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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

[Header] मार्क्ससीय अर्थ-व्यवस्था ३३७

अतः कामके घंटे और मजदूरीका निष्पक्ष न्यायालयद्वारा तय होना उचित है। पैदावारके साधनोकी उन्नति यदि दोष नहीं है तो उसका होना उचित ही है। और जो पैदावारके साधनोंकी उन्नति कराता है, उसे उसका फल भी मिलना उचित ही है। फिर दूसरेकी उन्नतिसे दूसरेके पेटमें दर्द हो, इसे सिवा ईर्ष्याके और दूसरा क्या कहा जा सकता है ? कामके घंटोमें कमी होनेसे अधिकाधिक लोगोंको काम मिलेगा, वेकारी घटेगी, इससे जनतामें क्रय-शक्ति बनी रहेगी, मालकी खपत बढ़ेगी, जिससे उत्पादनमें बाधा न पड़ेगी। जिन वस्तुओंका उत्पादन उपभोक्ताओंकी आवश्यकतासे अधिक होने लगे, उनपर प्रतिबन्ध लगाकर अन्य उपयोगी वस्तुओंके उत्पादन एव तदुपयोगी उत्पादन-साधनोंके निर्माणका प्रयत्न होना चाहिये। इससे सभीका हित है। अतः इसके अनुकूल सरकारी प्रोत्साहन, प्रेरणा तथा आवश्यक आदेश भी होना चाहिये। इस तरह वेकारी भी रुकेगी, मालके खपतमे भी बाधा नहीं पड़ेगी और उपभोक्ताओंको आवश्यक उपभोग-सामग्री भी मिल सकेगी। यान्त्रिक विकासमें भी बाधा नहीं पड़ेगी और

३३८ मार्क्सवाद और रामराज्य बनानेका प्रयत्न किया जाता है। जिस गायसे दूध लिया जाता है, उसको इस लायक रखा जाता है कि वह कल भी सहायता देने योग्य रहे। यह नहीं कि एक दिन दूध लेकर उसे सदाके लिये मिटा दिया जाय। वस्तुस्थिति तो यह है कि आधुनिक मार्क्सवादियोने यह स्थिति उत्पन्न कर दी है कि छीनाझपटी करनेवाले लोगोकी बहुतायत हो गयी है। वे कहते हैं कि लेगे, मरकर लेगे, मारकर लेगे, जहन्नुममें जाकर, जहन्नुममे भेजकर लेगे, लूटकर-मारकर हर तरहसे लेगे, लेंगे, किन्तु फलस्वरूप देनेवाले कहते हैं कि मर जायेंगे, मिट जायेंगे, परंतु नहीं देगे, नही देगे। ठीक इसके विपरीत रामराज्यकी स्थिति यह है कि देनेवाला हर तरहसे देनेकी चेष्टा करता है। शास्त्र कहते हैं कि श्रद्धासे, प्रेमसे, लज्जासे, भयसे, हर तरहसे देना चाहिये। लेनेवालेको हर तरहसे बचना चाहिये। मुफ्तखोरीका माल हराम- खोरीका माल है। उससे वंशवृद्धि, समृद्धि तथा बरकत रुक जाती है। इस दृष्टिसे देनेवाला हर तरहसे देना चाहता है और लेनेवाला हर तरहसे बचना चाहता है। मार्क्सवादमें 'दो दो', 'नहीं नहीं' का उद्घोष होता है। रामराज्यमें 'लो लो' 'नहीं नहीं' का उद्घोष होता है। मार्क्सवादमे सब वस्तुएँ सरकारी हो जाती है, व्यक्तिकी कोई मिलकियत नहीं रहती है; किंतु रामराज्यमे व्यक्तियोकी बपौती सम्पत्ति सुरक्षित रहती है, और उसपर उचित धर्मनियन्त्रण रहता है। इस पक्षमें धन, धर्म या जान-मालकी रक्षा जो कि राज्य-स्थापनाका प्रमुख उद्देश्य है, सुरक्षित रहती है। मार्क्स को छोड़कर प्राच्य, प्रतीच्य सभी राजनीतिज्ञोने धर्म एव धनकी रक्षा या जान-मालकी रक्षा ही सभ्य व्यवस्थाका उद्देश्य माना है। इसीलिये व्यक्तियोने अपने अधिकार शासनको सौंपा था, जिसके पूरा न होनेपर राज्य-सत्ताको उलट देना जनताका जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। मार्क्स- वादी व्यवस्थामें धर्म, धन एवं जान-मालका प्रत्यक्ष अपहरण होता है। वैध संपत्ति, बपौती आदिका कुछ भी महत्त्व मार्क्सके मतमें नहीं है। अतिरिक्त मूल्य और शोषण कहा जाता है कि 'कला-कौशल, उद्योग-धंधोके विकासके पहले जब दास- प्रथा थी, तब दासोका भी शोषण अतिरिक्त श्रमके रूपमें होता था। दास एवं गुलामको केवल अन्न और वस्त्र दिया जाता था। वह भी उतना ही जितना कि उसके शरीरमें परिश्रम करनेकी शक्ति कायम रखनेके लिये पर्याप्त था। दासद्वारा कराये गये परिश्रमके सम्पूर्ण फलको मालिक लोग भोगते थे। यही बात सामन्तशाही एव जागीरदारीके जमानेमें थी। सामन्तों एवं जागीरदारोंकी प्रजा कठिन परिश्रमसे जो पैदावार आदि उपज भूमि या भूमिकी पैदावारसे सम्बन्ध रखनेवाले दूसरे कामोसे करती थी, उसमेंसे इन लोगोके शरीरमें परिश्रम-शक्ति बनाये रखनेके लिये अत्यन्त आवश्यक भागको छोड़कर शेष भाग दाम, कर,

लगान या नजरानाके रूपमे मालिकके पास चला जाता था । परन्तु उस समय शोषण होता था मालिकोंके उपयोग और उपभोगके लिये । उस समय व्यवहारमें लाना ही उनका उपयोग होता था । इसलिये शोषण भी उतना ही होता था जितनेमे मालिकोकी आवश्यकता पूरी हो जाती थी । मालिक भी शोषणद्वारा प्राप्त धनको अपने व्यवहारमें खर्च कर देते थे, जिससे वह धन दूसरी श्रेणियोंके पास पहुँचकर फिर बाजारमें पहुँच जाता था और दूसरोंके उपयोगमे आता रहता था । परन्तु पूँजीवादके युगमें धनको पूँजी बनाकर उसका उपयोग खर्चके लिये नहीं, बल्कि अधिक धन पैदा करनेके लिये किया जाता है । उसके पैदावारके साधन बढाये जाते हे । पूँजीपतियोंके लिये मुनाफेका क्षेत्र बढाया जाता है। मुनाफेका बहुत छोटा भाग पूँजीपतियोंके खर्चमें आता है । शेष पूँजी बनकर मुनाफा कमानेके ही काममें आता है । जितना जितना अधिक मुनाफा होता है, उसमें और अधिक मुनाफा कमानेका यत्न किया जाता है । इस तरह पूँजीपतिके मुनाफा कमानेसे सन्तुष्ट होनेकी कोई सीमा नहीं रहती ।' वस्तुतः अङ्ग अङ्गीभाव तथा शेष-शेषी-भावसे ही सेव्य सेवक-भाव है । सेवक, दास आदि शब्द लगभग समानार्थ हैं । ससारमें ये भाव किसी-न-किसी रूपमें सदा ही बने रहते हैं । भले ही कहा जाय कि आज राजा-प्रजाका भाव मिट गया, आज प्रजा ही राजा है, सरकार या सरकारी आदमी सेवक हैं । फिर भी सिवा शब्दोंके व्यवहारके कोई भी अन्तर नही आया । आज केवल वोट डालनेके समयतक भले ही कुछ अशोंतक जनताका सम्मान किया जाय, परन्तु व्यवहारतः जिन लोगोंके हाथमें शासनयन्त्र आता है, भले ही अपना नाम वे सेवक रखे; किंतु वे सत्ताधारी राजेका भी कान काटते हैं । वस्तुत आज सेवको (शूद्रो) का ही राज्य है । मालिक कही जानेवाली जनता जो चाहती है, उसीकी पूर्ण उपेक्षा की जाती है । आज भारतीय जनता गोहत्या-बन्दी चाहती है, धर्महत्या, शास्त्रहत्याका विरोध करती है, परन्तु सेवक कहे जानेवाले सरकारी अधिकारी उसकी कुछ भी परवा नहीं करते । कहनेके लिये आज दास या गुलामी-प्रथा समाप्त हो गयी, परन्तु खास साम्यवादी देश रूसमें ही विरोधियोके साथ दासो एव गुलामोसे भी अधिक बुरा व्यवहार किया जाता है । कहनेके लिये भारतमें बेगारी-प्रथा समाप्त हो गयी, किंतु वही श्रमदानके रूपमें जोरोंसे प्रचलित है, जिसे इच्छा न होनेपर भी करना पड़ता है। बड़े-बड़े अध्यापक, प्रिंसिपल तथा उच्च श्रेणीके लोग इच्छा न रहनेपर भी सरकारी आज्ञानुसार श्रमदानमें लगते ह । इतना ही नहीं, कहीं तो झूठे तौरपर ही रजिस्टरोंकी खाना पूरी की जाती है । प्राचीनकालमें बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी अपने आपको ईश्वरका, महापुरुषोका, भगवद्भक्तोका दास बननेमे गौरव अनुभव करते थे । धर्मराज

