महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1058)
जयद्रथके कटे हुए मस्तकका उसके पिताकी गोदमें गिरना
अथ शारद्वतो राजन् कौन्तेयशरपीडितः ।
अवासीदद् रथोपस्थे मूर्च्छामभिजगाम ह ॥ ९ ॥
राजन्! कृपाचार्य अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हो मूर्च्छित हो गये और रथके पिछले भागमें जा बैठे ॥ ९ ॥
विह्वलं तमभिज्ञाय भर्तारं शरपीडितम् ।
हतोऽयमिति च ज्ञात्वा सारथिस्तमपावहत् ॥ १० ॥
अपने स्वामीको बाणोंसे पीड़ित एवं विह्वल जानकर और उन्हें मरा हुआ समझकर सारथि रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ १० ॥
तस्मिन् भग्ने महाराज कृपे शारद्वते युधि ।
अश्वत्थामाप्यपायासीत् पाण्डवेयाद् रथान्तरम् ॥ ११ ॥
महाराज! युद्धस्थलमें शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यके अचेत होकर वहाँसे हट जानेपर अश्वत्थामा भी अर्जुनको छोड़कर दूसरे किसी रथीका सामना करनेके लिये चला गया ॥ ११ ॥
दृष्ट्वा शारद्वतं पार्थो मूर्च्छितं शरपीडितम् ।
रथ एव महेष्वासः सकृपं पर्यदेवयत् ॥ १२ ॥
अश्रुपूर्णमुखो दीनो वचनं चेदमब्रवीत् ।
कृपाचार्यको बाणोंसे पीड़ित एवं मूर्च्छित देखकर महाधनुर्धर कुन्तीकुमार अर्जुन दयावश रथपर बैठे-बैठे ही विलाप करने लगे। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। वे दीनभावसे इस प्रकार कहने लगे— ॥
पश्यन्निदं महाप्राज्ञः क्षत्ता राजानमुक्तवान् ॥ १३ ॥
कुलान्तकरणे पापे जातमात्रे सुयोधने ।
नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसनः ॥ १४ ॥
अस्माद्धि कुरुमुख्यानां महदुत्पत्स्यते भयम् ।
‘जिस समय कुलान्तकारी पापी दुर्योधनका जन्म हुआ था, उस समय महाज्ञानी विदुरजीने यही सब विनाशकारी परिणाम देखकर राजा धृतराष्ट्रसे कहा था कि ‘इस कुलांगार बालकको परलोक भेज दिया जाय, यही अच्छा होगा; क्योंकि इससे प्रधान-प्रधान कुरुवंशियोंको महान् भय उत्पन्न होगा’ ॥ १३-१४ १/२ ॥
तदिदं समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः ॥ १५ ॥
तत्कृते ह्यद्य पश्यामि शरतल्पगतं गुरुम् ।
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलपौरुषम् ॥ १६ ॥
‘सत्यवादी विदुरजीका वह कथन आज सत्य हो रहा है। दुर्योधनके ही कारण आज मैं अपने गुरुको शर-शय्यापर पड़ा देखता हूँ। क्षत्रियके आचार, बल और पुरुषार्थको धिक्कार है! धिक्कार है ॥ १५-१६ ॥
को हि ब्राह्मणमाचार्यमभिद्रुह्येत मादृशः । ऋषिपुत्रो ममाचार्यो द्रोणस्य परमः सखा ॥ १७ ॥ एष शेते रथोपस्थे कृपो मद्बाणपीडितः । 'मेरे-जैसा कौन पुरुष ब्राह्मण एवं आचार्यसे द्रोह करेगा? ये ऋषिकुमार, मेरे आचार्य तथा गुरुवर द्रोणाचार्यके परम सखा कृप मेरे बाणोंसे पीड़ित हो रथकी बैठकमें पड़े हैं ॥ १७ १/२ ॥' अकामयानेन मया विशिखैरर्दितो भृशम् ॥ १८ ॥ अवसीदन् रथोपस्थे प्राणान् पीडयतीव मे । 'मैंने इच्छा न रहते हुए भी उन्हें बाणोंद्वारा अधिक चोट पहुँचायी है। वे रथकी बैठकमें पड़े-पड़े कष्ट पा रहे हैं और मुझे अत्यन्त पीड़ित-सा कर रहे हैं ॥ १८ १/२ ॥' पुत्रशोकाभितप्तेन शरैरभ्यर्दितेन च ॥ १९ ॥ अभ्यस्तो बहुभिर्बाणैर्दशधर्मगतेन वै । 'मैंने पुत्रशोकसे संतप्त, बाणोंद्वारा पीड़ित तथा भारी दुरवस्थाको प्राप्त होकर बहुसंख्यक बाणोंद्वारा उन्हें अनेक बार चोट पहुँचायी है ॥ १९ १/२ ॥' शोचयत्येष नियतं भूयः पुत्रवधाद्धि माम् ॥ २० ॥ कृपणं स्वरथे सन्नं पश्य कृष्ण यथागतम् । 'निश्चय ही ये कृपाचार्य आहत होकर मुझे पुत्रवधकी अपेक्षा भी अधिक शोकमें डाल रहे हैं। श्रीकृष्ण! देखिये, वे अपने रथपर कैसे सन्न और दीन होकर पड़े हैं ॥ २० १/२ ॥' उपाकृत्य तु वै विद्यामाचार्येभ्यो नरर्षभाः ॥ २१ ॥ प्रयच्छन्तीह ये कामान् देवत्वमुपयान्ति ते । 'आचार्योंसे विद्या ग्रहण करके जो श्रेष्ठ पुरुष उन्हें उनकी अभीष्ट वस्तुएँ देते हैं, वे देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥ २१ १/२ ॥' ये च विद्यामुपादाय गुरुभ्यः पुरुषाधमाः ॥ २२ ॥ घ्नन्ति तानेव दुर्वृत्तास्ते वै निरयगामिनः । 'गुरुसे विद्या ग्रहण करके जो नराधम उनपर ही चोट करते हैं, वे दुराचारी मानव निश्चय ही नरकगामी होते हैं ॥ २२ १/२ ॥' तदिदं नरकायाद्य कृतं कर्म मया ध्रुवम् ॥ २३ ॥ आचार्यं शरवर्षेण रथे सादयता कृपम् । 'मैंने आचार्य कृपको अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा रथपर सुला दिया है। निश्चय ही यह कर्म मैंने आज नरकमें जानेके लिये ही किया है ॥ २३ १/२ ॥' यत् तत् पूर्वमुपाकुर्वन्नस्त्रं मामब्रवीत् कृपः ॥ २४ ॥ न कथंचन कौरव्य प्रहर्तव्यं गुराविति ।
