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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

(श्राद्धपर्व)

२१- गान्धारीके द्वारा कर्णको देखकर उसके शौर्य तथा उसकी स्त्रीके विलापका श्रीकृष्णके सम्मुख वर्णन २२- अपनी-अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए अवन्ती-नरेश और जयद्रथको देखकर तथा दुःशलापर दृष्टिपात करके गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप २३- शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोणको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख गान्धारीका विलाप २४- भूरिश्रवाके पास उसकी पत्नियोंका विलाप, उन सबको तथा शकुनिको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख शोकोद्गार २५- अन्यान्य वीरोंको मरा हुआ देखकर गान्धारीका शोकातुर होकर विलाप करना और क्रोधपूर्वक श्रीकृष्णको यदुवंशविनाशविषयक शाप देना

(श्राद्धपर्व)

२६- प्राप्त अनुस्मृतिविद्या और दिव्य दृष्टिके प्रभावसे युधिष्ठिरका महाभारतयुद्धमें मारे गये लोगोंकी संख्या और गतिका वर्णन तथा युधिष्ठिरकी आज्ञासे सबका दाह-संस्कार २७- सभी स्त्री-पुरुषोंका अपने मरे हुए सम्बन्धियोंको जलांजलि देना, कुन्तीका अपने गर्भसे कर्णके जन्म होनेका रहस्य प्रकट करना तथा युधिष्ठिरका कर्णके लिये शोक प्रकट करते हुए उनका प्रेतकृत्य सम्पन्न करना और स्त्रियोंके मनमें रहस्यकी बात न छिपनेका शाप देना


चित्र-सूची

चित्र-सूची

(सादा)

१- दुर्योधनद्वारा द्रोणाचार्यका सेनापतिके पदपर अभिषेक २- अर्जुनके द्वारा भगदत्तका वध ३- चक्रव्यूह ४- अभिमन्युके द्वारा कौरव-सेनाके प्रमुख वीरोंका संहार ५- अभिमन्युपर अनेक महारथियोंद्वारा एक साथ प्रहार ६- रुद्रदेवका ब्रह्माजीसे उनके क्रोधकी शान्तिके लिये वर माँगना ७- अर्जुनका जयद्रथवधके लिये प्रतिज्ञा करना ८- अर्जुनका स्वप्नदर्शन ९- श्रीकृष्ण और अर्जुनका दुर्मर्षणकी गजसेनामें प्रवेश १०- सात्यकिका कौरव-सेनामें प्रवेश और युद्ध ११- भीमसेनके द्वारा कर्णकी पराजय १२- भीमसेनका कर्णके रथपर हाथीकी लाश फेंकना १३- जयद्रथके कटे हुए मस्तकका उसके पिताकी गोदमें गिरना १४- घटोत्कचको कर्णके साथ युद्ध करनेकी प्रेरणा १५- द्रोणाचार्यका ध्यानावस्थामें देहत्याग एवं तेजस्वीस्वरूपसे ऊर्ध्वलोकगमन १६- अश्वत्थामाके द्वारा पाण्डव-सेनापर नारायणास्त्रका प्रयोग १७- अश्वत्थामाके द्वारा अर्जुनपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग एवं उसके द्वारा पाण्डव-सेनाका संहार १८- वेदव्यासजीका अश्वत्थामाको आश्वासन १९- (७५ लाइन चित्र फरमोंमें) २०- दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना २१- शल्य कर्णको हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर अपमानित कर रहे हैं २२- भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके कई पुत्रों एवं कौरवयोद्धाओंका संहार २३- अर्जुनके द्वारा संशप्तकोंका संहार २४- धर्मराजके चरणोंमें श्रीकृष्ण एवं अर्जुन प्रणाम कर रहे हैं २५- कर्णद्वारा पृथ्वीमें धँसे हुए पहियेको उठानेका प्रयत्न २६- कर्णवध २७- (१६ लाइन चित्र फरमोंमें) २८- शल्यका कौरवोंके सेनापतिपदपर अभिषेक

द्रोणपर्व

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

द्रोणपर्व

द्रोणाभिषेकपर्व

प्रथमोऽध्यायः

भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।

जनमेजय उवाच
तमप्रतिमसत्त्वौजबलवीर्यसमन्वितम् ।
हतं देवव्रतं श्रुत्वा पाञ्चाल्येन शिखण्डिना ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रस्ततो राजा शोकव्याकुललोचनः ।
किमचेष्टत विप्रर्षे हते पितरि वीर्यवान् ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! अनुपम सत्त्व, ओज, बल और पराक्रमसे सम्पन्न देवव्रत भीष्मको पांचालराज शिखण्डीके हाथसे मारा गया सुनकर राजा धृतराष्ट्रके नेत्र शोकसे व्याकुल हो उठे होंगे। ब्रह्मर्षे! अपने ज्येष्ठ पिताके मारे जानेपर पराक्रमी धृतराष्ट्रने कैसी चेष्टा की? ॥ १-२ ॥
तस्य पुत्रो हि भगवन् भीष्मद्रोणमुखै रथैः ।
पराजित्य महेष्वासान् पाण्डवान् राज्यमिच्छति ॥ ३ ॥
भगवन्! उनका पुत्र दुर्योधन भीष्म, द्रोण आदि महारथियोंके द्वारा महाधनुर्धर पाण्डवोंको पराजित करके स्वयं राज्य हथिया लेना चाहता था ॥ ३ ॥

तस्मिन् हते तु भगवन् केतौ सर्वधनुष्मताम् । यदचेष्टत कौरव्यस्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥ ४ ॥ भगवन्! तपोधन! सम्पूर्ण धनुर्धरोंके ध्वजस्वरूप भीष्मजीके मारे जानेपर कुरुवंशी दुर्योधनने जो प्रयत्न किया हो, वह सब मुझे बताइये ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

