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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
२१२* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अष्टावात्मगुणाः प्रोक्ताः पुराणस्य तु कोविदैः ।<br>अयमेव क्रियायोगो ज्ञानयोगस्य साधकः ॥ ११<br><br>कर्मयोगं विना ज्ञानं कस्यचिन्नेह दृश्यते ।<br>श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममुपतिष्ठेत् प्रयत्नतः ॥ १२<br><br>देवतानां पितॄणां च मनुष्याणां च सर्वदा ।<br>कुर्यादहरहर्यज्ञैर्भूतर्षिगणतर्पणम् ॥ १३<br><br>स्वाध्यायैरर्चयेच्चर्षीन् होमैर्विद्वान् यथाविधि ।<br>पितॄञ्छ्राद्धैरन्नदानैर्भूतानि बलिकर्मभिः ॥ १४<br><br>पञ्चैते विहिता यज्ञाः पञ्चसूनापनुत्तये ।<br>कण्डनी पेषणी चुल्ली जलकुम्भी प्रमार्जनी ॥ १५<br><br>पञ्च सूना गृहस्थस्य तेन स्वर्गं न गच्छति ।<br>तत्पापनाशनायामी पञ्च यज्ञाः प्रकीर्तिताः * ॥ १६रहना—पुराणोंके ज्ञाता विद्वानोंद्वारा ये आठ आत्मगुण बतलाये गये हैं। यही कर्मयोग ज्ञानयोगका साधक है। जगत्‌में कर्मयोगके बिना किसीको ज्ञानकी प्राप्ति हुई हो, ऐसा नहीं देखा गया है; इसलिये श्रुतियों एवं स्मृतियोंद्वारा कहे गये धर्मका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। प्रतिदिन सर्वदा देवताओं, पितरों और मनुष्योंको यज्ञोंद्वारा तृप्त करना चाहिये। साथ ही पितरों और ऋषियोंके तर्पणका कार्य भी कर्तव्य है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह स्वाध्यायद्वारा देवताओंकी, हवनद्वारा ऋषियोंकी, श्राद्धद्वारा पितरोंकी, अन्नद्वारा अतिथियोंकी तथा बलिकर्मद्वारा मृत प्राणियोंकी विधिपूर्वक अर्चना करे। गृहस्थोंके घरमें जीवहिंसाके पाँच प्रकारके स्थानोंपर घटित हुए पापकी निवृत्तिके लिये इन पाँच प्रकारके यज्ञोंका विधान बतलाया गया है। गृहस्थके घरमें जीवहिंसाके पाँच स्थान ये हैं—कण्डनी (वस्तुओंके कूटनेका पात्र ओखली, खरल आदि), पेषणी (पीसनेका उपकरण चक्की, सिलवट आदि), चुल्ली (चूल्हा), जलकुम्भी (पानी रखे जानेवाले घड़े) और प्रमार्जनी (झाडू आदि)। इन स्थानोंपर उत्पन्न हुए पापके कारण गृहस्थ पुरुष स्वर्ग नहीं जा सकता, अतः उन पापोंके विनाशके लिये ये पाँचों यज्ञ बतलाये गये हैं॥ ५—१६॥
द्वात्रिंशच्च तथाष्टौ च ये संस्काराः प्रकीर्तिताः ।<br>तद्युक्तोऽपि न मोक्षाय यस्त्वात्मगुणवर्जितः ॥ १७<br><br>तस्मादात्मगुणोपेतः श्रुतिकर्म समाचरेत् ।<br>गोब्राह्मणानां वित्तेन सर्वदा भद्रमाचरेत् ॥ १८द्विजातियोंके लिये जो चालीस प्रकारके संस्कार बतलाये गये हैं, उनसे संस्कृत होनेपर भी जो मनुष्य (उपर्युक्त आठ) आत्मगुणोंसे रहित है, वह मोक्षका भागी नहीं हो सकता। इसलिये आत्मगुणोंसे सम्पन्न होकर ही वैदिक कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। गृहस्थको सदा उपार्जित धनद्वारा गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण करना चाहिये।
गोभूहिरण्यवासोभिर्गन्धमाल्योदकेन च ।<br>पूजयेद् ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्रवस्वात्मकं शिवम् ॥ १९<br><br>व्रतोपवासैर्विधिवच्छ्रद्धया च विमत्सरः ।<br><br>योऽसावतीन्द्रियः शान्तः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ।<br>वासुदेवो जगन्मूर्तिस्तस्य सम्भूतयो ह्यमी ॥ २०उसका कर्तव्य है कि वह व्रत एवं उपवास आदि करके गौ, पृथ्वी, सुवर्ण, वस्त्र, गन्ध, माला और जल आदिसे ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, रुद्र और वसुस्वरूप शिवकी श्रद्धापूर्वक विधिसहित पूजा करे; इसमें कृपणता न करे। जो ये इन्द्रियोंके अगोचर, परम शान्त, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अव्यक्त, अविनाशी एवं विश्वस्वरूप भगवान् वासुदेव हैं,

* ये १३—१६ तकके ४ श्लोक मनुस्मृति ३। ६८—७१ में भी प्राप्त होते हैं। और आठ गुणोंके निर्देशक श्लोक गौतमधर्मसूत्र ८। २४—२५, शङ्ख स्मृ० १। १७, चाणक्य० १२। १५ आदिमें उपलब्ध भी हैं।

५४ नक्षत्र-पुरुष-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

* अध्याय ५२ *२१३

| ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् मार्तण्डो वृषवाहनः।<br>अष्टौ च वसवस्तद्वदेकादश गणाधिपाः।<br>लोकपालाधिपाश्चैव पितरो मातरस्तथा॥ २१ | उन्हींकी ये विभूतियाँ हैं। उन विभूतियोंके नाम ये हैं—ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, सूर्य, शिव, आठ वसु, ग्यारह गणाधिप, लोकपालाधीश्वर, पितर और मातृकाएँ। चराचर जगत्सहित | | इमा विभूतयः प्रोक्ताश्चराचरसमन्विताः।<br>ब्रह्माद्याश्चतुरो मूलमव्यक्ताधिपतिः स्मृतः॥ २२ | ये सभी विभूतियाँ बतलायी गयी हैं। ब्रह्मा आदि चार (ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, शिव) देवता मूलरूपसे इस जगत्के अव्यक्त अधिपति कहे जाते हैं। इसलिये ब्रह्मा, सूर्य, विष्णु अथवा | | ब्रह्मणा चाथ सूर्येण विष्णुनाथ शिवेन वा।<br>अभेदात् पूजितेन स्यात् पूजितं सचराचरम्॥ २३ | शिवकी अभेदभावसे पूजा करनेपर चराचर जगत्की पूजा सम्पन्न हो जाती है। सूर्य ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंके परम | | ब्रह्मादीनां परं धाम त्रयाणामपि संस्थितिः।<br>वेदमूर्तावतः पूषा पूजनीयः प्रयत्नतः॥ २४ | धाम हैं, जिनमें वे निवास करते हैं। सूर्यदेव वेदोंके मूर्तस्वरूप हैं, अतः इनकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इसलिये | | तस्मादग्निद्विजमुखान् कृत्वा सम्पूजयेदिमान्।<br>दानैर्व्रतोपवासैश्च जपहोमादिना नरः॥ २५ | मनुष्यको चाहिये कि वह अग्नि अथवा ब्राह्मणोंके मुखोंमें इनका आवाहन करके दान, व्रत, उपवास, जप, हवन आदि-द्वारा इनकी पूजा करे। इस प्रकार जो मनुष्य कर्मयोगनिष्ठ, | | इति क्रियायोगपरायणस्य<br>वेदान्तशास्त्रस्मृतिवत्सलस्य ।<br>विकर्मभीतस्य सदा न किंचित्<br>प्राप्तव्यमस्तीह परे च लोके॥ २६ | वेदान्तशास्त्र और स्मृतियोंका प्रेमी तथा अधर्मसे सदा भयभीत रहता है, उसके लिये इस लोक अथवा परलोकमें कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रह जाता, अर्थात् सभी पदार्थ उसके हस्तगत हो जाते हैं॥ १७—२६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कर्मयोगमाहात्म्यं नाम द्विपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कर्मयोगमाहात्म्यनामक बावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५२॥

२१४* मत्स्यपुराण *

तिरपनवाँ अध्याय

पुराणोंकी नामावलि और उनका संक्षिप्त परिचय

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>पुराणसंख्यामाचक्ष्व सूत विस्तरशः क्रमात्।<br>दानधर्ममशेषं तु यथावदनुपूर्वशः॥ १ऋषियोंने पूछा—सूतजी! अब आप हमलोगोंसे क्रमशः पुराणोंकी संख्याका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। साथ ही उनके दान और धर्मकी सम्पूर्ण आनुपूर्वी विधि भी यथार्थरूपसे बतलाइये॥ १॥
सूत उवाच<br>इदमेव पुराणेषु पुराणपुरुषस्तदा।<br>यदुक्तवान् स विश्वात्मा मनवे तन्निबोधत॥ २सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ऐसे ही प्रश्नके उत्तरमें उस समय पुराणपुरुष विश्वात्मा मत्स्यभगवान्‌ने मनुके प्रति पुराणोंके विषयमें जो कुछ कहा था, उसे सुनिये॥ २॥
मत्स्य उवाच<br>पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।<br>अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥ ३<br><br>पुराणमेकमेवासीत् तदा कल्पान्तरेऽनघ।<br>त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ४<br><br>निर्दग्धेषु च लोकेषु वाजिरूपेण वै मया।<br>अङ्गानि चतुरो वेदान् पुराणं न्यायविस्तरम्॥ ५<br><br>मीमांसां धर्मशास्त्रं च परिगृह्य मया कृतम्।<br>मत्स्यरूपेण च पुनः कल्पादावुदकार्णवे॥ ६<br><br>अशेषमेतत् कथितमुदकान्तर्गतेन च।<br>श्रुत्वा जगाद च मुनीन् प्रति देवांश्चतुर्मुखः॥ ७<br><br>प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत् ततः।<br>कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो नृप॥ ८<br><br>व्यासरूपमहं कृत्वा संहरामि युगे युगे।<br>चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा॥ ९<br><br>तथाष्टादशधा कृत्वा भूर्लोकेऽस्मिन् प्रकाश्यते।<br>अद्यापि देवलोकेऽस्मिञ्शतकोटिप्रविस्तरम्॥ १०मत्स्यभगवान्‌ने कहा—राजर्षे! ब्रह्माजीने (सृष्टिनिर्माणके समय) समस्त शास्त्रोंमें सर्वप्रथम पुराणका ही स्मरण किया था। उसके बाद उनके मुखोंसे वेद प्रादुर्भूत हुए हैं। अनघ! उस कल्पान्तरमें सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तृत, पुण्यप्रद और त्रिवर्ग—तीन पुरुषार्थके समुदाय (धर्म, अर्थ, काम)-का साधनस्वरूप पुराण एक ही था। सभी लोकोंके जलकर नष्ट हो जानेपर मैंने ही अश्व (हयग्रीव)-रूपसे व्याकरणादि छहों अङ्गोंसहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्रको ग्रहण करके उनका संकलन किया था। पुनः मैंने ही कल्पके आदिमें एकार्णवके समय मत्स्यरूपसे जलके भीतर स्थित रहकर इस (विषय)-का पूर्णरूपसे वर्णन किया था। उसे सुनकर ब्रह्माने देवताओं और मुनियोंसे कहा था। राजन्! तभीसे संसारमें समस्त शास्त्रों और पुराणोंका प्रचार हुआ। काल-प्रभावसे पुराणकी ओरसे लोगोंकी उदासीनता देखकर प्रत्येक द्वापरयुगमें मैं सदा व्यासरूपसे प्रकट होता हूँ* और उस (पुराण)-का संक्षेप कर चार लाख श्लोकोंमें बना देता हूँ। वही अठारह भागोंमें विभक्त होकर इस भूलोकमें प्रकाशित होता है। आज भी यह पुराण इस देवलोकमें सौ करोड़ श्लोकोंमें ही है।

* व्यासजीके विष्णुरूप होनेकी बात महाभारत, विष्णुपुराण (३। ४। ५) आदिमें भी कही गयी है, यथा—‘कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम्। को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्॥’ इत्यादि।