'पूर्वकालमें मुझे अस्त्रविद्याकी शिक्षा देकर कृपाचार्यने जो मुझसे यह कहा था कि ‘कुरुनन्दन! तुम्हें गुरुके ऊपर किसी प्रकार भी प्रहार नहीं करना चाहिये’ ॥ २४ १/२ ॥ तदिदं वचनं साधोराचार्यस्य महात्मनः ॥ २५ ॥ नानुष्ठितं तमेवाजौ विशिखैरभिवर्षता । 'उन श्रेष्ठ महात्मा आचार्यका यह वचन युद्धस्थलमें उन्हींपर बाणोंकी वर्षा करके मैंने नहीं माना है ॥ २५ १/२ ॥ नमस्तस्मै सुपूज्याय गौतमायापलायिने ॥ २६ ॥ धिगस्तु मम वार्ष्णेय यदस्मै प्रहराम्यहम् । 'वार्ष्णेय! युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले उन परम पूजनीय गौतमवंशी कृपाचार्यको मेरा नमस्कार है। मैं जो उनपर प्रहार करता हूँ, इसके लिये मुझे धिक्कार है' ॥ तथा विलपमाने तु सव्यसाचिनि तं प्रति ॥ २७ ॥ सैन्धवं निहतं दृष्ट्वा राधेयः समुपाद्रवत् । सव्यसाची अर्जुन कृपाचार्यके लिये विलाप कर ही रहे थे कि सिंधुराजको मारा गया देख राधानन्दन कर्णने उनपर धावा कर दिया ॥ २७ १/२ ॥ तमापतन्तं राधेयमर्जुनस्य रथं प्रति ॥ २८ ॥ पाञ्चाल्यौ सात्यकिश्चैव सहसा समुपाद्रवन् । राधापुत्र कर्णको अर्जुनके रथकी ओर आते देख दोनों भाई पांचालराजकुमार (युधामन्यु और उत्तमौजा) तथा सात्वतवंशी सात्यकि सहसा उसकी ओर दौड़े ॥ २८ १/२ ॥ उपायान्तं तु राधेयं दृष्ट्वा पार्थो महारथः ॥ २९ ॥ प्रहसन् देवकीपुत्रमिदं वचनमब्रवीत् । राधापुत्रको अपने समीप आते देख महारथी कुन्तीकुमार अर्जुनने देवकीनन्दन श्रीकृष्णसे हँसते हुए कहा— ॥ २९ १/२ ॥ एष प्रयात्याधिरथिः सात्यकेः स्यन्दनं प्रति ॥ ३० ॥ न मृष्यति हतं नूनं भूरिश्रवसमाहवे । 'यह अधिरथपुत्र कर्ण सात्यकिके रथकी ओर जा रहा है। अवश्य ही युद्धस्थलमें भूरिश्रवाका मारा जाना इसके लिये असह्य हो उठा है ॥ ३० १/२ ॥ यत्र यात्येष तत्र त्वं चोदयाश्वान् जनार्दन ॥ ३१ ॥ न सौमदत्तिपदवीं गमयेत् सात्यकिं वृषः । 'जनार्दन! यह जहाँ जाता है, वहीं आप भी अपने घोड़ोंको हाँकिये। कहीं ऐसा न हो कि कर्ण सात्यकिको भूरिश्रवाके पथपर पहुँचा दे' ॥ ३१ १/२ ॥ एवमुक्तो महाबाहुः केशवः सव्यसाचिना ॥ ३२ ॥ प्रत्युवाच महातेजाः कालयुक्तमिदं वचः ।
सव्यसाची अर्जुनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी महाबाहु केशवने उनसे यह समयोचित वचन कहा— ।।
अलमेष महाबाहुः कर्णायैकोऽपि पाण्डव ।। ३३ ।।
किं पुनद्र्रौपदेयाभ्यां सहितः सात्वतर्षभः ।
‘पाण्डुनन्दन! यह महाबाहु सात्वतशिरोमणि सात्यकि अकेला भी कर्णके लिये पर्याप्त है। फिर इस समय जब द्रुपदके दोनों पुत्र इसके साथ हैं, तब तो कहना ही क्या है ।। ३३ १/२ ।।
न च तावत् क्षमः पार्थ तव कर्णेन सङ्गरः ।। ३४ ।।
प्रज्वलन्ती महोल्केव तिष्ठत्यस्य हि वासवी ।
‘कुन्तीकुमार! इस समय कर्णके साथ तुम्हारा युद्ध होना ठीक नहीं है; क्योंकि उसके पास बड़ी भारी उल्काके समान प्रज्वलित होनेवाली इन्द्रकी दी हुई शक्ति है ।। ३४ १/२ ।।
त्वदर्थं पूज्यमानैषा रक्ष्यते परवीरहन् ।। ३५ ।।
अतः कर्णः प्रयात्वत्र सात्वतस्य यथातथा ।
‘शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुन! तुम्हारे लिये कर्ण उसकी प्रतिदिन पूजा करते हुए उसे सदा सुरक्षित रखता है; अतः कर्ण सात्यकिके पास जैसे-तैसे जाय और युद्ध करे ।। ३५ १/२ ।।
अहं ज्ञास्यामि कौन्तेय कालमस्य दुरात्मनः ।
यत्रैनं विशिखैस्तीक्ष्णैः पातयिष्यसि भूतले ।। ३६ ।।
‘कुन्तीकुमार! मैं उस दुरात्माका अन्तकाल जानता हूँ, जब कि तुम अपने तीखे बाणोंद्वारा उसे पृथ्वीपर मार गिराओगे’ ।। ३६ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
योऽसौ कर्णेन वीरस्य वार्ष्णेयस्य समागमः ।
हते तु भूरिश्रवसि सैन्धवे च निपातिते ।। ३७ ।।
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! भूरिश्रवाके मारे जाने और सिंधुराजके धराशायी किये जानेपर कर्णके साथ वीरवर सात्यकिका जो संग्राम हुआ, वह कैसा था? ।। ३७ ।।
सात्यकिश्चापि विरथः कं समारूढवान् रथम् ।
चक्ररक्षौ च पाञ्चाल्यौ तन्ममाचक्ष्व संजय ।। ३८ ।।
संजय! सात्यकि भी तो रथहीन हो चुके थे। वे किस रथपर आरूढ़ हुए तथा चक्ररक्षक युधामन्यु और उत्तमौजा इन दोनों पांचाल वीरोंने किसके साथ युद्ध किया? यह सब मुझे बताओ ।। ३८ ।।
संजय उवाच
हन्त ते वर्तयिष्यामि यथा वृत्तं महारणे ।
शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा दुराचरितमात्मनः ॥ ३९ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! मैं बड़े खेदके साथ उस महासमरमें घटित हुई घटनाओंका आपके समक्ष वर्णन करूँगा। आप स्थिर होकर अपने दुराचारका परिणाम सुनें ॥ पूर्वमेव हि कृष्णस्य मनोगतमिदं प्रभो । विजेतव्यो यथा वीरः सात्यकिः सौमदत्तिना ॥ ४० ॥ प्रभो! भगवान् श्रीकृष्णके मनमें पहले ही यह बात आ गयी थी कि आज वीर सात्यकिको सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा परास्त कर देगा ॥ ४० ॥ अतीतानागते राजन् स हि वेत्ति जनार्दनः । ततः सूतं समाहूय दारुकं संदिदेश ह ॥ ४१ ॥ रथो मे युज्यतां कल्पमिति राजन् महाबलः । न हि देवा न गन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ॥ ४२ ॥ मानवा वापि जेतारः कृष्णयोः सन्ति केचन । राजन्! वे जनार्दन भूत और भविष्य दोनों कालोंको जानते हैं। इसीलिये उन्होंने अपने सारथि दारुकको बुलाकर पहले ही दिन यह आज्ञा दे दी थी कि कल सबेरेसे ही मेरा रथ जोतकर तैयार रखना। महाराज! श्रीकृष्णका बल महान् है। श्रीकृष्ण और अर्जुनको परास्त करनेवाले न तो कोई देवता हैं, न गन्धर्व हैं, न यक्ष, नाग तथा राक्षस हैं और न मनुष्य ही हैं ॥ ४१-४२ १/२ ॥ पितामहपुरोगाश्च देवाः सिद्धाश्च तं विदुः ॥ ४३ ॥ तयोः प्रभावमतुलं शृणु युद्धं तु तत् तथा । उन्हें ब्रह्मा आदि देवता और सिद्ध पुरुष ही यथार्थ रूपसे जान पाते हैं। उन दोनोंके प्रभावकी कहीं तुलना नहीं है। अच्छा, अब युद्धका वृत्तान्त सुनिये ॥ ४३ १/२ ॥ सात्यकिं विरथं दृष्ट्वा कर्णं चाभ्युद्यतं रणे ॥ ४४ ॥ दध्मौ शङ्खं महानादमार्षभेणाथ माधवः । सात्यकिको रथहीन और कर्णको युद्धके लिये उद्यत देख भगवान् श्रीकृष्णने बड़े जोरकी ध्वनि करनेवाले शंखको ऋषभस्वरसे बजाया ॥ ४४ १/२ ॥ दारुकोऽवेत्य संदेशं श्रुत्वा शङ्खस्य च स्वनम् ॥ ४५ ॥ रथमन्वानयत् तस्मै सुपर्णोच्छ्रितकेतनम् । दारुकने उस शंखध्वनिको सुनकर भगवान्के संदेशको स्मरण करके तुरंत ही उनके लिये अपना रथ ला दिया, जिसपर गरुड़चिह्नसे युक्त ऊँची ध्वजा फहरा रही थी ॥ ४५ १/२ ॥ स केशवस्यानुमते रथं दारुकसंयुतम् ॥ ४६ ॥ आरुरोह शिनेः पौत्रो ज्वलनादित्यसंनिभम् ।
भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमति पाकर शिनिपौत्र सात्यकि दारुकद्वारा जोते हुए अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी उस रथपर आरूढ़ हुए ।। ४६ १/२ ।।
कामगैः शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः ।। ४७ ।। हयोद्ग्रैर्महावेगैर्हेमभाण्डविभूषितैः । युक्तं समारुह्य च तं विमानप्रतिमं रथम् ।। ४८ ।। अभ्यद्रवत राधेयं प्रवपन् सायकान् बहून् ।
उसमें इच्छानुसार चलनेवाले महान् वेगशाली और सुवर्णमय अलंकारोंसे विभूषित शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले श्रेष्ठ अश्व जुते हुए थे। वह रथ विमानके समान जान पड़ता था। उसपर आरूढ़ होकर बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए सात्यकिने राधापुत्र कर्णपर धावा किया ।। ४७-४८ १/२ ।।
चक्ररक्षावपि तदा युधामन्यूत्तमौजसौ ।। ४९ ।। धनंजयरथं हित्वा राधेयं प्रत्युदीयतुः ।
उस समय चक्ररक्षक युधामन्यु और उत्तमौजाने भी धनंजयका रथ छोड़कर कर्णपर ही आक्रमण किया ।। ४९ १/२ ।।
राधेयोऽपि महाराज शरवर्षं समुत्सृजन् ।। ५० ।। अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धो रणे शैनेयमच्युतम् ।
महाराज! अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए कर्णने भी उस युद्धस्थलमें अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले सात्यकिपर बाणोंकी वर्षा करते हुए धावा किया ।। ५० १/२ ।।
नैव दैवं न गान्धर्वं नासुरं न च राक्षसम् ।। ५१ ।। तादृशं भुवि नो युद्धं दिवि वा श्रुतमित्युत ।
राजन्! मैंने इस पृथ्वीपर या स्वर्गमें देवताओं, गन्धर्वों, असुरों तथा राक्षसोंका भी वैसा युद्ध नहीं सुना था ।। ५१ १/२ ।।
उपारमत तत् सैन्यं सरथाश्वनरद्विपम् ।। ५२ ।। तयोर्दृष्ट्वा महाराज कर्म सम्मूढचेतसः । सर्वे च समपश्यन्त तद् युद्धमतिमानुषम् ।। ५३ ।। तयोर्नृवरयो राजन् सारथ्यं दारुकस्य च ।
महाराज! उन दोनोंका वह संग्राम देखकर सबके चित्तमें मोह छा गया। राजन्! सभी दर्शकके समान उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंके उस अतिमानव युद्धको और दारुकके सारथ्य कर्मको देखने लगे। हाथी, घोड़े, रथ और मनुष्योंसे युक्त वह चतुरंगिणी सेना भी युद्धसे उपरत हो गयी थी ।। ५२-५३ १/२ ।।
गतप्रत्यागतावृत्तैर्मण्डलैः संनिवर्तनैः ।। ५४ ।। सारथेस्तु रथस्थस्य काश्यपेयस्य विस्मिताः ।
नभस्तलगताश्चैव देवगन्धर्वदानवाः ॥ ५५ ॥
अतीवावहिता द्रष्टुं कर्णशैनेययो रणम् ।
मित्रार्थे तौ पराक्रान्तौ शुष्मिणौ स्पर्धिनौ रणे ॥ ५६ ॥
रथपर बैठे हुए कश्यपगोत्रीय सारथि दारुकके रथ-संचालनकी गमन, प्रत्यागमन, आवर्तन, मण्डल तथा संनिवर्तन आदि विविध रीतियोंसे आकाशमें खड़े हुए देवता, गन्धर्व और दानव भी चकित हो उठे तथा कर्ण और सात्यकिके युद्धको देखनेके लिये अत्यन्त सावधान हो गये। वे दोनों बलवान् वीर रणभूमिमें एक-दूसरेसे स्पर्धा रखते हुए अपने-अपने मित्रके लिये पराक्रम दिखा रहे थे ॥ ५४-५६ ॥
कर्णश्चामरसङ्काशो युयुधानश्च सात्यकिः ।
अन्योन्यं तौ महाराज शरवर्षैरवर्षताम् ॥ ५७ ॥
महाराज! देवताओंके समान तेजस्वी कर्ण तथा सत्यकपुत्र युयुधान दोनों एक-दूसरेपर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ५७ ॥
प्रममाथ शिनेः पौत्रं कर्णः सायकवृष्टिभिः ।
अमृष्यमाणो निधनं कौरव्यजलसंधयोः ॥ ५८ ॥
कर्णने भूरिश्रवा और जलसंधके वधको सहन न करनेके कारण अपने बाणोंकी वर्षासे शिनिपौत्र सात्यकिको मथ डाला ॥ ५८ ॥
