मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| २३४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवटशाखाकृतानि तु।<br>मण्डपस्य प्रतिदिशं द्वाराण्येतानि कारयेत्॥ १०<br>शुभास्तत्राष्ट होतारो द्वारपालास्तथाष्ट वै।<br>अष्टौ तु जापकाः कार्या ब्राह्मणा वेदपारगाः॥ ११<br>सर्वलक्षणसम्पूणों मन्त्रविद् विजितेन्द्रियः।<br>कुलशीलसमायुक्तः पुरोधाः स्याद् द्विजोत्तमः॥ १२<br>प्रतिगर्तेषु कलशा यज्ञोपकरणानि च।<br>व्यजनं चामरे शुभ्रे ताम्रपात्रे सुविस्तृते॥ १३ | मण्डपके चारों ओर क्रमशः पीपल, गूलर, पाकड़ और बरगदकी शाखाओंके दरवाजे बनाये जायँ। वहाँ आठ होता, आठ द्वारपाल तथा आठ जप करनेवाले ब्राह्मणोंका वरण किया जाय। वे सभी ब्राह्मण वेदोंके पारगामी विद्वान् होने चाहिये। सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, मन्त्रोंके ज्ञाता, जितेन्द्रिय, कुलीन, शीलवान् एवं श्रेष्ठ ब्राह्मणको ही इस कार्यमें पुरोहित-पदपर नियुक्त करना चाहिये। प्रत्येक कुण्डके पास कलश, यज्ञ-सामग्री, पंखा, दो चँवर और दो दिव्य एवं विस्तृत ताम्रपात्र प्रस्तुत रहें॥ ४—१३॥ |
| ततस्त्वनेकवर्णाः स्युश्चरवः प्रतिदैवतम्।<br>आचार्यः प्रक्षिपेद् भूमावनुमन्त्र्य विचक्षणः॥ १४ | तदनन्तर प्रत्येक देवताके लिये नाना प्रकारकी चरु (पुरोडास, खीर, दही, अक्षत आदि उत्तम भक्ष्य पदार्थ) उपस्थित करे। विद्वान् आचार्य मन्त्र पढ़कर उन सामग्रियोंको पृथ्वीपर सब देवताओंको समर्पित करे। |
| त्र्यरत्निमात्रो यूपः स्यात् क्षीरवृक्षविनिर्मितः।<br>यजमानप्रमाणो वा संस्थाप्यो भूतिमिच्छता॥ १५ | तीन अरत्निके बराबर एक यूप (यज्ञस्तम्भ) स्थापित किया जाय, जो किसी दूधवाले वृक्ष (वट, पाकड़ आदि)-की शाखाका बना हुआ हो। ऐश्वर्य चाहनेवाले पुरुषको यजमानके शरीरके बराबर ऊँचा यूप स्थापित करना चाहिये। |
| हेमालङ्कारिणः कार्याः पञ्चविंशति ऋत्विजः।<br>कुण्डलानि च हैमानि केयूरकटकानि च॥ १६<br>तथाङ्गुल्यः पवित्राणि वासांसि विविधानि च।<br>पूजयेत् तु समं सर्वानाचार्यो द्विगुणं पुनः।<br>दद्याच्छयनसंयुक्तमात्मनश्चापि यत् प्रियम्॥ १७ | उसके बाद पचीस ऋत्विजोंका वरण करके उन्हें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित करे। सोनेके बने कुण्डल, बाजूबंद, कड़े, अँगूठी, पवित्री तथा नाना प्रकारके वस्त्र—ये सभी आभूषणादि प्रत्येक ऋत्विज्को बराबर-बराबर दे और आचार्यको दूना अर्पण करे। इसके सिवा उन्हें शय्या तथा अपनेको प्रिय लगनेवाली अन्यान्य वस्तुएँ भी प्रदान करे। |
| सौवर्णौ कूर्ममकरौ राजतौ मत्स्यदुण्डुभौ।<br>ताम्रौ कुलीरमण्डूका वायसः शिशुमारकः।<br>एवमासाद्य तत् सर्वमादावेव विशाम्पते॥ १८ | सोनेका बना हुआ कछुआ और मगर, चाँदीके मत्स्य और दुण्डुभ (गिरगिट), ताँबेके केंकड़ा और मेढक तथा लोहेके दो सूँस बनवाये (और सबको सोनेके पात्रमें रखे)। राजन्! इन सभी वस्तुओंको पहलेसे ही बनवाकर ठीक रखना चाहिये। |
| शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः।<br>सर्वौषध्युदकैस्तत्र स्नापितो वेदपारगैः॥ १९<br>यजमानः सपत्नीकः पुत्रपौत्रसमन्वितः।<br>पश्चिमं द्वारमासाद्य प्रविशेद् यागमण्डपम्॥ २०<br>ततो मङ्गलशब्देन भेरीणां निःस्वनेन च। | इसके बाद यजमान वेदज्ञ विद्वानोंकी बतायी हुई विधिके अनुसार सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान करके श्वेत वस्त्र और श्वेत माला धारण करे। फिर श्वेत चन्दन लगाकर पत्नी और पुत्र-पौत्रोंके साथ पश्चिम द्वारसे यज्ञमण्डपमें प्रवेश करे। उस समय माङ्गलिक शब्द होने चाहिये और भेरी आदि बाजे बजने चाहिये॥ १४—२० १/२॥ |
| चूर्णेन मण्डलं कुर्यात् पञ्चवर्णेन तत्त्ववित्॥ २१ | तदनन्तर विद्वान् पुरुष पाँच रंगके चूर्णोंसे मण्डल बनाये |
| * अध्याय ५८ * | २३५ |
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| षोडशारं ततश्चक्रं पद्मगर्भं चतुर्मुखम्।<br>चतुरस्रं च परितो वृत्तं मध्ये सुशोभनम्॥ २२<br>वेद्याश्चोपरि तत् कृत्वा ग्रहांल्लोकपतींस्ततः।<br>संन्यसेन्मन्त्रतः सर्वान् प्रतिदिक्षु विचक्षणः॥ २३<br>कलशं स्थापयेन्मध्ये वारुण्यां मन्त्रमाश्रितः।<br>ब्रह्माणं च शिवं विष्णुं तत्रैव स्थापयेद् बुधः॥ २४<br>विनायकं च विन्यस्य कमलाम्बिकां तथा।<br>शान्त्यर्थं सर्वलोकानां भूतग्रामं न्यसेत् ततः॥ २५<br>पुष्पभक्ष्यफलैर्युक्तमेवं कृत्वाधिवासनम्।<br>कुम्भान् सजलगर्भांस्तान् वासोभिः परिवेष्टयेत्॥ २६<br>पुष्पगन्धैरलंस्कृत्य द्वारपालान् समन्ततः।<br>पठध्वमिति तान् ब्रूयादाचार्यस्त्वभिपूजयेत्॥ २७<br>बह्वृचौ पूर्वतः स्थाप्यौ दक्षिणेन यजुर्विदौ।<br>सामगौ पश्चिमे तद्वदुत्तरेण त्वथर्वणौ॥ २८<br>उदङ्मुखो दक्षिणतो यजमान उपाविशेत्।<br>यजध्वमिति तान् ब्रूयाद्धौ त्रिकान् पुनरेव तु॥ २९<br>उत्कृष्टमन्त्रजापेन तिष्ठध्वमिति जापकान्।<br>एवमादिश्य तान् सर्वान् पर्युक्ष्याग्निं स मन्त्रवित्॥ ३०<br>जुहुयाद् वारुणैर्मन्त्रैराज्यं च समिधस्तथा।<br>ऋत्विग्भिश्चाथ होतव्यं वारुणैरेव सर्वतः॥ ३१<br>ग्रहेभ्यो विधिवद्धुत्वा तथेन्द्रायेश्वराय च।<br>मरुद्भ्यो लोकपालेभ्यो विधिवद् विश्वकर्मणे॥ ३२<br>शान्तिसूक्तं च रौद्रं च पावमानं च मङ्गलम्।<br>जपेयुः पौरुषं सूक्तं पूर्वतो बह्वृचः पृथक्॥ ३३<br>शाक्रं रौद्रं च सौम्यं च कुष्माण्डं जातवेदसम्।<br>सौरं सूक्तं जपेयुस्ते दक्षिणेन यजुर्विदः॥ ३४ | और उसमें सोलह अरोंसे युक्त चक्र चिह्नित करे। उसके गर्भमें कमलका आकार बनाये। चक्र देखनेमें सुन्दर और चौकोर हो। चारों ओरसे गोल होनेके साथ ही मध्यभागमें अधिक शोभायमान दीख पड़ता हो। बुद्धिमान् पुरुष उस चक्रको वेदीके ऊपर स्थापित कर उसके चारों ओर प्रत्येक दिशामें मन्त्रपाठपूर्वक ग्रहों और लोकपालोंकी स्थापना करे। फिर मध्यभागमें वरुण-सम्बन्धी मन्त्रका उच्चारण करते हुए एक कलश स्थापित करे और उसीके ऊपर ब्रह्मा, शिव, विष्णु, गणेश, लक्ष्मी तथा पार्वतीकी भी स्थापना करे। इसके पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंकी शान्तिके लिये भूतसमुदायको स्थापित करे। इस प्रकार पुष्प, नैवेद्य और फलोंके द्वारा सबकी स्थापना करके उन सभी जलपूर्ण कलशोंको वस्त्रोंसे आवेष्टित कर दे। फिर पुष्प और चन्दनके द्वारा उन्हें अलंकृत कर द्वार-रक्षाके लिये नियुक्त ब्राह्मणोंसे स्वयं आचार्य वेदपाठ करनेके लिये प्रेमसे कहे। पूर्व दिशाकी ओर दो ऋग्वेदी, दक्षिणद्वारपर दो यजुर्वेदी, पश्चिमद्वारपर दो सामवेदी तथा उत्तरद्वारपर दो अथर्ववेदी विद्वानोंको रखना चाहिये। यजमान मण्डलके दक्षिणभागमें उत्तराभिमुख होकर बैठे और ऋत्विजोंसे पुनः आचार्य कहें—‘आप यज्ञ प्रारम्भ करें।’ तत्पश्चात् वे जप करनेवाले ब्राह्मणोंसे कहें—‘आपलोग उत्तम मन्त्रका जप करते रहें।’ इस प्रकार सबको प्रेरित करके मन्त्रज्ञ पुरुष अग्निका पर्युक्षण (चारों ओर जल छिड़क) कर वरुण-सम्बन्धी मन्त्रोंका उच्चारण कर घी और समिधाओंकी आहुति दे। ऋत्विजोंको भी वरुण-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा सब ओरसे हवन करना चाहिये। ग्रहोंके निमित्त विधिवत् आहुति देकर उस यज्ञ-कर्ममें इन्द्र, शिव, मरुद्गण, लोकपाल और विश्वकर्माके निमित्त भी विधिपूर्वक होम करे॥ २१—३२॥<br><br>पूर्वद्वारपर नियुक्त ऋग्वेदी ब्राह्मण शान्तिसूक्त,* रुद्रसूक्त, पवमानसूक्त (ऋग्वेद ३।४।५ आदि), सुमङ्गलसूक्त (ऋ० २।४।२१) तथा पुरुषसूक्त (१०।९०) का पृथक्-पृथक् जप करें। दक्षिणद्वारपर स्थित यजुर्वेदी विद्वान् इन्द्र (अ० १६), रुद्र, सोम, कूष्माण्ड (२०। १४–१६), अग्नि (अ० २) तथा सूर्य-सम्बन्धी (अ० ३५) सूक्तोंका जप करें। |
* यहाँ वेद-निर्देश महत्त्वपूर्ण है, किंतु अन्यत्र पद्म, भविष्यदि पुराणोंमें ऋग्वेदीय ७।३५ के मत्स्य-पाठ रात्रिसूक्तकी जगह 'शान्तिसूक्त'के सर्वप्रथम पाठका ही निर्देश है, जिसका सर्वारम्भमें होना विशेष उचित जँचता है। तीनों वेदके शान्तिसूक्त तो प्रसिद्ध हैं। अथर्ववेदके शान्तिसूक्तका नाम शांतातीयसूक्त है। पवमानसूक्तके बहिष्, माध्यंदिन, तृतीय और अर्यव—ये चार भेद हैं। यजुर्वेदमें कूष्माण्डसूक्त भी उपर्निर्दिष्टके अतिरिक्त ४ हैं, जो तै० ब्रा० २।४।४; ६।६।१; ३।७।२ और तै० आरण्यक २।३।६ में प्राप्त होते हैं।
६१ अगस्त्य और वसिष्ठकी दिव्य उत्पत्ति, उर्वशी अप्सराका प्राकट्य और अगस्त्यके लिये अर्घ्य-प्रदान करनेकी विधि एवं माहात्म्य
| २३६ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
