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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

शृणु व्यूहस्य रचनामर्जुनश्च यथा गतः ।
परिवार्य नृपं स्वं स्वं संग्रामश्चाभवद् यथा ॥ १० ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! व्यूहकी रचना किस प्रकार हुई थी, अर्जुन कैसे और कहाँ चले गये थे और अपने-अपने राजाको सब ओरसे घेरकर दोनों दलोंके योद्धाओंने किस प्रकार संग्राम किया था? यह सब बताता हूँ, सुनिये ॥ १० ॥
कृपः शारद्वतो राजन् मागधाश्च तरस्विनः ।
सात्वतः कृतवर्मा च दक्षिणं पक्षमाश्रिताः ॥ ११ ॥
तेषां प्रपक्षे शकुनिरुलूकश्च महारथः ।
सादिभिर्विमलप्रासैस्त्वानीकमरक्षताम् ॥ १२ ॥
नरेश्वर! शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य, वेगशाली मागध वीर और सात्वतवंशी कृतवर्मा—ये व्यूहके दाहिने पक्षका आश्रय लेकर खड़े थे। महारथी शकुनि और उलूक चमचमाते हुए प्रासोंसे सुशोभित घुड़सवारोंके साथ उनके प्रपक्षमें स्थित हो आपके व्यूहकी रक्षा कर रहे थे ॥ ११-१२ ॥
गान्धारिभिरसम्भ्रान्तैः पर्वतीयैश्च दुर्जयैः ।
शलभानामिव व्रातैः पिशाचैरिव दुर्द्दशैः ॥ १३ ॥
उनके साथ कभी घबराहटमें न पड़नेवाले गान्धारदेशीय सैनिक और दुर्जय पर्वतीय वीर भी थे। पिशाचोंके समान उन योद्धाओंकी ओर देखना कठिन हो रहा था और वे टिड्डीदलोंके समान यूथ बनाकर चलते थे ॥ १३ ॥
चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि रथानामनिवर्तिनाम् ।
संशप्तका युद्धशौण्डा वामं पार्श्वमपालयन् ॥ १४ ॥
समन्वितास्तव सुतैः कृष्णार्जुनजिघांसवः ।
श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालनेकी इच्छावाले युद्ध-निपुण संशप्तक योद्धा युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले रथी वीर थे। उनकी संख्या चौंतीस हजार थी। वे आपके पुत्रोंके साथ रहकर व्यूहके वाम पार्श्वकी रक्षा करते थे ॥ १४ १/२ ॥
तेषां प्रपक्षाः काम्बोजाः शकाश्च यवनैः सह ॥ १५ ॥
निदेशात् सूतपुत्रस्य सरथाः साश्वपत्तयः ।
आह्वयन्तोऽर्जुनं तस्थुः केशवं च महाबलम् ॥ १६ ॥
उनके प्रपक्षस्थानमें सूतपुत्रकी आज्ञासे रथों, घुड़सवारों और पैदलोंसहित काम्बोज, शक तथा यवन महाबली श्रीकृष्ण और अर्जुनको ललकारते हुए खड़े थे ॥ १५-१६ ॥
मध्ये सेनामुखे कर्णोऽप्यवातिष्ठत दंशितः ।
चित्रवर्माङ्गदः स्रग्वी पालयन् वाहिनीमुखम् ॥ १७ ॥
कर्ण भी विचित्र कवच, अंगद और हार धारण करके सेनाके मुखभागकी रक्षा करता हुआ व्यूहके मुहानेपर ठीक बीचो-बीचमें खड़ा था ॥ १७ ॥

रक्षमाणैः सुसंरब्धैः पुत्रैः शस्त्रभृतां वरः ।
वाहिनीं प्रमुखे वीरः सम्प्रकर्षन्नशोभत ॥ १८ ॥
अभ्यवर्त्तन्महाबाहुः सूर्यवैश्वानरप्रभः ।
सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी और शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु कर्ण रोष और जोशमें भरकर सेनापतिकी रक्षामें तत्पर हुए आपके पुत्रोंके साथ प्रमुख भागमें स्थित हो कौरव-सेनाको अपने साथ खींचता हुआ बड़ी शोभा पा रहा था, वह शत्रुओंके सामने डटा हुआ था ॥ १८ १/२ ॥

महाद्विपस्कन्धगतः पिङ्गाक्षः प्रियदर्शनः ॥ १९ ॥
दुःशासनो वृतः सैन्यैः स्थितो व्यूहस्य पृष्ठतः ।
व्यूहके पृष्ठभागमें पिंगल नेत्रोंवाला प्रियदर्शन दुःशासन सेनाओंसे घिरा हुआ खड़ा था। वह एक विशाल गजराजकी पीठपर विराजमान था ॥ १९ १/२ ॥

तमन्वयान्महाराज स्वयं दुर्योधनो नृपः ॥ २० ॥
चित्रास्त्रैश्चित्रसंनाहैः सोदर्यैरभिरक्षितः ।
रक्ष्यमाणो महावीर्यैः सहितैर्मद्रकेकयैः ॥ २१ ॥
अशोभत महाराज देवैरिव शतक्रतुः ।
महाराज! विचित्र अस्त्र और कवच धारण करनेवाले सहोदर भाइयों तथा एक साथ आये हुए मद्र और केकयदेशके महापराक्रमी योद्धाओंद्वारा सुरक्षित साक्षात् राजा दुर्योधन दुःशासनके पीछे-पीछे चल रहा था। महाराज! उस समय देवताओंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रके समान उसकी शोभा हो रही थी ॥ २०-२१ १/२ ॥

अश्वत्थामा कुरूणां च ये प्रवीरा महारथाः ॥ २२ ॥
नित्यमत्ताश्च मातङ्गाः शूरैर्म्लेच्छैः समन्विताः ।
अन्वयुस्तद् रथानीकं क्षरन्त इव तोयदाः ॥ २३ ॥
अश्वत्थामा, कौरवपक्षके प्रमुख महारथी वीर, शौर्यसम्पन्न म्लेच्छ सैनिकोंसे युक्त नित्य मतवाले हाथी वर्षा करनेवाले मेघोंके समान मदकी धारा बहाते हुए उस रथसेनाके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ २२-२३ ॥

ते ध्वजैर्वैजयन्तीभिर्ज्वलद्भिः परमायुधैः ।
सादिभिश्चास्थिता रेजुर्द्रुमवन्त इवाचलाः ॥ २४ ॥
वे हाथी ध्वजों, वैजयन्ती पताकाओं, प्रकाशमान अस्त्र-शस्त्रों तथा सवारोंसे सुशोभित हो वृक्षसमूहोंसे युक्त पर्वतोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २४ ॥

तेषां पदातिनागानां पादरक्षाः सहस्रशः ।
पट्टिशासिधराः शूरा बभूवुरनिवर्तिनः ॥ २५ ॥
पट्टिश और खड्ग धारण किये तथा युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले सहस्रों शूर सैनिक उन पैदलों एवं हाथियोंके पादरक्षक थे ॥ २५ ॥

सादिभिः स्यन्दनैर्नागैरधिकं समलङ्कृतैः ।
स व्यूहराजो विबभौ देवासुरचमूपमः ॥ २६ ॥
अधिकाधिक सुसज्जित हाथियों, रथों और घुड़सवारोंसे सम्पन्न वह व्यूहराज देवताओं और असुरोंकी सेनाके समान सुशोभित हो रहा था ॥ २६ ॥

