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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

उदारवाद और आदर्शवादका समन्वय मिलता है । वह क्रामवेलका, जिसने इंगलैंडमें कुछ कालके लिये गणतन्त्र स्थापित किया था, वंशज था । वह 'प्यूरिटन' और 'नानकन्फार्मिस्ट' ( आत्मसंयमी और स्वतन्त्र ) मनोवृत्ति- का था । इसीलिये वह 'स्वतन्त्रता' और 'नैतिकता' का प्रेमी था । उसके समयमे मिलकी 'स्वतन्त्रता' और 'अर्थशास्त्र' का पर्याप्त प्रभाव था । अतः वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका पोषक था । ग्रीन राज्यको 'संघोंका संघ' मानता था । इन संघोंका जन्म राज्यके पूर्व हुआ था, राज्य इनका जन्मदाता नहीं । इनका समन्वय करना राज्यका कर्तव्य है । ग्रीन वास्तविक अधिकार राज्यकी देन मानता था । सामाजिक प्रगति तथा नैतिकताकी वृद्धिमें सहायक अधिकार ही वास्तविक अधिकार होते हैं । वह बाहुबलद्वारा राज्यका संचालन और मानवके अधिकारोंकी रक्षा मानता है । परंतु वह बाहुबलको राज्यके व्यक्तिगत अधिकारोंका जन्मदाता नहीं मानता । वह व्यक्तिगत अधिकारोंका स्रोत राज्य और राज्यका आधार जनस्वीकृति मानता है । ग्रीन स्वतन्त्रताका प्रेमी था, परंतु व्यक्तिवादियोंके समान वह स्वेच्छानुसार कार्य करनेको स्वतन्त्रता नहीं मानता था । वह सामाजिक, नैतिक दृष्टिकोणसे प्राप्तियोग्य वस्तु या सुखके लिये कार्य करनेको ही स्वतन्त्रता समझता था । नैतिकताकी वृद्धि सामाजिक भलाईके कार्यकी स्वतन्त्रता ही स्वतन्त्रता है । ग्रीन अनुबन्धवादको इतिहास एवं तर्कके दृष्टिकोणसे मिथ्या कहता है । 'जनस्वीकृति राज्यका आधार है, बाहुबल नहीं' ग्रीनका यह ऐतिहासिक वाक्य है । फिर भी यह लॉकके समान अनुबन्धवादी नहीं था । जनस्वीकृतिपर आधारित राज्य सामान्येच्छासे होना चाहिये । सामान्य भलाईकी सामान्य चेतना उसकी सामान्येच्छाका अर्थ है । जो राज्य ऐसा नहीं, उसका अन्त निश्चित है । ग्रीनकी सामान्येच्छा रूसोके समान जनतन्त्रीय नहीं, किंतु उसके मतानुसार राज्यतन्त्र भी सामान्येच्छाका प्रतिनिधित्व कर सकता है । व्यक्तिगत सम्पत्तिके सम्बन्धमें वह पूँजीपतिका अस्तित्व उचित मानता था; किंतु जमीनदारका नहीं । वह उत्पादनमें जमीनदारोंका हाथ नहीं मानता, अतः वह जमीनदारी प्रथाका विरोधी था । ग्रीनके अनुसार राज्य आदर्श संस्था अवश्य है, परंतु व्यक्तिराज्यका दास नहीं । समाज हितके लिये नागरिक राज्यका विरोध कर सकता है, परंतु बहुमत उसके पक्षमें होना चाहिये । इस तरह राज्यका विरोध किया जा सकता है । परंतु शर्तें कठिन हैं । वह युद्धविरोधी और विश्वसंघद्वारा संसारमें शान्ति स्थापनाका समर्थक था । उसके अनुसार समाजहितका राज्यहितसे अधिक महत्त्व है । राज्य समाजका प्रतिनिधि है, स्वामी नहीं । अतः राज्यको विश्वसमाजकी सामान्य नैतिक चेतनाके अनुसार संचालित होना चाहिये ! यह सामान्य चेतना

शान्तिका पोषक है। उसके मतानुसार 'आदर्श राज्यका ध्येय विश्वशान्ति और सामाजिक प्रगति है।' इस ध्येयकी पूर्तिमें असफल होनेपर राज्यका नागरिकोद्वारा विरोध न्याय-संगत है। ग्रीनके अनुसार 'सामाजिक हितका स्थान व्यक्तिगत इच्छाओं एवं स्वार्थोंसे ऊँचा है।' व्यक्तिवादियोंके नैसर्गिक अधिकारोंका वह विरोधी था। 'समाज हितद्वारा ही व्यक्तिहित हो सकता है।' काण्टके अनुसार ही ग्रीन भी राज्यके नियमोको रुकावटोंकी रुकावट मानता था। अर्थात् नैतिक जीवनकी रुकावटोंको रोकना राज्यके नियमोंका उद्देश्य है। अज्ञानता, दरिद्रताकी हालतमें सच्ची स्वतन्त्रता सम्भव नही। ग्रीनका कहना है कि 'राज्य प्रत्यक्ष तो नही, किन्तु परोक्षरूपसे ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है जिसके द्वारा व्यक्तिकी स्वतन्त्रता और नैतिकताकी वृद्धि हो सके। स्वतन्त्रता एव नैतिकताके प्रतिरोधक तत्त्वोको दूर करना राज्यका कर्तव्य है। अनिवार्य शिक्षा, मद्यविक्रयादि-निषेध ग्रीनकी दृष्टिमे अज्ञान एव प्रमादका निवारक होनेसे अत्यावश्यक है। उसके मतानुसार एक मद्यप स्वतन्त्र नहीं, परतन्त्र ही है, क्योकि इससे वह अपने विवेकका समुचित प्रयोग नहीं कर सकता। स्वच्छ स्वास्थ्यवर्धक गृहनिर्माणके लिये राज्य नागरिकोको बाध्य कर सकता है। श्रमिकोकी दयनीय दशाका सुधार भी राज्यका कर्त्तव्य है।' वर्तमान यान्त्रिक विकास एव उसके द्वारा होनेवाले आर्थिक असंतुलन तथा क्रयशक्तिका ह्रास और मालकी अधिक उपज तथा माल खपतके लिये बाजारोका अभाव आदि समस्याओका समाधान ग्रीनकी व्यवस्थासे सम्पन्न नहीं होता। अतः उसके लिये अतिरिक्त आयके वितरण और यान्त्रिक विकासके अवरोध आदिके लिये रामराज्यवादका आश्रयण अनिवार्य है। रामराज्यकी दृष्टिमें भी जनसम्मति अवश्य अपेक्षित है; क्योकि लोकरञ्जन राजाका मुख्य कार्य है। तथापि जन-स्वीकृतिके विषय सीमित ही है, निस्सीम नही। अनेकविध धर्म, दर्शन, शिल्प, कला आदि विषयोंमें जनसम्मतिकी अपेक्षा नहीं होती। यद्यपि परम्पराप्राप्त राज्य-प्राप्तिमें जन-स्वीकृति मूल नही। फिर भी जनरञ्जनकी दृष्टिसे अपने कार्योंमें जन-सम्मति या जन-स्वीकृति लेना आवश्यक है। इसी तरह जिस न्यायसे ग्रीन व्यक्तिगत पूँजीकी सत्ता मानता है, व्यक्तिगत भूमिकी सत्ता माननेमें भी वही न्याय क्यो न माना जाय? रामराज्यवादकी दृष्टिसे तो भूमि, सम्पत्ति, कल-कारखाना तथा उद्योग-धंधे आदि सभी विषयोमें 'सप्तवित्तागमा धर्म्या' के अनुसार, व्यक्तिगत वैध अधिकार मान्य हैं। शर्त यही है कि अन्याय, अत्याचार, शोषण आदिद्वारा उनकी प्राप्ति न की गयी हो; किन्तु पितृपितामहादि परम्पराके दायसे तथा गाढ़े पसीनेकी कमाई एवं मान- पुरस्कारादिसे प्राप्त की गयी हो। इसकी उपपत्ति पीछे की जा चुकी है। अन्य अंशोंमे ग्रीनका मन्तव्य रामराज्य-सम्मत ही है।

