मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ७२० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| अब्भक्षा वायुभक्षाश्च दन्तोलूखलिनस्तथा।<br>अश्मकुट्टा दशतपाः पञ्चातपसहाश्च ये॥ ३५<br>एते तपसि तिष्ठन्ति व्रतैरपि सुदुष्करैः।<br>ब्रह्मचर्यं पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ति परां गतिम्॥ ३६<br>ब्रह्मचर्याद् ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते।<br>एवमाहुः परे लोके ब्रह्मचर्यविदो जनाः॥ ३७<br>ब्रह्मचर्ये स्थितं धैर्यं ब्रह्मचर्ये स्थितं तपः।<br>ये स्थिता ब्रह्मचर्ये तु ब्राह्मणास्ते दिवि स्थिताः॥ ३८<br>नास्ति योगं विना सिद्धिर्न वा सिद्धिं विना यशः।<br>नास्ति लोके यशोमूलं ब्रह्मचर्यात् परं तपः॥ ३९<br>यो निगृह्येन्द्रियग्रामं भूतग्रामं च पञ्चकम्।<br>ब्रह्मचर्येण वर्तेत किमतः परमं तपः॥ ४० | जो लोग केवल जल पीकर, वायुका आहार कर, दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेकर, पत्थरपर कुटे हुए पदार्थोंको खाकर, दस या पाँच स्थानोंपर अग्नि जलाकर उनके मध्यमें बैठकर तपस्या करनेवाले हैं तथा सुदुष्कर व्रतोंका पालन करते हुए तपस्यामें निरत हैं, वे लोग भी ब्रह्मचर्यको प्रधान मानकर परम गतिको प्राप्त होते हैं। परलोकमें ब्रह्मचर्यके महत्त्वको जाननेवाले लोग ऐसा कहते हैं कि ब्रह्मचर्यके पालनसे ब्राह्मणको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है। ब्रह्मचर्यमें धैर्य स्थित है, ब्रह्मचर्यमें तप स्थित है तथा जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यमें स्थित रहते हैं, वे मानो स्वर्गमें स्थित हैं। लोकमें योगके बिना सिद्धि और सिद्धिके बिना यशकी प्राप्ति नहीं हो सकती तथा यशःप्राप्तिका मूल कारण परम तप ब्रह्मचर्यके बिना नहीं हो सकता। जो इन्द्रियसम्मूह और पञ्चमहाभूतोंको वशमें करके ब्रह्मचर्यका पालन करता है, उसके लिये इससे बढ़कर और कौन-सा तप हो सकता है? अर्थात् कोई नहीं॥ ३१—४०॥ |
| अयोगे केशधारणमसंकल्पे व्रतक्रिया।<br>अब्रह्मचर्या चर्या च त्रयं स्याद् दम्भसंज्ञकम्॥ ४१<br>क्व दाराः क्व च संयोगः क्व च भावविपर्ययः।<br>नन्वियं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा॥ ४२<br>यद्यस्ति तपसो वीर्यं युष्माकं विदितात्मनाम्।<br>सृजध्वं मानसान् पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा॥ ४३<br>मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विभिः।<br>न दारयोगो बीजं वा व्रतमुक्तं तपस्विनाम्॥ ४४<br>यदिदं लुप्तधर्मार्थं युष्माभिरिह निर्भयैः।<br>व्याहृतं सद्भिरत्यर्थमसद्भिरिव मे मतम्॥ ४५<br>वपुर्दीप्तान्तरात्मानमेतत् कृत्वा मनोमयम्।<br>दारयोगं विना स्रक्ष्ये पुत्रमात्मतनूरुहम्॥ ४६<br>एवमात्मानमात्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति।<br>वन्येनानेन विधिना दिधिक्षन्तमिव प्रजाः॥ ४७<br>ऊर्वस्तु तपसाविष्टो निवेश्योरुं हुताशने।<br>ममन्थैकेन दर्भेण सुतस्य प्रभवारणिम्॥ ४८<br>तस्योरुं सहसा भित्त्वा ज्वालामाली ह्यनिन्धनः।<br>जगतो दहनाकाङ्क्षी पुत्रोऽग्निः समपद्यत॥ ४९ | 'योगाभ्यासके बिना जटा धारण करना, संकल्पके बिना व्रताचरण और ब्रह्मचर्य-हीन दशामें नियमोंका पालन—ये तीनों दम्भ कहे जाते हैं। कहाँ स्त्री, कहाँ स्त्री-संयोग और कहाँ स्त्री-पुरुषका भाव-परिवर्तन? परंतु इन सबके अभावमें ही ब्रह्माने इस सृष्टिको मनसे उत्पन्न की है और सारी प्रजाएँ भी मनसे ही प्रादुर्भूत हुई हैं। इसलिये आत्मज्ञानी आपलोगोंमें यदि तपस्याका बल है तो प्रजापतिके कर्मानुसार आपलोग भी मानसिक पुत्रोंकी सृष्टि कीजिये। तपस्वियोंको मानसिक संकल्पद्वारा योनिका निर्माण कर उसमें आधान करना चाहिये। उनके लिये स्त्री-संयोग, बीज और व्रत आदिका विधान नहीं है। आपलोगोंने मेरे सामने निर्भय होकर जो यह धर्म और अर्थसे हीन वचन कहा है, यह सत्पुरुषोंद्वारा अत्यन्त गर्हित है। मेरे विचारसे तो यह अज्ञानियोंकी उक्ति-जैसा है। मैं अपने इस उद्दीप्त अन्तरात्मावाले शरीरको मनोमय करके स्त्री-संयोगके बिना ही अपने शरीरसे पुत्रकी सृष्टि करूँगा। इस प्रकार मेरा आत्मा इस वन्य (वानप्रस्थ) विधिके अनुसार प्रजाओंको जला देनेवाले दूसरे आत्मा (पुत्र)-को उत्पन्न करेगा।' तत्पश्चात् ऊर्वने तपस्यामें संलग्न होकर अपनी जाँघको अग्निमें डालकर पुत्रकी उत्पत्तिके लिये एक कुशसे अरणि-मन्थन किया। तब सहसा उनकी जाँघका भेदन कर इन्धनरहित होनेपर भी ज्वालाओंसे युक्त अग्नि जगत्को जला देनेकी इच्छासे पुत्ररूपमें प्रकट हुआ। |
| * अध्याय १७५ * | ७२१ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| ऊर्वस्योरुं विनिर्भिद्य और्वो नामान्तकोऽनलः।<br>दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीञ्जज्ञे परमकोपनः॥ ५०<br>उत्पन्नमात्रश्चोवाच पितरं क्षीणया गिरा।<br>क्षुधा मे बाधते तात जगद् भक्ष्ये त्यजस्व माम्॥ ५१<br>त्रिदिवारोहिभिर्ज्वालैर्जृम्भमाणो दिशो दश।<br>निर्दहन् सर्वभूतानि ववृधे सोऽन्तकोऽनलः॥ ५२<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा मुनिमूर्वं समाजयन्।<br>उवाच वार्यतां पुत्रो जगतश्च दयां कुरु॥ ५३<br>अस्यापत्यस्य ते विप्र करिष्ये स्थानमुत्तमम्।<br>तथ्यमेतद्वचः पुत्र शृणु त्वं वदतां वर॥ ५४ | इस प्रकार ऊर्वकी जाँघका भेदन कर वह और्व नामक विनाशकारी अग्नि उत्पन्न हुआ, जो परम क्रोधी और तीनों लोकोंको जला डालना चाहता था। उत्पन्न होते ही उसने मन्द स्वरमें पितासे कहा—'तात! मुझे भूख कष्ट दे रही है, अतः मुझे छोड़िये। मैं जगत्को खा जाऊँगा।' ऐसा कहकर वह विनाशकारी और्व अग्नि स्वर्गतक पहुँचनेवाली ज्वालाओंसे युक्त हो दसों दिशाओंमें फैलकर समस्त प्राणियोंको भस्म करते हुए बढ़ने लगा। इसी बीच ब्रह्मा ऊर्व मुनिके निकट आये और उन्हें आदर देते हुए बोले—'विप्रवर! तुम मेरी बात तो सुनो। अपने पुत्रको मना कर दो, जगत्पर दया तो करो। मैं तुम्हारे इस पुत्रको उत्तम स्थान प्रदान करूँगा। वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! मेरी यह बात एकदम सच है'॥ ४१—५४॥ |
| ऊर्व उवाच<br>धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मेऽद्य भगवाञ्शिशोः।<br>मतिमेतां ददातीह परमानुग्रहाय वै॥ ५५<br>प्रभातकाले सम्प्राप्ते काङ्क्षितव्ये समागमे।<br>भगवंस्तर्पितः पुत्रः कैर्हव्यैः प्राप्स्यते सुखम्॥ ५६<br>कुत्र चास्य निवासः स्याद् भोजनं वा किमात्मकम्।<br>विधास्यतीह भगवान् वीर्यतुल्यं महौजसः॥ ५७ | ऊर्व बोले— भगवन्! आज मैं धन्य हो गया। आपने मुझपर महान् अनुग्रह किया, जो मेरे पुत्रके लिये इस प्रकारकी बुद्धि दे रहे हैं। यह आपका मुझपर परम अनुग्रह है। किंतु प्रातःकाल होनेपर जब वह पुत्र मेरे पास आयेगा तब मैं उसे किन पदार्थोंसे तृप्त करूँगा, जिससे उसे सुख प्राप्त हो सकेगा? इसका निवासस्थान कहाँ होगा? और इसका भोजन किस प्रकारका होगा? (मुझे आशा है कि) आप इस महान् तेजस्वीके पराक्रमके अनुरूप ही सब विधान करेंगे॥ ५५—५७॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>वडवामुखेऽस्य वसतिः समुद्रे वै भविष्यति।<br>मम योनिर्जलं विप्र तस्य पीतवतः सुखम्॥ ५८<br>यत्राहमास नियतं पिबन् वारिमयं हविः।<br>तद्धविस्तव पुत्रस्य विसृजाम्यालयं च तत्॥ ५९<br>ततो युगान्ते भूतानामेष चाहं च पुत्रक।<br>सहितौ विचरिष्यावो निष्पुत्राणामृणापहः॥ ६०<br>एषोऽग्निरन्तकाले तु सलिलाशी मया कृतः।<br>दहनः सर्वभूतानां सदेवासुररक्षसाम्॥ ६१<br>एवमस्त्विति तं सोऽग्निः संवृतज्वालमण्डलः।<br>प्रविवेशार्णवमुखं प्रक्षिप्य पितरि प्रभाम्॥ ६२<br>प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ये च सर्वे महर्षयः।<br>और्वस्याग्नेः प्रभां ज्ञात्वा स्वां स्वां गतिमुपाश्रिताः॥ ६३ | ब्रह्माने कहा— विप्रवर! समुद्रमें स्थित बड़वाके मुखमें इसका निवास होगा और मेरे उत्पत्तिस्थानभूत जलको यह सुखपूर्वक पान करेगा। जहाँ मैं जलमय हविका पान करता हुआ नियत रूपसे निवास करता हूँ, वही हवि और वही स्थान मैं तुम्हारे पुत्रके लिये भी दे रहा हूँ। पुत्र! तत्पश्चात् युगान्तके समय यह और मैं—दोनों एक साथ होकर पुत्रहीन प्राणियोंको पितृ-ऋणसे मुक्त करते हुए विचरण करेंगे। इस प्रकार मैंने इस अग्निको जलभक्षी तथा अन्तकालमें देवता, असुर और राक्षसोंसहित समस्त प्राणियोंको दग्ध कर देनेवाला बना दिया। यह सुनकर ऊर्वने 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर ब्रह्म-वाणीका अनुमोदन किया। तदुपरान्त ज्वालामण्डलसे घिरा हुआ वह अग्नि अपनी कान्तिको पिता ऊर्वमें निहित कर समुद्रके मुखमें प्रविष्ट हो गया। इसके बाद ब्रह्मा ब्रह्मलोकको चले गये और वहाँ उपस्थित सभी महर्षि और्व अग्निकी प्रभाका महत्त्व जानकर अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ५८—६३॥ |
७२२ | * मत्स्यपुराण *
