भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तत्रिंशोऽध्यायः

कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन

संजय उवाच

दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं युयुत्सुं समवस्थितम् ।
चुक्रुशुः कुरवः सर्वे हृष्टरूपाः समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब महाधनुर्धर कर्ण युद्धकी इच्छासे समरांगणमें डटकर खड़ा हो गया, तब समस्त कौरव बड़े हर्षमें भरकर सब ओर कोलाहल करने लगे ॥

ततो दुन्दुभिनिर्घोषैर्भेरीणां निनदेन च ।
बाणशब्दैश्च विविधैर्गर्जितैश्च तरस्विनाम् ॥ २ ॥
निर्ययुस्तावका युद्धे मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ।
तदनन्तर आपके पक्षके समस्त वीर दुन्दुभि और भेरियोंकी ध्वनि, बाणोंकी सनसनाहट और वेगशाली वीरोंकी विविध गर्जनाओंके साथ युद्धके लिये निकल पड़े। उनके मनमें यह निश्चय था कि अब मौत ही हमें युद्धसे निवृत्त कर सकेगी ॥ २ १/२ ॥

प्रयाते तु ततः कर्णे योधेषु मुदितेषु च ॥ ३ ॥
चचाल पृथिवी राजन् ववाश च सुविस्तरम् ।
राजन्! कर्ण और कौरव योद्धाओंके प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान करनेपर धरती डोलने और बड़े जोर-जोरसे अव्यक्त शब्द करने लगी ॥ ३ १/२ ॥

निःसरन्तो व्यदृश्यन्त सूर्यात् सप्त महाग्रहाः ॥ ४ ॥
उल्कापाताश्च संजज्ञुर्दिशां दाहास्तथैव च ।
शुष्काशन्यश्च सम्पेतुर्युवार्ताश्च भैरवाः ॥ ५ ॥
उस समय सूर्यमण्डलसे सात बड़े-बड़े ग्रह निकलते दिखायी दिये, उल्कापात होने लगे, दिशाओंमें आग-सी जल उठी, बिना वर्षाके ही बिजलियाँ गिरने लगीं और भयानक आँधी चलने लगी ॥ ४-५ ॥

मृगपक्षिगणाश्चैव पृतनां बहुशस्तव ।
अपसव्यं तदा चक्रुर्वेदयन्तो महाभयम् ॥ ६ ॥
बहुतेरे मृग और पक्षी महान् भयकी सूचना देते हुए अनेक बार आपकी सेनाको दाहिने करके चले गये ॥ ६ ॥

प्रस्थितस्य च कर्णस्य निपेतुस्तुरगा भुवि ।
अस्थिवर्षं च पतितमन्तरिक्षाद् भयानकम् ॥ ७ ॥

कर्णके प्रस्थान करते ही उसके घोड़े पृथ्वीपर गिर पड़े और आकाशसे हड्डियोंकी भयंकर वर्षा होने लगी ॥ ७ ॥ जज्वलुश्चैव शस्त्राणि ध्वजाश्चैव चकम्पिरे । अश्रूणि च व्यमुञ्चन्त वाहनानि विशाम्पते ॥ ८ ॥ प्रजानाथ! कौरवोंके शस्त्र जल उठे, ध्वज हिलने लगे और वाहन आँसू बहाने लगे ॥ ८ ॥ एते चान्ये च बहव उत्पातास्तत्र दारुणाः । सम्पतेतुर्विनाशाय कौरवाणां सुदारुणाः ॥ ९ ॥ ये तथा और भी बहुत-से भयंकर उत्पात वहाँ प्रकट हुए, जो कौरवोंके विनाशकी सूचना दे रहे थे ॥ ९ ॥ न च तान् गणयामासुः सर्वे दैवेन मोहिताः । प्रस्थितं सूतपुत्रं च जयेत्यूचुर्नराधिपाः । निर्जितान् पाण्डवांश्चैव मेनिरे तत्र कौरवाः ॥ १० ॥ परंतु दैवसे मोहित होनेके कारण उन सबने उन उत्पातोंको कुछ गिना ही नहीं। सूतपुत्रके प्रस्थान करनेपर सब राजा उसकी जय-जयकार बोलने लगे। कौरवोंको यह विश्वास हो गया कि अब पाण्डव परास्त हो जायँगे ॥ १० ॥ ततो रथस्थः परवीरहन्ता भीष्मद्रोणावस्तवीर्यौ समीक्ष्य । समुज्ज्वलद्भास्करपावकाभो वैकर्तनोऽसौ रथकुञ्जरो नृप ॥ ११ ॥ स शल्यमाभाष्य जगाद वाक्यं पार्थस्य कर्मातिशयं विचिन्त्य । मानेन दर्पेण विदह्यमानः क्रोधेन दीप्यन्निव निःश्वसंश्च ॥ १२ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर प्रकाशमान सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी, शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ एवं रथपर बैठा हुआ रथिश्रेष्ठ कर्ण यह देखकर कि भीष्म और द्रोणाचार्यके पराक्रमका लोप हो गया, अर्जुनके अलौकिक कर्मका चिन्तन करके अभिमान और दर्पसे दग्ध हो उठा तथा क्रोधसे जलता हुआ-सा लंबी-लंबी साँस खींचने लगा। उस समय उसने शल्यको सम्बोधित करके कहा— ॥ ११-१२ ॥ नाहं महेन्द्रादपि वज्रपाणेः क्रुद्धाद् बिभेम्यायुधवान् रथस्थः । दृष्ट्वा हि भीष्मप्रमुखाञ्शयाना- नतीव मां ह्यस्थिरता जहाति ॥ १३ ॥

‘राजन्! मैं हाथमें आयुध लेकर रथपर बैठा रहूँ, उस अवस्थामें यदि वज्र धारण करनेवाले इन्द्र भी कुपित होकर आ जायँ तो उनसे भी मुझे भय न होगा। भीष्म आदि महारथियोंको रणभूमिमें सदाके लिये सोया हुआ देखकर भी अस्थिरता (घबराहट) मुझसे दूर ही रहती है॥

महेन्द्रविष्णुप्रतिमावनिन्दितौ
रथाश्वनागप्रवरप्रमाथिनौ।
अवध्यकल्पौ निहतौ यदा परै-
स्ततो न मेऽप्यस्ति रणेऽद्य साध्वसम् ॥ १४ ॥

‘भीष्म और द्रोणाचार्य देवराज इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी, सबके द्वारा प्रशंसित, रथों, घोड़ों और गजराजोंको भी मथ डालनेवाले तथा अवध्य-तुल्य थे, जब उन्हें भी शत्रुओंने मार डाला, तब मेरी क्या गिनती है? यह सोचकर भी आज मुझे रणभूमिमें कोई भय नहीं हो रहा है॥ १४॥

