महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
७४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् यह सुन्दर मेखला मेरे लिए कल्याणकारिणी हो। तब मौन होकर बालक गुरु के सामने खड़ा हो (१६४)। अब गुरु निम्न मन्त्र को पढ़कर बालक को कृष्णाजिन से युक्त यज्ञोपवीत और वेणु या खदिर या पलाश या क्षीर-वृक्ष की लकड़ी से बना दण्ड प्रदान करे- यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, बृहस्पतिर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्र्यं प्रति-मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ अर्थात् यह यज्ञोपवीत परम पवित्र है, जो पूर्व काल में वृहस्पति का स्वाभाविक था। आयुष्यकर, श्रेष्ठ, शुभ्र इस यज्ञोपवीत को तुम धारण करो। तुम्हारे बल ओर तेज की वृद्धि हो (१६५-१६६)। इसके बाद दण्ड और उपवीत-धारी बालक को गुरु 'ह्रीं आपोहिष्ठा ह्रीं' मन्त्र का तीन बार उच्चारण कर कुश-जल द्वारा अभिषिक्त कर जल से बालक की अञ्जलि को पूर्ण करें (१६७)। फिर ब्रह्मचारी उसी जलाञ्जलि से सूर्य के लिए अर्घ्य प्रदान करे। तब गुरु 'तच्चक्षुर्देव-हितं' मन्त्र का पाठ करते हुए शिष्य को सूर्य का दर्शन कराये (१६८)। सूर्य का दर्शन कर चुकने पर बालक से गुरु कहे- मम व्रते मनो धेहि, मम चित्तं ददामि ते । जुषष्वैक-मना वत्स ! मम वाचोऽस्तु ते शिवम् । अर्थात् तुम मेरे व्रत में मन लगाओ। मैं तुम्हें अपना चित्त देता हूँ। हे पुत्र ! तुम एक-मन होकर मेरे व्रत का आचरण करो। मेरी वाणी से तुम्हारा कल्याण हो (१६६)। इस मन्त्र को पढ़कर गुरु बालक के हृदय को छूकर उससे पूछे- ‘किं नामासि ?' अर्थात् तुम्हारा नाम क्या है ? उत्तर में शिष्य कहे- ‘अमुक-शर्माऽहं भवन्तमभिवादये ।' अर्थात् मैं अमुक शर्मा आपको प्रणाम करता हूँ (२००)। हे पार्वति ! तब गुरु यह पूछे- ‘कस्य त्वं ब्रह्मचारी ?’ अर्थात् तुम किसके ब्रह्मचारो हो ? शिष्य सावधान होकर उत्तर दे- ‘भवतो ब्रह्मचार्यहम् ।' अर्थात् मैं आपका ब्रह्मचारी हूँ (२०१)। इस पर सद्गुरु कहें- ‘इन्द्रस्य ब्रह्मचारी त्वमाचार्यस्ते हुताशनः ।' अर्थात् तुम इन्द्र के ब्रह्मचारी हो, तुम्हारे आचार्य हुताशन हैं। ऐसा कहकर सद्गुरु निम्न मन्त्र पढ़कर शिष्य को देवताओं के निकट समर्पित करे- त्वां प्रजापतये वत्स ! सवित्रे वरुणाय च, पृथिव्यै विश्व-देवेभ्यः सर्व-देवेभ्य एव च । समर्पयामि ते सर्वे रक्षन्तु त्वां निरन्तरम् ।
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार । ७५ अर्थात् हे पुत्र ! तुमको प्रजापति के लिए, सविता के लिए, वरुण के लिए, पृथिवी के लिए, विश्वदेवों के लिए, सब देवों के लिए समर्पित करता हूँ। वे सब तुम्हारी निरन्तर रक्षा करें (२०३)। इसके बाद माणवक (ब्रह्मचारी) दक्षिणावर्त्त-क्रम से अग्नि की ओर गुरु की प्रदक्षिणा कर पुनः अपने आसन पर बैठे (२०४)। हे प्रिये ! तब गुरु शिष्य द्वारा स्पृष्ट होकर 'समुद्भव' नामक अग्नि में पञ्च-देवों को पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (२०५)। पञ्च-देव हैं—१. प्रजापति, २. शक्र, ३. विष्णु, ४. ब्रह्मा, ५. शिव (२०६) । पञ्च-देवों में से प्रत्येक के नाम के आदि में माया अर्थात् 'ह्रीं' और अन्त में वह्नि-जाया अर्थात् 'स्वाहा' लगाकर आहुति दे । यथा— ह्रीं प्रजापतये स्वाहा, ह्रीं शक्राये स्वाहा, ह्रीं विष्णवे स्वाहा, ह्रीं ब्रह्मणे स्वाहा, ह्रीं शिवाय स्वाहा इसी प्रकार, जिस मन्त्र की कोई विधि न कही हो, उसके आदि में 'ह्रीं' और अन्त में स्वाहा कहे। (२०७) । इसके बाद दुर्गा, महालक्ष्मी, सुन्दरी, भुवनेश्वरी, इन्द्रादि दश दिक्-पाल, सूर्यादि नव-ग्रह—इनमें से प्रत्येक का नामोल्लेख कर आहुति दे। फिर बालक को वस्त्र से आच्छादित कर गुरु ब्रह्मचर्याभिमानी उस माण- वक से पूछे— 'को वाश्रमस्ते तनय ! ब्रूहि किं ते मनोगतम् ?' अर्थात् हे पुत्र ! तुम्हारा आश्रम क्या है ? तुम्हारा मनोगत भाव क्या है ? बोलो (२०८-२०६)। इस पर शिष्य सावधान होकर गुरु के दोनों चरणों को पकड़ कर कहे— 'करोतु मामा श्रमणं ब्रह्म-विद्योपदेशतः ।' अर्थात् ब्रह्म-विद्या का उपदेश देकर मुझे आश्रमी बनाइए । हे शिवे ! इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले शिष्य के दाएँ कान में गुरु सर्व-मन्त्र-मय प्रणव (ॐ) को तीन बार सुनाकर 'भूर्भुवः स्वः' इन तीन व्याहृतियों का उच्चारण कर गायत्री को सुनाए (२१०-२११)। यथा— सदाशिव इस सावित्री के ऋषि कहे गए हैं। त्रिष्टुप् छन्द है। सावित्री अधिष्ठात्री देवी कही गई हैं। मोक्षार्थ विनियोग है (२१२)। पहले 'तत् सवितुः,' फिर 'वरेण्यं' इस पद का उच्चारण करे। तब 'भर्ग' इस पद के बाद 'देवस्य धीमहि' इस पद का पाठ करे (२१३)। हे परमेश्वरि ! उसके बाद 'धियो योनः प्रचोदयात्' और पुनः प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर गुरु शिष्य को गायत्री का अर्थ बताए (२१४)। यथा— त्र्यक्षरात्मक 'प्रणव' (ॐ) द्वारा परमेश्वर का प्रतिपादन होता है। सृष्टि-स्थिति-प्रलय-कर्त्ता जो देव प्रकृति से भी श्रेष्ठ है (२१५), वही देव त्रिलोक की आत्मा है। वह त्रिगुण अर्थात् सत्व, रज और तम को व्याप्त करके वर्तमान है, अतः 'भूर्भुवः स्वः' इन तीन व्याहृतियों का वाच्य ब्रह्म है (२१६)। जो प्रणव और व्याहृति का वाच्य है, सावित्री द्वारा उसी ज्ञेय सविता अर्थात् जगद्-रूप वस्तु के सृष्टि-कर्त्ता, दीप्त्यादि क्रियाओं के आश्रय विभु के अन्तर्गत योगियों के वरणीय, सर्व-व्यापी और सनातन उसी महाज्योति का ध्यान करता हूँ (२१७- २१८) । यह महा-ज्योति सबकी साक्षी और ईश्वर है। हम सबकी मन, बुद्धि, सभी इन्द्रियों को धर्म-अर्थ-काम- मोक्ष में प्रेरित करो अर्थात् नियोजित करो (२१६)। हे देवि ! सद्गुरु इसी प्रकार अर्थ-सहित ब्रह्म-विद्या का उपदेश कर शिष्य को गृहस्थाश्रम के कर्म में नियुक्त करे (२२०) । यथा— ब्रह्मचर्योचितं वेषं वत्सेदानीं परित्यज । शाम्भवोदित-मार्गेण देवान् पितॄन् समर्चय । ब्रह्म-विद्योपदेशेन पवित्रं ते कलेवरम् । प्राप्तां गृहस्थाश्रमिता तदुक्तं कर्म कल्पय ॥
७६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र उपवीत-द्वयं दिव्य-वस्त्रादलङ्करणानि च । गृहाण पादुका-छत्रं गन्ध-माल्यानुलेपनम् ॥ अर्थात् हे पुत्र ! अब ब्रह्मचर्योचित वेश को छोड़ो। शम्भु द्वारा दर्शित मार्ग के अनुसार देवों और पितरों का अर्चन करो (२२१) । ब्रह्म-विद्या के उपदेश से तुम्हारा शरीर पवित्र हो गया है । तुम गृहस्थाश्रम को प्राप्त हुए हो । अतः तुम उसके निर्दिष्ट कर्म करो (२२२) । दो उपवीत, दो दिव्य वस्त्र, अलङ्कार, पादुका, छत्र, गन्ध, माला और अनुलेपन ग्रहण करो (२२३) । तदनन्तर शिष्य कृष्णाजिन से युक्त कषाय वस्त्र, यज्ञ-सूत्र, मेखला, दण्ड, भिक्षा-पात्र और आचार के अनुसार उपार्जित भिक्षा को गुरु को समर्पित कर शुद्ध दो यज्ञोपवीत और उत्तम दो वस्त्रों को पहनकर गन्ध तथा माला धारण कर आचार्य के पास मौन होकर बैठे । आचार्य गृहस्थाश्रमो से यह कहे (२२४-२२६)— जितेन्द्रियः सत्य-वादी ब्रह्म-ज्ञान-परो भव । स्वाध्यायाऽऽश्रम-कर्माणि यथा-धर्मेण साधय ॥ अर्थात् तुम जितेन्द्रिय, सत्य-वादी और ब्रह्म-ज्ञान में तत्पर होओ। धर्मशास्त्र का लंघन न कर अध्ययन करो और गृहस्थाश्रम के सब कर्मों का पालन करो (२२७) । द्विज शिष्य को गुरु इस प्रकार आदेश देकर पहले माया (ह्रीं) और सबसे अन्त में प्रणव (ॐ) का उच्चारण करते हुए 'भूः भुवः स्वः' इन तीन मन्त्रों द्वारा 'समुद्भव' नामक अग्नि में तोन बार होम कराकर स्विष्टिकृत होम कर हे भद्रे ! पूर्णाहुति देने के बाद 'उपनयन'-क्रिया को समाप्त करे (२२८-२२६) । हे प्रिये ! जीव-सेक से लेकर उपनयन तक के नौ संस्कार पिता द्वारा हो सम्पन्न हो सकते हैं । 'उद्वाह- संस्कार' पिता अथवा स्वयं करे (२३०) । कार्य-कुशल व्यक्ति विवाह के दिन स्नान के बाद नित्य-क्रिया करके पञ्च-देवों की पूजा कर गौरी आदि १६ मातृकाओं का पूजन करे । फिर वसुधारा देकर वृद्धि-श्राद्ध करे (२३१) । पहले से निश्चित वर-पात्र के गीत-वाद्य के साथ निशा-काल में आने पर उसे छाया-मण्डप में लाकर वर के आसन पर पूर्वाभिमुख करके बैठाए (२३२) । दाता पश्चिमाभिमुख होकर बैठे । कन्या-दाता पहले आचमन कर ब्राह्मणों के साथ स्वस्ति और ऋद्धि का पाठ करे (२३३) । फिर कन्या-दाता वर से कुशल-प्रश्न और अर्चना-प्रश्न करके प्रश्न का उत्तर लेकर पाद्यादि द्वारा वर का अर्चन करे (२३४) । 'समर्पयामि' शब्द द्वारा देय द्रव्य प्रदान करे । दोनों चरणों में पाद्य और मस्तक पर अर्घ्य समर्पित करे (२३५) । मुख में आचमनीय देकर उत्तम दो वस्त्र, गन्ध, माल्य, उत्तम आभूषण, रत्न और यज्ञ-सूत्र समर्पित करे (२३६) । फिर कांस्य-पात्र में दधि, घृत और मधु रखकर इसे 'मधुपर्कं समर्पयामि' कहकर हाथ में प्रदान करे (२३७) । वर भी उस मधु- पर्क-पात्र को लेकर बाएँ हाथ में रखकर प्राणाहुति-मन्त्र 'प्राणाय स्वाहा' इत्यादि को पढ़कर दाएँ हाथ के अँगूठे और अनामिका द्वारा पाँच बार सूँघ कर उस पात्र को उत्तर दिशा में रख दे । इस प्रकार मधुपर्क समर्पित कर वर को पुनः आचमन कराए (२३८-३६) । तब दूर्वा और आतप-तण्डुल हाथ में लेकर जामाता के दाएँ जानु को पकड़कर विष्णु को स्मरण करते हुए 'तत् सत्' इस वाक्य का उच्चारण कर मास, पक्ष, और तिथि का उल्लेख कर वर के प्रपितामह से पिता तक के प्रत्येक के गोत्र-प्रवर-सहित षष्ठ्यन्त नाम का उच्चारण और इसी प्रकार गोत्र-प्रवरादि-सहित द्वितीयान्त वर के नाम का उल्लेख कर उत्तम वर का वरण करे (२४०) । फिर इसी प्रकार कन्या के प्रपितामह से पिता तक के तीन पुरुषों के षष्ठ्यन्त नाम, गोत्र और प्रवर के सहित उच्चा- रण कर इसी प्रकार गोत्र-प्रवर-सहित द्वितीयान्त कन्या-नाम का उल्लेख कर कन्या-दाता कहे (२४१-४२)— 'ब्राह्मोद्वाहेन दातुं भवन्तं वृणेऽहम् ।' अर्थात् ब्राह्म विवाह द्वारा कन्या-दान करने के लिए मैं तुम्हारा वरण करता हूँ (२४३) ।
