महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पाञ्चालराजके पुत्र धृष्टद्युम्न महाधनुर्धर, महायशस्वी, तेजस्वी तथा शत्रुसमूहका संहार करनेमें समर्थ थे ॥ ३७ ॥
पारावतसवर्णाश्वं कोविदारवरध्वजम् ।
धृष्टद्युम्नं रणे दृष्ट्वा त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ३८ ॥
जिनके रथमें कबूतरके समान रंगवाले घोड़े जुते हुए थे तथा रथकी श्रेष्ठ ध्वजापर कचनारवृक्षका चिह्न बना हुआ था, उन धृष्टद्युम्नको रणभूमिमें उपस्थित देख आपके सैनिक भयसे भाग खड़े हुए ॥ ३८ ॥
गान्धारराजं शीघ्रास्त्रमनुसृत्य यशस्विनौ ।
अचिरात् प्रत्यदृश्येतां माद्रीपुत्रौ ससात्यकी ॥ ३९ ॥
सात्यकिसहित यशस्वी माद्रीकुमार नकुल और सहदेव शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले गान्धारराज शकुनिका तुरंत पीछा करते हुए दिखायी दिये ॥ ३९ ॥
चेकितानः शिखण्डी च द्रौपदेयाश्च मारिष ।
हत्वा त्वदीयं सुमहत् सैन्यं शङ्खानथाधमन् ॥ ४० ॥
माननीय नरेश! चेकितान, शिखण्डी और द्रौपदीके पाँचों पुत्र—आपकी विशाल सेनाका संहार करके शंख बजाने लगे ॥
ते सर्वे तावकान् प्रेक्ष्य द्रवतो वै पराङ्मुखान् ।
अभ्यधावन्त निघ्नन्तो वृषाञ्जित्वा वृषा इव ॥ ४१ ॥
जैसे साँड़ साँड़ोंको परास्त करके उन्हें बहुत दूरतक खदेड़ते रहते हैं, उसी प्रकार उन सब पाण्डववीरोंने आपके समस्त सैनिकोंको युद्धसे विमुख होकर भागते देख बाणोंका प्रहार करते हुए दूरतक उनका पीछा किया ॥
सेनावशेषं तं दृष्ट्वा तव पुत्रस्य पाण्डवः ।
अवस्थितं सव्यसाची चुक्रोध बलवन्नृप ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुन आपके पुत्रकी सेनाके उस एक भागको अवशिष्ट एवं सामने उपस्थित देख अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ४२ ॥
तत एनं शरै राजन् सहसा समवाकिरत् ।
रजसा चोद्गतेनाथ न स्म किंचन दृश्यते ॥ ४३ ॥
राजन्! तदनन्तर उन्होंने सहसा बाणोंद्वारा उस सेनाको आच्छादित कर दिया। उस समय इतनी धूल ऊपर उठी कि कुछ भी दिखायी नहीं देता था ॥ ४३ ॥
अन्धकारीकृते लोके शरीभूते महीतले ।
दिशः सर्वा महाराज तावकाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ४४ ॥
महाराज! जब जगत्में उस धूलसे अन्धकार छा गया और पृथ्वीपर बाण-ही-बाण बिछ गया, उस समय आपके सैनिक भयके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥
भज्यमानेषु सर्वेषु कुरुराजो विशाम्पते ।
परेषामात्मनश्चैव सैन्ये ते समुपाद्रवत् ॥ ४५ ॥ प्रजानाथ! उन सबके भाग जानेपर कुरुराज दुर्योधनने शत्रुपक्षकी और अपनी दोनों ही सेनाओंपर आक्रमण किया ॥
ततो दुर्योधनः सर्वानजुहावाथ पाण्डवान् । युद्धाय भरतश्रेष्ठ देवानिव पुरा बलिः ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें राजा बलिने देवताओंको युद्धके लिये ललकारा था, उसी प्रकार दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंका आह्वान किया ॥ ४६ ॥
त एनमभिगर्जन्तं सहिताः समुपाद्रवन् । नानाशस्त्रसृजः क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ ४७ ॥ तब वे पाण्डवयोध्दा अत्यन्त कुपित हो गर्जना करनेवाले दुर्योधनको बारंबार फटकारते और क्रोधपूर्वक नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए एक साथ ही उसपर टूट पड़े ॥
दुर्योधनोऽप्यसम्भ्रान्तस्तानरीन् व्यधमच्छरैः । तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् ॥ ४८ ॥ यदेनं पाण्डवाः सर्वे न शेकुरतिवर्तितुम् । दुर्योधन भी बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा उन शत्रुओंको छिन्न-भिन्न करने लगा। वहाँ हमलोगोंने आपके पुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि समस्त पाण्डव मिलकर भी उसे लाँघकर आगे न बढ़ सके ॥ ४८ १/२ ॥
नातिदूरापयातं च कृतबुद्धिः पलायने ॥ ४९ ॥ दुर्योधनः स्वकं सैन्यमपश्यद् भृशविक्षतम् । दुर्योधनने देखा कि मेरी सेना अत्यन्त घायल हो रणभूमिसे पलायन करनेका विचार रखकर भाग रही है, परंतु अधिक दूर नहीं गयी है ॥ ४९ १/२ ॥
ततोऽवस्थाप्य राजेन्द्र कृतबुद्धिस्तवात्मजः ॥ ५० ॥ हर्षयन्निव तान् योधांस्ततो वचनमब्रवीत् । राजेन्द्र! तब युद्धका ही दृढ़ निश्चय रखनेवाले आपके पुत्रने उन समस्त सैनिकोंको खड़ा करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए कहा— ॥ ५० १/२ ॥
न तं देशं प्रपश्यामि पृथिव्यां पर्वतेषु च ॥ ५१ ॥ यत्र यातान्न वो हन्युः पाण्डवाः किं सृतेन वः । ‘वीरो! मैं भूतलपर और पर्वतोंमें भी कोई ऐसा स्थान नहीं देखता, जहाँ चले जानेपर तुमलोगोंको पाण्डव मार न सकें; फिर तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है? ॥ ५१ १/२ ॥
स्वल्पं चैव बलं तेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ॥ ५२ ॥ यदि सर्वेऽत्र तिष्ठामो ध्रुवं नो विजयो भवेत् ।
'पाण्डवोंके पास थोड़ी-सी ही सेना शेष रह गयी है और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं। यदि हम सब लोग यहाँ डटे रहें तो निश्चय ही हमारी विजय होगी॥ ५२ १/२॥
विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतकिल्बिषान्॥ ५३ ॥ अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेयो नः समरे वधः। 'यदि तुमलोग पृथक्-पृथक् होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सभी अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे, अतः युद्धमें ही मारा जाना हमारे लिये श्रेयस्कर होगा॥ ५३ १/२॥
