मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* अध्याय १५४ * ६१३
| श्रुत्वैतत् संभ्रमाविष्टो ध्वस्तधैर्यो महाचलः।<br>नारदं प्रत्युवाचाथ साश्रुकण्ठो महागिरिः॥ १४७ | यह सुनकर पर्वतराज हिमाचल व्याकुल हो गये। उनका सारा धैर्य जाता रहा। तब वे अश्रुगद्गद कण्ठसे नारदजीसे बोले॥ १४२—१४७॥ | | हिमवानुवाच<br>संसारस्यातिदोषस्य दुर्विज्ञेया गतिर्यतः।<br>सृष्ट्यां चावश्यभाविन्यां केनाप्यतिशयात्मना॥ १४८<br>कर्त्रा प्रणीता मर्यादा स्थिता संसारिणामियम्।<br>यो जायते हि यद्बीजाज्जनेतुः स ह्यसार्थकः॥ १४९<br>जनिता चापि जातस्य न कश्चिदिति यत्स्फुटम्।<br>स्वकर्मणैव जायन्ते विविधा भूतजातयः॥ १५०<br>अण्डजो ह्यण्डजाज्जातः पुनर्जायेत मानवः।<br>मानुषाच्च सरीसृप्यां मनुष्यत्वेन जायते॥ १५१<br>तत्रापि जातौ श्रेष्ठायां धर्मस्योत्कर्षणेन तु।<br>अपुत्रजन्मिनः शेषाः प्राणिनः समवस्थिताः॥ १५२<br>मनुजास्तत्र जायन्ते यतो न गृहधर्मिणः।<br>क्रमेणाऽऽश्रमसम्प्राप्तिर्ब्रह्मचारिव्रतादनु ॥ १५३<br>तस्य कर्तुर्नियोगेन संसारो येन वर्धितः।<br>संसारस्य कुतो वृद्धिः सर्वे स्युर्यदतिग्रहाः॥ १५४<br>अतः कर्त्रा तु शास्त्रेषु सुतलाभः प्रशंसितः।<br>प्राणिनां मोहनाथार्य नरकत्राणसंश्रयात्॥ १५५<br>स्त्रिया विरहिता सृष्टिर्जन्तूनां नोपपद्यते।<br>स्त्रीजातिस्तु प्रकृत्यैव कृपणा दैन्यभाषिणी।<br>शास्त्रालोचनसामर्थ्यमुज्झितं तासु वेधसा॥ १५६ | हिमवान्ने कहा—देवर्षे! इस अत्यन्त दोषपूर्ण संसारकी गति दुर्विज्ञेय है। इस अवश्यम्भाविनी सृष्टिमें किसी कर्ता महापुरुषद्वारा जो मर्यादा स्थापित की गयी है, वह संसारी जीवोंके लिये स्थिर है। जो जिसके बीजसे उत्पन्न होता है, वह उस पैदा करनेवालेके लिये निरर्थक होता है, उसी प्रकार पैदा करनेवाला भी पैदा हुएका कोई नहीं है—यह तो स्पष्ट है; क्योंकि प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही उत्पन्न होती हैं। एक ही जीव अण्डजके सम्पर्कसे अण्डजयोनिमें पैदा होता है और वही पुनः मनुष्यके संयोगसे मानव-योनिमें उत्पन्न होता है। फिर मानव-योनिसे भी उलटकर सर्प आदि रेंगनेवाली योनियोंमें जन्म लेता है। वहाँ भी धर्मकी उत्कृष्टतासे उत्तम जातिमें जन्म होता है। शेष जो अधार्मिक प्राणी होते हैं, वे पुत्रहीन होते हैं। उनमें गृहस्थधर्मका सुचारुरूपसे पालन न करनेवाले मानवोंको पुत्रकी प्राप्ति नहीं होती। इन आश्रमोंकी प्राप्ति उसी कर्ताकी व्यवस्थासे, जिसने संसारकी वृद्धि की है, क्रमशः ब्रह्मचर्य व्रतके बाद होती है। यदि सभी प्राणी आश्रमधर्मका त्याग कर दें तो संसारकी वृद्धि कैसे हो सकती है। इसीलिये सृष्टिकर्ताने शास्त्रोंमें नरकसे त्राण करनेका लोभ दिखाकर प्राणियोंको मोहित करनेके लिये पुत्रप्राप्तिकी प्रशंसा की है; परंतु प्राणियोंकी सृष्टि स्त्रीके बिना हो नहीं सकती और वह स्त्री-जाति स्वभावसे ही दयनीय और दीनतापूर्वक बोलनेवाली होती है। इसीलिये ब्रह्माने उन स्त्रियोंको शास्त्रालोचनकी शक्ति नहीं दी है॥ १४८—१५६॥ | | शास्त्रेषूक्तमसंदिग्धं बहुवारं महाफलम्।<br>दशपुत्रसमा कन्या या न स्याच्छीलवर्जिता॥ १५७<br>वाक्यमेतत् फलभ्रष्टं पुंसि ग्लानिकरं परम्।<br>कन्या हि कृपणा शोच्या पितुर्दुःखविवर्धिनी॥ १५८<br>यापि स्यात् पूर्णसर्वाढ्या पतिपुत्रधनादिभिः।<br>किं पुनर्दुर्भागा हीना पतिपुत्रधनादिभिः॥ १५९<br>त्वं चोक्तवान् सुताया मे शरीरे दोषसंग्रहम्।<br>अहो मुह्यामि शुष्यामि ग्लामि सीदामि नारद ॥ १६० | इसी प्रकार शास्त्रोंमें अनेकों बार निश्चितरूपसे इस महान् फलका वर्णन किया गया है कि जो कन्या शील-सदाचारसे रहित न हो, वह दस पुत्रोंके समान मानी गयी है; किंतु यह वाक्य निष्फल है और पुरुषके लिये अत्यन्त ग्लानि उत्पन्न करनेवाला है; क्योंकि जो कन्या पति, पुत्र, धन आदि सभी सुख-साधनोंसे पूर्ण सम्पन्न होनेपर भी जब कृपण, शोचनीय और पिताके दुःखको बढ़ानेवाली होती है, तब जो पति, पुत्र, धन आदिसे हीन अभागिनी हो तो उसके विषयमें क्या कहना है। नारदजी! आपने मेरी कन्याके शरीरमें तो दोष-समूहका ही वर्णन किया है, इसी कारण मैं मोहमें पड़ा हूँ, मेरा शरीर सूखा जा रहा |
| ६१४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अयुक्तमथ वक्तव्यमप्राप्यमपि साम्प्रतम्।<br>अनुग्रहेण मे छिन्धि दुःखं कन्याश्रयं मुने॥ १६१॥<br><br>परिच्छिन्नेऽप्यसंदिग्धे मनः परिभवाश्रयम्।<br>तृष्णामुष्णातिनिष्णाता फललोभाश्रयाशुभा॥ १६२॥<br><br>स्त्रीणां हि परमं जन्म कुलानामुभयात्मनाम्।<br>इहामुत्र सुखायोक्तं सत्पतिप्राप्तिसंज्ञितम्॥ १६३॥<br><br>दुर्लभः सत्पतिः स्त्रीणां विगुणोऽपि पतिः किल।<br>न प्राप्यते विना पुण्यैः पतिर्नार्या कदाचन॥ १६४॥<br><br>यतो निःसाधनो धर्मः परिमाणोज्झिता रतिः।<br>धनं जीवितपर्याप्तं पत्यौ नार्याः प्रतिष्ठितम्॥ १६५॥ | है, मनमें ग्लानि हो रही है और कष्ट पा रहा हूँ। मुने! इस समय मुझपर अनुग्रह करके (कन्याके कष्ट-निवारक उपाय) यदि अयुक्त अथवा दुष्प्राप्य भी हो तो बतलाइये और मेरे कन्याविषयक दुःखको दूर कीजिये; क्योंकि निःसंदेहरूपसे कार्य-सिद्धिकी सम्भावना होनेपर भी फलके लोभमें आसक्त एवं कार्य-साधनमें निपुण अशुभ तृष्णा मेरे परिभवयुक्त मनको ठग रही है। स्त्रियोंके लिये उत्तम पतिकी प्राप्ति ही उनके सौभाग्यशाली जन्मकी सूचक है तथा वह पितृकुल एवं प्रतिकुल—दोनों कुलोंके लिये इहलोक और परलोकमें सुखका साधन बतलायी गयी है। इस प्रकार स्त्रियोंके लिये उत्तम पतिका मिलना तो दुर्लभ है ही, परंतु गुणहीन पति भी नारीको पुण्यके बिना कभी नहीं प्राप्त होता; क्योंकि नारीको साधनरहित धर्म, प्रचुर मात्रामें कामवासनाकी प्राप्ति और जीवन-निर्वाहके लिये धन पतिके द्वारा ही प्राप्त होते हैं॥ १५७—१६५॥ |
| निर्धनो दुर्भगो मूर्खः सर्वलक्षणवर्जितः।<br>दैवतं परमं नार्याः पतिरुक्तः सदैव हि॥ १६६॥<br><br>त्वया चोक्तं हि देवर्षे न जातोऽस्याः पतिः किल।<br>एतद्दौर्भाग्यमतुलमसंख्यं गुरु दुःसहम्॥ १६७॥<br><br>चराचरे भूतसर्गे यद्यद्यापि च नो मुने।<br>न संजात इति ब्रूषे तेन मे व्याकुलं मनः॥ १६८॥ | पति निर्धन, अभागा, मूर्ख और सभी शुभ लक्षणोंसे रहित क्यों न हो, किंतु वह नारीके लिये सदैव परम देवता कहा गया है। देवर्षे! आपने कहा है कि मेरी पुत्रीका पति पैदा ही नहीं हुआ है, यह तो इसका अतुलनीय एवं बहुत बड़ा दुःसह दुर्भाग्य है। मुने! आप जो ऐसा कह रहे हैं कि चराचर प्राणियोंकी सृष्टिमें वह अभीतक उत्पन्न ही नहीं हुआ है, इससे मेरा मन व्याकुल हो गया है। |
| मनुष्यदेवजातीनां शुभाशुभनिवेदकम्।<br>लक्षणं हस्तपादादौ विहितैर्लक्षणैः किल॥ १६९॥<br><br>सेयमुत्तानहस्तेति त्वयोक्ता मुनिपुङ्गव।<br>उत्तानहस्तता प्रोक्ता याचतामेव नित्यदा॥ १७०॥<br><br>शुभोदयानां धन्यानां न कदाचित्प्रयच्छताम्।<br>स्वच्छाययास्याश्चरणौ त्वयोक्तो व्यभिचारिणौ॥ १७१॥<br><br>तत्रापि श्रेयसी ह्याशा मुने न प्रतिभाति नः।<br>शरीरलक्षणाश्चान्ये पृथक् फलनिवेदिनः॥ १७२॥<br><br>सौभाग्यधनपुत्रायुःपतिलाभानुशंसनम् ।<br>तैश्च सर्वैर्विहीनेयं त्वमात्थ मुनिपुङ्गव॥ १७३॥ | मनुष्यों एवं देवजातियोंके शुभाशुभसूचक लक्षण हाथों एवं पैरोंमें चिह्नित लक्षणोंद्वारा जाने जाते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इस विषयमें भी आपने इसे उत्तानहस्ता बतलाया है। यह उत्तानहस्ता सदा याचकोंकी ही कही गयी है, किंतु जो सौभाग्यशाली, धन्यवादके पात्र और दानी होते हैं, उनके हाथ कभी उत्तान नहीं रहते। मुने! आपने यह भी कहा है कि इसके चरण अपनी छायासे युक्त होनेके कारण दोषी हैं, अतः इस विषयमें भी हमें कल्याणकारिणी आशा नहीं प्रतीत हो रही है। शरीरके अन्यान्य लक्षण पृथक्-पृथक् फल सूचित करते हैं। उनमें जो सौभाग्य, धन, पुत्र, आयु और पति-प्राप्तिके सूचक होते हैं, उन सभी लक्षणोंसे मेरी यह कन्या हीन है—ऐसा आप कह रहे हैं। |
| त्वं मे सर्वं विजानासि सत्यवागसि चाप्यतः।<br>मुह्यामि मुनिशार्दूल हृदयं दीर्यतीव मे॥ १७४॥ | मुनिश्रेष्ठ! आप मेरी सारी मनोगत अभिलाषाओंको जानते हैं। मुनिशार्दूल! आप सत्यवादी हैं, इसी कारण (आपकी बात सुनकर) मैं मोहित हो रहा हूँ और मेरा हृदय |
* अध्याय १५४ *
६१५
| इत्युक्त्वा विरतः शैलो महादुःखविचारणात्।<br>श्रुत्वैतदखिलं तस्माच्छैलराजमुखाम्बुजात्।<br>स्मितपूर्वमुवाचेदं नारदो देवपूजितः॥ १७५<br><br>नारद उवाच<br><br>हर्षस्थानेऽपि महति त्वया दुःखं निरूप्यते।<br>अपरिच्छिन्नवाक्यार्थे मोहं यासि महागिरे॥ १७६<br>इमां शृणु गिरं मत्तो रहस्यपरिनिष्ठिताम्।<br>समाहितो महाशैल मयोक्तस्य विचारणे॥ १७७<br>न जातोऽस्याः पतिर्देव्या यन्मयोक्तं हिमाचल।<br>न स जातो महादेवो भूतभव्यभवोद्भवः।<br>शरण्यः शाश्वतः शास्ता शंकरः परमेश्वरः॥ १७८<br>ब्रह्माविष्ण्विन्द्रमुनयो जन्ममृत्युजरार्दिताः।<br>तस्यैते परमेशस्य सर्वे क्रीडनका गिरे॥ १७९<br>आस्ते ब्रह्मा तदिच्छात्तः सम्भूतो भुवनप्रभुः।<br>विष्णुर्युगे युगे जातो नानाजातिर्महातनूः॥ १८०<br>मन्यसे मायया जातं विष्णुं चापि युगे युगे।<br>आत्मनो न विनाशोऽस्ति स्थावरान्तेऽपि भूधर॥ १८१<br>संसारे जायमानस्य म्रियमाणस्य देहिनः।<br>नश्यते देह एवात्र नात्मनो नाश उच्यते॥ १८२<br>ब्रह्मादिस्थावरान्तोऽयं संसारो यः प्रकीर्तितः।<br>स जन्ममृत्युदुःखार्तो ह्यवशः परिवर्तते॥ १८३<br>महादेवोऽचलः स्थाणुर्न जातो जनकोऽजरः।<br>भविष्यति पतिः सोऽस्या जगन्नाथो निरामयः॥ १८४<br>यदुक्तं च मया देवी लक्षणैर्वर्जिता तव।<br>शृणु तस्यापि वाक्यस्य सम्यक्त्वेन विचारणम्॥ १८५<br>लक्षणं दैविको ह्यङ्कः शरीरावयवाश्रयः।<br>सर्वायुर्धनसौभाग्यपरिमाणप्रकाशकः ॥ १८६ | फटा-सा जा रहा है। ऐसा कहकर हिमाचल उस महान् दुःखी कल्पनासे विरत हो गये। उस शैलराजके मुखकमलसे निकली हुई ये सारी बातें सुनकर देवपूजित नारदजी मुसकराते हुए इस प्रकार बोले॥ १६६—१७५॥<br><br>**नारदजीने कहा—**गिरिराज! आप तो महान् हर्षका अवसर उपस्थित होनेपर भी दुःखकी गाथा गा रहे हैं और मेरे अस्पष्ट वाक्यके अर्थको समझे बिना मोहको प्राप्त हो रहे हैं। शैलराज! इस रहस्यपूर्ण वाणीका तात्पर्य मुझसे सुनिये और मेरे द्वारा कही हुई बातपर सावधानीपूर्वक विचार कीजिये। हिमाचल! मैंने जो यह कहा है कि इस देवीका पति उत्पन्न ही नहीं हुआ है, इसका अभिप्राय यह है कि जो भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों कालोंमें वर्तमान रहनेवाले, जीवोंके शरणदाता, अविनाशी, नियामक, कल्याणकर्ता और परमेश्वर हैं, वे महादेव उत्पन्न नहीं हुए हैं अर्थात् वे अनादि हैं, उनका जन्म नहीं होता। पर्वतराज! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, मुनि आदि जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थासे ग्रस्त हैं। ये सभी उस परमेश्वरके खिलौनेमात्र हैं। उन्हींकी इच्छासे त्रिभुवनके स्वामी ब्रह्मा प्रकट हुए हैं और विष्णु प्रत्येक युगमें विशाल शरीर धारण करके नाना प्रकारकी जातियोंमें उत्पन्न होते हैं। पर्वतराज! प्रत्येक युगमें मायाका आश्रय लेकर उत्पन्न हुए विष्णुको तो तुम भी मानते ही हो। स्थावर योनिमें जन्म लेनेपर भी शरीरान्त होनेपर आत्माका विनाश नहीं होता। संसारमें उत्पन्न होकर मृत्युको प्राप्त हुए प्राणीका शरीरमात्र नष्ट होता है, आत्माका नाश नहीं कहा जाता। ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त जो यह संसार कहा जाता है, उसमें उत्पन्न हुए प्राणी जन्म-मृत्युके दुःखसे पीड़ित होकर पराधीन रहते हैं, किंतु महादेव स्थाणुकी भाँति अचल हैं। वे वृद्धावस्थासे रहित तथा सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, किंतु स्वयं किसीसे उत्पन्न नहीं होते। वे ही निर्दोष जगदीश्वर शङ्कर इस कन्याके पति होंगे॥ १७६—१८४॥<br><br>साथ ही मैंने तुमसे जो यह कहा था कि यह देवी लक्षणोंसे रहित है, उस वाक्यका अभिप्राय भी सम्यक्-रूपसे सुनो। पर्वतराज! शरीरके अवयवोंमें अङ्कित लक्षण दैविक चिह्न होता है। वह सभीके आयु, धन और सौभाग्यके परिणामको प्रकट करनेवाला होता है, |
६१६ * मत्स्यपुराण *
| अनन्तस्याप्रमेयस्य सौभाग्यस्यास्य भूधर।<br>नैवाङ्गे लक्षणाकारः शरीरे संविधीयते॥ १८७<br>अतोऽस्या लक्षणं गात्रे शैल नास्ति महामते।<br>यथाहमुक्तवान् तस्या ह्युत्तानकरतां सदा॥ १८८<br>उत्तानो वरदः पाणिरेष देव्याः सदैव तु।<br>सुरासुरमुनिव्रातवरदेयं भविष्यति॥ १८९<br>यथा प्रोक्तं तदा पादौ स्वच्छायव्यभिचारिणौ।<br>अस्याः शृणु ममात्रापि वाग्युक्तिं शैलसत्तम॥ १९०<br>चरणौ पद्मसंकाशावस्याः स्वच्छनखोज्ज्वलौ।<br>सुरासुराणां नमतां किरीटमणिकान्तिभिः॥ १९१<br>विचित्रवर्णैर्भासन्तौ स्वच्छायप्रतिबिम्बितौ।<br>भार्या जगद्गुरोर्ह्येषा वृषाङ्कस्य महीधर॥ १९२<br>जननी लोकधर्मस्य सम्भूता भूतभाविनी।<br>शिवेयं पावनायैव त्वत्क्षेत्रे पावकद्युतिः॥ १९३<br>तद्यथा शीघ्रमेवैषा योगं यायात् पिनाकिना।<br>तथा विधेयं विधिवत्त्वया शैलेन्द्रसत्तम।<br>अत्यन्तं हि महत् कार्यं देवानां हिमभूधर॥ १९४ | किंतु इसके शरीरमें इस अनन्त एवं अप्रमेय सौभाग्यके किसी लक्षणाकार चिह्नका संविधान नहीं किया गया है, इसीलिये मैंने कहा है कि इसके शरीरमें लक्षण नहीं है। महाबुद्धिमान् हिमाचल! जो मैंने इसकी सदा उत्तानकरताका कथन किया था, उसका तात्पर्य यह है कि इस देवीका यह वरदायक हाथ सदा उत्तान ही रहेगा, जिससे यह सुर, असुर और मुनिसमूहके लिये वरदायिनी होगी। पर्वतश्रेष्ठ! उस समय मैंने जो ऐसा कहा था कि इसके चरण अपनी छायामें रहनेके कारण दोषी हैं, इस विषयमें भी तुम मेरे वचनोंकी युक्ति सुनो। इसके कमल-सदृश चरण स्वच्छ उज्ज्वल नखोंसे सुशोभित हैं। जब वे नमस्कार करनेवाले सुरों एवं असुरोंके किरीटोंमें जड़ी हुई मणियोंकी विचित्र वर्णकी कान्तिसे उद्भासित होंगे, तब अपनी छायासे प्रतिबिम्बित कहलायेंगे। महीधर! आपकी यह कन्या जगद्गुरु वृषभध्वज शङ्करकी भार्या, लोकधर्मकी जननी, प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाली, कल्याणस्वरूपा और अग्निके समान कान्तिमती है। यह तुम्हारे क्षेत्रमें तुम्हें पावन करनेके लिये प्रकट हुई है। इसलिये श्रेष्ठ पर्वतराज! जिस प्रकार यह शीघ्र-से-शीघ्र पिनाकधारी शङ्करजीके साथ संयुक्त हो जाय, तुम्हें विधिपूर्वक वैसा ही विधान करना चाहिये। हिमाचल! इससे देवताओंका अत्यन्त महान् कार्य सिद्ध हो जायगा॥ १८५—१९४॥ |
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! नारदजीके मुखसे ये सारी बातें सुनकर उस समय मेनाके प्राणपति शैलराज अपनेको पुनः उत्पन्न हुआ-सा अनुभव करने लगे। तत्पश्चात् हर्षसे फूले हुए हिमाचल भी उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेव वृषभध्वजको नमस्कार करके नारदजीसे बोले॥१९५-१९६॥ |
| एवं श्रुत्वा तु शैलेन्द्रो नारदात् सर्वमेव हि।<br>आत्मानं स पुनर्जातं मेने मेनापतिस्तदा॥ १९५<br>नमस्कृत्य वृषाङ्काय तदा देवाय धीमते।<br>उवाच सोऽपि संहृष्टो नारदं तु हिमाचलः॥ १९६ | |
| हिमवानुवाच | **हिमवान्ने कहा—**मुने! आपने तो मुझे घोर दुस्तर नरकसे उबार लिया है और पाताललोकसे निकालकर सातों लोकोंका अधिपति बना दिया है। मुनिवर! इस समय आपने हिमाचलपर जो अचल गुणवाली समृद्धि उत्पन्न कर दी है, इससे मैं सचमुच हिमाचल नामसे विख्यात कर दिया गया हूँ। मुने! इस समय मेरा हृदय आनन्दमय दिनका अनुभव कर रहा है, जिससे यह आपके कृत्योंका विभागपूर्वक विचार करनेमें सक्षम नहीं हो रहा है। यदि मैं वाणीके अधीश्वर बृहस्पति हो जाऊँ तो भी आपके गुणोंका विचार करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। |
| दुस्तरान्नरकाद् घोरादुद्धृतोऽस्मि त्वया मुने।<br>पातालादहमुद्धृत्य समलोकाधिपः कृतः॥ १९७<br>हिमाचलोऽस्मि विख्यातस्त्वया मुनिवराधुना।<br>हिमाचलेऽचलगुणां प्रापितोऽस्मि समुन्नतिम्॥ १९८<br>आनन्ददिवसाहारि हृदयं मेऽधुना मुने।<br>नाध्यवस्यति कृत्यानां प्रविभागविचारणम्॥ १९९<br>यदि वाचामधीशः स्यां त्वद्गुणानां विचारणे॥ २०० |
* अध्याय १५४ * <span style="float: right;">६१७</span>
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भवद्विधानां नियतममोघं दर्शनं मुने।<br>तवास्मान् प्रति चापल्यं व्यक्तं मम महामुने॥ २०१<br>भवद्भिरेव कृत्योऽहं निवासायात्मरूपिणाम्।<br>मुनीनां देवतानां च स्वयं कर्तापि कल्मषम्॥ २०२<br>तथापि वस्तुन्येकस्मिन्नाज्ञा मे सम्प्रदीयताम्।<br>इत्युक्तवति शैलेन्द्रे स तदा हर्षनिर्भरै॥ २०३<br>तथा च नारदो वाक्यं कृतं सर्वमिति प्रभो।<br>सुरकार्ये य एवार्थस्तवापि सुमहत्तरः॥ २०४<br>इत्युक्त्वा नारदः शीघ्रं जगाम त्रिदिवं प्रति।<br>स गत्वा शक्रभवनममरेशं ददर्श ह॥ २०५<br>ततोऽभिरूपे स मुनिरुपविष्टो महासने।<br>पृष्टः शक्रेण प्रोवाच हिमजासंश्रयां कथाम्॥ २०६ | मुने! आप-जैसे महर्षियोंका दर्शन निश्चय ही अमोघ होता है। महामुने! हमलोगोंके प्रति आपकी अस्थिरता तो मुझे स्पष्टरूपसे ज्ञात है। आप लोगोंद्वारा ही मैं आत्मस्वरूप मुनियों एवं देवताओंके निवास-योग्य बनाया गया हूँ। यद्यपि मैं स्वयं भी पाप करनेवाला हूँ, तथापि किसी एक वस्तुके लिये मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये। उस समय हर्षसे भरे हुए शैलराजके इस प्रकार कहनेपर नारदजीने कहा—'प्रभो! तुमने सब कुछ कर लिया। (अब मुझे यही कहना है कि) देवताओंके कार्यका जो प्रयोजन है, वह तुम्हारे लिये भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होगा।' ऐसा कहकर नारदजी शीघ्र ही स्वर्गलोकको चले गये। वहाँ इन्द्रके भवनमें जाकर वे देवराज इन्द्रसे मिले। जब वे एक सुन्दर सिंहासनपर आसीन हो गये, तब इन्द्रने उनसे जिज्ञासा प्रकट की। फिर तो वे पार्वती-सम्बन्धी कथाका वर्णन करने लगे॥ १९७—२०६॥ |
| नारद उवाच<br>समूह्य यत्तु कर्तव्यं तन्मया कृतमेव हि।<br>किंतु पञ्चशरस्यैव समयोऽयमुपस्थितः॥ २०७<br>इत्युक्तो देवराजस्तु मुनिना कार्यदर्शिना।<br>चूताङ्कुरास्त्रं सस्मार भगवान् पाकशासनः॥ २०८<br>संस्मृतस्तु तदा क्षिप्रं सहस्राक्षेण धीमता।<br>उपतस्थे रतियुतः सविलासो झषध्वजः।<br>प्रादुर्भूतं तु तं दृष्ट्वा शक्रः प्रोवाच सादरम्॥ २०९ | नारदजी बोले— देवराज! संगठित होकर सबके द्वारा जो काम किया जाना चाहिये, उसे तो मैंने अकेले ही कर दिया; किंतु इस अवसरपर अब कामदेवकी आवश्यकता आ पड़ी है। कार्यदर्शी नारद मुनिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवराज भगवान् इन्द्रने आमके बौरके अङ्कुरको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाले कामदेवका स्मरण किया। सहस्रनेत्रधारी बुद्धिमान् इन्द्रद्वारा स्मरण किये जानेपर झषकेतु कामदेव अपनी पत्नी रतिके साथ विलासपूर्वक शीघ्र ही उपस्थित हुआ। उसे उपस्थित देखकर इन्द्रने आदरपूर्वक उससे कहा॥ २०७—२०९॥ |
| शक्र उवाच<br>उपदेशेन बहुना किं त्वां प्रति वदे प्रियम्।<br>मनोभवोऽसि तेन त्वं वेत्सि भूतमनोगतम्॥ २१०<br>तद्यथार्थकमेव त्वं कुरु नाकसदाम् प्रियम्।<br>शङ्करं योजय क्षिप्रं गिरिपुत्र्या मनोभव।<br>संयुतो मधुना चैव ऋतुराजेन दुर्जय॥ २११<br>इत्युक्तो मदनस्तेन शक्रेण स्वार्थसिद्धये।<br>प्रोवाच पञ्चबाणोऽथ वाक्यं भीतः शतक्रतुम्॥ २१२ | इन्द्र बोले— मनोभव! तुम तो अजेय हो और मनसे ही उत्पन्न होते हो, अतः सभी प्राणियोंके मनोगत भावोंको भलीभाँति जानते हो। ऐसी दशामें तुम्हारे प्रति अधिक उपदेश करनेसे क्या लाभ? मैं तुमसे एक प्रिय बात कह रहा हूँ। तुम स्वर्गवासियोंके उस प्रिय कार्यको अवश्य पूर्ण करो। (वह यह है कि) तुम चैत्रमास और ऋतुराज वसन्तको साथ लेकर शङ्करजीका गिरिराजकुमारी पार्वतीके साथ शीघ्र ही संयोग स्थापित करा दो। अपनी स्वार्थसिद्धिके निमित्त इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर पञ्चबाण कामदेव भयभीत होकर इन्द्रसे इस प्रकार बोला॥ २१०—२१२॥ |
