भारतकोश
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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
  • अध्याय १९४ * ८१३

| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र त्रिदशज्योतिविश्रुतम्।<br>यत्र ता ऋषिकन्यास्तु तपोऽतप्यन्त सुव्रताः ॥ ११<br><br>भर्ता भवतु सर्वासामीश्वरः प्रभुरव्ययः।<br>प्रीतस्तासां महादेवो दण्डरूपधरो हरः ॥ १२<br><br>विकृताननबीभत्सुर्व्रती तीर्थमुपागतः।<br>तत्र कन्या महाराज वरयत् परमेश्वरः ॥ १३<br><br>कन्या ऋषेर्वरयतः कन्यादानं प्रदीयताम्।<br>तीर्थं तत्र महाराज ऋषिकन्येति विश्रुतम् ॥ १४<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र स्वर्णविन्दु त्विति स्मृतम् ॥ १५<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दुर्गतिं न च पश्यति।<br>अप्सरेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ १६<br><br>क्रीडते नागलोकस्थोऽप्सरोभिः सह मोदते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र नरके तीर्थमुत्तमम् ॥ १७<br><br>तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं नरकं च न पश्यति। | राजेन्द्र ! इसके बाद प्रसिद्ध त्रिदशज्योतितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ उत्तम व्रत धारण करनेवाली उन ऋषि-कन्याओंने तपस्या की थी। उनकी अभिलाषा थी कि अविनाशी एवं सामर्थ्यशाली महेश्वर हम सभीके पति हों। तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर संहारकारी महादेव, जिनका मुख विकृत और शरीर घृणास्पद था तथा जो उत्तम व्रतमें लीन थे, दण्ड धारणकर उस तीर्थमें आये। महाराज! वहाँ शंकरजीने उन कन्याओंका वरण किया। महाराज! वहाँ शंकरजीने ऋषिकन्याओंका वरण किया था, अतः वह स्थान ऋषिकन्या नामसे विख्यात तीर्थ हुआ। यहाँ कन्यादान करना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदनन्तर स्वर्णबिन्दु नामक प्रसिद्ध तीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको दुर्गति नहीं देखनी पड़ती। तत्पश्चात् अप्सरेशतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेवाला नागलोकमें अप्सराओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त नरक नामक श्रेष्ठ तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे तो नरक नहीं देखना पड़ता ॥ ११-१७ १/२ ॥ | | भारभूतिं ततो गच्छेदुपवासपरो जनः ॥ १८<br><br>एतत् तीर्थं समासाद्य चावतारं तु शाम्भवम्।<br>अर्चयित्वा विरूपाक्षं रुद्रलोके महीयते ॥ १९<br><br>अस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा भारभूतौ महात्मनः।<br>यत्र तत्र मृतस्यापि ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः ॥ २०<br><br>कार्तिकस्य तु मासस्य ह्यर्चयित्वा महेश्वरम्।<br>अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २१<br><br>दीपकानां शतं तत्र घृतपूर्णं तु दापयेत्।<br>विमानैः सूर्यसंकाशैर्व्रजते यत्र शंकरः ॥ २२<br><br>वृषभं यः प्रयच्छेत् तु शङ्खकुन्देन्दुसप्रभम्।<br>वृषयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति ॥ २३<br><br>धेनुमेकां तु यो दद्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>पायसं मधुसंयुक्तं भक्ष्याणि विविधानि च ॥ २४ | इसके बाद भारभूतितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। इस तीर्थमें आकर मनुष्य उपवासपूर्वक शम्भूके अवतार विरूपाक्षकी अर्चना करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। महात्मा शंकरके इस भारभूतितीर्थमें स्नानकर मनुष्य जहाँ-कहीं भी मरता है तो उसे निश्चय ही गणोंके अध्यक्षकी गति प्राप्त होती है। कार्तिकमासमें यहाँ महेश्वरकी पूजा करनेसे अश्वमेधयज्ञसे दसगुना फल प्राप्त होता है—ऐसा विद्वानोंने कहा है। जो वहाँ घृतपूर्ण सौ दीपक जलाता है, वह सूर्यके समान देदीप्यमान विमानोंसे शंकरजीके निकट चला जाता है। जो वहाँ शङ्ख, कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान उज्ज्वल रंगके वृषभका दान करता है, वह वृषयुक्त विमानसे रुद्रलोकको जाता है। नराधिप! उस तीर्थमें जो एक धेनुका दान देता है और यथाशक्ति मधुसंयुक्त खीर एवं विविध भोज्य पदार्थ ब्राह्मणोंको खिलाता है, |