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| वैराजं पौरुषं सूक्तं सौपर्णं रुद्रसंहिताम्।<br>शैशवं पञ्चनिधनं गायत्रं ज्येष्ठसाम च॥ ३५<br><br>वामदेव्यं बृहत्साम रौरवं च रथन्तरम्।<br>गवां व्रतं च काण्वं च रक्षोघ्नं च यमं तथा।<br>गायेयुः सामगा राजन् पश्चिमं द्वारमाश्रिताः॥ ३६<br><br>आथर्वणश्रोत्तरतः शान्तिकं पौष्टिकं तथा।<br>जपेयुर्मनसा देवमाश्रित्य वरुणं प्रभुम्॥ ३७<br><br>पूर्वेद्युरभितो रात्रावेवं कृत्वाधिवासनम्।<br>गजाश्वरथ्यावल्मीकात् संगमाद्दध्रगोकुलात्।<br>मृदमादाय कुम्भेषु प्रक्षिपेच्चत्वरात् तथा॥ ३८<br><br>रोचनां च ससिद्धार्थां गन्धं गुग्गुलमेव च।<br>स्नपनं तस्य कर्तव्यं पञ्चगव्यसमन्वितम्॥ ३९<br><br>प्रत्येकं तु महामन्त्रैरेवं कृत्वा विधानतः।<br>एवं क्षपातिवाह्याथ विधियुक्तेन कर्मणा॥ ४०<br><br>ततः प्रभाते विमले संजातेऽथ शतं गवाम्।<br>ब्राह्मणेभ्यः प्रदातव्यमष्टषष्टिश्च वा पुनः।<br>पञ्चाशद् वाथ षट्त्रिंशत् पञ्चविंशतिरप्यथ॥ ४१<br><br>ततः सांवत्सरप्रोक्ते शुभे लग्ने सुशोभने।<br>वेदशब्दैश्च गान्धर्ववार्द्यैश्च विविधैः पुनः॥ ४२<br><br>कनकालङ्कृतां कृत्वा जले गामवतारयेत्।<br>सामगाय च सा देया ब्राह्मणाय विशाम्पते॥ ४३<br><br>पात्रीमादाय सौवर्णीं पञ्चरत्नसमन्विताम्।<br>ततो निक्षिप्य मकरमत्स्यादींश्चैव सर्वशः।<br>धृतां चतुर्विधेर्विप्रैर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥ ४४<br><br>महानदीजलोपेतां दध्यक्षतसमन्विताम्।<br>उत्तराभिमुखीं धेनुं जलमध्ये तु कारयेत्॥ ४५ | राजन्! पश्चिमद्वारपर रहनेवाले सामवेदी ब्राह्मण वैराजसाम (२। २९। ८०), पुरुषसूक्त (६१३-३१), सुपर्णसूक्त (साम० ३। २। १-३), रुद्रसंहिता, शिशुसूक्त, पञ्चनिधनसूक्त, गायत्रसाम, ज्येष्ठसाम (१। २। २९), वामदेव्यसाम (५। ६। २५), बृहत्साम (१। २२। ३४), रौरवसाम, रथन्तरसाम (१। २२३), गोव्रत, काण्व, सूक्तसाम, रक्षोघ्न (३। १२। ३९) और यमसम्बन्धी सूक्तोंका गान करें। उत्तरद्वारके अथर्ववेदी विद्वान् मन-ही-मन भगवान् वरुणदेवकी शरण ले शान्ति और पुष्टि-सम्बन्धी मन्त्रोंका जप करें। इस प्रकार पहले दिन मन्त्रोंद्वारा देवताओंकी स्थापना करके हाथी और घोड़ेके पैरोंके नीचेकी, जिसपर रथ चलता हो—ऐसी सड़ककी, बाँबीकी, दो नदियोंके संगमकी, गोशालाकी, साक्षात् गौओंके पैरके नीचेकी तथा चौराहेकी मिट्टी (सप्तमृत्तिका) लेकर कलशोंमें छोड़ दे। उसके बाद सर्वौषधि, गोरोचन, सरसोंके दाने, चन्दन और गूगल भी छोड़े। फिर पञ्चगव्य (दधि, दूध, घी, गोबर और गोमूत्र) मिलाकर उन कलशोंके जलसे यजमानका विधिपूर्वक अभिषेक करे। इस प्रकार प्रत्येक कार्य महामन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिसहित करना चाहिये॥ ३३-३९ १/२ ॥<br><br>श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार शास्त्रविहित कर्मद्वारा रात्रि व्यतीत करके निर्मल प्रभातका उदय होनेपर व्रती हवनके अन्तमें ब्राह्मणोंको सौ, अड़सठ, पचास, छत्तीस अथवा पचीस गौ दान करे। राजन्! तदनन्तर ज्योतिषीद्वारा बतलाये गये शुद्ध एवं सुन्दर लग्न आनेपर वेदपाठ, संगीत तथा नाना प्रकारके बाजोंकी मनोहर ध्वनिके साथ एक गौको सुवर्णसे अलंकृत करके तालाबके जलमें उतारे और उसे सामगान करनेवाले ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् पञ्चरत्नोंसे युक्त सोनेका पात्र लेकर उसमें पूर्वोक्त मगर और मछली आदिको रखे और उसे किसी बड़ी नदीसे मँगाये हुए जलसे भर दे। फिर उस पात्रको दही-अक्षतसे विभूषितकर वेद और वेदाङ्गोंके विद्वान् चार ब्राह्मण हाथसे पकड़ें और अथर्ववेदके मन्त्रोंसे उसे स्नान कराये, फिर यजमानकी प्रेरणासे उसे उत्तराभिमुख उलटकर तालाबके जलमें डाल दें। इस प्रकार |
- अध्याय ५८ * २३७
| आथर्वणेन संस्नातां पुनर्मामेत्यथेति च।<br>आपो हि ष्ठेति मन्त्रेण क्षिप्त्वाऽऽगत्य च मण्डपम्॥ ४६ | 'पुनर्मामेति०' तथा 'आपो हि ष्ठा मयो०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा उसे जलमें डालकर पुनः सब लोग यज्ञमण्डपमें आ जायँ और यजमान सदस्योंकी पूजा |
| पूजयित्वा सदस्यांस्तु बलिं दद्यात् समन्ततः।<br>पुनर्दिनानि होतव्यं चत्वारि मुनिसत्तमाः॥ ४७ | कर सब ओर देवताओंके उद्देश्यसे बलि अर्पण करे। इसके बाद लगातार चार दिनोंतक हवन होना चाहिये। |
| चतुर्थीकर्म कर्तव्यं देया तत्रापि शक्तितः।<br>दक्षिणा राजशार्दूल वरुणक्षमापणं ततः॥ ४८ | राजसिंह! चौथे दिन चतुर्थी-कर्म करना उचित है। उसमें भी यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। तदनन्तर वरुणसे क्षमा-प्रार्थना करके यज्ञ-सम्बन्धी जितने पात्र और |
| कृत्वा तु यज्ञपात्राणि यज्ञोपकरणानि च।<br>ऋत्विग्भ्यस्तु समं दत्त्वा मण्डपं विभजेत् पुनः।<br>हेमपात्रीं च शय्यां च स्थापकाय निवेदयेत्॥ ४९ | सामग्री हों, उन्हें ऋत्विजोंमें बराबर बाँट देना चाहिये। फिर मण्डपको भी विभाजित करे। सुवर्णपात्र और शय्या व्रतारम्भ करानेवाले ब्राह्मणको दान कर दे। इसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार, एक सौ आठ, |
| ततः सहस्रं विप्राणामथवाष्टशतं तथा।<br>भोजनीयं यथाशक्ति पञ्चाशद् वाथ विंशतिः।<br>एवमेष पुराणेषु तडागविधिरुच्यते॥ ५० | पचास अथवा बीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये। पुराणों (एवं कल्पसूत्रों)-में तालाबकी प्रतिष्ठाके लिये यही विधि बतलायी गयी है। सभी कुआँ, बावली और |
| कूपवापीषु सर्वासु तथा पुष्करिणीषु च।<br>एष एव विधिर्दृष्टः प्रतिष्ठासु तथैव च॥ ५१ | पुष्करिणीके लिये भी यही विधि है। देवताओंकी प्रतिष्ठामें भी ऐसा ही विधान समझना चाहिये। प्रासाद (महल अथवा मन्दिर) और बगीचे आदिके प्रतिष्ठा-कार्यमें केवल (कुछ) मन्त्रोंका ही भेद है। विधि-विधान प्रायः एक-से ही हैं। उपर्युक्त विधिकायदि |
| मन्त्रतस्तु विशेषः स्यात् प्रासादोद्यानभूमिषु।<br>अयं त्वशक्तावर्धेन विधिर्दृष्टः स्वयम्भुवा।<br>अल्पे त्वेकाग्निवत् कृत्वा वित्तशाठ्यादृते नृणाम्॥ ५२ | पूर्णतया पालन करनेकी शक्ति न हो तो आधे व्ययसे भी यह कार्य सम्पन्न हो सकता है। यह बात ब्रह्माजीने कही है। किंतु इस अल्प विधानमें भी मनुष्यको कृपणताका त्याग कर एकाग्नि ब्राह्मणकी भाँति दान आदि करना चाहिये॥ ४०-५२॥ |
| प्रावृट्काले स्थिते तोये ह्यग्निष्टोमफलं स्मृतम्।<br>शरत्काले स्थितं यत् स्यात्तदुक्तफलदायकम्।<br>वाजपेयातिरात्राभ्यां हेमन्ते शिशिरे स्थितम्॥ ५३ | जिस पोखरेमें केवल वर्षाकालमें ही जल रहता है, वह अग्निष्टोम-यज्ञके बराबर फल देनेवाला होता है। जिसमें शरत्कालतक जल रहता हो, उसका भी यही फल है। हेमन्त और शिशिरकालतक रहनेवाला जल |
| अश्वमेधसमं प्राह वसन्तसमये स्थितम्।<br>ग्रीष्मेऽपि तत्स्थितं तोयं राजसूयाद् विशिष्यते॥ ५४ | क्रमशः वाजपेय और अतिरात्र नामक यज्ञका फल देता है। वसन्तकालतक टिकनेवाले जलको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाया गया है तथा जो जल ग्रीष्मकालतक वर्तमान रहता है, वह राजसूय-यज्ञसे भी अधिक फल देनेवाला होता है॥ ५३-५४॥ |
| एतान् महाराज विशेषधर्मान्<br>करोति योऽप्यागमशुद्धबुद्धिः।<br>स याति रुद्रालयमाशु पूतः<br>कल्पाननेकान् दिवि मोदते च॥ ५५ | महाराज! जो मनुष्य पृथ्वीपर इन विशेष धर्मोंका पालन करता है, वह शुद्धचित्त होकर शिवजीके लोकमें जाता है और वहाँ अनेक कल्पोंतक दिव्य आनन्दका अनुभव करता है। |
| २३८ | * मत्स्यपुराण * |
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| अनेकलोकान् स महत्तमादीन्<br>भुक्त्वा परार्धद्वयमङ्गनाभिः।<br>सहैव विष्णोः परमं पदं यत्<br>प्राप्नोति तद्योगबलेन भूयः॥ ५६ | वह पुनः परार्ध (ब्रह्माजीकी पिछली आधी आयु)-तक देवाङ्गनाओंके साथ अनेक महत्तम लोकोंका सुख भोगनेके पश्चात् ब्रह्माजीके साथ ही योगबलसे श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तडागविधिर्नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तडागविधि नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५८॥
उनसठवाँ अध्याय
वृक्ष लगानेकी विधि
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा— |
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| पादपानां विधिं सूत यथावद् विस्तराद् वद।<br>विधिना केन कर्तव्यं पादपोद्यापनं बुधैः।<br>ये च लोकाः स्मृतास्तेषां तानिदानीं वदस्व नः॥ १ | सूतजी! अब आप हमें विस्तारके साथ वृक्ष लगानेकी यथार्थ विधि बतलाइये। विद्वानोंको किस विधिसे वृक्ष लगाने चाहिये तथा वृक्षारोपण करनेवालोंके लिये जिन लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, उन्हें भी आप इस समय हमलोगोंको बतलाइये॥ १॥ |
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
| पादपानां विधिं वक्ष्ये तथैवोद्यानभूमिषु।<br>तडागविधिवत् सर्वमासाद्य जगदीश्वर॥ २ | [यही प्रश्न जब मनुने मत्स्य-भगवान्से किया था तो इसे उनसे मत्स्य (भगवान्)-ने कहा था।] जगदीश्वर! मैं बगीचेमें वृक्षोंके लगानेकी विधि तुम्हें बतलाता हूँ। तड़ागकी प्रतिष्ठाके विषयमें जो विधान बतलाया गया है, उसीके समान सारी विधि समझनी चाहिये। |
| ऋत्विङ्मण्डपसम्भारमाचार्यं चैव तद्विधम्।<br>पूजयेद् ब्राह्मणांस्तद्वद्धेमवस्त्रानुलेपनैः॥ ३ | इसमें भी ऋत्विज्, मण्डप, सामग्री और आचार्यको पूर्ववत् रखे। उसी प्रकार सुवर्ण, वस्त्र और चन्दनद्वारा ब्राह्मणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। |
| सर्वौषध्युदकैः सिक्तान् दध्यक्षतविभूषितान्।<br>वृक्षान् माल्यैरलङ्कृत्य वासोभिरभिवेष्टयेत्॥ ४ | रोपे गये पौधोंको सर्वौषधिमिश्रित जलसे सींचे। फिर उनके ऊपर दही और अक्षत छोड़े। उसके बाद उन्हें पुष्पमालाओंसे अलंकृत कर वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। |
| सूच्या सौवर्णया कार्यं सर्वेषां कर्णवेधनम्।<br>अञ्जनं चापि दातव्यं तद्धेमशलाकया॥ ५ | सोनेकी सूईसे सबका कर्णवेध करे। उसी प्रकार सोनेकी सलाईसे अञ्जन भी लगाना चाहिये। |
| फलानि सप्त चाष्टौ वा कलधौतानि कारयेत्।<br>प्रत्येकं सर्ववृक्षाणां वेद्यां तान्यधिवासयेत्॥ ६ | सात अथवा आठ सुवर्णके फल बनवावे, फिर इन फलोंके साथ सभी वृक्षोंको वेदीपर स्थापित कर दे। |
| धूपोऽत्र गुग्गुलः श्रेष्ठस्ताम्रापात्रैरधिष्ठितान्।<br>सर्वान् धान्यस्थितान् कृत्वा वस्त्रगन्धानुलेपनैः॥ ७ | वहाँ गुग्गुलका धूप देना श्रेष्ठ माना गया है। वृक्षोंको पृथक्-पृथक् ताम्रपात्रमें रखकर उन्हें सप्तधान्यसे आवृत करे तथा उनके ऊपर वस्त्र और चन्दन चढ़ाये। |