३४० मार्क्सवाद और रामराज्य युधिष्ठिरको हरिदासवर्य कहा जाता था—'हरिदासस्य राजर्षेः' (श्रीमद्भा० १०।७५।२७)। वैष्णवोंमें बड़े-बड़े महापुरुष अपनेको दासानुदास कहते है । तथापि यहाँ स्वामी भगवान्, गुरुजन दासोंके शोषक नहीं होते । वे दासोंको कृतकृत्य करनेवाले होते थे । साक्षात् भगवान् विष्णु कहते हैं कि मैं भक्तोंके परतन्त्र हूँ—'अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज' (श्रीमद्भा० ९ । ४ । ६३) । आजका दासत्वसे मुक्त कहा जानेवाला नागरिक अन्न एवं वस्त्रके लिये तड़पता हुआ मरता है । जब वह काम करने लायक नहीं रहता तो उसका बेटा-पोता भी उसे नहीं पूछता । पर दासत्व-प्रथा- कालमे भी दास भले काम करने लायक न हो, उसके और उसके कुटुम्बका उत्तरदायित्व उसके स्वामीपर रहता था । रहा यह कि उत्पादन साधन-पूँजी बढानेका उत्तरोत्तर प्रयत्न बढता है, तो अगर यह औद्योगिक विकास गुण है, तब तो भला ही है । आज भी ऐश-आरामसे धन बचाकर उत्पादन-वृद्धिके काममें लगाना गुण समझा जाता है । रामराज्यवादी तो फिर भी महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध लगाना उचित समझता है, परन्तु मार्क्सवादी तो महायन्त्रोंका उत्तरो- त्तर विकास ही चाहता है । यदि मुनाफाका विस्तार एवं विकास न होता तो आजकी वैज्ञानिक उन्नति भी असम्भव हो जाती। फिर रामराज्यकी दृष्टिमे तो सदा ही काम-दाम-आरामका उचित वितरण आवश्यक है । श्रमके अनुसार दाम आरामकी व्यवस्था तो होनी ही चाहिये, किंतु कभी यदि व्यक्ति श्रमके लायक न रहे तो भी मनुष्यता- के नाते उसके भी दाम-आरामकी व्यवस्था होनी चाहिये और वह दास-प्रथाके समय भी थी । वस्तुतः उस समयके ये दास नाममात्रके ही दास थे । वे तो कुटुम्बके एक प्रकार सदस्य समझे जाते थे । इसीलिये कुटुम्बपति ऐसे दासोंकी भोजन-व्यवस्थाके अनन्तर ही अपने भोजन-वस्त्रकी व्यवस्था करता था । उसके भोजन करनेपर ही कुटुम्बपति भोजन करता था । पूँजीवादके समाजमें पैदावारका काम पूँजीके आधारपर होता है । पूँजीपतिके पास पैदावारके जितने साधन हैं, वे सब उसकी पूँजी हैं। पूँजीवादके समर्थक कहते हैं—'यदि पूँजीवादी प्रणालीको समाजसे हटा दिया जायगा, पूँजी न रहेगी, मुनाफा कमानेकी प्रणाली न रहेगी तो समाजमें पैदावार बढ़ाने- के लिये साधनोंको किस प्रकार बढ़ाया जायगा ?' परंतु मार्क्सवादके अनुसार वही धन पैदावारका साधन, पूँजी है, जिससे मुनाफा कमाया जाता है । जिससे उपयोगके पदार्थ तैयार किये जाते हैं, वह धन पूँजी नहीं है ।' जो भेद पदार्थ एवं सौदेमें है, वही भेद पैदावारके साधनों और पूँजीमें है । गेहूँकी बोरी यदि परिवारके व्यवहारके उपयोगके लिये है तो वह उपयोग पदार्थ है और यदि वह बिक्रीके लिये है तो वह सौदा है । कोई भी वस्तु सौदा

है या पदार्थ वह इस बातपर निर्भर करता है कि वह वस्तु किस प्रयोजन या उपयोगमें आयगी ? इसी प्रकार पैदावारके साधनोंके बारेमें भी उनका प्रयोजन यह निश्चय करता है कि वह जरूरत पूरी करनेका साधन है या मुनाफा कमानेका साधन ? किसी मशीनसे यदि उपयोग पदार्थ बनाये जाते हैं, तो वह पैदावार साधन तो अवश्य है, पर मुनाफा कमानेका साधन नहीं । अतः मार्क्स उसे पूँजी नहीं कहता । परंतु यदि उस मशीनपर दूसरे लोगोंसे श्रम कराकर मुनाफा कमाया जायगा तो वह पूँजी कहलायेगा । समाजवादी समाजमे बड़ी-बड़ी मिलें रहेंगी, पैदावार और नये साधन जारी करनेके लिये बड़ी मात्रामे धन इकट्ठा किया जायगा । परंतु उसका उद्देश्य व्यक्तियों या श्रेणियोंके लिये मुनाफा कमाना न होकर जनताके उपयोगके लिये उपयोगी पदार्थ और साधन पैदा करना होगा । इसीलिये वह पूँजी न कहलायेगा । वह होगा समाजकी आवश्यकताओंको पूरा करनेका साधन-धन । वस्तुतः उपयोग पदार्थ एवं सौदामे भी पारमार्थिक भेद नहीं है । उपयोग, उद्देश्य या प्रयोजनके भेदसे पदार्थमें भेद नहीं हो सकता । वही विष चन्द्रोदय आदि औषध बनानेके काम आता है, वही मृत्युके काममे आता है । यह सदुपयोग-दुरुपयोगका भेद है । बिजलीमे प्रकाश भी होता है, दूसरे भी कितने काम होते हैं, मृत्यु भी हो जाती है । फिर भी बिजली बिजली ही रहती है, उसमें मौलिक अन्तर नहीं होता । गेहूँकी बोरी स्वार्थ भी हो सकती है, परार्थ भी, किंतु इससे गेहूँकी बोरीमें अन्तर नहीं आता । इसी तरह उपयोग या मुनाफेके लिये गेहूँकी बोरीमे प्रयोग-भेद होनेपर भी उसमें कोई अन्तर नहीं होता । बड़े-बड़े साधनोंके लिये बड़ी मात्रामें धन जुटाना आवश्यक ही होगा । फिर डाका डालकर, छीना-झपटीकर, जबरदस्ती टैक्स लगाकर, इगालवृत्तिसे धन नहीं बटोरना है तो उचित मुनाफाद्वारा ही साम्यवादी सरकारको भी धन जुटाना होगा । नीतिशास्त्रोंका मत है कि इगालकार ( कोयला बनानेवाले ) की वृत्तिसे ( अर्थात् जैसे वह वृक्षको जड़-मूलसे काटकर उसे जलाकर कोयला बनाता है उसी तरह ) प्रजाको लूटकर, उसकी भूमि सम्पत्ति छीनकर धन- संग्रहकी नीति न अपनायी जाय, मधुकर-वृत्तिसे ही धनसंग्रह उचित है । जैसे मधुमक्खी वृक्षों, पौधों, पुष्पों, स्तबकों, फलोंको बिना नष्ट किये ही उनमेंसे रस-संग्रहकर मधु बना लेती है, उसी तरह प्रजाको बिना नष्ट किये ही उसकी सम्पत्तिको बिना छीने ही आवश्यक धन-संग्रह करना उचित है । व्यापार-कौशलसे प्राणी मृतमृत्तिकामात्रके आधारपर धनवान् बन सकता है ( देखिये पृष्ठ ३४७ ) । इससे किसीका नुकसान भी नहीं होता

