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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

शां० भा० ] आगम-प्रकरण २५


निर्बीजतयैव चेत्सति लीनानां सुषुप्तप्रलययोः पुनरुत्थानानुपपत्तिः स्यात् । मुक्तानां च पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः, बीजाभावाविशेषात् । ज्ञानदाह्यबीजाभावे च ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्गः। तस्मात्सबीजत्वाभ्युपगमेनैव सतः प्राणत्वव्यपदेशः सर्वश्रुतिषु च कारणत्वव्यपदेशः ।

अत एव "अक्षरात्परतः परः" (मु० उ० २।१।२) । "सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः" (मु० उ० २।१।२) । "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।९) । "नेति नेति" (बृ० उ० ४।४।२२) इत्यादिना बीजवत्त्वापनयनेन व्यपदेशः । तामबीजावस्थां तस्यैव प्राज्ञशब्द- | और यदि वहाँ ['सत्' शब्दसे] ब्रह्मका निर्बीजरूपसे ही निर्देश करना इष्ट हो तो सुषुप्ति और प्रलय (मरण) अवस्थामें सत्‌में लीन हुए पुरुषोंका फिर उठना [अर्थात् उत्पन्न होना] सम्भव नहीं होगा तथा मुक्त पुरुषोंके पुनः उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा,* क्योंकि [मुक्त और सत्‌में लीन हुए पुरुषोंमें] बीजत्वका अभाव समान ही है। तथा ज्ञानसे दग्ध होनेवाले बीजका अभाव होनेपर ज्ञानकी व्यर्थताका भी प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा। अतः सद्ब्रह्मकी सबीजता स्वीकार करके ही उसका प्राणरूपसे समस्त श्रुतियोंमें कारणरूपसे उल्लेख किया गया है।

इसीलिये "वह पर अक्षरसे भी पर है" "वह बाह्य (कार्य) और अभ्यन्तर (कारण) के सहित [उनका अधिष्ठान होनेके कारण] अजन्मा है" "जहाँसे वाणी लौट आती है" "यह नहीं है यह नहीं है" इत्यादि श्रुतियोंद्वारा शुद्ध ब्रह्मका निर्देश बीजवत्त्वका निरास करके ही किया गया है। उस 'प्राज्ञ' शब्दवाच्य जीवकी, देहादिसम्बन्ध तथा जाग्रत् आदि अवस्थासे रहित,


* क्योंकि निर्बीज ब्रह्ममें लीन हुए मुक्तोंका पुनर्जन्म माना नहीं गया और यदि उस अवस्थामें भी पुनर्जन्म स्वीकार किया जाय तो मुक्तिसे भी पुनर्जन्म होना मानना पड़ेगा।

२६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
वाच्यस्य तुरीयत्वेन देहादिसंबन्ध-जाग्रदादिरहितां पारमार्थिकीं पृथग्वक्ष्यति । बीजावस्थापि न किंचिदवेदिषमित्युत्थितस्य प्रत्ययदर्शनाद्देहेऽनुभूयत एवेति त्रिधा देहे व्यवस्थित इत्युच्यते ॥२॥उस पारमार्थिकी अबीजावस्थाका तुरीयरूपसे अलग वर्णन करेंगे। बीजावस्था भी जाग्रत् होनेपर 'मुझे कुछ भी पता नहीं रहा' ऐसी प्रतीति देखनेसे शरीरमें अनुभव होती ही है। इसीसे 'वह देहमें तीन प्रकारसे स्थित है' ऐसा कहा गया है ॥२॥

विश्वादिका त्रिविध भोग

विश्वो हि स्थूलभुङ्नित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् ।
आनन्दभुक्तथा प्राज्ञस्त्रिधा भोगं निबोधत ॥ ३ ॥

विश्व सर्वदा स्थूल पदार्थोंको ही भोगनेवाला है, तैजस सूक्ष्म पदार्थोंका भोक्ता है तथा प्राज्ञ आनन्दको भोगनेवाला है; इस प्रकार इनका तीन तरहका भोग जानो ॥३॥

स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ।
आनन्दश्च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं निबोधत ॥ ४ ॥

स्थूल पदार्थ विश्वको तृप्त करता है, सूक्ष्म तैजसकी तृप्ति करनेवाला है तथा आनन्द प्राज्ञकी; इस प्रकार इनकी तृप्ति भी तीन तरहकी समझो ॥४॥

उक्तार्थौ श्लोकौ ॥ ३-४ ॥इन दोनों श्लोकोंका अर्थ कहा जा चुका है ॥ ३-४ ॥

त्रिविध भोक्ता और भोग्यके ज्ञानका फल

त्रिषु धामसु यद्भोज्यं भोक्ता यश्च प्रकीर्तितः ।
वेदैतदुभयं यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ॥ ५ ॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण २७

[ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन ] तीनों स्थानोंमें जो भोज्य और भोक्ता बतलाये गये हैं—इन दोनोंको जो जानता है, वह [भोगोंको] भोगते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता ॥ ५ ॥

| त्रिषु धामसु जाग्रदादिषु स्थूलप्रविविक्तानन्दाख्यं भोज्यमेकं त्रिधाभूतम् । यश्च विश्वतैजसप्राज्ञाख्यो भोक्तैकः सोऽहमित्येकत्वेन प्रतिसन्धानाद्रष्टृत्वाविशेषाच्च प्रकीर्तितः; यो वेद तदुभयं भोज्यभोक्तृतयानेकधा भिन्नं स भुञ्जानो न लिप्यते; भोज्यस्य सर्वस्यैकस्य भोक्तुर्भोज्यत्वात् । न ह्यस्य यो विषयः स तेन हीयते वर्धते वा; न ह्यग्निः स्वविषयं दग्ध्वा काष्ठादि तद्वत् ॥ ५ ॥ | जाग्रत् आदि तीन स्थानोंमें जो स्थूल, सूक्ष्म और आनन्दसंज्ञक तीन भेदोंमें बँटा हुआ एक ही भोज्य है और 'वह मैं हूँ' इस प्रकार एकरूपसे अनुसंधान किये जाने तथा द्रष्टृत्वमें कोई विशेषता न होनेके कारण विश्व, तैजस और प्राज्ञनामक जो एक ही भोक्ता बतलाया गया है—इस प्रकार भोज्य और भोक्त्तारूपसे अनेक प्रकार विभिन्न हुए इन दोनों (भोक्ता और भोज्य) को जो जानता है वह भोगता हुआ भी लिप्त नहीं होता, क्योंकि समस्त भोज्य एक ही भोक्ताका भोग है। जैसे अग्नि अपने विषय काष्ठादिको जलाकर [न्यूनाधिक नहीं होता अपने स्वरूपमें सदा समान रहता है] उसी प्रकार जिसका जो विषय होता है वह उस विषयकें कारण ह्रास अथवा वृद्धिको प्राप्त नहीं होता ॥५॥ |