| कुम्भान् सर्वेषु वृक्षेषु स्थापयित्वा नरेश्वर।<br>सहिरण्यानशेषांस्तान् कृत्वा बलिनिवेदनम्॥ ८ | नरेश्वर! फिर प्रत्येक वृक्षके पास कलश-स्थापन करके उन सभी कलशोंमें स्वर्ण-खण्ड डाले, फिर बलि प्रदान करके उनकी पूजा करे। |
| * अध्याय ५९ * | २३९ |
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| यथास्वं लोकपालानामिन्द्रादीनां विशेषतः।<br>वनस्पतेश्च विद्वद्भिर्होमः कार्यो द्विजातिभिः ॥ ९<br>ततः शुक्लाम्बरधरां सौवर्णकृतभूषणाम् ।<br>सकांस्यदोहां सौवर्णशृङ्गाभ्यामतिशालिनीम्।<br>पयस्विनीं वृक्षमध्यादुत्सृजेद् गामुदङ्मुखीम्॥ १०<br>ततोऽभिषेकमन्त्रेण वाद्यमङ्गलगीतकैः।<br>ऋग्यजुःसाममन्त्रैश्च वारुणैरभितस्तथा।<br>तैरेव कुम्भैः स्नपनं कुर्युर्ब्राह्मण पुङ्गवाः ॥ ११<br>स्नातः शुक्लाम्बरस्तद्वद् यजमानोऽभिपूजयेत् ।<br>गोभिर्विभवतः सर्वानृत्विजस्तान् समाहितः ॥ १२<br>हेमसूत्रैः सकटकैरङ्गुलीयपवित्रकैः ।<br>वासोभिः शयनीयैश्च तथोपस्करपादुकैः।<br>क्षीरेण भोजनं दद्याद् यावद्दिनचतुष्टयम् ॥ १३<br>होमश्च सर्षपैः कार्यो यवैः कृष्णतिलैस्तथा।<br>पलाशसमिधः शस्तास्तृतीयेऽह्नि तथोत्सवः ।<br>दक्षिणा च पुनस्तद्वद् देया तत्रापि शक्तितः ॥ १४<br>यद् यदिष्टतमं किञ्चित् तत्तद् दद्यादमत्सरी।<br>आचार्ये द्विगुणं दद्यात् प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥ १५ | रातमें विद्वान् द्विजातियोंद्वारा इन्द्रादि लोकपालों तथा वनस्पतिके निमित्त वित्तानुसार हवन कराये। तदनन्तर दूध देनेवाली एक गौको लाकर उसे श्वेत वस्त्र ओढ़ाये। उसके मस्तकपर सोनेकी कँलगी लगाये, सींगोंको सोनेसे मँढ़ा दे। उसको दूहनेके लिये काँसेकी दोहनी प्रस्तुत करे। इस प्रकार अत्यन्त शोभासम्पन्न उस गौको उत्तराभिमुख खड़ी करके वृक्षोंके बीचसे छोड़े। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मण बाजों और मङ्गलगीतोंकी ध्वनिके साथ अभिषेकके मन्त्र—तीनों वेदोंकी वरुणसम्बन्धिनी ऋचाएँ पढ़ते हुए उक्त कलशोंके जलसे यजमानका अभिषेक करें। अभिषेकके पश्चात् यज्ञकर्ता पुरुष श्वेत वस्त्र धारण करे और अपनी सामर्थ्यके अनुसार सावधानीपूर्वक गौ, सोनेकी जंजीर, कड़े, अँगूठी, पवित्री, वस्त्र, शय्या शय्योपयोगी सामान तथा चरणपादुका देकर सम्पूर्ण ऋत्विजोंका पूजन करे। इसके बाद चार दिनोंतक उन्हें दूधके साथ भोजन कराये तथा सरसोंके दाने, जौ और काले तिलोंसे होम कराये। होममें पलाश (ढाक) की लकड़ी उत्तम मानी गयी है। वृक्षारोपणके पश्चात् चौथे दिन विशेष उत्सव करे। उसमें भी अपनी शक्तिके अनुसार पुनः उसी प्रकार दक्षिणा दे। जो-जो वस्तु अपनेको अधिक प्रिय हो, ईर्ष्या छोड़कर उस-उसका दान करे। आचार्यको दूनी दक्षिणा दे तथा प्रणाम करके यज्ञकी समाप्ति करे॥२—१५॥ |
| अनेन विधिना यस्तु कुर्याद् वृक्षोत्सवं बुधः ।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति फलं चानन्त्यमश्नुते ॥ १६<br>यश्चैकमपि राजेन्द्र वृक्षं संस्थापयेन्नरः ।<br>सोऽपि स्वर्गे वसेद् राजन् यावदिन्द्रायुतत्रयम् ॥ १७<br>भूतान् भव्यांश्च मनुजांस्तारयेद् द्रुमसंमितान् ।<br>परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम् ॥ १८<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः ।<br>सोऽपि सम्पूजितो देवैर्ब्रह्मलोके महीयते ॥ १९ | जो विद्वान् उपर्युक्त विधिसे वृक्षारोपणका उत्सव करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा वह अक्षय फलका भागी होता है। राजेन्द्र! जो मनुष्य इस प्रकार एक भी वृक्षकी स्थापना करता है, राजन्! वह भी जबतक तीस इन्द्र समाप्त हो जाते हैं, तबतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। वह जितने वृक्षोंका रोपण करता है, अपने पहले और पीछेकी उतनी ही पीढ़ियोंका वह उद्धार कर देता है तथा उसे पुनरावृत्तिसे रहित परम सिद्धि प्राप्त होती है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसङ्गको सुनता या सुनाता है, वह भी देवताओंद्वारा सम्मानित और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है*॥ १६–१९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृक्षोत्सवो नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृक्षोत्सव नामक उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५९ ॥
* वृक्ष मुनियों तथा कवियोंको बहुत प्रिय थे। वृक्ष-उद्यानादि रोपण-प्रतिष्ठाकी सभी विधियाँ पद्म, भविष्य, स्कन्दादि पुराणोंमें बहुत विस्तारसे हैं। अमरसिंह, कालिदासादिने भी इनका खूब वर्णन किया है। मत्स्यपुराणमें वृक्षोंका वर्णन बार-बार मिलेगा।
| २४० | * मत्स्यपुराण * |
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साठवाँ अध्याय
सौभाग्यशयन-व्रत तथा जगद्धात्री सतीकी आराधना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>तथैवान्यत् प्रवक्ष्यामि सर्वकामफलप्रदम्।<br>सौभाग्यशयनं नाम यत् पुराणविदो विदुः॥ १ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! इसी प्रकार एक दूसरा व्रत बतलाता हूँ, जो समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। उसका नाम है—'सौभाग्यशयन'। इसे पुराणोंके विद्वान् ही जानते हैं। |
| पुरा दग्धेषु लोकेषु भूर्भुवःस्वर्महादिषु।<br>सौभाग्यं सर्वभूतानामेकस्थमभवत् तदा।<br>वैकुण्ठं स्वर्गमासाद्य विष्णोर्वक्षःस्थलस्थितम्॥ २ | पूर्वकालमें जब भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक दग्ध हो गये, तब समस्त प्राणियोंका सौभाग्य एकत्रित हो गया। वह वैकुण्ठलोकमें जाकर भगवान् श्रीविष्णुके वक्षःस्थलमें स्थित हो गया। |
| ततः कालेन महता पुनः सर्गविधौ नृप।<br>अहङ्कारावृते लोके प्रधानपुरुषान्विते॥ ३ | तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् जब पुनः सृष्टि-रचनाका समय आया, तब प्रकृति और पुरुषसे युक्त सम्पूर्ण लोकोंके अहंकारसे आवृत हो जानेपर श्रीब्रह्माजी तथा भगवान् श्रीविष्णुमें स्पर्धा जाग्रत् हुई। |
| स्पर्धायां च प्रवृत्तायां कमलासनकृष्णयोः।<br>पिङ्गाकारा* समुद्भूता वह्नेर्ज्वालातिभीषणा।<br>तयाभितप्तस्य हरेर्वक्षसस्तद् विनिःसृतम्॥ ४ | उस समय एक पीले रंगकी (अथवा शिवलिङ्गके आकारकी) अत्यन्त भयंकर अग्निज्वाला प्रकट हुई। उससे भगवान्का वक्षःस्थल तप उठा, जिससे वह सौभाग्यपुञ्ज वहाँसे गलित हो गया। |
| वक्षःस्थलं समाश्रित्य विष्णौ सौभाग्यमास्थितम्।<br>रसं रूपं न तद् यावत् प्राप्नोति वसुधातले॥ ५ | श्रीविष्णुके वक्षःस्थलका आश्रय लेकर स्थित वह सौभाग्य अभी रसरूप होकर धरतीपर गिरने भी न पाया था कि |
| उत्क्षिप्तमन्तरिक्षे तद् ब्रह्मपुत्रेण धीमता।<br>दक्षेण पीतमात्रं तद् रूपलावण्यकारकम्॥ ६ | ब्रह्माजीके बुद्धिमान् पुत्र दक्षने उसे आकाशमें ही रोककर पी लिया। दक्षके पीते ही वह अद्भुत रूप और लावण्य प्रदान करनेवाला सिद्ध हुआ। |
| बलं तेजो महज्जातं दक्षस्य परमेष्ठिनः।<br>शेषं यदपतद् भूमावष्टधा तद् व्यजायत॥ ७ | ब्रह्म-पुत्र दक्षका बल और तेज बढ़ गया। उनके पीनेसे बचा हुआ जो अंश पृथ्वीपर गिर पड़ा, वह आठ भागोंमें बँट गया। |
| ततस्त्वोषधयो जाताः सप्त सौभाग्यदायिकाः।<br>इक्षवो रसराजश्च निष्पावा राजधान्यकम्॥ ८ | उनमेंसे सात भागोंसे सात सौभाग्यदायिनी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—ईंख, रसराज (पारा), निष्पाव (सेम), राजधान्य (शालि या अगहनी), |
| विकारवच्च गोक्षीरं कुसुम्भं कुङ्कुमं तथा।<br>लवणं चाष्टमं तद्वत् सौभाग्याष्टकमुच्यते॥ ९ | गोक्षीर (क्षीरजीरक), कुसुम्भ (कुसुम नामक) पुष्प, कुङ्कुम (केसर) तथा आठवाँ पदार्थ नमक है। इन आठोंको सौभाग्याष्टक कहते हैं॥ १—९॥ |
* कहीं-कहीं लिङ्गाकारा पाठ है; जिसका शिव, स्कन्द आदि पुराणोंकी तथा शिवरात्रि-व्रत कथाके लिङ्गोद्भव-वृत्तान्तसे तात्पर्य माना जाना चाहिये।
६२ अनन्ततृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ६० * | २४१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पीतं यद् ब्रह्मपुत्रेण योगज्ञानविदा पुनः।<br>दुहिता साभवत् तस्य या सतीत्यभिधीयते॥ १०<br><br>लोकानतीत्य लालित्याल्ललिता तेन चोच्यते।<br>त्रैलोक्यसुन्दरीमेनामुपयेमे पिनाकधृक्॥ ११<br><br>त्रिविष्वसौभाग्यमयी भुक्तिमुक्तिफलप्रदा।<br>तामाराध्य पुमान् भक्त्या नारी वा किं न विन्दति॥ १२ | योग और ज्ञानके तत्त्वको जाननेवाले ब्रह्मपुत्र दक्षने पूर्वकालमें जिस सौभाग्य-रसका पान किया था, उसके अंशसे उन्हें एक कन्या उत्पन्न हुई; जिसे सती नामसे अभिहित किया जाता है। अपनी सुन्दरतासे तीनों लोकोंको पराजित कर देनेके कारण वह कन्या लोकमें ललिता* के नामसे भी प्रसिद्ध है। पिनाकधारी भगवान् शंकरने उस त्रिभुवनसुन्दरी देवीके साथ विवाह किया। सती तीनों लोकोंकी सौभाग्यरूपा हैं। वे भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। उनकी भक्तिपूर्वक आराधना करके नर या नारी क्या नहीं प्राप्त कर सकती ॥ १०—१२॥ |
| मनुरुवाच<br>कथमाराधनं तस्या जगद्धात्र्या जनार्दन।<br>तद्विधानं जगन्नाथ तत् सर्वं च वदस्व मे॥ १३ | मनुजीने पूछा— जनार्दन! जगद्धात्री सतीकी आराधना कैसे की जाती है? जगन्नाथ! उसके लिये जो विधान हो, वह सब मुझे बतानेकी कृपा कीजिये॥ १३॥ |
| मत्स्य उवाच<br>वसन्तमासमासाद्य तृतीयायां जनप्रिय।<br>शुक्लपक्षस्य पूर्वाह्णे तिलैः स्नानं समाचरेत्॥ १४<br><br>तस्मिन्नहनि सा देवी किल विश्वात्मना सती।<br>पाणिग्रहणकैर्मन्त्रैरवसद् वरवर्णिनी॥ १५<br><br>तया सहैव देवेशं तृतीयायामथार्चयेत्।<br>फलैर्नानाविधैर्धूपैर्दीपैर्नैवेद्यसंयुतैः ॥ १६ | मत्स्यभगवान्ने कहा— जनप्रिय! चैत्रमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाको दिनके पूर्वभागमें मनुष्य तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। उस दिन परम सुन्दरी भगवती सतीका विश्वात्मा भगवान् शंकरके साथ वैवाहिक मन्त्रोंद्वारा विवाह हुआ था, अतः तृतीयाको सती देवीके साथ ही भगवान् शंकरका भी पूजन करे। |
