महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान्का दर्शन, भगवान्का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचन
एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान्का दर्शन, भगवान्का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य
भीष्म उवाच
एवं स्तुतः स भगवान् गुह्यैस्तथ्यैश्च नामभिः ।
तं मुनिं दर्शयामास नारदं विश्वरूपधृक् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस प्रकार गुह्य तथा सत्य नामोंसे जब नारदजीने भगवान्की स्तुति की, तब उन्होंने विश्वरूप धारण करके उन्हें दर्शन दिया ॥ १ ॥
किंचिच्चन्द्राद् विशुद्धात्मा किंचिच्चन्द्राद् विशेषवान् ।
कृशानुवर्णः किंचिच्च किंचिद्धिष्ण्याकृतिः प्रभुः ॥ २ ॥
उनका वह स्वरूप कुछ चन्द्रमासे भी अधिक निर्मल और कुछ चन्द्रमासे भी विलक्षण था। कुछ अग्निके समान देदीप्यमान और कुछ नक्षत्रोंके समान जाज्वल्यमान था ॥ २ ॥
शुकपत्रनिभः किंचित् किंचित्स्फटिकसंनिभः ।
नीलाञ्जनचयप्रख्यो जातरूपप्रभः क्वचित् ॥ ३ ॥
कुछ तोतेकी पाँखके समान हरा, कुछ स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल, कहींसे कज्जलराशिके समान काला और कहींसे सुवर्णके समान कान्तिमान् था ॥ ३ ॥
प्रवालाङ्कुरवर्णश्च श्वेतवर्णस्तथा क्वचित् ।
क्वचित् सुवर्णवर्णाभो वैदूर्यसदृशः क्वचित् ॥ ४ ॥
कहीं नवांकुरित पल्लवके समान था। कहीं श्वेतवर्ण दिखायी देता था, कहीं सुनहरी आभा दिखायी देती थी और कहीं-कहीं वैदूर्यमणिकी-सी छटा छिटक रही थी ॥ ४ ॥
नीलवैदूर्यसदृश इन्द्रनीलनिभः क्वचित् ।
मयूरग्रीववर्णाभो मुक्ताहारनिभः क्वचित् ॥ ५ ॥
कहीं नीलवैदूर्य, कहीं इन्द्रनीलमणि, कहीं मोरकी ग्रीवाके सदृश वर्ण और कहीं मोतीके हारकी-सी कान्ति दृष्टिगोचर होती थी ॥ ५ ॥
एतान् बहुविधान् वर्णान् रूपैर्बिभ्रत्सनातनः ।
सहस्रनयनः श्रीमान् शतशीर्षः सहस्रपात् ॥ ६ ॥
सहस्रोदरबाहुश्च अव्यक्त इति च क्वचित् ।
इस प्रकार वे सनातन भगवान् श्रीहरि अपने स्वरूपमें नाना प्रकारके रंग धारण किये हुए थे। उनके हजारों नेत्र, सैकड़ों (हजारों) मस्तक, हजारों पैर, हजारों उदर और हजारों हाथ थे। वे अपूर्व कान्तिसे सम्पन्न थे और कहीं-कहीं उनकी आकृति अव्यक्त थी॥ ६ १/२॥ ओङ्कारमुद्गिरन् वक्त्रात् सावित्रीं तदन्वयाम्॥ ७॥ शेषेभ्यश्चैव वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदान् गिरन् बहून्। आरण्यकं जगौ देवो हरिनारायणो वशी॥ ८॥ सबको वशमें रखनेवाले वे भगवान् नारायण हरि एक मुखसे तो ओङ्कार तथा उससे सम्बन्ध रखनेवाली गायत्रीका जप करते थे एवं अन्यान्य मुखोंसे चारों वेदों और उनके आरण्यकभागका गान कर रहे थे॥ ७-८॥ वेदिं कमण्डलुं शुभ्रान् मणीनुपानहौ कुशान्। अजिनं दण्डकाष्ठं च ज्वलितं च हुताशनम्॥ ९॥ धारयामास देवेशो हस्तैर्यज्ञपतिस्तदा। यज्ञोंके स्वामी उन भगवान् देवेश्वर विष्णुने उस समय अपने हाथोंमें यज्ञवेदी, कमण्डलु, चमकीले मणिरत्न, उपानह, कुशा, मृगचर्म, दण्ड-काष्ठ और प्रज्वलित अग्नि—ये सब वस्तुएँ ले रखी थीं॥ ९ १/२॥ तं प्रसन्नं प्रसन्नात्मा नारदो द्विजसत्तमः॥ १०॥ वाग्यतः प्रणतो भूत्वा ववन्दे परमेश्वरम्। उनका दर्शन करनेके पश्चात् प्रसन्नचित्त हुए द्विजश्रेष्ठ नारदने मौनभावसे नतमस्तक हो उन प्रसन्न हुए परमेश्वरकी वन्दना की॥ १० १/२॥ तमुवाच नतं मूर्ध्ना देवानामादिरव्ययः॥ ११॥ मस्तक झुकाकर चरणोंमें पड़े हुए नारदजीसे देवताओंके आदिकारण अविनाशी श्रीहरिने इस प्रकार कहा॥ ११॥
श्रीभगवानुवाच
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः। इमं देशमनुप्राप्ता मम दर्शनलालसाः॥ १२॥ **श्रीभगवान् बोले—**देवर्षे! महर्षि एकत, द्वित और त्रित—ये सब भी मेरे दर्शनकी इच्छासे इस स्थानपर आये हुए थे॥ १२॥ न च मां ते ददृशिरे न च द्रक्ष्यति कश्चन। ऋते ह्यैकान्तिकश्रेष्ठात् त्वं चैवैकान्तिकोत्तमः॥ १३॥ किंतु उन्हें मेरा दर्शन न प्राप्त हो सका। वास्तवमें मेरे अनन्य भक्तके सिवा और कोई मनुष्य मेरा दर्शन नहीं कर सकता। तुम तो मेरे अनन्य भक्तोंमें श्रेष्ठ हो; इसीलिये तुम्हें मेरा दर्शन हुआ है॥ १३॥
ममैतास्तनवः श्रेष्ठा जाता धर्मगृहे द्विज ।
तास्त्वं भजस्व सततं साधयस्व यथागतम् ॥ १४ ॥
विप्रवर! धर्मके घरमें जो अवतीर्ण हुए हैं, वे नर-नारायण आदि चारों भाई मेरे ही स्वरूप हैं; अतः तुम सदा उनका भजन किया करो तथा जो कार्य प्राप्त हो, उसका साधन करो ॥ १४ ॥
वृणीष्व च वरं विप्र मत्तस्त्वं यदिहेच्छसि ।
प्रसन्नोऽहं तवाद्येह विश्वमूर्तिरिहाव्ययः ॥ १५ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैं अविनाशी विश्वरूप परमेश्वर आज तुमपर प्रसन्न हुआ हूँ; अतः तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, वह वर माँग लो ॥ १५ ॥
नारद उवाच
अद्य मे तपसो देव यमस्य नियमस्य च ।
सद्यः फलमवाप्तं वै दृष्टो यद् भगवान् मया ॥ १६ ॥
नारदजीने कहा—देव! जब मैंने आप भगवान्का दर्शन पा लिया, तब मुझे तप, यम और नियम—सबका फल तत्काल ही मिल गया ॥ १६ ॥
वर एष ममात्यन्तं दृष्टस्त्वं यत् सनातनः ।
भगवन् विश्वदृक् सिंहः सर्वमूर्तिर्महान् प्रभुः ॥ १७ ॥
भगवन्! आप सम्पूर्ण विश्वके द्रष्टा, सिंहके समान निर्भय, सर्वस्वरूप, महान् एवं सनातन प्रभु हैं। आपका जो दर्शन हो गया, यही मेरे लिये सबसे बड़ा वरदान है ॥ १७ ॥
भीष्म उवाच
एवं संदर्शयित्वा तु नारदं परमेष्ठिनम् ।
उवाच वचनं भूयो गच्छ नारद मा चिरम् ॥ १८ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार दर्शन देकर भगवान्ने ब्रह्मपुत्र नारदजीसे फिर कहा, 'नारद! जाओ, विलम्ब न करो ॥ १८ ॥
इमे ह्यनिन्द्रियाहारा मद्भक्ताश्चन्द्रवर्चसः ।