प्राण ही सबकी सृष्टि करता है—

प्रभवः सर्वभावानां सतामिति विनिश्चयः । सर्वं जनयति प्राणश्चेतोंऽशून्पुरुषः पृथक् ॥ ६ ॥

२८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

यह सुनिश्चित बात है कि जो पदार्थ विद्यमान होते हैं उन्हीं सबकी उत्पत्ति हुआ करती है । बीजात्मक प्राण ही सबकी उत्पत्ति करता है और चेतनात्मक पुरुष चैतन्यके आभासभूत जीवोंको अलग-अलग प्रकट करता है ॥६॥

सतां विद्यमानानां स्वेनाविद्याकृतनामरूपमायास्वरूपेण सर्वभावानां विश्वतैजसप्राज्ञभेदानां प्रभव उत्पत्तिः । वक्ष्यति च—<br>“वन्ध्यापुत्रो न तत्त्वेन मायया वापि जायते” इति । यदि ह्यसतामेव जन्म स्याद्ब्रह्मणोऽव्यवहार्यस्य ग्रहणद्वाराभावादसत्त्वप्रसङ्गः । दृष्टं च रज्जुसर्पादीनामविद्याकृतमायाबीजोत्पन्नानां रज्ज्वाद्यात्मना सत्त्वम् । न हि निरास्पदा रज्जुसर्पमृगतृष्णिकादयः क्वचिदुपलभ्यन्ते केनचित् । यथा रज्ज्वां प्राक्सर्पोत्पत्ते रज्ज्वात्मना सर्पः सन्नेवासीत्, एवं सर्वभावानामुत्पत्तेः प्राक्प्राणबीजात्मनैव सत्त्वम् । इत्यतः श्रुतिरपि वक्ति—<br>“ब्रह्मैवेदम” (मु० उ० २।२।११)<br>“आत्मैवेदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १।४।१) इति ।सत् अर्थात् अपने अविद्याकृत नामरूपात्मक मायिक स्वरूपसे विद्यमान विश्व, तैजस और प्राज्ञ भेदवाले सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति हुआ करती है। आगे (प्रक० ३ का० २८ में) यह कहेंगे भी कि “वन्ध्यापुत्र न तो वस्तुतः और न मायासे ही उत्पन्न होता है।” यदि असत् (स्वरूपसे अविद्यमान) पदार्थोंकी ही उत्पत्ति हुआ करती तो अव्यवहार्य ब्रह्मको ग्रहण करनेका कोई मार्ग न रहनेसे उसकी असत्ताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता । अविद्याकृत मायामय बीजसे उत्पन्न हुए रज्जुसर्पादिकी भी रज्जु आदिरूपसे सत्ता देखी गयी है । किसी भी पुरुषने निराश्रय रज्जुसर्प अथवा मृगतृष्णा आदि कभी नहीं देखे । जिस प्रकार सर्पकी उत्पत्तिसे पूर्व वह रज्जुमें रज्जुरूपसे सत् ही था उसी प्रकार समस्त पदार्थ अपनी उत्पत्तिसे पूर्व प्राणात्मक बीजरूपसे सत् ही थे। इसीसे श्रुति भी कहती है—“यह ब्रह्म ही है” “पहले यह आत्मा ही था” इत्यादि ।

शां० भा० ] आगम-प्रकरण २९


सर्वं जनयति प्राणश्चेतों-शूनंशव इव रवेश्चिदात्मकस्य पुरुषस्य चेतोरूपा जलार्कसमाः प्राज्ञतैजसविश्वभेदेन देवतिर्यगादिदेहभेदेषु विभाव्यमानाश्चेतोंशवो ये तान्पुरुषः पृथग्विषयभावविलक्षणानग्निविस्फुलिङ्गवत् सलक्षणाञ्जलार्कवच्च जीवलक्षणांस्त्वितरान् सर्वभावान् प्राणो बीजात्मा जनयति “यथोर्णनाभिः” (मु० उ० १।१ ।७) “यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २।१।२०) इत्यादिश्रुतेः ॥६॥सब पदार्थोंको [बीजरूप] प्राण ही उत्पन्न करता है। तथा जो जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान देव, मनुष्य और तिर्यगादि विभिन्न शरीरोंमें प्राज्ञ, तैजस एवं विश्वरूपसे भासमान चिदात्मक पुरुषके किरणरूप चिदाभास हैं, उन विषयभावसे विलक्षण तथा अग्निकी चिनगारी और जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान सजातीय जीवोंको पुरुष अलग ही उत्पन्न करता है। उनके सिवाय अन्य समस्त पदार्थोंको बीजात्मक प्राण उत्पन्न करता है, जैसा कि “जिस प्रकार मकड़ी [जाला बनाती है]” तथा “जैसे अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ॥६॥

सृष्टिके विषयमें भिन्न-भिन्न विकल्प

विभूतिं प्रसवं त्वन्ये मन्यन्ते सृष्टिचिन्तकाः ।
स्वप्नमायासरूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिता ॥ ७ ॥

सृष्टिके विषयमें विचार करनेवाले दूसरे लोग भगवान्‌की विभूतिको ही जगत्की उत्पत्ति मानते हैं तथा दूसरे लोगोंद्वारा यह सृष्टि स्वप्न और मायाके समान मानी गयी है ॥७॥

३० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


विभूतिर्विस्तार ईश्वरस्य सृष्टि-यह सृष्टि ईश्वरकी विभूति यानी
रिति सृष्टिचिन्तका मन्यन्ते नउसका विस्तार है—ऐसा सृष्टिके
तु परमार्थचिन्तकानां सृष्टावादरविषयमें विचार करनेवाले लोग मानते
इत्यर्थः। "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूपहैं। तात्पर्य यह है कि परमार्थ-चिन्तन करनेवालोंका सृष्टिके विषयमें आदर नहीं होता; जैसा कि "इन्द्र (परमात्मा) मायासे अनेक रूप-
ईयते" (बृ० उ० २।५।१९)वाला हो जाता है" इस श्रुतिसे सिद्ध
इति श्रुतेः। न हि मायाविनंहोता है, [केवल बहिर्मुख पुरुष ही उसकी उत्पत्तिके विषयमें तरह-
सूत्रमाकाशे निक्षिप्य तेनतरहकी कल्पना किया करते हैं]।
सायुधमारुह्य चक्षुर्गोचरतामतीत्यआकाशमें सूत फेंककर उसपर शस्त्रोंसहित आरूढ़ हो नेत्रेन्द्रियकी
युद्धेन खण्डशश्छिन्नं पतितंपहुँचसे परे जाकर युद्धके द्वारा अनेकों टुकड़ोंमें विभक्त होकर गिरे
पुनरुत्थितं च पश्यतां तत्कृत-हुए मायावीको पुनः उठता देखने-वाले पुरुषोंको उसकी रची हुई माया
मायादिसत्त्वतत्त्वचिन्तायामादरोआदिके स्वरूपके चिन्तनमें आदर
भवति। तथैवायं मायाविनः सूत्र-नहीं होता। उस मायावीके सूत्र-विस्तारके समान ही ये सुषुप्ति एवं
प्रसारणसमः सुषुप्तस्वप्नादिविका-स्वप्नादिके विकास हैं; तथा उस (सूत्र) पर चढ़े हुए मायावीके
रस्तदारूढमायाविसमश्च तत्स्थःसमान ही उन (सुषुप्ति आदि अवस्थाओं) में स्थित प्राज्ञ एवं
प्राज्ञतैजसादिः। सूत्रतदारूढाभ्या-तैजस आदि हैं। किन्तु वास्तविक
मन्यः परमार्थमायावी स एवमायावी तो सूत्र और उसपर चढ़े हुए मायावीसे भिन्न है और वही
भूमिष्ठो मायाच्छन्नोऽदृश्यमान एवजैसे मायासे आच्छादित रहनेके कारण दिखलायी न देता हुआ ही
स्थितो यथा तथा तुरीयाख्यंपृथिवीपर स्थित रहता है वैसा ही

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ३१


परमार्थतत्त्वम् । अतस्तच्चिन्तायामेवादरो मुमुक्षूणामार्याणां न निष्प्रयोजनायां सृष्टावादर इत्यतः सृष्टिचिन्तकानामेवैते विकल्पा इत्याह—स्वप्नमायासरूपेति । स्वप्नरूपा मायासरूपा चेति ॥७॥तुरीयसंज्ञक परमार्थ तत्त्व भी है । अतः मोक्षकामी आर्य पुरुषोंका उसीके चिन्तनमें आदर होता है । प्रयोजनहीन सृष्टिमें उनका आदर नहीं होता । अतः ये सब विकल्प सृष्टिका चिन्तन करनेवालोंके ही हैं; इसीसे कहा है—'स्वप्नमायासरूपा इति' अर्थात् [ दूसरे इसे ] स्वप्नरूपा और मायारूपा [ बतलाते हैं ] ॥७॥

इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिरिति सृष्टौ विनिश्चिताः ।
कालात्प्रसूतिं भूतानां मन्यन्ते कालचिन्तकाः ॥ ८ ॥

कोई-कोई सृष्टिके विषयमें ऐसा निश्चय रखते हैं कि 'प्रभुकी इच्छा ही सृष्टि है।' तथा कालके विषयमें विचार करनेवाले [ ज्योतिषी लोग ] कालसे ही जीवोंकी उत्पत्ति मानते हैं ॥ ८ ॥

इच्छामात्रं प्रभोः सत्यसंकल्पत्वात्सृष्टिर्घटादिः संकल्पनामात्रं न संकल्पनातिरिक्तम् । कालादेव सृष्टिरिति केचित् ॥८॥भगवान् सत्यसंकल्प हैं; अतः घटादिकी सृष्टि प्रभुका संकल्पमात्र है—उनके संकल्पसे भिन्न नहीं है । तथा कोई-कोई 'सृष्टि कालहीसे हुई है' ऐसा कहते हैं ॥ ८ ॥

भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।
देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥ ९ ॥

कुछ लोग 'सृष्टि भोगके लिये है' ऐसा मानते हैं और कुछ 'क्रीडाके लिये है' ऐसा समझते हैं । [ परन्तु वास्तवमें तो ] यह भगवान्‌का स्वभाव ही है क्योंकि पूर्णकामको इच्छा ही क्या हो सकती है ? ॥ ९ ॥

३२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| भोगार्थं क्रीडार्थमिति चान्ये सृष्टिं मन्यन्ते । अनयोः पक्षयो- र्दूषणं देवस्यैष स्वभावोऽयमिति देवस्य स्वभावपक्षमाश्रित्य, सर्वेषां वा पक्षाणामाप्तकामस्य का स्पृहेति । न हि रज्ज्वादीनामविद्यास्वभाव-व्यतिरेकेण सर्पाद्याभासत्वे कारणं शक्यं वक्तुम् ॥९॥ | दूसरे लोग सृष्टिको 'यह भोगार्थ अथवा क्रीडार्थ है'—ऐसा मानते हैं। 'देवस्यैष स्वभावोऽयम्' इस वाक्यसे देवके स्वभावपक्षका आश्रय लेकर इन दोनों पक्षोंको दोषयुक्त बतलाते हैं। अथवा 'आप्तकामस्य का स्पृहा' यह चौथा पाद सभी पक्षोंको दोष-युक्त बतलानेवाला है; क्योंकि अविद्यारूप अपने स्वभावके विना रज्जु आदिका सर्पादिको अभिव्यक्ति-में कारणत्व नहीं बतलाया जा सकता ॥ ९॥ |