पाश्चात्त्य राजनीति ११३ एफ. एच. ब्रैडले (१८४६-१९२४) का कहना था कि 'मनुष्यका समाजसे बाहर कोई अस्तित्व ही नहीं। समाजद्वारा ही उसे भाषा एवं विचार मिलते हैं। मनुष्यका शरीर एक पैतृक सम्पत्ति है। परन्तु बिना समाजके यह सम्पत्ति प्रगति नहीं कर सकती। व्यक्तित्व-वृद्धिके लिये समाज अनिवार्य है।' उनके अनुसार 'व्यक्तिको समाजमें स्थान चुननेकी स्वाधीनता है। परन्तु चुननेके पश्चात् समाज- सम्बन्धी कर्त्तव्योंका पालन अत्यावश्यक है।' बोसाके (१८४८-१९२३) की प्रसिद्ध पुस्तक 'फिलॉसॉफिकल थ्योरी आफ दि स्टेट' (राज्यका दार्शनिक सिद्धान्त) है। उसके दर्शनमें रूसोकी सामान्येच्छाका विश्लेषण किया गया है। वह राज्यकी इच्छाको सामान्येच्छा मानता था। वह सामाजिक इच्छाके अनुसार कार्य करनेको ही स्वतन्त्रता मानता था। इसीलिये चोर स्वतन्त्र नहीं कहा जा सकता। व्यक्तिकी सामाजिक इच्छा सामान्येच्छासे अभिन्न है, वह राज्यमें निहित है, उसका कहना है कि 'एक चोरके चोरी करनेका कार्य स्वार्थमयी इच्छाका प्रतिबिम्ब है। यह कार्य उसके वास्तविक स्वतन्त्रताके अनुसार नहीं है। न्यायाधीशका चोरको दण्ड देनेका कार्य चोरकी सामाजिक या विवेकशील इच्छाका प्रतीक है। उसके अनुसार चोरकी वास्तविक स्वतन्त्रता चोरी करनेमें नहीं बल्कि दण्ड भोगनेमें है। सामान्येच्छा और सबकी इच्छामें यह भी विभिन्नता मानता है। रूसोकी सामान्येच्छा जनतन्त्रीय है। परन्तु इसके मतानुसार 'सामान्येच्छा राज्यमें ही निहित है, भले ही वह राज्य तानाशाही क्यों न हो। एक तानाशाहकी इच्छा भी इसके अनुसार सामान्येच्छा है।' रूसोके अनुसार राजसत्ता नागरिकोंमें निहित होती है। अतः उसके अनुसार नागरिकोंको स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य करना न्याय-सङ्गत है। परन्तु एक अधिनायककी इच्छाके अनुसार काम करनेके लिये नागरिकको बाध्य किया जा सकता है और इसीको स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य करना कहा जायगा। उसके अनुसार 'राजसत्ताधारी नागरिकोंकी सामाजिक इच्छाके प्रतिबिम्बभूत सामान्येच्छाके अनुसार नियम बनायें, भले ही नागरिक उनका विरोध करे। वह विरोध उनके अज्ञानका ही प्रतीक है। वे राज्यनिहित अपनी सामाजिक इच्छाको नहीं जानते। स्वार्थी तात्कालिक इच्छाके अधीन होकर नियमका विरोध करते हैं। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति नदीमें तैरना चाहता है। दूसरा उसका हितैषी तैरनेसे रोकता है, क्योंकि उसमें घड़ियाल-मगर आदि हैं। जिनसे कि तैरनेवाला खतरेमें पड़ सकता है। तैरनेकी इच्छा स्वार्थी इच्छा है। रोकनेवालेका परामर्श सामाजिक एवं विवेकशील इच्छाके अनुसार है। इसी तरह व्यवस्थापक, सत्ताधारी, सामाजिक, विवेकशील इच्छाका प्रतिनिधि है। विरोधी नागरिक स्वार्थी इच्छाके अनुसार कार्य करता है।' बोसांकेके मतानुसार 'राज्य अनैतिक कार्य नहीं कर सकता।' हीगेलके समान ही बोसांके भी 'अन्ताराष्ट्रिय मा० शा० ८-

१६४ मार्क्सवाद और रामराज्य नैतिकता और अनुबन्धोको स्थान नहीं देता । उसने भी राज्यको साध्य बनाया है, साधन नही । 'राज्य सर्वेसर्वा है ।' अनुबन्धवादमे राज्य कृत्रिम संस्था मानी गयी, व्यक्तिको सर्वोच्च स्थान मिला, सामाजिक हित गौण हो गया । ह्यूम, बेन्थस आदिने उपयोगिताको राज्यके जन्मका कारण कहा । इन्होने राज्यके अनुबन्धवादी और कृत्रिम रूपका खण्डन किया । परंतु उपयोगिताके आधारपर व्यक्तिको सर्वेसर्वा माना । आदर्शवादने राज्यको प्राकृतिक संस्था और व्यक्तिको स्वभावतः सामाजिक प्राणी कहा । इसीलिये प्राणी संस्था या समाज बनाता है । इसी प्रवृत्तिसे राज्य बना । व्यक्तिका राज्यमें रहना आन्तरिक मनोवृत्तिके अनुकूल है । राज्य व्यक्तिकी सामाजिक मनोवृत्तिका प्रतिबिम्ब है । इसमें राज्य साध्य है, व्यक्ति साधन । परंतु भारतीय भावनाके अनुसार 'रञ्जनाद्राजा' के सिद्धान्तानुसार प्रजाका रञ्जन करना ही राजाका कार्य है । प्रजाहितार्थ तथा व्यक्तियोके हितार्थ राजा अपने सर्वस्वका बलिदान करता है— स्नेहं दया च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥ (उत्तररामचरि० १ । १२) व्याधि नास हित जननी गनै न सो सिसु पीर । —के अनुसार यह ठीक है कि कई प्रजाहित ऐसे हो सकते हैं कि जिन्हें सामान्य जन नहीं समझ सकते । परंतु समष्टिमे विशिष्टो एव विशेषज्ञोका अभाव नही रहता । अतः समष्टिकी उपेक्षा कर नियमनिर्माण या समाजकी इच्छाके प्रतिकूल कार्य करनेके लिये बाध्य करना न्यायसङ्गत नही । कहा जा चुका है कि डाक्टरसे आपरेशन कराया जा सकता है, परंतु विरोधी शत्रुको ऐसा करनेकी स्वतन्त्रता नहीं दी जा सकती । सावयववादके अनुसार नागरिक अङ्गहित और राज्य सावयवहित अन्योन्याश्रित है । सावयवराज्यके बिना अवयव नागरिककी बौद्धिक, शारीरिक, नैतिक, आर्थिक प्रगति नहीं हो सकती । समाज या राज्यके बाहर सभ्य-जीवन सम्भव नही होता । इस दृष्टिसे राज्य एक आवश्यक विकार न होकर अनिवार्य प्राकृतिक संस्था है । हाब्सके सत्ताधारी 'दीर्घकाय मानवदेव' (लेवियाथन) के समान ही आदर्शवादियोने भी नागरिकोंके हितार्थ एक 'दीर्घकाय' को समाजशास्त्रमें प्रस्तुत किया। यह 'दीर्घकाय' आदर्शवादियोका राज्य है। हीगेलका राज्य विश्वात्मा या 'सर्वव्यापक विचार-तत्त्व'का प्रतिबिम्ब है। बोसाकेका राज्य 'सामान्येच्छा'- का प्रतीक है। इन सिद्धान्तोकी ओटमे व्यक्तिगत उचित स्वतन्त्रताका भी अपहरण किया गया । नैतिकताकी वृद्धि राज्य तथा नागरिकका सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य माना जाना ही आदर्शवादका भौतिकवादियोसे वैशिष्ट्य है । राजनीति शास्त्रके साथ आचार-

पाश्चात्य राजनीति १६७ शास्त्रका सम्बन्ध महत्त्वकी वस्तु है । किंतु राज्यको अन्तर्राष्ट्रिय नैतिकतासे भी मुक्त मानना राज्यकी पूर्ण निरङ्कुशताका समर्थन है । 'राज्य कोई अनैतिक कार्य कर ही नहीं सकता । युद्धसम्बन्धी अत्याचार अनैतिक नहीं कहे जा सकते' यह सब असंगत एवं मानवता-विरुद्ध है । रामराज्यमें अनिवार्य होनेपर युद्ध आदरणीय अवश्य है, परंतु उसके भी कुछ धर्म हैं, नियम हैं । अत्याचार, क्रूरता वहाँ भी अनैतिक ही है । शस्त्रहीन, अयुद्धयमान, पराङ्मुखका वध आदि यहाँ भी अनैतिक ही है । स्वतन्त्र-बुद्धि-प्रसूत कल्पनाएँ निरङ्कुश होती हैं, इसीलिये पाश्चात्य दार्शनिकोंमें दार्शनिकोंकी परस्पर अत्यन्त विसंगति है । कोई व्यक्तिवादका अतिवाद, कोई समष्टिवादका अतिवाद स्वीकार करते हैं । कोई प्रजा-प्राखर्य, कोई राज्य-प्राखर्यको चरम सीमापर ले जाना चाहते हैं । बिना सुस्थिर शास्त्रीय प्रमाण और बिना प्रामाणिक परम्पराके इन विभिन्न नुस्खोंको आजमानेके लिये विभिन्न राष्ट्ररूपी प्रयोगशालामें प्रयुक्त किया जाता है । कोई भी प्रयोग कुछ सालोंमें ही असफल सिद्ध हो जाते हैं । रामराज्य-प्रणाली ठीक इसके विपरीत है । वह अनादि अनन्त ईश्वरीय अपौरुषेय शास्त्रों एवं आर्ष, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक शास्त्रों तथा प्रामाणिक परम्पराओंके आधारपर स्थिर है । यही प्रणाली ईश्वरराज्य, धर्मराज्य, रामराज्य, पक्षपात-विहीन धर्मसापेक्षराज्य, अध्यात्मवादपर आधारित धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्र आदि नामोंसे प्रसिद्ध है । वह लाखों-करोड़ों नहीं, अरबों वर्षोंसे सफल अनुभूत है । मार्क्सवाद कार्लमार्क्स ( १८१८-१८८३) के केपिटल आदि अनेक ग्रन्थोंद्वारा समाजवाद एवं साम्यवादका परिष्कृत रूप व्यक्त हुआ । यों इसका प्रचलन बहुत पूर्वसे ही था । अफलातून, मोर आदिने तथा उनसे भी पहले कई धार्मिक लोगोंने साम्यवादी समाजका चित्रण किया है । 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की प्रसिद्धि बहुत पुरानी है । किंतु कार्लमार्क्सने साम्यवाद या समष्टिवादको आवश्यक ही नहीं, अपितु अवश्यम्भावी बतलाया । वह एक नयी ऐतिहासिक विश्लेषण-पद्धतिका जन्मदाता तथा पूँजीवादका सर्वश्रेष्ठ समालोचक माना जाता है । फ्रेडरिक एजिल्ससे इन कार्योंमें उसे बड़ी सहायता मिली थी । उसी दर्शनके आधारपर लेनिनके नेतृत्व- में १९१७ मे रूसी क्रान्ति हुई । लेनिनके बाद स्टालिनने इसका नेतृत्व अपने हाथोंमें लिया । चीनमें माओत्सेतुगने साम्यवादका नेतृत्व किया । इन लोगोंने नयी परिस्थितियोंके अनुसार मार्क्सवादकी नयी व्याख्या की ।

