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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

दुःशासनं त्रिभिर्विद्ध्वा शकुनिं षड्भिरायसैः । उलूकं च पतत्रिं च चकार विरथावुभौ ॥ ३० ॥ तीन बाणोंसे दुःशासनको और छः लोहेके बाणोंसे शकुनिको भी घायल करके उलूक और पतत्रि दोनों वीरोंको रथहीन कर दिया ॥ ३० ॥

सुषेणं च हतोऽसीति ब्रुवन्नादत्त सायकम् । तमस्य कर्णश्चिच्छेद त्रिभिश्चैनमताडयत् ॥ ३१ ॥ फिर सुषेणसे यह कहते हुए बाण हाथमें लिया कि 'अब तू मारा गया।' किंतु कर्णने भीमसेनके उस बाणको काट डाला और तीन बाणोंसे उन्हें भी घायल कर दिया ॥ ३१ ॥

अथान्यं परिजग्राह सुपर्वाणं सुतेजनम् । सुषेणायासृजद् भीमस्तमप्यस्याच्छिनद् वृषः ॥ ३२ ॥ तब भीमसेनने सुन्दर गाँठ और तेज धारवाले दूसरे बाणको हाथमें लिया और उसे सुषेणपर चला दिया; किंतु कर्णने उसको भी काट डाला ॥ ३२ ॥

पुनः कर्णस्त्रिसप्तत्या भीमसेनमथेषुभिः । पुत्रं परीप्सन् विव्याध क्रूरं क्रूरैर्जिघांसया ॥ ३३ ॥

फिर पुत्रके प्राण बचानेकी इच्छासे कर्णने क्रूर भीमसेनको मार डालनेकी अभिलाषा लेकर उनपर तिहत्तर बाणोंका प्रहार किया ।। ३३ ।।
सुषेणस्तु धनुर्गृह्य भारसाधनमुत्तमम् ।
नकुलं पञ्चभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।। ३४ ।।
तब सुषेणने महान् भारको सह लेनेवाले श्रेष्ठ धनुषको हाथमें लेकर नकुलकी दोनों भुजाओं और छातीमें पाँच बाणोंका प्रहार किया ।। ३४ ।।
नकुलस्तं तु विंशत्या विद्ध्वा भारसहैर्दृढैः ।
ननाद बलवन्नादं कर्णस्य भयमादधत् ।। ३५ ।।
नकुलने भी भार सहन करनेमें समर्थ बीस सुदृढ़ बाणोंद्वारा सुषेणको घायल करके कर्णके मनमें भय उत्पन्न करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ।। ३५ ।।
तं सुषेणो महाराज विद्ध्वा दशभिराशुगैः ।
चिच्छेद च धनुः शीघ्रं क्षुरप्रेण महारथः ।। ३६ ।।
महाराज! महारथी सुषेणने दस बाणोंसे नकुलको चोट पहुँचाकर शीघ्र ही एक क्षुरप्रके द्वारा उनका धनुष काट दिया ।। ३६ ।।
अथान्यद् धनुरदाय नकुलः क्रोधमूर्च्छितः ।
सुषेणं नवभिर्बाणैर्वारयामास संयुगे ।। ३७ ।।
तब क्रोधसे अचेत-से होकर नकुलने दूसरा धनुष हाथमें लिया और सुषेणको नौ बाण मारकर उसे युद्धस्थलमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। ३७ ।।
स तु बाणैर्दिशो राजन्नाच्छाद्य परवीरहा ।
आजघ्ने सारथिं चास्य सुषेणं च ततस्त्रिभिः ।। ३८ ।।
चिच्छेद चास्य सुदृढं धनुर्भल्लैस्त्रिभिस्त्रिधा ।
राजन्! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले नकुलने अपने बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करके फिर तीन बाणोंसे सुषेण और उसके सारथिको भी घायल कर दिया। साथ ही तीन भल्ल मारकर उसके सुदृढ़ धनुषके तीन टुकड़े कर डाले ।। ३८ १/२ ।।
अथान्यद् धनुरदाय सुषेणः क्रोधमूर्च्छितः ।। ३९ ।।
आविध्यन्नकुलं षष्ट्या सहदेवं च सप्तभिः ।
तब क्रोधसे मूर्च्छित हुए सुषेणने दूसरा धनुष लेकर नकुलको साठ और सहदेवको सात बाणोंसे घायल कर दिया ।। ३९ १/२ ।।
तद् युद्धं सुमहद् घोरमासीद् देवासुरोपमम् ।। ४० ।।
निघ्नतां सायकैस्तूर्णमन्योन्यस्य वधं प्रति ।
बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक एक-दूसरेके वधके लिये चोट करते हुए वीरोंका वह महान् युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था ।। ४० १/२ ।।
(सात्यकिर्वृषसेनं तु विद्ध्वा सप्तभिरायसैः ।

पुनर्विव्याध सप्तत्या सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥
सात्यकिने लोहेके बने हुए सात बाणोंसे वृषसेनको घायल करके फिर सत्तर बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही तीन बाणोंसे उसके सारथिको भी बींध डाला।

वृषसेनस्तु शैनेयं शरेणानतपर्वणा ।
आजघान महाराज शङ्खदेशे महारथम् ॥
महाराज! वृषसेनने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे महारथी सात्यकिके कपालमें आघात किया।

शैनेयो वृषसेनेन पत्रिणा परिपीडितः ।
कोपं चक्रे महाराज क्रुद्धो वेगं च दारुणम् ॥
जग्राहेषुवरान् वीरः शीघ्रं वै दश पञ्च च ।)
महाराज! वृषसेनके उस बाणसे अत्यन्त पीड़ित होनेपर वीर सात्यकिको बड़ा क्रोध हुआ। क्रुद्ध होनेपर उन्होंने भयंकर वेग प्रकट किया और शीघ्र ही पंद्रह श्रेष्ठ बाण हाथमें ले लिये।

सात्यकिर्वृषसेनस्य सूतं हत्वा त्रिभिः शरैः ॥ ४१ ॥
धनुश्चिच्छेद भल्लेन जघानाश्वांश्च सप्तभिः ।
ध्वजमेकेषुणोन्मथ्य त्रिभिस्तं हृद्यताडयत् ॥ ४२ ॥
उनमेंसे तीन बाणोंद्वारा सात्यकिने वृषसेनके सारथिको मारकर एकसे उसका धनुष काट दिया और सात बाणोंसे उसके घोड़ोंको मार डाला। फिर एक बाणसे उसके ध्वजाको खण्डित करके तीन बाणोंसे वृषसेनकी छातीमें भी चोट पहुँचायी ॥ ४१-४२ ॥

अथावसन्नः स्वरथे मुहूर्तात् पुनरुत्थितः ।
स रणे युयुधानेन विसूताश्वरथध्वजः ॥ ४३ ॥
कृतो जिघांसुः शैनेयं खड्गचर्मधृगभ्ययात् ।
इस प्रकार रणक्षेत्रमें युयुधानके द्वारा सारथि, अश्व एवं रथकी ध्वजासे रहित किया हुआ वृषसेन दो घड़ीतक अपने रथपर ही शिथिल-सा होकर बैठा रहा। फिर उठकर सात्यकिको मार डालनेकी इच्छासे ढाल और तलवार लेकर उनकी ओर बढ़ा ॥ ४३ १/२ ॥

तस्य चापततः शीघ्रं वृषसेनस्य सात्यकिः ॥ ४४ ॥
वाराहकर्णैर्दशभिर्विध्यदसिचर्मणी ।
इस प्रकार आक्रमण करते हुए वृषसेनकी तलवार और ढालको सात्यकिने वाराहकर्ण नामक दस बाणोंद्वारा शीघ्र ही खण्डित कर दिया ॥ ४४ १/२ ॥