* अध्याय ५३ * २१५

| तदर्थोऽत्र चतुर्लक्षं संक्षेपेण निवेशितम्।<br>पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते॥ ११<br><br>नामतस्तानि वक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>ब्रह्मणाभिहितं पूर्वं यावन्मात्रं मरीचये॥ १२<br><br>ब्राह्मं त्रिदशसाहस्रं पुराणं परिकीर्त्यते।<br>लिखित्वा तच्च यो दद्याज्जलधेनुसमन्वितम्।<br>वैशाखपूर्णिमायां च ब्रह्मलोके महीयते॥ १३<br><br>एतदेव यदा पद्ममभूद्धैरण्मयं जगत्।<br>तद्वृत्तान्ताश्रयं तद्वत् पाद्ममित्युच्यते बुधैः।<br>पाद्मं तत्पञ्चपञ्चाशत्सहस्राणीह कथ्यते॥ १४<br><br>तत्पुराणं च यो दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>ज्येष्ठे मासि तिलैर्युक्तमश्वमेधफलं लभेत्॥ १५<br><br>वाराहकल्पवृत्तान्तमधिकृत्य पराशरः।<br>यत् प्राह धर्मानखिलांस्तदुक्तं वैष्णवं विदुः॥ १६<br><br>तदाषाढे च यो दद्याद् घृतधेनुसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां विपूतात्मा स पदं याति वारुणम्।<br>त्रयोविंशतिसाहस्रं तत्प्रमाणं विदुर्बुधाः॥ १७<br><br>श्वेतकल्पप्रसङ्गेन धर्मान् वायुरिहाब्रवीत्।<br>यत्र तद्वायवीयं स्याद् रुद्रमाहात्म्यसंयुतम्।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि पुराणं तदिहोच्यते॥ १८<br><br>श्रावण्यां श्रावणे मासि गुडधेनुसमन्वितम्।<br>यो दद्याद् वृषसंयुक्तं ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>शिवलोके स पूतात्मा कल्पमेकं वसेन्नरः॥ १९ | उसका पूरा सारांश मैंने संक्षेपसे इस चार लाख श्लोकोंवाले पुराणमें भर दिया है। अब उन अठारह पुराणोंका यहाँ वर्णन किया जाता है॥ ३—११॥<br><br>श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं उनका नाम निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने महर्षि मरीचिके प्रति जितने श्लोकोंका वर्णन किया था, वह प्रथम ब्रह्मपुराण कहा जाता है। उसमें तेरह हजार श्लोक हैं। जो मानव इस पुराणको लिखकर उस पुस्तकका जलधेनु¹ (दानके लिये जलके घड़ेमें कल्पित गौ)-के साथ वैशाखकी पूर्णिमा तिथिके दिन ब्राह्मणको दान कर देता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जिस समय यह जगत् स्वर्णमय कमलके रूपमें परिणत था, उस समयका वृत्तान्त जिसमें वर्णन किया गया है, उसे विद्वान्लोग (द्वितीय) पद्मपुराण नामसे अभिहित करते हैं। उस पद्मपुराणकी श्लोक-संख्या पचपन हजार बतायी जाती है। स्वर्णनिर्मित कमलसे युक्त उस पुराणका जो मनुष्य तिलके साथ ज्येष्ठमासमें ब्राह्मणको दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञ²के फलकी प्राप्ति होती है। महर्षि पराशरने वाराह-कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर जिन सम्पूर्ण धर्मोंका वर्णन किया है, उनसे युक्त (तृतीय) पुराणको वैष्णव (विष्णुपुराण) कहा जाता है। विद्वान्लोग उसका प्रमाण तेईस³ हजार श्लोकोंका बतलाते हैं। जो मानव आषाढमासकी पूर्णिमाको घृतधेनुयुक्त इस पुराणका दान करता है, उसका आत्मा पवित्र हो जाता है और वह वरुण-लोकमें जाता है। श्वेतकल्पके प्रसङ्गवश वायुने इस मर्त्यलोकमें जिन धर्मोंका वर्णन किया था, उनका संकलन जिसमें हुआ है, उसे (चतुर्थ) वायवीय (वायुपुराण या शिवपुराण⁴) कहते हैं। वह शङ्करजीके माहात्म्यसे भी परिपूर्ण है। इस पुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार बतलायी जाती है। जो मनुष्य श्रावणमासमें श्रावणी पूर्णिमाको गुड़धेनु और बैलके साथ इस पुराणका कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह पवित्रात्मा होकर शिवलोकमें एक कल्पतक निवास करता |


१. जलधेनु-दानकी विधि वाराहादि पुराणोंमें तथा इसी मत्स्यपुराणके ८२ वें अध्यायमें भी आयी है। इसके आगे घृतधेनु आदिकी भी विधि है, जिसकी चर्चा यहाँ भी आगे १७ वें श्लोकमें हुई है।
२. विष्णुपुराण (५। ५। १४) तथा मनुस्मृति (११। २६०) आदि स्मृतियोंके अनुसार यह क्रतुराट्—सभी यज्ञोंका राजा तथा सर्वपापापनोदक है। शतपथब्राह्मणके अश्वमेधकाण्डके पचासों पृष्ठों तथा ऐतरेय-तैत्तिरीय ब्राह्मणों, तैत्तिरीय संहिता-भाष्य, आश्वलायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, कात्यायनादि श्रौतसूत्रों तथा वाल्मीकीय रामायण बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड, पद्म आदि कई स्थानों और रामाश्वमेध, महाभारतके आश्वमेधिकपर्व, जैमिनीयाश्वमेध आदि कई ग्रन्थोंमें इसकी विस्तृत महिमा एवं विधि निरूपित है। इसमें प्रति आठवें पूरे दिन 'पारिप्लव'में पुराण (विशेषकर मत्स्यपुराण) सुननेकी विधि है और इसमें पुराण-श्रवणकी ३६ बार पुनरावृत्ति होती है।
३. यह संख्या विष्णुधर्मोत्तरको लेकर है। अन्यथा लिङ्गपुराणादिके वचनानुसार इसमें साढ़े पाँच सहस्र श्लोक ही हैं।
४. पुराणगणनामें चौथी संख्यापर कहीं वायु और कहीं शिवपुराणका उल्लेख है। शिवपुराणमें भी एक वायवीय संहिता है तथा शूलपाणिके वचनानुसार वायुपुराण भी शैवपुराण ही है।

२१६* मत्स्यपुराण *

| यत्राधिकृत्य गायत्रीं वर्ण्यते धर्मविस्तरः।<br>वृत्रासुरवधोपेतं तद् भागवतमुच्यते॥ २०<br><br>सारस्वतस्य कल्पस्य मध्ये ये स्युर्नरोत्तमाः।<br>तद्वृत्तान्तोद्भवं लोके तद् भागवतमुच्यते॥ २१<br><br>लिखित्वा तच्च यो दद्याद्धेमसिंहसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां प्रौष्ठपद्यां स याति परमां गतिम्।<br>अष्टादश सहस्राणि पुराणं तत् प्रचक्षते॥ २२ | है। जिसमें गायत्रीका आश्रय लेकर विस्तारपूर्वक धर्मका वर्णन किया गया है तथा जो वृत्रासुरवधके वृत्तान्तसे संयुक्त है, उसे (पञ्चम) भागवतपुराण<sup></sup> कहा जाता है। इसी प्रकार सारस्वतकल्पमें जो श्रेष्ठ मनुष्य हो गये हैं, लोकमें उनके वृत्तान्तसे सम्बन्धित पुराणको 'भागवतपुराण' कहा जाता है। यह पुराण अठारह हजार श्लोकोंका बतलाया जाता है। जो मनुष्य इसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित सिंहके साथ भाद्रपदमासकी पूर्णिमा तिथिको दान कर देता है वह परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है॥ १२—२२॥ | | यत्राह नारदो धर्मान् बृहत्कल्पाश्रयाणि च।<br>पञ्चविंशत्सहस्राणि नारदीयं तदुच्यते॥ २३<br><br>आश्विने पञ्चदश्यां तु दद्याद् धेनुसमन्वितम्।<br>परमां सिद्धिमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम्॥ २४ | जिस पुराणमें बृहत्कल्पका आश्रय लेकर देवर्षि नारदने धर्मोंका उपदेश किया है, उसे (षष्ठ) नारदीय (नारदपुराण) कहा जाता है। उसमें पचीस हजार श्लोक हैं। जो मनुष्य आश्विनमासकी पूर्णिमा तिथिको धेनुके साथ इस पुराणका दान करता है, वह पुनर्जन्मसे रहित परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। | | यत्राधिकृत्य शकुनीन् धर्माधर्मविचारणा।<br>व्याख्याता वै मुनिप्रश्ने मुनिभिर्धर्मचारिभिः॥ २५<br><br>मार्कण्डेयेन कथितं तत् सर्वं विस्तरेण तु।<br>पुराणं नवसाहस्रं मार्कण्डेयमिहोच्यते॥ २६<br><br>प्रतिलिख्य च यो दद्यात् सौवर्णकरिसंयुतम्।<br>कार्तिक्यां पुण्डरीकस्य यज्ञस्य फलभाग् भवेत्॥ २७ | जिस पुराणमें पक्षियोंका आश्रय लेकर एक मुनिके प्रश्न करनेपर धर्मचारी मुनियोंद्वारा धर्म और अधर्मके विचारका जो कुछ व्याख्यान दिया गया है, उन सबका महर्षि मार्कण्डेयने पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, वह लोकमें (सप्तम) मार्कण्डेयपुराणके नामसे विख्यात है। इसकी श्लोक-संख्या नौ हजार है। जो मनुष्य इस पुराणको लिखकर स्वर्णनिर्मित हाथीके सहित कार्तिकी पूर्णिमाको उस पुस्तकका दान करता है, वह पुण्डरीक-यज्ञके<sup></sup> फलका भागी होता है। | | यत्तदीशानकं कल्पं वृत्तान्तमधिकृत्य च।<br>वसिष्ठायाग्निना प्रोक्तमाग्नेयं तत् प्रचक्षते॥ २८<br><br>लिखित्वा तच्च यो दद्याद्धेमपद्मसमन्वितम्।<br>मार्गशीर्ष्यां विधानेन तिलधेनुसमन्वितम्।<br>तच्च षोडशसाहस्रं सर्वक्रतुफलप्रदम्॥ २९ | जिसमें ईशानकल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर अग्निने महर्षि वसिष्ठके प्रति उपदेश किया है, उसे (अष्टम) आग्नेय (अग्निपुराण) कहते हैं। इसमें सोलह सहस्र श्लोक हैं। जो मनुष्य इसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित कमल और तिलधेनुसहित मार्गशीर्षमासकी पूर्णिमा तिथिको विधि-विधानके साथ दान करता है, उसके लिये यह सम्पूर्ण यज्ञोंके फलका प्रदाता हो जाता है। |


१. भागवतपुराण बहुत प्राचीन सर्वाधिक प्रसिद्ध है; क्योंकि इसपर ११ वीं शतीकी श्रीधरीसे १९ वीं शतीकी अन्वितार्थप्रकाशिका-तक पचासों संस्कृत टीकाएँ हैं तथा सूरसागर आदि-जैसे सैकड़ों देशी-विदेशी भाषाओंमें इसके गद्य-पद्यानुवाद हैं। बर्नफका फ्रेंच अनुवाद भी श्रेष्ठरूप पर्याप्त प्रसिद्ध है। इसपर प्रथम शतीसे लेकर मध्वादिमतके 'भागवत'-तात्पर्यनिर्णय, लघुभागवतामृत, बृहद्भागवतामृतादि अगणित प्रबन्ध निबद्ध हुए हैं और गोपाल भट्ट आदिके हरिभक्तिविलासादिमें इसके हजारों वचन उद्धृत हैं। कल्याणके १६वें वर्षमें १-२ अङ्कोंमें यह अनुवाद तथा मूलसहित प्रकाशित है। गीताप्रेससे इसकी प्रायः लाखों प्रतियाँ विभिन्न संस्करणोंमें बिक चुकी हैं।

२. इस यज्ञकी विस्तृत महिमा एवं प्रक्रिया आश्वलायन, सत्याषाढ, कात्यायन देवयाज्ञिक पद्धति आदिमें है।