सुखः सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम्॥ ५४ ॥ मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते। 'क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये संग्रामभूमिमें होनेवाली मृत्यु ही सुखद है; क्योंकि वहाँ मरा हुआ मनुष्य मृत्युके दुःखको नहीं जानता और मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है॥ ५४ १/२॥
शृण्वन्तु क्षत्रियाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः॥ ५५ ॥ द्विषतो भीमसेनस्य वशमेष्यथ विद्रुताः। 'जितने क्षत्रिय यहाँ आये हैं वे सब सुनें—'तुमलोग भागनेपर अपने शत्रु भीमसेनके अधीन हो जाओगे॥ ५५ १/२॥
पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ॥ ५६ ॥ नान्यत् कर्मास्ति पापीयः क्षत्रियस्य पलायनात्। 'इसलिये अपने बाप-दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मका परित्याग न करो। क्षत्रियके लिये युद्ध छोड़कर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई अत्यन्त पापपूर्ण कर्म नहीं है॥ ५६ १/२॥
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् हि पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः॥ ५७ ॥ सुचिरेणार्जिताँल्लोकान् सद्यो युद्धात् समश्रुते। 'कौरवो! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गका श्रेष्ठ मार्ग नहीं है। दीर्घकालतक पुण्यकर्म करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यलोकोंको वीर क्षत्रिय युद्धसे तत्काल प्राप्त कर लेता है'॥ ५७ १/२॥
तस्य तद् वचनं राज्ञः पूजयित्वा महारथाः॥ ५८ ॥ पुनरेवाभ्यवर्तन्त क्षत्रियाः पाण्डवान् प्रति। पराजयममृष्यन्तः कृतचित्ताश्च विक्रमे॥ ५९ ॥ राजा दुर्योधनकी उस बातका आदर करके वे महारथी क्षत्रिय पुनः युद्ध करनेके लिये पाण्डवोंके सामने आये। उन्हें पराजय असह्य हो उठी थी; इसलिये उन्होंने पराक्रम करनेमें ही मन लगाया था॥ ५८-५९॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं पुनरेव सुदारुणम्।
तावकानां परेषां च देवासुररणोपमम् ॥ ६० ॥
तदनन्तर आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें पुनः देवासुर-संग्रामके समान अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ६० ॥
युधिष्ठिरपुरोगांश्च सर्वसैन्येन पाण्डवान् ।
अन्वधावन्महाराज पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ६१ ॥
महाराज! उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने अपनी सारी सेनाके साथ युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डवोंपर धावा किया था ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि कौरवसैन्यापयाने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें कौरवसेनाका पलायनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2457)
चतुर्थोऽध्यायः
कृपाचार्यका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना
संजय उवाच
पतितान् रथनीडांश्च रथांश्चापि महात्मनाम् ।
रणे च निहतान् नागान् दृष्ट्वा पत्तींश्च मारिष ॥ १ ॥
आयोधनं चातिघोरं रुद्रस्याक्रीड संनिभम् ।
अप्रख्यातिं गतानां तु राज्ञां शतसहस्रशः ॥ २ ॥
विमुखे तव पुत्रे तु शोकोपहतचेतसि ।
भृशोद्विग्नेषु सैन्येषु दृष्ट्वा पार्थस्य विक्रमम् ॥ ३ ॥
ध्यायमानेषु सैन्येषु दुःखं प्राप्तेषु भारत ।
बलानां मथ्यमानानां श्रुत्वा निनदमुत्तमम् ॥ ४ ॥
अभिज्ञानं नरेन्द्राणां विक्षतं प्रेक्ष्य संयुगे ।
कृपाविष्टः कृपो राजन् वयःशीलसमन्वितः ॥ ५ ॥
अब्रवीत् तत्र तेजस्वी सोऽभिसृत्य जनाधिपम् ।
दुर्योधनं मन्युवशाद् वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ६ ॥
**संजय कहते हैं—**माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दुःखमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा— ॥ १—६ ॥
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
श्रुत्वा कुरु महाराज यदि ते रोचतेऽनघ ॥ ७ ॥
‘कुरुवंशी महाराज दुर्योधन! मैं इस समय तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। अनघ! मेरी बात सुनकर यदि तुम्हें रुचे तो उसके अनुसार कार्य करो ॥ ७ ॥
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् वै पन्था राजेन्द्र विद्यते ।
यं समाश्रित्य युद्ध्यन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।। ८ ।। 'राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है, जिसका आश्रय लेकर क्षत्रिय लोग युद्धमें तत्पर रहते हैं।। ८ ।। पुत्रो भ्राता पिता चैव स्वस्त्रीयो मातुलस्तथा । सम्बन्धिबान्धवाश्चैव योद्धव्या वै क्षत्रजीविना ।। ९ ।। 'क्षत्रियधर्मसे जीवन-निर्वाह करनेवाले पुरुषके लिये पुत्र, भ्राता, पिता, भानजा, मामा, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव—इन सबके साथ युद्ध करना कर्तव्य है ।। ९ ।। वधे चैव परो धर्मस्तथाधर्मः पलायने । ते स्म घोरां समापन्ना जीविकां जीवितार्थिनः ।। १० ।। 'युद्धमें शत्रुको मारना या उसके हाथसे मारा जाना दोनों ही उत्तम धर्म है और युद्धसे भागनेपर महान् पाप होता है। सभी क्षत्रिय जीवन-निर्वाहकी इच्छा रखते हुए उसी घोर जीविकाका आश्रय लेते हैं ।। १० ।। तदत्र प्रतिवक्ष्यामि किंचिदेव हितं वचः । हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णे चैव महारथे ।। ११ ।। जयद्रथे च निहते तव भ्रातृषु चानघ । लक्ष्मणे तव पुत्रे च किं शेषं पर्युपास्महे ।। १२ ।। 'ऐसी दशामें मैं यहाँ तुम्हारे लिये कुछ हितकी बात बताऊँगा। अनघ! पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महारथी कर्ण, जयद्रथ तथा तुम्हारे सभी भाई मारे जा चुके हैं। तुम्हारा पुत्र लक्ष्मण भी जीवित नहीं है। अब दूसरा कौन बच गया है, जिसका हमलोग आश्रय ग्रहण करें ।। ११-१२ ।। येषु भारं समासाद्य राज्ये मतिमकुर्महि । ते संत्यज्य तनूर्याताः शूरा ब्रह्मविदां गतिम् ।। १३ ।। 