एकाग्राश्चिन्तयेयुर्मां नैषां विघ्नो भवेदिति ॥ १९ ॥
'ये इन्द्रिय और आहारसे शून्य, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मेरे भक्तजन एकाग्रभावसे मेरा चिन्तन कर सकें और इनके ध्यानमें किसी प्रकारका विघ्न न हो, इसके लिये तुम्हें यहाँसे चले जाना चाहिये ॥ १९ ॥
सिद्धा ह्येते महाभागाः पुरा ह्येकान्तिनोऽभवन् ।
तमोरजोभिनिर्मुक्ता मां प्रवेक्ष्यन्त्यसंशयम् ॥ २० ॥
'यहाँ निवास करनेवाले ये सभी महाभाग सिद्ध हो चुके हैं। ये पहले भी मेरे अनन्य भक्त रहे हैं। ये तमोगुण और रजोगुणसे मुक्त हैं; अतः निःसंदेह मुझमें ही प्रवेश
करेंगे ।। २० ।। न दृश्यश्चक्षुषा योऽसौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च । न घ्रेयश्चैव गन्धेन रसेन च विवर्जितः ।। २१ ।। सत्त्वं रजस्तमश्चैव न गुणास्तं भजन्ति वै । यश्च सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते ।। २२ ।। भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न विनश्यति । अजो नित्यः शाश्वतश्च निर्गुणो निष्कलस्तथा ।। २३ ।। द्विर्द्वादशेभ्यस्तत्त्वेभ्यः ख्यातो यः पञ्चविंशकः । पुरुषो निष्क्रियश्चैव ज्ञानदृश्यश्च कथ्यते ।। २४ ।। यं प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता वै द्विजसत्तमाः । स वासुदेवो विज्ञेयः परमात्मा सनातनः ।। २५ ।। ‘जो नेत्रोंसे देखा नहीं जाता, त्वचासे जिसका स्पर्श नहीं होता, गन्ध ग्रहण करनेवाली घ्राणेन्द्रियसे जो सूँघनेमें नहीं आता, जो रसनेन्द्रियकी पहुँचसे परे है; सत्त्व, रज और तम नामक गुण जिसपर कोई प्रभाव नहीं डाल पाते, जो सर्वव्यापी, साक्षी और सम्पूर्ण जगत्का आत्मा कहलाता है, सम्पूर्ण प्राणियोंका नाश हो जानेपर भी जो स्वयं नष्ट नहीं होता है, जिसे अजन्मा, नित्य, सनातन, निर्गुण और निष्कल बताया गया है, जो चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवें तत्त्वके रूपमें विख्यात है, जिसे अन्तर्यामी पुरुष, निष्क्रिय तथा ज्ञानमय नेत्रोंसे ही देखने योग्य बताया जाता है, जिसमें प्रवेश करके श्रेष्ठ द्विज यहाँ मुक्त हो जाते हैं, वही सनातन परमात्मा है। उसीको वासुदेव नामसे जानना चाहिये ।। २१—२५ ।।
पश्य देवस्य माहात्म्यं महिमानं च नारद । शुभाशुभैः कर्मभिर्यो न लिप्यति कदाचन ।। २६ ।। ‘नारद! उस परमात्मदेवका माहात्म्य और महिमा तो देखो, जो शुभाशुभ कर्मोंसे कभी लिप्त नहीं होता है ।। २६ ।।
सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणानेतान् प्रचक्षते । यत्ते सर्वशरीरेषु तिष्ठन्ति विचरन्ति च ।। २७ ।। ‘सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण बताये जाते हैं, जो सम्पूर्ण शरीरोंमें स्थित रहते हैं और विचरते हैं ।।
एतान् गुणांस्तु क्षेत्रज्ञो भुङ्क्ते नैभिः स भुज्यते । निर्गुणो गुणभुक् चैव गुणस्रष्टा गुणाधिकः ।। २८ ।। ‘इन गुणोंको क्षेत्रज्ञ स्वयं भोगता है, किंतु इन गुणोंके द्वारा वह क्षेत्रज्ञ भोगा नहीं जाता; क्योंकि वह निर्गुण, गुणोंका भोक्ता, गुणोंका स्रष्टा तथा गुणोंसे उत्कृष्ट है ।। २८ ।।
जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीयते । ज्योतिष्यापः प्रलीयन्ते ज्योतिर्वायौ प्रलीयते ।। २९ ।।
‘देवर्षे! यह सम्पूर्ण जगत् जिसपर प्रतिष्ठित है, वह पृथिवी जलमें विलीन हो जाती है। जलका तेजमें और तेजका वायुमें लय होता है ॥ २९ ॥
खे वायुः प्रलयं याति मनस्याकाशमेव च ।
मनो हि परमं भूतं तदव्यक्ते प्रलीयते ॥ ३० ॥
‘वायुका आकाशमें लय होता है, आकाश मनमें विलीन होता है। मन उत्कृष्ट भूत है। वह अव्यक्त प्रकृतिमें लीन होता है ॥ ३० ॥
अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निष्क्रिये सम्प्रलीयते ।
नास्ति तस्मात् परतरः पुरुषाद् वै सनातनात् ॥ ३१ ॥
‘ब्रह्मन्! अव्यक्तका निष्क्रिय पुरुषमें लय होता है। उस सनातन पुरुषसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है ॥ ३१ ॥
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम् ।
ऋते तमेकं पुरुषं वासुदेवं सनातनम् ॥ ३२ ॥
‘संसारमें उस एकमात्र सनातन पुरुष वासुदेवको छोड़कर कोई भी चराचर भूत नित्य नहीं है ॥ ३२ ॥
सर्वभूतात्मभूतो हि वासुदेवो महाबलः ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ ३३ ॥
‘महाबली वासुदेव सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत हैं ॥
ते समेता महात्मानः शरीरमिति संज्ञितम् ।
तदा विशति यो ब्रह्मन्नदृश्यो लघुविक्रमः ॥ ३४ ॥
‘वे सब महाभूत एक साथ मिलकर ही शरीर नाम धारण करते हैं। ब्रह्मन्! उस समय अदृश्यभावसे जो शीघ्रगामी चेतन उसमें प्रवेश करता है, वही जीवात्मा है ॥ ३४ ॥
उत्पन्न एव भवति शरीरं चेष्टयन् प्रभुः ।
न विना धातुसंघातं शरीरं भवति क्वचित् ॥ ३५ ॥
‘उसका शरीरमें प्रवेश करना ही उत्पन्न होना बताया जाता है। वही शरीरको चेष्टाशील बनाता है। वही इसके संचालनमें समर्थ है। कहीं भी पाँचों भूतोंके मिलित समुदायके बिना कोई शरीर नहीं होता ॥ ३५ ॥
न च जीवं विना ब्रह्मन् वायवश्चेष्टयन्त्युत ।
स जीवः परिसंख्यातः शेषः संकर्षणः प्रभुः ॥ ३६ ॥
‘ब्रह्मन्! जीवके बिना प्राणवायु चेष्टा नहीं करती। वह जीव ही शेष या भगवान् संकर्षण कहा गया है ॥ ३६ ॥
तस्मात् सनत्कुमारत्वं योऽलभत् स्वेन कर्मणा ।
यस्मिंश्च सर्वभूतानि प्रलयं यान्ति संक्षयम् ॥ ३७ ॥
स मनः सर्वभूतानां प्रद्युम्नः परिपठ्यते ।
‘जो उसी संकर्षण अथवा जीवसे उत्पन्न होकर अपने कर्म (ध्यान, पूजन आदि) के द्वारा सनत्कुमारत्व (जीवन्मुक्ति) प्राप्त कर लेता है, जिसमें समस्त प्राणी लय एवं क्षयको प्राप्त होते हैं, वह सम्पूर्ण भूतोंका मन ही ‘प्रद्युम्न’ कहलाता है ।। ३७ ½ ।।
