मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
१२२ मार्क्सवाद और रामराज्य अनुसार इनका भावी समाज श्रमिक संघोद्वारा बनेगा। परंतु फ्रान्सके संघ-वादियोंने प्रथम महायुद्धमें क्रान्तिकारी मार्ग छोड़कर राष्ट्रभक्ति और सुधारका मार्ग ग्रहण कर लिया। अन्यत्रके भी संघवादी शिथिल हो गये। इसी तरह इङ्गलैंडका श्रेणी समाजवाद भी कुछ दिन पनपकर खतम हो गया। यह फ्रान्सीसी संघवादका आँग्ल-संस्करण था। ए० जे० पेन्टी, ए० आर० ओरेल, एम० जी० हॉब्सन, जे० डी० एच० कोल इनके प्रमुख विचारक थे। पूँजीवादके अन्तसे ही सब बुराइयोका अन्त मानते थे। इनके अनुसार श्रेणीवादी समाजवाद ही मुख्य जनतन्त्र है। हॉब्सनके अनुसार भावी समाजमे भी राज्यका महत्त्वपूर्ण स्थान होगा। वह एक समाज सेवक संस्था होगी। उसके द्वारा अन्य सामाजिक तथा आर्थिक संस्थाओंका समन्वय होगा। परंतु लोकके अनुसार राज्यका कोई महत्त्वपूर्ण स्थान न होना चाहिये। वह राज्यके स्थानपर कम्यूनकी स्थापना चाहता था। उसके अनुसार राज्यके अधिकार इतने कम होने चाहिये कि वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाय। इसके कार्य-क्रममें व्यावसायिक संघोकी स्थापना महत्त्वपूर्ण है। १९२५ तक वह भी खतम हो गया। वस्तुतः सिद्धान्तकी दृष्टिसे नहीं, किंतु बहुत-से पक्षोकी सफलता परिस्थितियोके अनुकूल हो जाती है। उन परिस्थितियोको बदला जा सकता है अवश्य, परंतु उसमे अनेक साधनों तथा समयकी अपेक्षा होती है। यदि मार्क्सवादियोंकी रूसमें सफलता न होती, तो मार्क्सवादको भी वही हालत होती जो इन दूसरे वादोकी हुई। यदि हिटलरकी जीत हो गयी होती तो भी मार्क्सवाद अबतक मर चुका होता। कई बार शून्यवादियोंकी भी जीत हो जाया करती है, परंतु इससे ही यह नहीं कहा जा सकता कि सिद्धान्त भी वही ठीक है, यह तो 'बन आयेकी बात' है। किसीका सिद्धान्त बहुत श्रेष्ठ हो, परंतु अन्य साधन न हो तो वह केवल सिद्धान्तके आधारपर नहीं जीत सकता। बहुलवाद इसी प्रकार ब्रिटेनमें ही एक सत्तावादका विरोधी बहुलवाद दर्शन प्रकट हुआ। एक सत्तावाद एकात्मव्यवस्थाका समर्थक था। बहुलवादके अनुसार व्यक्ति उसकी स्वतन्त्रता उसके संघोका समर्थक है। लॉस्की मुख्यरूपसे इस दर्शनका वेत्ता था। व्यक्ति अपने अनेक ध्येयोकी पूर्तिके लिये अनेक सङ्घ बनाता है। राज्यद्वारा यह काम पूरा नहीं होता। उसके अनुसार कोई भी संस्था 'मेरे पूरे मैके लिये' नियम नहीं बना सकती। मैकाइवरके अनुसार राज्य अर्थैक्यका प्रतिनिधित्व करता है, परंतु सम्पूर्ण अर्थैक्यका नहीं। संघोकी दृष्टिसे सहयोग
पाश्चात्य राजनीति १२३ एवं संघर्ष विश्वव्यापी है । लॉस्कीके मतानुसार आदर्श नागरिकका सर्वप्रथम कर्तव्य अपनी आत्माकी प्रगति है । वह उसी सत्ताका अनुसरण करेगा, जिसमें उसकी आत्मतुष्टि हो । अतः राज्यसत्ताधारी पदके योग्य तभी हो सकता है, जब वह व्यक्ति प्रगति को पूरी करे । इतिहासके अनुसार संघोंने अनेक बार राज्यकी निरपेक्षताको सीमित किया है । नागरिककी सक्रियता ही सच्चा जनतन्त्र है । यह बहुलवादी सत्तात्मक समाजमें ही सम्भव है । ऑस्टिनके अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय निरपेक्षता भी सम्भव नहीं है । विश्वजनमतको कोई राज्य उल्लङ्घन नहीं कर सकता । लॉस्कीके अनुसार ब्रिटेनका आदेश दृष्टिकोण यह होना चाहिये कि वह विश्व-कल्याणमें अपना कल्याण समझे । उसके अनुसार नैतिक क्षमताको पूर्ण करनेवाली व्यवस्था या नियम मान्य होना चाहिये । यदि अव्यवस्थाका लक्ष्य मानव-प्रगति है, तो वह अन्यायसे कई गुना अच्छी है । व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, व्यक्त-प्रगति और व्यक्ति-सत्ताका अस्तित्व ही उनके दर्शनका सार है । फैसीवाद मुसोलिनी एवं हिटलरके फैसीवाद एवं नाजीवादने डार्विनके संघर्षको बहुत महत्त्व दिया और स्पेंसर आदिके इस पक्षको अपनाया कि 'जो संघर्षमें सफल हो वही जीवित रहे ।' अर्थक्रियाकारित्ववाद इसका प्राण है । उत्कृष्ट जातिका यह प्रकृतिसिद्ध अधिकार है कि वह निकृष्ट जातिका शासन करे । उनके अनुसार मानव-इतिहास एक युद्धकी कहानी है । मानव- प्रगति युद्धके द्वारा ही होती है । इसमें भी वर्गों तथा सोरेलकी भाँति अन्ध श्रद्धाको बढ़ाना आवश्यक माना जाता था । उनके मतानुसार 'जन-समूह एक स्त्रीकी भाँति होता है, जो बलवान् एवं नाटकीय व्यक्तिकी तरफ आकृष्ट होता है । इसीलिये राज्य, देश एवं नेताकी भक्तिको खूब प्रोत्साहन दिया गया, रक्तकी पवित्रतापर भी बहुत बल दिया गया, भौतिकताके स्थानपर आध्यात्मिकता, गौरव, मान, चरित्रको मानव-जीवनका लक्ष्य बतलाया गया । राज्यको साध्य और व्यक्तिको साधन कहा गया । इनके मतानुसार सर्वाधिकारी राज्यके संरक्षणमें ही व्यक्तिकी सर्वविध उन्नति सम्भव है, राज्य ही सर्वेसर्वा है । केन्द्रिय कार्य- पालिका एक प्रकारकी अधिनायककी परामर्श-समिति थी। जनसत्ताके स्थानपर नेतृ- सत्ता ही फैसीवादकी विशेषता थी । रूसी समाजवाद एवं फैसीवाद दोनो ही सर्वाधिकारवादी अधिनायकवादी हैं । समाजवादी जनवादका नाम लेते हैं । फैसीवाद जनवादके स्पष्ट विरोधी थे ।
१२४ मार्क्सवाद और रामराज्य जनवाद जनवादकी व्याख्याएँ भी भिन्न-भिन्न ढंगसे होती रही हैं। अब्राहम लिंकनके अनुसार 'जनताका जनताके लिये जनताद्वारा किया जानेवाला शासन ही प्रजातन्त्र या जनतन्त्र माना जाता है। प्रतिनिधि जनवादका आधार राष्ट्रका सामान्य हित होता है। सुशासनके लिये सामान्यहितको कार्यान्वित करनेके लिये कुछ प्रतिनिधियोंका निर्वाचन होता है। यही 'परोक्ष-जनवाद' है।' आलोचकोंकी दृष्टिमें जनवादका अर्थ 'मूर्खोंपर उनकी अनुमतिद्वारा शासन करना' है। पर यह तो परम सत्य है कि जनवादमे जन-शिक्षा, निष्पक्ष जनमत, राजनीतिक दलोंका अस्तित्व, नागरिकोंका शासनमे सक्रिय भाग, सतर्कता और आदर्श निर्वाचन-व्यवस्था अनिवार्य है। इनके बिना तो जनवाद कोरा दम्भ ही है। राजनीतिक दलोंमें अर्धसैनिक-अनुशासन, नेताओका बोलबाला और पूँजीपतियोंका दलोंपर अधिकार आदि जनवादके बाधक ही हैं। पक्षपातयुक्त प्रचार-साधन—रेडियो, पत्र, सिनेमा आदि—भी बाधक हैं। समाचारपत्र आदि अपने दलों एवं मालिकोंका गुणगान करते हैं। इससे विवेकशीलताको धक्का पहुँचता है। सतर्कता भी इसमे परमावश्यक