महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महाभाग! उस समय उस श्रेष्ठ बाणके छूटते ही भूतलपर गिरते हुए उन तीनों पुरोंका महान् आर्तनाद प्रकट हुआ। भगवान्ने उन असुरोंको भस्म करके पश्चिम समुद्रमें डाल दिया ॥ ११३-११४ ॥
एवं तु त्रिपुरं दग्धं दानवाश्चाप्यशेषतः ।
महेश्वरेण क्रुद्धेन त्रैलोक्यस्य हितैषिणा ॥ ११५ ॥
इस प्रकार तीनों लोकोंका हित चाहनेवाले महेश्वरने कुपित होकर उन तीनों पुरों तथा उनमें निवास करनेवाले दानवोंको दग्ध कर दिया ॥ ११५ ॥
स चात्मक्रोधजो वह्निर्हाहेत्युक्त्वा निवारितः ।
मा कार्षीर्भस्मसाल्लोकानिति त्र्यक्षोऽब्रवीच्च तम् ॥ ११६ ॥
उनके अपने क्रोधसे जो अग्नि प्रकट हुई थी, उसे भगवान् त्रिलोचनने ‘हा-हा’ कहकर रोक दिया और उससे कहा—'तू सम्पूर्ण जगत्को भस्म न कर' ॥ ११६ ॥
ततः प्रकृतिमापन्ना देवा लोकास्त्वथर्षयः ।
तुष्टुवुर्वाग्भिरग्र्याभिः स्थाणुमप्रतिमौजसम् ॥ ११७ ॥
तब समस्त देवता, महर्षि तथा तीनों लोकोंके प्राणी स्वस्थ हो गये। सबने श्रेष्ठ वचनोंद्वारा अप्रतिम शक्तिशाली महादेवजीका स्तवन किया ॥ ११७ ॥
तेऽनुज्ञाता भगवता जग्मुः सर्वे यथागतम् ।
कृतकामाः प्रयत्नेन प्रजापतिमुखाः सुराः ॥ ११८ ॥
फिर भगवान्की आज्ञा लेकर अपने प्रयत्नसे पूर्णकाम हुए प्रजापति आदि सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये ॥ ११८ ॥
एवं स भगवान् देवो लोकस्रष्टा महेश्वरः ।
देवासुरगणाध्यक्षो लोकानां विदधे शिवम् ॥ ११९ ॥
इस प्रकार देवताओं तथा असुरोंके भी अध्यक्ष जगत्स्रष्टा भगवान् महेश्वर देवने तीनों लोकोंका कल्याण किया था ॥ ११९ ॥
यथैव भगवान् ब्रह्मा लोकधाता पितामहः ।
सारथ्यमकरोत्तत्र रुद्रस्य परमोऽव्ययः ॥ १२० ॥
तथा भवानपि क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः ।
संयच्छतु हयानस्य राधेयस्य महात्मनः ॥ १२१ ॥
वहाँ विश्वविधाता सर्वोत्कृष्ट अविनाशी पितामह भगवान् ब्रह्माने जिस प्रकार रुद्रका सारथि-कर्म किया था तथा जिस प्रकार उन पितामहने रुद्रदेवके घोड़ोंकी बागडोर सँभाली थी, उसी प्रकार आप भी शीघ्र ही इस महामनस्वी राधापुत्र कर्णके घोड़ोंको काबूमें कीजिये ॥ १२०-१२१ ॥
त्वं हि कृष्णाच्च कर्णाच्च फाल्गुनाच्च विशेषतः ।
विशिष्टो राजशार्दूल नास्ति तत्र विचारणा ॥ १२२ ॥
नृपश्रेष्ठ! आप श्रीकृष्णसे, कर्णसे और अर्जुनसे भी श्रेष्ठ हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। १२२ ।।
युद्धे ह्ययं रुद्रकल्पस्त्वं च ब्रह्मसमो नये ।
तस्माच्छक्तो भवाज्जेतुं मच्छत्रूंस्तानिवासुरान् ।। १२३ ।।
यह कर्ण युद्धक्षेत्रमें रुद्रके समान है और आप भी नीतिमें ब्रह्माजीके तुल्य हैं; अतः आप उन असुरोंकी भाँति मेरे शत्रुओंको जीतनेमें समर्थ हैं ।। १२३ ।।
यथा शल्याद्य कर्णोऽयं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् ।
प्रमथ्य हन्यात् कौन्तेयं तथा शीघ्रं विधीयताम् ।। १२४ ।।
शल्य! आप शीघ्र ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे यह कर्ण उस श्वेतवाहन अर्जुनको, जिसके सारथि श्रीकृष्ण हैं, मथकर मार डाले ।। १२४ ।।
त्वयि मद्रेश राज्याशा जीविताशा तथैव च ।
विजयश्च तथैवाद्य कर्णसाचिव्यकारितः ।। १२५ ।।
मद्रराज! आपपर ही मेरी राज्यप्राप्तिविषयक अभिलाषा और जीवनकी आशा निर्भर है। आपके द्वारा कर्णका सारथिकर्म सम्पादित होनेपर जो आज विजय मिलनेवाली है, उसकी सफलता भी आपपर ही निर्भर है ।। १२५ ।।
त्वयि कर्णश्च राज्यं च वयं चैव प्रतिष्ठिताः ।
विजयश्चैव संग्रामे संयच्छाद्य हयोत्तमान् ।। १२६ ।।
आपपर ही कर्ण, राज्य, हम और हमारी विजय प्रतिष्ठित हैं। इसलिये आज संग्राममें आप इन उत्तम घोड़ोंको अपने वशमें कीजिये ।। १२६ ।।
इमं चाप्यपरं भूय इतिहासं निबोध मे ।
पितुर्मम सकाशे यद् ब्राह्मणः प्राह धर्मवित् ।। १२७ ।।
राजन्! आप मुझसे फिर यह दूसरा इतिहास भी सुनिये, जिसे एक धर्मज्ञ ब्राह्मणने मेरे पिताके समीप कहा था ।। १२७ ।।
श्रुत्वा चैतद् वचश्चित्रं हेतुकार्यार्थसंहितम् ।
कुरु शल्य विनिश्चित्य माभूदत्र विचारणा ।। १२८ ।।
शल्य! कारण और कार्यसे युक्त इस विचित्र ऐतिहासिक वार्ताको सुनकर आप अच्छी तरह सोच-विचार लेनेके पश्चात् मेरा कार्य करें, इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ।। १२८ ।।
भार्गवाणां कुले जातो जमदग्निर्महायशाः ।
तस्य रामेति विख्यातः पुत्रस्तेजोगुणान्वितः ।। १२९ ।।
भृगुवंशमें महायशस्वी महर्षि जमदग्नि प्रकट हुए थे, जिनके तेजस्वी और गुणवान् पुत्र परशुरामके नामसे विख्यात हैं ।। १२९ ।।
स तीव्रं तप आस्थाय प्रसादयितवान् भवम् ।
अस्त्रहेतोः प्रसन्नात्मा नियतः संयतेन्द्रियः ॥ १३० ॥ उन्होंने अस्त्र-प्राप्तिके लिये मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए प्रसन्न हृदयसे भारी तपस्या करके भगवान् शंकरको प्रसन्न किया ॥ १३० ॥ तस्य तुष्टो महादेवो भक्त्या च प्रशमेन च । हृद्गतं चास्य विज्ञाय दर्शयामास शङ्करः ॥ १३१ ॥ (प्रत्यक्षेण महादेवः स्वां तनुं सर्वशङ्करः ।) उनकी भक्ति और मनःसंयमसे संतुष्ट हो सबका कल्याण करनेवाले महादेवजीने उनके मनोगत भावको जानकर उन्हें अपने दिव्य शरीरका प्रत्यक्ष दर्शन कराया ॥ १३१ ॥
