महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तदनन्तर अर्जुन, भीमसेन, माद्रीपुत्र पाण्डुकुमार नकुल, सहदेव, पुरुषसिंह सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, पांचाल और सोमक वीर—इन सबने युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये उन्हें चारों ओरसे घेर लिया॥ ७-८ १/२ ॥ ते समन्तात् परिवृताः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ॥ ९ ॥ क्षोभयन्ति स्म तां सेनां मकराः सागरं यथा । युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए पुरुषप्रवर पाण्डव उस सेनाको उसी प्रकार क्षुब्ध करने लगे, जैसे मगर समुद्रको ॥ ९ १/२ ॥ वृक्षानिव महावाताः कम्पयन्ति स्म तावकान् ॥ १० ॥ पुरोवातेन गङ्गेव क्षोभ्यमाणा महानदी । अक्षोभ्यत तदा राजन् पाण्डूनां ध्वजिनी ततः ॥ ११ ॥ जैसे महावायु (आँधी) वृक्षोंको हिला देती है, उसी प्रकार पाण्डववीरोंने आपके सैनिकोंको कम्पित कर दिया। राजन्! जैसे पूर्वी हवा महानदी गंगाको क्षुब्ध कर देती है, उसी प्रकार उन सैनिकोंने पाण्डवोंकी सेनामें भी हलचल मचा दी ॥ १०-११ ॥ प्रस्कन्द्य सेनां महतीं महात्मानो महारथाः । बहवश्चुक्रुशुस्तत्र क्व स राजा युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥ भ्रातरो वास्य ते शूरा दृश्यन्ते नेह केन च । वे बहुसंख्यक महामनस्वी मद्रमहारथी विशाल पाण्डव-सेनाको मथकर जोर-जोरसे पुकार-पुकारकर कहने लगे—‘कहाँ है वह राजा युधिष्ठिर? अथवा उसके वे शूरवीर भाई? वे सब यहाँ दिखायी क्यों नहीं देते? ॥ १२ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नोऽथ शैनेयो द्रौपदेयाश्च सर्वशः ॥ १३ ॥ पञ्चालाश्च महावीर्याः शिखण्डी च महारथः । ‘धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके सभी पुत्र, महापराक्रमी पांचाल और महारथी शिखण्डी—ये सब कहाँ हैं?’ ॥ एवं तान् वादिनः शूरान् द्रौपदेया महारथाः ॥ १४ ॥ अभ्यघ्नन् युयुधानश्च मद्रराजपदानुगान् । ऐसी बातें कहते हुए उन मद्रराजके अनुगामी वीर योद्धाओंको द्रौपदीके महारथी पुत्रों और सात्यकिने मारना आरम्भ किया ॥ १४ १/२ ॥ चक्रैर्विमथितैः केचित् केचिच्छिन्नैर्महाध्वजैः ॥ १५ ॥ ते दृश्यन्तेऽपि समरे तावका निहताः परैः । समरांगणमें आपके वे सैनिक शत्रुओंद्वारा मारे जाने लगे। कुछ योद्धा छिन्न-भिन्न हुए रथके पहियों और कुछ कटे हुए विशाल ध्वजोंके साथ ही धराशायी होते दिखायी देने लगे ॥ १५ १/२ ॥
आलोक्य पाण्डवान् युद्धे योधा राजन् समन्ततः ॥ १६ ॥ वार्यमाणा ययुर्वेगात् पुत्रेण तव भारत । राजन्! भरतनन्दन! वे योद्धा युद्धमें सब ओर फैले हुए पाण्डवोंको देखकर आपके पुत्रके मना करनेपर भी वेगपूर्वक आगे बढ़ गये ॥ १६ १/२ ॥ दुर्योधनश्च तान् वीरान् वारयामास सान्त्वयन् ॥ १७ ॥ न चास्य शासनं केचित्तत्र चक्रुर्महारथाः । दुर्योधनने उन वीरोंको सान्त्वना देते हुए बहुत मना किया, किंतु वहाँ किन्हीं महारथियोंने उसकी इस आज्ञाका पालन नहीं किया ॥ १७ १/२ ॥ ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरब्रवीत् ॥ १८ ॥ दुर्योधनं महाराज वचनं वचनक्षमः । महाराज! तब प्रवचनपटु गान्धारराजपुत्र शकुनिने दुर्योधनसे यह बात कही— ॥ १८ १/२ ॥ किं नः सम्प्रेक्षमाणानां मद्राणां हन्यते बलम् ॥ १९ ॥ न युक्तमेतत् समरे त्वयि तिष्ठति भारत । ‘भारत! हमलोगोंके देखते-देखते मद्रदेशकी यह सेना क्यों मारी जाती है? तुम्हारे रहते ऐसा कदापि नहीं होना चाहिये ॥ १९ १/२ ॥ सहितैश्चापि योद्धव्यमित्येष समयः कृतः ॥ २० ॥ अथ कस्मात् परानेव घ्नतो मर्षयसे नृप । ‘यह शपथ ली जा चुकी है कि ‘हम सब लोग एक साथ होकर लड़ें।’ नरेश्वर! ऐसी दशामें शत्रुओंको अपनी सेनाका संहार करते देखकर भी तुम क्यों सहन करते हो?’ ॥ २० १/२ ॥
दुर्योधन उवाच वार्यमाणा मया पूर्वं नैते चक्रुर्वचो मम ॥ २१ ॥ एते विनिहताः सर्वे प्रस्कन्नाः पाण्डुवाहिनीम् । दुर्योधनने कहा—मैंने पहले ही इन्हें बहुत मना किया था, परंतु इन लोगोंने मेरी बात नहीं मानी और पाण्डवसेनामें घुसकर ये प्रायः सब-के-सब मारे गये ॥
शकुनिरुवाच न भर्तुः शासनं वीरा रणे कुर्वन्त्यमर्षिताः ॥ २२ ॥ अलं क्रोद्धुमथैतेषां नायं काल उपेक्षितुम् । यामः सर्वे च सम्भूय सवाजिरथकुञ्जराः ॥ २३ ॥ परित्रातुं महेष्वासान् मद्रराजपदानुगान् । अन्योन्यं परिरक्षामो यत्नेन महता नृप ॥ २४ ॥
शकुनि बोला— नरेश्वर! युद्धस्थलमें रोषामर्षके वशीभूत हुए वीर स्वामीकी आज्ञाका पालन नहीं करते हैं; वैसी दशामें इनपर क्रोध करना उचित नहीं है। यह इनकी उपेक्षा करनेका समय नहीं है। हम सब लोग एक साथ हो मद्रराजके महाधनुर्धर सेवकोंकी रक्षाके लिये हाथी, घोड़े और रथसहित चलें तथा महान् प्रयत्नपूर्वक एक-दूसरेकी रक्षा करें।। २२—२४।।
संजय उवाच
एवं सर्वेऽनुसंचिन्त्य प्रययुर्यत्र सैनिकाः।
एवमुक्तस्तदा राजा बलेन महता वृतः।। २५।।
प्रययौ सिंहनादेन कम्पयन्निव मेदिनीम्।