५५ आदित्यशयन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

* अध्याय ५३ * २१७


| यत्राधिकृत्य माहात्म्यमादित्यस्य चतुर्मुखः।<br>अघोरकल्पवृत्तान्तप्रसङ्गेन जगत्स्थितिम्।<br>मनवे कथयामास भूतग्रामस्य लक्षणम्॥ ३०<br>चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च।<br>भविष्यच्चरितप्रायं भविष्यं तदिहोच्यते॥ ३१<br>तत्पौषे मासि यो दद्यात् पौर्णमास्यां विमत्सरः।<br>गुडकुम्भसमायुक्तमग्निष्टोमफलं भवेत्॥ ३२<br>रथन्तरस्य कल्पस्य वृत्तान्तमधिकृत्य च।<br>सावर्णिना नारदाय कृष्णमाहात्म्यमुत्तमम्॥ ३३<br>यत्र ब्रह्मवराहस्य चोदनं वर्णितं मुहुः।<br>तदष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमुच्यते॥ ३४<br>पुराणं ब्रह्मवैवर्तं यो दद्यान्माघमासि च।<br>पौर्णमास्यां शुभदिने ब्रह्मलोके महीयते॥ ३५ | जिसमें अघोर कल्पके वृत्तान्तके प्रसङ्गवश सूर्यके माहात्म्यका आश्रय लेकर ब्रह्माने मनुके प्रति जगत्की स्थिति और प्राणिसमूहके लक्षणका वर्णन किया है तथा जिसमें प्रायः भविष्यकालीन चरितका वर्णन आया है, उसे इस लोकमें (नवम) भविष्यपुराण कहते हैं। उसमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक हैं। जो मनुष्य ईर्ष्या-द्वेषरहित हो पौषमासकी पूर्णिमा तिथिको उसका गुड़से पूर्ण घड़ेसहित दान करता है, उसे अग्निष्टोम* नामक यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। जिसमें रथन्तर कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर सावर्णि मनुने नारदजीके प्रति भगवान् श्रीकृष्णके श्रेष्ठ माहात्म्यका वर्णन किया है तथा जिसमें ब्रह्मवराहका वृत्तान्त बारम्बार वर्णित हुआ है, उसे (दशम) ब्रह्मवैवर्तपुराण कहते हैं। इसमें अठारह सहस्र श्लोक हैं। जो मनुष्य माघमासमें पूर्णिमा तिथिको शुभ दिनमें इस ब्रह्मवैवर्तपुराणका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सत्कृत होता है॥ २३—३५॥ | | यत्राग्निलिङ्गमध्यस्थः प्राह देवो महेश्वरः।<br>धर्मार्थकाममोक्षार्थमाग्रेयमधिकृत्य च॥ ३६<br>कल्पान्ते लैङ्गमित्युक्तं पुराणं ब्रह्मणा स्वयम्।<br>तदेकादशसाहस्रं फाल्गुन्यां यः प्रयच्छति।<br>तिलधेनुसमायुक्तं स याति शिवसाम्यताम्॥ ३७ | जिसमें कल्पान्तके समय अग्निका आश्रय लेकर देवाधिदेव महेश्वरने अग्निलिङ्गके मध्यमें स्थित रहते हुए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारोंकी प्राप्तिके लिये उपदेश दिया है, उस पुराणको स्वयं ब्रह्माने (एकादश) लैङ्ग (लिङ्ग)-पुराण नामसे अभिहित किया है। उसमें ग्यारह हजार श्लोक हैं। जो मानव फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको तिलधेनुसहित इस पुराणका दान करता है, वह शिवजीकी साम्यताको प्राप्त कर लेता है। | | महावराहस्य पुनर्माहात्म्यमधिकृत्य च।<br>विष्णुनाभिहितं क्षोण्यै तद्वाराहमिहोच्यते॥ ३८<br>मानवस्य प्रसङ्गेन कल्पस्य मुनिसत्तमाः।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि तत्पुराणमिहोच्यते॥ ३९<br>काञ्चनं गरुडं कृत्वा तिलधेनुसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां मधौ दद्याद् ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>वराहस्य प्रसादेन पदमाप्नोति वैष्णवम्॥ ४० | मुनिवरो! जिसमें मानककल्पके प्रसङ्गवश पुनः महावराहके माहात्म्यका आश्रय लेकर भगवान् विष्णुने पृथ्वीके प्रति उपदेश दिया है, उसे भूतलपर (द्वादश) वराहपुराण कहते हैं। उस पुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार बतलायी जाती है। जो मनुष्य गरुड़की सोनेकी मूर्ति बनवाकर उस मूर्ति तथा तिल-धेनुके साथ इस पुराणका चैत्रमासकी पूर्णिमा तिथिको कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह वराहभगवान्की कृपासे विष्णुपदको प्राप्त कर लेता है। |


* यह ज्योतिष्टोमका एक अङ्ग है।

२१८ * मत्स्यपुराण *

यत्र माहेश्वरान् धर्मानधिकृत्य च षण्मुखः।<br>कल्पे तत्पुरुषं वृत्तं चरितैरुपबृंहितम्॥ ४१<br><br>स्कान्दं नाम पुराणं च ह्येकाशीति निगद्यते।<br>सहस्राणि शतं चैकमिति मर्त्येषु गद्यते॥ ४२<br><br>परिलिख्य च यो दद्याद्धेमशूलसमन्वितम्।<br>शैवं पदमवाप्नोति मीने चोपागते रवौ॥ ४३<br><br>त्रिविक्रमस्य माहात्म्यमधिकृत्य चतुर्मुखः।<br>त्रिवर्गमभ्यधात् तच्च वामनं परिकीर्तितम्॥ ४४<br><br>पुराणं दशसाहस्रं कूर्मकल्पानुगं शिवम्।<br>यः शरद्विषुवे दद्याद् वैष्णवं यात्यसौ पदम्॥ ४५<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां मोक्षस्य च रसातले।<br>माहात्म्यं कथयामास कूर्मरूपी जनार्दनः॥ ४६<br><br>इन्द्रद्युम्नप्रसङ्गेन ऋषिभ्यः शक्रसंनिधौ।<br>अष्टादश सहस्राणि लक्ष्मीकल्पानुषङ्गिकम्॥ ४७<br><br>यो दद्यादयने कूर्मं हेमकूर्मसमन्वितम्।<br>गोसहस्रप्रदानस्य फलं सम्प्राप्नुयान्नरः॥ ४८<br><br>श्रुतीनां यत्र कल्पादौ प्रवृत्त्यर्थं जनार्दनः।<br>मत्स्यरूपेण मनवे नरसिंहोपवर्णनम्॥ ४९<br><br>अधिकृत्याब्रवीत् सप्तकल्पवृत्तं मुनीश्वराः।<br>तन्मात्स्यमिति जानीध्वं सहस्राणि चतुर्दश॥ ५०जिसमें कल्पान्तके समय स्वामिकार्तिकने माहेश्वर धर्मोंका आश्रय लेकर शिवजीके सुशोभन चरित्रोंसे युक्त वृत्तान्तका वर्णन किया है, उस (त्रयोदश पुराण)-का नाम स्कन्दपुराण है। वह मृत्युलोकमें इक्यासी हजार एक सौ श्लोकोंका बतलाया जाता है।$^१$ जो मनुष्य उसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित त्रिशूलके साथ सूर्यके मीन राशिपर आनेपर (प्रायः चैत्रमासमें) दान करता है, वह शिव-पदको प्राप्त कर लेता है। जिसमें ब्रह्माने त्रिविक्रमके माहात्म्यका आश्रय लेकर त्रिवर्गोंका वर्णन किया है, उसे (चतुर्दश) वामनपुराण कहते हैं। इसमें दस हजार श्लोक हैं। यह कूर्मकल्पका अनुगमन करनेवाला तथा मङ्गलप्रद है। जो मानव शरत्कालीन विषुवयोग (१८ सितम्बरके लगभग दिन-रातके बराबर होनेके काल—तुलासंक्रान्ति)-में इसका दान करता है, वह विष्णु-पदको प्राप्त कर लेता है। जिसमें कूर्मरूपी भगवान् जनार्दनने रसातलमें इन्द्रद्युम्नकी कथाके प्रसङ्गवश इन्द्रके निकट धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके माहात्म्यका ऋषियोंके प्रति वर्णन किया है, उसे (पञ्चदश) कूर्मपुराण कहते हैं। यह लक्ष्मीकल्पसे सम्बन्ध रखनेवाला है। इसमें अठारह हजार श्लोक हैं। जो मनुष्य सूर्यके उत्तरायण एवं दक्षिणायनके प्रारम्भकालमें स्वर्णनिर्मित कच्छपसहित कूर्मपुराणका दान करता है, उसे एक हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है॥ ३६—४८॥<br><br>मुनिवरो! जिसमें कल्पके प्रारम्भमें भगवान् जनार्दनने मत्स्य-रूप धारण करके मनुके प्रति श्रुतियोंकी प्रवृत्तिके निमित्त नृसिंहावतारके वृत्तान्तका आश्रय लेकर सातों कल्पोंके वृत्तान्तोंका वर्णन किया है, उसे (षोडश$^२$ मात्स्य) मत्स्यपुराण जानना चाहिये। उसमें चौदह हजार श्लोक हैं।

१. यहाँके अतिरिक्त विष्णुपुराण ३।६।२१—२४; भागवत १२।७ तथा १३; मार्कण्डेय १३४; वाराह ११२।७९-७२; कूर्म १।१३-१५; लिङ्ग १।३९।६१-४; पद्म १।६२।२-७; नारद १।९२-१०९ आदिमें पुराणक्रम एवं श्लोक-संख्यादिका वर्णन है। शोधकर्त्ताओंने इन क्रमोंको तीन भागोंमें क्रमबद्ध किया है। इनमें मत्स्य, भागवत, विष्णु आदि क्रमको मत्स्य या विष्णुपुराणक्रम कहा है। इनके अनुसार स्कन्दपुराण १३वीं संख्यापर तथा लिङ्गपुराणद्वारा निर्दिष्ट क्रममें १७ वीं संख्यापर निर्दिष्ट है। इसके सूतसंहितादि छः संहिताओंका एक रूप तथा माहेश्वरादि सात खण्डोंका दूसरा रूप—दोनों मिलकर पौने दो लाख श्लोक होते हैं। फिर शाम्भल-माहात्म्य, सत्यनारायण-व्रतकथा आदि इसके अनेक खिल ग्रंथ भी हैं।
२. यह विष्णुपुराण आदिक्रममें १६ वीं संख्यापर, पर लिङ्गादिक्रममें १५ वीं संख्यापर परिगणित है।

* अध्याय ५३ * २१९

| विषुवे हेममत्स्येन धेन्वा चैव समन्वितम्।<br>यो दद्यात् पृथिवी तेन दत्ता भवति चाखिला॥ ५१<br><br>यदा च गारुडे कल्पे विश्वाण्डाद् गरुडोद्भवम्।<br>अधिकृत्याब्रवीत् कृष्णो गारुडं तदिहोच्यते॥ ५२<br><br>तदष्टादशकं चैकं सहस्त्राणीह पठ्यते।<br>सौवर्णहंससंयुक्तं यो ददाति पुमानिह।<br>स सिद्धिं लभते मुख्यां शिवलोके च संस्थितिम्॥ ५३<br><br>ब्रह्मा ब्रह्माण्डमाहात्म्यमधिकृत्याब्रवीत् पुनः।<br>तच्च द्वादशसाहस्त्रं ब्रह्माण्डं द्विशताधिकम्॥ ५४<br><br>भविष्याणां च कल्पानां श्रूयते यत्र विस्तरः।<br>तद् ब्रह्माण्डपुराणं च ब्रह्मणा समुदाहृतम्॥ ५५<br><br>यो दद्यात् तद् व्यतीपाते पीतोर्णायुगसंयुतम्।<br>राजसूयसहस्त्रस्य फलमाप्नोति मानवः।<br>हेमधेन्वा युतं तच्च ब्रह्मलोकफलप्रदम्॥ ५६<br><br>चतुर्लक्षमिदं प्रोक्तं व्यासेनाद्भुतकर्मणा।<br>मत्पितुर्मम पित्रा च मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५७<br><br>इह लोकहितार्थाय संक्षिप्तं परमर्षिणा।<br>इदमद्यापि देवेषु शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ५८<br><br>उपभेदान् प्रवक्ष्यामि लोके ये सम्प्रतिष्ठिताः।<br>पाद्मे पुराणे यत्रोक्तं नरसिंहोपवर्णनम्।<br>तच्चाष्टादशसाहस्त्रं नारसिंहमिहोच्यते॥ ५९<br><br>नन्दाया यत्र माहात्म्यं कार्त्तिकेयेन वर्ण्यते।<br>नन्दीपुराणं तल्लोकैराख्यातमिति कीर्त्यते॥ ६० | जो मनुष्य विषुवयोग (मेष अथवा तुलाकी संक्रान्ति)-में स्वर्णनिर्मित मत्स्य और दुधारू गौके साथ इस पुराणका दान करता है, उसके द्वारा समग्र पृथ्वीका दान सम्पन्न हो जाता है अर्थात् उसे सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त होता है। जिसमें भगवान् श्रीकृष्णने गरुड-कल्पके समय विश्वाण्ड (ब्रह्माण्ड)-से गरुडकी उत्पत्तिके वृत्तान्तका आश्रय लेकर उपदेश दिया है, उसे इस लोकमें सप्तदश गारुड (गरुडपुराण) कहते हैं। उसे भूतलपर उन्नीस हजार श्लोकोंका कहा जाता है। जो पुरुष स्वर्णनिर्मित हंसके साथ इस पुराणका दान करता है, उसे मुख्य सिद्धि प्राप्त होती है और वह शिवलोकमें निवास करता है। जिसमें ब्रह्माने पुनः ब्रह्माण्डके माहात्म्यका आश्रय लेकर वृत्तान्तोंका वर्णन किया है तथा जिसमें भविष्यकल्पोंका भी विस्तारपूर्वक वर्णन सुना जाता है, उसे ब्रह्माने (अन्तिम—अष्टादश) ब्रह्माण्डपुराण बतलाया है<sup></sup>। वह ब्रह्माण्डपुराण बारह हजार दो सौ श्लोकोंवाला है। जो मानव व्यतीपात नामक योगमें पीले रंगके दो ऊनी वस्त्रोंके साथ इस पुराणका दान करता है, उसे एक हजार राजसूय-यज्ञके<sup></sup> फलकी प्राप्ति होती है। उसी (ब्रह्माण्डपुराण)-को यदि स्वर्णनिर्मित गौके साथ दान किया जाय तो वह ब्रह्मलोक-प्राप्तिरूपी फलका प्रदाता बन जाता है। अद्भुतकर्मा महर्षि वेदव्यासने मेरे पिता रोमहर्षणके प्रति इन चार लाख श्लोकोंका वर्णन किया था। उसीको मेरे पिताने मुझे बतलाया और मैंने आपलोगोंके प्रति निवेदन कर दिया। परमर्षि व्यासजीने मृत्युलोकमें लोकहितके लिये इसका संक्षेप कर दिया है, किंतु देवलोकमें तो यह आज भी सौ करोड़ श्लोकोंसे युक्त ही है॥ ४९—५८॥<br><br>ऋषियो! अब मैं उन उपपुराणोंका वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें प्रचलित हैं। पद्मपुराणमें जहाँ नृसिंहावतारके वृत्तान्तका वर्णन किया गया है, उसे नारसिंह (नरसिंहपुराण<sup></sup>) कहते हैं। उसमें अठारह हजार श्लोक हैं। जिसमें स्वामिकार्तिकने नन्दाके माहात्म्यका वर्णन किया है, उसे लोग नन्दीपुराणके नामसे पुकारते हैं। |