महेश्वर उवाच
राम तुष्टोऽस्मि भद्रं ते विदितं मे तवेप्सितम् । कुरुष्व पूतमात्मानं सर्वमेतदवाप्स्यसि ॥ १३२ ॥ **महादेवजी बोले—**राम! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम क्या चाहते हो, यह मुझे विदित है। अपने हृदयको शुद्ध करो। तुम्हें यह सब कुछ प्राप्त हो जायगा ॥ १३२ ॥ दास्यामि ते तदास्त्राणि यदा पूतो भविष्यसि । अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि भार्गव ॥ १३३ ॥ जब तुम पवित्र हो जाओगे, तब तुम्हें अपने अस्त्र दूँगा, भृगुनन्दन! अपात्र और असमर्थ पुरुषको तो ये अस्त्र जलाकर भस्म कर डालते हैं ॥ १३३ ॥ इत्युक्तो जामदग्न्यस्तु देवदेवेन शूलिना । प्रत्युवाच महात्मानं शिरसावनतः प्रभुम् ॥ १३४ ॥ त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवजीके ऐसा कहनेपर जमदग्निनन्दन परशुरामने उन महात्मा भगवान् शिवको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ १३४ ॥ यदा जानाति देवेशः पात्रं मामस्त्रधारणे । तदा शुश्रूषवेऽस्त्राणि भगवान् मे दातुमर्हति ॥ १३५ ॥ ‘यदि आप देवेश्वर प्रभु मुझे अस्त्रधारणाका पात्र समझें तभी मुझ सेवकको दिव्यास्त्र प्रदान करें’ ॥ १३५ ॥
दुर्योधन उवाच
ततः स तपसा चैव दमेन नियमेन च । पूजोपहारबलिभिर्होममन्त्रपुरस्कृतैः ॥ १३६ ॥ आराधयितवान् शर्वं बहून् वर्षगणांस्तदा ।
दुर्योधन कहता हैं—तदनन्तर परशुरामने बहुत वर्षोंतक तपस्या, इन्द्रिय-संयम, मनोनिग्रह, पूजा, उपहार, भेंट, अर्पण, होम और मन्त्र-जप आदि साधनोंद्वारा भगवान् शिवकी आराधना की ।। १३६ ½ ।।
प्रसन्नश्च महादेवो भार्गवस्य महात्मनः ॥ १३७ ॥
अब्रवीत् तस्य बहुशो गुणान् देव्याः समीपतः ।
भक्तिमानेष सततं मयि रामो दृढव्रतः ॥ १३८ ॥
इससे महादेवजी महात्मा परशुरामपर प्रसन्न हो गये और उन्होंने पार्वती देवीके समीप उनके गुणोंका बारंबार वर्णन किया—'ये दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले परशुराम मेरे प्रति सदा भक्तिभाव रखते हैं' ।। १३७-१३८ ।।
एवं तस्य गुणान् प्रीतो बहुशोऽकथयत् प्रभुः ।
देवतानां पितॄणां च समक्षमरिसूदन ॥ १३९ ॥
शत्रुसूदन! इसी प्रकार प्रसन्न हुए भगवान् शिवने देवताओं और पितरोंके समक्ष भी बारंबार प्रसन्नतापूर्वक उनके गुणोंका वर्णन किया ।। १३९ ।।
एतस्मिन्नेव काले तु दैत्या ह्यासन् महाबलाः ।
तैस्तदा दर्पमोहाद्यैरबाध्यन्त दिवौकसः ॥ १४० ॥
इन्हीं दिनोंकी बात है, दैत्यलोग महान् बलसे सम्पन्न हो गये थे। वे दर्प और मोह आदिके वशीभूत हो उस समय देवताओंको सताने लगे ।। १४० ।।
ततः सम्भूय विबुधास्तान् हन्तुं कृतनिश्चयाः ।
चक्रुः शत्रुवधे यत्नं न शेकुर्जेतुमेव तान् ॥ १४१ ॥
तब सम्पूर्ण देवताओंने एकत्र हो उन्हें मारनेका निश्चय करके शत्रुओंके वधके लिये यत्न किया; परंतु वे उन्हें जीत न सके ।। १४१ ।।
अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमुमापतिम् ।
प्रासादयंस्तदा भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ॥ १४२ ॥
तत्पश्चात् देवताओंने उमावल्लभ महेश्वरके समीप जाकर भक्तिपूर्वक उन्हें प्रसन्न किया और कहा—'प्रभो! हमारे शत्रुओंका संहार कीजिये' ।। १४२ ।।
प्रतिज्ञाय ततो देवो देवतानां रिपुक्षयम् ।
रामं भार्गवमाहूय सोऽभ्यभाषत शङ्करः ॥ १४३ ॥
तब कल्याणकारी महादेवजीने देवताओंके समक्ष उनके शत्रुओंका संहार करनेकी प्रतिज्ञा करके भृगुनन्दन परशुरामको बुलाकर इस प्रकार कहा— ।। १४३ ।।
रिपून् भार्गव देवानां जहि सर्वान् समागतान् ।
लोकानां हितकामार्थं मत्प्रीत्यर्थं तथैव च ॥ १४४ ॥
'भार्गव! तुम तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे तथा मेरी प्रसन्नताके लिये देवताओंके समस्त समागत शत्रुओंका वध करो' ।। १४४ ।।
एवमुक्तः प्रत्युवाच त्र्यम्बकं वरदं प्रभुम् ।
उनके ऐसा कहनेपर परशुरामने वरदायक भगवान् त्रिलोचनको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ १४४ १/२ ॥
राम उवाच
का शक्तिर्मम देवेश अकृतास्त्रस्य संयुगे ॥ १४५ ॥
निहन्तुं दानवान् सर्वान् कृतास्त्रान् युद्धदुर्मदान् ।
**परशुराम बोले—**देवेश्वर! मैं तो अस्त्रविद्याका ज्ञाता नहीं हूँ। फिर युद्धस्थलमें अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा रणदुर्मद समस्त दानवोंका वध करनेके लिये मुझमें क्या शक्ति है? ॥ १४५ १/२ ॥
महेश्वर उवाच
गच्छ त्वं मदनुज्ञातो निहनिष्यसि शात्रवान् ॥ १४६ ॥
विजित्य च रिपून् सर्वान् गुणान् प्राप्स्यसि पुष्कलान् ।
**महेश्वरने कहा—**राम! तुम मेरी आज्ञासे जाओ। निश्चय ही देवशत्रुओंका संहार करोगे। उन समस्त वैरियोंपर विजय पाकर प्रचुर गुण प्राप्त कर लोगे ॥ १४६ १/२ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं प्रतिगृह्य च सर्वशः ॥ १४७ ॥
रामः कृतस्वस्त्ययनः प्रययौ दानवान् प्रति ।