११६ मार्क्सवाद और रामराज्य मार्क्सका जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवारमें हुआ। पहले उसने वकालतकी शिक्षा ग्रहण की। फिर वह पत्रकार बना, समय पाकर उसने 'हिगेलवाद'का अध्ययन किया। मानवतावादसे प्रेरित होकर वह श्रमिक आन्दोलनमें अग्रसर हुआ और शीघ्र ही आन्दोलनका नेता बन गया। उसकी जीविकाका आधार उसके लेख एव एंगिल्सकी सहायता ही थी। गरीबी अवस्थामें भी उसने अपना ध्येय नहीं त्यागा। अफलातून, अरस्तू, हीगेलकी श्रेणीमें ही वह भी उच्च दार्शनिक गिना जाता है। 'पावर्टी आफ फिलासफी' 'मेनिफेस्टो आफ कम्युनिस्ट पार्टी' 'एटटिन्थ ब्रूमेयर आफ लूई बोनापार्ट' 'ए कंट्रीब्यूशन टु दी क्रिटिक आफ पोलेटिकल एकानामी' 'दी कैपिटल' 'सिविलवार इन कास' 'दी गोथा प्रोग्राम' 'क्लास स्ट्रगल इन फ्रांस' 'रेवेल्यूशन एंड काउंटर-रेवेल्यूशन' आदि उसके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। एंगिल्स एक धनी व्यवसायी कुटुम्बमे जन्मा था। उसका पिता प्रशाका एक व्यवसायी था। युद्धमे एंगिल्स ब्रिटेनके व्यवसायी नगर मेनचेस्टरमे रहने लगा। वह स्वयं एक मिलमालिक था। उसने मार्क्सको आर्थिक, बौद्धिक दोनो ही प्रकारकी आजन्म सहायता दी। मार्क्सकी मृत्युके बाद कम्यूनिस्ट आन्दोलनका नेतृत्व उसने ही किया। उसने मार्क्सके सिद्धान्तोको विज्ञान तथा दर्शनपर लागू किया। उसकी कई पुस्तके प्रसिद्ध हैं। लेनिन क्रान्तिकारी वॉलशेविक दलका जन्मदाता हुआ। २० वी शताब्दीमे रूसके समाजवादी जनतान्त्रिकदलमे दो पक्ष हो गये। एक वॉलशेविक, दूसरा मेन शेविक। वॉलशेविक दल पहले क्रान्तिकारी था, लेनिन उसका नेता था। बहुत संघर्षोंके बाद १९१७ मे उसके नेतृत्वमे समाजवादी क्रान्ति हुई और जीवन- पर्यन्त वह सोवियत-शासनका प्रमुख सूत्रधार बना रहा। उसकी सारी कृतियाँ ग्यारह ग्रन्थोंमें संकलित हैं। मार्क्सके दर्शनको द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (डाइलेक्टिकल मेटिरियलिज्म) या ऐतिहासिक भौतिकवाद (हिस्टारिकल मेटेरियलिज्म) भी कहा जाता है। यह द्वन्द्वात्मक दृष्टिसे प्राकृतिक घटनाओंकी परख और पहचान करता है। भौतिकवादी दृष्टिसे प्राकृतिक घटनाओकी व्याख्या, कल्पना तथा सिद्धान्तकी विवेचना करता है। स्टालिनके मतानुसार 'मार्क्सवाद अन्धश्रद्धा नहीं है।' अतः उसकी व्याख्या समयानुसार बदलती रहती है। साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रान्तियुगमें लेनिनने उसकी पुनः व्याख्या की थी। इसीलिये लेनिनवादको प्रधानरूपसे सर्व- हाराके अधिनायकत्वका दर्शन कहा जाता है। इतिहास और समाजकी आर्थिक व्याख्या, मूल्य तथा अतिरिक्त मूल्यका सिद्धान्त वर्गसंघर्ष तथा सर्वहाराका अधिनायकत्व उसके दर्शनके मुख्य विषय हैं।

पाश्चात्त्य राजनीति [११७]

मार्क्सने निम्नलिखित वस्तुओको सिद्ध किया— १. वर्गोंका अस्तित्व उत्पादन व्यवस्थाके अनुकूल होता है । दासताके युगमें वर्गोंका अस्तित्व और सङ्घर्ष उस युगकी उत्पादन व्यवस्थाके अनुकूल था। इसी तरह सामन्तशाही एवं पूँजीवादी युगोमे इनका अस्तित्व तथा सङ्घर्ष इन युगोंके उत्पादनके अनुकूल था। २. वर्ग-सङ्घर्ष अनिवार्य रूपसे सर्वहारा दलके अधिनायकत्वका मार्ग प्रशस्त करता है । ३.यह अधिनायकत्व स क्रमणकालिक हेगा । इसके वाद वर्गोंका अन्त हो जायगा और एक वर्गविहीन समाजका जन्म होगा । हीगेलका द्वन्द्ववाद, ब्रिटेनका अर्थशास्त्र, फ्रांसका समाजवादी दर्शनके अध्ययन- द्वारा द्वन्द्वात्मक भौतिकवादके नामसे उसने नये दर्शनका आविर्भाव किया । हीगेलके द्वन्द्ववादमें विचारका प्रमुख स्थान है । उनके मतानुसार 'बाह्य जगत् आन्तरिक विचारोंका ही प्रतिबिम्ब है । परंतु मार्क्सने भौतिक संसारकी ही सत्ता मानी है और उसे आन्तरिक विचारोंका जनक माना है। इस प्रकार दोनोंके द्वन्द्वात्मक प्रणालीमे भेद है । प्रायः इतिहासकार मनुष्यको ही सर्वश्रेष्ठ स्थान देते आये हैं । इतिहासमें परिवर्तन अपूर्व बुद्धि मनुष्योद्वारा ही मानते आये हैं । परंतु मार्क्सवादके अनुसार इतिहासकी प्रगतिमें सर्वप्रधान है अर्थव्यवस्था । आर्थिक ढाँचेपर ही एक युगका सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ढाँचा आश्रित होता है । उत्पादनके साधन और उत्पादनके सम्बन्ध ही आर्थिक ढाँचा हैं। इतिहासके परिवर्तनमें मनुष्यका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, परंतु वह परिस्थितियोंका दास होता है । उसके विचार भी उन्हीं परिस्थितियोपर आश्रित रहते हैं । एक व्यक्ति नेता तभी बन सकता है जब उसकी योजनाएँ तत्कालीन परिस्थितियोंके अनुसार होती हैं ।' अपनी परिस्थिति, अपनी सम्पत्ति, विपत्तिकी प्रतिक्रिया ही आधुनिक दार्शनिकोंका दर्शन होता है । वे अपने सुख-दुःख, राग-द्वेषके संस्कारोंसे घिरे हुए होते हैं । अतः जैसे लाल-पीले चश्मेवालोंको सारा जगत् ही लाल पीला दिखायी देता है, उसी प्रकार अपनी परिस्थितियो तथा भावनाओके अनुसार ही उनकी प्रतिक्रियास्वरूप तर्क तथा सिद्धान्तोका आविष्कार होता है । कामुकके लिये संसार कान्तामय ही उपलब्ध होता है । परिस्थितियोंसे ऊँचे उठे हुए तत्त्वज्ञको संसार ब्रह्ममय दिखायी देता है । गरीबीकी हालतमें आर्थिक कष्टसे पीड़ित मार्क्सके मस्तिष्कमें जैसी प्रक्रिया हुई, वैसा ही मार्क्सीय दर्शन हुआ । आर्थिक कष्टपीड़ित मनुष्य ही अर्थका महत्त्व समझता है । प्यासा पानीका, भूखा भोजनका महत्त्व समझता है । इस दृष्टिसे मार्क्सको संसारमें सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु अर्थ ही प्रतीत हुआ । ब्रह्म, चेतन आत्मा, श्रेष्ठ मनुष्य, धार्मिक, सामाजिक, शाश्वत नियम—सभी महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ उसे अर्थके सामने नगण्य जँचीं।