बार्हस्पत्यः सुविहितो नायकेन विपश्चिता ।
नृत्यतीव महाव्यूहः परेषां भयमादधत् ॥ २७ ॥
विद्वान् सेनापति कर्णके द्वारा बृहस्पतिकी बतायी हुई रीतिके अनुसार भलीभाँति रचा गया वह महान् व्यूह शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करता हुआ नृत्य-सा कर रहा था ॥ २७ ॥

तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युयुत्सवः ।
पत्त्यश्वरथमातङ्गाः प्रावृषीव बलाहकाः ॥ २८ ॥
उसके पक्ष और प्रपक्षोंसे युद्धके इच्छुक पैदल, घुड़सवार, रथी और गजारोही योद्धा उसी प्रकार निकल पड़ते थे, जैसे वर्षाकालमें मेघ प्रकट होते हैं ॥ २८ ॥

ततः सेनामुखे कर्णं दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः ।
धनंजयममित्रघ्नमेकवीरमुवाच ह ॥ २९ ॥
तदनन्तर सेनाके मुहानेपर कर्णको खड़ा देख राजा युधिष्ठिरने शत्रुओंका संहार करनेवाले अद्वितीय वीर धनंजयसे इस प्रकार कहा— ॥ २९ ॥

पश्यार्जुन महाव्यूहं कर्णेन विहितं रणे ।
युक्तं पक्षैः प्रपक्षैश्च परानीकं प्रकाशते ॥ ३० ॥
‘अर्जुन! रणभूमिमें कर्णद्वारा रचित उस महाव्यूहको देखो। पक्षों और प्रपक्षोंसे युक्त शत्रुकि वह व्यूहबद्ध सेना कैसी प्रकाशित हो रही है! ॥ ३० ॥

तदेतद् वै समालोक्य प्रत्यमित्रं महत् बलम् ।
यथा नाभिभवत्यस्मांस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ३१ ॥
‘अतः इस विशाल शत्रुसेनाकी ओर देखकर तुम ऐसी नीतिका निर्माण करो, जिससे वह हमें परास्त न कर सके’ ॥ ३१ ॥

एवमुक्तोऽर्जुनो राज्ञा प्राञ्जलिर्नृपमब्रवीत् ।
यथा भवानाह तथा तत् सर्वं न तदन्यथा ॥ ३२ ॥
राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर अर्जुन हाथ जोड़कर उनसे बोले—‘भारत! आप जैसा कहते हैं वह सब वैसा ही है। उसमें थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं है ॥ ३२ ॥

यस्त्वस्य विहितो घातस्तं करिष्यामि भारत ।
प्रधानवध एवास्य विनाशस्तं करोम्यहम् ॥ ३३ ॥
‘युद्धशास्त्रमें इस व्यूहके विनाशके लिये जो उपाय बताया गया है, उसीका सम्पादन करूँगा। प्रधान सेनापतिका वध होनेपर ही इसका विनाश हो सकता है; अतः मैं वही करूँगा’ ॥ ३३ ॥

युधिष्ठिर उवाच
तस्मात् त्वमेव राधेयं भीमसेनः सुयोधनम् ।

वृषेसेनं च नकुलः सहदेवोऽपि सौबलम् ॥ ३४ ॥ दुःशासनं शतानीको हार्दिक्यं शिनिपुङ्गवः । धृष्टद्युम्नो द्रोणसुतं स्वयं योत्स्याम्यहं कृपम् ॥ ३५ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**अर्जुन! तब तुम्हीं राधापुत्र कर्णके साथ भिड़ जाओ! भीमसेन दुर्योधनसे, नकुल वृषसेनसे, सहदेव शकुनिसे, शतानीक दुःशासनसे, सात्यकि कृतवर्मासे और धृष्टद्युम्न अश्वत्थामासे युद्ध करे तथा स्वयं मैं कृपाचार्यके साथ युद्ध करूँगा ॥ द्रौपदेया धार्तराष्ट्रान् शिष्टान् सह शिखण्डिना । ते ते च तांस्तानहितानस्माकं घ्नन्तु मामकाः ॥ ३६ ॥ द्रौपदीके पुत्र शिखण्डीके साथ रहकर धृतराष्ट्रके शेष बचे हुए पुत्रोंपर धावा करें। इसी प्रकार हमारे विभिन्न सैनिक हमलोगोंके उन-उन शत्रुओंका विनाश करें ॥ ३६ ॥

संजय उवाच

इत्युक्तो धर्मराजेन तथेत्युक्त्वा धनंजयः । व्यादिदेश स्वसैन्यानि स्वयं चागाच्चमूमुखम् ॥ ३७ ॥ **संजय कहते हैं—**धर्मराजके ऐसा कहनेपर अर्जुनने 'तथास्तु' कहकर अपनी सेनाओंको युद्धके लिये आदेश दे दिया और स्वयं वे सेनाके मुहानेपर जा पहुँचे ॥ ३७ ॥ (धनंजयो महाराज दक्षिणं पक्षमास्थितः । भीमसेनो महाबाहुर्वामं पक्षमुपाश्रितः ॥ सात्यकिर्द्रौपदेयाश्च स्वयं राजा च पाण्डवः । व्यूहस्य प्रमुखे तस्थुः स्वेनानीकेन संवृताः ॥ स्वबलेनारिसैन्यं तत् प्रत्यवस्थाप्य पाण्डवः । प्रत्यव्यूहत् पुरस्कृत्य धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ॥ तत् सादिनागकलिलं पदातिरथसंकुलम् । धृष्टद्युम्नमुखं व्यूहमशोभत महाबलम् ॥) महाराज! अर्जुन दाहिने पक्षमें खड़े हुए और महाबाहु भीमसेनने बायें पक्षका आश्रय लिया। सात्यकि, द्रौपदीके पुत्र तथा स्वयं राजा युधिष्ठिर अपनी सेनासे घिरकर व्यूहके मुहानेपर खड़े हुए। युधिष्ठिरने अपनी सेना द्वारा प्रतिरोध करके शत्रुको उस सेनाको ठहर जानेके लिये विवश कर दिया और धृष्टद्युम्न तथा शिखण्डीको आगे करके उसके मुकाबलेमें अपनी सेनाका व्यूह बनाया। घुड़सवारों, हाथियों, पैदलों और रथोंसे भरा हुआ वह प्रबल व्यूह, जिसके प्रमुख भागमें धृष्टद्युम्न थे, बड़ी शोभा पा रहा था। अग्निर्वैश्वानरः पूर्वो ब्रह्मोद्भवः सप्तितां गतः । तस्माद् यः प्रथमं जातस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ ३८ ॥

वेद-मन्त्रोंद्वारा प्रज्वलित और सबसे पहले प्रकट हुए सम्पूर्ण विश्वके नेता अग्निदेव, जो ब्रह्माजीके मुखसे सर्वप्रथम उत्पन्न हैं और इसी कारण देवता जिन्हें ब्राह्मण मानते हैं, अर्जुनके उस दिव्य रथके अश्व बने हुए थे ॥ ३८ ॥

ब्रह्मेशानेन्द्रवरुणान् क्रमशॊ योऽवहत् पुरा ।
तमाद्यं रथमास्थाय प्रयातौ केशवार्जुनौ ॥ ३९ ॥
जो प्राचीन कालमें क्रमशः ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र और वरुणकी सवारीमें आ चुका था, उसी आदि रथपर बैठकर श्रीकृष्ण और अर्जुन शत्रुओंकी ओर बढ़े चले जा रहे थे ॥