समीक्ष्य संख्येऽतिबलान् नराधिपान्
ससूतमातङ्गरथान् परैर्हतान्।
कथं न सर्वानहितान्रणेऽवधीद्
महास्त्रविद् ब्राह्मणपुङ्गवो गुरुः ॥ १५ ॥

‘युद्धस्थलमें अत्यन्त बलवान् नरेशोंको सारथि, रथ और हाथियोंसहित शत्रुओंद्वारा मारा गया देखकर भी महान् अस्त्रवेत्ता ब्राह्मणशिरोमणि आचार्य द्रोणने रणभूमिमें समस्त शत्रुओंका वध क्यों नहीं कर डाला? ॥

स संस्मरन् द्रोणमहं महाहवे
ब्रवीमि सत्यं कुरवो निबोधत।
न वा मदन्यः प्रसहेद् रणेऽर्जुनं
समागतं मृत्युमिवोग्ररूपिणम् ॥ १६ ॥

‘अतः महासमरमें मारे गये द्रोणाचार्यका स्मरण करके मैं सत्य कहता हूँ, कौरवो! तुमलोग ध्यान देकर सुनो। मेरे सिवा दूसरा कोई रणभूमिमें अर्जुनका वेग नहीं सह सकता। वे सामने आये हुए भयानक रूपधारी मृत्युके समान हैं॥ १६॥

शिक्षाप्रमादश्च बलं धृतिश्च
द्रोणे महास्त्राणि च संनतिश्च।
स चेदगान्मृत्युवशं महात्मा
सर्वानन्यानातुरानद्य मन्ये ॥ १७ ॥

‘शिक्षा, सावधानी, बल, धैर्य, महान् अस्त्र और विनय—ये सभी सद्गुण द्रोणाचार्यमें विद्यमान थे। वे महात्मा द्रोण भी यदि मृत्युके वशमें पड़ गये तो अन्य सब लोगोंको भी मैं मरणासन्न ही समझता हूँ॥ १७॥

नेह ध्रुवं किंचिदपि प्रचिन्तयन् विद्यां लोके कर्मणो नित्ययोगात् । सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो भावं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते ॥ १८ ॥ ‘बहुत सोचनेपर भी मैं कर्म-सम्बन्धकी अनित्यताके कारण इस लोकमें किसी भी वस्तुको नित्य नहीं मानता। जब आचार्य द्रोण भी मार दिये गये, तब कौन संदेहरहित होकर आगामी सूर्योदयतक जीवित रहनेका दृढ़ विश्वास कर सकता है? ॥ १८ ॥

न नूनमस्त्राणि बलं पराक्रमः क्रियाः सुनीतं परमायुधानि वा । अलं मनुष्यस्य सुखाय वर्तितुं तथा हि युद्धे निहतः परैर्गुरुः ॥ १९ ॥ ‘निश्चय ही अस्त्र, बल, पराक्रम, क्रिया, अच्छी नीति अथवा उत्तम आयुध आदि किसी मनुष्यको सुख पहुँचानेके लिये पर्याप्त नहीं हैं; क्योंकि इन सब साधनोंके होते हुए भी आचार्यको शत्रुओंने युद्धमें मार डाला है ॥ १९ ॥

हुताशनादित्यसमानतेजसं पराक्रमे विष्णुपुरन्दरोपमम् । नये बृहस्पत्युशनोः सदा समं न चैनमस्त्रं तदुपास्त दुःसहम् ॥ २० ॥ ‘अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, विष्णु और इन्द्रके समान पराक्रमी तथा सदा बृहस्पति और शुक्राचार्यके समान नीतिमान् इन गुरुदेवको बचानेके लिये इनके दुःसह अस्त्र आदि पास न आ सके अर्थात् उनकी रक्षा नहीं कर सके ॥ २० ॥

सम्प्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे पराभूते पौरुषे धार्तराष्ट्रे । मया कृत्यमिति जानामि शल्य प्रयाहि तस्माद् द्विषतामनीकम् ॥ २१ ॥ ‘शल्य! (द्रोणाचार्यके मारे जानेपर) जब सब ओर त्राहि-त्राहिकी पुकार हो रही है, स्त्रियाँ और बच्चे बिलख-बिलखकर रो रहे हैं तथा दुर्योधनका पुरुषार्थ दब गया है, ऐसे समयमें दुर्योधनको मेरी सहायताकी विशेष आवश्यकता है। मैं अपने इस कर्तव्यको अच्छी तरह समझता हूँ। इसलिये तुम शत्रुओंकी सेनाकी ओर चलो ॥ २१ ॥

यत्र राजा पाण्डवः सत्यसंधो व्यवस्थितो भीमसेनार्जुनौ च । वासुदेवः सात्यकिः सृञ्जयाश्च यमौ च कस्तान् विषहेन्मदन्यः ॥ २२ ॥

‘जहाँ सत्यप्रतिज्ञ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े हैं, जहाँ भीमसेन, अर्जुन, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण, सात्यकि, सृंजय वीर तथा नकुल और सहदेव डटे हुए हैं, वहाँ मेरे सिवा दूसरा कौन उन वीरोंका वेग सह सकता है? ।। २२ ।। तस्मात् क्षिप्रं मद्रपते प्रयाहि रणे पञ्चालान् पाण्डवान् सृञ्जयांश्च । तान् वा हनिष्यामि समेत्य संख्ये यास्यामि वा द्रोणपथा यमाय ।। २३ ।। ‘इसलिये मद्रराज! तुम शीघ्र ही रणभूमिमें पांचाल, पाण्डव तथा सृंजय वीरोंकी ओर रथ ले चलो। आज युद्धस्थलमें उन सबके साथ भिड़कर या तो उन्हें ही मार डालूँगा या स्वयं ही द्रोणाचार्यके मार्गसे यमलोक चला जाऊँगा ।। २३ ।। न त्वेवाहं न गमिष्यामि मध्ये तेषां शूराणामिति मां शल्य विद्धि । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि द्रोणम् ।। २४ ।। ‘शल्य! मैं उन शूरवीरोंके बीचमें नहीं जाऊँगा, ऐसा मुझे न समझो; क्योंकि संग्रामसे पीछे हटनेपर मित्रद्रोह होगा और यह मित्रद्रोह मेरे लिये असह्य है। इसलिये मैं प्राणोंका परित्याग करके द्रोणाचार्यका ही अनुसरण करूँगा ।। २४ ।। प्राज्ञस्य मूढस्य च जीवितान्ते नास्ति प्रमोक्षोऽन्तकसत्कृतस्य । अतो विद्वन्नभियास्यामि पार्थान् दिष्टं न शक्यं व्यतिवर्तितुं वै ।। २५ ।। ‘विद्वान् हो या मूर्ख, आयुकी समाप्ति होनेपर सभीका यमराजके द्वारा यथायोग्य सत्कार होता है। उससे किसीको छुटकारा नहीं मिलता। अतः विद्वन्! मैं कुन्तीके पुत्रोंपर अवश्य चढ़ाई करूँगा। निश्चय ही दैवके विधानको कोई पलट नहीं सकता ।। २५ ।। कल्याणवृत्तः सततं हि राजा वैचित्रवीर्यस्य सुतो ममासीत् । तस्यार्थसिद्ध्यर्थमहं त्यजामि प्रियान् भोगान् दुस्त्यजं जीवितं च ।। २६ ।। ‘धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सदा ही मेरे कल्याण-साधनमें तत्पर रहा है; अतः आज उसके मनोरथकी सिद्धिके लिये मैं अपने प्रिय भोगोंको और जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, उस जीवनको भी त्याग दूँगा ।। २६ ।। वैयाघ्रचर्माणमकूजनाक्षं हैमत्रिकोषं रजतत्रिवेणुम् ।