| हिरण्यकशिपुर्दृष्ट्वा तदा तन्महदद्भुतम्।<br>उच्चैः प्रणतसर्वाङ्गो वाक्यमेतदुवाच ह॥ ६४<br><br>भगवन्नद्भुतमिदं संवृत्तं लोकसाक्षिकम्।<br>तपसा ते मुनिश्रेष्ठ परितुष्टः पितामहः॥ ६५<br><br>अहं तु तव पुत्रस्य तव चैव महाव्रत।<br>भृत्य इत्यवगन्तव्यः साध्यो यदिह कर्मणा॥ ६६<br><br>तन्मां पश्य समापन्नं तवैवाराधने रतम्।<br>यदि सीदेन्मुनिश्रेष्ठ तवैव स्यात्पराजयः॥ ६७<br><br>ऊर्व उवाच<br><br>धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य तेऽहं गुरुः स्थितः।<br>नास्ति मे तपसानेन भयमद्येह सुव्रत॥ ६८<br><br>तामेव मायां गृह्णीष्व मम पुत्रेण निर्मिताम्।<br>निरिन्धनामग्निमयीं दुर्धर्षां पावकैरपि॥ ६९<br><br>एषा ते स्वस्य वंशस्य वशगारिविनिग्रहे।<br>संरक्ष्यत्यात्मपक्षं च विपक्षं च प्रधर्षति॥ ७०<br><br>एवमस्त्विति तां गृह्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ।<br>जगाम त्रिदिवं हृष्टः कृतार्थो दानवेश्वरः॥ ७१<br><br>एषा दुर्विषहा माया देवैरपि दुरासदा।<br>और्वेण निर्मिता पूर्वे पावकेनोर्वसूनुना॥ ७२<br><br>तस्मिंस्तु व्युत्थिते दैत्ये निर्वीर्येषा न संशयः।<br>शापो ह्यस्याः पुरा दत्तः सृष्टा येनैव तेजसा॥ ७३<br><br>यद्येषा प्रतिहन्तव्या कर्तव्यो भगवान् सुखी।<br>दीयंतां मे सखा शक्र तोययोनिर्निशाकरः॥ ७४<br><br>तेनाहं सह संगम्य यादोभिश्च समावृतः।<br>मायामेतां हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्न संशयः॥ ७५ | तदनन्तर उस महान् अद्भुत प्रसङ्गको देखकर हिरण्यकशिपु ऊर्व मुनिको साष्टाङ्ग प्रणामकर उच्चस्वरसे इस प्रकार बोला—'भगवन्! यह तो अत्यन्त अद्भुत घटना घटित हुई। सारा जगत् इसका साक्षी है। मुनिश्रेष्ठ! आपकी तपस्यासे पितामह ब्रह्मा संतुष्ट हो गये हैं। महाव्रत! आप ऐसा समझिये कि मैं आपका तथा आपके पुत्रका भृत्य हूँ, अतः यहाँ जो कुछ कार्य हो, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये। मुझे अपना शरणागत समझिये। मैं आपकी ही आराधनामें निरत हूँ। मुनिश्रेष्ठ! इसपर भी यदि मैं कष्ट पाता हूँ तो यह आपकी ही पराजय होगी॥ ६४—६७॥<br><br>ऊर्वने कहा—सुव्रत! यदि मैं तुम्हारे गुरुके रूपमें स्थित हूँ तो मैं धन्य हो गया। तुमने मुझपर महान् अनुग्रह किया। अब तुम्हें मेरी इस तपस्याके बलसे जगत्में किसी प्रकारका भय नहीं है। इसके लिये तुम मेरे पुत्रद्वारा निर्मित उसी मायाको ग्रहण करो, जो इन्धनरहित होनेपर भी अग्निमयी और अग्नियोंद्वारा भी दुर्धर्ष है। शत्रुओंका निग्रह करते समय यह माया तुम्हारे निजी वंशके वशमें रहेगी। यह आत्मपक्षका संरक्षण और विपक्षका विनाश करेगी। यह सुनकर दानवेश्वर हिरण्यकशिपुने 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर उस मायाको ग्रहणकर मुनिश्रेष्ठ ऊर्वको प्रणाम किया और वह कृतार्थ होकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गको चला गया। (वरुण कहते हैं—) यह वही माया है, जो असह्य और देवताओंके लिये भी दुर्गम्य है। इसे पूर्वकालमें ऊर्वके पुत्र और्व अग्निने निर्मित किया था। उस हिरण्यकशिपु दैत्यके मर जानेपर निःसंदेह यह माया शक्तिहीन हो जायगी; क्योंकि यह जिसके तेजसे उत्पन्न हुई थी, उन ऊर्व ऋषिने इसे पहले ही ऐसा शाप दे रखा है। अतः शक्र! यदि आप इसका विनाश करके सबको सुखी करना चाहते हैं तो जलके उत्पत्तिस्थान चन्द्रमाको मुझे सखारूपमें प्रदान कीजिये। जल-जन्तुओंसे घिरा हुआ मैं उनके साथ रहकर आपकी कृपासे इस मायाको नष्ट कर डालूँगा—इसमें संशय नहीं है॥ ६८—७५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७५॥
| * अध्याय १७६ * | ७२३ |
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एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय
चन्द्रमाकी सहायतासे वरुणद्वारा और्वाग्नि-मायाका प्रशमन, मयद्वारा शैली-मायाका प्राकट्य, भगवान् विष्णुके आदेशसे अग्नि और वायुद्वारा उस मायाका निवारण तथा कालनेमिका रणभूमिमें आगमन
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**देवताओंकी वृद्धि करनेवाले इन्द्र परम प्रसन्न हुए और 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर सर्वप्रथम शीतायुध चन्द्रमाको युद्धके लिये आदेश देते हुए बोले—'सोम ! आप जाइये और असुरोंके विनाश तथा देवताओंकी विजयके निमित्त पाशधारी वरुणकी सहायता कीजिये। आप मुझसे भी बढ़कर पराक्रमी और ज्योतिर्गणोंके अधीश्वर हैं। रसज्ञ लोग सम्पूर्ण लोकोंमें जितने रस हैं, उन्हें आपसे ही युक्त मानते हैं। आपके मण्डलमें सागरकी तरह क्षय और वृद्धि स्पष्टरूपसे होती रहती है। आप जगत्में कालका योग करते हुए दिन-रातका परिवर्तन करते रहते हैं। आपका चिह्न लोककी छायासे युक्त है। आप मृगलाञ्छन हैं। सोम ! जो नक्षत्रोंके उत्पत्तिकर्ता हैं, वे देवता भी आपकी महिमाको नहीं जानते। आप सूर्यके मार्गसे ऊपर सभी ज्योतिर्गणोंके ऊपरी भागमें स्थित हैं और अपने तेजसे अन्धकारको दूर कर सम्पूर्ण जगत्को उद्भासित करते हैं। आप श्वेतभानु, हिमतनु, ज्योतियोंके अधीश्वर, शशलाञ्छन, कालयोंग-स्वरूप, अग्निहोत्र-वेदाध्ययन आदि कर्मरूप, यज्ञके परिणामभूत, अविनाशी, ओषधियोंके स्वामी, कर्मके उत्पादक, शिवजीके मस्तकपर स्थित, शीतल किरणोंवाले, अमृतके आश्रयस्थान, चञ्चल और श्वेतवाहन हैं। आप ही सौन्दर्यशाली व्यक्तियोंके सौन्दर्य हैं और आप ही सोमपान करनेवालोंके लिये सोम हैं। आपका स्वभाव समस्त प्राणियोंके लिये सौम्य है। आप अन्धकारके विनाशक और नक्षत्रोंके स्वामी हैं। इसलिये महासेन ! आप कवचधारी वरुणके साथ जाइये और उस आसुरी मायाको शान्त कीजिये, जिससे हमलोग युद्धस्थलमें जल रहे हैं'॥ १—१०॥ |
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| एवमस्त्विति संहृष्टः शक्रस्त्रिदशवर्धनः।<br>संदिदेशाग्रतः सोमं युद्धाय शिशिरायुधम्॥ १<br>गच्छ सोम सहायत्वं कुरु पाशधरस्य वै।<br>असुराणां विनाशाय जयार्थं च दिवौकसाम्॥ २<br>त्वं मत्तः प्रतिवीर्यश्च ज्योतिषां चेश्वरेश्वरः।<br>त्वन्मयं सर्वलोकेषु रसं रसविदो विदुः॥ ३<br>क्षयवृद्धी तव व्यक्ते सागरस्येव मण्डले।<br>परिवर्तस्यहोरात्रं कालं जगति योजयन्॥ ४<br>लोकच्छायामयं लक्ष्म तवाङ्कः शशसंनिभः।<br>न विदुः सोम देवापि ये च नक्षत्रयोनयः॥ ५<br>त्वमादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपरि स्थितः।<br>तमः प्रोत्सार्य महसा भासयस्यखिलं जगत्॥ ६<br>श्वेतभानुर्हिमतनुर्ज्योतिषामधिपः शशी।<br>अधिकृत्कालयोगात्मा इष्टो यज्ञरसोऽव्ययः॥ ७<br>ओषधीशः क्रियायोनिर्हरशेखरभाक् तथा।<br>शीतांशुरामृताधारश्चपलः श्वेतवाहनः॥ ८<br>त्वं कान्तिः कान्तिवपुषां त्वं सोमः सोमपायिनाम्।<br>सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट्॥ ९<br>तद् गच्छ त्वं महासेन वरुणेन वरूथिना।<br>शमय त्वासुरीं मायां यया दह्याम संयुगे॥ १० | |
| सोम उवाच | **सोमने कहा—**वरदायक देवराज! यदि आप मुझे युद्धके लिये आदेश देते हैं तो मैं अभी दैत्योंकी मायाका विनाश करनेवाले शिशिरकी वर्षा करता हूँ। |
| यन्मां वदसि युद्धार्थे देवराज वरप्रद।<br>एष वर्षामि शिशिरं दैत्यमायापकर्षणम्॥ ११ |
१७८- कालनेमि और भगवान् विष्णुका रोषपूर्वक वार्तालाप और भीषण युद्ध, विष्णुके चक्रके द्वारा कालनेमिका वध और देवताओंको पुनः निज पदकी प्राप्ति
७२४ * मत्स्यपुराण *
| एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य त्वं हिमवेष्टितान्।<br>विमायान् विमदांश्चैव दैत्यसिंहान् महाहवे॥ १२<br><br>तेषां हिमकरोत्सृष्टाः सपाशा हिमवृष्टयः।<br>वेष्टयन्ति स्म तान् घोरान् दैत्यान् मेघगणा इव॥ १३<br><br>तौ पाशशीतांशुधरौ वरुणेन्दू महाबलौ।<br>जघ्नतुर्हिमपातैश्च पाशपातैश्च दानवान्॥ १४<br><br>द्वावम्बुनाथौ समरे तौ पाशहिमयोधिनौ।<br>मृधे चेरतुरम्भोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ॥ १५<br><br>ताभ्यामाप्लावितं सैन्यं तद्दानवमदृश्यत।<br>जगत्संवर्तकाम्भोदैः प्रविष्टैरिव संवृतम्॥ १६<br><br>तावुद्यताम्बुनाथौ तु शशाङ्कवरुणावुभौ।<br>शमयामासतुर्मायां देवौ दैत्येन्द्रनिर्मिताम्॥ १७<br><br>शीतांशुजालनिर्दग्धाः पाशैश्च स्पन्दिता रणे।<br>न शेकुश्चलितुं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः॥ १८<br><br>शीतांशुनिहतास्ते तु दैत्यास्तोयहिमार्दिताः।<br>हिमाप्लावितसर्वाङ्गा निरुष्माण इवाग्नयः॥ १९<br><br>तेषां तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि वै।<br>विमानानि विचित्राणि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥ २०<br><br>तान् पाशहस्तग्रथितांश्छादिताञ्शीतरश्मिभिः।<br>मयो ददर्श मायावी दानवान् दिवि दानवः॥ २१<br><br>स शिलाजालविततां खड्गचर्माट्टहासिनीम्।<br>पादपोत्कटकूटाग्रां कन्दराकीर्णकाननाम्॥ २२<br><br>सिंहव्याघ्रगणाकीर्णां नदद्भिर्गजयूथपैः।<br>ईहामृगगणाकीर्णां पवनाघूर्णितद्रुमाम्॥ २३<br><br>निर्मितां स्वेन यत्नेन कूजितां दिवि कामगाम्।<br>प्रथितां पार्वतीं मायामसृजत् स समन्ततः॥ २४<br><br>सासिशब्दैः शिलावर्षैः सम्पतद्द्भिश्च पादपैः।<br>जघान देवसङ्घांश्च दानवांश्चाप्यजीवयत्॥ २५ | आप इस भीषण युद्धमें मेरे द्वारा प्रयुक्त किये गये शीतसे जले हुए, हिमपरिवेष्टित, माया और गर्वसे रहित इन दैत्यसिंहोंको देखिये। फिर तो वरुणके पाशसहित चन्द्रमाद्वारा छोड़ी गयी हिमवृष्टिने उन भयंकर दैत्योंको मेघसमूहकी तरह घेर लिया। वे दोनों महाबली पाशधारी वरुण और शीतांशु चन्द्रमा पाश और हिमके प्रहारसे दानवोंका संहार करने लगे। वे दोनों जलके स्वामी और समरमें पाश एवं हिमके द्वारा युद्ध करनेवाले थे, अतः वे रणभूमिमें जलसे क्षुब्ध हुए दो महासागरकी भाँति विचरण करने लगे। उन दोनोंके द्वारा जलमग्न की गयी हुई दानवोंकी वह सेना उमड़े हुए संवर्तक नामक बादलोंसे आच्छादित जगत्की तरह दीख रही थी। इस प्रकार जलके स्वामी उन दोनों देवता चन्द्रमा और वरुणने दैत्येन्द्रद्वारा निर्मित मायाको शान्त कर दिया। रणभूमिमें शीतल किरणसमूहोंसे जले हुए तथा पाशोंसे जकड़े हुए दैत्यगण शिखररहित पर्वतोंकी तरह चलनेमें भी असमर्थ हो गये। शीतांशुके आघातसे उन दैत्योंके सर्वाङ्ग हिमसे आप्लावित हो गये और वे जलकी ठण्डकसे ठिठुर गये। इस प्रकार वे गरमीरहित अग्निकी तरह दीख रहे थे। आकाशमण्डलमें विचरनेवाले उन दैत्योंके विचित्र विमानोंकी कान्ति विपरीत हो गयी और वे लड़खड़ाकर गिरने-पड़ने लगे॥ ११–२०॥<br><br>इस प्रकार जब मायावी मयदानवने आकाशमें उन दानवोंको वरुणके पाशद्वारा बँधे हुए तथा शीतल किरणोंद्वारा आच्छादित देखा, तब उसने चारों ओर सुप्रसिद्ध पार्वती मायाकी सृष्टि की, जो शिलासमूहसे व्याप्त तथा ढाल-तलवारसे युक्त हो अट्टहास करनेवाली थी, जिसका अग्रभाग घने वृक्षोंसे आच्छादित होनेके कारण भयंकर था, जो कन्दराओंसे व्याप्त काननोंसे युक्त, सिंहों, व्याघ्रों, चिग्घाड़ते हुए गजयूथों और भेड़ियोंसे परिपूर्ण थी, जिसके वृक्ष वायुके झकोरेसे चक्कर काट रहे थे, जो अपने ही प्रयत्नसे निर्मित, घोर शब्द करनेवाली और आकाशमें स्वेच्छानुसार गमन करनेवाली थी। वह पार्वती-माया तलवारोंकी खनखनाहट, शिलाओंकी वृष्टि और गिरते हुए वृक्षोंसे देवसमूहोंका संहार करने लगी। उधर उसने दानवोंको जीवित भी कर दिया। |