अथ तं रथमायान्तं दृष्ट्वात्यद्भुतदर्शनम् ।
उवाचाधिरथिं शल्यः पुनस्तं युद्धदुर्मदम् ॥ ४० ॥
अत्यन्त अद्भुत दिखायी देनेवाले उस रथको आते देख शल्यने रणदुर्मद सूतपुत्र कर्णसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ४० ॥

अयं सरथ आयात: श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ।
दुर्वारः सर्वसैन्यानां विपाकः कर्मणामिव ॥ ४१ ॥
निघ्नन्नमित्रान् कौन्तेयो यं कर्ण परिपृच्छसि ।
‘कर्ण! तुम जिन्हें बारंबार पूछ रहे थे, वे ही ये कुन्तीकुमार अर्जुन शत्रुओंका संहार करते हुए रथके साथ आ पहुँचे। उनके घोड़े श्वेत रंगके हैं, श्रीकृष्ण उनके सारथि हैं और वे कर्मोंके फलकी भाँति तुम्हारी सम्पूर्ण सेनाओंके लिये दुर्निवार्य हैं ॥ ४१ ½ ॥

श्रूयते तुमुलः शब्दो यथा मेघस्वनो महान् ॥ ४२ ॥
ध्रुवमेतौ महात्मानौ वासुदेवधनंजयौ ।
‘उनके रथका भयंकर शब्द ऐसा सुनायी दे रहा है, मानो महान् मेघकी गर्जना हो रही हो। निश्चय ही वे महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन ही आ रहे हैं ॥ ४२ ½ ॥

एष रेणुः समुद्भूतो दिवमावृत्य तिष्ठति ॥ ४३ ॥
चक्रनेमिप्रणुन्नेव कम्पते कर्ण मेदिनी ।
‘कर्ण! यह ऊपर उठी हुई धूल आकाशको आच्छादित करके स्थित हो रही है और यह पृथ्वी अर्जुनके रथके पहियोंद्वारा संचालित-सी होकर काँपने लगी है ॥ ४३ ½ ॥

प्रवात्येष महावायुरभितस्तव वाहिनीम् ॥ ४४ ॥
क्रव्यादा व्याहरन्त्येते मृगाः क्रन्दन्ति भैरवम् ।
‘तुम्हारी सेनाके सब ओर यह प्रचण्ड वायु बह रही है, ये मांसभक्षी पशु-पक्षी बोल रहे हैं और मृगगण भयंकर क्रन्दन कर रहे हैं ॥ ४४ ½ ॥

पश्य कर्ण महाघोरं भयदं लोमहर्षणम् ॥ ४५ ॥
कबन्धं मेघसंकाशं भानुमावृत्य संस्थितम् ।

‘कर्ण! वह देखो, रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयदायक मेघसदृश महाघोर कबन्धाकार केतु नामक ग्रह सूर्यमण्डलको घेरकर खड़ा है ।। ४५ १/२ ।। पश्य यूथैर्बहुविधैर्मृगाणां सर्वतोदिशम् ।। ४६ ।। बलिभिर्दृप्तशार्दूलैरादित्योऽभिनिरीक्ष्यते । ‘देखो, चारों दिशाओंमें नाना प्रकारके पशुसमुदाय तथा बलवान् एवं स्वाभिमानी सिंह सूर्यकी ओर देख रहे हैं ।। ४६ १/२ ।। पश्य कङ्कांश्च गृध्रांश्च समवेतान् सहस्रशः ।। ४७ ।। स्थितानभिमुखान् घोरानन्योन्यमभिभाषतः । ‘देखो, सहस्रों घोर कंक और गीध एकत्र होकर सामने खड़े हैं और आपसमें कुछ बोल भी रहे हैं ।। रज्जिताश्चामरा युक्तास्तव कर्ण महारथे ।। ४८ ।। प्रवराः प्रज्वलन्त्येते ध्वजश्चैव प्रकम्पते । ‘कर्ण! तुम्हारे विशाल रथमें बँधे हुए ये रंगीन और श्रेष्ठ चँवर सहसा प्रज्वलित हो उठे हैं और तुम्हारी ध्वजा भी जोर-जोरसे हिलने लगी है ।। ४८ १/२ ।। सवेपथून् हयान् पश्य महाकायान् महाजवान् ।। ४९ ।। प्लवमानान् दर्शनीयानाकाशे गरुडानिव । ‘देखो, ये तुम्हारे विशालकाय, महान् वेगशाली, दर्शनीय तथा आकाशमें गरुडके समान उड़नेवाले घोड़े थरथर काँप रहे हैं ।। ४९ १/२ ।। ध्रुवमेषु निमित्तेषु भूमिमाश्रित्य पार्थिवाः ।। ५० ।। स्वप्स्यन्ति निहताः कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः । ‘कर्ण! जब ऐसे अपशकुन प्रकट हो रहे हैं तो निश्चय ही आज सैकड़ों और हजारों नरेश मारे जाकर रणभूमिमें शयन करेंगे ।। ५० १/२ ।। शङ्खानां तुमुलः शब्दः श्रूयते लोमहर्षणः ।। ५१ ।। आनकानां च राधेय मृदङ्गानां च सर्वशः । ‘राधानन्दन! सब ओर शंखों, ढोलों और मृदंगोंकी रोमांचकारी तुमुल ध्वनि सुनायी दे रही है ।। ५१ १/२ ।। बाणशब्दान् बहुविधान् नराश्वरथनिस्वनान् ।। ५२ ।। ज्यातलत्रेषुशब्दांश्च शृणु कर्ण महात्मनाम् । ‘कर्ण! बाणोंके भाँति-भाँतिके शब्द, मनुष्यों, घोड़ों और रथोंके कोलाहल तथा महामनस्वी वीरोंकी प्रत्यंचा और दस्तानोंके शब्द सुनो ।। ५२ १/२ ।। हेमरूप्यप्रसृष्टानां वाससां शिल्पिनिर्मिताः ।। ५३ ।। नानावर्णा रथे भान्ति श्वसनेन प्रकम्पिताः ।