११८ मार्क्सवाद और रामराज्य यद्यपि— यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ ( महा० शां० प० ८ । १८ ) यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः । स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ॥ ( नीतिशतक ४१ ) अर्थेभ्योऽथ प्रवृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्तस्ततः । क्रियाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ( वाल्मीकिरामायण ६ । ८३ । ३२ ) इत्यादि शब्दोद्वारा शास्त्रोंमें धनका बड़ा महत्त्व बतलाया गया है और यह ठीक भी है, परंतु 'अर्थसे अधिक कुछ है ही नहीं । धार्मिक, आध्यात्मिक नैतिक उन्नतियों तथा तदनुकूल सभी नियम, सबकी आधारभित्ति अर्थ ही है, वही सर्वश्रेष्ठ है, यह समझना तथा अर्थके लिये सनातन सत्य, शाश्वत न्याय, नित्य आत्मा परमात्मा तथा धार्मिक नियमोंका भी परित्याग कर देना तो गरीबी एवं दरिद्रताकी ही शुद्ध प्रक्रिया है । गरीबीमे धनवान्से ईर्ष्या-द्वेष भी होता है । उन्हे मिटा देनेकी इच्छा भी होती है, फिर तदनुकूल कुछ युक्तियाँ तथा तर्क भी ढूँढ लिये जाते हैं । इस तरह अधिकांश पाश्चात्त्य दर्शन विशेषतः मार्क्सदर्शन प्रक्रियावादी दर्शन है । कोई भी समझदार समझ सकता है कि जड़, भौतिक अर्थ स्वयं महत्त्वपूर्ण नहीं है किंतु भोक्ताके भोगका साधन होनेसे ही उसका महत्त्व है । भोक्ताके बिना उसका कुछ भी मूल्य नही है । कोई भी वस्तु भोक्ताद्वारा माँग होनेपर ही मूल्यवान् होती है । भोक्ताकी माँग न होनेपर उसका कुछ भी मूल्य नहीं होता । चेतन पुरुष ही अर्थका उत्पादक, वर्धक एवं रक्षक भी है । फिर भोक्ता या चेतन मनुष्यका महत्त्व कम आँकना, उसे आर्थिक व्यवस्थाओका दास बनाना कहाँतक संगत है ? अवश्य ही सामान्य स्थिति यह है कि बड़े-से-बड़े लोग भी अर्थके दास होते हैं—'अर्थस्य पुरुषो दासः' । सामान्य मनुष्य मनका दास, परिस्थितियोका गुलाम, इन्द्रियोका किंकर एव विषयोका कीड़ा होता है । परंतु विशिष्ट जितेन्द्रिय सयमी प्राणी निश्चय ही मन, इन्द्रिय, भोग, परिस्थिति सबको अपना दास बनाकर उनका स्वामी हो जाता है । अनेक राजाओ, धनवानोने परोपकारके लिये, पुण्यके लिये, अध्यात्मनिष्ठाके लिये धन ही नहीं, शरीर एवं प्राणतक दे दिये हैं । रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, रन्तिदेव, शिवि, दिलीप आदि इसीके उदाहरण हैं । रन्तिदेवने कहा था—

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् । कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥ ( महा० ) 'मुझे राज्य, स्वर्ग, मोक्ष कुछ न चाहिये, केवल प्राणियोंकी दुःख-निवृत्ति ही मुझे इष्ट है।' रामचन्द्र, हरिश्चन्द्रका राज्यत्याग तथा दिलीप एव रन्तिदेवका सर्वस्व त्याग प्रसिद्ध है। समर्थ विद्वान्, महातपा, महात्यागी पुरुष तो इतिहासकी धारा ही बदल सकते हैं, यह प्रत्यक्ष सत्य है। जो तर्कसे इस प्रत्यक्षको मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं, वे प्रत्यक्ष सूर्यको भी अपनी बुद्धि-वैभवसे अधकार वतला सकते हैं । परिस्थितियाँ तथा अवसरके प्रवाहमें बह जाना वैसा ही है, जैसे मुर्देका नदी- प्रवाहमें बहना। बुद्धिमान् साहसी महापुरुष प्रवाहको चीरकर बाहर निकलते हैं और प्रवाहको भी वैसे ही बदल देते हैं, जैसे नदी-प्रवाहमें पड़ा व्यक्ति प्रवाहको काटकर निकलता है और बाँध बाँधकर, नहर निकालकर, प्रवाहका मुँह भी मोड़ देता है। ईर्ष्या-द्वेषकी स्थिति भी सामान्य स्थिति है। उत्तम स्थिति तो यही है कि अपने पुरुषार्थसे अपनी गाढ़ी कमाईके कुछ पैसोंसे ही सतुष्ट रहे। लूटकर, दूसरोंको मारकर धनवान् बनना अच्छा नहीं है। ये सस्कार अभीतक ग्रामीणों, नागरिकों सभीके हृदयोंमें बद्धमूल हैं । ईर्ष्या-द्वेष आदि मनुष्यके दोष हैं, गुण नहीं । मार्क्सवादी इन्हीं विकारोंको उत्तेजित करके उनके द्वारा राजनीतिक समस्या सुलझाना चाहते हैं। स्वार्थ-साधनमें भी नैतिकताका कुछ ध्यान रखा जाता है, परापहरण आदि निन्द्य समझा जाता है। पर मार्क्सके मतसे परकीय वस्तुका अपहरण न्याय ही है; अन्याय नहीं। समष्टिवाद समष्टिवादका भी मार्क्सवादसे अंशतः मतभेद है। उसका स्रोत है फेबियन- वाद और संशोधनवाद। इसे ही 'समाजवादी जनतन्त्र' या 'जनतन्त्रीय समाज- वाद' कहा जाता है। द्वितीय अन्तर्राष्ट्रिय मजदूर-सघके कई दल इसके समर्थक थे। इसे ही सुधारवादी या विकासवादी समाजवाद भी कहा जाता है। इंग्लैण्ड- का मजदूर-दल इसी विचारधाराका है। मिल इस वादका उद्गम है। वार्करने मार्क्सवादसे बचकर ब्रिटेनमें समाजवादी दर्शनका निर्माण किया है। उसने ब्रिटिश व्यक्तिवादी परम्पराके अनुसार सुधारवादी समाजवादकी रूपरेखा प्रस्तुत की है। पीजका कहना था कि 'हम समाजवाद बनाना चाहते हैं, समाजवादी नहीं।' बर्न स्टाइन ( १८५०--१९२२ ) ने मार्क्सवादका सशोधन करते हुए वतलाया था कि 'संसदीय नीतिद्वारा समाजवादकी स्थापना सम्भव है।' मार्क्सने भी अमेरिका और इंग्लैण्डमें समदीय व्यवस्थाद्वारा भी समाजवादकी स्थापनाको सम्भव वतलाया था। एक तरहसे यह दर्शन विधानवादका समर्थक है। इनके अनुसार व्यक्ति विवेकशील होता है, अतः निर्वाचक समाजवादके पक्षमें मतदान करेंगे।

१२० मार्क्सवाद और रामराज्य इसलिये प्रचारद्वारा उन्हे यह बतलाना ही पर्याप्त है कि आधुनिक कुरीतियोका अन्त समाजवादसे ही सम्भव है । निर्वाचनकी सफलतासे समाजवादी सरकार बनेगी । वह शनैः-शनैः पूँजीवादी व्यवस्थाको समाजवादमे परिवर्तन करेगी । मैकडानल्डके अनुसार समाजवाद अवश्यंभावी है, अतः ससदीय नीति और प्रचारद्वारा क्रमेण सुधार करना इनकी नीति है। मार्क्सवाद सुधारवादको सड़ियल मानता है । समष्टिवादियोका समाजवादकी स्थापनाका एक ही लक्ष्य होना चाहिये, फिर अन्य विषयोमें मतभेद रखनेवाले भी उसमें सम्मिलित हो सकते हैं । इनके यहाँ सगठनकी एकतापर जोर है, मार्क्सवादियोंकी तरह दर्शनकी एकता आवश्यक नहीं है । अन्य समाजवादियोके विपरीत समष्टिवादियोका यह भी कहना है कि सामन्तो तथा पूँजीपतियोके अनुपार्जित लाभको राज्यद्वारा समाजहितके लिये प्रयोगमें लाना चाहिये । परतु परोपजीवी पूँजीवादका अन्त वह भी चाहता है । किंतु इस कार्यमें समष्टिवादी शीघ्रता नहीं करना चाहते । इनके मतानुसार खजाना, खान, इस्पात, विद्युत्, यातायात आदि व्यवसायोका शीघ्र ही राष्ट्रिय- करण कर लेना चाहिये । साबुन, तेल, वस्त्र आदि व्यवसायोके परिपक्व होनेपर ही उनका राष्ट्रियकरण होना चाहिये । नाई, बढई, होटल आदि व्यवसायोका व्यक्तिगत संचालन ही वे लाभदायक मानते हैं। शनैः-शनैः-वादी नीति अनुभव- की दृष्टिसे हितकर है। इनके अनुसार पूँजीपति आदिकी पूँजी लेनेपर उन्हें उसका मुआवजा देना उचित है । एटलीके मतानुसार ऐसा न करना अन्याय है । जनमत-निर्वाचन ही उनके परिवर्तनका आधार है । डाक्टर डाल्टनके अनुसार पूँजीवाद एव समाजवादमें गुणात्मक नहीं, अपितु परिमाणात्मक भेद है । समष्टि- वादके अनुसार व्यक्तिगत क्षेत्र धीरे-धीरे कम होना और सामाजिक क्षेत्र बढ़ना चाहिये । इनके मतानुसार आधुनिक जनवाद अपूर्ण है। इसकी पूर्णता होनेपर ही राष्ट्रियकरण समाजके लिये हितकर होगा । ब्रिटिश-मजदूर-दल राजतन्त्रको उपयुक्त सुधारोंद्वारा जनतन्त्रीय बनाना चाहता है। बड़ी धारा-सभाको भी वह जनवादीरूप देना चाहता है । उसके अनुसार छोटी धारा-सभाकी सत्ताका वास्तवीकरण जनवादके लिये नितान्त आवश्यक है । यह कमेटियोकी संख्यामें वृद्धिसे सम्भव है । निर्वाचन तथा प्रचार आदिद्वारा जनतन्त्रकी पुष्टि होती है । ये न राज्यको एकवर्गीय संस्था मानते हैं और न वर्ग-सघर्षको समाजका आधार मानते हैं। इनके अनुसार राज्य एक अवयवी है। नागरिकका एवं राज्यका हित अन्योन्याश्रित है । श्रमिकों एवं पूँजीपतियोका हित अवश्य वर्गीय है, तथापि सामाजिक जीवनमें वर्ग-सहयोगकी भी प्रधानता होती है । ये लोग