रथप्रबर्हं तुरगप्रबर्है- र्युक्तं प्रादान्मह्यमिमं हि रामः ॥ २७ ॥ ‘गुरुवर परशुरामजीने मुझे यह व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और उत्तम अश्वोंसे जुता हुआ श्रेष्ठ रथ प्रदान किया है। इसमें तीन सुवर्णमय कोष और रजतमय त्रिवेणु सुशोभित हैं। इसके धुरों और पहियोंसे कोई आवाज नहीं निकलती है ॥ २७ ॥ धनूंषि चित्राणि निरीक्ष्य शल्य ध्वजान् गदाः सायकांश्चोग्ररूपान् । असिं च दीप्तं परमायुधं च शङ्खं च शुभ्रं स्वनवन्तमुग्रम् ॥ २८ ॥ ‘शल्य! तत्पश्चात् उन्होंने भलीभाँति इस रथका निरीक्षण करके बहुत-से विचित्र धनुष, भयंकर बाण, ध्वज, गदा, खड्ग, चमचमाते हुए उत्तम आयुध तथा गम्भीर ध्वनिसे युक्त भयंकर श्वेत शंख भी दिये थे ॥ २८ ॥ पताकिनं वज्रनिपातनिःस्वनं सिताश्वयुक्तं शुभतूणशोभितम् । इमं समास्थाय रथं रथर्षभं रणे हनिष्याम्यहमर्जुनं बलात् ॥ २९ ॥ ‘यह रथ सब रथोंसे उत्तम है। इसमें पताकाएँ फहरा रही हैं, सफेद घोड़े जुते हुए हैं और सुन्दर तरकस इसकी शोभा बढ़ाते हैं। चलते समय इस रथकी धमकसे वज्रपातके समान शब्द होता है। मैं इस रथपर बैठकर रणभूमिमें अर्जुनको बलपूर्वक मार डालूँगा ॥ २९ ॥ तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षेत् सदाप्रमत्तः समरे पाण्डुपुत्रम् । तं वा हनिष्यामि रणे समेत्य यास्यामि वा भीष्ममुखो यमाय ॥ ३० ॥ ‘यदि सबका संहार करनेवाली मृत्यु सदा सावधान रहकर समरांगणमें पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करे तो रणक्षेत्रमें उससे भी भिड़कर या तो मैं उसे ही मार डालूँगा या स्वयं ही भीष्मके सम्मुख यमलोकको चला जाऊँगा ॥ ३० ॥ यमवरुणकुबेरवासवा वा यदि युगपत्सगणा महाहवे । जुगुपिषव इहैत्य पाण्डवं किमु बहुना सह तैर्जयामि तम् ॥ ३१ ॥ ‘अधिक कहनेसे क्या लाभ? यदि इस महासमरमें अपने गणोंसहित यम, वरुण, कुबेर और इन्द्र भी एक साथ आकर यहाँ पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करना चाहें तो मैं उन सबके

साथ ही उन्हें जीत लूँगा' ।। ३१ ।।

संजय उवाच

इति रणरभसस्य कत्थत- स्तदुत निशम्य वचः स मद्रराट् । अवहसदवमन्य वीर्यवान् प्रतिषिषिधे च जगाद चोत्तरम् ।। ३२ ।।

**संजय कहते हैं—**राजन्! पराक्रमी मद्रराज शल्य युद्धके उत्साहमें भरकर बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाले कर्णके उस कथनको सुनकर उसकी अवहेलना करके उपहास करने लगे। उन्होंने फिर ऐसी बातें कहनेसे कर्णको रोका और इस प्रकार उत्तर दिया ।। ३२ ।।

शल्य उवाच

विरम विरम कर्ण कत्थना- दतिरभसोऽप्यतिवाचमुक्तवान् । क्व च हि नरवरो धनंजयः क्व पुनरहो पुरुषाधमो भवान् ।। ३३ ।।

**शल्यने कहा—**कर्ण! बस, अब बढ़-बढ़कर बातें बनाना बंद करो, बंद करो। तुम अधिक जोशमें आकर अपनी शक्तिसे बहुत बड़ी बात कह गये। भला, कहाँ नरश्रेष्ठ अर्जुन और कहाँ मनुष्योंमें अधम तुम? ।। ३३ ।।

यदुसदनमुपेन्द्रपालितं
त्रिदशमिवामरराजरक्षितम् ।
प्रसभमतिविलोद्य को हरेत्
पुरुषवरावरजामृतेऽर्जुनात् ॥ ३४ ॥
बताओ तो सही, अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो साक्षात् विष्णु भगवान्‌से सुरक्षित यदुवंशियोंकी पुरीको, जिसकी उपमा देवराज इन्द्रद्वारा पालित देवनगरी अमरावतीसे दी जाती है, बलपूर्वक मथकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी छोटी बहिन सुभद्राका अपहरण कर सके ॥

त्रिभुवनविभुमीश्वरेश्वरं
क इह पुमान् भवमाह्वयेद् युधि ।
मृगवधकलहे ऋतेऽर्जुनात्
सुरपतिवीर्यसमप्रभावतः ॥ ३५ ॥
देवराज इन्द्रके समान बल और प्रभाव रखनेवाले अर्जुनको छोड़कर इस संसारमें दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है, जो एक वन्य पशुको मारनेके विषयमें उठे हुए विवादके