१. यह पुराण प्रायः सर्वांशमें वायुपुराणसे (और अत्यधिक अंशोंमें मत्स्यपुराणसे भी) मिल जाता है, यह एक विचित्र बात है। केवल अन्तमें उसके गयामाहात्म्यकी जगह इसमें ललितोपाख्यान है।
२. यह भी अश्वमेधवत् प्रसिद्ध तथा श्रौतसूत्रोंमें प्रायः उन्हीं स्थलोंपर चर्चित है।
३. कल्याण वर्ष ४५ में यह मूलसहित और सानुवाद प्रकाशित है और अब ग्रन्थरूपमें पुनर्मुद्रित हो चुका है।

५६ श्रीकृष्णमाष्टमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

२२० | *** मत्स्यपुराण ***


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यत्र साम्बं पुरस्कृत्य भविष्यति कथानकम्।<br>प्रोच्यते तत् पुनर्लोके साम्बमेतन्मुनिव्रताः॥ ६१<br><br>एवमादित्यसंज्ञा च तत्रैव परिगण्यते।<br>अष्टादशभ्यस्तु पृथक् पुराणं यत् प्रदिश्यते॥ ६२<br><br>विजानीध्वं द्विजश्रेष्ठास्तदेतेभ्यो विनिर्गतम्।<br>पञ्चाङ्गानि पुराणेषु आख्यानकमतः स्मृतम्॥ ६३<br><br>सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंश्यानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ ६४<br><br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणां माहात्म्यं भुवनस्य च।<br>ससंहारप्रदानां च पुराणे पञ्चवर्णके॥ ६५<br><br>धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चैवात्र कीर्त्यते।<br>सर्वेष्वपि पुराणेषु तद्विरुद्धं च यत् फलम्॥ ६६मुनिवरो! जहाँ भविष्यकी चर्चासहित साम्बका प्रसङ्ग लेकर कथानकका वर्णन किया गया है, उसे लोकमें साम्बपुराण कहते हैं। इस प्रकार सूर्य-महिमाके प्रसङ्गमें होनेसे उसे आदित्यपुराण भी कहा जाता है। द्विजवरो! उपर्युक्त अठारह पुराणोंसे पृथक् जो पुराण बतलाये गये हैं, उन्हें इन्हींसे निकला हुआ समझना चाहिये। पुराणोंमें बतलाये गये सर्गादि पाँच अङ्ग तथा आख्यान भी कहे गये हैं। उनमें—सर्ग (ब्रह्माद्वारा की गयी सृष्टिरचना), प्रतिसर्ग (ब्रह्माके मानस पुत्रोंद्वारा की गयी सृष्टिरचना*), वंश (सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि), मन्वन्तर (स्वायम्भुव आदि मनुओंका कार्यकाल) और वंश्यानुचरित (पूर्वोक्त वंशोंमें उत्पन्न हुए नरेशोंका जीवन-चरित्र)—ये पाँच पुराणोंके लक्षण बतलाये गये हैं। इन पाँच लक्षणोंवाले सभी पुराणोंमें सृष्टि और संहार करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके तथा भुवनके माहात्म्यका वर्णन किया गया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका भी इनमें विस्तृत विवेचन किया गया है। इनके विरुद्ध आचरण करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका भी निरूपण किया गया है॥ ५९—६६॥
सात्त्विकेषु पुराणेषु माहात्म्यमधिकं हरेः।<br>राजसेषु च माहात्म्यमधिकं ब्रह्मणो विदुः॥ ६७<br><br>तद्वदग्नेश्च माहात्म्यं तामसेषु शिवस्य च।<br>संकीर्णेषु सरस्वत्याः पितॄणां च निगद्यते॥ ६८सत्त्वगुणप्रधान पुराणोंमें भगवान् विष्णुके माहात्म्यकी तथा रजोगुणप्रधान पुराणोंमें ब्रह्माकी प्रधानता जाननी चाहिये। उसी प्रकार तमोगुणप्रधान पुराणोंमें अग्नि और शिवजीके माहात्म्यका विशेषरूपसे वर्णन किया गया है। संकीर्ण पुराणों (उपपुराणों)-में सरस्वती और पितरोंका वृत्तान्त कहा गया है।
अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>भारताख्यानमखिलं चक्रे तदुपबृंहितम्।<br>लक्षेणैकेन यत् प्रोक्तं वेदार्थपरिबृंहितम्॥ ६९सत्यवती-नन्दन व्यासजीने इन अठारह पुराणोंकी रचना कर इनके कथानकोंसे समन्वित सम्पूर्ण महाभारत नामक इतिहासकी रचना की, जो वेदोंके अर्थसे सम्पन्न है। वह एक लाख श्लोकोंमें वर्णित है।
वाल्मीकिना तु यत् प्रोक्तं रामोपाख्यानमुत्तमम्।<br>ब्रह्मणाभिहितं यच्च शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ७०<br><br>आहृत्य नारदायैव तेन वाल्मीकये पुनः।<br>वाल्मीकिना च लोकेषु धर्मकामार्थसाधनम्।<br>एवं सपादाः पञ्चैते लक्षा मर्त्ये प्रकीर्तिताः॥ ७१महर्षि वाल्मीकिने जिस उत्तम रामोपाख्यान—रामायणका वर्णन किया है, उसीको पहले सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तार करके ब्रह्माने नारदजीको बतलाया था। नारदजीने उसे लाकर वाल्मीकिजीको प्रदान किया। वाल्मीकिजीने धर्म, अर्थ और कामके साधनस्वरूप उस रामायणका लोकोंमें प्रचार किया। इस प्रकार ये सवा पाँच लाख श्लोक मृत्युलोकमें प्रचलित बतलाये गये हैं।

* पुराणोंमें प्रायः 'प्रतिसर्ग'का दूसरा अर्थ प्रतिसंचर या प्रलय भी आया है। यहाँ केवल तीन ही उपपुराणोंका वर्णन हुआ है। पर कूर्मपुराणके आरम्भमें अठारह उपपुराणोंका रूप कथन है।

* अध्याय ५४ *२२१

| पुरातनस्य कल्पस्य पुराणानि विदुर्बुधाः।<br>धन्यं यशस्यमायुष्यं पुराणानामनुक्रमम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि स याति परमां गतिम्॥ ७२<br>इदं पवित्रं यशसो निधान-<br>  मिदं पितृणामतिवल्लभं च।<br>इदं च देवेष्वमृतायितं च<br>  नित्यं त्विदं पापहरं च पुंसाम्॥ ७३* | विद्वान्‌लोग इन पुराणोंको पुरातन कल्पकी कथाएँ मानते हैं। इन पुराणोंका अनुक्रम धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम गतिको प्राप्त हो जाता है। यह परम पवित्र और यशका खजाना है। यह पितरोंको परम प्रिय है। यह देवताओंमें अमृतके समान प्रतिष्ठित है और नित्य मनुष्योंके पापका हरण करनेवाला है॥ ६७—७३॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पुराणानुक्रमणिकाभिधानं नाम त्रिपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पुराणानुक्रमणिकाभिधान नामक तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५३॥


चौवनवाँ अध्याय

नक्षत्र-पुरुष-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके बाद अब मैं व्रत और उपवाससे समन्वित सभी दान-धर्मोंका पूर्णरूपसे उसी प्रकार वर्णन कर रहा हूँ, जैसे इस मृत्युलोकमें मत्स्यभगवान्‌ने मनुके प्रति किया था। इसी प्रकार महादेवजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके संवादमें धर्म, काम और अर्थको सिद्ध करनेवाला जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसे भी बतला रहा हूँ। पूर्वकालकी बात है, एक बार भगवान् शङ्कर, जो तीन नेत्रोंसे युक्त, कामदेवके शत्रु और कामदेवके शरीरको दग्ध कर देनेवाले हैं, कैलास पर्वतके शिखरपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उसी समय देवर्षि नारदने उनके पास जाकर ऐसा प्रश्न किया॥ १—३॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि दानधर्मानशेषतः।<br>व्रतोपवाससंयुक्तान् यथा मत्स्योदितानिह॥ १<br><br>महादेवस्य संवादे नारदस्य च धीमतः।<br>यथावृत्तं प्रवक्ष्यामि धर्मकामार्थसाधकम्॥ २<br><br>कैलासशिखरासीनमपृच्छन्नारदः पुरा।<br>त्रिनयनमनङ्गारिमनङ्गाङ्गहरं हरम्॥ ३
नारद उवाच**नारदजीने पूछा—**भगवन्! आप तो देवेश्वरोंके भी देव तथा ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रके अधीश्वर हैं, इसलिये यह बताइये कि आपका अथवा भगवान् विष्णुका भक्त पुरुष किस प्रकार धन-सम्पत्ति, नीरोगता, सौन्दर्य, आयु, भाग्य और सौभाग्यरूपी सम्पत्तिसे सम्पन्न हो सकता है? अथवा विधवा स्त्री (जन्मान्तरमें) किस प्रकार समस्त गुणों एवं सौभाग्यसे संयुक्त हो सकती है? तथा देव! इस लोकमें कोई अन्य मुक्तिदायक व्रत हो तो क्रमशः उसे भी बतलाइये॥ ४-५॥
भगवन् देवदेवेश ब्रह्मविष्ण्विन्द्रनायक।<br>श्रीमदारोग्यरूपायुर्भाग्यसौभाग्यसम्पदा ।<br>संयुक्तस्तव विष्णोर्वा पुमान् भक्तः कथं भवेत्॥ ४<br><br>नारी वा विधवा सर्वगुणसौभाग्यसंयुता।<br>क्रमान्मुक्तिप्रदं देव किञ्चिद् व्रतामिहोच्यताम्॥ ५

* पुराण-संख्या-निर्देश-दाननिरूपणादि प्रायः अठारह पुराणोंमें ही वर्णित है। पर यहाँ तथा नारदपुराण ९१—१०८में यह कुछ विस्तारसे निरूपित है। गीतामें ब्रह्मसूत्रका, ब्रह्मसूत्रमें गीताका, पुराणोंमें महाभारतका तथा परस्पर एक-दूसरेका एवं महाभारतमें पुराणोंका ठीक-ठीक वर्णन व्यासजीके अद्भुत दिव्य ज्ञान एवं वैदुष्यका ही चमत्कार है।