८९४ * मत्स्यपुराण *

| यथाशक्त्या च राजेन्द्र ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ २५<br>नर्मदाया जलं पीत्वा ह्यर्चयित्वा वृषध्वजम्।<br>दुर्गतिं च न पश्यन्ति तस्य तीर्थप्रभावतः॥ २६<br>एतत् तीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो व्रजेद् वै यत्र शंकरः।<br>जलप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ २७<br>हंसयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च हिमवांश्च महोदधिः॥ २८<br>गङ्गाद्याः सरितो यावत् तावत् स्वर्गे महीयते।<br>अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ २९<br>गर्भवासे तु राजेन्द्र न पुनर्जायते पुमान्।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र आषाढीतीर्थमुत्तमम्॥ ३० | राजेन्द्र! उसका वह सभी कर्म उस तीर्थके प्रभावसे करोड़गुना हो जाता है। जो लोग नर्मदाका जल पीकर शिवजीकी पूजा करते हैं, उन्हें उस तीर्थके प्रभावसे दुर्गति नहीं देखनी पड़ती। जो इस तीर्थमें आकर प्राणोंका त्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर शंकरजीके समीप चला जाता है। नराधिप! उस तीर्थमें जो जलमें प्रवेश (करके प्राण-त्याग) करता है, वह हंसयुक्त विमानसे रुद्रलोकको जाता है तथा जबतक चन्द्रमा, सूर्य, हिमालय, महासागर और गङ्गा आदि नदियाँ हैं, तबतक स्वर्गमें पूजित होता है। नराधिप! जो पुरुष उस तीर्थमें अनशन करता है, राजेन्द्र! वह पुनः गर्भमें वास नहीं करता॥१८—२९ ½॥ | | तत्र स्नात्वा नरो राजन्निन्द्रस्यार्धासनं लभेत्।<br>स्त्रियास्तीर्थं ततो गच्छेत्सर्वपापप्रणाशनम्॥ ३१<br>तत्रापि स्नातमात्रस्य ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः।<br>ऐरण्डीनर्मदयोश्च संगमं लोकविश्रुतम्॥ ३२<br>तच्च तीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>उपवासपरो भूत्वा नित्यव्रतपरायणः॥ ३३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमम्॥ ३४<br>जामदग्न्यमिति ख्यातं सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>यत्रेष्ट्वा बहुभिर्यज्ञैरिन्द्रो देवाधिपोऽभवत्॥ ३५<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमे।<br>त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३६<br>पश्चिमस्योदधेः संधौ स्वर्गद्वारविघट्टनम्।<br>तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः॥ ३७<br>आराधयन्ति देवेशं त्रिसंध्यं विमलेश्वरम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ३८<br>विमलेशात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>तत्रोपवासं कृत्वा ये पश्यन्ति विमलेश्वरम्॥ ३९<br>सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा यान्ति शिवालयम्। | राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ आषाढ़ीतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य इन्द्रके आधे आसनको प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् सभी पापोंके विनाशक स्त्री-तीर्थमें जाय। वहाँ भी स्नानमात्रसे निश्चय ही गाणेश्वरी गति प्राप्त होती है। ऐरण्डी और नर्मदाका संगम लोकप्रसिद्ध तीर्थ है, वह अतिशय पुण्यदायक तथा सभी पापोंका विनाश करनेवाला है। राजेन्द्र! वहाँ उपवास और नित्य व्रतोंका सम्पादन करते हुए स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त नर्मदा और समुद्रके संगमपर जाना चाहिये, जो जामदग्न्य नामसे प्रसिद्ध है। इसी तीर्थमें जनार्दनको सिद्धि प्राप्त हुई थी तथा इन्द्र अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान कर देवताओंके अधीश्वर हुए। राजेन्द्र! उस नर्मदा और सागरके सङ्गममें स्नान कर मनुष्य अश्वमेधयज्ञसे तिगुना फल प्राप्त करता है। पश्चिम समुद्रके संधि-स्थानपर स्वर्गद्वारविघट्टन तीर्थ है, वहाँ देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण तीनों संध्याओंमें विमलेश्वर महादेवकी आराधना करते हैं। राजन्! वहाँ स्नानकर मानव रुद्रलोकमें पूजित होता है। विमलेश्वरसे बढ़कर तीर्थ न हुआ है और न होगा। उस तीर्थमें उपवास कर जो विमलेश्वरका दर्शन करते हैं, वे सात जन्मोंके पापोंसे मुक्त होकर शिवपुरीमें जाते हैं॥३०—३९ ½॥ |