अवसरपर ईश्वरोंके भी ईश्वर त्रिलोकीनाथ भगवान् शंकरको भी युद्धके लिये ललकार सके ।। ३५ ।।

असुरसुरमहोरगान् नरान् गरुडपिशाचयक्षराक्षसान् । इषुभिरजयदग्निगौरवात् स्वभिलषितं च हविर्ददौ जयः ।। ३६ ।।

अर्जुनने अग्निदेवका गौरव मानकर गरुड़, पिशाच, यक्ष, राक्षस, देवता, असुर, बड़े-बड़े नाग तथा मनुष्योंको भी बाणोंद्वारा परास्त कर दिया और अग्निको अभीष्ट हविष्य प्रदान किया था ।। ३६ ।।

स्मरसि ननु यदा परैर्हृतः स च धृतराष्ट्रसुतोऽपि मोक्षितः । दिनकरसदृशैः शरोत्तमैर्युधा कुरुषु बहून् विनिहत्य तानरीन् ।। ३७ ।।

कर्ण! याद है वह घटना, जब कि कुरुजांगल-प्रदेशमें घोषयात्राके समय गन्धर्वोंने शत्रु बनकर दुर्योधनका अपहरण कर लिया था, उस समय इन्हीं अर्जुनने सूर्यकिरणोंके समान तेजस्वी उत्तमोत्तम बाणोंद्वारा उन बहुसंख्यक शत्रुओंको मारकर धृतराष्ट्रपुत्रको बन्धनसे मुक्त किया था ।। ३७ ।।

प्रथममपि पलायिते त्वयि प्रियकलहा धृतराष्ट्रसूनवः । स्मरसि ननु यदा प्रमोचिताः खचरगणानवजित्य पाण्डवैः ।। ३८ ।।

उस युद्धमें तुम सबसे पहले भाग गये थे। उस समय पाण्डवोंने गन्धर्वोंको पराजित करके कलहप्रिय धृतराष्ट्रपुत्रोंको कैदसे छुड़ाया था। क्या ये सब बातें तुम्हें याद हैं? ।। ३८ ।।

समुदितबलवाहनाः पुनः पुरुषवरेण जिताः स्थ गोग्रहे । सगुरुगुरुसुताः सभीष्मकाः किमु न जितः स तदा त्वयार्जुनः ।। ३९ ।।

विराटनगरमें गोहरणके समय पुरुषश्रेष्ठ अर्जुनने विशाल बल-वाहनसे सम्पन्न तुम सब लोगोंको द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और भीष्मके सहित परास्त कर दिया था। उस समय तुमने अर्जुनको क्यों नहीं जीत लिया? ।। ३९ ।।

इदमपरमुपस्थितं पुन- स्तव निधनाय सुयुद्धमद्य वै ।

यदि न रिपुभयात् पलायसे समरगतोऽद्य हतोऽसि सूतज ॥ ४० ॥ सूतपुत्र! अब आज तुम्हारे वधके लिये पुनः यह दूसरा उत्तम युद्ध उपस्थित हुआ है। यदि तुम शत्रुके भयसे भाग नहीं गये तो समरांगणमें पहुँचकर अवश्य मारे जाओगे ॥ ४० ॥

संजय उवाच

इति बहु परुषं प्रभाषति प्रमनसि मद्रपतौ रिपुस्तवम् । भृशमभिरुषितः परंतपः कुरुपृतनापतिराह मद्रपम् ॥ ४१ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! जब महामना मद्रराज शल्य इस प्रकार शत्रु की प्रशंसासे सम्बन्ध रखनेवाली बहुत-सी कड़वी बातें सुनाने लगे, तब कौरव-सेनापति शत्रुसंतापी कर्ण अत्यन्त क्रोधसे जल उठा और शल्यसे बोला ॥ ४१ ॥

कर्ण उवाच

भवतु भवतु किं विकत्थसे ननु मम तस्य हि युद्धमुद्यतम् । यदि स जयति मामिहाहवे तत इदमस्तु सुकत्थितं तव ॥ ४२ ॥ **कर्णने कहा—**रहने दो, रहने दो। क्यों बहुत बड़बड़ा रहे हो। अब तो मेरा और उनका युद्ध उपस्थित हो ही गया है। यदि अर्जुन यहाँ युद्धमें मुझे परास्त कर दें, तब तुम्हारा यह बढ़-बढ़कर बातें करना ठीक और अच्छा समझा जायगा ॥ ४२ ॥

संजय उवाच

एवमस्त्विति मद्रेश उक्त्वा नोत्तरमुक्तवान् । याहि शल्येति चाप्येनं कर्णः प्राह युयुत्सया ॥ ४३ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! तब मद्रराज शल्य 'एवमस्तु' कहकर चुप हो गये। उन्होंने कर्णकी उस बातका कोई उत्तर नहीं दिया। तब कर्णने युद्धकी इच्छासे उनसे कहा—'शल्य! रथ आगे ले चलो' ॥ ४३ ॥

स रथः प्रययौ शत्रून् श्वेताश्वः शल्यसारथिः । निघ्नन्नमित्रान् समरे तमो घ्नन् सविता यथा ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् शल्य जिसके सारथि थे और जिसमें श्वेत घोड़े जुते हुए थे, वह विशाल रथ अन्धकारका विनाश करनेवाले सूर्यदेवके समान शत्रुओंका संहार करता हुआ आगे

बढ़ा ।। ४४ ।। ततः प्रायात् प्रीतिमान् वै रथेन वैयाघ्रेण श्वेतयुजाथ कर्णः । स चालोक्य ध्वजिनीं पाण्डवानां धनंजयं त्वरया पर्यपृच्छत् ।। ४५ ।।

तदनन्तर व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और श्वेत अश्वोंसे युक्त उस रथके द्वारा कर्ण बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रस्थित हुआ। उसने सामने ही पाण्डवोंकी सेनाको खड़ी देख बड़ी उतावलीके साथ धनंजयका पता पूछा ।। ४५ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे सप्तत्रिंशोऽध्याय ।। ३७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३७ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1863)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टात्रिंशोऽध्यायः

कर्णके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनका पता बतानेवालेको नाना प्रकारकी भोगसामग्री और इच्छानुसार धन देनेकी घोषणा

संजय उवाच

प्रयाणे च ततः कर्णो हर्षयन् वाहिनीं तव ।
एकैकं समरे दृष्ट्वा पाण्डवान् पर्यमृच्छत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! प्रस्थानकालमें आपकी सेनाका हर्ष बढ़ाता हुआ कर्ण समरांगणमें पाण्डव-सैनिकोंको देखकर प्रत्येकसे पूछने और कहने लगा— ॥ १ ॥