अब्रवीद् देवशत्रूंस्तान् महादर्पबलान्वितान् ॥ १४८ ॥
उनकी यह बात सुनकर उसे सब प्रकारसे शिरोधार्य करके परशुराम स्वस्तिवाचन आदि मंगलकृत्य करनेके पश्चात् दानवोंका सामना करनेके लिये गये और महान् दर्प एवं बलसे सम्पन्न उन देवशत्रुओंसे इस प्रकार बोले— ॥ १४७-१४८ ॥
मम युद्धं प्रयच्छध्वं दैत्या युद्धमदोत्कटाः ।
प्रेषितो देवदेवेन वो निजेतुं महासुराः ॥ १४९ ॥
‘युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले दैत्यो! मुझे युद्ध प्रदान करो। महान् असुरगण! मुझे देवाधिदेव महादेवजीने तुम्हें परास्त करनेके लिये भेजा है’ ॥ १४९ ॥
इत्युक्ता भार्गवेणाथ दैत्या युद्धं प्रचक्रमुः ।
स तान् निहत्य समरे दैत्यान् भार्गवनन्दनः ॥ १५० ॥
वज्राशनिसमस्पर्शैः प्रहारैरेव भार्गवः ।
स दानवैः क्षततनुर्जामदग्न्यो द्विजोत्तमः ॥ १५१ ॥
भृगुवंशी परशुरामके ऐसा कहनेपर दैत्य उनके साथ युद्ध करने लगे। भार्गवनन्दन रामने समरांगणमें वज्र और विद्युत्के समान स्पर्शवाले प्रहारोंद्वारा उन दैत्योंका वध कर डाला। साथ ही उन द्विजश्रेष्ठ जमदग्निकुमारके शरीरको भी दानवोंने क्षत-विक्षत कर डाला ॥ १५०-१५१ ॥
संस्पृष्टःस्थाणुना सद्यो निर्व्रणः समजायत । प्रीतश्च भगवान् देवः कर्मणा तेन तस्य वै ॥ १५२ ॥ परंतु महादेवजीके हाथोंका स्पर्श पाकर परशुरामजीके सारे घाव तत्काल दूर हो गये। परशुरामके उस शत्रुविजयरूपी कर्मसे भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १५२ ॥ वरान् प्रादाद् बहुविधान् भार्गवाय महात्मने । उक्तश्च देवदेवेन प्रीतियुक्तेन शूलिना ॥ १५३ ॥ उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शिवने बड़ी प्रसन्नताके साथ महात्मा भार्गवको नाना प्रकारके वर प्रदान किये ॥ १५३ ॥ निपातात्तव शस्त्राणां शरीरे याभवद् रुजा । तया ते मानुषं कर्म व्यपोढं भृगुनन्दन ॥ १५४ ॥ गृहाणास्त्राणि दिव्यानि मत्सकाशाद् यथेप्सितम् । उन्होंने कहा—'भृगुनन्दन! दैत्योंके अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे तुम्हारे शरीरमें जो चोट पहुँची है, उससे तुम्हारा मानवोचित कर्म नष्ट हो गया (अब तुम देवताओंके ही समान हो गये); अतः मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दिव्यास्त्र ग्रहण करो' ॥ १५४ १/२ ॥
दुर्योधन उवाच
ततोऽस्त्राणि समस्तानि वरांश्च मनसेप्सितान् ॥ १५५ ॥ लब्ध्वा बहुविधान् रामः प्रणम्य शिरसा भवम् । अनुज्ञां प्राप्य देवेशाज्जगाम स महातपाः ॥ १५६ ॥ दुर्योधन कहता है—राजन्! तब रामने भगवान् शिवसे समस्त दिव्यास्त्र और नाना प्रकारके मनोवांछित वर पाकर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया। फिर वे महातपस्वी परशुराम देवेश्वर शिवसे आज्ञा लेकर चले गये ॥ १५५-१५६ ॥ एवमेतत् पुरावृत्तं तदा कथितवानृषिः । भार्गवोऽपि ददौ दिव्यं धनुर्वेदं महात्मने ॥ १५७ ॥ कर्णाय पुरुषव्याघ्र सुप्रीतेनान्तरात्मना । राजन्! इस प्रकार यह पुरातन वृत्तान्त उस समय ऋषिने मेरे पिताजीसे कहा था। पुरुषसिंह! भृगुनन्दन परशुरामने भी अत्यन्त प्रसन्न हृदयसे महामना कर्णको दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया है ॥ १५७ १/२ ॥ वृजिनं हि भवेत् किंचिद् यदि कर्णस्य पार्थिव ॥ १५८ ॥ नास्मै ह्यस्त्राणि दिव्यानि प्रादास्यद् भृगुनन्दनः । भूपाल! यदि कर्णमें कोई पाप या दोष होता तो भृगुनन्दन परशुराम इसे दिव्यास्त्र न देते ॥ १५८ १/२ ॥ नापि सूतकुले जातं कर्णं मन्ये कथंचन ॥ १५९ ॥
देवपुत्रमहं मन्ये क्षत्रियाणां कुलोद्भवम् ।
विसृष्टमवबोधार्थं कुलस्येति मतिर्मम ।। १६० ।।
राजन्! मैं किसी तरह इस बातपर विश्वास नहीं करता कि कर्ण सूतकुलमें उत्पन्न हुआ है। मैं इसे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न देवपुत्र मानता हूँ। मेरा तो यह विश्वास है कि इसकी माताने अपने गुप्त रहस्यको छिपानेके लिये तथा इसे अन्य कुलका बालक विख्यात करनेके लिये ही सूतकुलमें छोड़ दिया होगा ।। १५९-१६० ।।
सर्वथा न ह्ययं शल्य कर्णः सूतकुलोद्भवः ।
सकुण्डलं सकवचं दीर्घबाहुं महारथम् ।। १६१ ।।
कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति ।
शल्य! मैं सर्वथा इस बातपर विश्वास करता हूँ कि इस कर्णका जन्म सूतकुलमें नहीं हुआ है। इस महाबाहु महारथी और सूर्यके समान तेजस्वी कुण्डल-कवचविभूषित पुत्रको सूतजातिकी स्त्री कैसे पैदा कर सकती है? क्या कोई हरिणी अपने पेटसे बाघको जन्म दे सकी है? ।। १६१ १/३ ।।
यथा ह्यस्य भुजौ पीनौ नागराजकरोपमौ ।। १६२ ।।
वक्षः पश्य विशालं च सर्वशत्रुनिबर्हणम् ।
न त्वेष प्राकृतः कश्चित् कर्णो वैकर्तनो वृषः ।
महात्मा ह्येष राजेन्द्र रामशिष्यः प्रतापवान् ।। १६३ ।।