* अध्याय १७६ * ७२५
| नैशाकरी वारुणी च मायेऽन्तर्दधतुस्ततः।<br>असिभिश्चायसगणैः किरन् देवगणान् रणे॥ २६<br><br>साश्मयन्त्रायुधघना द्रुमपर्वतसङ्कटा।<br>अभवद् घोरसंचारा पृथिवी पर्वतैरिव॥ २७<br><br>अश्मना प्रहताः केचिच्छिलाभिः शकलीकृताः।<br>नानिरुद्धो द्रुमगणैर्देवोऽदृश्यत कश्चन॥ २८<br><br>तदपध्वस्तधनुषं भग्नप्रहरणाविलम्।<br>निष्प्रयत्नं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम्॥ २९<br><br>स हि युद्धगतः श्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत।<br>सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुक्रोध गदाधरः॥ ३०<br><br>कालज्ञः कालमेघाभः समीक्ष्य कालमाहवे।<br>देवासुरविमर्दं तु द्रष्टुकामस्तदा हरिः॥ ३१ | उसके प्रभावसे चन्द्रमा और वरुणकी दोनों मायाएँ अन्तर्हित हो गयीं। वह दैत्य रणभूमिमें देवगणोंके ऊपर तलवारों और लोहनिर्मित अन्यान्य अस्त्रोंका प्रयोग कर रहा था। उसने रणभूमिको शिलाओं, यन्त्रों, अस्त्रों, वृक्षों और पर्वतोंसे ऐसा सघनरूपसे पाट दिया कि वहाँकी पृथ्वी पर्वतोंकी तरह चलने-फिरनेके लिये दुर्गम हो गयी। उस समय कुछ देवता पत्थरोंसे आहत कर दिये गये, कुछ शिलाओंकी मारसे खण्ड-खण्ड कर दिये गये तथा कोई भी देवता ऐसा नहीं दीख रहा था, जो वृक्षसमूहोंसे ढक न गया हो। इस प्रकार एकमात्र भगवान् गदाधरको छोड़कर देवताओंकी उस सेनाके धनुष छिन्न-भिन्न हो गये, अस्त्रसमूह नष्ट हो गये और वह प्रयत्नहीन हो गयी। शोभाशाली परमेश्वर गदाधर युद्धस्थलमें उपस्थित होनेपर भी विचलित नहीं हुए तथा सहनशील होनेके कारण उन जगदीश्वरको क्रोध भी नहीं आया। काले मेघकी-सी कान्तिवाले कालके ज्ञाता श्रीहरि रणभूमिमें देवताओं और असुरोंके युद्धको देखनेकी इच्छासे कालकी प्रतीक्षा करते हुए स्थित थे॥ २१—३१॥ | | ततो भगवता दृष्टो रणे पावकमारुतौ।<br>चोदितौ विष्णुवाक्येन तौ मायामपकर्षताम्॥ ३२<br><br>ताभ्यामुद्भ्रान्तवेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहवे।<br>दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह॥ ३३<br><br>सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुलः।<br>दैत्यसेनां ददहतुर्युगान्तेष्विव मूर्च्छितौ॥ ३४<br><br>वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निस्तु मारुतम्।<br>चेरतुर्दानवानीके क्रीडन्तावनिलानलौ॥ ३५<br><br>भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च।<br>दानवानां विमानेषु निपतत्सु समन्ततः॥ ३६<br><br>वातस्कन्धापविद्धेषु कृतकर्मणि पावके।<br>मायाबन्धे निवृत्ते तु स्तूयमाने गदाधरे॥ ३७<br><br>निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबन्धने।<br>सम्पहृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः॥ ३८<br><br>जये दशशताक्षस्य दैत्यानां च पराजये।<br>दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मविस्तरे॥ ३९<br><br>अपावृते चन्द्रमसि स्वस्थानस्थे दिवाकरे।<br>प्रकृतिस्थेषु लोकेषु त्रिषु चारित्रबन्धुषु॥ ४० | तदनन्तर रणभूमिमें भगवान्को अग्नि और वायु दीख पड़े। तब भगवान् विष्णुने उन्हें प्रेरित किया कि तुम दोनों इस मायाको नष्ट कर डालो। तब वृद्धिकी अन्तिम सीमापर पहुँचे हुए उन प्रचण्ड वेगशाली वायु और अग्निके प्रभावसे उस महासमरमें वह पार्वती माया जलकर भस्म हो गयी और सर्वथा नष्ट हो गयी। इसके बाद अग्निसे संयुक्त वायु और वायुसे संयुक्त अग्नि—दोनों पूरी शक्ति लगाकर युगान्तकी तरह दैत्यसेनाको भस्म करने लगे। आगे-आगे वायुदेव चलते थे, फिर वायुदेवके पीछे अग्निदेव चलते थे। इस प्रकार अग्नि और वायु उस दानव-सेनामें क्रीडा करते हुए विचरण कर रहे थे। दानवोंकी सेना जलती हुई इधर-उधर भागने लगी और विमान चारों ओर जलकर गिरने लगे। दानवोंके कंधे वायुसे अकड़ गये। इस प्रकार अग्निद्वारा अपना कर्म कर चुकनेपर मायाका बन्धन निवृत्त हो गया, भगवान् गदाधरकी स्तुति की जाने लगी, दैत्यगण प्रयत्नहीन हो गये, त्रिलोकी बन्धनसे मुक्त हो गयी, परम प्रसन्न हुए देवगण सब ओर 'ठीक है, ठीक हैं' ऐसा शब्द बोलने लगे। इन्द्रकी विजय और दैत्योंकी पराजय हो गयी, सभी दिशाएँ शुद्ध हो गयीं, धर्मका विस्तार होने लगा।' चन्द्रमाका आवरण हट गया, सूर्य अपने स्थानपर स्थित हो गये, तीनों लोक निश्चिन्त हो गये, लोगोंमें |
| ७२६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यजमानेषु भूतेषु प्रशान्तेषु च पाप्मसु।<br>अभिन्नबन्धने मृत्यौ हूयमाने हुताशने॥ ४१<br>यज्ञशोभिषु देवेषु स्वर्गार्थं दर्शयत्सु च।<br>लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवर्तिषु॥ ४२<br>भावे तपसि सिद्धानामभावे पापकर्मणाम्।<br>देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति॥ ४३<br>त्रिपादविग्रहे धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।<br>अपावृत्ते महाद्वारे वर्तमाने च सत्यथे॥ ४४<br>लोके प्रवृत्ते धर्मेषु सुधर्मेष्वाश्रमेषु च।<br>प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु॥ ४५<br>प्रशान्तकल्मषे लोके शान्ते तमसि दानवे।<br>अग्निमारुतयोस्तत्र वृत्ते संग्रामकर्मणि॥ ४६<br>तन्मया विपुला लोकास्ताभ्यां कृतजयक्रिया। | चरित्रबल और बन्धुत्वकी भावना जाग्रत् हो गयी, सभी प्राणी यज्ञकी भावनासे पूर्ण हो गये, पापोंका प्रशमन हो गया, मृत्युका बन्धन सुदृढ़ हो गया, अग्निमें आहुतियाँ पड़ने लगीं, यज्ञोंमें शोभा पानेवाले देवगण स्वर्गकी प्राप्तिके हेतु मार्गदर्शन करने लगे, लोकपालगण सभी दिशाओंके लिये प्रस्थित हो गये, सिद्धोंकी भावना तपस्यामें संलग्न हो गयी, पापकर्मोंका अभाव हो गया, देवपक्षमें आनन्द मनाया जाने लगा। दैत्यपक्षमें उदासी छा गयी, धर्म तीन चरणोंसे स्थित हुआ और अधर्मका एक चरण रह गया, महाद्वार (यममार्ग) बंद हो गया और सन्मार्गका प्रचार होने लगा। सभी लोग अपने-अपने वर्णधर्म एवं आश्रमधर्ममें प्रवृत्त हो गये, राजाओंका दल प्रजाकी रक्षामें तत्पर होकर सुशोभित होने लगा, दानवरूपी तमोगुणके शान्त हो जानेपर जगत्में पापका विनाश हो गया। इस प्रकार अग्नि और वायुद्वारा युद्धकर्म किये जानेपर सभी विशाल लोक उन्हींसे युक्त हो गये और उन्हींके द्वारा यह विजयकी क्रिया सम्पन्न हुई॥ ३२-४६ १/२॥ |
| पूर्वं दैत्यभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत्॥ ४७<br>कालनेमीति विख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत।<br>भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः॥ ४८<br>मन्दराद्रिप्रतीकाशो महारजतपर्वतः।<br>शतप्रहरणोदग्रः शतबाहुः शताननः॥ ४९<br>शतशीर्षः स्थितः श्रीमाञ्छतशृङ्ग इवाचलः।<br>पक्षे महति संवृद्धो निदाघ इव पावकः॥ ५०<br>धूम्रकेशो हरिच्छ्मश्रुः संदष्टौष्ठपुटाननः।<br>त्रैलोक्यान्तरविस्तारि धारयन् विपुलं वपुः॥ ५१<br>बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पद्भ्यां महीधरान्।<br>ईरयन् मुखनिःश्वासैर्वृष्टियुक्तान् बलाहकान्॥ ५२<br>तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोद्रग्रवर्चसम्।<br>दिधक्षन्तमिवायातं सर्वान् देवगणान् मृधे॥ ५३<br>तर्जयन्तं सुरगणांश्छादयन्तं दिशो दश।<br>संवर्तकाले तृषितं दृष्टं मृत्युमिवोत्थितम्॥ ५४ | तदनन्तर दैत्योंके लिये वायु और अग्निद्वारा उत्पन्न किये गये महान् भयको सुनकर सर्वप्रथम कालनेमि नामसे विख्यात दानव (युद्धभूमिमें) दिखायी पड़ा। वह सुवर्णसे युक्त मन्दराचलके समान विशालकाय था, उसके मस्तकपर सूर्य-सरीखा मुकुट चमक रहा था, वह मधुर शब्द करते हुए बाजूबंदसे विभूषित था, उसके सौ बाहु, सौ मुख और सौ मस्तक थे, वह परम भयानक सौ अस्त्रोंको एक साथ धारण किये हुए था, इस प्रकार वह सौ शिखरोंवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था, दैत्योंके विशाल पक्षमें आगे बढ़ा हुआ वह दानव ग्रीष्मकालीन अग्निकी तरह दीख रहा था, उसके बाल धूमिल थे, उसकी दाढ़ी हरे रंगकी थी, वह दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए मुखसे युक्त था, इस प्रकार वह समूची त्रिलोकीमें विस्तृत विशाल शरीर धारण किये हुए था। वह भुजाओंसे आकाशको नापता हुआ, पैरोंसे पर्वतोंको फेंकता हुआ और मुखके निःश्वाससे जलयुक्त बादलोंको तितर-बितर करता हुआ चल रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी लाल आँखें तिरछी मढ़ी हुई थीं। वह मन्दराचलके समान परम तेजस्वी था। वह युद्धस्थलमें समस्त देवगणोंको जलाते हुएकी तरह आ रहा था। वह देवगणोंको भयभीत कर रहा था, दसों दिशाओंको आच्छादित किये हुए था और प्रलयकालमें प्रकट हुए प्यासे मृत्युकी |
| * अध्याय १७७ * | ७२७ |
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| सुतलेनोच्छ्रयवता विपुलाङ्गुलिपर्वणा।<br>लम्बाभरणपूर्णेन किंचिच्चलितवर्मणा॥ ५५<br><br>उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता।<br>दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन्॥ ५६<br><br>तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालचेष्टितम्।<br>वीक्षन्ते स्म सुराः सर्वे भयवित्रस्तलोचनाः॥ ५७<br><br>तं वीक्षन्ति स्म भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम्।<br>त्रिविक्रमं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम्॥ ५८<br><br>सोऽत्युच्छ्रयपुरःपादमरुताघूर्णिताम्बरः ।<br>प्रक्रामन्नसुरो युद्धे त्रासयामास देवताः॥ ५९<br><br>स मयेनासुरेन्द्रेण परिष्वक्तस्ततो रणे।<br>कालनेमिर्बभौ दैत्यः सविष्णुरिव मन्दरः॥ ६०<br><br>अथ विव्यथिरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः।<br>कालनेमिं समायान्तं दृष्ट्वा कालमिवापरम्॥ ६१ | तरह दीख रहा था। जो सुतलसे निकला था, जिसकी अंगुलियोंके पर्व (पोरु) विशाल थे, जो आभरणोंसे युक्त था, जिसका कवच कुछ हिल रहा था और जिसके दाहिने हाथका अग्रभाग उठा हुआ था, ऐसे शरीरसे युक्त कालनेमिने देवताओंद्धारा मारे गये दानवोंसे कहा— 'अब तुमलोग उठकर खड़े हो जाओ'॥ ४७—५६॥<br><br>इस प्रकार समरभूमिमें शत्रुओंके प्रति कालकी-सी भीषण चेष्टा करनेवाले उस कालनेमिकी ओर सभी देवता एकटक निहारने लगे। उस समय उनके नेत्र भयसे कातर हो रहे थे। इस प्रकार चलते हुए उस कालनेमिको समस्त प्राणी ऐसे देख रहे थे मानो तीन पगसे त्रिलोकीको नापनेके लिये चलते हुए दूसरे नारायण हों। अत्यन्त विशाल शरीरवाले कालनेमिके चलते हुए पैरोंकी वायुसे आकाश चक्कर-सा काटने लगता था, इस प्रकार वह असुर युद्धभूमिमें विचरण करता हुआ देवताओंको भयभीत करने लगा। तदुपरान्त रणक्षेत्रमें असुरराज मयने कालनेमिका आलिङ्गन किया। उस समय वह दैत्य विष्णुसहित मन्दराचलके समान सुशोभित हो रहा था। तदनन्तर इन्द्र आदि सभी देवता दूसरे कालकी तरह कालनेमिको आया हुआ देखकर अत्यन्त व्यथित हो गये॥ ५७—६१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धे षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामययुद्धमें एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७६॥
एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय
देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंकी अद्भुत मुठभेड़, कालनेमिका भीषण पराक्रम और उसकी देवसेनापर विजय
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! महान् तेजस्वी |
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| दानवानामनीकेषु कालनेमिर्महासुरः।<br>व्यवधर्त महातेजास्तपान्ते जलदो यथा॥ १<br><br>तं त्रैलोक्यान्तरगतं दृष्ट्वा ते दानवेश्वराः।<br>उत्तस्थुरपरिश्रान्ताः पीत्वामृतमनुत्तमम्॥ २<br><br>ते वीतभयसंत्रासा मयतारपुरोगमाः।<br>तारकामयसंग्रामे सततं जितकाशिनः॥ ३ | महासुर कालनेमि दानवोंकी सेनामें उसी प्रकार वृद्धिंगत होने लगा, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें बादल उमड़ पड़ते हैं। तब वे सभी दानव-यूथपति कालनेमिको त्रिलोकीमें व्याप्त देखकर श्रमरहित हो गये और सर्वोत्तम अमृतका पान कर उठ खड़े हुए। उनके भय और त्रास समाप्त हो चुके थे। वे तारकामय-संग्राममें मय और तारकको आगे रखकर सदा विजयी होते रहे हैं। |
| ७२८ | * मत्स्यपुराण * |
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| रेजुरायोधनगता दानवा युद्धकाङ्क्षिणः।<br>मन्त्रमभ्यसतां तेषां व्यूहं च परिधावताम् ॥ ४<br>प्रेक्षतां चाभवत् प्रीतिर्दानवं कालनेमिनम्।<br>ये तु तत्र मयस्यासन् मुख्या युद्धपुरःसराः ॥ ५<br>ते तु सर्वे भयं त्यक्त्वा हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः।<br>मयस्तारो वराहश्च हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ ६<br>विप्रचित्तिसुतः श्वेतः खरलम्बावुभावपि।<br>अरिष्टो बलिपुत्रश्च किशोराख्यस्तथैव च ॥ ७<br>स्वर्भानुश्चामरप्रख्यो वक्त्रयोधी महासुरः।<br>एतेऽस्त्रवेदिनः सर्वे सर्वे तपसि सुस्थिताः ॥ ८<br>दानवाः कृतिनो जग्मुः कालनेमिं तमुद्धतम्।<br>ते गदाभिर्भुशुण्डीभिश्चक्रैरथ परश्वधैः ॥ ९<br>कालकल्पैश्च मुसलैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः।<br>अश्मभिश्चाद्रिसदृशैर्गण्डशैलैश्च दारुणैः ॥ १०<br>पट्टिशैर्भिन्दिपालैश्च परिघैश्चोत्तमयसैः।<br>घातनीभिः सुगुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥ ११<br>युगैर्यन्त्रैश्च निर्मुक्तैर्मार्गणैरूग्रताडितैः।<br>दोर्भिश्चायतदीर्घैश्च प्रासैः पाशैश्च मूर्च्छनैः ॥ १२<br>भुजङ्गवक्त्रैर्लोलिहानैर्विसर्पद्भिश्च सायकैः।<br>वज्रैः प्रहरणीयैश्च दीप्यमानैश्च तोमरैः ॥ १३<br>विकोशैरसिभिस्तीक्ष्णैः शूलैश्च शितनिर्मलैः।<br>दैत्याः संदीप्तमनसः प्रगृहीतशरासनाः ॥ १४<br>ततः पुरस्कृत्य तदा कालनेमिं महाहवे।<br>सा दीप्तशस्त्रप्रवरा दैत्यानां रुरुचे चमूः ॥ १५<br>द्यौर्निमीलितसर्वाङ्गा घनानीलाम्बुदागमे। | युद्धाभिलाषी वे दानव युद्धभूमिमें उपस्थित होकर शोभा पा रहे थे। उनमें कुछ परस्पर मन्त्रणा कर रहे थे, कुछ व्यूहकी रचना कर रहे थे और कुछ रक्षकके रूपमें थे। उन सबका कालनेमि दानवके प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो गया। तत्पश्चात् वहाँ मयदानवके जितने मुख्य-मुख्य युद्धके अगुआ थे, वे सभी भय छोड़कर हर्षपूर्वक युद्ध करनेके लिये उपस्थित हुए। फिर मय, तारक, वराह, पराक्रमी हयग्रीव, विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत, खर, लम्ब, बलिकाय पुत्र अरिष्ट, किशोर और देवरूपसे प्रसिद्ध मुखसे युद्ध करनेवाला महान् असुर स्वर्भानु—ये सभी अस्त्रवेत्ता थे और सभी तपोबलसे सम्पन्न थे। वे सभी सफल प्रयत्नवाले दानव उस उद्दण्ड कालनेमिके निकट गये। गदा, भुशुण्डि, चक्र, कुठार, काल-सदृश मुसल, क्षेपणीय (ढेलवाँस), मुद्गर, पर्वत-सदृश पत्थर, भीषण गण्डशैल, पट्टिश, भिन्दिपाल, उत्तम लोहेके बने हुए परिघ, संहारकारिणी बड़ी-बड़ी तोप, यन्त्र, हाथोंसे छूटनेपर भयानक चोट करनेवाले बाण, लम्बे चमकीले भाले, पाश, मूर्छन (बेहोश करनेका यन्त्र), रेंगते हुए जीभ लपलपानेवाले सर्पमुख बाण, फेंकने योग्य वज्र, चमचमाते हुए तोमर, म्यानसे बाहर निकली हुई तीखी तलवार और तीखे निर्मल शूलोंसे युक्त तथा धनुष धारण करनेवाले उन दैत्योंके मन उत्साहसे सम्पन्न थे, वे उस महासमरमें कालनेमिको आगे करके खड़े हो गये। उस समय देदीप्यमान शस्त्रोंसे युक्त दैत्योंकी वह सेना इस प्रकार शोभा पा रही थी मानो सघन नील बादलोंके छा जानेपर सर्वथा आच्छादित हुआ आकाशमण्डल हो॥ १-१५ १/२॥ |
| देवतानामपि चमूर्मुमुदे शक्रपालिता ॥ १६<br>उपेतसितकृष्णाभ्यां ताराभ्यां चन्द्रसूर्ययोः।<br>वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी ॥ १७<br>तोयदाविद्धवसना ग्रहनक्षत्रहासिनी।<br>यमेन्द्रवरुणैर्गुप्ता धनदेन च धीमता ॥ १८<br>सम्प्रदीप्ताग्निनयना नारायणपरायणा।<br>सा समुद्रौघसदृशी दिव्या देवमहाचमूः ॥ १९ | दूसरी ओर इन्द्रद्वारा सुरक्षित देवताओंकी सेना भी अट्टहास कर रही थी। वह चन्द्रमा और सूर्यकी श्वेत और कृष्ण ताराओंसे युक्त, वायुकी-सी वेगशालिनी, सौम्य और तारागणको पताकारूपमें धारण करनेवाली थी। उसके वस्त्र बादलोंसे संयुक्त थे। वह ग्रहों और नक्षत्रोंका उपहास-सी कर रही थी। बुद्धिमान् कुबेर, यम, इन्द्र और वरुण उसकी रक्षा कर रहे थे। वह प्रज्वलित अग्निरूप नेत्रोंवाली और नारायणके आश्रित थी। इस प्रकार यक्षों एवं गन्धर्वोंसे युक्त सागरसमूहकी तरह भयंकर देवताओंकी वह विशाल दिव्य सेना अस्त्र |
* अध्याय १७७ * । ७२९
| रजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी।<br>तयोश्चम्वोस्तदानीं तु बभूव स समागमः॥ २०<br>द्यावापृथिव्योः संयोगो यथा स्याद् युगपर्यये।<br>तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्॥ २१<br>क्षमापराक्रमपरं दर्पस्य विनयस्य च।<br>निष्क्रमुर्बलाभ्यां तु भीमास्तत्र सुरासुराः॥ २२<br>पूर्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवाम्बुदाः।<br>ताभ्यां बलाभ्यां संहृष्टाश्चेरूस्ते देवदानवाः॥ २३<br>वनाभ्यां पार्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथा गजाः। | धारण किये हुए शोभा पा रही थी। उस समय उन दोनों सेनाओंका ऐसा समागम हुआ जैसे प्रलयकालमें पृथ्वी और आकाशमण्डलका संयोग होता है। देवताओं और दानवोंसे व्याप्त तथा दर्प और विनयकी क्षमा और पराक्रमसे युक्त वह युद्ध अत्यन्त भयंकर हो गया। वहाँ दोनों सेनाओंमेंसे कुछ ऐसे भयंकर देवता और राक्षस निकल रहे थे, जो पूर्वी एवं पश्चिमी सागरोंसे निकलते हुए संक्षुब्ध बादलों-जैसे प्रतीत हो रहे थे। उन दोनों सेनाओंसे निकले हुए वे देवता और दानव इस प्रकार हर्षपूर्वक विचरण कर रहे थे, मानो खिले हुए पुष्पोंसे युक्त पर्वतीय वनोंसे गजराज निकल रहे हों॥ १६-२३ १/२ ॥ |
| समाजघ्नुस्ततो भेरीः शङ्खान् दध्मुborder/रनेकशः॥ २४<br>स शब्दो द्यां भुवं खं च दिशश्च समपूरयत्।<br>ज्याघाततलनिर्घोषो धनुषां कूजितानि च॥ २५<br>दुन्दुभीनां च निनदो दैत्यमन्तर्दधुः स्वनम्।<br>तेऽन्योन्यमभिसम्प्रेत्यः पातयन्तः परस्परम्॥ २६<br>बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहून् द्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः।<br>देवास्तु चाशनिं घोरं परिघांश्चोत्तमायसान्॥ २७<br>निस्त्रिंशान् ससृजुः संख्ये गदा गुर्वीश्च दानवाः।<br>गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च शकलीकृताः॥ २८<br>परिपेतर्भृशं केचित् पुनः केचित् तु जघ्निरे।<br>ततो रथैः सतुरगैर्विमानैश्चाशुगामिभिः॥ २९<br>समीयुस्ते सुसंरब्धा रोषादन्योन्यमाहवे।<br>संवर्तमानाः समरे संदष्टौष्ठपुटाननाः॥ ३०<br>रथा रथैर्निरुद्ध्यन्ते पादाताश्च पदातिभिः।<br>तेषां रथानां तुमुलः स शब्दः शब्दवाहिनाम्॥ ३१<br>नभोनभश्व हि यथा नभस्यैर्जलदस्वनैः।<br>बभञ्जुस्तु रथान् केचित् केचित् सम्मर्दिता रथैः॥ ३२<br>सम्बाधमन्ये सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथाः।<br>अन्योन्यमन्ये समरे दोर्भ्यामुत्क्षिप्य दंशिताः॥ ३३<br>संहादमानाभरणा जघ्नुस्तत्रापि चर्मिणः। | तदनन्तर नगाड़ोंपर चोटें पड़ने लगीं और अनेकों शङ्ख बज उठे। वह शब्द अन्तरिक्ष, पृथ्वी, आकाश और दिशाओंमें व्याप्त हो गया। धनुषोंकी प्रत्यञ्चा चढ़ानेके शब्द तथा सैनिकोंके कोलाहल होने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियोंका निनाद दैत्योंके वाद्यशब्दको पराभूत कर दिया। फिर तो वे एक-दूसरेपर टूट पड़े और परस्पर एक-दूसरेको मारकर गिराने लगे। कुछ द्वन्द्व-युद्ध करनेवाले वीर अपनी भुजाओंसे शत्रु की भुजाओंको मरोड़ दिये। रणभूमिमें देवगण भयंकर अशनि और उत्तम लोहेके बने हुए परिघोंसे प्रहार कर रहे थे तो दानवगण भारी गदाओं और खड्गोंका प्रयोग कर रहे थे। गदाके आघातसे बहुतोंके अङ्ग चूर हो गये। कुछ लोग तो बाणोंकी चोटसे टुकड़े-टुकड़े हो गये। कुछ अत्यन्त घायल होकर धराशायी हो गये। कुछ पुनः उठकर प्रहार करने लगे। तदनन्तर वे क्रोधसे विक्षुब्ध हो रणभूमिमें घोड़े जुते रथों और शीघ्रगामी विमानोंद्वारा एक-दूसरेसे भिड़ गये। युद्ध करते समय वे क्रोधवश अपने होंठोंको दाँतों-तले दबाये हुए थे। इस प्रकार रथ रथोंके साथ तथा पैदल पैदलोंके साथ उलझ गये। शब्द करनेवाले उन रथोंका ऐसा भयंकर शब्द होने लगा मानो भाद्रपदमासमें बादल गरज रहे हों। कुछ लोग रथोंको तोड़ रहे थे और कुछ लोग रथोंके धक्केसे रौंदे जा चुके थे। दूसरे रथ मार्गके अवरुद्ध हो जानेके कारण आगे बढ़नेमें असमर्थ हो गये। कुछ कवचधारी वीर समरभूमिमें एक-दूसरेको दोनों हाथोंसे उठाकर भूतलपर पटक देते थे। उस समय उनके आभूषण खनखना रहे थे। वहाँ कुछ ढाल धारण करनेवाले दूसरे अस्त्रोंद्वारा भी विपक्षियोंपर प्रहार कर रहे थे॥ २४-३३ १/२ ॥ |