यो मामद्य महात्मानं दर्शयेच्छ्वेतवाहनम् ।
तस्मै दद्यामभिप्रेतं धनं यन्मनसेच्छति ॥ २ ॥
‘जो आज मुझे महात्मा श्वेतवाहन अर्जुनको दिखा देगा, उसे मैं उसका अभीष्ट धन, जिसे वह मनसे लेना चाहे, दे दूँगा ॥ २ ॥

न चेत् तदभिमन्येत तस्मै दद्यामहं पुनः ।
शकटं रत्नसम्पूर्णं यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् ॥ ३ ॥
‘यदि उतने धनसे वह संतुष्ट न होगा तो मैं उसे और धन दूँगा। जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं रत्नोंसे भरा हुआ छकड़ा दूँगा ॥ ३ ॥

न चेत्तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।
शतं दद्यां गवां तस्मै नैत्यिकं कांस्यदोहनम् ॥ ४ ॥
‘यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उस धनको पर्याप्त न माने तो मैं उसे प्रतिदिन दूध देनेवाली सौ गौएँ और कांसका दुग्धपात्र प्रदान करूँगा ॥ ४ ॥

शतं ग्रामवरांश्चैव दद्यामर्जुनदर्शिने ।
तथा तस्मै पुनर्दद्यां श्वेतमश्वतरीरथम् ॥ ५ ॥
युक्तमञ्जनकेशीभिर्यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् ।
‘इतना ही नहीं, मैं अर्जुनको दिखा देनेवाले व्यक्तिके लिये सौ बड़े-बड़े गाँव दूँगा तथा जो अर्जुनका पता बता देगा उसे खच्चरियोंसे जुता हुआ एक श्वेत रथ भी भेंट करूँगा; जिसमें काले केशवाली युवतियाँ बैठी होंगी ॥ ५ ½ ॥

न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ॥ ६ ॥
अन्यं वास्मै पुनर्दद्यां सौवर्णं हस्तिषड्गवम् ।
तथाप्यस्मै पुनर्दद्यां स्त्रीणां शतमलंकृतम् ॥ ७ ॥

श्यामानां निष्ककण्ठीनां गीतवाद्यविपश्चिताम् । 'यदि अर्जुनका पता बतानेवाला पुरुष उस धनको पूरा न समझे तो उसे दूसरा सोनेका बना हुआ रथ प्रदान करूँगा जिसमें हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट छः बैल जुते होंगे। साथ ही उसे वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सौ ऐसी स्त्रियाँ दूँगा, जो श्यामा (सोलह वर्षकी अवस्थावाली), सुवर्णमय कण्ठहारसे अलंकृत तथा गाने-बजानेकी कलामें विदुषी होंगी ।। ६-७ १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। ८ ।। तस्मै दद्यां शतं नागान् शतं ग्रामान् शतं रथान् । सुवर्णस्य च मुख्यस्य हयाग्र्येणां शतं शतान् ।। ९ ।। ऋद्ध्या गुणैः सुदान्तांश्च धुर्यवाहान् सुशिक्षितान् । 'अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष यदि उसे भी पूरा न समझे तो मैं उसे सौ हाथी, सौ गाँव, पक्के सोनेके बने हुए सौ रथ तथा दस हजार अच्छे घोड़े भी दूँगा। वे घोड़े हृष्ट-पुष्ट, गुणवान्, विनीत, सुशिक्षित तथा रथका भार वहन करनेमें समर्थ होंगे ।। ८-९ १/२ ।। तथा सुवर्णशृङ्गीणां गोधेनूनां चतुःशतम् ।। १० ।। दद्यां तस्मै सवत्सानां यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । 'जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं चार सौ सवत्सा दुधारू गौएँ दूँगा, जिनके सींगोंमें सोने मढ़े होंगे ।। १० १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। ११ ।। अन्यदस्मै वरं दद्यां श्वेतान् पञ्चशतान् हयान् । हेमभाण्डपरिच्छन्नान् सुमृष्टमणिभूषणान् ।। १२ ।। 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उस धनको पूर्ण नहीं समझेगा तो उसे और भी उत्तम धन, श्वेत रंगके पाँच सौ घोड़े दूँगा, जो सोनेके साज-बाजसे सुसज्जित तथा विशुद्ध मणियोंके आभूषणोंसे विभूषित होंगे ।। ११-१२ ।। सुदान्तानपि चैवाहं दद्यामष्टादशापरान् । रथं च शुभ्रं सौवर्णं दद्यां तस्मै स्वलंकृतम् ।। १३ ।। युक्तं परमकाम्बोजैर्यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । 'इनके सिवा अठारह और भी घोड़े दूँगा, जो अच्छी तरह रथमें सधे हुए होंगे। जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा उसे मैं परम उज्ज्वल और अलंकारोंसे सजाया हुआ एक सुवर्णमय रथ दूँगा, जिसमें अच्छी नस्लके काबुली घोड़े जुते होंगे ।। १३ १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। १४ ।। अन्यदस्मै वरं दद्यां कुञ्जराणां शतानि षट् । काञ्चनैर्विविधैर्भाण्डैराच्छन्नान् हेममालिनः ।। १५ ।। उत्पन्नानपरान्तेषु विनीतान् हस्तिशिक्षकैः ।