रथोंकी ध्वजाओंपर सोने और चाँदीके तारोंसे खचित वस्त्रोंकी बनी हुई शिल्पियोंद्वारा निर्मित बहुरंगी पताकाएँ हवाके झोंकेसे हिलती हुई कैसी शोभा पा रही हैं॥ ५३ १/२ ॥ सहेमचन्द्रताराकाः पताकाः किङ्किणीयुताः ॥ ५४ ॥ पश्य कर्णार्जुनस्यैताः सौदामन्य इवाम्बुदे । ‘कर्ण! देखो, अर्जुनके रथकी इन पताकाओंमें सुवर्णमय चन्द्रमा, सूर्य और तारोंके चिह्न बने हुए हैं और छोटी-छोटी घंटियाँ लगी हुई हैं। रथपर फहराती हुई ये पताकाएँ मेघोंकी घटामें बिजलीके समान प्रकाशित हो रही हैं॥ ५४ १/२ ॥ ध्वजाः कणकणायन्ते वातेनाभिसमीरिताः ॥ ५५ ॥ विभ्राजन्ति रथे कर्ण विमाने दैवते यथा । ‘कर्ण! देवताओंके विमान-जैसे रथपर ये ध्वज हवाके झोंके खा-खाकर कड़कड़ शब्द करते हुए शोभा पा रहे हैं॥ ५५ १/२ ॥ सपताका रथाश्चैते पञ्चालानां महात्मनाम् ॥ ५६ ॥ पश्य कुन्तीसुतं वीरं बीभत्सुमपराजितम् । प्रधर्षयितुमायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ॥ ५७ ॥ ‘ये महामनस्वी पांचाल वीरोंके रथ हैं, जिनपर पताकाएँ फहरा रही हैं। यह देखो, श्रेष्ठ वानरयुक्त ध्वजावाले अपराजित वीर कुन्तीकुमार अर्जुन आक्रमण करनेके लिये इधर ही आ रहे हैं॥ ५६-५७॥ एष ध्वजाग्रे पार्थस्य प्रेक्षणीयः समन्ततः । दृश्यते वानरो भीमो द्विषतामघवर्धनः ॥ ५८ ॥ ‘अर्जुनके ध्वजके अग्रभागपर यह सब ओरसे देखनेयोग्य भयंकर वानर दृष्टिगोचर होता है, जो शत्रुओंका दुःख बढ़ानेवाला है॥ ५८॥ एतच्चक्रं गदा शार्ङ्गं शङ्खः कृष्णस्य धीमतः । अत्यर्थं भ्राजते कृष्णे कौस्तुभस्तु मणिस्ततः ॥ ५९ ॥ ‘ये बुद्धिमान् श्रीकृष्णके शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग-धनुष अत्यन्त शोभा पा रहे हैं। उनके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि सबसे अधिक प्रकाशित हो रही है॥ ५९॥ एष शङ्खगदापाणिर्वासुदेवोऽतिवीर्यवान् । वाहयन्नेति तुरगान् पाण्डुरान् वातरंहसः ॥ ६० ॥ ‘हाथोंमें शंख और गदा धारण करनेवाले ये अत्यन्त पराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वायुके समान वेगशाली श्वेत घोड़ोंको हाँकते हुए इधर ही आ रहे हैं॥ एतत् कूजति गाण्डीवं विकृष्टं सव्यसाचिना । एते हस्तवता मुक्ता घ्नन्त्यमित्रान्शिताः शराः ॥ ६१ ॥ ‘सव्यसाची अर्जुनके हाथसे खींचे गये गाण्डीव धनुषकी यह टंकार होने लगी। उनके कुशल हाथोंसे छोड़े गये ये पैने बाण शत्रुओंके प्राण ले रहे हैं॥ ६१॥

विशालायतताम्राक्षैः पूर्णचन्द्रनिभाननैः ।
एषा भूः कीर्यते राज्ञां शिरोभिरपलायिनाम् ॥ ६२ ॥
‘युद्ध छोड़कर पीछे न हटनेवाले राजाओंके मस्तकोंसे रणभूमि पटती जा रही है। वे मस्तक पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुख और लाल-लाल विशाल नेत्रोंसे सुशोभित हैं।। ६२ ।।

एते सुपरिघाकाराः पुण्यगन्धानुलेपनाः ।
उद्यतायुधशौण्डानां पात्यन्ते सायुधा भुजाः ॥ ६३ ॥
‘अस्त्र उठाये हुए युद्ध-कुशल वीरोंकी ये परिघ-जैसी मोटी और पवित्र सुगन्धयुक्त चन्दनसे चर्चित भुजाएँ आयुधोंसहित काटकर गिरायी जाने लगी हैं ।। ६३ ।।

निरस्तनेत्रजिह्वान्त्रा वाजिनः सह सादिभिः ।
पतिताः पात्यमानाश्च क्षितौ क्षीणाश्च शेरते ॥ ६४ ॥
‘जिनके नेत्र, जीभ और आँतें बाहर निकल आयी हैं, वे गिरे और गिराये जाते हुए घुड़सवारोंसहित घोड़े क्षत-विक्षत होकर पृथ्वीपर सो रहे हैं ।। ६४ ।।

एते पर्वतशृङ्गाणां तुल्यरूपा हता द्विपाः ।
संछिन्नभिन्नाः पार्थेन प्रपतन्त्यद्रयो यथा ॥ ६५ ॥
‘ये पर्वतशिखरोंके समान विशालकाय हाथी अर्जुनके द्वारा मारे जाकर छिन्न-भिन्न हो पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे हैं ।। ६५ ।।

गन्धर्वनगराकारा रथा हतनरेश्वराः ।
विमानानीव पुण्यानि स्वर्गिणां निपतन्त्यमी ॥ ६६ ॥
‘जिनके नरेश मारे गये हैं, वे गन्धर्वनगरके समान विशाल रथ स्वर्गवासियोंके पुण्यमय विमानोंके समान नीचे गिर रहे हैं ।। ६६ ।।

व्याकुलीकृतमत्यर्थं पश्य सैन्यं किरीटिना ।
नानामृगसहस्राणां यूथं केसरिणा यथा ॥ ६७ ॥
‘देखो, किरीटधारी अर्जुनने कौरव-सेनाको उसी प्रकार अत्यन्त व्याकुल कर दिया है, जैसे सिंह नाना जातिके सहस्रों मृगोंको भयभीत कर देता है ।। ६७ ।।

घ्नन्त्येते पार्थिवान् वीराः पाण्डवाः समभिद्रुताः ।
नागाश्वरथपत्त्योघांस्तावकान् समभिघ्नतः ॥ ६८ ॥
‘तुम्हारे सैनिकोंके आक्रमण करनेपर ये वीर पाण्डवयोद्धा अपने ऊपर प्रहार करनेवाले राजाओं तथा हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसमूहोंको मार रहे हैं ।। ६८ ।।

एष सूर्य इवाम्भोदैश्छन्नः पार्थो न दृश्यते ।
ध्वजाग्रं दृश्यते त्वस्य ज्याशब्दश्चापि श्रूयते ॥ ६९ ॥
‘जैसे सूर्य बादलोंसे ढक जाते हैं, उसी प्रकार आड़में पड़ जानेके कारण ये अर्जुन नहीं दिखायी देते हैं; परंतु इनके ध्वजका अग्रभाग दीख रहा है और प्रत्यंचाकी टंकार भी सुनायी