दुःशासनस्तु तं दृष्ट्वा विरथं व्यायुधं कृतम् ॥ ४५ ॥
आरोप्य स्वरथं तूर्णमपोवाह रणातुरम् ।
तब दुःशासनने वृषसेनको रथ और अस्त्र-शस्त्रोंसे हीन हुआ देख उसे रणसे व्याकुल हुआ मानकर तुरंत ही अपने रथपर बिठा लिया और वहाँसे दूर हटा दिया ॥ ४५ १/२ ॥

अथान्यं रथमास्थाय वृषसेनो महारथः ॥ ४६ ॥

द्रौपदेयांस्त्रिसप्तत्या युयुधानं च पञ्चभिः ।

भीमसेनं चतुःषष्ट्या सहदेवं च पञ्चभिः ॥ ४७ ॥

नकुलं त्रिंशता बाणैः शतानीकं च सप्तभिः ।

शिखण्डिनं च दशभिर्धर्मराजं शतेन च ॥ ४८ ॥

एतांश्चान्यांश्च राजेन्द्र प्रवीराञ्जयगृद्धिनः ।

अभ्यर्दयन्महेष्वासः कर्णपुत्रो विशाम्पते ॥ ४९ ॥

कर्णस्य युधि दुर्धर्षस्ततः पृष्ठमपालयत् ।

तदनन्तर महारथी वृषसेनने दूसरे रथपर बैठकर तिहत्तर बाणोंसे द्रौपदीके पुत्रोंको,

पाँचसे युयुधानको, चौंसठसे भीमसेनको, पाँचसे सहदेवको, तीन बाणोंसे नकुलको, सातसे

शतानीकको, दस बाणोंसे शिखण्डीको और सौ बाणोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको घायल कर

दिया। राजेन्द्र! प्रजानाथ! महाधनुर्धर कर्णपुत्रने विजयकी अभिलाषा रखनेवाले इन सभी

प्रमुख वीरोंको तथा दूसरोंको भी अपने बाणोंसे पीड़ित कर दिया। तत्पश्चात् वह दुर्धर्ष वीर

युद्धस्थलमें पुनः कर्णके पृष्ठभागकी रक्षा करने लगा ॥ ४६-४९ १/२ ॥

दुःशासनं च शैनेयो नवैर्नवभिरायसैः ॥ ५० ॥

विसूताश्वरथं कृत्वा ललाटे त्रिभिरार्पयत् ।

सात्यकिने लोहेके बने हुए नौ नूतन बाणोंसे दुःशासनको सारथि, घोड़ों और रथसे

वंचित करके उसके ललाटमें तीन बाण मारे ॥ ५० १/२ ॥

स त्वन्यं रथमास्थाय विधिवत् कल्पितं पुनः ॥ ५१ ॥

युयुधे पाण्डुभिः सार्धं कर्णस्याप्याययन् बलम् ।

दुःशासन विधिपूर्वक सजाये हुए दूसरे रथपर बैठकर कर्णके बलको बढ़ाता हुआ पुनः

पाण्डवोंके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५१ १/२ ॥

धृष्टद्युम्नस्ततः कर्णमविध्यद् दशभिः शरैः ॥ ५२ ॥

द्रौपदेयांस्त्रिसप्तत्या युयुधानस्तु सप्तभिः ।

भीमसेनश्चतुःषष्ट्या सहदेवश्च सप्तभिः ॥ ५३ ॥

नकुलस्त्रिंशता बाणैः शतानीकस्तु सप्तभिः ।

शिखण्डी दशभिर्वीरो धर्मराजः शतेन तु ॥ ५४ ॥

तदनन्तर धृष्टद्युम्नने कर्णको दस बाणोंसे बींध डाला। फिर द्रौपदीके पुत्रोंने तिहत्तर,

सात्यकिने सात, भीमसेनने चौंसठ, सहदेवने सात, नकुलने तीस, शतानीकने सात,

शिखण्डीने दस और वीर धर्मराज युधिष्ठिरने सौ बाण कर्णको मारे ॥ ५२-५४ ॥

एते चान्ये च राजेन्द्र प्रवीरा जयगृद्धिनः ।

अभ्यर्दयन् महेष्वासं सूतपुत्रं महामृधे ॥ ५५ ॥

राजेन्द्र! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले इन प्रमुख वीरों तथा दूसरोंने भी उस महासमरमें महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्णको बाणोंद्वारा पीड़ित कर दिया ।। ५५ ।।
तान् सूतपुत्रो विशिखैर्दशभिर्दशभिः शरैः ।
रथेनानुचरन् वीरः प्रत्यविध्यदरिंदमः ।। ५६ ।।
रथसे विचरनेवाले शत्रुदमन वीर सूतपुत्र कर्णने भी उन सबको दस-दस बाणोंसे घायल कर दिया ।। ५६ ।।
तत्रास्त्रवीर्यं कर्णस्य लाघवं च महात्मनः ।
अपश्याम महाभाग तदद्भुतमिवाभवत् ।। ५७ ।।
महाभाग! हमने महामना कर्णके अस्त्र-बल और फुर्तीको वहाँ अपनी आँखों देखा था। वह सब कुछ अद्भुत-सा प्रतीत होता था ।। ५७ ।।
न ह्याददानं ददृशुः संदधानं च सायकान् ।
विमुञ्चन्तं च संरम्भादपश्यन्त हतानरीन् ।। ५८ ।।
वह कब तरकससे बाण निकालता है, कब धनुषपर रखता है और कब क्रोधपूर्वक शत्रुओंपर छोड़ देता है, यह सब किसीने नहीं देखा। सब लोग मारे जाते हुए शत्रुओंको ही देखते थे ।। ५८ ।।
(प्रतीच्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्राच्यां पश्याम लाघवात् ।
न तं पश्याम राजेन्द्र क्व नु कर्णोऽधितिष्ठति ।।
राजेन्द्र! हमलोग एक ही क्षणमें कर्णको पश्चिम दिशामें देखकर उसकी फुर्तीके कारण उसे पूर्व दिशामें भी देखते थे। इस समय कर्ण कहाँ खड़ा है, यह हमलोग नहीं देख पाते थे।
इषूनेव स्म पश्यामो विनिकीर्णान् समन्ततः ।
छादयानान् दिशो राजञ्शलभानामिव व्रजान् ।।)
राजन्! सब ओर बिखरे हुए उसके बाण ही हमें दिखायी देते थे, जो टिड्डीदलोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित किये रहते थे।
द्यौर्वियद्भूदिशश्चैव प्रपूर्णा निशितैः शरैः ।
अरुणाभ्रावृताकारं तस्मिन् देशे बभौ वियत् ।। ५९ ।।
द्युलोक, आकाश, भूमि और सम्पूर्ण दिशाएँ पैने बाणोंसे खचाखच भर गयी थीं। उस प्रदेशमें आकाश अरुण रंगके बादलोंसे ढका हुआ-सा जान पड़ता था ।। ५९ ।।
नृत्यन्निव हि राधेयश्चापहस्तं प्रतापवान् ।
यैर्विद्धः प्रत्यविध्यत् तानेकेकं त्रिगुणैः शरैः ।। ६० ।।
प्रतापी राधापुत्र कर्ण हाथमें धनुष लेकर नृत्य-सा कर रहा था। जिन-जिन योद्धाओंने उसे एक बाणसे घायल किया, उनमेंसे प्रत्येकको उसने तीन गुने बाणोंसे बींध डाला ।। ६० ।।
दशभिर्दशभिश्चैतान् पुनर्विद्ध्वा ननाद च ।