निहतं पितरं श्रुत्वा धृतराष्ट्रो जनाधिपः । लेभे न शान्तिं कौरव्यश्चिन्ताशोकपरायणः ॥ ५ ॥ वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय! ज्येष्ठ पिताको मारा गया सुनकर कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र चिन्ता और शोकमें डूब गये। उन्हें क्षणभरको भी शान्ति नहीं मिल रही थी ॥ ५ ॥

तस्य चिन्तयतो दुःखमनिशं पार्थिवस्य तत् । आजगाम विशुद्धात्मा पुनर्गावलगणिस्तदा ॥ ६ ॥ वे भूपाल निरन्तर उस दुःखदायिनी घटनाका ही चिन्तन करते रहे। उसी समय विशुद्ध अन्तःकरणवाला गवलगणपुत्र संजय पुनः उनके पास आया ॥ ६ ॥

शिबिरात् संजयं प्राप्तं निशि नागह्वयं पुरम् । आम्बिकेयो महाराज धृतराष्ट्रोऽन्वपृच्छत ॥ ७ ॥ महाराज! रातके समय कुरुक्षेत्रके शिविरसे हस्तिनापुरमें आये हुए संजयसे अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने वहाँका समाचार पूछा ॥ ७ ॥

श्रुत्वा भीष्मस्य निधनमप्रहृष्टमना भृशम् । पुत्राणां जयमाकाङ्क्षन् विललापातुरो यथा ॥ ८ ॥ भीष्मकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर उनका मन सर्वथा अप्रसन्न एवं उत्साहशून्य हो गया था। वे अपने पुत्रोंकी विजय चाहते हुए आतुरकी भाँति विलाप कर रहे थे ॥

धृतराष्ट्र उवाच

संशोच्य तु महात्मानं भीष्मं भीमपराक्रमम् । किमकार्षुः परं तात कुरवः कालचोदिताः ॥ ९ ॥ धृतराष्ट्रने पूछा—तात! संजय! भयंकर पराक्रमी महात्मा भीष्मके लिये अत्यन्त शोक करके कालप्रेरित कौरवोंने आगे कौन-सा कार्य किया ॥ ९ ॥

तस्मिन् विनिहते शूरे दुराधर्षे महात्मनि । किं नु स्वित् कुरवोऽकार्षुर्मग्नाः शोकसागरे ॥ १० ॥ उन दुर्धर्ष वीर महात्मा भीष्मके मारे जानेपर तो समस्त कुरुवंशी शोकके समुद्रमें डूब गये होंगे; फिर उन्होंने कौन-सा कार्य किया? ।। १० ।।

तदुदीर्णं महत् सैन्यं त्रैलोक्यस्यापि संजय । भयमुत्पादयेत् तीव्रं पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ११ ॥ संजय! महात्मा पाण्डवोंकी वह विशाल एवं प्रचण्ड सेना तो तीनों लोकोंके हृदयमें तीव्र भय उत्पन्न कर सकती है ।। ११ ।।

को हि दौर्योधने सैन्ये पुमानासीन्महारथः । यं प्राप्य समरे वीरा न त्रस्यन्ति महाभये ॥ १२ ॥ उस महान् भयके अवसरपर दुर्योधनकी सेनामें कौन ऐसा वीर महारथी पुरुष था, जिसका आश्रय पाकर समरांगणमें वीर कौरव भयभीत नहीं हुए हैं ।। १२ ।।

देवव्रते तु निहते कुरूणामृषभे तदा । किमकार्षून्नृपतयस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १३ ॥ संजय! कुरुश्रेष्ठ देवव्रतके मारे जानेपर उस समय सब राजाओंने कौन-सा कार्य किया? यह मुझे बताओ ।।

संजय उवाच

शृणु राजन्नेकमना वचनं ब्रुवतो मम । यत् ते पुत्रास्तदाकार्षुर्हते देवव्रते मृधे ॥ १४ ॥

संजयने कहा— राजन्! उस युद्धमें देवव्रत भीष्मके मारे जानेपर उस समय आपके पुत्रोंने जो कार्य किया, वह सब मैं बता रहा हूँ। मेरे इस कथनको आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ १४ ॥ निहते तु तदा भीष्मं राजन् सत्यपराक्रमे । तावकाः पाण्डवेयाश्च प्राध्यायन्त पृथक् पृथक् ॥ १५ ॥ राजन्! जब सत्यपराक्रमी भीष्म मार दिये गये, उस समय आपके पुत्र और पाण्डव अलग-अलग चिन्ता करने लगे ॥ १५ ॥ विस्मिताश्च प्रहृष्टाश्च क्षत्रधर्मं निशम्य ते । स्वधर्मं निन्दमानास्ते प्रणिपत्य महात्मने ॥ १६ ॥ शयनं कल्पयामासुर्भीष्मायामितकर्मणे । सोपधानं नरव्याघ्र शरैः संनतपर्वभिः ॥ १७ ॥ पुरुषसिंह! वे क्षत्रियधर्मका विचार करके अत्यन्त विस्मित और प्रसन्न हुए। फिर अपने कठोरतापूर्ण धर्मकी निन्दा करते हुए उन्होंने महात्मा भीष्मको प्रणाम किया और उन अमित पराक्रमी भीष्मके लिये झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा तकिये और शय्याकी रचना की ॥ १६-१७ ॥ विधाय रक्षां भीष्माय समाभाष्य परस्परम् । अनुमान्य च गाङ्गेयं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ॥ १८ ॥ क्रोधसंरक्तनयनाः समवेत्य परस्परम् । पुनर्युद्धाय निर्जग्मुः क्षत्रियाः कालचोदिताः ॥ १९ ॥ इसी प्रकार परस्पर वार्तालाप करके भीष्मजीकी रक्षाकी व्यवस्था कर दी और उन गङ्गानन्दन देवव्रतकी अनुमति ले उनकी परिक्रमा करके आपसमें मिलकर वे कालप्रेरित क्षत्रिय क्रोधसे लाल आँखें किये पुनः युद्धके लिये निकले ॥ १८-१९ ॥ ततस्तूर्यनिनादैश्च भेरीणां निनदेन च । तावकानामनीकानि परेषां च विनिर्ययुः ॥ २० ॥ तदनन्तर बाजोंकी ध्वनि और नगाड़ोंकी गड़गड़ाहटके साथ आपकी तथा पाण्डवोंकी भी सेनाएँ युद्धके लिये निकलीं ॥ २० ॥ व्यावृत्तेऽर्यम्णि राजेन्द्र पतिते जाह्नवीसुते । अमर्षवशमापन्नाः कालोपहतचेतसः ॥ २१ ॥ अनादृत्य वचः पथ्यं गाङ्गेयस्य महात्मनः ।