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ७७ इसके बाद वर कहे— 'वृतोऽस्मि ।' अर्थात् 'मैं वृत होता हूँ।' फिर कन्या-दाता वर से कहे— 'यथा-विहितं विवाह-कर्म कुरु ।' अर्थात् 'विधि के अनुसार विवाह का कर्म करो।' उत्तर में वर कहे— 'यथा-ज्ञानं करवाणि ।' अर्थात् मुझे जैसा ज्ञान है, उसी के अनुसार करता हूँ (२४४)। तत्र वस्त्र और अलङ्कार से विभूषित कन्या को लाकर अन्य वस्त्र द्वारा आच्छादित करे। उसे वर के सम्मुख बैठाए (२४५)। फिर कन्या-दाता पुनः वस्त्र और अलंकार आदि द्वारा वर की पूजा कर वर के दाएँ हाथ में कन्या का हाथ रखे (२४६)। उसी हाथ के मध्य में फल, ताम्बूल और पञ्च-रत्न देकर पूजाकर वर को कन्या समर्पित करे (२४७)। समर्पण करते समय पहले अपनी कामना का उल्लेख कर तीन पुरुषों के नामो- ल्लेख-पूर्वक कारण का वर्णन कर चतुर्थी-विभक्ति वर के नाम के अन्त में लगाकर उसका उच्चारण करे (२४८)। तब तीन पुरुषों के नामोल्लेख पूर्वक कन्या के द्वितीयान्त नाम के बाद निम्न पद का उच्चारण करे— 'अर्चितां समलंकृतां साच्छादनां प्रजापति-देवताकां तुभ्यमहं सम्प्रददे ।' और कन्या-दान करे। वर उत्तर में 'स्वस्ति' कह कर कन्या को ग्रहण करे। कन्या-दाता वर से कहे (२४६)— 'धर्मे चार्थे च कामे च भवता भार्यया सह वर्त्तितव्यं ।' अर्थात् तुम धर्म, अर्थ और काम के विषयों में भार्या के साथ मिलकर कार्य करना । वर उत्तर दे—'वाढं वर्त्तितव्यम्' अर्थात् मैं ऐसा ही करूँगा । फिर काम-स्तुति का पाठ करे (२५०-५१)— दाता कामो गृहीताऽपि कामायाऽदाच्च कामिनीम् । कामेन त्वां प्रगृह्णामि कामः पूर्णोऽस्तु चावयोः ॥ अर्थात् काम सम्प्रदान करता है ; काम ही प्रतिग्रह करता है, काम ही काम-हेतु कामिनी को ग्रहण करता है। हे भार्ये ! मैं काम-जन्य तुम्हे ग्रहण करता हूँ हम दोनों के काम पूर्ण हों (२५२)। अब कन्या-दाता कन्या और जामाता से कहे— प्रजापति-प्रसादेन युवयोरभि-वाञ्छितम् । पूर्णमस्तु शिवं चास्तु धर्मं पालयतां युवाम् ॥ अर्थात् प्रजापति के प्रसाद से तुम दोनों का अभीष्ट पूरा हो और तुम दोनों का कल्याण हो; तुम दोनों एकत्र होकर धर्म का पालन करो (२५३) । इसके बाद दाता मङ्गल गीत, वाद्य, शंख आदि की ध्वनि करते हुए कन्या और वर को वस्त्र से आच्छा- दित कर परस्पर शुभ-दृष्टि कराए (२५४)। फिर जामाता को यथा-शक्ति स्वर्ण और रत्न की दक्षिणा देकर अच्छिद्रावधारण करे (२५५) । तब उसी रात्रि में या अगले दिन वर को भार्या के साथ कर कुशण्डिकोक्त विधि से अग्नि-स्थापन करे (२५६) । इस स्थल में 'योजक' नाम वह्नि और 'प्राजापत्य' नामक चरु निर्दिष्ट है। वर धारा-होम तक सारा कार्य कर पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (२५७) । शिव, दुर्गा, विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र—इन पंच-देवताओं का ध्यान कर प्रत्येक के लिए एक-एक आहुति संस्कृत अग्नि में दे (२५८) । फिर निम्न मन्त्र पढ़ेते
७८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र हुए वर भार्या के दोनों हाथों को पकड़े— पाणिं गृह्णामि सुभगे ! गुरु-देव-रता भव । गार्हस्थ्यं कर्म धर्मेण यथावदनुशीलय ॥ अर्थात् हे सुभगे ! मैं तुम्हारा पाणिग्रहण करता हूँ । तुम गुरु और देवता की भक्त होकर धर्मानुसार यथा- विधि गृहस्थी के कार्य करो (२५९) । हे शिवे ! तब वधू स्वामी द्वारा दिए घृत और भाई द्वारा दिए लाज (लावा) से प्रजापति के लिए चार बार आहुति प्रदान करे (२६०) । फिर वर भार्या के साथ खड़े होकर अग्नि की प्रदक्षिणा करे और दुर्गा-शिव, लक्ष्मी-विष्णु तथा ब्राह्मी-ब्रह्मा—इन दम्पतियों में से प्रत्येक दम्पति के लिए तीन-तीन आहुतियाँ प्रदान करे (२६१) । इसके बाद शिलारोहण और सप्त पद-गमन करे। यदि विवाह की रात्रि में ही कुशाण्डिका हो, तो वर- वधू स्त्रियों के साथ होकर अरुन्धती का दर्शन करें (२६२)। फिर लौटकर वर आसन पर यथाविधि बैठकर स्विष्टकृत होम से लेकर पूर्णाहुति तक समस्त कार्य समाप्त करे (२६३) । भिन्न-गोत्रा, असपिण्डा, सवर्णा के साथ कुल-धर्म के अनुसार ब्राह्म-विवाह करना निर्दोष है (२६४) । जो भार्या ब्राह्म-विवाह द्वारा परिणीता है, वही गृहेश्वरी होती है। इस पत्नी की अनुमति के बिना कोई व्यक्ति पुनः ब्राह्म-विवाह नहीं कर सकता (२६५) । हे कुलेश्वरि ! ब्राह्म-विवाह से विवाहिता पत्नी के गर्भ से उत्पन्न सन्तान या उसके वंश का कोई विद्यमान हो, तो शैव विवाह से विवाहिता भार्या के गर्भ से उत्पन्न सन्तान धन की अधिकारी नहीं हो सकती (२६६) । हे परमेश्वरि ! शैव विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री के गर्भ से उत्पन्न सन्तान या उसके वंश की सन्तानें धनाधिकारी व्यक्ति की सम्पत्ति के अनुसार उससे भोजन-वस्त्र पा सकती हैं (२६७) । शैव विवाह के दो प्रकार हैं। 'कुल-चक्र' में यह विवाह हो सकता है। चक्र के नियमानुसार एक प्रकार है और यावज्जीवन स्थायी विवाह दूसरा प्रकार है (२६८) । चक्रानुष्ठान के समय वीराचारी एकाग्र-चित्त हो शक्ति-साधकों और स्वजनों के बीच परस्पर इच्छा से विवाह करें (२६९) । इसके लिए भैरवियों और वीराचारी साधकों से अपना मनोरथ निवेदन करे। यथा— 'आवयोः शाम्भवोद्वाहे भवद्भिरनुमन्यताम् ।' अर्थात् हम दोनों के शैव विवाह के सम्बन्ध में आप लोग अनुमति दें (२७०) । इस प्रकार उनकी अनुमति लेकर सप्ताक्षर मन्त्र अर्थात् 'परमेश्वरि स्वाहा' का एक सौ आठ बार जप कर परमा कालिका को प्रणाम करे (२७१) । हे शिवे ! तब कौल-वर्ग के समक्ष उस रमणी से कहे— 'अकैतवेन चित्तेन पति-भावेन मां वृणु ।' अर्थात् चित्त में कोई कपट न रखकर पति-भाव से मुझे वरण करो (२७२) । हे देवेशि ! तब वह कौल कामिनी बड़ी श्रद्धा के साथ गन्ध-पुष्प-अक्षत द्वारा प्रियतम पति का वरण कर उसके हाथ में अपना हाथ प्रदान करे (२७३) । तदनन्तर चक्रेश्वर निम्न मन्त्र द्वारा उस दम्पति का अभिषेक करे। उस समय चक्र में उपस्थित सभी वीर लोग आदर के साथ 'स्वस्ति' कहें (२७४)— राज-राजेश्वरी काली तारिणी भुवनेश्वरी । वगला कमला नित्या युवां रक्षन्तु भैरवी ॥ अर्थात् राज-राजेश्वरी, काली, तारिणी, भुवनेश्वरी, वगला, कमला, नित्या और भैरवी—ये तुम दोनों की रक्षा करें (२७५) । यह मन्त्र पढ़ते हुए मद्य अथवा अर्घ्य-जल द्वारा बारह बार दोनों का अभिषेक करे। फिर वह दम्पति
दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन | ७६ प्रणाम करे और ज्ञानी चक्रेश्वर उन्हें वाग्भव-रमा अर्थात् 'ऐं श्रीं' ये दो बीज सुनाए (२७६)। हे कुलेश्वरि ! वह कुलीन दम्पति उस शैव विवाह-स्थल में जो-जो स्वीकार किया जाय, उसका पालन शिवोक्त विधानानुसार उन्हें यत्न-पूर्वक करना होगा (२७७)। इस शैव-विवाह में आयु और वर्ण का विचार नहीं है। शम्भु के आदेशा- नुसार पति-हीना और असपिण्डा से ही विवाह करे (२७८)। जो स्त्री शैव धर्म-चक्र के नियमानुसार विवाहिता है, सन्तानार्थी वीर उसके नियमित ऋतु-काल को देखकर चक्र के निवृत्ति-काल में उसका परित्याग कर सकता है (२७६)। अनुलोम-क्रम में अर्थात् वर उच्चजाति का हो, कन्या निम्न जाति की, तो इस कन्या की सन्तान मातृ- जाति के अनुरूप ही व्यवहार में मानी जायगी। विलोम-क्रम में अर्थात् वर निम्न जाति का हो और कन्या उच्च जाति की, तो उसके गर्भ से उत्पन्न सन्तान को सामान्य जाति को समझा जायगा (२८०)। इन सभी सङ्कर जातिवालों के पितृ-श्राद्धादि में कौल व्यक्तियों को भोज्य द्रव्य देना और भोजन कराना होगा (२८१)। हे देवि ! भोजन और मैथुन मनुष्यों को स्वभाव से ही प्रिय हैं। अतएव उनके संक्षेप के लिए और हित-साधन के लिए शैव धर्म में उनकी सीमा निर्दिष्ट की गई है (२८२)। हे महेश्वरि ! इसीलिए शिव-प्रवर्तित धर्म का सेवन करने से मनुष्य धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष का पूर्ण अधिकारी होता है, इसमें सन्देह नहीं (२८३-८४)। • × • दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन देवी ने कहा-हे नाथ ! आपसे दस प्रकार के संस्कारों और कुशण्डिका की विधि सुनी। अब कृपा करके मुझे 'वृद्धि-श्राद्ध' का विधान बताइए (१)। हे शंकर ! किस संस्कार में अथवा किस प्रतिष्ठा-कर्म में 'कुशण्डिका' और 'वृद्धि-श्राद्ध' करना है और कहाँ नहीं करना है, वह सब मेरी प्रसन्नता के लिए तथा जीवों के कल्याण के लिए ठीक-ठीक बताइए (२-३)। श्री सदाशिव ने कहा-हे भद्रे ! गर्भाधान से विवाह तक दस संस्कारों में जो कार्य जिसमें विहित हैं, वह सब मैं विशेषकर कहता हूँ (४)। हे वरानने ! मैंने उक्त प्रकार से जिस स्थल पर जैसी विधि बताई है, कल्याण-कामी तत्त्वज्ञ लोग उसी प्रकार अनुष्ठान करें। उससे भिन्न अन्य स्थलों पर जैसी विधि है, वह कहता हूँ, सुनो (५)। हे प्रिये ! वापी, कूप, तड़ाग, देव-प्रतिमा, गृह, उद्यान, व्रत आदि सभी प्रतिष्ठा-कार्यों में पञ्च-देव-पूजा, मातृकाओं की पूजा, वसुधारा, वृद्धि-श्राद्ध और कुशण्डिका करना चाहिए (७)। जो कर्म स्त्रियों द्वारा होते हैं, उनमें वृद्धि-श्राद्ध नहीं होता, केवल देवताओं और पितरों की तृप्ति के लिए एक भोज करना चाहिए (८)। स्त्रियाँ पुरोहित द्वारा भक्ति-पूर्वक देव-पूजन, षोडश-मातृका-पूजन, वसुधारा-दान और कुशण्डिका करावें (६)। हे शिवे ! दैव और पितृ-कर्मों में पुत्र, पौत्र, दौहित्र, भागिनेय, जामाता और पुरोहित को प्रतिनिधि बनाना प्रशस्त है (१०)। हे कालिके ! 