है। सतर्कता स्वतन्त्रताकी बहिन है। कहा जा चुका है कि एतदर्थ विकेन्द्रीकरण और सक्रियता आवश्यक है। इसीलिये स्थानीय स्वशासनादि आवश्यक होते हैं। प्रतिनिधि जनवादमें योग्य उम्मीदवारोंका मिलना, स्वतन्त्र मतदान, निर्वाचकोंकी योग्यता, निर्वाचन-विधिका सरलता और अल्पव्ययिता आदि भी आवश्यक हैं। यह सब इस समय असम्भव-सा ही हो रहा है। फिर भी इस समय इससे अन्य अच्छी व्यवस्था कोई नहीं है। यदि इसे शस्त्र एव धर्म अथवा सामान्य मानव-धर्मसे भी नियन्त्रित कर दिया जाय तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया, ईश्वर भक्ति आदि सद्गुणोंसे युक्त रामराज्य प्रणालीका जनतन्त्र-राज्य राम-राज्य ही बन सकता है। अराजकतावाद मार्क्सवादियोंसे भी बढ़े-चढ़े अराजकतावादी हैं। इसके प्रवर्तक माइकेल बाकुनिन ( १८१४-१८७६ ) और प्रिंस क्रोपोटकिन ( १८४२-१९१९ ) हुए हैं। उनके मतानुसार क्रान्तिद्वारा पूँजीवादका अन्त होते ही राज्यका भी अन्त हो जाना चाहिये। श्रमिक क्रान्तिके पश्चात् वर्गीय संस्थाका अन्त हो जाना चाहिये। न मर्ज (वर्ग) रहे, न मरीज (राज्य) रहना चाहिये। मार्क्सवादी भी राज्यको वर्ग-विशेषकी ही संस्था मानते हैं। लेनिनके अनुसार भी राज्य दमन-यन्त्र है। किंतु वे विरोधियोंको कुचलनेके लिये उसकी आवश्यकता मानते हैं। परंतु अराजकतावादी इसका विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि 'ऐतिहासिक दृष्टिसे राज्य
आवश्यक नहीं। राज्यकी उत्पत्तिके पहले भी मनुष्य रहते थे और अपने समूहोंमें सुखी एवं स्वतन्त्र जीवन-निर्वाह करते थे । श्रमिक क्रान्तिके बाद भी वैसे ही बिना राज्यके सुखी एवं सम्पन्न रह सकते हैं । वर्गविहीन समाजमें, जो कि श्रमिक क्रान्तिका फल है, वर्गीय संस्था—राज्यकी आवश्यकता ही क्या है ?' अराजकतावादी कहते हैं कि 'इतिहासके अनुसार राज्य कभी भी न्यायपूर्ण नहीं था। व्यक्तिगत सम्पत्तिके द्वारा ही राज्यका जन्म हुआ है । व्यक्तिगत सम्पत्ति एक चोरी है, राज्य इसका रक्षक रहा है। राज्य सदा ही शोषकोंका पक्षपाती तथा शोषितोंके विपरीत रहा है। जो संस्था सदा मजदूरोंके हितोंको कुचलती रही है, उससे मजदूर कैसे प्रेम कर सकता है।' क्रोपोट्किनने कहा है कि 'पूँजीवादी प्रथाके अभावका नाम ही शासन-प्रथाका अभाव है।' अराजकतावादी राज्यको निरङ्कुशताका प्रतीक मानते हैं, चाहे वह राज्य जैसा भी हो । जैसे राजतन्त्र या कुलीनतन्त्रमें अल्पसंख्यकोंद्वारा बहुसंख्यकोंकी स्वतन्त्रताका अपहरण होता है वैसे प्रजातन्त्रके बहुमतद्वारा भी वैयक्तिक स्वतन्त्रताका अपहरण होता है । अराजकतावादियोंके अनुसार 'कोई मनुष्य दूसरेका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। 'अ' का प्रतिनिधि सभामें ठीक 'अ' की भाँति नहीं बोल सकता । फिर समूहोंका प्रतिनिधि तो कोई हो ही कैसे सकता है ? कोई विधान-विशेषज्ञ धारासभाका सदस्य बनता है । वह सफ़ाई, शिक्षा तथा शासनके सम्बन्धमें अनुभवशून्य होता है। फिर उसके द्वारा इन विषयोंके सम्बन्धमें बनाये नियम किस तरह लाभदायक होंगे ? अतः प्रतिनिधियोंकी सरकार वही होती है जो सभी कार्योंको अयोग्यतापूर्वक करती है। निर्वाचनद्वारा जनताकी सामान्य इच्छाएँतक व्यक्त नहीं हो सकतीं। शक्तिका मद तो शासकमें आ ही जाता है।' अराजकतावादियोंके मतानुसार साधारणतया मनुष्य नेक होता है, परंतु पदपर पहुँचते ही वह बुरा हो जाता है । मनुष्य राजनीतिज्ञ होनेसे ही बुरा हो जाता है । गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीका भी कहना है कि अधिकार पाकर किसे गर्व नहीं होता— प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं । अराजकतावादियोंके मतानुसार राज्यके बिना भी मनुष्य खाता, सोता, बोलता, पढता है । जुआड़ी जुएमें हारकर बिना राज्यके दबावके ही रुपया देता है । चोर भी आपसमें समझौता करते ही हैं । कितने ही खेलोंमें खिलाड़ी स्वयं नियम बनाते और उसका पालन करते हैं । इसी तरह राज्यके बिना भी स्वेच्छात्मक संस्थाओंद्वारा सब काम चल सकता है । बाह्य आक्रमणका भी सामना राज्य सेनाकी अपेक्षा जनताकी सेना अधिक अच्छा कर सकती है। अराजकतावादी दण्ड-विधान एवं जेल आदिद्वारा भी सुधारमें विश्वास नहीं करते।
१२६ मार्क्सवाद और रामराज्य क्रोपोट्किनके अनुसार 'जेले पाखण्ड और कायरताकी स्मारक हैं।' वह स्वय रूस और फ्रान्सकी जेलोंमें रहा था । जेलोंके अपने अनुभव बतलाते हुए वह लिखता है कि “जेलोंमें आधेसे अधिक हत्यारे तथा चोर थे, जो अनेक बार जेलोंमें रह चुके थे । दण्डके भयसे प्राणी अपराध नहीं करेगा, यह समझना सर्वथा भ्रम है । एक अपराधी अपराध करते समय यही सोचता है कि वह दण्डसे अपने आपको बचा लेगा । किसी व्यक्तिको फाँसी देनेसे उसके बाल- बच्चे निराश्रित असहाय होकर समाजके लिये अधिक हानिकर सिद्ध हो सकते हैं। अराजकतावादियोंके अनुसार इतिहास बतलाता है कि राज्यने कभी भी उच्च आदर्शकी पूर्ति नहीं की । उसके द्वारा सदा ही दुःख एवं अन्यायको स्थायी- बनानेका प्रयत्न किया गया है। राज्यकर्णधारोंके सदियोंके प्रचारद्वारा राज्य नितान्त आवश्यक वस्तु समझी जाने लगी है। जन्मसे यही सुनते, विद्यालयोंमें पढ़ते और पुस्तकों, लेखों और समाचार-पत्रोंमें राज्यकी आवश्यकताका वर्णन पढ़ते-पढ़ते मनुष्यके मस्तिष्कमें यह बात बैठ जाती है कि राज्य नितान्त आवश्यक संस्था है। कोई भी राजनीतिज्ञ यही कहता है कि 'मुझे अधिकार दीजिये तो मै देशमें घी- दूधकी नदियाँ वहा दूँगा।' राज्यका अन्त हुए बिना इन पाखण्डोंकी समाप्ति नहीं हो सकती। अराजकतावादियोंका अपना कार्यक्रम भी है। उनके मतानुसार 'क्रान्तिके पहले अराजकतावादकी शिक्षा होनी चाहिये। मनुष्य समाज अराजकताकी ओर अग्रसर हो रहा है। क्रोपोट्किन जीवशास्त्रज्ञ था । उसके अनुसार ' मनुष्य जातिने सहयोगद्वारा ही प्रगति की है, प्रतियोगिताद्वारा नहीं । सहयोगद्वारा ही मनुष्यने प्रकृतिपर विजय पायी है, सहयोगद्वारा ही प्राचीन मनुष्य जीवित रहते थे । आधुनिक युगमें भी सहयोगकी मात्रा बढ़ रही है, अतएव स्वेच्छात्मक संस्थाओंकी वृद्धि हो रही है । राज्यके कायोंकी सीमा भी घट रही है । मनुष्य जितना सभ्य होगा उतना ही सहयोगी होता है । सभ्यताकी प्रगतिसे स्वेच्छात्मक संस्थाओंद्वारा राज्य-कार्य सीमित हो रहे हैं । अब थोडे ही प्रयत्नसे राज्यका अन्त एवं स्वेच्छात्मक संस्थाओंका युग आरम्भ होगा, यही अराजकतावादी युग है । वैज्ञानिक तर्कोंद्वारा जनताको अराजकताके पक्षमें कर लेना चाहिये । जनताके मस्तिष्कमें यह विचार कूट-कूटकर भर देना चाहिये कि अराजकतावादी युग अब बहुत ही निकटवर्ती है । जनता स्वागतके लिये तैयार रहे । यह अन्ध- विश्वास नहीं, किंतु वैज्ञानिक सत्य है । इसके लिये क्रान्ति आवश्यक है। अरा- जकतावादी समितियों तथा केन्द्रीय समितिके प्रयत्नसे यह क्रान्ति होगी । इनका भावी समाज साम्यवादी, स्वेच्छावादी और सहयोगवादी होगा । नागरिककी हैसियतसे राज्यसे, उत्पादककी हैसियतसे पूँजीवादसे और मनुष्यकी हैसियतसे शासनमात्रसे स्वतन्त्रता प्राप्त करना अराजकतावादका ध्येय है।