निर्ययुर्भरतश्रेष्ठाः शस्त्राण्यादाय सत्वराः ॥ २२ ॥ राजेन्द्र! जिस समय गंगानन्दन भीष्म रथसे गिरे थे, उस समय सूर्य पश्चिम दिशामें ढल चुके थे। यद्यपि महात्मा गंगानन्दन भीष्मने उन सबको युद्ध बंद कर देनेकी सलाह दी थी, तथापि कालसे विवेकशक्ति नष्ट हो जानेके कारण वे भरतश्रेष्ठ क्षत्रिय उनके हितकर वचनकी अवहेलना करके अमर्षके वशीभूत हो हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये तुरंत ही युद्धके लिये निकल पड़े ॥ २१-२२ ॥

मोहात् तव सपुत्रस्य वधाच्छान्तनवस्य च । कौरव्या मृत्युसाद्भूताः सहिताः सर्वराजभिः ॥ २३ ॥ पुत्रसहित आपके मोह (अविवेक)-से और शान्तनुनन्दन भीष्मका वध हो जानेसे समस्त राजाओंसहित सम्पूर्ण कुरुवंशी मृत्युके अधीन हो गये हैं ॥ २३ ॥

अजावय इवागोपा वने श्वापदसंकुले । भृशमुद्विग्नमनसो हीना देवव्रतेन ते ॥ २४ ॥ जैसे हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए वनमें बिना रक्षककी भेड़ और बकरियाँ भयसे उद्विग्न रहती हैं, उसी प्रकार आपके पुत्र और सैनिक देवव्रतसे रहित हो मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे थे ॥ २४ ॥

पतिते भरतश्रेष्ठे बभूव कुरुवाहिनी । द्यौरिवापेतनक्षत्रा हीनं खमिव वायुना ॥ २५ ॥ विपन्नसस्येव मही वाक् चैवासंस्कृता तथा । आसुरीव यथा सेना निगृहीते नृपे बलौ ॥ २६ ॥ भरतशिरोमणि भीष्मके धराशायी हो जानेपर कौरव-सेना नक्षत्ररहित आकाश, वायुशून्य अन्तरिक्ष, नष्ट हुई खेतीवाली भूमि, असंस्कृत वाणी तथा राजा बलिके बाँध लिये जानेपर नायकविहीन हुई असुरोंकी सेनाके समान उद्विग्न, असमर्थ और श्रीहीन हो गयी ॥ २५-२६ ॥

विधवेव वरारोहा शुष्कतोयेव निम्नगा । वृकैरिव वने रुद्धा पृषती हतयूथपा ॥ २७ ॥ शरभाहतसिंहेव महती गिरिकन्दरा । भारती भरतश्रेष्ठे पतिते जाह्नवीसुते ॥ २८ ॥ गंगानन्दन भरतश्रेष्ठ भीष्मके धराशायी होनेपर भरत-वंशियोंकी सेना विधवा सुन्दरीके समान, जिसका पानी सूख गया हो, उस नदीके समान, जिसे भेड़ियोंने वनमें घेर रखा हो और जिसका साथी यूथप मार डाला गया हो, उस चितकबरी मृगीके समान तथा शरभने जिसमें रहनेवाले सिंहको मार डाला हो, उस विशाल कन्दराके समान भयभीत, विचलित और श्रीहीन जान पड़ती थी ॥

विष्वग्वाताहता रुग्णा नौरिवासीन्महार्णवे ।

बलिभिः पाण्डवैर्वीरैर्लब्धलक्षैर्भृशार्दिता ॥ २९ ॥
वीर और बलवान् पाण्डव अपने लक्ष्यको सफलतापूर्वक मार गिरानेवाले थे, उनके द्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर आपकी सेना महासागरमें चारों ओरसे वायुके थपेड़े खाकर टूटी हुई नौकाके समान बड़ी विपत्तिमें फँस गयी ॥ २९ ॥
सा तदाऽऽसीद् भृशं सेना व्याकुलाश्वरथद्विपा ।
विपन्नभूयिष्ठनरा कृपणा ध्वस्तमानसा ॥ ३० ॥
उस समय आपकी सेनाके घोड़े, रथ और हाथी सब अत्यन्त व्याकुल हो उठे थे। उसके अधिकांश सैनिक अपने प्राण खो चुके थे। उसका दिल बैठ गया था और वह अत्यन्त दीन हो रही थी ॥ ३० ॥
तस्यां त्रस्ता नृपतयः सैनिकाश्च पृथग्विधाः ।
पाताल इव मज्जन्तो हीना देवव्रतेन ते ॥ ३१ ॥
उस सेनाके भिन्न-भिन्न सैनिक, नरेशगण अत्यन्त भयभीत हो देवव्रत भीष्मके बिना मानो पातालमें डूब रहे थे ॥ ३१ ॥
कर्णं हि कुरवोऽस्मार्षुः स हि देवव्रतोपमः ।
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं रोचमानमिवातिथिम् ॥ ३२ ॥
बन्धुमापद्गतस्येव तमेवोपागमन्मनः ।
चुक्रुशुः कर्ण कर्णेति तत्र भारत पार्थिवाः ॥ ३३ ॥
उस समय कौरवोंने कर्णका स्मरण किया। जैसे गृहस्थका मन अतिथिकी ओर तथा आपत्तिमं पड़े हुए मनुष्यका मन अपने मित्र या भाई-बन्धुकी ओर जाता है, उसी प्रकार कौरवोंका मन समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ एवं तेजस्वी वीर कर्णकी ओर गया; क्योंकि वही भीष्मके समान पराक्रमी समझा जाता था। भारत! वहाँ सब राजा ‘कर्ण! कर्ण!’ की पुकार करने लगे ॥ ३२-३३ ॥
राधेयं हितमस्माकं सूतपुत्रं तनुत्यजम् ।
स हि नायुध्यत तदा दशाहानि महायशाः ॥ ३४ ॥
सामात्यबन्धुः कर्णो वै तमानयत मा चिरम् ।
वे कहने लगे कि ‘राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण हमारा हितैषी है। हमारे लिये अपना शरीर निछावर किये हुए है। अपने मन्त्रियों और बन्धुओंके साथ महायशस्वी कर्णने दस दिनोंतक युद्ध नहीं किया है। उसे शीघ्र बुलाओ। देर न करो ॥ ३४ १/२ ॥
भीष्मेण हि महाबाहुः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ ३५ ॥
रधेषु गण्यमानेषु बलविक्रमशालिषु ।
संख्यातोऽर्धरथः कर्णो द्विगुणः सन् नरर्षभः ॥ ३६ ॥
राजन्! बात यह हुई थी कि जब बल और पराक्रमसे सुशोभित रथियोंकी गणना की जा रही थी, उस समय समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते भीष्मजीने महाबाहु नरश्रेष्ठ कर्णको

