ।।
विदुरने भविष्यमें होनेवाली दूरतककी घटनाओंको ध्यानमें रखकर जो बातें कही थीं, उन्हींके अनुसार इस समय हमें यह फल मिल रहा है। इसे देखकर मैं यह समझता हूँ कि मेरे पुत्र सात्यकि और अर्जुनके द्वारा अपनी सेनाका संहार देखते हुए शोक कर रहे होंगे ।। ४६-४७ ।।
शून्यान् दृष्ट्वा रथोपस्थान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।
हिमात्यये यथा कक्षं शुष्कं वातेरितो महान् ।। ४८ ।।
अग्निर्दहेत् तथा सेनां मामिकां स धनंजयः ।
आचक्ष्व मम तत् सर्वं कुशलो ह्यसि संजयः ।। ४९ ।।
बहुत-से रथोंकी बैठकोंको रथियोंसे शून्य देखकर मेरे पुत्र शोकमें डूब गये होंगे; ऐसा मेरा विश्वास है। जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें वायुका सहारा पाकर बढ़ी हुई अग्नि सूखे घासको जला डालती है, उसी प्रकार अर्जुन मेरी सेनाको दग्ध कर डालेंगे। संजय! तुम कथा कहनेमें कुशल हो; अतः युद्धका सारा समाचार मुझसे कहो ।। ४८-४९ ।।
यदुपयात सायाह्ने कृत्वा पार्थस्य किल्बिषम् ।
अभिमन्यौ हते तात कथमासीन्मनो हि वः ।। ५० ।।
तात! जब तुमलोग अभिमन्युके मारे जानेपर अर्जुनका महान् अपराध करके सायंकालमें शिविरको लौटे थे, उस समय तुम्हारे मनकी क्या अवस्था थी? ।। ५० ।।
न जातु तस्य कर्माणि युधि गाण्डीवधन्वनः ।
अपकृत्य महत् तात सोढुं शक्ष्यन्ति मामकाः ।। ५१ ।।
तात! गाण्डीवधारी अर्जुनका महान् अपकार करके मेरे पुत्र युद्धमें उनके पराक्रमको कभी नहीं सह सकेंगे ।।
किन्नु दुर्योधनः कृत्यं कर्णः कृत्यं किमब्रवीत् ।
दुःशासनः सौबलश्च तेषामेवं गतेष्वपि ।। ५२ ।।
उस समय उनकी ऐसी अवस्था होनेपर भी दुर्योधनने कौन-सा कर्तव्य निश्चित किया? कर्ण, दुःशासन तथा शकुनिने क्या करनेकी सलाह दी? ।। ५२ ।।
सर्वेषां समवेतानां पुत्राणां मम संजय ।
यद् वृत्तं तात संग्रामे मन्दस्यापनयैर्भृशम् ।। ५३ ।।
लोभानुगस्य दुर्बुद्धेः क्रोधेन विकृतात्मनः ।
राज्यकामस्य मूढस्य रागोपहतचेतसः ।
दुर्णीतं वा सुनीतं वा तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ५४ ॥
तात संजय! युद्धमें मेरे मूर्ख पुत्र दुर्योधनके अत्यन्त अन्यायसे एकत्र हुए मेरे अन्य सभी पुत्रोंपर जो कुछ बीता था तथा लोभका अनुसरण करनेवाले, क्रोधसे विकृत चित्तवाले, रागसे दूषित हृदयवाले, राज्यकामी मूढ़ और दुर्बुद्धि दुर्योधनने जो न्याय अथवा अन्याय किया हो, वह सब मुझसे कहो ॥ ५३-५४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं।)