साश्वसूतरथच्छत्रांस्ततस्ते विवरं ददुः ॥ ६१ ॥ फिर दस-दस बाणोंसे घोड़ों, सारथि, रथ और छत्रोंसहित इन सबको घायल करके कर्णने सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया। फिर तो उन शत्रुओंने उसे आगे बढ़नेके लिये जगह दे दी ॥ ६१ ॥ तान् प्रमथ्य महेष्वासान् राधेयः शरवृष्टिभिः । राजानीकमसम्बाधं प्राविशच्छत्रुकर्शनः ॥ ६२ ॥ शत्रुओंका संहार करनेवाले राधापुत्र कर्णने अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उन महाधनुर्धरोंको रौंदकर राजा युधिष्ठिरकी सेनामें बेरोक-टोक प्रवेश किया ॥ ६२ ॥ स रथांस्त्रिशतं हत्वा चेदीनामनिवर्तिनाम् । राधेयो निशितैर्बाणैस्ततोऽभ्यार्च्छद् युधिष्ठिरम् ॥ ६३ ॥ उसने युद्धसे पीछे न हटनेवाले तीन सौ चेदिदेशीय रथियोंको अपने पैने बाणोंद्वारा मारकर युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ ६३ ॥ ततस्ते पाण्डवा राजन् शिखण्डी च ससात्यकिः । राधेयात् परिरक्षन्तो राजानं पर्यवारयन् ॥ ६४ ॥ राजन्! तब पाण्डवों, शिखण्डी और सात्यकिने राधापुत्र कर्णसे राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करनेके लिये उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ ६४ ॥ तथैव तावकाः सर्वे कर्णं दुर्वारणं रणे । यत्ताः शूरा महेष्वासाः पर्यरक्षन्त सर्वशः ॥ ६५ ॥ इसी प्रकार आपके सभी महाधनुर्धर शूरवीर योद्धा रणमें अनिवार्य गतिसे विचरनेवाले कर्णकी सब ओरसे प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे ॥ ६५ ॥ नानावादित्रघोषाश्च प्रादुरासन् विशाम्पते । सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणामभिगर्जताम् ॥ ६६ ॥ प्रजानाथ! उस समय नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनि होने लगी और सब ओरसे गर्जना करनेवाले शूरवीरोंका सिंहनाद सुनायी देने लगा ॥ ६६ ॥ ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः । युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ ६७ ॥ तदनन्तर पुनः कौरव और पाण्डव योद्धा निर्भय होकर एक-दूसरेसे भिड़ गये। एक ओर युधिष्ठिर आदि कुन्तीपुत्र थे और दूसरी ओर कर्ण आदि हमलोग ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७२ १/२ श्लोक हैं)

कर्ण और युधिष्ठिरका संग्राम, कर्णकी मूर्च्छा, कर्णद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय और तिरस्कार तथा पाण्डवोंके हजारों योद्धाओंका वध और रक्त-नदीका वर्णन तथा पाण

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कर्ण और युधिष्ठिरका संग्राम, कर्णकी मूर्च्छा, कर्णद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय और तिरस्कार तथा पाण्डवोंके हजारों योद्धाओंका वध और रक्त-नदीका वर्णन तथा पाण्डव महारथियोंद्वारा कौरव-सेनाका विध्वंस और उसका पलायन

संजय उवाच

विदार्य कर्णस्तां सेनां युधिष्ठिरमथाद्रवत् ।
रथहस्त्यश्वपत्तीनां सहस्रैः परिवारितः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! सहस्रों रथ, हाथी, घोड़े और पैदलोंसे घिरे हुए कर्णने उस सेनाको विदीर्ण करके युधिष्ठिरपर धावा किया ॥ १ ॥

नानायुधसहस्राणि प्रेरितान्यरिभिर्वृषः ।
छित्त्वा बाणशतैरुग्रैस्तानविध्यदसम्भ्रमात् ॥ २ ॥
धर्मात्मा कर्णने शत्रुओंके चलाये हुए नाना प्रकारके हजारों अस्त्र-शस्त्रोंको काटकर उन सबको सैकड़ों उग्र बाणोंद्वारा बिना किसी घबराहटके बींध डाला ॥ २ ॥

निचकर्त शिरांस्येषां बाहूनूरूंश्च सूतजः ।
ते हता वसुधां पेतुर्भग्नाश्चान्ये विदुद्रुवुः ॥ ३ ॥
सूतपुत्रने पाण्डव-सैनिकोंके मस्तकों, भुजाओं और जाँघोंको काट डाला। वे मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े और दूसरे बहुत-से योद्धा घायल होकर भाग गये ॥ ३ ॥

द्राविडास्तु निषादास्तु पुनः सात्यकिचोदिताः ।
अभ्यद्रवञ्जिघांसन्तः पत्तयः कर्णमाहवे ॥ ४ ॥
तब सात्यकिसे प्रेरित होकर द्रविड और निषाद देशोंके पैदल सैनिक कर्णको युद्धमें मार डालनेकी इच्छासे पुनः उसपर टूट पड़े ॥ ४ ॥

ते विबाहुशिरस्त्राणाः प्रहताः कर्णसायकैः ।
पेतुः पृथिव्यां युगपच्छिन्नं शालवनं यथा ॥ ५ ॥
परंतु कर्णके बाणोंसे घायल होकर बाहु, मस्तक और कवच आदिसे रहित हो वे कटे हुए शालवनके समान एक साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५ ॥

एवं योधशतान्याजौ सहस्राण्ययुतानि च ।
हतानीयुर्महीं देहैर्यशसा पूरयन् दिशः ॥ ६ ॥

इस प्रकार युद्धस्थलमें मारे गये सैकड़ों, हजार और दस हजार योद्धा शरीरसे तो इस पृथ्वीपर गिर पड़े, किंतु अपने यशसे उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंको पूर्ण कर दिया ।।

अथ वैकर्तनं कर्णं रणे क्रुद्धमिवान्तकम् ।
रुरुधुः पाण्डुपाञ्चाला व्याधिं मन्त्रौषधैरिव ।। ७ ।।
तदनन्तर रणक्षेत्रमें कुपित हुए यमराजके समान वैकर्तन कर्णको पाण्डवों और पांचालोंने अपने बाणोंद्वारा उसी प्रकार रोक दिया, जैसे चिकित्सक मन्त्रों और औषधोंसे रोगोंकी रोकथाम कर लेते हैं ।। ७ ।।

स तान् प्रमृद्याभ्यपतत् पुनरेव युधिष्ठिरम् ।
मन्त्रौषधिक्रियातीतो व्याधिरत्युल्बणो यथा ।। ८ ।।
परंतु मन्त्र और ओषधियोंकी क्रियासे असाध्य भयानक रोगकी भाँति कर्णने उन सबको रौंदकर पुनः युधिष्ठिरपर ही आक्रमण किया ।। ८ ।।

स राजगृद्धिभी रुद्धः पाण्डुपाञ्चालकेकयैः ।
नाशकत् तानतिक्रान्तुं मृत्युर्ब्रह्मविदो यथा ।। ९ ।।
राजाकी रक्षा चाहनेवाले पाण्डवों, पांचालों और केकयोंने पुनः कर्णको रोक दिया। जैसे मृत्यु ब्रह्मवेत्ताओंको नहीं लाँघ सकती, उसी प्रकार कर्ण उन सबको लाँघकर आगे न बढ़ सका ।। ९ ।।