अर्धरथी बता दिया। यद्यपि वह दो रथियोंके समान है ।। ३५-३६ ।। रथातिरथसंख्यायां योऽग्रणीः शूरसम्मतः । सासुरानपि देवेशान् रणे यो योद्धुमुत्सहेत् ॥ ३७ ॥ रथियों और अतिरथियोंकी संख्यामें वह अग्रगण्य और शूरवीरके सम्मानका पात्र है। रणक्षेत्रमें असुरोंसहित सम्पूर्ण देवेश्वरोंके साथ भी वह युद्ध करनेका उत्साह रखता है ।। ३७ ।।

स तु तेनैव कोपेन राजन् गाङ्गेयमुक्तवान् । त्वयि जीवति कौरव्य नाहं योत्स्ये कदाचन ॥ ३८ ॥ त्वया तु पाण्डवेयेषु निहतेषु महामृधे । दुर्योधनमनुज्ञाप्य वनं यास्यामि कौरव ॥ ३९ ॥ राजन्! अर्धरथी बतानेके कारण ही क्रोधवश उसने गंगानन्दन भीष्मसे कहा—‘कुरुनन्दन! आपके जीते-जी मैं कदापि युद्ध नहीं करूँगा। कौरव! यदि आप उस महासमरमें पाण्डुपुत्रोंको मार डालेंगे तो मैं दुर्योधनकी अनुमति लेकर वनको चला जाऊँगा ।। ३८-३९ ।।

पाण्डवैर्वा हते भीष्मे त्वयि स्वर्गमुपेयुषि । हन्तास्म्येकरथेनैव कृत्स्नान् यान् मन्यसे रथान् ॥ ४० ॥ ‘अथवा यदि पाण्डवोंके द्वारा मारे जाकर आप स्वर्गलोकमें पहुँच गये तो मैं एकमात्र रथकी सहायतासे उन सबको मार डालूँगा, जिन्हें आप रथी मानते हैं’ ।। ४० ।।

एवमुक्त्वा महाबाहुर्दशाहानि महायशाः । नायुध्यत ततः कर्णः पुत्रस्य तव सम्मते ॥ ४१ ॥ ऐसा कहकर महाबाहु महायशस्वी कर्ण आपके पुत्रकी सम्मति ले दस दिनोंतक युद्धमें सम्मिलित नहीं हुआ ।। ४१ ।।

भीष्मः समरविक्रान्तः पाण्डवेयस्य भारत । जघान समरे योधामसंख्येयपराक्रमः ॥ ४२ ॥ भारत! समरभूमिमें पराक्रम प्रकट करनेवाले अनन्त पराक्रमी भीष्मने युद्धस्थलमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके बहुत-से योद्धाओंको मार डाला ।। ४२ ।।

तस्मिंस्तु निहते शूरे सत्यसंधे महौजसि । त्वत्सुताः कर्णमस्मार्षुस्तर्तुकामा इव प्लवम् ॥ ४३ ॥ उन महापराक्रमी सत्यप्रतिज्ञ शूरवीर भीष्मके मारे जानेपर आपके पुत्रोंने कर्णका उसी प्रकार स्मरण किया, जैसे पार जानेकी इच्छावाले पुरुष नावकी इच्छा करते हैं ।।

तावकास्तव पुत्राश्च सहिताः सर्वराजभिः । हा कर्ण इति चाक्रन्दन् कालोऽयमिति चाब्रुवन् ॥ ४४ ॥

समस्त राजाओंसहित आपके पुत्र और सैनिक 'हा कर्ण' कहकर विलाप करने लगे और बोले—'कर्ण! तुम्हारे पराक्रमका यह अवसर आया है' ।। ४४ ।। एवं ते स्म हि राधेयं सूतपुत्रं तनुत्यजम् । चुक्रुशुः सहिता योधास्तत्र तत्र महाबलाः ।। ४५ ।। इस प्रकार आपके महाबली योद्धालोग राधानन्दन सूतपुत्र कर्णको, जो दुर्योधनके लिये अपना शरीर निछावर किये बैठा था, एक साथ पुकारने लगे ।। ४५ ।। जामदग्न्याभ्यनुज्ञातमस्त्रे दुर्वारपौरुषम् । अगमन्नो मनः कर्णं बन्धुमात्ययिकेष्विव ।। ४६ ।। राजन्! कर्णने जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे अस्त्र-विद्याकी शिक्षा प्राप्त की है और उसका पराक्रम दुर्निवार्य है। इसीलिये हमलोगोंका मन कर्णकी ओर गया, ठीक वैसे ही, जैसे बड़ी भारी आपत्तिके समय मनुष्यका मन अपने मित्रों तथा सगे-सम्बन्धियोंकी ओर जाता है ।। ४६ ।। स हि शक्तो रणे राजंस्त्रातुमस्मान् महाभयात् । त्रिदशानिव गोविन्दः सततं सुमहाभयात् ।। ४७ ।। राजन्! जैसे भगवान् विष्णु देवताओंकी सदा अत्यन्त महान् भयसे रक्षा करते हैं, उसी प्रकार कर्ण हमें भारी भयसे उबारनेमें समर्थ है ।। ४७ ।।