राजेन्द्र! गजराजके शुण्डदण्डके समान जैसी इसकी मोटी भुजाएँ हैं तथा समस्त शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ जैसा इसका विशाल वक्षःस्थल है, उससे सूचित होता है कि परशुरामजीका यह प्रतापी शिष्य महामनस्वी धर्मात्मा वैकर्तन कर्ण कोई प्राकृत पुरुष नहीं है ।। १६२-१६३ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि त्रिपुरवधोपाख्याने चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें त्रिपुरवधोपाख्यानविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १७० १/३ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1839)
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
शल्य और दुर्योधनका वार्तालाप, कर्णका सारथि होनेके लिये शल्यकी स्वीकृति
दुर्योधन उवाच
एवं स भगवान् देवः सर्वलोकपितामहः ।
सारथ्यमकरोत् तत्र ब्रह्मा रुद्रोऽभवद् रथी ॥ १ ॥
**दुर्योधन बोला—**राजन्! इस प्रकार सर्वलोक-पितामह भगवान् ब्रह्माने वहाँ सारथिका कार्य किया और रथी हुए रुद्र ॥ १ ॥
रथिनोऽभ्यधिको वीर कर्तव्यो रथसारथिः ।
तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान् युधि ॥ २ ॥
वीर! रथका सारथि तो उसीको बनाना चाहिये जो रथीसे भी बढ़कर हो। अतः पुरुषसिंह! आप युद्धमें कर्णके घोड़ोंको काबूमें रखिये ॥ २ ॥
यथा देवगणैस्तत्र वृतो यत्नात् पितामहः ।
तथास्माभिर्भवान् यत्नात् कर्णादभ्यधिको वृतः ॥ ३ ॥
जैसे देवताओंने वहाँ यत्नपूर्वक ब्रह्माजीका वरण किया था, उसी प्रकार हमलोगोंने विशेष चेष्टा करके कर्णसे भी अधिक बलवान् आपका सारथि-कर्मके लिये वरण किया ॥ ३ ॥
यथा देवैर्महाराज ईश्वरादधिको वृतः ।
तथा भवानपि क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः ॥ ४ ॥
नियच्छ तुरगान् युद्धे राधेयस्य महाद्युते ।
महाराज! जैसे देवताओंने महादेवजीसे भी बड़े ब्रह्माजीको उनका सारथि चुना था, उसी प्रकार हमने भी आपको चुना है। अतः महातेजस्वी नरेश! आप युद्धमें राधापुत्र कर्णके घोड़ोंका नियन्त्रण कीजिये ॥ ४ ½ ॥
शल्य उवाच
मयाप्येतन्नरश्रेष्ठ बहुशोऽमरसिंहयोः ॥ ५ ॥
कथ्यमानं श्रुतं दिव्यमाख्यानमतिमानुषम् ।
यथा च चक्रे सारथ्यं भवस्य प्रपितामहः ॥ ६ ॥
यथासुराश्च निहता इषुणैकेन भारत ।
शल्यने कहा— भारत! नरश्रेष्ठ! मैंने भी देवश्रेष्ठ ब्रह्मा और महादेवजीके इस अलौकिक एवं दिव्य उपाख्यानको विद्वानोंके मुखसे सुना है कि किस प्रकार प्रपितामह ब्रह्माजीने महादेवजीका सारथि-कर्म किया था और कैसे एक ही बाणसे समस्त असुर मारे गये।।
कृष्णस्य चापि विदितं सर्वमेतत् पुरा ह्यभूत् ॥ ७ ॥ यथा पितामहो जज्ञे भगवान् सारथिस्तदा । भगवान् ब्रह्मा उस समय जिस प्रकार महादेवजीके सारथि हुए थे, यह सारा पुरातन वृत्तान्त श्रीकृष्णको भी विदित ही होगा ॥ ७१/२ ॥
अनागतमतिक्रान्तं वेद कृष्णोऽपि तत्त्वतः ॥ ८ ॥ एतदर्थं विदित्वापि सारथ्यमुपजग्मिवान् । स्वयंभूरिव रुद्रस्य कृष्णः पार्थस्य भारत ॥ ९ ॥ क्योंकि श्रीकृष्ण भी भूत और भविष्यको यथार्थरूपसे जानते हैं। भारत! इस विषयको अच्छी तरह जानकर ही रुद्रके सारथि ब्रह्माजीके समान श्रीकृष्ण पार्थके सारथि बने हुए हैं ॥ ८-९ ॥
यदि हन्याच्च कौन्तेयं सूतपुत्रः कथंचन । दृष्ट्वा पार्थं हि निहतं स्वयं योत्स्यति केशवः ॥ १० ॥ शङ्खचक्रगदापाणिर्धक्ष्यते तव वाहिनीम् । यदि सूतपुत्र कर्ण किसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनको मार डालेगा तो अर्जुनको मारा गया देख श्रीकृष्ण स्वयं ही युद्ध करेंगे। उनके हाथमें शंख, चक्र और गदा होगी। वे तुम्हारी सेनाको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ १०१/२ ॥
न चापि तस्य क्रुद्धस्य वार्ष्णेयस्य महात्मनः ॥ ११ ॥ स्थास्यते प्रत्यनीकेषु कश्चिदत्र नृपस्तव । महात्मा श्रीकृष्ण कुपित होकर जब हथियार उठायेंगे, उस समय तुम्हारे पक्षका कोई भी नरेश उनके सामने ठहर नहीं सकेगा ॥ १११/२ ॥
संजय उवाच
तं तथा भाषमाणं तु मद्रराजमरिंदमः ॥ १२ ॥ प्रत्युवाच महाबाहुरदीनात्मा सुतस्तव । संजय कहते हैं— राजन्! मद्रराज शल्यको ऐसी बातें करते देख आपके शत्रुदमन पुत्र महाबाहु दुर्योधनने मनमें तनिक भी दीनता न लाकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १२१/२ ॥
मावमंस्था महाबाहो कर्णं वैकर्तनं रणे ॥ १३ ॥ सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं सर्वशास्त्रार्थपारगम् ।
‘महाबाहो! तुम रणक्षेत्रमें वैकर्तन कर्णका अपमान न करो। वह सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका पारंगत विद्वान् है ।। १३१/२ ।।
यस्य ज्यातलनिर्घोषं श्रुत्वा भयंकरं महत् ।। १४ ।।
पाण्डवेयानि सैन्यानि विद्रवन्ति दिशो दश ।
‘यह वही वीर है जिसकी प्रत्यंचाकी अत्यन्त भयानक टंकार सुनकर पाण्डव-सेना दसों दिशाओंमें भागने लगती है ।। १४१/२ ।।
प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथा रात्रौ घटोत्कचः ।। १५ ।।
मायाशतानि कुर्वाणो हतो मायापुरस्कृतः ।
‘महाबाहो! यह तो तुमने अपनी आँखों देखा था कि किस प्रकार उस दिन रातमें सैकड़ों मायाओंका प्रयोग करनेवाला मायावी घटोत्कच कर्णके हाथसे मारा गया ।। १५१/२ ।।
न चातिष्ठत बीभत्सुः प्रत्यनीके कथंचन ।। १६ ।।
एतांश्च दिवसान् सर्वान् भयेन महता वृतः ।