१९७- महर्षि अत्रिके वंशका वर्णन

* अध्याय १९४ *८१५

| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कौशिकीतीर्थमुत्तमम् ॥ ४०<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायणः ।<br>उपोष्य रजनीमेकां नियतो नियताशनः ॥ ४१<br><br>एतत्तीर्थप्रभावेण मुच्यते ब्रह्महत्यया ।<br>सर्वतीर्थाभिषेकं तु यः पश्येत् सागरेश्वरम् ॥ ४२<br><br>योजनाभ्यन्तरे तिष्ठन्नावर्ते संस्थितः शिवः ।<br>तं दृष्ट्वा सर्वतीर्थानि दृष्टान्येव न संशयः ॥ ४३<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तो यत्र रुद्रः स गच्छति ।<br>नर्मदासंगमं यावद् यावच्चामरकण्टकम् ॥ ४४<br><br>अत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट्यो दश स्मृताः ।<br>तीर्थात्तीर्थान्तरं यत्र ऋषिकोटिनिषेवितम् ॥ ४५<br><br>साग्निहोत्रैस्तु विद्वद्भिः सर्वैर्ध्यानपरायणैः ।<br>सेविनानेन राजेन्द्र त्वीप्सितार्थप्रदायिका ॥ ४६<br><br>यस्त्विदं वै पठेन्नित्यं शृणुयाद् वापि भावतः ।<br>तस्य तीर्थानि सर्वाणि ह्यभिषिञ्चन्ति पाण्डव ॥ ४७<br><br>नर्मदा च सदा प्रीता भवेद् वै नात्र संशयः ।<br>प्रीतस्तस्य भवेद् रुद्रो मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ ४८<br><br>वन्ध्या चैव लभेत् पुत्रान् दुर्भगा सुभगा भवेत् ।<br>कन्या लभेत भर्तारं यश्च वाञ्छेत् तु यत्फलम् ।<br>तदेव लभते सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ ४९<br><br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत् ।<br>वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रः प्राप्नोति सद्गतिम् ॥ ५०<br><br>मूर्खस्तु लभते विद्यां त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।<br>नरकं च न पश्येत् तु वियोगं च न गच्छति ॥ ५१ | राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ कौशिकीतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ उपवासपूर्वक स्नान करने और नियमित भोजन करके एक रात निवास करनेसे मनुष्य इस तीर्थके प्रभावसे ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। जो सागरेश्वरका दर्शन करता है, उसे सभी तीर्थोंके अभिषेकका फल प्राप्त हो जाता है। वहाँसे एक योजनके भीतर वर्तुलस्थानमें शिवजी संस्थित हैं, अतः उनका दर्शन कर लेनेसे सभी तीर्थोंका दर्शन हो जाता है—इसमें संशय नहीं है। वह मानव सभी पापोंसे मुक्त होकर जहाँ रुद्र रहते हैं, वहाँ चला जाता है। महाराज! नर्मदा-सङ्गमसे लेकर अमरकण्टकके मध्यमें दस करोड तीर्थ बतलाये जाते हैं। वहाँ एक तीर्थसे दूसरे तीर्थके मध्यमें करोड़ों ऋषिगण निवास करते हैं। राजेन्द्र! सभी ध्यानपरायण अग्निहोत्री विद्वानोंद्वारा सेवित यह तीर्थ-परम्परा अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली है। पाण्डव! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इन तीर्थोंका पाठ करता है या श्रवण करता है, उसे सभी तीर्थोंमें अभिषेक करनेका फल प्राप्त होता है और उसपर नर्मदा सदा प्रसन्न होती है—इसमें संदेह नहीं है। साथ ही उसपर महामुनि मार्कण्डेय एवं रुद्र प्रसन्न होते हैं। (इस तीर्थके प्रभावसे) वन्ध्याको पुत्रकी प्राप्ति होती है, अभागिनी सौभाग्यवती हो जाती है, कन्या पतिको प्राप्त करती है तथा अन्य जो कोई जिस फलको चाहता है, उसे वह सब फल प्राप्त हो जाता है—इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। ब्राह्मण वेदका ज्ञान प्राप्त करता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन प्राप्त करता है और शूद्रको अच्छी गति प्राप्त होती है तथा मूर्ख विद्याको प्राप्त करता है। जो मनुष्य तीनों संध्याओंमें इसका पाठ करता है उसे न तो नरकका दर्शन होता है और न प्रियजनोंका वियोग ही प्राप्त होता है॥ ४०–५१ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्यं नाम चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चौरानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९४॥

१९८- प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि विश्वामित्रके वंशका वर्णन