ततो युधिष्ठिरः कर्णमदूरस्थं निवारितम् ।
अब्रवीत् परवीरघ्नं क्रोधसंरक्तलोचनः ।। १० ।।
उस समय युधिष्ठिरने क्रोधसे लाल आँखें करके शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कर्णसे जो पास ही रोक दिया गया था, इस प्रकार कहा— ।। १० ।।

कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्र वचः शृणु ।
सदा स्पर्धसि संग्रामे फाल्गुनेन तरस्विना ।। ११ ।।
तथास्मान् बाधसे नित्यं धार्तराष्ट्रमते स्थितः ।
‘कर्ण! कर्ण! मिथ्यादर्शी सूतपुत्र! मेरी बात सुनो। तुम संग्राममें वेगशाली वीर अर्जुनके साथ सदा डाह रखते और दुर्योधनके मतमें रहकर सर्वदा हमें बाधा पहुँचाते हो ।। ११ १/२ ।।

यद् बलं यच्च ते वीर्यं प्रद्वेषो यस्तु पाण्डुषु ।। १२ ।।
तत् सर्वं दर्शयस्वाद्य पौरुषं महदास्थितः ।
युद्धश्रद्धां च तेऽद्याहं विनेष्यामि महाहवे ।। १३ ।।
‘परंतु आज तुम्हारे पास जितना बल हो, जो पराक्रम हो तथा पाण्डवोंके प्रति तुम्हारे मनमें जो विद्वेष हो, वह सब महान् पुरुषार्थका आश्रय लेकर दिखाओ। आज महासमरमें मैं तुम्हारा युद्धका हौसला मिटा दूँगा’ ।। १२-१३ ।।

एवमुक्त्वा महाराज कर्णं पाण्डुसुतस्तदा ।
सुवर्णपुङ्खैर्दशभिर्विद्ध्वाधायस्मयैः शरैः ।। १४ ।।

महाराज! ऐसा कहकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने लोहेके बने हुए सुवर्णपंखयुक्त दस बाणोंद्वारा कर्णको बींध डाला ॥ तं सूतपुत्रो दशभिः प्रत्यविध्यदरिंदमः । वत्सदन्तैर्महेष्वासः प्रहसन्निव भारत ॥ १५ ॥ भारत! तब शत्रुओंका दमन करनेवाले महाधनुर्धर सूतपुत्रने हँसते हुए-से वत्सदन्त नामक दस बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल कर दिया ॥ १५ ॥ सोऽवज्ञाय तु निर्विद्धः सूतपुत्रेण मारिष । प्रजज्वाल ततः क्रोधाद्धविषेव हुताशनः ॥ १६ ॥ माननीय नरेश! सूतपुत्रके द्वारा अवज्ञापूर्वक घायल किये जानेपर फिर राजा युधिष्ठिर घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान क्रोधसे जल उठे ॥ १६ ॥ ज्वालामालापरिक्षिप्तो राज्ञो देहो व्यदृश्यत । युगान्ते दग्धुकामस्य संवर्ताग्नेरिवापरः ॥ १७ ॥ ज्वालामालाओंसे घिरा हुआ युधिष्ठिरका शरीर प्रलयकालमें जगत्को दग्ध करनेकी इच्छावाले द्वितीय संवर्तक अग्निके समान दिखायी देता था ॥ १७ ॥ ततो विस्फार्य सुमहच्चापं हेमपरिष्कृतम् । समाधत्त शितं बाणं गिरीणामपि दारणम् ॥ १८ ॥ तदनन्तर उन्होंने अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको फैलाकर उसपर पर्वतोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले तीखे बाणका संधान किया ॥ १८ ॥ ततः पूर्णायतोत्कृष्टं यमदण्डनिभं शरम् । मुमोच त्वरितो राजा सूतपुत्रजिघांसया ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने सूतपुत्रको मार डालनेकी इच्छासे तुरंत ही धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर वह यमदण्डके समान बाण उसके ऊपर छोड़ दिया ॥ १९ ॥ स तु वेगवता मुक्तो बाणो वज्राशनिस्वनः । विवेश सहसा कर्णं सव्ये पार्श्वे महारथम् ॥ २० ॥ वेगवान् युधिष्ठिरका छोड़ा हुआ वज्र और बिजलीके समान शब्द करनेवाला वह बाण सहसा महारथी कर्णकी बायीं पसलीमें घुस गया ॥ २० ॥ स तु तेन प्रहारेण पीडितः प्रमुमोह वै । स्रस्तगात्रो महाबाहुर्धनुरुत्सृज्य स्यन्दने ॥ २१ ॥ उस प्रहारसे पीड़ित हो महाबाहु कर्ण धनुष छोड़कर रथपर ही मूर्च्छित हो गया। उसका सारा शरीर शिथिल हो गया था ॥ २१ ॥ गतासुरिव निश्चेष्टः शल्यस्याभिमुखोऽपतत् । राजापि भूयो नाजघ्ने कर्णं पार्थहितेप्सया ॥ २२ ॥

वह शल्यके सामने ही अचेत होकर ऐसे गिर पड़ा, मानो उसके प्राण निकल गये हों। राजा युधिष्ठिरने अर्जुनके हितकी इच्छासे कर्णपर पुनः प्रहार नहीं किया ॥ २२ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं धार्तराष्ट्रबलं महत् ।
विवर्णमुखभूयिष्ठं कर्णं दृष्ट्वा तथागतम् ॥ २३ ॥
तब कर्णको उस अवस्थामें देखकर दुर्योधनकी सारी विशाल सेनामें हाहाकार मच गया और अधिकांश सैनिकोंके मुखका रंग विषादसे फीका पड़ गया ॥ २३ ॥
सिंहनादश्च संजज्ञे क्ष्वेलाः किलकिलास्तथा ।
पाण्डवानां महाराज दृष्ट्वा राज्ञः पराक्रमम् ॥ २४ ॥
महाराज! राजाका वह पराक्रम देखकर पाण्डव-सैनिकोंमें सिंहनाद, आनन्द, कलरव और किलकिल शब्द होने लगा ॥ २४ ॥
प्रतिलभ्य तु राधेयः संज्ञां नातिचिरादिव ।
दध्रे राजविनाशाय मनः क्रूरपराक्रमः ॥ २५ ॥
तब क्रूर पराक्रमी राधापुत्र कर्णने थोड़ी ही देरमें होशमें आकर राजा युधिष्ठिरको मार डालनेका विचार किया ॥ २५ ॥
स हेमविकृतं चापं विस्फार्य विजयं महत् ।
अवाकिरदमेयात्मा पाण्डवं निशितैः शरैः ॥ २६ ॥
उस अमेय आत्मबलसे सम्पन्न वीरने विजय नामक अपने विशाल सुवर्णजटित धनुषको खींचकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको पैने बाणोंसे ढक दिया ॥ २६ ॥
ततः क्षुराभ्यां पाञ्चाल्यौ चक्ररक्षौ महात्मनः ।
जघान चन्द्रदेवं च दण्डधारं च संयुगे ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् दो क्षुरोंसे महात्मा युधिष्ठिरके चक्ररक्षक दो पांचाल वीर चन्द्रदेव और दण्डधारको युद्धस्थलमें मार डाला ॥ २७ ॥
तावुभौ धर्मराजस्य प्रवीरौ परिपार्श्वतः ।
रथाभ्याशे चकाशेते चन्द्रस्येव पुनर्वसू ॥ २८ ॥
धर्मराजके रथके समीप पार्श्वभागमें वे दोनों प्रमुख पांचाल वीर चन्द्रमाके पास रहनेवाले दो पुनर्वसु नामक नक्षत्रोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २८ ॥
युधिष्ठिरः पुनः कर्णमविध्यत् त्रिंशता शरैः ।
सुषेणं सत्यसेनं च त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ॥ २९ ॥
युधिष्ठिरने पुनः तीस बाणोंसे कर्णको बींध डाला तथा सुषेण और सत्यसेनको भी तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २९ ॥
शल्यं नवत्या विव्याध त्रिसप्तत्या च सूतजम् ।
तांस्तस्य गोप्तॄन् विव्याध त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥ ३० ॥