५७ रोहिणीचन्द्रशयन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

२२२* मत्स्यपुराण *

| ईश्वर उवाच<br><br>सम्यक् पृष्टं त्वया ब्रह्मन् सर्वलोकहितावहम् ।<br>श्रुतमप्यत्र यच्छान्त्यै तद् व्रतं शृणु नारद ॥ ६<br><br>नक्षत्रपुरुषं नाम व्रतं नारायणात्मकम् ।<br>पादादि कुर्याद् शीर्षान्तं विष्णुनामानुकीर्तनम् ॥ ७<br><br>प्रतिमां वासुदेवस्य मूलर्क्षादिषु चार्चयेत् ।<br>चैत्रमासं समासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ८<br><br>मूले नमो विश्वधराय पादौ<br>गुल्फावनन्ताय च रोहिणीषु ।<br>जङ्घेऽभिपूज्ये वरदाय चैव<br>द्वे जानुनी चाश्विकुमारऋक्षे ॥ ९<br><br>पूर्वोत्तराषाढयुगे तथोरू<br>नमः शिवायत्यभिपूजनीयौ ।<br>पूर्वोत्तराफल्गुनियुग्मके च<br>मेढ्रं नमः पञ्चशराय पूज्यम् ॥ १०<br><br>कटिं नमः शार्ङ्गधराय विष्णोः<br>सम्पूजयेन्नारद कृत्तिकासु ।<br>तथार्चयेद् भाद्रपदाद्वये च<br>पार्श्वे नमः केशिनिषूदनाय ॥ ११<br><br>कुक्षिद्वयं नारद रेवतीषु<br>दामोदरायेत्यभिपूजनीयम् ।<br>ऋक्षेऽनुराधासु च माधवाय<br>नमस्तथोरःस्थलमेव पूज्यम् ॥ १२<br><br>पृष्ठं धनिष्ठासु च पूजनीय-<br>मघौघविध्वंसकराय तच्च ।<br>श्रीशङ्खचक्रासिगदाधराय<br>नमो विशाखासु भुजाश्च पूज्याः ॥ १३ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! आपने तो बड़ा उत्तम प्रश्न किया, यह तो समस्त लोकोंके लिये हितकारी है। नारद! जो सुननेमात्रसे शान्ति प्रदान करनेवाला है, वह व्रत मैं बतला रहा हूँ, सुनो। नक्षत्रपुरुष* नामक एक व्रत है, जो भगवान् नारायणका स्वरूप ही है। इस व्रतमें चैत्रमास आनेपर भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करते हुए विधिपूर्वक चरणसे लेकर मस्तकपर्यन्तकी एक विष्णुकी मूर्ति बनावे। फिर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर मूल आदि नक्षत्रोंमें क्रमशः भगवान् विष्णुकी उस प्रतिमाका पूजन करे। मूल-नक्षत्रमें 'विश्वधराय नमः'—'विश्वके धारकको नमस्कार है'—यों कहकर दोनों चरणोंकी, रोहिणी नक्षत्रमें 'अनन्ताय नमः'—'अनन्तको प्रणाम है'—कहकर दोनों गुल्फोंकी तथा अश्विनी नक्षत्रमें 'वरदाय नमः'—'वरदाताको अभिवादन है'—कहकर दोनों जानुओं और दोनों जङ्घाओंकी पूजा करे। पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ नक्षत्रोंमें 'शिवाय नमः'—'शिवजीको नमस्कार है'—कहकर दोनों ऊरुओंकी पूजा करे। पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रोंमें 'पञ्चशराय नमः'—'पाँच बाण धारण करनेवालेको प्रणाम है'—कहकर जननेन्द्रियकी पूजा करे। नारद! कृत्तिकानक्षत्रमें 'शार्ङ्गधराय नमः'—'शार्ङ्ग-धनुष धारण करनेवालेको अभिवादन है'—कहकर भगवान् विष्णुकी कटिका पूजन करे। इसी प्रकार पूर्वभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद नक्षत्रोंमें 'केशिनिषूदनाय नमः'—'केशी नामक असुरके संहारकको नमस्कार है'—कहकर दोनों पार्श्वभागोंकी पूजा करे। नारद! रेवती नक्षत्रमें 'दामोदराय नमः'—'दामोदरको प्रणाम है'—कहकर दोनों कुक्षियोंकी पूजा करनी चाहिये। अनुराधा नक्षत्रमें 'माधवाय नमः'—'माधव (लक्ष्मीके प्राणपति)-को अभिवादन है'—कहकर वक्षःस्थलकी पूजा करे। धनिष्ठा नक्षत्रमें 'अघौघविध्वंसकराय नमः'—'पापसमूहके विनाशकको नमस्कार है'—कहकर पृष्ठभागकी पूजा करनी चाहिये। विशाखा नक्षत्रमें 'श्रीशङ्खचक्रासिगदाधराय नमः'—'लक्ष्मी, शङ्ख, चक्र, खड्ग और गदा धारण करनेवालेको प्रणाम है'—कहकर भुजाओंका पूजन करना चाहिये॥ ६—१३॥ |


* वामनपुराण अध्याय ८० के 'नक्षत्रपुरुष' व्रतमें भी प्रायः ये ही बातें स्वल्पान्तरसे आयी हैं। वहाँ पूजाके मन्त्र नहीं, पर दोहदपदार्थ—अभिलषित पदार्थ उपदिष्ट हैं। इस अर्चामें नक्षत्रक्रमसे नहीं, अङ्गक्रमसे निर्दिष्ट हैं। यह अद्भुत बात है।

* अध्याय ५४ *२२३

| हस्ते तु हस्ता मधुसूदनाय<br>नमोऽभिपूज्या इति कैटभारेः।<br>पुनर्वसावङ्गुलिपूर्वभागाः<br>साम्नामधीशाय नमोऽभिपूज्याः॥ १४॥ | हस्तनक्षत्रमें 'मधुसूदनाय नमः'—'मधु नामक दैत्यके वधकर्ताको अभिवादन है'—कहकर कैटभ नामक असुरके शत्रु—भगवान् विष्णुके (चारों) हाथोंका पूजन करे। पुनर्वसुनक्षत्रमें 'साम्नामधीशाय नमः'—'सामवेदकी ऋचाओंके अधीश्वरको नमस्कार है'—कहकर अङ्गुलियोंके अग्रभागकी पूजा करे। आश्लेषा-नक्षत्रके दिन 'मत्स्यशरीरभाजः पादौ शरणं व्रजामि'—'मत्स्य-शरीरधारीके चरणोंके शरणागत हूँ'—कहकर नखोंकी पूजा करनी चाहिये। ज्येष्ठानक्षत्रमें 'कूर्मस्य पादौ शरणं व्रजामि'—'कूर्मरूपधारी भगवान्‌के चरणोंकी शरणमें जाता हूँ'—कहकर कण्ठस्थानमें भगवान् श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। श्रवणनक्षत्रमें 'वराहाय नमः'—'वराहरूपधारी भगवान्‌को प्रणाम है'—कहकर भगवान् जनार्दनके दोनों कानोंका* भलीभाँति पूजन करे। पुष्य-नक्षत्रमें 'दानवसूदनाय नृसिंहाय नमः'—'दानवोंके विनाशक नृसंहरूपधारी भगवान्‌को अभिवादन है'—कहकर मुखकी अर्चना करनी चाहिये। स्वातीनक्षत्रमें 'कारणवामनाय नमो नमः'—'कारणवश वामनरूपधारी भगवान्‌को बारम्बार नमस्कार है'—कहकर दाँतोंके अग्रभागकी पूजा करनी चाहिये। द्विजवर नारद! शतभिष्-नक्षत्रमें 'भार्गवनन्दनाय नमः'—'भार्गवनन्दन परशुरामजीको प्रणाम है'—कहकर मुखके मध्यभागका पूजन करे। मघानक्षत्रमें 'रामाय नमोऽस्तु'—'श्रीरामको अभिवादन है'—कहकर श्रीरघुनन्दनकी नासिकाकी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। मृगशिरानक्षत्रमें 'विघूर्णिताक्ष राम! ते नमोऽस्तु'—'तिरछी चितवनसे युक्त राम! आपको नमस्कार है'—कहकर उत्तमाङ्गरूप नेत्रोंकी पूजा करे। चित्रानक्षत्रमें 'शान्ताय बुद्धाय नमः'—'परम शान्त बुद्धभगवान्‌को प्रणाम है'—कहकर भगवान् मुरारिके ललाटका पूजन करना चाहिये। भरणीनक्षत्रमें 'विश्वेश्वर कल्किरूपिणे नमोऽस्तु'—'विश्वेश्वर! कल्किरूपधारी आपको अभिवादन है'—कहकर भगवान् विष्णुके सिरका पूजन करे। आर्द्रानक्षत्रमें 'हरये नमस्ते'—'श्रीहरिको नमस्कार है'—कहकर पुरुषोत्तमभगवान्‌के बालोंकी पूजा करनी चाहिये। व्रती मनुष्यद्वारा उपर्युक्त नक्षत्र-दिनोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका भी भक्तिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे पूजन करते रहना चाहिये॥ १४—२०॥ | | भुजङ्गनक्षत्रदिने नखानि<br>सम्पूजयेन्मत्स्यशरीरभाजः ।<br>कूर्मस्य पादौ शरणं व्रजामि<br>ज्येष्ठासु कण्ठे हरिरर्चनीयः॥ १५॥ | | | श्रोत्रे वराहाय नमोऽभिपूज्ये<br>जनार्दनस्य श्रवणेन सम्यक्।<br>पुष्ये मुखं दानवसूदनाय<br>नमो नृसिंहाय च पूजनीयम्॥ १६॥ | | | नमो नमः कारणवामनाय<br>स्वातीषु दन्ताग्रमथार्चनीयम्।<br>आस्यं हरेर्भागवनन्दनाय<br>सम्पूजनीयं द्विज वारुणे तु॥ १७॥ | | | नमोऽस्तु रामाय मघासु नासा<br>सम्पूजनीया रघुनन्दनस्य।<br>मृगोत्तमाङ्गे नयनेऽभिपूज्ये<br>नमोऽस्तु ते राम विघूर्णिताक्ष॥ १८॥ | | | बुद्धाय शान्ताय नमो ललाटं<br>चित्रासु सम्पूज्यतमं मुरारेः।<br>शिरोऽभिपूज्यं भरणीषु विष्णो-<br>र्नमोऽस्तु विश्वेश्वर कल्किरूपिणे॥ १९॥ | | | आर्द्रासु केशाः पुरुषोत्तमस्य<br>सम्पूजनीया हरये नमस्ते।<br>उपोषितेनर्क्षदिनेषु भक्त्या<br>सम्पूजनीया द्विजपुङ्गवाः स्युः॥ २०॥ | |


* यहाँ पुनर्वसुका सामवेदसे, हस्तका हाथोंसे तथा श्रवणमें कानों आदिसे सम्बन्ध दिखलाकर आलंकारिक चमत्कार प्रकृष्ट हुआ है।