'जिनपर युद्धका भार रखकर हम राज्य पानेकी आशा करते थे, वे शूरवीर तो शरीर छोड़कर ब्रह्मवेत्ताओंकी गतिको प्राप्त हो गये ।। १३ ।। वयं त्विह विना भूता गुणवद्भिर्महारथैः । कृपणं वर्तयिष्याम पातयित्वा नृपान् बहून् ।। १४ ।। 'इस समय हमलोग यहाँ भीष्म आदि गुणवान् महारथियोंके सहयोगसे वंचित हो गये हैं और बहुत-से नरेशोंको मरवाकर दयनीय स्थितिमें आ गये हैं ।। १४ ।। सर्वैरथ च जीवद्भिर्बीभत्सुरपराजितः । कृष्णनेत्रो महाबाहुर्देवैरपि दुरासदः ।। १५ ।। 'जब सब लोग जीवित थे, तब भी अर्जुन किसीके द्वारा पराजित नहीं हुए। श्रीकृष्ण-जैसे नेताके रहते हुए महाबाहु अर्जुन देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं ।। १५ ।। इन्द्रकार्मुकतुल्याभमिन्द्रकेतुमिवोच्छ्रितम् ।
वानरं केतुमासाद्य संचचाल महाचमूः ॥ १६ ॥ 'उनका वानरध्वज इन्द्रधनुषके तुल्य बहुरंगा और इन्द्रध्वजके समान अत्यन्त ऊँचा है। उसके पास पहुँचकर हमारी विशाल सेना भयसे विचलित हो उठती है ॥ १६ ॥
सिंहनादाच्च भीमस्य पाञ्चजन्यस्वनेन च। गाण्डीवस्य च निर्घोषात् सम्मुह्यन्ते मनांसि नः ॥ १७ ॥ 'भीमसेनके सिंहनाद, पांचजन्य शंखकी ध्वनि और गाण्डीव धनुषकी टंकारसे हमारा दिल दहल उठता है ॥ १७ ॥
चरन्तीव महाविद्युन्मुष्णन्ती नयनप्रभाम् । अलातमिव चाविद्धं गाण्डीवं समदृश्यत ॥ १८ ॥ 'जैसे चमकती हुई महाविद्युत् नेत्रोंकी प्रभाको छीनती-सी दिखायी देती है तथा जैसे अलातचक्र घूमता देखा जाता है, उसी प्रकार अर्जुनके हाथमें गाण्डीव धनुष भी दृष्टिगोचर होता है ॥ १८ ॥
जाम्बूनदविचित्रं च धूयमानं महत् धनुः । दृश्यते दिक्षु सर्वासु विद्युदभ्रघनेष्विव ॥ १९ ॥ 'अर्जुनके हाथमें डोलता हुआ उनका सुवर्णजटित महान् धनुष सम्पूर्ण दिशाओंमें वैसा ही दिखायी देता है, जैसे मेघोंकी घटामें बिजली ॥ १९ ॥
श्वेताश्च वेगसम्पन्नाः शशिकाशसमप्रभाः । पिबन्त इव चाकाशं रथे युक्तास्तु वाजिनः ॥ २० ॥ 'उनके रथमें जुते हुए घोड़े श्वेत वर्णवाले, वेगशाली तथा चन्द्रमा और कासके समान उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित हैं। वे ऐसी तीव्र गतिसे चलते हैं, मानो आकाशको पी जायेंगे ॥ २० ॥
उह्यमानांश्च कृष्णेन वायुनेव बलाहकाः । जाम्बूनदविचित्राङ्गा वहन्ते चार्जुनं रणे ॥ २१ ॥ 'जैसे वायुकी प्रेरणासे बादल उड़ते फिरते हैं, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्णद्वारा हाँके जाते हुए घोड़े, जो सुनहरे साजोंसे सजे होनेके कारण अंगोंमें विचित्र शोभा धारण करते हैं, रणभूमिमें अर्जुनकी सवारी ढोते हैं ॥ २१ ॥
तावकं तद् बलं राजन्नर्जुनोऽस्त्रविशारदः । गहनं शिशिरापाये ददाहाग्निरिवोल्बणः ॥ २२ ॥ 'राजन्! अर्जुन अस्त्रविद्यामें कुशल हैं, उन्होंने तुम्हारी सेनाको उसी प्रकार भस्म किया है, जैसे भयंकर आग ग्रीष्म-ऋतुमें बहुत बड़े जंगलको जला डालती है ॥ २२ ॥
गाहमानमनीकानि महेन्द्रसदृशप्रभम् । धनंजयम्पश्याम चतुर्दंष्ट्रमिव द्विपम् ॥ २३ ॥
‘देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी अर्जुनको हम चार दाँतवाले गजराजके समान अपनी सेनामें प्रवेश करते देखते हैं ॥ २३ ॥ विक्षोभयन्तं सेनां ते त्रासयन्तं च पार्थिवान् । धनंजयम्पश्याम नलिनीमिव कुञ्जरम् ॥ २४ ॥ ‘जैसे मतवाला हाथी तालाबमें घुसकर उसे मथ डालता है, उसी प्रकार हमने अर्जुनको तुम्हारी सेनाको मथते और राजाओंको भयभीत करते देखा है ॥ २४ ॥ त्रासयन्तं तथा योधान् धनुर्घोषेण पाण्डवम् । भूय एनमपश्याम सिंहं मृगगणानिव ॥ २५ ॥ ‘जैसे सिंह मृगोंके झुंडको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार पाण्डुकुमार अर्जुन अपने धनुषकी टंकारसे तुम्हारे समस्त योद्धाओंको बारंबार भयभीत करते दिखायी दिये हैं ॥ २५ ॥ सर्वलोकमहेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् । आमुक्तकवचौ कृष्णौ लोकमध्ये विचेरतुः ॥ २६ ॥ ‘अपने अंगोंमें कवच धारण किये श्रीकृष्ण और अर्जुन, जो सम्पूर्ण विश्वके महाधनुर्धर और सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ हैं, योद्धाओंके समूहमें निर्भय विचरते हैं ॥ २६ ॥ अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत । संग्रामस्यातिघोरस्य वध्यतां चाभितो युधि ॥ २७ ॥ ‘भारत! परस्पर मार-काट मचाते हुए दोनों ओरसे योद्धाओंके इस अत्यन्त भयंकर संग्रामको आरम्भ हुए आज सत्रह दिन हो गये ॥ २७ ॥ वायुनेव विधूतानि तव सैन्यानि सर्वतः । शरदम्भोदजालानि व्यशीर्यन्त समन्ततः ॥ २८ ॥ ‘जैसे हवा शरद्-ऋतुके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनकी मारसे तुम्हारी सेनाएँ सब ओर तितर-बितर हो गयी हैं ॥ २८ ॥ तां नावमिव पर्यस्तां वातधूतां महार्णवे । तव सेनां महाराज सव्यसाची व्यकम्पयत् ॥ २९ ॥ ‘महाराज! जैसे महासागरमें हवाके थपेड़े खाकर नाव डगमगाने लगती है, उसी प्रकार सव्यसाची अर्जुनने तुम्हारी सेनाको कँपा डाला है ॥ २९ ॥ क्व नु ते सूतपुत्रोऽभूत् क्व नु द्रोणः सहानुगः । अहं क्व च क्व चात्मा ते हार्दिक्यश्च तथा क्व नु ॥ ३० ॥ दुःशासनश्च ते भ्राता भ्रातृभिः सहितः क्व नु । बाणगोचरसम्प्राप्तं प्रेक्ष्य चैव जयद्रथम् ॥ ३१ ॥ ‘उस दिन जयद्रथको अर्जुनके बाणोंका निशाना बनते देखकर भी तुम्हारा कर्ण कहाँ चला गया था? अपने अनुयायियोंके साथ आचार्य द्रोण कहाँ थे? मैं कहाँ था? तुम कहाँ थे?