उन्होंने शल्यको नब्बे और सूतपुत्र कर्णको तिहत्तर बाण मारे। साथ ही उनके रक्षकोंको सीधे जानेवाले तीन-तीन बाणोंसे बेध दिया ।। ३० ।।

ततः प्रहस्याधिरथिर्विधुन्वानः स कार्मुकम् ।
भित्त्वा भल्लेन राजानं विद्ध्वा षष्ट्यानदत्तदा ।। ३१ ।।

तब अधिरथपुत्र कर्णने अपने धनुषको हिलाते हुए हँसकर एक भल्लद्वारा राजा युधिष्ठिरके धनुषको काट दिया और उन्हें भी साठ बाणोंसे घायल करके सिंहके समान गर्जना की ।। ३१ ।।

ततः प्रवीराः पाण्डूनामभ्यधावन्नमर्षिताः ।
युधिष्ठिरं परीप्सन्तः कर्णमभ्यर्दयञ्छरैः ।। ३२ ।।

तदनन्तर अमर्षमें भरे हुए प्रमुख पाण्डव वीर युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये दौड़े आये और कर्णको अपने बाणोंसे पीड़ित करने लगे ।। ३२ ।।

सात्यकिश्चेकितानश्च युयुत्सुः पाण्ड्य एव च ।
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ।। ३३ ।।
यमौ च भीमसेनश्च शिशुपालस्य चात्मजः ।
कारूषा मत्स्यशेषाश्च केकयाः काशिकोसलाः ।। ३४ ।।
एते च त्वरिता वीरा वसुषेणमताडयन् ।

सात्यकि, चेकितान, युयुत्सु, पाण्ड्य, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, प्रभद्रकगण, नकुल-सहदेव, भीमसेन और शिशुपालपुत्र एवं करूष, मत्स्य, केकय, काशि और कोसल-देशोंके योद्धा—ये सभी वीर सैनिक तुरंत ही वसुषेण (कर्ण)-को घायल करने लगे ।। ३३-३४ ½ ।।

जनमेजयश्च पाञ्चाल्यः कर्णं विव्याध सायकैः ।। ३५ ।।
वाराहकर्णनाराचैर्नालीकैर्निशितैः शरैः ।
वत्सदन्तैर्विपाठैश्च क्षुरप्रैश्चटकामुखैः ।। ३६ ।।
नानाप्रहरणैश्चोग्रै रथहस्त्यश्वसादिभिः ।
सर्वतोऽभ्यद्रवत् कर्णं परिवार्य जिघांसया ।। ३७ ।।

पांचालवीर जनमेजयने रथ, हाथी और घुड़सवारोंकी सेना साथ लेकर सब ओरसे कर्णपर धावा किया और उसे मार डालनेकी इच्छासे घेरकर बाण, वाराहकर्ण, नाराच, नालीक, पैने बाण, वत्सदन्त, विपाठ, क्षुरप्र, चटकामुख तथा नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा चोट पहुँचाना आरम्भ किया ।। ३५—३७ ।।

स पाण्डवानां प्रवरैः सर्वतः समभिद्रुतः ।
उदीरयन् ब्राह्ममस्त्रं शरैरापूरयद् दिशः ।। ३८ ।।

पाण्डवपक्षके प्रमुख वीरोंद्वारा सब ओरसे आक्रान्त होनेपर कर्णने ब्रह्मास्त्र प्रकट करके बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ।। ३८ ।।

(ततः पुनरमेयात्मा चेदीनां प्रवरान् दश । न्यहनद् भरतश्रेष्ठ कर्णो वैकर्तनस्तदा ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न वैकर्तन कर्णने चेदिदेशके दस प्रधान वीरोंको पुनः मार डाला। तस्य बाणसहस्राणि सम्प्रपन्नानि मारिष । दृश्यन्ते दिक्षु सर्वासु शलभानामिव व्रजाः ॥ माननीय नरेश! कर्णके गिरते हुए सहस्रों बाण सम्पूर्ण दिशाओंमें टिड्डीदलोंके समान दिखायी देते थे। कर्णनामाङ्किता बाणाः स्वर्णपुङ्खाः सुतेजनाः । नराश्वकायान् निर्भिद्य पेतुरुर्व्यां समन्ततः ॥ उसके नामसे अंकित सुवर्णमय पंखवाले तेज बाण मनुष्यों और घोड़ोंके शरीरोंको विदीर्ण करके सब ओरसे पृथ्वीपर गिरने लगे। कर्णेनैकेन समरे चेदीनां प्रवरा रथाः । संजयानां च सर्वेषां शतशो निहता रणे ॥ समरांगणमें अकेले कर्णने चेदिदेशके प्रधान रथियोंका तथा सम्पूर्ण सृंजयोंके सैकड़ों योद्धाओंका भी संहार कर डाला। कर्णस्य शरसंछन्नं बभूव विपुलं तमः । नाज्ञायत ततः किञ्चित् परेषामात्मनोऽपि वा ॥ कर्णके बाणोंसे सारी दिशाएँ ढक जानेके कारण वहाँ महान् अन्धकार छा गया। उस समय शत्रुपक्षकी तथा अपने पक्षकी भी कोई वस्तु पहचानी नहीं जाती थी। तस्मिंस्तमसि भूते च क्षत्रियाणां भयंकरे । विचचार महाबाहुर्निर्दहन् क्षत्रियान् बहून् ॥) शत्रुओंके लिये भयदायक उस घोर अन्धकारमें महाबाहु कर्ण बहुसंख्यक राजपूतोंको दग्ध करता हुआ विचरने लगा। ततः शरमहाज्वालो वीर्योष्मा कर्णपावकः । निर्दहन् पाण्डववनं वीरः पर्यचरद् रणे ॥ ३९ ॥ उस समय वीर कर्ण अग्निके समान हो रहा था। बाण ही उसकी ऊँचेतक उठती हुई ज्वालाओंके समान थे, पराक्रम ही उसका ताप था और वह पाण्डवरूपी वनको दग्ध करता हुआ रणभूमिमें विचर रहा था ।। ३९ ।। (ततस्तेषां महाराज पाण्डवानां महारथाः । सृञ्जयानां च सर्वेषां शतशोऽथ सहस्रशः ॥ अस्त्रैः कर्णं महेष्वासं समन्तात् पर्यवारयन् ।)

महाराज! तब सम्पूर्ण संजयों और पाण्डवोंके सैकड़ों-हजारों महारथियोंने महाधनुर्धर कर्णपर बाणोंकी वर्षा करते हुए उसे चारों ओरसे घेर लिया।

स संधाय महास्त्राणि महेष्वासा महामनाः ।
प्रहस्य पुरुषेन्द्रस्य शरैश्चिच्छेद कार्मुकम् ॥ ४० ॥
महाधनुर्धर महामना कर्णने हँसकर महान् अस्त्रोंका संधान किया और अपने बाणोंसे महाराज युधिष्ठिरका धनुष काट दिया ॥ ४० ॥