कर्णः शोकसमाविष्टो महोरग इव श्वसन् ।
स शैनेयं रणे क्रुद्धः प्रदहन्निव चक्षुषा ॥ ५९ ॥
अभ्यधावत वेगेन पुनः पुनररिंदम ।
शत्रुदमन नरेश! कर्ण उन दोनोंकी मृत्युसे शोकमग्न हो फुफकारते हुए महान् सर्पकी भाँति लंबी साँसें खींच रहा था। वह युद्धमें क्रुद्ध हो अपने नेत्रोंसे सात्यकिकी ओर इस प्रकार देख रहा था, मानो वह उन्हें जलाकर भस्म कर देगा। उसने बारंबार वेगपूर्वक सात्यकिपर धावा किया ॥ ५९ १/२ ॥
तं तु सक्रोधमालोक्य सात्यकिः प्रत्ययुध्यत ॥ ६० ॥
महता शरवर्षेण गजं प्रति गजो यथा ।
कर्णको कुपित देख सात्यकि बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करते हुए उसका सामना करने लगे, मानो एक हाथी दूसरे हाथीसे लड़ रहा हो ॥ ६० १/२ ॥
तौ समेतौ नरव्याघ्रौ व्याघ्राविव तरस्विनौ ॥ ६१ ॥
अन्योन्यं संततक्षाते रणेऽनुपमविक्रमौ ।
वेगशाली व्याघ्रोंके समान परस्पर भिड़े हुए वे दोनों पुरुषसिंह युद्धमें अनुपम पराक्रम दिखाते हुए एक-दूसरेको क्षत-विक्षत कर रहे थे ॥ ६१ १/२ ॥
ततः कर्ण शिनेः पौत्रः सर्वपारसवैः शरैः ॥ ६२ ॥
बिभेद सर्वगात्रेषु पुनः पुनररिंदम ।
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ ६३ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! तदनन्तर शिनिपौत्र सात्यकिने सम्पूर्णतः लोहमय बाणोंद्वारा कर्णको उसके सारे अंगोंमें बारंबार चोट पहुँचायी और एक भल्लद्वारा उसके सारथिको रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ६२-६३ ॥
अश्वांश्च चतुरः श्वेतान् निजघान शितैः शरैः ।
छित्त्वा ध्वजं रथं चैव शतधा पुरुषर्षभ ॥ ६४ ॥
चकार विरथं कर्णं तव पुत्रस्य पश्यतः ।
नरश्रेष्ठ! इसके बाद सात्यकिने तीखे बाणोंद्वारा कर्णके चारों श्वेत घोड़ोंको मार डाला और उसके ध्वजको काटकर रथके सैकड़ों टुकड़े करके आपके पुत्रके देखते-देखते कर्णको रथहीन कर दिया ॥ ६४ १/२ ॥
ततो विमनसो राजंस्तावकास्ते महारथाः ॥ ६५ ॥
वृषसेनः कर्णसुतः शल्यो मद्राधिपस्तथा ।
द्रोणपुत्रश्च शैनेयं सर्वतः पर्यवारयन् ॥ ६६ ॥
राजन्! इससे खिन्नचित्त होकर आपके महारथी वीर कर्णपुत्र वृषसेन, मद्रराज शल्य तथा द्रोणकुमार अश्वत्थामाने सात्यकिको सब ओरसे घेर लिया ॥
ततः पर्याकुलं सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ।
तथा सात्यकिना वीरे विरथे सूतजे कृते ॥ ६७ ॥
सात्यकिके द्वारा वीरवर सूतपुत्र कर्णके रथहीन कर दिये जानेपर सारा सैन्यदल सब ओरसे व्याकुल हो उठा। किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता था ॥ ६७ ॥
हाहाकारस्ततो राजन् सर्वसैन्येष्वभून्महान् ।
कर्णोऽपि विरथो राजन् सात्वतेन कृतः शरैः ॥ ६८ ॥
दुर्योधनरथं तूर्णमारुरोह विनिःश्वसन् ।
राजन्! उस समय सारी सेनाओंमें महान् हाहाकार होने लगा। महाराज! सात्यकिके बाणोंसे रथहीन किया गया कर्ण भी लंबी साँस खींचता हुआ तुरंत ही दुर्योधनके रथपर जा बैठा ॥ ६८ १/२ ॥
मानयंस्तव पुत्रस्य बाल्यात् प्रभृति सौहृदम् ॥ ६९ ॥
कृतां राज्यप्रदानेन प्रतिज्ञां परिपालयन् ।
बचपनसे लेकर सदा ही किये हुए आपके पुत्रके सौहार्दका वह समादर करता था और दुर्योधनको राज्य दिलानेकी जो उसने प्रतिज्ञा कर रखी थी, उसके पालनमें वह तत्पर था ॥ ६९ १/२ ॥
तथा तु विरथं कर्णं पुत्रांश्च तव पार्थिव ॥ ७० ॥
दुःशासनमुखान् वीरान् नावधीत् सात्यकिर्वशी ।
रक्षन् प्रतिज्ञां भीमेन पार्थेन च पुराकृताम् ॥ ७१ ॥
राजन्! अपने मनको वशमें करनेवाले सात्यकिने रथहीन हुए कर्णको तथा दुःशासन आदि आपके वीर पुत्रोंको भी उस समय इसलिये नहीं मारा कि वे भीमसेन और अर्जुनकी पहलेसे की हुई प्रतिज्ञाकी रक्षा कर रहे थे ॥ ७०-७१ ॥
विरथान् विह्वलांश्चक्रे न तु प्राणैर्व्ययोजयत् ।
भीमसेनेन तु वधः पुत्राणां ते प्रतिश्रुतः ॥ ७२ ॥
अनुद्यूते च पार्थेन वधः कर्णस्य संश्रुतः ।
उन्होंने उन सबको रथहीन और अत्यन्त व्याकुल तो कर दिया, परंतु उनके प्राण नहीं लिये। जब दोबारा द्यूत हुआ था, उस समय भीमसेनेने आपके पुत्रोंके वधकी प्रतिज्ञा की थी और अर्जुनने कर्णको मार डालनेकी घोषणा की थी ॥ ७२½ ॥
वधे त्वकुर्वन् यत्नं ते तस्य कर्णमुखास्तदा ॥ ७३ ॥
नाशक्नुवंस्ततो हन्तुं सात्यकिं प्रवरा रथाः ।
कर्ण आदि श्रेष्ठ महारथियोंने सात्यकिके वधके लिये पूरा प्रयत्न किया; परंतु वे उन्हें मार न सके ॥ ७३½ ॥
द्रौणिश्च कृतवर्मा च तथैवान्ये महारथाः ॥ ७४ ॥
निर्जिता धनुषैकेन शतशः क्षत्रियर्षभाः ।
काङ्क्षता परलोकं च धर्मराजस्य च प्रियम् ॥ ७५ ॥
अश्वत्थामा, कृतवर्मा, अन्यान्य महारथी तथा सैकड़ों क्षत्रियशिरोमणि सात्यकिद्वारा एकमात्र धनुषसे परास्त कर दिये गये। सात्यकि धर्मराजका प्रिय करना और परलोकपर विजय पाना चाहते थे ॥ ७४-७५ ॥
कृष्णयोः सदृशो वीर्ये सात्यकिः शत्रुतापनः ।