कृतवर्मा कहाँ चले गये थे और भाइयोंसहित तुम्हारा भ्राता दुःशासन भी कहाँ था? ॥ ३०-३१ ॥ सम्बन्धिनस्ते भ्रातूंश्च सहायान् मातुलांस्तथा । सर्वान् विक्रम्य मिषतो लोकमाक्रम्य मूर्धनि ॥ ३२ ॥ जयद्रथो हतो राजन् किं नु शेषमुपास्महे । को हीह स पुमानस्ति यो विजेष्यति पाण्डवम् ॥ ३३ ॥ ‘राजन्! तुम्हारे सम्बन्धी, भाई, सहायक और मामा सब-के-सब देख रहे थे तो भी अर्जुनने उन सबको अपने पराक्रमद्वारा परास्त करके सब लोगोंके मस्तकपर पैर रखकर जयद्रथको मार डाला। अब और कौन बचा है जिसका हम भरोसा करें? यहाँ कौन ऐसा पुरुष है जो पाण्डुपुत्र अर्जुनपर विजय पायेगा? ॥ ३२-३३ ॥ तस्य चास्त्राणि दिव्यानि विविधानि महात्मनः । गाण्डीवस्य च निर्घोषो धैर्याणि हरते हि नः ॥ ३४ ॥ ‘महात्मा अर्जुनके पास नाना प्रकारके दिव्यास्त्र हैं। उनके गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष हमारा धैर्य छीन लेता है ॥ ३४ ॥ नष्टचन्द्रा यथा रात्रिः सेनेयं हतनायका । नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीवाकुलतां गता ॥ ३५ ॥ ‘जैसे चन्द्रमाके उदित न होनेपर रात्रि अन्धकारमयी दिखायी देती है, उसी प्रकार हमारी यह सेना सेनापतिके मारे जानेसे श्रीहीन हो रही है। हाथीने जिसके किनारेके वृक्षोंको तोड़ डाला हो, उस सूखी नदीके समान यह व्याकुल हो उठी है ॥ ३५ ॥ ध्वजिन्यां हतनेत्रायां यथेष्टं श्वेतवाहनः । चरिष्यति महाबाहुः कक्षेष्वाग्निरिव ज्वलन् ॥ ३६ ॥ ‘हमारी इस विशाल वाहिनीका नेता नष्ट हो गया है। ऐसी दशामें घास-फूसके ढेरमें प्रज्वलित होनेवाली आगके समान श्वेत घोड़ोंवाले महाबाहु अर्जुन इस सेनाके भीतर इच्छानुसार विचरेंगे ॥ ३६ ॥ सात्यकेश्चैव यो वेगो भीमसेनस्य चोभयोः । दारयेच्च गिरीन् सर्वान् शोषयेच्चैव सागरान् ॥ ३७ ॥ ‘उधर सात्यकि और भीमसेन दोनों वीरोंका जो वेग है, वह सारे पर्वतोंको विदीर्ण कर सकता है। समुद्रोंको भी सुखा सकता है ॥ ३७ ॥ उवाच वाक्यं यद् भीमः सभामध्ये विशाम्पते । कृतं तत् सफलं तेन भूयश्चैव करिष्यति ॥ ३८ ॥ ‘प्रजानाथ! द्यूतसभामें भीमसेनने जो बात कही थी, उसे उन्होंने सत्य कर दिखाया और जो शेष है, उसे भी वे अवश्य ही पूर्ण करेंगे ॥ ३८ ॥ प्रमुखस्थे तदा कर्णे बलं पाण्डवरक्षितम् ।
दुरासदं तदा गुप्तं व्यूढं गाण्डीवधन्वना ॥ ३९ ॥ 'जब कर्णके साथ युद्ध चल रहा था, उस समय कर्ण सामने ही था तो भी पाण्डवोंद्वारा रक्षित सेना उसके लिये दुर्जय हो गयी; क्योंकि गाण्डीवधारी अर्जुन व्यूहरचनापूर्वक उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ ३९ ॥
युष्माभिस्तानी चीर्णानि यान्यसाधूनि साधुषु । अकारणकृतान्येव तेषां वः फलमागतम् ॥ ४० ॥ 'पाण्डव साधुपुरुष हैं तो भी तुमलोगोंने अकारण ही उनके साथ जो बहुत-से अनुचित बर्ताव किये हैं, उन्हींका यह फल तुम्हें मिला है ॥ ४० ॥
आत्मनोऽर्थे त्वया लोको यत्नतः सर्व आहृतः । स ते संशयितस्तात आत्मा वै भरतर्षभ ॥ ४१ ॥ 'भरतश्रेष्ठ! तुमने अपनी रक्षाके लिये ही प्रयत्नपूर्वक सारे जगत्के लोगोंको एकत्र किया था, किंतु तुम्हारा ही जीवन संशयमें पड़ गया है ॥ ४१ ॥
रक्ष दुर्योधनात्मानमात्मा सर्वस्य भाजनम् । भिन्ने हि भाजने तात दिशो गच्छति तद्गतम् ॥ ४२ ॥ 'दुर्योधन! अब तुम अपने शरीरकी रक्षा करो; क्योंकि आत्मा (शरीर) ही समस्त सुखोंका भाजन है। जैसे पात्रके फूट जानेपर उसमें रखा हुआ जल चारों ओर बह जाता है, उसी प्रकार शरीरके नष्ट होनेसे उसपर अवलम्बित सुखोंका भी अन्त हो जाता है ॥ ४२ ॥
हीयमानेन वै सन्धिः पर्येष्टव्यः समेन वा । विग्रहो वर्धमानेन मतिरेषा बृहस्पतेः ॥ ४३ ॥ 'बृहस्पतिकी यह नीति है कि जब अपना बल कम या बराबर जान पड़े तो शत्रुके साथ संधि कर लेनी चाहिये। लड़ाई तो उसी वक्त छेड़नी चाहिये, जब अपनी शक्ति शत्रुसे बढ़ी-चढ़ी हो ॥ ४३ ॥
ते वयं पाण्डुपुत्रेभ्यो हीना स्म बलशक्तितः । तदत्र पाण्डवैः सार्धं सन्धिं मन्ये क्षमं प्रभो ॥ ४४ ॥ 'हमलोग बल और शक्तिमें पाण्डवोंसे हीन हो गये हैं। अतः प्रभो! इस अवस्थामें पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही उचित समझता हूँ ॥ ४४ ॥
न जानीते हि यः श्रेयः श्रेयसश्चावमन्यते । स क्षिप्रं भ्रश्यते राज्यान्न च श्रेयोऽनुविन्दते ॥ ४५ ॥ 'जो राजा अपनी भलाईकी बात नहीं समझता और श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान करता है, वह शीघ्र ही राज्यसे भ्रष्ट हो जाता है। उसे कभी कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ४५ ॥
प्रणिपत्य हि राजानं राज्यं यदि लभेमहि । श्रेयः स्यान्न तु मौढ्येन राजन् गन्तुः पराभवम् ॥ ४६ ॥
'राजन्! यदि राजा युधिष्ठिरके सामने नतमस्तक होकर हम अपना राज्य प्राप्त कर लें तो यही श्रेयस्कर होगा। मूर्खतावश पराजय स्वीकार करनेवालेका कभी भला नहीं हो सकता।। ४६ ।।
वैचित्रवीर्यवचनात् कृपाशीलो युधिष्ठिरः ।
विनियुञ्जीत राज्ये त्वां गोविन्दवचनेन च ॥ ४७ ॥
'युधिष्ठिर दयालु हैं। वे राजा धृतराष्ट्र और भगवान् श्रीकृष्णके कहनेसे तुम्हें राज्यपर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।। ४७ ।।'