संजय कहते हैं— राजन्! ऐसा विचारकर सब लोग वहीं गये, जहाँ वे सैनिक मौजूद थे। शकुनिके वैसा कहनेपर राजा दुर्योधन विशाल सेनाके साथ सिंहनाद करता और पृथ्वीको कँपाता हुआ-सा आगे बढ़ा।। २५ १/२।।
हत विद्ध्यत गृह्णीत प्रहरध्वं निकृन्तत।। २६।।
इत्यासीत् तुमुलः शब्दस्तव सैन्यस्य भारत।
भारत! उस समय आपकी सेनामें 'मार डालो, घायल करो, पकड़ लो, प्रहार करो और टुकड़े-टुकड़े कर डालो' यह भयंकर शब्द गूँज रहा था।। २६ १/२।।
पाण्डवास्तु रणे दृष्ट्वा मद्रराजपदानुगान्।। २७।।
सहितानभ्यवर्तन्त गुल्ममास्थाय मध्यमम्।
रणभूमिमें मद्रराजके सेवकोंको एक साथ धावा करते देख पाण्डवोंने मध्यम गुल्म (सेना)-का आश्रय ले उनका सामना किया।। २७ १/२।।
ते मुहूर्ताद् रणे वीरा हस्ताहस्ति विशाम्पते।। २८।।
निहताः प्रत्यदृश्यन्त मद्रराजपदानुगाः।
प्रजानाथ! वे मद्रराजके अनुगामी वीर रणभूमिमें दो ही घड़ीके भीतर हाथों-हाथ मारे गये दिखायी दिये।।
ततो नः सम्प्रयातानां हता मद्रास्तरस्विनः।। २९।।
हृष्टाः किलकिलाशब्दमकुर्वन् सहिताः परे।
वहाँ हमारे पहुँचते ही मद्रदेशके वे वेगशाली वीर कालके गालमें चले गये और शत्रुसैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो एक साथ किलकारियाँ भरने लगे।। २९ १/२।।
उत्थितानि कबन्धानि समदृश्यन्त सर्वशः।। ३०।।
पपात महती चोल्का मध्येनादित्यमण्डलम्।
सब ओर कबन्ध खड़े दिखायी दे रहे थे और सूर्यमण्डलके बीचसे वहाँ बड़ी भारी उल्का गिरी।।
रथैर्भग्नैर्युगाक्षैश्च निहतैश्च महारथैः ॥ ३१ ॥ अश्वैर्निपतितैश्चैव संछन्नाभूद् वसुन्धरा । टूटे-फूटे रथों, जूओं और धुरोंसे, मारे गये महारथियोंसे तथा धराशायी हुए घोड़ोंसे भूमि ढक गयी थी ॥ ३१ १/२ ॥ वातायमानैस्तुरगैर्युगासक्तैस्ततस्ततः ॥ ३२ ॥ अदृश्यन्त महाराज योधास्तत्र रणाजिरे । महाराज! वहाँ समरांगणमें बहुत-से योद्धा जूएमें बँधे हुए वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा इधर-उधर ले जाये जाते दिखायी देते थे ॥ ३२ १/२ ॥ भग्नचक्रान् रथान् केचिदहरंस्तुरगा रणे ॥ ३३ ॥ रथार्धं केचिदादाय दिशो दश विबभ्रमुः । कुछ घोड़े रणभूमिमें टूटे पहियोंवाले रथोंको लिये जा रहे थे और कितने ही अश्व आधे ही रथको लेकर दसों दिशाओंमें चक्कर लगाते थे ॥ ३३ १/२ ॥ तत्र तत्र व्यदृश्यन्त योक्तैः श्लिष्टाः स्म वाजिनः ॥ ३४ ॥ रथिनः पतमानाश्च दृश्यने स्म नरोत्तमाः । गगनात् प्रच्युताः सिद्धाः पुण्यानामिव संक्षये ॥ ३५ ॥ जहाँ-तहाँ जोतोंसे जुड़े हुए घोड़े और नरश्रेष्ठ रथी गिरते दिखायी दे रहे थे, मानो सिद्ध (पुण्यात्मा) पुरुष पुण्यक्षय होनेपर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हों ॥ निहतेषु च शूरेषु मद्रराजानुगेषु वै । अस्मानापततश्चापि दृष्ट्वा पार्था महारथाः ॥ ३६ ॥ अभ्यवर्तन्त वेगेन जयगृद्धाः प्रहारिणः । बाणशब्दरवान् कृत्वा विमिश्रान् शङ्खनिःस्वनैः ॥ ३७ ॥ मद्रराजके उन शूरवीर सैनिकोंके मारे जानेपर हमें आक्रमण करते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले महारथी पाण्डवयोद्धा शंखध्वनिके साथ बाणोंकी सनसनाहट फैलाते हुए हमारा सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आये ॥ ३६-३७ ॥ अस्मांस्तु पुनरासाद्य लब्धलक्ष्यप्रहारिणः । शरासनानि धुन्वानाः सिंहनादान् प्रचुक्रुशुः ॥ ३८ ॥ हमारे पास पहुँचकर लक्ष्य वेधनेमें सफल और प्रहारकुशल पाण्डव-सैनिक अपने धनुष हिलाते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ३८ ॥ ततो हतमभिप्रेक्ष्य मद्रराजबलं महत् । मद्रराजं च समरे दृष्ट्वा शूरं निपातितम् ॥ ३९ ॥ दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत् पराङ्मुखम् । मद्रराजकी वह विशाल सेना मारी गयी तथा शूरवीर मद्रराज शल्य पहले ही समरभूमिमें धराशायी किये जा चुके हैं, यह सब अपनी आँखों देखकर दुर्योधनकी सारी
सेना पुनः पीठ दिखाकर भाग चली ।।
वध्यमानं महाराज पाण्डवैर्जितकाशिभिः ।
दिशो भेजेऽथ सम्भ्रान्तं भ्रामितं दृढधन्विभिः ॥ ४० ॥
महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले दृढ़ धनुर्धर पाण्डवोंकी मार खाकर कौरव-सेना घबरा उठी और भ्रान्त-सी होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगी ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2581)
एकोनविंशोऽध्यायः
पाण्डवसैनिकोंका आपसमें बातचीत करते हुए पाण्डवोंकी प्रशंसा और धृतराष्ट्रकी निन्दा करना तथा कौरव-सेनाका पलायन, भीमद्वारा इक्कीस हजार पैदलोंका संहार और दुर्योधनका अपनी सेनाको उत्साहित करना
संजय उवाच
पतिते युधि दुर्धर्षे मद्रराजे महारथे ।
तावकास्तव पुत्राश्च प्रायशो विमुखाभवन् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! दुर्जय महारथी मद्रराज शल्यके मारे जानेपर आपके सैनिक और पुत्र प्रायः संग्रामसे विमुख हो गये ॥ १ ॥
वणिजो नावि भिन्नायां यथागाधेऽप्लवेऽर्णवे ।
अपारे पतिमच्छन्तो हते शूरे महात्मना ॥ २ ॥