'वृद्धि-श्राद्ध' को बताता हूँ, सुनो (११)। नित्य-कर्म समाप्त कर अत्यन्त एकाग्र होकर गङ्गा, यज्ञेश्वर विष्णु, वास्तुदेव और भू-स्वामी की पूजा करे (१२)। फिर 'प्रणव' (ॐ) का स्मरण करते हुए दर्भ (कुश) का ब्राह्मण बनाये। पाँच, नौ, सात या तीन कुश-पत्र लेकर उन्हें दक्षिणावर्त ढाई बार लपेट कर
८० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र बटने से उक्त दर्भ-मय ब्राह्मण की रचना होती है (१३-१४) । हे शिवे ! ‘वृद्धि-श्राद्ध’ में और ‘पार्वणादि श्राद्धों’ में छः ब्राह्मणों की विधि है किन्तु ‘एकोद्दिष्ट श्राद्ध’ में केवल एक ही ब्राह्मण बताया है (१५) । उक्त कुश-मय ब्राह्मणों को एक पात्र में उत्तर-मुख रखे और निम्न मन्त्र से उन्हें स्नान कराए (१६)— ह्रीं शन्नो देवीरभीष्टये शन्नो भवन्तु पीतये शंयोरभिस्रवन्तु नः । अर्थात् जल-देवता हमारे अभीष्ट की सिद्धि के लिए मंगल करें; हमारे पीने के लिए मङ्गल करें; हम पर सब प्रकार कल्याण की वर्षा करें (१७) । इसके बाद गन्ध-पुष्प से कुश-मय ब्राह्मणों की पूजा करे (१८) । फिर पश्चिम और दक्षिण दिशा में तिल सहित दो-दो तुलसी-पत्र लेकर दर्भ-युक्त छः पात्र स्थापित करे (१६) । पश्चिम में स्थापित दो पात्रों में और दक्षिण में स्थापित चार पात्रों में क्रमशः पूर्व-मुख और उत्तर-मुख करके छः ब्राह्मणों को बिठाये (२०) । हे पार्वति ! पश्चिम में ‘देव-पक्ष’, दक्षिण में बाईं ओर ‘पितृ-पक्ष’ और दक्षिण में दाईं ओर ‘मातामह का पक्ष’ जाने (२१) । हे वरानने ! आभ्युदयिक श्राद्ध में पितरों को ‘नान्दीमुख’ और माताओं को ‘नान्दीमुखी’ पद से विभूषित कर उनका उल्लेख करे । मातामह और मातामही आदि का भी उल्लेख इसी प्रकार करे (२२) । ‘देव कर्म’ उत्तर-मुख होकर दक्षिणावर्त-क्रम से और ‘पितृ-कर्म’ दक्षिण-मुख होकर वामावर्त-क्रम से करे (२३) । हे शिवे ! माता को माता, पितादि का लंघन करके श्राद्ध करने से वह निष्फल होता है। तात्पर्य यह है कि पितृ-कर्म में दक्षिणावर्त-क्रम से दक्षिण-मुख न होवे (२४) । ‘देव-कर्म’ के समय उत्तर-मुख होकर अनुज्ञा- वाक्य का पाठ करे और ‘पितृ तथा मातामहादि के कर्म’ के समय दक्षिण-मुख होकर । हे शुचि-स्मिते ! पहले ‘देव पक्ष’ के अनुज्ञा-वाक्य का सुनो (२५)— अद्यैतस्य.........तत्तत्-कर्माभ्युदयार्थं अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः पितुः, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः पिता- महस्य, अमुक-गोत्रामुक शर्मणः प्रपितामहस्य; अमुक-गोत्रामुकी-देवी मातुः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी पिता- मह्याः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी प्रपितामह्याः; अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः मातामहस्य, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः प्रमातामहस्य, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः वृद्ध-प्रमातामहस्य; अमुक-गोत्रामुकी-देवी मातामह्याः, अमुक-गोत्रा- मुकी-देवी प्रमातामह्याः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी वृद्ध-प्रमातामह्याः विश्वेषां देवानां श्राद्धं कुश-निर्मितयोः ब्राह्मणयोरहं करिष्ये । यही अनुज्ञा-वाक्य' है (२६-२६) । हे पार्वति ! पितृ-त्रय और मातामह-त्रय के नामों के साथ ‘विश्वेषां देवानां’ पद का उच्चारण न करे (३०) । इसके बाद दस बार ब्रह्म-विद्या गायत्री का जप करे (३१) । फिर निम्न मन्त्र को तीन बार पढ़े— देवताभ्यः पितृभ्यश्च महा-योगिभ्य एव च । नमोऽस्तु पुष्ट्यै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ॥ अर्थात् देवताओं, पितरों और महा-योगियों को, पुष्टि को और स्वाहा को नमस्कार । और हाथ में जल लेकर ‘वं हुं फट्’ इस मन्त्र द्वारा श्राद्ध के सभी पदार्थों का शोधन करे (३२) । अर्थात् उक्त मन्त्र-पूत जल को पदार्थों पर छिड़के (३३) । तब अग्नि-कोण में एक पात्र स्थापित कर कहे कि— रक्षोधनममृतं, मम यज्ञ-रक्षां कुरुष्व । फिर उस पात्र में तुलसी-दल से युक्त जल डाले और देव-पक्ष से आरम्भ कर कुश-मय ब्राह्मणों को देवादि- क्रम से जल-गण्डूष देकर कुशासन प्रदान करे (३४-३५) । तब विश्व-देव-गण का, पितृ-त्रय का, मातृ-त्रय का, मातामह-त्रय का और मातामही-त्रय का आवाहन करे (३६) । फिर पहले विश्व-देव-गण की पूजा करे, तब
दसवां उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन । ८१ पितृ-त्रय, मातृ-त्रय, मातामह-त्रय और मातामही-त्रय को पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, धूप, दीप, वस्त्रादि द्वारा पूजा करे । पूजा कर देव-पक्ष से आरम्भ कर पात्र-पातन हेतु पूछे (३७-३८) । इसके बाद माया-बीज 'ह्रीं' का उच्चारण कर देव-पक्ष के लिए एक चतुष्कोण-मण्डल बनाए । फिर इसी प्रकार पितृ-पक्ष और मातामह-पक्ष के लिए भी 'ह्रीं' से दो-दो मण्डल बनाए (३६) । वरुण-बीज 'वं' से इन मण्डलों का प्रोक्षण कर इन पर क्रमशः पात्र स्थापित कर समस्त सामग्री-सहित पात्र को बीज से प्रक्षालित कर पीने के लिए जल-सहित क्रमशः अन्न रखे (४०) । फिर सभी अन्न पर मधु एवं यव प्रदान कर 'ह्रां हूँ फट्' इस मन्त्र से उस समस्त अन्न को जल द्वारा प्रोक्षित कर क्रमशः विश्वदेव-गण को, पितृ-गण को, मातृ-गण को, माता- मह-गण को और मातामही-गण को उनका उल्लेख करते हुए उस अन्न को उन्हें निवेदित करे । फिर गायत्री और 'देवताभ्यः' आदि मन्त्र का तीन बार पाठ करे (४१-४२) । हे आद्ये ! तब शेषान्न-प्रश्न और पिण्ड-प्रश्न करे (४३) । ब्राह्मणों से प्रश्न का उत्तर मिलने पर देने से बचे अक्षतादि द्वारा विल्व के समान बारह पिण्ड बनाए (४४) । उसी प्रकार का एक दूसरा पिण्ड बनाए । तब नैऋत-कोण में मण्डल के ऊपर यव-सहित दर्भ (कुश) बिछाए (४५) और निम्न दो मन्त्रों का पाठ करते हुए अपिण्डों को पिण्ड-दान करे— ये मे कुले लुप्त-पिण्डाः पुत्र-दार-विवर्जिताः । अग्नि-दग्धाश्च ये केऽपि व्याल-व्याघ्र-हताश्च ये ॥ ये बान्धवाबान्धवा वा येऽन्य-जन्मनि बान्धवाः । मद्-दत्त-पिण्ड-तोयाभ्यां ते यान्तु तृप्तिमक्षयां ॥ अर्थात् मेरे वंश में जो लुप्त-पिण्ड हैं; जो स्त्री-पुत्र से रहित हैं ; जो अग्नि से जले हैं ; जो सर्प, व्याघ्रादि द्वारा मरे हैं; जो मेरे बान्धव अबान्धव हैं या जो अन्य जन्म के मेरे बान्धव हैं, वे सब मेरे द्वारा दिए इस पिण्ड और जल द्वारा अक्षय तृप्ति को प्राप्त करें (४६-४७) । फिर हाथ धोकर आचमन करे और गायत्री तथा 'देवताभ्यः' इत्यादि मन्त्र का तीन बार जप कर मण्डल बनाए (४८) । हे देवि ! पितृ-पक्ष से आरम्भ कर उच्छिष्ट पात्र के सम्मुख पूर्वोक्त विधि से दो-दो मण्डल बनाए (४६) । 'वं' बीज से इन सभी मण्डलों को प्रोक्षित कर इन पर कुश बिछाये । फिर वायु-बीज 'यं' से सभी कुशों को प्रोक्षित कर पितृ-दर्भ से आरम्भ कर दर्भ के मूल, मध्य और ऊर्ध्व भाग में क्रमशः १ पितृ-त्रय, २ मातृ-त्रय, ३ मातामह-त्रय और ४ मातामही-त्रय को तीन-तीन पिण्ड प्रदान करे (५०) । हे महेश्वरि ! प्रत्येक का सम्बो- धनान्त-नाम उच्चारण कर 'स्वधा' कहते हुए प्रत्येक को यव और मधु-सहित पिण्ड प्रदान करे (५१) । पिण्ड- दान करने के बाद 'कर-लेप' द्वारा अर्थात् अन्न-युक्त हाथ को कुश में रगड़ कर 'लेप-भोजी' अर्थात् चौथे से सातवें पुरुष को प्रसन्न करे । एकोद्दिष्ट श्राद्ध में यह 'लेप-भोजि-पितृ-गण-प्रीणन विधि' नहीं है (५२) । देवताओं और पितृ-गण की तृप्ति के लिए दश बार गायत्री-जप और तीन बार 'देवताभ्यः पितृभ्यश्च' इस मन्त्र का पाठ कर पिण्ड-पूजा करे । तब धूप-दीप को जलाकर दोनों आँखें बन्दकर यह भावना करे कि 'दिव्य देह-धारी पितृ-गण यज्ञ-स्थल में कव्य अर्थात् उनके लिए दिए गए द्रव्य का भोजन कर रहे हैं।' फिर निम्न मन्त्र से पितृ-गण को प्रणाम करे— पिता मे परमो धर्मः पिता मे परमं तपः । स्वर्गः पिता मे तत्-तृप्तौ तृप्तमस्त्यखिलं जगत् ॥ अर्थात् पिता ही मेरे परम धर्म हैं, पिता ही मेरे परम तप हैं, पिता ही मेरे स्वर्ग हैं। उनके तृप्त होने से सारा जगत् तृप्त होता है (५३-५५) । फिर निर्माल्य लेकर पितृ-गण से आशीर्वाद हेतु प्रार्थना करे (५६)— आशिषो मे प्रदीयन्तां पितरः करुणा-मयाः । वेदाः सन्ततयो नित्यं वर्द्धन्तां बान्धवा मम ॥ फा०—११