८१६* मत्स्यपुराण *

एक सौ पञ्चानबेवाँ अध्याय

गोत्रप्रवर-निरूपण*-प्रसङ्गमें भृगुवंशकी परम्पराका विवरण

| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार ओंकारका | | इत्याकर्ण्य स राजेन्द्र ओंकारस्याभिवर्णनम्। | वर्णन सुननेके पश्चात् राजेन्द्र मनुने उस जलार्णवमें | | ततः पप्रच्छ देवेशं मत्स्यरूपं जलार्णवे॥ १ | स्थित मत्स्यरूपी देवेश विष्णुसे पुनः (इस प्रकार) प्रश्न किया॥ १॥ | | मनुरुवाच | **मनुजीने पूछा—**प्रभो! ऋषियोंके नाम, गोत्र, वंश, | | ऋषीणां नाम गोत्राणि वंशावतरणं तथा। | अवतार तथा प्रवरोंकी समता और विषमता—इन | | प्रवराणां तथा साम्यमसाम्यं विस्तराद् वद॥ २ | विषयोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। स्वायम्भुव- | | महादेवेन ऋषयः शप्ताः स्वायम्भुवान्तरे। | मन्वन्तरमें महादेवजीने ऋषियोंको शाप दिया था, अतः | | तेषां वैवस्वते प्राप्ते सम्भवं मम कीर्तय॥ ३ | वैवस्वतमन्वन्तरमें उनकी पुनः उत्पत्ति कैसे हुई? यह मुझे बतलाइये। साथ ही दक्ष प्रजापतिकी संतानोंसे | | दाक्षायणीनां च तथा प्रजाः कीर्तय मे प्रभो। | उत्पन्न प्रजाओंका, ऋषियोंके वंशका तथा भृगुवंशके | | ऋणीणां च तथा वंशं भृगुवंशविवर्धनम्॥ ४ | विस्तारका वर्णन कीजिये॥ २—४॥ | | मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान् बोले—**राजन्! अब मैं पूर्वकालमें | | मन्वन्तरेऽस्मिन् सम्प्राप्ते पूर्वं वैवस्वते तथा। | वैवस्वत-मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर जो परमेष्ठी ब्रह्मा थे, | | चरित्रं कथ्यते राजन् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ५ | उनका चरित्र बतला रहा हूँ। महादेवजीके शापसे अपने | | महादेवस्य शापेन त्यक्त्वा देहं स्वयं तथा। | शरीरका परित्याग कर ऋषिगण महात्मा ब्रह्माद्वारा अग्निसे | | ऋषयश्च समुद्भूता हुते शुक्रे महात्मना॥ ६ | उत्पन्न हुए। उसी अग्निसे परम तेजस्वी तपोनिधि भृगु | | देवानां मातरो दृष्ट्वा देवपत्न्यस्तथैव च। | उत्पन्न हुए। अङ्गारोंसे अङ्गिरा, शिखाओंसे अत्रि और | | स्कन्नं शुक्रं महाराज ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ७ | किरणोंसे महातपस्वी मरीचि उत्पन्न हुए। केशोंसे कपिश | | तज्जुहाव ततो ब्रह्मा ततो जाता हुताशनात्। | रंगवाले महातपस्वी पुलस्त्य प्रकट हुए। तत्पश्चात् | | ततो जातो महातेजा भृगुश्च तपसां निधिः॥ ८ | लम्बे केशोंसे महातपस्वी पुलहने जन्म लिया। अग्निकी | | अङ्गारैष्ष्वङ्गिरा जातो ह्यर्चिभ्योऽत्रिस्तथैव च। | दीप्तिसे तपोनिधि वसिष्ठ उत्पन्न हुए। महर्षि भृगुने | | मरीचिभ्यो मरीचिस्तु ततो जातो महातपाः॥ ९ | पुलोमा ऋषिकी दिव्य पुत्रीको भार्यारूपमें ग्रहण किया। | | केशैस्तु कपिशो जातः पुलस्त्यश्च महातपाः। | | | केशैः प्रलम्बैः पुलहस्ततो जातो महातपाः॥ १० | | | वसुमध्यात् समुत्पन्नो वसिष्ठस्तु तपोधनः। | | | भृगुः पुलोम्नस्तु सुतां दिव्यां भार्यामविन्दत॥ ११ | |


* गोत्र-प्रवर-निर्णयपर कई स्वतन्त्र निबन्ध हैं। पर वे सभी इन्हीं (१९५—२०३) अध्यायोंपर आदृत हैं। वैसे ऋक्संहिता (७। १८। ६—८। ३। ९ तक) तथा स्कन्दपुराण माहेश्वर खं० एवं ब्रह्मखण्डमें भी इसपर विस्तृत विचार है।