३४२ मार्क्सवाद और रामराज्य और धनसंग्रह भी हो जाता है । कई स्थानोंमे मूर्खतावश सरकारें गरीबोंकी गाढ़ी कमाईका लाखो रुपया खर्च करके भी कोई लाभ नहीं उठा पातीं । भाखरा आदि बाँधोंके भ्रष्टाचारोंकी कहानियाँ अभी ताजी ही हैं । ऐसे उदाहरण कितने हैं । जैसे कोई मतवादी या सरकारें धनसंग्रहका उद्देश्य प्रजाका उपयोग बताकर पूँजी एवं पैदावारके साधनोंके भेद सिद्ध करनेका प्रयत्न करती है, उसी तरह मुसोलिनी तथा हिटलर सम्पत्ति बढ़ानेके नामपर दूसरे राष्ट्रोंको कुचलकर उनपर अधिकार जमाना उचित समझते थे । वैसे ही मार्क्सवादी पैदावारके साधन संग्रहके नामपर प्रजाकी वैधसम्पत्तियोंका भी अपहरण करते हैं । दान, इनाम तथा क्रयद्वारा मिली, दायमे मिली बपौती सम्पत्तियोंको भी छीन लेते हैं । कई सद्गृहस्थ अपनी सम्पूर्ण कमाईको धर्मार्थ, परोपकारार्थ ही लगाते है । रामराज्यकी दृष्टिसे कमाईका यही सदुपयोग है । सत्पुरुषोंकी विद्या ज्ञानके लिये, धन दान तथा परोपकारके लिये होता है । खलकी विद्या विवाद, धन घमण्ड एव शक्ति परोत्पीड़नके लिये होती है-- विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीड़नाय । खलस्य साधोर्विपरीतमेतज् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ (गुणरत्नम् ७) ऐसी स्थितिमे रामराज्यके अनुसार वैध धनोपार्जन प्रथम दानार्थ, परोपकारार्थ, यज्ञार्थ है, पश्चात् भोगार्थ । मुनाफा कमानेका भी उद्देश्य यज्ञार्थ- परोपकारार्थ ही है । अतः समाजवादी अर्थ-व्यवस्था सिवा अपहरण और लूट- पाटके और कोई व्यवस्था नहीं है । इसके अनुसार जनता धनहीन, धर्महीन, शक्तिहीन होकर मुट्ठीभर तानाशाहोंकी गुलाम बन जाती है । दासोंकी-जैसी भी स्वतन्त्रता उसे नहीं मिलती । बोलने, विचार व्यक्त करने, अपनी कमाईका सदुपयोग करनेके अधिकार भी जनतासे छिन जाते हैं । मनु, शुक, बृहस्पति, कामन्दक, कौटल्य, सुकरात, अरस्तू, अफलातून सभी जान-मालकी रक्षा राज्यविधानका उद्देश्य मानते हैं, किंतु मार्क्सवादी व्यवस्थामे राज्य ही जान-मालका विध्वंसक बन जाता है । जनताकी स्वतन्त्रता सर्वथा नष्ट हो जाती है । लेनिन एव स्टालिन बड़े गर्वके साथ कहा करते थे कि 'रूसमें गैरसरकारी पार्टीका न होना दूषण नहीं भूषण है । जिन देशोंमे वर्गभेद विद्यमान होते हैं, उनमे विभिन्न वर्गोंकी प्रतिनिधित्व करनेवाली अनेक राजनीतिक पार्टियाँ अपेक्षित हो सकती हैं, किंतु रूसमे तो वर्गभेद समाप्त हो चुके हैं, फिर तो यहाँ किसी अन्य राजनीतिक पार्टीका न होना गुण ही है । पर उनका यह गर्व सिवा दम्भके और कुछ नहीं था । वस्तुतः पुलिस-पल्टन तथा गुप्तचर विभागका जाल बिछा- कर, मतभेद रखनेवाले लोगोंकी जबानपर ताला लगाकर उसे दबा रखा गया था । यदि वहाँ वर्गोंका अवशेष न होता, तो लेखन-भाषण एवं प्रेसो तथा

पत्रोंकी स्वतन्त्रतापर प्रतिबन्ध क्यो लगा रखा जाता ? यदि विरोधीवर्ग नहीं थे तो खतरा किससे था ? प्रेसो, पत्रोंकी स्वतन्त्रता आज संसारके सभी देशोमें मान्य है, पर रूसमें उसकी भी स्वतन्त्रता नहीं। वहाँ कोई व्यक्ति सरकारके विरुद्ध न भाषण दे सकता है, न लेख ही लिख सकता है और न कोई सरकारके विरुद्ध नोटिस-पोस्टर निकाल सकता है। फिर स्वतन्त्र अखबार निकालना, सरकारी पार्टीके विरुद्ध चुनाव आदि लडना तो दूरकी बात है। नाटकके लिये मतगणनाके समय सरकारी प्रेरणासे कुछ स्वतन्त्र व्यक्ति खड़े हो जायें, यह अलग बात है। ऐसी स्थितिमें यह कहना कि 'रूसमें वर्गभेद समाप्त हो गया है और वहाँ दूसरी राजनीतिक पार्टीका न होना भूषण है', सिवा दम्भके और क्या है ? लेनिन तथा स्तालिनने संक्रमणकालके नामपर रूसी समाजवादी शासनमें सर्वहाराके डिक्टेटरशिपका जोरदार समर्थन किया था। इन डिक्टेटरोके भीषण डिक्टेटरशिपमें कटकशोधनके नाम एक-एक विरोधियों चुनकर समाप्त कर दिया गया था । ट्राटस्की, बुखारिन आदि हजारो कामरेड तथा उनके लाखो अनुयायियोको मौतके घाट उतार दिया गया था। स्तालिनके विरोधियोकी इन बातोको मिथ्या प्रचार कहकर उन काले कारनामोको छिपानेका प्रयत्न किया जाता था। परन्तु अब खुश्चेव तथा बुल्गानिन जो स्तालिनके पक्के अनुयायी थे, उसके भीषण डिक्टेटरशिपकी निन्दा कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि १९३६ से १९३८ तक पाँच हजारसे अधिक उच्च सोवियत अधिकारियोको नष्ट कर दिया गया था। स्तालिनके चित्रोको हटाने और उसके प्रति श्रद्धा-भक्ति मिटानेका यत्न कर रहे हैं। वस्तुतः यह तो मार्क्सवादी व्यवस्थाका ही दोष है। जहाँ ईश्वर और धर्मका सम्मान नहीं होगा, लोगोको लिखने, बोलनेकी आजादी न होगी, वहाँ भीषण डिक्टेटरशिपका होना अनिवार्य है। स्वयं बुल्गानिन तथा खुश्चेव भी डिक्टेटर ही हैं। बेरियाको गोली मारकर मालेनकोवको पार्टी एव शासनसमितिके प्रधान पदसे हटाकर मोलोटोवको दबाकर अपने अधिकारोको दृढ रखना ही उनका लक्ष्य था। इसके लिये अभी भीषण उलट-फेर एव हत्याओकी आवश्यकता पड सकती है। जैसे स्तालिनने लेनिनके अनुयायियोको नष्ट किया था, अब उसी प्रकार स्तालिनके साथियोका सफाया करनेका प्रयत्न चल रहा है। अधिकार-प्राप्तिके लिये चलनेवाले इन सघर्षोंका कभी भी अन्त नहीं हो सकता । जर्मनीके हिटलरका नात्सीवाद, इटलीके मुसोलिनीका फासिस्टवाद, रूसी समाजवादियोका डिक्टेटरवाद सब एक-ही-जैसा है। भारतमें भी समाजवादी ढगकी समाज-रचनाका प्रयत्न चल रहा है, जिसका अन्तिम रूप यही डिक्टेटरशिप होनेवाला है। व्यक्तियोकी भूमि, सम्पत्ति, उद्योग छीनकर उन्हें विरोधी शक्तिरहित बनानेका भीषण षड्यन्त्र चल रहा है। अध्यादेशी आर्डिनेन्सो-

३४४ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वारा जीवन-बीमा-कम्पनी-जैसी एक-एक वस्तुका सरकारीकरण हो रहा है । एक संसद्-सदस्यने बताया कि यदि अधिवेशनोंके दिन निकाल दिये जायें तो प्रतिदिन एक अध्यादेशका औसत पड़ता है । इस तरह भारतका वर्तमान काँग्रेसी शासन भी डिक्टेटरशिपकी ओर ही बढ़ रहा है । विरोधियोंके दमन करनेकी नीतिमे यहाँ भी तेजी आ रही है । भारतमे उस मार्क्सवादका विस्तार होने जा रहा है जिसमे आत्मा- परमात्माका खण्डन किया जाता है । शून्यवादी तो जड़-चेतन सभीका खण्डन करके शून्यताका ही प्रतिपादन करते थे । आस्तिकोने उनका खण्डन कर आत्मा और परमात्माका अस्तित्व प्रतिपादित किया । आज भी दृढ अध्यवसायके साथ विचार करनेसे मार्क्सवादकी निस्सारता स्पष्ट हो जाती है । अर्थपरायण प्राणी अर्थको ही सबका मूल समझता है । जहाँ धार्मिक, आस्तिक लोग धर्मको ही सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा कहते हैं, वहाँ चार्वाकोंका अनुसरण करते हुए मार्क्सवादी अर्थको ही सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा कहते हैं । 'धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' के मुकाबिलेमे 'अर्थो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' कहते हैं । अर्थका माहात्म्य महाभारतादि ग्रन्थोंमें पर्याप्तरूपोमे वर्णित है । तथापि आस्तिकजन अर्थका भी मूल धर्मको ही मानते हैं । इसी अभिप्रायसे कहा गया है '—धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।' धर्मसे ही अर्थ एव कामकी भी प्राप्ति होती है । देखते ही हैं बड़े- बडे अर्थशास्त्री हजारो प्रकारके प्रयत्न करते हुए भी भाग्यहीन होनेसे दरिद्र ही बने रहते है । स्वयं मार्क्स ही इसका उदाहरण है । मार्क्स जितना अर्थ- शास्त्रका विचार कर सका उतना अर्थार्जन नही कर पाया । जैसे निपुण चिकित्सकके लिये रोगी रहना एक विडम्बना ही है, वैसे ही एक अर्थनिष्णातका अर्थविहीन दशामे पडे रहना भी विडम्बना ही है । अतः धर्ममूलक ही अर्थ काम भी होते है । श्रम और मुनाफा कहा जाता है कि 'पूँजीपतिके हाथमे पूँजी होनेके कारण पैदावारके साधन उसके हाथमें चले जाते हैं। पूँजीसे पूँजी ही पैदा होती है । यह पूँजी भी शोषणसे इकट्ठी होती है। बड़े परिमाणमे मुनाफेके लिये पैदावार आरम्भ होनेसे पहले मामूलीरूपसे व्यापार चलता है, उपयोगकी वस्तुओको सस्ते दामसे खरीदकर अधिक दाममे बेचकर मुनाफा कमाया जाता है, उन्ही व्यापारोसे पूँजी एकत्रित होती है । सस्ता खरीदकर मँहगा बेचनेका अर्थ होता है या तो सौदेका दाम उचित नहीं दिया गया या उचित मूल्यसे अधिक मूल्य लिया गया । इस तरह मुनाफेकी अधिक गुञ्जाइश नही रहती, परंतु परिश्रम करनेकी शक्ति ही ऐसी वस्तु है जिसके