८२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र दातारो मे विवर्द्धन्तां बहून्यन्नानि सन्तु मे । याचितारः सदा सन्तु मा च याचामि कञ्चन ॥ अर्थात् दया-मय पितृ-गण मुझे आशीर्वाद दें । मेरे वेद-ज्ञान, पुत्रों और बान्धवों की नित्य वृद्धि हो । मुझे दान देनेवालों की वृद्धि हो। मेरे पास बहुत अन्न हो। याचक लोग सदा मेरे पास बने रहें और मैं किसी से याचना न करूँ (५७-५८) । इसके बाद देव-पक्ष से आरम्भ कर ब्राह्मणों और सभी पिण्डों का विसर्जन करे । फिर देव-पक्ष, पितृ-पक्ष और मातामह-पक्ष के लिए दक्षिणा प्रदान करे (५६) । तब दश बार गायत्री और पाँच बार 'देवताभ्यः पितृ- भ्यश्च' इस मन्त्र का जप कर अग्नि तथा सूर्य का दर्शन करने के बाद हाथ जोड़कर ब्राह्मण से पूछे (६०)— इदं श्राद्धं साङ्गं जातम् ? अर्थात् क्या यह श्राद्ध सभी अङ्ग-कार्यों-सहित सम्पन्न हो गया ? ब्राह्मण उत्तर दें— विधानतः सम्यगेव साङ्गं जातम् । अर्थात् विधि के अनुसार यह सम्पूर्ण रूप से सभी कार्यों के सहित सम्पन्न हो गया (६१) । तब अङ्ग-वैगुण्य की शान्ति के लिए दश बार प्रणव 'ॐ' का जप कर अच्छिद्राभिविधान द्वारा कर्म को समाप्त करे । पात्र के अन्न और पिण्डों को ब्राह्मण को दे दे (६२) । ब्राह्मण न हो, तो गाय या बकरी को दे दे या उन्हें जल में डाल दे । 'नित्य' अर्थात् अवश्य करणीय संस्कार में यहो 'वृद्धि-श्राद्ध' कहा गया है (६३) । अमावास्या आदि पर्व के उपलक्ष्य में करणीय श्राद्ध को 'पार्वण श्राद्ध' कहते हैं (६४) । देवतादि-प्रतिष्ठा, तीर्थ-यात्रा और तीर्थ में 'पार्वण श्राद्ध' की विधि के अनुसार श्राद्ध करे (६५) । इन सब श्राद्ध-कार्यों में पितृ-गण को 'नान्दीमुख' विशेषण से युक्त न करे और 'नमोस्तु पुष्ट्यै' के स्थान पर 'नमः स्वधायै' कहे (६६) । हे वरानने ! पिता आदि पुरुष-त्रय में से जो जीवित हो, उसके ऊपरवाले पुरुष का उल्लेख कर श्राद्ध करे (६७) । पिता, पितामह, प्रपितामह—ये तीनों पुरुष यदि जीवित हों, तो श्राद्ध न करे । उनके प्रसन्न रहने से ही श्राद्ध और यज्ञ का फल मिल जायगा (६८) । हे कल्याणि ! पिता जीवित हों, तो माता और पत्नी के श्राद्ध एवं 'नान्दीमुख-श्राद्ध' के सिवा अन्य किसी श्राद्ध के करने का अधिकार नहीं होता (६६) । 'एकोद्दिष्ट श्राद्ध' करते समय विश्वदेव-गण को पूजा न करे । उसके स्थान पर एक ही व्यक्ति को लक्ष्य कर अनुज्ञा-वाक्य की कल्पना करे (७०) । दक्षिणाभिमुख होकर अन्न और पिण्ड-दान करे । यव के स्थान पर तिल प्रदान करे, शेष सामग्री पूर्ववत् ही रखे (७१) । 'प्रेत-श्राद्ध' में यह विशेषता है कि उसमें गङ्गादि की पूजा न करे और अन्न तथा पिण्ड-दान के समय मृत व्यक्ति का उल्लेख 'प्रेत' कहकर करे (७२) । एक व्यक्ति के उद्देश्य से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे 'एको- द्दिष्ट' कहा जाता है । 'प्रेत-श्राद्ध' में प्रेत के अन्न और पिण्ड में मत्स्य और मांस प्रदान करे (७३) । हे कुल- नायिके ! अशौच के अन्त के दूसरे दिन यह श्राद्ध करे, इसी को 'प्रेत-श्राद्ध' कहते हैं (७४) । जहाँ गर्भ-स्राव हो या बालक जन्म लेकर पृथ्वी पर मर जाय, वहाँ से अतिरिक्त स्थान पर सन्तान के जन्म लेने या मरने पर कुलाचार के अनुसार 'अशौच' का पालन करे । ब्राह्मण के लिए दश दिन, क्षत्रिय के लिए बारह दिन, वैश्य के लिए पन्द्रह दिन और शूद्र एवं सामान्य जाति के लिए एक मास का 'अशौच' माना गया है (७५-७६) हे शिवे ! अ-सपिण्ड जाति के मरने पर और सपिण्ड के मरने पर 'अशौच'-काल के बाद
दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन । ८३ (अथवा एक वर्ष के भीतर) मरने की सूचना मिलने पर तीन रात्रि का 'अशौच' होता है (७७) । 'अशौच'-युक्त व्यक्ति कुल-पूजा और प्रारब्ध कर्म को छोड़कर अन्य कोई दैव या पैत्र्य कर्म नहीं कर सकता (७८) । हे कुलेश्वरि ! पाँच वर्ष से अधिक आयुवाले मृत मनुष्य को श्मशान में दग्ध करे । कुल-स्त्री को पति के साथ दग्ध न करे क्योंकि स्त्री भगवती-स्वरूपा होती है। मोह-वश ही वह पति की चिता पर चढ़ती है और नरक में जाती है (७९-८०) । हे कालिके ! जो ब्रह्म-मन्त्रोपासक हैं, उनके मृत शरीर को जल में विसर्जित करे या मिट्टी में समाधिस्थ करे अथवा दग्ध कर दे (८१) । हे अम्बिके ! पुण्य-क्षेत्र में, तीर्थ में, विशेषकर देवी के समीप या कौलिकों के पास मरना प्रशस्त है (८२) । जो मृत्यु के समय तीनों लोकों को भुलाकर एकमात्र सत्य-स्वरूप की भावना करते हुए प्राण छोड़ता है, वह गुण-त्रय के सम्बन्ध का त्याग कर निर्लेप, निर्गुण, नित्य-बुद्ध इत्यादि निज-भाव में प्रतिष्ठित होता है अर्थात् 'निर्वाण' को प्राप्त करता है (८३) । प्रेत-भूमि में शव को ले जाकर उसे घृताक्त कर स्नान कराए और उसे उत्तराभिमुख कर चिता पर लिटाये (८४) । फिर प्रेत-गोत्र और सम्बोधनान्त प्रेत-नाम का उल्लेख करते हुए प्रेत के मुख में पिण्ड देकर वह्नि-बीज 'रं' का स्मरण करते हुए दाह-कर्म करे (८५) । यहाँ सिद्धान्न या चावल या यव-चूर्ण या गोधूम- चूर्ण द्वारा धात्री-फल (आंवले) के समान पिण्ड बनाए (८६) । प्रेत के अनेक पुत्र हों, तो ज्येष्ठ पुत्र ही श्राद्ध करने का अधिकारी होता है। ज्येष्ठ पुत्र के अभाव में ज्येष्ठ-क्रम से दूसरे पुत्रों को भी अधिकार होता है (८७) । अशौच की समाप्ति के दूसरे दिन स्नान कर पवित्र हो मृत व्यक्ति की प्रेतत्व-विमुक्ति के लिए तिल-काञ्चन का दान करे (८८) । सत्पुत्र मृत पिता के स्वर्ग-लाभ के लिए गो, भूमि, वस्त्र, यान, धातु-निर्मित गात्र और अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों का दान करे (८९) । गन्ध, माला, फल, जल, सुख देनेवाली शैय्या और जो- जो वस्तुएँ जीवित अवस्था में मृत व्यक्ति को प्रिय थीं, वे सभी प्रेत के स्वर्ग-लाभ के लिए प्रदान करे (९०) । इसके बाद उसके स्वर्ग-प्राप्ति के लिए एक बैल को त्रिशूल के चिह्न से चिह्नित कर और स्वर्ण से सजा कर विसर्जित करे (९१) । अत्यन्त श्रद्धा के साथ प्रेत-श्राद्ध में कही विधि से श्राद्धकर ब्रह्मज्ञ ब्राह्मणों, कौलों और अन्य भूखे लोगों को भोजन कराए (९२) । गो आदि के दान करने में जो असमर्थ हो, वह अपनी शक्ति के अनुसार श्राद्ध कर भूखे लोगों को भोजन कराकर पिता के प्रेतत्व का मोचन करे (९३) । यही आदि एको- द्दिष्ट और प्रेतत्व से विमुक्ति का कारण होता है। फिर प्रति वर्ष मृत्यु-तिथि पर मृत व्यक्ति के लिए अन्न प्रदान करे (९४) । बहुत विधान या बहुत कर्मों का अनुष्ठान करने से क्या लाभ ? कौलिक साधकों का अर्चन करने से सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती है (९५) । होम, जप, श्राद्ध-व्यतीत संस्कार और अन्य कर्मों में एकमात्र कौलिक साधक की अर्चना करने से सम्पूर्ण रूप से कार्य की सिद्धि होती है (९६) । शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरम्भ कर कृष्ण पक्ष की पञ्चमी तक सभी शुभ कर्म करे—यह शिवोक्त विधि है (९७) । कमार्थी व्यक्ति गुरु, आचार्य और कौलिक साधक की अनुमति से अन्य विशुद्ध दिन में भी सभी अपरिहार्य कर्म कर सकता है (९८) । कौलिक व्यक्ति पञ्च-तत्त्व द्वारा आद्या देवी की पूजा कर गृहारम्भ, गृह- प्रवेश, यात्रा, शङ्ख-रत्न आदि धारण—ये सब कार्य करे (९९) । अथवा श्रेष्ठ साधक संक्षेप में करे, यथा— देवी का ध्यान करते हुए मन्त्र-जप और नमस्कार कर इच्छानुसार प्रस्थान करे (१००) । शारदीय उत्सव आदि सभी देव-पूजाओं में तत्-तत् कल्पोक्त विधि के अनुसार ध्यान और पूजा करे (१०१) । आद्या
