भारतकोश
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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
* अध्याय १५४ *६२७
मुनीञ्शान्तकथालापान् प्रेक्ष्य प्रोवाच वाग्यमम्।<br>भगवन्तो विजानन्ति प्राणिनां मानसं हितम्॥ ३२२<br><br>मनोगतीभिरत्यर्थं कन्दर्प्यन्ते हि देहिनः।<br>केचित्तु निपुणास्तत्र घटन्ते विबुधोद्यमैः॥ ३२३<br><br>उपायैर्दुर्लभान् भावान् प्राप्नुवन्ति ह्यतन्द्रिताः।<br>अपरे तु परिच्छिन्ना नानाकाराभ्युपक्रमाः॥ ३२४<br><br>देहान्तरार्थमारम्भमाश्रयन्ति हितप्रदम्।<br>मम त्वाकाशसम्भूतपुष्पदामविभूषितम्॥ ३२५<br><br>वन्ध्या सुतं प्राप्तुकामा मनः प्रसरते मुहुः।<br>अहं किल भवं देवं पतिं प्राप्तुं समुद्यता॥ ३२६<br><br>प्रकृत्यैव दुराधर्षं तपस्यन्तं तु सम्प्रति।<br>सुरासुरैरनिर्णीतपरमार्थक्रियाश्रयम् ॥ ३२७<br><br>साम्प्रतं चापि निर्दग्धमदनं वीतरागिणम्।<br>कथमाराधयेदीशं मादृशी तादृशं शिवम्॥ ३२८<br><br>इत्युक्ता मुनयस्ते तु स्थिरतां मनसस्ततः।<br>ज्ञातुमस्या वचः प्रोचुः प्रक्रमात् प्रकृतार्थकम्॥ ३२९<br><br><center>मुनय ऊचुः</center><br>द्विविधं तु सुखं तावत् पुत्रि लोकेषु भाव्यते।<br>शरीरस्यास्य सम्भोगैश्चेतसश्चापि निर्वृतिः॥ ३३०<br><br>प्रकृत्या स तु दिग्वासा भीमः पितृवनेशयः।<br>कपाली भिक्षुको नग्नो विरूपाक्षः स्थिरक्रियः॥ ३३१<br><br>प्रमत्तोन्मत्तकाकारो बीभत्सकृतसंग्रहः।<br>यतिना तेन कस्तेऽर्थो मूर्तानर्थेन काङ्क्षितः॥ ३३२<br><br>यदि ह्यस्य शरीरस्य भोगमिच्छसि साम्प्रतम्।<br>तत् कथं ते महादेवाद्भवभाजो जुगुप्सितात्॥ ३३३<br><br>स्रवद्रक्तवसाभ्यक्तकपालकृतभूषणात् ।<br>श्वसदुग्रभुजगेन्द्रकृतभूषणभीषणात् ॥ ३३४<br><br>श्मशानवासिनो रौद्रप्रमथानुगतात् सति।मनसे मुनियोंको शान्तरूपसे वार्तालाप करते देखकर वाणीपर संयम रखते हुए इस प्रकार कहा—'महर्षियो! आपलोग तो प्राणियोंके मानस हितको भलीभाँति जानते हैं। शरीरधारी प्राणी प्रायः अपने मनोगत भावोंके कारण ही अत्यधिक कष्टका अनुभव करते हैं। उनमें कुछ लोग ऐसे निपुण हैं, जो आलस्यरहित हो दैवी उपायोंद्वारा प्रयत्न करते हैं और दुर्लभ विषयोंको प्राप्त कर लेते हैं। दूसरे कुछ लोग ऐसे हैं, जो परिमित एवं नाना प्रकारके उपायोंसे युक्त हैं। वे देहान्तरको ही हितप्रद मानकर उसके लिये कार्यारम्भ करते हैं। परंतु मेरा मन आकाशमें उत्पन्न हुए पुष्पोंकी मालासे विभूषित वन्ध्या पुत्रको प्राप्त करनेके लिये बारंबार प्रयास कर रहा है। मैं निश्चितरूपसे भगवान् शङ्करको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये उद्यत हूँ। वे एक तो स्वभावसे ही दुराराध्य हैं, दूसरे इस समय तो वे तपस्यामें निरत हैं। सुर अथवा असुर कोई भी अबतक उनकी परमार्थ-क्रियाका निर्णय नहीं कर सका। अभी-अभी हालमें ही वे कामदेवको जलाकर वीतरागी तपस्वी बन गये हैं। भला मुझ-जैसी अबला वैसे कल्याणकारी शिवकी आराधना कैसे कर सकती है।' इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनिगण पार्वतीके मनकी स्थिरताका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये क्रमशः उसी विषयपर पुनः बोले॥ ३२०–३२९॥<br><br>मुनियोंने कहा—'बेटी! लोकोंमें दो प्रकारके सुख बतलाये जाते हैं—एक तो इस शरीरके सम्भोगोंद्वारा और दूसरा मनकी (विषयभोगोंसे) निवृत्तिद्वारा प्राप्त होता है। शङ्करजी तो स्वभावसे ही दिगम्बर, विकृत वेषधारी, पितृवनमें शयन करनेवाले, कपालधारी, भिक्षुक, नग्न, विकृत नेत्रोंवाले और उद्यमहीन हैं। उनका आकार मतवाले पागलोंकी तरह है। वे घृणित वस्तुओंका ही संग्रह करते हैं। वे एकदम अनर्थकी मूर्ति हैं। ऐसे संन्यासीसे तुम अपना कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करना चाहती हो? यदि तुम इस समय इस शरीरके भोगकी इच्छा करती हो तो भला उन भयावने एवं निन्दित महादेवसे तुम्हें उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है; उनके तो चूते हुए रक्त और मज्जासे चुपड़े हुए कपाल ही भूषण हैं। वे फुफकारते हुए विषैले सर्पराजोंका आभूषण धारण करनेके कारण बड़े भीषण दीख पड़ते हैं, सदा श्मशानमें निवास करते हैं और भयंकर प्रमथगण उनके अनुचर हैं॥ ३३०–३३४ १/२ ॥
६२८* मत्स्यपुराण *

| सुरेन्द्रमुकुटव्रातनिघृष्टचरणोऽरिहा ॥ ३३५<br><br>हरिरस्ति जगद्धाता श्रीकान्तोऽनन्तमूर्तिमान्।<br>नाथो यज्ञभुजामस्ति तथेन्द्रः पाकशासनः ॥ ३३६<br><br>देवतानां निधिश्चास्ति ज्वलनः सर्वकामकृत्।<br>वायुरस्ति जगद्धाता यः प्राणः सर्वदेहिनाम् ॥ ३३७<br><br>तथा वैश्रवणो राजा सर्वार्थमतिमान् विभुः।<br>एभ्य एकतमं कस्मान्न त्वं सम्प्राप्तुमिच्छसि ॥ ३३८<br><br>उतान्यदेहसम्प्राप्त्या सुखं ते मनसेप्सितम्।<br>एवमेतत् तवाप्यत्र प्रभवो नाकम्पदाम्।<br>अस्मिन् नेह परत्रापि कल्याणप्राप्तयस्तव ॥ ३३९<br><br>पितुरेवास्ति तत् सर्वं सुरेभ्यो यन्न विद्यते।<br>अतस्तत्प्राप्तये क्लेशः स वाप्यत्राफलस्तव ॥ ३४०<br><br>प्रायेण प्रार्थितो भद्रे सुस्वल्पो ह्यतिदुर्लभः।<br>अस्य ते विधियोगस्य धाता कर्तात्र चैव हि ॥ ३४१ | इनसे तो कहीं अच्छे भगवान् विष्णु हैं, जिनके चरणोंपर प्रधान देवता अपने मुकुटसमूहोंको रगड़ते रहते हैं। जो शत्रुओंके संहारक, जगत्का पालन-पोषण करनेवाले, लक्ष्मीके पति और अनुपम शोभाशाली हैं। इसी प्रकार यज्ञभोजी देवताओंके स्वामी पाकशासन हैं। देवताओंके निधिस্বরূপ एवं समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अग्नि हैं। जगत्का पालन-पोषण करनेवाले वायु हैं, जो सभी शरीरधारियोंके प्राण हैं तथा विश्रवाके पुत्र राजाधिराज कुबेर हैं, जो बड़े ऐश्वर्यशाली, बुद्धिमान् और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके अधीश्वर हैं। तुम इनमेंसे किसी एकको प्राप्त करनेकी इच्छा क्यों नहीं कर रही हो? अथवा यदि तुमने अपने मनमें यह ठान लिया हो कि जन्मान्तरमें सुखकी प्राप्ति होगी तो वह भी तुम्हें स्वर्गवासी देवताओंसे ही प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार तुम्हें देवताओंके बिना इस जन्ममें अथवा जन्मान्तरमें कल्याणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। यदि अन्यान्य सुखदायक पदार्थोंको प्राप्त करना चाहती हो तो वे सब तुम्हारे पिताके पास ही इतने अधिक हैं, जो देवताओंके पास नहीं हैं; अतः उनकी प्राप्तिके हेतु तुम्हारा इस प्रकार कष्ट सहन करना व्यर्थ है। साथ ही भद्रे! प्रायः ऐसा देखा जाता है कि माँगी हुई वस्तुका मिलना अत्यन्त कठिन होता है और यदि मिल भी जाय तो बहुत थोड़ी ही मिलती है। इस कारण तुम्हारे इस मनोरथको ब्रह्मा ही पूर्ण कर सकते हैं (दूसरेकी शक्ति नहीं है) ॥ ३३५-३४१ ॥ | | सूत उवाच<br><br>इत्युक्ता सा तु कुपिता मुनिवर्यैषु शैलजा।<br>उवाच कोपरक्ताक्षी स्फुरद्भिर्दशनच्छदैः ॥ ३४२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! सप्तर्षियोंद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वती उन मुनियोंपर कुपित हो उठीं। उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और होंठ फड़कने लगे, तब वे बोलीं ॥ ३४२ ॥ | | देव्युवाच<br><br>असद्ग्रहस्य का नीतिर्नासनस्य क्व यन्त्रणा।<br>विपरीतार्थबोद्धारः सत्पथे केन योजिताः ॥ ३४३ | **देवीने कहा—**सप्तर्षियो! असद् वस्तुको ग्रहण करनेवालेके लिये नीति कैसी ? तथा दुर्व्यसनीके लिये व्यसनकी प्राप्तिमें कष्ट कहाँ ? (अर्थात् जिसमें जिसका मन आसक्त हो गया है, उसकी प्राप्तिके लिये उसे कितना ही कष्ट क्यों न झेलना पड़े, परंतु वह उसकी परवा नहीं करता।) अरे! विपरीत अर्थको जाननेवाले आपलोगोंको किसने सन्मार्गपर नियुक्त कर दिया? | | एवं मां वेत्थ दुष्प्रज्ञां ह्यस्थानासद्ग्रहप्रियाम्।<br>न मां प्रति विचारोऽस्ति ततोऽहङ्कारमानिनी ॥ ३४४ | आपलोग मुझे इस प्रकार दुष्ट बुद्धिवाली तथा अयुक्त एवं असद् वस्तुको ग्रहण करनेकी अभिलाषिणी मानते हैं, अतः आपलोगोंका विचार मेरे प्रति ठीक नहीं है। इसी कारण मेरे मनमें अहंकारपूर्वक मान उत्पन्न हो गया है। | | प्रजापतिसमाः सर्वे भवन्तः सर्वदर्शिनः। | यद्यपि आप सभी लोग प्रजापतिके समान समदर्शी हैं, |