पाश्चात्त्य राजनीति १२१ वैयक्तिक स्वतन्त्रताका भी पूर्ण सम्मान करते हैं, परन्तु यह व्यक्तिवादके विपरीत समाजवादी व्यवस्थामे ही सम्भव मानते हैं । ये साम्राज्यके स्थानमें राष्ट्रमण्डल- का समर्थन करते हैं । औपनिवेशिक देशोंमें भी ये आर्थिक, राजनीतिक प्रगति तथा औपनिवेशिक स्वराज्य स्थापित करना चाहते हैं । सर क्रिप्सने राष्ट्रमण्डलको प्रजातन्त्रीय विकासशील संस्था बना दिया था । यह संस्था केन्द्रीकरण एव विकेन्द्रीकरणका प्रतीक है । समष्टिवाद, पूँजीवाद एव साम्राज्यवादके एकाधिकारका और व्यक्तिवाद तथा रूढिवादका भी विरोधी है । साथ ही मार्क्सवाद पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्य एव श्रमिक एकाधिकारका और अधिनायकवाद एव पूर्ण नवीन समाजका भी विरोधी है । वह डार्विनकी पूँजीवादी दुनियाके वैयक्तिक स्वतन्त्रता और साम्यवादी दुनियाकी अर्थयोजनाका समन्वय करना चाहता है । एक तरहसे समष्टिवाद विभिन्न मतोकी खिचड़ी है । रामराज्य-प्रणालीके अनुसार निश्चित शास्त्रानुसारी सिद्धान्तोके बिना स्थिरता नही हो सकती । मार्क्सवादियों तथा समष्टि-वादियोंका सुन्दोपसुन्दन्याया- नुसारा विरोध इन दोनो ही सिद्धान्तोकी त्रुटियोको स्पष्ट करता है ।

सङ्घवाद

१९ वीं सदीके अन्तमें फ्रान्सीसी सङ्घवाद भी मार्क्सवाद एव अराजकता- वादके आधारपर ही बना है । इसका भी अनेक देशोंपर प्रभाव फैला । कोकरके कथनानुसार यह राज्य-विरोधी, देश-भक्ति-विरोधी, सैन्यवाद-विरोधी, राजनीतिक- दल-विरोधी, संसद्-विरोधी, माध्यमवर्ग-विरोधी और सोवियतवाद विरोधी भी है । उस समयके वोलेञ्जर, ग्रेवी-विल्सन, पनामा आदि अनेक भ्रष्टाचारकाण्ड इसके कारण थे । लेवीनके मतानुसार जिस शासनमें नागरिक स्वय निर्माण करे, वही वास्तविक जनवाद है । मार्क्सके अनुसार ये भी देशभक्तिको ढोंग मानते हैं । श्रमिकोकी न कोई मातृभूमि होती है और न कोई देश । भूखो और नंगोंके लिये मातृ-भूमिका आदर्श खोखला है, यह पूँजीपतियोका प्रचार मात्र है । संघवादी सैनिकोसे कहते थे कि 'वे अपने वर्गीय बन्धुओपर गोली न चलायें, क्योंकि वे भी श्रमिक कुटुम्बके ही सदस्य हैं और अन्तमे उन्हे उन्हीमें रहना है ।' वे युद्ध-विरोधी भी थे । इनके मतमे ससदीय नीति एवं वर्ग-सहयोगसे श्रमिकोंका हित नही हो सकता, इसके लिये वर्ग-सघर्ष ही आवश्यक है । वे तोड़-फोड़में, आम हड़ताल करने और वोटमें भाग न लेनेमें विश्वास रखते थे ।

जॉर्ज सोरेलके अनुसार पूँजीपतियोको सदा भयभीत रखना चाहिये । आम हड़ताल प्रोत्साहन एवं प्रेरणाके द्वारा ही सफल होती है । अराजकतावादियोके,

१२२ मार्क्सवाद और रामराज्य अनुसार इनका भावी समाज श्रमिक संघोद्वारा बनेगा। परंतु फ्रान्सके संघ-वादियोंने प्रथम महायुद्धमें क्रान्तिकारी मार्ग छोड़कर राष्ट्रभक्ति और सुधारका मार्ग ग्रहण कर लिया। अन्यत्रके भी संघवादी शिथिल हो गये। इसी तरह इङ्गलैंडका श्रेणी समाजवाद भी कुछ दिन पनपकर खतम हो गया। यह फ्रान्सीसी संघवादका आँग्ल-संस्करण था। ए० जे० पेन्टी, ए० आर० ओरेल, एम० जी० हॉब्सन, जे० डी० एच० कोल इनके प्रमुख विचारक थे। पूँजीवादके अन्तसे ही सब बुराइयोका अन्त मानते थे। इनके अनुसार श्रेणीवादी समाजवाद ही मुख्य जनतन्त्र है। हॉब्सनके अनुसार भावी समाजमे भी राज्यका महत्त्वपूर्ण स्थान होगा। वह एक समाज सेवक संस्था होगी। उसके द्वारा अन्य सामाजिक तथा आर्थिक संस्थाओंका समन्वय होगा। परंतु लोकके अनुसार राज्यका कोई महत्त्वपूर्ण स्थान न होना चाहिये। वह राज्यके स्थानपर कम्यूनकी स्थापना चाहता था। उसके अनुसार राज्यके अधिकार इतने कम होने चाहिये कि वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाय। इसके कार्य-क्रममें व्यावसायिक संघोकी स्थापना महत्त्वपूर्ण है। १९२५ तक वह भी खतम हो गया। वस्तुतः सिद्धान्तकी दृष्टिसे नहीं, किंतु बहुत-से पक्षोकी सफलता परिस्थितियोके अनुकूल हो जाती है। उन परिस्थितियोको बदला जा सकता है अवश्य, परंतु उसमे अनेक साधनों तथा समयकी अपेक्षा होती है। यदि मार्क्सवादियोंकी रूसमें सफलता न होती, तो मार्क्सवादको भी वही हालत होती जो इन दूसरे वादोकी हुई। यदि हिटलरकी जीत हो गयी होती तो भी मार्क्सवाद अबतक मर चुका होता। कई बार शून्यवादियोंकी भी जीत हो जाया करती है, परंतु इससे ही यह नहीं कहा जा सकता कि सिद्धान्त भी वही ठीक है, यह तो 'बन आयेकी बात' है। किसीका सिद्धान्त बहुत श्रेष्ठ हो, परंतु अन्य साधन न हो तो वह केवल सिद्धान्तके आधारपर नहीं जीत सकता। बहुलवाद इसी प्रकार ब्रिटेनमें ही एक सत्तावादका विरोधी बहुलवाद दर्शन प्रकट हुआ। एक सत्तावाद एकात्मव्यवस्थाका समर्थक था। बहुलवादके अनुसार व्यक्ति उसकी स्वतन्त्रता उसके संघोका समर्थक है। लॉस्की मुख्यरूपसे इस दर्शनका वेत्ता था। व्यक्ति अपने अनेक ध्येयोकी पूर्तिके लिये अनेक सङ्घ बनाता है। राज्यद्वारा यह काम पूरा नहीं होता। उसके अनुसार कोई भी संस्था 'मेरे पूरे मैके लिये' नियम नहीं बना सकती। मैकाइवरके अनुसार राज्य अर्थैक्यका प्रतिनिधित्व करता है, परंतु सम्पूर्ण अर्थैक्यका नहीं। संघोकी दृष्टिसे सहयोग