६१८ * मत्स्यपुराण *
| काम उवाच | कामदेवने कहा— जगन्नाथ! क्या आप यह नहीं जानते कि मुनियों और दानवोंको भयभीत करनेवाली इस देवसामग्रीसे देवाधिदेव शङ्करको वशमें कर लेना सहज नहीं है। उन महादेवकी इन्द्रियाँ विकाररहित हैं, इसका भी ज्ञान तो आपको है ही। साथ ही महापुरुषोंकी प्रसन्नता और क्रोध भी महान् होता है। इस समय आप जो सम्पूर्ण उपभोगोंकी सारभूता स्वर्गमें उत्पन्न होनेवाली सुन्दरी अप्सराओं तथा बिना चेष्टा किये ही प्राप्त होनेवाले सुखदायक पदार्थोंका उपभोग कर रहे हैं, वह शङ्करजीके प्रति प्रमाद करनेसे नष्ट हो जायगा। थोड़ा इसपर भी विचार कर लीजिये; क्योंकि सामान्य प्राणियोंको भी कार्यफलकी सम्भावना पहलेसे ही दीखने लगती है। इन्द्रदेव! जो लोग सामान्यको छोड़कर विशेषकी आकाङ्क्षा करते हैं, उनका सामान्यसे पतन हो जाना ही फल है। (विशेष तो अप्राप्त है ही।) कामदेवके इस कथनको सुनकर देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रने उससे कहा—॥ २१३—२१७॥ |
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| अनया देवसामग्र्या मुनिदानवभीमया।<br>दुःसाध्यः शङ्करो देवः किं न वेत्सि जगत्प्रभो ॥ २१३ | |
| तस्य देवस्य वेत्थ त्वं करणं तु यदव्ययम्।<br>प्रायः प्रसादः कोपोऽपि सर्वो हि महतां महान् ॥ २१४ | |
| सर्वोपभोगसारा हि सुन्दर्यः स्वर्गसम्भवाः।<br>अध्याश्रितं च यत्सौख्यं भवता नष्टचेष्टितम् ॥ २१५ | |
| प्रमादादथ विभ्रंश्येदीदृशं प्रतिविचिन्त्यताम्।<br>प्रागेव चेह दृश्यन्ते भूतानां कार्यसम्भवाः ॥ २१६ | |
| विशेषं काङ्क्षतां शक्र सामान्याद् भ्रंशनं फलम्।<br>श्रुत्वैतद्वचनं शक्रस्तमुवाचामरैर्वृतः ॥ २१७ | |
| शक्र उवाच | इन्द्र बोले— रतिवल्लभ! तुम्हारे इस कथनके लिये हमलोग प्रमाण हैं। तुम्हारे कथनमें कोई संदेह नहीं है, किंतु (निर्मित वस्तुके) आकार-प्रकारके बिना लोहार अथवा कारीगरकी शक्तिका पता नहीं चलता तथा किसीकी भी शक्ति किसी विशेष विषयमें ही सफलरूपसे देखी जाती है, सर्वत्र नहीं। इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर रतिसहित कामदेव सहायकरूपमें अपने मित्र मधुमास (अथवा वसन्त)-को साथ लेकर प्रस्थित हुआ और शीघ्र ही हिमाचलके शिखरपर जा पहुँचा। वहाँ जाकर वह कार्यकी सिद्धिके लिये उपायपूर्वक चिन्ता करने लगा। उसने सोचा कि जो लोग महान् लक्ष्यसे युक्त और अटल निश्चयवाले हैं, उनके मनको जीतना अत्यन्त कठिन है। अतः सर्वप्रथम उसीको ही संक्षुब्ध कर निश्चयरूपसे विजय प्राप्त की जा सकती है; क्योंकि पूर्वकालमें मनको शुद्ध करके ही लोगोंने उत्तम सिद्धि प्राप्त की है। (किंतु कठिनाई तो यह है कि) क्रूरतर प्राणियोंके सङ्गसे अनेकों प्रकारके भावोंद्वारा द्वेषका अनुगमन किये बिना क्रोध कैसे उत्पन्न हो सकता है? इसके लिये मैं भयंकर ईर्ष्या नामकी महासखीको चपलताके मस्तकपर स्थापित करूँगा, तत्पश्चात् धैर्यके प्रवाहको विध्वस्त करनेवाली, महान् बलवती मनकी उस उत्कृष्ट विकृतिको शङ्करजीपर विनियुक्त करूँगा। |
| वयं प्रमाणस्ते ह्यत्र रतिकान्त न संशयः।<br>संदर्शेन विना शक्तिरयस्कारस्य नेष्यते।<br>कस्यचिच्च क्वचिद् दृष्टं सामर्थ्यं न तु सर्वतः ॥ २१८ | |
| इत्युक्तः प्रययौ कामः सखायं मधुमाश्रितः।<br>रतियुक्तो जगामाशु प्रस्थं तु हिमभूभृतः ॥ २१९ | |
| स तु तत्राकरोचिन्तां कार्यस्योपायपूर्वकम्।<br>महार्था ये हि निष्कम्पा मनस्तेषां सुदुर्जयम् ॥ २२० | |
| तदादावेव संक्षोभ्य नियतं सुजयो भवेत्।<br>संसिद्धिं प्राप्नुयुश्चैव पूर्वे संशोध्य मानसम् ॥ २२१ | |
| कथं च विविधैर्भावैर्द्वेषानुगमनं विना।<br>क्रोधः क्रूरतरासङ्गाद् भीषणेष्यों महासखीम् ॥ २२२ | |
| चापल्यमूर्ध्नि विध्वस्तधैर्यधारां महाबलाम्।<br>तामस्य विनियोक्ष्यामि मनसो विकृतिं पराम् ॥ २२३ |
* अध्याय १५४ * ६१९
| पिधाय धैर्यद्वाराणि संतोषमपकृष्य च।<br>अवगन्तुं हि मां तत्र न कश्चिदतिपण्डितः ॥ २२४<br><br>विकल्पमात्रावस्थाने वैरूप्यं मनसो भवेत्।<br>पश्चान्मूलक्रियारम्भगम्भीरावर्तदुस्तरः ॥ २२५<br><br>हरिष्यामि हरस्याहं तपस्तस्य स्थिरात्मनः।<br>इन्द्रियग्राममावृत्य रम्यसाधनसंविधिः ॥ २२६ | वहाँ धैर्यके द्वारोंको बंद कर तथा संतोषको दूर हटाकर कोई भी ऐसा उत्कृष्ट विद्वान् नहीं है, जो मुझे जाननेमें समर्थ हो सके। किसी भी कार्यके आरम्भमें विकल्पमात्रका विचार करनेसे मनकी विरूपता उत्पन्न हो जाती है, जिससे आगे चलकर मूल कार्यके आरम्भ होनेपर गम्भीर आपत्तियोंकी लहरें उठने लगती हैं और कार्य दुस्तर हो जाता है। अतः अब मैं रमणीय साधनोंके संविधानसे उन स्थिरात्मा शङ्करजीके इन्द्रियसमूहको ढककर उनकी तपस्याको भङ्ग करूँगा॥ २२४-२२६॥ |
| चिन्तयित्वेति मदनो भूतभर्तुस्तदाश्रमम्।<br>जगाम जगतीसारं सरलद्रुमवेदिकम् ॥ २२७<br><br>शान्तसत्त्वसमाकीर्णमचलप्राणिसंकुलम् ।<br>नानापुष्पलताजालं गगनस्थगणेश्वरम् ॥ २२८<br><br>निर्व्यग्रवृषभाध्युष्टनीलशाद्वलसानुकम् ।<br>तत्रापश्यत् त्रिनेत्रस्य रम्यं कञ्चिद् द्वितीयकम् ॥ २२९<br><br>वीरकं लोकवीरेशमीशानसदृशद्युतिम्।<br>यक्षकुङ्कुमकिञ्जल्कपुञ्जपिङ्गजटासटम् ॥ २३०<br><br>वेत्रपाणिनमव्यग्रमुग्रभोगीन्द्रभूषणम् ।<br>ततो निमीलितोन्निद्रपद्मपत्रामलोचनम् ॥ २३१<br><br>प्रेक्षमाणमृजुस्थानं नासिकाग्रं सुलोचनैः।<br>स्रवस्तरससिंहैन्द्रचर्मलम्बोत्तरीयकम् ॥ २३२<br><br>श्रवणाहीफलन्मुक्तं निःश्वासानलपिङ्गलम्।<br>प्रेङ्खत्कपालपर्यन्ततुम्बिलम्बिजटाचयम् ॥ २३३<br><br>कृतवासुकिपर्यङ्कनाभिमूलनिवेशितम् ।<br>ब्रह्माञ्जलिस्थपुच्छाग्रनिबद्धोरगभूषणम् ॥ २३४<br><br>ददर्श शङ्करं कामः क्रमप्राप्तान्तिकं शनैः।<br>ततो भ्रमरझङ्कारमालम्बिद्रुमसानुकम् ॥ २३५<br><br>प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण भवस्य मदनो मनः। | इस प्रकार सोच-विचारकर कामदेव प्राणियोंके पालक शङ्करजीके उस आश्रमपर गया, जो पृथ्वीका सारभूत था। वहाँ आमके वृक्ष उगे हुए थे, जिनकी छायामें वेदिकाएँ बनी थीं। वह शान्त स्वभाववाले जीवोंसे व्याप्त तथा पर्वतीय जीवोंसे भरा हुआ था। वहाँ नाना प्रकारके पुष्पोंकी लताएँ फैली हुई थीं। ऊपर आकाशमण्डलमें गणेश्वर विराजमान थे। वहीं एक ओर नीली घासके ऊपर वृषभराज नन्दीश्वर निश्चिन्तभावसे बैठे हुए थे। वहाँ कामदेवने त्रिनेत्रधारी शङ्करजीके निकट किसी दूसरे सुन्दर पुरुषको देखा। उसका नाम वीरक था। वह जगत्के वीरोंमें प्रधान था। उसकी शरीर-कान्ति शङ्करजीके समान थी। उसकी जटाएँ यक्षकुङ्कुम* और पद्मकेसरके पुञ्जके समान पीली थीं। उसके हाथमें बेंत शोभा पा रहा था। वह विषैले सर्पोंके आभूषणोंसे विभूषित हो निश्चिन्त भावसे बैठा हुआ था।<br>तदनन्तर कामदेवकी दृष्टि क्रमशः धीरे-धीरे निकट प्राप्त हुए शङ्करजीपर पड़ी, जिनके कमल-दलके सदृश नेत्र अधखुले थे। जो अपने सुन्दर नेत्रोंद्वारा सीधे नासिकाके अग्रभागको देख रहे थे। उनके कंधेपर सिंहके चमड़ेका ऐसा लम्बा उत्तरीय लटक रहा था, जिससे रक्त टपक रहा था। कानोंमें कुण्डलरूपमें पहने हुए सर्पोंके मुखसे निकलती हुई निःश्वासाग्निसे उनका शरीर पीला दीख रहा था। उनकी लम्बी जटाएँ खप्पर और तुम्बीतक हिलती हुई शोभा पा रही थीं। वे वासुकि नागकी शय्या बनाकर उसके नाभिमूलपर बैठे हुए थे। उनकी ब्रह्माञ्जलिमें भूषणरूपसे धारण किये गये सर्पकी पूँछका अग्रभाग स्थित था। तत्पश्चात् शङ्करजी जिस वृक्षके नीचे बैठे हुए थे, उसकी चोटीपर भ्रमरोंकी गुंजार गूँज उठी। उसी समय कामदेव शङ्करजीके श्रोत्रमार्गसे मनमें प्रविष्ट हुआ ॥ २२७-२३५ १/२॥ |
* कपूर, अगर, कस्तूरी और कंकोलके सम्मिश्रणसे बने हुए अङ्गराग या चन्दनको यक्षकुङ्कुम कहते हैं।
६२० * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| शङ्करस्तमथाकर्ण्य मधुरं मदनाश्रयम्॥ २३६<br>सस्मार दक्षदुहितां दयितां रक्तमानसः।<br>ततः सा तस्य शनकैस्तिरोभूयातिनिर्मला ॥ २३७<br>समाधिभावना तस्थौ लक्ष्यप्रत्यक्षरूपिणी।<br>ततस्तन्मयतां यातः प्रत्यूहपिहिताशयः॥ २३८<br>वशित्वेन बुबोधेशो विकृतिं मदनात्मिकाम्।<br>ईषत्कोपसमाविष्टो धैर्यमालम्ब्य धूर्जटिः॥ २३९<br>निरासे मदनस्थित्या योगमायासमावृतः।<br>स तया माययाऽऽविष्टो जज्वाल मदनस्ततः॥ २४०<br>इच्छाशरीरो दुर्जेयो रोषदोषमहाश्रयः।<br>हृदयान्निर्गतः सोऽथ वासनाव्यसनात्मकः॥ २४१<br>बहिःस्थलं समालम्ब्य ह्युपतस्थौ झषध्वजः।<br>अनुयातोऽथ हृद्येन मित्रेण मधुना सह॥ २४२<br>सहकारतरौ दृष्ट्वा मृदुमारुतनिर्धूतम्।<br>स्तबकं मदनो रम्यं हरवक्षसि सत्वरम्॥ २४३<br>मुमोच मोहनं नाम मार्गणं मकरध्वजः।<br>शिवस्य हृदये शुद्धे नाशशाली महाशरः॥ २४४<br>पपात परुषप्रांशुः पुष्पबाणो विमोहनः।<br>ततः करणसंदेहो विद्धस्तु हृदये भवः॥ २४५<br>बभूव भूधरौपम्यधैर्योऽपि मदनोन्मुखः।<br>ततः प्रभुत्वाद्भावानां नावेशं समपद्यत॥ २४६<br>बाह्यं बहु समासाद्य प्रत्यूहप्रसवात्मकम्।<br>ततः कोपानलोद्भूतघोरहुङ्कारभीषणे॥ २४७ | भ्रमरोंकी उस मधुर झंकारको सुनकर शङ्करजीका मन कामदेवके प्रभावसे अनुरक्त हो गया। तब उन्होंने अपनी प्रिया दक्षकन्या सतीका स्मरण किया। उस समय उनकी वह लक्ष्यको प्रत्यक्षरूपमें प्रकट करनेवाली अत्यन्त निर्मल समाधिभावना धीरे-धीरे तिरोहित हो गयी। वे विघ्नोंद्वारा लक्ष्यके अवरुद्ध हो जानेसे सतीकी तन्मयताको प्राप्त हो गये। थोड़ी देर बाद जितेन्द्रिय होनेके कारण शङ्करजी इस कामजन्य विकारको समझ गये। फिर तो उनमें थोड़ा क्रोधकी झलक आ गयी। तब उन जटाधारीने धैर्य धारणकर अपनेको कामदेवकी स्थितिसे मुक्त करनेके लिये योगमायाका आश्रय लिया। उस मायासे आविष्ट होनेके कारण कामदेव जलने लगा। तत्पश्चात् जो वासना और दुर्व्यसनका मूर्तरूप, स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनेवाला, अजेय, क्रोध और दोषका महान् आश्रयस्थान था, वह कामदेव शङ्करजीके हृदयसे बाहर निकला और एक बाहरी स्थानका सहारा लेकर निकट ही खड़ा हो गया। उस समय उसका परम स्नेही मित्र मधु (चैत्रमास या वसन्त) भी उसके साथ था। वहाँ आमके वृक्षपर मन्द वायुसे हिलाये गये रमणीय पुष्पगुच्छको देखकर मकरध्वज कामदेवने शीघ्र ही शङ्करजीके वक्षःस्थलपर वह मोहन नामक बाण छोड़ा। वह विमोहन नामक पुष्पबाण विनाशकारी, महान् प्रभावशाली, कठोर और विशाल था। वह शङ्करजीके शुद्ध हृदयपर जा गिरा। जिससे उनका हृदय घायल हो गया और उनकी इन्द्रियाँ विचलित हो गयीं। फिर तो पर्वतके समान धैर्यशाली होनेपर भी शङ्करजी कामोन्मुख हो गये, किंतु अनेकों बाहरी विघ्नसमूहोंके प्राप्त होनेपर भी सद्भावोंके प्रभुत्वके कारण उनमें कामका आवेश विशेषरूपसे नहीं हुआ॥ २३६-२४६ १/२ ॥ |