१९९- गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि कश्यपके वंशका वर्णन

* अध्याय १९५ *८१७
तस्यामस्य सुता जाता देवा द्वादश याज्ञिकाः।<br>भुवनो भौवनश्चैव सुजन्यः सुजनस्तथा॥ १२<br>ऋतुर्वसुश्च मूर्धा च त्याज्यश्च वसुदश्च ह।<br>प्रभवश्चाव्ययश्चैव दक्षोऽथ द्वादशस्तथा॥ १३<br>इत्येते भृगवो नाम देवा द्वादश कीर्तिताः।<br>पौलोम्यां जनयद् विप्रान् देवानां तु कनीयसः॥ १४<br>च्यवनं तु महाभागमाप्नुवानं तथैव च।<br>आप्नुवानात्मजश्चौर्वो जमदग्निस्तदात्मजः॥ १५<br>और्वो गोत्रकरस्तेषां भार्गवाणां महात्मनाम्।<br>तत्र गोत्रकरान् वक्ष्ये भृगोर्वै दीप्ततेजसः॥ १६<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>और्वश्च जमदग्निश्च वात्स्यो दण्डिर्नडायनः॥ १७<br>वैगायनो वीतिहव्यः पैलश्चात्र शौनकः।<br>शौनकायनजीवन्विरायेदः कार्षिणिस्तथा॥ १८<br>वैहीनरिर्विरूपाक्षो रौहित्यायनिरेव च।<br>वैश्वानरिस्तथा नीलो लुब्धः सावर्णिकश्च सः॥ १९<br>विष्णुः पौरोऽपि बालाकिरैलिकोऽनन्तभागिनः।<br>मृगमार्गेयमार्केण्डजविनो नीतिनस्तथा॥ २०<br>मण्डमाण्डव्यमाण्डूकफेनपाः स्तनितस्तथा।<br>स्थलपिण्डः शिखावर्णः शार्कराक्षिस्तथैव च॥ २१<br>जालधिः सौधिकः क्षुभ्यः कुत्सोऽन्यो मौद्गलायनः।<br>माङ्कायनो देवपतिः पाण्डुरोचिः सगालवः॥ २२<br>सांस्कृत्यश्चातकिः सर्पिर्यज्ञपिण्डायनस्तथा।<br>गार्ग्यायणो गायनश्च ऋषिर्गार्हायणस्तथा॥ २३<br>गोष्ठायनो वाह्रायनो वैशम्पायन एव च।<br>वैकणिर्निः शार्ङ्गरवो याज्ञेयिर्भ्राष्ट्रकायणिः॥ २४<br>लालाटिर्नाकुलिश्चैव लौक्षिण्योपरिमण्डलौ।<br>आलुकिः सौचकिः कौत्सस्तथान्यः पैङ्गलायनिः॥ २५<br>सात्यायनिर्मलयनिः कौटिलिः कौचहस्तिकः।<br>सौहः सोक्तिः सकौवाक्षिः कौसिश्चान्द्रमसिस्तथा॥ २६<br>नैकजिह्वो जिह्वकश्च व्याधाज्यो लौहवैरिणः।<br>शारद्वतिकनेतिष्यौ लोलाक्षिश्चलकुण्डलः॥ २७<br>वागायनिश्चानुमतिः पूर्णिमागतिकोऽसकृत्।<br>सामान्येन यथा तेषां पञ्चैते प्रवरा मताः॥ २८<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>और्वश्च जमदग्निश्च पञ्चैते प्रवरा मताः॥ २९उस पत्नीसे उनके यज्ञ करनेवाले बारह देवतुल्य पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम हैं—भुवन, भौवन, सुजन्य, सुजन, क्रतु, वसु, मूर्धा, त्याज्य, वसुद, प्रभव, अव्यय तथा बारहवें दक्ष। इस प्रकार ये बारह 'देवभृगु' नामसे विख्यात हैं। इसके बाद भृगुने पौलोमीके गर्भसे देवताओंसे कुछ निम्नकोटिके ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया। उनके नाम हैं—महाभाग्यशाली च्यवन और आप्नुवान। आप्नुवानके पुत्र और्व हैं। और्वके पुत्र जमदग्नि हुए॥५—१५॥<br><br>और्व उन महात्मा भार्गवोंके गोत्र-प्रवर्तक हुए। अब मैं दीप्त तेजस्वी भृगुके गोत्र-प्रवर्तकोंका वर्णन कर रहा हूँ—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, और्व, जमदग्नि, वात्स्य, दण्डि, नडायन, वैगायन, वीतिहव्य, पैल, शौनक, शौनकायन, जीवन्ति, आयेद, कार्षिणि, वैहिनरि, विरूपाक्ष, रौहित्यायनि, वैश्वानरि, नील, लुब्ध, सावर्णिक, विष्णु, पौर, बालाकि, ऐलिक, अनन्तभागिन, मृग, मार्गेय, मार्केण्ड, जबिन, नीतिन, मण्ड, माण्डव्य, माण्डूक, फेनप,, स्तनित, स्थलपिण्ड, शिखावर्ण, शार्कराक्षि, जालधि, सौधिक, क्षुभ्य, कुत्स, मौद्लायन, माङ्कायन, देवपति, पाण्डुरोचि, गालव, सांकृत्य, चातकि, सर्पि, यज्ञपिण्डायन, गार्ग्यायण, गायन, गार्हायण, गोष्ठायन, बाह्रायन, वैशम्पायन, वैकर्णिनि, शार्ङ्गरव, याज्ञेयि, भ्राष्ट्रकायणि, लालाटि, नाकुलि, लौक्षिण्य, उपरिमण्डल, आलुकि, सौचकि, कौत्स, पँगलायनि, सात्यायनि, मलयनि, कौटिलि, कौचहस्तिक, सौह, सोक्ति, सकौवाक्षि, कौसि, चान्द्रमसि, नैकजिह्व, जिह्वक, व्याधाज्य, लौहवैरिण, शारद्वतिक, नेतिष्य, लोलाक्षि, चलकुण्डल, वागायनि, आनुमति, पूर्णिमागतिक और असकृत्। साधारणरूपसे इन ऋषियोंमें ये पाँच प्रवर कहे जाते हैं—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, और्व और जामदग्नि॥१६—२९॥