* अध्याय १५४ *६२९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नूनं न वेत्थ तं देवं शाश्वतं जगतः प्रभुम्॥ ३४५<br>अजमीशानमव्यक्तममेयमहिमोदयम् ॥ ३४६<br><br>आस्तां तद्धर्मसद्भावसम्बोधस्तावदद्भुतः ।<br>विदुर्यं न हरिब्रह्मप्रमुखा हि सुरेश्वराः ॥ ३४७<br><br>यत्तस्य विभवात् स्वोत्थं भुवनेषु विजृम्भितम् ।<br>प्रकटं सर्वभूतानां तदप्यत्र न वेत्थ किम्॥ ३४८<br><br>कस्यैतद्गगनं मूर्तिः कस्याग्निः कस्य मारुतः ।<br>कस्य भूः कस्य वरुणः कश्चन्द्रार्कविलोचनः ॥ ३४९<br><br>कस्यार्चयन्ति लोकेषु लिङ्गं भक्त्या सुरासुराः ।<br>यं ब्रुवन्तीश्वरं देवा विधीन्द्राद्या महर्षयः ॥ ३५०<br><br>प्रभावं प्रभवं चैव तेषामपि न वेत्थ किम् ।तथापि उन महादेवके विषयमें आपलोगोंको निश्चय ही कुछ भी ज्ञात नहीं है। वे अविनाशी, जगत्के स्वामी, अजन्मा, शासक, अव्यक्त और अप्रमेय महिमावाले हैं। विष्णु और ब्रह्मा आदि सुरेश्वर भी जिन्हें नहीं जानते, उन महादेवके धर्म एवं सद्भावका जो अद्भुत ज्ञान आपलोग दे रहे हैं, उसे अब रहने दीजिये। जिसके विभवसे उत्पन्न हुआ चैतन्य सभी लोकोंमें फैला हुआ है और सभी प्राणियोंमें प्रत्यक्षरूपसे दृष्टिगोचर हो रहा है, उसे भी क्या आपलोग नहीं जानते। (भला सोचिये तो सही) यह आकाश, अग्नि, वायु, पृथ्वी और वरुण पृथक्-पृथकरूपसे किसकी मूर्ति हैं? चन्द्रमा और सूर्यको नेत्ररूपमें धारण करनेवाला कौन है? समस्त सुर एवं असुर लोकोंमें भक्तिपूर्वक किसके लिङ्गकी अर्चना करते हैं? ब्रह्मा एवं इन्द्र आदि देवता तथा महर्षिगण जिन्हें अपना ईश्वर मानते हैं, उन देवताओंके प्रभाव एवं उत्पत्तिको भी क्या आपलोग नहीं जानते?॥ ३४३—३५० १/२॥
अदितिः कस्य मातेयं कस्माज्जातो जनार्दनः ॥ ३५१<br><br>अदितेः कश्यपाज्जाता देवा नारायणादयः ।<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रो ह्यदितिर्दक्षपुत्रिका ॥ ३५२<br><br>मरीचिश्चापि दक्षश्च पुत्रौ तौ ब्रह्मणः किल ।<br>ब्रह्मा हिरण्मयात्तवण्डाद्दिव्यसिद्धिविभूषितात् ॥ ३५३<br><br>कस्य प्रादुरभूद्ध्यानात्प्राकृतैः प्रकृतांशकात् ।<br>प्रकृतौ तु तृतीयायामम्बुजाजननक्रिया ॥ ३५४<br><br>जातः ससर्ज षड्वर्गान् बुद्धिपूर्वान्स्वकर्मजान् ।<br>अजातकोऽभवद्द्वेधा ब्रह्माण्डोऽव्यक्तजन्मनः ॥ ३५५<br><br>यः स्वयोगेन संक्षोभ्य प्रकृतिं कृतवानिदम् ।<br>ब्रह्मणः सिद्धसर्वार्थमैश्वर्यं लोककर्तृताम् ॥ ३५६<br><br>विदुर्विष्णुवादयो यच्च स्वमहिम्ना सदैव हि ।<br>कृत्वान्यं देहमन्यादृक् तादृक् कृत्वा पुनर्हरिः ॥ ३५७<br><br>कुरुते जगतः कृत्यमुत्तमाधममध्यमम् ।<br>एवमेव हि संसारो यो जन्ममरणात्मकः ॥ ३५८<br><br>कर्मणश्च फलं ह्येतन्नानारूपसमुद्भवम् ।(यदि नहीं जानते तो सुनिये—) ये अदिति किसकी माता हैं और विष्णु किससे उत्पन्न हुए हैं? ये नारायण आदि सभी देवता कश्यप और अदितिसे ही उत्पन्न हुए हैं। वे कश्यप महर्षि मरीचिके पुत्र हैं और अदिति प्रजापति दक्षकी पुत्री हैं। ये दोनों मरीचि और दक्ष भी ब्रह्माके पुत्र हैं और ब्रह्मा दिव्य सिद्धिसे विभूषित हिरण्मय अण्डसे प्रकट हुए हैं। उनका प्रादुर्भाव किसके ध्यानसे हुआ था? (अर्थात् ब्रह्माके आविर्भावके कारण महादेव ही हैं।) ब्रह्मा प्राकृत गुणोंके संयोगसे प्रकृतिके अंशसे तृतीय-प्रकृतिमें कमलपर उत्पन्न हुए थे। जन्म लेते ही उन्होंने बुद्धिपूर्वक अपने कर्मवश उत्पन्न होनेवाले षड्वर्गोंकी सृष्टि की। इस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्मासे उत्पन्न होनेके कारण ब्रह्मा अजन्मा कहलाये, जिन्होंने अपने योगबलसे प्रकृतिको संक्षुब्ध कर इस जगत्की रचना की। विष्णु आदि सभी देवता अपनी महिमासे सदासे ही ब्रह्माकी सर्वार्थसिद्धि, ऐश्वर्य और लोकरचनाको जानते हैं। पुनः श्रीहरि युगानुसार विभिन्न प्रकारका शरीर धारण कर जगत्के उत्तम, मध्यम और अधम कर्मोंका सम्पादन करते हैं। जन्म-मृत्युरूप संसारकी यही स्थिति हैं और अनेक रूपोंमें उत्पन्न हुए कर्मोंका भी यही फल है॥ ३५१—३५८ १/२॥

६३० * मत्स्यपुराण *

| अथ नारायणो देवः स्वकां छायां समाश्रयत् ॥ ३५९<br><br>तत्प्रेरितः प्रकुरुते जन्म नानाप्रकारकम्।<br>सापि कर्मण एवोक्ता प्रेरणा विवशात्मनाम् ॥ ३६०<br><br>यथोन्मादादिजुष्टस्य मतिरेव हि सा भवेत्।<br>इष्टान्येव यथार्थानि विपरीतानि मन्यते ॥ ३६१<br><br>लोकस्य व्यवहारेषु सृष्टेषु सहते सदा।<br>धर्माधर्मफलावाप्तौ विष्णुरेव निबोधितः ॥ ३६२<br><br>अथानादित्वमस्यास्ति सामान्यात्तु तदात्मना।<br>न हास्य जीवितं दीर्घं दृष्टं देहे तु कुत्रचित् ॥ ३६३<br><br>भवद्भिर्र्यस्य नो दृष्टमन्तमग्रमथापि वा।<br>देहिनां धर्म एवैष क्वचिज्जायेत क्वचिन्मियेत् ॥ ३६४<br><br>क्वचिद्गर्भगतो नश्येत्क्वचिज्जीवेज्जरामयः।<br>क्वचित्समाः शतं जीवेत् क्वचिद्बाल्ये विपद्यते ॥ ३६५<br><br>शतायुः पुरुषो यस्तु सोऽनन्तः स्वल्पजन्मनः।<br>जीवितो न म्रियत्यग्रे तस्मात् सोऽमर उच्यते ॥ ३६६<br><br>अदृष्टजन्मनिधना ह्येवं विष्ण्वादयो मताः।<br>एतत् संशुद्धमैश्वर्यं संसारे को लभेदिह ॥ ३६७<br><br>तत्र क्षयादियोगात् तु नानाश्रर्यस्वरूपिणि।<br>तस्माद्विश्वसृरान् सर्वान् मलिनान् स्वल्पभूतिकान् ॥ ३६८<br><br>नाहं भद्राः किलेच्छामि ऋते शर्वात् पिनाकिनः।<br>स्थितं च तारतम्येन प्राणिनां परमं त्विदम् ॥ ३६९<br><br>धीबलैश्वर्यकार्यादिप्रमाणं महतां महत्।<br>यस्मान्न कश्चिदपरं सर्वे यस्मात् प्रवर्तते ॥ ३७०<br><br>यस्यैश्वर्यमनाद्यन्तं तमहं शरणं गता।<br>एष मे व्यवसायश्च दीर्घोऽतिविपरीतकः ॥ ३७१<br><br>यात वा तिष्ठतैवाथ मुनयो मद्विधायकाः।<br>एवं निशम्य वचनं देव्या मुनिवरास्तदा ॥ ३७२<br><br>आनन्दाश्रुपरीताक्षाः सस्वजुस्तां तपस्विनीम्।<br>ऊचुश्च परमप्रीताः शैलजां मधुरं वचः ॥ ३७३ | तदनन्तर भगवान् नारायण अपनी छायाका आश्रय ग्रहण करते हैं और उससे प्रेरित हो नाना प्रकारका जन्म धारण करते हैं। वह प्रेरणा भी भाग्याधीन प्राणियोंके कर्मके अनुरूप ही कही गयी है, जो उन्माद आदिसे युक्त पुरुषकी बुद्धि-जैसी होती है; क्योंकि वह अपनी यथार्थ इष्ट वस्तुओंको भी विपरीत ही मानता है और सदा लोकके लिये रचे गये व्यवहारोंमें कष्ट भोगता है। इस प्रकार धर्म और अधर्मके फलकी प्राप्तिमें विष्णु ही कारण माने गये हैं। यद्यपि विष्णुको सामान्यतया आत्मरूपसे अनादि माना जाता है, तथापि उनका किसी भी देहमें दीर्घ जीवन नहीं देखा गया। आपलोग भी उनके आदि-अन्तको नहीं जानते, किंतु देहधारियोंका यह धर्म है कि वे कहीं जन्म लेते हैं तो मरते कहीं हैं। कहीं गर्भमें ही नष्ट हो जाते हैं तो कहीं बुढ़ापा और रोगसे ग्रस्त होकर भी जीवित रहते हैं। कोई सौ वर्षोंतक जीवित रहता है तो कोई बचपनमें ही कालके गालमें चला जाता है। जिस पुरुषकी आयु सौ वर्षकी होती है, वह थोड़ी आयुवालेकी अपेक्षा अनन्त आयुवाला कहा जाता है। सदा जीवित रहते हुए जो आगे चलकर मृत्युको नहीं प्राप्त होता, उसे अमर कहा जाता है। इस तरह विष्णु आदि देवगण भी प्रारब्ध, जन्म और मृत्युसे युक्त माने गये हैं। भला, जो विनाश आदिके संयोगसे नाना प्रकारके आश्चर्यमय स्वरूपोंसे युक्त है, उस संसारमें ऐसा विशुद्ध ऐश्वर्य किसको प्राप्त हो सकता है? अतः भद्रपुरुषो! मैं पिनाकधारी शङ्करजीके अतिरिक्त इन सभी मलिन एवं स्वल्प विभूतिवाले देवताओंको नहीं वरण करना चाहती। प्राणियोंकी यह उत्कृष्टता तो क्रमशः चली ही आ रही है, किंतु जो महापुरुष हैं, उनके बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और कार्यका प्रमाण भी विशाल होता है। अतः जिन शङ्करजीसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है और जहाँ पहुँचकर सभी समाप्त हो जाते हैं तथा जिनका ऐश्वर्य आदि-अन्तसे रहित है, मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है। मेरा यह व्यवसाय अत्यन्त महान् तथा विचित्र है। मेरे कल्याणका विधान करनेवाले मुनियो! अब आपलोग चाहे चले जायें अथवा ठहरें, यह आपकी इच्छापर निर्भर है। पार्वती देवीके ऐसे वचन सुनकर उन मुनिवरोंकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। तब उन्होंने उस तपस्विनी कन्याको गले लगाया। फिर वे परम प्रसन्न होकर पार्वतीसे मधुर वाणीमें बोले॥ ३५९-३७३॥ |

* अध्याय १५४ *६३१

| ऋषय ऊचुः<br><br>अत्यद्भुतास्यहो पुत्रि ज्ञानमूर्तिरिवामला।<br>प्रसादयति नो भावं भवभावप्रतिश्रयात्॥ ३७४<br><br>न तु विद्मो वयं तस्य देवस्यैश्वर्यमद्भुतम्।<br>त्वन्निश्चयस्य दृढतां वेत्तुं वयमिहागताः॥ ३७५<br><br>अचिरादेव तन्वङ्गि कामस्तेऽयं भविष्यति।<br>क्वादित्यस्य प्रभा याति रत्नेभ्यः क्व द्युतिः पृथक्॥ ३७६<br><br>कोऽर्थो वर्णालिकाव्यक्तः कथं त्वं गिरिशं विना।<br>यामो नैकाभ्युपायेन तमभ्यर्थयितुं वयम्॥ ३७७<br><br>अस्माकमपि वै सोऽर्थः सुतरां हृदि वर्तते।<br>अतस्त्वमेव सा बुद्धिर्यतो नीतिस्त्वमेव हि॥ ३७८<br><br>अतो निःसंशयं कार्यं शङ्करोऽपि विधास्यति।<br>इत्युक्त्वा पूजिता याता मुनयो गिरिकन्यया॥ ३७९<br><br>प्रययुर्गिरिशं द्रष्टुं प्रस्थं हिमवतो महत्।<br>गङ्गाम्बुप्लावितात्मानं पिङ्गबद्धजटासटम्॥ ३८०<br><br>भृङ्गानुयातपाणिस्थमन्दारकुसुमस्त्रजम् ।<br>गिरेः सम्प्राप्य ते प्रस्थं ददृशुः शङ्कराश्रमम्॥ ३८१<br><br>प्रशान्ताशेषसत्त्वौघं नवस्तिमितकाननम्।<br>निःशब्दाक्षोभसलिलप्रपानं सर्वतोदिशम्॥ ३८२<br><br>तत्रापश्यंस्ततो द्वारि वीरकं वेत्रपाणिनम्।<br>सम ते मुनयः पूज्या विनीताः कार्यगौरवात्॥ ३८३<br><br>ऊचुर्मधुरभाषिण्या वाचा ते वाग्मिनां वराः।<br>द्रष्टुं वयमिहायाताः शरण्यं गणनायकम्॥ ३८४<br><br>त्रिलोचनं विजानीहि सुरकार्यप्रचोदिताः।<br>त्वमेव नो गतिस्तत्त्वं यथा कालानतिक्रमः॥ ३८५<br><br>सा प्रार्थनैषा प्रायेण प्रतीहारमयः प्रभुः।<br>इत्युक्तो मुनिभिः सोऽथ गौरवात् तानुवाच सः॥ ३८६ | **ऋषियोंने कहा—**पुत्रि! तुम तो अत्यन्त अद्भुत निर्मल ज्ञानकी मूर्ति-जैसी प्रतीत हो रही हो। अहो! शङ्करजीके भावसे भावित तुम्हारा भाव हमलोगोंको परम आनन्दित कर रहा है। शैलजे! उन देवाधिदेव शङ्करके इस अद्भुत ऐश्वर्यको हमलोग नहीं जानते हों— ऐसी बात नहीं है, अपितु हमलोग तुम्हारे निश्चयकी दृढ़ता जाननेके लिये यहाँ आये हैं। तन्वङ्गि! शीघ्र ही तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा। भला, सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कहीं जा सकती है? रत्नोंकी कान्ति रत्नोंसे पृथक् होकर कहीं ठहर सकती है? तथा अक्षरसमूहोंसे प्रकट होनेवाला अर्थ अक्षरोंसे अलग कहीं रह सकता है? उसी प्रकार तुम शङ्करजीके बिना कैसे रह सकती हो। अच्छा, अब हमलोग अनेकों उपायोंद्वारा शङ्करजीसे प्रार्थना करनेके निमित्त जा रहे हैं; क्योंकि हमलोगोंके हृदयमें भी वही प्रयोजन निश्चित-रूपसे वर्तमान है। उसकी सिद्धिके लिये तुम्हीं वह बुद्धि और नीति हो। अतः शङ्करजी भी निःसंदेह उस कार्यका विधान करेंगे। ऐसा कहकर गिरिराजकुमारीद्वारा पूजित हो वे मुनिगण वहाँसे चल पड़े। तदनन्तर जो अपने शरीरको गङ्गा-जलसे आप्लावित करते हैं, जिनके मस्तकपर पीली जटा बँधी रहती है तथा जिनके गलेमें पड़ी हुई मन्दार-पुष्पोंकी माला हथेलीतक लटकती रहती है, जिसपर भँवरे मँडराते रहते हैं, उन शङ्करजीका दर्शन करनेके लिये वे सप्तर्षि हिमालयके विशाल शिखरकी ओर प्रस्थित हुए। हिमालयके उस शिखरपर पहुँचकर उन्होंने शङ्करजीके आश्रमको देखा। उस आश्रममें सम्पूर्ण प्राणिसमूह शान्तरूपसे बैठे हुए थे। वहाँका नूतन कानन भी शान्त था। चारों दिशाओंमें शब्दरहित एवं स्वच्छन्दगतिसे प्रवाहित होनेवाले जलसे युक्त झरने झर रहे थे। उस आश्रमके द्वारपर उन पूज्य एवं विनीत सप्तर्षियोंने हाथमें बेंत धारण किये वीरकको देखा। तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ वे सप्तर्षि कार्यके गौरववश वीरकसे मधुर वाणीमें बोले—'द्वारपाल! ऐसा समझो कि हमलोग देवकार्यसे प्रेरित होकर यहाँ शरणदाता एवं गणनायक त्रिनेत्रधारी भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये आये हैं। इस विषयमें तुम्हीं हमलोगोंके साधन हो। इसलिये हमलोगोंकी यह प्रार्थना है कि ऐसा उपाय करो, जिससे हमलोगोंका कालातिक्रम न हो; क्योंकि स्वामियोंकी सूचना तो प्रायः द्वारपालसे ही मिलती है।' मुनियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वीरकने गौरववश उनसे कहा— |