ततः संधाय नवतिं निमेषान्तरपर्वणाम् ।
बिभेद कवचं राज्ञो रणे कर्णः शितैः शरैः ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् पलक मारते-मारते झुकी हुई गाँठवाले नब्बे बाणोंका संधान करके कर्णने उन पैने बाणोंद्वारा रणभूमिमें राजा युधिष्ठिरके कवचको छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ४१ ॥

तद् वर्म हेमविकृतं रत्नचित्रं बभौ पतत् ।
सविद्युदभ्रं सवितुः श्लिष्टं वातहतं यथा ॥ ४२ ॥
उनका वह सुवर्णभूषित रत्नजटित कवच गिरते समय ऐसी शोभा पा रहा था, मानो सूर्यसे सटा हुआ बिजलीसहित बादल वायुका आघात पाकर नीचे गिर रहा हो ॥ ४२ ॥

तदङ्गात् पुरुषेन्द्रस्य भ्रष्टं वर्म व्यरोचत ।
रत्नैरलंकृतं चित्रैर्व्यभ्रं निशि यथा नभः ॥ ४३ ॥
छिन्नवर्मा शरैः पार्थो रुधिरेण समुक्षितः ।
जैसे रात्रिमें बिना बादलका आकाश नक्षत्रमण्डलसे विचित्र शोभा धारण करता है, उसी प्रकार नरेन्द्र युधिष्ठिरके शरीरसे गिरा हुआ वह कवच विभिन्न रत्नोंसे अलंकृत होनेके कारण अद्भुत शोभा पा रहा था। बाणोंसे कवच कट जानेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर रक्तसे भीग गये ॥ ४३ ½ ॥

(बभासे पुरुषश्रेष्ठ उद्यन्निव दिवाकरः ।
स शराचितसर्वाङ्गश्छिन्नवर्माथ संयुगे ॥
क्षत्रधर्मं समास्थाय सिंहनादमकुर्वत ।)
उस समय युद्धस्थलमें पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिर उगते हुए सूर्यके समान लाल दिखायी देते थे। उनके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे और कवच छिन्न-भिन्न हो गया था, तो भी वे क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेकर वहाँ सिंहके समान दहाड़ रहे थे।

ततः सर्वायसीं शक्तिं चिक्षेपाधिरथिं प्रति ॥ ४४ ॥
तां ज्वलन्तीमिवाकाशे शरैश्चिच्छेद सप्तभिः ।
सा छिन्ना भूमिमगमन्महेष्वासस्य सायकैः ॥ ४५ ॥
उन्होंने अधिरथपुत्र कर्णपर सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई शक्ति चलायी, परंतु उसने सात बाणोंद्वारा उस प्रज्वलित शक्तिको आकाशमें ही काट डाला। महाधनुर्धर कर्णके सायकोंसे कटी हुई वह शक्ति पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४४-४५ ॥

ततो बाह्वोर्ललाटे च हृदि चैव युधिष्ठिरः । चतुर्भिस्तोमरैः कर्णं ताडयित्वानदन्मुदा ॥ ४६ ॥ तत्पश्चात् युधिष्ठिरने कर्णकी दोनों भुजाओं, ललाट और छातीमें चार तोमरोंका प्रहार करके सानन्द सिंहनाद किया ॥ ४६ ॥ उद्भिन््नरुधिरः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् । ध्वजं चिच्छेद भल्लेन त्रिभिर्विव्याध पाण्डवम् ॥ ४७ ॥ इषुधी चास्य चिच्छेद रथं च तिलशोऽच्छिनत् । कर्णके शरीरसे रक्त बहने लगा। फिर तो क्रोधमें भरे हुए सर्पके समान फुफकारते हुए कर्णने एक भल्लसे युधिष्ठिरकी ध्वजा काट डाली और तीन बाणोंसे उन पाण्डुपुत्रको भी घायल कर दिया। उनके दोनों तरकस काट दिये और रथके भी तिल-तिल करके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ४७ १/२ ॥ (एतस्मिन्नन्तरे शूराः पाण्डवानां महारथाः । ववृषुः शरवर्षाणि राधेयं प्रति भारत ॥ भारत! इसी बीचमें शूरवीर पाण्डव महारथी राधापुत्र कर्णपर बाणोंकी वर्षा करने लगे। सात्यकिः पञ्चविंशत्या शिखण्डी नवभिः शरैः । अवर्षतां महाराज राधेयं शत्रुकर्शनम् ॥ महाराज! सात्यकिने शत्रुसूदन राधापुत्रपर पचीस और शिखण्डीने नौ बाणोंकी वर्षा की। शैनेयं तु ततः क्रुद्धः कर्णः पञ्चभिरायसैः । विव्याध समरे राजंस्त्रिभिश्चान्यैः शिलीमुखैः ॥ राजन्! तब क्रोधमें भरे हुए कर्णने समरांगणमें सात्यकिको पहले लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे घायल करके फिर दूसरे तीन बाणोंद्वारा उन्हें बींध डाला। दक्षिणं तु भुजं तस्य त्रिभिः कर्णोऽप्यविध्यत । सव्यं षोडशभिर्बाणैर्यन्तारं चास्य सप्तभिः ॥ इसके बाद कर्णने सात्यकिकी दाहिनी भुजाको तीन, बायीं भुजाको सोलह और सारथिको सात बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया। अथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः । सूतपुत्रोऽनयत् क्षिप्रं यमस्य सदनं प्रति ॥ तदनन्तर चार पैने बाणोंसे सूतपुत्रने सात्यकिके चारों घोड़ोंको भी तुरंत ही यमलोक पहुँचा दिया। अपरेणाथ भल्लेन धनुश्छित्त्वा महारथः । सारथेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ॥

फिर दूसरे भल्लसे महारथी कर्णने उनका धनुष काटकर उनके सारथिके

शिरस्त्राणसहित मस्तकको शरीरसे अलग कर दिया।

हताश्वसूते तु रथे स्थितः स शिनिपुङ्गवः ।

शक्तिं चिक्षेप कर्णाय वैडूर्यमणिभूषिताम् ॥

जिसके घोड़े और सारथि मारे गये थे, उसी रथपर खड़े हुए शिनिप्रवर सात्यकिने

कर्णके ऊपर वैदूर्यमणिसे विभूषित शक्ति चलायी।

तामापतन्तीं सहसा द्विधा चिच्छेद भारत ।

कर्णो वै धन्विनां श्रेष्ठस्तांश्च सर्वानवारयत् ॥

ततस्तान् निशितैर्बाणैः पाण्डवानां महारथान् ।

न्यवारयदमेयात्मा शिक्षया च बलेन च ॥

भारत! धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कर्णने अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिके सहसा दो टुकड़े कर

डाले और उन सब महारथियोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया, फिर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न

कर्णने अपनी शिक्षा और बलके प्रभावसे तीखे बाणोंद्वारा उन सभी पाण्डव-महारथियोंकी

गति अवरुद्ध कर दी।

अर्दयित्वा शरैस्तांस्तु सिंहः क्षुद्रमृगानिव ।

पीडयन् धर्मराजानं शरैः संनतपर्वभिः ॥

अभ्यद्रवत राधेयो धर्मपुत्रं शितैः शरैः ।)

जैसे सिंह छोटे मृगोंको पीड़ा देता है, उसी प्रकार राधापुत्र कर्णने उन महारथियोंको

बाणोंसे पीड़ित करके झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंसे चोट पहुँचाते हुए वहाँ धर्मराज

धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर पुनः आक्रमण किया।

कालवालास्तु ये पार्थ दन्तवर्णावहन् हयाः ।। ४८ ।।

तैर्युक्तं रथमास्थाय प्रायाद् राजा पराङ्मुखः ।

उस समय दाँतोंके समान सफेद रंग और काली पूँछवाले जो घोड़े युधिष्ठिरकी सवारीमें

थे, उन्हींसे जुते हुए दूसरे रथपर बैठकर राजा युधिष्ठिर रणभूमिसे विमुख हो शिविरकी ओर

चल दिये ।। ४८ १/२ ।।

एवं पार्थोऽभ्यपायात् स निहतः पार्ष्णिसारथिः ।। ४९ ।।

अशक्नुवन् प्रमुखतः स्थातुं कर्णस्य दुर्मनाः ।

युधिष्ठिरका पृष्ठरक्षक पहले ही मार दिया गया था। उनका मन बहुत दुःखी था,

इसलिये वे कर्णके सामने ठहर न सके और युद्धस्थलसे हट गये ।। ४९ १/२ ।।

अभिद्रुत्य तु राधेयः पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम् ।। ५० ।।

वज्रच्छत्रांकुशैर्मत्स्यैर्ध्वजकूर्माम्बुजादिभिः ।

लक्षणैरुपपन्नेन पाण्डुना पाण्डुनन्दनम् ।। ५१ ।।

पवित्रीकर्तुमात्मानं स्कन्धे संस्पृश्य पाणिना ।

ग्रहीतुमिच्छन् स बलात् कुन्तीवाक्यं च सोऽस्मरत् ॥ ५२ ॥ उस समय राधापुत्र कर्ण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका पीछा करके वज्र, छत्र, अंकुश, मत्स्य, ध्वज, कूर्म और कमल आदि शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न गोरे हाथसे उनका कंधा छूकर, मानो अपने-आपको पवित्र करनेके लिये उन्हें बलपूर्वक पकड़नेकी इच्छा करने लगा। उसी समय उसे कुन्तीदेवीको दिये हुए अपने वचनका स्मरण हो आया ॥ ५०—५२ ॥

तं शल्यः प्राह मा कर्ण गृहीथाः पार्थिवोत्तमम् । गृहीतमात्रो हत्वा त्वां मा करिष्यति भस्मसात् ॥ ५३ ॥ उस समय राजा शल्यने कहा—'कर्ण! इन नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको हाथ न लगाना, अन्यथा वे पकड़ते ही तुम्हारा वध करके अपनी क्रोधाग्निसे तुम्हें भस्म कर डालेंगे' ॥

अब्रवीत् प्रहसन् राजन् कुत्सयन्निव पाण्डवम् । कथं नाम कुले जातः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ॥ ५४ ॥ प्रजह्यात् समरं भीतः प्राणान् रक्षन् महाहवे । न भवान् क्षत्रधर्मेषु कुशलो हीति मे मतिः ॥ ५५ ॥ राजन्! तब कर्ण जोर-जोरसे हँस पड़ा और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी निन्दा-सा करता हुआ बोला—'युधिष्ठिर! जो क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न हो, क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहता हो, वह महासमरमें प्राणोंकी रक्षाके लिये भयभीत हो युद्ध छोड़कर भाग कैसे सकता है? मेरा तो ऐसा विश्वास है कि तुम क्षत्रिय-धर्ममें निपुण नहीं हो ॥ ५४-५५ ॥

ब्राह्मे बले भवान् युक्तः स्वाध्याये यज्ञकर्मणि । मा स्म युध्यस्व कौन्तेय मा स्म वीरान् समासदः ॥ ५६ ॥ 'कुन्तीकुमार! तुम ब्राह्मबल, स्वाध्याय एवं यज्ञ-कर्ममें ही कुशल हो; अतः न तो युद्ध किया करो और न वीरोंके सामने ही जाओ ॥ ५६ ॥

मा चैतानप्रियं ब्रूहि मा वै व्रज महार णम् । वक्तव्या मारिषान्ये तु न वक्तव्यास्तु मादृशाः ॥ ५७ ॥ 'माननीय नरेश! न इन वीरोंसे कभी अप्रिय वचन बोलो और न महान् युद्धमें पैर ही रखो। यदि अप्रिय वचन बोलना ही हो तो दूसरोंसे बोलना; मेरे-जैसे वीरोंसे नहीं ॥

मादृशान् विब्रुवन् युद्धे एतदन्यच्च लप्स्यसे । स्वगृहं गच्छ कौन्तेय यत्र तौ केशवार्र्जुनौ ॥ ५८ ॥ न हि त्वां समरे राजन् हन्यात् कर्णः कथञ्चन । 'युद्धमें मेरे-जैसे लोगोंसे अप्रिय वचन बोलनेपर तुम्हें यही तथा दूसरा कुफल भी भोगना पड़ेगा। अतः कुन्तीनन्दन! अपने घर चले जाओ अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हों वहीं पधारो। राजन्! कर्ण समरांगणमें किसी तरह भी तुम्हारा वध नहीं करेगा' ॥ ५८ १/२ ॥ ॥

एवमुक्त्वा ततः पार्थं विसृज्य च महाबलः ॥ ५९ ॥

न्यहनत् पाण्डवीं सेनां वज्रहस्त इवासुरीम् । महाबली कर्णने युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर फिर उन्हें छोड़ दिया और जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरसेनाका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया ।। ५९ १/२ ।।

ततोऽपायाद् द्रुतं राजन् व्रीडन्निव नरेश्वरः ।। ६० ।। अथापयातं राजानं मत्वान्वीयूस्तमच्युतम् । चेदिपाण्डवपाञ्चालाः सात्यकिश्च महारथः ।। ६१ ।। द्रौपदेयास्तथा शूरा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । राजन्! तब राजा युधिष्ठिर लजाते हुए-से तुरंत रणभूमिसे भाग गये। राजाको रणक्षेत्रसे हटा हुआ जानकर चेदि, पाण्डव और पांचाल वीर, महारथी सात्यकि, द्रौपदीके शूरवीर पुत्र तथा पाण्डुनन्दन माद्रीकुमार नकुल-सहदेव भी धर्म-मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चल दिये ।। ६०-६१ १/२ ।।

ततो युधिष्ठिरानीकं दृष्ट्वा कर्णः पराङ्मुखम् ।। ६२ ।। कुरुभिः सहितो वीरः प्रहृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् । तदनन्तर युधिष्ठिरकी सेनाको युद्धसे विमुख हुई देख हर्षमें भरे हुए वीर कर्णने कौरव-सैनिकोंको साथ लेकर कुछ दूरतक उसका पीछा किया ।। ६२ १/२ ।।

भेरीशङ्खमृदङ्गानां कार्मुकाणां च निःस्वनः ।। ६३ ।। बभूव धार्तराष्ट्राणां सिंहनादरवस्तथा । उस समय भेरी, शंख, मृदंग और धनुषोंकी ध्वनि सब ओर फैल रही थी तथा दुर्योधनके सैनिक सिंहके समान दहाड़ रहे थे ।। ६३ १/२ ।।

युधिष्ठिरस्तु कौरव्य रथमारुह्य सत्वरम् ।। ६४ ।। श्रुतकीर्तेर्महाराज दृष्टवान् कर्णविक्रमम् । कुरुवंशी महाराज! युधिष्ठिरके घोड़े थक गये थे; अतः उन्होंने तुरंत ही श्रुतकीर्तिके रथपर आरूढ़ हो कर्णके पराक्रमको देखा ।। ६४ १/२ ।।