मद्रराजे महाराज वित्रस्ताः शरविक्षताः ।
महाराज! जैसे अगाध महासागरमें नाव टूट जानेपर उस नौकारहित अपार समुद्रसे पार जानेकी इच्छावाले व्यापारी व्याकुल हो उठते हैं, उसी प्रकार महात्मा युधिष्ठिरके द्वारा शूरवीर मद्रराज शल्यके मारे जानेपर आपके सैनिक बाणोंसे क्षत-विक्षत एवं भयभीत हो बड़ी घबराहटमें पड़ गये ॥ २ १/२ ॥
अनाथा नाथमिच्छन्तो मृगाः सिंहार्दिता इव ॥ ३ ॥
वृषा यथा भग्नशृङ्गाः शीर्णदन्ता यथा गजाः ।
वे अपनेको अनाथ समझते हुए किसी नाथ (सहायक) की इच्छा रखते थे और सिंहके सताये हुए मृगों, टूटे सींगवाले साँड़ों तथा जीर्ण-शीर्ण दाँतोंवाले हाथियोंके समान असमर्थ हो गये थे ॥ ३ १/२ ॥
मध्याह्ने प्रत्यपायाम निर्जिताजातशत्रुणा ॥ ४ ॥
न संधातुमनीकानि न च राजन् पराक्रमे ।
आसीद् बुद्धिर्हते शल्ये भूयो योधस्य कस्यचित् ॥ ५ ॥
राजन्! अजातशत्रु युधिष्ठिरसे पराजित हो दोपहरके समय हमलोग युद्धसे भाग चले थे। शल्यके मारे जानेसे किसी भी योद्धाके मनमें सेनाओंको संगठित करने तथा पराक्रम दिखानेका उत्साह नहीं होता था ॥
भीष्मे द्रोणे च निहते सूतपुत्रे च भारत ।
यद् दुःखं तव योधानां भयं चासीद् विशाम्पते ॥ ६ ॥
तद् भयं स च नः शोको भय एवाभ्यवर्तत ।
भारत! प्रजानाथ! भीष्म, द्रोण और सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके योद्धाओंको जो दुःख और भय प्राप्त हुआ था, वही भय और वही शोक पुनः (शल्यके मारे जानेपर) हमारे सामने उपस्थित हुआ ।। ६ १/२ ।।
निराशाश्च जये तस्मिन् हते शल्ये महारथे ॥ ७ ॥
हतप्रवीरा विध्वस्ता निकृत्ताश्च शितैः शरैः ।
जिनके प्रमुख वीर मारे गये थे, वे कौरवसैनिक महारथी शल्यका वध हो जानेपर पैने बाणोंसे क्षत-विक्षत और विध्वस्त हो विजयकी ओरसे निराश हो गये थे ।। ७ १/२ ।।
मद्रराजे हते राजन् योधास्ते प्राद्रवन् भयात् ॥ ८ ॥
अश्वानन्ये गजानन्ये रथानन्ये महारथाः ।
आरुह्य जवसम्पन्नाः पादाताः प्राद्रवंस्तथा ॥ ९ ॥
राजन्! मद्रराजकी मृत्यु हो जानेपर आपके वे सभी योद्धा भयके मारे भागने लगे। कुछ सैनिक घोड़ोंपर, कुछ हाथियोंपर और दूसरे महारथी रथोंपर आरूढ़ हो बड़े वेगसे भागे। पैदल सैनिक भी वहाँसे भाग खड़े हुए ।।
द्विसाहस्राश्च मातङ्गा गिरिरूपाः प्रहारिणः ।
सम्प्राद्रवन् हते शल्ये अङ्कुशाङ्गुष्ठनोदिताः ॥ १० ॥
दो हजार प्रहारकुशल पर्वताकार मतवाले हाथी शल्यके मारे जानेपर अंकुशों और पैरके अँगूठोंसे प्रेरित हो तीव्र गतिसे पलायन करने लगे ।। १० ।।
ते रणाद् भरतश्रेष्ठ तावकाः प्राद्रवन् दिशः ।
धावतश्चाप्यपश्याम श्वसमानान् शराहतान् ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! आपके वे सैनिक रणभूमिसे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागे थे। हमने देखा, वे बाणोंसे क्षत-विक्षत हो हाँफते हुए दौड़े जा रहे हैं ।। ११ ।।
तान् प्रभग्नान् द्रुतान् दृष्ट्वा हतोत्साहान् पराजितान् ।
अभ्यवर्तन्त पञ्चालाः पाण्डवाश्च जयैषिणः ॥ १२ ॥
उन्हें हतोत्साह, पराजित एवं हताश होकर भागते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले पांचाल और पाण्डव उनका पीछा करने लगे ।। १२ ।।
बाणशब्दरवाश्चापि सिंहनादाश्च पुष्कलाः ।
शङ्खशब्दश्च शूराणां दारुणः समपद्यत ॥ १३ ॥
बाणोंकी सनसनाहट, शूरवीरोंका सिंहनाद और शंखध्वनि—इन सबकी मिली-जुली आवाज बड़ी भयानक जान पड़ती थी ।। १३ ।।
दृष्ट्वा तु कौरवं सैन्यं भयत्रस्तं प्रविद्रुतम् ।
अन्योन्यं सम्भाषन्त पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ १४ ॥
कौरव-सेनाको भयसे संत्रस्त होकर भागती देख पाण्डवोंसहित पांचालयोद्धा आपसमें इस प्रकार वार्तालाप करने लगे— ।। १४ ।। अद्य राजा सत्यधृतिर्हतामित्रो युधिष्ठिरः । अद्य दुर्योधनो हीनो दीप्ताया नृपतिश्रियः ।। १५ ।। ‘आज सत्यपरायण राजा युधिष्ठिर शत्रुहीन हो गये और आज दुर्योधन अपनी देदीप्यमान राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गया ।। अद्य श्रुत्वा हतं पुत्रं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । विह्वलः पतितो भूमौ किल्बिषं प्रतिपद्यताम् ।। १६ ।। ‘आज राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रको मारा गया सुनकर व्याकुल हो पृथ्वीपर पछाड़ खाकर गिरें और दुःख भोगें ।। अद्य जानातु कौन्तेयं समर्थं सर्वधन्विनाम् । अद्यात्मानं च दुर्मेधा गर्हयिष्यति पापकृत् ।। १७ ।। अद्य क्षत्तुर्वचः सत्यं स्मरतां ब्रुवतो हितम् । ‘आज वे समझ लें कि कुन्तीपुत्र अर्जुन सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ एवं सामर्थ्यशाली हैं। आज पापाचारी दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र अपनी भरपेट निन्दा करें और विदुरजीने जो सत्य एवं हितकर वचन कहे थे, उन्हें याद करें ।। अद्यप्रभृति पार्थं च प्रेष्यभूत इवाचरन् ।। १८ ।। विजानातु नृपो दुःखं यत् प्राप्तं पाण्डुनन्दनैः । ‘आजसे वे स्वयं ही दासतुल्य होकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरकी परिचर्या करते हुए अच्छी तरह समझ लें कि ‘पाण्डवोंने पहले कितना कष्ट उठाया था?’ ।। १८½ ।। अद्य कृष्णस्य माहात्म्यं विजानातु महीपतिः ।। १९ ।। अद्यार्जुनधनुर्घोषं घोरं जानातु संयुगे । अस्त्राणां च बलं सर्वं बाह्वोश्च बलमाहवे ।। २० ।। ‘आज राजा धृतराष्ट्र अनुभव करें कि भगवान् श्रीकृष्णका कैसा माहात्म्य है और आज वे यह भी जान लें कि युद्धस्थलमें अर्जुनके गाण्डीव धनुषकी टंकार कितनी भयंकर है? उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी सारी शक्ति कैसी है तथा रणभूमिमें उनकी दोनों भुजाओंका बल कितना अद्भुत है? ।। १९-२० ।। अद्य ज्ञास्यति भीमस्य बलं घोरं महात्मनः । हते दुर्योधने युद्धे शक्रणेवासुरे बले ।। २१ ।। ‘जैसे इन्द्रने असुरोंकी सेनाका संहार किया था, उसी प्रकार युद्धमें भीमसेनके हाथसे दुर्योधनके मारे जानेपर आज धृतराष्ट्रको यह ज्ञात हो जायगा कि ‘महामनस्वी भीमका बल कैसा भयंकर है!’ ।। २१ ।। यत् कृतं भीमसेनेन दुःशासनवधे तदा ।
नान्यः कर्तास्ति लोकेऽस्मिन्नृते भीमान्महाबलात् ॥ २२ ॥
‘दुःशासनके वधके समय भीमसेनने जो कुछ किया था, उसे महाबली भीमसेनके सिवा इस संसारमें दूसरा कोई नहीं कर सकता ॥ २२ ॥
अद्य श्रेष्ठस्य जानीतां पाण्डवस्य पराक्रमम् ।
मद्रराजं हतं श्रुत्वा देवैरपि सुदुःसहम् ॥ २३ ॥
‘देवताओंके लिये भी दुःसह मद्रराज शल्यके वधका वृत्तान्त सुनकर आज धृतराष्ट्र ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके पराक्रमको भी अच्छी तरह जान लें ॥ २३ ॥
अद्य ज्ञास्यति संग्रामे माद्रीपुत्रौ सुदुःसहौ ।
निहते सौबले वीरे प्रवीरेषु च सर्वशः ॥ २४ ॥
‘आज संग्राममें सुबलपुत्र वीर शकुनि तथा दूसरे समस्त प्रमुख वीरोंके मारे जानेपर उन्हें शत्रुके लिये अत्यन्त दुःसह माद्रीकुमार नकुल-सहदेवकी शक्तिका भी ज्ञान हो जायगा ॥
कथं जयो न तेषां स्याद् येषां योद्धा धनंजयः ।
सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २५ ॥
द्रौपद्यास्तनयाः पञ्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
शिखण्डी च महेष्वासो राजा चैव युधिष्ठिरः ॥ २६ ॥
‘जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले धनंजय, सात्यकि, भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव, महाधनुर्धर शिखण्डी तथा स्वयं राजा युधिष्ठिर-जैसे वीर हैं, उनकी विजय कैसे न हो? ॥ २५-२६ ॥
येषां च जगतीनाथो नाथः कृष्णो जनार्दनः ।
कथं तेषां जयो न स्याद् येषां धर्मो व्यपाश्रयः ॥ २७ ॥
‘सम्पूर्ण जगत्के स्वामी जनार्दन श्रीकृष्ण जिनके रक्षक हैं और जिन्हें धर्मका आश्रय प्राप्त है, उनकी विजय क्यों न हो? ॥ २७ ॥
(लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः ।
येषां नाथो हृषीकेशः सर्वलोकविभुर्हरिः ॥)
‘अखिल विश्वके प्रभु और सबकी इन्द्रियोंके नियन्ता भगवान् श्रीहरि जिनके स्वामी और संरक्षक हैं, उन्हींको लाभ प्राप्त होता है और उन्हींकी विजय होती है। भला उनकी पराजय कैसे हो सकती है?।
भीष्मं द्रोणं च कर्णं च मद्रराजानमेव च ।
तथान्यान् नृपतीन् वीरान् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २८ ॥
कोऽन्यः शक्तो रणे जेतुमृते पार्थाद् युधिष्ठिरात् ।
यस्य नाथो हृषीकेशः सदा सत्ययशोनिधिः ॥ २९ ॥
‘कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके सिवा दूसरा कौन ऐसा राजा है जो रणभूमिमें भीष्म, द्रोण, कर्ण, मद्रराज शल्य तथा अन्य सैकड़ों-हजारों नरपतियोंपर विजय प्राप्त कर सके। सदा सत्य और यशके सागर भगवान् श्रीकृष्ण जिनके स्वामी एवं रक्षक हैं, उन्हींको यह सफलता प्राप्त हो सकती है’॥
इत्येवं वदमानास्ते हर्षेण महता युताः।
प्रभग्नांस्तावकान् योधान् सृञ्जयाः पृष्ठतोऽन्वयुः॥ ३०॥
इस तरहकी बातें करते हुए सृंजयवीर अत्यन्त हर्षमें भरकर आपके भागते हुए योद्धाओंका पीछा करने लगे॥ ३०॥
धनंजयो रथानीकमभ्यवर्तत वीर्यवान्।
माद्रीपुत्रौ च शकुनिं सात्यकिश्च महारथः॥ ३१॥
इसी समय पराक्रमी अर्जुनने आपकी रथसेनापर धावा किया। साथ ही नकुल-सहदेव और महारथी सात्यकिने शकुनिपर चढ़ाई की॥ ३१॥
तान् प्रेक्ष्य द्रवतः सर्वान् भीमसेनभयार्दितान्।
दुर्योधनस्तदा सूतमब्रवीद् विजयाय च॥ ३२॥
भीमसेनके भयसे पीड़ित हुए अपने उन समस्त योद्धाओंको भागते देख दुर्योधनने विजयकी इच्छासे अपने सारथिसे कहा—॥ ३२॥
मामतिक्रमते पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम्।
जघने सर्वसैन्यानां ममाश्वान् प्रतिपादय॥ ३३॥
‘सूत! मैं यहाँ हाथमें धनुष लिये खड़ा हूँ और अर्जुन मुझे लाँघ जानेकी चेष्टा कर रहे हैं। अतः तुम मेरे घोड़ोंको सारी सेनाके पिछले भागमें पहुँचा दो॥ ३३॥
जघने युध्यमानं हि कौन्तेयो मां समन्ततः।
नोत्सहेदभ्यतिक्रान्तुं वेलामिव महोदधिः॥ ३४॥