यद् ब्रूयाद्धि हृषीकेशो राजानमपराजितम् ।
अर्जुनं भीमसेनं च सर्वे कुर्युंरसंशयम् ॥ ४८ ॥
'भगवान् श्रीकृष्ण किसीसे पराजित न होनेवाले राजा युधिष्ठिर, अर्जुन और भीमसेनसे जो कुछ भी कहेंगे, वे सब लोग उसे निःसंदेह स्वीकार कर लेंगे ।।'
नातिक्रमिष्यते कृष्णो वचनं कौरवस्य तु ।
धृतराष्ट्रस्य मन्येऽहं नापि कृष्णस्य पाण्डवः ॥ ४९ ॥
'कुरुराज धृतराष्ट्रकी बात श्रीकृष्ण नहीं टालेंगे और श्रीकृष्णकी आज्ञाका उल्लंघन युधिष्ठिर नहीं कर सकेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है ।। ४९ ।।'
एतत् क्षेममहं मन्ये न च पार्थैश्च विग्रहम् ।
न त्वां ब्रवीमि कार्पण्यान्न प्राणपरिरक्षणात् ॥ ५० ॥
पथ्यं राजन् ब्रवीमि त्वां तत्परासुः स्मरिष्यसि ।
'राजन्! मैं इस संधिको ही तुम्हारे लिये कल्याणकारी मानता हूँ। पाण्डवोंके साथ किये जानेवाले युद्धको नहीं। मैं कायरता या प्राण-रक्षाकी भावनासे यह सब नहीं कहता हूँ। तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ। तुम मरणासन्न अवस्थामें मेरी यह बात याद करोगे ।। ५० १/२ ।।'
इति वृद्धो विलप्यैतत् कृपः शारद्वतो वचः ।
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य शुशोच च मुमोह च ॥ ५१ ॥
शरद्वान्के पुत्र वृद्ध कृपाचार्य इस प्रकार विलाप करके गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए शोक और मोहके वशीभूत हो गये ।। ५१ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि कृपवाक्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें कृपाचार्यका वचनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2464)
पञ्चमोऽध्यायः
दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना
संजय उवाच
एवमुक्तस्ततो राजा गौतमेन तपस्विना ।
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च तूष्णीमासीद् विशाम्पते ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! तपस्वी कृपाचार्यके ऐसा कहनेपर दुर्योधन जोर-जोरसे गरम साँस खींचता हुआ कुछ देरतक चुपचाप बैठा रहा ॥ १ ॥
ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा धार्तराष्ट्रो महामनाः ।
कृपं शारद्वतं वाक्यमित्युवाच परंतपः ॥ २ ॥
दो घड़ीतक सोच-विचार करनेके पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके उस महामनस्वी पुत्रने शरदद्वान्के पुत्र कृपाचार्यको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २ ॥
यत् किंचित् सुहृदा वाच्यं तत् सर्वं श्रावितो ह्यहम् ।
कृतं च भवता सर्वं प्राणान् संत्यज्य युध्यता ॥ ३ ॥
‘विप्रवर! एक हितैषी सुहृद्को जो कुछ कहना चाहिये, वह सब आपने कह सुनाया। इतना ही नहीं, आपने प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते हुए मेरी भलाईके लिये सब कुछ किया है ॥ ३ ॥
गाहमानमनीकानि युध्यमानं महारथैः ।
पाण्डवैरतितेजोभिर्लोकस्त्वामनुदृष्टवान् ॥ ४ ॥
‘सब लोगोंने आपको शत्रुओंकी सेनाओंमें घुसते और अत्यन्त तेजस्वी महारथी पाण्डवोंके साथ युद्ध करते हुए बारंबार देखा है ॥ ४ ॥
सुहृदा यदिदं वाक्यं भवता श्रावितो ह्यहम् ।
न मां प्रीणाति तत् सर्वं मुमूर्षोरिव भेषजम् ॥ ५ ॥
‘आप मेरे हितचिन्तक सुहृद् हैं तो भी आपने मुझे जो बात सुनायी है, वह सब मेरे मनको उसी तरह पसंद नहीं आती, जैसे मरणासन्न रोगीको दवा अच्छी नहीं लगती है ॥ ५ ॥
हेतुकारणसंयुक्तं हितं वचनमुत्तमम् ।
उच्यमानं महाबाहो न मे विप्राग्र्य रोचते ॥ ६ ॥
‘महाबाहो! विप्रवर! आपने युक्ति और कारणोंसे सुसंगत, हितकारक एवं उत्तम बात कही है तो भी वह मुझे अच्छी नहीं लग रही है ॥ ६ ॥
राज्याद् विनिकृतोऽस्माभिः कथं सोऽस्मासु विश्वसेत् ।
अक्षद्यूते च नृपतिर्जितोऽस्माभिर्महाधनः ॥ ७ ॥
स कथं मम वाक्यानि श्रद्दध्याद् भूय एव तु ।
‘हमलोगोंने राजा युधिष्ठिरके साथ छल किया है। वे महाधनी थे, हमने उन्हें जूएमं जीतकर निर्धन बना दिया। ऐसी दशामें वे हमलोगोंपर विश्वास कैसे कर सकते हैं? हमारी बातोंपर उन्हें फिर श्रद्धा कैसे हो सकती है? ॥
तथा दौत्येन सम्प्राप्तः कृष्णः पार्थहिते रतः ॥ ८ ॥
प्रलब्धश्च हृषीकेशस्तच्च कर्माविचारितम् ।
स च मे वचनं ब्रह्मन् कथमेवाभिमन्यते ॥ ९ ॥
‘ब्रह्मन्! पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले श्रीकृष्ण मेरे यहाँ दूत बनकर आये थे, किंतु मैंने उन हृषीकेशके साथ धोखा किया। मेरा वह कर्म अविचारपूर्ण था। भला, अब वे मेरी बात कैसे मानेंगे? ॥ ८-९ ॥
विललाप च यत् कृष्णा सभामध्ये समेयुषी ।
न तन्मर्षयते कृष्णो न राज्यहरणं तथा ॥ १० ॥
‘सभामें बलात् लायी हुई द्रौपदीने जो विलाप किया था तथा पाण्डवोंका जो राज्य छीन लिया गया था, वह बर्ताव श्रीकृष्ण सहन नहीं कर सकते ॥ १० ॥
एकप्राणावुभौ कृष्णावन्योन्यमभिसंश्रितौ ।
पुरा यच्छ्रुतमेवासीदद्य पश्यामि तत् प्रभो ॥ ११ ॥
‘प्रभो! श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों दो शरीर और एक प्राण हैं। वे दोनों एक-दूसरेके आश्रित हैं। पहले जो बात मैंने केवल सुन रखी थी, उसे अब प्रत्यक्ष देख रहा हूँ ॥