६३२ * मत्स्यपुराण *

समन्वास्यापरां संध्यां स्नातुं मन्दाकिनीजलैः।<br>क्षणेन भविता विप्रास्तत्र द्रक्ष्यथ शूलिनम्॥ ३८७'विप्रवरो! अभी-अभी दोपहरकी संध्या समाप्त कर शङ्करजी मन्दाकिनीके जलमें स्नान करनेके लिये गये हैं, अतः क्षणभर ठहरिये, फिर आपलोग उन त्रिशूलधारीका दर्शन कीजियेगा।' इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनिगण उस कालकी प्रतीक्षा करते हुए उसी प्रकार खड़े रहे, जैसे वर्षा-ऋतुमें प्यासे चातक जलसे भरे हुए बादलकी ओर टकटकी लगाये रहते हैं॥ ३७४—३८८॥
इत्युक्ता मुनयस्तस्थुस्ते तत्कालप्रतीक्षिणः।<br>गम्भीराम्बुधरं प्रावृत्तृषिताश्चातका यथा॥ ३८८
ततः क्षणेन निष्पन्नसमाधानक्रियाविधिः।<br>वीरासनं बिभेदेशो मृगचर्मनिवासनम्॥ ३८९तत्पश्चात् थोड़ी देर बाद जब समाधि सम्पन्न करके शङ्करजी मृगचर्मपर लगाये हुए वीरासनको छोड़कर उठे, तब वीरकने विनम्र भावसे पृथ्वीपर घुटने टेककर प्रणाम करते हुए महादेवजीसे कहा—'विभो! प्रचण्ड तेजस्वी सप्तर्षि आपका दर्शन करनेके लिये आये हुए हैं। उन्हें दर्शन करनेके लिये आदेश दीजिये अथवा इस विषयमें आप जैसा उचित समझें। उनके मनमें आपके दर्शनकी लालसा है और वे कह रहे हैं कि हमलोग देवकार्यसे आये हुए हैं।' तब उस महात्मा वीरकद्वारा इस प्रकार सूचित किये जानेपर जटाधारी शङ्करने भौंहोंके संकेतसे उन लोगोंके लिये प्रवेशाज्ञा प्रदान की। फिर तो वीरकने भी समीपमें ही स्थित उन सभी मुनियोंको सिर हिलाकर संकेतसे पिनाकधारी शङ्करका दर्शन करनेके लिये बुलाया। यह देखकर उतावलीवश आधी बँधी हुई शिखावाले एवं मृगचर्मरूपी वस्त्रको लटकाये हुए वे मुनिलोग शङ्करजीकी विभूतिसे सिद्ध हुई वेदीमें प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने बँधी हुई अञ्जलि तथा दोनेमें रखे हुए स्वर्गीय पुष्पसमूहोंको स्वर्गवासियोंद्वारा वन्दनीय शिवजीके दोनों चरणोंपर बिखेरकर नमस्कार किया। तब त्रिशूलधारी शङ्करने उन शान्तस्वभाव मुनियोंकी ओर स्नेहभरी दृष्टिसे देखा। इस प्रकार सत्कृत होनेसे प्रसन्न हुए ऋषिगण कामदेवके शत्रु भगवान् शङ्करकी सम्यक् प्रकारसे स्तुति करने लगे॥ ३८९—३९६॥
ततो विनीतो जानुभ्यामवलम्ब्य महीस्थितिम्।<br>उवाच वीरको देवं प्रणामैकसमाश्रयः॥ ३९०
सम्प्राप्ता मुनयः सप्त द्रष्टुं त्वां दीप्ततेजसः।<br>विभो समादिश द्रष्टुमवगन्तुमिहार्हसि।<br>तेऽब्रुवन् देवकार्येण तव दर्शनलालसाः॥ ३९१
इत्युक्तो धूर्जटिस्तेन वीरकेण महात्मना।<br>भूभङ्गसंज्ञया तेषां प्रवेशाज्ञां ददौ तदा॥ ३९२
मूर्धकम्पेन तान् सर्वान् वीरकोऽपि महामुनीन्।<br>आजुहावाविदूरस्थान् दर्शनाय पिनाकिनः॥ ३९३
त्वराबद्धार्धचूडास्ते लम्बमानाजिनाम्बराः।<br>विविशुर्वेदिकों सिद्धां गिरिशस्य विभूतिभिः॥ ३९४
बद्धपाणिपुटाक्षीमनाकपुष्पोत्करास्ततः ।<br>पिनाकिपादयुगलं वन्द्यं नाकनिवासिनाम्॥ ३९५
ततः स्निग्धेक्षिताः शान्ता मुनयः शूलपाणिना।<br>मन्मथारिं ततो हृष्टाः सम्यक् तुष्टुवुरादृताः॥ ३९६
मुनय ऊचुः<br>अहो कृतार्था वयमेव साम्प्रतं<br>सुरेश्वरोऽप्यत्र पुरो भविष्यति।<br>भवत्प्रसादामलवारिसेकतः<br>फलेन काचित् तपसा नियुज्यते॥ ३९७**मुनियोंने कहा—**अहो भगवन्! इस समय हमलोग तो कृतार्थ हो ही गये, आगे चलकर देवराज इन्द्र भी सफलमनोरथ होंगे। इसी प्रकार आपकी कृपारूपी निर्मल जलके सिंचनसे कोई तपस्विनी भी अपनी तपस्याके फलसे युक्त होगी।
* अध्याय १५४ *६३३

| जयत्यसौ धन्यतरो हिमाचल-<br>स्तदाश्रयं यस्य सुता तपस्यति।<br>स दैत्यराजोऽपि महाफलोदयो<br>विमूलिताशेषसुरो हि तारकः॥ ३९८<br>त्वदीयमंशं प्रविलोक्य कल्मषात्<br>स्वकं शरीरं परिमोक्ष्यते हि यः।<br>स धन्यधीर्लोकपिता चतुर्मुखो<br>हरिश्च यत्सम्भ्रमवह्निदीपितः॥ ३९९<br>त्वदङ्घ्रियुग्मं हृदयेन बिभ्रतो<br>महाभितापप्रशमैकहेतुकम्।<br>त्वमेव चैको विविधक्रतुक्रियः<br>किलेति वाचा विधुरैर्विभाष्यते॥ ४००<br>अथाद्य एकस्त्वमवैषि नान्यथा<br>जगत्तथा निर्घृणतां तव स्पृशेत्।<br>न वेत्सि वा दुःखमिदं भवात्मकं<br>विहन्यते ते खलु सर्वतः क्रिया॥ ४०१<br>उपेक्षसे चेज्जगतामुपद्रवं<br>दयामयत्वं तव केन कथ्यते।<br>स्वयोगमायामहिमागुहाश्रयं<br>न विद्यते निर्मलभूतिगौरवम्॥ ४०२<br>वयं च ते धन्यतमाः शरीरिणां<br>यदीदृशं त्वां प्रविलोकयामहे।<br>अदर्शनं तेन मनोरथो यथा<br>प्रयाति साफल्यतया मनोगतम्॥ ४०३<br>जगद्विधानैकविधौ जगन्मुखे<br>करिष्यसेऽतो बलभिच्चरा वयम्।<br>विनेमुरित्थं मुनयो विसृज्य तां<br>गिरं गिरीशश्रुतिभूमिसन्निधौ।<br>उत्कृष्टकेदार इवावनीतले<br>सुबीजमुष्टिं सुफलाय कर्षकाः॥ ४०४ | इस धन्यवादके पात्र हिमाचलकी जय हो, जिनके आश्रयमें रहकर उनकी कन्या तपस्या कर रही है। सम्पूर्ण देवताओंको उखाड़ फेंकनेवाले दैत्यराज तारकके भी महान् पुण्यफलका उदय हो गया है, जो आपके अंशसे उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर पापसे निर्मुक्त हो अपने शरीरका परित्याग करेगा। लोकपिता चतुर्मुख ब्रह्माकी तथा तारकके भयरूपी अग्निसे संतप्त श्रीहरिकी भी बुद्धि धन्य है, जो महान् संतापके प्रशमनके लिये एकमात्र कारणभूत आपके दोनों चरणोंको अपने हृदयमें धारण करते हैं। एकमात्र आप ही अनेकविध दुरूह कार्योंको सम्पन्न करनेवाले हैं, दुःखी लोग आपका ऐसा विरद गाते हैं। इसे अकेले आप ही जानते हैं, अतः इसके विपरीत कोई ऐसा कार्य न कीजिये, जिससे जगत्को आपकी निर्दयताका अनुभव होने लगे। अथवा यदि आप इस सांसारिक दुःखकी ओर ध्यान नहीं देते तो आपकी सर्वतोमुखी क्रिया लुप्त होने जा रही है। यदि आप इस प्रकार जगत्के उपद्रवकी उपेक्षा कर दे रहे हैं तो किसलिये आपको दयामय कहा जा सकता है। साथ ही अपनी योगमायाकी महिमारूपी गुफामें स्थित रहनेवाला आपके निर्मल ऐश्वर्यका गौरव भी विद्यमान नहीं रह सकता। शरीरधारियोंमें हमलोग भी अतिशय धन्यवादके पात्र हैं, जो इस प्रकार आपका दर्शन कर रहे हैं। इसलिये हमारा मनोरथ नष्ट नहीं होना चाहिये। आप जगत्की रक्षाके विधानमें जगत्के लिये ऐसा करें जिससे हमारे मनोगत भाव सफल हो जायँ। हमलोग देवराज इन्द्रके दूत बनकर आये हैं। ऐसा कहकर वे मुनिगण शङ्करजीके चरणोंमें अवनत हो गये। उस समय उन्होंने शङ्करजीके कानरूपी भूमिके निकट उस वाणीरूपी बीजको इस प्रकार छींट दिया था, जैसे किसानलोग भलीभाँति जोती हुई भूमिपर अच्छे फलकी प्राप्तिके निमित्त उत्तम बीजकी मूँठ डाल देते हैं॥ ३९७-४०४॥ | | तेषां श्रुत्वा ततो रम्यां प्रक्रमोपक्रमक्रियाम्।<br><br>वाचं वाचस्पतिरिव प्रोवाच स्मितसुन्दरः॥ ४०५ | तदनन्तर उन मुनियोंकी सिलसिलेवार योजनासे युक्त मनोहर वाणीको सुनकर भगवान् शङ्करके मुखपर मुसकानकी छटा बिखर गयी। तब वे बृहस्पतिकी तरह सान्त्वनापूर्ण वचन बोले॥ ४०५॥ |

६३४* मत्स्यपुराण *

| शर्व उवाच<br>जाने लोकविधानस्य कन्यासत्कार्यमुत्तमम्।<br>जाता प्रालेयशैलस्य संकेतकनिरूपणा॥ ४०६<br>सत्यमुत्कण्ठिताः सर्वे देवकार्यार्थमुद्यताः।<br>तेषां त्वरन्ति चेतांसि किंतु कार्यं विवक्षितम्॥ ४०७<br>लोकयात्रानुगन्तव्या विशेषेण विचक्षणैः।<br>सेवन्ते ते यतो धर्मं तत्प्रामाण्यात्परे स्थिताः॥ ४०८<br>इत्युक्ता मुनयो जग्मुस्त्वरितास्तु हिमाचलम्।<br>तत्र ते पूजितास्तेन हिमशैलेन सादरम्।<br>ऊचुर्मुनिवराः प्रीताः स्वल्पवर्णं त्वरान्विताः॥ ४०९ | शङ्करजीने कहा— मुनिवरो! जगत्के कल्याणके लिये किये जाते हुए कन्याके उस उत्तम सत्कार्यको मैं जानता हूँ। वह कन्या हिमाचलकी पुत्रीरूपमें उत्पन्न हुई है। आपलोग उसीके संयोग-प्रस्तावका निरूपण कर रहे हैं। यह सत्य है कि सभी लोग देवकार्यकी सिद्धिके हेतु उत्सुक और उद्यत हैं, इसीसे उनके चित्त उतावलीसे भर गये हैं, किंतु यह कार्य कुछ कालकी अपेक्षा कर रहा है अर्थात् इसके पूर्ण होनेमें कुछ विलम्ब है। विद्वानोंको विशेषरूपसे लोकव्यवहारका निर्वाह करना चाहिये; क्योंकि वे जिस धर्मका सेवन करते हैं, वही दूसरोंके लिये प्रमाणरूप बन जाता है। ऐसा कहे जानेपर मुनिगण तुरंत ही हिमाचलके पास चल दिये। वहाँ पहुँचनेपर हिमाचलने उनकी आदरपूर्वक आवभगत की। तब प्रसन्न हुए मुनिवर शीघ्रतापूर्वक थोड़े शब्दोंमें (इस प्रकार) बोले॥ ४०६–४०९॥ | | मुनय ऊचुः<br>देवो दुहितरं साक्षात्पिनाकी तव मार्गते।<br>तच्छीघ्रं पावयात्मानमाहुत्येवानलार्पणात्॥ ४१०<br>कार्यमेतच्च देवानां सुचिरं परिवर्तते।<br>जगदुद्धरणायैष क्रियतां वै समुद्यमः॥ ४११<br>इत्युक्तस्तैस्तदा शैलो हर्षाविष्टोऽवदन्मुनीन्।<br>असमर्थोऽभवद् वक्तुमुत्तरं प्रार्थयच्छिवम्॥ ४१२<br>ततो मेना मुनीन् वन्द्य प्रोवाच स्नेहविक्लवा।<br>दुहितुस्तान् मुनींश्चैव चरणाश्रयमर्थवित्॥ ४१३ | मुनियोंने कहा— पर्वतराज! पिनाकधारी साक्षात् महादेव आपकी कन्याको प्राप्त करना चाहते हैं, अतः अग्निमें पड़ी हुई आहुतिकी तरह उसे शीघ्र ही उन्हें प्रदान करके अपने आत्माको पवित्र कर लीजिये। देवताओंका यह कार्य चिरकालसे चला आ रहा है, अतः जगत्का उद्धार करनेके लिये आप इस उद्योगको शीघ्र सम्पन्न कीजिये। मुनियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस समय हिमाचल हर्षविभोर हो मुनियोंको उत्तर देनेके लिये उद्यत हुए; किंतु जब उत्तर देनेमें असमर्थ हो गये, तब मन-ही-मन शङ्करजीसे प्रार्थना करने लगे। तत्पश्चात् प्रयोजनको समझनेवाली मेनाने मुनियोंको प्रणाम किया और पुत्रीके स्नेहसे व्याकुल हुई वह उन मुनियोंके चरणोंके निकट स्थित हो इस प्रकार बोली॥ ४१०–४१३॥ | | मेनोवाच<br>यदर्थं दुहितुर्जन्म नेच्छन्त्यपि महाफलम्।<br>तदेवोपस्थितं सर्वं प्रक्रमेणैव साम्प्रतम्॥ ४१४<br>कुलजन्मवयोरूपविभूत्यार्द्धियुतोऽपि यः।<br>वरस्तस्यापि चाहूय सुता देया हयाचतः॥ ४१५<br>तत्समस्ततपो घोरं कथं पुत्री प्रयास्यति।<br>पुत्रीवाक्याद्यदत्रास्ति विधेयं तद्विधीयताम्॥ ४१६ | मेनाने कहा— मुनिवरो! जिन कारणोंसे लोग महान् फलदायक होनेपर भी कन्याके जन्मकी इच्छा नहीं करते, वही सब इस समय परम्परासे मेरे सामने आ उपस्थित हुआ है। (विवाहकी प्रथा तो यह है कि) जो वर उत्तम कुल, जन्म, अवस्था, रूप, ऐश्वर्य और सम्पत्तिसे भी युक्त हो, उसे अपने घर बुलाकर कन्या प्रदान करनी चाहिये, किंतु कन्याकी याचना करनेवालेको नहीं। भला बताइये, इस प्रकार समस्त घोर तपोंको करनेवाले वरके साथ मेरी पुत्री कैसे जायगी। इसलिये इस विषयमें मेरी पुत्रीके कथनानुसार जो उचित हो, वही आपलोग करें। |