‘पृष्ठभागमें रहकर युद्ध करते समय मुझे अर्जुन किसी ओरसे भी लाँघनेका साहस नहीं कर सकते। ठीक वैसे ही, जैसे महासागर अपने तटप्रान्तको नहीं लाँघ पाता है॥
पश्य सैन्यं महत् सूत पाण्डवैः समभिद्रुतम्।
सैन्यरेणुं समुद्भूतं पश्यस्वैनं समन्ततः॥ ३५॥
‘सारथे! देखो, पाण्डव मेरी विशाल सेनाको खदेड़ रहे हैं और सैनिकोंके दौड़नेसे उठी हुई धूल जो सब ओर छा गयी है उसपर भी दृष्टिपात करो॥ ३५॥
सिंहनादांश्च बहुशः शृणु घोरान् भयावहान्।
तस्माद् याहि शनैः सूत जघनं परिपालय॥ ३६॥
‘सूत! वह सुनो, बारंबार भय उत्पन्न करनेवाले घोर सिंहनाद हो रहे हैं। इसलिये तुम धीरे-धीरे चलो और सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करो॥ ३६॥
मयि स्थिते च समरे निरुद्धेषु च पाण्डुषु।
पुनरावर्तते तूर्णं मापकं बलमोजसा ॥ ३७ ॥
‘जब मैं समरांगणमें खड़ा होऊँगा और पाण्डवोंका बढ़ाव रुक जायगा, तब मेरी सेना पुनः शीघ्र ही लौट आयेगी और सारी शक्ति लगाकर युद्ध करेगी’ ॥ ३७ ॥
तच्छ्रुत्वा तव पुत्रस्य शूरार्यसदृशं वचः ।
सारथिर्हेमसंछन्नान् शनैरश्वानचोदयत् ॥ ३८ ॥
राजन्! आपके पुत्रका यह श्रेष्ठ वीरोचित वचन सुनकर सारथिने सोनेके साज-बाजसे सजे हुए घोड़ोंको धीरे-धीरे आगे बढ़ाया ॥ ३८ ॥
गजाश्वरथिभिर्हीनास्त्यक्तात्मानः पदातयः ।
एकविंशतिसाहस्राः संयुगायावतस्थिरे ॥ ३९ ॥
उस समय वहाँ हाथीसवार, घुड़सवार तथा रथियोंसे रहित इक्कीस हजार केवल पैदल योद्धा अपने जीवनका मोह छोड़कर युद्धके लिये डट गये ॥ ३९ ॥
नानादेशसमुद्भूता नानानगरवासिनः ।
अवस्थितास्तदा योधाः प्रार्थयन्तो महद् यशः ॥ ४० ॥
वे अनेक देशोंमें उत्पन्न और अनेक नगरोंके निवासी वीर सैनिक महान् यशकी अभिलाषा रखते हुए वहाँ युद्ध करनेके लिये खड़े हुए थे ॥ ४० ॥
तेषामापततां तत्र संहृष्टानां परस्परम् ।
संमर्दः सुमहाञ् जज्ञे घोररूपो भयानकः ॥ ४१ ॥
परस्पर हर्षमें भरकर एक-दूसरेपर आक्रमण करनेवाले उभयपक्षके सैनिकोंका वह घोर एवं महान् संघर्ष बड़ा भयंकर हुआ ॥ ४१ ॥
भीमसेनस्तदा राजन् धृष्टद्युम्नश्च पार्वतः ।
बलेन चतुरङ्गेन नानादेश्यानवारयत् ॥ ४२ ॥
राजन्! उस समय भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न चतुरंगिणी सेना साथ लेकर उन अनेकदेशीय सैनिकोंको रोकने लगे ॥ ४२ ॥
भीममेवाभ्यवर्तन्त रणेऽन्ये तु पदातयः ।
प्रक्ष्वेड्यास्फोट्य संहृष्टा वीरलोकं यियासवः ॥ ४३ ॥
तब रणभूमिमें अन्य पैदल योद्धा हर्ष और उत्साहमें भरकर भुजाओंपर ताल ठोंकते और सिंहनाद करते हुए वीरलोकमें जानेकी इच्छासे भीमसेनके ही सामने आ पहुँचे ॥ ४३ ॥
आसाद्य भीमसेनं तु संरब्धा युद्धदुर्मदाः ।
धार्तराष्ट्रा विनेदुर्हि नान्यामकथयन् कथाम् ॥ ४४ ॥
भीमसेनके पास पहुँचकर वे रोषभरे रणदुर्मद कौरवयोद्धा केवल गर्जना करने लगे, मुँहसे दूसरी कोई बात नहीं कहते थे ॥ ४४ ॥
परिवार्य रणे भीमं निजघ्नुस्ते समन्ततः ।
स वध्यमानः समरे पदातिगणसंवृतः ।। ४५ ।। न चचाल ततः स्थानान्मैनाक इव पर्वतः । उन्होंने रणभूमिमें भीमसेनको चारों ओरसे घेरकर उनपर प्रहार आरम्भ कर दिया। समरांगणमें पैदल सैनिकोंसे घिरे हुए भीमसेन उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी चोट सहते हुए भी मैनाक पर्वतके समान अपने स्थानसे विचलित नहीं हुए ।। ४५ १/२ ।।
ते तु क्रुद्धा महाराज पाण्डवस्य महारथम् ।। ४६ ।। निग्रहीतुं प्रवृत्ता हि योधांश्चान्यानवारयन् । महाराज! वे सभी सैनिक कुपित हो पाण्डव महारथी भीमसेनको पकड़नेकी चेष्टामें संलग्न हो गये और दूसरे योद्धाओंको भी आगे बढ़नेसे रोकने लगे ।।
अक्रुध्यत रणे भीमस्तैस्तदा पर्यवस्थितैः ।। ४७ ।। सोऽवतीर्य रथात् तूर्णं पदातिः समवस्थितः । जातरूपप्रतिच्छन्नां प्रगृह्य महतीं गदाम् ।। ४८ ।। अवधीत् तावकान् योधान् दण्डपाणिरिवान्तकः । उनके इस प्रकार सब ओर खड़े होनेपर उस समय रणभूमिमें भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। वे तुरंत अपने रथसे उतरकर पैदल खड़े हो गये और सोनेसे जड़ी हुई विशाल गदा हाथमें लेकर दण्डधारी यमराजके समान आपके उन योद्धाओंका संहार करने लगे ।। ४७-४८ १/२ ।।
विप्रहीणरथाश्वांस्तानवधीत् पुरुषर्षभः ।। ४९ ।। एकविंशतिसाहस्रान् पदातीन् समपोथयत् । रथ और घोड़ोंसे रहित उन इक्कीसों हजार पैदल सैनिकोंको पुरुषप्रवर भीमने गदासे मारकर धराशायी कर दिया ।। ४९ १/२ ।।
हत्वा तत् पुरुषानीकं भीमः सत्यपराक्रमः ।। ५० ।। धृष्टद्युम्नं पुरस्कृत्य नचिरात् प्रत्यदृश्यत । सत्यपराक्रमी भीमसेन उस पैदल सेनाका संहार करके थोड़ी ही देरमें धृष्टद्युम्नको आगे किये दिखायी दिये ।।
पादाता निहता भूमौ शिशियरे रुधिरोक्षिताः ।। ५१ ।। सम्भग्ना इव वातेन कर्णिकाराः सुपुष्पिताः । मारे गये पैदल सैनिक खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर सदाके लिये सो गये, मानो हवाके उखाड़े हुए सुन्दर लाल फूलोंसे भरे कनेरके वृक्ष पड़े हों ।। ५१ १/२ ।।
नानाशस्त्रसमायुक्ता नानाकुण्डलधारिणः ।। ५२ ।। नानाजात्या हतास्तत्र नानादेशसमागताः ।