पड़ती है ।। ६९ ।। अद्य द्रक्ष्यसि तं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । निघ्नन्तं शात्रवान् संख्ये यं कर्ण परिपृच्छसि ।। ७० ।। ‘कर्ण! तुम जिन्हें पूछ रहे थे, युद्धस्थलमें शत्रुओंका संहार करते हुए उन कृष्णसारथि श्‍वेतवाहन वीर अर्जुनको अभी देखोगे ।। ७० ।। अद्य तौ पुरुषव्याघ्रौ लोहिताक्षौ परंतपौ । वासुदेवार्जुनौ कर्ण द्रष्टास्येकरथे स्थितौ ।। ७१ ।। ‘कर्ण! लाल नेत्रोंवाले उन शत्रुसंतापी पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुनको आज तुम एक रथपर बैठे हुए देखोगे ।। सारथिर्यस्य वार्ष्णेयो गाण्डीवं यस्य कार्मुकम् । तं चेद्धन्तासि राधेय त्वं नो राजा भविष्यसि ।। ७२ ।। ‘राधापुत्र! श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं और गाण्डीव जिनका धनुष है, उन अर्जुनको यदि तुमने मार लिया तो तुम हमारे राजा हो जाओगे ।। ७२ ।। एष संशप्तकाहूतस्तानेवाभिमुखो गतः । करोति कदनं चैषां संग्रामे द्विषतां बली ।। ७३ ।। ‘यह देखो, संशप्तकोंकी ललकार सुनकर महाबली अर्जुन उन्हींकी ओर चल पड़े और अब संग्राममें उन शत्रुओंका संहार कर रहे हैं’ ।। ७३ ।। इति ब्रुवाणं मद्रेशं कर्णः प्राहातिमन्युना । पश्य संशप्तकैः क्रुद्धैः सर्वतः समभिद्रुतः ।। ७४ ।। ऐसी बातें कहते हुए मद्रराज शल्यसे कर्णने अत्यन्त क्रोधपूर्वक कहा—‘तुम्हीं देखो न, रोषमें भरे हुए संशप्तकोंने उनपर चारों ओरसे आक्रमण कर दिया है ।। एष सूर्य इवाम्भोदैश्छन्नः पार्थो न दृश्यते । एतदन्तोऽर्जुनः शल्य निमग्नो योधसागरे ।। ७५ ।। ‘यह लो, बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान अर्जुन अब नहीं दिखायी देते हैं। शल्य! अब अर्जुनका यहीं अन्त हुआ समझो। वे योद्धाओंके समुद्रमें डूब गये’ ।। ७५ ।।

शल्य उवाच

वरुणं कोऽम्भसा हन्यादिन्धनेन च पावकम् । को वानिलं निगृह्णीयात् पिबेद् वा को महार्णवम् ।। ७६ ।। **शल्यने कहा—**कर्ण! कौन ऐसा वीर है जो जलसे वरुणको और ईंधनसे अग्निको मार सके? वायुको कौन कैद कर सकता है अथवा महासागरको कौन पी सकता है? ।। ७६ ।। ईदृग्रूपमहं मन्ये पार्थस्य युधि विग्रहम् । न हि शक्योऽर्जुनो जेतुं युधि सेन्द्रैः सुरासुरैः ।। ७७ ।।

मैं युद्धमें अर्जुनके स्वरूपको ऐसा ही समझता हूँ। संग्रामभूमिमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंके द्वारा भी अर्जुन नहीं जीते जा सकते ॥ ७७ ॥ अथवा परितोषस्ते वाचोक्त्वा सुमना भव । न स शक्यो युधा जेतुमन्यं कुरु मनोरथम् ॥ ७८ ॥ अथवा यदि तुम्हें इसीसे संतोष होता है तो वाणीमात्रसे अर्जुनके वधकी चर्चा करके मन-ही-मन प्रसन्न हो लो। परंतु वास्तवमें युद्धके द्वारा कोई भी अर्जुनको जीत नहीं सकता। अतः अब तुम कोई और ही मनसूबा बाँधो ॥ ७८ ॥ बाहुभ्यामुद्धरेद् भूमिं दहेत् क्रुद्ध इमाः प्रजाः । पातयेत् त्रिदिवाद् देवान् योऽर्जुनं समरे जयेत् ॥ ७९ ॥ जो समरांगणमें अर्जुनको जीत ले, वह मानो अपनी दोनों भुजाओंसे पृथ्वीको उठा सकता है, कुपित होनेपर इस सारी प्रजाको दग्ध कर सकता है तथा देवताओंको भी स्वर्गसे नीचे गिरा सकता है ॥ ७९ ॥ पश्य कुन्तीसुतं वीरं भीममक्लिष्टकारिणम् । प्रभासन्तं महाबाहुं स्थितं मेरुमिवापरम् ॥ ८० ॥ लो देख लो, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भयंकर वीर महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुन दूसरे मेरुपर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए प्रकाशित हो रहे हैं ॥ अमर्षी नित्यसंरब्धश्चिरं वैरमनुस्मरन् । एष भीमो जयप्रेप्सुर्युधि तिष्ठति वीर्यवान् ॥ ८१ ॥ सदा क्रोधमें भरे रहकर दीर्घकालतक वैरको याद रखनेवाले ये अमर्षशील पराक्रमी भीमसेन विजयकी अभिलाषा लेकर युद्धके लिये खड़े हैं ॥ ८१ ॥ एष धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः । तिष्ठत्यसुकरः संख्ये परैः परपुरञ्जयः ॥ ८२ ॥ शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले, ये धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर भी युद्धभूमिमें खड़े हैं। शत्रुओंके लिये इन्हें पराजित करना आसान नहीं है ॥ ८२ ॥ एतौ च पुरुषव्याघ्रावश्विनाविव सोदरौ । नकुलः सहदेवश्च तिष्ठतो युधि दुर्जयौ ॥ ८३ ॥ ये अश्विनीकुमारोंके समान सुन्दर दोनों भाई पुरुषप्रवर नकुल और सहदेव भी युद्धस्थलमें खड़े हैं। इन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन है ॥ ८३ ॥ अमी स्थिता द्रौपदेयाः पञ्च पञ्चाचला इव । व्यवस्थिता योद्धुकामाः सर्वेऽर्जुनसमा युधि ॥ ८४ ॥ ये द्रौपदीके पाँचों पुत्र पाँच पर्वतोंके समान अविचल भावसे युद्धके लिये खड़े हैं। रणभूमिमें ये सब-के-सब अर्जुनके समान पराक्रमी हैं ॥ ८४ ॥ एते द्रुपदपुत्राश्च धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।

स्फीताः सत्यजितो वीरास्तिष्ठन्ति परमौजसः ॥ ८५ ॥
ये समृद्धिशाली, सत्यविजयी तथा परम बलवान् द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न आदि वीर युद्धके लिये डटे हुए हैं ॥
असाविन्द्र इवासह्यः सात्यकिः सात्वतां वरः ।
युयुत्सुरुपयात्यस्मान् क्रुद्धान्तकसमः पुरः ॥ ८६ ॥
वह सामने सात्वतवंशके श्रेष्ठ वीर सात्यकि, जो शत्रुओंके लिये इन्द्रके समान असह्य हैं, क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान युद्धकी इच्छा लेकर सामनेसे हमलोगोंकी ओर आ रहे हैं ॥ ८६ ॥
इति संवदतोरेव तयोः पुरुषसिंहयोः ।
ते सेने समसज्जेतां गङ्गायमुनवद् भृशम् ॥ ८७ ॥
राजन्! वे दोनों पुरुषसिंह शल्य और कर्ण इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि कौरव और पाण्डवकी दोनों सेनाएँ गंगा और यमुनाके समान एक-दूसरेसे वेगपूर्वक जा मिलीं ॥ ८७ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल १०३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 1939)

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंका भयंकर युद्ध तथा अर्जुन और कर्णका पराक्रम

धृतराष्ट्र उवाच

तथा व्यूढेष्वनीकेषु संसक्तेषु च संजय ।
संशप्तकान् कथं पार्थो गतः कर्णश्च पाण्डवान् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! इस प्रकार जब सारी सेनाओंकी व्यूह-रचना हो गयी और दोनों दलोंके योद्धा परस्पर युद्ध करने लगे, तब कुन्तीपुत्र अर्जुनने संशप्तकोंपर और कर्णने पाण्डव-योद्धाओंपर कैसे धावा किया? ॥ १ ॥