तस्मात् प्रसूतो यः कर्ता कारणं कार्यमेव च ।। ३८ ।।
‘उस प्रद्युम्नसे जिसकी उत्पत्ति हुई है, वह (अहंकार ही) तन्मात्रा आदिका कर्ता, परम्परा-सम्बन्धसे महाभूतोंका कारण तथा महत्तत्त्वका कार्य है ।। ३८ ।।
तस्मात् सर्वं सम्भवति जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
सोऽनिरुद्धः स ईशानो व्यक्तः स सर्वकर्मसु ।। ३९ ।।
‘उसीसे समस्त चराचर जगत्की उत्पत्ति होती है। वही ‘अनिरुद्ध’ एवं ‘ईशान’ कहलाता है। वह (कर्तृत्वके अभिमानरूपसे) सम्पूर्ण कर्मोंमें व्यक्त होता है ।। ३९ ।।
यो वासुदेवो भगवान् क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ।
ज्ञेयः स एव राजेन्द्र जीवः संकर्षणः प्रभुः ।। ४० ।।
संकर्षणाच्च प्रद्युम्नो मनोभूतः स उच्यते ।
प्रद्युम्नाद् योऽनिरुद्धस्तु सोऽहंकारः स ईश्वरः ।। ४१ ।।
‘राजेन्द्र! जो भगवान् वासुदेव क्षेत्रज्ञस्वरूप एवं निर्गुणरूपसे जाननेयोग्य बताये गये हैं, वे ही प्रभावशाली संकर्षणरूप जीवात्मा हैं। संकर्षणसे प्रद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ है, जो मनोमय कहलाते हैं। प्रद्युम्नसे जो अनिरुद्ध प्रकट हुए हैं, वे ही अहंकार और ईश्वर हैं ।। ४०-४१ ।।
मत्तः सर्वं सम्भवति जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
अक्षरं च क्षरं चैव सच्चासचै़व नारद ।। ४२ ।।
‘नारद! मुझसे ही समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत्की उत्पत्ति होती है। क्षर और अक्षर तथा असत् और सत् भी मुझसे ही प्रकट हुए हैं ।। ४२ ।।
मां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता भक्तास्तु ये मम ।
अहं हि पुरुषो ज्ञेयो निष्क्रियः पञ्चविंशकः ।। ४३ ।।
‘यहाँ जो मेरे भक्त हैं, वे मुझमें ही प्रवेश करके मुक्त होते हैं। मैं ही पचीसवें तत्त्व निष्क्रिय पुरुषरूपसे जानने योग्य हूँ ।। ४३ ।।
निर्गुणो निष्कलश्चैव निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
एतत् त्वया न विज्ञेयं रूपवानिति दृश्यते ।। ४४ ।।
इच्छन् मुहूर्तान्निश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः ।
‘मैं निर्गुण, निष्कल, द्वन्द्वोंसे अतीत और परिग्रहसे शून्य हूँ। तुम ऐसा न समझ लेना कि ये रूपवान् हैं, इसलिये दिखायी देते हैं; क्योंकि मैं इच्छा करते ही एक ही क्षणमें अदृश्य हो सकता हूँ; क्योंकि मैं सम्पूर्ण जगत्का ईश्वर और गुरु हूँ ।। ४४ ½ ।।
माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद ॥ ४५ ॥ सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि । 'नारद! तुम जो मुझे देख रहे हो, इस रूपमें मैंने माया रची है। तुम मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंके गुणोंसे युक्त न जानो ॥ ४५ १/२ ॥ मयैतत् कथितं सम्यक् तव मूर्तिचतुष्टयम् ॥ ४६ ॥ अहं हि जीवसंज्ञातो मयि जीवः समाहितः । नैवं ते बुद्धिरत्राभूद् दृष्टो जीवो मयेति वै ॥ ४७ ॥ 'मैंने अपने वासुदेव, संकर्षण आदि चार स्वरूपोंका तुम्हारे सामने भलीभाँति वर्णन किया है। मैं ही जीव नामसे प्रसिद्ध हूँ, मुझमें ही जीवकी स्थिति है; परंतु तुम्हारे मनमें ऐसा विचार नहीं उठना चाहिये कि मैंने जीवको देखा है ॥ ४६-४७ ॥ अहं सर्वत्रगो ब्रह्मन् भूतग्रामान्तरात्मकः । भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न नशाम्यहम् ॥ ४८ ॥ 'ब्रह्मन्! मैं सर्वव्यापी और समस्त प्राणिसमुदायका अन्तरात्मा हूँ। सम्पूर्ण भूतसमुदाय और शरीरोंके नष्ट हो जानेपर भी मेरा नाश नहीं होता है ॥ ४८ ॥ सिद्धा हि ते महाभागा नरा ह्येकान्तिनोऽभवन् । तमोरजोभ्यां निर्मुक्ताः प्रवेक्ष्यन्ति च मां मुने ॥ ४९ ॥ 'मुने! ये महाभाग श्वेतद्वीपनिवासी सिद्ध हैं। ये पहले मेरे अनन्य भक्त रहे हैं। ये तमोगुण और रजोगुणसे मुक्त हो गये हैं; इसलिये मेरे भीतर प्रवेश करेंगे ॥ ४९ ॥ हिरण्यगर्भो लोकादिश्चतुर्वक्त्रोऽनिरुक्तगः । ब्रह्मा सनातनो देवो मम बह्वर्थचिन्तकः ॥ ५० ॥ 'जो सम्पूर्ण जगत्के आदि, चतुर्मुख, अनिर्वचनीय-स्वरूप, हिरण्यगर्भ एवं सनातन देवता हैं, वे ब्रह्मा मेरे बहुत-से कार्योंका चिन्तन करनेवाले हैं ॥ ५० ॥ ललाटाच्चैव मे रुद्रो देवः क्रोधाद् विनिःसृतः । पश्यैकादश मे रुद्रान् दक्षिणं पार्श्वमास्थितान् ॥ ५१ ॥ 'मेरे क्रोधवश ललाटसे मेरे ही रुद्रदेवका प्राकट्य हुआ है। देखो, ये ग्यारह रुद्र मेरे दाहिने भागमें विराजमान हैं ॥ ५१ ॥ द्वादशैव तथाऽऽदित्यान् वामपार्श्वे समास्थितान् । अग्रतश्चैव मे पश्य वसूनष्टौ सुरोत्तमान् ॥ ५२ ॥ 'इसी प्रकार मेरे बायें भागमें बारह आदित्य विराज रहे हैं। अग्रभागमें सुरश्रेष्ठ आठ वसु विद्यमान हैं। इन सबको प्रत्यक्ष देखो ॥ ५२ ॥ नासत्यं चैव दस्रं च भिषजौ पश्य पृष्ठतः । सर्वान् प्रजापतीन् पश्य पश्य सप्त ऋषींस्तथा ॥ ५३ ॥ वेदान् यज्ञांश्च शतशः पश्यामृतमथौषधीः ।
तपांसि नियमांश्चैव यमानपि पृथग्विधान् ॥ ५४ ॥ 'मेरे पृष्ठभागमें भी दृष्टिपात करो, जहाँ नासत्य और दस्र—ये दोनों देववैद्य अश्विनीकुमार स्थित हैं। इनके सिवा मेरे विभिन्न अंगोंमें समस्त प्रजापतियों, सप्तर्षियों, सम्पूर्ण वेदों, सैकड़ों यज्ञों, ओषधियों तथा अमृतको भी देखो। तप तथा नाना प्रकारके यम-नियम भी यहाँ मूर्तिमान् हैं ॥ ५३-५४ ॥
तथाष्टगुणमैश्वर्यमेकस्थं पश्य मूर्तिमत् । श्रियं लक्ष्मीं च कीर्तिं च पृथिवीं च ककुद्मिनीम् ॥ ५५ ॥ वेदानां मातरं पश्य मत्स्थां देवीं सरस्वतीम् । ध्रुवं च ज्योतिषां श्रेष्ठं पश्य नारद खेचरम् ॥ ५६ ॥ 'आठ प्रकारके ऐश्वर्य भी यहाँ एक ही जगह साकाररूपसे प्रकट हैं, इन्हें देखो। श्री, लक्ष्मी, कीर्ति, पर्वतोंसहित पृथ्वी तथा वेदमाता सरस्वतीदेवी भी मेरे भीतर विराजमान हैं, उन सबका दर्शन करो। नारद! ये नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी ध्रुव दिखायी दे रहे हैं, इनकी ओर भी दृष्टिपात करो ॥ ५५-५६ ॥