‘इन सारे दिनोंमें महान् भयसे घिरे हुए अर्जुन किसी तरह भी कर्णके सामने खड़े न हो सके थे ।। १६१/२ ।।
भीमसेनश्च बलवान् धनुष्कोट्याभिचोदितः ।। १७ ।।
उक्तश्च संज्ञया राजन् मूढ औदरिको यथा ।
‘राजन्! बलवान् भीमसेनको भी इसने अपने धनुषकी कोटिसे दबाकर युद्धके लिये प्रेरित किया था और उन्हें मूर्ख, पेटू आदि नामोंसे पुकारा था ।। १७१/२ ।।
माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ येन जित्वा महारणे ।। १८ ।।
कमप्यर्थं पुरस्कृत्य न हतौ युधि मारिष ।
‘मान्यवर! इसने महासमरमें शूरवीर नकुल-सहदेवको भी परास्त करके किसी विशेष प्रयोजनको सामने रखकर उन दोनोंको युद्धमें मार नहीं डाला ।।
येन वृष्णिप्रवीरस्तु सात्यकिः सात्वतां वरः ।। १९ ।।
निर्जित्य समरे शूरो विरथश्च बलात् कृतः ।
‘इसने वृष्णिवंशके प्रमुख वीर सात्वतशिरोमणि शूरवीर सात्यकिको समरांगणमें परास्त करके उन्हें बलपूर्वक रथहीन कर दिया था ।। १९१/२ ।।
सृञ्जयाश्चेतरे सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।। २० ।।
असकृन्निर्जिताः संख्ये स्मयमानेन संयुगे ।
‘इसके सिवा धृष्टद्युम्न आदि समस्त सृञ्जयोको भी इसने युद्धस्थलमें हँसते-हँसते अनेक बार परास्त किया है ।। २०१/२ ।।
तं कथं पाण्डवा युद्धे विजेष्यन्ति महारथम् ।। २१ ।।
यो हन्यात् समरे क्रुद्धो वज्रहस्तं पुरंदरम् । 'जो कुपित होनेपर वज्रधारी इन्द्रको भी समरभूमिमें मार डालनेकी शक्ति रखता है, उस महारथी वीर कर्णको पाण्डवलोग युद्धमें कैसे जीत लेंगे? ।। २१ १/२ ।। त्वं च सर्वास्त्रविद् वीरः सर्वविद्यास्त्रपारगः ।। २२ ।। बाहुवीर्येण ते तुल्यः पृथिव्यां नास्ति कश्चन । 'आप भी सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, समस्त विद्याओं तथा अस्त्रोंके पारंगत विद्वान् एवं वीर हैं। इस भूतलपर बाहुबलके द्वारा आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है ।। २२ १/२ ।। त्वं शल्यभूतः शत्रूणामविषह्यः पराक्रमे ।। २३ ।। ततस्त्वमुच्यसे राजन् शल्य इत्यरिसूदन । 'शत्रुसूदन नरेश! आप पराक्रम प्रकट करते समय शत्रुओंके लिये असह्य हो उठते हैं, उनके लिये आप शल्यभूत (कण्टकस्वरूप) हैं; इसीलिये आपको शल्य कहा जाता है ।। २३ १/२ ।। तव बाहुबलं प्राप्य न शेकुः सर्वसात्वताः ।। २४ ।। तव बाहुबलाद् राजन् किं नु कृष्णो बलाधिकः । 'राजन्! आपके बाहुबलको सामने पाकर सम्पूर्ण सात्वतवंशी क्षत्रिय कभी युद्धमें टिक न सके हैं। क्या आपके बाहुबलसे श्रीकृष्णका बल अधिक है? ।। २४ १/२ ।। यथा हि कृष्णेन बलं धार्यं वै फाल्गुने हते ।। २५ ।। तथा कर्णात्ययीभावे त्वया धार्यं महत् बलम् । 'जैसे अर्जुनके मारे जानेपर श्रीकृष्ण पाण्डव-सेनाकी रक्षा करेंगे, उसी प्रकार यदि कर्ण मारा गया तो आपको मेरी विशाल वाहिनीका संरक्षण करना होगा ।। किमर्थं समरे सैन्यं वासुदेवो नवारयत् ।। २६ ।। किमर्थं च भवान् सैन्यं न हनिष्यति मारिष । 'मान्यवर! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण क्यों कौरव-सेनाका निवारण करेंगे और क्यों आप पाण्डव-सेनाका वध नहीं करेंगे? ।। २६ १/२ ।। त्वत्कृते पदवीं गन्तुमिच्छेयं युधि मारिष । सोदराणां च वीराणां सर्वेषां च महीक्षिताम् ।। २७ ।। 'माननीय नरेश! मैं तो आपके ही भरोसे युद्धमें मारे गये अपने वीर भाइयों तथा समस्त राजाओंके (ऋणसे मुक्त होनेके लिये उन्हींके) पथपर चलनेकी इच्छा करता हूँ' ।। २७ १/२ ।।
<center>शल्य उवाच</center>यन्मां ब्रवीषि गान्धारे अग्रे सैन्यस्य मानद । विशिष्टं देवकीपुत्रात् प्रीतिमानस्म्यहं त्वयि ।। २८ ।।
शल्यने कहा— मानद! गान्धारीनन्दन! तुम सम्पूर्ण सेनाके आगे जो मुझे देवकीपुत्र श्रीकृष्णसे बढ़कर बता रहे हो, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २८ ॥
एष सारथ्यमातिष्ठे राधेयस्य यशस्विनः ।
युध्यतः पाण्डवाग्र्येण यथा त्वं वीर मन्यसे ॥ २९ ॥
वीर! मैं यशस्वी राधापुत्र कर्णका पाण्डवशिरोमणि अर्जुनके साथ युद्ध करते समय सारथ्य करूँगा जैसा कि तुम चाहते हो ॥ २९ ॥
समयश्च हि मे वीर कश्चिद् वैकर्तनं प्रति ।
उत्सृजेयं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य संनिधौ ॥ ३० ॥
वीरवर! परंतु वैकर्तन कर्णको मेरी एक शर्तका पालन करना होगा। मैं इसके समीप जो जीमें आयेगा, वैसी बातें करूँगा ॥ ३० ॥
संजय उवाच
तथेति राजन् पुत्रस्ते सह कर्णेन मारिष ।
अब्रवीन्मद्रराजानं सर्वक्षत्रस्य संनिधौ ॥ ३१ ॥
संजय कहते हैं— माननीय नरेश! तब समस्त क्षत्रियोंके समीप कर्णसहित आपके पुत्रने मद्रराज शल्यसे कहा— 'बहुत अच्छा, आपकी शर्त स्वीकार है' ॥ ३१ ॥
सारथ्यस्याभ्युपगमाच्छल्येनाश्वासितस्तदा ।
दुर्योधनस्तदा हृष्टः कर्णं तमभिषस्वजे ॥ ३२ ॥
सारथ्य स्वीकार करके जब शल्यने आश्वासन दिया, तब राजा दुर्योधनने बड़े हर्षके साथ कर्णको हृदयसे लगा लिया ॥ ३२ ॥
अब्रवीच्च पुनः कर्णं स्तूयमानः सुतस्तव ।