एतद् विस्तरशो युद्धं प्रब्रूहि कुशलो ह्यसि ।
न हि तृप्यामि वीराणां शृण्वानो विक्रमान् रणे ॥ २ ॥
सूत! तुम युद्धसम्बन्धी इस समाचारका विस्तार-पूर्वक वर्णन करो, क्योंकि इस कार्यमें कुशल हो। रणभूमिमें वीरोंके पराक्रमका वर्णन सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥

संजय उवाच

तदास्थितमवज्ञाय प्रत्यमित्रबलं महत् ।
अव्यूहतार्जुनो व्यूहं पुत्रस्य तव दुर्नये ॥ ३ ॥
संजयने कहा— महाराज! आपके पुत्रकी दुर्नीतिके कारण शत्रुओंकी उस विशाल सेनाको युद्धमें उपस्थित जानकर अर्जुनने अपनी सेनाका भी व्यूह बनाया ॥ ३ ॥

तत् सादिनागकलिलं पदातिरथसंकुलम् ।
धृष्टद्युम्नमुखं व्यूहमशोभत महद् बलम् ॥ ४ ॥
घुड़सवारों, हाथियों, रथों तथा पैदलोंसे भरे हुए उस व्यूहके मुखभागमें धृष्टद्युम्न खड़े थे, जिससे उस विशाल सेनाकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४ ॥

पारावतसवर्णाश्वश्चन्द्रादित्यसमद्युतिः ।
पार्षतः प्रबभौ धन्वी कालो विग्रहवानिव ॥ ५ ॥
कबूतरके समान रंगवाले घोड़ोंसे युक्त और चन्द्रमा तथा सूर्यके समान तेजस्वी धनुर्धर वीर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न वहाँ मूर्तिमान् कालके समान जान पड़ते थे ॥

पार्षतं जुगुपुः सर्वे द्रौपदेया युयुत्सवः ।
दिव्यवर्मायुधधराः शार्दूलसमविक्रमाः ॥ ६ ॥
सानुगा दीप्तवपुषश्चन्द्रं तारागणा इव ।

दिव्य कवच और आयुध धारण किये, सिंहके समान पराक्रमी सेवकोंसहित समस्त द्रौपदीपुत्र युद्धके लिये उत्सुक हो धृष्टद्युम्नकी रक्षा करने लगे, मानो तेजस्वी शरीरवाले नक्षत्र चन्द्रमाका संरक्षण कर रहे हों॥

अथ व्यूढेष्वनीकेषु प्रेक्ष्य संशप्तकान् रणे ॥ ७ ॥
क्रुद्धोऽर्जुनोऽभिदुद्राव व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः ।
इस प्रकार सेनाओंकी व्यूह-रचना हो जानेपर रणभूमिमें संशप्तकोंकी ओर देखकर क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए उनपर आक्रमण किया॥ ७ १/२ ॥

अथ संशप्तकाः पार्थमभ्यधावन् वधैषिणः ॥ ८ ॥
विजये धृतसंकल्पा मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ।
तब विजयका दृढ़ संकल्प लेकर मृत्युको ही युद्धसे निवृत्त होनेका निमित्त बनाकर अर्जुनके वधकी इच्छावाले संशप्तकोंने भी उनपर धावा बोल दिया॥ ८ १/२ ॥

तन्नराश्वौघबहुलं मत्तनागरथाकुलम् ॥ ९ ॥
पत्तिमच्छूरवीरौघं द्रुतमर्जुनमार्दयत् ।
संशप्तकोंकी सेनामें पैदल मनुष्यों और घुड़सवारोंकी संख्या बहुत अधिक थी। मतवाले हाथी और रथ भी भरे हुए थे। पैदलोंसहित शूरवीरोंके उस समुदायने तुरंत ही अर्जुनको पीड़ा देना आरम्भ किया॥ ९ १/२ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषामासीत् किरीटिना ॥ १० ॥
तस्यैव नः श्रुतो यादृङ्निवातकवचैः सह ।
किरीटधारी अर्जुनके साथ संशप्तकोंका वह संग्राम वैसा ही भयानक था, जैसा कि निवातकवच नामक दानवोंके साथ अर्जुनका युद्ध हमने सुन रखा है॥ १० १/२ ॥

रथानश्वान् ध्वजान् नागान् पतीन् रणगतानपि ॥ ११ ॥
इषून् धनूंषि खड्गांश्च चक्राणि च परश्वधान् ।
सायुधानुद्यतान् बाहून् विविधान्यायुधानि च ॥ १२ ॥
चिच्छेद द्विषतां पार्थः शिरांसि च सहस्रशः ।
तदनन्तर कुन्तीकुमार अर्जुनने रणस्थलमें आये हुए शत्रुपक्षके रथों, घोड़ों, ध्वजों, हाथियों और पैदलोंको भी काट डाला, उन्होंने शत्रुओंके धनुष, बाण, खड्ग, चक्र, फरसे, आयुधोंसहित उठी हुई भुजा, नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र तथा सहस्रों मस्तक काट गिराये॥ ११-१२ १/२ ॥

तस्मिन् सैन्यमहावर्ते पातालतलसंनिभे ॥ १३ ॥
निमग्नं तं रथं मत्वा नेदुः संशप्तका मुदा ।

सेनाओंकी उस विशाल भँवरमें जो पातालतलके समान प्रतीत होता था, अर्जुनके उस रथको निमग्न हुआ मानकर संशप्तक सैनिक प्रसन्न हो सिंहनाद करने लगे ॥ १३ १/२ ॥

स पुनस्तानरीन् हत्वा पुनरुत्तरतोऽवधीत् ॥ १४ ॥
दक्षिणेन च पश्चाच्च क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ।
तत्पश्चात् उन शत्रुओंका वध करके पुनः अर्जुनने कुपित हो उत्तर, दक्षिण और पश्चिमकी ओरसे आपकी सेनाका उसी प्रकार संहार आरम्भ किया, जैसे प्रलयकालमें रुद्रदेव पशुओं (जगत्के प्राणियों)-का विनाश करते हैं ॥ १४ १/२ ॥

अथ पञ्चालचेदीनां सृञ्जयानां च मारिष ॥ १५ ॥
त्वदीयैः सह संग्राम आसीत् परमदारुणः ।
माननीय नरेश! फिर आपके सैनिकोंके साथ पाञ्चाल, चेदि और सृजयवीरोंका अत्यन्त भयंकर संग्राम होने लगा ॥ १५ १/२ ॥

कृपश्च कृतवर्मा च शकुनिश्चापि सौबलः ॥ १६ ॥
हृष्टसेनाः सुसंरब्धा रथानीकप्रहारिणः ।
कोसलैः काश्यमत्स्यैश्च कारूषैः केकयैरपि ॥ १७ ॥
शूरसेनैः शूरवरैर्ययुर्युधुर्युद्धदुर्मदाः ।
रथियोंकी सेनामें प्रहार करनेमें कुशल कृपाचार्य, कृतवर्मा और सुबलपुत्र शकुनि—ये रणदुर्मद वीर अत्यन्त कुपित हो हर्षमें भरी हुई सेना साथ लेकर कोसल काशि, मत्स्य, करूष, केकय तथा शूरसेनदेशीय शूरवीरोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १६-१७ १/२ ॥