८४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कालिका के पूजा-स्थल में उक्त विधान के अनुसार बलिदान और होम करे। अन्त में कौलिक व्यक्ति की अर्चना और दक्षिणा देकर कर्म समाप्त करे (१०२)। गङ्गा, विष्णु, शिव, सूर्य और ब्रह्मा को पूजा कर उद्दिष्ट देवता की पूजा करे—यह सामान्य विधि कही है (१०३) । कौलिक ही परम धर्म, कौलिक ही परम देवता, कौलिक ही परम तीर्थ है, अतएव सदा कौलिक साधक की अर्चना करे (१०४) । साढ़े तीन कोटि तीर्थ एवं ब्रह्मादि सभी देवता कौलिक शरीर में वास करते हैं, अतः कौलिक साधक की पूजा करने से क्या नहीं होता (१०५)? पूर्णाभिषिक्त सत्कौलिक जिस देश में विराजता है, वही धन्य-मान्य-पुण्यतम और देवताओं द्वारा प्रार्थनीय होता है (१०६) । साक्षात् शिव-स्वरूप, पाप-पुण्य-रहित पूर्णाभिषिक्त साधक का प्रभाव पृथ्वी पर कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता (१०७)। कौल व्यक्ति नर- रूप में सारे जगत् के उद्धार का निमित्त है और लोक-यात्रा की शिक्षा देने के लिए भूमण्डल पर विहार करता है (१०८) । श्री देवी ने कहा- हे प्रभो ! पूर्णाभिषिक्त कौल साधक की महिमा आपने कही। अब आप कृपा कर मुझे उक्त 'अभिषेक' का विधान सुनाइए (१०६)। श्री सदाशिव ने कहा—सत्य, त्रेता और द्वापर युगों में यह विधान गुप्त रहा। पूर्व-काल में गुप्त भाव से इसका अनुष्ठान कर लोगों ने मोक्ष प्राप्त किया है (११०)। प्रबल कलि-काल में कुलाचारी लोग रात्रि-काल में या दिन में प्रकट रूप से 'अभिषेक' करें (१११) । बिना अभिषेक केवल मद्य-सेवन करने से ही कौल नहीं होता। जिसका 'पूर्णाभिषेक' हुआ है, वही कौल, कुलार्चक और चक्राधीश्वर होता है (११२) । अभिषेक के पूर्व-दिन में गुरुदेव सब विघ्नों की शान्ति के लिए यथा-शक्ति उपचारों के द्वारा विघ्न-राज अर्थात् गणपति की पूजा करें (११३) । हे प्रिये ! यदि गुरुदेव शुभ 'पूर्णाभिषेक' में अधिकारी न हों, तो पूर्णा- भिषिक्त कौल द्वारा उक्त संस्कार कराए (११४)। 'ख' वर्ण के बाद के वर्ण ('ग') को अनुस्वार-युक्त करने से बना 'गं' ही गणपति का बीज है (११५) । इस गणपति-मन्त्र के ऋषि गणक, छन्द निवृत्, देवता गणपति और विनियोग कर्त्तव्य कर्म के विघ्न की शान्ति के निमित्त है (११६) । छः दीर्घ स्वरों से युक्त मूल-मन्त्र ('गां गीं' इत्यादि) द्वारा षडङ्ग-न्यास करे। हे शिवे ! फिर प्राणायाम कर गणपति का ध्यान करे (११७) -- सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतर-जठरं हस्त-पद्मैर्दधानं । शङ्खं पाशांकुशेष्टान्युरु-कर-विलसद्-वारुणी-पूर्ण-कुम्भं ॥ बालेन्दूद्दोप्त-मौलिं करि-पति-वदनं बीजपूरार्द्र-गण्डम् । भोगीन्द्राबद्ध-भूषं भजत गणपति रक्त-वस्त्राङ्गरागम् ॥ अर्थात् सिन्दूर के समान रक्त-वर्ण, त्रिनेत्र, अत्यन्त स्थूल उदर, चार कर-कमलों में शङ्ख, पाश, अंकुश और वर धारण करनेवाले, वारुणी से भरे हुए कुम्भ से शोभायमान विशाल सूंड, नवीन चन्द्र-कला द्वारा प्रदीप्त मस्तकवाले, गजराज के मुख वाले, बीजपूर के समान आर्द्र दोनों गण्ड-स्थल, सर्पराज द्वारा विभूषित, रक्त-वस्त्र और रक्त अङ्गराग से युक्त गणपति का मैं भजन करता हूँ (११८)। इस प्रकार ध्यान कर मानसोपचारों से उनकी पूजा कर पीठ-शक्तियों की पूजा करे। तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, काम-रूपिणी, उग्रा, तेजस्वती और सत्या- इन आठ पीठ-शक्तियों की पूजा पूर्वादि-क्रम से करके मध्य में विघ्न-विनाशिनी की पूजा कर कमलासन की पूजा करे (११६-१२०)। फिर गणपति का पुनः
दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन | ८५ ध्यान कर मन्त्र-शोधित पञ्च-तत्व-रूप उपचारों द्वारा उनकी पूजा कर उनके चारों ओर गणेश, गण-नायक, गण-नाथ, गण-क्रीड़, एक-दन्त, रक्त-तुण्ड, लम्बोदर, गजानन, महोदर, विकट, धूम्राभ और विघ्न-नाशन की पूजा करे (१२१-१२३)। तब ब्राह्मी आदि अष्ट-शक्तियों एवं दश दिक्पालों की पूजा करके उनके अस्त्रों की पूजा कर विघ्नराज को विसर्जित करे (१२४)। इसी प्रकार विघ्नराज की पञ्च-तत्वों द्वारा पूजा कर अधिवास करे और ब्रह्मज्ञ कुल-साधकों को भोजन कराए (१०५)। अगले दिन स्नान और नित्य-क्रिया कर जन्म से अब तक के किए पापों के नाश के लिए तिल-काञ्चन का दान करे। हे प्रिये ! कौलों को तृप्ति के लिए एक भोज भी प्रदान करे (१२६)। तब सूर्य को अर्घ्य देकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, नव-ग्रह, मातृकाओं को पूजा कर 'वसुधारा' दे (१२७)। फिर कर्म के अभ्युदय की कामना से वृद्धि-श्राद्ध करे। उसके बाद गुरु के पास जाकर प्रणाम कर प्रार्थना करे (१२८)--- त्राहि नाथ ! कुलाचार-नलिनो-कुल-वल्लभ ! त्वत्-पादाम्भोरुहच्छायां देहि मूर्ध्नि कृपा-निधे ॥ आज्ञां देहि महा-भाग ! शुभ-पूर्णाभिषेचने । निर्विघ्नं कर्मणः सिद्धिमुपैमि त्वत्-प्रसादतः ॥ अर्थात् हे नाथ ! हे कुलाचार-रूप कमलिनी-समूह के प्रियतम ! हे दया-सागर ! मेरे मस्तक पर अपने चरण-कमलों की छाया प्रदान करें ( २६)। हे महानुभाव ! मेरे शुभ पूर्णाभिषेक के लिए आज्ञा दें। आपकी कृपा से मैं बिना किसी विघ्न के कार्य की सफलता पाऊँ (१३०)। इस प्रार्थना के उत्तर में गुरुदेव कहें- शिव-शक्त्याज्ञया वत्स ! कुरु पूर्णाभिषेचनम् । मनोरथ-मयी-सिद्धिर्जायतां शिव-शासनात् ॥ अर्थात् हे पुत्र ! शिव-शक्ति की आज्ञानुसार 'पूर्णाभिषेक' करो। शिव के आदेश से तुम्हें इच्छानुरूप सिद्धि प्राप्त हो (१३१) गुरुदेव से इस प्रकार आज्ञा प्राप्त कर समस्त उपद्रवों की शान्ति के लिए और आयु, लक्ष्मी, बल तथा आरोग्य की प्राप्ति के लिए 'सङ्कल्प' करे (१३२)। तब सङ्कल्प लेकर वस्त्र, अलङ्कार, भूषण और शुद्धि-सहित कारण द्वारा गुरुदेव की पूजाकर उनका 'वरण' करे (१३३)। गुरुदेव गैरिकादि रंगों से चित्रित, सुन्दर ध्वज-पताकाओं से युक्त, फल-पत्तों से सुसज्जित, मालाकार किङ्किणियों से शोभित, रंग-बिरंगी चाँदनी से अलंकृत, जलते हुए घृत-दीपकों की पंक्तियों से लेश मात्र भी अंधेरे से रहित, कर्पूर-सहित धूप और यक्ष-धूप (धूना) द्वारा सुगन्धित, ताल-वृन्त, चामर, मोर-पङ्ख और दर्प- णादि से सुसज्जित, मनोहर गृह में चार अंगुल ऊँची, डेढ़ हाथ चौड़ी मिट्टी की वेदी बनाएँ। फिर उक्त गृह में पीले, लाल, काले, सफेद, साँवले रंग के अक्षत-चूर्ण द्वारा सुन्दर 'सर्वतोभद्र-मण्डल' की रचना करें (१३४-३८)। तब अपने कल्प में बताई विधि के अनुसार मानस-पूजा तक के कर्म करके पूर्वोक्त मन्त्रों से पञ्च-तत्त्वों का शोधन करें (१३६)। फिर अस्त्र (फट्) मन्त्र द्वारा प्रक्षालित दही और अक्षत से लिप्त सोने या चांदी या ताँबे अथवा मिट्टी के बने ' घट' को प्रणव (ॐ) का उच्चारण करते हुए पूर्व-निर्मित 'सर्वतोभद्र-मण्डल' के ऊपर स्थापित करें। श्री-बीज अर्थात् 'श्रीं' का जप करते हुए उसे सिन्दूर से अङ्कित करें (१४०-४१)। तब अनुस्वार- युक्त 'क्ष' से लेकर 'अ' तक के पचास वर्णों के सहित मूल-मन्त्र का तीन बार जप कर 'कारण' (मदिरा) या तीर्थ-जल अथवा शुद्ध जल द्वारा उस 'घट' को पूर्ण कर उसमें नव-रत्न या स्वर्ण छोड़ें (१४२-४३)। फिर वाग्भव बीज 'ऐं' का जप करते हुए 'घट' के मुख पर कटहल, गूलर, पीपल, मौलसिरी और आम के पत्तों को स्थापित करें (१४४)। तब रमा-माया अर्थात् 'श्रीं ह्रीं' इस मन्त्र का जप करते हुए फल और अक्षत से युक्त सोने, चाँदी,
८६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तांबे या मिट्टी का 'शराब' (प्याला) उक्त पत्तों के ऊपर रखें (१४५)। हे वरानने ! दो वस्त्रों द्वारा इस घट के गले को बाँधें। शक्ति-मन्त्र हो तो लाल और विष्णु-मन्त्र हो तो सफेद वस्त्र की विधि है (१४६)। फिर निम्न मन्त्र से 'घट' को स्थिर करें— स्थां स्थों ह्रीं श्रीं स्थिरीभव । इस प्रकार स्थिर किए गए घट में 'पञ्च-तत्त्व' छोड़ें और तब नौ पात्रों की स्थापना करें (१४७) । 'शक्ति-पात्र' चाँदी का, 'गुरु-पात्र' सोने का, महा-शङ्ख (नर-कपाल) या नारिकेल का 'श्रीपात्र' और तांबे के अन्य पात्र होने चाहिए (१४८)। महा-देवी की पूजा में पत्थर, लकड़ी और लोहे के पात्र का उपयोग न करें। सामर्थ्य के अनुसार अन्य पदार्थों के ही पात्र रखें (१४६) । पात्रों की स्थापना कर गुरुओं और भगवती (आनन्दभैरवादि) का तर्पण करने के बाद गुरुदेव अमृत-पूर्ण 'घट' की पूजा करें (१५०)। तब धूप, दीप दिखा- कर सर्व-भूत को बलि प्रदान करें। उसके बाद पीठ-देवतादि की पूजाकर षडङ्ग-न्यास करें (१५१)। फिर प्राणा- याम कर महेश्वरी का ध्यान और आवाहन कर अपनी सामर्थ्य के अनुसार इष्ट-देवता की पूजा करें। पूजा के समय वित्त-शास्र (अर्थात् अपनी सामर्थ्य के अनुरूप खर्च न कर कंजूसों से कार्य करना) अनुचित है (१५२) । हे शिवे ! गुरुदेव होम तक के कर्म करने के बाद पुष्प, चन्दन और वस्त्र द्वारा क्रमशः कुमारी, शक्ति और साधकों की पूजा करें (१५३)। तब गुरुदेव उपस्थित कौल-साधकों से अपने शिष्य का 'पूर्णाभिषेक' करने की अनुमति माँगें— अनुगृह्णन्तु कौला मे शिष्यं प्रति कुल-व्रताः । पूर्णाभिषेक-संस्कारे भवद्भिरनुमन्यताम् ।। अर्थात् हे कुल-व्रत-परायण कौल-गण ! आप लोग मेरे शिष्य पर अनुग्रह करें और पूर्णाभिषेक-संस्कार को अनुमति दें। चक्रेश्वर के इस प्रकार कहने पर कौल लोग आदर-सहित चक्रेश्वर गुरुदेव से कहें कि— महा-माया-प्रसादेन प्रभावात् परमात्मनः । शिष्यो भवतु पूर्णस्ते पर-तत्त्व-परायणः ।। अर्थात् महा-माया के प्रसाद और परमात्मा के प्रभाव से आपका शिष्य परंब्रह्म में तत्पर होकर पूर्ण होवे (१५४-५५) । तदनन्तर गुरुदेव शिष्य द्वारा देवी की पूजा करायें और पूजित 'घट' के ऊपर 'काम-माया-रमा' अर्थात् 'क्लीं ह्रीं श्रीं' इस मन्त्र का जप कर उस निर्मल 'घट' को निम्न मन्त्र से हिलावें— उत्तिष्ठ ब्रह्म-कलश ! देवात्मक ! सिद्धिद ! त्वत्-तोय-पल्लवैः सिक्तः शिष्यो ब्रह्म-रतोऽस्तु मे ।। अर्थात् हे सिद्धि-दायक, देवता-स्वरूप, ब्रह्म-कलश ! तुम उठो। तुम्हारे जल और पल्लव द्वारा सिक्त होकर मेरा शिष्य ब्रह्म में रत होवे (१५६-५७)। तब शिष्य को गुरुदेव उत्तर की ओर मुख करके बैठाएँ और निम्न मन्त्रों से घटस्थ जल से पञ्च-पल्लवों के गुच्छे द्वारा उसका अभिषेक करें (१५८)— ॐ शुभ-पूर्णाभिषेकस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आद्या देवता, ॐ वीजं, शुभ- पूर्णाभिषेकार्थे विनियोगः । गुरवस्त्वाभिषिञ्चन्तु ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः । दुर्गा-लक्ष्मी-भवान्यस्त्वामभिषिञ्चन्तु मातरः ।।१
दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन । ८७ षोडशी तारिणी नित्या स्वाहा महिष-मर्दिनी । एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु मन्त्र-पूतेन वारिणा ॥२ जय-दुर्गा विशालाक्षी ब्रह्माणी च सरस्वती । एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु बगला वरदा शिवा ॥३ नारसिंही च वाराही वैष्णवी वन-मालिनी । इन्द्राणी वारुणी रौद्री त्वामभिषिञ्चन्तु शक्तयः ॥४ भैरवी भद्रकाली च तुष्टिः पुष्टिरुमा क्षमा । श्रद्धा कान्तिर्दया शान्तिरभिषिञ्चन्तु ते सदा ॥५ महा-काली महा-लक्ष्मीर्महा-नील-सरस्वती । उग्र-चण्डा प्रचण्डा त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वदा ॥६ मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नृसिंहो वामनस्तथा । रामो भार्गव-रामस्त्वामभिषिञ्चन्तु वारिणा ॥७ असिताङ्गो रुरुश्चण्डः क्रोधोन्मत्तो भयङ्करः । कपाली भीषणश्च त्वामभिषिञ्चन्तु वारिणा ॥८ काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी । विप्रचित्ता महोग्रा त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वदा ॥६ इन्द्रोऽग्निः शमनो रक्षो वरुणः पवनस्तथा । धनदश्च महेशानः सिञ्चन्तु त्वां दिगीश्वराः ॥१० रविः सोमो मङ्गलश्च बुधो जीवः सितः शनिः । राहुः केतुः स-नक्षत्रा अभिषिञ्चन्तु ते ग्रहाः ॥११ नक्षत्रं करणं योगो वाराः पक्षौ दिनानि च । ऋतुर्मासो हायनस्त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वदा ॥१२ लवणेक्षु-सुरा-सर्पिर्दधि-दुग्ध-जलान्तकाः । समुद्रास्त्वाभिषिञ्चन्तु मन्त्र-पूतेन वारिणा ॥१३ गङ्गा सूर्य-सुता रेवा चन्द्र-भागा सरस्वती । सरयूर्गण्डकी कुम्भी श्वेत-गङ्गा च कौशिकी । एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु मन्त्र-पूतेन वारिणा ॥१४ अनन्ताद्या महा-नागाः सुपर्णाद्याः पतत्रिणः । तरवः कल्प-वृक्षाद्याः सिञ्चन्तु त्वां महीधराः ॥१५ पाताल-भूतल-व्योम-चारिणः क्षेम-कारिणः । पूर्णाभिषेक-सन्तुष्टास्त्वाभिषिञ्चन्तु पाथसा ॥१६ दौर्भाग्यं दुर्यशो रोगा दौर्मनस्यं तथा शुचः । विनश्यन्त्वभिषेकेण परम-ब्रह्म-तेजसा ॥५७ अलक्ष्मी काल-कर्णी च डाकिन्यो योगिनी-गणाः । विनश्यन्त्वभिषेकेण काली-बीजेन ताडिताः ॥१८ भूताः प्रेताः पिशाचाश्च ग्रहा येऽरिष्ट-कारकाः । विद्रुतास्ते विनश्यन्तु रमा-बीजेन ताडिताः ॥१९ अभिचार-कृता दोषा वैरि-मन्त्रोद्भवाश्च ये । मनो-वाक्कायजा दोषाः विनश्यन्त्वभिषेचनात् ॥२० नश्यन्तु विपदः सर्वाः सम्पदः सन्तु सुस्थिराः । अभिषेकेन पूर्णेन पूर्णाः सन्तु मनोरथाः ॥२१ इन इक्कीस मन्त्रों से अभिषिक्त साधक ने यदि पहले पशु द्वारा दीक्षा ली हो, तो इस समय कौल गुरुदेव पुनः उसे वही मन्त्र सुनावें (१५६-८१) । फिर कौलिक गुरुदेव पूर्वोक्त नाम द्वारा शिष्य को सम्बोधन कर सभी शक्ति-साधकों को सूचित करते हुए उसे 'आनन्द-नाथान्त' नाम प्रदान करें (१८२) । गुरुदेव से मन्त्र प्राप्त कर शिष्य यन्त्र-राज में अपने देवता की पूजा कर पञ्च-तत्त्वोपचारों से गुरुदेव की पूजा करे (१८३) । फिर शिष्य गुरुदेव को भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, पान (सुधा), अलंकार-यह सब दक्षिणा में देकर शिव-स्वरूप कौलों की पूजा करे (१८४) । तब वह शान्त और विनम्र भाव से भक्तिपूर्वक श्रीगुरुदेव के चरण छूकर प्रणाम करे और यह प्रार्थना करे कि- श्रीनाथ ! जगतां नाथ !, मन्नाथ ! करुणा-निधे ! । परामृत-प्रदानेन, पूरयास्मन्मनोरथम् ।।
८८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् हे श्रीनाथ ! हे जगत् के नाथ ! हे मेरे नाथ ! हे दया-निधे ! परमामृत देकर मेरे मनोरथ को पूरा करें (१८५-८६) । इस पर गुरुदेव कौलों से अनुमति-प्राप्त्यर्थ उनसे कहें कि— आज्ञा मे दीयतां कौलाः प्रत्यक्ष-शिव-रूपिणः । सच्छिष्याय विनीताय ददामि परमामृतम् ॥ अर्थात् हे शिव-स्वरूप कौल-गण ! अपने विनम्र सच्छिष्य को मैं परमामृत देता हूँ। आप लोग मुझे आज्ञा दें (१८७) । उत्तर में कौल-जन कहें कि— चक्रेश ! परमेशान ! कौल-पङ्कज-भास्कर ! कृतार्थं कुरु सच्छिष्यं देह्यमुष्मै कुलामृतम् ॥ अर्थात् हे चक्रेश्वर ! हे परमेशान ! हे कौल-कमल-भानु ! आप इस सच्छिष्य को कुलामृत देकर कृतार्थ करें (१८८) । तब कौलों की अनुमति पाकर गुरुदेव शुद्धि के सहित परमामृत से पूर्ण पात्र शिष्य के हाथ में प्रदान करें (१८६) । फिर गुरुदेव हृदय में देवी का ध्यान कर स्रुव में लगी भस्म से शिष्य और कौल साधकों के भ्रू-मध्य में तिलक लगायें (१६०) । इसके बाद सभी कौलों को समस्त प्रसाद-तत्त्व अर्पित कर 'चक्रानुष्ठान' की विधि के अनुसार पान और भोजन करें (१६१)। हे देवि ! यह मैंने तुमसे ब्रह्म-ज्ञान का एकमात्र कारण और शिवत्व-प्राप्ति का उपाय — शुभ 'पूर्णाभिषेक' बताया है (१६२)। नौ, सात, पाँच, तीन या एक रात्रि में 'पूर्णाभिषेक' करे (१६३)। हे कुलेश्वरि ! इस संस्कार के ये पांच 'कल्प' बताए गए हैं। नौ रात्रि के अभिषेक में 'सर्वतोभद्र मण्डल', सात रात्रि के अभिषेक में 'नव-नाभ-मण्डल', पाँच रात्रि के अभिषेक में 'पञ्चाब्ज-मण्डल', तीन और एक रात्रि के अभिषेक में 'अष्ट- दल-कमल' की रचना करे (१६४-६५) । 'सर्वतोभद्र' और 'नव-नाभ' मण्डल में नौ घटों तथा 'पञ्चाब्ज' मण्डल में पाँच घटों की स्थापना करे (१६६) । हे देवि ! 'अष्ट-दल कमल' में केवल एक घट की विधि बताई है । केशरादि में अङ्ग-देवता और आवरण-देवताओं की पूजा करे (१६७) । 'पूर्णाभिषेक' से सिद्ध निर्मल-चित्त कौलों के देखने, छूने और सूंघने से ही द्रव्यों की शुद्धि हो जाती है (१६८) । शाक्त, वैष्णव, शैव, सौर या गाणपत—सभी उपासकों द्वारा कुल-धर्माश्रित साधु यत्नपूर्वक पूजनीय है (१६६) । शाक्तों के लिए शाक्त गुरु, शैवों के लिए शैव गुरु, वैष्णवों के लिये वैष्णव गुरु, सोरों के लिये सौर गुरु और गाणपत के लिये गाणपत गुरु ही प्रशस्त है। 'कौल' सभी के लिए प्रशस्त गुरु है। अतः बुद्धिमान् व्यक्ति सब प्रकार से 'कौल' से दीक्षा ग्रहण करे (२००-२०१) । जो लोग यत्न करके भक्ति-पूर्वक पञ्च-तत्त्वों के द्वारा कौलों की पूजा करते हैं, वे अपने सभी पूर्वजों का उद्धार करके स्वयं परम गति को प्राप्त होते हैं (२०२) । पशु के मुख से मन्त्र प्राप्त करनेवाला पशु ही होता है, इसमें सन्देह नहीं । जो वीर से मन्त्र लेता है, वह वीर और जो 'कौल' से मन्त्र ग्रहण करता है, वह 'ब्रह्मज्ञ' होता है (२०३) । जिसका 'शाक्ताभिषेक' हुआ है, वही 'वीर' है। अपनो इष्ट-देवता की पूजा-विधि से वह पञ्च-तत्त्वों का शोधन कर सकता है किन्तु 'चक्रेश्वर' नहीं बन सकता (२०४) । वीर की हत्या करनेवाला वृथा अर्थात् अवैध मद्य पीनेवाला, वीर-पत्नी-गामी और चोर अर्थात् विप्र का धन, जिसका मूल्य अस्सी रत्ती स्वर्ण तक हो, उसे चुरानेवाला — ये 'महापापी' हैं और इन चार के सम्पर्क में रहनेवाला व्यक्ति पाँचवाँ 'महा-पापी' है (२०५) ।
ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन । ८६ जो पापी लोग कुल-मार्ग, कुल-द्रव्य और कुल-साधक की निन्दा करते हैं, वे अधोगति को पाते हैं (२०६) । रुद्र डाकिनियाँ और रुद्र भैरव देव कौल-द्वेषी मनुष्यों के मांसास्थि का चर्वण कर आनन्दित हो नृत्य करते हैं (२०७) । दयालु, सत्य-निष्ठ और सदा पर-हितैषी व्यक्ति भी कौलों की निन्दा करके किसी भी प्रकार नरक जाने से बच नहीं सकते (२०८) । बहुत प्रकार के प्रयोग और बहुत से कर्म कहे हैं किन्तु एक-मात्र ब्रह्म-परायण 'कौल' का 'कर्म-त्याग' और 'कर्मानुष्ठान'-दोनों समान फल-दायक होते हैं (२०६) । एकमात्र परम ब्रह्म ही त्रिभुवन में व्याप्त होकर अवस्थित है, अतः विश्व की पूजा करने से वह ब्रह्म की ही पूजा होती है क्योंकि सभी वस्तुएँ ब्रह्म से अन्वित हैं अर्थात् अभिन्न हैं (२१०) । हे प्रिये ! फल में आसक्त, काम-परायण और कर्म-काण्ड में लगे हुए व्यक्ति अलग- अलग भावों से अन्य देवताओं की पूजा करने पर भी ब्रह्म का ज्ञान पाते हैं और ब्रह्म में लय हो जाते हैं (२११) । जो सभी वस्तुओं को ब्रह्म में और सभी वस्तुओं में ब्रह्म को देखते हैं, उन्हें ही 'सत्कौल' और जीवन्मुक्त जाने, इसमें सन्देह नहीं (२१२) ।
ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन अपर्णा देवी वर्णाश्रम-भेद के अनुसार धर्म का विवरण सुनकर बड़ी प्रसन्न हुईं और उन्होंने शङ्कर से पूछा (१) । श्री देवी ने कहा-हे प्रभो ! आप सर्वज्ञ हैं । संसार-यात्रा में सफलता हेतु आपने वर्ण और आश्रम के आचार, धर्म और संस्कारों को बताया है (२) । किन्तु कलि-काल के मनुष्य काम-क्रोधादि से बुद्धि-हीन, नास्तिक, श्रद्धालु और सदा इन्द्रिय-सुख चाहनेवाले होंगे (३) । हे ईशान ! मूर्ख लोग आपके बताए अनुष्ठान को न करेंगे, उनकी क्या गति होगी ? इसे विशेष रूप से बतायें (४) । श्री सदाशिव ने कहा-हे देवि ! तुमने उत्तम प्रश्न किया है। तुम जगत् की जननी, जन्म और संसार- बन्धन से छुड़ानेवाली दुर्गा हो (५) । इस चराचर जगत् को तुम्हीं बनाए रहती हो (६) । तुम्हीं पृथ्वी, तुम्हीं जल, तुम्हीं वायु, तुम्हीं अग्नि, तुम्हीं आकाश, तुम्हीं अहङ्कार और तुम्हीं महत्-तत्त्व-स्वरूपा हो (७) । इस संसार में तुम्हीं समस्त जीव, तुम्हीं विद्या, तुम्हीं परम-देवता, तुम्हीं इन्द्रिय-समूह, तुम्हीं मन, तुम्हीं बुद्धि, तुम्हीं जगत् को गति और स्थिति हो (८) । तुम्हीं समस्त वेद, तुम्हीं प्रणव, तुम्हीं समस्त स्मृतियाँ, तुम्हीं महा-भारतादि समस्त संहिता, तुम्हीं निगम, तुम्हीं आगम, तुम्हीं तन्त्र, तुम्हीं सर्व-शास्त्र-मयी, तुम्हीं शिवा (६), तुम्हीं महा- काली, महा-लक्ष्मी, महा-नील-सरस्वती, महोदरी, महा-माया, महा-रौद्री एवं महेश्वरी हो (१०) । तुम्हीं सर्वज्ञा, ज्ञान-मयी हो, अतः तुमसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। हे प्राज्ञे ! फिर भी इस समय तुम जो पूछती हो, उसे तुम्हारी प्रसन्नता के लिए बताता हूँ (११) । हे देवि ! कलियुग के मनुष्यों का आचरण तुमने ठीक ही बताया है। अपने हित की बात जानकर भी तुरन्त सुख देनेवाले पाप में मस्त होकर हिताहित की विवेचना से रहित हो वे सत्पथ पर नहीं चलते। उन लोगों की मुक्ति के लिए जो कर्त्तव्य है, उसे कहता हूँ (१२-१३) । निषिद्ध कर्म करना और विहित कर्म को छोड़ फा०-१२
६० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र देना—ये दोनों बातें ही मनुष्य के दुःख और रोगादि देनेवाले पाप को उत्पन्न करती हैं (१४)। हे कुल-नायिके ! यह पाप दो प्रकार का है—१. केवल अपना अनिष्ट करनेवाला, जैसे सन्ध्यादि दैनिक कर्म न करने से और २. दूसरों का भी अनिष्ट करनेवाला, जैसे ब्रह्म-हत्यादि से (१५) । राज-दण्ड द्वारा दूसरों का अनिष्ट-दायक पाप से मुक्ति पा सकते हैं। प्रायश्चित्त और समाधि द्वारा अन्य प्रकार के पाप से मुक्ति मिलती है (१६) । जो पापी प्रायश्चित्त या राज-दण्ड से पवित्र नहीं होते, वे इस लोक में निन्दित होकर परलोक में नरक से छुटकारा नहीं पाते अर्थात् चिर काल तक नरक में रहते हैं (१७) । हे आद्ये ! पहले राज-शासन का निर्णय बताता हूँ। हे महेश्वरि ! इस शासन के न करने से राजा अधम गति को पाता है (१८) । शासन में राजा भृत्य, पुत्र, प्रिय या अप्रिय—सभी को समान दृष्टि से देखे (१६) । यदि राजा स्वयं पापाचार करता है, तो वह उपवास और दान द्वारा अपने को शुद्ध करे। यदि निर्दोष व्यक्तियों को वह दण्ड दे जाय, तो दान द्वारा उन सभी निर्दोषियों को सन्तुष्ट कर उपवास द्वारा शुद्ध हो (२०) । राजा यदि ऐसा पाप करे, जिसके लिए वह मृत्यु-दण्ड का पात्र बनता हो, तो वह राज्य को छोड़कर वन में जाए और तपस्या द्वारा अपना उद्धार करे (२१) । राजा बड़े पाप के लिए छोटा और छोटे पाप के लिए बड़ा दण्ड न दे (२२) । जिसे बहु-संख्यक् कुमार्गी व्यक्तियों पर शासन करना पड़े, उसे पाप से न डरनेवाले व्यक्ति के छोटे अपराध के लिए बड़ा दण्ड देना भी उचित है (२३) । केवल एक बार अपराध के लिए लज्जा युक्त, प्रतिष्ठित एवं पाप से डरनेवाले व्यक्ति के बड़े पाप के लिए छोटा ही दण्ड देना उचित है (२४) । यदि बहु-मान्य कौल व्यक्ति छोटे अपराध का अपराधी हो या उसी प्रकार का ब्राह्मण व्यक्ति छोटा पाप करे, तो राजा उन्हें वाग्- दण्ड दे (२५) । जो राजा मन्त्रियों के साथ विचार कर न्याय-दण्ड और पुरस्कार का निर्णय नहीं करता, वह महा-पापी होता है (२६) । पुत्र पिता-माता का त्याग न करे, प्रजा राजा का त्याग न करे और विनय-सम्पन्ना पत्नी पति का त्याग न करे; वे अति पापी हों, तभी त्याज्य हैं (२७) । प्रजा के लोग धार्मिक राजा के राज्य, धन और जीवन की यत्न से रक्षा करें अन्यथा उन्हें अधोगति मिलती है (२८ । हे शिवे ! जो जान-बूझकर माता, बहन, पुत्री गमन करते हैं या जान कर बहुत बड़ी हत्या करते हैं या कुल-धर्म का आश्रय लेकर पुनः कुल-कर्मों का अनुष्ठान छोड़ देते हैं और विश्वास-घाती हैं, वे अति-पापी हैं (२६-३०) । माता, बहिन या पुत्री गमन करनेवाले के लिए मृत्यु-दण्ड विहित है; इस कार्य में इच्छा रखनेवाले माता, बहिन या पुत्री के लिए भी यही दण्ड है (३१) । विमाता, बुआ, बहू, सास, गुरु-पत्नी, पितामही, नानी, चाचा की पुत्री, ममेरी बहन, चाची, मामी, भाभी, भतीजी, भांजे की पत्नी, स्वामी की पत्नी, स्वामी की पुत्री या कुमारी गमन करनेवाले पापियों के लिए लिङ्गच्छेद का दण्ड विहित है। इस दुष्कार्य में इच्छा रखनेवाली इन सभी स्त्रियों के पाप-मोचन के लिए नासिका-छेदन और घर से निष्कासन ही दण्ड है (३२-३४) । सपिण्ड की पत्नी या पुत्री और विश्वासी व्यक्ति की पत्नी गमन करनेवाले का सर्वस्व-हरण और मस्तक-मुण्डन ही दण्ड है (३५) । यदि अज्ञानवश पूर्वोक्त किसी नारी के साथ ब्राह्म या शैव विधि से विवाह हुआ हो, तो इस अकार्य का ज्ञान होते ही उस स्त्री का त्याग कर दे (३६) । जो व्यक्ति सजातीय पर-पत्नी गमन करे या जो अपनी अपेक्षा हीन जाति की पर-स्त्री अर्थात् चाण्डालादि अपकृष्ट जाति से भिन्न हीन-वर्ण की पर-स्त्री से गमन करे, उसे पर्याप्त अर्थ-दण्ड और एक मास तक कण-भोजन का दण्ड दे (३७) हे वरानने ! जानकर ब्राह्मणी-गमन करने- वाले क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या सामान्य जाति के व्यक्ति का लिङ्गच्छेद-रूप दण्ड कहा है (३८) । इस कर्म में इच्छा रखनेवाली ब्राह्मणी को विकृत अर्थात् अङ्ग-हीना कर राजा देश से निकाल दे और जो वीराचारियों की पत्नी से गमन करे, उसका लिङ्गच्छेद और इस कुक्रिया में आसक्त वीर-पत्नी आदि को विकृता कर देश से निकालना
ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन । ६१ ही दण्ड है (३६) । जो पापी प्रतिलोम अर्थात् उच्च-जातीय पर-स्त्री के साथ कुक्रिया करे, उसका सर्वस्व-हरण कर उसे तीन मास तक कण-भोजन का दण्ड दे (४०)। इस दुष्कर्म में इच्छा रखनेवाली सभी स्त्रियों के लिए भी ऐसा ही दण्ड है। यदि पत्नी पर अन्य बलात्कार करे, तो स्वामी उस पत्नी का त्याग करे किन्तु उसका पालन-पोषण उसे करना होगा (४१) ब्राह्मी या शैवी भार्या यदि इच्छा या अनिच्छा से एक बार पर-पुरुष-गता हो, तो उसका त्याग सर्वथा उचित है (४२)। हे देवेशि ! वाराङ्गना (वेश्या) या गो आदि पशु-योनि से गमन करनेवाले की शुद्धि तीन रात्रि कण-भोजन से होती है (४३) । जो पापी स्त्रियों के गुह्य में गमन करते हैं, उन्हें राजा मृत्यु-दण्ड दे (४४)। यदि कोई व्यक्ति बलात्कार से चाण्डाल-कन्या भी गमन करे, तो उसे मृत्यु-दण्ड दे (४५)। जो कन्याएँ ब्राह्म या शैव विवाह द्वारा परिणीता हैं, वे ही भार्यायें हैं। उनसे भिन्न स्त्रियाँ पर-स्त्रियाँ हैं (४६)। जो व्यक्ति सकाम होकर पर-स्त्री का दर्शन करे, वह एक दिन उपवास कर शुद्ध होता है। जो व्यक्ति सकाम होकर पर-स्त्री से एकान्त में बातें करता है, वह दो दिन उपवास करके और जो पर-स्त्री को छूता है, वह चार दिन उपवास करके तथा जो पर-स्त्री का आलिङ्गन करता है, वह आठ दिन उपवास कर शुद्ध हो सकता है (४७) । जो कुलाङ्गना सकामा होकर पर-पुरुष के साथ यह सब करती है, वह भी उक्त अनुसार अपने को शुद्ध कर सकती है (४८) । स्त्रियों को कुत्सित बात कहने, उनके गुप्त स्थान को देखने, उन्हें देखकर हँसने पर दो दिन के उपवास द्वारा शुद्धि होती है (४६) । जो व्यक्ति अपने को नङ्गा दिखाता है और जो दूसरे को नंगा करता है, वह तीन रात्रि तक आहार छोड़ने से शुद्ध होता है (५०) । यदि पति अपनी पत्नी के पर-पुरुष- संसर्ग को प्रमाणित कर दे, तो राजा उस व्यभिचारिणी स्त्री और उसके उप-पति को शास्त्रानुसार दण्ड दे (५१)। यदि स्वामी पत्नी के उप-पति-संसर्ग को प्रमाणित करने में असमर्थ हो, तो उस स्त्री का परित्याग कर उसका भरण-पोषण करता रहे, यदि वह स्त्री पति के आदेश में रहे (५२)। स्वामी पत्नी को उप-पति से रत देखकर यदि तुरन्त स्त्री-सहित उपपति को मार डाले, तो राजा उसे कोई दण्ड न दे (५३) । जहाँ जाने या जिससे बात करने को पति ने मना किया है, वहाँ यदि कुल-स्त्री जाती है या बात करती है, तो वह पति द्वारा त्याज्या है (५४) । स्वामी की मृत्यु होने पर पति के बन्धुओं के पास या उनके अभाव में पितृ-कुल के अधीन रह कर अपने धर्म का पालन करनेवाली स्त्री पति की सारी सम्पत्ति पाती है (५५)। विधवा दो बार भोजन, परान्न-भोजन, मैथुन, आमिष-भोजन, भूषण, पलंग पर सोना, रक्त वस्त्र पहनना छोड़ दे (५६) । वैधव्य धर्म स्वीकार कर सुगन्धि-द्रव्य शरीर में न लगाए, ग्राम्य आलाप छोड़ दे, सदा देव-पूजा में लगी रहकर समय बिताए (५७) । जिस बालक के पिता, माता या पितामह नहीं हैं, उसके पालन के लिए मातृ-कुल के मातृ-बन्धु प्रशस्त हैं (५८) । नानी, नाना, मामा, ममेरे भाई और नाना के भाई—ये सब मातृ-बन्धु हैं (५६) । आजी, बाबा, चाचा, चचेरे भाई, बाबा के भाई—ये सब पितृ-बन्धु हैं (६०) । सास, ससुर, देवर, देवर-पुत्र, पति की बहन के पुत्र, ससुर के भाई—ये सब पति-बान्धव हैं (६१) । पिता, माता, बाबा, आजी, पत्नी, पुत्र-हीन नाना- नानी—इन सबके दरिद्र होने पर राजा यथा-शक्ति इन्हें अन्न-वस्त्र प्रदान करे (६२-६३) । अपनी पत्नी को दुर्वाक्य कहने पर एक दिन, पत्नी को पीटने पर तीन रात्रि और पीटने से यदि पत्नी का खून गिरे तो सात रात्रि तक भोजन का त्याग करे (६४) । क्रोध या मोह-वश भार्या को माता, बहन या बेटी कहे, तो सात रात्रि उपवास करने से शुद्धि होती है (६५) । कन्या का विवाह नपुंसक से हो और बहुत समय बीतने पर भी यह बात मालूम हो तो राजा उस कन्या का पुनः विवाह कराए, यही शिवोक्त विधि है (६६) । यदि कन्या विवाहिता होकर पति के सहवास के पूर्व