पाश्चात्य राजनीति १२३ एवं संघर्ष विश्वव्यापी है । लॉस्कीके मतानुसार आदर्श नागरिकका सर्वप्रथम कर्तव्य अपनी आत्माकी प्रगति है । वह उसी सत्ताका अनुसरण करेगा, जिसमें उसकी आत्मतुष्टि हो । अतः राज्यसत्ताधारी पदके योग्य तभी हो सकता है, जब वह व्यक्ति प्रगति को पूरी करे । इतिहासके अनुसार संघोंने अनेक बार राज्यकी निरपेक्षताको सीमित किया है । नागरिककी सक्रियता ही सच्चा जनतन्त्र है । यह बहुलवादी सत्तात्मक समाजमें ही सम्भव है । ऑस्टिनके अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय निरपेक्षता भी सम्भव नहीं है । विश्वजनमतको कोई राज्य उल्लङ्घन नहीं कर सकता । लॉस्कीके अनुसार ब्रिटेनका आदेश दृष्टिकोण यह होना चाहिये कि वह विश्व-कल्याणमें अपना कल्याण समझे । उसके अनुसार नैतिक क्षमताको पूर्ण करनेवाली व्यवस्था या नियम मान्य होना चाहिये । यदि अव्यवस्थाका लक्ष्य मानव-प्रगति है, तो वह अन्यायसे कई गुना अच्छी है । व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, व्यक्त-प्रगति और व्यक्ति-सत्ताका अस्तित्व ही उनके दर्शनका सार है । फैसीवाद मुसोलिनी एवं हिटलरके फैसीवाद एवं नाजीवादने डार्विनके संघर्षको बहुत महत्त्व दिया और स्पेंसर आदिके इस पक्षको अपनाया कि 'जो संघर्षमें सफल हो वही जीवित रहे ।' अर्थक्रियाकारित्ववाद इसका प्राण है । उत्कृष्ट जातिका यह प्रकृतिसिद्ध अधिकार है कि वह निकृष्ट जातिका शासन करे । उनके अनुसार मानव-इतिहास एक युद्धकी कहानी है । मानव- प्रगति युद्धके द्वारा ही होती है । इसमें भी वर्गों तथा सोरेलकी भाँति अन्ध श्रद्धाको बढ़ाना आवश्यक माना जाता था । उनके मतानुसार 'जन-समूह एक स्त्रीकी भाँति होता है, जो बलवान् एवं नाटकीय व्यक्तिकी तरफ आकृष्ट होता है । इसीलिये राज्य, देश एवं नेताकी भक्तिको खूब प्रोत्साहन दिया गया, रक्तकी पवित्रतापर भी बहुत बल दिया गया, भौतिकताके स्थानपर आध्यात्मिकता, गौरव, मान, चरित्रको मानव-जीवनका लक्ष्य बतलाया गया । राज्यको साध्य और व्यक्तिको साधन कहा गया । इनके मतानुसार सर्वाधिकारी राज्यके संरक्षणमें ही व्यक्तिकी सर्वविध उन्नति सम्भव है, राज्य ही सर्वेसर्वा है । केन्द्रिय कार्य- पालिका एक प्रकारकी अधिनायककी परामर्श-समिति थी। जनसत्ताके स्थानपर नेतृ- सत्ता ही फैसीवादकी विशेषता थी । रूसी समाजवाद एवं फैसीवाद दोनो ही सर्वाधिकारवादी अधिनायकवादी हैं । समाजवादी जनवादका नाम लेते हैं । फैसीवाद जनवादके स्पष्ट विरोधी थे ।

१२४ मार्क्सवाद और रामराज्य जनवाद जनवादकी व्याख्याएँ भी भिन्न-भिन्न ढंगसे होती रही हैं। अब्राहम लिंकनके अनुसार 'जनताका जनताके लिये जनताद्वारा किया जानेवाला शासन ही प्रजातन्त्र या जनतन्त्र माना जाता है। प्रतिनिधि जनवादका आधार राष्ट्रका सामान्य हित होता है। सुशासनके लिये सामान्यहितको कार्यान्वित करनेके लिये कुछ प्रतिनिधियोंका निर्वाचन होता है। यही 'परोक्ष-जनवाद' है।' आलोचकोंकी दृष्टिमें जनवादका अर्थ 'मूर्खोंपर उनकी अनुमतिद्वारा शासन करना' है। पर यह तो परम सत्य है कि जनवादमे जन-शिक्षा, निष्पक्ष जनमत, राजनीतिक दलोंका अस्तित्व, नागरिकोंका शासनमे सक्रिय भाग, सतर्कता और आदर्श निर्वाचन-व्यवस्था अनिवार्य है। इनके बिना तो जनवाद कोरा दम्भ ही है। राजनीतिक दलोंमें अर्धसैनिक-अनुशासन, नेताओका बोलबाला और पूँजीपतियोंका दलोंपर अधिकार आदि जनवादके बाधक ही हैं। पक्षपातयुक्त प्रचार-साधन—रेडियो, पत्र, सिनेमा आदि—भी बाधक हैं। समाचारपत्र आदि अपने दलों एवं मालिकोंका गुणगान करते हैं। इससे विवेकशीलताको धक्का पहुँचता है। सतर्कता भी इसमे परमावश्यक है। सतर्कता स्वतन्त्रताकी बहिन है। कहा जा चुका है कि एतदर्थ विकेन्द्रीकरण और सक्रियता आवश्यक है। इसीलिये स्थानीय स्वशासनादि आवश्यक होते हैं। प्रतिनिधि जनवादमें योग्य उम्मीदवारोंका मिलना, स्वतन्त्र मतदान, निर्वाचकोंकी योग्यता, निर्वाचन-विधिका सरलता और अल्पव्ययिता आदि भी आवश्यक हैं। यह सब इस समय असम्भव-सा ही हो रहा है। फिर भी इस समय इससे अन्य अच्छी व्यवस्था कोई नहीं है। यदि इसे शस्त्र एव धर्म अथवा सामान्य मानव-धर्मसे भी नियन्त्रित कर दिया जाय तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया, ईश्वर भक्ति आदि सद्गुणोंसे युक्त रामराज्य प्रणालीका जनतन्त्र-राज्य राम-राज्य ही बन सकता है। अराजकतावाद मार्क्सवादियोंसे भी बढ़े-चढ़े अराजकतावादी हैं। इसके प्रवर्तक माइकेल बाकुनिन ( १८१४-१८७६ ) और प्रिंस क्रोपोटकिन ( १८४२-१९१९ ) हुए हैं। उनके मतानुसार क्रान्तिद्वारा पूँजीवादका अन्त होते ही राज्यका भी अन्त हो जाना चाहिये। श्रमिक क्रान्तिके पश्चात् वर्गीय संस्थाका अन्त हो जाना चाहिये। न मर्ज (वर्ग) रहे, न मरीज (राज्य) रहना चाहिये। मार्क्सवादी भी राज्यको वर्ग-विशेषकी ही संस्था मानते हैं। लेनिनके अनुसार भी राज्य दमन-यन्त्र है। किंतु वे विरोधियोंको कुचलनेके लिये उसकी आवश्यकता मानते हैं। परंतु अराजकतावादी इसका विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि 'ऐतिहासिक दृष्टिसे राज्य

आवश्यक नहीं। राज्यकी उत्पत्तिके पहले भी मनुष्य रहते थे और अपने समूहोंमें सुखी एवं स्वतन्त्र जीवन-निर्वाह करते थे । श्रमिक क्रान्तिके बाद भी वैसे ही बिना राज्यके सुखी एवं सम्पन्न रह सकते हैं । वर्गविहीन समाजमें, जो कि श्रमिक क्रान्तिका फल है, वर्गीय संस्था—राज्यकी आवश्यकता ही क्या है ?' अराजकतावादी कहते हैं कि 'इतिहासके अनुसार राज्य कभी भी न्यायपूर्ण नहीं था। व्यक्तिगत सम्पत्तिके द्वारा ही राज्यका जन्म हुआ है । व्यक्तिगत सम्पत्ति एक चोरी है, राज्य इसका रक्षक रहा है। राज्य सदा ही शोषकोंका पक्षपाती तथा शोषितोंके विपरीत रहा है। जो संस्था सदा मजदूरोंके हितोंको कुचलती रही है, उससे मजदूर कैसे प्रेम कर सकता है।' क्रोपोट्किनने कहा है कि 'पूँजीवादी प्रथाके अभावका नाम ही शासन-प्रथाका अभाव है।' अराजकतावादी राज्यको निरङ्कुशताका प्रतीक मानते हैं, चाहे वह राज्य जैसा भी हो । जैसे राजतन्त्र या कुलीनतन्त्रमें अल्पसंख्यकोंद्वारा बहुसंख्यकोंकी स्वतन्त्रताका अपहरण होता है वैसे प्रजातन्त्रके बहुमतद्वारा भी वैयक्तिक स्वतन्त्रताका अपहरण होता है । अराजकतावादियोंके अनुसार 'कोई मनुष्य दूसरेका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। 'अ' का प्रतिनिधि सभामें ठीक 'अ' की भाँति नहीं बोल सकता । फिर समूहोंका प्रतिनिधि तो कोई हो ही कैसे सकता है ? कोई विधान-विशेषज्ञ धारासभाका सदस्य बनता है । वह सफ़ाई, शिक्षा तथा शासनके सम्बन्धमें अनुभवशून्य होता है। फिर उसके द्वारा इन विषयोंके सम्बन्धमें बनाये नियम किस तरह लाभदायक होंगे ? अतः प्रतिनिधियोंकी सरकार वही होती है जो सभी कार्योंको अयोग्यतापूर्वक करती है। निर्वाचनद्वारा जनताकी सामान्य इच्छाएँतक व्यक्त नहीं हो सकतीं। शक्तिका मद तो शासकमें आ ही जाता है।' अराजकतावादियोंके मतानुसार साधारणतया मनुष्य नेक होता है, परंतु पदपर पहुँचते ही वह बुरा हो जाता है । मनुष्य राजनीतिज्ञ होनेसे ही बुरा हो जाता है । गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीका भी कहना है कि अधिकार पाकर किसे गर्व नहीं होता— प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं । अराजकतावादियोंके मतानुसार राज्यके बिना भी मनुष्य खाता, सोता, बोलता, पढता है । जुआड़ी जुएमें हारकर बिना राज्यके दबावके ही रुपया देता है । चोर भी आपसमें समझौता करते ही हैं । कितने ही खेलोंमें खिलाड़ी स्वयं नियम बनाते और उसका पालन करते हैं । इसी तरह राज्यके बिना भी स्वेच्छात्मक संस्थाओंद्वारा सब काम चल सकता है । बाह्य आक्रमणका भी सामना राज्य सेनाकी अपेक्षा जनताकी सेना अधिक अच्छा कर सकती है। अराजकतावादी दण्ड-विधान एवं जेल आदिद्वारा भी सुधारमें विश्वास नहीं करते।