* अध्याय १५४ * ६३५

इत्युक्ता मुनयस्ते तु प्रियया हिमभूभृतः।<br>ऊचुः पुनरुदारार्थं नारीचित्तप्रसादकम्॥ ४१७हिमाचलकी पत्नी मेनाद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनिगण पुनः नारीके चित्तको प्रसन्न करनेवाले उदार अर्थसे युक्त वचन बोले॥ ४१४-४१७॥
मुनय ऊचुः<br>ऐश्वर्यमवगच्छस्व शंकरस्य सुरासुरैः।<br>आराध्यमानपादाब्जयुगलत्वात् सुनिर्वृतैः॥ ४१८<br>यस्योपयोगि यद्रूपं सा च तत्प्राप्तये चिरम्।<br>घोरं तपस्यते बाला तेन रूपेण निर्वृतिः॥ ४१९<br>यस्तद्व्रतानि दिव्यानि नयिष्यति समापनम्।<br>तत्र सावहिता तावत् तस्मात् सैव भविष्यति॥ ४२०<br>इत्युक्त्वा गिरिणा सार्धं ते ययुर्यत्र शैलजा।<br>जितार्कज्वलनज्वाला तपस्तेजोमयी ह्युमा॥ ४२१<br>प्रोचुस्तां मुनयः स्निग्धं सम्मान्यपथमागतम्।<br>रम्यं प्रियं मनोहारि मा रूपं तपसा दह॥ ४२२<br>प्रातस्ते शंकरः पाणिमेष पुत्रि ग्रहीष्यति।<br>वयमर्थितवन्तस्ते पितरं पूर्वमागताः॥ ४२३<br>पित्रा सह गृहं गच्छ वयं यामः स्वमन्दिरम्॥ ४२४<br>इत्युक्ता तपसः सत्यं फलमस्तीति चिन्त्य सा।<br>त्वरमाणा ययौ वेश्म पितुर्दिव्यार्थशोभितम्॥ ४२५<br>सा तत्र रजनीं मेने वर्षायुतसमां सती।<br>हरदर्शनसंजातमहोत्कण्ठा हिमाद्रिजा॥ ४२६**मुनियोंने कहा—**मेना! तुम शङ्करजीके ऐश्वर्यका ज्ञान उन देवताओं और असुरोंसे प्राप्त करो, जो उनके दोनों चरणकमलोंकी आराधना करके भलीभाँति संतुष्ट हो चुके हैं। जिसके लिये जो रूप उपयोगी होता है, वह उसीकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है। इस नियमके अनुसार वह कन्या शंकरजीकी प्राप्तिके लिये चिरकालसे घोर तपस्या कर रही है। उसे उसी रूपसे पूर्ण संतोष है। जो पुरुष उसके दिव्य व्रतोंका समापन करेगा, उसके प्रति वह अतिशय प्रसन्न एवं संतुष्ट होगी। ऐसा कहकर वे मुनिगण हिमाचलके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ सूर्य और अग्निकी ज्वालाको जीतनेवाली एवं तपस्याके तेजसे युक्त पार्वती उमा तपस्या कर रही थीं। वहाँ पहुँचकर मुनियोंने पार्वतीसे स्नेहपूर्ण वाणीमें कहा—'पुत्रि! अब तुम्हारे लिये सम्मान्यका पथ प्राप्त हो गया है, इसलिये अब तुम अपने इस रमणीय, प्रिय एवं मनको लुभानेवाले रूपको तपस्यासे दग्ध मत करो। प्रातःकाल वे शङ्कर तुम्हारा पाणिग्रहण करेंगे। हमलोग उनसे प्रार्थना करके पहले ही तुम्हारे पिताके पास आ गये हैं। अब तुम अपने पिताके साथ घर लौट जाओ और हमलोग अपने निवासस्थानको जा रहे हैं। इस प्रकार कही जानेपर पार्वती 'तपका फल निश्चय ही सत्य होता है'—ऐसा विचारकर दिव्य पदार्थोंसे सुशोभित अपने पिताके घरकी ओर शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुई। वहाँ पहुँचकर पार्वतीके मनमें शङ्करजीके दर्शनकी महान् उत्कण्ठा उत्पन्न हुई, जिससे सती पार्वतीको वह रात्रि दस हजार वर्षोंके समान प्रतीत होने लगी॥ ४१८-४२६॥
ततो मुहूर्ते ब्राह्मे तु तस्याश्चक्रुः सुरस्त्रियः।<br>नानामङ्गलसंदोहान् यथावत्क्रमपूर्वकम्॥ ४२७<br>दिव्यमण्डनमङ्गानां मन्दिरे बहुमङ्गले।<br>उपासत गिरिं मूर्ता ऋतवः सार्वकात्मकाः॥ ४२८<br>वायवो वारिदाश्चासन् सम्मार्जनविधौ गिरेः।<br>हर्म्येषु श्रीः स्वयं देवी कृतनानाप्रसाधना॥ ४२९<br>कान्तिः सर्वेषु भावेषु ऋद्धिश्चाभावदाकुला।<br>चिन्तामणिप्रभृतयो रत्नाः शैलं समंततः॥ ४३०तदनन्तर प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तमें देवाङ्गनाओंने पार्वतीके लिये क्रमशः नाना प्रकारके माङ्गलिक कार्योंको यथार्थरूपसे सम्पन्न किया। फिर उस विविध प्रकारके मङ्गलोंसे युक्त भवनमें पार्वतीके अङ्गोंको दिव्य शृंगारसे सुशोभित किया गया। उस समय सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली छहों ऋतुएँ शरीर धारणकर हिमाचलकी सेवामें उपस्थित हुईं, वायु और बादल पर्वतकी गुफाओंमें झाड़-बुहारके कार्यमें संलग्न थे। अट्टालिकाओंपर स्वयं लक्ष्मीदेवी नाना प्रकारकी सामग्रियोंको सँजोये हुए विराजमान थीं। सभी पदार्थोंमें कान्ति फूटी पड़ती थी। ऋद्धि आकुल हो उठी थी। चिन्तामणि आदि रत्न पर्वतपर चारों ओर
६३६* मत्स्यपुराण *

| उपस्तस्थुर्नगाश्चापि कल्पकाममहाद्रुमाः।<br>ओषध्यो मूर्तिमत्यश्च दिव्यौषधिसमन्विताः॥ ४३१<br>रसाश्च धातवश्चैव सर्वे शैलस्य किङ्कराः।<br>किङ्करास्तस्य शैलस्य व्यग्राश्चाज्ञानुवर्तिनः॥ ४३२<br>नद्यः समुद्रा निखिलाः स्थावरं जङ्गमं च यत्।<br>तत्सर्वं हिमशैलस्य महिमानमवर्धयत्॥ ४३३ | बिखरे हुए थे। कल्पवृक्ष आदि महनीय वृक्षोंसे युक्त अन्यान्य पर्वत भी सेवामें उपस्थित थे। दिव्यौषधिसे युक्त मूर्तिमती ओषधियाँ तथा सभी प्रकारके रस और धातुएँ हिमाचलके परिचारकरूपमें विद्यमान थे। हिमाचलके वे सभी किंकर आज्ञापालनके लिये उतावले हो रहे थे। इनके अतिरिक्त सभी समुद्र और नदियाँ तथा समस्त स्थावर-जङ्गम प्राणी उस समय हिमाचलकी महिमाको बढ़ा रहे थे॥ ४२७-४३३॥ | | अभवन् मुनयो नागा यक्षगन्धर्वकिन्नराः।<br>शंकरस्यापि विबुधा गन्धमादनपर्वते॥ ४३४<br>सर्वे मण्डनसम्भारास्तस्थुर्निर्मलमूर्तयः।<br>शर्वस्यापि जटाजूटे चन्द्रखण्डं पितामहः॥ ४३५<br>बबन्ध प्रणयोदारविस्फारितविलोचनः।<br>कपालमालां विपुलां चामुण्डा मूर्ध्न्यबन्धत॥ ४३६<br>उवाच चापि वचनं पुत्रं जनय शंकर।<br>यो दैत्येन्द्रकुलं हत्वा मां रक्तैस्तर्पयिष्यति॥ ४३७<br>शौरिर्ज्वलच्छिरोरत्नमुकुटं चानलोल्बणम्।<br>भुजगाभरणं गृह्य सज्जं शम्भोः पुरोऽभवत्॥ ४३८<br>शक्रो गजाजिनं तस्य वसाभ्यक्ताग्रपल्लवम्।<br>दधे सरभसं स्विद्यद्विस्तीर्णमुखपङ्कजम्॥ ४३९<br>वायुश्च विपुलं तीक्ष्णशृङ्गं हिमगिरिप्रभम्।<br>वृषं विभूषयामास हयानं महौजसम्॥ ४४०<br>वितेनुर्नयनान्तःस्थाः शम्भोः सूर्यानलेन्दवः।<br>स्वां द्युतिं लोकनाथस्य जगतः कर्मसाक्षिणः॥ ४४१<br>चिताभस्म समाधाय कपाले रजतप्रभम्।<br>मनुजास्थिमयीं मालामाबबन्ध च पाणिना॥ ४४२<br>प्रेताधिपः पुरो द्वारे सगदः समवर्तत।<br>नानाकारमहारत्नभूषणं धनदाहृतम्॥ ४४३<br>विहायोदग्रसर्पेन्द्रकटकेन स्वपाणिना।<br>कर्णोत्तंसं चकारेशो वासुकिं तक्षकं स्वयम्॥ ४४४<br>जलाधीशाहतां स्थास्नुप्रसूनावेष्टितां पृथक्। | उधर गन्धमादन पर्वतपर शङ्करजीके विवाहोत्सवमें सभी मुनि, नाग, यक्ष, गन्धर्व और किंनर आदि देवगण सम्मिलित हुए। वे सभी निर्मल मूर्ति धारणकर शृङ्गारसामग्रीके जुटानेमें तत्पर थे। उस समय प्रेम एवं उदार भावनासे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले ब्रह्माने शंकरजीके जटाजूटमें चन्द्रखण्डको बाँधा। चामुण्डाने उनके मस्तकपर एक विशाल कपालमाला बाँधी और इस प्रकार कहा—'शंकर! ऐसा पुत्र उत्पन्न करो, जो दैत्यराज तारकके कुलका संहार कर मुझे रक्तसे तृप्त करे।' भगवान् विष्णु अग्निके समान उद्दीप्त एवं चमकीले अग्रभागवाले रत्नोंसे निर्मित मुकुट और सर्पोंके आभूषण आदि शृङ्गारसामग्री लेकर शंकरजीके आगे उपस्थित हुए। इन्द्रने वेगपूर्वक गजचर्म लाकर शंकरजीको धारण कराया, जिसका अग्रभाग चर्बीसे लिस हुआ था। उस समय प्रसन्नतासे खिले हुए इन्द्रके मुखकमलपर पसीनेकी बूँदें झलक रही थीं। वायुने शंकरजीके वाहन उस वृषभराज नन्दीश्वरको विभूषित किया, जिसका शरीर विशाल था, जिसके सींग तीखे थे तथा जो हिमाचलके समान उज्ज्वल कान्तिवाला एवं महान् ओजस्वी था। जगत्‌के कर्मोंके साक्षी सूर्य, अग्नि और चन्द्र लोकनायक शम्भुके नेत्रोंके अन्तस्तलमें स्थित होकर अपनी-अपनी प्रभाका विस्तार करने लगे। प्रेतराज यमने शंकरजीके मस्तकपर चाँदीके समान चमकीला चिताभस्म लगाकर एक हाथसे मनुष्योंकी हड्डियोंसे बनी हुई मालाको बाँधा और फिर वे हाथमें गदा लेकर द्वारपर खड़े हो गये। तत्पश्चात् शिवजीने कुबेरद्वारा लाये गये नाना प्रकारके बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषणों और वरुणद्वारा लायी गयी अम्लान (न कुम्हलानेवाले) पुष्पोंसे गूँथी गयी मालाको पृथक् रखकर विषैले सर्पोंके कङ्कणसे सुशोभित अपने हाथसे स्वयं वासुकि और तक्षकको अपना कुण्डल बनाया॥ ४३४-४४४ १/२॥ |