पाश्चात्त्य राजनीति १२७ अराजकतावाद 'पूर्णस्वतन्त्रताका युग है। इसमें जो स्वस्थ और योग्य होगा, वह काम करेगा । २४ से ५० वर्षतक काम करनेकी अवस्था होगी । प्रत्येक व्यक्तिको प्रतिदिन ४ या ५ घंटे काम करना होगा। मनुष्य वेतन और प्रोत्साहनके बिना ही काम करेगा। काम करना मनुष्यका स्वभाव है। मनुष्यको सभी सुगम एव रोचक कार्य ही पसंद होते हैं। अतः भावी समाजमें सभी काम सुगम एव रोचक बना दिये जायेंगे । विज्ञानकी प्रगतिसे कोई काम गंदा न रह जायगा । अराज- कतावादमें उत्पादन एव उपभोगकी वस्तुओमें कोई अन्तर न होगा । भोजन, वस्त्र, साइकिल, मोटर आदिकी सहायतासे, जो कि उपभोगकी वस्तु मानी जाती हैं, मनुष्य उत्पादन भी करता है, अतः सभी वस्तुओंका वितरण अराजकतावादी संघोंद्वारा होगा। पहले बच्चो, बूढ़ो, अङ्गहीनोको उनके आवश्यकतानुसार चीजे दी जायेंगी, फिर अन्य लोगोको पहले जीवनोपयोगी वस्तुएँ दी जायेंगी, फिर आरामकी वस्तुएँ । सामाजिक बहिष्कारसे असामाजिक कायोकी स्वतः निवृत्ति होगी । इतनेपर भी सुधर न होनेपर अपराधीका डाक्टरी इलाज होगा, उमे सुधार-गृहमें भेजा जायगा । मनुष्य अपने सामाजिक समझौतेको भग न करेगा । आधुनिक समाज रचनासे ही मनुष्यमें दुर्गुण आये हैं । सघटनके लिये छोटे छोटे प्रादेशिक सघ होगे । इनमें प्रत्यक्षजनवादी प्रबन्ध होगा । इन्हींमे प्रान्तीय समितियाँ बनेगी और पान्तीय समितियोसे देश-समिति बनेगी । वहाँसे यूरोपको प्रतिनिधि भेजे जायेंगे और वहाँसे फिर ससारको प्रतिनिधि भेजे जायेंगे । ये प्रतिनिधि विशेषज्ञ होंगे, अटपज या अज्ञ नही । समस्या-पूर्ति होनेपर इन अस्थायी सघोका भी अन्त हो जायगा । दूमरी समस्या आनेपर पुनः उस प्रकारके विशेषज्ञ प्रतिनिधि भेजे जायेंगे; अर्थात् रोग-निवृत्तिके लिये चिकित्साविशेषज्ञ प्रतिनिधि होगा और खेलके लिये खेलका विशेषज्ञ खिलाड़ी-प्रतिनिधि होगा । स्वतन्त्र स्वेच्छात्मक संघोंका समुच्चय ही अराजकतावादी सघ होगा।' अराजकतावादका सार 'व्यवस्थाका अन्त नहीं, किंतु निरङ्कुशताका अन्त है।' इसके अनुसार 'समाजके बिना स्वतन्त्रतासे शोषण और अन्याय बढता है एव स्वतन्त्रताके बिना समाजवादसे दासता और पशुता बढती है।' कहना न होगा कि इतिहास भी एक विचित्र गोरखधंधा है । इसके द्वारा ही भिन्न भिन्न मतवादी अपना-अपना पक्ष सिद्ध करते हैं । इन लोगोंके इतिहास रामायण, महाभारतके समान महर्षियोंके आर्षविज्ञान एव समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाके आधारपर नही बनते । इनके इतिहास तो कुछ ईंट-पत्थरो, मुद्राओके आधारपर ही कल्पनाओके खड़े किये गये महल हैं, जिनमें कि प्रायः अटकलपच्चू अनुमान भिड़ाये जाते हैं । आज भी प्राय. विभिन्न समाचार-एजेन्सियोंके तारों,
१२८ मार्क्सवाद और रामराज्य टेलिप्रिटरोंके आधारपर समाचार प्रकाशित होते हैं, उनमें भी परस्पर पर्याप्त मतभेद दिखायी देता है । लड़ाईके दिनोंमें तो आँखों देखी घटनाओसे भी विभिन्न एजेसियोंके समाचार-संकलनोंमें पर्याप्त पार्थक्य दृष्टिगोचर होता है । उन्हें भी विभिन्न पत्र-प्रकाशक अपने-अपने दृष्टिकोणसे तोड़-मरोड़कर अपने उद्देश्यके उपयोगी बनाते हैं । सम्पादकीय टिप्पणियो एवं पर्यवेक्षको, समालोचकोकी विवेचनाओके विभिन्न रूपोंमें ढलकर उन घटनाओका सर्वथा ही रूपान्तर हो जाता है । उससे भी भिन्न-भिन्न मतवादी अपना मत सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । सर सुन्दरलालकी 'भारतमें अंगरेजी राज्य' पुस्तकमें इतिहासके तोड-मरोड़ और मिथ्या मनगढंत इतिहास-निर्माणके सम्बन्धमें बहुत कुछ कहा गया है । जर्मनीके बुद्धिमानोंने सुझाव दिया था कि 'संसारका इतिहास नये सिरेसे लिखा जाना चाहिये और उसका आरम्भ होना चाहिये जर्मनीके पर्वतों, नदियो, ग्रामो एव नगरोसे । उसमें जर्मन जातिकी वीर गाथाओका वर्णन होना चाहिये ।' इंग्लैडकी पार्लामेटमें अपने अनुकूल इतिहास गढ़नेके लिये मिथ्या पार्लामेन्टरी प्रस्ताव प्रस्तुत किये गये हैं । आर्योंका पश्चिमोत्तर एशियासे भिन्न देशोमें जाकर आबाद होना, उन्हीकी एक श्रेणीका भारतमें आना; ग्रीक, लैटिन, जेन्द आदि भाषाओके समान ही सर्वभाषाओकी जननी सस्कृत भाषाको सब भाषाओकी बहन मानना और किसी अनुपलब्ध भाषाको ही सर्वभाषाओके जननी मानना; आर्यों- अनायोंका भेद खड़ा करना आदि बहुत-सी भीषण ऐतिहासिक कल्पनाएँ जान- बूझकर गढी गयी हैं । इस तरह जब सही इतिहास ही नही, तब उसके आधारपर किसी भी सिद्धान्तकी स्थिति कैसे हो सकती है ? अराजकतावादी सिद्धान्त वस्तुतः अराजकताकी ही सृष्टि करेगा । जिसके कारण समाजमें मात्स्यन्याय फैलेगा और मनुष्य पशुप्राय हो जायगा । हाँ, यदि सभी सात्त्विक धर्मनिष्ठ जितेन्द्रिय तत्त्ववित् हो जायें तो अवश्य राज्य, राजा आदिके बिना भी कार्य चल सकता है । यह पीछे महाभारतके राजधर्मसे 'न वै राज्यं न राजासीत्' इत्यादिसे दिखलाया जा चुका है । जबतक यह स्थिति नही होती तबतक अराजकतावादसे सुख-शान्ति सर्वथा असम्भव हो जायगी । वाल्मीकि- रामायणके अयोध्याकाण्डके ६७ वे सर्गमें अराजकताकी दुरवस्थाका वर्णन किया गया है, जो नीचे दिया जा रहा है— नाराजके जनपदे विद्युन्माली महास्वनः । अभिवर्षति पर्जन्यो मही दिव्येन वारिणा ॥ नाराजके जनपदे बीजमुष्टिः प्रकीर्यते । नाराजके पितुः पुत्रो भार्या वा वर्तते वशे ॥