वैशम्पायन उवाच

तथा तु संजयं कर्णं कीर्तयन्तं पुनः पुनः । आशीविषवदुच्छ्वस्य धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ।। ४८ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब संजय इस प्रकार बार-बार कर्णका नाम ले रहा था, उस समय राजा धृतराष्ट्रने विषधर सर्पके समान उच्छ्वास लेकर इस प्रकार कहा ।। ४८ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

यत् तद्वैकर्तनं कर्णमगमद् वो मनस्तदा । अप्यपश्यत राधेयं सूतपुत्रं तनुत्यजम् ।। ४९ ।। **धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! जब तुमलोगोंका मन विकर्तनपुत्र कर्णकी ओर गया, तब क्या तुमने शरीर निछावर करनेवाले सूतपुत्र राधानन्दन कर्णको वहाँ देखा? ।। अपि तन्न मृषाकार्षीत् कच्चित् सत्यपराक्रमः । सम्भ्रान्तानां तदार्तानां त्रस्तानां त्राणमिच्छताम् ।। ५० ।। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि संकटमें पड़कर घबराये हुए और भयभीत होकर अपनी रक्षा चाहते हुए कौरवोंकी प्रार्थनाको सत्यपराक्रमी कर्णने निष्फल कर दिया हो? ।। अपि तत् पूरयांचक्रे धनुर्धरवरो युधि ।

यत्तद् विनिहते भीष्मे कौरवाणामपाकृतम् ।। ५१ ।।
भीष्मके मारे जानेपर युद्धस्थलमें कौरवोंके पक्षमें जो कमी आ गयी थी, क्या उसे धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ कर्णने पूरा कर दिया? ।। ५१ ।।

तत् खण्डं पूरयन् कर्णः परेषामादधद् भयम् ।
स हि वै पुरुषव्याघ्रो लोके संजय कथ्यते ।। ५२ ।।
क्या उस खण्डित अंशकी पूर्ति करके कर्णने शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न किया? संजय! जगत्में कर्णको ‘पुरुषसिंह’ कहा जाता है ।। ५२ ।।

आर्तानां बान्धवानां च क्रन्दतां च विशेषतः ।
परित्यज्य रणे प्राणांस्तत्त्राणार्थं च शर्म च ।
कृतवान् मम पुत्राणां जयाशां सफलामपि ।। ५३ ।।
क्या उसने रणभूमिमें शोकार्त होकर विशेषरूपसे क्रन्दन करनेवाले अपने उन बन्धुजनोंकी रक्षा एवं कल्याणके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करके मेरे पुत्रोंकी विजयाभिलाषाको सफल किया? ।। ५३ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्ट्र-प्रश्नविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।

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द्वितीयोऽध्यायः

कर्णकी रणयात्रा

संजय उवाच

हतं भीष्ममथाधिरथिर्विदित्वा
भिन्नां नावमिवात्यगाधे कुरूणाम् ।
सोदर्यवद् व्यसनात् सूतपुत्रः
संतारयिष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! अधिरथनन्दन सूतपुत्र कर्ण यह जानकर कि भीष्मजीके मारे जानेपर कौरवोंकी सेना अगाध महासागरमें टूटी हुई नौकाके समान संकटमें पड़ गयी है, सगे भाईके समान आपके पुत्रकी सेनाको संकटसे उबारनेके लिये चला ॥ १ ॥

श्रुत्वा तु कर्णः पुरुषेन्द्रमच्युतं
निपातितं शान्तनवं महारथम् ।
अथोपयायात् सहसारिकर्षणो
धनुर्धराणां प्रवरस्तदा नृप ॥ २ ॥

राजन्! तत्पश्चात् योद्धाओंके मुखसे अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले पुरुषप्रवर शान्तनुनन्दन महारथी भीष्मके मारे जानेका विस्तृत वृत्तान्त सुनकर धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ शत्रुसूदन कर्ण सहसा दुर्योधनके समीप चल दिया ॥ २ ॥

हते तु भीष्मे रथसत्तमे परै-
र्निमज्जतीं नावमिवार्णवे कुरून् ।
पितेव पुत्रांस्त्वरितोऽभ्ययात् ततः
संतारयिष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥ ३ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्मके शत्रुओंद्वारा मारे जानेपर, जैसे पिता अपने पुत्रोंको संकटसे बचानेके लिये जाता हो, उसी प्रकार सूतपुत्र कर्ण डूबती हुई नौकाके समान आपके पुत्रकी सेनाको संकटसे उबारनेके लिये बड़ी उतावलीके साथ दुर्योधनके निकट आ पहुँचा ॥ ३ ॥

(सम्मृज्य दिव्यं धनुरारातज्यं
स रामदत्तं रिपुसंघहन्ता ।
बाणांश्च कालानलवायुकल्पा-
नुल्लालयन् वाक्यमिदं बभाषे ॥)

शत्रुसमूहका विनाश करनेवाले कर्णने परशुरामजीके दिये हुए दिव्य धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा ली और उसपर हाथ फेरकर कालाग्नि तथा वायुके समान शक्तिशाली बाणोंको ऊपर उठाते हुए इस प्रकार कहा।

कर्ण उवाच

यस्मिन् धृतिर्बुद्धिपराक्रमौजः सत्यं स्मृतिर्वीरगुणाश्च सर्वे । अस्त्राणि दिव्यान्यथ संनतिर्ह्रीः प्रिया च वागनसूया च भीष्मे ॥ ४ ॥ सदा कृतज्ञे द्विजशत्रुघातके सनातनं चन्द्रमसीव लक्ष्म । स चेत् प्रशान्तः परवीरहन्ता मन्ये हतानेव च सर्ववीरान् ॥ ५ ॥