* अध्याय १५४ * ६३७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्तु ते गणाधीशा विनयात् तत्र वीरकम् ॥ ४४५<br><br>प्रोचुर्व्यग्राकृते त्वं नो समावेदय शूलिने।<br>निष्यन्नाभरणं देवं प्रसाध्येशं प्रसाधनैः ॥ ४४६<br><br>सप्त वारिधयस्तस्थुः कर्तुं दर्पणविभ्रमम्।<br>ततो विलोकितात्मानं महाम्बुधिजलोदरे ॥ ४४७<br><br>धरामालिङ्ग्य जानुभ्यां स्थाणुं प्रोवाच केशवः।<br>शोभसे देव रूपेण जगदानन्ददायिना ॥ ४४८<br><br>मातरः प्रेरयन् कामवधूं वैधव्यचिह्निताम्।<br>कालोऽयमिति चालक्ष्य प्रकारेङ्गितसंज्ञया ॥ ४४९<br><br>ततस्ताश्चोदिता देवमूचुः प्रहसिताननाः।<br>रतिः पुरस्तव प्राप्ता नाभाति मदनोज्झिता ॥ ४५०<br><br>ततस्तां सन्निवार्याह वामहस्ताग्रसंज्ञया।<br>प्रयाणे गिरिजावक्त्रदर्शनोत्सुकमानसः ॥ ४५१तत्पश्चात् वहाँ आये हुए गणाधीशोंने विनयपूर्वक वीरकसे कहा—'भयंकर आकृतिवाले वीरक! तुम शंकरजीसे हमारे आगमनकी सूचना दे दो। हमलोग सजे-सजाये महादेवको शृङ्गार-सामग्रियोंद्वारा पुनः सुशोभित करेंगे।' इतनेमें वहाँ सातों समुद्र दर्पणकी स्थानपूर्ति करनेके लिये उपस्थित हुए। तब उस महासागरके जलके भीतर अपने रूपको देखकर भगवान् केशव घुटनोंद्वारा पृथ्वीका आलिङ्गन करके (अर्थात् पृथ्वीपर दोनों घुटने टेककर) शंकरजीसे बोले—'देव! इस समय आप अपने इस जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले रूपसे सुशोभित हो रहे हैं।' इसी बीच मातृकाओंने उपयुक्त समय जानकर वैधव्यके चिह्नोंसे युक्त काम-पत्नी रतिको इशारेसे शंकरजीके सम्मुख जानेके लिये प्रेरित किया। (तब वह शिवजीके समक्ष जाकर खड़ी हो गयी।) तब वे मातृकाएँ हँसती हुई शंकरजीसे बोलीं—'देव! आपके सम्मुख खड़ी हुई कामदेवसे रहित यह रति शोभा नहीं पा रही है।' तब शंकरजी अपने बायें हाथके अग्रभागके संकेतसे उसे सान्त्वना देते हुए सामनेसे हटाकर प्रस्थित हुए। उस समय उनका मन गिरिजाके मुखका अवलोकन करनेके लिये समुत्सुक हो रहा था ॥ ४४५–४५१ ॥
ततो हरो हिमगिरिकन्दराकृतिं<br>  समुन्नतं मृदुगतिभिः प्रचोदयन्।<br>महावृषं गणतुमुलाहितेक्षणं<br>  स भूधरानशनिरिव प्रकम्पयन् ॥ ४५२<br><br>ततो हरिर्द्रुतपदपद्धतिः पुरः-<br>  सरः श्रमाद् द्रुमनिकरेषु विश्रमन्।<br>धरारजः शबलितभूषणोऽब्रवीत्<br>  प्रयात मा कुरुत पथोऽस्य संकटम् ॥ ४५३<br><br>प्रभोः पुनः प्रथमनियोगमूर्जयन्<br>  सुतोऽब्रवीद् भ्रुकुटिमुखोऽपि वीरकः।<br>वियच्चरा वियति किमस्ति कान्तकं<br>  प्रयात नो धरणिधरा विदूरतः ॥ ४५४<br><br>महार्णवाः कुरुत शिलोपमं पयः<br>  सुरद्विषागमनमहातिकर्दमम् ।<br>गणेश्वराश्चपलतया न गम्यतां<br>  सुरेश्वरैः स्थिरगतिभिश्च गम्यताम् ॥ ४५५तदुपरान्त शंकरजीने विशालकाय महावृषभ नन्दीश्वरपर, जिसकी आकृति हिमाचलके गुफा-सदृश थी तथा जिसके नेत्र प्रमथगणोंकी ओर लगे हुए थे, सवार होकर उसे धीमी चालसे आगे बढ़ाया। उस समय उनके प्रस्थानसे पृथ्वी उसी प्रकार काँप रही थी, मानो वज्रके प्रहारसे पर्वत काँप रहे हों। तत्पश्चात् श्रीहरिने जिनके आभूषण पृथ्वीकी धूलसे धूसरित हो गये थे, शीघ्रतापूर्वक कदम बढ़ाते हुए आगे जाकर श्रमवश घने वृक्षोंके नीचे विश्राम करते हुए लोगोंसे कहा—'अरे! चलो, आगे बढ़ो, इस मार्गमें भीड़ मत करो।' पुनः शंकरजीका पुत्र वीरक भौंहें टेढ़ी कर श्रीहरिकी प्रथम आज्ञाको उच्च स्वरसे फैलाता हुआ बोला—'अरे आकाशचारियो! आकाशमें कौन-सी सुन्दर वस्तु रखी है, जिसे सब लोग देख रहे हो, आगे बढ़ो। पर्वतसमूहो! तुमलोग एक-दूसरेसे अलग-अलग होकर चलो। महासागरो! तुमलोग राक्षसोंके आगमनसे उत्पन्न हुए महान् कीचड़से युक्त जलको शिलासदृश कर दो। गणेश्वरो! तुमलोग चञ्चलतापूर्वक मत चलो। सुरेश्वरोंको स्थिरगतिसे चलना चाहिये।

६३८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न भृङ्गिणा स्वतनुमवेक्ष्य नीयते<br>पिनाकिनः पृथुमुखमण्डमग्रतः।<br>वृथा यम प्रकटितदन्तकोटरं<br>त्वमायुधं वहसि विहाय सम्भ्रमम्॥ ४५६शङ्करजीके आगे-आगे विशाल पानपात्रको लेकर चलनेवाले भृङ्गी अपने शरीरकी रक्षा करते हुए नहीं चल रहे हैं। यम! तुम अपने इस निकले हुए दाँतोंवाले आयुधको व्यर्थ ही धारण किये हुए हो। भय छोड़कर चलो।
पदं न यद्रथतुरगैः पुरद्विषः<br>प्रमुच्यते बहुतरमातृसंकुलम्।<br>अमी सुराः पृथगनुयायिभिर्वृताः<br>पदातयो द्विगुणपथान् हरप्रियाः॥ ४५७शङ्करजीके रथके घोड़े अपने मार्गको बहुत-सी माताओंसे व्याप्त होनेपर भी नहीं छोड़ रहे हैं। ये शङ्करजीके प्रिय देवगण पृथक्-पृथक् अपने अनुयायियोंसे घिरे हुए पैदल ही दूना मार्ग तय कर रहे हैं॥ ४५२-४५७॥
स्ववाहनैः पवनविधूतचामरै-<br>श्लथध्वजैर्व्रजत विहारशालिभिः।<br>सुराः स्वकं किमिति न रागमूर्जितं<br>विचार्यते नियतलयत्रयानुगम्॥ ४५८‘देवगण! आपलोग आमोदके साधनोंसे सम्पन्न एवं वायुके आवेगसे हिलते हुए चामरोंसे युक्त अपने वाहनोंद्वारा, जिनपर ध्वजाएँ फहरा रही हैं, अलग-अलग होकर चलिये। आपलोग नियतरूपसे तीनों लयोंका अनुगमन करनेवाले अपने ऊर्जस्वी रागके विषयमें क्यों नहीं विचार कर रहे हैं?
न किन्नरैरभिभवितुं हि शक्यते<br>विभूषणप्रचयसमुद्भवो ध्वनिः।<br>स्वजातिकाः किमिति न षड्जमध्यम-<br>पृथुस्वरं बहुतरमत्र वक्ष्यते॥ ४५९किंनरगण (अपने वाद्योंद्वारा) आभूषणसमूहसे उत्पन्न हुई ध्वनिको परास्त नहीं कर सकते। अपनी जातिवाले गणेश्वरो! इस समय षड्ज, मध्यम और पृथु स्वरसे युक्त गीत अधिक मात्रामें क्यों नहीं गाये जा रहे हैं।
नतानताननतततानतां गताः<br>पृथक्तया समयकृता विभिन्नताम्।<br>विशङ्किता भवदतिभेदशीलिनः<br>प्रयान्त्यमी द्रुतपदमेव गौडकाः॥ ४६०ये गौड¹-रागके जानकार लोग कालभेदके अनुसार विभिन्नताको प्राप्त हुए एवं नतानत, नत और आनतके लयसे युक्त अत्यन्त भेदवाले रागको पृथक्रूपमें निःशङ्कभावसे अलापते हुए बड़ी शीघ्रतासे चले जा रहे हैं।
विसंहताः किमिति न षाडवादयः<br>स्वगीतकैर्ललितप्रदप्रयोजकैः।<br>प्रभोः पुरो भवति हि यस्य चाक्षतं<br>समुद्गतार्थकमिति तत्प्रतीय॥ ४६१षाडव² रागके ज्ञातालोग पृथक्-पृथक् अपने ललित पदोंके प्रयोजक गीतोंको अलापते हुए शंकरजीके आगे-आगे क्यों नहीं चल रहे हैं? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शंकरजीकी हर्षपूर्ण यात्रामें विघ्न न पड़ जाय, इस भयसे वे ऐसा नहीं कर रहे हैं।
अमी पृथग्विरचितरम्यरासकं<br>विलासिनो बहुगमकस्वभावकम्।<br>प्रयुञ्जते गिरिशयशोविसारिणं<br>प्रकीर्णकं बहुतरनागजातयः॥ ४६२ये विभिन्न जातियोंके विलासोन्मत्त नाग शंकरजीके यशका विस्तार करनेवाले, अधिकांश गमक³के स्वभावसे सम्पन्न तथा मनोहर ध्वनिसे युक्त संगीतका पृथक्-पृथक् प्रयोग कर रहे हैं।
अमी कथं ककुभि कथाः प्रतिक्षणं<br>ध्वनन्ति ते विविधवधूमिश्रिताः।<br>न जातयो ध्वनिमुरजासमीरिता<br>न मूर्च्छिताः किमिति च मूर्च्छनात्मिकाः॥ ४६३उधर उस दिशामें ये वधुओंसहित अनेकों संगीतज्ञ प्रतिक्षण कैसा संगीत अलाप रहे हैं? पता नहीं क्यों, न तो उसमें मृदङ्गसे निकली हुई ध्वनिकी जातियाँ लक्षित हो रही हैं, न मूर्च्छना⁴-आरोह-अवरोहसे युक्त स्वरका ही भान हो रहा है।

१. एक संकर राग। २. रागकी एक जाति, जिसमें केवल छः स्वर आते हैं। ३. सातों स्वरोंका क्रमसे आरोह-अवरोह। ४. गानेमें एक श्रुतिसे दूसरी श्रुतिपर जानेकी एक रीति।

* अध्याय १५४ *६३९
श्रुतिप्रियक्रमगतिभेदसाधनं<br>  ततादिकं किमिति न तुम्बुरेरितम्।<br>न हन्यते बहुविधवाद्यडम्बरं<br>  प्रकीर्णवीणामुरजादि नाम यत्॥ ४६४॥तुम्बुरुद्वारा बजाये जानेवाले कर्णप्रिय तथा क्रम एवं गतिके भेदसे युक्त तारवाले बाजे क्यों नहीं बजाये जा रहे हैं? इधर वीणा, मृदंग आदि अनेकों प्रकारके वाद्यसमूह क्यों नहीं बजाये जा रहे हैं?'॥ ४५८-४६४॥
इतीरितां गिरमवधार्य शालिनीं<br>  सुरासुराः सपदि तु वीरकाज्ञया।<br>नियामिताः प्रययुरतीव हर्षिता-<br>  श्चराचरं जगदखिलं ह्यपूरयन्॥ ४६५॥<br>इति स्तनत्ककुभि रसन् महार्णवे<br>  स्तनद्घने विदलितशैलकन्दरे।<br>जगत्यभूत् तुमुल इवाकुलीकृतः<br>  पिनाकिना त्वरितगतेन भूधरः॥ ४६६॥<br>परिज्वलत्कनकसहस्रतोरणं<br>  क्वचिन्मिलन्मरकतवेश्मवेदिकम्।<br>क्वचित्क्वचिद्विमलविदूर्र्यभूमिकं<br>  क्वचिद्गलज्जलधररम्यनिर्झरम्॥ ४६७॥<br>चलद्ध्वजप्रवरसहस्रमण्डितं<br>  सुरद्रुमस्तबकविकीर्णचत्वरम् ।<br>सितासितारुणरुचिधातुवर्णिकं<br>  श्रियोज्ज्वलं प्रविततमार्गगोपुरम्॥ ४६८॥<br>विजृम्भिताप्रतिमध्वनिवारिदं<br>  सुगन्धिभिः पुरपवनैर्मनोहरम् ।<br>हरो महागिरिनगरं समासदत्<br>  क्षणादिव प्रवरसुरासुरस्तुतः॥ ४६९॥इस प्रकार कही गयी उस सुन्दर वाणीको सुनकर देवता और दैत्य अत्यन्त प्रसन्न हो गये। तब वे तुरंत ही वीरककी आज्ञासे सम्पूर्ण चराचर जगत्को आच्छादित करते हुए नियमपूर्वक आगे बढ़ने लगे। इस प्रकार शंकरजीके शीघ्रतापूर्वक गमनसे दिशाओंमें कोलाहल गूँज उठा, महासागरोंमें ज्वार उठने लगा, बादल गरजने लगे, पर्वतकी कन्दराएँ तहस-नहस हो गयीं, जगत्में तुमुल ध्वनि व्याप्त हो गयी और हिमाचल व्याकुल हो गये। इस प्रकार श्रेष्ठ सुरों एवं असुरोंद्वारा प्रशंसित होते हुए शिवजी क्षणमात्रमें ही पर्वतराज हिमाचलके उस नगरमें जा पहुँचे, जो तपाये गये सुवर्णके सहस्रों तोरणोंसे सुशोभित था। उसमें कहीं-कहीं मरकतमणिके संयोगसे बने हुए घरोंमें वेदिकाएँ बनी हुई थीं। कहीं-कहीं निर्मल वैदूर्य मणिके फर्श बने थे। कहीं बादलके समान रमणीय झरने झर रहे थे। वह नगर हजारों फहराते हुए ऊँचे-ऊँचे ध्वजोंसे विभूषित था। वहाँ चबूतरोंपर कल्पवृक्षके पुष्पोंके गुच्छे बिखेरे गये थे। वह श्वेत, काले और लाल रंगकी धातुओंसे रँगा हुआ था। उसकी उज्ज्वल छटा फैल रही थी। उसके मार्ग और फाटक अत्यन्त विस्तृत थे। वहाँ उमड़े हुए बादलोंका अनुपम शब्द हो रहा था। सुगन्धयुक्त वायुके चलनेसे वह पुर अत्यन्त मनोहर लग रहा था॥ ४६५-४६९॥
तं प्रविशन्तमगात् प्रविलोक्य<br>  व्याकुलतां नगरं गिरिभर्तुः।<br>व्यग्रपुरन्ध्रिजनं जवियानं<br>  धावितमार्गजनाकुलरथ्यम् ॥ ४७०॥<br>हर्म्यगवाक्षगतामरनारी-<br>  लोचननीलसरोरुहमालम् ।<br>सुप्रकटा समदृश्यत काचित्<br>  स्वाभरणांशुवितानविगूढा ॥ ४७१॥<br>काप्यखिलीकृतमण्डनभूषा<br>  त्यक्तसखीप्रणया हरमैक्षत्।<br>काचिदुवाच कलं गतमाना<br>  कातरतां सखि मा कुरु मूढे॥ ४७२।शिवजीको उस नगरमें प्रवेश करते देखकर पर्वतराज हिमाचलका सारा नगर व्याकुल हो गया। पति-पुत्र आदिसे युक्त सम्मानित नारियाँ व्याकुल होकर वेगपूर्वक इधर-उधर भागने लगीं। मार्गों और गलियोंमें भागते हुए लोगोंकी भीड़ लग गयी। कोई देवाङ्गना अट्टालिकाके झरोखेमें बैठकर अपने नीलकमलके-से नेत्रोंसे उसकी शोभा बढ़ा रही थी। कोई नारी अपने आभूषणोंकी किरणोंसे छिपी होनेपर भी प्रत्यक्ष रूपमें दीख रही थी। कोई सुन्दरी अपनेको सम्पूर्ण श्रृङ्गारोंसे विभूषितकर सखीके प्रेमको छोड़कर शिवजीकी ओर निहार रही थी। कोई नारी अभिमानरहित हो मधुर वाणीमें बोली—'अरी भोली-
६४०* मत्स्यपुराण *