जितवान् सर्वसैन्यानि तावकानि हसन्निव ॥ ७६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले सात्यकि श्रीकृष्ण और अर्जुनके समान पराक्रमी थे। उन्होंने आपकी सारी सेनाओंको हँसते हुए-से जीत लिया था ॥ ७६ ॥
कृष्णो वापि भवेल्लोके पार्थो वापि धनुर्धरः ।
शैनेयो वा नरव्याघ्र चतुर्थस्तु न विद्यते ॥ ७७ ॥
नरव्याघ्र! संसारमें श्रीकृष्ण, कुन्तीकुमार अर्जुन और शिनिपौत्र सात्यकि—ये तीन ही वास्तवमें धनुर्धर हैं। इनके समान चौथा कोई नहीं है ॥ ७७ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
अजय्यं वासुदेवस्य रथमास्थाय सात्यकिः ।
विरथं कृतवान् कर्णं वासुदेवसमो युधि ॥ ७८ ॥
दारुकेण समायुक्तः स्वबाहुबलदर्पितः ।
कच्चिदन्यं समारूढः सात्यकिः शत्रुतापनः ॥ ७९ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! सात्यकि युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णके समान हैं। उन्होंने श्रीकृष्णके ही अजेय रथपर आरूढ़ होकर कर्णको रथहीन कर दिया। उस समय उनके साथ दारुक-जैसा सारथि था और उन्हें अपने बाहुबलका अभिमान तो था ही; परंतु शत्रुओंको संताप देनेवाले सात्यकि क्या किसी दूसरे रथपर भी आरूढ़ हुए थे? ।। ७८-७९ ।। एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कुशलो ह्यसि भाषितुम् । असह्यं तमहं मन्ये तन्ममाचक्ष्व संजय ।। ८० ।। मैं यह सुनना चाहता हूँ। तुम कथा कहनेमें बड़े कुशल हो। मैं तो सात्यकिको किसीके लिये भी असह्य मानता हूँ, अतः संजय! तुम मुझसे सारी बातें स्पष्ट रूपसे बताओ ।। ८० ।।
संजय उवाच
शृणु राजन् यथावृत्तं रथमम्यं महामतिः । दारुकस्यानुजस्तूर्णं कल्पनाविधिकल्पितम् ।। ८१ ।। **संजयने कहा—**राजन्! सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनिये। दारुकका एक छोटा भाई था, जो बड़ा बुद्धिमान् था। वह तुरंत ही रथ सजानेकी विधिसे सुसज्जित किया हुआ एक दूसरा रथ ले आया ।। ८१ ।। आयसैः काञ्चनैश्चापि पट्टैः संनद्धकूबरम् । तारासहस्रखचितं सिंहध्वजपताकिनम् ।। ८२ ।। लोहे और सोनेके पट्टोंसे उसका कूबर अच्छी तरह कसा हुआ था। उसमें सहस्रों तारे जड़े गये थे। उसकी ध्वजा-पताकाओंमें सिंहका चिह्न बना हुआ था ।। ८२ ।। अश्वैर्वातजवैर्युक्तं हेमभाण्डपरिच्छदैः । सैन्धवैरिन्दुसंकाशैः सर्वशब्दातिगैर्दृढैः ।। ८३ ।। उस रथमें सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित, वायुके समान वेगशाली, सम्पूर्ण शब्दोंको लाँघ जानेवाले, सुदृढ़ तथा चन्द्रमाके समान श्वेतवर्ण सिन्धी घोड़े जुते हुए थे ।। ८३ ।। चित्रकाञ्चनसंनाहैर्वाजिमुख्यैर्विशाम्पते । घण्टाजालाकुलरवं शक्तितोमरविद्युतम् ।। ८४ ।। प्रजानाथ! उन घोड़ोंको विचित्र स्वर्णमय कवचोंसे सुसज्जित किया गया था। वे सभी अश्व अच्छी श्रेणीके थे। उनसे जुते हुए उस रथमें क्षुद्र घंटिकाओंके समूहसे निकलती हुई मधुर ध्वनि व्याप्त हो रही थी। वहाँ रखे हुए शक्ति और तोमर आदि शस्त्र विद्युत्के समान प्रकाशित होते थे ।। ८४ ।। युक्तं सांग्रामिकैर्द्रव्यैर्बहुशस्त्रपरिच्छदैः । रथं सम्पादयामास मेघगम्भीरनिःस्वनम् ।। ८५ ।।
उसमें बहुत-से अस्त्र-शस्त्र आदि युद्धोपयोगी आवश्यक सामान एवं द्रव्य यथास्थान रखे गये थे। उस रथके चलनेपर मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द होता था। दारुकका छोटा भाई उस रथको सात्यकिके पास ले आया॥ ८५॥
तं समारुह्य शैनेयस्तव सैन्यमुपाद्रवत्।
दारुकोऽपि यथाकामं प्रययौ केशवान्तिकम्॥ ८६॥
सात्यकिने उसीपर आरूढ़ होकर आपकी सेनापर आक्रमण किया। दारुक भी इच्छानुसार भगवान् श्रीकृष्णके निकट चला गया॥ ८६॥
कर्णस्यापि रथं राजन् शंखगोक्षीरपाण्डुरैः।
चित्रकाञ्चनसंनाहैः सदश्वैर्वेगवत्तरैः॥ ८७॥
राजन्! कर्णके लिये भी एक सुन्दर रथ लाया गया, जिसमें शंख और गोदुग्धके समान श्वेतवर्णवाले, विचित्र सुवर्णमय कवचसे सुसज्जित और अत्यन्त वेगशाली श्रेष्ठ अश्व जुते हुए थे॥ ८७॥
हेमकक्ष्याध्वजोपेतं कॢप्तयन्त्रपताकिनम्।
अग्र्यं रथं सुयन्तारं बहुशस्त्रपरिच्छदम्॥ ८८॥
उसमें सुवर्णमयी रज्जुसे आवेष्टित ध्वजा फहरा रही थी। वह रथ यन्त्र और पताकाओंसे सुशोभित था। उसके भीतर बहुत-से अस्त्र-शस्त्र आदि आवश्यक सामान रखे गये थे। उस श्रेष्ठ रथका सारथि भी सुयोग्य था॥ ८८॥
उपाजहुस्तमास्थाय कर्णोऽप्यभ्यद्रवद् रिपून्।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ८९॥
दुर्योधनके सेवक वह रथ लेकर आये और कर्णने उसके ऊपर आरूढ़ होकर शत्रुओंपर धावा किया। राजन्! आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, वह सब मैंने आपको बता दिया॥ ८९॥
भूयश्चापि निबोधेमं तवापनयजं क्षयम्।
एकत्रिंशत् तव सुता भीमसेनेन पातिताः॥ ९०॥
दुर्मुखं प्रमुखे कृत्वा सततं चित्रयोधिनम्।
अब पुनः आपके ही अन्यायसे होनेवाले इस महान् जनसंहारका वृत्तान्त सुनिये। भीमसेनने अबतक सदा विचित्र युद्ध करनेवाले दुर्मुख आदि आपके इकतीस पुत्रोंको मार गिराया है॥ ९० १/२॥