पाश्चात्त्य राजनीति १२९ अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके । इदमत्याहितं चान्यत्कुतः सत्यमराजके ॥ नाराजके जनपदे कारयन्ति सभां नराः । उद्यानानि च रम्याणि हृष्टाः पुण्यगृहाणि च ॥ नाराजके जनपदे यज्ञशीला द्विजातयः । सत्राण्यन्वासते दान्ता ब्राह्मणाः संशितव्रताः ॥ नाराजके जनपदे प्रहृष्टनटनर्तकाः । उत्सवाश्च समाजाश्च वर्धन्ते राष्ट्रवर्धनाः ॥ नाराजके जनपदे सिद्धार्था व्यवहारिणः । कथाभिरनुरज्यन्ते कथाशीलाः कथाप्रियैः ॥ नाराजके जनपदे उद्यानानि समागताः । सायाह्ने क्रीडितुं यान्ति कुमार्यो हेमभूषिताः ॥ नाराजके जनपदे धनवन्तः सुरक्षिताः । शेरते विवृतद्वाराः कृषिगोरक्षजीविनः ॥ नाराजके जनपदे वणिजो दूरगामिनः । गच्छन्ति क्षेममध्वानं बहुपण्यसमाचिताः ॥ नाराजके जनपदे चरत्येकचरो वशी । भावयन्नात्मनाऽऽत्मानं यत्रसायंगृहो मुनिः ॥ नाराजके जनपदे योगक्षेमं प्रवर्तते । न चाप्यराजके सेना शत्रून् विषहते युधि ॥ नाराजके जनपदे नराः शास्त्रविशारदाः । संवदन्तोपतिष्ठन्ते वनेषूपवनेषु च ॥ यथा ह्यनुदका नद्यो यथा वाप्यतृणं वनम् । अगोपाला यथा गावस्तथा राष्ट्रमराजकम् ॥ सभीका शासनमे भाग लेना सम्भव न होनेसे ही प्रतिनिधिकी कल्पना करनी पड़ती है । प्रतिनिधि मुख्यसे भिन्न होता ही है, किंतु वह मुख्यका अपेक्षित एव निश्चित कार्यकारी होता है । अराजकतावादियोंको भी तो ससारके लिये प्रतिनिधि निश्चित करना पड़ता है, अतः धर्मनियन्त्रित राजा या धर्मनियन्त्रित जन- प्रतिनिधियोंका शासन अपेक्षित ही है ।
तृतीय परिच्छेद विकासवाद प्राणिशास्त्र, शरीर-रचना आजकल धर्म, संस्कृति, राजनीति, भाषाविज्ञान, इतिहास सभी क्षेत्रोंमें विकासवादका सिद्धान्त लागू किया जा रहा है । आधुनिक विज्ञान तथा जड- भौतिकवादका एक प्रकारसे यही मूल हो रहा है । बहुत-से भारतीय विद्वान् भी इसे ही मानकर भारतीय विषयोंकी व्याख्या करते हैं । मार्क्सवादके सिद्धान्तोंका आधार भी बहुत कुछ विकासवाद ही है । अतः विकासवादका सिद्धान्त और उसके समर्थनमें जो तर्क रखे जाते हैं, उनपर भी विचार करना बहुत आवश्यक है । डार्विनका मत चार्ल्स डार्विन विकासवादके ‘प्रवर्तक’ माने जाते हैं । उन्होंने जहाजद्वारा यथासम्भव संसारभरकी यात्रा की । दूर-दूरके टापुओंमें जाकर विविध जातिके जन्तुओंका अवलोकन किया । एक-एक जातिके प्राणियोंमें उन्होंने अगणित भेद पाये । उन्हें इन भेदों, अन्तरोंसे आश्चर्य हुआ । इसीलिये मालथसके प्राणिसंख्या- वृद्धि-विचारको पढकर उन्होंने यह भी देखा कि ‘जीवधारियोंकी संख्या १, २, ४, ८, १६ के हिसाबसे ज्यामितिक रेखागणितके अनुसार बढ़ रही है और खाद्यकी संख्या १, २, ३, ४ के क्रमसे अंकगणितके अनुसार बढ़ती है । लड़ाइयों, बीमारियों तथा अन्य विविध विप्लवोंद्वारा होनेवाले संहारोंसे ही जन-संख्या नियमित है ( आजकल यह मत मान्य नहीं है ) । डार्विनने यह निश्चित किया कि प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष स्वाभाविक है । इसमें जो योग्यतम होता है, वही बच सकता है । किसी कारण-विशिष्ट शारीरिक रचना एवं विशिष्ट शक्तिसे ही विशेष प्रदेशोंमें प्राणियोंको प्राण बचानेकी सुविधा होती है । इस तरह जो विशेष निवास-स्थानके योग्य शरीरवाले होते हैं, उन्हींकी संताने भी बढ़ती हैं । औरोंकी जातियाँ या तो नष्ट हो जाती हैं अथवा सुविधाके अनुकूल कही अन्यत्र जाकर उन्हें प्राण बचाना पड़ता है । प्रकृति योग्यतमका चुनावकर उसकी ही रक्षा करती तथा औरोंकी उपेक्षा करती है । अतः वे नष्ट हो जाते हैं । डार्विनके मतानुसार प्रतिद्वन्द्विता प्राकृतिक, शाश्वत एवं सार्वत्रिक नियम है । प्राणियोंकी अभिवृद्धिसे यह स्पष्ट होता है कि यही जीवन-संग्रामका भी मूल है । बलवान् निर्बलोंको नष्ट करके अपनेको सुरक्षित रखते हैं, जिनमें अपने आपको परिस्थितिके अनुसार बना सकनेकी क्षमता होती है, उसीकी संतानवृद्धि भी चलती है । इस जीवन- =घर्षसे विभिन्न गुणों, विभिन्न परिस्थितियोंके अनुसार भेद होते हैं और परम्परानुगत होनेसे वे और भी पुष्ट होते हैं । इसी अवस्थानुरूप परिवर्तनके
विकासवाद १३१ कारण ही विभिन्न जातियोंका प्राकट्य हुआ। यह भिन्न या स्वतन्त्र सृष्टि नहीं।' इस तरह निरीक्षण, अनुमान एव परीक्षणद्वारा डार्विनने विकास सिद्धान्त स्थिर किया। यात्राद्वारा अनेकविध प्राणियोंका निरीक्षण किया एव प्राणि-संख्या-वृद्धिका सिद्धान्त देखकर प्रतिद्वन्द्विता एवं उसमे योग्यतमके ही रक्षणका अनुमान किया। पश्चात् उसने परीक्षा आरम्भ की। उन्होने देखा कि घोडे एव भेड़ पालनेवाले लोग बहुतोंको छाँटकर अपने मतलबके जानवरोका संग्रह कर लेते हैं और उनमें इच्छानुरूप विभिन्नता उत्पन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त, पशु-पक्षियोकी बहुत-सी जो जातियाँ नष्ट हो गयी उनका वर्तमान जातियोंसे बहुत कुछ सादृश्य उपलब्ध होता है। भेद इतना ही है कि पहली जातियाँ वर्तमान जातियों-जैसी उत्तमताको प्राप्त- नहीं हुई थी। पृथ्वीकी वर्तमान जातियोंका सादृश्य भी तीसरा प्रमाण है। इससे निश्चय किया जाता है कि किसी समय छोटे जन्तुओकी एक ही जाति रही होगी। उनके ही सूक्ष्म अंडे या बीज जल, वायु आदिके प्रवाहसे समस्त भूमण्डलमें फैले । उन्हींमेंसे विकासक्रमसे वर्तमान जातियाँ निकलीं । विकासका चौथा एक यह भी कारण है कि 'गर्भावस्था मे सभी प्राणी एक से ही देख पडते हैं। अनेक जन्तुओंमें कितनी ही आरम्भिक इन्द्रियाँ गर्भावस्थामें पायी जाती हैं, जिनका पूर्ण विकास नहो होता। इससे भी प्राकृतिक चुनाव एव योग्यतम रक्षाका सिद्धान्त सिद्ध होता है।' फिर भी डार्विनने यह माना कि 'मेरी यह कल्पना तभी सिद्धान्तित होगी, जब चिरकाल बीतनेपर भी वैज्ञानिक परीक्षामे इसके विरुद्ध कोई बात न मिले।' अध्यात्मवादी सिद्धान्तकी दृष्टिसे डार्विनकी इस कल्पनामें कोई अपूर्व बात नहीं। वेदान्तियोका ब्रह्म, साख्योकी प्रकृति अनन्त प्रपञ्चका भण्डार है। उसमें शक्तिरूपसे सभी वस्तुएँ रहती हैं। प्रथम कारणावस्थामे कार्य-शक्तियाँ अव्यक्त रहती हैं, क्रमेण सहकारी सापेक्ष होकर व्यक्त होती हैं। धरतीमें ही अनगिनत बीज रहते हैं। विशिष्ट जल वायुके योगसे अकूरित, पुष्पित, फलित होनेपर उनके भेद दृष्टिगोचर होते हैं। मिट्टीके विभिन्न बर्तनो; सुवर्णके अनेक भूषणोकी कारणावस्था तो एक-सी होती है। सहकारी मिलनेपर कुलाल एवं सुवर्णकारके इच्छानुसार कार्यावस्थामें उनके अनेक रूप व्यक्त होते हैं। सारूप्य- वैरूप्य ही तो जगत्की विचित्रताका रूप है। नैयायिकोंने भी पदार्थोंके साधर्म्य- वैधर्म्यका विश्लेषण किया है । एक-एक अवान्तर कारणावस्था या मूल कारणावस्थासे भिन्न-भिन्न चेतनाचेतन वस्तुओका विकास या प्रादुर्भाव हुआ है। ये सब बाते अध्यात्मवादमें हजम हो जाती हैं। सगर्भ भी प्राणियोंमें दृष्ट ही है। कई लोगोने यह भी दृष्टान्त रखा है कि एक पात्रमें एक सेर किशमिश या मुनक्का रख दे तो कुछ दिनोमे उसमें एक ढगके कीट उत्पन्न हो जाते हैं।