८९८ * मत्स्यपुराण *

| अतः परं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वन्यान् भृगूद्वहान्।<br>जमदग्निर्बिदश्चैव पौलस्त्यो बैजभृत् तथा॥ ३०<br>ऋषिश्चोभयजातश्च कायनिः शाकटायनः।<br>और्वेया मारुताश्चैव सर्वेषां प्रवराः शुभाः॥ ३१ | इसके बाद भृगुवंशमें उत्पन्न अन्य ऋषियोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जमदग्नि, बिद, पौलस्त्य, बैजभृत, उभयजात, कायनि, शाकटायन, और्वेय और मारुत। इनके तीन शुभ प्रवर हैं— | | भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ३२ | भृगु, च्यवन और आप्नुवान। इन ऋषियोंमें परस्पर विवाहका निषेध है। | | भृगुदासो मार्गपथो ग्राम्यायणिकटायनी।<br>आपस्तम्बिस्तथा बिल्विर्नैकशिः कपिरेव च॥ ३३<br>आष्टिषेणो गार्दभिश्च कार्दमायनिरेव च।<br>आश्वायनिस्तथा रूपिः पञ्चार्षेयाः प्रकीर्तिताः॥ ३४<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>आष्टिषेणस्तथारूपिः प्रवराः पञ्च कीर्तिताः॥ ३५ | भृगुदास, मार्गपथ, ग्राम्यायणि,कटायनि, आपस्तम्बि, बिल्वि, नैकशि, कपि, आष्टिषेण, गार्दभि, कार्दमायनि, आश्वायनि तथा रूपि। इनके प्रवर ये पाँच हैं—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, आष्टिषेण तथा रूपि। | | परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>यस्को वा वीतिहव्यो वा मथितस्तु तथा दमः॥ ३६ | इन पाँच प्रवरवालोंमें भी विवाहकर्म निषिद्ध है। यस्क, वीतिहव्य, मथित, | | जैवन्तायनिर्मौञ्जश्च पिलिश्चैव चलिस्तथा।<br>भागिलो भागवित्तिश्च कौशापिस्त्वथ काश्यपिः॥ ३७<br>बालपिः श्रमदागेपिः सौरस्तिथिस्तथैव च।<br>गार्गीयस्त्वथ जाबालिस्तथा पौष्णायनो ह्यृषिः॥ ३८<br>रामोदश्च तथैतेषामार्षेयाः प्रवरा मताः।<br>भृगुश्च वीतिहव्यश्च तथा रैवसवैवसौ॥ ३९ | दम, जैवन्तायनि, मौञ्ज, पिलि, चलि, भागिल, भागवित्ति, कौशापि, काश्यपि, बालपि, श्रमदागेपि, सौर, तिथि, गार्गीय, जाबालि, पौष्णायन और रामोद। इन वंशोंमें ये प्रवर हैं—भृगु, वीतिहव्य, रेवस और वैवस। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होते। | | परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>शालायनिः शाकटाक्षो मैत्रेयः खाण्डवस्तथा॥ ४०<br>द्रौणायनो रौक्मायणिरापिशिश्चापिकायनिः।<br>हंसजिह्वस्तथैतेषां मार्षेयाः प्रवरा मताः॥ ४१ | शालायनि, शाकटाक्ष, मैत्रेय, खाण्डव, द्रौणायन, रौक्मायणि, आपिशि, आपिकायनि और हंसजिह्व। इनके प्रवर इन ऋषियोंके हैं— | | भृगुश्चैवाथ वध्र्यश्वो दिवोदासस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४२ | भृगु, वध्र्यश्व और दिवोदास। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। | | एकायनो यज्ञपतिर्मत्स्यगन्धस्तथैव च।<br>प्रत्यहश्च तथा सौरिश्चौक्षिश्चैवं कार्दमायनिः॥ ४३<br>तथा गृत्समदो राजन् सनकश्च महर्षिः।<br>प्रवरास्तु तथोक्तानामार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ ४४ | राजन्! एकायन, यज्ञपति, मत्स्यगन्ध, प्रत्यह, सौरि, ओक्षि, कार्दमायनि, गृत्समद और महर्षि सनक। इन वंशोंके दो ऋषियोंके प्रवर हैं— | | भृगुर्गृत्समदश्चैव आर्षेवेतौ प्रकीर्तितौ।<br>परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः॥ ४५ | भृगु तथा गृत्समद। इन वंशोंमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। |

२००- गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि वसिष्ठकी शाखाका कथन

* अध्याय १९६ * ८१९

एते तवोक्ता भृगुवंशजाता<br>महानुभावा नृप गोत्रकाराः।<br>एषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं विजहाति जन्तुः॥ ४६राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे भृगुवंशमें उत्पन्न महानुभाव गोत्रप्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर दिया। इनके नामोंका कीर्तन करनेसे प्राणी सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है॥ ३०—४६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भृगुवंशप्रवरकीर्तनं नाम पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भृगुवंशप्रवरवर्णन नामक एक सौ पञ्चानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९५॥