१७९- शिवजीके साथ अन्धकासुरका युद्ध, शिवजीद्वारा मातृकाओंकी सृष्टि, शिवजीके हाथों अन्धककी मृत्यु और उसे गणेशत्वकी प्राप्ति, मातृकाओंकी विध्वंसलीला तथा विष्णुनिर्मित देवियोंद्वारा उनका अवरोध
| ७३० | * मत्स्यपुराण * |
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| अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना वेमू रक्तं हता युधि॥ ३४<br><br>क्षरजलानां सदृशा जलदानां समागमे।<br>तैरस्त्रशस्त्रग्रथितं क्षिप्तोत्क्षिप्तगदाविलम्॥ ३५<br><br>देवदानवसंक्षुब्धं संकुलं युद्धमाबभौ।<br>तद्दानवमहामेघं देवायुधविराजितम्॥ ३६<br><br>अन्योन्यबाणवर्षेण युद्धदुर्दिनमाबभौ।<br>एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमी स दानवः॥ ३७<br><br>व्यवधर्त समुद्रौघैः पूर्यमाण इवाम्बुदः।<br>तस्य विद्युच्चलापीडैः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः॥ ३८<br><br>गात्रैर्नागगिरिप्रख्या विनिपेतुर्बलाहकाः।<br>क्रोधान्निःश्वसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः॥ ३९<br><br>साग्निस्र्फुलिङ्गप्रतता मुखान्निष्पेतुरर्चिषः।<br>तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः॥ ४०<br><br>पर्वतादिव निष्क्रान्ताः पञ्चास्या इव पन्नगाः।<br>सोऽस्त्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि॥ ४१<br><br>दिव्यमाकाशमावव्रे पर्वतैरुच्छ्रितैरिव।<br>सोऽनिलोद्धूतवसनस्तस्थौ संग्रामलालसः॥ ४२<br><br>संध्यातपग्रस्तशिलः साक्षान्मेरुरिवाचलः।<br>ऊरुवेगप्रमथितैः शैलशृङ्गाग्रपादपैः॥ ४३<br><br>अपातयद् देवगणान् वज्रेणेव महागिरीन्। | इसी प्रकार अन्य वीर युद्धस्थलमें अस्त्रोंद्वारा घायल होकर रक्त वमन करते हुए जलकी वृष्टि करनेवाले बादलोंकी तरह प्रतीत हो रहे थे। उस समय वह युद्ध अस्त्रों एवं शस्त्रोंसे परिपूर्ण, फेंकी गयी एवं फेंकनेके लिये उठायी हुई गदाओंसे युक्त और देवताओं एवं दानवोंसे व्याप्त और संक्षुब्ध होकर शोभा पा रहा था। दानवरूपी महामेघसे युक्त और देवताओंके हथियारोंसे विभूषित वह युद्ध परस्परकी बाणवर्षामे मेघाच्छन्न दुर्दिन-सा लग रहा था। इसी बीच क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि नामक दानव रणभूमिमें आगे बढ़ा। वह समुद्रकी लहरोंसे पूर्ण होते हुए बादलकी तरह शोभा पा रहा था। प्रज्वलित वज्रोंकी वर्षा करनेवाले उस दानवके बिजलीके समान चञ्चल मस्तकोंसे युक्त शरीरावयवोंसे टकराकर हाथी और पर्वत-सदृश विशाल बादल तितर-बितर होकर बिखर रहे थे। क्रोधवश निःश्वास लेते हुए उसकी टेढ़ी भौंहोंसे पसीनेकी बूँदें टपक रही थीं और मुखसे अग्निकी चिनगारियोंसे व्याप्त लपटें निकल रही थीं। उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी होकर ऊपरकी ओर बढ़ रही थीं, जो पर्वतसे निकले हुए पाँच मुखवाले नागकी तरह लग रही थीं। उसने ऊँचे-ऊँचे पर्वतों-सरीखे अनेक प्रकारके अस्त्रसमूहों, धनुषों और परिघोंसे दिव्य आकाशको आच्छादित कर दिया। वायुद्वारा उड़ाये जाते हुए वस्त्रोंवाला वह दानव संग्रामकी लालसासे डटकर खड़ा हुआ। उस समय वह संध्याकालीन धूपसे ग्रस्त हुई शिलासे युक्त साक्षात् मेरुपर्वतकी तरह दीख रहा था। उसने अपनी जंघाओंके वेगसे उखाड़े गये पर्वतशिखरके अग्रवर्ती वृक्षोंके प्रहारसे देवगणोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रके आघातसे विशाल पर्वत ढाह दिये गये थे॥ ३४-४३ १/२ ॥ | | बहुभिः शस्त्रनिस्त्रिंशैश्छिन्नभिन्नशिरोरुहाः॥ ४४<br><br>न शेकुश्चलितुं देवाः कालनेमिहता युधि।<br>मुष्टिभिर्निहताः केचित् केचित् तु विदलीकृताः॥ ४५<br><br>यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह महोरगैः।<br>तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना॥ ४६ | इस प्रकार रणभूमिमें कालनेमिद्वारा आहत हुए देवगण चलने-फिरनेमें भी असमर्थ हो गये। बहुत-से शस्त्रों तथा खड्गोंकी चोटसे कुछ लोगोंके सिरके बालतक छिन्न-भिन्न हो गये थे। कुछ मुक्कोंकी मारसे मार डाले गये और कुछके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। यक्षों और गन्धर्वोंके नायक बड़े-बड़े नागोंके साथ पृथ्वीकी गोदमें पड़ गये। समरभूमिमें उस कालनेमिद्वारा भयभीत किये गये देवगण |
| * अध्याय १७७ * | ७३१ |
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| न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि यत्नं कर्तुं विचेतसः।<br>तेन शक्रः सहस्राक्षः स्पन्दितः शरबन्धनैः॥ ४७<br>ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह।<br>निर्जलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः॥ ४८<br>निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे।<br>रणे वैश्रवणस्तेन परिघैः कामरूपिणा॥ ४९<br>वित्तदोऽपि कृतः संख्ये निर्जितः कालनेमिना।<br>यमः सर्वहरस्तेन मृत्युप्रहरणे रणे॥ ५०<br>याम्यामवस्थां संत्यज्य भीतः स्वां दिशमाविशत्।<br>स लोकपालानुत्सार्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्॥ ५१<br>दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा।<br>स नक्षत्रपथं गत्वा दिव्यं स्वर्भानुदर्शनम्॥ ५२<br>जहार लक्ष्मीं सोमस्य तं चास्य विषयं महत्। | प्रयत्न करनेके लिये उद्यत होनेपर भी कोई उपाय न कर सके; क्योंकि उनका मन भ्रमित हो उठा था। उसने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रको भी बाणोंके बन्धनसे इस प्रकार जकड़ दिया था कि वे युद्धस्थलमें ऐरावतपर बैठे हुए भी चलनेमें समर्थ न हो सके। उसने समर-भूमिमें वरुणको जलहीन बादल और निर्जल महासागरकी भाँति कान्तिहीन, व्यापाररहित और पाशसे शून्य कर दिया। स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उस दानवने रणभूमिमें परिघोंकी मारसे वैश्रवण कुबेरको भी जीत लिया। मृत्यु-सदृश प्रहार होनेवाले उस युद्धमें कालनेमिने सबके प्राणहर्ता यमको पराजित कर दिया। वे डरकर युद्धका परित्याग कर अपनी दक्षिण दिशाकी ओर चले गये। इस प्रकार उसने चारों लोकपालोंको पराजित कर दिया और अपने शरीरको चार भागोंमें विभक्त कर वह सभी दिशाओंमें उनका कार्य स्वयं सँभालने लगा। फिर जहाँ ग्रहणके समय राहुका दर्शन होता है, उस दिव्य नक्षत्रमार्गमें जाकर चन्द्रमाकी लक्ष्मी तथा उनके विशाल साम्राज्यका अपहरण कर लिया॥ ४४—५२ १/२ ॥ | | चालयामास दीप्तांशुं स्वर्गद्वारात् सभास्करम्॥ ५३<br>सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च।<br>सोऽग्निं देवमुखं दृष्ट्वा चकारात्ममुखाश्रयम्॥ ५४<br>वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम्।<br>स समुद्रान् समानीय सर्वांश्च सरितो बलात्॥ ५५<br>चकारात्ममुखे वीर्याद् देहभूताश्च सिन्धवः।<br>अपः स्ववशगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः॥ ५६<br>स स्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपतिर्यथा।<br>सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वभूतभयावहः॥ ५७<br>स लोकपालैकवपुश्चन्द्रादित्यग्रहात्मवान्।<br>स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः॥ ५८<br>पावकानिलसम्पातो रराज युधि दानवः।<br>पारमेष्ठ्ये स्थितः स्थाने लोकानां प्रभवोपमे।<br>तं तुष्टुवुर्दैत्यगणा देवा इव पितामहम्॥ ५९ | उसने प्रदीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे खदेड़ दिया और उनके सायन नामक साम्राज्य और दिनकी सृष्टि करनेकी शक्तिको छीन लिया। उसने देवताओंके मुखस्वरूप अग्निको सम्मुख देखकर उन्हें अपने मुखमें निगल लिया तथा वायुको वेगपूर्वक जीतकर उन्हें अपना वशवर्ती बना लिया। उसने अपने पराक्रमसे बलपूर्वक समुद्रोंको वशमें करके सभी नदियोंको अपने मुखमें डाल लिया और सागरोंको शरीरका अङ्ग बना लिया। इस प्रकार स्वर्ग अथवा भूतलपर जितने जल थे, उन सबको उसने अपने अधीन कर लिया। उस समय समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह दैत्य सम्पूर्ण लोकोंसे युक्त होकर महाभूतपति ब्रह्माकी तरह सुशोभित हो रहा था। सम्पूर्ण लोकपालोंके एकमात्र मूर्तस्वरूप तथा चन्द्र, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त उस दानवने पर्वतोंद्वारा सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया। इस प्रकार अग्नि और वायुके समान वेगशाली दानवराज कालनेमि युद्धस्थलमें लोकोंकी उत्पत्तिके स्थानभूत ब्रह्माके पदपर स्थित होकर शोभा पा रहा था। उस समय दैत्यगण उसकी उसी प्रकार स्तुति कर रहे थे, जैसे देवगण ब्रह्माकी किया करते हैं॥ ५३—५९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धं नाम सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकामय-युद्ध नामक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७७॥
७३२ * मत्स्यपुराण *
एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय
कालनेमि और भगवान् विष्णुका रोषपूर्वक वार्तालाप और भीषण युद्ध, विष्णुके चक्रके द्वारा कालनेमिका वध और देवताओंको पुनः निज पदकी प्राप्ति
| मत्स्य उवाच | |
|---|---|