१३२ मार्क्सवाद और रामराज्य पहले उनकी संख्या खूब बढ़ती है, पुनश्च ज्यो-ज्यो वे बढ़ते हैं, एक दूसरेका भक्षण करते हैं। प्रबल दुर्बलका भक्षण करते हैं। अन्तमें एक मोटा सा कीड़ा उस पात्रमे दिखायी देता है। पानी एवं जगलके जानवरोमे यह भक्ष्य-भक्षक- भाव 'मात्स्यन्याय' नामसे प्रसिद्ध है ही। भारतीय शास्त्रोने लिखा है कि हस्तहीनोंको हस्तवाले, अपदोको पदवाले तथा छोटोको बड़े जीव खा जाते हैं। इस तरह जीव ही जीवोका जीवन है— अहस्तानि सहस्तानाम्पदानि चतुष्पदाम् । फल्गूनि तत्र महतां जीवो जीवस्य जीवनम् ॥ (श्रीमद्भा० १ । १३ । ४७) फिर भी यह स्वाभाविक नहीं, किंतु क्षुधाका ही यह सब उपद्रव है। क्षुधा बिना कोई किसीका भक्षक नहीं बनता। क्षुधा ही मृत्यु है—'अशनाया वै मृत्युः' ( उपनिषद् ) । स्वभावसे सभी प्राणी 'अमृतस्य पुत्राः' परमेश्वरके पुत्र हैं। अतः सबमे समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृता ही स्वाभाविक है। अनादि, अविद्या, काम, कर्मके कारण ही देहादि तादात्म्याध्यासके कारण अशनाया- पिपासा एवं मृत्युका उपद्रव उपस्थित होता है। विकासके सम्बन्धमें आधुनिक लोगोको भी कई दोष प्रतीत होते हैं। जिन भिन्न प्रकारके व्यक्तियोंमेंसे देशकालोपयुक्त व्यक्तियाँ योग्यतमरूपसे प्रकृति- द्वारा चुनी जाकर रक्षित, परिवर्तित होती है और तदनुसार नाना प्रकारके जन्तुओंका विकास होता है, उन व्यक्तियोंमें प्रथम भेद कहाँसे आया ? जन्तुओको जातिभेदका मूल बतलानेवाली विकास-कल्पना अन्तिम व्यक्तिभेदपर जब पहुँचती है, तब उसे रुकना ही पड़ता है। डार्विनने अवस्थाभेदसे, इन्द्रियों और शक्तियांके उपयोग-अनुपयोगसे भी व्यक्तियोंमें प्रथम भेद माना है। सर्दी-गर्मी आदि अवस्थाओके भेदसे व्यक्तियोमे भेद होता है। जिस शक्ति या इन्द्रियका उपयोग होता है, वह सुरक्षित होती है। जिसका उपयोग नही होता, वह नष्ट हो जाती है। इन कारणो या अन्य कारणोसे होनेवाले भेदोकी रक्षा और वृद्धि कैसे होती है, यही दिखलाना डार्विनके विकास-सिद्धान्तका लक्ष्य है। अध्यात्मवादमे तो तत्तत् अनन्त विचित्र कार्योंके अनुगुण उन-उन कारणोंमें शक्तियाँ ही होती हैं। सूक्ष्मवट-बीजमें अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फलादि विचित्र रूप, रस एवं गन्धयुक्त विभिन्न पदार्थोंकी शक्ति होती है, वही कार्यरूप फलके बलसे अनुमेय होती है। सर्वथा असत्का विकास कभी भी हो नहीं सकता। इस दृष्टिसे तो प्रथम भेद या अन्तिम भेद, सबका ही मूल कारण शक्तिभेद है। विभिन्न चेतन जीवोंका उनसे सम्पर्क कर्मानुसार है, यह भी स्पष्ट है।
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डार्विनके मतानुसार—‘मनुष्यकी बुद्धि एव शरीरकी पशुओकी बुद्धि एव शरीरमे समानता मिलती है, अतः जैसे मछलियोंमे कछुआ, पक्षी आदि क्रमसे बदरोंका आविर्भाव हुआ, वैसे ही बदरोंसे मनुष्योंका आविर्भाव हुआ ।' डार्विनके मतानुसार 'बदर यदि मनुष्यके पूर्वज नहीं तो उनके चचेरे भाई अवश्य हैं । अर्थात् दोनोंके पूर्वज अवश्य एक हैं। पशुओंमें स्मृति, सौन्दर्य, ज्ञान, सहानुभूति आदि गुण मनुष्यके समान ही होते हैं। घोडों, कुत्तों आदिको शिक्षित किया जाता है। अतः उनमें विवेक भी रहता है। सामान्य कीटोंसे लेकर मनुष्यतक क्रमेण विकास मानना ही उचित है। बीचकी श्रेणियोंको छोडकर कीडो एवं मनुष्योंका भेद बहुत भारी मालूम पडता है, किंतु क्रमानुगत रूपसे देखें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं लगती। इसी तरह मनुष्यकृत यन्त्रों एव गृह आदि अन्य पदार्थोंका इतिहास देखें तो अन्तिम और आदिम अवस्थामें आकाश-पातालका अन्तर प्रतीत होता है, परन्तु क्रमोन्नति देखनेपर कोई आश्चर्य प्रतीत नहीं होता ।' अध्यात्मवादियोंके मता
१३४ मार्क्सवाद और रामराज्य भी हो रहे हैं। इस न्यायसे पहलेके समान आज भी बंदरोंसे मनुष्योंकी सृष्टि क्यों नहीं हो रही है ? इस तरह मनुष्येतरसे मनुष्योंकी उत्पत्तिका न दिखायी देना, मछली एवं बंदर आदिसे आज भी मछली एवं बंदरोंकी उत्पत्तिका दिखायी देना विकासके विरुद्ध ही है। डार्विनके मतानुसार 'प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष ही शाश्वत और सार्वत्रिक है। सहानुभूति, परोपकार, दया आदि भी स्वार्थके लिये ही है। कभी मनुष्य मनुष्यका बर्बर संहारक हो जाता है, कभी बंदर भी अपने मालिकके लिये प्राणतक दे देता है। प्रशंसा-योग्य कर्मोंमें प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है, निन्दित कामोंसे मनुष्यकी निवृत्ति होती है, धीरे धीरे अभ्यास हो जाता है। परार्थ-प्रवृत्ति एवं सहानुभूतिके कार्योंमें प्रवृत्ति होने लगती है। इससे प्रतिद्वन्द्विता सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं पडती।' अध्यात्मवादी ठीक इसके विपरीत कहते हैं कि स्वाभाविक अभिन्नता, समानता एव सहानुभूति है। द्वैत, भेद, कलह, प्रति- द्वन्द्विता, क्षुधा, स्वार्थ आदि ही अविद्या, काम, कर्मके अनुसार आदत पड़ जानेसे स्वाभाविक-से प्रतीत होते हैं। ईश्वरके सम्बन्धमें डार्विनने कुछ नहीं कहा। परंतु लोगोंके दुःख देखकर उसे कभी कभी यह संदेह अवश्य होता था कि 'यदि कोई परमकारुणिक, सर्वज्ञ जगत्का निर्माता या शासक है तो उसे अपने उत्कृष्ट ज्ञानद्वारा दुःखरहित ही संसार बनाना चाहिये था।' परंतु ईश्वरवादी तो ईश्वरके समान ही उसके अंश- भूत चेतन जीवो एवं अविद्याको भी अनादि मानते हैं और अविद्यावान् जीवोंके कर्मानुसार ही सृष्टि होती है। अतः सुख-दुःख एव तत्तत्साधनोंसे पूर्ण जगत्की