स्वस्त्रीयं निहतं श्रुत्वा दुःखं स्वपिति केशवः ।
कृतागसो वयं तस्य स मदर्थं कथं क्षमेत् ॥ १२ ॥
‘अपने भानजे अभिमन्युके मारे जानेका समाचार सुनकर श्रीकृष्ण सुखकी नींद नहीं सोते हैं। हम सब लोग उनके अपराधी हैं, फिर वे हमें कैसे क्षमा कर सकते हैं? ॥
अभिमन्योर्विनाशेन न शर्म लभतेऽर्जुनः ।
स कथं मद्विते यत्नं प्रकरिष्यति याचितः ॥ १३ ॥
‘अभिमन्युके मारे जानेसे अर्जुनको भी चैन नहीं है, फिर वे प्रार्थना करनेपर भी मेरे हितके लिये कैसे यत्न करेंगे? ॥ १३ ॥
मध्यमः पाण्डवस्तीक्ष्णो भीमसेनो महाबलः ।
प्रतिज्ञातं च तेनोग्रं भज्येतापि न संनमेत् ॥ १४ ॥
‘मझले पाण्डव महाबली भीमसेनका स्वभाव बड़ा ही कठोर है। उन्होंने बड़ी भयंकर प्रतिज्ञा की है। सूखे काठकी तरह वे टूट भले ही जायें, झुक नहीं सकते ॥ १४ ॥
उभौ तौ बद्धनिस्त्रिंशावुभौ चाबद्धकङ्कटौ ।
कृतवैरावुभौ वीरौ यमावपि यमोपमौ ॥ १५ ॥
‘दोनों भाई नकुल और सहदेव तलवार बाँधे और कवच धारण किये हुए यमराजके समान भयंकर जान पड़ते हैं। वे दोनों वीर मुझसे वैर मानते हैं ॥ १५ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च कृतवैरौ मया सह ।
तौ कथं मद्धिते यत्नं कुर्यातां द्विजसत्तम ॥ १६ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! धृष्टद्युम्न और शिखण्डीने भी मेरे साथ वैर बाँध रखा है, फिर वे दोनों मेरे हितके लिये कैसे यत्न कर सकते हैं? ॥ १६ ॥
दुःशासनेन यत् कृष्णा एकवस्त्रा रजस्वला ।
परिक्लिष्टा सभामध्ये सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ १७ ॥
तथा विवसनां दीनां स्मरन्त्यद्यापि पाण्डवाः ।
‘द्रौपदी एक वस्त्र पहने हुए थी, रजस्वला थी। उस अवस्थामें जो वह भरी सभामें लायी गयी और दुःशासनने सब लोगोंके सामने जो उसे महान् क्लेश पहुँचाया, उसका जो वस्त्र उतारा गया और उसे जो दयनीय दशाको पहुँचा दिया गया, उन सब बातोंको पाण्डव आज भी याद रखते हैं ॥ १७१/२ ॥
न निवारयितुं शक्याः संग्रामात्ते परंतपाः ॥ १८ ॥
यदा च द्रौपदी क्लिष्टा मद्विनाशाय दुःखिता ।
स्थण्डिले नित्यदा शेते यावद् वैरस्य यातनम् ॥ १९ ॥
‘इसलिये अब उन शत्रुसंतापी वीरोंको युद्धसे रोका नहीं जा सकता। जबसे द्रौपदीको क्लेश दिया गया, तबसे वह दुःखी हो मेरे विनाशका संकल्प लेकर प्रतिदिन मिट्टीकी वेदीपर सोया करती है। जबतक वैरका पूरा बदला न चुका लिया जाय, तबतकके लिये उसने यह व्रत ले रखा है ॥ १८-१९ ॥
उग्रं तेपे तपः कृष्णा भर्तॄणामर्थसिद्धये ।
निक्षिप्य मानं दर्पं च वासुदेवसहोदरा ॥ २० ॥
कृष्णायाः प्रेष्यवद् भूत्वा शुश्रूषां कुरुते सदा ।
इति सर्वं समुन्नद्धं न निर्वाति कथञ्चन ॥ २१ ॥
‘द्रौपदी अपने पतियोंके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये बड़ी कठोर तपस्या करती है और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी सगी बहन सुभद्रा मान और अभिमानको दूर फेंककर सदा दासीकी भाँति द्रौपदीकी सेवा करती है। इस प्रकार इन सारे कार्योंके रूपमें वैरकी आग प्रज्वलित हो उठी है, जो किसी प्रकार बुझ नहीं सकती ॥
अभिमन्योर्विनाशेन स संधेयः कथं मया ।
कथं च राजा भुक्त्वेमां पृथिवीं सागराम्बराम् ॥ २२ ॥
पाण्डवानां प्रसादेन भोक्ष्ये राज्यमहं कथम् ।
‘अभिमन्युके विनाशसे जिनके हृदयमें गहरी चोट पहुँची है, उस अर्जुनके साथ मेरी सन्धि कैसे हो सकती है? जब मैं समुद्रसे घिरी हुई सारी पृथ्वीका एकच्छत्र राजाकी हैसियतसे उपभोग कर चुका हूँ, तब इस समय पाण्डवोंकी कृपाका पात्र बनकर कैसे राज्य भोगूँगा? ।। २२ १/२ ।।
उपर्युपरि राज्ञां वै ज्वलित्वा भास्करो यथा ।। २३ ।। युधिष्ठिरं कथं पश्चादनुयास्यामि दासवत् । ‘समस्त राजाओंके ऊपर सूर्यके समान प्रकाशित होकर अब दासकी भाँति युधिष्ठिरके पीछे-पीछे कैसे चलूँगा? ।।
कथं भुक्त्वा स्वयं भोगान् दत्त्वा दायांश्च पुष्कलान् ।। २४ ।। कृपणं वर्तयिष्यामि कृपणैः सह जीविकाम् । ‘स्वयं बहुत-से भोग भोगकर और प्रचुर धन दान करके अब दीन पुरुषोंके साथ दीनतापूर्ण जीविकाका आश्रय ले किस प्रकार निर्वाह कर सकूँगा? ।। २४ १/२ ।।
नाभ्यसूयामि ते वाक्यमुक्तं स्निग्धं हितं त्वया ।। २५ ।। न तु सन्धिमहं मन्ये प्राप्तकालं कथञ्चन । ‘आपने स्नेहवश हितकी ही बात कही है। आपकी इस बातमें मैं दोष नहीं निकालता और न इसकी निन्दा ही करता हूँ। मेरा कथन तो इतना ही है कि अब किसी प्रकार सन्धिका अवसर नहीं रह गया है। मेरी ऐसी ही मान्यता है ।। २५ १/२ ।।
सुनीतमनुपश्यामि सुयुद्धेन परंतप ।। २६ ।। नायं क्लीबयितुं कालः संयोद्धुं काल एव नः । ‘शत्रुओंको तपानेवाले वीर! अब मैं अच्छी तरह युद्ध करनेमें ही उत्तम नीतिका पालन समझ रहा हूँ। हमारा यह समय कायरता दिखानेका नहीं, उत्साहपूर्वक युद्ध करनेका ही है ।। २६ १/२ ।।