| पञ्च तं नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा।<br>वेदो धर्मः क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणाश्रया॥ १<br><br>स तेषामनुपस्थानात् सक्रोधो दानवेश्वरः।<br>वैष्णवं पदमन्विच्छन् ययौ नारायणान्तिकम्॥ २<br><br>स ददर्श सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>दानवानां विनाशाय भ्रामयन्तं गदां शुभाम्॥ ३<br><br>सजलाम्भोधसदृशं विद्युत्सदृशवाससम्।<br>स्वारूढं स्वर्णपक्षाढ्यं शिखिनं काश्यपं खगम्॥ ४<br><br>दृष्ट्वा दैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम्।<br>दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धमानसः॥ ५<br><br>अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां प्राणनाशनः।<br>अर्णवावासिनश्चैव मधोर्वै कैटभस्य च॥ ६<br><br>अयं स विग्रहोऽस्माकमशाम्यः किल कथ्यते।<br>अनेन संयुगेष्वद्य दानवा बहवो हताः॥ ७<br><br>अयं स निर्घृणो लोके स्त्रीबालनिरपत्रपः।<br>येन दानवनारीणां सीमन्तोद्धरणं कृतम्॥ ८<br><br>अयं स विष्णुर्देवानां वैकुण्ठश्च दिवौकसाम्।<br>अनन्तो भोगिनामप्सु स्वपन्नाद्यः स्वयम्भुवः॥ ९<br><br>अयं स नाथो देवानांमस्माकं व्यथितात्मनाम्।<br>अस्य क्रोधं समासाद्य हिरण्यकशिपुर्हतः॥ १० | मत्स्यभगवान् बोले— रविनन्दन! कालनेमिद्वारा विपरीत कर्म किये जानेके कारण वेद, धर्म, क्षमा, सत्य और नारायणके आश्रयमें रहनेवाली लक्ष्मी— ये पाँचों उसके अधीन नहीं हुए। उनके उपस्थित न होनेसे क्रोधसे भरा हुआ दानवेश्वर कालनेमि वैष्णवपदकी प्राप्तिकी अभिलाषासे नारायणके निकट गया। वहाँ जाकर उसने शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान्को गरुड़की पीठपर बैठे तथा दैत्योंका विनाश करनेके लिये कल्याणमयी गदा घुमाते देखा। उनके शरीरकी कान्ति सजल मेघके समान थी। उनका पीताम्बर बिजलीके समान चमक रहा था। वे स्वर्णमय पंखसे युक्त शिखाधारी कश्यपनन्दन गरुडपर समासीन थे। इस प्रकार रणभूमिमें दैत्योंका विनाश करनेके लिये स्वस्थचित्तसे स्थित अक्षोभ्य भगवान् विष्णुको देखकर दानवराज कालनेमिका मन क्षुब्ध हो उठा, तब वह कहने लगा— 'यही हमलोगोंके पूर्वजोंका प्राणनाशक शत्रु है तथा यही महासागरमें निवास करनेवाले मधु और कैटभका भी प्राणहर्ता है। हमलोगोंका यह विग्रह शान्त होनेका नहीं, ऐसा निश्चितरूपसे कहा जाता है। बहुतेरे युद्धोंमें इसके द्वारा बहुत-से दानव मारे जा चुके हैं। यह बड़ा निष्ठुर है। इसे जगत्में स्त्री-बच्चोंपर भी हाथ उठाते समय लज्जा नहीं आती। इसने बहुत-सी दानव-पत्नियोंके सोहागका उन्मूलन कर दिया है। यही देवताओंमें विष्णु, स्वर्गवासियोंमें वैकुण्ठ, नागोंमें अनन्त और जलमें शयन करनेवाला आदि स्वयम्भू है। यही देवताओंका स्वामी और व्यथित हृदयवाले हमलोगोंका शत्रु है। इसीके क्रोधमें पड़कर हिरण्यकशिपु मारे गये हैं॥ १-१०॥ |
| अस्य छायामुपाश्रित्य देवा मखमुखे श्रिताः।<br>आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम्॥ ११ | 'इसी प्रकार इसीका आश्रय ग्रहण कर यज्ञके प्रारम्भमें स्थित देवगण महर्षियोंद्वारा तीन प्रकारकी आहुति-रूपमें दिये गये आज्यका उपभोग करते हैं। |
| अयं स निधने हेतुः सर्वेषाममरद्विषाम्।<br>यस्य चक्रे प्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे॥ १२ | यही सभी देवद्रोही असुरोंकी मृत्युका कारण है। युद्धभूमिमें हमारे सभी कुल इसीके चक्रमें प्रविष्ट हो गये हैं। |
| * अध्याय १७८ * | ७३३ |
|---|---|
| अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः।<br>सवितुस्तेजसा तुल्यं चक्रं क्षिपति शत्रु host... शत्रुषु॥ १३<br>अयं स कालो दैत्यानां कालभूतः समास्थितः।<br>अतिक्रान्तस्य कालस्य फलं प्राप्स्यति केशवः॥ १४<br>दिष्ट्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेष समागतः।<br>अद्य मद्बाहुनिष्पिष्टो मामेव प्रणयिष्यति॥ १५<br>यास्याम्यपचितिं दिष्ट्या पूर्वेषामद्य संयुगे।<br>इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम्॥ १६<br>क्षिप्रमेव हनिष्यामि रणेऽमरगणांस्ततः।<br>जात्यन्तरगतो ह्येष बाधते दानवान् मृधे॥ १७<br>एषोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति श्रुतः।<br>जघानैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ॥ १८<br>द्विधाभूतं वपुः कृत्वा सिंहस्यार्धं नरस्य च।<br>पितरं मे जघानैको हिरण्यकशिपुं पुरा॥ १९<br>शुभं गर्भमधत्तैनमदितिर्देवतारणिः।<br>त्रींल्लोकानुज्जहारैकः क्रममाणस्त्रिभिः क्रमैः॥ २०<br>भूयस्त्विदानीं संग्रामे सम्प्राप्ते तारकामये।<br>मया सह समागम्य सदेवो विनशिष्यति॥ २१<br>एवमुक्त्वा बहुविधं क्षिपन्नारायणं रणे।<br>वाग्भिरप्रतिरूपाभिर्युद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥ २२ | यह युद्धोंमें देवताओंके हितके लिये प्राणोंकी बाजी लगा देता है और शत्रुओंपर सूर्यके समान तेजस्वी चक्रका प्रयोग करता है। यह दैत्योंके कालरूपसे यहाँ स्थित है, किंतु अब यह केशव अपने बीते हुए कालका फल भोगेगा। सौभाग्यवश यह विष्णु इस समय मेरे ही समक्ष आ गया है। यह आज मेरी भुजाओंसे पिसकर मुझसे ही प्रेम करेगा। सौभाग्यकी बात है कि आज मैं रणभूमिमें दानवोंको भयभीत करनेवाले इस नारायणका वध कर पूर्वजोंके प्रायश्चित्तको पूर्ण कर दूँगा। तत्पश्चात् रणमें शीघ्र ही देवताओंका संहार कर डालूँगा। यह अन्य जातियोंमें भी उत्पन्न होकर समरमें दानवोंको कष्ट पहुँचाता है। यही पूर्वकालमें अनन्त होकर पुनः पद्मनाभ नामसे विख्यात हुआ। इसने ही भयंकर एकार्णवके जलमें मधु-कैटभ नामक दोनों दैत्योंका वध किया था। इसने अपने शरीरको आधा सिंह और आधा मनुष्य—इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त करके पूर्वकालमें मेरे पिता हिरण्यकशिपुको मौतके घाट उतारा था। देवताओंकी जननी अदितिने इसीको अपने मङ्गलमय गर्भमें धारण किया था। अकेले इसीने तीन पगोंसे नापते हुए त्रिलोकीका उद्धार किया था। इस समय यह पुनः तारकामय संग्रामके प्राप्त होनेपर उपस्थित हुआ है। यह मेरे साथ उलझकर सभी देवताओंसहित नष्ट हो जायगा।' ऐसा कहकर उसने रणके मैदानमें प्रतिकूल वचनोंद्वारा अनेकों प्रकारसे नायणपर आक्षेप करते हुए युद्धके लिये ही अभिलाषा व्यक्त की॥ ११—२२॥ |
| क्षिप्यमाणोऽसुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः।<br>क्षमाबलेन महता सस्मितं चेदमब्रवीत्॥ २३ | भगवान् गदाधरमें क्षमाका महान् बल है, जिसके कारण असुरेन्द्रद्वारा इस प्रकार आक्षेप किये जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए, अपितु मुसकराते हुए इस प्रकार बोले—'दैत्य! |
| अल्पं दर्पबलं दैत्य स्थिरमक्रोधजं बलम्।<br>हतस्त्वं दर्पजैर्दोषैर्हित्वा यद् भाषसे क्षमाम्॥ २४<br>अधीरस्त्वं मम मतो धिगेतत् तव वाग्बलम्।<br>न यत्र पुरुषाः सन्ति तत्र गर्जन्ति योषितः॥ २५<br>अहं त्वां दैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम्।<br>प्रजापतिकृतं सेतुं भित्त्वा कः स्वस्तिमान् व्रजेत्॥ २६ | दर्पका बल अल्पकालस्थायी होता है, किंतु क्षमाजनित बल स्थिर होता है। तुम क्षमाका परित्याग करके जो इस प्रकारकी ऊटपटाँग बातें बक रहे हो, इससे प्रतीत होता है कि तुम अपने दर्पजन्य दोषोंसे नष्ट हो चुके हो। मेरी समझसे तो तुम बड़े अधीर दीख रहे हो। तुम्हारे इस वाग्बलको धिक्कार है; क्योंकि ऐसी गर्जना तो जहाँ पुरुष नहीं होते, वहाँ स्त्रियाँ भी करती हैं। दैत्य! मैं तुम्हें भी पूर्वजोंके मार्गका अनुगामी ही देख रहा हूँ। भला, ब्रह्माद्वारा स्थापित की गयी मर्यादाओंको तोड़कर |
७३४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अद्य त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारघातकम्।<br>स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवताः॥ २७ | कौन कुशलपूर्वक जीवित रह सकता है। अतः देवताओंके कार्योंमें बाधा पहुँचानेवाले तुम्हें मैं आज ही नष्ट कर डालूँगा और देवताओंको पुनः अपने-अपने स्थानोंपर स्थापित कर दूँगा।'॥ २३-२७॥ |
| एवं ब्रुवति वाक्यं तु मृधे श्रीवत्सधारिणि।<br>जहास दानवः क्रोधाद्धस्तांश्चक्रे सहायुधान्॥ २८<br>स बाहुशतमुद्यम्य सर्वास्त्रग्रहणं रणे।<br>क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो विष्णुं वक्ष्यस्ताडयत्॥ २९<br>दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः।<br>उद्यतायुधनिस्त्रिंशा विष्णुमभ्यद्रवन् रणे॥ ३०<br>स ताड्यमानोऽतिबलैर्दैत्यैः सर्वोद्यतायुधैः।<br>न चचाल ततो युद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः॥ ३१<br>संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः।<br>स्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य बाहुभिः॥ ३२<br>घोरां ज्वलन्तीं मुमुचे संरब्धो गरुडोपरि।<br>कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुर्विस्मयमाविशत्॥ ३३<br>यदा तेन सुपर्णस्य पातिता मूर्ध्नि सा गदा।<br>सुपर्णं व्यथितं दृष्ट्वा कृत्तं च वपुरात्मनः॥ ३४<br>क्रोधसंरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे।<br>व्यवधंत स वेगेन सुपर्णेन समं विभुः॥ ३५<br>भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश।<br>प्रदिशश्चैव खं गां वै पूरयामास केशवः॥ ३६ | रणभूमिमें श्रीवत्सधारी भगवान्के इस प्रकार कहनेपर दानवराज कालनेमि ठहाका मारकर हँस पड़ा और फिर उसने क्रोधवश हाथोंमें हथियार धारण कर लिया। क्रोधके कारण उसके नेत्र दुगुने लाल हो गये थे। उसने रणभूमिमें सभी प्रकारके अस्त्रोंको धारण करनेवाली अपनी सैकड़ों भुजाओंको उठाकर भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। इसी प्रकार मय, तारक आदि अन्यान्य दानव भी खड्ग आदि आयुध लेकर युद्धस्थलमें भगवान् विष्णुपर टूट पड़े। यद्यपि सभी प्रकारके अस्त्रोंसे युक्त अत्यन्त बली दैत्य उनपर प्रहार कर रहे थे, तथापि वे विचलित नहीं हुए, अपितु युद्धभूमिमें पर्वतकी तरह अटल बने रहे। तब महान् असुर कालनेमि गरुडके साथ उलझ गया। उसने अपनी विशाल गदाको हाथोंमें धारण कर ली और क्रोधमें भरकर पूरी शक्तिके साथ उस चमकती हुई भयंकर गदाको गरुडके ऊपर छोड़ दिया। इस प्रकार उसके द्वारा फेंकी गयी वह गदा जब गरुडके मस्तकपर जा गिरी, तब दैत्यके उस कर्मसे भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो उठे। फिर गरुडको पीड़ित तथा अपने शरीरको क्षत-विक्षत देखकर उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब उन्होंने चक्र हाथमें उठाया। फिर तो वे सर्वव्यापी विष्णु गरुडके साथ वेगपूर्वक आगे बढ़े। उनकी भुजाएँ दसों दिशाओंमें व्यास होकर बढ़ने लगीं। इस प्रकार भगवान् केशवने प्रदिशाओं, आकाशमण्डल और भूतलको आच्छादित कर लिया॥ २८-३६॥ |