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३४५

खरीदनेके बाद और बेचनेमे पहले वह बढ़ जाती है अथवा अधिक उपयोगी पदार्थ पैदा करती है । 'बाजारमे बिकनेवाली हर वस्तुका दाम होता है और वह उस वस्तुकी तैयारीमे खर्च किये गये परिश्रमके समयसे निश्चित होता है। इसी आधारपर बाजारमे बिकनेवाली मजदूरी या परिश्रम-शक्तिका भी दाम निश्चित होता है । मजदूरको उस श्रमशक्तिको प्राप्त करनेके लिये अन्न, वस्त्र, सौदा—खरीदना पडता है, जिसके बिना परिश्रम सम्भव नहीं होता । यद्यपि मजदूर अपने जीवनके लिये अधिक भी खर्च कर सकता है, परन्तु उसे अधिक खर्च करनेको मिलता ही नहीं । मालिक लोग कम-से-कम दाममें उसे खरीदनेका प्रयत्न करते हैं । इस तरह मालिक लोग मजदूरको कम देकर उससे ज्यादा-से-ज्यादा काम लेते हैं । मजदूरद्वारा खर्च किये गये सौदे और मजदूरद्वारा पैदा किये गये सौदेके दाममे जो अन्तर है, वही पूँजीपतिका मुनाफा बन जाता है ।' शक्ति एव उसके परिणाममे भेद है । मजदूरकी जीवनरक्षाके लिये कम- से कम जरूरी सौदेका दाम ही परिश्रम-शक्तिका दाम होता है। मालिक जितने दिनतक मजदूरकी परिश्रम-शक्तिको अपने काममे लाना चाहता है, उतने दिन- तक जीवित रखनेके लिये सौदेका मूल्य देनेके लिये विवश है । वह कहीं एक रुपया रोज, कहीं पाँच रुपया रोज मजदूरी पाता है। वही परिश्रमशक्तिका मूल्य है । वेतनमे दिया 'हुआ धन ही दत्त समझा जाता है। दबाव या बलात्कारसे बाध्य होकर देनेपर भी वह अदत्त ही समझा जाता है। उसे न्यायालयद्वारा लौटाया जा सकता है— भृतिस्तुष्ट्या पण्यमूलं स्त्रीशुल्कमुपकारिणे । श्रद्धाऽनुग्रहसम्प्रीत्या दत्तमष्टविधं स्मृतम् ॥ ( या० स्मृ० २ । १७६ की वीरमित्रोदय टीकामें उद्धृत बृहस्पतिका वचन ) दत्तधन आठ प्रकारका होता है, भृति अर्थात् वेतनके रूपमे मिला हुआ, तुष्टिमे मिला हुआ, सौदेके दामरूपसे मिला हुआ, स्त्रीशुल्करूपमे दिया हुआ, उपकारीको दिया हुआ, श्रद्धासे दिया हुआ, अनुग्रहसे दिया हुआ और प्रसन्नतासे दिया हुआ । इन्हे लौटाया नही जा सकता । कही-कही सात प्रकारके दान अप्रत्यावर्तनीय कहे गये हैं और सोलह प्रकारके दान प्रत्यावर्तनीय— दत्तं सप्तविधं प्रोक्तमदत्त षोडशात्मकम् । पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्ट्या स्नेहाद्धर्म्युपकारितम् । स्त्रीशुल्कानुग्रहार्थं च दत्त दानविदो विदुः ॥ अदत्त तु भयक्रोधशोकवेगरुजान्वितै । तथोत्कोचपरीहासव्यत्यासच्छलयोगतः ॥ बालमूढास्वतन्त्रार्तमत्तोन्मत्तापवर्जितम् । कर्ता ममायं कर्मेति प्रतिलाभेच्छया च यत् ॥ अपात्रे पात्रमित्युक्ते कार्ये चाधर्मसंहिते । यद्दत्तं स्यादविज्ञानाददत्तं तत् प्रकीर्तितम् ॥ ( नारदस्मृति ४ । ३, ७—१० )

खरीदी हुई वस्तुका दिया हुआ मूल्य दत्त है, अप्रत्यावर्तनीय है। काम करनेवाले नौकरको दिया हुआ वेतन, बंदी-मागधादिको प्रसन्नतासे दिया हुआ, पिता-पुत्रादिको स्नेहसे दिया हुआ तथा उपकार करनेवालेको जो प्रत्युपकाररूपसे दिया जाता है, विवाहके लिये जो कन्यापक्षवालोको दिया जाता है, जो किसी- पर कृपा करके दिया जाता है—ये सभी दान दत्त ही हैं, लौटाये नही जा सकते। भयसे, क्रोधसे, शोकावेशसे तथा असाध्यरोगादिसे पीड़ित दशामे, परिहासवश, व्यत्यास (उल्टा-पल्टा) से, छलयोगसे, बाल (नाबालिक) सोलह वर्षसे कम उमरवालेद्वारा, मूढ़ (लोकव्यवहारानभिज्ञ), अस्वतन्त्र (पुत्र दासादि), आर्त्त (रोगाभिभूत), मत्त (मादक द्रव्यसे, मतवाला), उन्मत्त (वातिक, उन्माद- ग्रस्त) द्वारा दिया हुआ, किसी कार्य करानेके प्रतिलाभकी इच्छासे, अपात्रको पात्र बतला देनेसे, अवेदविद्को वेदविद् कहनेसे, यज्ञके नामसे धन लेकर जुए आदिमे खर्च करनेवालेको जो दिया गया हो—ये सोलह प्रकारके दान दत्त भी अदत्त ही समझे जाने चाहिये। जो अदत्तको लेता है और जो अदेय वस्तुको देता है—ये दोनो ही दण्ड्य हैं। भूमिपर भूमिपतिका अधिकार भी शास्त्रोने माना है। किसीकी भूमिपर मकान बनाकर जो भाड़ा देकर रहता है, वह यदि वहाँसे हटे तो अपना 'तृण, काष्ठ, इष्टिका (ईंट) आदि ले जा सकता है। परंतु जो भाड़ा बिना दिये किसीकी भूमिमे घर बनाकर रहता है, वह हटनेके समय घास, लकड़ी या ईंटोको नही ले सकता। परभूमौ गृहं कृत्वा स्तोमं दत्त्वा वसेत्ततः। स तद् गृहीत्वा निर्गच्छेत्तृणकाष्ठानि चेष्टकाम्॥ स्तोमाद् विना वसित्वा तु परभूमावनिश्श्रितः। निर्गच्छंस्तृणकाष्ठादि न गृह्णीयात् कथंचन°॥ (कात्यायनस्मृ० सारोद्धार) मार्क्सके अनुसार 'परिश्रमका दाम मालिकका मुनाफा ही है। पूँजीपति इमारत बनाकर, मशीन लगाकर, कच्चा माल खरीद लेता है, फिर भी जबतक मजदूर- की परिश्रमशक्ति उसमे नही लगती तबतक काम आरम्भ नहीं होता। अतः वह मजदूरके शरीरको किरायेपर लेकर उससे सौदा बनवाता है। यदि पाँच दिनतक सौदा बनानेका काम हुआ और उतने समयमे इमारत और मशीनका किराया, कच्चे मालका दाम तथा अन्य कामोमे जो खर्च हुआ है, वह तीन हजार घंटेके बराबर था। पूँजीपतिने बीस मजदूरोको प्रतिदिन दस घंटे कामपर लगाया और- सौदा तैयार होनेपर सौदेका दाम बाजारमें चार हजार घंटे परिश्रमके दामक बराबर पडा, तो तीन हजार घंटेके परिश्रमका दाम पूँजीपतिने खर्च किया ही है। मकान, मशीन आदिके किराये आदिपर और एक हजार घंटेके परिश्रमके दामकी बचत होती है, यह बचत ही परिश्रमका दाम है। उसमेसे मालिक मजदूरको एक हजार घंटे जीनेके लायक ही नौकरी देता है। यह एक हजार