वहाँ नाना देशोंसे आये हुए, नाना जातिके, नाना शस्त्र धारण किये और नाना प्रकारके कुण्डलधारी योद्धा मारे गये थे ॥ ५२ १/२ ॥
पताकाध्वजसंछन्नं पदातीनां महद् बलम् ॥ ५३ ॥
निकृत्तं विबभौ रौद्रं घोररूपं भयावहम् ।
ध्वज और पताकाओंसे आच्छादित पैदलोंकी वह विशाल सेना छिन्न-भिन्न होकर रौद्र, घोर एवं भयानक प्रतीत होती थी ॥ ५३ १/२ ॥
युधिष्ठिरपुरोगाश्च सहसैन्या महारथाः ॥ ५४ ॥
अभ्यधावन् महात्मानं पुत्रं दुर्योधनं तव ।
तत्पश्चात् सेनासहित युधिष्ठिर आदि महारथी आपके महामनस्वी पुत्र दुर्योधनकी ओर दौड़े ॥ ५४ १/२ ॥
ते सर्वं तावकान् दृष्ट्वा महेष्वासाः पराङ्मुखान् ॥ ५५ ॥
नात्यवर्तन्त ते पुत्रं वेलेव मकरालयम् ।
आपके योद्धाओंको युद्धसे विमुख हो भागते देख वे सब महाधनुर्धर पाण्डव-महारथी आपके पुत्रको लाँघकर आगे नहीं बढ़ सके। जैसे तटभूमि समुद्रको आगे नहीं बढ़ने देती है (उसी प्रकार दुर्योधनने उन्हें अग्रसर नहीं होने दिया) ॥ ५५ १/२ ॥
तदद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् ॥ ५६ ॥
यदेकं सहिताः पार्था न शेकुरतिवर्तितुम् ।
उस समय हमलोगोंने आपके पुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि कुन्तीके सभी पुत्र एक साथ प्रयत्न करनेपर भी उसे लाँघकर आगे न जा सके ॥ ५६ १/२ ॥
नातिदूरापयातं तु कृतबुद्धिं पलायने ॥ ५७ ॥
दुर्योधनः स्वकं सैन्यमब्रवीद् भृशविक्षतम् ।
जब दुर्योधनने देखा कि मेरी सेना भागनेका निश्चय करके अभी अधिक दूर नहीं गयी है, तब उसने उन अत्यन्त घायल हुए सैनिकोंको पुकारकर कहा— ॥
न तं देशं प्रपश्यामि पृथिव्यां पर्वतेषु च ॥ ५८ ॥
यत्र यातान्न वा हन्युः पाण्डवाः किं सृतेन वः ।
‘अरे! इस तरह भागनेसे क्या लाभ है? मैं पृथ्वीमें या पर्वतोंपर ऐसा कोई स्थान नहीं देखता, जहाँ जानेपर तुम्हें पाण्डव मार न सकें ॥ ५८ १/२ ॥
अल्पं च बलमेतेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ॥ ५९ ॥
यदि सर्वेऽत्र तिष्ठामो ध्रुवं नो विजयो भवेत् ।
‘अब तो इनके पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी है और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन भी अत्यन्त घायल हो चुके हैं, ऐसी दशामें यदि हम सब लोग साहस करके डटे रहें तो हमारी विजय अवश्य होगी ॥ ५९ १/२ ॥
विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतविप्रियाः ॥ ६० ॥
अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेयान्नः समरे वधः ।
‘तुम पाण्डवोंके अपराध तो कर ही चुके हो। यदि अलग-अलग होकर भागोगे तो पाण्डव पीछा करके तुम्हें अवश्य मार डालेंगे। ऐसी दशामें हमारे लिये संग्राममें मारा जाना ही श्रेयस्कर है ॥ ६० १/२ ॥
शृण्वन्तु क्षत्रियाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः ॥ ६१ ॥
यदा शूरं च भीरुं च मारयत्यन्तकः सदा ।
को नु मूढो न युध्येत पुरुषः क्षत्रियो ध्रुवम् ॥ ६२ ॥
‘जितने क्षत्रिय यहाँ एकत्र हुए हैं, वे सब कान खोलकर सुन लें—जब शूरवीर और कायर सभीको सदा ही मौत मार डालती है, तब ऐसा कौन मूर्ख मनुष्य है, जो क्षत्रिय कहलाकर भी निश्चितरूपसे युद्ध नहीं करेगा ॥ ६१-६२ ॥
श्रेयो नो भीमसेनस्य क्रुद्धस्याभिमुखे स्थितम् ।
सुखः साङ्ग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम् ॥ ६३ ॥
‘अतः क्रोधमें भरे हुए भीमसेनके सामने डटे रहना ही हमारे लिये कल्याणकारी होगा। क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीर पुरुषोंके लिये संग्राममें होनेवाली मृत्यु ही सुखद है ॥ ६३ ॥
मर्त्येनावश्यमर्तव्यं गृहेष्वपि कदाचन ।
युध्यतः क्षत्रधर्मेण मृत्युरेष सनातनः ॥ ६४ ॥
‘मरणधर्मा मनुष्यको कभी-न-कभी अवश्य मरना पड़ेगा। घरमें भी उससे छुटकारा नहीं है। अतः क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करते हुए ही जो मृत्यु होती है, यही क्षत्रियके लिये सनातन मृत्यु है ॥ ६४ ॥
हत्वेह सुखमाप्नोति हतः प्रेत्य महत् फलम् ।
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् वै पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः ॥ ६५ ॥
अचिरेणैव ताँल्लोकान् हतो युद्धे समश्नुते ।
‘कौरवो! वीर पुरुष शत्रुको मारकर इह लोकमें सुख भोगता है और यदि मारा गया तो वह परलोकमें जाकर महान् फलका भागी होता है; अतः युद्धधर्मसे बढ़कर स्वर्गकी प्राप्तिके लिये दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है। युद्धमें मारा गया वीर पुरुष थोड़ी ही देरमें उन प्रसिद्ध पुण्यलोकोंमें जाकर सुख भोगता है’ ॥ ६५ १/२ ॥
श्रुत्वा तद् वचनं तस्य पूजयित्वा च पार्थिवाः ॥ ६६ ॥
पुनरेवाभ्यवर्तन्त पाण्डवानातातयिनः ।
दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब राजा उसका आदर करते हुए पुनः आततायी पाण्डवोंका सामना करनेके लिये लौट आये ॥ ६६ १/२ ॥
तानापतत एवाशु व्यूढानीकाः प्रहारिणः ॥ ६७ ॥