चतुर्थ पादका विवरण

चतुर्थः पादः क्रमप्राप्तो वक्तव्य इत्याह—नान्तःप्रज्ञमित्यादिना । सर्वशब्दप्रवृत्तिनिमित्तशून्यत्वा-त्तस्य शब्दानभिधेयत्वमिति विशेषप्रतिषेधेनैव च तुरीयं निर्दिदिक्षति ।अब क्रमसे प्राप्त हुआ चौथा पाद भी बतलाना है, अतः यही बात 'नान्तःप्रज्ञम्' इत्यादि मन्त्रसे कहते हैं। वह (चौथा पाद) सम्पूर्ण शब्दप्रवृत्तिके निमित्तसे रहित है, अतः शब्दसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिये श्रुति [अन्तःप्रज्ञत्व आदि] विशेष भावका प्रतिषेध करके ही उस तुरीयका निर्देश करनेमें प्रवृत्त होती है।
शून्यमेव तर्हि तत् ।**पूर्व०—**तब तो वह शून्यरूप ही हुआ।
न; मिथ्याविकल्पस्य**सिद्धान्ती—**नहीं; क्योंकि मिथ्या-
शां० भा० ]आगम-प्रकरण३३
निर्निमित्तत्वानुपपत्तेः । न हि रजतसर्पपुरुषमृगतृष्णिकादिविकल्पाः शुक्तिकारज्जुस्थाणूषरादिव्यतिरेकेणावस्त्यास्पदाः शक्याः कल्पयितुम् ।विकल्पका बिना किसी निमित्तके होना सम्भव नहीं है । चाँदी, सर्प, पुरुष और मृगतृष्णा आदि विकल्प [ क्रमशः ] सीपी, रस्सी, ठूंठ और ऊसर आदिके बिना निराश्रय ही कल्पना नहीं किये जा सकते ।
एवं तर्हि प्राणादिसर्वविकल्पास्पदत्वात्तुरीयस्य शब्दवाच्यत्वम् इति न प्रतिषेधैः प्रत्याय्यत्वम् उदकाधारादेरिव घटादेः ।**पूर्व०—**यदि ऐसी बात है तब तो प्राणादि सम्पूर्ण विकल्पका आश्रय होनेके कारण वह तुरीय शब्दका वाच्य सिद्ध होता है; जलके आधारभूत घट आदिके समान [अन्तःप्रज्ञतादिके] प्रतिषेधद्वारा उसकी प्रतीति नहीं करायी जा सकती ।
न; प्राणादिविकल्पस्यासत्त्वाच्छुक्तिकादिष्विव रजतादेः । न हि सदसतोः सम्बन्धः शब्दप्रवृत्तिनिमित्तभागवस्तुत्वात् । नापि प्रमाणान्तरविषयत्वं स्वरूपेण गवादिवत् ; आत्मनो निरुपाधिकत्वात् । गवादिवन्नापि जातिमत्त्वमद्वितीयत्वेन सामान्यविशेषाभावात् । नापि क्रियावत्त्वं पाचकादिवदविक्रियत्वात् ।**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; क्योंकि शुक्ति आदिमें प्रतीत होनेवाली चाँदी आदिके समान प्राणादि विकल्प असद्रूप है । तथा सत् और असत्का सम्बन्ध अवस्तुरूप होनेके कारण शब्दकी प्रवृत्तिका हेतु नहीं हो सकता; और न गौ आदिके समान वह स्वरूपसे किसी अन्य प्रमाणका ही विषय हो सकता है, क्योंकि आत्मा उपाधिरहित है । इसी प्रकार अद्वितीयरूप होनेके कारण सामान्य अथवा विशेष भावका अभाव होनेसे उसमें गौ आदिके समान जातिमत्त्व भी नहीं है । और न अविकारी होनेके कारण उसमें पाचकादिके समान क्रियावत्त्व तथा
५-६
३४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
नापि गुणवत्त्वं नीलादिवन्निर्गुणत्वात् । अतो नाभिधानेन निर्देशमर्हति ।निर्गुण होनेके कारण नीलता आदिके समान गुणवत्त्व ही है । इसलिये उसका किसी भी नामसे निर्देश नहीं किया जा सकता ।
शशविषाणादिसमत्वान्निरर्थकत्वं तर्हि ।पूर्व०— तब तो शशशृङ्गादिके समान [ असद्रूप होनेके कारण ] उसकी निरर्थकता ही सिद्ध होती है।
तुरीयावगमस्य सार्थकत्वम्<br>न; आत्मत्वावगमे तुरीयस्यानात्मतृष्णाव्यावृत्तिहेतुत्वाच्छुक्तिकावगम इव रजततृष्णायाः । न हि तुरीयस्यात्मत्वावगमे सत्यविद्यातृष्णादिदोषाणां सम्भवोऽस्ति। न च तुरीयस्यात्मत्वानवगमे कारणमस्ति; सर्वोपनिषदां तादर्थ्येनोपक्षयात् । “तत्त्वमसि” (छा०उ०६।८-१६) ; “अयमात्मा ब्रह्म” (बृ० उ० २ । ५ । १९) । “तत्सत्यं स आत्मा” (छा० उ० ६ । ८ । १६) “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” ( बृ० उ० ३ । ४ । १ ) । “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” ( मु० उ० २ । १ । २) । “आत्मैवेदँ सर्वम्” ( छा० उ० ७ । २५ । २ ) इत्यादीनाम् ।सिद्धान्ती— नहीं; क्योंकि शुक्तिका ज्ञान होनेपर जिस प्रकार [ उसमें आरोपित ] चाँदीकी तृष्णा नष्ट हो जाती है उसी प्रकार तुरीय हमारा आत्मा है—ऐसा ज्ञान होनेपर वह अनात्मसम्बन्धिनी तृष्णाको निवृत्त करनेका कारण होता है । तुरीयको अपना आत्मा जान लेनेपर अविद्या एवं तृष्णादि दोषोंकी सम्भावना नहीं रहती । और तुरीयको अपने आत्मस्वरूपसे न जाननेका कोई कारण भी नहीं है, क्योंकि “तत्त्वमसि” “अयमात्मा ब्रह्म” “तत्सत्यं स आत्मा” “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” “आत्मैवेदँ सर्वम्” इत्यादि समस्त उपनिषद्वाक्योंका पर्यवसान इसी अर्थमें हुआ है ।
शां० भा० ]आगम-प्रकरण३५
सोऽयमात्मा परमार्थपरमार्थ-रूपश्चतुष्पादित्युक्तस्तस्यापरमार्थ-रूपमविद्याकृतं रज्जुसर्पादिसममुक्तं पादत्रयलक्षणं बीजाङ्कुरस्थानीयम् । अथेदानीमबीजात्मकं परमार्थस्वरूपं रज्जुस्थानीयं सर्पादिस्थानीयोक्तस्थानत्रयनिराकरणेनाह—नान्तःप्रज्ञमित्यादि ।वह यह आत्मा परमार्थ और अपरमार्थरूपसे चार पादवाला है—ऐसा कहा है । उसका बीजाङ्कुरस्थानीय पादत्रयस्वरूप अपरमार्थरूप रज्जुसर्पादिके समान अविद्याजनित कहा गया है । अब सर्पादिस्थानीय उक्त तीनों पादोंका निराकरणकर 'नान्तःप्रज्ञम्' इत्यादिरूपसे उसके रज्जुस्थानीय अबीजात्मक परमार्थस्वरूपका वर्णन करते हैं—