एक सौ छानबेवाँ अध्याय

प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि अङ्गिराके वंशका वर्णन

मत्स्य उवाच
मरीचितनया राजन् सुरूपा नाम विश्रुता।<br>भार्या चाङ्गिरसो देवास्तस्याः पुत्रा दश स्मृताः॥ १<br>आत्मायुर्दमनो दक्षः सदः प्राणस्तथैव च।<br>हविष्मांश्च गविष्ठश्च ऋतः सत्यश्च ते दश॥ २<br>एते चाङ्गिरसो नाम देवा वै सोमपायिनः।<br>सुरूपा जनयामास ऋषीन् सर्वेश्वरानिमान्॥ ३<br>बृहस्पतिं गौतमं च संवर्तमृषिमुत्तमम्।<br>उतथ्यं वामदेवं च अजस्यमृषिंजं तथा॥ ४<br>इत्येते ऋषयः सर्वे गोत्रकाराः प्रकीर्तिताः।<br>तेषां गोत्रसमुत्पन्नान् गोत्रकारान् निबोध मे॥ ५<br>उतथ्यो गौतमश्चैव तौलेयोऽभिजितस्तथा।<br>सार्धनेमिः सलौगाक्षिः क्षीरः कौष्टिकिरेव च॥ ६<br>राहुकर्णिः सौपुरिश्च कैरातिः सामलोमकिः।<br>पौषाजितिर्भार्गवतो हृषिश्चैरीडवस्तथा॥ ७<br>कारोटकः सजीवी च उपबिन्दुसुरैषिणौ।<br>वाहिनीपतिवैशाली क्रोष्टा चैवारुणायनिः॥ ८<br>सोमोऽत्रायनिकासोरुकौशल्याः पार्थिवस्तथा।<br>रौहिण्यायनिरेवाग्नी मूलपः पाण्डुरेव च॥ ९<br>क्षपाविश्वकरोऽरिश्च पारिकारारिरेव च।<br>आर्षेयाः प्रवराश्चैव तेषां च प्रवराञ्शृणु॥ १०<br>अङ्गिराः सुवचोतथ्य उशिजश्च महर्षिः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ११**मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! महर्षि मरीचिकी कन्या सुरूपा नामसे विख्यात थी। वह महर्षि अङ्गिराकी पत्नी थी। उसके दस देव-तुल्य पुत्र थे। उनके नाम हैं—आत्मा, आयु, दमन, दक्ष, सद, प्राण, हविष्मान्, गविष्ठ, ऋत और सत्य। ये दस अङ्गिराके पुत्र सोमरसके पान करनेवाले देवता माने गये हैं। सुरूपाने इन सर्वेश्वर ऋषियोंको उत्पन्न किया था। बृहस्पति, गौतम, ऋषिश्रेष्ठ संवर्त, उतथ्य, वामदेव, अजस्य तथा ऋषिज—ये सभी ऋषि गोत्रप्रवर्तक कहे गये हैं। अब इनके गोत्रोंमें उत्पन्न हुए गोत्रप्रवर्तकोंको मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। उतथ्य, गौतम, तौलेय, अभिजित, सार्धनेमि, सलौगाक्षि, क्षीर, कौष्ठिकि, राहुकर्णि, सौपुरि, कैराति, सामलोमकि, पौषाजिति, भार्गवत, चैरीडव, कारोटक, सजीवी, उपबिन्दु, सुरैषिण, वाहिनीपति, वैशाली, क्रोष्टा, आरुणायनि, सोम, अत्रायनि, कासोरु, कौशल्य, पार्थिव, रौहिण्यायनि, रेवाग्नि, मूलप, पाण्डु, क्षपा, विश्वकर, अरि और पारिकारारि—ये सभी श्रेष्ठ ऋषि गोत्रप्रवर्तक हैं। अब इनके प्रवरोंको सुनिये—अङ्गिरा सुवचोतथ्य तथा महर्षि उशिज। इन ऋषियोंके वंशवाले आपसमें विवाह नहीं करते थे॥ १—११॥