| बभूव वदने नेत्रं तृतीयमनलाकुलम्।<br>रुद्रस्य रौद्रवपुषो जगत्संहारभैरवम्॥ २४८<br>तदन्तिकस्थे मदने व्यस्फारयत धूर्जटिः।<br>तं नेत्रविस्फुलिङ्गेन क्रोशतां नाकवासिनाम्॥ २४९<br>गमितो भस्मसात् तूर्णं कंदर्पः कामिदर्पकः।<br>स तु तं भस्मसात्कृत्वा हरनेत्रोद्भवोऽनलः॥ २५० | तदुपरान्त क्रोधाग्निसे उत्पन्न हुए भयंकर हुंकारके भयानक शब्दसे युक्त मुखके ऊपर क्रोधाग्निसे उद्दीप्त तीसरा नेत्र प्रकट हो गया, जो भीषण रूपधारी शङ्करजीका जगत्का संहार करनेवाला भयानक रूप था। तब जटाधारी शङ्करजीने अपने निकट ही खड़े हुए कामदेवकी ओर दृष्टिपात किया। फिर तो उस नेत्रसे निकली हुई एक चिनगारीने तुरंत ही कामियोंके दर्पको बढ़ाने-वाले कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया। यह देखकर स्वर्गवासी हाहाकार मचा रहे थे। इस प्रकार शङ्करजीके नेत्रसे उद्भूत हुई अग्नि कामदेवको भस्म कर |
| * अध्याय १५४ * | ६२१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यजृम्भत जगद्दग्धुं ज्वालाहुङ्कारघस्मरः।<br>ततो भवो जगद्धेतोर्व्यभजज्जातवेदसम्॥ २५१<br><br>सहकारे मधौ चन्द्रे सुमनःसु परेष्वपि।<br>भृङ्गेषु कोकिलास्येषु विभागेन स्मरानलम्॥ २५२<br><br>स बाह्यान्तरविद्धेन हरेण स्मरमार्गणः।<br>रागस्नेहसमिद्धान्तर्ध्वंस्तीव्रहुताशनः ॥ २५३<br><br>विभक्तलोकसंक्षोभकरो दुर्वारजृम्भितः।<br>सम्प्राप्य स्नेहसम्पृक्तं कामिनां हृदयं किल॥ २५४<br><br>ज्वलत्यहर्निशं भीमो दुश्चिकित्स्यमुखात्मकः। | जगत्को जलानेके लिये आगे बढ़ी और लपटोंके हुंकारसे पदार्थोंको भक्षण करने लगी। तब शङ्करजीने जगत्का कल्याण करनेके लिये उस अग्निका विभाजन कर दिया। उन्होंने कामाग्निको विभक्त कर आमके वृक्ष, वसन्त-ऋतु (अथवा चैत्रमास), चन्द्रमा, सुगन्धित पुष्पों, भ्रमरों और कोकिलोंके मुखोंमें स्थापित कर दिया। बाहर और भीतर—दोनों प्रकारसे घायल हुए शिवजीद्वारा विभक्त हुआ वह कामदेवका बाण अनुराग और स्नेहसे उद्दीप्त हो वेगपूर्वक दौड़ती हुई अग्निकी तरह लोगोंके मनोंको क्षुब्ध करने लगा। उसकी उन्नति रोकी नहीं जा सकती थी। वह इतना भयंकर थी कि उसके प्रतिषेधका कोई उपाय बड़ी कठिनाईसे हो सकता था। इस प्रकार वह अब भी कामियोंके स्नेहसिक्त हृदयमें पहुँचकर उन्हें रात-दिन जलाता रहता है॥ २४७—२५४ १/२ ॥ |
| विलोक्य हरहुङ्कारज्वालाभस्मकृतं स्मरम्॥ २५५<br><br>विललाप रतिः क्रूरं बन्धुना मधुना सह।<br>ततो विलप्य बहुशो मधुना परिसान्त्विता॥ २५६<br><br>जगाम शरणं देवमिन्दुमौलिं त्रिलोचनम्।<br>भृङ्गानुयातां संगृह्य पुष्पितां सहकारजाम्॥ २५७<br><br>लतां पवित्रकस्थाने पाणौ परभृतां सखीम्।<br>निर्बध्य तु जटाजूटं कुटिलैरलकै रतिः॥ २५८<br><br>उद्धूल्य गात्रं शुभ्रेण हृद्येन स्मरभस्मना।<br>जानुभ्यामवनीं गत्वा प्रोवाचेन्दुविभूषणम्॥ २५९ | इस प्रकार कामदेवको शङ्करजीके हुंकारकी ज्वालासे भस्म हुआ देख रति कामदेवके मित्र वसन्तके साथ फूट-फूटकर विलाप करने लगी। बहुत प्रकारसे विलाप करनेके पश्चात् वसन्तद्वारा समझायी-बुझायी जानेपर रति त्रिनेत्रधारी भगवान् चन्द्रशेखरकी शरणमें जानेके लिये प्रस्थित हुई। उस समय उसने अपने एक हाथमें पवित्रकके स्थानपर फूली हुई आमकी लताको, जिसपर भौंरे मँडरा रहे थे, धारण कर रखा था और उसके दूसरे हाथपर उसकी सखी कोयल बैठी थी। उसने अपने घुँघराले बालोंको जटाजूटके रूपमें बाँधकर अपने प्रियतम कामदेवके श्वेत भस्मसे शरीरको धूसरित कर लिया था। वहाँ पहुँचकर वह पृथ्वीपर घुटने टेककर भगवान् चन्द्रशेखरसे बोली—॥ २५५—२५९॥ |
| रतिरुवाच<br>नमः शिवायस्तु निरामयाय<br>नमः शिवायस्तु मनोमयाय।<br>नमः शिवायस्तु सुरार्चिताय<br>तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय॥ २६०<br>नमो भवायास्तु भवोद्भवाय<br>नमोऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय।<br>नमोऽस्तु ते गूढमहाव्रताय<br>नमोऽस्तु मायागहनाश्रयाय॥ २६१ | रतिने कहा—जो सब प्रकारकी क्षतिसे रहित हैं, उन शिवको नमस्कार है। जो सभी प्राणियोंके मनःस्वरूप हैं, उन शिवको प्रणाम है। जो देवताओंद्वारा पूजित और सदा भक्तोंपर कृपा करनेवाले हैं, उन आप शिवको अभिवादन है। जगत्को उत्पन्न करनेवाले शिवको नमस्कार है। कामदेवको भस्म कर देनेवाले आपको प्रणाम है। गुप्त रूपसे महान् व्रतको धारण करनेवाले आपको अभिवादन है। मायारूपी काननका आश्रय लेनेवालेको नमस्कार है। |
६२२ * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shloka | Hindi Commentary |
|---|---|
| नमोऽस्तु शर्वाय नमः शिवाय<br>नमोऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय।<br>नमोऽस्तु कालाय नमः कलाय<br>नमोऽस्तु ते ज्ञानवरप्रदाय॥ २६२<br><br>नमोऽस्तु ते कालकलातिगाय<br>नमो निसर्गामलभूषणाय।<br>नमोऽस्त्वमेयान्धकमर्दकाय<br>नमः शरण्याय नमोऽगुणाय॥ २६३<br><br>नमोऽस्तु ते भीमगणानुगाय<br>नमोऽस्तु नानाभुवनादिकर्त्रे।<br>नमोऽस्तु नानाजगतां विधात्रे<br>नमोऽस्तु ते चित्रफलप्रयोक्त्रे॥ २६४<br><br>सर्वावसाने ह्यविनाशनेत्रे<br>नमोऽस्तु चित्राध्वरभागभोक्त्रे।<br>नमोऽस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे<br>नमः सदा ते भवसङ्गहर्त्रे॥ २६५ | आप जगत्के संहारक, कल्याणकारक और पुरातन सिद्ध हैं, आपको बारंबार प्रणाम है। आप कालस्वरूप, कल (कालकी गणना करनेवाले) और श्रेष्ठ ज्ञानके प्रदाता हैं, आपको पुनः-पुनः अभिवादन है। कालकी कलाका अतिक्रमण करनेवाले आपको नमस्कार है। प्रकृतिरूप निर्मल आभूषण धारण करनेवालेको प्रणाम है। आप अप्रमेय शक्तिशाली अन्धकासुरका मर्दन करनेवाले, शरणदाता और निर्गुण हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। भयंकर गणोंद्वारा अनुगमन किये जानेवाले आपको नमस्कार है। अनेकों भुवनोंके आदिकर्ताको प्रणाम है। अनेकों जगत्की रचना करनेवालेको अभिवादन है। चित्र-विचित्र फल प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। सबकी समाप्ति अर्थात् महाप्रलयके अवसरपर आप विनाशसे बचे हुए प्राणियोंके नेता तथा विशाल यज्ञोंमें अपने भागको भोगनेवाले हैं, आपको प्रणाम है। भक्तोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करनेवालेको अभिवादन है। संसारकी आसक्तिका हरण करनेवाले आपको सदा नमस्कार है॥ २६०-२६५॥ |
| अनन्तरूपाय सदैव तुभ्य-<br>मसह्यकोपाय नमोऽस्तु तुभ्यम्।<br>शशाङ्कचिह्नाय सदैव तुभ्य-<br>ममेयमानाय नमः स्तुताय॥ २६६<br><br>वृषेन्द्रयानाय पुरान्तकाय<br>नमः प्रसिद्धाय महौषधाय।<br>नमोऽस्तु भक्त्याभिमतप्रदाय<br>नमोऽस्तु सर्वार्तिहराय तुभ्यम्॥ २६७<br><br>चराचराचारविचारवर्य-<br>माचार्यमुत्प्रेक्षितभूतसर्गम् ।<br>त्वामिन्दुमौलिं शरणं प्रपन्ना<br>प्रियाप्रमेयं महतां महेशम्॥ २६८<br><br>प्रयच्छ मे कामयशःसमृद्धिं<br>पुनः प्रभो जीवतु कामदेवः।<br>प्रियं विना त्वां प्रियजीवितेषु<br>त्वत्तोऽपरः को भुवनेष्विहास्ति॥ २६९<br><br>प्रभुः प्रियायाः प्रसवः प्रियाणां<br>प्रणीतपर्यायपरापरार्थः।<br>त्वमेवमेको भुवनस्य नाथो<br>दयालुरुन्मूलितभक्तभीतिः॥ २७० | आप अनन्त रूपवाले हैं तथा आपका क्रोध असह्य होता है, आपको सदैव प्रणाम है। आप चन्द्रमाके चिह्नसे सुशोभित, अपरिमित मानसे युक्त और सभी प्राणियोंद्वारा स्तुत हैं, आपको सदैव अभिवादन है। वृषभेन्द्र नन्दी आपका वाहन है, आप त्रिपुरके विनाशक और प्रसिद्ध महौषधरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप भक्तिके वशीभूत हो अभीष्ट प्रदान करनेवाले और सभी प्रकारके कष्टोंको दूर करनेवाले हैं, आपको बारंबार प्रणाम है।<br>आप चराचर प्राणियोंके आचार-विचारसे सर्वश्रेष्ठ, जगत्के आचार्य, समस्त भूत-सृष्टिपर दृष्टि रखनेवाले, मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करनेवाले, अतुलित प्रेमी और महनीयोंके भी महेश्वर हैं, मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। प्रभो! मुझे कामदेवके यशकी समृद्धि प्रदान कीजिये, जिससे ये कामदेव पुनः जीवित हो जायें। इस त्रिभुवनमें आपसे बढ़कर दूसरा कौन है, जो मेरे प्रियतमको जीवित कर सके। एकमात्र आप ही अपनी प्रियाके प्राणपति, प्रिय पदार्थोंके उद्गम-स्थान, पर और अपर—इन दोनों अर्थोंके पर्यायस्वरूप, जगत्के स्वामी, परम दयालु और भक्तोंके भयको उखाड़ फेंकनेवाले हैं॥ २६६—२७०॥ |
- अध्याय १५४ * | ६२३ -|-