| दग्धमनोभव एव पिनाकी<br>कामयते स्वयमेव विहर्तुम्।<br>काचिदपि स्वयमेव पतन्ती<br>प्राह परां विरहस्खलिताङ्गीम्॥ ४७३<br>मा चपले मदनव्यतिषङ्गं<br>शङ्करजं स्खलनेन वद त्वम्।<br>कापि कृतव्यवधानमदृष्ट्वा<br>युक्तिवशाद्गिरिशो ह्ययमूचे॥ ४७४<br>एष स यत्र सहस्रमखाद्या<br>नाकसदामधिपाः स्वयमुक्तैः।<br>नामभिरिन्दुजटं निजसेवा-<br>प्राप्तिफलाय नतास्तु घटन्ते॥ ४७५<br>एष न चैष स एष यदग्रे<br>चर्मपरीततनुः शशिमौली।<br>धावति वज्रधरोऽमरराजो<br>मार्गममुं विवृतीकरणाय॥ ४७६<br>एष स पद्मभवोऽप्युपेत्य<br>प्रांशुजटामृगचर्मनगूढः ।<br>सप्रणयं करघट्टितवक्त्रः<br>किंचिदुवाच मितं श्रुतिमूले॥ ४७७<br>एवम्भूत् सुरनारिकुलानां<br>चित्तविसंस्थुलता गुरुरागात्।<br>शंकरसंश्रयणाद्रिरिजाया<br>जन्मफलं परमं त्विति चोचुः॥ ४७८ | 'भाली सखि! तुम कातर मत होओ। यद्यपि शिवजीने कामदेवको जला दिया है, तथापि वे स्वयं ही विहार करनेकी इच्छा करते हैं।' कोई सुन्दरी, जो स्वयं मनोभवके फंदेमें पड़ गयी थी, विरहसे स्खलित अङ्गोंवाली दूसरी नारीसे बोली—'चपले! तुम भूलसे शङ्करजीके साथ कामदेवके संयोगकी चर्चा मत किया कर!' कोई कामिनी व्यवधान पड़नेके कारण शङ्करजीको न देखकर युक्तिपूर्वक 'शङ्कर यही हैं'—ऐसा मानकर कह रही थी—'वे शिव यही हैं, जिन चन्द्रशेखरको अपनी सेवाके फलकी प्राप्तिके निमित्त स्वर्गवासियोंके अधीश्वर इन्द्र आदि देवगण स्वयं अपना-अपना नाम लेकर नमस्कार कर रहे हैं।' कोई नारी कह रही थी—'अरे! शिवजी यह नहीं हैं, वे तो वह हैं, जिनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभा पा रहा है और जिनका शरीर चमड़ेसे ढँका हुआ है तथा जिनके आगे वज्रधारी देवराज इन्द्र इस मार्गको निर्बाध करनेके लिये दौड़ रहे हैं। देखो, ये लम्बी जटाओं और मृगचर्मसे सुशोभित पद्मयोनि ब्रह्मा भी उनके निकट जाकर हाथसे मुख पकड़े हुए प्रेमपूर्वक उनके कानोंमें कुछ कह रहे हैं।' इस प्रकार अतिशय प्रेमके कारण देवाङ्गनाओंके चित्तमें परम संतोष हुआ। तब वे कहने लगीं कि शङ्करजीका आश्रय ग्रहण करनेसे पार्वतीको अपने जन्मका परम फल प्राप्त हो गया॥ ४७०—४७८॥ | | ततो हिमगिरेर्वेश्म विश्वकर्मनिवेदितम्।<br>महानीलमयस्तम्भं ज्वलत्काञ्चनकुट्टिमम्॥ ४७९<br>मुक्ताजालपरिष्कारं ज्वलितौषधिदीपितम्।<br>क्रीडोद्यानसहस्राढ्यं काञ्चनाबद्धदीर्घिकम्॥ ४८०<br>महेन्द्रप्रमुखाः सर्वे सुरा दृष्ट्वा तदद्भुतम्।<br>नेत्राणि सफलान्यद्य मनोभिरिति ते दधुः॥ ४८१<br>विमर्दकीर्णकेयूरा हरिणा द्वारि रोधिताः।<br>कथंचित् प्रमुखास्तत्र विविशुर्नाकवासिनः॥ ४८२<br>प्रणतेनाचलेन्द्रेण पूजितोऽथ चतुर्मुखः।<br>चकार विधिना सर्वं विधिमन्त्रपुरःसरम्॥ ४८३ | तदनन्तर भगवान् शङ्कर हिमाचलके उस भवनमें प्रविष्ट हुए, जिसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्माने किया था तथा जिसमें महानीलमणिके खम्भे लगे हुए थे, जिसका फर्श तपाये हुए स्वर्णका बना हुआ था, जो मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित और जलती हुई औषधियोंके प्रकाशसे उद्दीप्त हो रहा था, जिसमें हजारों क्रीडोद्यान थे तथा जिसकी बावलियोंकी सीढ़ियाँ सोनेकी बनी हुई थीं। उस अद्भुत भवनको देखकर महेन्द्र आदि सभी देवताओंने अपने मनमें ऐसा समझा कि आज हमारे नेत्र सफल हो गये। उस भवनके द्वारपर श्रीहरिद्वारा रोके जानेपर भीड़के कारण जिनके केयूर परस्पर रगड़ खाकर चूर-चूर हो गये थे, ऐसे कुछ प्रमुख स्वर्गवासी किसी प्रकार उस भवनमें प्रविष्ट हुए। तदनन्तर वहाँ (मण्डपमें) पर्वतराज हिमाचलने विनम्रभावसे ब्रह्माकी पूजा की। तब |

* अध्याय १५४ *६४१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शर्वेण पाणिग्रहणमग्निसाक्षिकमक्षतम्।<br>दाता महीभृतां नाथो होता देवश्चतुर्मुखः॥ ४८४<br><br>वरः पशुपतिः साक्षात् कन्या विश्वारणिस्तथा।<br>चराचराणि भूतानि सुरासुरवराणि च॥ ४८५<br><br>तत्राप्येते नियमतो ह्यभवन् व्यग्रमूर्तयः।<br>मुमोचाभिनवान् सर्वान् सस्यशालीन रसौषधीः॥ ४८६<br><br>व्यग्रा तु पृथिवी देवी सर्वभावमनोरमा।<br>गृहीत्वा वरुणः सर्वरत्नान्याभरणानि च॥ ४८७<br><br>पुण्यानि च पवित्राणि नानारत्नमयानि तु।<br>तस्थौ साभरणो देवो हर्षदः सर्वदेहिनाम्॥ ४८८उन्होंने विधानानुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न किया। तदुपरान्त शिवजीने अग्निको साक्षी बनाकर गिरिजाका अटूट पाणिग्रहण किया। उस विवाहोत्सवमें पर्वतोंके राजा हिमाचल दाता, देवाधिदेव ब्रह्मा होता, साक्षात् शिव वर तथा विश्वकी अरणिभूता पार्वती कन्या थीं। उस समय प्रधान देवता एवं असुर तथा चराचर सभी प्राणी (कार्याधिक्यके कारण) नियमको छोड़कर व्यग्र हो उठे। सभी प्रकारके मनोरम भावोंसे परिपूर्ण पृथ्वीदेवी आकुल होकर सभी प्रकारके नूतन अन्नों, रसों और औषधियोंको उड़ेलने लगीं। सभी प्राणियोंको हर्ष प्रदान करनेवाले वरुणदेव स्वयं आभूषणोंसे विभूषित हो सभी प्रकारके रत्नों तथा अनेकविध रत्नोंसे निर्मित पुण्यमय एवं पावन आभरणोंको लेकर वहाँ उपस्थित थे॥ ४७९-४८८॥
धनदश्चापि दिव्यानि हैमान्याभरणानि च।<br>जातरूपविचित्राणि प्रयतः समुपस्थितः॥ ४८९<br><br>वायुर्ववौ सुसुरभिः सुखसंस्पर्शनो विभुः।<br>छत्रमिन्दुकराेद्गारं सुसितं च शतक्रतुः॥ ४९०<br><br>जग्राह मुदितः स्रग्वी बाहुभिर्बहुभूषणैः।<br>जगगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ४९१<br><br>वादयन्तोऽति मधुरं जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।<br>मूर्ताश्च ऋतवस्तत्र जगुश्च ननृतुश्च वै॥ ४९२<br><br>चपलाश्च गणास्तस्थुर्लोलयन्तो हिमाचलम्।<br>उत्तिष्ठन् क्रमशःश्चात्र विश्वभृग्भगनेत्रहा॥ ४९३<br><br>चकारौद्वाहिकं कृत्यं पत्न्या सह यथोचितम्।<br>दत्तार्घो गिरिराजेन सुरवृन्दैर्विनोदितः॥ ४९४<br><br>अवसत् तां क्षपां तत्र पत्न्या सह पुरान्तकः।<br>ततो गन्धर्वगीतेन नृत्येनाप्सरसामपि॥ ४९५<br><br>स्तुतिभिर्देवदैत्यानां विबुद्धो विबुधाधिपः।<br>आमन्त्र्य हिमशैलेन्द्रं प्रभाते चोमया सह।<br>जगाम मन्दरगिरिं वायुवेगेन शृङ्गिणा॥ ४९६उस समय वहाँ कुबेर भी विनयभावसे विभिन्न प्रकारके स्वर्णमय दिव्य आभूषणोंको लिये हुए उपस्थित थे। स्पर्शसे सुख उत्पन्न करनेवाली परम सुगन्धित वायु चारों ओर बहने लगी। मालाधारी इन्द्र हर्षपूर्वक अनेकों आभूषणोंसे विभूषित अपनी भुजाओंद्वारा चन्द्रमाकी किरणोंके समान कान्तिमान् अत्यन्त उज्ज्वल छत्र लिये हुए थे। प्रधान-प्रधान गन्धर्व गीत गा रहे थे और अप्सराएँ नाच रही थीं। कुछ अन्य गन्धर्व और किंनर बाजा बजाते हुए अत्यन्त मधुर स्वरसे राग अलाप रहे थे। वहाँ छहों ऋतुएँ भी शरीर धारणकर नाचती और गाती थीं। चञ्चल प्रकृतिवाले प्रमथगण हिमाचलको विचलित करते हुए उपस्थित थे। इसी समय विश्वके पालनकर्ता एवं भगदेवताके नेत्रोंके विनाशक भगवान् शिव उठे और अपनी पत्नी पार्वतीके साथ क्रमशः सारा वैवाहिक कार्य यथोचितरूपसे सम्पन्न किये। उस समय पर्वतराज हिमाचलने उन्हें अर्घ्य प्रदान किया और सुरसमूह विनोदकी बातें करने लगे। तत्पश्चात् त्रिपुरके विनाशक भगवान् शङ्करने उस रातमें पत्नीके साथ वहाँ निवास किया। प्रातःकाल गन्धर्वोंके गीत, अप्सराओंके नृत्य तथा देवों एवं दैत्योंकी स्तुतियोंके माध्यमसे जगाये गये देवेश्वर शङ्कर पर्वतराज हिमाचलसे आज्ञा लेकर उमाके साथ वायुके समान वेगशाली नन्दीश्वरपर सवार हो मन्दराचलको चले गये॥ ४८९-४९६॥