| प्रतिमां पञ्चगव्येन तथा गन्धोदकेन तु।<br>स्त्रापयित्वार्चयेद् गौरीमिन्दुशेखरसंयुताम्॥ १७<br><br>नमोऽस्तु पाटलायै तु पादौ देव्याः शिवस्य तु।<br>शिवायैति च संकीर्त्य जयायै गुल्फयोर्द्वयोः॥ १८<br><br>त्रिगुणायैति रुद्राय भवान्यै जङ्घयोर्युगम्।<br>शिवं भद्रेश्वरायेति विजयायै च जानुनी।<br>संकीर्त्य हरिकेशाय तथोरू वरदे नमः॥ १९<br><br>ईशायै च कटिं देव्याः शंकरायेति शंकरम्।<br>कुक्षिद्वयं च कोटव्यै शूलिने शूलपाणये॥ २०<br><br>मङ्गलायै नमस्तुभ्यमुदरं चाभिपूजयेत्।<br>सर्वात्मने नमो रुद्रमीशान्यै च कुचद्वयम्॥ २१ | पञ्चगव्य तथा चन्दनमिश्रित जलके द्वारा गौरी और भगवान् चन्द्रशेखरकी प्रतिमाको स्नान कराकर धूप, दीप, नैवेद्य तथा नाना प्रकारके फलोंद्वारा उन दोनोंकी पूजा करनी चाहिये। ‘पाटलायै नमोऽस्तु’, ‘शिवाय नमः’ इन मन्त्रोंसे क्रमशः पार्वती और शिवके चरणोंका, ‘जयायै नमः’, ‘शिवाय नमः’ से दोनोंकी घुट्टियोंका, ‘त्रिगुणाय रुद्राय नमः’, ‘भवान्यै नमः’ से गुल्फोंका, ‘भद्रेश्वराय नमः’, ‘विजयायै नमः’ से घुटनोंका ‘हरिकेशाय नमः’, ‘वरदायै नमः’ से ऊरुओंका, ‘शङ्कराय नमः’ ‘ईशायै नमः’ से दोनों कटिभागका, ‘कोटव्यै नमः’, ‘शूलिने नमः’ से दोनों कुक्षिभागोंका, ‘शूलपाणये नमः’, ‘मङ्गलायै नमः’ से उदरका पूजन करना चाहिये। ‘सर्वात्मने नमः’, ‘ईशान्यै नमः’ से दोनों स्तनोंकी, |
* इसमें वर्णित—'सौभाग्य' एवं 'ललिता' देवीके रहस्यका सामञ्जस्य-स्थापन तथा पूर्ण चित्रण भास्करराय भारती ने 'ललितासहस्रनाम'के परम श्रेष्ठ 'सौभाग्य-भास्कर-भाष्य'में मत्स्यपुराणके नामोल्लेखपूर्वक किया है।
| २४२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|---|
| शिवं वेदात्मने तद्वद् रुद्राण्यै कण्ठमर्चयेत्।<br>त्रिपुरघ्नाय विश्वेशमनन्तायै करद्वयम्॥ २२ | 'वेदात्मने नमः', 'रुद्राण्यै नमः' से कण्ठकी, 'त्रिपुरघ्नाय नमः', 'अनन्तायै नमः' से दोनों हाथोंकी पूजा करे॥ १४-२२॥ |
| त्रिलोचनाय च हरं बाहू कालानलप्रिये।<br>सौभाग्यभवनायेति भूषणानि सदार्चयेत्।<br>स्वाहास्वधायै च मुखमीश्वरायेति शूलिनम्॥ २३<br>अशोकमधुवासिन्यै पूज्यावोष्ठौ च भूतिदौ।<br>स्थाणवे तु हरं तद्वद्वास्यं चन्द्रमुखप्रिये॥ २४<br>नमोऽर्धनारीशहरमसिताङ्गीति नासिकाम्।<br>नम उग्राय लोकेशं ललितेति पुनर्भ्रुवौ॥ २५<br>शर्वाय पुरहन्तारं वासव्यै तु तथालकान्।<br>नमः श्रीकण्ठनाथायै शिवकेशांस्ततोऽर्चयेत्।<br>भीमोग्रसमरूपिण्यै शिरः सर्वात्मने नमः॥ २६<br>शिवमभ्यर्च्य विधिवत् सौभाग्यष्टकमग्रतः।<br>स्थापयेद् घृतनिष्पावकुसुम्भक्षीरजीरकान्॥ २७<br>रसराजं च लवणं कुस्तुम्बुरुं तथाष्टकम्।<br>दत्तं सौभाग्यमित्यस्मात् सौभाग्याष्टकमित्यतः॥ २८<br>एवं निवेद्य तत् सर्वमग्रतः शिवयोः पुनः।<br>रात्रौ शृङ्गोदकं प्राश्य तद्वद् भूमावरिन्दम॥ २९<br>पुनः प्रभाते तु तथा कृतस्नानजपः शुचिः।<br>सम्पूज्य द्विजदाम्पत्यं वस्त्रमाल्याविभूषणैः॥ ३०<br>सौभाग्याष्टकसंयुक्तं सुवर्णचरणद्वयम्।<br>प्रीयतामत्र ललिता ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ३१ | फिर 'त्रिलोचनाय नमः', 'कालानलप्रियायै नमः' से बाँहोंका, 'सौभाग्यभवनाय नमः' से आभूषणोंका नित्य पूजन करे। 'स्वाहास्वधायै नमः', 'ईश्वराय नमः' से दोनोंके मुखमण्डलका, 'अशोकमधुवासिन्यै नमः'—इस मन्त्रसे ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले ओठोंका, 'स्थाणवे नमः', 'चन्द्रमुखप्रियायै नमः' से मुँहका, 'अर्धनारीश्वराय नमः', 'असिताङ्ग्यै नमः' से नासिकाका, 'उग्राय नमः', 'ललितायै नमः' से दोनों भौंहोंका, 'शर्वाय नमः', 'वासव्यै नमः' से केशोंका, 'श्रीकण्ठनाथाय नमः' से केवल शिवके बालोंका पूजन करे तथा 'भीमोग्रसमरूपिण्यै नमः', 'सर्वात्मने नमः' से दोनोंके मस्तकोंका पूजन करे। इस प्रकार शिव और पार्वतीकी विधिवत् पूजा कर उनके आगे सौभाग्याष्टक रखे। निष्पाव (सेम), कुसुम्भ, क्षीरजीरक, रसराज, इक्षु, लवण, कुङ्कुम तथा राजधानी—इन आठ वस्तुओंको देनेसे सौभाग्यकी प्राप्ति होती है, इसलिये इनकी 'सौभाग्याष्टक' संज्ञा है। शत्रुदमन! इस प्रकार शिवपार्वतीके आगे सब सामग्री निवेदन करके रातमें सिंघाड़ा खाकर अथवा शृङ्गोदक पान करके भूमिपर शयन करे। फिर सबेरे उठकर स्नान और जप करके पवित्र हो माला, वस्त्र और आभूषणोंके द्वारा ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। इसके बाद सौभाग्याष्टकसहित शिव और पार्वतीकी सुवर्णमयी प्रतिमाओंको ललितादेवीकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको निवेदन करे॥ २३-३१॥ |
| एवं संवत्सरं यावत् तृतीयायां सदा मनो।<br>कर्तव्यं विधिवद् भक्त्या सर्वसौभाग्यमीप्सुभिः॥ ३२<br>प्राशने दानमन्त्रे च विशेषोऽयं निबोध मे।<br>शृङ्गोदकं चैत्रमासे वैशाखे गोमयं पुनः॥ ३३<br>ज्येष्ठे मन्दारकुसुमं बिल्वपत्रं शुचौ स्मृतम्।<br>श्रावणे दधि सम्प्राश्यं नभस्ये च कुशोदकम्॥ ३४<br>क्षीरमाश्वयुजे मासि कार्तिके पृषदाज्यकम्।<br>मार्गे मासे तु गोमूत्रं पौषे सम्प्राशयेद् घृतम्॥ ३५ | मनो! इस प्रकार सम्पूर्ण सौभाग्यकी अभिलाषावाले मनुष्योंको एक वर्षतक प्रत्येक तृतीया तिथिको भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजन करना चाहिये। केवल भोजन और दानके मन्त्रोंमें कुछ विशेषता है, उसे मुझसे सुनिये। चैत्रमासमें शृङ्गोदक, वैशाखमें गोबर, ज्येष्ठमें मन्दारका पुष्प, आषाढ़में बिल्वपत्र, श्रावणमें दही, भाद्रपदमें कुशोदक, आश्विनमासमें दूध, कार्तिकमें दही मिला हुआ घी, मार्गशीर्षमासमें गोमूत्र, पौषमें घृत, |
- अध्याय ६० * | २४३ ---|---
| माघे कृष्णतिलं तद्वत् पञ्चगव्यं च फाल्गुने।<br>ललिता विजया भद्रा भवानी कुमुदा शिवा॥ ३६<br>वासुदेवी तथा गौरी मङ्गला कमला सती।<br>उमा च दानकाले तु प्रीयतामिति कीर्तयेत्॥ ३७<br>मल्लिकाशोककमलं कदम्बोत्पलमालतीः।<br>कुब्जकं करवीरं च बाणमम्लानकुङ्कुमम्॥ ३८<br>सिन्धुवारं च सर्वेषु मासेषु क्रमशः स्मृतम्।<br>जपाकुसुम्भकुसुमं मालती शतपत्रिका॥ ३९<br>यथालाभं प्रशस्तानि करवीरं च सर्वदा।<br>एवं संवत्सरं यावदुपोष्य विधिवन्नरः॥ ४०<br>स्त्री भक्ता वा कुमारी वा शिवमभ्यर्च्य भक्तितः।<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सर्वोपस्करसंयुतम्॥ ४१<br>उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवां सह।<br>स्थापयित्वाथ शयने ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ४२ | माघमें काला तिल और फाल्गुनमें पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये तथा दानके समय ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा, वासुदेवी, गौरी, मङ्गला, कमला, सती और उमा प्रसन्न हों—ऐसा कीर्तन करे। मल्लिका, अशोक, कमल, कदम्ब, उत्पल (नीलकमल), मालती, कुब्जक, करवीर (कनेर), बाण (कचनार या काश), ताजा कुङ्कुम और सिन्दुवार—इनके पुष्प क्रमशः सभी मासोंमें उपयुक्त माने गये हैं। जपाकुसुम, कुसुम्भ-कुसुम, मालती और शतपत्रिकाके पुष्प यदि मिल सकें तो प्रशस्त माने गये हैं, किंतु करवीर (कनेर) पुष्प तो सदा सभी महीनोंमें ग्राह्य है। इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिपूर्वक अनुष्ठान कर पुरुष, स्त्री या कुमारी भक्तिके साथ शिवजीकी पूजा करे। व्रतकी समाप्तिके समय सम्पूर्ण सामग्रियोंसे युक्त शय्या दान करे। उस शय्यापर शिव-पार्वतीकी सुवर्णमयी प्रतिमा और स्वर्णनिर्मित गौके साथ बैलको स्थापित कर ब्राह्मणको दान करे॥ ३२–४२॥ | | अन्यान्यपि यथाशक्ति मिथुनान्यम्बरादिभिः।<br>धान्यालङ्कारगोदानैरभ्यर्चेद् धनसंचयैः।<br>वित्तशाठ्येन रहितः पूजयेद् गतविस्मयः॥ ४३<br>एवं करोति यः सम्यक् सौभाग्यशयनव्रतम्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति पदमानन्त्यमश्नुते।<br>फलस्यैकस्य त्यागेन व्रतमेतत् समाचरेत्॥ ४४<br>य इच्छन् कीर्तिमाप्नोति प्रतिमासं नराधिप।<br>सौभाग्यारोग्यरूपायुर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः।<br>न वियुक्तो भवेद् राजन् नवार्बुदशतत्रयम्॥ ४५<br>यस्तु द्वादश वर्षाणि सौभाग्यशयनव्रतम्।<br>करोति सप्त चाष्टौ वा श्रीकण्ठभवनेऽमरैः।<br>पूज्यमानो वसेत् सम्यग् यावत्कल्पायुतत्रयम्॥ ४६<br>नारी वा कुरुते वापि कुमारी वा नरेश्वर।<br>सापि तत्फलमाप्नोति देव्यनुग्रहलालिता॥ ४७<br>शृणुयादपि यश्चैव प्रदद्यादथवा मतिम्।<br>सोऽपि विद्याधरो भूत्वा स्वर्गलोके चिरं वसेत्॥ ४८ | अन्यान्य ब्राह्मण-दम्पतियोंका भी वस्त्र, धान्य, अलंकार, गोदान और प्रचुर धनसे पूजन करना चाहिये। कृपणता छोड़कर दृढ़ निश्चयके साथ भगवान्का पूजन करे। जो मनुष्य इस प्रकार उत्तम सौभाग्यशयन नामक व्रतका भलीभाँति अनुष्ठान करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। अथवा (यदि वह निष्कामभावसे इस व्रतको करता है तो) उसे नित्यपदकी प्राप्ति होती है। इस व्रतका आचरण करनेवाले पुरुषको एक फलका परित्याग कर देना चाहिये। राजन्! प्रतिमास इसका आचरण करनेवाला पुरुष यश और कीर्ति प्राप्त करता है। नरेश्वर! (सौभाग्य-शयनका दान करनेवाला पुरुष) सौभाग्य, आरोग्य, सुन्दर रूप, आयु, वस्त्र, अलंकार और आभूषणोंसे नौ अरब तीन सौ वर्षोंतक वञ्चित नहीं होता। जो बारह, आठ या सात वर्षोंतक सौभाग्यशयन-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह श्रीकण्ठ (महादेव) के लोकमें देवगणोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर तीस कल्पोंतक निवास करता है। नरेश्वर! जो विवाहिता स्त्री या कुमारी इस व्रतका पालन करती है, वह भी ललितादेवीके अनुग्रहसे लालित होकर पूर्वोक्त फलको प्राप्त करती है। जो इस व्रतकी कथाको श्रवण करता है अथवा दूसरोंको इसे करनेकी सलाह देता है, वह भी विद्याधर होकर चिरकालतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। |