'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पूरा न समझे तो उसे मैं और भी श्रेष्ठ धन दूँगा। नाना प्रकारके सुवर्णमय आभूषणोंसे सुशोभित तथा सोनेकी मालाओंसे अलंकृत छः सौ ऐसे हाथी प्रदान करूँगा जो भारतवर्षकी पश्चिमी सीमाके जंगलोंमें उत्पन्न हुए हैं और जिन्हें गजशिक्षकोंने अच्छी तरह सुशिक्षित कर लिया है।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिमान् ॥ १६ ॥ अन्यदस्मै वरं दद्यां वैश्यग्रामांश्चतुर्दश । सुस्फीतान् धनसंयुक्तान् प्रत्यासन्नवनोदकान् । अकुतोभयान् सुसम्पन्नान् राजभोज्यांश्चतुर्दश ॥ १७ ॥ 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पूरा न समझे तो मैं उसे दूसरा श्रेष्ठ धन प्रदान करूँगा। जिनमें वैश्य निवास करते हों ऐसे चौदह समृद्धिशाली और धनसम्पन्न ग्राम दूँगा जिनके आसपास जंगल और जलकी सुविधा होगी और जहाँ किसी प्रकारका भय नहीं होगा। वे चौदहों गाँव अधिक सम्पन्न तथा राजोचित भोगोंसे परिपूर्ण होंगे ।। १६-१७ ।। दासीनां निष्ककण्ठीनां मागधीनां शतं तथा । प्रत्यग्रवयसां दद्यां यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् ॥ १८ ॥ 'जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं सोनेके कण्ठहारोंसे विभूषित मगधदेशकी सौ नवयुवती दासियाँ दूँगा ।। १८ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिमान् । अन्यं तस्मै वरं दद्यां यमसौ कामयेत् स्वयम् ॥ १९ ॥ 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पर्याप्त न समझे तो मैं उसे दूसरा वर प्रदान करूँगा, जिसकी वह स्वयं इच्छा करे ।। १९ ।। पुत्रदारान् विहारांश्च यदन्यद् वित्तमस्ति मे । तच्च तस्मै पुनर्दद्यां यद् यच्च मनसेच्छति ॥ २० ॥ 'स्त्री, पुत्र, विहारस्थान तथा दूसरा भी जो कुछ धन-वैभव मेरे पास है, उसमेंसे जिस-जिस वस्तुको वह अपने मनसे चाहेगा, वह सब कुछ मैं उसे दे डालूँगा ।। २० ।। हत्वा च सहितौ कृष्णौ तयोर्वित्तानि सर्वशः । तस्मै दद्यामहं यो मे प्रब्रूयात् केशवार्जुनौ ॥ २१ ॥ 'जो मुझे श्रीकृष्ण और अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं उन दोनोंको मारकर उनका सारा धन-वैभव दे दूँगा' ।। २१ ।। एता वाचः सुबहुशः कर्ण उच्चारयन् युधि । दध्मौ सागरसम्भूतं सुस्वरं शङ्खमुत्तमम् ॥ २२ ॥ इन सब बातोंको बारंबार कहते हुए कर्णने युद्धस्थलमें समुद्रसे उत्पन्न हुए अपने उत्तम शंखको उच्च स्वरसे बजाया ।। २२ ।।

ता वाचः सूतपुत्रस्य तथा युक्ता निशम्य तु । दुर्योधनो महाराज संहृष्टः सानुगोऽभवत् ॥ २३ ॥ महाराज! सूतपुत्रकी कही हुई उस अवसरके अनुरूप उन बातोंको सुनकर दुर्योधन अपने सेवकोंसहित बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ २३ ॥ ततो दुन्दुभिनिर्घोषो मृदङ्गानां च सर्वशः । सिंहनादः सवादित्रः कुञ्जराणां च निःस्वनः ॥ २४ ॥ फिर तो सब ओर दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी, मृदंग बजने लगे, वाद्योंकी ध्वनिके साथ-साथ वीरोंका सिंहनाद तथा हाथियोंके चिग्घाड़नेका शब्द वहाँ गूँज उठा ॥ २४ ॥ प्रादुरासीत् तदा राजन् सैन्येषु पुरुषर्षभ । योधानां सम्प्रहृष्टानां तथा समभवत् स्वनः ॥ २५ ॥ पुरुषप्रवर नरेश! उस समय सभी सेनाओंमें हर्ष और उत्साहसे भरे हुए योद्धाओंका गम्भीर गर्जन होने लगा ॥ २५ ॥ तथा प्रहृष्टे सैन्ये तु प्लवमानं महारथम् । विकत्थमानं च तदा राधेयमरिकर्षणम् । मद्रराजः प्रहस्येदं वचनं प्रत्यभाषत ॥ २६ ॥ इस प्रकार हर्षसे उल्लसित हुई सेनामें जाते और बढ़-बढ़कर बातें बनाते हुए शत्रुसूदन राधापुत्र महारथी कर्णसे मद्रराज शल्यने हँसकर इस प्रकार कहा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णावलेपे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका अभिमानविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1867)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

शल्यका कर्णके प्रति अत्यन्त आक्षेपपूर्ण वचन कहना

शल्य उवाच

मा सूतपुत्र दानेन सौवर्णं हस्तिषड्गवम् ।
प्रयच्छ पुरुषायाद्य द्रक्ष्यसि त्वं धनंजयम् ॥ १ ॥
शल्य बोले— सूतपुत्र! तुम किसी पुरुषको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट छः बैलोंसे जुता हुआ सोनेका रथ न दो। आज अवश्य ही अर्जुनको देखोगे ॥ १ ॥

बाल्यादिह त्वं त्यजसि वसु वैश्रवणो यथा ।
अयत्नेनैव राधेय द्रष्टास्यद्य धनंजयम् ॥ २ ॥
राधापुत्र! तुम मूर्खतासे ही यहाँ कुबेरके समान धन लुटा रहे हो, आज अर्जुनको तो तुम बिना यत्न किये ही देख लोगे ॥ २ ॥

परान् सृजसि यद् वित्तं किंचित्त्वं बहु मूढवत् ।
अपात्रदाने ये दोषास्तान् मोहान्नावबुध्यसे ॥ ३ ॥
मूढ़ पुरुषोंके समान तुम अपना बहुत कुछ धन जो दूसरोंको दे रहे हो, इससे जान पड़ता है कि अपात्रको धनका दान देनेसे जो दोष पैदा होते हैं, उन्हें मोहवश तुम नहीं समझ रहे हो ॥ ३ ॥

यत् त्वं प्रेरयसे वित्तं बहु तेन खलु त्वया ।
शक्यं बहुविधैर्यज्ञैर्यष्टुं सूत यजस्व तैः ॥ ४ ॥
सूत! तुम जो बहुत धन देनेकी यहाँ घोषणा कर रहे हो, निश्चय ही उसके द्वारा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कर सकते हो; अतः तुम उन धन-वैभवोंद्वारा यज्ञोंका ही अनुष्ठान करो ॥ ४ ॥

यच्च प्रार्थयसे हन्तुं कृष्णौ मोहाद् वृथैव तत् ।
न हि शुश्रुम सम्मर्दे क्रोष्ट्रा सिंहौ निपातितौ ॥ ५ ॥
और जो तुम मोहवश श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको मारना चाहते हो, वह मनसूबा तो व्यर्थ ही है; क्योंकि हमने यह बात कभी नहीं सुनी है कि किसी गीदड़ने युद्धमें दो सिंहोंको मार गिराया हो ॥ ५ ॥