विचित्रता मान्य होती है। विवेक, वैराग्य तत्त्वसाक्षात्कारके लिये सुखकी अपेक्षा दुःख अधिक उपकारक है, अतः संसारमे दुःखका भी अस्तित्व ईश्वरको अभीष्ट है। जैसे लौकिक शासक अपराधीकी आत्मशुद्धिके लिये कभी कभी दण्ड-विधान आवश्यक समझते हैं, वैसे ही ईश्वर भी। स्पेंसरकी मीमांसा हर्बर्ट स्पेंसर, हेमिल्टन एवं माइन्सेल आदि विकासानुयायियोंने ईश्वर माननेमें कई आपत्तियाँ उपस्थित की हैं, जैसे यदि 'स्वतन्त्र जगत्-कारण ईश्वर जगत् बाह्य है तो उसका जगत्से कोई सम्बन्ध ही नहीं। बिना सम्बन्धके कोई ज्ञान ही होना कठिन है। यदि जगत्मे सम्बन्ध हुआ, तो स्वतन्त्रता कैसे रह सकती है।' इत्यादि। परंतु ईश्वरवादियोंकी दृष्टिमें इन तर्कोंका कोई महत्त्व नहीं है। कारण, ईश्वर जगत्के भीतर रहता हुआ भी कमल-पत्रवत् निर्लेप रहता है, अतः सबको जानता हुआ भी स्वतन्त्र रहता है। शासक भी कारागारमें जाता है, किंतु दण्ड भोगने नहीं अपितु सुव्यवस्थाके लिये। वस्तुतः सर्वद्रष्टा, सर्वशक्तिमान्, स्वतन्त्र परमेश्वरसे ही नियमित विकास भी बन सकता है। अचेतन प्रकृति या अन्य कोई
विकासवाद १३५ भी जड़तत्त्व नियमित क्रमिक विकास करनेमें सर्वथा ही असमर्थ ठहरते हैं। लोकमें विकासकी नियमित योजनाका निर्माण एवं उसका संचालन चेतनद्वारा ही होता है अतः प्राकृतिक विकासके प्रोग्राममें चेतन ईश्वरका हाथ होना अनिवार्य है। अतएव प्रायः संसारका मूल कुछ रहस्यमय या अप्रमेय है। उसका सम्पूर्णरूपसे कोई भी वर्णन नहीं कर सकता, ऐसा विकासवादी भी मानते हैं। इन लोगोंका कहना है 'दिक्, काल, द्रव्य, वृत्ति, शक्ति, चित्त, आत्मा, परमात्मा आदि प्रत्यय हैं। उनका मूल एवं स्वभाव दुर्बोध एवं अनिर्वचनीय है।' अवश्य ही केवल प्रत्यक्ष प्रामाण्यवादीके लिये उक्त वस्तुओंका निर्णय कठिन है, परंतु अनुमान, आगम आदिद्वारा तो कोई भी वस्तु अज्ञेय नहीं है। हर्बर्ट स्पेन्सर तो सभी मतोंका आधार प्रत्यक्ष ही मानता था। इसलिये उसके मतानुसार 'न कोई मत अत्यन्त सत्य है, न अत्यन्त असत्य ही। अतः सभी मतों- का सामान्यांश ग्रहण करना ठीक है।' इसी आधारपर वह उक्त पदार्थोंको 'अज्ञेय' मानता है। उसके मतानुसार विशेष वस्तुओंको सामान्यमें और सामान्य- को पुनः उच्च सामान्यमें ले आना चाहिये। अन्तमें उस परासत्तामें ही स्थिरता होनी चाहिये। जिसका किसीमें अन्तर्भाव नहीं होता, उसे 'अनिर्वचनीय' कहा जाता है। उसके मतानुसार 'ज्ञान सम्बन्ध-ग्रहण-स्वरूप होता है, अतः एक वस्तु- का वस्त्वन्तरसे भेद सादृश्यादिके बिना नहीं हो सकता। अप्रमेयमें भेद-सादृश्य आदिका ग्रहण होना असम्भव है।' स्पेंसरके मतानुसार 'ईश्वरका स्वरूप क्या है यह नहीं जाना जा सकता। किंतु सत्ता मानी जाती है। सम्बन्ध ग्रहण सापेक्ष- बोध ईश्वरमें नहीं पहुँचता, अतः सम्बन्धातीत अप्रमेय कारणशक्ति मान्य होनी चाहिये।' वस्तुतः स्पेंसरके इस तर्कसे तो किसी भी वस्तुका बोध नहीं हो सकता, क्योंकि एक वस्तुसे भिन्न सभी वस्तुओंमें उसका किसी-न-किसी ढङ्गका सम्बन्ध रहता ही है। फिर एक अल्पज्ञ व्यक्तिको सब वस्तुओंका ज्ञान सम्भव नहीं और न सबके साथ उसके सम्बन्धका ही ज्ञान हो सकता है। इस तरह सभी ज्ञान भ्रमात्मक ही ठहरेंगे। अतः 'सप्रकारक, निष्प्रकारक, दोनों ही प्रकारके ज्ञान होते हैं।' यही सिद्धान्त मानना पड़ेगा। भले ही द्रव्यका गुण क्रिया- समन्वितरूपसे ही ग्रहण हो, फिर भी वस्तु-स्वरूपका भी ग्रहण होता ही है। रूप, सम्बन्ध आदि पदार्थोंका स्वरूप-ज्ञान भी होता है। एतावता ईश्वर, काल आदि भी अप्रमेय, अज्ञेय नहीं कहे जा सकते। हाँ, सर्वज्ञाता, सर्वद्रष्टा दृश्य या ज्ञेय नहीं हो सकता; क्योंकि एक ही स्वयं ज्ञाता और ज्ञेय दोनों नहीं हो सकता। ऐसा होनेसे कर्म-कर्तृ-विरोध होता है। वही कर्त्ता अपनी क्रियाका कर्म नहीं बन सकता। द्रष्टाका भी द्रष्टा यदि अन्य माना जाय तो फिर उसका द्रष्टा-
१३६ मार्क्सवाद और रामराज्य और फिर उसका भी द्रष्टा ढूँढना पड़ेगा। इस तरह अनवस्था-प्रसङ्ग होगा। सर्वद्रष्टा जिससे दृश्य होगा उसका द्रष्टा नहीं हो सकेगा; क्योकि कोई भी दृश्य अपने द्रष्टाका द्रष्टा नहीं हो सकता। ऐसी स्थितिमें उसको सर्वद्रष्टा नहीं कहा जा सकता। अतः प्रमाण व्यापारसे अज्ञाननिवृत्ति तथा स्वप्रकाशरूपसे आत्माका बोध मानना उचित है। इसी तरह प्रत्यक्ष, अनुमान, आगमादि प्रमाणों- के आधारपर काल आदिका भी ज्ञान होता ही है। कुछ भी हो, अज्ञेयरूपसे भी तो विद्यमान वस्तुका एक ज्ञान मानना पड़ता है। इसीलिये स्पेसर आत्मा-अनात्मा, जड-चेतनको शक्तिका ही रूपान्तर मानता है। परंतु विचार करनेपर यह भी सत्य नहीं ठहरता। आत्मा तो मूल पदार्थ है, शक्ति उसका अंश है। जैसे वह्नि- मे दाहिका शक्ति होती है, वैसे ही आत्मामें प्रपञ्चोत्पादिनी शक्ति मान्य होती है। सांख्य-मतानुसार भी आत्मा एक स्वतन्त्र पदार्थ माना जाता है। स्पेसरके मतानुसार 'शक्तिकी सार्वकालिक सत्ता ही मूल परमार्थ है। उसीसे द्रव्यकी अनश्वरता, गतिका सातत्य, शक्तियोके सम्बन्धकी नित्यता अर्थात् नियमोंकी एकरूपता, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, शक्तियोका परिणाम एवं तुल्यपरिवर्त्तिता, गतिका दिङ्नियम अर्थात् उसकी अल्पतमावरोध, रेखानुसारिता, गुरुत्वाकर्षणानुसारिता, इन दोनोका योग और गतिका अविच्छिन्न प्रवाह आदि निकलते हैं। उसी शक्तिके नियम सब प्रमेय पदार्थोंमें लगे हुए हैं। इन नियमोंमें सबसे व्यापी नियम विकासका नियम है। इसके अनुसार द्रव्यका सदा ही आन्तर परिवर्तन होता रहता है। संसारका प्रत्येक अवयव और समस्त संसार सदा ही 'विकास' एव 'विच्छेद' इन दो व्यापारोंमें लगा है। विकासावस्थामें द्रव्यका सङ्घीभाव और विच्छेदावस्थामें शिथिलीभाव होता है।' वस्तुतः यह अंश सांख्योंके मतसे मिलता-जुलता है। वे भी प्रकृतिको ही आत्म- भिन्न सब व्यक्त प्रपञ्चका मूल मानते हैं। 'चलञ्च गुणवृत्तम्' के अनुसार व्यक्त- अव्यक्त सभीको गतिशील मानते हैं— क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः। चितिशक्तिको छोडकर सभी भावोंको वे क्षणपरिणामी मानते हैं। उनके असङ्गचेतन व्यापक पुरुष स्वतन्त्र माने जाते हैं। सांख्यके सद्वादका ही प्रत्यभिज्ञान इस मतमें भी होता है। सांख्यानुसार सत्का विनाश एवं असत्की उत्पत्ति नहीं होती। केवल अवयवोंके सङ्घीभावसे आविर्भाव या विकास होता है एवं अवयव-विच्छेदसे तिरोभाव होनेसे ही नाशका व्यवहार होता है। प्रकृतिके स्वभावका उसके परिणामोंमें अनुवृत्त होना भी उन्हे मान्य है। प्रकृति सुख- दुःख-मोहात्मक है, अचेतन है। इसीलिये उसका परिणाम प्रपञ्च भी सुख-दुःख- मोहात्मक एवं अचेतन है।