शतशो निहताः शूराः सात्वतेनार्जुनेन च॥ ९१॥
भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा भगदत्तं च भारत।
एवमेष क्षयो वृत्तो राजन् दुर्मन्त्रिते तव॥ ९२॥
भारत! इसी प्रकार सात्यकि और अर्जुनने भी भीष्म और भगदत्त आदि सैकड़ों शूरवीरोंका संहार कर डाला है। राजन्! इस प्रकार आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप यह
विनाश-कार्य सम्पन्न हुआ है ॥ ९१-९२ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि कर्णसात्यकियुद्धे सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें कर्ण और सात्यकिका युद्धविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४७ ॥
१४८-
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनका कर्णको फटकारना और वृषसेनके वधकी प्रतिज्ञा करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको बधाई देकर उन्हें रणभूमिका भयानक दृश्य दिखाते हुए युधिष्ठिरके पास ले जाना
धृतराष्ट्र उवाच
तथा गतेषु शूरेषु तेषां मम च संजय ।
किं वै भीमस्तदाकार्षीत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब पाण्डवपक्षके और मेरे शूरवीर सैनिक पूर्वोक्तरूपसे युद्धके लिये उद्यत हो गये, तब भीमसेनने क्या किया? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥
संजय उवाच
विरथो भीमसेनो वै कर्णवाक्शल्यपीडितः ।
अमर्षवशमापन्नः फाल्गुनं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! रथहीन भीमसेन कर्णके वाग्बाणोंसे पीड़ित हो अमर्षके वशीभूत हो गये थे। वे अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥
पुनः पुनस्तूबरक मूढ औदरिकेति च ।
अकृतास्त्रक मा योत्सीर्बाल संग्रामकातर ॥ ३ ॥
इति मामब्रवीत् कर्णः पश्यतस्ते धनंजय ।
एवं वक्ता च मे वध्यस्तेन चोक्तोऽस्मि भारत ॥ ४ ॥
‘धनंजय! कर्णने तुम्हारे सामने ही मुझसे बारंबार कहा है कि ‘अरे! तू निमूंछिया, मूर्ख, पेटू, अस्त्रविद्याको न जाननेवाला, बालक और संग्रामभीरु है; अतः युद्ध न कर।' भारत! जो ऐसा कह दे, वह मेरा वध्य होता है। उसने मुझे ऐसा कह दिया ॥ ३-४ ॥
एतद् व्रतं महाबाहो त्वया सह कृतं मया ।
तथैतन्मम कौन्तेय यथा तव न संशयः ॥ ५ ॥
‘महाबाहु कुन्तीकुमार! ऐसा कहनेवालेके वधकी यह प्रतिज्ञा मैंने तुम्हारे साथ ही की थी। यह कर्णका वध जैसे मेरा कार्य है, वैसे ही तुम्हारा भी है, इसमें संशय नहीं है ॥
तद्वधाय नरश्रेष्ठ स्मरैतद् वचनं मम ।
यथा भवति तत् सत्यं तथा कुरु धनंजय ॥ ६ ॥
‘नरश्रेष्ठ! कर्णके वधके लिये तुम मेरे इस कथनपर भी ध्यान दो। धनंजय! जैसे भी मेरी वह प्रतिज्ञा सत्य हो सके, वैसा प्रयत्न करो' ॥ ६ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य भीमस्यामितविक्रमः ।
ततोऽर्जुनोऽब्रवीत् कर्णं किंचिदभ्येत्य संयुगे ॥ ७ ॥
भीमसेनका यह वचन सुनकर अमित पराक्रमी अर्जुन युद्धस्थलमें कर्णके कुछ निकट जाकर उससे इस प्रकार बोले— ॥ ७ ॥
कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्रात्मसंस्तुत ।
अधर्मबुद्धे शृणु मे यत् त्वां वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ ८ ॥
'कर्ण! कर्ण! तेरी दृष्टि मिथ्या है। सूतपुत्र! तू स्वयं ही अपनी प्रशंसा करता है। अधर्मबुद्धे! मैं इस समय तुझसे जो कुछ कहता हूँ, उसे सुन ॥ ८ ॥
द्विविधं कर्म शूराणां युद्धे जयपराजयौ ।
तौ चाप्यनित्यौ राधेय वासवस्यापि युध्यतः ॥ ९ ॥
'राधानन्दन! युद्धमें शूरवीरोंके दो प्रकारके कर्म (परिणाम) देखे जाते हैं—जय और पराजय। यदि इन्द्र भी युद्ध करें तो उनके लिये भी वे दोनों परिणाम अनिश्चित हैं (अर्थात् यह निश्चित नहीं कि कब किसकी विजय होगी और कब किसकी पराजय) ॥ ९ ॥
(रणमुत्सृज्य निर्लज्ज गच्छसे वै पुनः पुनः ।
माहात्म्यं पश्य भीमस्य कर्ण जन्म कुले तथा ॥
नोक्तवान् परुषं यत् त्वां पलायनपरायणम् ।
'ओ निर्लज्ज कर्ण! तू बार-बार युद्ध छोड़कर भाग जाता है, तो भी तुझ भागते हुएके प्रति भीमसेनने कोई कटु वचन नहीं कहा। भीमसेनके इस माहात्म्यको और उनके उत्तम कुलमें जन्म लेनेके कारण प्राप्त हुए अच्छे शील-स्वभावको प्रत्यक्ष देख ले।
भूयस्त्वमपि सङ्गम्य सकृदेव यदृच्छया ॥
विरथं कृतवान् वीरं पाण्डवं सूतदायद ।
कुलस्य सदृशं चापि राधेय कृतवानसि ॥
'सूतपुत्र! फिर तूने भी पुनः युद्ध करके केवल एक ही बार दैवेच्छासे पाण्डुपुत्र वीरवर भीमसेनको रथहीन किया है। राधापुत्र! तूने भीमको कटुवचन सुनाकर अपने कुलके अनुरूप कार्य किया है।
त्वमिदानीं नरश्रेष्ठ प्रस्तुतं नावबुध्यसे ।
शृगाल इव वन्यान् वै क्षत्रं त्वमवमन्यसे ॥
पित्र्यं कर्मास्य संग्रामस्तव तस्य कुलोचितम् ।
'नरश्रेष्ठ! इस समय जो संकट तेरे सामने प्रस्तुत है, उसे तू नहीं जानता है। जैसे सियार जंगली व्याघ्र आदि जन्तुओंकी अवहेलना करे, उसी प्रकार तू भी क्षत्रियसमाजका अपमान कर रहा है। संग्राम भीमसेनका तो पैतृक कर्म है और तेरा काम तेरे कुलके अनुरूप रथ हाँकना है।