काल्यमानं बलं दृष्ट्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। ६५ ।। स्वान् योधानब्रवीत् क्रुद्धो निघ्नतैतान् किमासत । अपनी सेनाको खदेड़ी जाती हुई देख धर्मराज युधिष्ठिरने कुपित हो अपने पक्षके योद्धाओंसे कहा—‘अरे! क्यों चुप बैठे हो? इन शत्रुओंको मार डालो’ ।।

ततो राज्ञाभ्यनुज्ञाताः पाण्डवानां महारथाः ।। ६६ ।। भीमसेनमुखाः सर्वे पुत्रांस्ते प्रत्युपाद्रवन् । राजाकी यह आज्ञा पाते ही भीमसेन आदि समस्त पाण्डव महारथी आपके पुत्रोंपर टूट पड़े ।। ६६ १/२ ।।

अभवत् तुमुलः शब्दो योधानां तत्र भारत ।। ६७ ।। रथहस्त्यश्वपत्तीनां शस्त्राणां च ततस्ततः । भारत! फिर तो वहाँ इधर-उधर सब ओर रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और पैदल योद्धाओं एवं अस्त्र-शस्त्रोंका भयंकर शब्द गूँजने लगा ।। ६७ १/२ ।। उत्तिष्ठत प्रहरत प्रैताभिपततेति च ।। ६८ ।। इति ब्रुवाणा ह्यन्योन्यं जघ्नुर्योधा महारणे । ‘उठो, मारो, आगे बढ़ो, टूट पड़ो’ इत्यादि वाक्य बोलते हुए सब योद्धा उस महासमरमें एक-दूसरेको मारने लगे ।। ६८ १/२ ।। अभ्रच्छायेव तत्रासीच्छरवॄष्टिभिरम्बरे ।। ६९ ।। समावृत्तैर्नरवरैर्निघ्नद्भिरितरेतरम् । उस समय वहाँ अस्त्रोंसे आवृत हो परस्पर आघात करनेवाले नरश्रेष्ठ वीरोंके चलाये हुए बाणोंकी वृष्टिसे आकाशमें मेघोंकी छाया-सी छा रही थी ।। ६९ १/२ ।। विपताकध्वजच्छत्रा व्यश्वसूतायुधा रणे ।। ७० ।। व्यङ्गाङ्गावयवाः पेतुः क्षितौ क्षीणाः क्षितीश्वराः । कितने ही घायल नरेश पताका, ध्वज, छत्र, अश्व, सारथि, आयुध, शरीर तथा उसके अवयवोंसे रहित हो रणभूमिमें गिर पड़े ।। ७० १/२ ।। प्रवणादिव शैलानां शिखराणि द्विपोत्तमाः ।। ७१ ।। सारोहा निहताः पेतुर्वज्रभिन्ना इवाद्रयः । जैसे पर्वतोंके शिखर टूटकर निम्न देशसे लुढ़कते हुए नीचे गिर पड़ते हैं तथा जैसे वज्रसे विदीर्ण किये हुए पर्वत धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार वहाँ मारे गये हाथी अपने सवारोंसहित पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ७१ १/२ ।। छिन्नभिन्नविपर्यस्तैर्वर्मलङ्कारभूषणैः ।। ७२ ।। सारोहास्तुरगाः पेतुर्हतवीराः सहस्रशः । टूटे-फूटे और अस्त-व्यस्त हुए कवच, अलंकार एवं आभूषणोंसहित सहस्रों घोड़े अपने बहादुर सवारोंके मारे जानेपर उनके साथ ही गिर पड़ते थे ।। ७२ १/२ ।। विप्रविद्धायुधाङ्गाश्च द्विरदाश्वरथैर्हताः ।। ७३ ।। प्रतिवीरैश्च सम्मर्दे पत्तिसंघाः सहस्रशः । उस संघर्षमें विपक्षी वीरों, हाथियों, घोड़ों तथा रथोंद्वारा मारे गये सहस्रों पैदल योद्धाओंके समुदाय रणभूमिमें सो रहे थे। उनके अस्त्र-शस्त्र और शरीरके अवयव क्षत-विक्षत होकर बिखर गये थे ।। ७३ १/२ ।। विशालायतताम्राक्षैः पद्मेन्दुसदृशाननैः ।। ७४ ।। शिरोभिर्युद्धशौण्डानां सर्वतः संवृता मही ।

यथा भुवि तथा व्योम्नि निःस्वनं शुश्रुवुर्जनाः ।। ७५ ।। विमानैरप्सरःसङ्गैर्गीतवादित्रनिःस्वनैः । युद्धकुशल वीरोंके विशाल, विस्तृत एवं लाल-लाल आँखों और कमल तथा चन्द्रमाके समान मुखवाले मस्तकोंसे सारी युद्धभूमि सब ओरसे ढक गयी थी। भूतलपर जैसा कोलाहल हो रहा था, वैसा ही आकाशमें भी लोगोंको सुनायी देता था। वहाँ विमानोंपर बैठी हुई झुंड-की-झुंड अप्सराएँ गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि फैला रही थीं ।। ७४-७५ १/२ ।। हतानभिमुखान् वीरान् वीरैः शतसहस्रशः ।। ७६ ।। आरोप्यारोप्य गच्छन्ति विमानेष्वप्सरोगणाः । वीरोंके द्वारा सम्मुख लड़कर मारे गये लाखों वीरोंको अप्सराएँ विमानोंपर बिठा-बिठाकर स्वर्गलोकमें ले जाती थीं ।। ७६ १/२ ।। तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं प्रत्यक्षं स्वर्गलिप्सया ।। ७७ ।। प्रहृष्टमनसः शूराः क्षिप्रं जघ्नुः परस्परम् । यह महान् आश्चर्यकी बात प्रत्यक्ष देखकर हर्ष और उत्साहमें भरे हुए शूरवीर स्वर्गकी लिप्सासे एक-दूसरेको शीघ्रतापूर्वक मारने लगे ।। ७७ १/२ ।। रथिनो रथिभिः सार्धं चित्रं युयुधुराहवे ।। ७८ ।। पत्तयः पत्तिभिर्नागाः सह नागैर्हयैर्हयाः । युद्धस्थलमें रथियोंके साथ रथी, पैदलोंके साथ पैदल, हाथियोंके साथ हाथी और घोड़ोंके साथ घोड़े विचित्र युद्ध करते थे ।। ७८ १/२ ।। एवं प्रवृत्ते संग्रामे गजवाजिनरक्षये ।। ७९ ।। सैन्येन रजसा व्याप्ते स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे परान् । इस प्रकार हाथी, घोड़ों और मनुष्योंका संहार करनेवाले उस संग्रामके आरम्भ होनेपर सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धूलसे वहाँका सारा प्रदेश आच्छादित हो जानेपर अपने और शत्रुपक्षके योद्धा अपने ही पक्षवालोंका संहार करने लगे ।। ७९ १/२ ।। कचाकचि युद्धमासीद् दन्तादन्ति नखानखि ।। ८० ।। मुष्टियुद्धं नियुद्धं च देहपाप्मासुनाशनम् । दोनों दलोंके सैनिक एक-दूसरेके केश पकड़कर खींचते, दाँतोंसे काटते, नखोंसे बखोटते, मुक्कोंसे मारते और परस्पर मल्लयुद्ध करने लगते थे। इस प्रकार वह युद्ध सैनिकोंके शरीर, प्राण और पापोंका विनाश करनेवाला हो रहा था ।। ८० १/२ ।। तथा वर्तति संग्रामे गजवाजिनरक्षये ।। ८१ ।। नराश्वनागदेहेभ्यः प्रसृता लोहितापगा । गजाश्वनरदेहान् सा व्युवाह पतितान् बहून् ।। ८२ ।।