कर्ण बोला— ब्राह्मणोंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले तथा अपने ऊपर किये हुए उपकारोंका आभार माननेवाले जिन वीरशिरोमणि भीष्मजीमें चन्द्रमामें सदा सुशोभित होनेवाले शशचिह्नके समान सदा धृति, बुद्धि, पराक्रम, ओज, सत्य, स्मृति, विनय, लज्जा, प्रिय वाणी तथा अनसूया (दोषदृष्टिका अभाव)—ये सभी वीरोचित गुण तथा दिव्यास्त्र शोभा पाते थे, वे शत्रुवीरोंके हन्ता देवव्रत यदि सदाके लिये शान्त हो गये तो मैं सम्पूर्ण वीरोंको मारा गया ही मानता हूँ ॥ ४-५ ॥

नेह ध्रुवं किंचन जातु विद्यते लोके ह्यस्मिन् कर्मणोऽनित्ययोगात् । सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो भावं कुर्वीतार्यमहाव्रते हते ॥ ६ ॥

निश्चय ही इस संसारमें कर्मोंके अनित्य सम्बन्धसे कभी कोई वस्तु स्थिर नहीं रहती है। श्रेष्ठ एवं महान् व्रतधारी भीष्मजीके मारे जानेपर कौन संशयरहित होकर कह सकता है कि कल सूर्योदय होगा ही (अर्थात् जीवन अनित्य होनेके कारण हममेंसे कौन कलका सूर्योदय देख सकेगा, यह कहना कठिन है। जब मृत्युंजयी भीष्मजी भी मारे गये, तब हमारे जीवनकी क्या आशा है?) ॥ ६ ॥

वसुप्रभावे वसुवीर्यसम्भवे गते वसूनेव वसुन्धराधिपे । वसूनि पुत्रांश्च वसुन्धरां तथा कुरूंश्च शोचध्वमिमां च वाहिनीम् ॥ ७ ॥

भीष्मजीमें वसु देवताओंके समान प्रभाव था। वसुओंके समान शक्तिशाली महाराज शान्तनुसे उनकी उत्पत्ति हुई थी। ये वसुधाके स्वामी भीष्म अब वसु देवताओंको ही प्राप्त हो गये हैं; अतः उनके अभावमें तुम सभी लोग अपने धन, पुत्र, वसुन्धरा, कुरुवंश, कुरुदेशकी प्रजा तथा इस कौरव-सेनाके लिये शोक करो ॥ ७ ॥

संजय उवाच

महाप्रभावे वरदे निपातिते
लोकेश्वरे शास्तरि चामितौजसि ।
पराजितेषु भरतेषु दुर्मनाः
कर्णो भृशं न्यश्वसदश्रु वर्तयन् ॥ ८ ॥
**संजय कहते हैं—**महान् प्रभावशाली वर देनेमें समर्थ लोकेश्वर शासक तथा अमित तेजस्वी भीष्मके मारे जानेपर भरतवंशियोंकी पराजय होनेसे कर्ण मन-ही-मन बहुत दुःखी हो नेत्रोंसे आँसू बहाता हुआ लंबी साँस खींचने लगा ॥ ८ ॥

इदं च राधेयवचो निशम्य
सुताश्च राजंस्तव सैनिकाश्च ह ।
परस्परं चुक्रुशुरार्तिजं मुहु-
स्तदाश्रु नेत्रैर्मुमुचुश्च शब्दवत् ॥ ९ ॥
राजन्! राधानन्दन कर्णकी यह बात सुनकर आपके पुत्र और सैनिक एक-दूसरेकी ओर देखकर शोकवश बारंबार फूट-फूटकर रोने तथा नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ ९ ॥

प्रवर्तमाने तु पुनर्महाहवे
विगाह्यमानासु चमूषु पार्थिवैः ।
अथाब्रवीद्धर्षकरं तदा वचो
रथर्षभान् सर्वमहारथर्षभः ॥ १० ॥
पाण्डवसेनाके राजालोगोंद्वारा जब कौरव-सेनाका ध्वंस होने लगा और बड़ा भारी संग्राम आरम्भ हो गया, तब सम्पूर्ण महारथियोंमें श्रेष्ठ कर्ण समस्त श्रेष्ठ रथियोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाता हुआ इस प्रकार बोला— ॥

जगत्यनित्ये सततं प्रधावति
प्रचिन्तयन्नस्थिरमद्य लक्षये ।
भवत्सु तिष्ठत्स्विह पातितो मृधे
गिरिप्रकाशः कुरुपुङ्गवः कथम् ॥ ११ ॥

‘सदा मृत्युकी ओर दौड़ लगानेवाले इस अनित्य संसारमें आज मुझे बहुत चिन्तन करनेपर भी कोई वस्तु स्थिर नहीं दिखायी देती; अन्यथा युद्धमें आप-जैसे शूरवीरोंके रहते हुए पर्वतके समान प्रकाशित होनेवाले कुरुश्रेष्ठ भीष्म कैसे मार गिराये गये? ।। ११ ।।

निपातिते शान्तनवे महारथे
दिवाकरे भूतलमास्थिते यथा ।
न पार्थिवाः सोढुमलं धनंजयं
गिरिप्रवोढारमिवानिलं द्रुमाः ॥ १२ ॥

‘महारथी शान्तनुनन्दन भीष्मका रणमें गिराया जाना सूर्यके आकाशसे गिरकर पृथ्वीपर आ पड़नेके समान है। यह हो जानेपर समस्त भूपाल अर्जुनका वेग सहन करनेमें असमर्थ हैं, जैसे पर्वतोंको भी ढोनेवाले वायुका वेग साधारण वृक्ष नहीं सह सकते हैं ।। १२ ।।