मार्क्सकीय अर्थ-व्यवस्था ३२७ घंटेतक परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम होगा और उसे जो बाजारमें मिला वह एक हजार घंटे परिश्रमका दाम है। 'यदि पूँजीपति मजदूरको पाँच दिनतक दस घंटे परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम ढाई दिनके परिश्रमके बराबर देता है तो उसे प्रति मजदूर ढाई दिनका परिश्रम मुनाफेमें बच जाता है। उसका कुल मुनाफा चार दिनके परिश्रमका परिणाम हो जाता है। अर्थात पूँजीपतिने अपने बीस मजदूरोंको उतना रूपया दिया जिससे वे पाँच दिन जीवित रहें और मजदूरोंने मालिकको उतना रूपया दिया जितना कि बीस आदमियोंकी पाँच दिनकी मेहनतसे पैदा होता है। "जैसे घोड़ेके दिनभर परिश्रम करनेके योग्य बनाये रखनेके लिये घास-दाना- में जो खर्च होता है, वह उसकी परिश्रमशक्तिका दाम है। घोड़ेकी दिनभरके परिश्रमसे जो कमायी होती है, वह उसके परिश्रमका दाम होता है। दोनोंमें जो अन्तर है, वही मुनाफा है। परिश्रमशक्तिको बनाये रखनेमें जो खर्च होगा, वह परिश्रम के दामसे कहीं कम होता है। इसी तरह मजदूरकी परिश्रमशक्तिका पूरा दाम मिलनेपर भी परिश्रमके दामसे वह बहुत कम होता है। परन्तु मजदूरोंकी संख्या बाजारमें अधिक होती है। आधा पेट खाकर परिश्रमशक्तिका दाम भी उचित (मुनासिब) से कम लेकर मजदूरी करते हैं। गांठकी पैदावारसे मजदूरको जितना ही कम मिलता है, उतना ही मालिकका मुनाफा बढ़ता है।" देशकालके भेदसे भावोंमें भेद हो जाता है। जिस देशमें जिस वस्तुकी अधिक आवश्यकता या माँग होती है, अन्यत्र कम दाममें खरीदी वस्तु वहाँ अधिक दाममें बिकती है। दिखाया जा चुका है कि किसी देशकालमें पानी भी कीमती हो जाता है, इसीलिये कालान्तग्में खरीदी वस्तु कालान्तरमें और देशान्तरमें खरीदी वस्तु देशान्तरमें बेचनेकी लाभके ही लिये पद्धति चलती है। बुद्धिकी विशेषतासे भी लाभमें विशेषता होती है। कथासरित्सागरकी कथा है कि एक व्यक्तिने एक मृतमूषिकाको, जो सामान्य दृष्टिसे व्यर्थ ही कही जाती है, लेकर व्यापार करनेका निश्चय किया। किसीने एक आना पैसा देकर उसे अपनी बीमार बिल्लीके लिये खरीद लिया। वह उसी पैसेसे भुना चना खरीदकर शीतल जल लेकर मार्गके किसी वृक्षकी ठंढी छायामें बैठ गया। लकड़ीका बोझ लेकर आते हुए भूख-प्यासे लकड़हारोंने वहीं रुककर और चना खाकर जलपान किया तथा बदलेमें वे उसे थोड़ी-थोड़ी लकड़ियाँ देते गये। उन लकड़ियोंके बेचनेसे उसे पाँच रुपये प्राप्त हो गये। उसमें उसने कुछ तो अपने भोजनमें व्यय किया और शेषका पुनः चना खरीद लिया। इसी प्रकार उनसे उसे पुनः लकड़ियाँ मिलीं और शनैः-शनैः वह महाधनवान् हो गया। फिर जिसके पास पूँजी हो उसमे तो वह बहुत कमा सकता है।

४. चतुर्थ खण्ड: वैदिक वर्णाश्रम-धर्म, सर्वकल्याण, सनातन रामराज्य दर्शन एवं उपसंहार

३४८ मार्क्सवाद और रामराज्य जब कोई व्यापार न कर अपना धन बैंकमें जमा करता है तो वहाँ भी सूदके रूपमें कुछ-न-कुछ आमदनी होती है। फिर श्रमपूर्वक व्यापार तो कुछ अधिक लाभके लिये किया ही जाता है। देश-विशेष तथा काल-विशेषमें माँग बढ़ जानेसे दाम बढ़ जाता है। इसमें श्रमका सन्निवेश नहीं होता। पूर्वोक्त कथामें मृतमृत्तिकाके व्यापारमें श्रमकी कोई बात नहीं आयी, पर अवसर-विशेष- पर ऐसी वस्तुओंका भी दाम मिल जाता है। इसी तरह खेतीसे तथा अन्य उपयोगी वस्तुओंको बनाकर बेचनेसे भी लाभ होता है। यहाँ सौदेका दाम कम देने अथवा उचितसे ज्यादा दाममें बेचनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। क्योंकि देश तथा कालकी महिमासे दाममें चढ़ाव-उतार होता ही रहता है। इसी तरह 'प्रत्येक वस्तुका दाम वस्तुकी तैयारीमें खर्च किये गये परिश्रमके समयसे निश्चित होता है', यह कथन भी असंगत है। क्योंकि आम्रादि फलोंका दाम उनकी मधुरता, हृद्यता आदि गुणोंपर तथा दुर्लभता, सुलभता आदि एवं माँगके आधारपर ही निश्चित होता है। परिश्रम समान होनेपर भी घटिया आमोंका उतना दाम नहीं होता। अतः उपकारकता तथा दुर्लभताके तारतम्यका ज्ञान ही वस्तुके मूल्यमें कारण होता है। हीरा-जैसी वस्तुमें भी उपकारकत्व दुर्लभत्वका ज्ञान न होनेसे अल्पमूल्यता या हेयताका व्यवहार हो सकता है। वकरी एवं गर्दभ, उष्ट्रके पालनमें श्रम एक-सा होनेपर भी वस्तुओंकी विशेषतासे ही दाममें विशेषता कहनी पड़ती है। इसी तरह परिश्रमके समयके आधारपर भी दामका निर्णय असंगत है। एक मजदूर अधिक समयतक कठोर-से-कठोर काम करता है, तब भी उसे थोड़ा ही पैसा मिलता है। परंतु एक इंजीनियर, डाक्टर, वकील मिनटोंमें हजारों रुपया प्राप्त कर लेता है। अतः यहाँ भी परिश्रमकी विशेषता तथा दुर्लभताके आधारपर ही दाममें विशेषता मान्य होनी चाहिये। वस्तुतः सफल कर्म ही श्रम है। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहङ्कारकी हलचल ही कर्म है। तथा च फलोत्पादनानुकूल उपयोगी हलचल ही श्रम है। यह स्वयं ही अनेक प्रकारकी होती है, एक रूप नहीं है। एक विशिष्ट वकीलकी वाणीकी हलचल बहुत लाभदायक होती है, अतः उसका दाम बहुत ज्यादा होता है। एक साधारण वकील या वक्ताकी वाणीसे उतना लाभ नहीं होता, अतः उसका साधारण ही दाम मिलता है। इसी तरह इंजीनियर, डाक्टर आदिके सम्बन्धमें भी कहा जा सकता है। विशिष्ट बुद्धि, विशिष्टवाणी, विशिष्ट हस्तपादादि क्रियाओने होनेवाले फलोंके आधारपर उनके दामोंमें भी कमी-वेशी होती रहती है। दुर्लभता एवं माँगकी विशेषता ही सर्वत्र दामका कारण हुआ करती है। जैसे विशिष्टबुद्धियुक्त शारीरिक हलचल अधिक लाभदायक होती है उसी तरह

मशीन कच्चा माल तथा विशिष्टबुद्धियुक्त शारीरिक हलचल (श्रम) और लाभ- दायक होती है। जिसके पास उपर्युक्त साधनोंमें जितनी कमी है उतना ही उसे कम लाभ होता है। जैसे इस जन्म या जन्मान्तरके शुभकर्मसे जिसके पास उत्तम बुद्धि एवं कायिक, वाचिक उत्तम कर्म होते हैं, उसको केवल कायिक कर्मवालोंकी अपेक्षा अधिक फल मिलता है। इस तरह इस जन्म या जन्मान्तरके शुभकर्मसे भूमि, मशीन, कच्चा माल आदि जिसके पास हैं, उसे और भी बड़ा फल प्राप्त होता है। किसीके पास बुद्धि नहीं है, केवल स्थूल श्रम है, उसे थोड़ा ही फल मिलता है। किसी वकील, डाक्टर, इंजीनियर आदिमें बाह्य श्रम अत्यल्प है, केवल बुद्धिके ही बलपर उन्हें पर्याप्त धन मिलता है। किसीके पास मशीन, भूमि आदि बाह्य साधनोंकी प्रधानता है, वे उसके सहारे साधारण बुद्धि, वाणी एवं शरीरके कर्मसे ही बड़ा फल पा लेते हैं। इसमें भी अवसरका महत्त्व होता है। किसी अवसर- पर कोई वाणी, कोई औषध कोई क्रिया लाभदायक होती है। किसी अवसर- पर वही हानिकारक भी हो जाती है। शास्त्रीय कर्मोंमें भी अवसर तथा जानकारी- का विशेष महत्त्व है। डाक्टर, इंजीनियर, गणक, वकील आदिके भी जानकारी तथा कर्मोंकी विलक्षणताके समान ही वैदिक, तान्त्रिक, ज्योतिष्टोम, अश्वमेध, षडध्वशोधनादि कर्मोंमें भी ज्ञानक्रिया आदिकी विलक्षणता होती है। पाठ, जपमें श्रम समान होनेपर भी किसी मन्त्र-स्तोत्रके जप, पाठसे सामान्य फल होता है, किसी मन्त्र-स्तोत्रके जप, पाठसे विशिष्ट फल होता है। यहाँ श्रमकी विशेषता न होकर वस्तुकी विशेषतासे ही फलमें विशेषता मान्य होती है। परिश्रम, शक्ति एवं परिश्रमका भेद भी अवास्तविक तथा अनुपयुक्त है। वस्तुतः खरीदार फलके आधारपर ही दाम देता है। फलोत्पादक शक्तिका कुछ भी दाम नहीं होता। काम न करनेवाले या अन्यका काम करनेवाले श्रमिकके पास भी शक्ति है, परन्तु जिसके लिये उसका फल नहीं है उसके लिये वह व्यर्थ है। अतः उसका कुछ भी दाम नहीं देता। अतः परिश्रमशक्ति एवं परिश्रमके पृथक् फलकी कल्पना निराधार है। जितनेसे परिश्रमशक्ति बनी रहे, उतना दाम परिश्रमशक्तिका दाम है, यह नियम भी व्यभिचरित है। क्योंकि वकीलों, डॉक्टरों आदिके श्रमशक्ति बनाये रखनेसे कहीं बहुत अधिक दाम मिलता है, अतः उस दामको परिश्रमशक्तिका दाम नहीं कहा जा सकता। ऐसे स्थानोंमें परिश्रमका दाम दूसरा क्या हो सकता है? क्योंकि यहाँ तो कोई वस्तु बाजारमें जानेवाली नहीं है, जिससे लागत खर्च निकालकर सौदेके दामको परिश्रमका फल कहा जा सके। वकीलके परिश्रमका परिणाम न्याय-प्राप्ति कहा जा सकता है, उसके फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले भूमि, हिरण्य आदिमें भले वकीलके परिश्रमको भी हेतु कहा जाय, परन्तु वह वादी आदिकी निजी वस्तु ही है। उसे प्राप्त होनी ही चाहिये। तभी