तुरीयका स्वरूप

नान्तःप्रज्ञं न वहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥७॥

[ विवेकीजन ] तुरीयको ऐसा मानते हैं कि वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ है, न उभयतः (अन्तर्बहिः) प्रज्ञ है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ है, और न अप्रज्ञ है । बल्कि अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राहा, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, प्रपञ्चका उपशम, शान्त, शिव और अद्वैतरूप है । वही आत्मा है और वही साक्षात् जाननेयोग्य है ॥७॥

नन्वात्मनश्चतुष्पात्त्वं प्रतिज्ञाय पादत्रयकथनेनैव चतुर्थस्यान्त-पूर्व—किन्तु आत्मा चार पादोंवाला है—ऐसी प्रतिज्ञाकर उसके तीन पादोंका वर्णन कर देनेसे ही
३६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
(संस्कृत)(हिन्दी अनुवाद)
प्रज्ञादिभ्योऽन्यत्वे सिद्धे नान्तः-<br>प्रज्ञमित्यादिप्रतिषेधोऽनर्थकः ।चौथे पादका अन्तःप्रज्ञादि विशेषणों-<br>से भिन्न होना तो सिद्ध ही है; अतः<br>यह “नान्तःप्रज्ञम्” इत्यादि प्रतिषेध<br>तो व्यर्थ ही है ।
(आत्मावगतौ अनात्मप्रतिषेध एव प्रमाणम्)<br>न; सर्पादिविकल्पप्रतिषेधेनैव<br>रज्जुस्वरूपप्रतिपत्ति-<br>वत्त्रयवस्थस्यैवात्म-<br>नस्तुरीयत्वेन प्रति-<br>पिपादयिषितत्वात्,<br>तत्त्वमसीतिवत् । यदि हि त्र्यव-<br>स्थात्मविलक्षणं तुरीयमन्यत्तत्प्र-<br>तिपत्तिद्वाराभावाच्छास्त्रोपदेशा-<br>नर्थक्यं शून्यतापत्तिर्वा ।<br>रज्जुरिव सर्पादिभिर्विकल्प्य-<br>माना स्थानत्रयेऽप्यात्मैक एवान्तः-<br>प्रज्ञादित्वेन विकल्प्यते यदा<br>तदान्तःप्रज्ञत्वादिप्रतिषेधविज्ञान-<br>प्रमाणसमकालमेवात्मन्यनर्थप्रप-<br>ञ्चनिवृत्तिलक्षणफलं परिसमाप्तम्,<br>इति तुरीयाधिगमे प्रमाणान्तरं<br>साधनान्तरं वा न मृग्यम् ।**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है;<br>क्योंकि जिस प्रकार सर्पादि विकल्प-<br>का प्रतिषेध करनेसे ही रज्जुके<br>स्वरूपका ज्ञान हो जाता है उसी<br>प्रकार, जैसा कि “तत्त्वमसि” इत्यादि<br>वाक्यमें देखा जाता है, यहाँ<br>[जाग्रदादि] तीनों अवस्थाओंमें स्थित<br>आत्माका ही तुरीयरूपसे प्रतिपादन<br>करना इष्ट है । यदि तुरीय आत्मा<br>अवस्थात्रयविशिष्ट आत्मासे सर्वथा<br>भिन्न होता तो उसकी उपलब्धिका<br>कोई उपाय न रहनेके कारण<br>शास्त्रोपदेशकी व्यर्थता अथवा<br>शून्यवादकी प्राप्ति हो जाती । जब<br>कि सर्पादि (सर्प, धारा, भूच्छिद्रादि)<br>रूपसे विकल्पित रज्जुके समान<br>[जाग्रदादि] तीनों स्थानोंमें एक ही<br>आत्मा अन्तःप्रज्ञादिरूपसे विकल्पित<br>हो रहा है तब तो अन्तःप्रज्ञत्वादिके<br>प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणकी उत्पत्ति-<br>के समकाल ही आत्मामें अनर्थ-<br>प्रपञ्चकी निवृत्तिरूप फल सिद्ध हो<br>जाता है; अतः तुरीयका साक्षात्कार<br>करनेके लिये इसके सिवा किसी<br>अन्य प्रमाण अथवा साधनकी खोज<br>करनेकी आवश्यकता नहीं है; जैसे

मांडू० भा० ] आगम-प्रकरण ३७

रज्जुसर्पविवेकसमकाल इव रज्ज्वां सर्पनिवृत्तिफले सति रज्ज्यधिगमस्य ।कि रज्जु और सर्पका विवेक होनेके समानकालमें ही रज्जुमें सर्पनिवृत्ति-रूप फलकी प्राप्ति होते ही रज्जुका ज्ञान हो जाता है [उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये] ।
येषां पुनस्तमोऽपनयव्यतिरेकेण घटाधिगमे प्रमाणं व्यापार्यते तेषां छेद्यावयवसम्बन्धवियोग-व्यतिरेकेणान्यतरावयवेऽपि-च्छिदिक्रियाप्रियत इत्युक्तं स्यात् ।किन्तु जिनके मतमें घटज्ञानमें अन्धकारकी निवृत्तिके सिवा किसी और कार्यमें भी प्रमाणकी प्रवृत्ति होती है उनका तो मानों ऐसा कथन है कि छेद्य पदार्थोंके अवयवोंका सम्बन्धविच्छेद करनेके अतिरिक्त भी छेदनक्रियाका वस्तुके किसी एक अवयवमें कोई व्यापार होता है।*
यदा पुनर्घटतमसोर्विवेककरणे प्रवृत्तं प्रमाणमनुपादित्सिततमो-निवृत्तिफलावसानं छिदिरिव-च्छेद्यावयवसम्बन्धविवेककरणे प्रवृत्ता तदवयवद्वैधीभावफला-छेद्य अवयवोंका सम्बन्धच्छेद करनेमें प्रवृत्त छेदनक्रिया जिस प्रकार उसके अवयवोंके विभक्त हो जानेमें समाप्त होनेवाली है उसी प्रकार जब कि घट और अन्धकारका पार्थक्य करनेमें प्रवृत्त प्रमाण अनिष्ट अन्धकारकी

* तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अन्धकारमें रहते हुए घटका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अन्धकारकी निवृत्तिमात्र ही आवश्यक है, अन्य किसी क्रियाकी अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार तुरीयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उसमें आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादिका निषेध ही कर्त्तव्य है। जो लोग घटज्ञानमें अन्धकार-निवृत्तिके सिवा उसके उत्पादक प्रमाणका कोई और व्यापार भी स्वीकार करते हैं वे मानों ऐसा कहते हैं कि छेदनक्रिया छेद्यपदार्थके अवयवोंका सम्बन्धच्छेद करनेके सिवा उसके किसी भी अवयवमें कोई अन्य कार्य भी कर देती है। परन्तु यह बात सर्वसम्मत है कि छेदनक्रियाका अवयवविश्लेषणके सिवा कोई अन्य व्यापार नहीं होता। इसीलिये उनका कथन माननीय नहीं है।

१. यदि प्रमाण अज्ञानका ही निवर्तक है तो विषयके स्फुरण होनेका तो

३८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० कां०

| वसाना तदा नान्तरीयकं घट- | निवृत्तिरूप फलमें ही समाप्त हो जाने- | | विज्ञानं न तत्प्रमाणफलम् । | वाला है तब घटज्ञान तो अवश्यम्भावी है, वह प्रमाणका फल नहीं है । | | न च तद्वदप्यात्मन्यध्यारो- | उसीके समान आत्मामें आरोपित | | पितान्तःप्रज्ञत्वादिविवेककरणे | अन्तःप्रज्ञत्वादिके विवेक करनेमें | | प्रवृत्तस्य प्रतिषेधविज्ञानप्रमाणस्य | प्रवृत्त प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणका, | | अनुपादित्सितान्तःप्रज्ञत्वादिनि- | अनुपादित्सित (जिसका स्वीकार | | वृत्तिव्यतिरेकेण तुरीये व्यापारो- | करना इष्ट नहीं है उस) अन्तःप्रज्ञत्वादि- | | पपत्तिः । अन्तःप्रज्ञत्वादिनि- | की निवृत्तिके सिवा तुरीय आत्मामें | | वृत्तिसमकालमेव प्रमातृत्वादि- | कोई अन्य व्यापार होना सम्भव | | भेदन्निवृत्तेः । तथा च वक्ष्यति— | नहीं है, क्योंकि अन्तःप्रज्ञत्वादिकी | | "ज्ञाते द्वैतं न विद्यते" (माण्डू० | निवृत्तिके समकालमें ही प्रमातृत्वादि | | का० १ । १८) इति । ज्ञानस्य | भेदकी निवृत्ति हो जाती है । ऐसा | | द्वैतनिवृत्तिक्षणव्यतिरेकेण क्षणा- | ही "ज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं | | न्तरानवस्थानात् । अवस्थाने | रहता" इत्यादि वाक्यद्वारा आगे कहेंगे | | चानवस्थाप्रसङ्गादद्वैतानिवृत्तिः । | भी; क्योंकि वृत्तिज्ञानकी भी स्थिति | | | द्वैतनिवृत्तिके क्षणके सिवा दूसरे | | | क्षणमें नहीं रहती; और यदि स्थिति | | | मानी जाय तो अनवस्थाका प्रसङ्ग* | | | उपस्थित हो जानेसे द्वैतकी निवृत्ति |

कोई कारण दिखायी नहीं देता; अतः विषयज्ञान होना ही नहीं चाहिये—ऐसी आशङ्का करके आगेकी बात कहते हैं ।

* अद्वैत-बोधके लिये जिन-जिन प्रमाणोंका आश्रय लिया जाता है वे सब द्वैतप्रपञ्चके ही अन्तर्गत हैं । निखिलद्वैतकी निवृत्ति करनेवाला वृत्तिज्ञान भी वृत्तिरूप होनेके कारण द्वैतके ही अन्तर्गत है । यदि वह सम्पूर्ण द्वैतकी निवृत्ति करके भी बना रहे तो उसकी निवृत्तिके लिये किसी अन्य वृत्तिकी अपेक्षा होगी और उसके लिये किसी तीसरीकी । इस प्रकार अनवस्था दोष उपस्थित हो जायगा और द्वैतकी निवृत्ति कभी न हो पावेगी । इसलिये निखिलद्वैतकी निवृत्ति

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ३९


तस्मात्प्रतिषेधविज्ञानप्रमाणव्यापा-ही नहीं होगी । अतः यह सिद्ध
हुआ कि प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणके
रसमकालैवात्मन्यध्यारोपितान्तः-प्रवृत्त होनेके समकालमें ही आत्मामें
आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादि अनर्थकी
प्रज्ञत्वाद्यनर्थनिवृत्तिरिति सिद्धम्।निवृत्ति हो जाती है ।
नान्तःप्रज्ञमिति तैजसप्रतिषेधः।'अन्तःप्रज्ञ नहीं है' ऐसा कहकर
तैजसका प्रतिषेध किया है; 'बहि-
न बहिष्प्रज्ञमिति विश्वप्रतिषेधः।ष्प्रज्ञ नहीं है' इससे विश्वका निषेध
नोभयतःप्रज्ञमिति जाग्रत्स्वप्नयोःकिया है; 'उभयतःप्रज्ञ नहीं है'
इस वाक्यसे जाग्रत् और स्वप्नके
अन्तरालावस्थाप्रतिषेधः । नबीचकी अवस्थाका प्रतिषेध किया है;
प्रज्ञानघनमिति सुषुप्तावस्थाप्रति-'प्रज्ञानघन नहीं है' इससे सुषुप्तिका
प्रतिषेध हुआ है, क्योंकि वह बीज-
षेधः। बीजभावाविवैकरूपत्वात्।भावमय-अविवेकस्वरूपा है; 'प्रज्ञ
न प्रज्ञमिति युगपत्सर्वविषयप्रज्ञा-नहीं है' इससे एक साथ सब
विषयोंके ज्ञातृत्वका प्रतिषेध किया है;
तृत्वप्रतिषेधः । नाप्रज्ञमित्य-तथा 'अप्रज्ञ नहीं है' इससे
चैतन्यप्रतिषेधः ।अचेतनताका निषेध किया है ।
कथं पुनरन्तःप्रज्ञत्वादीना-किन्तु जब कि अन्तःप्रज्ञत्वादि
धर्म आत्मामें प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं
मात्मनि गम्यमानानां रज्ज्वादौतो केवल प्रतिषेधके ही कारण
उनका रज्जुमें प्रतीत होनेवाले
सर्पादिवत्प्रतिषेधादसत्त्वं गम्यतसर्पादिके समान असत्यत्व कैसे सिद्ध
हो सकता है ? इसपर कहते हैं—
इत्युच्यते । ज्ञस्वरूपाविशेषेऽपिरज्जु आदिमें प्रतीत होनेवाले सर्प,