हतप्रधानं त्विदमार्तरूपं
परैर्हतोत्साहमनाथमद्य वै ।

मया कुरूणां परिपाल्यमाहवे बलं यथा तेन महात्मना तथा ।। १३ ।। ‘आज यह कौरवदल अपने प्रधान सेनापतिके मारे जानेसे अनाथ एवं अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। शत्रुओंने इसके उत्साहको नष्ट कर दिया है। इस समय संग्रामभूमिमें मुझे इस कौरवसेनाकी उसी प्रकार रक्षा करनी है, जैसे महात्मा भीष्म किया करते थे ।। १३ ।।

समाहितं चात्मनि भारमीदृशं जगत् तथानित्यमिदं च लक्ष्ये । निपातितं चाहवशौण्डमाहवे कथं नु कुर्यामहमीदृशे भयम् ।। १४ ।। ‘मैंने यह भार अपने ऊपर ले लिया। जब मैं यह देखता हूँ कि सारा जगत् अनित्य है तथा युद्धकुशल भीष्म भी युद्धमें मारे गये हैं, तब ऐसे अवसरपर मैं भय किस लिये करूँ? ।। १४ ।।

अहं तु तान् कुरुवृषभानजिह्मगैः प्रवेशयन् यमसदनं चरन् रणे । यशः परं जगति विभाव्य वर्तिता परैर्हतो भुवि शयिताथवा पुनः ।। १५ ।। ‘मैं उन कुरुप्रवर पाण्डवोंको अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा यमलोकमें पहुँचाकर रणभूमिमें विचरूँगा और संसारमें उत्तम यशका विस्तार करके रहूँगा अथवा शत्रुओंके हाथसे मारा जाकर युद्धभूमिमें सदाके लिये सो जाऊँगा ।। १५ ।।

युधिष्ठिरो धृतिमतिसत्यसत्त्ववान् वृकोदरो गजशततुल्यविक्रमः । तथार्जुनस्त्रिदशवरात्मजो युवा न तद्बलं सुजयमिहामरैरपि ।। १६ ।। ‘युधिष्ठिर धैर्य, बुद्धि, सत्य और सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं। भीमसेनका पराक्रम सैकड़ों हाथियोंके समान है तथा अर्जुन भी देवराज इन्द्रके पुत्र एवं तरुण हैं। अतः पाण्डवोंकी सेनाको सम्पूर्ण देवता भी सुगमतापूर्वक नहीं जीत सकते ।। १६ ।।

यमौ रणे यत्र यमोपमौ बले ससात्यकिर्यत्र च देवकीसुतः । न तद्बलं कापुरुषोऽभ्युपेयिवान् निवर्तते मृत्युमुखान्न चासुभृत् ।। १७ ।। ‘जहाँ रणभूमिमें यमराजके समान नकुल और सहदेव विद्यमान हैं, जहाँ सात्यकि तथा देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण हैं, उस सेनामें कोई कायर मनुष्य प्रवेश कर जाय तो वह मौतके मुखसे जीवित नहीं निकल सकता ।। १७ ।।

तपोऽभ्युदीर्णं तपसैव बाध्यते बलं बलेनैव तथा मनस्विभिः । मनश्च मे शत्रुनिवारणे ध्रुवं स्वरक्षणे चाचलवद् व्यवस्थितम् ॥ १८ ॥ ‘मनस्वी पुरुष बढ़े हुए तपका तपसे और प्रचण्ड बलका बलसे ही निवारण करते हैं। यह सोचकर मेरा मन भी शत्रुओंको रोकनेके लिये दृढ़ निश्चय किये हुए है तथा अपनी रक्षाके लिये भी पर्वतकी भाँति अविचल-भावसे स्थित है ॥ १८ ॥

एवं चैषां बाधमानः प्रभावं गत्वाहं ताञ्जय्याम्यद्य सूत । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं भग्ने सैन्ये यः समेयात् स मित्रम् ॥ १९ ॥ फिर कर्ण अपने सारथिसे कहने लगा—‘सूत! इस प्रकार मैं युद्धमें जाकर इन शत्रुओंके बढ़ते हुए प्रभावको नष्ट करते हुए आज इन्हें जीत लूँगा। मेरे मित्रोंके साथ कोई द्रोह करे, यह मुझे सह्य नहीं। जो सेनाके भाग जानेपर भी साथ देता है, वही मित्र है ॥

कर्तास्म्येतत् सत्पुरुषार्यकर्म त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि भीष्मम् । सर्वान् संख्ये शत्रुसंघान् हनिष्ये हतस्तैर्वा वीरलोकं प्रपत्स्ये ॥ २० ॥ ‘या तो मैं सत्पुरुषोंके करनेयोग्य इस श्रेष्ठ कार्यको सम्पन्न करूँगा अथवा अपने प्राणोंका परित्याग करके भीष्मजीके ही पथपर चला जाऊँगा। मैं संग्रामभूमिमें शत्रुओंके समस्त समुदायोंका संहार कर डालूँगा अथवा उन्हींके हाथसे मारा जाकर वीरलोक प्राप्त कर लूँगा ॥

सम्प्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे पराहते पौरुषे धार्तराष्ट्रे । मया कृत्यमिति जानामि सूत तस्माद् राजंस्त्वद्य शत्रून् विजेष्ये ॥ २१ ॥ ‘सूत! दुर्योधनका पुरुषार्थ प्रतिहत हो गया है। उसके स्त्री-बच्चे रो-रोकर ‘त्राहि-त्राहि’ पुकार रहे हैं। ऐसे अवसरपर मुझे क्या करना चाहिये, यह मैं जानता हूँ। अतः आज मैं राजा दुर्योधनके शत्रुओंको अवश्य जीतूँगा ॥ २१ ॥

कुरून् रक्षन् पाण्डुपुत्राञ्जिघांसं- स्त्यक्त्वा प्राणान् घोररूपे रणेऽस्मिन् । सर्वान् संख्ये शत्रुसंघान् निहत्य दास्याम्यहं धार्तराष्ट्राय राज्यम् ॥ २२ ॥