अम्भोधरान् समुद्रांश्च सरांसि सरितस्तथा । मूर्तिमन्तः पितृगणांश्चतुरः पश्य सत्तम ॥ ५७ ॥ 'साधुशिरोमणे! बादल, समुद्र, सरोवर और सरिताओंको भी मेरे भीतर मूर्तिमान् देख लो। चारों प्रकारके पितृगण भी सशरीर प्रकट हैं, इनका भी दर्शन कर लो ॥ ५७ ॥
त्रींश्चैवेमान् गुणान् पश्य मत्स्थान् मूर्तिविवर्जितान् । देवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ५८ ॥ 'मेरे शरीरमें स्थित हुए मूर्तिरहित इन तीन गुणोंको भी मूर्तिमान् देख लो। मुने! देवकार्यसे भी पितृकार्य बढ़कर है ॥ ५८ ॥
देवानां च पितॄणां च पिता ह्येकोऽहमादितः । अहं हयशिरा भूत्वा समुद्रे पश्चिमोत्तरे ॥ ५९ ॥ पिबामि सुहुतं हव्यं कव्यं च श्रद्धयान्वितम् । 'एकमात्र मैं ही देवताओं और पितरोंका भी पिता हूँ। मैं ही हयग्रीवरूप धारण करके समुद्रमें वायव्यकोणकी ओर रहता हूँ और विधिपूर्वक हवन किये हुए हव्य और श्रद्धापूर्वक समर्पित किये हुए कव्यका भी पान करता हूँ ॥ ५९ १/२ ॥
मया सृष्टः पुरा ब्रह्मा मां यज्ञमयजत् स्वयम् ॥ ६० ॥ ततस्तस्मिन् वरान् प्रीतो दत्तवानस्म्यनुत्तमान् । 'पूर्वकालमें मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये ब्रह्माने स्वयं ही मुझ यज्ञपुरुषका यजन किया था। इससे प्रसन्न होकर मैंने उन्हें उत्तम वरदान दिये थे ॥ ६० १/२ ॥
मत्पुत्रत्वं च कल्पादौ लोकाध्यक्षत्वमेव च ॥ ६१ ॥ अहंकारकृतं चैव नाम पर्यायवाचकम् ।
त्वया कृतां च मर्यादां नातिक्रंस्यति कश्चन ॥ ६२ ॥ (वे वरदान इस प्रकार हैं—) ‘ब्रह्मन्! तुम प्रत्येक कल्पके आदिमें मेरे पुत्ररूपसे उत्पन्न होओगे। तुम्हें लोकाध्यक्षका पद प्राप्त होगा। तुम्हारा पर्यायवाची नाम होगा, अहंकारकर्ता। तुम्हारी बाँधी हुई मर्यादाका कोई उल्लंघन नहीं करेगा ।। ६१-६२ ।। त्वं चैव वरदो ब्रह्मन् वरेप्सूनां भविष्यसि । सुरासुरगणानां च ऋषीणां च तपोधन ॥ ६३ ॥ पितॄणां च महाभाग सततं संशितव्रत । विविधानां च भूतानां त्वमुपास्यो भविष्यसि ॥ ६४ ॥ ‘ब्रह्मन्! तुम वर चाहनेवाले साधकोंको वर देनेमें समर्थ होओगे। कठोर व्रतका पालन करनेवाले महाभाग तपोधन! तुम देवताओं, असुरों, ऋषियों, पितरों तथा नाना प्रकारके प्राणियोंके सदा ही उपासनीय होओगे ।। ६३-६४ ।। प्रादुर्भावगतश्चाहं सुरकार्येषु नित्यदा । अनुशास्यस्त्वया ब्रह्मन् नियोज्यश्च सुतो यथा ॥ ६५ ॥ ‘ब्रह्मन्! जब मैं देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये अवतार धारण करूँ, उन दिनों सदा तुम मुझपर शासन करना और पुत्रकी भाँति मुझे प्रत्येक कार्यमें नियुक्त करना’ ।। ६५ ।। एतांश्चान्यांश्च रुचिरान् ब्रह्मणोऽमिततेजसे । अहं दत्त्वा वरान् प्रीतो निवृत्तिपरमोऽभवम् ॥ ६६ ॥ ‘नारद! अमित तेजस्वी ब्रह्माको ये तथा और भी बहुत-से सुन्दर वर देकर मैं प्रसन्नतापूर्वक निवृत्तिपरायण हो गया ।। ६६ ।। निर्वाणं सर्वधर्माणां निवृत्तिः परमा स्मृता । तस्मान्निवृत्तिमापन्नश्चरेत् सर्वाङ्गनिर्वृतः ॥ ६७ ॥ ‘समस्त कर्मोंसे उपरत हो जाना ही परम निवृत्ति है; अतः जो निवृत्तिको प्राप्त हो गया है, वह सभी अंगोंसे सुखी होकर विचरण करे ।। ६७ ।। विद्यासहायवन्तं च आदित्यस्थं समाहितम् । कपिलं प्राहुराचार्याः सांख्यनिश्चितनिश्चयाः ॥ ६८ ॥ ‘सांख्यशास्त्रके सिद्धान्तका निश्चय करनेवाले आचार्यगण मुझे ही विद्याकी सहायतासे युक्त, सूर्यमण्डलमें स्थित एवं समाहितचित्त कपिल कहते हैं ।। ६८ ।। हिरण्यगर्भो भगवानेष छन्दसि सुष्टुतः । सोऽहं योगरतिर्ब्रह्मन् योगशास्त्रेषु शब्दितः ॥ ६९ ॥ ‘वेदमें जिनकी स्तुति की गयी है, वे भगवान् हिरण्यगर्भ मेरे ही स्वरूप हैं! ब्रह्मन्! योगीलोग जिसमें रमण करते हैं, वह योगशास्त्रप्रसिद्ध पुरुषविशेष ईश्वर भी मैं ही हूँ ।। ६९ ।।
एषोऽहं व्यक्तिमागत्य तिष्ठामि दिवि शाश्वतः ।
ततो युगसहस्रान्ते संहरिष्ये जगत् पुनः ॥ ७० ॥
‘इस समय मैं सनातन परमात्मा ही व्यक्तरूप धारण करके आकाशमें स्थित हूँ। फिर एक सहस्र चतुर्युग व्यतीत होनेपर मैं ही इस जगत्का संहार करूँगा ॥ ७० ॥
कृत्वाऽऽत्मस्थानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
एकाकी विद्यया सार्धं विहरिष्ये जगत् पुनः ॥ ७१ ॥
‘उस समय सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंको अपनेमें लीन करके मैं अकेला ही अपनी विद्या-शक्ति के साथ सूने संसारमें विहार करूँगा ॥ ७१ ॥
ततो भूयो जगत् सर्वं करिष्यामीह विद्यया ।
अस्मिन् मूर्तिश्चतुर्थी या सासृजच्छेषमव्ययम् ॥ ७२ ॥
‘तदनन्तर सृष्टिका समय आनेपर फिर उस विद्याशक्तिके ही द्वारा संसारके सारे चराचर प्राणियोंकी सृष्टि करूँगा। मेरी जो चार मूर्तियाँ हैं, उनमें जो चौथी वासुदेव मूर्ति है, उसने अविनाशी शेषको उत्पन्न किया है ॥ ७२ ॥
स हि संकर्षणः प्रोक्तः प्रद्युम्नं सोऽप्यजीजनत् ।
प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽहं सर्गो मम पुनः पुनः ॥ ७३ ॥
‘उस शेषको ही संकर्षण कहा गया है। संकर्षणने प्रद्युम्नको प्रकट किया है और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका आविर्भाव हुआ है। वह सब मैं ही हूँ। बारंबार उत्पन्न होनेवाला यह सृष्टि विस्तार मेरा ही है ॥ ७३ ॥
अनिरुद्धात् तथा ब्रह्मा तन्नाभिकमलोद्भवः ।
ब्रह्मणः सर्वभूतानि चराणि स्थावराणि च ॥ ७४ ॥
‘मेरी अनिरुद्ध मूर्तिसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए हैं, जिनका प्राकट्य मेरे नाभिकमलसे हुआ है। ब्रह्मासे समस्त चराचर भूत उत्पन्न हुए हैं ॥ ७४ ॥