उसके पक्षमे न्याय हुआ है । 'अतः वह सब वकीलके श्रमका फल है, उसे ही मिलना चाहिये', यह नहीं कहा जा सकता । बहुत-सी ऐसी भी मजदूरी होती है जिसके द्वारा बाजारमे जानेवाला कोई सौदा नहीं बनता । उदाहरणार्थ अपने ही कुटुम्बके काम चलानेके लिये लोहार, दर्जी, बढ़ई, मकान बनानेवाले कारीगरसे उपयोगके लिये काम कराये जाते हैं, वहाँ धोबी, नाई, भंगीके श्रमोंका क्या दाम होगा ? यहाँ कोई बाजारमें बिकनेका सौदा नहीं बनता । अतः वहाँ बाजार भावके आधारपर श्रमका दाम निश्चित करना पड़ेगा । अवश्य ही वह दाम कामके अनुरूप तथा राष्ट्रीय नागरिकोंके जीवनस्तरके अनुरूप होना चाहिये । इसके विपरीत जहाँ कथञ्चित् मजदूरोंका जीवन चलानेके लिये नितान्त आवश्यक जो कम-से-कम मजदूरी देते हैं, वे अन्याय करते हैं । उनपर नियन्त्रण आवश्यक है । फिर भी सौदा बनानेवाले मजदूरोंकी उचित मजदूरी या नौकरीसे अतिरिक्त लागत खर्च निकालकर सौदेके सब दाममे भी मजदूरोंका अधिकार है, यह नहीं सिद्ध हो सकता । कोई कारण नहीं कि उपयोगार्थ काम करनेवाले मजदूरोंके परिश्रमका दूसरा दाम हो और सौदा बनानेवाले मजदूरोंके परिश्रमका दूसरा । बाजारमे गेहूँ खानेके लिये खरीदे या दानके लिये खरीदे अथवा बेचनेके लिये खरीदे, पर दाममे कोई अन्तर नहीं आता ।

कच्चा माल, मशीन और पूँजी तथा पूँजीपतिकी बुद्धि, साहस, चेष्टा आदि सब मिलकर लाभमे हेतु हैं। यदि मजदूरोंके परिश्रमका भेद मानकर परिश्रमका दाम भी पृथक्-पृथक् माना जाय तो मशीनोंके सम्बन्धमे भी कहा जा सकता है कि जितनेसे मशीन कामलायक बनी रहे, वह उनकी कार्यक्षमताका दाम होगा । मजदूरकी नौकरी आदि लागत खर्च निकालकर अवशिष्ट सौदेका दाम मशीनकी क्रियाका परिणाम है । लाखो मजदूरोंका काम करनेवाली मशीनके सम्बन्धमें वे सभी न्याय लागू होने चाहिये, जो मजदूरके सम्बन्धमें लागू होते हैं। अतः लाखो मजदूरोंकी श्रमशक्ति एव श्रमका जो भी फल है, वह सब मशीनके मालिकको मिलना चाहिये । कच्चा माल तो सौदेका उपादान-कारण ही होता है । रूई ही सूत बनती है, सूत ही कपड़ा बनता है, अतः रूई तथा सूतके मालिकको जो दाम दिया गया है, उसे भी अपूर्ण ही कहा जा सकता है । रुपया निश्चल पड़ा रहे तो उसका कुछ भी फल नहीं होता । परंतु बैंकमें जाता है तो व्याजरूपसे उससे कुछ आमदनी होती है । व्यापार-उद्योगमें लगानेसे उससे और बड़ी आमदनी होती है । इसलिये व्यापारमे पूँजी लगायी जाती है । यदि लागत खर्चके अतिरिक्त सौदेका दाम मजदूरके परिश्रमका ही फल है और वह सब मजदूरको ही मिलना चाहिये, तब तो कच्चे माल खरीदने, मकान, मशीन बनाने, मजदूरोंको बटोरकर काम कराने, मजदूरी देनेमे पूँजी लगाकर उसे खतरेमे डालना व्यर्थ ही होगा । उसकी अपेक्षा तो

बिना खतरा उठाये ही बैंकमें रुपया रखकर लाभ उठाया जा सकता है । अतः जैसे श्रमिकको श्रम लगानेका फल मजदूरी मिलती है, वैसे ही पूँजीपतिके पूँजी लगानेका फल मुनाफा मिलना चाहिये । हाँ, वह सीमित होना चाहिये । समाज तथा मजदूरोंको नुकसान पहुँचानेवाला न होना चाहिये ।

पूँजी और श्रम

अतिरिक्त श्रमके दरके सम्बन्धमें मार्क्सवादी कहते हैं कि "पूँजी या पैदावारके साधनोंको हम इस प्रकार बाँट सकते हैं । एक वे साधन, जो एक हदतक स्थायी हैं, उदाहरणतः इमारतें और मशीने, दूसरा कच्चा माल, तीसरे मजदूरको मजदूरी देनेके लिये पूँजी । पूँजीका जो भाग पैदावारके स्थायी साधनोंपर खर्च होता है, वह एक निश्चित समयमें पन्द्रह या बीस वर्षमें वसूल हो सकता है । इन साधनो- के दामपर सूद और घिसाई पूँजीपति आमदनीमेसे लगातार निकालता जाता है । कच्चे मालपर जो पूँजी खर्च होती है, वह भी तैयार किये गये सौदेके बिकते ही वसूल हो जाती है । पैदावारके इन साधनोंपर जो रुपया लगता है, पूँजीपति उसे सौदेके मूल्यसे वसूल कर लेता है, परन्तु उसपर मुनाफा वसूल नहीं किया जा सकता, वह घटता-बढ़ता नहीं । परिश्रमकी शक्ति इन साधनोंपर लगाये बिना कुछ लाभ नहीं हो सकता । पैदावारमे लगाये गये पूँजीपतिके धनका तीसरा भाग परिश्रमके शक्तिके खरीदनेमे लगता है । पूँजीपतिका मुनाफा उसकी पूँजीके इस भागसे आता है। "परिश्रम करनेकी शक्ति-जिस दामपर खरीदी जाती है, परिश्रमके फलका दाम उससे अधिक होता है । सौदेके दाममेंसे परिश्रमकी शक्ति या दाम निकाल देनेपर 'अतिरिक्त दाम' बच जाता है । अतिरिक्त दाम बढानेका सीधा तरीका यह है कि परिश्रमकी शक्तिके दाम मजदूरीको घटाया जाय, उदाहरणतः यदि मजदूर द्वारा कराये गये दस घंटे परिश्रमका दाम एक रुपया है और उसमेंसे मजदूरको उसकी परिश्रमकी शक्तिका मूल्य आठ आने दे दिया जाता है तो अतिरिक्त मूल्य आठ आने प्रति मजदूर बच जाता है । परिश्रमके मूल्य एक रुपयेमेसे यदि मजदूरी घटा दी जाय तो अतिरिक्त मूल्यका मुनाफा बढ़ जायगा । दूसरा उपाय मशीनोंका प्रयोग बढाकर पैदावार बढाना है । जिसमें परिश्रमके शक्तिके कम खर्च होनेसे उसके लिये कम दाम देना पड़े और मालिकके पास अतिरिक्त दाम या मुनाफा अधिक बच जाय । अतिरिक्त श्रमको बढानेका तीसरा उपाय यह है कि परिश्रमकी शक्तिका मूल्य तो न बढे, परन्तु परिश्रम अधिक दामका अधिक समयतक कराया जाय ताकि अतिरिक्त मूल्यका भाग बढ जाय । इसके लिये मजदूरोंसे बजाय दस घंटेके बारह घंटे काम कराया जाय । दस घंटे काम करानेसे पाँच घंटेमें तो मजदूर अपने परिश्रमकी शक्तिका दाम पैदा करता है, जो उसे मालिकसे मिलता है और पाँच घंटेमे मालिकके लिये अतिरिक्त दाम । अब काम बारह