१५५- भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान

६४२* मत्स्यपुराण *

| ततो गते भगवति नीललोहिते<br>सहोमया रतिमलभन्न भूधरः।<br>सबान्धवो भवति च कस्य नो मनो<br>विह्वलं च जगति हि कन्यकापितुः॥ ४९७<br>ज्वलन्मणिस्फटिकहाटकोत्कटं<br>स्फुटद्युति स्फटिकगोपुरं पुरम्।<br>हरो गिरौ चिरमनुकल्पितं तदा<br>विसर्जितामरनिवहोऽविशत्स्वकम्॥ ४९८ | तदनन्तर नीललोहित भगवान् शङ्करके उमासहित चले जानेपर भाई-बन्धुओंसहित हिमाचलका मन खिन्न हो गया; क्योंकि जगत्में भला ऐसा कौन कन्याका पिता होगा, जिसका मन उसकी विदाईके समय विह्वल न हो जाता हो ? उधर मन्दराचलपर शिवजीका नगर बहुत पहलेसे ही विरचित था। वह चमकती हुई मणियों, स्फटिक-शिलाओं और स्वर्णसे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर लग रहा था, उसकी कान्ति फूटी पड़ती थी और उसमें स्फटिकके फाटक लगे हुए थे। वहाँ पहुँचकर शिवजी देवसमूहको विदा कर अपने नगरमें प्रविष्ट हुए॥ ४९७-४९८॥ | | तदोमासहितो देवो विजहार भगाक्षिहा।<br>पुरोद्यानेषु रम्येषु विविक्तेषु वनेषु च॥ ४९९ | वहाँ भग-नेत्रहारी भगवान् शङ्कर उमासहित नगरके रमणीय उद्यानों तथा एकान्त वनोंमें विहार करने लगे। | | सुरक्तहृदयो देव्या मकराङ्कपुरःसरः।<br>ततो बहुतिथे काले सुतकामा गिरेः सुता॥ ५०० | उस समय उनका हृदय कामके वशीभूत होनेके कारण पार्वतीदेवीके प्रति अतिशय अनुरक्त हो गया था। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत होनेके पश्चात् पार्वतीके मनमें पुत्रकी कामना उत्पन्न हुई, | | सखीभिः सहिता क्रीडां चक्रे कृत्रिमपुत्रकैः।<br>कदाचिद्गन्धतैलेन गात्रमभ्यज्य शैलजा॥ ५०१ | तब वे सखियोंके साथ कृत्रिम पुत्र बनाकर क्रीडा करने लगीं। किसी समय पार्वतींने सुगन्धित तेलसे शरीरको मलकर उसके मैल | | चूर्णैरुद्वर्तयामास मलिनान्तरितां तनुम्।<br>तदुद्वर्तनकं गृह्य नरं चक्रे गजाननम्॥ ५०२ | जमे हुए अङ्गोंमें चूर्णका उबटन भी लगाया। फिर उस लेपनको इकट्ठाकर उससे हाथीके-से मुखवाले पुरुषकी आकृतिका निर्माण किया। | | पुत्रकं क्रीडती देवी तं चाक्षिपयदम्भसि।<br>जाह्नव्यास्तु शिवासख्यास्ततः सोऽभूद् बृहद्वपुः॥ ५०३ | उसके साथ क्रीडा करनेके पश्चात् पार्वतीदेवीने उसे अपनी सखी जाह्नवीके जलमें डलवा दिया। वहाँ वह विशाल शरीरवाला हो गया और | | कायेनातिविशालेन जगदापूरयत्तदा।<br>पुत्रेत्युवाच तं देवी पुत्रेत्युचे च जाह्नवी॥ ५०४ | अपने उस अत्यन्त विशाल शरीरसे सारे जगत्को आच्छादित कर लिया। तब पार्वतीदेवीने उसे 'पुत्र' ऐसा कहा और उधर जाह्नवीने भी उसे 'पुत्र' कहकर पुकारा। | | गाङ्गेय इति देवैस्तु पूजितोऽभूद्गजाननः।<br>विनायकाधिपत्यं च ददावस्य पितामहः॥ ५०५ | अन्तमें वह गजानन 'गाङ्गेय' नामसे देवताओंद्वारा सम्मानित किया गया और ब्रह्माने उसे विनायकोंका आधिपत्य प्रदान किया। | | पुनः सा क्रीडनं चक्रे पुत्रार्थं वरवर्णिनी।<br>मनोज्ञमङ्कुरं रूढमशोकस्य शुभानना॥ ५०६<br>वर्धयामास तं चापि कृतसंस्कारमङ्गला।<br>बृहस्पतिमुखैर्विप्रैर्दिवस्पतिपुरोगमैः ॥ ५०७ | तत्पश्चात् सुन्दर मुखवाली सुन्दरी पार्वतींने पुनः पुत्रकी कामनासे अशोकके नये निकले हुए सुन्दर अङ्कुरको खिलौना बनाया और बृहस्पति आदि विप्रों तथा इन्द्र आदि देवताओंद्वारा अपना माङ्गलिक संस्कार कराकर उसे पाला-पोसा। | | ततो देवैश्च मुनिभिः प्रोक्ता देवी त्विदं वचः।<br>भवानि भवती भव्या सम्भूता लोकभूतये॥ ५०८ | यह देखकर देवताओं और मुनियोंने पार्वतीदेवीसे यह बात कही—'भवानि! आप तो परम सुन्दर रूपवाली हो और लोकके कल्याणके लिये प्रकट हुई हो। | | प्रायः सुतफलो लोकः पुत्रपौत्रैश्च लभ्यते।<br>अपुत्रा च प्रजाः प्रायो दृश्यन्ते दैवहेतुतः॥ ५०९ | प्रायः संसार पुत्ररूप फलका ही प्रेमी है और वह फल पुत्र-पौत्रोंद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जगत्में जो प्रजाएँ पुत्रहीन हैं, वे प्रायः प्रारब्धके कारण ही वैसा दीख पड़ती हैं। |

  • अध्याय १५४ * ६४३
अधुना दर्शिते मार्गे मर्यादां कर्तुमर्हसि।<br>फलं किं भविता देवि कल्पितैस्तरुपुत्रकैः।<br>इत्युक्ता हर्षपूर्णाङ्गी प्रोवाचोमा शुभां गिरम्॥ ५१०<br><br>देव्युवाच<br><br>एवं निरुदके देशे यः कूपं कारयेद् बुधः।<br>बिन्दौ बिन्दौ च तोयस्य वसेत् संवत्सरं दिवि॥ ५११<br><br>दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।<br>दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः।<br>एषैव मम मर्यादा नियता लोकभाविनी॥ ५१२<br><br>इत्युक्तास्तु ततो विप्रा बृहस्पतिपुरोगमाः।<br>जग्मुः स्वमन्दिराण्येव भवानीं वन्द्य सादरम्॥ ५१३<br><br>गतेषु तेषु देवोऽपि शङ्करः पर्वतात्मजाम्।<br>पाणिनाऽऽलम्ब्य वामेन शनैः प्रावेशयच्छुभाम्॥ ५१४<br><br>चित्तप्रसादजननं प्रासादमनुगोपुरम्।<br>लम्बमौक्तिकदामानं मालिकाकुलवेदिकम्॥ ५१५<br><br>निर्धौतकलधौतं च क्रीडागृहमनोरमम्।<br>प्रकीर्णकुसुमामोदमत्तालिकुलकूजितम् ॥ ५१६<br><br>किन्नरोद्गीतसङ्गीतगृहान्तरितभित्तिकम् ।<br>सुगन्धिधूपसङ्घातमनःप्रार्थ्यमलक्षितम् ॥५१७<br><br>क्रीडन्मयूरनारीभिर्वृतं वै ततवादिभिः।<br>हंससंघातसङ्घृष्टं स्फाटिकस्तम्भवेदिकम्॥ ५१८<br><br>अनारतमतिप्रीत्या बहुशः किन्नराकुलम्।<br>शुकैर्यत्राभिहन्यन्ते पद्मरागविनिर्मिताः॥५१९<br><br>भित्तयो दाडिमभ्रान्त्या प्रतिबिम्बितमौक्तिकाः।<br>तत्राक्षक्रीडया देवी विहर्तुमुपचक्रमे॥ ५२०<br><br>स्वच्छेन्द्रनीलभूभागे क्रीडने यत्र धिष्ठितौ।<br>वपुःसहायतां प्राप्तौ विनोदरसनिर्वृतौ॥ ५२१<br><br>एवं प्रक्रीडतोस्तत्र देवीशङ्करयोस्तदा।<br>प्रादुर्भवन्महाशब्दस्तद्गृहोदरगोचरः ॥५२२देवि! इस समय आप शास्त्रद्वारा प्रदर्शित मार्गकी मर्यादा निर्धारित करें। इन कल्पित तरुपुत्रकोंसे क्या लाभ उपलब्ध होगा?' ऐसा कही जानेपर उमाके अङ्ग हर्षसे पूर्ण हो गये, तब वे सुन्दर वाणीमें बोलीं ॥ ४९९—५१० ॥<br><br>पार्वतीदेवीने कहा—'विप्रवरो! इस प्रकारके जलरहित प्रदेशमें जो बुद्धिमान् पुरुष कुआँ बनवाता है, वह कुएँके जलके एक-एक बूँदके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। इस प्रकार दस कुएँके समान एक बावली, दस बावलीके सदृश एक सरोवर, दस सरोवरकी तुलनामें एक पुत्र और दस पुत्रके समान एक वृक्ष माना गया है। यही लोकोंका कल्याण करनेवाली मर्यादा है, जिसे मैं निर्धारित कर रही हूँ। इस प्रकार कहे जानेपर बृहस्पति आदि विप्रगण भवानीको आदरपूर्वक नमस्कार कर अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये। उन सबके चले जानेपर देवाधिदेव शङ्करने भी सुन्दरी पार्वतीको बायें हाथका सहारा देकर धीरे-धीरे अपने भवनमें प्रवेश कराया। चित्तको प्रसन्न करनेवाला वह भवन फाटकके निकट ही था। उसमें मोतियोंकी लम्बी-लम्बी झालरें लटक रही थीं, वेदिकाएँ पुष्पहारोंसे सुसज्जित थीं, तपाये हुए स्वर्णके मनोरम क्रीडागृह बने हुए थे, बिखरे हुए पुष्पोंकी सुगन्धसे उन्मत्त हुए भँवरे गुंजार कर रहे थे, किन्नरोंद्वारा गाये गये संगीतसे गृहकी भीतरी दीवाल प्रतिध्वनित हो रही थी, मनको अच्छी लगनेवाली सुगन्धित धूपोंकी भीनी सुगन्ध फैल रही थी। वह नाचती हुई मयूरियों तथा तारवाले बाजे बजानेवाले वादकोंसे व्याप्त था। वहाँ हंस-समूहोंकी ध्वनि गूँज रही थी, स्फटिकके खम्भोंसे युक्त वेदिकाएँ सुशोभित थीं, अधिकांश किन्नर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक निरन्तर उपस्थित रहते थे। उसमें पद्मराग मणिकी दीवालें बनी हुई थीं, जिनपर मोतियोंकी झलक पड़ रही थी, इस कारण अनारके भ्रमसे शुकसमूह उनपर अपने ठोरोंसे आघात कर रहे थे। ऐसे भवनमें पार्वतीदेवी द्यूतक्रीडाके माध्यमसे विहार करने लगीं। निर्मल इन्द्रनील मणिके बने हुए उस क्रीडा-स्थानपर क्रीडा करते हुए शिव-पार्वती विनोदके रसमें निमग्न हो परस्पर एक-दूसरेके शरीरकी सहायताको प्राप्त हुए॥ ५११—५२१॥<br><br>इस प्रकार वहाँ पार्वती और शंकरके क्रीडा करते समय उस गृहके भीतर महान् भयंकर शब्द प्रादुर्भूत हुआ।

१५६- कुसुमामोदिनी और पार्वतीकी गुप्त मन्त्रणा, पार्वतीका तपस्यामें निरत होना, आदि दैत्यका पार्वती-रूपमें शङ्करके पास जाना और मृत्युको प्राप्त होना तथा पार्वतीद्वारा वीरकको शाप