६३ रसकल्याणिनी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| इदमिह मदनेन पूर्वमिष्टं <br> शतधनुषा कृतवीर्यसूनुना च। <br> कृतमथ वरुणेन नन्दिना वा <br> किमु जननाथ ततो यदुद्भवः स्यात्॥ ४९ | जननाथ ! पूर्वकालमें कामदेवने, राजा शतधन्वाने, कार्तवीर्य अर्जुनने, वरुणदेवने तथा नन्दीने भी इस अद्भुत व्रतका अनुष्ठान किया था। इस प्रकार इस व्रतके अनुष्ठानसे जैसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय॥ ४३—४९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सौभाग्यशयनव्रतं नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सौभाग्यशयनव्रत नामक साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६०॥
इकसठवाँ अध्याय
अगस्त्य और वसिष्ठकी दिव्य उत्पत्ति, उर्वशी अप्सराका प्राकट्य और अगस्त्यके लिये अर्घ्य-प्रदान करनेकी विधि एवं माहात्म्य
| नारद उवाच | नारदजीने पूछा— |
|---|---|
| भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महर्जनः। <br> तपः सत्यं च सप्तैते देवलोकाः प्रकीर्तिताः॥ १ <br> पर्यायेण तु सर्वेषामाधिपत्यं कथं भवेत्। <br> इह लोके शुभं रूपमायुः सौभाग्यमेव च। <br> लक्ष्मीश्च विपुला नाथ कथं स्यात् पुरसूदन॥ २ | त्रिपुरविनाशक महेश्वर ! भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—ये सात देवलोक बतलाये गये हैं। इन सबपर क्रमशः आधिपत्य कैसे प्राप्त किया जा सकता है? तथा नाथ ! इस लोकमें सुन्दर रूप, दीर्घायु, सौभाग्य और विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? (कृपया इसे बतलाइये)॥ १-२॥ |
| महेश्वर उवाच | भगवान् महेश्वरने कहा— |
| पुरा हुताशनः सार्धं मारुतेन महीतले। <br> आदिष्टः पुरुहूतेन विनाशाय सुरद्विषाम्॥ ३ <br> निर्दग्धेषु ततस्तेन दानवेषु सहस्रशः। <br> तारकः कमलाक्षश्च कालदंष्ट्रः परावसुः। <br> विरोचनश्च संग्रामादपलायंस्तपोधन॥ ४ <br> अम्भः सामुद्रमाविश्य संनिवेशमकुर्वत। <br> अशक्या इति तेऽप्यग्निमारुताभ्यामुपेक्षिताः॥ ५ <br> ततः प्रभृति ते देवान् मनुष्यान् सभुजङ्गमान्। <br> सम्पीड्य च मुनीन् सर्वान् प्रविशन्ति पुनर्जलम्॥ ६ <br> एवं वर्षसहस्राणि वीराः पञ्च च सप्त च। <br> जलदुर्गबलाद् ब्रह्मन् पीडयन्ति जगत्त्रयम्॥ ७ <br> ततः परमथो वह्निमारुतावमराधिपः। <br> आदिदेश चिरादम्बुनिधिरेष विशोष्यताम्॥ ८ | तपोधन ! पूर्वकालकी बात है, एक बार इन्द्रने भूतलपर देवद्रोही असुरोंका विनाश करनेके लिये वायुके साथ अग्निको आज्ञा दी। तब अग्निद्वारा हजारों दानवोंको जलाकर भस्म कर दिये जानेपर तारक, कमलाक्ष, कालदंष्ट्र, परावसु और विरोचन आदि प्रधान दानव रणभूमिसे भाग खड़े हुए और समुद्रके जलमें प्रविष्ट होकर (वहाँ छिपकर) निवासस्थान बनाकर रहने लगे। उस समय अग्नि और वायुने भी 'अब ये सर्वथा अशक्त, निर्जीव हो गये हैं'—ऐसा समझकर उनकी उपेक्षा कर दी। तबसे वे दानव जलसे निकलकर देवताओं, नागों (सामान्य) मनुष्यों और समस्त मुनियोंको बुरी तरह पीड़ित कर पुनः जलमें प्रविष्ट हो जाते थे। ब्रह्मन् ! इस प्रकार वे पाँच-सात ही दानववीर हजारों वर्षोंसे अपने जलदुर्गके बलपर त्रिलोकीको पीड़ा पहुँचा रहे थे। तब यह सब देखकर देवेश्वर इन्द्रने अग्नि और वायुको आज्ञा दी कि 'आपलोग इस समुद्रको सुखा डालें। |
| * अध्याय ६१ * | २४५ |
|---|
| यस्मादस्मद्द्विषामेष शरणं वरुणालयः।<br>तस्माद् भवद्भ्यामद्यैव क्षयमेष प्रणीयताम्॥ ९<br>तावूचतुस्ततः शक्रमुभौ शम्बरसूदनम्।<br>अधर्म एष देवेन्द्र सागरस्य विनाशनम्॥ १०<br>यस्माज्जीवनिकायस्य महतः संक्षयो भवेत्।<br>तस्मान्न पापमद्यावां करवावः पुरंदर॥ ११<br>अस्य योजनमात्रेऽपि जीवकोटिशतानि च।<br>निवसन्ति सुरश्रेष्ठ स कथं नाशमर्हति॥ १२ | 'चूँकि यह वरुणका निवासस्थान समुद्र हमारे शत्रुओंका आश्रयस्थान बना हुआ है, इसलिये आपलोग आज ही इसे नष्ट कर दें।' तब वे दोनों (अग्नि और वायु) शम्बरासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रसे बोले—'देवेन्द्र! समुद्रका विनाश कर देना—यह महान् अधर्म होगा। पुरंदर! ऐसा करनेसे बहुत बड़े जीव-समुदायका विनाश हो जायगा, इसलिये हमलोग आज यह पाप नहीं करना चाहते। सुरश्रेष्ठ! इस समुद्रके एक योजन (चार मील)-के विस्तारमें ही सैकड़ों करोड़ जीव निवास करते हैं, भला, उनका विनाश कैसे किया जा सकता है!'॥३—१२॥ | | एवमुक्तः सुरेन्द्रस्तु कोपात् संरक्तलोचनः।<br>उवाचेदं वचो रोषात्रिर्दहन्निव पावकम्॥ १३<br>न धर्माधर्मसंयोगं प्राप्नुवन्त्यमराः क्वचित्।<br>भवतस्तु विशेषेण माहात्म्यं चाधितिष्ठति॥ १४<br>मदाज्ञालङ्घनं यस्मान्मारुतेन समं त्वया।<br>मुनिव्रतमहिंसादि परिगृह्य त्वया कृतम्।<br>धर्मार्थशास्त्ररहितं शत्रुं प्रति विभावसो॥ १५<br>तस्मादेकेन वपुषा मुनिरूपेण मानुषे।<br>मारुतेन समं लोके तव जन्म भविष्यति॥ १६<br>यदा च मानुषत्वेऽपि त्वयागस्त्येन शोषितः।<br>भविष्यत्युदधिर्वह्ने तदा देवत्वमाप्स्यसि॥ १७<br>इतीन्द्रशापात् पतितौ तत्क्षणात् तौ महीतले।<br>अवाप्तावेकदेहेन कुम्भाज्जन्म तपोधन॥ १८<br>मित्रावरुणयोर्वीर्याद् वसिष्ठस्यानुजोऽभवत्।<br>अगस्त्य इत्युग्रतपाः सम्बभूव पुनर्मुनिः॥ १९ | उनके ऐसा कहनेपर क्रोधके कारण सुरेन्द्रके नेत्र लाल हो गये। तब वे अपनी क्रोधाग्निसे अग्निको जलाते हुएकी तरह यह वचन बोले—'विभावसो! देवताओंपर कहीं भी धर्म और अधर्मका प्रभाव नहीं पड़ता। आपमें तो यह महत्त्व विशेषरूपसे वर्तमान है। चूँकि आपने वायुके साथ मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है और अहिंसा आदि मुनि-व्रत धारण कर धर्म, अर्थ और शास्त्रसे विहीन शत्रुके प्रति उपेक्षा की है, इसलिये मानवलोकमें वायुके साथ आपका एक शरीरसे मुनिरूपमें जन्म होगा। अग्ने! मानव-योनिमें उत्पन्न होनेपर भी जब आपद्वारा अगस्त्यरूपसे समुद्र सोख लिया जायगा, तब पुनः आपको देवत्वकी प्राप्ति होगी।' तपोधन! इस प्रकार इन्द्रके शापसे वे दोनों (अग्नि और वायु) उसी क्षण पृथ्वीतलपर गिर पड़े और एक ही शरीरसे (दोनोंने) घड़ेसे जन्म धारण किया। वे मित्रावरुणके वीर्यसे उत्पन्न होकर वसिष्ठके अनुज हुए। आगे चलकर वे दोनों संयुक्त उग्रतपस्वी अगस्त्य मुनिके नामसे विख्यात हुए॥ १३—१९॥ | | नारद उवाच<br>सम्भूतः स कथं भ्राता वसिष्ठस्याभवन्मुनिः।<br>कथं च मित्रावरुणौ पितरावस्य तौ स्मृतौ।<br>जन्म कुम्भादगस्त्यस्य कथं स्यात् पुरसूदन॥ २० | नारदजीने पूछा—त्रिपुरसूदन! वे मुनि जन्म धारण करनेके पश्चात् वसिष्ठके भ्राता कैसे हो गये? वे दोनों मित्रावरुण इनके पिता कैसे कहलाये? तथा अगस्त्य मुनिका घड़ेसे जन्म कैसे हुआ? (यह सब हम जानना चाहते हैं।)॥२०॥ | | ईश्वर उवाच<br>पुरा पुराणपुरुषः कदाचिद् गन्धमादने।<br>भूत्वा धर्मसुतो विष्णुश्चचार विपुलं तपः॥ २१ | ईश्वरने कहा—नारद! पूर्वकालमें पुराणपुरुष भगवान् विष्णु किसी समय धर्मके पुत्ररूपमें उत्पन्न होकर गन्धमादन पर्वतपर महान् तपस्यामें संलग्न थे। |
| २४६ | * मत्स्यपुराण * |
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| तपसा तस्य भीतेन विघ्नार्थं प्रेषितावुभौ।<br>शक्रेण माधवानङ्गावप्सरोगणसंयुतौ ॥ २२<br>तदा तद्गीतवाद्येन नाङ्गरागादिना हरिः।<br>न काममाधवाभ्यां च विषयान् प्रति चुक्षुभे ॥ २३<br>तदा काममधुस्त्रीणां विषादमगमद् गणः।<br>संक्षोभाय ततस्तेषां स्वोरुदेशान्नराग्रजः।<br>नारीमुत्पादयामास त्रैलोक्यजनमोहिनीम् ॥ २४<br>संक्षुब्धास्तु तया देवास्तौ तु देववरावुभौ।<br>अप्सरोभिः समक्षं हि देवानामकब्रवीद्धरिः॥ २५<br>अप्सरा इति सामान्या देवानामकब्रवीद्धरिः।<br>उर्वशीति च नाम्नेयं लोके ख्यातिं गमिष्यति ॥ २६<br>ततः कामयमानेन मित्रेणाहूय सोर्वशी।<br>उक्ता मां रमयस्वेति बाढमित्यब्रवीत् तु सा ॥ २७<br>गच्छन्ती चाम्बरं तद्वत् स्तोकमिन्दीवरेक्षणा।<br>वरुणेन धृता पश्चाद् वरुणं नाभ्यनन्दत ॥ २८<br>मित्रेणाहं वृता पूर्वमद्य भार्या न ते विभो।<br>उवाच वरुणश्चित्तं मयि संन्यस्य गम्यताम् ॥ २९ | उनकी तपस्यासे भयभीत हुए इन्द्रने उसमें विघ्न डालनेके लिये अप्सराओंके साथ वसन्त-ऋतु और कामदेव—दोनोंको भेजा। उस समय श्रीहरि न तो उनके गाने, बजाने अथवा अङ्गराग आदिसे ही प्रभावित हुए, न वसन्त और कामदेवद्वारा उपस्थित किये गये विषय-भोगोंके प्रति ही उनका मन क्षुब्ध हुआ। यह देखकर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंका समूह विषादमें डूब गया। तत्पश्चात् नरके अग्रज नारायणने उन्हें विशेषरूपसे क्षुब्ध करनेके हेतु अपने ऊरुप्रदेशसे एक ऐसी नारीको उत्पन्न किया, जो त्रिलोकीके मनुष्योंको मोहित करनेवाली थी। उस स्त्रीने समस्त देवताओं तथा उन दोनों देवश्रेष्ठोंको भलीभाँति क्षुब्ध कर दिया। उस समय श्रीहरिने अप्सराओंके सामने ही देवताओंसे कहा—'देवगण! यह एक अप्सरा है। यह लोकमें उर्वशी-नामसे प्रसिद्ध होगी'॥ २१—२९॥ | | गतायां बाढमित्युक्त्वा मित्रः शापमदात्तदा।<br>तस्यै मानुषलोके त्वं गच्छ सोमसुतात्मजम् ॥ ३०<br>भजस्वेति यतो वेश्याधर्म एष त्वया कृतः।<br>जलकुम्भे ततो वीर्यं मित्रेण वरुणेन च।<br>प्रक्षिप्तमथ संजातौ द्वावेव मुनिसत्तमौ ॥ ३१<br>निमिर्नाम सह स्त्रीभिः पुरा द्यूतमदीव्यत।<br>तत्रान्तरेऽभ्याजगाम वसिष्ठो ब्रह्मसम्भवः॥ ३२<br>तस्य पूजामकुर्वन्तं शशाप स मुनिर्नृपम्।<br>विदेहस्त्वं भवस्वेति ततस्तेनाप्यसौ मुनिः॥ ३३<br>अन्योन्यशापाच्च तयोर्विगते इव चेतसी।<br>जग्मतुः शापनाशाय ब्रह्माणं जगतः पतिम् ॥ ३४<br>अथ ब्रह्मण आदेशालोचनेष्ववसन्निभिः।<br>निमेषाः स्युश्च लोकानां तद्विश्रामाय नारद ॥ ३५<br>वसिष्ठोऽप्यभवत् तस्मिन् जलकुम्भे च पूर्ववत्।<br>ततः श्वेतश्चतुर्बाहुः साक्षसूत्रकमण्डलुः।<br>अगस्त्य इति शान्तात्मा बभूव ऋषिसत्तमः ॥ ३६ | तदनन्तर एक घड़ेसे मित्र और वरुणके अंशसे दो मुनिश्रेष्ठ उत्पन्न हुए। प्राचीनकालकी बात है, एक बार जब महाराज निमि स्त्रियोंके साथ जुआ खेल रहे थे, उसी समय ब्रह्मपुत्र महर्षि वसिष्ठ उनके पास आये, किंतु राजाने उनका स्वागत-सत्कार नहीं किया। तब वसिष्ठ मुनिने राजाको शाप दे दिया—'तुम विदेह—देहरहित हो जाओ।' तब राजाने भी मुनिको वही शाप दे दिया। इस प्रकार एक-दूसरेके शापवश दोनोंकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। तब वे दोनों शापसे छुटकारा पानेके लिये जगत्पति ब्रह्माके पास गये। वहाँ ब्रह्माके आदेशसे राजा निमिका प्राणियोंके नेत्रोंमें निवास हुआ। नारद! उन्हींको विश्राम देनेके लिये लोगोंके निमेष (पलकोंका गिरना और खुलना) होते रहते हैं। वसिष्ठ भी पहलेकी तरह उसी जलकुम्भसे प्रकट हुए। तदुपरान्त उसी जलकुम्भसे ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त शान्त स्वभाववाले थे। उनका गौर वर्ण था, उनके चार भुजाएँ थीं तथा वे अक्षसूत्र (यज्ञोपवीत) और कमण्डलु धारण किये हुए थे। विप्रोंसे घिरे हुए अगस्त्यने अपनी पत्नीके साथ |
— उसका माहात्म्य
| * अध्याय ६१ * | २४७ |
|---|---|
| मलयस्यैकदेशे तु वैखानसविधानतः।<br>सभार्यः संवृतो विप्रैस्तपश्चक्रे सुदुश्चरम्॥ ३७<br><br>ततः कालेन महता तारकादतिपीडितम्।<br>जगद् वीक्ष्य स कोपेन पीतवान् वरुणालयम्॥ ३८<br><br>ततोऽस्य वरदाः सर्वे बभूवुः शङ्करादयः।<br>ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् वरदानाय जग्मतुः।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते यदभीष्टं च वै मुने॥ ३९ | रहकर मलयपर्वतके एक प्रदेशमें वैखानस-विधिके अनुसार अत्यन्त कठोर तप किया था। चिरकालके पश्चात् तारकासुरद्वारा जगत्को अत्यन्त पीड़ित देखकर वे कुपित हो गये और समुद्रको पी गये। यह देखकर शङ्कर आदि सभी देवता उन्हें वर देनेके लिये उत्सुक हो उठे। उसी समय ब्रह्मा और भगवान् विष्णु वर प्रदान करनेके निमित्त उनके निकट गये और बोले—'मुने! आपका कल्याण हो! आपको जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लीजिये'॥ ३०—३९॥ |
| अगस्त्य उवाच<br>यावद् ब्रह्मसहस्राणां पञ्चविंशतिकोटयः।<br>वैमानिको भविष्यामि दक्षिणाचलवर्त्मनि॥ ४०<br>मद्विमानोदये कुर्याद् यः कश्चित् पूजनं मम।<br>स समलोकाधिपतिः पर्यायेण भविष्यति॥ ४१ | अगस्त्य बोले— देव! मैं एक सहस्र ब्रह्माओंके पचीस करोड़ वर्षोंतक दक्षिणाचलके मार्गमें विमानपर स्थित होकर निवास करूँ। उस समय मेरे विमानके उदय होनेपर जो कोई मनुष्य मेरा पूजन करे, वह क्रमशः सातों लोकोंका अधिपति हो जाय॥ ४०-४१॥ |
| ईश्वर उवाच<br>एवमस्त्विति तेऽप्युक्त्वा जग्मुर्देवा यथागतम्।<br>तस्मादर्घः प्रदातव्यो ह्यगस्त्यस्य सदा बुधैः॥ ४२ | ईश्वरने कहा— नारद! तब वे देवगण भी 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। इसलिये विद्वानोंको अगस्त्यके लिये सदा अर्घ्य प्रदान करते रहना चाहिये॥ ४२॥ |
| नारद उवाच<br>कथमर्घप्रदानं तु कर्तव्यं तस्य वै विभो।<br>विधानं यदगस्त्यस्य पूजने तद् वदस्व मे॥ ४३ | नारदजीने पूछा— विभो! अगस्त्यके लिये किस विधिसे अर्घ्य प्रदान करना चाहिये? तथा उनके पूजनका क्या विधान है? यह मुझे बतलाइये?॥ ४३॥ |
| ईश्वर उवाच<br>प्रत्यूषसमये विद्वान् कुर्यादस्योदये निशि।<br>स्नानं शुक्लतिलैस्तद्वच्छुक्लमाल्याम्बरो गृही॥ ४४<br>स्थापयेदव्रणं कुम्भं माल्यवस्त्रविभूषितम्।<br>पञ्चरत्नसमायुक्तं घृतपात्रसमन्वितम्॥ ४५<br>अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं तथैव<br>सौवर्णमेवायतबाहुदण्डम् ।<br>चतुर्मुखं कुम्भमुखे निधाय<br>धान्यानि सप्ताम्बरसंयुतानि॥ ४६<br>सकांस्यपात्राक्षतशुक्तियुक्तं<br>मन्त्रेण दद्याद् द्विजपुङ्गवाय।<br>उत्क्षिप्य लम्बोदरदीर्घबाहु-<br>मनन्यचेता यमदिङ्मुखः सन्॥ ४७ | ईश्वरने कहा— नारद! विद्वान् गृहस्थको चाहिये कि वह अगस्त्यके उदयसे संयुक्त रात्रिमें प्रातःकाल श्वेत तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। उसी प्रकार श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे। तत्पश्चात् एक छिद्ररहित कलश स्थापित करे और उसे पुष्पमाला तथा वस्त्रसे विभूषित कर दे। उसके भीतर पञ्चरत्न डाल दे और पार्श्वभागमें घीसे भरा हुआ एक पात्र रख दे। साथ ही काँसेका पात्र चावल भरकर उसके ऊपर सीप अथवा शङ्ख रखकर प्रस्तुत करे। फिर अँगूठेके बराबर लम्बी सोनेकी एक ऐसी पुरुषाकार प्रतिमा बनवाये, जिसमें चार मुख दीख पड़ते हों और जिसकी भुजाएँ लम्बी हों, उसे कलशके मुखमें स्थापित कर दे। उसके निकट पृथक्-पृथक् सात वस्त्रोंमें बँधी हुई धान्य-राशि भी रखे। तदनन्तर अनन्य चित्तसे दक्षिणाभिमुख हो लम्बे उदर और लम्बी भुजाओंवाली अगस्त्यमुनिकी उस प्रतिमाको (घड़ेसे) निकालकर हाथमें लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारी सामग्रियोंसहित सुपात्र ब्राह्मणको दान कर दे। |
२४८ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| श्वेतां च दद्याद् यदि शक्तिरस्ति<br>रौप्यैः खुरैर्हेममुखीं सवत्साम्।<br>धेनुं नरः क्षीरवतीं प्रणम्य<br>स्रग्वस्त्रघण्टाभरणां द्विजाय॥ ४८<br><br>आसप्तरात्रोदयमेतदस्य<br>दातव्यमेतत् सकलं नरेण।<br>यावत्सप्ताः सप्त दशाथ वा स्यु-<br>रथोध्वंमप्यत्र वदन्ति केचित्॥ ४९ | साथ ही यदि धनसम्पत्तिरूपी शक्ति हो तो गृहस्थ पुरुष एक श्वेत वर्णकी बछड़ेवाली दुधारू गौको सोनेके मुख और चाँदीके खुरोंसे संयुक्त करे तथा उसे माला, वस्त्र और घंटीसे विभूषित करके नमस्कारपूर्वक ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार गृहस्थ पुरुषको अगस्त्योदयसे सात रात्रियोंतक इन सभी वस्तुओंका दान करना चाहिये। इस विधानको सात अथवा दस वर्षोंतक करना चाहिये। कुछ लोग इससे आगे भी इसकी अवधि बतलाते हैं॥ ४८—४९॥ |
| काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव।<br>मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते।<br>प्रत्यब्दं तु फलत्यागमेवं कुर्वन्न सीदति<sup>१</sup>॥ ५० | तदनन्तर यों प्रार्थना करते हुए अर्घ्य प्रदान करे—'कुम्भसे उत्पन्न होनेवाले अगस्त्यजी! आपके शरीरका रंग कासके पुष्पके सदृश उज्ज्वल है, आपकी उत्पत्ति अग्नि और वायुसे हुई है और आप मित्रावरुणके पुत्र हैं, आपको नमस्कार है।' इस प्रकार फलत्यागपूर्वक प्रतिवर्ष अर्घ्य प्रदान करनेवाला पुरुष कष्टभागी नहीं होता। |
| होमं कृत्वा ततः पश्चाद् वर्जयेन्मानवः फलम्।<br>अनेन विधिना यस्तु पुमानर्घ्यं निवेदयेत्॥ ५१ | तत्पश्चात् हवन करके कार्य समाप्त करे। उस समय मनुष्यको फलकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। जो पुरुष इस विधिके अनुसार अगस्त्यको अर्घ्य निवेदित करता है, वह सुन्दर रूप और नीरोगतासे युक्त होकर इस मृत्युलोकमें पुनः जन्म धारण करता है। |
| इमं लोकं स चाप्नोति रूपारोग्यसमन्वितः।<br>द्वितीयेन भुवर्लोकं स्वर्लोकं च ततः परम्॥ ५२ | इसी प्रकार वह दूसरे अर्घ्यसे भुवर्लोकको और तीसरेसे उससे भी श्रेष्ठ स्वर्लोकको जाता है। |
| सप्तैव लोकानाप्नोति सप्तार्घ्यान् यः प्रयच्छति।<br>यावदायुश्च यः कुर्यात् परं ब्रह्माधिगच्छति॥ ५३ | इसी तरह जो मनुष्य उन (सात) दिनोंमें अर्घ्य देता है, वह क्रमशः सातों लोकोंको प्राप्त होता है तथा जो आयुपर्यन्त इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ ५०—५३॥ |
| इह पठति शृणोति वा य<br>एतद् युगलमुनिप्रभवार्घ्यसम्प्रदानम्।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि<br>विष्णोर्भवनगतः परिपूज्यतेऽमरौघैः॥ ५४ | जो मनुष्य इस मर्त्यलोकमें इन दोनों (वसिष्ठ और अगस्त्य) मुनियोंकी उत्पत्ति और अगस्त्य मुनिके अर्घ्यप्रदान<sup>२</sup> के वृत्तान्तको पढ़ता अथवा सुनता है या ऐसा करनेकी सलाह देता है, वह विष्णुलोकमें जाकर देवगणोंद्वारा पूजित होता है॥ ५४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽगस्त्योत्पत्तिपूजाविधानं नामैकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अगस्त्योत्पत्तिपूजा-विधान नामक इकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६१॥
१. यहाँ पूनावाली प्रतिमें तीन श्लोक अधिक हैं।
२. अगस्त्यार्घ्यपर ऋग्वेद १। १७९। ६ से लेकर अग्नि, गरुड, वृहद्धर्म आदि पुराणोंतकमें अपार सामग्री भरी पड़ी है। हेमाद्रि, गोपाल तथा रत्नाकर आदिने भी इन्हें अपने व्रत-निबन्धोंमें कई पृष्ठोंमें संगृहीत किया है। ऋक् प्रथम मण्डलमें दीर्घतमा १६४ सू० के बाद १९१ सूक्तोंतकके ये ही द्रष्टा हैं।
६५ अक्षयतृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
- अध्याय ६२ * | २४९ ---|---
बासठवाँ अध्याय