इष्टं मे बहुभिर्यज्ञैर्दत्ता विप्रेषु दक्षिणाः ।। २७ ।। प्राप्ताः कामाः श्रुता वेदाः शत्रूणां मूर्ध्नि च स्थितम् । भृत्या मे सुभृतास्तात दीनश्चाभ्युद्धृतो जनः ।। २८ ।। नोत्सहेऽद्य द्विजश्रेष्ठ पाण्डवान् वक्तुमीदृशम् । ‘तात! मैंने बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया। ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणाएँ दे दीं। सारी कामनाएँ पूर्ण कर लीं। वेदोंका श्रवण कर लिया। शत्रुओंके माथेपर पैर रखा और भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंके पालन-पोषणकी अच्छी व्यवस्था कर दी। इतना ही नहीं, मैंने दीनोंका उद्धारकार्य भी सम्पन्न कर दिया है। अतः द्विजश्रेष्ठ! अब मैं पाण्डवोंसे इस प्रकार सन्धिके लिये याचना नहीं कर सकता ।। २७-२८ १/२ ।।
जितानि परराष्ट्राणि स्वराष्ट्रमनुपालितम् ।। २९ ।।
भुक्ताश्च विविधा भोगास्त्रिवर्गः सेवितो मया । पितॄणां गतमानृण्यं क्षत्रधर्मस्य चोभयोः ॥ ३० ॥ ‘मैंने दूसरोंके राज्य जीते, अपने राष्ट्रका निरन्तर पालन किया, नाना प्रकारके भोग भोगे; धर्म, अर्थ और कामका सेवन किया और पितरों तथा क्षत्रियधर्म—दोनोंके ऋणसे उऋण हो गया ।। २९-३० ।।
न ध्रुवं सुखमस्तीति कुतो राष्ट्रं कुतो यशः । इह कीर्तिर्विधातव्या सा च युद्धेन नान्यथा ॥ ३१ ॥ ‘संसारमें कोई भी सुख सदा रहनेवाला नहीं है। फिर राष्ट्र और यश भी कैसे स्थिर रह सकते हैं? यहाँ तो कीर्तिका ही उपार्जन करना चाहिये और कीर्ति युद्धके सिवा किसी दूसरे उपायसे नहीं मिल सकती ।। ३१ ।।
गृहे यत् क्षत्रियस्यापि निधनं तद् विगर्हितम् । अधर्मः सुमहानेष यच्छय्यामरणं गृहे ॥ ३२ ॥ ‘क्षत्रियकी भी यदि घरमें मृत्यु हो जाय तो उसे निन्दित माना गया है। घरमें खाटपर सोकर मरना यह क्षत्रियके लिये महान् पाप है ।। ३२ ।।
अरण्ये यो विमुच्येत संग्रामे वा तनुं नरः । क्रतूनाहृत्य महतो महिमानं स गच्छति ॥ ३३ ॥ ‘जो बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके वनमें या संग्राममें शरीरका त्याग करता है, वही क्षत्रिय महत्त्वको प्राप्त होता है ।। ३३ ।।
कृपणं विलपन्नार्तो जरयाभिपरिप्लुतः । म्रियते रुदतां मध्ये ज्ञातीनां न स पूरुषः ॥ ३४ ॥ ‘जिसका शरीर बुढ़ापेसे जर्जर हो गया हो, जो रोगसे पीड़ित हो, परिवारके लोग जिसके आस-पास बैठकर रो रहे हों और उन रोते हुए स्वजनोंके बीचमें जो करुण विलाप करते-करते अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह पुरुष कहलानेयोग्य नहीं है ।। ३४ ।।
त्यक्त्वा तु विविधान् भोगान् प्राप्तानां परमां गतिम् । अपीदानीं सुयुद्धेन गच्छेयं यत्सलोकताम् ॥ ३५ ॥ ‘अतः जिन्होंने नाना प्रकारके भोगोंका परित्याग करके उत्तम गति प्राप्त कर ली है, इस समय युद्धके द्वारा मैं उन्हींके लोकोंमें जाऊँगा ।। ३५ ।।
शूराणामार्यवृत्तानां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् । धीमतां सत्यसंधानां सर्वेषां क्रतुयाजिनाम् ॥ ३६ ॥ शस्त्रावभृथपूतानां ध्रुवं वासस्त्रिविष्टपे । ‘जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते, अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाते और यज्ञोंद्वारा यजन करनेवाले हैं तथा जिन्होंने शस्त्रकी धारामें अवभृथस्नान किया है, उन समस्त बुद्धिमान् पुरुषोंका निश्चय ही स्वर्गमें निवास होता है ।। ३६ १/२ ।।
मुदा नूनं प्रपश्यन्ति युद्धे ह्यप्सरसां गणाः ।। ३७ ।। पश्यन्ति नूनं पितरः पूजितान् सुरसंसदि । अप्सरोभिः परिवृतान् मोदमानांस्त्रिविष्टपे ।। ३८ ।। 'निश्चय ही युद्धमें प्राण देनेवालोंकी ओर अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नतासे निहारा करती हैं। पितृगण उन्हें अवश्य ही देवताओं-की सभामें सम्मानित होते देखते हैं। वे स्वर्गमें अप्सराओंसे घिरकर आनन्दित होते देखे जाते हैं ।। पन्थानममरैर्यान्तं शूरैश्चानिवर्तिभिः । अपि तत्संगतं मार्ग वयमध्यारुहेमहि ।। ३९ ।। पितामहेन वृद्धेन तथाऽऽचार्येण धीमता । जयद्रथेन कर्णेन तथा दुःशासनेन च ।। ४० ।। 'देवता तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीर जिस मार्गसे जाते हैं, क्या उसी मार्गपर अब हमलोग भी वृद्ध पितामह, बुद्धिमान् आचार्य द्रोण, जयद्रथ, कर्ण तथा दुःशासनके साथ आरूढ़ होंगे? ।। ३९-४० ।। घटमाना मदर्थेऽस्मिन् हताः शूरा जनाधिपाः । शेरते लोहिताक्ताङ्गाः संग्रामे शरविक्षताः ।। ४१ ।। 'कितने ही वीर नरेश मेरी विजयके लिये यथाशक्ति चेष्टा करते हुए बाणोंसे क्षत-विक्षत हो मारे जाकर रक्तरंजित शरीरसे संग्रामभूमिमें सो रहे हैं ।। ४१ ।। उत्तमास्त्रविदः शूरा यथोक्तक्रतुयाजिनः । त्यक्त्वा प्राणान् यथान्यायमिन्द्रसद्मस्वधिष्ठिताः ।। ४२ ।। 'उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता और शास्त्रोक्त विधिसे यज्ञ करनेवाले अन्य शूरवीर यथोचित रीतिसे युद्धमें प्राणोंका परित्याग करके इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित हो रहे हैं ।। ४२ ।। तैः स्वयं रचितो मार्गो दुर्गमो हि पुनर्भवेत् । सम्पतद्भिर्महावेगैर्यास्यद्भिरिह सद्गतिम् ।। ४३ ।। 'उन वीरोंने स्वयं ही जिस मार्गका निर्माण किया है, वह पुनः बड़े वेगसे सद्गतिको जानेवाले बहुसंख्यक वीरोंद्वारा दुर्गम हो जाय (अर्थात् इतने अधिक वीर उस मार्गसे यात्रा करें कि भीड़के मारे उसपर चलना कठिन हो जाय) ।। ४३ ।। ये मदर्थे हताः शूरास्तेषां कृतमनुस्मरन् । ऋणं तत् प्रतियुञ्जानो न राज्ये मन आदधे ।। ४४ ।। 'जो शूरवीर मेरे लिये मारे गये हैं, उनके उस उपकारका निरन्तर स्मरण करता हुआ उस ऋणको उतारनेकी चेष्टामें संलग्न होकर मैं राज्यमें मन नहीं लगा सकता ।। ४४ ।। घातयित्वा वयस्यांश्च भ्रातृनथ पितामहान् । जीवितं यदि रक्षेयं लोको मां गर्हयेद् ध्रुवम् ।। ४५ ।।