६४४ * मत्स्यपुराण *

Sanskrit ShlokaHindi Translation
तच्छ्रुत्वा कौतुकाद् देवी किमेतदिति शङ्करम्।<br>पप्रच्छ तं शुभतनुर्हरं विस्मयपूर्वकम्॥ ५२३<br>उवाच देवीं नैतत् ते दृष्टपूर्वं सुविस्मिते।<br>एते गणेशाः क्रीडन्ते शैलेऽस्मिन् मत्प्रियाः सदा॥ ५२४<br>तपसा ब्रह्मचर्येण नियमैः क्षेत्रसेवनैः।<br>यैरहं तोषितः पूर्वं त एते मनुजोत्तमाः॥ ५२५<br>मत्समीपमनुप्राप्ता मम हृद्याः शुभानने।<br>कामरूपा महोत्साहा महारूपगुणान्विताः॥ ५२६<br>कर्मभिर्विस्मयं तेषां प्रयामि बलशालिनाम्।<br>सामरस्यास्य जगतः सृष्टिसंहरणक्षमाः॥ ५२७<br>ब्रह्मविष्ण्विन्द्रगन्धर्वैः सकिन्नरमहोरगैः।<br>विवर्जितोऽप्यहं नित्यं नैभिर्विरहितो रमे॥ ५२८<br>हृद्या मे चारुसर्वाङ्गास्त एते क्रीडिता गिरौ।<br>इत्युक्ता तु ततो देवी त्यक्त्वा तद्विस्मयाकुला॥ ५२९<br>गवाक्षान्तरमासाद्य प्रेक्षते विस्मितानना।उसे सुनकर सुन्दर शरीरवाली पार्वतीदेवीने कुतूहलवश आश्चर्यपूर्वक भगवान् शंकरसे पूछा—'यह क्या हो रहा है?' तब शिवजीने पार्वतीसे कहा—'सुविस्मिते! तुमने पहले इसे नहीं देखा है। मेरे परम प्रिय ये गणेश्वर इस पर्वतपर सदा क्रीडा करते रहते हैं। शुभानने! जो लोग पहले तपस्या, ब्रह्मचर्य, नियमपालन और तीर्थसेवनद्वारा मुझे संतुष्ट कर चुके हैं, वे ही ये श्रेष्ठ पुरुष मेरे पास प्राप्त हुए हैं। ये मुझे परम प्रिय हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, महान् उत्साहसे सम्पन्न तथा अतिशय सौन्दर्य एवं गुणोंसे युक्त हैं। इन बलशालियोंके कार्योंसे तो मुझे भी परम विस्मय हो जाता है। ये देवताओंसहित इस जगत्की सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं। अतः ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, गन्धर्व, किंनर और प्रधान-प्रधान नागोंसे नित्य विलग रहनेपर भी मुझे कष्ट नहीं होता, परंतु इनसे वियुक्त होनेपर मुझे कभी आनन्द नहीं प्राप्त होता। इनके सभी अङ्ग अत्यन्त सुन्दर हैं और ये सभी मुझे परम प्रिय हैं। वे ही ये सब इस पर्वतपर क्रीडा कर रहे हैं।' इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने विस्मयसे व्याकुल हो द्यूतक्रीडा छोड़ दी और वे भौंचक्की-सी हो झरोखेमें बैठकर उनकी ओर देखने लगीं॥ ५२२—५२९ १/२ ॥
यावन्तस्ते कृशा दीर्घा ह्रस्वाः स्थूला महोदराः॥ ५३०<br>व्याघ्रेभवदनाः केचित् केचिन्मेषाजरूपिणः।<br>अनेकप्राणिरूपाश्च ज्वालास्याः कृष्णपिङ्गलाः॥ ५३१<br>सौम्या भीमाः स्मितमुखाः कृष्णपिङ्गजटासटाः।<br>नानाविहङ्गवदना नानाविधमृगाननाः॥ ५३२<br>कौशेयचर्मवसना नग्नाश्चान्ये विरूपिणः।<br>गोकर्णा गजकर्णाश्च बहुवक्त्रेक्षणोदराः॥ ५३३<br>बहुपादा बहुभुजा दिव्यनानाशस्त्रपाणयः।<br>अनेककुसुमापीडा नानाव्यालविभूषणाः॥ ५३४<br>वृत्ताननायुधधरा नानाकवचभूषणाः।<br>विचित्रवाहनारूढा दिव्यरूपा वियच्चराः॥ ५३५वे जितने थे, उनमें कुछ दुबले-पतले, लम्बे, छोटे और विशाल पेटवाले थे। किन्हींके मुख व्याघ्र और हाथीके समान थे तो कोई भेड़ और बकरेके-से रूपवाले थे। उनके रूप अनेकों प्राणियोंके सदृश थे। किन्हींके मुखसे ज्वाला निकल रही थी तो कोई काले एवं पीले रंगके थे। किन्हींके मुख सौम्य, किन्हींके भयंकर और किन्हींके मुसकानयुक्त थे। किन्हींके मस्तकपर काले एवं पीले रंगकी जटा बँधी थी। किन्हींके मुख नाना प्रकारके पक्षियोंके-से तथा किन्हींके मुख विभिन्न प्रकारके पशुओं-सदृश थे। किन्हींके शरीरपर रेशमी वस्त्र थे तो कोई वस्त्रके स्थानपर चमड़ा ही लपेटे हुए थे और कुछ नंगे ही थे। कुछ अत्यन्त कुरूप थे। किन्हींके कान गौ-सरीखे थे तो किन्हींके कान हाथी-जैसे थे। किन्हींके बहुत-से मुख, नेत्र और पेट थे तो किन्हींके बहुत-से पैर और भुजाएँ थीं। उनके हाथोंमें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र शोभा पा रहे थे। किन्हींके मस्तकोंपर नाना प्रकारके पुष्प बँधे हुए थे तो कोई अनेकविध सर्पोंके ही आभूषण धारण किये हुए थे। कोई गोल मुखवाले अस्त्र लिये हुए थे तो कोई विभिन्न प्रकारके कवचोंसे विभूषित थे। कुछ दिव्य रूपधारी थे और विचित्र वाहनोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचर रहे थे।
* अध्याय १५४ *६४५
वीणावाद्यमुखोद्घुष्टा नानास्थानकनर्तकाः ।<br>गणेशांस्तांस्तथा दृष्ट्वा देवी प्रोवाच शङ्करम् ॥ ५३६<br><br>देव्युवाच<br>गणेशाः कति संख्याताः किं नामानः किमात्मकाः ।<br>एकैकशो मम ब्रूहि धिष्ठिता ये पृथक् पृथक् ॥ ५३७कुछ मुखसे वीणा आदि बाजे बजा रहे थे और कुछ यत्र-तत्र नाच रहे थे। इस प्रकार उन गणेश्वरोंको देखकर पार्वतीदेवी शंकरजीसे बोलीं ॥ ५३०-५३६ ॥<br><br>देवीने पूछा— 'प्रभो ! इन गणेश्वरोंकी संख्या कितनी है ? इनके क्या-क्या नाम हैं ? इनके स्वभाव कैसे हैं ? ये जो पृथक्-पृथक् बैठे हैं, इनमेंसे मुझे एक-एकका परिचय दीजिये ॥ ५३७ ॥
शङ्कर उवाच<br>कोटिसंख्या ह्यसंख्याता नानाविख्यातपौरुषाः ।<br>जगदापूरितं सर्वैरेभिर्भीमैर्महाबलैः ॥ ५३८<br>सिद्धक्षेत्रेषु रथ्यासु जीर्णोद्यानेषु वेश्मसु ।<br>दानवानां शरीरेषु बालेषून्मत्तकेषु च ।<br>एते विशन्ति मुदिता नानाहारविहारिणः ॥ ५३९<br>ऊष्मपाः फेनपाश्चैव धूमपा मधुपायिनः ।<br>रक्तपाः सर्वभक्षाश्च वायुपा ह्यम्बुभोजनाः ॥ ५४०<br>गेयनृत्योपहाराश्च नानावाद्यरवप्रियाः ।<br>न ह्येषां वै अनन्तत्वाद् गुणान् वक्तुं हि शक्यते ॥ ५४१शंकरजी बोले— 'देवि! यों तो ये असंख्य हैं, परंतु प्रधान-प्रधान गणेश्वरोंकी संख्या एक करोड़ है। ये विभिन्न प्रकारके पुरुषार्थोंके लिये विख्यात हैं। इन सभी महाबली भयंकर गणोंसे सारा जगत् परिपूर्ण है। नाना प्रकारके आहार-विहारसे युक्त ये गणेश्वर हर्षपूर्वक सिद्ध क्षेत्रों, गलियों, पुराने उद्यानों, घरों, दानवोंके शरीरों, बालकों और पागलोंमें प्रवेश करते हैं। ये सभी ऊष्मा, फेन, धूम, मधु, रक्त और वायुका पान करनेवाले हैं। जल इनका भोजन है और ये सर्वभक्षी हैं। ये नाच-गानके उपहारसे प्रसन्न होनेवाले और अनेकों प्रकारके वाद्य-शब्दोंके प्रेमी हैं। अनन्त होनेके कारण इनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५३८-५४१ ॥
देव्युवाच<br>मार्गत्वगुत्तरासङ्गः शुद्धाङ्गो मुञ्जमेखली ।<br>वामस्थेन च शिक्येन चपलो रञ्जिताननः ॥ ५४२<br>मृगदंष्ट्रो ह्युत्पलानां स्रग्दामो मधुराकृतिः ।<br>पाषाणशकलोत्तानकांस्यतालप्रवर्तकः ॥ ५४३<br>असौ गणेश्वरो देवः किं नामा किंनरानुगः ।<br>य एष गणगीतेषु दत्तकर्णो मुहुर्मुहुः ॥ ५४४देवीने पूछा— 'स्वामिन् ! जो मृगचर्मका दुपट्टा लपेटे हुए हैं, जिसके सभी अङ्ग शुद्ध हैं; जो मूँजकी मेखला धारण किये हुए हैं, जिसके बायें कंधेपर झोली लटक रही है, जो अत्यन्त चञ्चल और रँगे हुए मुखवाला है, जिसकी दाढ़ सिंहके सदृश है, जो कमल-पुष्पोंकी माला धारण किये हुए, सुन्दर आकृतिसे युक्त और पाषाण-खण्डसे उत्तान रखे हुए काँसेके बाजेपर ताल लगा रहा है तथा जिसके पीछे किन्नर लोग चल रहे हैं और जो अन्य गणोंद्वारा गाये गये गीतोंपर बार-बार कान लगाये हुए हैं, उस गणेश्वर देवका क्या नाम है ? ॥ ५४२-५४४ ॥
शर्व उवाच<br>स एष वीरको देवि सदा मद्धृदयप्रियः ।<br>नानाश्चर्यगुणाधारो गणेश्वरगणार्चितः ॥ ५४५शंकरजीने कहा— देवि! यही वह वीरक है, जो सदा मेरे हृदयको प्रिय लगनेवाला है। यह नाना प्रकारके आश्चर्यजनक गुणोंका आश्रय तथा सभी गणेश्वरोंद्वारा पूजित—सम्मानित है ॥ ५४५ ॥
देव्युवाच<br>ईदृशस्य सुतस्यास्ति ममोत्कण्ठा पुरान्तक ।<br>कदाहमीदृशं पुत्रं द्रक्ष्याम्यानन्ददायिनम् ॥ ५४६देवीने पूछा— त्रिपुरनाशक भगवन्! मेरे मनमें ऐसा ही पुत्र प्राप्त करनेकी प्रबल उत्कण्ठा है। मैं कब ऐसे आनन्ददायक पुत्रको देखूँगी ? ॥ ५४६ ॥

६४६ * मत्स्यपुराण *

शर्व उवाचशिवजीने कहा—
शर्व उवाच<br>एष एव सुतस्तेऽस्तु नयनानन्दहेतुकः।<br>त्वया मात्रा कृतार्थस्तु वीरकोऽपि सुमध्यमे॥ ५४७<br>इत्युक्ता प्रेषयामास विजयां हर्षणोत्सुका।<br>वीरकानयनायाशु दुहिता हिमभूभृतः॥ ५४८<br>सावरुह्य त्वरायुक्ता प्रासादादम्बरस्पृशः।<br>विजयोवाच गणपं गणमध्ये प्रवर्तिता॥ ५४९<br>एहि वीरक चापल्यात् त्वया देवः प्रकोपितः।<br>किमुत्तरं वदत्यर्थे नृत्येरङ्गे तु शैलजा॥ ५५०<br>इत्युक्तस्त्यक्तपाषाणशकलो मार्जिताननः।<br>आहूतस्तु तयोद्भूतमूलप्रस्तावशंसकः॥ ५५१<br>देव्याः समीपमागच्छद् विजयानुगतः शनैः।<br>प्रासादशिखरात्फुल्लरक्ताम्बुजनिभद्युतिः॥ ५५२<br>तं दृष्ट्वा प्रस्रुतानल्पस्वादुक्षीरपयोधरा।<br>गिरिजोवाच सस्नेहं गिरा मधुरवर्णया॥ ५५३**शिवजीने कहा—**सुमध्यमे! नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाला यह वीरक ही तुम्हारा पुत्र हो और वीरक भी तुम-जैसी माताको पाकर कृतार्थ हो जाय। इस प्रकार कही जानेपर पर्वतराजकी कन्या पार्वतीने हर्षसे उत्सुक होकर तुरंत ही वीरकको बुला लानेके लिये विजयाको भेजा। तब विजया शीघ्र ही उस गगनचुम्बी अट्टालिकासे नीचे उतरकर गणोंके मध्यमें पहुँची और गणेश्वर वीरकसे बोली—'वीरक! यहाँ आओ, तुम्हारी चञ्चलतासे भगवान् शंकर क्रुद्ध हो गये हैं। तुम्हारे इस नाच-रंगके विषयमें माता पार्वती भी देखो क्या कहती हैं।' विजयाके ऐसा कहनेपर वीरकने पाषाणखण्डको फेंक दिया और वह अपने मुखको धोकर माताद्वारा बुलाये जानेके मूल कारणके विषयमें सोचता हुआ विजयाके पीछे-पीछे पार्वतीदेवीके निकट आया। खिले हुए लाल कमलपुष्पकी-सी कान्तिवाली पार्वतीने अट्टालिकाके शिखरपरसे जब वीरकको आते हुए देखा तो उनके स्तनोंसे अधिक मात्रामें स्वादिष्ट दूध टपकने लगा। तब गिरिजा स्नेहपूर्वक मधुर वाणीमें वीरकसे बोलीं॥ ५४७–५५३॥
उमोवाच<br>एह्येहि यातोऽसि मे पुत्रतां<br>देवदेवेन दत्तोऽधुना वीरक।<br>इत्येवमङ्के निधायाथ तं पर्यचुम्बत्<br>कपोले शनैः कलवादिनम्॥ ५५४<br>मूर्ध्यापाघ्राय सम्मार्ज्य गात्राणि<br>ते भूषयामास दिव्यैः स्रजैर्भूषणैः।<br>किङ्किणीमेखलानूपुरै-<br>र्माणिक्यकेयूरहारोरुमूलगुणैः ॥ ५५५<br>कोमलैः पल्लवैश्चित्रितैश्चारुभि-<br>र्दिव्यमन्त्रोद्भवैस्तस्य शुभ्रैस्ततो<br>भूरिभिश्चाकरोन्मिश्र-<br>सिद्धार्थकै रङ्गरक्षाविधिम् ॥ ५५६<br>एवमादाय चोवाच कृत्वा स्रजं<br>मूर्ध्नि गोरोचनापत्रभङ्गोञ्ज्वलैः॥ ५५७<br>गच्छ गच्छाधुना क्रीड सार्धं गणै-<br>रप्रमत्तो वस शुभ्रवर्जी शनै-**उमाने कहा—**वीरक! आओ, यहाँ आओ, देवाधिदेवने तुम्हें मुझे प्रदान किया है। अब तुम मेरे पुत्रस्वरूप हो गये हो। ऐसा कहकर माता पार्वती वीरकको अपनी गोदमें बैठाकर उस मधुरभाषी पुत्रके कपोलोंका चुम्बन करने लगीं। उन्होंने उसका मस्तक सूँघकर शरीरके सभी अङ्गोंको नहलाकर स्वच्छ किया। फिर किंकिणी, कटिसूत्र, नूपुर, मणिनिर्मित केयूर, हार और ऊरुमूलगुण (कच्छी) आदि दिव्य आभूषणोंसे उसे स्वयं विभूषित किया। तत्पश्चात् अत्यन्त सुन्दर विचित्र रंगके कोमल पल्लवों, दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित अनेकों माङ्गलिक सूक्तों तथा अनेक धातुओंके चूर्णोंसे मिश्रित सफेद सरसोंसे उसके अङ्गोंकी रक्षाका विधान किया। इस प्रकार उसे गोदमें लेकर मुखपर गोरोचनसे उज्ज्वल पत्रभंगीकी रचना करके उसके मस्तकपर माला डालकर कहा—'बेटा! अब जाओ और अपने साथी गणोंके साथ सावधान होकर खेलो। उनके साथ कपटरहित होकर निवास करो।