प्रत्युद्ययुस्तदा पार्था जयगृद्धाः प्रमन्यवः । उनके आक्रमण करते ही अपनी सेनाका व्यूह बनाकर प्रहारकुशल, विजयाभिलाषी तथा बढ़े हुए क्रोधवाले पाण्डव शीघ्र ही उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ६७ १/३ ॥ धनंजयो रथेनाजौ व्यभ्यवर्तत वीर्यवान् ॥ ६८ ॥ विश्रुतं त्रिषु लोकेषु व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः । पराक्रमी अर्जुन अपने त्रिलोकविख्यात गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए रथके द्वारा युद्धके लिये वहाँ आ पहुँचे ॥ ६८ १/३ ॥ माद्रीपुत्रौ च शकुनिं सात्यकिश्च महाबलः ॥ ६९ ॥ जवेनाभ्यपतन् हृष्टा यत्ता वै तावकं बलम् ॥ ७० ॥ माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव और महाबली सात्यकिने शकुनिपर धावा किया। ये सब लोग हर्ष और उत्साहमें भरकर बड़ी सावधानीके साथ आपकी सेनापर वेगपूर्वक टूट पड़े ॥ ६९-७० ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ७१ श्लोक हैं।)
आस्थाय सुमहानागं प्रभिन्नं पर्वतोपमम् ।
विंशोऽध्यायः
धृष्टद्युम्नद्वारा राजा शाल्वके हाथीका और सात्यकिद्वारा राजा शाल्वका वध
संजय उवाच
संनिवृत्ते जनौघे तु शाल्वो म्लेच्छगणाधिपः ।
अभ्यवर्तत संक्रुद्धः पाण्डवानां महद् बलम् ॥ १ ॥
आस्थाय सुमहानागं प्रभिन्नं पर्वतोपमम् ।
दृप्तमैरावतप्रख्यममित्रगणमर्दनम् ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जब कौरवपक्षका जनसमूह पुनः युद्धके लिये लौट आया, उस समय म्लेच्छोंका राजा शाल्व अत्यन्त क्रुद्ध हो मदकी धारा बहानेवाले, पर्वतके समान विशालकाय, अभिमानी तथा ऐरावतके सदृश शत्रुसमुदायका संहार करनेमें समर्थ एक महान् गजराजपर आरूढ़ हो पाण्डवोंकी विशाल सेनाका सामना करनेके लिये आया ॥ १-२ ॥
योऽसौ महाभद्रकुलप्रसूतः
सुपूजितो धार्तराष्ट्रेण नित्यम् ।
सुकल्पितः शास्त्रविनिश्चयज्ञैः
सदोपवाह्यः समरेषु राजन् ॥ ३ ॥
राजन्! वह हाथी महाभद्र नामक गजराजके कुलमें उत्पन्न हुआ था। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने नित्य ही उसका आदर किया था, गजशास्त्रके ज्ञाता पुरुषोंने उसे अच्छी तरह सजाया था और सदा ही युद्धके अवसरोंपर वह सवारीके उपयोगमें लाया जाता था ॥ ३ ॥
तमास्थितो राजवरो बभूव
यथोदयस्थः सविता क्षपान्ते ।
स तेन नागप्रवरेण राज-
न्नभ्युद्ययौ पाण्डुसुतान् समेतान् ॥ ४ ॥
शितैः पृषत्कैर्विददार वेगै-
र्महेन्द्रवज्रप्रतिमैः सुघोरैः ।
राजाओंमें श्रेष्ठ शाल्व उस गजराजपर बैठकर प्रातःकाल उदयाचलपर स्थित हुए सूर्यदेवके समान सुशोभित होने लगा। महाराज! वह उस श्रेष्ठ हाथीके द्वारा वहाँ एकत्र हुए समस्त पाण्डवोंपर चढ़ आया और इन्द्रके वज्रकी भाँति अत्यन्त भयंकर तीखे बाणोंसे उन सबको वेगपूर्वक विदीर्ण करने लगा ॥ ४ १/२ ॥
ततः शरान् वै सृजतो महारणे योधांश्च राजन् नयतो यमालयम् ।। ५ ।। नास्यान्तरं ददृशुः स्वे परे वा यथा पुरा वज्रधरस्य दैत्याः । ऐरावणस्थस्य चमूविमर्दे- दैत्याः पुरा वासवस्येव राजन् ।। ६ ।। राजन्! जैसे पूर्वकालमें ऐरावतपर बैठकर शत्रु-सेनाका संहार करते हुए वज्रधारी इन्द्रके बाण छोड़ने और विपक्षीको मार गिरानेके अन्तरको दैत्य और देवता नहीं देख पाते थे, उसी प्रकार उस महासमरमें शाल्वके बाण छोड़ने तथा सैनिकोंको यमलोक पहुँचानेमें कितनी देर लगती है, इसे अपने या शत्रुपक्षके योद्धा नहीं देख सके ।। ते पाण्डवाः सोमकाः सृञ्जयाश्च तमेकनागं ददृशुः समन्तात् । सहस्रशो वै विचरन्तमेकं यथा महेन्द्रस्य गजं समीपे ।। ७ ।। इन्द्रके ऐरावत हाथीकी भाँति म्लेच्छराजका वह गजराज यद्यपि रणभूमिमें अकेला ही निकट विचर रहा था, तो भी पाण्डव, सृंजय और सोमकयोद्धा उसे सहस्रोंकी संख्यामें देखते थे। उन्हें सब ओर वही वह दिखायी देता था ।। ७ ।। संद्राव्यमाणं तु बलं परेषां परीतकल्पं विबभौ समन्ततः । नैवावतस्थे समरे भृशं भयाद् विमृद्यमानं तु परस्परं तदा ।। ८ ।। उस हाथीके द्वारा खदेड़ी जाती हुई वह सेना सब ओरसे घिरी हुई-सी जान पड़ती थी। अत्यन्त भयके कारण वह समरभूमिमें ठहर न सकी। उस समय सभी सैनिक आपसमें ही धक्के खाकर कुचले जाने लगे ।। ८ ।। ततः प्रभग्ना सहसा महाचमूः सा पाण्डवी तेन नराधिपेन । दिशश्चतस्रः सहसा विधाविता गजेन्द्रवेगं तमपारयन्ती ।। ९ ।। दृष्ट्वा च तां वेगवतीं प्रभग्नां सर्वे त्वदीया युधि योधमुख्याः । अपूजयंस्ते तु नराधिपं तं दध्मुश्च शङ्खान् शशिसंनिकाशान् ।। १० ।।
म्लेच्छराज शाल्वने पाण्डवोंकी उस विशाल सेनामें सहसा भगदड़ मचा दी। उस गजराजके वेगको सहन न कर सकनेके कारण वह सेना तत्काल चारों दिशाओंमें भाग चली! उस वेगशालिनी सेनाको भागती देख युद्धस्थलमें खड़े हुए आपके सभी प्रधान-प्रधान योद्धा म्लेच्छराज शाल्वकी प्रशंसा करने और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल शंख बजाने लगे ।। ९-१० ।।
श्रुत्वा निनादं त्वथ कौरवाणां
हर्षाद् विमुक्तं सह शङ्खशब्दैः ।