अहं त्वामपि राधेय ब्रवीमि रणमूर्धनि ॥
सर्वशस्त्रभृतां मध्ये कुरु कार्याणि सर्वशः ।
नैकान्तसिद्धिः संग्रामे वासवस्यापि विद्यते ॥) ‘राधापुत्र! मैं इस युद्धके मुहानेपर सम्पूर्ण शस्त्रधारी योद्धाओंके बीचमें तुझसे कहे देता हूँ, तू अपने सारे कार्य सब प्रकारसे पूर्ण कर ले। संग्राममें इन्द्रको भी एकान्ततः सिद्धि नहीं प्राप्त होती।
मुमूर्षुयुर्युधानेन विरथो विकलेन्द्रियः । मद्वध्यस्त्वमिति ज्ञात्वा जित्वा जीवन् विसर्जितः ॥ १० ॥ ‘सात्यकिने तुझे रथहीन करके मृत्युके निकट पहुँचा दिया था। तेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी थीं, तो भी ‘तू मेरा वध्य है’ यह जानकर उन्होंने तुझे जीतकर भी जीवित छोड़ दिया ॥ १० ॥
यदृच्छया रणे भीमं युध्यमानं महाबलम् । कथंचिद् विरथं कृत्वा यत् त्वं रूक्षमभाषथाः ॥ ११ ॥ अधर्मस्त्वेष सुमहाननार्यचरितं च तत् । ‘परंतु तूने रणभूमिमें युद्धपरायण महाबली भीमसेनको दैवेच्छासे किसी प्रकार रथहीन करके जो उनके प्रति कठोर बातें कही थीं, यह तेरा महान् अधर्म है। नीच मनुष्य वैसा कार्य करते हैं ॥ ११ १/२ ॥
नारिं जित्वातिकत्थन्ते न च जल्पन्ति दुर्वचः ॥ १२ ॥ न च कञ्चन निन्दन्ति सन्तः शूरा नरर्षभाः । ‘नरश्रेष्ठ शूरवीर सज्जन शत्रुको जीतकर बढ़-बढ़कर बातें नहीं बनाते, किसीको कटु वचन नहीं कहते और न किसीकी निन्दा ही करते हैं ॥ १२ १/२ ॥
त्वं तु प्राकृतविज्ञानस्तत् तद् वदसि सूतज ॥ १३ ॥ बह्वबद्धमकण्र्यं च चापलादपरीक्षितम् । ‘सूतपुत्र! तेरी बुद्धि बहुत ओछी है। इसीलिये तू चपलतावश बिना जाँचे-बूझे बहुत-सी न सुननेयोग्य असम्बद्ध बातें बक जाया करता है ॥ १३ १/२ ॥
युध्यमानं पराक्रान्तं शूरमार्यव्रते रतम् ॥ १४ ॥ यदवोचोऽप्रियं भीमं नैतत् सत्यं वचस्तव । ‘तूने युद्धमें संलग्न, श्रेष्ठ व्रतके पालनमें तत्पर, पराक्रमी और शूरवीर भीमसेनके प्रति जो अप्रिय वचन कहा है, तेरा यह कथन ठीक नहीं है ॥ १४ १/२ ॥
पश्यतां सर्वसैन्यानां केशवस्य ममैव च ॥ १५ ॥ विरथो भीमसेनेन कृतोऽसि बहुशो रणे । ‘सारी सेनाओंके देखते-देखते मेरे और श्रीकृष्णके सामने युद्धस्थलमें भीमसेनने तुझे अनेक बार रथहीन कर दिया है ॥ १५ १/२ ॥
न च त्वां परुषं किंचिदुक्तवान् पाण्डुनन्दनः ॥ १६ ॥
यस्मात् तु बहु रूक्षं च श्रावितस्ते वृकोदरः ।
परोक्षं यच्च सौभद्रो युष्माभिर्निहतो मम ॥ १७ ॥
तस्मादस्यावलेपस्य सद्यः फलमवाप्नुहि ।
'परंतु उन पाण्डुनन्दन भीमने तुझसे कोई कटु वचन नहीं कहा। तूने जो भीमको बहुत-सी रूखी बातें सुनायी हैं और मेरे परोक्षमें तुमलोगोंने जो मेरे पुत्र सुभद्राकुमार अभिमन्युको अन्यायपूर्वक मार डाला है, अपने उस घमंडका तत्काल ही उचित फल तू प्राप्त कर ले ॥ १६-१७१/२ ॥
त्वया तस्य धनुश्छिन्नमात्मनाशाय दुर्मते ॥ १८ ॥
तस्माद् वध्योऽसि मे मूढ सभृत्यसुतबान्धवः ।
'दुर्मते! मूढ़! तूने अपने विनाशके लिये अभिमन्युका धनुष काट दिया था, अतः मेरे द्वारा भृत्य, पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंसहित प्राणदण्ड पानेयोग्य है ॥ १८१/२ ॥
कुरु त्वं सर्वकृत्यानि महत् ते भयमागतम् ॥ १९ ॥
हन्तास्मि वृषसेनं ते प्रेक्षमाणस्य संयुगे ।
'तू अपने सारे कर्तव्य पूर्ण कर ले। तुझे भारी भय आ पहुँचा है। मैं युद्धस्थलमें तेरे देखते-देखते तेरे पुत्र वृषसेनको मार डालूँगा ॥ १९१/२ ॥
ये चान्येऽप्युपयास्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नृपाः ॥ २० ॥
तांश्च सर्वान् हनिष्यामि सत्येनायुधमालभे ।
'दूसरे भी जो राजा अपनी बुद्धिपर मोह छा जानेके कारण मेरे समीप आ जायँगे, उन सबका संहार कर डालूँगा। इस सत्यको सामने रखकर मैं अपना धनुष छूता (शपथ खाता) हूँ ॥ २०१/२ ॥
त्वां च मूढाकृतप्रज्ञमतिमानिनमाहवे ॥ २१ ॥
दृष्ट्वा दुर्योधनो मन्दो भृशं तप्स्यति पातितम् ।
'ओ मूढ़! तुझ अपवित्र बुद्धिवाले अत्यन्त घमंडी सहायकको युद्धस्थलमें धराशायी हुआ देखकर मूर्ख दुर्योधनको भी बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ २११/२ ॥
अर्जुनेन प्रतिज्ञाते वधे कर्णसुतस्य तु ॥ २२ ॥
महान् सुतुमुलः शब्दो बभूव रथिनां तदा ।
इस प्रकार अर्जुनके द्वारा कर्णपुत्र वृषसेनके वधकी प्रतिज्ञा होनेपर उस समय वहाँ रथियोंका महान् एवं भयंकर कोलाहल छा गया ॥ २२१/२ ॥
तस्मिन्नाकुलसंग्रामे वर्तमाने महाभये ॥ २३ ॥
मन्दरश्मिः सहस्रांशुरस्तं गिरिमुपाद्रवत् ।
उस महाभयानक तुमुल संग्रामके छिड़ जानेपर मन्द किरणोंवाले भगवान् सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये ॥
ततो राजन् हृषीकेशः संग्रामशिरसि स्थितम् ॥ २४ ॥
तीर्णप्रतिज्ञं बीभत्सुं परिष्वज्यैनमब्रवीत् ।
राजन्! तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने प्रतिज्ञासे पार होकर युद्धके मुहानेपर खड़े हुए अर्जुनको हृदयसे लगाकर इस प्रकार कहा— ॥ २४ १/२ ॥