विकासवाद १३७ स्पेंसर इस विकासकी तीन श्रेणियाँ मानता है-- (१) 'शक्तिका केन्द्रस्थ होना, जैसा कि बादलोंके इकट्ठा होनेमें प्रारम्भिक बदलीका और कीटाणुओंके जीवन-केन्द्रोंमें देखा जाता है। (२) भेदीकरण--मूलका बहिरावेष्टनसे अलग होकर उसमें आन्तरिक भेद होना और (३) स्पष्टीकरण--अर्थात् भेदोंका निश्चितरूप एव आपसमें सम्बन्धित होकर एक सुव्यवस्थित पूर्णरूप धारण करना । विकास और विच्छेदका भेद यही है कि विकासमें भेदके साथ सङ्गठन है और विच्छेदमें सङ्गठनका अभाव है। विकासकी गति अनिश्चित सम्बन्ध और व्यवस्थारहित एकरूपतासे निश्चित सम्बन्ध और व्यवस्थापूर्ण अनेकरूपताकी ओर होती है । उदाहरणार्थ निम्नश्रेणीके जीवोमे विशेष इन्द्रियभेद नहीं होता, कहीं-कहीं लिङ्गभेद भी नहीं होता। एक (स्पर्श) इन्द्रियमे ही सब इन्द्रियोंका कार्य चलता है। परन्तु जैसे-जैसे जन्तु विकासकी श्रेणीमें बढ़ते जाते हैं, वैसे वैसे उनमें इन्द्रियभेद बढ़ता जाता है और साथ ही विभिन्न इन्द्रियोंमे सम्बन्ध भी स्थापित होता जाता है। मनुष्यमें सब इन्द्रियाँ स्पष्ट होती हैं और तभी अपने-अपने सम्बन्धमे मनुष्य-शरीरकी रक्षा एव वृद्धिमें योग देती हैं।' स्पेंसरके मतानुसार 'विकासका यह नियम सभी विषयोंमें लगता है।' साख्यानुसार कारणगत प्रकाश, हलचल एव अवष्टम्भ आदि गुणोंके अङ्गाङ्गीभावरूप वैषम्यके अनन्तर ही तिरोधायक आवरणसे बहिर्भूत होकर कार्यकी स्पष्टता होती है। बीज और मृत्पिण्डके विघटनपूर्वक अङ्कुर एवं घटादिके आविर्भावानुकूल संघटनक्रियासे ही अङ्कुर एवं घटकी अभिव्यक्ति होती है । अनेकता एवं व्यवस्था भी साङ्ख्यानुसार घटके समान अभिव्यक्त ही होती है । अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती । चेतना एव इन्द्रियाँ भी विद्यमान ही थीं, केवल उनकी अभिव्यक्ति ही होती है। अभिव्यक्तिमें ही क्रम मान्य हे । अत्यन्त अविद्यमानका बालूसे तेलके समान कभी भी आविर्भाव नहीं होता । उसी तरह सत्का नाश भी नहीं होता । विकासमें 'भूतपदार्थका एकीकरण और गतिका वितरण होता है विच्छेदमें गतिका तिरोभाव और भूत पदार्थका अनेकीकरण या वितरण होता है। यह विकास और विच्छेदका नियम विश्वके लिये एक साथ ही प्रयुक्त नहीं होता, किंतु एक भागमें विकास तो दूसरे भागमें विच्छेदका आरम्भ होता है। सांख्यमतानुसार 'गति तो हर समय ही रहती है, किंतु एक कारणमें अनेक कार्य युगपत् नहीं हो सकते । अतः कार्यान्तरके आविर्भावके लिये प्रथम कार्यका तिरोभाव आवश्यक होता है, जैसा कि घटके आविर्भावके लिये पिण्डावस्थाका तिरोभाव अपेक्षित होता है।' इसीलिये विकास-विच्छेदका क्रम भी सङ्गत हो जाता है । स्पेंसरने जीवशास्त्रका तत्त्व बतलाते हुए कहा है कि 'आन्तर सम्बन्धोंके
साथ अविच्छिन्न मिलावट ही जीवनतत्त्व है । जैसे-जैसे वाह्य एवं आन्तरिक सम्बन्धोंका साम्य होता है, वैसे-वैसे इन्द्रिय एवं शरीरसम्बन्धी विकासके क्रममें उच्चता होती है ।' मनस्तत्त्वके सम्बन्धमें उसने कहा है कि 'मनस्तत्त्व विज्ञानगम्य नहीं है । जिन अवस्थाओंमे वह प्रकाशित होता है, केवल उन अवस्थाओंकी अभिव्यक्ति ही विज्ञानाधीन होती है ।' उसके मतानुसार 'स्नायुनिष्ठ आघातसे ही संवित्की अभिव्यक्ति होती है, संवेदन और उसके सम्बन्धोंसे ही चित्त बनता है । संवेदनोंके स्मरण, परस्पर सम्बन्ध और संघीभावसे समस्त संवित्का बनना वह मानता है । इसीलिये चित्तकी भिन्न वृत्तियोंमें परस्पर अत्यन्त भेद नहीं होता । चित्त व्यापारमे प्रतिफलन, स्वाभाविक क्रिया, स्मरण और विवेक ये क्रम हैं । संवित्के जो आकार व्यक्तियोंमें स्वाभाविक और सहज हैं, वे भी जातिमें किसी-न-किसी समय अनुभवसे ही प्राप्त माने जाते हैं । पीछेसे स्नायुजालमें जमकर वे परम्परागत हो जाते हैं ।' स्पेंसरने इसी प्रकार अनुभववाद और सहजज्ञानवादका साम्य स्थापित किया । किंतु यहाँ भी यह प्रश्न बना ही रहता है कि प्रारम्भिक मनुष्योंमें ऐसे ज्ञानकी नींव किस प्रकार पड़ी ? प्रारम्भकालमें अनुभव किस प्रकार स्वतन्त्र हो सकता है ? वस्तुतः स्नायुके आघात अथवा विषयेन्द्रिय-सन्निकर्ष, शब्द-प्रमाण या व्याप्तिज्ञानसे सात्त्विक मनकी ही विषयाकाराकारित वृत्ति उत्पन्न होती है । उसी वृत्तिपर अभिव्यक्त आत्मचैतन्यसे ही वस्तुका प्रकाश होता है । जैसे पार्थिव होने- पर भी सामान्य पाषाणोपर सूर्यका प्रतिबिम्ब नहीं पडता, परंतु स्फटिकपर प्रतिबिम्ब पडता है, वैसे ही सामान्य जड पदार्थोंपर आत्मचैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं पडता, परंतु सात्त्विक अन्तःकरण-परिणामरूप वृत्तियोपर आत्मचैतन्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है । मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार आदि एक ही वस्तुके अवस्थाभेद हैं । वेदान्त- सिद्धान्तानुसार अन्त:करण सूक्ष्म पञ्च महाभूतोके समष्टि सात्त्विक अंशका परिणाम है । ग्राह्य ग्राहकभाव सजातीयमें ही दृष्ट है । पार्थिव घ्राणेन्द्रियसे पार्थिव गन्धका ग्रहण होता है । तैजस चक्षुरिन्द्रियसे तैजस रूपका ग्रहण होता है । इसी तरह आकाशीय श्रोत्रेन्द्रियसे आकाशीय शब्दका, वायवीय त्वगिन्द्रियसे वायवीय स्पर्शका और जलीय रसनेन्द्रियसे जलीय रसका ग्रहण होता है । मनसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध — इन पाँचों ही विषयोंका ग्रहण होता है । अतः उसे सूक्ष्म पञ्चमहाभूतोके समष्टि सात्त्विक अंशका परिणाम मानना प्रामाणिक है । छान्दोग्य उपनिषद्में तो स्पष्ट ही अन्वय व्यतिरेकसे मनस्तत्त्वको अन्नमय सिद्ध किया गया है । अन्नके अभावमें मनकी कलाएँ घटती हैं और अन्नके अस्तित्वमें उसकी कलाएँ उपोद्वलित होती हैं— 'अन्नमयं हि सौम्य मनः ।' संकल्प, विकल्प, स्मरण, निश्चय, अभिमान आदि सब इस चित्त या मनके ही परिणाम हैं । अभिव्यक्त