| सूत उवाच<br>इत्थं स्तुतः शङ्कर ईड्य ईशो<br>वृषाकपिर्मन्मथकान्तया तु।<br>तुतोष दोषाकरखण्डधारी<br>उवाच चैनां मधुरं निरीक्ष्य॥ २७१ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! कामदेवकी पत्नी रतिद्वारा इस प्रकार स्तवन किये जानेपर स्तुतिके योग्य भगवान् शङ्कर प्रसन्न हो गये। तब चन्द्रखण्डको धारण करनेवाले शिवजी उसकी ओर दृष्टिपात करके मधुर वाणीमें बोले॥ २७१॥ | | शंकर उवाच<br>भवितेति च कामोऽयं कालात् कान्तोऽचिरादपि।<br>अनङ्ग इति लोकेषु स विख्यातिं गमिष्यति॥ २७२<br>इत्युक्ता शिरसा वन्द्य गिरिशं कामवल्लभा।<br>जगामोपवनं रम्यं रतिस्तु हिमभूभृतः॥ २७३<br>रुरोद बहुशो दीना रमणेऽपि स्थले तु सा।<br>मरणव्यवसायात्तु निवृत्ता सा हराज्ञया॥ २७४ | **शङ्करजीने कहा—**कामवल्लभे! थोड़े ही समयके बाद यह कामदेव पुनः तुम्हें पतिरूपमें प्राप्त होगा। वह जगत्में अनङ्ग नामसे विख्यात होगा। इस प्रकार कही जानेपर काम-पत्नी रतिने सिर झुकाकर भगवान् शङ्करको प्रणाम किया, तत्पश्चात् वह हिमालयके रमणीय उपवनकी ओर चली गयी। उस सुरम्य स्थानपर पहुँचकर भी वह दीनभावसे बहुत देरतक विलाप करती रही; क्योंकि वह शङ्करजीकी आज्ञासे मृत्युके निश्चयसे निवृत्त हो चुकी थी॥ २७२–२७४॥ | | अथ नारदवाक्येन चोदितो हिमभूधरः।<br>कृताभरणसंस्कारां कृतकौतुकमङ्गलाम्॥ २७५<br>स्वर्गपुष्पकृतापीड़ां शुभ्रचीनांशुकाम्बराम्।<br>सखीभ्यां संयुतां शैलो गृहीत्वा स्वसुतां ततः॥ २७६<br>जगाम शुभयोगेन तदा सम्पूर्णमानसः।<br>स काननान्युपाक्रम्य वनान्युपवनानि च॥ २७७<br>ददर्श रुदतीं नारीमग्रतः समहौजसम्।<br>रूपेणासदृशीं लोके रम्येषु वनसानुषु॥ २७८<br>कौतुकेन परामृश्य तां दृष्ट्वा रुदतीं गिरिः।<br>उपसृत्य ततस्तस्या निकटे सोऽभ्यपृच्छत॥ २७९ | इधर नारदजीके वाक्योंसे प्रेरित होकर पर्वतराज हिमालय उल्लासपूर्ण मनसे दो सखियोंके साथ अपनी कन्याको लेकर (शङ्करजीके पास जानेके लिये) शुभमुहूर्तमें प्रस्थित हुए। उस समय पार्वतीको आभूषणोंसे सुसज्जित कर दिया गया था। उनके सभी वैवाहिक मङ्गलकार्य सम्पन्न कर लिये गये थे। उनके मस्तकपर स्वर्गीय पुष्पोंकी माला पड़ी थी तथा शरीरपर श्वेत रंगकी महीन रेशमी साड़ी झलक रही थी। वे काननों, वनों एवं उपवनोंको पार करके जब आगे बढ़े तो उन्होंने उस रमणीय वनस्थलीमें एक महान् ओजस्विनी नारीको, जो लोकमें अनुपम रूपवती थी, रोती हुई देखा। तब गिरिराज उसे रोती देखकर कुतूहलवश उसके निकट गये और पूछने लगे॥ २७५–२७९॥ | | हिमवानुवाच<br>कासि कस्यासि कल्याणि किमर्थं चापि रोदिषि।<br>नैतदल्पमहं मन्ये कारणं लोकसुन्दरि॥ २८०<br>सा तस्य वचनं श्रुत्वा उवाच मधुना सह।<br>रुदती शोकजननं श्वसती दैन्यवर्धनम्॥ २८१ | **हिमवान् बोले—**कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी पत्नी हो? किसलिये इस प्रकार रुदन कर रही हो? लोकसुन्दरि! मैं इसका असाधारण कारण नहीं मानता, (अपितु इसका कोई विशेष कारण है।) हिमाचलके वचनको सुनकर वसन्तसहित रोती हुई रति दीर्घ निःश्वास लेकर दैन्यवर्धक एवं शोकजनक वचन बोली॥ २८०-२८१॥ | | रतिरुवाच<br>कामस्य दयितां भार्यां रति मां विद्धि सुव्रत।<br>गिरावस्मिन् महाभाग गिरिशस्तपसि स्थितः॥ २८२ | **रतिने कहा—**सुव्रत! आप मुझे कामदेवकी प्यारी पत्नी रति समझें। महाभाग! इसी पर्वतपर भगवान् शङ्कर तपस्या कर रहे हैं। |
६२४ * मत्स्यपुराण *
| तेन प्रत्यूहरुष्टेन विस्फार्यालोक्य लोचनम्।<br>दग्धोऽसौ झषकेतुस्तु मम कान्तोऽतिवल्लभः॥ २८३<br><br>अहं तु शरणं याता तं देवं भयविह्वला।<br>स्तुतवत्यथ संस्तुत्य ततो मां गिरिशोऽब्रवीत्॥ २८४<br><br>तुष्टोऽहं कामदयिते कामोऽयं ते भविष्यति।<br>त्वत्स्तुतिं चाप्यधीयानो नरो भक्त्या मदाश्रयः।<br>लप्स्यते काङ्क्षितं कामं निवर्त्य मरणादितः॥ २८५<br><br>प्रतीक्षन्ती च तद्वाक्यमाशावेशादिभिर्ह्यहम्।<br>शरीरं परिरक्षिष्ये कञ्चित् कालं महाद्युते॥ २८६<br><br>इत्युक्तस्तु तदा रत्या शैलः सम्भ्रमभीषितः।<br>पाणावादाय हि सुतां गन्तुमैच्छत् स्वकं पुरम्॥ २८७<br><br>भाविनोऽवश्यभावित्वादभवित्री भूतभाविनी।<br>लज्जमाना सखिमुखैरुवाच पितरं गिरिमू॥ २८८ | तपस्यामें विघ्न पड़नेसे रुष्ट होकर उन्होंने अपने तीसरे नेत्रको खोलकर देखा, जिससे मेरे परम प्रिय पति कामदेव जलकर भस्म हो गये। तब भयसे विह्वल हुई मैं उन देवाधिदेवकी शरणमें गयी। वहाँ मैंने उनकी स्तुति की। उस स्तवनसे प्रसन्न होकर भगवान् शङ्करने मुझसे कहा—'कामदयिते! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण हो जायगा। साथ ही जो मनुष्य मेरे शरणागत होकर तुम्हारे द्वारा की गयी इस स्तुतिका भक्तिपूर्वक पाठ करेगा, वह अपनी मनोवाञ्छित कामनाको प्राप्त कर लेगा। अब तुम मृत्युके निश्चयसे निवृत्त हो जाओ।' महाद्युतिमान् पर्वतराज! उसी आशाके आवेशसे मैं शङ्करजीके वाक्यकी प्रतीक्षा करती हुई कुछ कालतक इस शरीरकी रक्षा करूँगी।<br>रतिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर हिमाचल उस समय भयभीत हो गये। तब वे अपनी कन्याका हाथ पकड़कर अपने नगरको लौट जानेके लिये उद्यत हो गये। तब जो होनहार है, वह तो अवश्य होकर ही रहेगा—ऐसा विचारकर प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाली पार्वती लजाती हुई सखीके मुखसे अपने पिता गिरिराजसे बोलीं ॥ २८२–२८८ ॥ |
| शैलदुहितोवाच<br><br>दुर्भगेण शरीरेण किं मामनेन कारणम्।<br>कथं च तादृशं प्राप्तं सुखं मे स पतिर्भवेत्॥ २८९<br><br>तपोभिः प्राप्यतेऽभीष्टं नासाध्यं हि तपस्यतः।<br>दुर्भगंत्वं वृथा लोको वहते सति साधने॥ २९०<br><br>जीविताद्दुर्भागाच्छ्रेयो मरणं ह्यतपस्यतः।<br>भविष्यामि न संदेहो नियमैः शोषये तनुम्॥ २९१<br><br>तपसि भ्रष्टसंदेह उद्यमोऽर्थजिगीषया।<br>साहं तपः करिष्यामि यदहं प्राप्य दुर्लभा॥ २९२<br><br>इत्युक्तः शैलराजस्तु दुहित्रा स्नेहविक्लवः।<br>उवाच वाचा शैलेन्द्रो स्नेहगद्गदवर्णया॥ २९३ | गिरिराजकुमारीने कहा— पिताजी! इस अभागे शरीरको धारण करनेसे मुझे क्या लाभ प्राप्त हो सकता है? अब मैं किस प्रकार सुखी हो सकूँगी और किस उपायसे भगवान् शङ्कर मेरे पति हो सकेंगे? (ठीक है, ऐसा सुना जाता है कि) तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है; क्योंकि तपस्वीके लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। भला ऐसे उत्तम साधनके रहते हुए भी लोग व्यर्थ ही दुर्भाग्यका भार क्यों वहन करते हैं? तपस्या न करनेवालेके लिये भाग्यहीन जीवनसे तो मर जाना ही श्रेयस्कर है। अतः मैं निःसंदेह तपस्विनी बनूँगी और नियमोंके पालनद्वारा अपने शरीरको सुखा डालूँगी। प्रयोजन-सिद्धिके लिये तपस्याके निमित्त संदेहरहित उद्यम अवश्य करना चाहिये। इसलिये अब मैं तपस्या करूँगी, जिससे मुझे वह दुर्लभ कामना प्राप्त हो जाय। पुत्रीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर पर्वतराज हिमाचल स्नेहसे विह्वल हो गये, तब वे स्नेहभरी गद्गद वाणीसे बोले ॥ २८९–२९३ ॥ |
| हिमवानुवाच<br><br>उमेति चपले पुत्रि न क्षमं तावकं वपुः।<br>सोढुं क्लेशस्वरूपस्य तपसः सौम्यदर्शने॥ २९४<br><br>भावीन्यभिविचार्याणि पदार्थानि सदैव तु।<br>भाविनोऽर्था भवन्त्येव हठेनानिच्छतोऽपि वा॥ २९५ | हिमवान्ने कहा— बेटी! तू तो बड़ी चञ्चल है। 'उ—मा'—उसे मत कर; क्योंकि सुन्दर स्वरूपवाली बच्ची! तेरा यह शरीर क्लेशस्वरूप तपस्याके कष्टको सहन करनेके लिये सक्षम नहीं है। वत्से! भावी पदार्थोंके प्रति सदैव ऐसा समझना चाहिये कि होनहारके विषय न चाहनेपर |
* अध्याय १५४ * । ६२५
| तस्मान्न तपसा तेऽस्ति बाले किञ्चित् प्रयोजनम्।<br>भवनायैव गच्छामश्चिन्तयिष्यामि तत्र वै॥ २९६<br>इत्युक्ता तु यदा नैव गृहायाभ्येति शैलजा।<br>ततः स चिन्तयाऽऽविष्टो दुहितां प्रशशंस च॥ २९७<br>ततोऽन्तरिक्षे दिव्या वाग्भूद्भुवनभूतले।<br>उमेति चपले पुत्रि त्वयोक्ता तनया ततः॥ २९८<br>उमेति नाम तेनास्या भुवनेषु भविष्यति।<br>सिद्धिं च मूर्तिमत्येषा साधयिष्यति चिन्तिताम्॥ २९९<br>इति श्रुत्वा तु वचनमाकाशात् काशपाण्डुरः।<br>अनुज्ञाय सुतां शैलो जगामाशु स्वमन्दिरम्॥ ३०० | भी हठपूर्वक घटित होते ही हैं; अतः बाले ! तुझे तपस्या करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। आओ, हमलोग घर चलें, वहीं इस विषयमें विचार किया जायगा। इस प्रकार कहे जानेपर भी जब पार्वती घर लौटनेके लिये उद्यत नहीं हुई, तब हिमाचल चिन्तित हो गये और पुत्रीकी प्रशंसा करने लगे। इसी बीच धरातलपर इस प्रकारकी दिव्य आकाशवाणी सुनायी पड़ी—'शैलराज ! जो तुमने अपनी पुत्रीके प्रति 'उ मेति चपले पुत्रि—चञ्चल बेटी ! उसे मत कर'—ऐसा कहा है, इस कारण संसारमें इसका 'उमा' नाम प्रसिद्ध होगा। यह साक्षात् प्रकट होकर (भक्तोंको उनकी) अभीष्ट सिद्धि प्रदान करेगी।' इस आकाशवाणीको सुनकर कास-पुष्पके समान उज्ज्वल वर्णवाले हिमाचल अपनी पुत्रीको तपके निमित्त आज्ञा देकर शीघ्र ही अपने भवनको लौट गये॥ २९४—३००॥ | | सूत उवाच<br>शैलजापि ययौ शैलमगम्यमपि दैवतैः।<br>सखीभ्यामनुयाता तु नियता नगराजजा॥ ३०१<br>शृङ्गं हिमवतः पुण्यं नानाधातुविभूषितम्।<br>दिव्यपुष्पलताकीर्णं सिद्धगन्धर्वसेवितम्॥ ३०२<br>नानामृगगणाकीर्णं भ्रमरोद्घुष्टपादपम्।<br>दिव्यप्रस्रवणोपेतं दीर्घिकाभिरलङ्कृतम्॥ ३०३<br>नानापक्षिगणाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्।<br>जलजस्थलजैः पुष्पैः प्रोत्फुल्लैरुपशोभितम्॥ ३०४<br>चित्रकन्दरसंस्थानं गुहागृहमनोहरम्।<br>विहङ्गसंघसंजुष्टं कल्पपादपसंकटम्॥ ३०५<br>तत्रापश्यन्महाशाखं शाखिनं हरितच्छदम्।<br>सर्वर्तुकुसुमोपेतं मनोरथशतोज्ज्वलम्॥ ३०६<br>नानापुष्यसमाकीर्णं नानाविधफलान्वितम्।<br>नतं सूर्यस्य रुचिभिर्भिन्नसंहतपल्लवम्॥ ३०७<br>तत्राम्बराणि संत्यज्य भूषणानि च शैलजा।<br>संवीता वल्कलैर्दिव्यैर्दभैर्निर्मितमेखला॥ ३०८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! इधर पार्वती भी नियमबद्ध होकर अपनी दोनों सखियोंके साथ उस शिखरकी ओर प्रस्थित हुई, जो देवताओंके लिये भी अगम्य था। हिमालयका वह पावन शिखर अनेकों प्रकारकी धातुओंसे विभूषित था। उसपर दिव्य पुष्पोंकी लताएँ फैली हुई थीं। वह सिद्धों एवं गन्धर्वोंद्वारा सेवित था। वहाँ अनेकों जातियोंके मृगसमूह विचर रहे थे। उसके वृक्षोंपर भ्रमर गुंजार कर रहे थे। वह दिव्य झरनोंसे युक्त तथा बावलियोंसे सुशोभित था। वहाँ नाना प्रकारके पक्षिसमूह चहचहा रहे थे। वह चक्रवाक पक्षीसे अलंकृत तथा जलमें एवं स्थलपर उत्पन्न होनेवाले खिले हुए पुष्पोंसे विभूषित था। वह विचित्र ढंगकी कन्दराओंसे युक्त था। उन गुफाओंमें मनको लुभानेवाले गृह बने थे। वहाँ घनेरूपमें कल्पवृक्ष उगे हुए थे, जिनपर पक्षिसमूह निवास करते थे। वहाँ पहुँचकर गिरिराजकुमारी पार्वतीेने एक विशाल शाखाओंवाले वृक्षको देखा, जो हरे-हरे पत्तोंसे सुशोभित था। वह छहों ऋतुओंके पुष्पोंसे युक्त, सैकड़ों मनोरथोंकी भाँति उज्ज्वल, नाना प्रकारके पुष्पोंसे आच्छादित और अनेकविध फलोंसे लदा हुआ था। सूर्यकी किरणें उसके सघन पल्लवोंका भेदन कर नीचेतक नहीं पहुँच पाती थीं। उसी वृक्षके नीचे पार्वतींने अपने आभूषणों और वस्त्रोंको उतारकर मूँजकी मेखला और दिव्य वल्कलवस्त्रोंसे अपने शरीरको ढक लिया (और वे तपस्यामें निरत हो गयीं)। |