अप्रार्थितं प्रार्थयसे सुहृदो न हि सन्ति ते ।
ये त्वां न वारयन्त्याशु प्रपतन्तं हुताशने ॥ ६ ॥
तुम ऐसी चीज चाहते हो, जिसकी अबतक किसीने इच्छा नहीं की थी। जान पड़ता है तुम्हारे कोई सुहृद् नहीं हैं, जो शीघ्र ही आकर तुम्हें चलती आगमें गिरनेसे रोक नहीं रहे हैं ॥ ६ ॥

कार्याकार्यं न जानीषे कालपक्वोऽस्यसंशयम् । बह्वबद्धमकणीयं को हि ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥ ७ ॥ तुम्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं है। निःसंदेह तुम्हें कालने पका दिया है। (अतः तुम पके हुए फलके समान गिरनेवाले ही हो); अन्यथा जो जीवित रहना चाहता है, ऐसा कौन पुरुष ऐसी बहुत-सी न सुननेयोग्य ऊटपटांग बातें कह सकता है? ॥ ७ ॥ समुद्रतरणं दोर्भ्यां कण्ठे बद्ध्वा यथा शिलाम् । गिर्यग्राद् वा निपतनं तादृक् तव चिकीर्षितम् ॥ ८ ॥ जैसे कोई गलेमें पत्थर बाँधकर दोनों हाथोंसे समुद्र पार करना चाहे अथवा पहाड़ की चोटीसे पृथ्वीपर कूदनेकी इच्छा करे, ऐसी ही तुम्हारी सारी चेष्टा और अभिलाषा है ॥ ८ ॥ सहितः सर्वयोधैस्त्वं व्यूढानीकैः सुरक्षितः । धनंजयेन युध्यस्व श्रेयश्चेत् प्राप्तुमिच्छसि ॥ ९ ॥ यदि तुम कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो व्यूहरचनापूर्वक खड़े हुए समस्त सैनिकोंके साथ सुरक्षित रहकर अर्जुनसे युद्ध करो ॥ ९ ॥ हितार्थं धार्तराष्ट्रस्य ब्रवीमि त्वां न हिंसया । श्रद्धत्स्वैवं मया प्रोक्तं यदि तेऽस्ति जिजीविषा ॥ १० ॥ दुर्योधनके हितके लिये ही मैं ऐसा कह रहा हूँ, हिंसाभावसे नहीं। यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो मेरे इस कथनपर विश्वास करो ॥ १० ॥

कर्ण उवाच

स्वबाहुवीर्यमाश्रित्य प्रार्थयाम्यर्जुनं रणे । त्वं तु मित्रमुखः शत्रुर्मां भीषयितुमिच्छसि ॥ ११ ॥ **कर्ण बोला—**शल्य! मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके रणक्षेत्रमें अर्जुनको पाना चाहता हूँ; परंतु तुम तो मुँहसे मित्र बने हुए वास्तवमें शत्रु हो, जो मुझे यहाँ डराना चाहते हो ॥ ११ ॥ न मामस्मादभिप्रायात् कश्चिदद्य निवर्तयेत् । अपीन्द्रो वज्रमुद्यम्य किमु मर्त्यः कथंचन ॥ १२ ॥ परंतु मुझे इस अभिप्रायसे आज कोई भी पीछे नहीं लौटा सकता। वज्र उठाये हुए इन्द्र भी मुझे किसी तरह इस निश्चयसे डिगा नहीं सकते, फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है? ॥ १२ ॥

संजय उवाच

इति कर्णस्य वाक्यान्ते शल्यः प्राहोत्तरं वचः । चुकोपयिषुरत्यर्थं कर्णं मद्रेश्वरः पुनः ॥ १३ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! कर्णकी यह बात समाप्त होते ही मद्रराज शल्य उसे अत्यन्त कुपित करनेकी इच्छासे पुनः इस प्रकार उत्तर देने लगे— ॥ १३ ॥

यदा वै त्वां फाल्गुनवेगयुक्ता ज्याचोदिता हस्तवता विसृष्टाः । अन्वेतारः कङ्कपत्राः सिताग्रा- स्तदा तप्स्यस्यर्जुनस्यानुयोगात् ॥ १४ ॥ ‘कर्ण! अर्जुनके वेगसे युक्त हो उनकी प्रत्यंचासे प्रेरित और सुशिक्षित हाथोंसे छोड़े हुए तीखी धारवाले कंकपत्रविभूषित बाण जब तुम्हारे शरीरमें घुसने लगेंगे, तब जो तुम अर्जुनको पूछते फिरते हो, इसके लिये पश्चात्ताप करोगे ॥ १४ ॥

यदा दिव्यं धनुरदाय पार्थः प्रतापयन् पृतनां सव्यसाची । त्वां मर्दयिष्यन्निशितैः पृषत्कै- स्तदा पश्चात् तप्स्यसे सूतपुत्र ॥ १५ ॥ ‘सूतपुत्र! जब सव्यसाची कुन्तीकुमार अर्जुन अपने हाथमें दिव्य धनुष लेकर शत्रुसेनाको तपाते हुए पैने बाणोंद्वारा तुम्हें रौंदने लगेंगे, तब तुम्हें अपने कियेपर पछतावा होगा ॥

बालश्चन्द्रं मातुरङ्के शयानो यथा कश्चित् प्रार्थयतेऽपहर्तुम् । तद्वन्मोहाद् द्योतमानं रथस्थं सम्प्राथर्यस्यर्जुनं जेतुमद्य ॥ १६ ॥ ‘जैसे अपनी माँकी गोदमें सोया हुआ कोई बालक चन्द्रमाको पकड़ लाना चाहता हो, उसी प्रकार तुम भी रथपर बैठे हुए तेजस्वी अर्जुनको आज मोहवश परास्त करना चाहते हो ॥ १६ ॥

त्रिशूलमाश्रित्य सुतीक्ष्णधारं सर्वाणि गात्राणि विघर्षसि त्वम् । सुतीक्ष्णधारोपमकर्मणा त्वं युयुत्ससे योऽर्जुनेनाद्य कर्ण ॥ १७ ॥ ‘कर्ण! अर्जुनका पराक्रम अत्यन्त तीखी धारवाले त्रिशूलके समान है। उन्हीं अर्जुनके साथ आज जो तुम युद्ध करना चाहते हो, वह दूसरे शब्दोंमें यों है कि तुम पैनी धारवाले त्रिशूलको लेकर उसीसे अपने सारे अंगोंको रगड़ना या खुजलाना चाहते हो ॥ १७ ॥

क्रुद्धं सिंहं केसरिणं बृहन्तं बालो मूढः क्षुद्रमृगस्तरस्वी । समाह्वयेत् तद्वदेतत् तवाद्य