चिद्ब्रह्म ही 'संवित्' शब्दसे कहा जाता है और उच्च वेदान्त-सिद्धान्तानुसार तो अखण्ड, अनन्त बोधस्वरूप ब्रह्मात्मा ही मननीयशक्तिविशिष्ट होकर मनस्तत्त्वरूप- में विवर्तित होता है। अखण्ड बोध ब्रह्म एवं साक्षीस्वरूप आत्माका अक्षभृतसे जो भी ज्ञान होता है, वह प्रमाणके द्वारा प्रमात्मक होता है और सदोष प्रमाणोंसे भ्रमात्मक ज्ञान होते हैं। स्पेसरके मतानुसार 'बाह्यशरीरके द्वारा स्नायु तन्तुओपर आघात होता है। उससे ज्ञान उत्पन्न होता है। चित्त एवं शरीर दोनों ही अप्रमेयके रूपान्तर हैं। संवित्के एकीभाव और विभागका प्रवाहरूप चित्त है। इसके अनुसार वास्तविक सत्ताके अस्तित्वका ज्ञान उसके दृश्योंद्वारा होता है। यह दृश्य उसकी प्रतिलिपि नहीं, किंतु उसके संकेत हैं। जैसे वर्णोंका संकेत लिपिद्वारा होता है, उच्चरित एव लिखित शब्दोंमें समानता नही होती। वैसे ही वास्तविक सत्ता तथा उसके दृश्योंमें समानता नहीं है। यही 'रूपान्तरित सद्वाद' है। वस्तुवादमें बाहरी सत्ताको माना जाता है। इस विषयपर विचार करनेसे विदित होता
१४० मार्क्सवाद और रामराज्य तो आचार बुरा है । स्वार्थ, परार्थ दोनों पृथक् होनेके कारण अनर्थकारक हैं । दोनोंमें मेल होनेसे आचारकी उन्नति होती है । स्वार्थसे परार्थ एवं परार्थसे स्वार्थ साधन होता है । सर्वप्रथम स्वार्थप्रयुक्त कलह होता है, फिर प्रत्येकका स्वार्थ परस्पर अधीन देखकर मनुष्य प्रेममय जीवन पसद करते हैं । सामाजिक आचारोंमें न्याय और उपकार मुख्य हैं । प्रत्येक व्यक्ति दूसरोंके स्वातन्त्र्यका विरोध न कर जितना और जो चाहे कर सकता है । यही न्यायका नियम है । स्पेसरके मतानुसार 'समाज और व्यक्तिका अवयवावयवीभाव है । अवयव अवयवीसे पृथक् नहीं हो सकता । जो कार्य समाजके लाभका है, उससे व्यक्ति- का भी लाभ होता है । जिस कार्यसे समाजको हानि होती है, उससे व्यक्तिकी भी हानि होती है, यही परार्थका आधार है । परस्पर विरोधके कारण समाजमे राज्य-शासनकी आवश्यकता पड़ी । प्रजामें परस्पर आन्तर भेदको बचाना, प्रजाकी बाहरी शत्रुओंसे रक्षा करना राज्यका कार्य है ।' व्यक्तिके कार्योंमें राज्यका हस्तक्षेप उसे अमान्य है । सापेक्षतावादी हेमिल्टनका कहना है कि 'हमारी मानसिक शक्तियोंसे ही सब ज्ञान होते हैं, निरपेक्ष ज्ञान नहीं होता ।' परंतु निरपेक्ष पदार्थ भी असम्भव या असत् नहीं । केवल दृश्य ही प्राणीको दिखायी पड़ते हैं । वे द्रष्टाकी अपेक्षा रखते हैं । यह दृश्य, यह गुण, अवश्य किसी पदार्थके दृश्य होंगे, परंतु वह पदार्थ अज्ञेय रहता है । दृश्य शृङ्खलाकी भिन्नतासे मूल द्रव्यमें भेद भी समझा जा सकता है । डीन मैन्सलका कहना है 'दार्शनिकोंके निश्चित ज्ञानतक न पहुँचनेके आधारपर ही धर्मकी पुष्टि की गयी है ।' बुद्धिवादी लोग धर्ममें जो कठिनाइयाँ देखते हैं वही तो विज्ञानमें भी कठिनाइयाँ हैं । फिर धर्ममें ही आपत्ति क्यों उठायी जाय ? जब एक और अनेकके दुर्भेद्य रहस्यके आगे दार्शनिक मूक हैं और सभी चीजोंकी उत्पत्तिका रहस्य नहीं जान सकते, तब ईश्वरकृत अद्भुत चमत्कारोंको न समझ पाना तो सर्वथा स्वाभाविक है । हक्सलेके मतानुसार 'अपनी रुचि एवं इच्छाओको सत्यके निर्णयमें बिल्कुल स्थान न देना चाहिये । स्वर्ग, अमरत्व आदि यद्यपि इच्छाओंके नुकूल हैं, तथापि जबतक वैज्ञानिक प्रत्यक्ष प्रमाण न मिले, तबतक उनपर श्वास नहीं करना चाहिये । प्रयोगात्मक जाँचमे जो ठीक उतरे, वही सत्य है । अनुमानमात्र पर्याप्त नहीं है । जो बातें अनुभवमें नहीं आती, उनके सम्बन्धमें वैज्ञानिकको चुप रहना चाहिये ।' वैज्ञानिक
लोग जो एक मूल द्रव्यको सबका कारण मान लेते हैं, यह अपने अधिकारसे आगे जाना है। यद्यपि उन्होंने प्रत्ययवादियोंके संवित्को बड़ा महत्त्व दिया है, फिर भी ये कहते हैं कि 'भूतवादकी कल्पना अधिक पट सकती है।' इस तरह वे संवित्का आधार भी मानते हैं और यह भी कहते हैं कि 'संवित्के बाहर कोई वस्तु नहीं हो सकती।' इस तरह भूत या आत्माके सम्बन्धमें हूमके समान यह भी अज्ञेयवादी हैं। इनका कहना है कि 'भौतिकवादके सम्बन्धमें जहाँतक व्याख्या हो, ठीक ही है। परंतु हमें तो व्यवहारके लिये प्राकृतिक नियमोंका ज्ञान भी पर्याप्त है।' हमें आम खानेसे काम है, पेड़ गिननेसे क्या लाभ ? अज्ञेय पदार्थ एक हो या अनेक, इसके बारेमें कुछ निश्चय कहा नहीं जा सकता।' कर्त्तव्यके सम्बन्धमें उसका कहना है कि 'हमें प्रकृतिसे ऊँचे उठना चाहिये, उसका अनुकरण नहीं करना चाहिये।' क्लीफॉर्डके अनुसार 'सर्व मानमद्रव्य ही सर्वत्र संसारमें फैला है। यही द्रव्यविकासद्वारा ऐन्द्रियक शरीरोंमें इकट्ठा होकर चेतना हो जाता है। मेरे मनसे भिन्न अन्य मनके द्वारा भी जो वस्तु उपलब्ध होती है, वही वस्तुकी वस्तुता है।' विलियम रीडका कहना है कि 'मनुष्यजाति एक व्यक्ति है। वह पूर्णताकी ओर जा रही है, वही ईश्वर है।' विकासवादियोंके मतानुसार 'विकासकी पराकाष्ठामें जब मनुष्यमें सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता होगी, तभी ईश्वर- कल्पनाकी बात पूरी होगी।' कहना न होगा कि 'इन जडवादियोंकी कल्पनाओंमें भी परस्पर महान् मतभेद है।' अनेकों ऐसे पदार्थोंको 'अज्ञेय' कहकर ही वे संतोप कर लेते हैं। डीन मैन्सलके अनुसार 'जब भूतद्रव्यके ही समझनेमें वैज्ञानिकोंको कठिनाई है, तब आध्यात्मिक द्रव्यमें कठिनाई होनेमात्रसे उसमें अविश्वास क्यों किया जाय ? जब किसी पदार्थके अस्तित्वके लिये प्रमाण अपेक्षित होता है, तब उसके अभावके लिये भी तो प्रमाण चाहिये ही । यह तो निश्चय ही है कि आधिभौतिक शास्त्रज्ञ भी एक अव्यक्त प्रकृतिको किसी न-किसी नामसे स्वीकार करते हैं और उसीसे अनेक प्रकारकी सृष्टि मानते हैं।' इस सम्बन्धमें लोकमान्य तिलकनें 'गीता-रहस्य' में लिखा है— 'हेकलकी विश्वकी पहेली' ( Riddle of the universe ) के अनुसार आधुनिक पदार्थ विज्ञानवादीकी दृष्टिमें कार्यके कोई भी गुण कारणके बाहरके गुणोंसे उत्पन्न नहीं होते। जब कारणको कार्यका स्वरूप प्राप्त होता है, तब उस कार्यमें रहनेवाले द्रव्यांश एवं कर्मशक्तिका कुछ भी नाश नहीं होता । पदार्थकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंके द्रव्यांश और कर्मशक्तिको जोड़कर वजन भी सदैव