जहि पार्थान् रणे सर्वान् महेन्द्रो दानवानिव ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् वन्दीजनोंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए आपके पुत्रने कर्णसे फिर कहा—'वीर! तुम रणक्षेत्रमें कुन्तीके समस्त पुत्रोंको उसी प्रकार मार डालो, जैसे देवराज इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं' ॥ ३३ ॥
स शल्येनाभ्युपगते हयानां संनियच्छने ।
कर्णो हृष्टमना भूयो दुर्योधनमभाषत ॥ ३४ ॥
शल्यके द्वारा अश्वोंका नियन्त्रण स्वीकार कर लिये जानेपर कर्ण प्रसन्नचित्त हो पुनः दुर्योधनसे बोला— ॥ ३४ ॥
नातिहृष्टमना ह्येष मद्रराजोऽभिभाषते ।
राजन् मधुरया वाचा पुनरेनं ब्रवीहि वै ॥ ३५ ॥
'राजन्! ये मद्रराज शल्य अधिक प्रसन्न होकर बात नहीं कर रहे हैं; अतः तुम मधुर वाणीद्वारा इन्हें फिरसे समझाते हुए कुछ कहो' ॥ ३५ ॥
ततो राजा महाप्राज्ञः सर्वास्त्रकुशलो बली ।
दुर्योधनोऽब्रवीच्छल्यं मद्रराजं महीपतिम् ॥ ३६ ॥
पूरयन्निव घोषेण मेघगम्भीरया गिरा ।
तब सम्पूर्ण अस्त्रोंके संचालनमें कुशल, परम बुद्धिमान् एवं बलवान् राजा दुर्योधनने मद्रदेशके राजा पृथ्वीपति शल्यको सम्बोधित करके अपने स्वरसे वहाँके प्रदेशको गुँजाते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा इस प्रकार कहा— ॥ ३६ १/२ ॥
शल्य कर्णोऽर्जुनेनाद्य योद्धव्यमिति मन्यते ॥ ३७ ॥
तस्य त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान् युधि ।
‘शल्य! आज कर्ण अर्जुनके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखता है। पुरुषसिंह! आप रणस्थलमें इसके घोड़ोंको काबूमें रखें ॥ ३७ १/२ ॥
कर्णो हत्वेतरान् सर्वान् फाल्गुनं हन्तुमिच्छति ॥ ३८ ॥
तस्याभीषुग्रहे राजन् प्रयाचे त्वां पुनः पुनः ।
‘कर्ण अन्य सब शत्रुवीरोंका संहार करके अर्जुनका वध करना चाहता है। राजन्! आपसे उसके घोड़ोंकी बागडोर सँभालनेके लिये मैं बारंबार याचना करता हूँ ॥ ३८ १/२ ॥
पार्थस्य सचिवः कृष्णो यथाभीषुग्रहो वरः ।
तथा त्वमपि राधेयं सर्वतः परिपालय ॥ ३९ ॥
‘जैसे श्रीकृष्ण अर्जुनके श्रेष्ठ सचिव तथा सारथि हैं, उसी प्रकार आप भी राधापुत्र कर्णकी सर्वथा रक्षा कीजिये’ ॥ ३९ ॥
संजय उवाच
ततः शल्यः परिष्वज्य सुतं ते वाक्यमब्रवीत् ।
दुर्योधनममित्रघ्नं प्रीतो मद्राधिपस्तदा ॥ ४० ॥
संजय कहते हैं—महाराज! तब मद्रराज शल्यने प्रसन्न हो आपके पुत्र शत्रुसूदन दुर्योधनको हृदयसे लगाकर कहा ॥ ४० ॥
शल्य उवाच
एवं चेन्मन्यसे राजन् गान्धारे प्रियदर्शन ।
तस्मात् ते यत् प्रियं किंचित् तत् सर्वं करवाण्यहम् ॥ ४१ ॥
शल्य बोले—गान्धारीनन्दन! प्रियदर्शन नरेश! यदि तुम ऐसा समझते हो तो तुम्हारा जो कुछ प्रिय कार्य है, वह सब मैं करूँगा ॥ ४१ ॥
यत्रास्मि भरतश्रेष्ठ योग्यः कर्मणि कर्हिचित् ।
तत्र सर्वात्मना युक्तो वक्ष्ये कार्यधुरं तव ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! मैं जहाँ कहीं कभी भी जिस कर्मके योग्य होऊँ वहाँ उस कर्ममें तुम्हारे द्वारा नियुक्त कर दिये जानेपर मैं सम्पूर्ण हृदयसे उस कार्यभारको वहन करूँगा ॥ ४२ ॥
यत्तु कर्णमहं ब्रूयां हितकामः प्रियाप्रिये । मम तत् क्षमतां सर्वं भवान् कर्णश्च सर्वशः ॥ ४३ ॥ परंतु मैं हितकी इच्छा रखते हुए कर्णसे जो भी प्रिय अथवा अप्रिय वचन कहूँ, वह सब तुम और कर्ण सर्वथा क्षमा करो ॥ ४३ ॥
कर्ण उवाच
ईशानस्य यथा ब्रह्मा यथा पार्थस्य केशवः । तथा नित्यं हिते युक्तो मद्रराज भवस्व नः ॥ ४४ ॥ कर्णने कहा— मद्रराज! जैसे ब्रह्मा महादेवजीके और श्रीकृष्ण अर्जुनके हितमें सदा तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार आप भी निरन्तर हमारे हितसाधनमें संलग्न रहें ॥
शल्य उवाच
आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः । अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम् ॥ ४५ ॥ शल्य बोले— अपनी निन्दा और प्रशंसा, परायी निन्दा और परायी स्तुति—ये चार प्रकारके बर्ताव श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं ॥ ४५ ॥ यत् तु विद्वन् प्रवक्ष्यामि प्रत्ययार्थमहं तव । आत्मनः स्तवसंयुक्तं तन्निबोध यथातथम् ॥ ४६ ॥ परंतु विद्वन्! मैं तुम्हें विश्वास दिलानेके लिये जो अपनी प्रशंसासे भरी बात कहता हूँ, उसे तु यथार्थरूपसे सुनो ॥ ४६ ॥ अहं शक्रस्य सारथ्ये योग्यो मातलिवत् प्रभो । अप्रमादात् प्रयोगाच्च ज्ञानविद्याचिकित्सनैः ॥ ४७ ॥ प्रभो! मैं सावधानी, अश्वसंचालन, ज्ञान, विद्या तथा चिकित्सा आदि सद्गुणोंकी दृष्टिसे इन्द्रके सारथि-कर्ममें नियुक्त मातलिके समान सुयोग्य हूँ ॥ ४७ ॥ ततः पार्थेन संग्रामे युध्यमानस्य तेऽनघ । वाहयिष्यामि तुरगान् विज्वरो भव सूतज ॥ ४८ ॥ निष्पाप सूतपुत्र कर्ण! जब तुम युद्धस्थलमें अर्जुनके साथ युद्ध करोगे, तब मैं तुम्हारे घोड़े अवश्य हाँकूँगा। तुम निश्चिन्त रहो ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसारथ्यस्वीकारे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यके सारथिकर्मको स्वीकार करनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1846)
षट्त्रिंशोऽध्यायः