अनन्ततृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| मनुरुवाच<br>सौभाग्यारोग्यफलदं विपक्षक्षयकारकम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं देव तन्मे ब्रूहि जनार्दन॥ १ | मनुने पूछा— जनार्दनदेव ! जो इस लोकमें सौभाग्य और नीरोगतारूप फल देनेवाला तथा भोग और मोक्षका प्रदाता एवं शत्रुनाशक हो, वह व्रत मुझे बतलाइये॥ १॥ | | मत्स्य उवाच<br>यदुमायाः पुरा देव उवाच पुरसूदनः।<br>कैलासशिखरासीनो देव्या पृष्टस्तदा किल॥ २<br>कथासु सम्प्रवृत्तासु धर्म्यासु ललितासु च।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन् ! पूर्वकालमें कैलास पर्वतके शिखरपर बैठे हुए त्रिपुरविनाशक महादेवजीने सुन्दर धार्मिक कथाओंके प्रसङ्गमें उमादेवीद्वारा पूछे जानेपर उनसे जिस व्रतका वर्णन किया था, वही इस समय मैं बतला रहा हूँ, यह भोग और मोक्षरूप फल देनेवाला है॥ २-३॥ | | ईश्वर उवाच<br>शृणुष्वावहिता देवि तथैवानन्तपुण्यकृत्।<br>नराणामथ नारीणामाराधनमनुत्तमम्॥ ४<br>नभस्ये वाथ वैशाखे पौषे मार्गशिरेऽथवा।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां सुस्नातो गौरसर्षपैः॥ ५<br>गोरोचनं सगोमूत्रं मुस्तां गोशकृतं तथा।<br>दधिचन्दनसम्मिश्रं ललाटे तिलकं न्यसेत्।<br>सौभाग्यारोग्यदं यत् स्यात् सदा च ललिताप्रियम्॥ ६<br>प्रतिपक्षं तृतीयासु पुमानापीतवाससी।<br>धारयेदथ रक्तानि नारी चेदथ संयता॥ ७<br>विधवा धातुरक्तानि कुमारी शुक्लवाससी।<br>देवीं तु पञ्चगव्येन ततः क्षीरेण केवलम्।<br>स्त्रापयेन्मधुना तद्वत् पुष्पगन्धोदकेन च॥ ८<br>पूजयेच्छुक्लपुष्पैश्च फलैर्नानाविधैरपि।<br>धान्यलाजाजिलवणैर्गुडक्षीरघृतान्वितैः ॥ ९<br>शुक्लाक्षततिलैर्र्च्चां ललितां यः सदार्चयेत्।<br>आपादाद्यर्चनं कुर्याद् गौर्याः सम्यक् समासतः॥ १० | ईश्वरने कहा— देवि! मैं पुरुषों तथा स्त्रियोंके लिये एक सर्वश्रेष्ठ व्रत बतला रहा हूँ, जो अनन्त पुण्यदायक है। तुम सावधानीपूर्वक उसे सुनो। इस व्रतका व्रती भाद्रपद, वैशाख, पौष अथवा मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षमें तृतीया तिथिको पीली सरसोंसे युक्त जलसे भलीभाँति स्नान करे। फिर गोरोचन, गोमूत्र, मुस्ता, गोबर, दही और चन्दनको मिलाकर ललाटमें तिलक लगावे; क्योंकि यह तिलक सौभाग्य और आरोग्यका प्रदायक तथा ललितादेवीको परम प्रिय* है। प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको पुरुषको पीला वस्त्र, यदि सधवा स्त्री व्रतनिष्ठ होती है तो उसे लाल वस्त्र, विधवाको गेरू आदि धातुओंसे रँगा हुआ वस्त्र और कुमारी कन्याको श्वेत वस्त्र धारण करना चाहिये। उस समय देवीकी मूर्तिको पञ्चगव्यसे स्नान करानेके पश्चात् केवल दूधसे नहलाना चाहिये। उसी प्रकार मधु और पुष्प-चन्दनमिश्रित जलसे भी स्नान करावे। फिर श्वेत पुष्प, अनेक प्रकारके फल, धनिया, श्वेत जीरा, नमक, गुड़, दूध और घृतसे देवीकी पूजा करे। श्वेत अक्षत और तिलसे तो ललितादेवीकी सदा पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक शुक्लपक्षमें तृतीया तिथिको देवीकी मूर्तिके चरणसे लेकर मस्तकपर्यन्त संक्षेपसे पूजनका विधान है। |
* सौर, पाद्म सृष्टि, भविष्योत्तरपुराण अ० २६ में यह व्रत सविस्तर निरूपित है। सौभाग्य एवं ललितादेवीके विषयमें ६० वें अध्यायकी टिप्पणी द्रष्टव्य है।
६६ सारस्वत-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२५० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अर्थ |
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| वरदायै नमः पादौ तथा गुल्फौ श्रियै नमः।<br>अशोकायै नमो जङ्घे पार्वत्यै जानुनी तथा॥ ११<br>ऊरू मङ्गलकारिण्यै वामदेव्यै तथा कटिम्।<br>पद्मोदरायै जठरमुरः कामश्रियै नमः॥ १२<br>करौ सौभाग्यदायिन्यै बाहूदरमुखं श्रियै।<br>दन्तान् दर्पणवासिन्यै स्मरदायै स्मितं नमः॥ १३<br>गौर्यै नमस्तथा नासामुत्पलायै च लोचने।<br>तुष्ट्यै ललाटमलकान् कात्यायन्यै शिरस्तथा॥ १४<br>नमो गौर्यै नमो धिष्ण्यै नमः कान्त्यै नमः श्रियै।<br>रम्भायै ललितायै च वासुदेव्यै नमो नमः॥ १५ | 'वरदायै नमः' से दोनों चरणोंका, 'श्रियै नमः' से दोनों गुल्फोंका, 'अशोकायै नमः' से दोनों जाँघोंका, 'पार्वत्यै नमः' से दोनों जानुओंका, 'मङ्गलकारिण्यै नमः' से दोनों ऊरुओंका, 'वामदेव्यै नमः' से कटिप्रदेशका, 'पद्मोदरायै नमः' से उदरका तथा 'कामश्रियै नमः' से वक्षःस्थलका अर्चन करे; फिर 'सौभाग्यदायिन्यै नमः' से दोनों हाथोंका, 'श्रियै नमः' से बाहु, उदर और मुखका, 'दर्पणवासिन्यै नमः' से दाँतोंका, 'स्मरदायै नमः' से मुसकानका, 'गौर्यै नमः' से नासिकाका, 'उत्पलायै नमः' से नेत्रोंका, 'तुष्ट्यै नमः' से ललाटका, 'कात्यायन्यै नमः' से सिर और बालोंका पूजन करना चाहिये। तदुपरान्त 'गौर्यै नमः', 'धिष्ण्यै नमः', 'कान्त्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'रम्भायै नमः', 'ललितायै नमः' और 'वासुदेव्यै नमः' कहकर देवीके चरणोंमें प्रणिपात करना चाहिये॥ ४—१५॥ |
| एवं सम्पूज्य विधिवदग्रतः पद्ममालिखेत्।<br>पत्रैर्द्वादशभिर्युक्तं कुङ्कुमेन सकर्णिकम्॥ १६<br>पूर्वेण विन्यसेद् गौरीमपर्णां च ततः परम्।<br>भवानीं दक्षिणे तद्वद् रुद्राणीं च ततः परम्॥ १७<br>विन्यसेत् पश्चिमे सौम्यां सदा मदनवासिनीम्।<br>वायव्ये पाटलावासामुत्तरेण ततोऽप्युमाम्॥ १८<br>लक्ष्मीं स्वाहां स्वधां तुष्टिं मङ्गलां कुमुदां सतीम्।<br>रुद्रं च मध्ये संस्थाप्य ललितां कर्णिकोपरि।<br>कुसुमैरक्षतैर्वारिभिर्नमस्कारेण विन्यसेत्॥ १९<br>गीतमङ्गलनिर्घोषान् कारयित्वा सुवासिनीः।<br>पूजयेद् रक्तवासोभी रक्तमाल्यानुलेपनैः।<br>सिन्दूरं गन्धचूर्णं च तासां शिरसि पातयेत्॥ २०<br>सिन्दूरकुङ्कुमस्नानमिष्टं सत्याः सदा यतः।<br>तथोपदेष्टारमपि पूजयेद् यत्नतो गुरुम्।<br>न पूज्यते गुरुर्यत्र सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ २१<br>नभस्ये पूजयेद् गौरीमुत्पलैरसितैः सदा।<br>बन्धुजीवैराश्वयुजे कार्तिके शतपत्रकैः॥ २२ | इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके मूर्तिके आगे कुङ्कुमसे बारह पत्तोंसे युक्त कर्णिकासहित कमल बनाये। उसके पूर्वभागमें गौरी, उसके बाद अपर्णा, दक्षिणभागमें भवानी और नैर्ऋत्य कोणमें रुद्राणीको स्थापित करे। पुनः पश्चिममें सदा सौम्य स्वभावसे रहनेवाली मदनवासिनी, वायव्यकोणमें पाटला और उत्तरमें पुष्पमें निवास करनेवाली उमाकी स्थापना करे। मध्यभागमें लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा, तुष्टि, मङ्गला, कुमुदा और सतीको स्थित करे। कमलके मध्यमें रुद्रकी स्थापना करके कर्णिकाके ऊपर ललितादेवीको स्थित करे। तत्पश्चात् गीत और माङ्गलिक बाजाका आयोजन कराकर पुष्प, श्वेत अक्षत और जलसे देवीकी अर्चना करके उन्हें नमस्कार करे। फिर लाल वस्त्र, लाल पुष्पोंकी माला और लाल अङ्गरागसे सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा उनके सिर (माँग)-में सिन्दूर और कुङ्कुम लगावे; क्योंकि सिन्दूर और कुङ्कुम सती देवीको सदा अभीष्ट हैं। तदनन्तर उपदेश करनेवाले गुरु अर्थात् आचार्यकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये; क्योंकि जहाँ आचार्यकी पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। गौरीदेवीकी पूजा सदा भाद्रपदमासमें नीले कमलसे, आश्विनमें बन्धुजीव (गुलदपहरिया)-के फूलोंसे, कार्तिकमें शतपत्रक (कमल)-के पुष्पोंसे, |
| * अध्याय ६२ * | २५१ |
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| जातीपुष्पैर्मार्गशीर्षे पौषे पीतैः कुरण्टकैः।<br>कुन्दकुङ्कुमपुष्पैस्तु देवीं माघे तु पूजयेत्।<br>सिन्धुवारेण जात्या वा फाल्गुनेऽप्यर्चयेदुमाम्॥ २३<br>चैत्रे तु मल्लिकाशोकैर्वैशाखे गन्धपाटलैः।<br>ज्येष्ठे कमलमन्दारैराषाढे चम्पकाम्बुजैः।<br>कदम्बैरथ मालत्या श्रावणे पूजयेदुमाम्॥ २४<br>गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्।<br>बिल्वपत्रार्कपुष्पं च गवां शृङ्गोदकं तथा॥ २५<br>पञ्चगव्यं च बिल्वं च प्राशयेत् क्रमशस्तदा।<br>एतद् भाद्रपदाद्यं तु प्राशनं समुदाहृतम्॥ २६ | मार्गशीर्षमें जाती (मालती)-के पुष्पोंसे, पौषमें पीले कुरण्टक (कटसरैया)-के पुष्पोंसे, माघमें कुन्द और कुङ्कुमके पुष्पोंसे करनी चाहिये। इसी प्रकार फाल्गुनमें सिन्दुवार अथवा मालतीके पुष्पोंसे उमाकी अर्चना करे। चैत्रमें मल्लिका और अशोकके पुष्पोंसे, वैशाखमें गन्धपाटलके फूलोंसे, ज्येष्ठमें कमल और मन्दारके कुसुमोंसे, आषाढ़में चम्पा एवं कमल-पुष्पोंसे और श्रावणमें कदम्ब तथा मालतीके फूलोंसे पार्वतीकी पूजा करनी चाहिये। इसी तरह भाद्रपदसे आरम्भ कर आश्विन आदि बारह महीनोंमें क्रमशः गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, बिल्व-पत्र, मदारका पुष्प, गोशृङ्गोदक, पञ्चगव्य और बेलका नैवेद्य अर्पण करनेका विधान है। क्रमशः भाद्रपदसे लेकर श्रावणतक प्रत्येक मासके लिये ये नैवेद्य बतलाये गये हैं॥ १६—२६॥ |