'मित्रों, भाइयों और पितामहोंको मरवाकर यदि मैं अपने प्राणोंकी रक्षा करूँ तो सारा संसार निश्चय ही मेरी निन्दा करेगा ।। ४५ ।। कीदृशं च भवेद् राज्यं मम हीनस्य बन्धुभिः । सखिभिश्च विशेषेण प्रणिपत्य च पाण्डवम् ।। ४६ ।। 'बन्धु-बान्धवों और मित्रोंसे हीन हो युधिष्ठिरके पैरोंमें पड़नेपर मुझे जो राज्य मिलेगा, वह कैसा होगा? ।। ४६ ।। सोऽहमेतादृशं कृत्वा जगतोऽस्य पराभवम् । सुयुद्धेन ततः स्वर्गं प्राप्स्यामि न तदन्यथा ।। ४७ ।। 'इसलिये मैं जगत्का ऐसा विनाश करके अब उत्तम युद्धके द्वारा ही स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा। मेरी सद्गतिके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है' ।। ४७ ।। एवं दुर्योधनेनोक्तं सर्वे सम्पूज्य तद्वचः । साधु साध्विति राजानं क्षत्रियाः सम्बभाषिरे ।। ४८ ।। इस प्रकार राजा दुर्योधनकी कही हुई यह बात सुनकर सब क्षत्रियोंने 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर उसका आदर किया और उसे भी धन्यवाद दिया ।। ४८ ।। पराजयमशोचन्तः कृतचित्ताश्च विक्रमे । सर्वे सुनिश्चिता योद्धुमुदग्रमनसोऽभवन् ।। ४९ ।। सबने अपनी पराजयका शोक छोड़कर मन-ही-मन पराक्रम करनेका निश्चय किया। युद्ध करनेके विषयमें सबका पक्का विचार हो गया और सबके हृदयमें उत्साह भर गया ।। ४९ ।। ततो वाहान् समाश्वस्य सर्वे युद्धाभिनन्दिनः । ऊने द्वियोजने गत्वा प्रत्यतिष्ठन्त कौरवाः ।। ५० ।। तत्पश्चात् सब योद्धाओंने अपने-अपने वाहनोंको विश्राम दे युद्धका अभिनन्दन किया और आठ कोससे कुछ कम दूरीपर जाकर डेरा डाला ।। ५० ।। आकाशे विद्रुमे पुण्ये प्रस्थे हिमवतः शुभे । अरुणां सरस्वतीं प्राप्य पपुः सस्नुश्च ते जलम् ।। ५१ ।। आकाशके नीचे हिमालयके शिखरकी सुन्दर, पवित्र एवं वृक्षरहित चौरस भूमिपर अरुणसलिला सरस्वतीके निकट जाकर उन सबने स्नान और जलपान किया ।। ५१ ।। तव पुत्रकृतोत्साहाः पर्यवर्तन्त ते ततः । पर्यवस्थाप्य चात्मानमन्योन्येन पुनस्तदा । सर्वे राजन् न्यवर्तन्त क्षत्रियाः कालचोदिताः ।। ५२ ।। राजन्! वे कालप्रेरित समस्त क्षत्रिय आपके पुत्रद्वारा उत्साह देनेपर एक-दूसरेके द्वारा मनको स्थिर करके पुनः रणभूमिकी ओर लौटे ।। ५२ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि दुर्योधनवाक्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें दुर्योधनका वाक्यविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2472)
षष्ठोऽध्यायः
दुर्योधनके पूछनेपर अश्वत्थामाका शल्यको सेनापति बनानेके लिये प्रस्ताव, दुर्योधनका शल्यसे अनुरोध और शल्यद्वारा उसकी स्वीकृति
संजय उवाच
अथ हैमवते प्रस्थे स्थित्वा युद्धाभिनन्दिनः ।
सर्व एव महायोधास्तत्र तत्र समागताः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! तदनन्तर हिमालयके ऊपरकी चौरस भूमिमें डेरा डालकर युद्धका अभिनन्दन करनेवाले सभी महान् योद्धा वहाँ एकत्र हुए ॥ १ ॥
शल्यश्च चित्रसेनश्च शकुनिश्च महारथः ।
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥ २ ॥
सुषेणोऽरिष्टसेनश्च धृतसेनश्च वीर्यवान् ।
जयत्सेनश्च राजानस्ते रात्रिमुषितास्ततः ॥ ३ ॥
शल्य, चित्रसेन, महारथी शकुनि, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, सात्वतवंशी कृतवर्मा, सुषेण, अरिष्टसेन, पराक्रमी धृतसेन और जयत्सेन आदि राजाओंने वहीं रात बितायी ॥ २-३ ॥
रणे कर्णे हते वीरे त्रासिता जितकाशिभिः ।
नालभन् शर्म ते पुत्रा हिमवन्तमृते गिरिम् ॥ ४ ॥
रणभूमिमें वीर कर्णके मारे जानेपर विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा डराये हुए आपके पुत्र हिमालय पर्वतके सिवा और कहीं शान्ति न पा सके ॥ ४ ॥
तेऽब्रुवन् सहितास्तत्र राजानं शल्यसंनिधौ ।
कृतयत्ना रणे राजन् सम्पूज्य विधिवत्तदा ॥ ५ ॥
राजन्! संग्रामभूमिमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सब योद्धाओंने वहाँ एक साथ होकर शल्यके समीप राजा दुर्योधनका विधिपूर्वक सम्मान करके उससे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
कृत्वा सेनाप्रणेतारं परांस्त्वं योद्धुमर्हसि ।
येनाभिगुप्ताः संग्रामे जयेमासुहृदो वयम् ॥ ६ ॥
‘नरेश्वर! तुम किसीको सेनापति बनाकर शत्रुओंके साथ युद्ध करो, जिससे सुरक्षित होकर हमलोग विपक्षियोंपर विजय प्राप्त करें’ ॥ ६ ॥
ततो दुर्योधनः स्थित्वा रथे रथवरोत्तमम् ।
सर्वयुद्धविभावज्ञमन्तकप्रतिमं युधि ॥ ७ ॥