एतां सृष्टिं विजानीहि कल्पादिषु पुनः पुनः ।
यथा सूर्यस्य गगनादुदयास्तमने इह ॥ ७५ ॥
‘कल्पके आदिमें बारंबार इस सृष्टिको मैं प्रकट करता हूँ (और अन्तमें इसका संहार कर डालता हूँ)। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। जैसे आकाशसे सूर्यका उदय होता है और आकाशमें ही वह अस्त होता है—ये उदय-अस्तके क्रम सदा चलते रहते हैं (उसी प्रकार मुझसे ही जगत्की उत्पत्ति होती है और मुझमें ही उसका लय होता है। यह सृष्टि और संहारका क्रम यों ही चला करता है) ॥ ७५ ॥
नष्टे पुनर्बलात् काल आनयत्यमितद्युतिः ।
तथा बलादहं पृथ्वीं सर्वभूतहिताय वै ॥ ७६ ॥
‘जैसे अमिततेजस्वी काल सूर्यके अदृश्य होनेपर पुनः बलपूर्वक उसे दृष्टिपथमें ला देता है, उसी प्रकार मैं भी समस्त प्राणियोंके हितके लिये इस पृथ्वीको समुद्रके जलसे बलपूर्वक
ऊपर लाता हूँ' ।। ७६ ।।
(भीष्म उवाच
नारदस्त्वथ पप्रच्छ भगवन्तं जनार्दनम् ।
केषु केषु च भावेषु त्वं द्रष्टव्यो महाप्रभो ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर नारदजीने भगवान् जनार्दनसे पूछा—'महाप्रभो! किन-किन स्वरूपोंमें आपका दर्शन (और स्मरण) करना चाहिये? ।।
श्रीभगवानुवाच
शृणु नारद तत्त्वेन प्रादुर्भावान् महामुने ।
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहश्च वामनः ।।
रामो रामश्च रामश्च कृष्णः कल्की च ते दश ।
श्रीभगवान् बोले—महामुनि नारद! तुम मेरे अवतारोंके नाम सुनो—मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, बलराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि—ये दस अवतार हैं ।।
पूर्वं मीनो भविष्यामि स्थापयिष्याम्यहं प्रजाः ।।
लोकान् वेदान् धरिष्यामि मज्जमानान् महार्णवे ।
पहले मैं 'मत्स्य' रूपसे प्रकट होऊँगा और समस्त प्रजाको निर्भय अवस्थामें स्थापित करूँगा। महासागरमें डूबते हुए लोकों और वेदोंकी भी रक्षा करूँगा ।।
द्वितीयं कूर्मरूपं मे हेमकूटनिभं सुत ।।
मन्दरं धारयिष्यामि अमृतार्थे द्विजोत्तम ।
वत्स! मेरा दूसरा अवतार होगा कूर्म—कच्छप। उस समय मैं हेमकूट पर्वतके समान कच्छपरूप धारण करूँगा। द्विजश्रेष्ठ! जब देवता अमृतके लिये क्षीरसागरका मन्थन करेंगे, तब मैं अपनी पीठपर मन्दराचलको धारण करूँगा ।।
मग्नां महार्णवे घोरे भाराक्रान्तामिमं पुनः ।।)
सत्त्वैराक्रान्तसर्वाङ्गां नष्टां सागरमेखलाम् ।
आनयिष्यामि स्वस्थानं वाराहं रूपमास्थितः ।। ७७ ।।
हिरण्याक्षं वधिष्यामि दैतेयं बलगर्वितम् ।
जिसके सारे अंग प्राणियोंसे भरे हुए हैं तथा जो समुद्रसे घिरी हुई है, वही यह पृथ्वी जब भारी भारसे दबकर घोर महासागरमें निमग्न हो जायगी, उस समय मैं वाराहरूप धारण करके इसे पुनः अपने स्थानपर ला दूँगा। उसी समय बलके घमंडमें भरे हुए हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध कर डालूँगा ।। ७७ १/२ ।।
नारसिंहं वपुः कृत्वा हिरण्यकशिपुं पुनः ।। ७८ ।।
सुरकार्ये हनिष्यामि यज्ञघ्नं दितिनन्दनम् ।
तदनन्तर देवताओंके कार्यके लिये नरसिंहरूप धारण करके यज्ञनाशक दितिनन्दन हिरण्यकशिपुका संहार कर डालूँगा॥ ७८ १/२॥ विरोचनस्य बलवान् बलिः पुत्रो महासुरः॥ ७९॥ अवध्यः सर्वलोकानां सदेवासुररक्षसाम्। भविष्यति स शक्रं वा स्वराज्याच्च्यावयिष्यति॥ ८०॥ विरोचनके एक बलवान् पुत्र होगा, जो महासुर बलिके नामसे विख्यात होगा। उसे देवता, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण लोक भी नहीं मार सकेंगे। वह इन्द्रको राज्यसे भ्रष्ट कर देगा॥ ७९-८०॥ त्रैलोक्येऽपहृते तेन विमुखे च शचीपतौ। अदित्यां द्वादशादित्यः सम्भविष्यामि कश्यपात्॥ ८१॥ जब वह त्रिलोकीका अपहरण कर लेगा और शचीपति इन्द्र युद्धमें पीठ दिखाकर भाग जायेंगे, उस समय मैं कश्यपजीके अंश और अदितिके गर्भसे बारहवाँ आदित्य वामन बनकर प्रकट होऊँगा॥ ८१॥ (जटी गत्वा यज्ञसदः स्तूयमानो द्विजोत्तम। यज्ञस्तवं करिष्यामि श्रुत्वा प्रीतो भवेद् बलिः॥ द्विजश्रेष्ठ! उस समय सब लोग मेरी स्तुति करेंगे और मैं जटाधारी ब्रह्मचारीके रूपमें बलिके यज्ञमण्डपमें जाकर उसके उस यज्ञकी भूरि-भूरि प्रशंसा करूँगा, जिसे सुनकर बलि बहुत प्रसन्न होगा॥ किमिच्छसि वटो ब्रूहीत्युक्तो याचे महद् वरम्। दीयतां त्रिपदीमात्रमिति याचे महासुरम्॥ जब वह कहेगा कि 'ब्रह्मचारी ब्राह्मण! बताओ, क्या चाहते हो?' तब मैं उससे महान् वरकी याचना करूँगा। मैं उस महान् असुरसे कहूँगा कि 'मुझे तीन पग भूमिमात्र दे दो'॥ स दद्यान्मयि सम्प्रीतः प्रतिषिद्धश्च मन्त्रिभिः। यावज्जलं हस्तगतं त्रिभिर्विक्रमणैर्वृतम्॥) ततो राज्यं प्रदास्यामि शक्रायामिततेजसे। देवताः स्थापयिष्यामि स्वस्वस्थानेषु नारद॥ ८२॥ वह अपने मन्त्रियोंके मना करनेपर भी मुझपर प्रसन्न होनेके कारण वह वर मुझे दे देगा। ज्यों ही संकल्पका जल मेरे हाथपर आयेगा, त्यों ही तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापकर उसका सारा राज्य अमिततेजस्वी इन्द्रको समर्पित कर दूँगा। नारद! इस प्रकार मैं सम्पूर्ण देवताओंको अपने-अपने स्थानोंपर स्थापित कर दूँगा॥ बलिं चैव करिष्यामि पातालतलवासिनम्। दानवं च बलिं श्रेष्ठमवध्यं सर्वदैवतैः॥ ८३॥
साथ ही सम्पूर्ण देवताओंके लिये अवध्य श्रेष्ठ दानव बलिको भी पातालतलका निवासी बना दूँगा ॥
त्रेतायुगे भविष्यामि रामो भृगुकुलोद्भवः ।
क्षत्रं चोत्सादयिष्यामि समृद्धबलवाहनम् ॥ ८४ ॥
फिर त्रेतायुगमें भृगुकुलभूषण परशुरामके रूपमें प्रकट होऊँगा और सेना तथा सवारियोंसे सम्पन्न क्षत्रियकुलका संहार कर डालूँगा ॥ ८४ ॥
संध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च ।
अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः ॥ ८५ ॥