| ववृधे च पुनर्लोकान् क्रान्तुकाम इवौजसा।<br>तर्जनायासुरेन्द्राणां वर्धमानं नभस्तले॥ ३७<br>ऋषयश्चैव गन्धर्वास्तुष्टुवुर्मधुसूदनम्।<br>सर्वान् किरीटेन लिहन् साभ्रमम्बरमम्बरैः॥ ३८<br>पद्भ्यामाक्रम्य वसुधां दिशः प्रच्छाद्य बाहुभिः।<br>स सूर्यकरतुल्याभं सहस्रारमरिक्षयम्॥ ३९ | पुनः वे अपने तेजसे लोकोंका अतिक्रमण करते हुए-से बढ़ने लगे। जिस समय वे आकाशमण्डलमें सुरेन्द्रोंको भयभीत करनेके लिये बढ़ रहे थे, उस समय ऋषिगण और गन्धर्व भगवान् मधुसूदनकी स्तुति कर रहे थे। वे अपने किरीटसे ऊपरी सभी लोकोंको तथा वस्त्रोंसे मेघसहित आकाशको छूते हुए पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त करके और भुजाओंसे दिशाओंको आच्छादित करके स्थित थे। उनके चक्रकी कान्ति सूर्यकी किरणोंकी-सी उद्दीप्त थी। उसमें हजारों अरे लगे थे। वह शत्रुओंका |
| * अध्याय १७८ * | ७३५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनेन सुदर्शनम्।<br>सुवर्णरेणुपर्यन्तं वज्रनाभं भयावहम्॥ ४०<br><br>मेदोऽस्थिमज्जारुधिरैः सिक्तं दानवसम्भवैः।<br>अद्वितीयप्रहरणं क्षुरपर्यन्तमण्डलम्॥ ४१<br><br>स्रग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम्।<br>स्वयं स्वयम्भुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम्॥ ४२<br><br>महर्षिरोषैराविष्टं नित्यमाहवदर्पितम्।<br>क्षेपणाद् यस्य मुह्यन्ति लोकाः स्थाणुजङ्गमाः॥ ४३<br><br>क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महामृधे।<br>तदप्रतिमकर्म्मोग्रं समानं सूर्यवर्चसा॥ ४४ | विनाशक था। वह प्रज्वलित अग्निकी तरह भयंकर होनेपर भी देखनेमें परम सुन्दर था। सुवर्णकी रेणुकासे धूसरित, वज्रकी नाभिसे युक्त और अत्यन्त भयानक था। वह दानवोंके शरीरसे निकले हुए मेदा, अस्थि, मज्जा और रुधिरसे चुपड़ा हुआ था। वह अपने ढंगका अकेला ही अस्त्र था। उसके चारों ओर खुरे लगे हुए थे। वह माला और हारसे विभूषित था। वह अभीप्सित स्थानपर जानेवाला तथा स्वेच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला था। स्वयं ब्रह्माने उसकी रचना की थी। वह सम्पूर्ण शत्रुओंके लिये भयदायक था तथा महर्षिके क्रोधसे परिपूर्ण और नित्य युद्धमें गर्वीला बना रहता था। उसका प्रयोग करनेसे स्थावर-जङ्गमसहित सभी प्राणी मोहित हो जाते हैं तथा महासमरमें मांसभोजी जीव तृप्तिको प्राप्त होते हैं। वह अनुपम कर्म करनेवाला, भयंकर और सूर्यके समान तेजस्वी था॥ ३७—४४॥ |
| चक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीप्तो गदाधरः।<br>स मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा॥ ४५<br><br>चिच्छेद बाहूंश्चक्रेण श्रीधरः कालनेमिनः।<br>तस्य वक्त्रशतं घोरं साग्निपूर्णाट्टहासिवै॥ ४६<br><br>तस्य दैत्यस्य चक्रेण प्रमथ्य बलाद्धरिः।<br>स च्छिन्नबाहुर्विशिरा न प्राकम्पत दानवः॥ ४७<br><br>कबन्धोऽवस्थितः संख्ये विशाख इव पादपः।<br>संवितत्य महापक्षाै वायोः कृत्वा समं जवम्॥ ४८<br><br>उरसा पातयामास गरुडः कालनेमिनम्।<br>स तस्य देहो विमुखो विबाहुश्च परिभ्रमन्॥ ४९<br><br>निपपात दिवं त्यक्त्वा क्षोभयन् धरणीतलम्।<br>तस्मिन् निपतिते दैत्ये देवाः सर्षिगणास्तदा॥ ५०<br><br>साधुसाध्विति वैकुण्ठं समेताः प्रत्यपूजयन्।<br>अपरे ये तु दैत्याश्च युद्धे दृष्टपराक्रमाः॥ ५१<br><br>ते सर्वे बाहुभिर्व्याप्ता न शेकुश्चलितुं रणे।<br>कांश्चित् केशेषु जग्राह कांश्चित् कण्ठेषु पीडयन्॥ ५२ | क्रोधसे उद्दीप्त हुए भगवान् गदाधरने समरभूमिमें उस चक्रको उठाकर अपने तेजसे दानवके तेजको नष्ट कर दिया और फिर उन श्रीधरने चक्रद्वारा कालनेमिकी भुजाओंको काट डाला। तत्पश्चात् श्रीहरिने उस दैत्यके सौ मुखोंको, जो भयंकर, अग्निके समान तेजस्वी और अट्टहास कर रहे थे, बलपूर्वक चक्रके प्रहारसे काट डाला। इस प्रकार भुजाओं और सिरोंके कट जानेपर भी वह दानव विचलित नहीं हुआ, अपितु युद्धभूमिमें शाखाओंसे हीन वृक्षकी तरह कबन्धरूपसे स्थित रहा। तब गरुड़ने अपने विशाल पंखोंको फैलाकर और वायुके समान वेग भरकर अपनी छातीके धक्केसे कालनेमिके कबन्धको धराशायी कर दिया। मुखों और भुजाओंसे हीन उसका वह शरीर चक्कर काटता हुआ स्वर्गलोकको छोड़कर भूतलको क्षुब्ध करता हुआ नीचे गिर पड़ा। उस दैत्यके गिर जानेपर ऋषियोंसहित देवगणोंने उस समय संगठित होकर भगवान् विष्णुको साधुवाद देते हुए उनकी पूजा की। दूसरे दैत्यगण, जो युद्धमें भगवान्के पराक्रमको देख चुके थे, वे सभी भगवान्की भुजाओंके वशीभूत हो रणभूमिमें चलने-फिरनेमें भी असमर्थ थे। भगवान्ने किन्हींको केश पकड़कर पटक दिया तो किन्हींको गला घोंटकर मार डाला। |
और उसका माहात्म्य तथा हरिकेशको शिवजीद्वारा वरप्राप्ति
| ७३६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| चकर्ष कस्यचिद् वक्त्रं मध्ये गृह्यादथापरम्।<br>ते गदाचक्रनिर्दग्धा गतसत्त्वा गतासवः॥ ५३<br>गगनाद् भ्रष्टसर्वाङ्गा निपेतुर्धरणीतले।<br>तेषु दैत्येषु सर्वेषु हतेषु पुरुषोत्तमः॥ ५४<br>तस्थौ शक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधरः। | किसीका मुख फाड़ दिया तो दूसरेकी कमर तोड़ दी। इस प्रकार वे सभी गदाकी चोट और चक्रसे जल चुके थे, उनके पराक्रम नष्ट हो गये थे और शरीरके सभी अङ्ग चूर-चूर हो गये थे। वे प्राणरहित होकर आकाशसे भूतलपर गिर पड़े। इस प्रकार उन सभी दैत्योंके मारे जानेपर पुरुषोत्तम भगवान् गदाधर इन्द्रका प्रिय कार्य करके कृतार्थ हो शान्तिपूर्वक स्थित हुए॥ ४५–५४ १/२ ॥ | | तस्मिन् विमर्दे संग्रामे निवृत्ते तारकामये॥ ५५<br>तं देशमाजगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>सर्वैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं गन्धर्वाप्सरसां गणैः॥ ५६<br>देवदेवो हरिं देवं पूजयन् वाक्यमब्रवीत्।<br>कृतं देव महत् कर्म सुराणां शल्यमुद्धृतम्।<br>वधेनानेन दैत्यानां वयं च परितोषिताः॥ ५७<br>योऽयं त्वया हतो विष्णो कालनेमी महासुरः।<br>त्वमेकोऽस्य मृधे हन्ता नान्यः कश्चन विद्यते॥ ५८<br>एष देवान् परिभवँल्लोकांश्च ससुरासुरान्।<br>ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपि प्रति गर्जति॥ ५९<br>तदनेन तवाग्र्येण परितुष्टोऽस्मि कर्मणा।<br>यदयं कालकल्पस्तु कालनेमी निपातितः॥ ६०<br>तदागच्छस्व भद्रं ते गच्छामः दिवमुत्तमम्।<br>ब्रह्मर्षयस्त्वां तत्रस्थाः प्रतीक्षन्ते सदोगताः॥ ६१<br>कं चाहं तव दास्यामि वरं वरवतां वर।<br>सुरेष्वथ च दैत्येषु वराणां वरदो भवान्॥ ६२<br>निर्यात्यैतत् त्रैलोक्यं स्फीतं निहतकण्टकम्।<br>अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने॥ ६३<br>एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्ययः।<br>देवाञ्शक्रमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा॥ ६४ | तदनन्तर उस भयानक तारकामय संग्रामके निवृत्त होनेपर लोकपितामह ब्रह्मा तुरंत ही उस स्थानपर आये। उस समय उनके साथ सभी ब्रह्मर्षि थे तथा गन्धर्वों एवं अप्सराओंका समुदाय भी था। तब देवाधिदेव ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिका आदर करते हुए इस प्रकार कहा—'देव! आपने बहुत बड़ा काम किया है। आपने तो देवताओंका काँटा ही उखाड़ दिया। दैत्योंके इस संहारसे हमलोग परम संतुष्ट हैं। विष्णो! आपने जो इस महान् असुर कालनेमिका वध किया है, यह आपके ही योग्य है; क्योंकि एकमात्र आप ही रणभूमिमें इसके वधकर्ता हैं, दूसरा कोई नहीं है। यह दानव देवताओं और असुरोंसहित समस्त लोकों और देवताओंको तिरस्कृत करते हुए ऋषियोंका संहार कर मेरे पास भी आकर गर्जता था। इसलिये जो यह कालके समान भयंकर कालनेमि मारा गया, आपके इस श्रेष्ठ कर्मसे मैं भलीभाँति संतुष्ट हूँ। अतः आपका कल्याण हो, आइये, अब हमलोग उत्तम स्वर्गलोकमें चलें। वहाँ सभामें बैठे हुए ब्रह्मर्षिगण आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वरदानियोंमें श्रेष्ठ भगवन्! आप तो स्वयं ही देवताओं और दैत्योंके लिये श्रेष्ठ वरदायक हैं। ऐसी दशामें मैं आपको कौन-सा वर प्रदान करूँ? विष्णो! त्रिलोकीका यह समृद्धिशाली राज्य अब कण्टकरहित हो गया है, इसे आप इसी युद्धस्थलमें महात्मा इन्द्रको समर्पित कर दीजिये।' भगवान् ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर अविनाशी श्रीहरि इन्द्र आदि सभी देवताओंसे मधुर वाणीमें बोले॥ ५५–६४॥ | | विष्णुरुवाच<br>शृण्वन्तु त्रिदशाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः।<br>श्रवणावहितैः श्रोत्रैः पुरस्कृत्य पुरंदरम्॥ ६५<br>अस्माभिः समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः।<br>दानवा विक्रमोपेताः शक्रादपि महत्तराः॥ ६६<br>अस्मिन् महति संग्रामे दैतेयौ द्वौ विनिःसृतौ।<br>विरोचनश्च दैत्येन्द्रः स्वर्भानुश्च महाग्रहः॥ ६७ | **भगवान् विष्णुने कहा—**यहाँ आये हुए जितने देवता हैं, वे सभी इन्द्रको आगे करके सावधानीपूर्वक कान लगाकर मेरी बात सुनें। इस समरमें हमलोगोंने कालनेमि आदि सभी महान् पराक्रमी दानवोंको, जो इन्द्रसे भी बढ़कर बलशाली थे, मार डाला है; किंतु इस महान् संग्राममें दैत्येन्द्र विरोचन और महान् ग्रह राहु—ये दोनों दैत्य भाग निकले हैं। |
- अध्याय १७८ * | ७३७ ---|---