६२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र विधवा हो जाय, तो पिता उसका पुनर्विवाह करे। शैव धर्म में ऐसी ही विधि है (६७)। विवाह के बाद बारह पक्ष अर्थात् छः मास में या स्वामी की मृत्यु के एक वर्ष बाद जो स्त्री परिपुष्ट सन्तान को जन्म दे, वह उस स्वामी की पत्नी नहीं और वह पुत्र भी उसका पुत्र नहीं (६८) । गर्भाधान से पाँचवें महीने के बीच में जो स्त्री जानकर गर्भपात करे, उस स्त्री को और जो व्यक्ति उस गर्भपात का उपाय करे, उसको राजा तीव्र ताड़न द्वारा पीड़ित करे (६६)। पाँचवें मास के बाद जो स्त्री गर्भपात करे, उसे और जो व्यक्ति उसका उपाय करे, उसे हत्या-जन्य पाप होता है (७०) जो क्रूर-कर्मा मनुष्य जानकर नर-हत्या करे, उसे राजा अवश्य मृत्यु-दण्ड दे (७१)। प्रमाद या भ्रम-वश अनजान में मनुष्य-हत्या करनेवाले व्यक्ति को राजा अर्थ-दण्ड एवं कठिन ताड़ना द्वारा शुद्ध करे (७२)। जो स्वयं या अन्य द्वारा वध का उपाय करे, उस पापी को भी अज्ञानपूर्वक हत्या करनेवाले के समान ही दण्ड विहित है (७३)। हे परमेश्वरि ! परस्पर युद्ध करते समय एक को दूसरा मार डाले या आततायी मनुष्य को मारनेवाला पाप-भागी नहीं होता (७४) । पाप करने की इच्छावाला व्यक्ति अन्य का अङ्गच्छेद करे, तो राजा उसका भी अङ्गच्छेदन करे और अन्य पर प्रहार करे, तो उस पर भी प्रहार करे (७५)। जो पापी ब्राह्मण या गुरु के प्रति प्रहार के लिए डण्डा आदि उठाए, उसे राजा क्रमशः उसकी धन-सम्पत्ति जप्त करके या हस्त-दाहन द्वारा विशुद्ध करे (७६) । शस्त्र द्वारा घायल व्यक्ति की छः मास तक मृत्यु हो जाने पर प्रहार-कर्ता दण्डनीय होता है किन्तु मृत्यु-दण्ड का भागी नहीं होता (७७) । राज्य-विद्रोही, राज्य-हरण का इच्छुक, गुप्त रूप से राज-शत्रुओं का हित चाहनेवाला, राजा-सहित सैन्य का भेद लेनेवाला, राजा से युद्ध करने का इच्छुक, शस्त्र धारण कर प्रजा और पथिकों को पीड़ित करने- वाला—इन सबका विनाश करने से राजा पाप-भागी नहीं होता (७८-७६)। जो व्यक्ति स्वामी की अनिवार्य आज्ञा से नर-हत्या करता है, उसके स्थान पर स्वामी ही मृत्यु-दण्ड का भागी है—हत्या करनेवाला बध्य नहीं है (८०) । असावधान पुरुष के अस्त्र या पशु द्वारा किसी की मृत्यु होने पर अर्थ-दण्ड या शारीरिक दण्ड द्वारा उसकी शुद्धि होती है (८१)। राजा की आज्ञा न माननेवाला, राजा के सामने विवाद करनेवाला, कुल-धर्म की निन्दा करनेवाला—राजा इन सभी गर्हित व्यक्तियों को दण्डित करे (८२)। पथिकों का धन हरण करने- वाले, क्रूर, ठग, भेदिया और लोगों में झगड़ा बढ़ानेवाले दुष्टों को राजा देश से निकाल दे (८३)। जो शुल्क लेकर कन्या या पुत्र का दान करें या जो जानकर नपुंसक को कन्या दें, उन पापियों को राजा देश से निकाल दे (८४)। मिथ्यापवाद द्वारा अन्य का अनिष्ट करने की इच्छा रखनेवाले व्यक्तियों को धर्मज्ञ राजा अपवाद के अनुरूप दण्डित करे (८५)। जो व्यक्ति जिस परिमाण में अनिष्ट करे, उतना ही उस पर अर्थदण्ड कर अनिष्ट- भागी व्यक्ति को राजा धन प्रदान करे (८६)। मणि-मुक्ता या सुवर्णादि धातु के मूल्य का विचार कर चोर के हाथ या दोनों बाहु कटवा दे (८७) । बलपूर्वक भैंस, घोड़ा, गाय आदि पशु, रत्नादि या शिशु-सन्तान के अप- हरण करनेवालों के लिए भी चोर के ही समान दण्ड विहित है (८८)। अन्न या कम मूल्य के द्रव्य के चोर को राजा एक पक्ष या सप्ताह कण-भोजन कराकर शोधित करे (८६) । हे सुर-पूजिते ! विश्वास-घातक या कृतघ्न की निवृत्ति यज्ञ, व्रत, तपस्या या दान आदि किसी प्रायश्चित्त द्वारा नहीं होती (६०)। जो लोग कूट-साक्षी हैं अर्थात् मध्यस्थ होकर जो पक्षपात करते हैं, राजा उन्हें तीव्र दण्ड द्वारा शासित करे और देश से बाहर निकाल दे (६१) । छः, चार या तीन लोगों को साक्षी का प्रमाण है। अभाव में एक व्यक्ति को साक्षी मान्य है, जो प्रसिद्ध और धार्मिक हो (६२)। हे प्रिये ! देश, काल और विषय-विशेष में जो परस्पर-विरुद्ध वाक्य बोलें, उन साक्षियों की बात अग्राह्य है (६३) । अन्धे और बहरे लोगों
ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन | ६३ की बात प्रमाण होती है। मूक (गंगे) और हकलानेवाले का सिर हिलाना स्वीकृति तथा प्रमाण के लिए उनकी लिपि ग्रहण करे (६४) सभी स्थानों में सभी के लिए लिपि ही प्रशस्त प्रमाण है, विशेष कर व्यवहार के स्थान में क्योंकि बहुत समय तक यह नष्ट नहीं होती (६५)। जो व्यक्ति अपने लिए या दूसरे के लिए जाली लिपि करते हैं, उन्हें कूट-साक्षी का दण्ड दूना करके दे (६६) । भ्रम और प्रमाद-रहित व्यक्ति अपने विषय में मात्र एक बार स्वीकार करे, तो बहु साक्षियों के होने पर भी, प्रमाण है (६७)। हे पार्वति ! जिस प्रकार सत्य का आश्रय लेकर सभी पुण्य रहते हैं, उसी प्रकार एकमात्र मिथ्या का आश्रय लेकर सभी पाप रहते हैं (६८) । अतः जो व्यक्ति सत्य-हीन है, वह सब पापों का आश्रय है। ऐसे पापात्मा का ताड़न और दमन करने से राजा पाप का भागी नहीं होता (६६) । 'मैं जो कहूँगा, वह सत्य है,' इस प्रकार संकल्प कर कौल गुरु, ब्राह्मण, गङ्गा-जल, देव-मूर्ति, कुल-शास्त्र, कुलामृत, देव-निर्माल्य—इन सबको स्पर्श कर जो कहा जाता है, उसका नाम 'शपथ' है। यह 'शपथ' लेकर जो मिथ्या बोलता है, वह एक कल्प तक नरक में रहता है (१००-१०१)। जो कार्य पाप-जनक नहीं है, उसका त्याग या ग्रहण, जो 'शपथ' के साथ स्वीकृत हो, वह अवश्य कर्तव्य है (१०२)। स्वीकृत बात का जानकर उल्लंघन करने से एक पक्ष निराहार द्वारा शुद्धि होती है। भ्रम-वश उल्लंघन हो, तो बारह दिन कण-भोजन करने से शुद्धि होती है (१०३) यदि कुल-धर्म का पालन सत्य विधि से न करे, तो वह मोक्ष और मंगल-दायक नहीं होता, उस कौल-व्यक्ति के लिए केवल पाप-जनक ही होता है (१०४) । 'सुरा' द्रव-मयी तारा है अर्थात् द्रव-पदार्थ के रूप में परिणता 'तारा' है। अतः जीवों के लिए मोक्षदा, भोग और मुक्ति की कारण तथा रोग व विपत्ति की नाशिनी है (१०५) । हे प्रिये ! 'सुरा' सभी पापों को भस्म करती है; 'सुरा' द्वारा जगत् पवित्र है, 'सुरा' सब प्रकार की सिद्धि देती है और 'सुरा' ज्ञान, बुद्धि व विद्या को बढ़ाती है (१०६)। हे आद्ये ! मुक्त, मुमुक्षु, सिद्ध गण, साधक-जन, राजा और देव लोग अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए इसी 'सुरा' का सदा सेवन करते हैं (१०७) । जो शास्त्र में निर्दिष्ट नियम का और सावधान- चित्त से 'सुरा' पान करते हैं, वे पृथिवी पर मर्त्य होकर भी अमर्त्य (अर्थात् देव-समान) होते हैं (१०८)। पञ्च- तत्त्वों में से प्रत्येक तत्त्व विधि-पूर्वक सेवन करने से मनुष्य शिव-स्वरूप होता है और पाँचों तत्त्वों का सेवन करने का क्या फल होता है, उसे मैं नहीं जानता अर्थात् ज्ञान से परे फल होता है (१०६) । यदि विधि को छोड़कर कोई इस वारुणी देवी का पान करता है, तो वह पान करनेवाले की बुद्धि, आयु, यश, धन-सब कुछ नष्ट कर देती है (११०)। जो प्रमत्त चित्त से अत्यधिक 'सुरा' सेवन करता है, उसका धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष-साधक ज्ञान नष्ट हो जाता है (१११)। अति 'मद्य' पीनेवाला कार्याकार्य-विचार-हीन, विभ्रान्त-बुद्धि मनुष्य पग-पग पर अपना और दूसरे का अनिष्ट करता है (११२)। अतः 'मद्य' या मादक वस्तु में अत्यन्त आसक्त व्यक्तियों को राजा या चक्रेश्वर शारीरिक दण्ड या अर्थ-दण्ड द्वारा शुद्ध करे (११३) । 'सुरा' अधिक मात्रा में पी हो या थोड़ी ही मात्रा में, वह 'सुरा'-भेद से, व्यक्ति-भेद से, देश-भेद से और काल-भेद से बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है (११४) । अतः लड़खड़ाती वाणी, काँपते हाथों, डगमगाते पैरों और अस्थिर दृष्टि द्वारा अतिरिक्त पान का निर्णय करे क्योंकि 'सुरा' के परिमाण से अति-पान को नहीं जान सकते (११५) । राजा अवशेन्द्रिय, मद से व्याकुल चित्तवाले और देवता व गुरु की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाले, भय-प्रद, सभी प्रकार के अनर्थ को तैयार, शिव-घाती पापी की जीभ जलवा दे, उसका धन छीन ले और उसे ताड़ना दे (११६-१७)। जिसके पैर, वचन और हाथ विचलित हों; जो भ्रमित, उन्मत्त, उद्धत हो, उस उग्र व्यक्ति को राजा दण्ड देकर उसका धन छीन ले (११८) । जो व्यक्ति मत्त होकर अश्लील वाक्य बोले, लज्जा और भय