३५२ मार्क्सवाद और रामराज्य घंटे कराये जानेपर और परिश्रमकी शक्तिका दाम मजदूरी न बढानेपर अतिरिक्त श्रम बजाय पाँच घंटेके सात घंटे होने लगेगा। इसीलिये जब मशीनोंद्वारा थोडे समयमें अधिक काम हो सकता है, तब भी मालिक लोग कामके घंटे घटानेके लिये तैयार नहीं होते। “इस प्रकार हम देखते हैं कि मुनाफा कमानेकी पूँजीवादी प्रणालीमें मशीनों- का प्रयोग बढ़ने, पैदावार बढ़ने आदि सभी प्रकारकी उन्नतिसे मजदूरोंको नुकसान और पूँजीपतियोंको लाभ होता है, क्योंकि इन सब वस्तुओंका व्यवहार समाजकी आवश्यकताओंको पूरा न कर मुनाफा कमानेके उद्देश्यसे किया जाता है। पैदावार- के सब साधनोंके मौजूद होते हुए भी पैदावार उस समयतक नहीं हो सकती जब- कि मेहनतकी शक्तिको व्यवहारमें न लाया जाय। पूँजीवादी समाजमें मजदूरोंसे मेहनतकी शक्ति आती है। मजदूरोंकी मेहनतकी शक्तिको मजदूरी या वेतन- द्वारा खरीदकर पैदावारके साधनोंको चलाया जाता है! मजदूरी पूँजीवादी समाजका विशेष महत्त्वपूर्ण अङ्ग है, क्योंकि मजदूरीद्वारा ही पूँजीपति मजदूर- की मेहनतसे मुनाफा उठाता है। “अपने लाभके विचारसे पूँजीपति मजदूरोंकी मजदूरी अर्थात् परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम सदा ही घटानेकी कोशिश करते रहते हैं। परिश्रमकी शक्तिके मूल्य और परिश्रमके मूल्यपर विचार करते समय यह कहा गया है कि पूँजीपतिके व्यवसाय- में परिश्रम करनेवाले मजदूरके परिश्रमके दो भाग होते हैं। मजदूरके परिश्रमका एक वह भाग होता है, जो उसकी परिश्रमकी शक्तिके मूल्यमें उसे दे दिया जाता है और उसके परिश्रमका दूसरा भाग वह होता है, जिसका उसे कोई फल नहीं मिलता, अर्थात् अतिरिक्त श्रम। मजदूर इस रहस्यको नहीं जानता। उसे यही समझाया जाता है कि ‘जितने दामका परिश्रम उसने किया है, उतना दाम उसे मिल गया है’ मजदूरको कहा जाता है कि ‘तुम्हारे परिश्रमका जो दाम एक पूँजीपति तुम्हें देता है, उसे यदि तुम कम समझते हो तो दूसरी जगह मजदूरी तलाश कर सकते हो।’ मजदूरीका दर समाज भरमें एक ही रहता है, क्योंकि सभी पूँजीपति अतिरिक्त श्रम- से लाभ उठाना चाहते हैं। “यदि मजदूरकी मजदूरी उसी पदार्थके रूपमें दी जाय जिसे वह अपन परिश्रमसे तैयार करता है, तो उसे इस बातका अनुमान हो सकता है कि उसके परिश्रमके फलका कितना भाग उसे मिलता है, और कितना भाग मालिककी जेबमें चला जाता है। परंतु मजदूरी या वेतनका पर्दा मजदूरसे उसके शोषणकी वास्तविकताको छिपाये रहता है। पूँजीवादी समाजमें मेहनत करनेवाली साधनहीन श्रेणी पैदावार तो बहुत अधिक करती है, परंतु खर्च करनेके लिये बहुत कम पाती है। पैदावारकी शक्ति और साधन तो खूब बढ़ते जाते हैं, किंतु जनताकी

मार्क्स्रीय अर्थ-व्यवस्था ३५३

पैदावार, खर्च करनेकी शक्ति घटती जाती है । इन सबका कारण है, अतिरिक्त मूल्यके रहस्यमय मार्गद्वारा जनताके परिश्रमका मुनाफेके रूपमें पूँजीपति श्रेणीके खजानोमे जमा होते जाना । इस व्यवस्थासे मेहनत करनेवाली साधनहीन श्रेणी तो संकट भोगती ही है, परंतु पूँजीपति श्रेणीको भी कम उलझनका सामना नहीं करना पडता । समाजमें हो सकनेवाली पैदावारको जनता खपा नहीं सकती । पूँजीपतियोंके पैदावारके विशाल साधन निष्प्रयोजन खडे रहते हैं । उन साधनोमें लगी उनकी पूँजी उन्हे कोई लाभ नही पहुँचा सकती और वे भयंकर आर्थिक संकट अनुभव करने लगते हैं । 'यद्यपि पूँजीवादी व्यवस्थामे मेहनत करनेवाली श्रेणीका शोषण उन्हे दी जाने- वाली मजदूरीके पर्देमे छिपा रहता है, जिसके द्वारा उन्हे सदा यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनकी मेहनतका पूरा फल मेहनत करनेवालोको मिल जाता है, परंतु मजदूरोको उनकी मेहनतसे मिलनेवाले फलमे नित्य कमी आते जानेसे उनका जीवन दिन प्रतिदिन संकटमय होता जाता है, इसलिये मजदूरश्रेणी अपनी मजदूरीको बढानेकी पुकार उठाये बिना नही रह सकती ।' मार्क्सने उसी बातको बार-बार दोहराया है । कहा जा चुका है कि मजदूरीकी दर उचित होना चाहिये, परंतु मार्क्सवादी तो किसी न्यायालय या पंचायतकी बात माननेको प्रस्तुत ही नही होते । समझौता उन्हे अभीष्ट नही होता । उनका उद्देश्य तो सम्पूर्ण पूँजीको हथियाना है। जो पहले बेकारीके कारण परेशान होकर नौकरी ढूँढता था उसे काम मिला । नौकरी मिलनेसे जब बैठनेको जगह मिल गयी तो अब वह मालिकको समाप्त करके स्वय मालिक बनना चाहता है। ऐसी दृष्टिवाला व्यक्ति या समाज समझौता भला कब चाहेगा ? शोषण, उत्पीडनका अतिरंजित बीभत्स वर्णन केवल उत्तेजना और विद्वेष फैलानेकी दृष्टिसे मार्क्सवादी करते हैं । उनके वर्णनमें तथ्यांश नगण्य ही होता है । मार्क्सका अतिरिक्त श्रम, अतिरिक्त मूल्य सर्वथा निराधार है । मजदूरीका मार्ग बिल्कुल स्पष्ट है । इसमे कोई भी रहस्य नही । जैसे आपसी समझौते या पंचायत अथवा निष्पक्ष सरकारद्वारा कच्चे मालकी दर निर्धारित होती है वैसे ही श्रमकी भी दर निर्धारित होती है और हो सकती है। यह प्रत्यक्ष ही ससारकी आँखमे धूलि-प्रक्षेप है कि 'व्यापार या उद्योगमे होनेवाले लाभका मूल कारण उस श्रमिकका श्रम ही है, जो वेतनसे काम करता है। पूँजीका लाभमें कोई हाथ नहीं है।' जब सूदपर रुपया लेने या बैंकमे जमा कर देनेसे भी रुपयोका सूद मिलता है, तो फिर यदि अधिक लाभका लोभ न हो तो कौन बुद्धिमान् उद्योगोमे रुपया लगायेगा और क्यो रुपयेको व्यर्थ खतरेमें डालेगा ? क्योकि उद्योग या व्यापारमें हानिकी भी तो सम्भावना रहती है और झझटमें ऊपरसे पडना । लाभमें रुपयेका कोई हाथ भी