| स्वां दिशं भजतां शक्रो दिशं वरुण एव च।<br>याम्यां यमः पालयतामुत्तरां च धनाधिपः॥ ६८<br>ऋक्षैः सह यथायोगं गच्छतां चैव चन्द्रमाः।<br>अब्दमृतुमुखे सूर्यो भजतामयनैः सह॥ ६९<br>आज्यभागाः प्रवर्त्तन्तां सदस्यैरभिपूजिताः।<br>हूयन्तामग्नयो विप्रैर्वेददृष्टेन कर्मणा॥ ७०<br>देवाश्चाप्यग्निहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः।<br>श्राद्धेन पितरश्चैव तृप्तिं यान्तु यथासुखम्॥ ७१<br>वायुश्चरतु मार्गस्थस्त्रिधा दीप्यतु पावकः।<br>त्रींस्तु वर्णांश्च लोकांस्त्रींस्तर्पयंश्चात्मजैर्गुणैः॥ ७२<br>क्रतवः सम्प्रवर्त्तन्तां दीक्षणीयैर्द्विजातिभिः।<br>दक्षिणाश्चोपपाद्यन्तां याज्ञिकेभ्यः पृथक् पृथक् ॥ ७३<br>गां तु सूर्यो रसान् सोमो वायुः प्राणांश्च प्राणिषु।<br>तर्पयन्तः प्रवर्त्तन्तां सर्व एव स्वकर्मभिः॥ ७४<br>यथावदानुपूर्व्येण महेन्द्रमलयोद्भवाः।<br>त्रैलोक्यमातरः सर्वाः समुद्रं यान्तु सिन्धवः॥ ७५<br>दैत्येभ्यस्त्यज्यतां भीश्च शान्तिं व्रजत देवताः।<br>स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि ब्रह्मलोकं सनातनम्॥ ७६<br>स्वगृहे स्वर्गलोके वा संग्रामे वा विशेषतः।<br>विश्रम्भो वो न मन्तव्यो नित्यं क्षुद्रा हि दानवाः॥ ७७<br>छिद्रेषु प्रहरन्त्येते न तेषां संस्थितिर्ध्रुवा।<br>सौम्यानामृजुभावानां भवतामार्जवं धनम्॥ ७८<br>एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णुः सत्यपराक्रमः।<br>जगाम ब्रह्मणा सार्धं स्वलोकं तु महायशाः॥ ७९<br>एतदाश्चर्यमभवत् संग्रामे तारकामये।<br>दानवानां च विष्णोश्च यन्मां त्वं परिपृष्टवान्॥ ८० | अब इन्द्र अपनी पूर्व दिशाकी रक्षा करें तथा वरुण पश्चिम दिशाकी, यम दक्षिण दिशाका और कुबेर उत्तर दिशाका पालन करें। चन्द्रमा नक्षत्रोंके साथ पूर्ववत् अपने स्थानको चले जायँ। सूर्य अयनोंके साथ ऋतुकालानुसार वर्षका उपभोग करें। यज्ञोंमें सदस्योंद्वारा अभिपूजित हो देवगण आज्यभाग ग्रहण करें। ब्राह्मणलोग वेदविहित कर्मानुसार अग्निमें आहुतियाँ डालें। देवगण अग्निहोत्रसे, महर्षिगण स्वाध्यायसे और पितृगण श्राद्धसे सुखपूर्वक तृप्तिलाभ करें। वायु अपने मार्गसे प्रवाहित हों। अग्नि अपने गुणोंसे तीनों वर्णों और तीनों लोकोंको तृप्त करते हुए तीन भागोंमें विभक्त होकर प्रकाशित हों॥ ६५-७२॥<br><br>दीक्षित ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ हों। याज्ञिक ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणाएँ दी जायँ। सूर्य पृथ्वीको, चन्द्रमा रसोंको और वायु प्राणियोंमें स्थित प्राणोंको तृप्त करते हुए सभी अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त हों। महेन्द्र और मलय पर्वतसे निकलनेवाली त्रिलोकीकी मातास्वरूप सभी नदियाँ आनुपूर्वी पूर्ववत् समुद्रमें प्रविष्ट हों। देवगण! आपलोग दैत्योंसे प्राप्त होनेवाले भयको छोड़ दें और शान्ति धारण करें। आपलोगोंका कल्याण हो। अब मैं सनातन ब्रह्मलोकको जा रहा हूँ। आपलोगोंको अपने घरमें अथवा स्वर्गलोकमें अथवा विशेषकर संग्राममें दैत्योंका विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि दानव सदा क्षुद्र प्रकृतिवाले होते हैं। वे छिद्र पाकर तुरंत प्रहार कर बैठते हैं। उनकी स्थिति कभी निश्चित नहीं रहती। इधर सौम्य एवं कोमल स्वभाववाले आपलोगोंका आर्जव ही धन है। महायशस्वी एवं सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु देवगणोंसे ऐसा कहकर ब्रह्माके साथ अपने लोकको चले गये। राजन्! दानवों और भगवान् विष्णुके मध्य घटित हुए तारकामय संग्राममें यही आश्चर्य हुआ था, जिसके विषयमें तुमने मुझसे प्रश्न किया था॥ ७३-८०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावसंग्रहो नामाष्टासप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पद्मोद्भवप्रादुर्भावसंग्रह नामक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७८॥
७३८ * मत्स्यपुराण *
एक सौ उनासीवाँ अध्याय
शिवजीके साथ अन्धकासुरका युद्ध, शिवजीद्वारा मातृकाओंकी सृष्टि, शिवजीके हाथों अन्धककी मृत्यु और उसे गणेशत्वकी प्राप्ति, मातृकाओंकी विध्वंसलीला तथा विष्णुनिर्मित देवियोंद्वारा उनका अवरोध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>श्रुतः पद्मोद्भवस्तात विस्तरेण त्वयेरितः।<br>समासाद् भवमाहात्म्यं भैरवस्याभिधीयताम्॥ १ | ऋषियोंने पूछा—तात! आपके द्वारा विस्तारपूर्वक कहे गये पद्मोद्भवके प्रसङ्गको हमलोग सुन चुके, अब आप भैरवस्वरूप शंकरजीके माहात्म्यका संक्षेपसे वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>तस्यापि देवदेवस्य शृणुध्वं कर्म चोत्तमम्।<br>आसीद् दैत्योऽन्धको नाम भिन्नाञ्जनचयोपमः॥ २<br>तपसा महता युक्तो ह्यवध्यस्त्रिदिवौकसाम्।<br>स कदाचिन्महादेवं पार्वत्या सहितं प्रभुम्॥ ३<br>क्रीडमानं तदा दृष्ट्वा हर्तुं देवीं प्रचक्रमे।<br>तस्य युद्धं तदा घोरमभवत् सह शम्भुना॥ ४<br>आवन्त्ये विषये घोरे महाकालवनं प्रति।<br>तस्मिन् युद्धे तदा रुद्रश्चान्धकेनातिपीडितः॥ ५<br>सुषुवे बाणमत्युग्रं नाम्ना पाशुपतं हि तत्।<br>रुद्रबाणविनिर्भेदाद् रुधिरादन्धकस्य तु॥ ६<br>अन्धकाश्च समुत्पन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तेषां विदार्यमाणानां रुधिरादपरे पुनः॥ ७<br>बभूवुरन्धका घोरा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्।<br>एवं मायाविनं दृष्ट्वा तं च देवस्तदान्धकम्॥ ८<br>पानार्थमन्धकास्रस्य सोऽसृजन्मातरस्तदा। | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अच्छा, आपलोग देवाधिदेव शंकरजीके भी उत्तम कर्मको सुनिये। पूर्वकालमें अञ्जनसमूहके सदृश वर्णवाला अन्धक नामका एक दैत्य हुआ था। वह महान् तपोबलसे सम्पन्न था, इसी कारण देवताओंद्वारा अवध्य था। किसी समय उसकी दृष्टि पार्वतीके साथ क्रीडा करते हुए भगवान् शंकरपर पड़ी, तब वह पार्वती देवीका अपहरण करनेके लिये प्रयास करने लगा। उस समय अवन्ती-प्रदेशमें स्थित भयंकर महाकालवनमें उसका शंकरजीके साथ भीषण संग्राम हुआ। उस युद्धमें जब भगवान् रुद्र अन्धकद्वारा अत्यन्त पीडित कर दिये गये, तब उन्होंने अतिशय भयंकर पाशुपत नामक बाणको प्रकट किया। शंकरजीके उस बाणके आघातसे निकलते हुए अन्धकके रक्तसे दूसरे सैकड़ों-हजारों अन्धक उत्पन्न हो गये। पुनः उनके घायल शरीरोंसे बहते हुए रुधिरसे दूसरे भयंकर अन्धक प्रकट हुए, जिनके द्वारा सारा जगत् व्याप्त हो गया। तब उस अन्धकको इस प्रकारका मायावी जानकर भगवान् शंकरने उसके रक्तको पान करनेके लिये मातृकाओंकी सृष्टि की॥ २–८ १/२॥ |
| माहेश्वरी तथा ब्राह्मी कौमारी मालिनी तथा॥ ९<br>सौपर्णी ह्याथ वायव्या शाक्री वै नैरृती तथा।<br>सौरी सौम्या शिवा दूती चामुण्डा चाथ वारुणी॥ १०<br>वाराही नारसिंही च वैष्णवी च चलच्छिखा।<br>शतानन्दा भगानन्दा पिच्छिला भगमालिनी॥ ११ | उन (मातृकाओं)-के नाम हैं—माहेश्वरी, ब्राह्मी, कौमारी, मालिनी, सौपर्णी, वायव्या, शाक्री, नैर्ऋती, सौरी, सौम्या, शिवा, दूती, चामुण्डा, वारुणी, वाराही, नारसिंही, वैष्णवी, चलच्छिखा, शतानन्दा, भगानन्दा, पिच्छिला, भगमालिनी, |
- अध्याय १७९ * ७३९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी सूची |
|---|---|
| बला चातिबला रक्ता सुरभी मुखमण्डिका।<br>मातृनन्दा सुनन्दा च बिडाली शकुनी तथा ॥ १२ | बला, अतिबला, रक्ता, सुरभी, मुखमण्डिका, मातृनन्दा, सुनन्दा, बिडाली, शकुनी, रेवती, महारक्ता, पिलपिच्छिका, |
| रेवती च महारक्ता तथैव पिलपिच्छिका।<br>जया च विजया चैव जयन्ती चापराजिता ॥ १३ | जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, काली, महाकाली, दूती, सुभगा, दुर्भगा, कराली, नन्दिनी, अदिति, दिति, |
| काली चैव महाकाली दूती चैव तथैव च।<br>सुभगा दुर्भगा चैव कराली नन्दिनी तथा ॥ १४ | मारी, मृत्यु, कर्णमोटी, ग्राम्या, उलूकी, घटोदरी, कपाली, वज्रहस्ता, पिशाची, राक्षसी, भुशुण्डी, शांकरी, चण्डा, |
| अदितिश्च दितिश्चैव मारी वै मृत्युरेव च।<br>कर्णमोटी तथा ग्राम्या उलूकी च घटोदरी ॥ १५ | लाङ्गली, कुटभी, खेटा, सुलोचना, धूम्रा, एकवीरा, करालिनी, विशालदंष्ट्रिणी, श्यामा, त्रिजटी, कुकुटी, वैनायकी, वैताली, |
| कपाली वज्रहस्ता च पिशाची राक्षसी तथा।<br>भुशुण्डी शाङ्करी चण्डा लाङ्गली कुटभी तथा ॥ १६ | उन्मत्तोदुम्बरी, सिद्धि, लेलिहाना, केकरी, गर्दभी, भुकुटी, बहुपुत्री, प्रेतयाना, बिडम्बिनी, क्रौञ्चा, शैलमुखी, विनता, |
| खेटा सुलोचना धूम्रा एकवीरा करालिनी।<br>विशालदंष्ट्रिणी श्यामा त्रिजटी कुक्कुटी तथा ॥ १७ | सुरसा, दनु, उषा, रम्भा, मेनका, सलिला, चित्ररूपिणी, स्वाहा, स्वधा, वषट्कारा, धृति, ज्येष्ठा, कपर्दिनी, माया, |
| वैनायकी च वैताली उन्मत्तोदुम्बरी तथा।<br>सिद्धिश्च लेलिहाना च केकरी गर्दभी तथा ॥ १८ | विचित्ररूपा, कामरूपा, संगमा, मुखेविला, मङ्गला, महानासा, महामुखी, कुमारी, रोचना, भीमा, सदाहा, मदोद्धता, अलम्बाक्षी, |
| भुकुटी बहुपुत्री च प्रेतयाना विडम्बिनी।<br>क्रौञ्चा शैलमुखी चैव विनता सुरसा दनुः ॥ १९ | कालपर्णी, कुम्भकर्णी, महासुरी, केशिनी, शंखिनी, लम्बा, पिंगला, लोहितामुखी, घण्टारवा, दंष्ट्रला, रोचना, काकजंघिका, |
| उषा रम्भा मेनका च ललिता चित्ररूपिणी।<br>स्वाहा स्वधा वषट्कारा धृतिर्ज्येष्ठा कपर्दिनी ॥ २० | गोकर्णिका, अजमुखिका, महाग्रीवा, महामुखी, उल्कामुखी, धूमशिखा, कम्पिनी, परिकम्पिनी, मोहना, कम्पना, श्वेला, |
| माया विचित्ररूपा च कामरूपा च सङ्गमा।<br>मुखेविला मङ्गला च महानासा महामुखी ॥ २१ | निर्भया, बाहुशालिनी, सर्पकर्णी, एकाक्षी, विशोका, नन्दिनी, ज्योत्स्नामुखी, रभसा, निकुम्भा, रक्तकम्पना, |
| कुमारी रोचना भीमा सदाहा सा मदोद्धता।<br>अलम्बाक्षी कालपर्णी कुम्भकर्णी महासुरी ॥ २२ | अविकारा, महाचित्रा, चन्द्रसेना, मनोरमा, अदर्शना, हरत्पापा, मातंगी, लम्बमेखला, अबाला, वञ्चना, काली, प्रमोदा, |
| केशिनी शङ्खिनी लम्बा पिङ्गला लोहितामुखी।<br>घण्टारवाथ दंष्ट्राला रोचना काकजङ्घिका ॥ २३ | लाङ्गलावती, चित्ता, चित्तजला, कोणा, शान्तिका, अघविनाशिनी, लम्बस्तनी, लम्बसटा, विसटा, वासचूर्णिनी, |
| गोकर्णिकाजमुखिका महाग्रीवा महामुखी।<br>उल्कामुखी धूमशिखा कम्पिनी परिकम्पिनी ॥ २४ | |
| मोहना कम्पना श्वेला निर्भया बाहुशालिनी।<br>सर्पकर्णी तथैकाक्षी विशोका नन्दिनी तथा ॥ २५ | |
| ज्योत्स्नामुखी च रभसा निकुम्भा रक्तकम्पना।<br>अविकारा महाचित्रा चन्द्रसेना मनोरमा ॥ २६ | |
| अदर्शना हरत्पापा मातङ्गी लम्बमेखला।<br>अबाला वञ्चना काली प्रमोदा लाङ्गलावती ॥ २७ | |
| चित्ता चित्तजला कोणा शान्तिकाघविनाशिनी।<br>लम्बस्तनी लम्बसटा विसटा वासचूर्णिनी ॥ २८ |