‘कौरवोंकी रक्षा और पाण्डवोंके वधकी इच्छा करके मैं प्राणोंकी भी परवा न कर इस महाभयंकर युद्धमें समस्त शत्रुओंका संहार कर डालूँगा और दुर्योधनको सारा राज्य सौंप दूँगा ॥ २२ ॥ निबध्यतां मे कवचं विचित्रं हैमं शुभ्रं मणिरत्नावभासि । शिरस्त्राणं चार्कसमानभासं धनुः शरांश्चाग्निविषाहिकल्पान् ॥ २३ ॥ ‘तुम मेरे शरीरमें मणियों तथा रत्नोंसे प्रकाशित सुन्दर एवं विचित्र सुवर्णमय कवच बाँध दो और मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी शिरस्त्राण रख दो। अग्नि, विष तथा सर्पके समान भयंकर बाण एवं धनुष ले आओ ॥ २३ ॥ उपासङ्गान् षोडश योजयन्तु धनूंषि दिव्यानि तथाऽऽहरन्तु । असींश्च शक्तीश्च गदाश्च गुर्वीः शङ्खं च जाम्बूनदचित्रनालम् ॥ २४ ॥ ‘मेरे सेवक बाणोंसे भरे हुए सोलह तरकश रख दें, दिव्य धनुष ले आ दें, बहुत-से खड्गों, शक्तियों, भारी गदाओं तथा सुवर्णजटित विचित्र नालवाले शंखको भी ले आकर रख दें ॥ २४ ॥ इमां रौक्मीं नागकक्ष्यां विचित्रां ध्वजं चित्रं दिव्यमिन्दीवराङ्कम् । श्लक्ष्णैर्वस्त्रैर्विप्रमृज्यानयन्तु चित्रां मालां चारुबद्धां सलाजाम् ॥ २५ ॥ हाथीको बाँधनेके लिये बनी हुई इस विचित्र सुनहरी रस्सीको तथा कमलके चिह्नसे युक्त दिव्य एवं अद्भुत ध्वजको स्वच्छ सुन्दर वस्त्रोंसे पोंछकर ले आवें। इसके सिवा सुन्दर ढंगसे गुँथी हुई विचित्र माला और खील आदि मांगलिक वस्तुएँ प्रस्तुत करें ॥ २५ ॥ अश्वानग्रयान् पाण्डुराभ्रप्रकाशान् पुष्टान् स्नातान् मन्त्रपूताभिरद्भिः । तप्तैर्भाण्डैः काञ्चनैरभ्युपेतान् शीघ्रान् शीघ्रं सूतपुत्रानयस्व ॥ २६ ॥ ‘सूतपुत्र! तुम शीघ्र ही मेरे लिये श्रेष्ठ एवं शीघ्रगामी घोड़े ले आओ, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल तथा मन्त्रपूत जलसे नहाये हुए हों, शरीरसे हृष्टपुष्ट हों और जिन्हें सोनेके आभूषणोंसे सजाया गया हो ॥ २६ ॥ रथं चाग्रयं हेममालावबद्धं रत्नैश्चित्रं सूर्यचन्द्रप्रकाशैः ।

द्रव्यैर्युक्तं सम्प्रहारोपपन्नै-
र्वाहैर्युक्तं तूर्णमावर्तयस्व ॥ २७ ॥
‘उन्हीं घोड़ोंसे जुता हुआ सुन्दर रथ शीघ्र ले आओ, जो सोनेकी मालाओंसे अलंकृत, सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित होनेवाले विचित्र रत्नोंसे जटित तथा युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न हो ।। २७ ।।
चित्राणि चापानि च वेगवन्ति
ज्याश्चोत्तमाः संहननोपपन्नाः ।
तूणांश्च पूर्णान् महतः शराणा-
मासाद्य गात्रावरणानि चैव ॥ २८ ॥
‘विचित्र एवं वेगशाली धनुष, उत्तम प्रत्यंचा, कवच, बाणोंसे भरे हुए विशाल तरकश और शरीरके आवरण—इन सबको लेकर शीघ्र तैयार हो जाओ ।। २८ ।।
प्रायात्रिकं चानयताशु सर्वं
दध्ना पूर्णं वीर कांस्यं च हैमम् ।
आनीय मालामवबध्य चाङ्गे
प्रवादयन्त्वाशु जयाय भेरीः ॥ २९ ॥
‘वीर! रणयात्राकी सारी आवश्यक सामग्री, दहीसे भरे हुए कांस्य और सुवर्णके पात्र आदि सब कुछ शीघ्र ले आओ। यह सब लानेके पश्चात् मेरे गलेमें माला पहनाकर विजय-यात्राके लिये तुमलोग तुरंत नगाड़े बजवा दो ।। २९ ।।
प्रयाहि सूताशु यतः किरीटी
वृकोदरो धर्मसुतो यमौ च ।
तान् वा हनिष्यामि समेत्य संख्ये
भीष्माय गच्छामि हतो द्विषद्भिः ॥ ३० ॥
‘सूत! यह सब कार्य करके तुम शीघ्र ही रथ लेकर उस स्थानपर चलो, जहाँ किरीटधारी अर्जुन, भीमसेन, धर्मपुत्र युधिष्ठिर तथा नकुल-सहदेव खड़े हैं। वहाँ युद्धस्थलमें उनसे भिड़कर या तो उन्हींको मार डालूँगा या स्वयं ही शत्रुओंके हाथसे मारा जाकर भीष्मके पास चला जाऊँगा ।। ३० ।।
यस्मिन् राजा सत्यधृतिर्युधिष्ठिरः
समास्थितो भीमसेनार्जुनौ च ।
वासुदेवः सात्यकिः सृंजयाश्च
मन्ये बलं तदजय्यं महीपैः ॥ ३१ ॥
‘जिस सेनामें सत्यधृति राजा युधिष्ठिर खड़े हों, भीमसेन, अर्जुन, वासुदेव, सात्यकि तथा सृंजय मौजूद हों, उस सेनाको मैं राजाओंके लिये अजेय मानता हूँ ।।
तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षेत्