१२६ मार्क्सवाद और रामराज्य क्रोपोट्किनके अनुसार 'जेले पाखण्ड और कायरताकी स्मारक हैं।' वह स्वय रूस और फ्रान्सकी जेलोंमें रहा था । जेलोंके अपने अनुभव बतलाते हुए वह लिखता है कि “जेलोंमें आधेसे अधिक हत्यारे तथा चोर थे, जो अनेक बार जेलोंमें रह चुके थे । दण्डके भयसे प्राणी अपराध नहीं करेगा, यह समझना सर्वथा भ्रम है । एक अपराधी अपराध करते समय यही सोचता है कि वह दण्डसे अपने आपको बचा लेगा । किसी व्यक्तिको फाँसी देनेसे उसके बाल- बच्चे निराश्रित असहाय होकर समाजके लिये अधिक हानिकर सिद्ध हो सकते हैं। अराजकतावादियोंके अनुसार इतिहास बतलाता है कि राज्यने कभी भी उच्च आदर्शकी पूर्ति नहीं की । उसके द्वारा सदा ही दुःख एवं अन्यायको स्थायी- बनानेका प्रयत्न किया गया है। राज्यकर्णधारोंके सदियोंके प्रचारद्वारा राज्य नितान्त आवश्यक वस्तु समझी जाने लगी है। जन्मसे यही सुनते, विद्यालयोंमें पढ़ते और पुस्तकों, लेखों और समाचार-पत्रोंमें राज्यकी आवश्यकताका वर्णन पढ़ते-पढ़ते मनुष्यके मस्तिष्कमें यह बात बैठ जाती है कि राज्य नितान्त आवश्यक संस्था है। कोई भी राजनीतिज्ञ यही कहता है कि 'मुझे अधिकार दीजिये तो मै देशमें घी- दूधकी नदियाँ वहा दूँगा।' राज्यका अन्त हुए बिना इन पाखण्डोंकी समाप्ति नहीं हो सकती। अराजकतावादियोंका अपना कार्यक्रम भी है। उनके मतानुसार 'क्रान्तिके पहले अराजकतावादकी शिक्षा होनी चाहिये। मनुष्य समाज अराजकताकी ओर अग्रसर हो रहा है। क्रोपोट्किन जीवशास्त्रज्ञ था । उसके अनुसार ' मनुष्य जातिने सहयोगद्वारा ही प्रगति की है, प्रतियोगिताद्वारा नहीं । सहयोगद्वारा ही मनुष्यने प्रकृतिपर विजय पायी है, सहयोगद्वारा ही प्राचीन मनुष्य जीवित रहते थे । आधुनिक युगमें भी सहयोगकी मात्रा बढ़ रही है, अतएव स्वेच्छात्मक संस्थाओंकी वृद्धि हो रही है । राज्यके कायोंकी सीमा भी घट रही है । मनुष्य जितना सभ्य होगा उतना ही सहयोगी होता है । सभ्यताकी प्रगतिसे स्वेच्छात्मक संस्थाओंद्वारा राज्य-कार्य सीमित हो रहे हैं । अब थोडे ही प्रयत्नसे राज्यका अन्त एवं स्वेच्छात्मक संस्थाओंका युग आरम्भ होगा, यही अराजकतावादी युग है । वैज्ञानिक तर्कोंद्वारा जनताको अराजकताके पक्षमें कर लेना चाहिये । जनताके मस्तिष्कमें यह विचार कूट-कूटकर भर देना चाहिये कि अराजकतावादी युग अब बहुत ही निकटवर्ती है । जनता स्वागतके लिये तैयार रहे । यह अन्ध- विश्वास नहीं, किंतु वैज्ञानिक सत्य है । इसके लिये क्रान्ति आवश्यक है। अरा- जकतावादी समितियों तथा केन्द्रीय समितिके प्रयत्नसे यह क्रान्ति होगी । इनका भावी समाज साम्यवादी, स्वेच्छावादी और सहयोगवादी होगा । नागरिककी हैसियतसे राज्यसे, उत्पादककी हैसियतसे पूँजीवादसे और मनुष्यकी हैसियतसे शासनमात्रसे स्वतन्त्रता प्राप्त करना अराजकतावादका ध्येय है।

पाश्चात्त्य राजनीति १२७ अराजकतावाद 'पूर्णस्वतन्त्रताका युग है। इसमें जो स्वस्थ और योग्य होगा, वह काम करेगा । २४ से ५० वर्षतक काम करनेकी अवस्था होगी । प्रत्येक व्यक्तिको प्रतिदिन ४ या ५ घंटे काम करना होगा। मनुष्य वेतन और प्रोत्साहनके बिना ही काम करेगा। काम करना मनुष्यका स्वभाव है। मनुष्यको सभी सुगम एव रोचक कार्य ही पसंद होते हैं। अतः भावी समाजमें सभी काम सुगम एव रोचक बना दिये जायेंगे । विज्ञानकी प्रगतिसे कोई काम गंदा न रह जायगा । अराज- कतावादमें उत्पादन एव उपभोगकी वस्तुओमें कोई अन्तर न होगा । भोजन, वस्त्र, साइकिल, मोटर आदिकी सहायतासे, जो कि उपभोगकी वस्तु मानी जाती हैं, मनुष्य उत्पादन भी करता है, अतः सभी वस्तुओंका वितरण अराजकतावादी संघोंद्वारा होगा। पहले बच्चो, बूढ़ो, अङ्गहीनोको उनके आवश्यकतानुसार चीजे दी जायेंगी, फिर अन्य लोगोको पहले जीवनोपयोगी वस्तुएँ दी जायेंगी, फिर आरामकी वस्तुएँ । सामाजिक बहिष्कारसे असामाजिक कायोकी स्वतः निवृत्ति होगी । इतनेपर भी सुधर न होनेपर अपराधीका डाक्टरी इलाज होगा, उमे सुधार-गृहमें भेजा जायगा । मनुष्य अपने सामाजिक समझौतेको भग न करेगा । आधुनिक समाज रचनासे ही मनुष्यमें दुर्गुण आये हैं । सघटनके लिये छोटे छोटे प्रादेशिक सघ होगे । इनमें प्रत्यक्षजनवादी प्रबन्ध होगा । इन्हींमे प्रान्तीय समितियाँ बनेगी और पान्तीय समितियोसे देश-समिति बनेगी । वहाँसे यूरोपको प्रतिनिधि भेजे जायेंगे और वहाँसे फिर ससारको प्रतिनिधि भेजे जायेंगे । ये प्रतिनिधि विशेषज्ञ होंगे, अटपज या अज्ञ नही । समस्या-पूर्ति होनेपर इन अस्थायी सघोका भी अन्त हो जायगा । दूमरी समस्या आनेपर पुनः उस प्रकारके विशेषज्ञ प्रतिनिधि भेजे जायेंगे; अर्थात् रोग-निवृत्तिके लिये चिकित्साविशेषज्ञ प्रतिनिधि होगा और खेलके लिये खेलका विशेषज्ञ खिलाड़ी-प्रतिनिधि होगा । स्वतन्त्र स्वेच्छात्मक संघोंका समुच्चय ही अराजकतावादी सघ होगा।' अराजकतावादका सार 'व्यवस्थाका अन्त नहीं, किंतु निरङ्कुशताका अन्त है।' इसके अनुसार 'समाजके बिना स्वतन्त्रतासे शोषण और अन्याय बढता है एव स्वतन्त्रताके बिना समाजवादसे दासता और पशुता बढती है।' कहना न होगा कि इतिहास भी एक विचित्र गोरखधंधा है । इसके द्वारा ही भिन्न भिन्न मतवादी अपना-अपना पक्ष सिद्ध करते हैं । इन लोगोंके इतिहास रामायण, महाभारतके समान महर्षियोंके आर्षविज्ञान एव समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाके आधारपर नही बनते । इनके इतिहास तो कुछ ईंट-पत्थरो, मुद्राओके आधारपर ही कल्पनाओके खड़े किये गये महल हैं, जिनमें कि प्रायः अटकलपच्चू अनुमान भिड़ाये जाते हैं । आज भी प्राय. विभिन्न समाचार-एजेन्सियोंके तारों,