कर्णका युद्धके लिये प्रस्थान और शल्यसे उसकी बातचीत
दुर्योधन उवाच
अयं ते कर्ण सारथ्यं मद्रराजः करिष्यति ।
कृष्णादभ्यधिको यन्ता देवेशस्येव मातलिः ॥ १ ॥
**दुर्योधन बोला—**कर्ण! ये मद्रराज शल्य तुम्हारा सारथ्यकर्म करेंगे। देवराज इन्द्रके सारथि मातलिके समान ये श्रीकृष्णसे भी श्रेष्ठ रथसंचालक हैं ॥ १ ॥
यथा हरिहयैर्युक्तं संगृह्णाति स मातलिः ।
शल्यस्तथा तवाद्यायं संयन्ता रथवाजिनाम् ॥ २ ॥
जैसे मातलि इन्द्रके घोड़ोंसे जुते हुए रथकी बागडोर सँभालते हैं, उसी प्रकार ये तुम्हारे रथके घोड़ोंको काबूमें रखेंगे ॥ २ ॥
योधे त्वयि रथस्थे च मद्रराजे च सारथौ ।
रथश्रेष्ठो ध्रुवं संख्ये पार्थानभिभविष्यति ॥ ३ ॥
जब तुम योद्धा बनकर रथपर बैठोगे और मद्रराज शल्य सारथिके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे, उस समय वह श्रेष्ठ रथ निश्चय ही युद्धस्थलमें कुन्तीपुत्रोंको पराजित कर देगा ॥ ३ ॥
संजय उवाच
ततो दुर्योधनो भूयो मद्रराजं तरस्विनम् ।
उवाच राजन् संग्रामेऽव्युषिते पर्युपस्थिते ॥ ४ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर दुर्योधनने प्रातःकाल युद्ध उपस्थित होनेपर पुनः वेगशाली मद्रराज शल्यसे कहा— ॥ ४ ॥
कर्णस्य यच्छ संग्रामे मद्रराज हयोत्तमान् ।
त्वयाभिगुप्तो राधेयो विजेष्यति धनंजयम् ॥ ५ ॥
‘मद्रराज! आप संग्राममें कर्णके इन उत्तम घोड़ोंको वशमें कीजिये। आपसे सुरक्षित होकर राधापुत्र कर्ण निश्चय ही अर्जुनको जीत लेगा’ ॥ ५ ॥
इत्युक्तो रथमास्थाय तथेति प्राह भारत ।
शल्येऽभ्युपगते कर्णः सारथिं सुमनाब्रवीत् ॥ ६ ॥
त्वं सूत स्यन्दनं मह्यं कल्पयेत्यसकृत् त्वरन् ।
भारत! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर शल्यने रथका स्पर्श करके कहा—'तथास्तु।' जब शल्यने सारथि होना पूर्णरूपसे स्वीकार कर लिया, तब कर्णने प्रसन्नचित्त होकर बारंबार अपने पूर्व सारथिसे शीघ्रतापूर्वक कहा—'सूत! तुम मेरा रथ सजाकर तैयार करो' ॥ ६ १/२ ॥
ततो जैत्रं रथवरं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ ७ ॥
विधिवत् कल्पितं भद्रं जयेत्युक्त्वा न्यवेदयत् ।
तब सारथिने गन्धर्वनगरके समान विशाल, विजयशील श्रेष्ठ और मंगलकारक रथको विधिपूर्वक सुसज्जित करके सूचित किया—'स्वामिन्! आपकी जय हो! रथ तैयार है' ॥ ७ १/२ ॥
तं रथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णोऽभ्यर्च्य यथाविधि ॥ ८ ॥
सम्पादितं ब्रह्मविदा पूर्वमेव पुरोधसा ।
कृत्वा प्रदक्षिणं यत्नादुपस्थाय च भास्करम् ॥ ९ ॥
समीपस्थं मद्रराजमारोह त्वमथाब्रवीत् ।
रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने वेदज्ञ पुरोहितद्वारा पहलेसे ही जिसका मांगलिक कृत्य सम्पन्न कर दिया गया था, उस रथकी विधिपूर्वक पूजा और प्रदक्षिणा की। तत्पश्चात् सूर्यदेवका प्रयत्नपूर्वक उपस्थान करके पास ही खड़े हुए मद्रराजसे कहा—'पहले आप रथपर बैठिये' ॥ ८-९ १/२ ॥
ततः कर्णस्य दुर्धर्षं स्यन्दनप्रवरं महत् ॥ १० ॥
आरुरोह महातेजाः शल्यः सिंह इवाचलम् ।
तदनन्तर जैसे सिंह पर्वतपर चढ़ता है, उसी प्रकार महातेजस्वी शल्य कर्णके दुर्जय, विशाल एवं श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हुए ॥ १० १/२ ॥
ततः शल्याश्रितं दृष्ट्वा कर्णः स्वं रथमुत्तमम् ॥ ११ ॥
अध्यतिष्ठद् यथाम्भोदं विद्युत्वन्तं दिवाकरः ।
कर्ण अपने उत्तम रथको सारथि शल्यसे सनाथ हुआ देख स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुआ, मानो सूर्यदेव बिजलियोंसे युक्त मेघपर प्रतिष्ठित हुए हों ॥ ११ १/२ ॥
तावेकरथमारूढावादित्याग्निसमत्विषौ ॥ १२ ॥
अभ्राजेतां यथा मेघं सूर्याग्नी सहितौ दिवि ।
जैसे आकाशमें किसी महान् मेघखण्डपर एक साथ बैठे हुए सूर्य और अग्नि प्रकाशित हो रहे हों, उसी प्रकार सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी कर्ण और शल्य उस एक ही रथपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १२ १/२ ॥
संस्तूयमानौ तौ वीरौ तदास्तां द्युतिमत्तमौ ॥ १३ ॥
ऋत्विक्सदस्यैरिन्द्राग्नी स्तूयमानाविवाध्वरे ।
उस समय उन दोनों परम तेजस्वी वीरोंकी उसी प्रकार स्तुति होने लगी, जैसे यज्ञमण्डपमें ऋत्विजों और सदस्योंद्वारा इन्द्र और अग्नि देवताका स्तवन किया जाता है॥ १३ १/२॥
स शल्यसंगृहीताश्वे रथे कर्णः स्थितो बभौ ॥ १४ ॥
धनुर्विस्फारयन् घोरं परिवेषीव भास्करः ।
शल्यने घोड़ोंकी बागडोर हाथमें ले ली। उस रथपर बैठा हुआ कर्ण अपने भयंकर धनुषको फैलाकर उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो सूर्यमण्डलपर घेरा पड़ा हो॥ १४ १/२॥
आस्थितः स रथश्रेष्ठं कर्णः शरगभस्तिमान् ॥ १५ ॥
प्रबभौ पुरुषव्याघ्रो मन्दरस्थ इवांशुमान् ।
उस श्रेष्ठ रथपर चढ़ा हुआ पुरुषसिंह कर्ण अपनी बाणमयी किरणोंसे युक्त हो मन्दराचलके शिखरपर देदीप्यमान होनेवाले सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ १५ १/२ ॥
तं रथस्थं महाबाहुं युद्धायामिततेजसम् ॥ १६ ॥
दुर्योधनस्तु राधेयमिदं वचनमब्रवीत् ।