सेनापतिः पाण्डवसृञ्जयानां
पाञ्चालपुत्रो ममृषे न कोपात् ।। ११ ।।
शंखध्वनिके साथ कौरवोंका वह हर्षनाद सुनकर पाण्डवों और सृञ्जयोंके सेनापति पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न क्रोधपूर्वक उसे सहन न कर सके ।। ११ ।।
ततस्तु तं वै द्विरदं महात्मा
प्रत्युद्ययौ त्वरमाणे जयाय ।
जम्भो यथा शक्रसमागमे वै
नागेन्द्रमैरावणमिन्द्रवाह्यम् ।। १२ ।।
तदनन्तर उन महामनस्वी धृष्टद्युम्नने बड़ी उतावलीके साथ विजय प्राप्त करनेके लिये उस हाथीपर चढ़ाई की। जैसे इन्द्रके साथ युद्ध छिड़नेपर जम्भासुरने इन्द्रवाहन नागराज ऐरावतपर धावा किया था ।। १२ ।।
तमापतन्तं सहसा तु दृष्ट्वा
पाञ्चालपुत्रं युधि राजसिंहः ।
तं वै द्विपं प्रेषयामास तूर्णं
वधाय राजन् द्रुपदात्मजस्य ।। १३ ।।
राजन्! पांचालपुत्र धृष्टद्युम्नको युद्धमें सहसा आक्रमण करते देख नृपश्रेष्ठ शाल्वने उस हाथीको उनके वधके लिये तुरंत ही उनकी ओर बढ़ाया ।। १३ ।।
स तं द्विपेन्द्रं सहसा पतन्त-
मविध्यदग्निप्रतिमैः पृषत्कैः ।
कर्मारधौतैर्निशितैर्ज्वलद्भि-
र्नाराचमुख्यैस्त्रिभिरुग्रवेगैः ।। १४ ।।
उस नागराजको सहसा आते देख धृष्टद्युम्नने अग्निके समान प्रज्वलित, कारीगरके साफ किये हुए, तेजधारवाले, तीन भयंकर वेगशाली उत्तम नाराचोंद्वारा घायल कर दिया ।। १४ ।।
ततोऽपरान् पञ्चशतान् महात्मा
नाराचमुख्यान् विससर्ज कुम्भे ।
स तैस्तु विद्धः परमद्विपो रणे तदा परावृत्य भृशं प्रदुद्रुवे ॥ १५ ॥ तत्पश्चात् महामना धृष्टद्युम्नने उसके कुम्भस्थलको लक्ष्य करके पाँच सौ उत्तम नाराच और छोड़े। उनके द्वारा अत्यन्त घायल हुआ वह महान् गजराज युद्धसे मुँह मोड़कर वेगपूर्वक भागने लगा ॥ १५ ॥
तं नागराजं सहसा प्रणुन्नं विद्राव्यमाणं विनिवर्त्य शाल्वः । तोत्राङ्कुशैः प्रेषयामास तूर्णं पाञ्चालराजस्य रथं प्रदिश्य ॥ १६ ॥ उस नागराजको सहसा पीड़ित होकर भागते देख शाल्वराजने पुनः युद्धकी ओर लौटाया और पीड़ा देनेवाले अंकुशोंसे मारकर उसे तुरंत ही पांचालराजके रथकी ओर दौड़ाया ॥ १६ ॥
दृष्ट्वाऽऽपतन्तं सहसा तु नागं धृष्टद्युम्नः स्वरथाच्छीघ्रमेव । गदां प्रगृह्योग्रजवेन वीरो भूमिं प्रपन्नो भयविह्वलाङ्गः ॥ १७ ॥ हाथीको सहसा आक्रमण करते देख वीर धृष्टद्युम्न हाथमें गदा ले शीघ्र ही अत्यन्त वेगपूर्वक अपने रथसे कूदकर पृथ्वीपर आ गये। उस समय उनके सारे अंग भयसे व्याकुल हो रहे थे ॥ १७ ॥
स तं रथं हेमविभूषिताङ्गं साश्वं ससूतं सहसा विमृद्य । उत्क्षिप्य हस्तेन नदन् महाद्विपो विपोथयामास वसुन्धरातले ॥ १८ ॥ गर्जना करते हुए उस विशालकाय हाथीने धृष्टद्युम्नके उस सुवर्णभूषित रथको घोड़ों और सारथि-सहित सहसा कुचल डाला और सूँड़से ऊपर उठाकर पृथ्वीपर दे मारा ॥ १८ ॥
पाञ्चालराजस्य सुतं च दृष्ट्वा तदार्दितं नागवरेण तेन । तमभ्यधावन् सहसा जवेन भीमः शिखण्डी च शिनेश्च नप्ता ॥ १९ ॥ पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नको उस गजराजके द्वारा पीड़ित हुआ देख भीमसेन, शिखण्डी और सात्यकि सहसा बड़े वेगसे उसकी ओर दौड़े ॥ १९ ॥
शरैश्च वेगं सहसा निगृह्य
तस्याभितो व्यापततो गजस्य । स संगृहीतो रथिभिर्गजो वै चचाल तैवार्यमाणश्च संख्ये ।। २० ।। उन रथियोंने सब ओर आक्रमण करनेवाले उस हाथीके वेगको सहसा अपने बाणोंद्वारा अवरुद्ध कर दिया। उनके द्वारा अपनी प्रगति रुक जानेके कारण वह निगृहीत-सा होकर विचलित हो उठा ।। २० ।।
ततः पृषत्कान् प्रववर्ष राजा सूर्यो यथा रश्मिजालं समन्तात् । तैराशुगैर्वध्यमाना रथौघाः प्रदुद्रुवुः सहितास्तत्र तत्र ।। २१ ।। तदनन्तर जैसे सूर्यदेव सब ओर अपनी किरणोंका प्रसार करते हैं, उसी प्रकार राजा शाल्वने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। उन शीघ्रगामी बाणोंकी मार खाकर वे पाण्डव रथी एक साथ इधर-उधर भागने लगे ।। २१ ।।
तत् कर्म शाल्वस्य समीक्ष्य सर्वे पाञ्चालपुत्रा नृप सृञ्जयाश्च । हाहाकारैर्नादयन्ति स्म युद्धे द्विपं समन्ताद् रुरुधुर्नराग्र्याः ।। २२ ।। नरेश्वर! शास्त्रका वह पराक्रम देखकर समस्त नरश्रेष्ठ पांचाल तथा सृंजय अपने हाहाकारोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे। उन्होंने युद्धभूमिमें उस हाथीको चारों ओरसे घेर लिया ।। २२ ।।
पाञ्चालपुत्रस्त्वरितस्तु शूरो गदां प्रगृह्याचलशृङ्गकल्पाम् । ससम्भ्रमं भारत शत्रुघाती जवेन वीरोऽनुससार नागम् ।। २३ ।। भारत! इसी समय शत्रुघाती शूरवीर पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने तुरंत ही पर्वतशिखरके समान विशाल गदा हाथमें लेकर बड़े वेगसे उस हाथीपर आक्रमण किया ।।
ततस्तु नागं धरणीधराभं मदं स्रवन्तं जलदप्रकाशम् । गदां समाविद्धय भृशं जघान पाञ्चालराजस्य सुतस्तरस्वी ।। २४ ।। पांचालराजके वेगवान् पुत्रने मेघोंके समान मदकी वर्षा करनेवाले उस पर्वताकार गजराजपर अपनी गदा घुमाकर बड़े वेगसे प्रहार किया ।। २४ ।।
स भिन्नकुम्भः सहसा विनद्य