तदनन्तर जब त्रेता और द्वापरकी सन्ध्या उपस्थित होगी, उस समय मैं जगत्पति दशरथनन्दन रामके रूपमें अवतार लूँगा ॥ ८५ ॥
त्रितोपघाताद् वैरूप्यमेकतोऽथ द्वितस्तथा ।
प्राप्स्येते वानरत्वं हि प्रजापतिसुतावृषी ॥ ८६ ॥
त्रित नामक मुनिके साथ विश्वासघात करनेके कारण एकत और द्वित—ये दो प्रजापतिके पुत्र ऋषि विरूप वानरयोनिको प्राप्त होंगे ॥ ८६ ॥
तयोर्ये त्वन्वये जाता भविष्यन्ति वनौकसः ।
महाबला महावीर्याः शक्रतुल्यपराक्रमाः ॥ ८७ ॥
उन दोनोंके वंशमें जो वनवासी वानर जन्म लेंगे, वे महाबली, महापराक्रमी और इन्द्रके तुल्य पराक्रम प्रकट करनेमें समर्थ होंगे ॥ ८७ ॥
ते सहाया भविष्यन्ति सुरकार्ये मम द्विज ।
ततो रक्षःपतिं घोरं पुलस्त्यकुलपांसनम् ॥ ८८ ॥
हरिष्ये रावणं रौद्रं सगणं लोककण्टकम् ।
ब्रह्मन्! वे देवकार्यकी सिद्धिके लिये मेरे सहायक होंगे। तदनन्तर मैं पुलस्त्यकुलांगार भयंकर राक्षसराज रावणको, जो समस्त जगत्के लिये भयावह होगा, उसके गणोंसहित मार डालूँगा ॥ ८८ १/२ ॥
द्वापरस्य कलेश्चैव संधौ पार्यवसानिके ॥ ८९ ॥
प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मथुरायां भविष्यति ।
फिर द्वापर और कलिकी संधिका समय बीतते-बीतते कंसका वध करनेके लिये मथुरामें मेरा अवतार होगा ॥ ८९ १/२ ॥
(कंसं केशिं तथा कालमरिष्टं च महासुरम् ।
चाणूरं च महावीर्यं मुष्टिकं च महाबलम् ॥
प्रलम्बं धेनुकं चैव अरिष्टं वृषरूपिणम् ।
कालीयं च वशे कृत्वा यमुनाया महाह्रदे ॥
गोकुले तु ततः पश्चाद् गवार्थे तु महागिरिम् ।
सप्तरात्रं धरिष्यामि वर्षमाणे तु वासवे ॥
अपक्रान्ते ततो वर्षे गिरिमूर्धन्यवस्थितः ।
इन्द्रेण सह संवादं करिष्यामि तदा द्विज ॥)
उस समय कंस, केशी, कालासुर, महादैत्य अरिष्टासुर, महापराक्रमी चाणूर, महाबली मुष्टिक, प्रलम्ब, धेनुकासुर तथा वृषभरूपधारी अरिष्टको मारकर यमुनाके विशाल कुण्डमें स्थित कालियनागको वशमें करके गोकुलमें इन्द्रके वर्षा करते समय गौओंकी रक्षाके लिये महान् पर्वत गोवर्धनको सात दिन-रात अपने हाथसे छत्रकी भाँति धारण किये रहूँगा। ब्रह्मन्! जब वर्षा बन्द हो जायगी, तब पर्वतके शिखरपर आरूढ़ हो मैं इन्द्रके साथ संवाद करूँगा ॥
तत्राहं दानवान् हत्वा सुबहून् देवकण्टकान् ॥ ९० ॥
कुशस्थलीं करिष्यामि निवेशं द्वारकां पुरीम् ।
वहाँ मैं बहुत-से देवकण्टक दानवोंको मारकर कुशस्थलीको द्वारकापुरीके नामसे बसाऊँगा और उसीमें निवास करूँगा ॥ ९० १/२ ॥
वसानस्तत्र वै पुर्यामदितेर्विप्रियंकरम् ॥ ९१ ॥
हनिष्ये नरकं भौमं मुरं पीठं च दानवम् ।
प्राग्ज्योतिषं पुरं रम्यं नानाधनसमन्वितम् ॥ ९२ ॥
कुशस्थलीं नयिष्यामि हत्वा वै दानवोत्तमम् ।
वहाँ रहकर देवमाता अदितिका अप्रिय करनेवाले भूमिपुत्र नरकासुर, मुर तथा पीठ नामक दानवोंका संहार करूँगा एवं नाना प्रकारके धन-धान्यसे सम्पन्न जो प्राग्ज्योतिषपुर नामक रमणीय नगर है, वहाँ दानवराज नरकका वध करके उसका सारा वैभव कुशस्थलीमें पहुँचा दूँगा ॥ ९१-९२ १/२ ॥
(कृकलासं नृगं चैव मोचयिष्ये ह वै पुनः ॥
तत्र पौत्रनिमित्तेन गत्वा वै शोणितं पुरम् ।
बाणस्य च पुरं गत्वा करिष्ये कदनं महत् ॥)
गिरगिटकी योनिमें पड़े हुए राजा नृगका भी उद्धार करूँगा। उसी अवतारमें अपने पौत्र अनिरुद्धके निमित्त बाणासुरकी राजधानी शोणितपुरमें जाकर वहाँकी असुरसेनाका महान् संहार कर डालूँगा ॥
महेश्वरमहासेनौ बाणप्रियहितैषिणौ ॥ ९३ ॥
पराजेष्याम्यथोद्युक्तौ देवौ लोकनमस्कृतौ ।
बाणासुरका प्रिय और हित चाहनेवाले विश्व-वन्दित देवता भगवान् शंकर और कार्तिकेय भी जब मेरे साथ युद्धके लिये उद्यत होंगे, तब उन दोनोंको पराजित कर दूँगा ॥ ९३ १/२ ॥
ततः सुतं बलेर्जित्वा बाणं बाहुसहस्रिणम् ॥ ९४ ॥
विनाशयिष्यामि ततः सर्वान् सौभनिवासिनः । तदनन्तर सहस्र भुजाओंसे सुशोभित बलिपुत्र बाणासुरको पराजित करके शाल्वके सौभ विमानमें रहनेवाले समस्त योद्धाओंका विनाश कर डालूँगा ॥ ९४ १/२ ॥ यः कालयवनः ख्यातो गर्गतेजोऽभिसंवृतः ॥ ९५ ॥ भविष्यति वधस्तस्य मत्त एव द्विजोत्तम । द्विजोत्तम! गर्गाचार्यके तेजसे उत्पन्न होकर शक्तिशाली बना हुआ जो कालयवन नामक विख्यात असुर होगा, उसका वध भी मेरे ही द्वारा सम्भव होगा ॥ जरासंधश्च बलवान् सर्वराजविरोधनः ॥ ९६ ॥ भविष्यत्यसुरः स्फीतो भूमिपालो गिरिव्रजे । मम बुद्धिपरिस्पन्दाद् वधस्तस्य भविष्यति ॥ ९७ ॥ गिरिव्रजमें जरासंध नामक एक बहुत समृद्धिशाली और बलवान् असुर राजा होगा, जो सम्पूर्ण राजाओंसे वैर मोल लेता फिरेगा। मेरे ही बौद्धिक प्रयत्नसे उसका भी वध हो सकेगा ॥ ९६-९७ ॥ शिशुपालं वधिष्यामि यज्ञे धर्मसुतस्य वै । समागतेषु बलिषु पृथिव्यां सर्वराजसु ॥ ९८ ॥ धर्मपुत्र युधिष्ठिरके यज्ञमें भूमण्डलके समस्त बलवान् राजा पधारेंगे, उनके बीचमें मैं शिशुपालका वध कर डालूँगा ॥ ९८ ॥ वासविः सुसहायो वै मम त्वेको भविष्यति । युधिष्ठिरं स्थापयिष्ये स्वराज्ये भ्रातृभिः सह ॥ ९९ ॥ एकमात्र इन्द्रकुमार अर्जुन मेरा सखा एवं सुन्दर सहायक होगा। मैं राजा युधिष्ठिरको उनके भाइयोंसहित पुनः राजपदपर प्रतिष्ठित करूँगा ॥ ९९ ॥ एवं लोका वदिष्यन्ति नरनारायणावृषी । उद्युक्तौ दहतः क्षत्रं लोककार्यार्थमीश्वरौ ॥ १०० ॥ उस समयके लोग कहेंगे कि 'ये ईश्वररूप नर और नारायण नामक ऋषि ही एक साथ उद्यत हो लोकहितके लिये क्षत्रियजातिका संहार कर रहे हैं' ॥ कृत्वा भारावतरणं वसुधाया यथेप्सितम् । सर्वसात्वतमुख्यानां द्वारकायाश्च सत्तम ॥ १०१ ॥ करिष्ये प्रलयं घोरमात्मज्ञातिविनाशनम् । साधुशिरोमणे! पृथ्विदेवीकी इच्छाके अनुसार उसका भार उतारकर मैं द्वारकाके समस्त यादव-शिरोमणियोंका नाश करके अपनी जातिका विनाशरूप घोर कर्म करूँगा ॥ १०१ १/२ ॥ कर्माण्यपरिमेयाणि चतुर्मूर्तिधरो ह्यहम् ॥ १०२ ॥ कृत्वा लोकान् गमिष्यामि स्वानहं ब्रह्मसत्कृतान् ।