२२४

* मत्स्यपुराण *

| पूर्णं व्रते सर्वगुणान्विताय<br>वाग्रूपशीलाय च सामगाय।<br>हैमीं विशालायतबाहुदण्डां<br>मुक्ताफलेन्दूपलवज्रयुक्ताम् ॥ २१<br>जलस्य पूर्णे कलशे निविष्टा-<br>मर्चां हरेर्वस्त्रगवा सहैव।<br>शय्यां तथोपस्करभाजनादि-<br>युक्तां प्रदद्याद् द्विजपुङ्गवाय ॥ २२<br>यद्यस्ति यत्किञ्चिदिहास्ति देयं<br>दद्याद् द्विजायात्महिताय सर्वम्।<br>मनोरथं नः सफलीकुरुष्व<br>हिरण्यगर्भाच्युतरूद्ररूपिन् ॥ २३<br>सलक्ष्मीकं सभार्याय काञ्चनं पुरुषोत्तमम्।<br>शय्यां च दद्यान्मन्त्रेण ग्रन्थिभेदविवर्जिताम् ॥ २४<br>यथा न विष्णुभक्तानां वृजिनं जायते क्वचित्।<br>तथा सुरूपताऽऽरोग्यं केशवे भक्तिमुत्तमाम् ॥ २५<br>यथा न लक्ष्म्या शयनं तव शून्यं जनार्दन।<br>शय्या ममाप्यशून्यास्तु कृष्ण जन्मनि जन्मनि ॥ २६<br>एवं निवेद्य तत् सर्वं वस्त्रमाल्यानुलेपनम्।<br>नक्षत्रपुरुषज्ञाय विप्रायथ विसर्जयेत् ॥ २७<br>भुञ्जीतातैललवणं सर्वर्क्षेष्वप्युपोषितः।<br>भोजनं च यथाशक्ति वित्तशाठ्यं विवर्जयेत् ॥ २८<br>इति नक्षत्रपुरुषमुपास्य विधिवत् स्वयम्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते ॥ २९<br>ब्रह्महत्यादिकं किञ्चिदिह वामुत्र वा कृतम्।<br>आत्मना वाथ पितृभिस्तत् सर्वं क्षयमाप्नुयात् ॥ ३०<br>इति पठति शृणोति यश्च भक्त्या<br>पुरुषवरो व्रतमङ्गनाथ कुर्यात्।<br>कलिकलुषविदारणं मुरारेः<br>सकलविभूतिफलप्रदं च पुंसां ॥ ३१ | इस प्रकार व्रतके समाप्त होनेपर जो सम्पूर्ण सद्गुणोंसे सम्पन्न, वक्ता, सौन्दर्यशाली, सुशील और सामवेदका ज्ञाता हो, ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मणको उस स्वर्णनिर्मित एवं मुक्ताफल, चन्द्रकान्त-मणि और हीरेसे खचित जलपूर्ण कलशमें रखी हुई विशाल एवं लम्बी भुजाओंवाली श्रीहरिकी अर्चा-मूर्तिका वस्त्र और गौके साथ दान कर देना चाहिये। साथ ही पात्र आदि सभी सामग्रियोंसे युक्त शय्याका भी दान करना चाहिये। इस प्रकार उस समय अपने पास जो कुछ भी दान देनेयोग्य वस्तु हो, वह सब अपने कल्याणके लिये उस ब्राह्मणको दान कर दे और उससे यों प्रार्थना करे—'ब्रह्मा, विष्णु और शिवस्वरूप द्विजवर ! आप हमारे मनोरथको सफल कीजिये।' स्वर्णनिर्मित लक्ष्मीसहित पुरुषोत्तमभगवान्की मूर्तिका तथा ग्रन्थिभेदरहित शय्याका मन्त्रोच्चारणपूर्वक सपत्नीक ब्राह्मणको दान करनेका विधान है। उस समय ऐसी प्रार्थना करे—'भगवन् ! जैसे विष्णु-भक्तोंको कहीं भी कष्ट नहीं प्राप्त होता, वैसे ही मुझे भी (आपकी कृपासे) सुन्दर रूप, नीरोगता और आप-भगवान् केशवके प्रति उत्तम भक्ति प्राप्त हो। जनार्दन ! जैसे आपकी शय्या कभी लक्ष्मीसे शून्य नहीं रहती, श्रीकृष्ण ! वैसे ही मेरी भी शय्या प्रत्येक जन्ममें अशून्य बनी रहे।' इस प्रकार निवेदन कर वस्त्र, माला, चन्दन आदि सभी वस्तुएँ नक्षत्रपुरुष-व्रतके ज्ञाता ब्राह्मणको देकर व्रतका विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार सभी नक्षत्रोंमें उपवास करके एक बार तेल और नमकरहित भोजन करनेका विधान है। वह भोजन शक्तिके अनुसार उपयुक्त होना चाहिये। उसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार स्वयं विधिपूर्वक नक्षत्रपुरुषकी उपासना करके मनुष्य इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और मृत्युके पश्चात् विष्णुलोकमें पूजित होता है। साथ ही इहलोक अथवा परलोकमें अपने अथवा पितरोंद्वारा जो कुछ भी ब्रह्महत्या आदि पाप घटित हुए रहते हैं, वे सभी नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष अथवा स्त्री—जो कोई भी हो, उसे इस व्रतका पठन, श्रवण और अनुष्ठान करना चाहिये। भगवान् मुरारिका यह व्रत कलिके प्रभावसे घटित हुए पापोंको विदीर्ण करनेवाला और समस्त विभूतियोंके फलका प्रदाता है॥ २१—३१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नक्षत्रपुरुषव्रतं नाम चतुःपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नक्षत्रपुरुष-व्रत नामक चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥

५८ तालाब, बगीचा, कुआँ, बावली, पुष्करिणी तथा देवमन्दिरकी प्रतिष्ठा आदिका विधान

* अध्याय ५५ *२२५

पचपनवाँ अध्याय

आदित्यशयन<sup>*</sup>-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

नारद उवाचनारदजीने पूछा— भगवन्! जो अभ्यास न होनेके कारण अथवा रोगवश उपवास करनेमें असमर्थ है, किंतु उसका फल चाहता है, उसके लिये कौन-सा व्रत उत्तम है—यह बताइये॥ १॥
उपवासेष्वशक्तस्य तदेव फलमिच्छतः।<br>अनभ्यासेन रोगाद् वा किमिष्टं व्रतमुत्तमम्॥ १
ईश्वर उवाचभगवान् शंकरने कहा— नारद! जो लोग उपवास करनेमें असमर्थ हैं, उनके लिये वही व्रत अभीष्ट है, जिसमें दिनभर उपवास करके रात्रिमें भोजनका विधान हो; मैं ऐसे महान् एवं अक्षय फल देनेवाले व्रतका परिचय देता हूँ, सुनो। उस व्रतका नाम है—'आदित्यशयन'। उसमें विधिपूर्वक भगवान् शङ्करकी पूजा की जाती है। पुराणोंके ज्ञाता महर्षि जिन नक्षत्रोंके योगमें इस व्रतका उपदेश करते हैं, उन्हें बताता हूँ। जब सप्तमी तिथिको हस्तनक्षत्रके साथ रविवार हो अथवा सूर्यकी संक्रान्ति हो, वह तिथि समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली होती है। उस दिन सूर्यके नामोंसे भगवती पार्वती और महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये। सूर्यदेवकी प्रतिमा तथा शिवलिङ्गका भी भक्तिपूर्वक पूजन करना उचित है; क्योंकि मुनिश्रेष्ठ! उमापति शङ्कर अथवा सूर्यमें कहीं भेद नहीं देखा जाता; इसलिये अपने घरमें शङ्करजीकी अर्चना करनी चाहिये। हस्तनक्षत्रमें 'सूर्याय नमः' का उच्चारण करके सूर्यदेवके चरणोंकी, चित्रा-नक्षत्रमें 'अर्काय नमः' कहकर उनके गुल्फों (घुट्टियों)-की, स्वातीनक्षत्रमें 'पुरुषोत्तमाय नमः' से पिंडलियोंकी, विशाखामें 'धात्रे नमः' से घुटनोंकी तथा अनुराधामें 'सहस्रभानवे नमः' से दोनों जाँघोंकी पूजा करनी चाहिये। ज्येष्ठानक्षत्रमें 'अनङ्गाय नमः' से गुह्य प्रदेशकी, मूलमें 'इन्द्राय नमः' और 'भीमाय नमः' से कटिभागकी पूजा करे॥ २—८॥
उपवासेष्वशक्तानां नक्तं भोजनमिष्यते।<br>यस्मिन् व्रते तदप्यत्र श्रूयतामक्षयं महत्॥ २
आदित्यशयनं नाम यथावच्छङ्करार्चनम्।<br>येषु नक्षत्रयोगेषु पुराणज्ञाः प्रचक्षते॥ ३
यदा हस्तेन सप्तम्यामादित्यस्य दिनं भवेत्।<br>सूर्यस्य चाथ संक्रान्तिस्तिथिः सा सार्वकामिकी॥ ४
उमामहेश्वरस्यार्चामर्चयेत् सूर्यनामभिः।<br>सूर्यार्चां शिवलिङ्गं च प्रकुर्वन् पूजयेद् यतः॥ ५
उमापते रवेर्वापि न भेदो दृश्यते क्वचित्।<br>यस्मात् तस्मान्मुनिश्रेष्ठ गृहे शम्भुं (भानुं) समर्चयेत्॥ ६
हस्ते च सूर्याय नमोऽस्तु पादाव-<br>  कार्य चित्रासु च गुल्फदेशम्।<br>स्वातीषु जङ्घे पुरुषोत्तमाय<br>  धात्रे विशाखासु च जानुदेशम्॥ ७
तथानुराधासु नमोऽभिपूज्य-<br>  मूरुद्वयं चैव सहस्रभानोः।<br>ज्येष्ठास्वनङ्गाय नमोऽस्तु गुह्य-<br>  मिन्द्राय भीमाय कटिं च मूले॥ ८

* इस अध्यायमें आदित्यशयन नामक बड़े सरस व्रतधर्मका उल्लेख है। सूर्यके नामोंमें वेद, वाल्मीकीय रामायण युद्धकाण्ड एवं भविष्यपुराणके आदित्यहृदयादिमें भी आये हुए नाम हैं। मत्स्यपुराणकी सभी प्रतियाँ यहाँ बहुत अशुद्ध हैं। अन्य पुराणों तथा व्रतनिबन्धोंके सहारे ये पाठ शुद्ध किये गये हैं।

२२६* मत्स्यपुराण *

| पूर्वोत्तराषाढयुगे च नाभिं<br>त्वष्ट्रे नमः समतुरङ्गमाय।<br>तीक्ष्णांशवे च श्रवणे च कुक्षौ<br>पृष्ठं धनिष्ठासु विकर्तनाय ॥ ९<br>वक्षःस्थलं ध्वान्तविनाशनाय<br>जलाधिपर्क्षैः परिपूजनीयम्।<br>पूर्वोत्तराभाद्रपदद्वये च<br>बाहू नमश्चण्डकराय पूज्यौ ॥ १०<br>साम्रामधीशाय करद्वयं च<br>सम्पूजनीयं द्विज रेवतीषु।<br>नखानि पूज्यानि तथाश्विनीषु<br>नमोऽस्तु समाश्वधुरंधराया ॥ ११<br>कठोरधाम्ने भरणीषु कण्ठं<br>दिवाकरायेत्यभिपूजनीया ।<br>ग्रीवाग्निपर्क्षेऽधरमम्बुजेशे<br>सम्पूजयेन्नारद रोहिणीषु ॥ १२<br>मृगेऽर्चनीया रसना पुरारेः<br>रौद्रे तु दन्ता हरये नमस्ते।<br>नमः सवित्रे इति शंकरस्य<br>नासाभिपूज्या च पुनर्वसौ च ॥ १३<br>ललाटमम्भोरुहवल्लभाय<br>पुष्येऽलकान् वेदशरीरधारिणे।<br>सार्पेऽथ मौलिं विबुधप्रियाय<br>मघासु कर्णाविति गोगणेशे ॥ १४<br>पूर्वासु गोब्राह्मणनन्दनाय<br>नेत्राणि सम्पूज्यतमानि शम्भोः।<br>अथोत्तराफल्गुनिभे ध्रुवौ च<br>विश्वेश्वरायेति च पूजनीये ॥ १५<br>नमोऽस्तु पाशाङ्कुशपद्मशूल-<br>कपालसर्पेन्दुधनुर्धराय ।<br>गजासुरानङ्गपुरान्धकादि-<br>विनाशमूलाय नमः शिवाय ॥ १६<br>इत्यादि चास्त्राणि च पूजयित्वा<br>विश्वेश्वरायेति शिवोऽभिपूज्यः।<br>भोक्तव्यमत्रैवमतैलशाक-<br>ममांसमक्षारमभुक्तशेषम् ॥ १७ | पूर्वाषाढ और उत्तराषाढमें 'त्वष्ट्रे नमः' और 'समतुरङ्गाय नमः' से नाभिकी, श्रवणमें 'तीक्ष्णांशवे नमः' से दोनों कुक्षियोंकी, धनिष्ठामें 'विकर्तनाय नमः' से पृष्ठभागकी और शतभिष नक्षत्रमें 'ध्वान्तविनाशनाय नमः' से सूर्यके वक्षःस्थलकी पूजा करनी चाहिये। द्विजवर! पूर्वाभाद्रपद और उत्तराभाद्रपदमें 'चण्डकराय नमः' से दोनों भुजाओंका, रेवतीमें 'साम्रामधीशाय नमः' से दोनों हाथोंका पूजन करना चाहिये। अश्विनीमें 'समाश्र्वधुरंधराय नमः' से नखोंका और भरणीमें 'कठोरधाम्ने नमः' से भगवान् सूर्यके कण्ठका पूजन करे। नारदजी! कृत्तिकामें 'दिवाकराय नमः' से ग्रीवाकी, रोहिणीमें 'अम्बुजेशाय नमः' से सूर्यदेवके ओठोंकी, मृगशिरामें 'हरये नमस्ते' से त्रिपुर-दाहक शिवकी जिह्वाकी और आर्द्रा नक्षत्रमें 'रुद्राय नमः' से उनके दाँतोंकी पूजा करनी चाहिये। पुनर्वसुमें 'सवित्रे नमः' से शङ्करजीकी नासिकाका, पुष्यमें 'अम्भोरुहवल्लभाय नमः' से ललाटका तथा 'वेदशरीरधारिणे नमः' से शिवके बालोंका पूजन करना चाहिये। आश्लेषामें 'विबुधप्रियाय नमः' से उनके मस्तकका, मघामें 'गोगणेशाय नमः' से शङ्करजीके दोनों कानोंका, पूर्वाफाल्गुनीमें 'गोब्राह्मणनन्दनाय नमः' से शम्भुके नेत्रोंका तथा उत्तराफाल्गुनीनक्षत्रमें 'विश्वेश्वराय नमः' से उनकी दोनों भौंहोंका पूजन करे। 'पाश, अङ्कुश, त्रिशूल, कमल, कपाल, सर्प, चन्द्रमा तथा धनुष धारण करनेवाले श्रीमहादेवजीको नमस्कार है। गजासुर, कामदेव, त्रिपुर और अन्धकासुर आदिके विनाशके मूल कारण भगवान् श्रीशिवको प्रणाम है।' इत्यादि वाक्योंका उच्चारण करके प्रत्येक अङ्गकी पूजा करनेके पश्चात् 'विश्वेश्वराय नमः' से भगवान् शिवका पूजन करना चाहिये। तदनन्तर अन्न-भोजन करना उचित है। भोजनमें तेलसे युक्त शाक और खारे नमकका उपयोग नहीं करना चाहिये। मांस और उच्छिष्ट अन्नका तो कदापि सेवन न करे॥ ९-१७॥ |