तेषामन्तकरं युद्धं देहपाप्मासुनाशनम् ॥ १८ ॥
क्षत्रविट्शूद्रवीराणां धर्म्यं स्वर्ग्यं यशस्करम् ।
उनका वह युद्ध क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रवीरोंके शरीर, पाप और प्राणोंका विनाश करनेवाला, संहारकारी, धर्मसंगत स्वर्गदायक तथा यशकी वृद्धि करनेवाला था ॥ १८ १/२ ॥

दुर्योधनोऽथ सहितो भ्रातृभिर्भरतर्षभ ॥ १९ ॥
गुप्तः कुरुप्रवीरैश्च मद्राणां च महारथैः ।
पाण्डवैः सह पञ्चालैश्चेदिभिः सात्यकेन च ॥ २० ॥
युध्यमानं रणे कर्णं कुरुवीरो व्यपालयत् ।
भरतश्रेष्ठ! भाइयोंसहित कुरुवीर दुर्योधन कौरववीरों तथा मद्रदेशीय महारथियोंसे सुरक्षित हो रणभूमिमें पाण्डवों, पांचालों, चेदिदेशके वीरों तथा सात्यकिके साथ जूझते हुए कर्णकी रक्षा करने लगा ॥ १९-२० १/२ ॥

कर्णोऽपि निशितैर्बाणैर्विनिहत्य महाचमूम् ॥ २१ ॥
प्रमृद्य च रथश्रेष्ठान् युधिष्ठिरमपीडयत् ।

कर्ण भी अपने पैने बाणोंसे विशाल पाण्डवसेनाको हताहत करके बड़े-बड़े रथियोंको धूलमें मिलाकर युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगा ।। २१ १/२ ।।
विवस्त्रायुधदेहासून् कृत्वा शत्रून् सहस्रशः ।। २२ ।।
युक्त्वा स्वर्गयशोभ्यां च स्वेभ्यो मुदमुदावहत् ।
वह सहस्रों शत्रुओंको वस्त्र, आयुध शरीर और प्राणोंसे शून्य करके उन्हें स्वर्ग और सुयशसे संयुक्त करता हुआ आत्मीयजनोंको आनन्द प्रदान करने लगा ।।
एवं मारिष संग्रामो नरवाजिगजक्षयः ।
कुरूणां सृञ्जयानां च देवासुरसमोऽभवत् ।। २३ ।।
मान्यवर! इस प्रकार मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंका विनाश करनेवाला वह कौरवों तथा सृंजयोंका युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर था ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1943)

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अष्टचत्वारिं‍शोऽध्यायः

कर्णके द्वारा बहुत-से योद्धाओंसहित पाण्डव-सेनाका संहार, भीमसेनके द्वारा कर्णपुत्र भानुसेनका वध, नकुल और सात्यकिके साथ वृषसेनका युद्ध तथा कर्णका राजा युधिष्ठिरपर आक्रमण

धृतराष्ट्र उवाच

यत्तत् प्रविश्य पार्थानां सैन्यं कुर्वञ्जनक्षयम् । कर्णो राजानमभ्येत्य तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥ **धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! कर्ण कुन्तीपुत्रोंकी सेनामें प्रवेश करके राजा युधिष्ठिरके पास पहुँचकर जो जनसंहार कर रहा था, उसका समाचार मुझे सुनाओ ॥ १ ॥ के च प्रवीराः पार्थानां युधि कर्णमवारयन् । कांश्च प्रमथ्याधिरथिर्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ २ ॥ उस समय पाण्डवपक्षके किन-किन प्रमुख वीरोंने युद्धस्थलमें कर्णको आगे बढ़नेसे रोका और किन-किनको रौंदकर सूतपुत्र कर्णने युधिष्ठिरको पीड़ित किया ॥ २ ॥

संजय उवाच

धृष्टद्युम्नमुखान् पार्थान् दृष्ट्वा कर्णो व्यवस्थितान् । समभ्यधावत्त्वरितः पञ्चालान् शत्रुकर्षणः ॥ ३ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! कर्णने धृष्टद्युम्न आदि पाण्डववीरोंको खड़ा देख बड़ी उतावलीके साथ शत्रुसंहारकारी पांचालोंपर धावा किया ॥ ३ ॥ तं तूर्णमभिधावन्तं पञ्चाला जितकाशिनः । प्रत्युद्ययुर्महात्मानं हंसा इव महार्णवम् ॥ ४ ॥ विजयसे उल्लसित होनेवाले पांचाल वीर शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करते हुए महामना कर्णकी अगवानीके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे हंस महासागरकी ओर बढ़ते हैं ॥ ४ ॥ ततः शङ्खसहस्राणां निःस्वनो हृदयङ्गमः । प्रादुरासीदुभयतो भेरीशब्दश्च दारुणः ॥ ५ ॥ तदनन्तर दोनों सेनाओंमें सहसा सहस्रों शंखोंकी ध्वनि प्रकट हुई, जो हृदयको कम्पित कर देती थी। साथ ही भयंकर भेरीनाद भी होने लगा ॥ ५ ॥ नानाबाणनिपाताश्च द्विपाश्वरथनिःस्वनः ।

सिंहनादश्च वीराणामभवद् दारुणस्तदा ॥ ६ ॥
उस समय नाना प्रकारके बाणोंके गिरने, हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हींसने, रथके घरघराने तथा वीरोंके सिंहनाद करनेका दारुण शब्द वहाँ गूँज उठा ॥ ६ ॥

साद्रिद्रुमार्णवा भूमिः सवाताम्बुदमम्बरम् ।
सार्केन्दुग्रहनक्षत्रा द्यौश्च व्यक्तं विघूर्णिता ॥ ७ ॥
पर्वत, वृक्ष और समुद्रोंसहित पृथ्वी, वायु तथा मेघोंसहित आकाश एवं सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित स्वर्ग स्पष्ट ही घूमते-से जान पड़े ॥ ७ ॥

इति भूतानि तं शब्दं मेनिरे ते च विव्यथुः ।
यानि चाप्यल्पसत्त्वानि प्रायस्तानि मृतानि च ॥ ८ ॥
इस प्रकार समस्त प्राणियोंने उस तुमुल नादको सुना और सब-के-सब व्यथित हो उठे। उनमें जो दुर्बल प्राणी थे, वे प्रायः मर गये ॥ ८ ॥

अथ कर्णो भृशं क्रुद्धः शीघ्रमस्त्रमुदीरयन् ।
जघान पाण्डवीं सेनामासुरीं मघवानिव ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् जैसे इन्द्र असुरोंकी सेनाका विनाश करते हैं, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए कर्णने शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाकर पाण्डव-सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ ९ ॥

स पाण्डवबलं कर्णः प्रविश्य विसृजञ्छरान् ।
प्रभद्रकाणां प्रवरानहनत् सप्तसप्ततिम् ॥ १० ॥
पाण्डवोंकी सेनामें प्रवेश करके बाणोंकी वर्षा करते हुए कर्णने प्रभद्रकोंके सतहत्तर प्रमुख वीरोंको मार डाला ॥ १० ॥

ततः सुपुङ्खैर्निशितै रथश्रेष्ठो रथेष्षुभिः ।
अवधीत् पञ्चविंशत्या पञ्चालान् पञ्चविंशतिम् ॥ ११ ॥
तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने सुन्दर पंखवाले पचीस पैने बाणोंद्वारा पचीस पांचालोंको कालके गालमें भेज दिया ॥ ११ ॥