करनेके उत्तर-क्षणमें ही वृत्तिज्ञान स्वयं भी निवृत्त हो जाता है—यही मत समीचीन है ।

४०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
इतरेतरव्यभिचाराद्रज्जुवादाविव सर्पधारादिविकल्पितभेदवत् सर्वत्राव्यभिचाराद्रज्जुस्वरूपस्य सत्यत्वम् । <br><br> सुषुप्ते व्यभिचरतीति चेन्न । सुषुप्तस्यानुभूयमानत्वात् । “न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४।३।३०) इति श्रुतेः । <br><br> अत एवादृष्टम् । यस्माददृष्टं तस्मादव्यवहार्यम् । अग्राह्यं कर्मेन्द्रियैः। अलक्षणमलिङ्गमित्येतद्-ननुमेयमित्यर्थः । अत एवाचिन्त्यम् । अत एवाव्यपदेश्यं शब्दैः । एकात्मप्रत्ययसारं जाग्रदादिस्थानेष्वेकोऽयमात्मेत्यव्यभिचारी यः प्रत्ययस्तेनानुसरणीयम् । अथ वैक आत्मप्रत्ययःधारा आदि विकल्पभेदोंके समान उनके चित्स्वरूपमें कोई भेद न होनेपर भी परस्पर एक-दूसरेका व्यभिचार होनेके कारण वे असद्रूप हैं । किन्तु चित्स्वरूपका कहीं भी व्यभिचार नहीं है; इसलिये वह सत्य है । <br><br> यदि कहो कि सुषुप्तिमें उसका व्यभिचार होता है तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिका भी अनुभव हुआ करता है; जैसा कि “विज्ञाताकी विज्ञातिका लोप नहीं होता” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । <br><br> इसीलिये वह अदृश्य है । और क्योंकि अदृश्य है इसलिये अव्यवहार्य है तथा कर्मेन्द्रियोंसे अग्राह्य और अलक्षण यानी लिङ्गरहित है । तात्पर्य यह है कि उसका अनुमान नहीं किया जा सकता । इसीसे वह अचिन्त्य है अतएव शब्दोंद्वारा अकथनीय है । वह एकात्मप्रत्ययसार है । अर्थात् जाग्रत् आदि स्थानोंमें एक ही आत्मा है—ऐसा जो अव्यभिचारी प्रत्यय है उससे अनुसरण किये जाने योग्य है ।

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४१


सारं प्रमाणं यस्य तुरीयस्याधिगमे तत्तुरीयमेकात्मप्रत्ययसारम् । "आत्मेत्येवोपासीत" (बृ० उ० १।४।७) इति श्रुतेः । <br><br> अन्तःप्रज्ञत्वादिस्यानिधर्मप्रतिषेधः कृतः। प्रपञ्चोपशममिति जाग्रदादिस्थानधर्माभाव उच्यते। <br><br> अत एव शान्तमविक्रियम्, शिवं यतोऽद्वैतं भेदविकल्परहितम् । चतुर्थं तुरीयं मन्यन्ते; प्रतीयमानपादत्रयरूपवैलक्षण्यात्। <br><br> स आत्मा स विज्ञेय इति प्रतीयमानसर्पभूच्छिद्रदण्डादिव्यतिरिक्ता यथा रज्जुस्तथा तत्त्वमसीत्यादिवाक्यार्थ आत्मा "अदृष्टो द्रष्टा" (बृ० उ० ३।७।२३) "न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते" (बृ० उ० ४।३।२३) इत्यादिभिरुक्तो यः। स विज्ञेयअथवा "आत्मा है—इस प्रकार ही उपासना करे" इस श्रुतिके अनुसार जिस तुरीयका ज्ञान प्राप्त करनेमें एक आत्मप्रत्यय ही सार यानी प्रमाण है वह तुरीय एकात्मप्रत्ययसार है। <br><br> अन्तःप्रज्ञत्वादि स्थानियों (जाग्रत् आदि अवस्थाओंके अभिमानियों) के धर्मोंका प्रतिषेध किया गया, अब 'प्रपञ्चोपशमम्' इत्यादिसे जाग्रत् आदि स्थानों (अवस्थाओं) के धर्मोंका अभाव बतलाया जाता है। इसीलिये वह शान्त यानी अविकारी है; और क्योंकि वह अद्वैत अर्थात् भेदरूप विकल्पसे रहित है, इसलिये शिव है। उसे चतुर्थ यानी तुरीय मानते हैं; क्योंकि यह प्रतीत होनेवाले पूर्वोक्त तीन पादोंसे विलक्षण है। वही आत्मा है और वही ज्ञातव्य है। अतः जिस प्रकार रज्जु अपनेमें प्रतीत होनेवाले सर्प, दण्ड और भूच्छिद्र आदिसे सर्वथा भिन्न है उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका अर्थस्वरूप आत्मा, जिसका कि "अदृश्य होकर भी देखनेवाला है" "द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं होता" इत्यादि श्रुतियोंने प्रतिपादन किया है, [अपनेमें अध्यस्त जाग्रदादि अवस्थाओंसे सर्वथा भिन्न है]। वही ज्ञातव्य है

४२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


इति भूतपूर्वगत्या; ज्ञाते द्वैताभावः ॥ ७ ॥-ऐसा भूतपूर्वगतिसे* कहा जाता हैं, क्योंकि उसका ज्ञान होनेपर द्वैतका अभाव हो जाता है ॥ ७ ॥

तुरीयका प्रभाव

अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक हैं—

निवृत्ते सर्वदुःखानामीशानः प्रभुरव्ययः ।
अद्वैतः सर्वभावानां देवस्तुर्यो विभुः स्मृतः ॥ १० ॥