| ६२६ | * मत्स्यपुराण * |
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| त्रिःस्नाता पाटलाहारा बभूव शरदां शतम्।<br>शतमेकेन शीर्णेन पर्णेनावर्तयत् तदा॥ ३०९<br><br>निराहारा शतं साभूत् समानां तपसां निधिः।<br>तत उद्वेजिताः सर्वे प्राणिनस्तत्तपोऽग्निना॥ ३१० | उन्होंने प्रथम सौ वर्ष त्रिकाल स्नान और पाटल वृक्षके पत्तोंका भोजन करके बिताया। फिर दूसरे सौ वर्षोंतक वे एक सूखा पत्ता चबाकर जीवननिर्वाह करती रहीं और पुनः सौ वर्षोंतक निराहार रहकर तपस्यामें संलग्न रहीं। उस प्रकार वे तपस्याकी निधि बन गयीं। फिर तो उनकी तपस्याजन्य अग्निसे सभी प्राणी उद्विग्न हो उठे॥ ३०९-३१०॥ | | ततः सस्मार भगवान् मुनीन् सप्त शतक्रतुः।<br>ते समागम्य मुनयः सर्वे समुदितास्ततः॥ ३११<br><br>पूजिताश्च महेन्द्रेण पप्रच्छुस्तं प्रयोजनम्।<br>किमर्थं तु सुरश्रेष्ठ संस्मृतास्तु वयं त्वया॥ ३१२<br><br>शक्रः प्रोवाच शृण्वन्तु भगवन्तः प्रयोजनम्।<br>हिमाचले तपो घोरं तप्यते भूधरात्मजा।<br>तस्या ह्यभिमतं कामं भवन्तः कर्तुमर्हथ॥ ३१३<br><br>ततः समापतन् देव्या जगदर्थं त्वरान्विताः।<br>तथेत्युक्त्वा तु शैलेन्द्रं सिद्धसंघातसेवितम्॥ ३१४<br><br>ऊचुरागत्य मुनयस्तामथो मधुराक्षरम्।<br>पुत्रि किं ते व्यवसितः कामः कमललोचने॥ ३१५<br><br>तानुवाच ततो देवी सलज्जा गौरवान्मुनीन्।<br>तपस्यतो महाभागाः प्राप्य मौनं भवादृशान्॥ ३१६<br><br>वन्दनाय नियुक्ता धीः पावयत्यविकल्पितम्।<br>प्रश्नोन्मुखत्वाद् भवतां युक्तमासनमादितः॥ ३१७<br><br>उपविष्टाः श्रमोन्मुक्तास्ततः प्रक्ष्यथ मामतः।<br>इत्युक्त्वा सा ततश्चक्रे कृतासनपरिग्रहान्॥ ३१८<br><br>सा तु तान् विधिवत् पूज्यान् पूजयित्वा विधानतः।<br>उवाचादित्यसंकाशान् मुनीन् सप्त सती शनैः॥ ३१९ | तदनन्तर ऐश्वर्यशाली इन्द्रने सातों मुनियोंका स्मरण किया। स्मरण करते ही वे सभी मुनि हर्षपूर्वक वहाँ उपस्थित हो गये। तब महेन्द्रद्वारा पूजित होनेपर उन्होंने इन्द्रसे अपना स्मरण किये जानेका प्रयोजन पूछते हुए कहा—'सुरश्रेष्ठ! किसलिये आपने हमलोगोंका स्मरण किया है?' यह सुनकर इन्द्रने कहा—'ऋषिगण! आपलोग मेरे उस प्रयोजनको श्रवण करें। हिमाचलकी कन्या पार्वती हिमालय पर्वतपर घोर तपका अनुष्ठान कर रही है। आपलोग उनकी अभीष्ट कामनाको पूर्ण करें।' तत्पश्चात् 'तथेति—बहुत अच्छा' यो कहकर जगत्का कल्याण करनेके लिये (अरुन्धतीसहित सभी) मुनिगण शीघ्र ही सिद्धसमूहोंसे सेवित हिमालयके शिखरपर पार्वती देवीके निकट पहुँचे। वहाँ पहुँचकर मुनियोंने पार्वतीसे मधुर वाणीमें पूछा—'कमलके समान नेत्रोंवाली पुत्रि! तुम अपना कौन-सा मनोरथ सिद्ध करना चाहती हो?' तब गौरववश लजाती हुई पार्वती देवीने उन मुनियोंसे कहा—'महाभाग मुनिगण! यद्यपि तपस्या करते समय मैंने मौनका नियम ले रखा था, तथापि आप-जैसे महापुरुषोंकी वन्दना करनेके लिये मेरी बुद्धि उत्सुक हो उठी है, जो निश्चय ही मुझे पावन बना रही है। प्रश्न पूछनेसे पूर्व आपलोगोंके लिये आसन ग्रहण कर लेना ही उपयुक्त है, अतः पहले आसनपर बैठिये, थकावटको दूर कीजिये, तत्पश्चात् मुझसे पूछिये।' ऐसा कहकर पार्वतीने उन पूजनीयोंको आसनपर विराजमान किया और विधि-विधानपूर्वक उनकी पूजा की। तत्पश्चात् सती धीमे स्वरमें सूर्यके समान तेजस्वी उन सप्तर्षियोंसे कहने लगीं॥ ३११-३१९॥ | | त्यक्त्वा व्रतात्मकं मौनं मौनं जग्राह ह्रीमयम्।<br>भावं तस्यास्तु मौनान्तं तस्याः सप्तर्षयो यथा॥ ३२०<br><br>गौरवाधीनतां प्राप्ताः पप्रच्छुस्तां पुनस्तथा।<br>सापि गौरवगर्भेण मनसा चारुहासिनी॥ ३२१ | उस समय उन्होंने व्रतसम्बन्धी मौनका त्याग कर लज्जामय मौन ग्रहण कर लिया था, जिससे उनका भाव मौन-दशामें परिणत हो गया था। तब सप्तर्षियोंने गौरवके अधीन हुई पार्वतीसे उस प्रयोजनके विषयमें पुनः प्रश्न किया। तदुपरान्त सुन्दर मुस्कानवाली पार्वती ने गौरवपूर्ण |
| * अध्याय १५४ * | ६२७ |
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| मुनीञ्शान्तकथालापान् प्रेक्ष्य प्रोवाच वाग्यमम्।<br>भगवन्तो विजानन्ति प्राणिनां मानसं हितम्॥ ३२२<br><br>मनोगतीभिरत्यर्थं कन्दर्प्यन्ते हि देहिनः।<br>केचित्तु निपुणास्तत्र घटन्ते विबुधोद्यमैः॥ ३२३<br><br>उपायैर्दुर्लभान् भावान् प्राप्नुवन्ति ह्यतन्द्रिताः।<br>अपरे तु परिच्छिन्ना नानाकाराभ्युपक्रमाः॥ ३२४<br><br>देहान्तरार्थमारम्भमाश्रयन्ति हितप्रदम्।<br>मम त्वाकाशसम्भूतपुष्पदामविभूषितम्॥ ३२५<br><br>वन्ध्या सुतं प्राप्तुकामा मनः प्रसरते मुहुः।<br>अहं किल भवं देवं पतिं प्राप्तुं समुद्यता॥ ३२६<br><br>प्रकृत्यैव दुराधर्षं तपस्यन्तं तु सम्प्रति।<br>सुरासुरैरनिर्णीतपरमार्थक्रियाश्रयम् ॥ ३२७<br><br>साम्प्रतं चापि निर्दग्धमदनं वीतरागिणम्।<br>कथमाराधयेदीशं मादृशी तादृशं शिवम्॥ ३२८<br><br>इत्युक्ता मुनयस्ते तु स्थिरतां मनसस्ततः।<br>ज्ञातुमस्या वचः प्रोचुः प्रक्रमात् प्रकृतार्थकम्॥ ३२९<br><br><center>मुनय ऊचुः</center><br>द्विविधं तु सुखं तावत् पुत्रि लोकेषु भाव्यते।<br>शरीरस्यास्य सम्भोगैश्चेतसश्चापि निर्वृतिः॥ ३३०<br><br>प्रकृत्या स तु दिग्वासा भीमः पितृवनेशयः।<br>कपाली भिक्षुको नग्नो विरूपाक्षः स्थिरक्रियः॥ ३३१<br><br>प्रमत्तोन्मत्तकाकारो बीभत्सकृतसंग्रहः।<br>यतिना तेन कस्तेऽर्थो मूर्तानर्थेन काङ्क्षितः॥ ३३२<br><br>यदि ह्यस्य शरीरस्य भोगमिच्छसि साम्प्रतम्।<br>तत् कथं ते महादेवाद्भवभाजो जुगुप्सितात्॥ ३३३<br><br>स्रवद्रक्तवसाभ्यक्तकपालकृतभूषणात् ।<br>श्वसदुग्रभुजगेन्द्रकृतभूषणभीषणात् ॥ ३३४<br><br>श्मशानवासिनो रौद्रप्रमथानुगतात् सति। | मनसे मुनियोंको शान्तरूपसे वार्तालाप करते देखकर वाणीपर संयम रखते हुए इस प्रकार कहा—'महर्षियो! आपलोग तो प्राणियोंके मानस हितको भलीभाँति जानते हैं। शरीरधारी प्राणी प्रायः अपने मनोगत भावोंके कारण ही अत्यधिक कष्टका अनुभव करते हैं। उनमें कुछ लोग ऐसे निपुण हैं, जो आलस्यरहित हो दैवी उपायोंद्वारा प्रयत्न करते हैं और दुर्लभ विषयोंको प्राप्त कर लेते हैं। दूसरे कुछ लोग ऐसे हैं, जो परिमित एवं नाना प्रकारके उपायोंसे युक्त हैं। वे देहान्तरको ही हितप्रद मानकर उसके लिये कार्यारम्भ करते हैं। परंतु मेरा मन आकाशमें उत्पन्न हुए पुष्पोंकी मालासे विभूषित वन्ध्या पुत्रको प्राप्त करनेके लिये बारंबार प्रयास कर रहा है। मैं निश्चितरूपसे भगवान् शङ्करको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये उद्यत हूँ। वे एक तो स्वभावसे ही दुराराध्य हैं, दूसरे इस समय तो वे तपस्यामें निरत हैं। सुर अथवा असुर कोई भी अबतक उनकी परमार्थ-क्रियाका निर्णय नहीं कर सका। अभी-अभी हालमें ही वे कामदेवको जलाकर वीतरागी तपस्वी बन गये हैं। भला मुझ-जैसी अबला वैसे कल्याणकारी शिवकी आराधना कैसे कर सकती है।' इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनिगण पार्वतीके मनकी स्थिरताका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये क्रमशः उसी विषयपर पुनः बोले॥ ३२०–३२९॥<br><br>मुनियोंने कहा—'बेटी! लोकोंमें दो प्रकारके सुख बतलाये जाते हैं—एक तो इस शरीरके सम्भोगोंद्वारा और दूसरा मनकी (विषयभोगोंसे) निवृत्तिद्वारा प्राप्त होता है। शङ्करजी तो स्वभावसे ही दिगम्बर, विकृत वेषधारी, पितृवनमें शयन करनेवाले, कपालधारी, भिक्षुक, नग्न, विकृत नेत्रोंवाले और उद्यमहीन हैं। उनका आकार मतवाले पागलोंकी तरह है। वे घृणित वस्तुओंका ही संग्रह करते हैं। वे एकदम अनर्थकी मूर्ति हैं। ऐसे संन्यासीसे तुम अपना कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करना चाहती हो? यदि तुम इस समय इस शरीरके भोगकी इच्छा करती हो तो भला उन भयावने एवं निन्दित महादेवसे तुम्हें उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है; उनके तो चूते हुए रक्त और मज्जासे चुपड़े हुए कपाल ही भूषण हैं। वे फुफकारते हुए विषैले सर्पराजोंका आभूषण धारण करनेके कारण बड़े भीषण दीख पड़ते हैं, सदा श्मशानमें निवास करते हैं और भयंकर प्रमथगण उनके अनुचर हैं॥ ३३०–३३४ १/२ ॥ |
| ६२८ | * मत्स्यपुराण * |