समाह्वानं सूतपुत्रार्जुनस्य ॥ १८ ॥ ‘सूतपुत्र! जैसे बालक, मूढ़ और वेगसे चौकड़ी भरनेवाला क्षुद्र मृग क्रोधमें भरे हुए विशालकाय, केसरयुक्त सिंहको ललकारे, तुम्हारा आज यह अर्जुनका युद्धके लिये आह्वान करना भी वैसा ही है ॥ १८ ॥

मा सूतपुत्राह्वय राजपुत्रं महावीर्यं केसरिणं यथैव । वने शृगालः पिशितेन तृप्तो मा पार्थमासाद्य विनङ्क्ष्यसि त्वम् ॥ १९ ॥ ‘सूतपुत्र! तुम महापराक्रमी राजकुमार अर्जुनका आह्वान न करो। जैसे वनमें मांस-भक्षणसे तृप्त हुआ गीदड़ महाबली सिंहके पास जाकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी अर्जुनसे भिड़कर विनाशके गर्तमें न गिरो ॥ १९ ॥

ईषादन्तं महानागं प्रभिन्नकरटामुखम् । शशको ह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २० ॥ ‘कर्ण! जैसे कोई खरगोश ईषादण्डके समान दाँतोंवाले महान् मदस्रावी गजराजको अपने साथ युद्धके लिये बुलाता हो, उसी प्रकार तुम भी कुन्तीपुत्र धनंजयका रणक्षेत्रमें आह्वान करते हो ॥ २० ॥

बिलस्थं कृष्णसर्पं त्वं बाल्यात् काष्ठेन विध्यसि । महाविषं पूर्णकोपं यत् पार्थं योद्धुमिच्छसि ॥ २१ ॥ ‘तुम यदि पूर्णतः क्रोधमें भरे हुए अर्जुनके साथ जूझना चाहते हो तो मूर्खतावश बिलमें बैठे हुए महाविषैले काले सर्पको किसी काठकी छड़ीसे बींध रहे हो ॥ २१ ॥

सिंहं केसरिणं क्रुद्धमतिक्रम्याभिनर्दसे । शृगाल इव मूढस्त्वं नृसिंहं कर्ण पाण्डवम् ॥ २२ ॥ ‘कर्ण! तुम मूर्ख हो; जैसे गीदड़ क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहका अनादर करके गर्जना करे, उसी प्रकार तुम भी मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी और क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनका लंघन करके गरज रहे हो ॥ २२ ॥

सुपर्णं पतगश्रेष्ठं वैनतेयं तरस्विनम् । भोगीवाह्वयसे पाते कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २३ ॥ ‘कर्ण! जैसे कोई सर्प अपने पतनके लिये ही पक्षियोंमें श्रेष्ठ वेगशाली विनतानन्दन गरुडका आह्वान करता है, उसी प्रकार तुम भी अपने विनाशके लिये ही कुन्तीकुमार अर्जुनको ललकार रहे हो ॥ २३ ॥

सर्वाम्भसां निधिं भीमं मूर्तिमन्तं झषायुतम् । चन्द्रोदये विवर्धन्तमप्लवः संस्तितीर्षसि ॥ २४ ॥

'अरे! तुम चन्द्रोदयके समय बढ़ते हुए, जलजन्तुओंसे पूर्ण तथा उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त अगाध जलराशिवाले भयंकर समुद्रको बिना किसी नावके ही केवल दोनों हाथोंके सहारे पार करना चाहते हो ।। २४ ।।

ऋषभं दुन्दुभिग्रीवं तीक्ष्णशृङ्गं प्रहारिणम् ।
वत्स आह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनंजयम् ।। २५ ।।
'बेटा कर्ण! दुन्दुभिकी ध्वनिके समान जिसका कंठस्वर गम्भीर है, जिसके सींग तीखे हैं तथा जो प्रहार करनेमें कुशल है, उस साँड़के समान पराक्रमी पृथापुत्र अर्जुनको तुम युद्धके लिये ललकार रहे हो ।। २५ ।।

महामेघं महाघोरं दर्दुरः प्रतिनर्दसि ।
बाणतोयप्रदं लोके नरपर्जन्यमर्जुनम् ।। २६ ।।
'जैसे महाभयंकर महामेघके मुकाबलेमें कोई मेढक टर्र-टर्र कर रहा हो, उसी प्रकार तुम संसारमें बाणरूपी जलकी वर्षा करनेवाले मानवमेघ अर्जुनको लक्ष्य करके गर्जना करते हो ।। २६ ।।

यथा च स्वगृहस्थः श्वा व्याघ्रं वनगतं भषेत् ।
तथा त्वं भषसे कर्ण नरव्याघ्रं धनंजयम् ।। २७ ।।
'कर्ण! जैसे अपने घरमें बैठा हुआ कोई कुत्ता वनमें रहनेवाले बाघकी ओर भूँके, उसी प्रकार तुम भी नरव्याघ्र अर्जुनको लक्ष्य करके भूँक रहे हो ।। २७ ।।

शृगालोऽपि वने कर्ण शशैः परिवृतो वसन् ।
मन्यते सिंहमात्मानं यावत् सिंहं न पश्यति ।। २८ ।।
'कर्ण! वनमें खरगोशोंके साथ रहनेवाला गीदड़ भी जबतक सिंहको नहीं देखता, तबतक अपनेको सिंह ही मानता रहता है ।। २८ ।।

तथा त्वमपि राधेय सिंहमात्मानमिच्छसि ।
अपश्यन् शत्रुदमनं नरव्याघ्रं धनंजयम् ।। २९ ।।
'राधानन्दन! उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषसिंह अर्जुनको न देखनेके कारण ही अपनेको सिंह समझना चाहते हो ।। २९ ।।

व्याघ्रं त्वं मन्यसेऽऽत्मानं यावत् कृष्णौ न पश्यसि ।
समास्थितावेकरथे सूर्याचन्द्रमसाविव ।। ३० ।।
'एक रथपर बैठे हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान सुशोभित श्रीकृष्ण और अर्जुनको जबतक तुम नहीं देख रहे हो, तभीतक अपनेको बाघ माने बैठे हो ।। ३० ।।

यावद् गाण्डीवघोषं त्वं न शृणोषि महाहवे ।
तावदेव त्वया कर्ण शक्यं वक्तुं यथेच्छसि ।। ३१ ।।
'कर्ण! महासमरमें जबतक गाण्डीवकी टंकार नहीं सुनते हो, तभीतक तुम जैसा चाहो, बक सकते हो ।। ३१ ।।