* अध्याय ५५ * २२७

| इत्येवं द्विज नक्तानि कृत्वा दद्यात् पुनर्वसौ ।<br>शालेयतण्डुलप्रस्थमौदुम्बरमये घृतम् ॥ १८<br><br>संस्थाप्य पात्रे विप्राय सहिरण्यं निवेदयेत् ।<br>सप्तमे वस्त्रयुग्मं च पारणे त्वधिकं भवेत् ॥ १९<br><br>चतुर्दशे तु सम्प्राप्ते पारणे नारदाब्दिके ।<br>ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या गुडक्षीरघृतादिभिः ॥ २०<br><br>कृत्वा तु काञ्चनं पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम् ।<br>शुद्धमष्टाङ्गुलं तच्च पद्मरागदलान्वितम् ॥ २१<br><br>शय्यां सुलक्षणां कृत्वा विरुद्धग्रन्थिवर्जिताम् ।<br>सोपधानकविश्रामस्वास्तरव्यजनाश्रिताम् ॥ २२<br><br>भाजनोपानहच्छत्रचामरासनदर्पणैः ।<br>भूषणैरपि संयुक्तां फलवस्त्रानुलेपनैः ॥ २३<br><br>तस्यां विधाय तत्पद्ममलङ्कृत्य गुणान्विताम् ।<br>कपिलां वस्त्रसंयुक्तां सुशीलां च पयस्विनीम् ॥ २४<br><br>रौप्यखुरीं हेमशृङ्गीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।<br>दद्यान्मन्त्रेण पूर्वाह्ने न चैनामभिलङ्घयेत् ॥ २५<br><br>यथैवादित्य शयनमशून्यं तव सर्वदा ।<br>कान्त्या धृत्या श्रिया रत्या तथा मे सन्तु सिद्धयः ॥ २६<br><br>यथा न देवाः श्रेयांसं त्वदन्यमनघं विदुः ।<br>तथा मामुद्धराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥ २७<br><br>ततः प्रदक्षिणीकृत्य प्रणिपत्य विसर्जयेत् ।<br>शय्यागवादि तत् सर्वं द्विजस्य भवनं नयेत् ॥ २८ | द्विजवर नारद! इस प्रकार रात्रिमें शुद्ध भोजन करके पुनर्वसुनक्षत्रमें गूलरकी लकड़ीके पात्रमें एक सेर अगहनीका चावल तथा घृत रखकर सुवर्णके साथ उसे ब्राह्मणको दान करना चाहिये। सातवें दिनके पारणमें और दिनोंकी अपेक्षा एक जोड़ा वस्त्र अधिक दान करना चाहिये। नारद! चौदहवें दिनमें पारणमें गुड़, खीर और घृत आदिके द्वारा ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराये। तदनन्तर कर्णिकासहित सोनेका अष्टदल कमल बनवाये, जो आठ अङ्गुलका हो तथा जिसमें पद्मरागमणि (माणिक्य अथवा लाल)-की पत्तियाँ अङ्कित की गयी हों। फिर सुन्दर शय्या तैयार करावे, जिसपर सुन्दर बिछौने बिछाकर तकिया रखा गया हो, शय्याके ऊपर पंखा रखा गया हो। उसके आस-पास बर्तन, खड़ाऊँ, जूता, छत्र, चँवर, आसन और दर्पण रखे गये हों। फल, वस्त्र, चन्दन तथा आभूषणोंसे वह शय्या सुशोभित होनी चाहिये। ऊपर बताये हुए सर्वगुणसम्पन्न सोनेके कमलको अलङ्कृत करके उस शय्यापर रख दे। इसके बाद मन्त्रोच्चारणपूर्वक दूध देनेवाली अत्यन्त सीधी कपिला गौका दान करे। वह गौ उत्तम गुणोंसे सम्पन्न, वस्त्राभूषणोंसे सुशोभित और बछड़ेसहित होनी चाहिये। उसके खुर चाँदीसे और सींग सोनेसे मढ़े होने चाहिये तथा उसके साथ काँसेकी दोहनी होनी चाहिये। दिनके पूर्व भागमें ही दान करना उचित है। समयका उल्लङ्घन कदापि नहीं करना चाहिये। शय्यादानके पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—'सूर्यदेव! जिस प्रकार आपकी शय्या कान्ति, धृति, श्री और रतिसे कभी सूनी नहीं होती, वैसे ही मुझे भी सिद्धियाँ प्राप्त हों। देवगण आपके सिवा और किसीको निष्पाप एवं श्रेयस्कर नहीं जानते, इसलिये आप सम्पूर्ण दुःखोंसे भरे हुए इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।' इसके पश्चात् भगवान्‌की प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम करनेके अनन्तर विसर्जन करे। शय्या और गौ आदि समस्त पदार्थोंको ब्राह्मणके घर पहुँचा दे॥ १८-२८ ॥ | | नैतद् विशीलाय न दाम्भिकाय<br>कुतर्कदुष्टाय विनिन्दकाय ।<br>प्रकाशनीयं व्रतमिन्दुमौले-<br>र्यंश्चापि निन्दामधिकां विधत्ते ॥ २९ | दुराचारी और दम्भी पुरुषके सामने भगवान् शंकरके इस व्रतकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। जो गौ, ब्राह्मण, देवता, अतिथि और धार्मिक पुरुषोंकी विशेषरूपसे निन्दा करता है, उसके सामने भी इसको प्रकट न करे। |

२२८ * मत्स्यपुराण *

| भक्ताय दान्ताय च गुह्यमेत-<br>दाख्येयमानन्दकरं शिवस्य।<br>इदं महापातकभिन्Doc/कराणा-<br>मप्यक्षरं वेदविदो वदन्ति॥ ३०<br>न बन्धुपुत्रेण धनैर्वियुक्तः<br>पत्नीभिरानन्दकरः सुराणाम्।<br>नाभ्येति रोगं न च शोकदुःखं<br>या वाथ नारी कुरुतेऽतिभक्त्या॥ ३१<br>इदं वसिष्ठेन पुरार्जुनेन<br>कृतं कुबेरेण पुरन्दरेण।<br>यत्कीर्त्तनेनाप्यखिलानि नाश-<br>मायान्ति पापानि न संशयोऽस्ति॥ ३२<br>इति पठति शृणोति वा य इत्थं<br>रविशयनं पुरुहूतवल्लभः स्यात्।<br>अपि नरकगतान् पितॄनशेषा-<br>नपि दिवमानयतीह यः करोति॥ ३३ | भगवान्के भक्त और जितेन्द्रिय पुरुषके समक्ष ही शिवजीका यह आनन्ददायी एवं गूढ़ रहस्य प्रकाशित करनेके योग्य है। वेदवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि यह व्रत महापातकी मनुष्योंके भी पापोंका नाश कर देता है। जो पुरुष इस व्रतका अनुष्ठान करता है, उसका बन्धु, पुत्र, धन और स्त्रीसे कभी वियोग नहीं होता तथा वह देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाला माना जाता है। इसी प्रकार जो नारी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करती है उसे कभी रोग, दुःख और शोकका शिकार नहीं होना पड़ता। प्राचीनकालमें महर्षि वसिष्ठ, अर्जुन, कुबेर तथा इन्द्रने इस व्रतका आचरण किया था। इस व्रतके कीर्तनमात्रसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो पुरुष इस आदित्यशयन नामक व्रतके माहात्म्य एवं विधिको पाठ या श्रवण करता है, वह इन्द्रका प्रियतम होता है तथा जो इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह नरकमें भी पड़े हुए समस्त पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है॥ २९—३३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदित्यशयनव्रतं नाम पञ्चपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आदित्यशयनव्रत नामक पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५५॥


छप्पनवाँ अध्याय

श्रीकृष्णाष्टमी-*व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

श्रीभगवानुवाचश्रीभगवान्ने कहा—नारद! अब मैं श्रीकृष्णाष्टमी-
कृष्णाष्टमीमथो वक्ष्ये सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>शान्तिर्मुक्तिश्च भवति जयः पुंसां विशेषतः॥ १व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो समस्त पापोंका विध्वंस करनेवाला है। इस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्योंको विशेषरूपसे शान्ति, मुक्ति और विजयकी प्राप्ति होती है।
शङ्करं मार्गशिरसि शम्भुं पौषेऽभिपूजयेत्।<br>माघे महेश्वरं देवं महादेवं च फाल्गुने॥ २मनुष्यको अगहनमासमें शङ्करकी और पौषमासमें शम्भुकी पूजा करनी चाहिये। माघमासमें देवाधिदेव महेश्वरका, फाल्गुनमासमें महादेवका, चैत्रमासमें स्थाणुका, और उसी
स्थाणुं चैत्रे शिवं तद्वद् वैशाखे त्वर्चयेन्नरः।<br>ज्येष्ठे पशुपतिं चार्चेदाषाढे उग्रमर्चयेत्॥ ३प्रकार वैशाखमासमें शिवका पूजन करना उचित है। ज्येष्ठ-मासमें पशुपतिकी और आषाढ़मासमें उग्रकी अर्चना करे।

* यह श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीसे भिन्न शिवोपासनाका एक मुख्य अङ्गभूत व्रत है। इसकी महिमा तथा अनुष्ठानविधिका वर्णन भविष्य, नारद, सौरपुराण १४। १—३६, व्रतकल्पद्रुम आदिमें बहुत विस्तारसे है। विशेष जानकारीके लिये उन्हें भी देखना चाहिये।