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| सुरेन्द्रमुकुटव्रातनिघृष्टचरणोऽरिहा ॥ ३३५<br><br>हरिरस्ति जगद्धाता श्रीकान्तोऽनन्तमूर्तिमान्।<br>नाथो यज्ञभुजामस्ति तथेन्द्रः पाकशासनः ॥ ३३६<br><br>देवतानां निधिश्चास्ति ज्वलनः सर्वकामकृत्।<br>वायुरस्ति जगद्धाता यः प्राणः सर्वदेहिनाम् ॥ ३३७<br><br>तथा वैश्रवणो राजा सर्वार्थमतिमान् विभुः।<br>एभ्य एकतमं कस्मान्न त्वं सम्प्राप्तुमिच्छसि ॥ ३३८<br><br>उतान्यदेहसम्प्राप्त्या सुखं ते मनसेप्सितम्।<br>एवमेतत् तवाप्यत्र प्रभवो नाकम्पदाम्।<br>अस्मिन् नेह परत्रापि कल्याणप्राप्तयस्तव ॥ ३३९<br><br>पितुरेवास्ति तत् सर्वं सुरेभ्यो यन्न विद्यते।<br>अतस्तत्प्राप्तये क्लेशः स वाप्यत्राफलस्तव ॥ ३४०<br><br>प्रायेण प्रार्थितो भद्रे सुस्वल्पो ह्यतिदुर्लभः।<br>अस्य ते विधियोगस्य धाता कर्तात्र चैव हि ॥ ३४१ | इनसे तो कहीं अच्छे भगवान् विष्णु हैं, जिनके चरणोंपर प्रधान देवता अपने मुकुटसमूहोंको रगड़ते रहते हैं। जो शत्रुओंके संहारक, जगत्का पालन-पोषण करनेवाले, लक्ष्मीके पति और अनुपम शोभाशाली हैं। इसी प्रकार यज्ञभोजी देवताओंके स्वामी पाकशासन हैं। देवताओंके निधिस্বরূপ एवं समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अग्नि हैं। जगत्का पालन-पोषण करनेवाले वायु हैं, जो सभी शरीरधारियोंके प्राण हैं तथा विश्रवाके पुत्र राजाधिराज कुबेर हैं, जो बड़े ऐश्वर्यशाली, बुद्धिमान् और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके अधीश्वर हैं। तुम इनमेंसे किसी एकको प्राप्त करनेकी इच्छा क्यों नहीं कर रही हो? अथवा यदि तुमने अपने मनमें यह ठान लिया हो कि जन्मान्तरमें सुखकी प्राप्ति होगी तो वह भी तुम्हें स्वर्गवासी देवताओंसे ही प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार तुम्हें देवताओंके बिना इस जन्ममें अथवा जन्मान्तरमें कल्याणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। यदि अन्यान्य सुखदायक पदार्थोंको प्राप्त करना चाहती हो तो वे सब तुम्हारे पिताके पास ही इतने अधिक हैं, जो देवताओंके पास नहीं हैं; अतः उनकी प्राप्तिके हेतु तुम्हारा इस प्रकार कष्ट सहन करना व्यर्थ है। साथ ही भद्रे! प्रायः ऐसा देखा जाता है कि माँगी हुई वस्तुका मिलना अत्यन्त कठिन होता है और यदि मिल भी जाय तो बहुत थोड़ी ही मिलती है। इस कारण तुम्हारे इस मनोरथको ब्रह्मा ही पूर्ण कर सकते हैं (दूसरेकी शक्ति नहीं है) ॥ ३३५-३४१ ॥ | | सूत उवाच<br><br>इत्युक्ता सा तु कुपिता मुनिवर्यैषु शैलजा।<br>उवाच कोपरक्ताक्षी स्फुरद्भिर्दशनच्छदैः ॥ ३४२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! सप्तर्षियोंद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वती उन मुनियोंपर कुपित हो उठीं। उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और होंठ फड़कने लगे, तब वे बोलीं ॥ ३४२ ॥ | | देव्युवाच<br><br>असद्ग्रहस्य का नीतिर्नासनस्य क्व यन्त्रणा।<br>विपरीतार्थबोद्धारः सत्पथे केन योजिताः ॥ ३४३ | **देवीने कहा—**सप्तर्षियो! असद् वस्तुको ग्रहण करनेवालेके लिये नीति कैसी ? तथा दुर्व्यसनीके लिये व्यसनकी प्राप्तिमें कष्ट कहाँ ? (अर्थात् जिसमें जिसका मन आसक्त हो गया है, उसकी प्राप्तिके लिये उसे कितना ही कष्ट क्यों न झेलना पड़े, परंतु वह उसकी परवा नहीं करता।) अरे! विपरीत अर्थको जाननेवाले आपलोगोंको किसने सन्मार्गपर नियुक्त कर दिया? | | एवं मां वेत्थ दुष्प्रज्ञां ह्यस्थानासद्ग्रहप्रियाम्।<br>न मां प्रति विचारोऽस्ति ततोऽहङ्कारमानिनी ॥ ३४४ | आपलोग मुझे इस प्रकार दुष्ट बुद्धिवाली तथा अयुक्त एवं असद् वस्तुको ग्रहण करनेकी अभिलाषिणी मानते हैं, अतः आपलोगोंका विचार मेरे प्रति ठीक नहीं है। इसी कारण मेरे मनमें अहंकारपूर्वक मान उत्पन्न हो गया है। | | प्रजापतिसमाः सर्वे भवन्तः सर्वदर्शिनः। | यद्यपि आप सभी लोग प्रजापतिके समान समदर्शी हैं, |
| * अध्याय १५४ * | ६२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नूनं न वेत्थ तं देवं शाश्वतं जगतः प्रभुम्॥ ३४५<br>अजमीशानमव्यक्तममेयमहिमोदयम् ॥ ३४६<br><br>आस्तां तद्धर्मसद्भावसम्बोधस्तावदद्भुतः ।<br>विदुर्यं न हरिब्रह्मप्रमुखा हि सुरेश्वराः ॥ ३४७<br><br>यत्तस्य विभवात् स्वोत्थं भुवनेषु विजृम्भितम् ।<br>प्रकटं सर्वभूतानां तदप्यत्र न वेत्थ किम्॥ ३४८<br><br>कस्यैतद्गगनं मूर्तिः कस्याग्निः कस्य मारुतः ।<br>कस्य भूः कस्य वरुणः कश्चन्द्रार्कविलोचनः ॥ ३४९<br><br>कस्यार्चयन्ति लोकेषु लिङ्गं भक्त्या सुरासुराः ।<br>यं ब्रुवन्तीश्वरं देवा विधीन्द्राद्या महर्षयः ॥ ३५०<br><br>प्रभावं प्रभवं चैव तेषामपि न वेत्थ किम् । | तथापि उन महादेवके विषयमें आपलोगोंको निश्चय ही कुछ भी ज्ञात नहीं है। वे अविनाशी, जगत्के स्वामी, अजन्मा, शासक, अव्यक्त और अप्रमेय महिमावाले हैं। विष्णु और ब्रह्मा आदि सुरेश्वर भी जिन्हें नहीं जानते, उन महादेवके धर्म एवं सद्भावका जो अद्भुत ज्ञान आपलोग दे रहे हैं, उसे अब रहने दीजिये। जिसके विभवसे उत्पन्न हुआ चैतन्य सभी लोकोंमें फैला हुआ है और सभी प्राणियोंमें प्रत्यक्षरूपसे दृष्टिगोचर हो रहा है, उसे भी क्या आपलोग नहीं जानते। (भला सोचिये तो सही) यह आकाश, अग्नि, वायु, पृथ्वी और वरुण पृथक्-पृथकरूपसे किसकी मूर्ति हैं? चन्द्रमा और सूर्यको नेत्ररूपमें धारण करनेवाला कौन है? समस्त सुर एवं असुर लोकोंमें भक्तिपूर्वक किसके लिङ्गकी अर्चना करते हैं? ब्रह्मा एवं इन्द्र आदि देवता तथा महर्षिगण जिन्हें अपना ईश्वर मानते हैं, उन देवताओंके प्रभाव एवं उत्पत्तिको भी क्या आपलोग नहीं जानते?॥ ३४३—३५० १/२॥ |
| अदितिः कस्य मातेयं कस्माज्जातो जनार्दनः ॥ ३५१<br><br>अदितेः कश्यपाज्जाता देवा नारायणादयः ।<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रो ह्यदितिर्दक्षपुत्रिका ॥ ३५२<br><br>मरीचिश्चापि दक्षश्च पुत्रौ तौ ब्रह्मणः किल ।<br>ब्रह्मा हिरण्मयात्तवण्डाद्दिव्यसिद्धिविभूषितात् ॥ ३५३<br><br>कस्य प्रादुरभूद्ध्यानात्प्राकृतैः प्रकृतांशकात् ।<br>प्रकृतौ तु तृतीयायामम्बुजाजननक्रिया ॥ ३५४<br><br>जातः ससर्ज षड्वर्गान् बुद्धिपूर्वान्स्वकर्मजान् ।<br>अजातकोऽभवद्द्वेधा ब्रह्माण्डोऽव्यक्तजन्मनः ॥ ३५५<br><br>यः स्वयोगेन संक्षोभ्य प्रकृतिं कृतवानिदम् ।<br>ब्रह्मणः सिद्धसर्वार्थमैश्वर्यं लोककर्तृताम् ॥ ३५६<br><br>विदुर्विष्णुवादयो यच्च स्वमहिम्ना सदैव हि ।<br>कृत्वान्यं देहमन्यादृक् तादृक् कृत्वा पुनर्हरिः ॥ ३५७<br><br>कुरुते जगतः कृत्यमुत्तमाधममध्यमम् ।<br>एवमेव हि संसारो यो जन्ममरणात्मकः ॥ ३५८<br><br>कर्मणश्च फलं ह्येतन्नानारूपसमुद्भवम् । | (यदि नहीं जानते तो सुनिये—) ये अदिति किसकी माता हैं और विष्णु किससे उत्पन्न हुए हैं? ये नारायण आदि सभी देवता कश्यप और अदितिसे ही उत्पन्न हुए हैं। वे कश्यप महर्षि मरीचिके पुत्र हैं और अदिति प्रजापति दक्षकी पुत्री हैं। ये दोनों मरीचि और दक्ष भी ब्रह्माके पुत्र हैं और ब्रह्मा दिव्य सिद्धिसे विभूषित हिरण्मय अण्डसे प्रकट हुए हैं। उनका प्रादुर्भाव किसके ध्यानसे हुआ था? (अर्थात् ब्रह्माके आविर्भावके कारण महादेव ही हैं।) ब्रह्मा प्राकृत गुणोंके संयोगसे प्रकृतिके अंशसे तृतीय-प्रकृतिमें कमलपर उत्पन्न हुए थे। जन्म लेते ही उन्होंने बुद्धिपूर्वक अपने कर्मवश उत्पन्न होनेवाले षड्वर्गोंकी सृष्टि की। इस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्मासे उत्पन्न होनेके कारण ब्रह्मा अजन्मा कहलाये, जिन्होंने अपने योगबलसे प्रकृतिको संक्षुब्ध कर इस जगत्की रचना की। विष्णु आदि सभी देवता अपनी महिमासे सदासे ही ब्रह्माकी सर्वार्थसिद्धि, ऐश्वर्य और लोकरचनाको जानते हैं। पुनः श्रीहरि युगानुसार विभिन्न प्रकारका शरीर धारण कर जगत्के उत्तम, मध्यम और अधम कर्मोंका सम्पादन करते हैं। जन्म-मृत्युरूप संसारकी यही स्थिति हैं और अनेक रूपोंमें उत्पन्न हुए कर्मोंका भी यही फल है॥ ३५१—३५८ १/२॥ |
६३० * मत्स्यपुराण *
| अथ नारायणो देवः स्वकां छायां समाश्रयत् ॥ ३५९<br><br>तत्प्रेरितः प्रकुरुते जन्म नानाप्रकारकम्।<br>सापि कर्मण एवोक्ता प्रेरणा विवशात्मनाम् ॥ ३६०<br><br>यथोन्मादादिजुष्टस्य मतिरेव हि सा भवेत्।<br>इष्टान्येव यथार्थानि विपरीतानि मन्यते ॥ ३६१<br><br>लोकस्य व्यवहारेषु सृष्टेषु सहते सदा।<br>धर्माधर्मफलावाप्तौ विष्णुरेव निबोधितः ॥ ३६२<br><br>अथानादित्वमस्यास्ति सामान्यात्तु तदात्मना।<br>न हास्य जीवितं दीर्घं दृष्टं देहे तु कुत्रचित् ॥ ३६३<br><br>भवद्भिर्र्यस्य नो दृष्टमन्तमग्रमथापि वा।<br>देहिनां धर्म एवैष क्वचिज्जायेत क्वचिन्मियेत् ॥ ३६४<br><br>क्वचिद्गर्भगतो नश्येत्क्वचिज्जीवेज्जरामयः।<br>क्वचित्समाः शतं जीवेत् क्वचिद्बाल्ये विपद्यते ॥ ३६५<br><br>शतायुः पुरुषो यस्तु सोऽनन्तः स्वल्पजन्मनः।<br>जीवितो न म्रियत्यग्रे तस्मात् सोऽमर उच्यते ॥ ३६६<br><br>अदृष्टजन्मनिधना ह्येवं विष्ण्वादयो मताः।<br>एतत् संशुद्धमैश्वर्यं संसारे को लभेदिह ॥ ३६७<br><br>तत्र क्षयादियोगात् तु नानाश्रर्यस्वरूपिणि।<br>तस्माद्विश्वसृरान् सर्वान् मलिनान् स्वल्पभूतिकान् ॥ ३६८<br><br>नाहं भद्राः किलेच्छामि ऋते शर्वात् पिनाकिनः।<br>स्थितं च तारतम्येन प्राणिनां परमं त्विदम् ॥ ३६९<br><br>धीबलैश्वर्यकार्यादिप्रमाणं महतां महत्।<br>यस्मान्न कश्चिदपरं सर्वे यस्मात् प्रवर्तते ॥ ३७०<br><br>यस्यैश्वर्यमनाद्यन्तं तमहं शरणं गता।<br>एष मे व्यवसायश्च दीर्घोऽतिविपरीतकः ॥ ३७१<br><br>यात वा तिष्ठतैवाथ मुनयो मद्विधायकाः।<br>एवं निशम्य वचनं देव्या मुनिवरास्तदा ॥ ३७२<br><br>आनन्दाश्रुपरीताक्षाः सस्वजुस्तां तपस्विनीम्।<br>ऊचुश्च परमप्रीताः शैलजां मधुरं वचः ॥ ३७३ | तदनन्तर भगवान् नारायण अपनी छायाका आश्रय ग्रहण करते हैं और उससे प्रेरित हो नाना प्रकारका जन्म धारण करते हैं। वह प्रेरणा भी भाग्याधीन प्राणियोंके कर्मके अनुरूप ही कही गयी है, जो उन्माद आदिसे युक्त पुरुषकी बुद्धि-जैसी होती है; क्योंकि वह अपनी यथार्थ इष्ट वस्तुओंको भी विपरीत ही मानता है और सदा लोकके लिये रचे गये व्यवहारोंमें कष्ट भोगता है। इस प्रकार धर्म और अधर्मके फलकी प्राप्तिमें विष्णु ही कारण माने गये हैं। यद्यपि विष्णुको सामान्यतया आत्मरूपसे अनादि माना जाता है, तथापि उनका किसी भी देहमें दीर्घ जीवन नहीं देखा गया। आपलोग भी उनके आदि-अन्तको नहीं जानते, किंतु देहधारियोंका यह धर्म है कि वे कहीं जन्म लेते हैं तो मरते कहीं हैं। कहीं गर्भमें ही नष्ट हो जाते हैं तो कहीं बुढ़ापा और रोगसे ग्रस्त होकर भी जीवित रहते हैं। कोई सौ वर्षोंतक जीवित रहता है तो कोई बचपनमें ही कालके गालमें चला जाता है। जिस पुरुषकी आयु सौ वर्षकी होती है, वह थोड़ी आयुवालेकी अपेक्षा अनन्त आयुवाला कहा जाता है। सदा जीवित रहते हुए जो आगे चलकर मृत्युको नहीं प्राप्त होता, उसे अमर कहा जाता है। इस तरह विष्णु आदि देवगण भी प्रारब्ध, जन्म और मृत्युसे युक्त माने गये हैं। भला, जो विनाश आदिके संयोगसे नाना प्रकारके आश्चर्यमय स्वरूपोंसे युक्त है, उस संसारमें ऐसा विशुद्ध ऐश्वर्य किसको प्राप्त हो सकता है? अतः भद्रपुरुषो! मैं पिनाकधारी शङ्करजीके अतिरिक्त इन सभी मलिन एवं स्वल्प विभूतिवाले देवताओंको नहीं वरण करना चाहती। प्राणियोंकी यह उत्कृष्टता तो क्रमशः चली ही आ रही है, किंतु जो महापुरुष हैं, उनके बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और कार्यका प्रमाण भी विशाल होता है। अतः जिन शङ्करजीसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है और जहाँ पहुँचकर सभी समाप्त हो जाते हैं तथा जिनका ऐश्वर्य आदि-अन्तसे रहित है, मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है। मेरा यह व्यवसाय अत्यन्त महान् तथा विचित्र है। मेरे कल्याणका विधान करनेवाले मुनियो! अब आपलोग चाहे चले जायें अथवा ठहरें, यह आपकी इच्छापर निर्भर है। पार्वती देवीके ऐसे वचन सुनकर उन मुनिवरोंकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। तब उन्होंने उस तपस्विनी कन्याको गले लगाया। फिर वे परम प्रसन्न होकर पार्वतीसे मधुर वाणीमें बोले॥ ३५९-३७३॥ |
| * अध्याय १५४ * | ६३१ |
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| ऋषय ऊचुः<br><br>अत्यद्भुतास्यहो पुत्रि ज्ञानमूर्तिरिवामला।<br>प्रसादयति नो भावं भवभावप्रतिश्रयात्॥ ३७४<br><br>न तु विद्मो वयं तस्य देवस्यैश्वर्यमद्भुतम्।<br>त्वन्निश्चयस्य दृढतां वेत्तुं वयमिहागताः॥ ३७५<br><br>अचिरादेव तन्वङ्गि कामस्तेऽयं भविष्यति।<br>क्वादित्यस्य प्रभा याति रत्नेभ्यः क्व द्युतिः पृथक्॥ ३७६<br><br>कोऽर्थो वर्णालिकाव्यक्तः कथं त्वं गिरिशं विना।<br>यामो नैकाभ्युपायेन तमभ्यर्थयितुं वयम्॥ ३७७<br><br>अस्माकमपि वै सोऽर्थः सुतरां हृदि वर्तते।<br>अतस्त्वमेव सा बुद्धिर्यतो नीतिस्त्वमेव हि॥ ३७८<br><br>अतो निःसंशयं कार्यं शङ्करोऽपि विधास्यति।<br>इत्युक्त्वा पूजिता याता मुनयो गिरिकन्यया॥ ३७९<br><br>प्रययुर्गिरिशं द्रष्टुं प्रस्थं हिमवतो महत्।<br>गङ्गाम्बुप्लावितात्मानं पिङ्गबद्धजटासटम्॥ ३८०<br><br>भृङ्गानुयातपाणिस्थमन्दारकुसुमस्त्रजम् ।<br>गिरेः सम्प्राप्य ते प्रस्थं ददृशुः शङ्कराश्रमम्॥ ३८१<br><br>प्रशान्ताशेषसत्त्वौघं नवस्तिमितकाननम्।<br>निःशब्दाक्षोभसलिलप्रपानं सर्वतोदिशम्॥ ३८२<br><br>तत्रापश्यंस्ततो द्वारि वीरकं वेत्रपाणिनम्।<br>सम ते मुनयः पूज्या विनीताः कार्यगौरवात्॥ ३८३<br><br>ऊचुर्मधुरभाषिण्या वाचा ते वाग्मिनां वराः।<br>द्रष्टुं वयमिहायाताः शरण्यं गणनायकम्॥ ३८४<br><br>त्रिलोचनं विजानीहि सुरकार्यप्रचोदिताः।<br>त्वमेव नो गतिस्तत्त्वं यथा कालानतिक्रमः॥ ३८५<br><br>सा प्रार्थनैषा प्रायेण प्रतीहारमयः प्रभुः।<br>इत्युक्तो मुनिभिः सोऽथ गौरवात् तानुवाच सः॥ ३८६ | **ऋषियोंने कहा—**पुत्रि! तुम तो अत्यन्त अद्भुत निर्मल ज्ञानकी मूर्ति-जैसी प्रतीत हो रही हो। अहो! शङ्करजीके भावसे भावित तुम्हारा भाव हमलोगोंको परम आनन्दित कर रहा है। शैलजे! उन देवाधिदेव शङ्करके इस अद्भुत ऐश्वर्यको हमलोग नहीं जानते हों— ऐसी बात नहीं है, अपितु हमलोग तुम्हारे निश्चयकी दृढ़ता जाननेके लिये यहाँ आये हैं। तन्वङ्गि! शीघ्र ही तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा। भला, सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कहीं जा सकती है? रत्नोंकी कान्ति रत्नोंसे पृथक् होकर कहीं ठहर सकती है? तथा अक्षरसमूहोंसे प्रकट होनेवाला अर्थ अक्षरोंसे अलग कहीं रह सकता है? उसी प्रकार तुम शङ्करजीके बिना कैसे रह सकती हो। अच्छा, अब हमलोग अनेकों उपायोंद्वारा शङ्करजीसे प्रार्थना करनेके निमित्त जा रहे हैं; क्योंकि हमलोगोंके हृदयमें भी वही प्रयोजन निश्चित-रूपसे वर्तमान है। उसकी सिद्धिके लिये तुम्हीं वह बुद्धि और नीति हो। अतः शङ्करजी भी निःसंदेह उस कार्यका विधान करेंगे। ऐसा कहकर गिरिराजकुमारीद्वारा पूजित हो वे मुनिगण वहाँसे चल पड़े। तदनन्तर जो अपने शरीरको गङ्गा-जलसे आप्लावित करते हैं, जिनके मस्तकपर पीली जटा बँधी रहती है तथा जिनके गलेमें पड़ी हुई मन्दार-पुष्पोंकी माला हथेलीतक लटकती रहती है, जिसपर भँवरे मँडराते रहते हैं, उन शङ्करजीका दर्शन करनेके लिये वे सप्तर्षि हिमालयके विशाल शिखरकी ओर प्रस्थित हुए। हिमालयके उस शिखरपर पहुँचकर उन्होंने शङ्करजीके आश्रमको देखा। उस आश्रममें सम्पूर्ण प्राणिसमूह शान्तरूपसे बैठे हुए थे। वहाँका नूतन कानन भी शान्त था। चारों दिशाओंमें शब्दरहित एवं स्वच्छन्दगतिसे प्रवाहित होनेवाले जलसे युक्त झरने झर रहे थे। उस आश्रमके द्वारपर उन पूज्य एवं विनीत सप्तर्षियोंने हाथमें बेंत धारण किये वीरकको देखा। तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ वे सप्तर्षि कार्यके गौरववश वीरकसे मधुर वाणीमें बोले—'द्वारपाल! ऐसा समझो कि हमलोग देवकार्यसे प्रेरित होकर यहाँ शरणदाता एवं गणनायक त्रिनेत्रधारी भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये आये हैं। इस विषयमें तुम्हीं हमलोगोंके साधन हो। इसलिये हमलोगोंकी यह प्रार्थना है कि ऐसा उपाय करो, जिससे हमलोगोंका कालातिक्रम न हो; क्योंकि स्वामियोंकी सूचना तो प्रायः द्वारपालसे ही मिलती है।' मुनियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वीरकने गौरववश उनसे कहा— |
६३२ * मत्स्यपुराण *
| समन्वास्यापरां संध्यां स्नातुं मन्दाकिनीजलैः।<br>क्षणेन भविता विप्रास्तत्र द्रक्ष्यथ शूलिनम्॥ ३८७ | 'विप्रवरो! अभी-अभी दोपहरकी संध्या समाप्त कर शङ्करजी मन्दाकिनीके जलमें स्नान करनेके लिये गये हैं, अतः क्षणभर ठहरिये, फिर आपलोग उन त्रिशूलधारीका दर्शन कीजियेगा।' इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनिगण उस कालकी प्रतीक्षा करते हुए उसी प्रकार खड़े रहे, जैसे वर्षा-ऋतुमें प्यासे चातक जलसे भरे हुए बादलकी ओर टकटकी लगाये रहते हैं॥ ३७४—३८८॥ |
| इत्युक्ता मुनयस्तस्थुस्ते तत्कालप्रतीक्षिणः।<br>गम्भीराम्बुधरं प्रावृत्तृषिताश्चातका यथा॥ ३८८ | |
| ततः क्षणेन निष्पन्नसमाधानक्रियाविधिः।<br>वीरासनं बिभेदेशो मृगचर्मनिवासनम्॥ ३८९ | तत्पश्चात् थोड़ी देर बाद जब समाधि सम्पन्न करके शङ्करजी मृगचर्मपर लगाये हुए वीरासनको छोड़कर उठे, तब वीरकने विनम्र भावसे पृथ्वीपर घुटने टेककर प्रणाम करते हुए महादेवजीसे कहा—'विभो! प्रचण्ड तेजस्वी सप्तर्षि आपका दर्शन करनेके लिये आये हुए हैं। उन्हें दर्शन करनेके लिये आदेश दीजिये अथवा इस विषयमें आप जैसा उचित समझें। उनके मनमें आपके दर्शनकी लालसा है और वे कह रहे हैं कि हमलोग देवकार्यसे आये हुए हैं।' तब उस महात्मा वीरकद्वारा इस प्रकार सूचित किये जानेपर जटाधारी शङ्करने भौंहोंके संकेतसे उन लोगोंके लिये प्रवेशाज्ञा प्रदान की। फिर तो वीरकने भी समीपमें ही स्थित उन सभी मुनियोंको सिर हिलाकर संकेतसे पिनाकधारी शङ्करका दर्शन करनेके लिये बुलाया। यह देखकर उतावलीवश आधी बँधी हुई शिखावाले एवं मृगचर्मरूपी वस्त्रको लटकाये हुए वे मुनिलोग शङ्करजीकी विभूतिसे सिद्ध हुई वेदीमें प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने बँधी हुई अञ्जलि तथा दोनेमें रखे हुए स्वर्गीय पुष्पसमूहोंको स्वर्गवासियोंद्वारा वन्दनीय शिवजीके दोनों चरणोंपर बिखेरकर नमस्कार किया। तब त्रिशूलधारी शङ्करने उन शान्तस्वभाव मुनियोंकी ओर स्नेहभरी दृष्टिसे देखा। इस प्रकार सत्कृत होनेसे प्रसन्न हुए ऋषिगण कामदेवके शत्रु भगवान् शङ्करकी सम्यक् प्रकारसे स्तुति करने लगे॥ ३८९—३९६॥ |
| ततो विनीतो जानुभ्यामवलम्ब्य महीस्थितिम्।<br>उवाच वीरको देवं प्रणामैकसमाश्रयः॥ ३९० | |
| सम्प्राप्ता मुनयः सप्त द्रष्टुं त्वां दीप्ततेजसः।<br>विभो समादिश द्रष्टुमवगन्तुमिहार्हसि।<br>तेऽब्रुवन् देवकार्येण तव दर्शनलालसाः॥ ३९१ | |
| इत्युक्तो धूर्जटिस्तेन वीरकेण महात्मना।<br>भूभङ्गसंज्ञया तेषां प्रवेशाज्ञां ददौ तदा॥ ३९२ | |
| मूर्धकम्पेन तान् सर्वान् वीरकोऽपि महामुनीन्।<br>आजुहावाविदूरस्थान् दर्शनाय पिनाकिनः॥ ३९३ | |
| त्वराबद्धार्धचूडास्ते लम्बमानाजिनाम्बराः।<br>विविशुर्वेदिकों सिद्धां गिरिशस्य विभूतिभिः॥ ३९४ | |
| बद्धपाणिपुटाक्षीमनाकपुष्पोत्करास्ततः ।<br>पिनाकिपादयुगलं वन्द्यं नाकनिवासिनाम्॥ ३९५ | |
| ततः स्निग्धेक्षिताः शान्ता मुनयः शूलपाणिना।<br>मन्मथारिं ततो हृष्टाः सम्यक् तुष्टुवुरादृताः॥ ३९६ | |
| मुनय ऊचुः<br>अहो कृतार्था वयमेव साम्प्रतं<br>सुरेश्वरोऽप्यत्र पुरो भविष्यति।<br>भवत्प्रसादामलवारिसेकतः<br>फलेन काचित् तपसा नियुज्यते॥ ३९७ | **मुनियोंने कहा—**अहो भगवन्! इस समय हमलोग तो कृतार्थ हो ही गये, आगे चलकर देवराज इन्द्र भी सफलमनोरथ होंगे। इसी प्रकार आपकी कृपारूपी निर्मल जलके सिंचनसे कोई तपस्विनी भी अपनी तपस्याके फलसे युक्त होगी। |