दिष्ट्या सम्पादिता जिष्णो प्रतिज्ञा महती त्वया ॥ २५ ॥
दिष्ट्या विनिहतः पापो वृद्धक्षत्रः सहात्मजः ।
‘विजयशील अर्जुन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने अपनी बड़ी भारी प्रतिज्ञा पूरी कर ली। सौभाग्यसे पापी वृद्धक्षत्र पुत्रसहित मारा गया ॥ २५ १/२ ॥
धार्तराष्ट्रबलं प्राप्य देवसेनापि भारत ॥ २६ ॥
सीदेत समरे जिष्णो नात्र कार्या विचारणा ।
‘भारत! दुर्योधनकी सेनामें पहुँचकर समरभूमिमें देवताओंकी सेना भी शिथिल हो सकती है। जिष्णो! इस विषयमें कोई दूसरा विचार नहीं करना चाहिये ॥ २६ १/२ ॥
न तं पश्यामि लोकेषु चिन्तयन् पुरुषं क्वचित् ॥ २७ ॥
त्वदृते पुरुषव्याघ्र य एतद् योधयेद् बलम् ।
‘पुरुषसिंह! मैं बहुत सोचनेपर भी तीनों लोकोंमें कहीं तुम्हारे सिवा किसी दूसरे पुरुषको ऐसा नहीं देखता, जो इस सेनाके साथ युद्ध कर सके ॥ २७ १/२ ॥
महाप्रभावा बहवस्त्वया तुल्याधिकाऽपि वा ॥ २८ ॥
समेताः पृथिवीपाला धार्तराष्ट्रस्य कारणात् ।
‘धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके लिये बहुत-से महान् प्रभावशाली राजा यहाँ एकत्र हो गये हैं, जिनमेंसे कितने ही तुम्हारे समान या तुमसे भी अधिक बलशाली हैं ॥
ते त्वां प्राप्य रणे क्रुद्धा नाभ्यवर्तन्त दंशितः ॥ २९ ॥
तव वीर्यं बलं चैव रुद्रशक्रान्तकोपमम् ।
‘वे भी रणक्षेत्रमें कवच बाँधकर कुपित हो तुम्हारा सामना करनेके लिये आये, परंतु टिक न सके। तुम्हारा बल और पराक्रम रुद्र, इन्द्र तथा यमराजके समान है ॥
नेदृशं शक्नुयात् कश्चिद् रणे कर्तुं पराक्रमम् ॥ ३० ॥
यादृशं कृतवानद्य त्वमेकः शत्रुतापनः ।
‘युद्धमें कोई भी ऐसा पराक्रम नहीं कर सकता, जैसा कि आज तुमने अकेले ही कर दिखाया है। वास्तवमें तुम शत्रुओंको संताप देनेवाले हो ॥ ३० १/२ ॥
एवमेव हते कर्णे सानुबन्धे दुरात्मनि ॥ ३१ ॥
वर्धयिष्यामि भूयस्त्वां विजितारिं हतद्विषम् ।
‘इसी प्रकार सगे-सम्बन्धियोंसहित दुरात्मा कर्णके मारे जानेपर शत्रुओंको जीतने और द्वेषी विपक्षियोंको मार डालनेवाले तुझ विजयी वीरको पुनः बधाई दूँगा’ ॥
तमर्जुनः प्रत्युवाच प्रसादात् तव माधव ॥ ३२ ॥ प्रतिज्ञेयं मया तीर्णा विबुधैरपि दुस्तरा । तब अर्जुनने उनकी बातोंका उत्तर देते हुए कहा—'माधव! आपकी कृपासे मैं इस प्रतिज्ञाको पार कर सका हूँ; अन्यथा इसका पार पाना देवताओंके लिये भी कठिन था ॥ ३२ ½ ॥
अनाश्चर्यो जयस्तेषां येषां नाथोऽसि केशव ॥ ३३ ॥ त्वत्प्रसादान्महीं कृत्स्नां सम्प्राप्स्यति युधिष्ठिरः । तव प्रभावो वार्ष्णेय तवैव विजयः प्रभो । वर्धनीयास्तव वयं सदैव मधुसूदन ॥ ३४ ॥ 'केशव! आप जिनके रक्षक हैं, उनकी विजय हो, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। आपके कृपा-प्रसादसे राजा युधिष्ठिर सम्पूर्ण भूमण्डलका राज्य प्राप्त कर लेंगे। वृष्णिनन्दन! प्रभो! यह आपका ही प्रभाव और आपकी ही विजय है। मधुसूदन! आपकी बधाईके पात्र तो हमलोग सदा ही बने रहेंगे' ॥ ३३-३४ ॥
एवमुक्तस्ततः कृष्णः शनैर्वाहयन् हयान् । दर्शयामास पार्थाय क्रूरमायोधनं महत् ॥ ३५ ॥ अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने धीरे-धीरे घोड़ोंको बढ़ाते हुए उस विशाल एवं क्रूरतापूर्ण संग्रामका दृश्य अर्जुनको दिखाना आरम्भ किया ॥ ३५ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
प्रार्थयन्तो जयं युद्धे प्रथितं च महद् यशः । पृथिव्यां शेरते शूराः पार्थिवास्त्वच्छरैर्हताः ॥ ३६ ॥ **श्रीकृष्ण बोले—**अर्जुन! युद्धमें विजय और सब ओर फैले हुए महान् सुयशकी अभिलाषा रखनेवाले ये शूरवीर भूपाल तुम्हारे बाणोंसे मरकर पृथ्वीपर सो रहे हैं ॥
विकीर्णशस्त्राभरणा विपन्नाश्वरथद्विपाः । संछिन्नभिन्नमर्माणो वैक्लव्यं परमं गताः ॥ ३७ ॥ इनके अस्त्र-शस्त्र और आभूषण बिखरे पड़े हैं, घोड़े, रथ और हाथी नष्ट हो गये हैं तथा मर्मस्थल छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण ये नरेश भारी व्याकुलतामें पड़ गये हैं ॥ ३७ ॥
ससत्त्वा गतसत्त्वाश्च प्रभया परया युताः । सजीवा इव लक्ष्यन्ते गतसत्त्वा नराधिपाः ॥ ३८ ॥ कितने ही राजाओंके प्राण चले गये हैं और कितनोंके प्राण अभी नहीं निकले हैं। जिनके प्राण निकल गये हैं, वे नरेश भी अत्यन्त कान्तिसे प्रकाशित होनेके कारण जीवित-से दिखायी देते हैं ॥ ३८ ॥
तेषां शरैः स्वर्णपुङ्खैः शस्त्रैश्च विविधैः शितैः । वाहनैरायुधैश्चैव सम्पूर्णां पश्य मेदिनीम् ॥ ३९ ॥ देखो, यह सारी पृथ्वी उन राजाओंके सुवर्णमय पंखवाले बाणों, तेज धारवाले नाना प्रकारके शस्त्रों, वाहनों और आयुधोंसे भरी हुई है ॥ ३९ ॥
वर्मभिश्चर्मभिर्हारैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । उष्णीषैर्मुकुटैः स्रग्भिश्चूडामणिभिरम्बरैः ॥ ४० ॥ कण्ठसूत्रैरङ्गदैश्च निष्कैरपि च सप्रभैः ।