मा० रा० २३-

नहीं समझा जाता । यदि लाभ सब मजदूरका ही है पूँजीपतिका कुछ नही तब क्या पूँजीपति पागल है, जो निरर्थक अपना रुपया खतरेमे डालेगा ? और झंझट मोल लेगा ? हर्गिज नही, फिर तो अच्छा होता कि वह अपनी पूँजी बैठकर खाये और दूरसे तमाशा देखे कि साधनोके बिना मजदूर श्रममात्रसे क्या कमाता है ? पैदावारके साधनोको बढाना, औद्योगिक नगरोमे श्रमिकोको इकट्ठा करके उचित नौकरी देकर योग्य कामपर लगाकर उन्हे शिक्षित तथा अनुभवी बनाना अपराध नहीं है । वस्तुतः रामराज्यवादीके मतानुसार महायन्त्रका निर्माण अपराध है और उसपर प्रतिबन्ध लगाना चाहिये । मार्क्सवादमे तो पूँजीवाद, साम्यवादका उपकारक है, क्योकि मार्क्सवादका यन्त्रवाद ही प्राण है । मनुष्योको भूखा-नगा बनानेवाला पूँजीवाद अवश्य अपराधी है, उसका मिटना आवश्यक है। परतु विचारणीय बात यह है कि कही भूखा नगा बना देनेका लाञ्छन लगाकर उसके विनाशका बहानामात्र तो नही ढूँढा जा रहा है ? जैसे हिटलर, मुसोलिनी दूसरोको सभ्य बनानेके लिये उनपर हमला करनेके लिये अपनेको बाध्य समझते थे । एक भेड़िया नीचेकी ओर पानी पीनेवाली बकरीको अपराधिनी घोषित कर उसे खानेको अपनेको बाध्य मानता है। उसी तरह देशका सर्वस्व हरण करके अपना अधिनायकत्व स्थापित करनेके लिये पानी पी-पीकर मार्क्सवादी पूँजीवादको कोसते हैं। अतः न तो सब व्यवस्थाओसे दूसरी व्यवस्थाओका जन्म ही होता है न आवश्यक ही है । यह स्पष्ट है कि पूँजी, मशीन, कल, कारखाने, कच्चा माल और श्रमिको- का श्रम सब मिलकर उत्पादनके हेतु होते हैं । जैसे श्रमिक बिना सब चीजे व्यर्थ होती हैं, वैसे ही कच्चे माल आदि बिना श्रमिकोका श्रम भी व्यर्थ रहता हैं, तभी बेकारीका प्रश्न उठता है, बल्कि गन्ने आदि कई ढंगसे कच्चे माल, कारखानोमे बिना गये भी उपयोगी होनेसे कीमती होते हैं । पर श्रम इन वस्तुओके बिना सर्वथा व्यर्थ रहता है । पूँजीपति जैसे दामसे मशीन खरीदता है, मकान बनाता है, दामसे कच्चा माल खरीदता है, वैसे ही दामसे श्रमिकोका श्रम भी खरीदता है। जैसे श्रमिकोके श्रमके दाममे घटाव-बढाव होता रहता है, वैसे ही कच्चे माल और मशीनोके दाममें भी घटाव-बढाव होता रहता है । काम, कामके घंटे तथा वेतन पारस्परिक समझौतेसे ही तय होता है । यदि आपसी समझौतासे तय न हुआ हो तब धर्मशास्त्रद्वारा निर्धारित वेतन श्रमिकोको प्राप्त हो सकता है । राष्ट्र हितके लिये बेरोजगारी दूर करनेके लिये, कामके घंटे और वेतन- की दरका निर्धारण सरकार भी कर सकती है । सर्वथापि आयका जरिया केवल श्रम नहीं, किंतु श्रम मशीन, कच्चा माल सब मिलकर ही आयके हेतु हैं । कच्चा माल, मशीन, श्रम सबका दाम पूँजीपतिने चुकाया है, अतः न्यायतः आयका हिस्सेदार

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३५५ पूँजीपति ही है, अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना सर्वथा निराधार है। धर्मशास्त्रोने स्पष्ट ही आयमें पूँजी लगानेवालोका हिस्सा बतलाया है। वेतनके सम्बन्धमें आपसी समझौते तथा न्यायालयके मतका उल्लेख वृहस्पति-स्मृतिमें इस प्रकार है— कुलीनदक्षानलसैः प्राज्ञैर्नाणकवेदिभिः । आयव्ययज्ञैः शुचिभिः शूरैः कुर्यात्सह क्रियाः ॥ समोऽतिरिक्तो हीनो वा यत्रांशो यस्य यादृशः । क्षयव्ययौ तथा वृद्धिस्तस्य तत्र तथाविधा ॥ प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना । समन्यूनाधिकैरंशैर्लाभस्तेषां तथाविधः ॥ (बृहस्प० स्मृति० गायक० १३ । १-२, ४) अर्थात् कुलीन, दक्ष, निरालस्य, विद्वान्, व्यापारविशेषज्ञ, आय-व्ययके ज्ञाता साहसी लोग मिलकर व्यापार करे। मूलधनमें जिनका जितना कम या अधिक अंश होता है, उसके अनुसार हीं उनका हानि-लाभमें भी भाग रहता है। सुवर्ण, अन्न, रसादिका व्यापार करनेवालोका मूलधनके भागके अनुसार ही लाभमें भी भाग होता है। यहाँ स्पष्ट ही व्यापारमें धन लगानेवालोका ही लाभमें हिस्सा कहा गया है। लाभको श्रममात्रका फल नही माना गया। समो न्यूनाधिको वांशो येन क्षिप्तस्तथैव सः । व्ययं दद्यात्कर्म कुर्याल्लाभं गृहीत चैव हि ॥ क्षयहानिर्यदा तत्र दैवराजकृताद् भवेत् । सर्वेषामेव सा प्रोक्ता कल्पनीया तथांशतः ॥ (बृहस्प० स्मृति० गायकवाड संस्कृ० १३ । ५, ८) बराबर या कम-अधिक मूल धनमें जिसका जैसा भाग होता है तदनुसार ही उसका वेतन आदि सम्बन्धसे व्यापारिक व्ययमें खर्च होगा, तदनुसार ही लाभमें हिस्सा मिलेगा। उसी तरह यदि राजकृत या दैवकृत हानि हो तो भी मूलधनके भागानुसार ही हानि भी सबको ही सहनी पड़ेगी। अनिर्दिष्टो वार्यमाणः प्रमादाद्यस्तु नाशयेत् । तेनैव तद्भवेद्देयं सर्वेषां समवायिनाम् ॥ राज्ञे दत्त्वा तु षड्भागं लभेरंस्ते यथांशत ॥ दैवराजभयाद्यस्तु स्वशक्त्या परिपालयेत् । तस्यांशं दशमं दत्त्वा गृह्णीयुत्तँऽशतः परम् ॥ (बृह० स्मृ० १३ । ९-११)

३५६ मार्क्सवाद और रामराज्य समुदायकी सम्मति बिना एवं मना करनेपर भी अगर किसीने प्रमादवश धन नष्ट किया है, तो उसे सबको धन देना पड़ेगा । राजाका षष्ठांश देकर शेष आय मूल-धनके भागानुसार सबको मिलना चाहिये । जिसने विशेषरूपसे दैवभय या राजभयसे धनको नाश होनेसे बचाया है उसे दशांश देकर शेषका अंशानुसार समुदायके लोग ग्रहण करे— बहूनां सम्मतो यस्तु दद्यादेको धनं नरः। करणं कारयेद्वापि सर्वैरेव कृतं भवेत् ॥ समवेतैस्तु यद्दत्तं प्रार्थनीयं तथैव तत्। न याचते च यः कश्चिल्लाभात्स परिहीयते ॥ श्रूयतां कर्षकादीनां विधानमिदमुच्यते । वाह्यवाहकबीजाद्यैः क्षेत्रोपकरणेन च। ये समाः स्युस्तु तैः सार्धं कृषिः कार्या विजानता ॥ ( वही २२; २५—२७) बहुतोंकी सम्मति किसी उद्योगके लिये, एक व्यक्ति जो धन देकर उद्योग प्रारम्भ करता है, वह सभीद्वारा दिया गया समझा जाना चाहिये । जिन संयुक्त लोगोंने जो धन दिया है सभीको मिलकर ही उसे माँगना चाहिये । जो उनसे नही माँगता उसे लाभमें वचित रहना पड़ेगा । संयुक्तरूपसे कृषिकर्म करनेवालोमें भी जिनका हल, बैल, मजदूर, बीज, खाद, खेत आदिका सामान या कम, अधिक जिनके जैसे हैं, तदनुसार ही उनको लाभमे हिस्सा मिलना चाहिये । वाह्यबीजात्ययाद्यच्च क्षेत्रहानिः प्रजायते । तेनैव सा प्रदातव्या सर्वेषां कृषिजीविनाम् ॥ हेमकारादयो यत्र शिल्पं सम्भूय कुर्वते । कर्मानुरूपं निर्वेशं लभेरंस्ते यथांशतः ॥ शिक्षकाभिज्ञकुशला आचार्याश्चेति शिल्पिनः । एकद्वित्रिचतुर्भागान् लभेयुस्ते यथोत्तरम् ॥ हर्म्यं देवगृहं वापि धार्मिंकोपस्कराणि च। सम्भूय कुर्वतां चैषां प्रमुखो द्व्यंशमर्हति ॥ नर्तकानामेष एव धर्मः सद्भीरुदाहृतः । तालज्ञो लभते ह्यर्धं गायनास्तु समांशिनः ॥ ( वही २८, ३४-३७) जिसके हल-बैल या बीजकी कमीसे जो खेतकी हानि हो उसीको वह हानि सहनी पड़ेगी । हेमकार आदि शिल्पी जहाँ मिलकर काम करते हों, वहाँ कर्मानुरूप प्रत्येकको वेतन मिलना चाहिये । शिक्षक, अभिज्ञ, कुशल आचार्यको एक, दो, तीन तथा चार भाग क्रमेण मिलना चाहिये । प्रासाद, देव, गृह धार्मिक उपस्करण