श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार स्वरूपोंको धारण करनेवाला मैं असंख्य कर्म करके ब्रह्माजीके द्वारा सम्मानित अपने धामको चला जाऊँगा ॥
हंसः कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोत्तम ॥ १०३ ॥
वराहो नरसिंहश्च वामनो राम एव च ।
रामो दाशरथिश्चैव सात्वतः कल्किरेव च ॥ १०४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! हंस, कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, दशरथनन्दन राम, यदुवंशी श्रीकृष्ण तथा कल्कि—ये सब मेरे अवतार हैं ॥ १०३-१०४ ॥
यदा वेदश्रुतिर्नष्टा मया प्रत्याहृता पुनः ।
सवेदाः सश्रुतीकाश्च कृताः पूर्वं कृते युगे ॥ १०५ ॥
जब-जब वेद-श्रुति लुप्त हुई है, तब-तब अवतार लेकर मैंने पुनः उसे प्रकाशमें ला दिया है। मैंने ही पहले सत्ययुगमें वेदोंसहित श्रुतियोंको प्रकट किया था ॥ १०५ ॥
अतिक्रान्ताः पुराणेषु श्रुतास्ते यदि वा क्वचित् ।
अतिक्रान्ताश्च बहवः प्रादुर्भावा ममोत्तमाः ॥ १०६ ॥
मेरे जो अवतार अबतक व्यतीत हो चुके हैं, उन्हें सम्भवतः तुमने पुराणोंमें सुना होगा। मेरे कई उत्तमोत्तम अवतार हो चुके हैं ॥ १०६ ॥
लोककार्याणि कृत्वा च पुनः स्वां प्रकृतिं गताः ।
न ह्येतद् ब्रह्मणा प्राप्तमीदृशं मम दर्शनम् ॥ १०७ ॥
यत् त्वया प्राप्तमद्येह एकान्तगतबुद्धिना ।
वे अवतार लोकहितके कार्य सम्पन्न करके पुनः अपने मूलस्वरूपमें मिल गये हैं। मुझमें अनन्य भक्ति रखनेके कारण आज तुमने यहाँ जिस स्वरूपका दर्शन पाया है, मेरे ऐसे स्वरूपका दर्शन अबतक ब्रह्माको भी नहीं प्राप्त हो सका है ॥ १०७ १/२ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं ब्रह्मन् भक्तिमतो मया ॥ १०८ ॥
पुराणं च भविष्यं च सरहस्यं च सत्तम ।
ब्रह्मन्! साधुप्रवर! तुम मुझमें भक्तिभाव रखनेवाले हो, इसलिये मैंने तुमसे भूत और भविष्यके सारे अवतारोंका रहस्यसहित वर्णन किया है ॥ १०८ १/२ ॥
भीष्म उवाच
एवं स भगवान् देवो विश्वमूर्तिधरोऽव्ययः ॥ १०९ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं तत्रैवान्तर्दधे पुनः ।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! विश्वरूपधारी अविनाशी भगवान् नारायणदेव इतनी बात कहकर वहीं पुनः अन्तर्धान हो गये ॥ १०९ १/२ ॥
नारदोऽपि महातेजाः प्राप्यानुग्रहमीप्सितम् ॥ ११० ॥
नरनारायणौ द्रष्टुं बदर्याश्रममाद्रवत् ।
तब महातेजस्वी नारदजी भी भगवान्का मनोवाञ्छित अनुग्रह पाकर नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये बदरिकाश्रमकी ओर चल दिये ।। ११० १/२ ।।
इदं महोपनिषदं चतुर्वेदसमन्वितम् ।। १११ ।।
सांख्ययोगकृतं तेन पञ्चरात्रानुशब्दितम् ।
नारायणमुखोद्गीतं नारदोऽश्रावयत् पुनः ।। ११२ ।।
ब्रह्मणः सदने तात यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।
यह महान् उपनिषद् (ज्ञान) चारों वेदोंके विज्ञानसे सम्पन्न है। इसमें सांख्य और योगका सिद्धान्त कूट-कूटकर भरा है। इसकी पांचरात्र आगमके नामसे प्रसिद्धि है। साक्षात् नारायणके मुखसे इसका गान हुआ है। तात! इस विषयको नारदजीने श्वेतद्वीपमें जैसा देखा और सुना था, वैसा ही ब्रह्माजीके भवनमें सुनाया था ।।
युधिष्ठिर उवाच
एतदाश्चर्यभूतं हि माहात्म्यं तस्य धीमतः ।। ११३ ।।
किं वै ब्रह्मा न जानीते यतः शुश्राव नारदात् ।
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! बुद्धिमान् नारायण-देवका माहात्म्य तो बड़ा ही आश्चर्यमय है। क्या ब्रह्माजी इसे नहीं जानते थे कि नारदजीके मुखसे इसका श्रवण किया? ।। ११३ १/२ ।।
पितामहोऽपि भगवांस्तस्माद् देवादनन्तरः ।। ११४ ।।
कथं स न विजानीयात् प्रभावममितौजसः ।
भगवान् ब्रह्मा तो उन्हीं नारायणसे प्रकट हुए हैं। फिर वे उन महातेजस्वी नारायणका प्रभाव कैसे नहीं जानते होंगे? ।। ११४ १/२ ।।
भीष्म उवाच
महाकल्पसहस्राणि महाकल्पशतानि च ।। ११५ ।।
समतीतानि राजेन्द्र सर्गाश्च प्रलयाश्च ह ।
सर्गस्यादौ स्मृतो ब्रह्मा प्रजासर्गकरः प्रभुः ।। ११६ ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजेन्द्र! अबतक सैकड़ों और हजारों महाकल्प बीत चुके हैं, कितने ही सर्ग और प्रलय समाप्त हो चुके हैं। सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजी ही प्रजावर्गके सृष्टिकर्ता माने गये हैं ।। ११५-११६ ।।
जानाति देवप्रवरं भूयश्चातोऽधिकं नृप ।
परमात्मानमीशानमात्मनः प्रभवं तथा ।। ११७ ।।
नरेश्वर! वे अपनी उत्पत्तिके कारणभूत देवप्रवर नारायणको इससे भी अधिक जानते हैं। उन्हें सर्वेश्वर और परमात्मा समझते हैं ।। ११७ ।।
ये त्वन्ये ब्रह्मसदने सिद्धसंघाः समागताः ।
तेभ्यस्तच्छावयामास पुराणं वेदसम्मितम् ॥ ११८ ॥ ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके अलावा जो दूसरे-दूसरे सिद्धसमुदाय निवास करते हैं, उनके लिये नारदजीने यह वेदतुल्य पुरातन पांचरात्र सुनाया था ॥ ११८ ॥ तेषां सकाशात् सूर्यस्तु श्रुत्वा वै भावितात्मनाम् । आत्मानुगामिनां राजन् श्रावयामास वै ततः ॥ ११९ ॥ षट् षष्टिर्हि सहस्राणि ऋषीणां भावितात्मनाम् । सूर्यस्य तपतो लोकान् निर्मिता ये पुरः सराः ॥ १२० ॥ तेषामकथयत् सूर्यः सर्वेषां भावितात्मनाम् । पवित्र अन्तःकरणवाले उन सिद्धोंके मुखसे भगवान् सूर्यने इस माहात्म्यको सुना। राजन्! सूर्यने सुनकर अपने पीछे चलनेवाले साठ हजार भावितात्मा मुनियोंको इसका श्रवण कराया। लोकमें तपते हुए सूर्यके आगे चलनेके लिये जिन ऋषियोंकी सृष्टि हुई है, उन भावितात्माओंको भी सूर्यदेवने भगवान्की यह महिमा सुनायी थी ॥ ११९-१२० १/२ ॥ सूर्यानुगामिभिस्तात ऋषिभिस्तैर्महात्मभिः ॥ १२१ ॥ मेरौ समागता देवाः श्राविताश्चेदमुत्तमम् । तात! सूर्यदेवका अनुसरण करनेवाले उन महात्मा ऋषियोंने मेरुपर्वतपर आये हुए देवताओंको वह उत्तम माहात्म्य सुनाया था ॥ १२१ १/२ ॥ देवानां तु सकाशाद् वै ततः श्रुत्वासितो द्विजः ॥ १२२ ॥ श्रावयामास राजेन्द्र पितॄणां मुनिसत्तमः । राजेन्द्र! मुनिश्रेष्ठ ब्राह्मण असितने देवताओंके मुखसे उस माहात्म्यको सुनकर पितरोंको सुनाया ॥ १२२ १/२ ॥ (एवं परम्पराख्यातमिदं शान्तनुमाश्रितम् ।) मम चापि पिता तात कथयामास शान्तनुः ॥ १२३ ॥ इस प्रकार परम्परा प्राप्त होकर यह उत्तम ज्ञान महाराज शान्तनुको मिला। तात! फिर पिता शान्तनुने मुझे इसका उपदेश दिया ॥ १२३ ॥ ततो मयापि श्रुत्वा च कीर्तितं तव भारत । सुरैर्वा मुनिभिर्वापि पुराणं यैरिदं श्रुतम् ॥ १२४ ॥ सर्वे ते परमात्मानं पूजयन्ते समन्ततः । भरतनन्दन! पिताजीके मुखसे इस प्रसंगको सुनकर मैंने अब तुमसे इसका वर्णन किया है। देवताओं, मुनियों अथवा जिन लोगोंने भी इस पुरातन ज्ञानको सुना है, वे सभी सब ओर परमात्माका पूजन करते हैं ॥ १२४ १/२ ॥ इदमाख्यानमार्षेयं पारम्पर्यागतं नृप ॥ १२५ ॥ नावासुदेवभक्ताय त्वया देयं कथंचन ।
नरेश्वर! इस प्रकार यह ऋषिसम्बन्धी आख्यान परम्परासे प्राप्त हुआ है। जो भगवान् वासुदेवका भक्त न हो, उसे किसी तरह भी इसका उपदेश तुम्हें नहीं देना चाहिये ॥ १२५ १/२ ॥
(आख्यानमुत्तमं चेदं श्रावयेद् यः सदा नृप । तदैव मनुजो भक्तः शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥ प्राप्नुयादचिराद् राजन् विष्णुलोकं सनातनम् ।) नरेश्वर! जो मनुष्य सदा इस उत्तम उपाख्यानको सुनायेगा, वह भक्त मनुष्य पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर शीघ्र ही भगवान् विष्णुके सनातनलोकको प्राप्त होगा ॥ मत्तोऽन्यानि च ते राजन्नुपाख्यानशतानि वै ॥ १२६ ॥ यानि श्रुतानि सर्वाणि तेषां सारोऽयमुद्धृतः । राजन्! तुमने मुझसे जो अन्य सैकड़ों उपाख्यान सुने हैं, उन सबका यह सारभाग निकालकर तुम्हारे सामने रखा गया है ॥ १२६ १/२ ॥ सुरासुरैर्यथा राजन् निर्मथ्यामृतमुद्धृतम् ॥ १२७ ॥ एवमेतत् पुरा विप्रैः कथामृतमिहोद्धृतम् । युधिष्ठिर! जैसे देवताओं और असुरोंने समुद्रको मथकर उससे अमृत निकाला था, उसी प्रकार प्राचीनकालमें ब्राह्मणोंने सारे शास्त्रोंको मथकर इस अमृतमयी कथाको यहाँ प्रकाशित किया ॥ १२७ १/२ ॥ यश्चेदं पठते नित्यं यश्चेदं शृणुयान्नरः ॥ १२८ ॥ एकान्तभावोपगत एकान्तेषु समाहितः । प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं भूत्वा चन्द्रप्रभो नरः ॥ १२९ ॥ स सहस्रार्चिषं देवं प्रविशेन्नात्र संशयः । जो मनुष्य प्रतिदिन इसका पाठ करेगा और जो इसे सदा सुनेगा, वह भगवान्के प्रति अनन्यभावको प्राप्त होकर उनके अनन्य भक्तोंमें एकाग्रचित्तसे अनुरक्त हो श्वेत नामक महाद्वीपमें पहुँच जायगा और वह मनुष्य चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रूप धारण करके उन सहस्रों किरणोंवाले भगवान् नारायणदेवमें प्रवेश करेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १२८-१२९ १/२ ॥ मुच्येदार्र्तस्तथा रोगाच्छ्रुत्वेमामादितः कथाम् ॥ १३० ॥ जिज्ञासुर्लभते कामान् भक्तो भक्तगतिं व्रजेत् । इस कथाको आदिसे ही सुनकर रोगी रोगसे मुक्त हो जायगा, जिज्ञासु पुरुषको इच्छानुसार ज्ञान प्राप्त होगा और भक्त पुरुष भक्तजनोचित गतिको प्राप्त होगा ॥ त्वयापि सततं राजन्नभ्यर्च्यः पुरुषोत्तमः ॥ १३१ ॥ स हि माता पिता चैव कृत्स्नस्य जगतो गुरुः ।
राजन्! तुम्हें भी सदा ही भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वे ही सम्पूर्ण जगत्के माता, पिता और गुरु हैं ॥ १३१ १/२ ॥
ब्रह्मण्यदेवो भगवान् प्रीयतां ते सनातनः ॥ १३२ ॥
युधिष्ठिर महाबाहो महाबुद्धिर्जनार्दनः ।
महाबाहु युधिष्ठिर! ब्राह्मणहितैषी परम बुद्धिमान् सनातन पुरुष भगवान् जनार्दनदेव तुमपर सदा प्रसन्न रहें ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैतदाख्यानवरं धर्मराड् जनमेजय ॥ १३३ ॥
भ्रातरश्चास्य ते सर्वे नारायणपराऽभवन् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस उत्तम उपाख्यानको सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर और उनके सभी भाई भगवान् नारायणके परम भक्त हो गये ॥ १३३ १/२ ॥
जितं भगवता तेन पुरुषेणेति भारत ॥ १३४ ॥
नित्यं जप्यपरा भूत्वा सरस्वतीमुदीरयन् ।
भरतनन्दन! वे नित्यप्रति भगवन्नामके जपमें तत्पर होकर 'भगवान् पुरुषोत्तमकी जय हो' ऐसी वाणी बोला करते थे ॥ १३४ १/२ ॥
यो ह्यस्माकं गुरुश्रेष्ठः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ १३५ ॥
जगौ परमकं जप्यं नारायणमुदीरयन् ।
जो हमारे परमगुरु मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हैं, वे भी परम उत्तम नारायणमन्त्रका जप करते हुए निरन्तर उनकी महिमाका गान करते रहते हैं ॥ १३५ १/२ ॥
गत्वान्तरिक्षात् सततं क्षीरोदममृताशयम् ॥ १३६ ॥
पूजयित्वा च देवेशं पुनरायात् स्वमाश्रमम् ।
व्यासजी सदा ही आकाशमार्गसे अमृतनिधि क्षीर-सागरके तटपर जाकर देवेश्वर श्रीहरिकी पूजा करनेके पश्चात् पुनः अपने आश्रमपर लौट आते हैं ॥ १३६ १/२ ॥
भीष्म उवाच
एतत् ते सर्वमाख्यातं नारदोक्तं मयेरितम् ॥ १३७ ॥
पारम्पर्यागतं ह्येतत् पित्रा मे कथितं पुरा ।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नारदजीका कहा हुआ यह सारा उपाख्यान मैंने तुमसे कह सुनाया। यह पूर्वपरम्परासे पहले मेरे पिताजीको प्राप्त हुआ। फिर पिताजीने मुझसे कहा था ॥ १३७ १/२ ॥
सौतिरुवाच
एतत् ते सर्वमाख्यातं वैशम्पायन कीर्तितम् ॥ १३८ ॥