१२८ मार्क्सवाद और रामराज्य टेलिप्रिटरोंके आधारपर समाचार प्रकाशित होते हैं, उनमें भी परस्पर पर्याप्त मतभेद दिखायी देता है । लड़ाईके दिनोंमें तो आँखों देखी घटनाओसे भी विभिन्न एजेसियोंके समाचार-संकलनोंमें पर्याप्त पार्थक्य दृष्टिगोचर होता है । उन्हें भी विभिन्न पत्र-प्रकाशक अपने-अपने दृष्टिकोणसे तोड़-मरोड़कर अपने उद्देश्यके उपयोगी बनाते हैं । सम्पादकीय टिप्पणियो एवं पर्यवेक्षको, समालोचकोकी विवेचनाओके विभिन्न रूपोंमें ढलकर उन घटनाओका सर्वथा ही रूपान्तर हो जाता है । उससे भी भिन्न-भिन्न मतवादी अपना मत सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । सर सुन्दरलालकी 'भारतमें अंगरेजी राज्य' पुस्तकमें इतिहासके तोड-मरोड़ और मिथ्या मनगढंत इतिहास-निर्माणके सम्बन्धमें बहुत कुछ कहा गया है । जर्मनीके बुद्धिमानोंने सुझाव दिया था कि 'संसारका इतिहास नये सिरेसे लिखा जाना चाहिये और उसका आरम्भ होना चाहिये जर्मनीके पर्वतों, नदियो, ग्रामो एव नगरोसे । उसमें जर्मन जातिकी वीर गाथाओका वर्णन होना चाहिये ।' इंग्लैडकी पार्लामेटमें अपने अनुकूल इतिहास गढ़नेके लिये मिथ्या पार्लामेन्टरी प्रस्ताव प्रस्तुत किये गये हैं । आर्योंका पश्चिमोत्तर एशियासे भिन्न देशोमें जाकर आबाद होना, उन्हीकी एक श्रेणीका भारतमें आना; ग्रीक, लैटिन, जेन्द आदि भाषाओके समान ही सर्वभाषाओकी जननी सस्कृत भाषाको सब भाषाओकी बहन मानना और किसी अनुपलब्ध भाषाको ही सर्वभाषाओके जननी मानना; आर्यों- अनायोंका भेद खड़ा करना आदि बहुत-सी भीषण ऐतिहासिक कल्पनाएँ जान- बूझकर गढी गयी हैं । इस तरह जब सही इतिहास ही नही, तब उसके आधारपर किसी भी सिद्धान्तकी स्थिति कैसे हो सकती है ? अराजकतावादी सिद्धान्त वस्तुतः अराजकताकी ही सृष्टि करेगा । जिसके कारण समाजमें मात्स्यन्याय फैलेगा और मनुष्य पशुप्राय हो जायगा । हाँ, यदि सभी सात्त्विक धर्मनिष्ठ जितेन्द्रिय तत्त्ववित् हो जायें तो अवश्य राज्य, राजा आदिके बिना भी कार्य चल सकता है । यह पीछे महाभारतके राजधर्मसे 'न वै राज्यं न राजासीत्' इत्यादिसे दिखलाया जा चुका है । जबतक यह स्थिति नही होती तबतक अराजकतावादसे सुख-शान्ति सर्वथा असम्भव हो जायगी । वाल्मीकि- रामायणके अयोध्याकाण्डके ६७ वे सर्गमें अराजकताकी दुरवस्थाका वर्णन किया गया है, जो नीचे दिया जा रहा है— नाराजके जनपदे विद्युन्माली महास्वनः । अभिवर्षति पर्जन्यो मही दिव्येन वारिणा ॥ नाराजके जनपदे बीजमुष्टिः प्रकीर्यते । नाराजके पितुः पुत्रो भार्या वा वर्तते वशे ॥

पाश्चात्त्य राजनीति १२९ अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके । इदमत्याहितं चान्यत्कुतः सत्यमराजके ॥ नाराजके जनपदे कारयन्ति सभां नराः । उद्यानानि च रम्याणि हृष्टाः पुण्यगृहाणि च ॥ नाराजके जनपदे यज्ञशीला द्विजातयः । सत्राण्यन्वासते दान्ता ब्राह्मणाः संशितव्रताः ॥ नाराजके जनपदे प्रहृष्टनटनर्तकाः । उत्सवाश्च समाजाश्च वर्धन्ते राष्ट्रवर्धनाः ॥ नाराजके जनपदे सिद्धार्था व्यवहारिणः । कथाभिरनुरज्यन्ते कथाशीलाः कथाप्रियैः ॥ नाराजके जनपदे उद्यानानि समागताः । सायाह्ने क्रीडितुं यान्ति कुमार्यो हेमभूषिताः ॥ नाराजके जनपदे धनवन्तः सुरक्षिताः । शेरते विवृतद्वाराः कृषिगोरक्षजीविनः ॥ नाराजके जनपदे वणिजो दूरगामिनः । गच्छन्ति क्षेममध्वानं बहुपण्यसमाचिताः ॥ नाराजके जनपदे चरत्येकचरो वशी । भावयन्नात्मनाऽऽत्मानं यत्रसायंगृहो मुनिः ॥ नाराजके जनपदे योगक्षेमं प्रवर्तते । न चाप्यराजके सेना शत्रून् विषहते युधि ॥ नाराजके जनपदे नराः शास्त्रविशारदाः । संवदन्तोपतिष्ठन्ते वनेषूपवनेषु च ॥ यथा ह्यनुदका नद्यो यथा वाप्यतृणं वनम् । अगोपाला यथा गावस्तथा राष्ट्रमराजकम् ॥ सभीका शासनमे भाग लेना सम्भव न होनेसे ही प्रतिनिधिकी कल्पना करनी पड़ती है । प्रतिनिधि मुख्यसे भिन्न होता ही है, किंतु वह मुख्यका अपेक्षित एव निश्चित कार्यकारी होता है । अराजकतावादियोंको भी तो ससारके लिये प्रतिनिधि निश्चित करना पड़ता है, अतः धर्मनियन्त्रित राजा या धर्मनियन्त्रित जन- प्रतिनिधियोंका शासन अपेक्षित ही है ।

तृतीय परिच्छेद विकासवाद प्राणिशास्त्र, शरीर-रचना आजकल धर्म, संस्कृति, राजनीति, भाषाविज्ञान, इतिहास सभी क्षेत्रोंमें विकासवादका सिद्धान्त लागू किया जा रहा है । आधुनिक विज्ञान तथा जड- भौतिकवादका एक प्रकारसे यही मूल हो रहा है । बहुत-से भारतीय विद्वान् भी इसे ही मानकर भारतीय विषयोंकी व्याख्या करते हैं । मार्क्सवादके सिद्धान्तोंका आधार भी बहुत कुछ विकासवाद ही है । अतः विकासवादका सिद्धान्त और उसके समर्थनमें जो तर्क रखे जाते हैं, उनपर भी विचार करना बहुत आवश्यक है । डार्विनका मत चार्ल्स डार्विन विकासवादके ‘प्रवर्तक’ माने जाते हैं । उन्होंने जहाजद्वारा यथासम्भव संसारभरकी यात्रा की । दूर-दूरके टापुओंमें जाकर विविध जातिके जन्तुओंका अवलोकन किया । एक-एक जातिके प्राणियोंमें उन्होंने अगणित भेद पाये । उन्हें इन भेदों, अन्तरोंसे आश्चर्य हुआ । इसीलिये मालथसके प्राणिसंख्या- वृद्धि-विचारको पढकर उन्होंने यह भी देखा कि ‘जीवधारियोंकी संख्या १, २, ४, ८, १६ के हिसाबसे ज्यामितिक रेखागणितके अनुसार बढ़ रही है और खाद्यकी संख्या १, २, ३, ४ के क्रमसे अंकगणितके अनुसार बढ़ती है । लड़ाइयों, बीमारियों तथा अन्य विविध विप्लवोंद्वारा होनेवाले संहारोंसे ही जन-संख्या नियमित है ( आजकल यह मत मान्य नहीं है ) । डार्विनने यह निश्चित किया कि प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष स्वाभाविक है । इसमें जो योग्यतम होता है, वही बच सकता है । किसी कारण-विशिष्ट शारीरिक रचना एवं विशिष्ट शक्तिसे ही विशेष प्रदेशोंमें प्राणियोंको प्राण बचानेकी सुविधा होती है । इस तरह जो विशेष निवास-स्थानके योग्य शरीरवाले होते हैं, उन्हींकी संताने भी बढ़ती हैं । औरोंकी जातियाँ या तो नष्ट हो जाती हैं अथवा सुविधाके अनुकूल कही अन्यत्र जाकर उन्हें प्राण बचाना पड़ता है । प्रकृति योग्यतमका चुनावकर उसकी ही रक्षा करती तथा औरोंकी उपेक्षा करती है । अतः वे नष्ट हो जाते हैं । डार्विनके मतानुसार प्रतिद्वन्द्विता प्राकृतिक, शाश्वत एवं सार्वत्रिक नियम है । प्राणियोंकी अभिवृद्धिसे यह स्पष्ट होता है कि यही जीवन-संग्रामका भी मूल है । बलवान् निर्बलोंको नष्ट करके अपनेको सुरक्षित रखते हैं, जिनमें अपने आपको परिस्थितिके अनुसार बना सकनेकी क्षमता होती है, उसीकी संतानवृद्धि भी चलती है । इस जीवन- =घर्षसे विभिन्न गुणों, विभिन्न परिस्थितियोंके अनुसार भेद होते हैं और परम्परानुगत होनेसे वे और भी पुष्ट होते हैं । इसी अवस्थानुरूप परिवर्तनके