तुरीय आत्मा सब प्रकारके दुःखोंकी निवृत्तिमें ईशान-प्रभु (समर्थ) है। वह अविकारी, सब पदार्थोंका अद्वैतरूप, देव, तुरीय और व्यापक माना गया है ॥ १० ॥

प्राज्ञतैजसविश्वलक्षणानां सर्वदुःखानां निवृत्तेरीशानस्तुरीय आत्मा । ईशान इत्यस्य पदस्य व्याख्यानं प्रभुरिति । दुःखनिर्वृत्तिं प्रति प्रभुर्भवतीत्यर्थः । तद्विज्ञाननिमित्तत्वादूदुःखनिर्वृत्तेः । <br><br> अव्ययो न व्येति स्वरूपान्न व्यभिचरतीति यावत् । एतत्कुतः यस्मादद्वैतः । सर्वभावानां रज्जु-तुरीय आत्मा प्राज्ञ, तैजस और विश्वरूप समस्त दुःखोंकी निवृत्तिमें ईशान है । 'ईशान' इस पदकी व्याख्या 'प्रभु' है । तात्पर्य यह है कि वह दुःखनिवृत्तिमें समर्थ है, क्योंकि उसका विज्ञान दुःखनिवृत्तिका कारण है । <br><br> अव्यय—जो व्यय (विकार) को प्राप्त नहीं होता; अर्थात् जो स्वरूपसे व्यभिचरित यानी च्युत नहीं होता । क्यों च्युत नहीं होता ? क्योंकि वह अद्वैत है । अन्य सब

* अर्थात् अविद्यावस्थामें आत्मामें जो ज्ञेयत्व मान रखा था उसीका आश्रय लेकर तुरीयको 'ज्ञातव्य' कहा जाता है । वास्तवमें तो जो अव्यवहार्य और अप्रमेय है उसे ज्ञातव्य भी नहीं कहा जा सकता ।

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४३


सर्पवन्मृषात्वात्स एष देवो द्योतनात्तुरीयश्चतुर्थो विभुर्व्यापी स्मृतः ॥१०॥पदार्थ रज्जुमें अध्यस्त सर्पके समान मिथ्या हैं; इसलिये प्रकाशनशील होनेके कारण वह यह देव तुर्य यानी चतुर्थ और विभु यानी व्यापक माना गया है ॥ १० ॥

विश्व और तेजससे तुरीयका भेद

विश्वादीनां सामान्यविशेषभावो निरूप्यते तुर्ययाथात्म्यावधारणार्थम्—तुरीयका यथार्थ स्वरूप समझनेके लिये विश्व आदिके सामान्य और विशेष भावका निरूपण किया जाता है—

कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ ।
प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तौ तुर्ये न सिध्यतः ॥ ११ ॥

विश्व और तैजस—ये दोनों कार्य (फलावस्था) और कारण (बीजावस्था) से बँधे हुए माने जाते हैं; किन्तु प्राज्ञ केवल कारणावस्थासे ही बद्ध है। तथा तुरीयमें तो ये दोनों ही नहीं हैं ॥ ११ ॥

कार्यं क्रियत इति फलभावः ।जो किया जाय उसे कार्य कहते हैं; वह फलभाव है। और जो करता
कारणं करोतीति बीजभावः ।है उसे कारण कहते हैं; वह बीजभाव है। ये उपर्युक्त विश्व और
तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणाभ्यांतैजस तत्त्वके अग्रहण एवं अन्यथा-
बीजफलभावाभ्यां तौ यथोक्तौग्रहणरूप बीजभाव और फलभावसे
विश्वतैजसौ बद्धौ संगृहीताविष्येते ।बँधे अर्थात् सम्यक् प्रकारसे पकड़े हुए माने जाते हैं। किन्तु प्राज्ञ
प्राज्ञस्तु बीजभावेनैव बद्धः ।केवल बीजभावसे ही बँधा हुआ है।
४४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
तत्त्वाप्रतिबोधमात्रमेव हि बीजं प्राज्ञत्वे निमित्तम् । ततो द्वौ तौ बीजफलभावौ तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणे तुर्ये न सिध्यतो न विद्येते न सम्भवत इत्यर्थः ॥११॥तत्त्वका अप्रतिबोधरूप बीज ही उसके प्राज्ञत्वमें कारण है । इससे तात्पर्य यह है कि तुरीयमें वे बीज और फलभावरूप तत्त्वका अग्रहण एवं अन्यथा ग्रहण दोनों ही नहीं रहते; उनकी तो वहाँ रहनेकी सम्भावना ही नहीं है ॥ ११ ॥

प्राज्ञसे तुरीयका भेद

कथं पुनःकारणबद्धत्वं प्राज्ञस्य तुरीये वा तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणलक्षणौ बन्धौ न सिध्यत इति । यस्मात्—किन्तु प्राज्ञकी कारणबद्धता किस प्रकार है ? तथा तुरीयमें तत्त्वका अग्रहण और अन्यथाग्रहणरूप बन्धन कैसे सिद्ध नहीं होते ? इसपर कहते हैं, क्योंकि—

नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् ।
प्राज्ञः किञ्चन संवेत्ति तुर्यं तत्सर्वदृक्सदा ॥ १२ ॥

प्राज्ञ तो न अपनेको, न परायेको और न सत्यको अथवा अनृतको ही जानता है किन्तु वह तुरीय सर्वदा सर्वदृक् है ॥ १२ ॥

आत्मविलक्षणमविद्याबीजप्रसूतं बाह्यं द्वैतं प्राज्ञो न किञ्चन संवेत्ति यथा विश्वतैजसौ। ततश्चासौ तत्त्वाग्रहणेन तमसान्यथाग्रहणबीजभूतेन बद्धो भवति । यस्मात्तुरीयं तत्सर्वदृक्सदा तुरीयादन्यस्या-प्राज्ञ आत्मासे भिन्न अविद्यारूप बीजसे उत्पन्न हुए वहिःस्थित वेद्यपदार्थरूप द्वैतको कुछ भी नहीं जानता, जैसा कि विश्व और तैजस उसे जानते हैं। इसीलिये यह अन्यथाग्रहणके बीजभूत तत्त्वाग्रहणरूप अन्धकारसे बँधा रहता है। और क्योंकि तुरीयसे भिन्न पदार्थका सर्वथा अभाव होनेके