| प्रतिपक्षं च मिथुनं तृतीयायां वरानने।<br>ब्राह्मणं ब्राह्मणीं चैव शिवं गौरीं प्रकल्प्य च॥ २७<br>भोजयित्वार्चयेद् भक्त्या वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पुंसः पीताम्बरे दद्यात् स्त्रियै कौसुम्भवाससी॥ २८<br>निष्पावाजाजिलवणमिक्षुदण्डगुडान्वितम् ।<br>स्त्रियै दद्यात् फलं पुंसे सुवर्णोत्पलसंयुतम्॥ २९<br>यथा न देवि देवेशस्त्वत्वां परित्यज्य गच्छति।<br>तथा मां सम्परित्यज्य पतिर्नान्यत्र गच्छतु॥ ३०<br>कुमुदा विमलानन्ता भवानी च सुधा शिवा।<br>ललिता कमला गौरी सती रम्भाथ पार्वती॥ ३१<br>नभस्यादिषु मासेषु प्रीयतामित्युदीरयेत्।<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्॥ ३२<br>मिथुनानि चतुर्विंशद् दश द्वौ च समर्चयेत्।<br>अष्टौ षड् वाप्यथ पुनश्चानुमासं समर्चयेत्॥ ३३<br>पूर्वं दत्त्वा तु गुरवे शेषानप्यर्चयेद् बुधः।<br>उक्तानन्ततृतीयेषा सदानन्तफलप्रदा॥ ३४ | वरानने! प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको एक ब्राह्मण-दम्पतिको उनमें शिव-पार्वतीकी कल्पना कर भोजन कराकर उनकी वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दनसे भक्तिपूर्वक अर्चना करे तथा पुरुषको दो पीताम्बर और स्त्रीको दो पीली साड़ियाँ प्रदान करे। फिर ब्राह्मणी-स्त्रीको निष्पाव (बड़ी मटर या सेम), जीरा, नमक, ईंख, गुड़, फल और फूल आदि सौभाग्यष्टक देकर और पुरुषको सुवर्णनिर्मित कमल देकर यों प्रार्थना करे—'देवि! जिस प्रकार देवाधिदेव भगवान् महादेव आपको छोड़कर नहीं जाते, उसी प्रकार मेरे भी पतिदेव मुझे छोड़कर अन्यत्र न जायें।' पुनः कुमुदा, विमला, अनन्ता, भवानी, सुधा, शिवा, ललिता, कमला, गौरी, सती, रम्भा और पार्वतीदेवीके इन नामोंका उच्चारण करके प्रार्थना करे कि आप क्रमशः भाद्रपद आदि मासोंमें प्रसन्न हों। व्रतकी समाप्तिमें सुवर्ण-निर्मित कमलसहित शय्या दान करे और चौबीस अथवा बारह द्विज-दम्पतियोंकी पूजा करे। पुनः प्रतिमास आठ या छः दम्पतियोंका पूजन करते रहनेका विधान है। विद्वान् व्रती सर्वप्रथम गुरुको दान देकर तत्पश्चात् दूसरे ब्राह्मणोंकी अर्चना करे। देवि! इस प्रकार मैंने इस अनन्त-तृतीयाका वर्णन कर दिया, जो सदा अनन्त फलकी प्रदायिका है॥२७—३४॥ |
| सर्वपापहरां देवि सौभाग्यारोग्यवर्धिनीम्।<br><br>न चैनां वित्तशाठ्येन कदाचिदपि लङ्घयेत्।<br><br>नरो वा यदि वा नारी वित्तशाठ्यात् पतत्यधः॥ ३५ | देवि! यह अनन्ततृतीया समस्त पापोंकी विनाशिका तथा सौभाग्य और नीरोगताकी वृद्धि करनेवाली है, इसका कृपणता-वश कभी भी उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये; क्योंकि चाहे पुरुष हो या स्त्री—कोई भी कृपणताके वशीभूत होकर यदि इसका उल्लङ्घन करता है तो उसका अधःपतन हो जाता है। |
६७ सूर्य-चन्द्र-ग्रहणके समय स्नानकी विधि और उसका माहात्म्य
२५२ * मत्स्यपुराण *
| गर्भिणी सूतिका नक्तं कुमारी वाथ रोगिणी।<br>यद्यशुद्धा तदान्येन कारयेत् प्रयता स्वयम्॥ ३६<br><br>इमामनन्तफलदां यस्तृतीयां समाचरेत्।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं शिवलोके महीयते॥ ३७<br><br>वित्तहीनोऽपि कुरुते वर्षत्रयमुपोषणैः।<br>पुष्पमन्त्रविधानेन सोऽपि तत्फलमाप्नुयात्॥ ३८<br><br>नारी वा कुरुते या तु कुमारी विधवाथवा।<br>सापि तत्फलमाप्नोति गौर्यनुग्रहलालिता॥ ३९<br><br>इति पठति शृणोति वा<br>य इत्थं गिरितनयाव्रतमिन्द्रलोकसंस्थः।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-<br>रमरवधूजनकिन्नरैश्च पूज्यः॥ ४० | गर्भिणी एवं सूतिका (सौरीमें पड़ी हुई) स्त्री नक्तव्रत (रातमें भोजन) करे। कुमारी और रोगिणी अथवा अशुद्ध स्त्री स्वयं नियमपूर्वक रहकर दूसरेके द्वारा व्रतका अनुष्ठान कराये। जो मानव अनन्त फल प्रदान करनेवाली इस तृतीयाके व्रतका अनुष्ठान करता है, वह सौ करोड़ कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। निर्धन पुरुष भी यदि तीन वर्षोंतक उपवास करके पुष्प और मन्त्र आदिके द्वारा इस व्रतका अनुष्ठान करता है तो उसे भी उस फलकी प्राप्ति होती है। सधवा स्त्री, कुमारी अथवा विधवा—जो कोई भी इस व्रतका पालन करती है, वह भी गौरीकी कृपासे लालित होकर उस फलको प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार जो मनुष्य गिरीश-नन्दिनी पार्वतीके इस व्रतको पढ़ता अथवा सुनता है, वह इन्द्रलोकमें वास करता है तथा जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवताओं, देवाङ्गनाओं और किन्नरोंद्वारा पूजनीय हो जाता है॥ ३५–४०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽनन्ततृतीयाव्रतं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ ६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनन्ततृतीया-व्रत नामक बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६२॥
तिरसठवाँ अध्याय
रसकल्याणिनी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br><br>अथान्यामपि वक्ष्यामि तृतीयां पापनाशिनीम्।<br>रसकल्याणिनीमेनां पुराकल्पविदो विदुः॥ १<br><br>माघमासे तु सम्प्राप्ते तृतीयां शुक्लपक्षतः।<br>प्रातर्गव्येन पयसा तिलैः स्नानं समाचरेत्॥ २<br><br>स्नापयेन्मधुना देवीं तथैवेक्षुरसेन च।<br>दक्षिणाङ्गानि सम्पूज्य ततो वामानि पूजयेत्॥ ३<br><br>गन्धोदकेन च पुनः पूजनं कुङ्कुमेन वै।<br>ललितायै नमो देव्याः पादौ गुल्फौ ततोऽर्चयेत्।<br>जङ्घां जानुं तथा शान्त्यै तथैवोरुं श्रियै नमः॥ ४ | ईश्वरने कहा—नारद! अब मैं एक अन्य तृतीयाका भी वर्णन कर रहा हूँ जो पापोंका विनाश करनेवाली है, तथा जिसे पुराकल्पके ज्ञातालोग 'रस-कल्याणिनी' के नामसे जानते हैं। माघका महीना आनेपर शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको प्रातःकाल व्रतीको गो-दुग्ध और तिलमिश्रित जलसे स्नान करना चाहिये। (इस प्रकार स्वयं शुद्ध होकर) फिर देवीकी मूर्तिको मधु और गन्नेके रससे स्नान करावे। तत्पश्चात् सुगन्धित जलसे शुद्ध स्नान कराकर कुङ्कुमका अनुलेप करे। पूजनमें दक्षिणाङ्गकी पूजा कर लेनेके पश्चात् वामाङ्गकी पूजा करनेका विधान है। 'ललितायै नमः' से देवीके दोनों चरणों तथा दोनों गुल्फोंकी अर्चना करे। 'शान्त्यै नमः' से जंघाओं और जानुओंका, 'श्रियै नमः' से ऊरुओंका, |
| * अध्याय ६३ * | २५३ |
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| मदालसायै तु कटिममलायै तथोदरम्।<br>स्तनौ मदनवासिन्यै कुमुदायै च कन्थराम्॥ ५<br><br>भुजं भुजाग्रं माधव्यै कमलायै मुखस्मिते।<br>भ्रूललाटे च रुद्राण्यै शंकरायै तथालकान्॥ ६<br><br>मुकुटं विश्ववासिन्यै शिरः कान्त्यै तथार्चयेत्।<br>मदनायै ललाटं तु मोहनायै पुनर्भुवौ॥ ७<br><br>नेत्रे चन्द्रार्धधारिण्यै तुष्ट्यै च वदनं पुनः।<br>उत्कण्ठिन्यै नमः कण्ठममृतायै नमः स्तनौ॥ ८<br><br>रम्भायै वामकुक्षिं च विशोकायै नमः कटिम्।<br>हृदयं मन्मथाधिष्ठ्यै पाटलायै तथोदरम्॥ ९<br><br>कटिं सुरतवासिन्यै तथोरुं चम्पकप्रिये।<br>जानुजङ्घे नमो गौर्यै गायत्र्यै घुटिके नमः॥ १०<br><br>धराधरायै पादौ तु विश्वकायै नमः शिरः।<br>नमो भवान्यै कामिन्यै कामदेव्यै जगत्प्रिये॥ ११ | 'मदालसायै नमः' से कटिभागका, 'अमलायै नमः' से उदरका, 'मदनवासिन्यै नमः' से दोनों स्तनोंका, 'कुमुदायै नमः' से कंधोंका, 'माधव्यै नमः' से भुजाओं और भुजाओंके अग्रभागका, 'कमलायै नमः' से मुख और मुसकानका, 'रुद्राण्यै नमः' से भौंहों और ललाटका, 'शङ्करायै नमः' से बालोंका, 'विश्ववासिन्यै नमः' से मुकुटका और 'कान्त्यै नमः' से सिरका पूजन करे। पुनः (पूजनका अन्य क्रम बतलाते हैं—) 'मदनायै नमः' से ललाटकी, 'मोहनायै नमः' से दोनों भौंहोंकी, 'चन्द्रार्धधारिण्यै नमः' से दोनों नेत्रोंकी, 'तुष्ट्यै नमः' से मुखकी, 'उत्कण्ठिन्यै नमः' से कण्ठकी, 'अमृतायै नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'रम्भायै नमः' से बायीं कुक्षिकी, 'विशोकायै नमः' से कटिभागकी, 'मन्मथाधिष्ठ्यै नमः' से हृदयकी, 'पाटलायै नमः' से उदरकी, 'सुरतवासिन्यै नमः' से कटिप्रदेशकी, 'चम्पकप्रियायै नमः' से ऊरुओंकी, 'गौर्यै नमः' से जंघाओं और जानुओंकी, 'गायत्र्यै नमः' से घुटनोंकी, 'धराधरायै नमः' से दोनों चरणोंकी और 'विश्वकायै नमः' से सिरकी पूजा करके 'भवान्यै नमः', 'कामिन्यै नमः', 'कामदेव्यै नमः', 'जगत्प्रियायै नमः' कहकर चरणोंमें प्रणिपात (प्रणाम) करना चाहिये ॥ १-११॥ | | एवं सम्पूज्य विधिवद् द्विजदाम्पत्यमर्चयेत्।<br>भोजयित्वाऽन्नपानेन मधुरेण विमत्सरः॥ १२<br><br>जलपूरितं तथा कुम्भं शुक्लाम्बरयुगद्वयम्।<br>दत्त्वा सुवर्णकमलं गन्धमाल्यैः समर्चयेत्॥ १३<br><br>प्रीयतामत्र कुमुदा गृह्णीयाल्लवणव्रतम्।<br>अनेन विधिना देवीं मासि मासि सदार्चयेत्॥ १४ | इस प्रकार विधि-विधानके साथ देवीकी पूजा करके एक द्विज-दम्पतिका भी पूजन करना चाहिये। उस समय व्रती अहंकाररहित हो अर्थात् विनम्रतापूर्वक उन्हें मधुर अन्न और जलका भोजन कराकर दो श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित एवं स्वर्णनिर्मित कमलसहित जलसे भरा हुआ घड़ा प्रदान करे फिर चन्दन और पुष्पमाला आदिसे उनकी अर्चना करे, तथा इस प्रकार कहे—'इस व्रतसे कुमुदा देवी प्रसन्न हों।' ऐसा कहकर उस दिन लवण-व्रत ग्रहण करे अर्थात् नमक खाना छोड़ दे। इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सदा देवीकी अर्चना करनी चाहिये। | | लवणं वर्जयेन्माघे फाल्गुने च गुडं पुनः।<br>तैलं राजिं तथा चैत्रे वर्ज्यं च मधु माधवे॥ १५<br><br>पानकं ज्येष्ठमासे तु आषाढे चाथ जीरकम्।<br>श्रावणे वर्जयेत् क्षीरं दधि भाद्रपदे तथा॥ १६<br><br>घृतमाश्वयुजे तद्वदूर्जे वर्ज्यं च माक्षिकम्।<br>धान्यकं मार्गशीर्षे तु पौषे वर्ज्या च शर्करा॥ १७ | व्रतीको माघमें नमक और फाल्गुनमें गुड़ नहीं खाना चाहिये। चैत्रमें तेल और पीली सरसों (या राई) तथा वैशाखमें मधु वर्जित है। ज्येष्ठमासमें पानक (एक प्रकारका पेय पदार्थ या ताम्बूल), आषाढ़में जीरा, श्रावणमें दूध और भाद्रपदमें दही निषिद्ध है। इसी प्रकार आश्विनमें घी और कार्तिकमें मधुका निषेध किया गया है। मार्गशीर्षमें धनिया और पौषमें शक्कर वर्जित है। |