सुवर्णपुङ्खैर्नाराचैः परकायविदारणैः ।
चेदिकानवधीद् वीरः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १२ ॥
वीर कर्णने शत्रुओंके शरीरको विदीर्ण कर देनेवाले सुवर्णमय पंखयुक्त नाराचोंद्वारा सैकड़ों और हजारों चेदिदेशीय वीरोंका वध कर डाला ॥ १२ ॥

तं तथा समरे कर्म कुर्वाणमतिमानुषम् ।
परिवव्रुर्महाराज पञ्चालानां रथव्रजाः ॥ १३ ॥
महाराज! इस प्रकार समरांगणमें अलौकिक कर्म करनेवाले कर्णको पांचाल रथियोंने चारों ओरसे घेर लिया ॥

ततः संधाय विशिखान् पञ्च भारत दुःसहान् ।
पञ्चालानवधीत् पञ्च कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥ १४ ॥

भानुदेवं चित्रसेनं सेनाविन्दुं च भारत ।
तपनं शूरसेनं च पञ्चालानहनद् रणे ॥ १५ ॥
भारत! तब उस रणक्षेत्रमें धर्मात्मा वैकर्तन कर्णने पाँच दुःसह बाणोंका संधान करके भानुदेव, चित्रसेन, सेनाविन्दु, तपन तथा शूरसेन—इन पाँच पांचाल वीरोंका संहार कर दिया ॥ १४-१५ ॥
पञ्चालेषु च शूरेषु वध्यमानेषु सायकैः ।
हाहाकारो महानासीत् पञ्चालानां महाहवे ॥ १६ ॥
उस महासमरमें बाणोंद्वारा उन शूरवीर पांचालोंके मारे जानेपर पांचालोंकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया ॥ १६ ॥
परिवव्रुर्महाराज पञ्चालानां रथा दश ।
पुनरेव च तान् कर्णो जघानाशु पतत्रिभिः ॥ १७ ॥
महाराज! फिर दस पांचाल महारथियोंने आकर कर्णको घेर लिया, परंतु कर्णने अपने बाणोंद्वारा पुनः उन सबको तत्काल मार डाला ॥ १७ ॥
चक्ररक्षौ तु कर्णस्य पुत्रौ मारिष दुर्जयौ ।
सुषेणः सत्यसेनश्च त्यक्त्वा प्राणानयुध्यताम् ॥ १८ ॥
माननीय नरेश! कर्णके दो दुर्जय पुत्र सुषेण और चित्रसेन उसके पहियोंकी रक्षामें तत्पर हो प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते थे ॥ १८ ॥
पृष्ठगोप्ता तु कर्णस्य ज्येष्ठः ओ महारथः ।
वृषसेनः स्वयं कर्णं पृष्ठतः पर्यपालयत् ॥ १९ ॥
कर्णका ज्येष्ठ पुत्र महारथी वृषसेन पृष्ठरक्षक था। वह स्वयं ही कर्णके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहा था ॥
धृष्टद्युम्नः सात्यकिश्च द्रौपदेया वृकोदरः ।
जनमेजयः शिखण्डी च प्रवीराश्च प्रभद्रकाः ॥ २० ॥
चेदिकेकयपाञ्चाला यमौ मत्स्याश्च दंशिताः ।
समभ्यधावन् राधेयं जिघांसन्तः प्रहारिणम् ॥ २१ ॥
उस समय प्रहार करनेवाले राधापुत्र कर्णको मार डालनेकी इच्छासे धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, भीमसेन, जनमेजय, शिखण्डी, प्रमुख प्रभद्रक वीर, चेदि, केकय और पांचाल देशके योद्धा, नकुल-सहदेव तथा मत्स्यदेशीय सैनिकोंने कवचसे सुसज्जित हो उसपर धावा बोल दिया ॥ २०-२१ ॥
त एनं विविधैः शस्त्रैः शरधाराभिरेव च ।
अभ्यवर्षन् विमर्दन्तं प्रावृषीवाम्बुदा गिरिम् ॥ २२ ॥
जैसे वर्षा-ऋतुमें बादल पर्वतपर जलकी धारा गिराते हैं, उसी प्रकार उन पाण्डववीरोंने अपनी सेनाका मर्दन करनेवाले कर्णपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों और बाणधाराओंकी

वृष्टि की ।। २२ ।।
पितरं तु परीप्सन्तः कर्णपुत्राः प्रहारिणः ।
त्वदीयाश्चापरे राजन् वीरा वीरानवारयन् ।। २३ ।।
राजन! उस समय अपने पिताकी रक्षा चाहनेवाले प्रहारकुशल कर्णपुत्र तथा आपकी सेनाके दूसरे-दूसरे वीर पूर्वोक्त पाण्डववीरोंका निवारण करने लगे ।। २३ ।।
सुषेणो भीमसेनस्य छित्त्वा भल्लेन कार्मुकम् ।
नाराचैः सप्तभिर्विद्ध्वा हृदि भीमं ननाद ह ।। २४ ।।
सुषेणने एक भल्लसे भीमसेनके धनुषको काटकर उनकी छातीमें सात नाराचोंका प्रहार करके भयंकर गर्जना की ।। २४ ।।
अथान्यद् धनुरदाय सुदृढं भीमविक्रमः ।
सज्यं वृकोदरः कृत्वा सुषेणस्याच्छिनद् धनुः ।। २५ ।।
तदनन्तर भीषण पराक्रम प्रकट करनेवाले भीमसेनने दूसरा सुदृढ़ धनुष लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी और सुषेणके धनुषको काट डाला ।। २५ ।।
विव्याध चैनं दशभिः क्रुद्धो नृत्यन्निवेषुभिः ।
कर्णं च तूर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या शितैः शरैः ।। २६ ।।
साथ ही कुपित हो नृत्य-से करते हुए भीमने दस बाणोंद्वारा उसे घायल कर दिया और तिहत्तर पैने बाणोंसे तुरंत ही कर्णको भी पाट दिया ।। २६ ।।
भानुसेनं च दशभिः साश्वसूतायुधध्वजम् ।
पश्यतां सुहृदां मध्ये कर्णपुत्रमपातयत् ।। २७ ।।
इतना ही नहीं, उन्होंने हितैषी सुहृदोंके बीचमें उनके देखते-देखते कर्णके पुत्र भानुसेनको दस बाणोंसे घोड़े, सारथि, आयुध और ध्वजोंसहित मार गिराया ।। २७ ।।
क्षरप्रणुन्नं तत्तस्य शिरश्चन्द्रनिभाननम् ।
शुभदर्शनमेवासीन्नालभ्रष्टमिवाम्बुजम् ।। २८ ।।
भीमसेनके क्षुरसे कटा हुआ चन्द्रोपम मुखसे युक्त भानुसेनका वह मस्तक नालसे कटकर गिरे हुए कमलपुष्पके समान सुन्दर ही दिखायी दे रहा था ।। २८ ।।
हत्वा कर्णसुतं भीमस्तावकान् पुनरार्दयत् ।
कृपहार्दिक्ययोश्छित्त्वा चापौ तावप्यथार्दयत् ।। २९ ।।
कर्णके पुत्रका वध करके भीमसेनने पुनः आपके सैनिकोंका मर्दन आरम्भ किया। कृपाचार्य और कृतवर्माके धनुषोंको काटकर उन दोनोंको भी गहरी चोट पहुँचायी ।। २९ ।।