* अध्याय ५६ *२२९

| पूजयेच्छावणे शर्वं नभस्ये त्र्यम्बकं तथा।<br>हरमाश्वयुजे मासि तथेशानं च कार्त्तिके॥ ४<br><br>कृष्णाष्टमीषु सर्वासु शक्तः सम्पूजयेद् द्विजान्।<br>गोभूहिरण्यवादोभिः शिवभक्तांश्च शक्तितः॥ ५<br><br>गोमूत्रघृतगोक्षीरतिलान् यवकुशोदकम्।<br>गोशृङ्गोदशीरीषार्कबिल्वपत्रदधीनि च।<br>पञ्चगव्यं च सम्प्राश्य शंकरं पूजयेन्निशि॥ ६<br><br>अश्वत्थं च वटं चैवोदुम्बरं प्लक्षमेव च।<br>पलाशं जम्बुवृक्षं च विदुः षष्ठं महर्षयः॥ ७<br><br>मार्गशीर्षादिमासाभ्यां द्वाभ्यां द्वाभ्यामिति क्रमात्।<br>एकैकं दन्तपवनं वृक्षेष्वेतेषु भक्षयेत्॥ ८<br><br>देवाय दद्यादर्घ्यं च कृष्णां गां कृष्णवाससम्।<br>दद्यात् समाप्ते दध्यन्नं वितानध्वजचामरम्॥ ९<br><br>द्विजानामुदकुम्भांश्च पञ्चरत्नसमन्वितान्।<br>गावः कृष्णाः सुवर्णं च वासांसि विविधानि च।<br>अशक्तस्तु पुनर्दद्यात् गामेकामपि शक्तितः॥ १०<br><br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषमवाप्नुयात्।<br>कृष्णाष्टमीमुपोष्यैव सप्तकल्पशतत्रयम्।<br>पुमान् सम्पूजितो देवैः शिवलोके महीयते॥ ११ | श्रावणमासमें शर्वकी, भाद्रपदमासमें त्र्यम्बककी, आश्विनमासमें हरकी तथा कार्तिकमासमें ईशानकी पूजा करनी चाहिये। धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न व्रतीको चाहिये कि कृष्णपक्षकी सभी अष्टमी तिथियोंमें अपनी शक्तिके अनुसार गौ, पृथ्वी, सुवर्ण और वस्त्रद्वारा शिव-भक्त ब्राह्मणोंकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करे। रातमें गोमूत्र, गोघृत, गोदुग्ध, तिल, यव, कुशोदक, गो-शृङ्गोदक, शिरीष (मौलसिरी)-का पुष्प, मन्दार-पुष्प, बिल्वपत्र और दधि—एकत्र मिश्रित हुए इन पदार्थोंका अथवा केवल पञ्चगव्य (गोदुग्ध, गोघृत, गोदधि, गोमूत्र और गोमय)-का प्राशन करके शङ्करजीकी पूजा करे। महर्षिगण मार्गशीर्षसे प्रारम्भकर कार्तिकतक तथा क्रमशः दो-दो मासोंमें पीपल, बरगद, गूलर, पाकड़, पलाश और छठे जामुनकी दातुनोंको—पूरे वर्षभर इस व्रतमें विशेष उपकारी मानते हैं। (इन वृक्षोंमेंसे एक-एक वृक्षकी दातुन दो-दो मासके क्रमसे करनी चाहिये, अर्थात् दो महीनेतक एक वृक्षकी दातुन करे, पुनः तीसरे-चौथे माससे दूसरे वृक्षकी करे।) फिर प्रधान देवताके निमित्त अर्घ्य देना चाहिये तथा काली गौ और काला वस्त्र दान करना चाहिये। व्रतकी समाप्तिके अवसरपर दही, अन्न, वितान (तम्बू, चँदोवा आदि), ध्वज, चँवर, पञ्चरत्नसे युक्त जलपूर्ण घड़ा, काली गौ, सुवर्ण, अनेकों प्रकारके रंग-विरंगे वस्त्र आदि ब्राह्मणोंको देनेका विधान है। जो उपर्युक्त वस्तुएँ देनेमें असमर्थ हो, वह अपनी शक्तिके अनुसार एक ही गौका दान करे। दान देनेमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो वह दोषका भागी होता है। जो मनुष्य इस श्रीकृष्णष्टमी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह इक्कीस सौ कल्पोंतक देवताओंद्वारा सम्मानित होकर शिवलोकमें पूजित होता है॥ १–११॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कृष्णाष्टमीव्रतं नाम षट्पञ्चाशोऽध्यायः॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें श्रीकृष्णष्टमी-व्रत नामक छप्पनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५६॥

५९ वृक्ष लगानेकी विधि

२३०* मत्स्यपुराण *

सत्तावनवाँ अध्याय

रोहिणीचन्द्रशयन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>दीर्घायुरारोग्यकुलाभिवृद्धि-<br>युक्तः पुमान् भूपकुलान्वितः स्यात्।<br>मुहुर्मुहुर्जन्मनि येन सम्यग्<br>व्रतं समाचक्ष्व तदिन्दुमौले ॥ १**नारदजीने पूछा—**चन्द्रभाल! जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य प्रत्येक जन्ममें दीर्घायु, नीरोगता, कुलीनता और अभ्युदयसे युक्त हो राजाके कुलमें जन्म पाता है, उस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन कीजिये॥ १॥
श्रीभगवानुवाच<br>त्वया पृष्टमिदं सम्यगुक्तं चाक्षय्यकारकम्।<br>रहस्यं तव वक्ष्यामि यत्पुराणविदो विदुः ॥ २**श्रीभगवान्‌ने कहा—**नारद! तुमने बड़ी उत्तम बात पूछी है। अब मैं तुम्हें वह गोपनीय व्रत बतलाता हूँ, जो अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है तथा जिसे पुराणवेत्ता विद्वान् ही जानते हैं।
रोहिणीचन्द्रशयनं नाम व्रतमिहोत्तमम्।<br>तस्मिन् नारायणस्यार्चामर्चयेदिन्दुनामभिः॥ ३इस लोकमें 'रोहिणीचन्द्रशयन' नामक व्रत बड़ा ही उत्तम है। इसमें चन्द्रमाके नामोंद्वारा भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये।
यदा सोमदिने शुक्ला भवेत् पञ्चदशी क्वचित्।<br>अथवा ब्रह्मणक्षत्रं पौर्णमास्यां प्रजायते ॥ ४जब कभी सोमवारके दिन पूर्णिमा-तिथि हो अथवा पूर्णिमाको रोहिणीनक्षत्र हो,
तदा स्नानं नरः कुर्यात् पञ्चगव्येन सर्षपैः।<br>आप्यायस्वेति च जपेद् विद्वानष्ट शतं पुनः॥ ५उस दिन मनुष्य सबेरे पञ्चगव्य और सरसोंके दानोंसे युक्त जलसे स्नान करे तथा विद्वान् पुरुष 'आप्यायस्व०' इत्यादि मन्त्रको एक सौ आठ बार जपे।
शूद्रोऽपि परया भक्त्या पाखण्डालापवर्जितः।<br>सोमाय वरदायाथ विष्णवे च नमो नमः॥ ६यदि शूद्र भी इस व्रतको करे तो अत्यन्त भक्तिपूर्वक 'सोमाय नमः', 'वरदाय नमः', 'विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंका जप करे और पाखण्डियों—विधर्मियोंसे बातचीत न करे।
कृतजप्यः स्वभवनमागत्य मधुसूदनम्।<br>पूजयेत् फलपुष्पैश्च सोमनामानि कीर्तयन्॥ ७जप करनेके पश्चात् अपने घर आकर फल-फूल आदिके द्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनकी पूजा करे। साथ ही चन्द्रमाके नामोंका उच्चारण करता रहे।
सोमाय शान्ताय नमोऽस्तुपादा-<br>वनन्तधाम्नेति च जानुजङ्घे।<br>ऊरुद्वयं चापि जलोदराय<br>सम्पूजयेन्मेढ्रमनन्तबाहोः ॥ ८'सोमाय नमः' से भगवान्‌के दक्षिण चरण और 'शान्ताय नमः' से वाम चरणका, 'अनन्तधाम्ने नमः' का उच्चारण करके उनके घुटनों और पिंडलियोंका, 'जलोदराय नमः' से दोनों जाँघोंका और 'अनन्तबाहवे नमः' से जननेन्द्रियका पूजन करे।
नमो नमः कामसुखप्रदाय<br>कटिः शशाङ्कस्य सदार्चनीया।<br>अथोदरं चाप्यमृतोदराय<br>नाभिः शशाङ्काय नमोऽभिपूज्या॥ ९'कामसुखप्रदाय नमो नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान्‌के कटिभागकी सदा अर्चना करनी चाहिये। इसी प्रकार 'अमृतोदराय नमः' से उदरका और 'शशाङ्काय नमः' से नाभिका पूजन करे।
नमोऽस्तु चन्द्राय प्रपूज्य कण्ठं<br>दन्ता द्विजानामधिपाय पूज्याः।<br>आस्यं नमश्चन्द्रमसेऽभिपूज्य-<br>मोष्ठौ कुमुद्वन्तवनप्रियाय ॥ १०'चन्द्राय नमोऽस्तु' से कण्ठका और 'द्विजानामधिपाय नमः' से दाँतोंका पूजन करना चाहिये। 'चन्द्रमसे नमः' से मुँहका पूजन करे। 'कुमुद्वन्तवनप्रियाय नमः' से
* अध्याय ५७ *२३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नासा च नाथाय वनौषधीना-<br>मानन्दबीजाय पुनर्ध्रुवौ च।<br>नेत्रद्वयं पद्मनिभं तथेन्दो-<br>रिन्दीवरव्यासकराय शौरेः॥ ११<br><br>नमः समस्ताध्वरवन्दिताय<br>कर्णद्वयं दैत्यनिषूदनाय ।<br>ललाटमिन्दोरुदधिप्रियाय<br>केशाः सुषुम्नाधिपतेः प्रपूज्याः॥ १२<br><br>शिरः शशाङ्काय नमो मुरारे-<br>र्विश्वेश्वरायेति नमः किरीटिने।<br>नमः श्रियै रोहिणिनामलक्ष्म्यै<br>सौभाग्यसौख्यामृतसागरायै ॥ १३<br><br>देवीं च सम्पूज्य सुगन्धपुष्पै-<br>र्नैवेद्यधूपादिभिरिन्दुपत्नीम् ।ओठोंका, 'वनौषधीनां नाथाय नमः' से नासिकाका, 'आनन्दबीजाय नमः' से दोनों भौंहोंका, 'इन्दीवरव्यासकराय नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके कमल-सदृश दोनों नेत्रोंका, 'समस्ताध्वरवन्दिताय दैत्यनिषूदनाय नमः' से दोनों कानोंका, 'उदधिप्रियाय नमः' से चन्द्रमाके ललाटका, 'सुषुम्नाधिपतये नमः' से केशोंका पूजन करे। 'शशाङ्काय नमः' से मस्तकका और 'विश्वेश्वराय नमः' से भगवान् मुरारिके किरीटका पूजन करे। फिर 'रोहिणीनामलक्ष्म्यै सौभाग्यसौख्यामृतसागराय पद्मश्रियै नमः'—रोहिणी नाम धारण करनेवाली सौभाग्य और सुखरूप अमृतके समुद्र लक्ष्मीको नमस्कार है—इस मन्त्रका उच्चारण कर सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य और धूप आदिके द्वारा इन्दुपत्नी रोहिणीदेवीका पूजन करे॥ २—१३ १/२॥
सुप्त्वाथ भूमौ पुनरुत्थितेन<br>स्नात्वा च विप्राय हविष्ययुक्तः॥ १४<br><br>दद्यात् प्रभाते सहिरण्यवारि-<br>कुम्भं नमः पापविनाशनाय।<br>सम्प्राश्य गोमूत्रममांसमन्न-<br>मक्षारमष्टावथ विंशतिं च।<br>ग्रासान् पयःसर्पियुतानुपोष्य<br>भुक्त्वाेतिहासं शृणुयान्मुहूर्तम् ॥ १५<br><br>कदम्बनीलोत्पलकेतकानि<br>जाती सरोजं शतपत्रिका च।<br>अम्लानकुब्जान्यथ सिन्धुवारं<br>पुष्पं पुनर्नारद मल्लिकायाः।<br>शुभ्रं च विष्णोः करवीरपुष्पं<br>श्रीचम्पकं चन्द्रमसे प्रदेयम् ॥ १६<br><br>श्रावणादिषु मासेषु क्रमादेतानि सर्वदा।<br>यस्मिन् मासे व्रतादिः स्यात् तत्पुष्पैरर्चयेद्धरिम्॥ १७इसके बाद रात्रिके समय भूमिपर शयन करे और सबेरे उठकर स्नानके पश्चात् 'पापविनाशाय नमः' का उच्चारण करके ब्राह्मणको घृत और सुवर्णसहित जलसे भरा कलश दान करे। फिर दिनभर उपवास करनेके पश्चात् गोमूत्र पीकर मांसवर्जित एवं खारे नमकसे रहित अन्नके अट्ठाईस ग्रास, दूध और घीके साथ भोजन करे। तदनन्तर दो घड़ीतक इतिहास, पुराण आदिका श्रवण करे। नारद! चन्द्रस्वरूप भगवान् विष्णुको कदम्ब, नील कमल, केवड़ा, जाती-पुष्प, कमल, शतपत्रिका, बिना कुम्हलाये कुब्जके फूल, सिन्दुवार, चमेली, अन्यान्य श्वेत पुष्प, करवीर-पुष्प तथा चम्पा—ये ही फूल चढ़ाने चाहिये। उपर्युक्त फूलोंकी जातियोंमेंसे एक-एकको श्रावण आदि महीनोंमें क्रमशः अर्पण करे। जिस महीनेमें व्रत प्रारम्भ किया जाय, उस समय जो भी पुष्प सुलभ हों, उन्हींके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये ॥ १४—१७॥
एवं संवत्सरं यावदुपास्य विधिवन्नरः।<br>व्रतान्ते शयनं दद्याद् दर्पणोपस्करान्वितम्॥ १८<br><br>रोहिणीचन्द्रमिथुनं कारयित्वाथ काञ्चनम्।<br>चन्द्रः षडङ्गुलः कार्यों रोहिणी चतुरङ्गुला॥ १९इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करके समाप्तिके समय व्रतीको चाहिये कि वह दर्पण तथा शयनोपयोगी सामग्रियोंके साथ शय्यादान करे। रोहिणी और चन्द्रमा—दोनोंकी सुवर्णमयी मूर्ति बनवाये। उनमें चन्द्रमा छः अङ्गुलके और रोहिणी चार अङ्गुलकी होनी चाहिये।