अकृतं द्रोणभीष्माभ्यां दुष्करं कर्म संयुगे ॥ १७ ॥ कुरुष्वाधिरथे वीर मिषतां सर्वधन्विनाम् । युद्धके लिये रथपर बैठे हुए अमिततेजस्वी महाबाहु राधापुत्र कर्णसे दुर्योधनने इस प्रकार कहा—'वीर! अधिरथकुमार! युद्धस्थलमें द्रोणाचार्य और भीष्म भी जिसे न कर सके, वही दुष्कर कर्म तुम सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते कर डालो ॥ १६-१७ १/२ ॥ मनोगतं मम ह्यासीद् भीष्मद्रोणौ महारथौ ॥ १८ ॥ अर्जुनं भीमसेनं च निहन्ताराविति ध्रुवम् । 'मेरे मनमें यह विश्वास था कि 'महारथी भीष्म और द्रोणाचार्य अर्जुन और भीमसेनको अवश्य ही मार डालेंगे ॥ १८ १/२ ॥ ताभ्यां यदकृतं वीर वीरकर्म महामृधे ॥ १९ ॥ तत् कर्म कुरु राधेय वज्रपाणिरिवापरः । 'वीर राधापुत्र! वे दोनों जिसे न कर सके, वही वीरोचित कर्म आज महासमरमें दूसरे वज्रधारी इन्द्रके समान तुम निश्चय ही पूर्ण करो ॥ १९ १/२ ॥ गृहाण धर्मराजं वा जहि वा त्वं धनंजयम् ॥ २० ॥ भीमसेनं च राधेय माद्रीपुत्रौ यमावपि । 'राधानन्दन! या तो तुम धर्मराज युधिष्ठिरको कैद कर लो या अर्जुन, भीमसेन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेवको मार डालो ॥ २० १/२ ॥ जयश्च तेऽस्तु भद्रं ते प्रयाहि पुरुषर्षभ ॥ २१ ॥ पाण्डुपुत्रस्य सैन्यानि कुरु सर्वाणि भस्मसात् । 'पुरुषप्रवर! तुम्हारी जय हो। कल्याण हो। अब तुम जाओ और पाण्डुपुत्रकी सारी सेनाओंको भस्म करो' ॥ ततस्तूर्यसहस्राणि भेरीणामयुतानि च ॥ २२ ॥ वाद्यमानान्यराजन्त मेघशब्दो यथा दिवि । तदनन्तर सहस्रों तूर्य और कई सहस्र रणभेरियाँ बज उठीं, जो आकाशमें मेघोंकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रही थीं ॥ २२ १/२ ॥ प्रतिगृह्य तु तद् वाक्यं रथस्थो रथसत्तमः ॥ २३ ॥ अभ्यभाषत राधेयः शल्यं युद्धविशारदम् । चोदयाश्वान् महाबाहो यावद्धन्मि धनंजयम् ॥ २४ ॥ भीमसेनं यमौ चोभौ राजानं च युधिष्ठिरम् । रथपर बैठे हुए रथियोंमें श्रेष्ठ राधापुत्र कर्णने दुर्योधनके उस आदेशको शिरोधार्य करके युद्धकुशल राजा शल्यसे कहा—'महाबाहो! मेरे घोड़ोंको बढ़ाइये, जिससे कि मैं अर्जुन, भीमसेन, दोनों भाई नकुल-सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरका वध कर सकूँ ॥ २३-२४ १/२ ॥
अद्य पश्यतु मे शल्य बाहुवीर्यं धनंजयः ॥ २५ ॥ अत्यतः कङ्कपत्राणां सहस्राणि शतानि च । ‘शल्य! आज सैकड़ों और सहस्रों कंकपत्रयुक्त बाणोंकी वर्षा करते हुए मुझ कर्णके बाहुबलको अर्जुन देखें ॥ २५ १/२ ॥ अद्य क्षेप्स्याम्यहं शल्य शरान् परमतेजनान् ॥ २६ ॥ पाण्डवानां विनाशाय दुर्योधनजयाय च । ‘शल्य! आज मैं पाण्डवोंके विनाश और दुर्योधनकी विजयके लिये अत्यन्त तीखे बाण चलाऊँगा’ ॥ २६ १/२ ॥
शल्य उवाच
सूतपुत्र कथं नु त्वं पाण्डवानवमन्यसे ॥ २७ ॥ सर्वास्त्रज्ञान् महेष्वासान् सर्वानैव महाबलान् । अनिवर्तिनो महाभागानजय्यान् सत्यविक्रमान् ॥ २८ ॥ **शल्यने कहा—**सूतपुत्र! तुम पाण्डवोंकी अवहेलना कैसे करते हो। वे सब-के-सब तो सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, महाधनुर्धर, महाबलवान्, युद्धसे पीछे न हटनेवाले, अजेय तथा सत्यपराक्रमी हैं ॥ २७-२८ ॥ अपि संतनयेयुर्ये भयं साक्षाच्छतक्रतोः । यदा श्रोष्यसि निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ २९ ॥ राधेय गाण्डिवस्याजौ तदा नैवं वदिष्यसि । वे साक्षात् इन्द्रके मनमें भी भय उत्पन्न कर सकते हैं। राधापुत्र! जब तुम युद्धस्थलमें वज्रकी गड़गड़ाहटके समान गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष सुनोगे, तब ऐसी बातें नहीं कहोगे ॥ २९ १/२ ॥ यदा द्रक्ष्यसि भीमेन कुञ्जरानीकमाहवे ॥ ३० ॥ विशीर्णदन्तं निहतं तदा नैवं वदिष्यसि । जब तुम देखोगे कि भीमसेनने संग्रामभूमिमें गजराजोंकी सेनाके दाँत तोड़-तोड़कर उसका संहार कर डाला है, तब तुम इस प्रकार नहीं बोल सकोगे ॥ ३० १/२ ॥ यदा द्रक्ष्यसि संग्रामे धर्मपुत्रं यमौ तथा ॥ ३१ ॥ शितैः पृषत्कैः कुर्वाणानभ्रच्छायामिवाम्बरे । अस्यतः क्षिण्वतश्चारीँल्लघुहस्तान् दुरासदान् । पार्थिवानपि चान्यांस्त्वं तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ३२ ॥ जब तुम्हें यह दिखायी देगा कि संग्राममें धर्मपुत्र युधिष्ठिर, नकुल-सहदेव तथा अन्यान्य दुर्जय भूपाल बड़ी शीघ्रताके साथ हाथ चला रहे हैं, अपने तीखे बाणोंद्वारा आकाशमें
मेघोंकी छायाके समान छाया कर रहे हैं, निरन्तर बाण-वर्षा करते और शत्रुओंका संहार किये डालते हैं, तब तुम ऐसी बातें मुँहसे न निकाल सकोगे ॥ ३१-३२ ॥
संजय उवाच
अनादृत्य तु तद् वाक्यं मद्रराजेन भाषितम् ।
याहीत्येवाब्रवीत् कर्णो मद्रराजं तरस्विनम् ॥ ३३ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! मद्रराजकी कही हुई उस बातकी उपेक्षा करके कर्णने उन वेगशाली मद्रनरेशसे कहा—‘चलिये, चलिये’ ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसंवादे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यसंवादविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