८२० * मत्स्यपुराण *

संस्कृत मूल (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
आत्रेयायणिंसौवेष्ट्यावग्निवेश्यः शिलास्थलिः।<br>बालिशायनिश्चैकेपी वाराहिर्बाष्कलिस्तथा॥ १२<br>सौटिश्च तृणकर्णिश्च प्रावहिश्वाश्वलायनिः।<br>वाराहिर्बर्हिसादी च शिखाग्रीविस्तथैव च॥ १३<br>कारकिश्च महाकापिस्तथा चोडुपतिः प्रभुः।<br>कौचकिर्धमितश्चैव पुष्पान्वेषिस्तथैव च॥ १४<br>सोमतन्विर्बृहत्तन्विः सालडिर्बालडिस्तथा।<br>देवरािर्देवस्थानिर्हारिकर्णिः सरिद्रुविः॥ १५<br>प्रावेपिः साद्यसुग्रीविस्तथा गोमेदगन्धिकः।<br>मत्स्याच्छाद्यो मूलहरः फलाहारस्तथैव च॥ १६<br>गाङ्गोदधिः कौरुपतिः कौरुक्षेत्रिस्तथैव च।<br>नायकिर्जैत्यद्रौणिश्च जैह्लायनिरेव च॥ १७<br>आपस्तम्बिर्मौञ्जवृष्टिर्मार्ष्टिपिङ्गलिरेव च।<br>पैलश्चैव महातेजाः शालङ्कायनिरेव च॥ १८<br>द्व्याख्येयो मारुतश्चैषां सर्वेषां प्रवरो नृप।<br>अङ्गिराः प्रथमस्तेषां द्वितीयश्च बृहस्पतिः॥ १९<br>तृतीयश्च भरद्वाजः प्रवराः परिकीर्तिताः।<br>परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः॥ २०आत्रेयायणि, सौवेष्ट्य, अग्निवेश्य, शिलास्थलि, बालिशायनि, चैकेपी, वाराहि, बाष्कलि, सौटि, तृणकर्णि, प्रावहि, आश्वलायनि, वाराहि, बर्हिसादी, शिखाग्रीवि, कारकि, महाकापि, उडुपति, कौचकि, धमित, पुष्पान्वेषि, सोमतन्वि, बृहत्तन्वि, सालडि, बालडि, देवरािर, देवस्थानि, हारिकर्णि, सरिद्रुवि, प्रावेपि, साद्यसुग्रीवि, गोमेदगन्धिक, मत्स्याच्छाद्य, मूलहर, फलाहार, गाङ्गोदधि, कौरुपति, कौरुक्षेत्रि, नायकि, जैत्यद्रौणि, जैह्लायनि, आपस्तम्बि, मौञ्जवृष्टि, मार्ष्टिपिङ्गलि, महातेजस्वी पैल, शालङ्कायनि, द्व्याख्येय तथा मारुत। नृप! इन ऋषियोंके प्रवर प्रथम अङ्गिरा, दूसरे बृहस्पति तथा तीसरे भरद्वाज कहे गये हैं। इन गोत्रवालोंमें भी परस्पर विवाह-कर्म नहीं होते॥ १२—२०॥
काणवायनाः कोपचयास्तथा वात्स्यतरायणाः।<br>भ्राष्ट्रकृद् राष्ट्रपिण्डी च लैन्द्राणिः सायकायनिः॥ २१<br>क्रोष्टाक्षी बहुवीती च तालकृन्मधुरावहः।<br>लावकृद् गालविद् गाथी मार्कटिः पौलिकायनिः॥ २२<br>स्कन्दसश्च तथा चक्री गार्ग्यः श्यामायनिस्तथा।<br>बलाकिः साहरिश्चैव पञ्चार्षेयाः प्रकीर्तिताः॥ २३<br>अङ्गिराश्च महातेजा देवाचार्यो बृहस्पतिः।<br>भरद्वाजस्तथा गर्गः सैत्यश्च भगवानृषिः॥ २४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>कपीतरः स्वस्तितरो दाक्षिः शक्तिः पतञ्जलिः॥ २५<br>भूयसिर्जलसंधिश्च विन्दुर्मादिः कुसीदकिः।<br>ऊर्वस्तु राजकेशी च वौषडिः शंसपिस्तथा॥ २६<br>शालिश्च कलशीकण्ठ ऋषिः कारीरयस्तथा।<br>काट्यो धान्यायनिश्चैव भावास्यायनिरेव च॥ २७<br>भरद्वाजिः सौबुधिश्च लघ्वी देवमतिस्तथा।<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतश्चैषां प्रवरो भूमिपोत्तम॥ २८काण्वायन, कोपचय, वात्स्यतरायण, भ्राष्ट्रकृत, राष्ट्रपिण्डी, लैन्द्राणि, सायकायनि, क्रोष्टाक्षी, बहुवीती, तालकृत, मधुरावह, लावकृत, गालवित्, गाथी, मार्कटि, पौलकायनि, स्कन्दस, चक्री, गार्ग्य, श्यामायनि, बलाकि तथा साहरि। इनके भी निम्नलिखित पाँच ऋषि प्रवर कहे गये हैं—महातेजस्वी अङ्गिरा, देवाचार्य बृहस्पति, भरद्वाज, गर्ग तथा ऐश्वर्यशाली महर्षि सैत्य। इनके वंशवालोंमें भी परस्पर विवाह नहीं होता। कपीतर, स्वस्तितर, दाक्षि, शक्ति, पतञ्जलि, भूयसि, जलसन्धि, विन्दु, मादि, कुसीदकि, ऊर्व, राजकेशी, वौषडि, शंसपि, शालि, कलशीकण्ठ, कारीरय, काट्य, धान्यायनि, भावास्यायनि, भरद्वाजि, सौबुधि, लघ्वी तथा देवमति। राजसत्तम! इन ऋषियोंके तीन

२०१- प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि पराशरके वंशका वर्णन

  • अध्याय १९६ *
८२१
अङ्गिरा दमवाहश्च तथा चैवाप्युरुक्षयः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ २९प्रवर बतलाये गये हैं—अङ्गिरा, दमवाह्य तथा उरुक्षय। इन गोत्रवालोंमें परस्पर विवाह नहीं होता॥ २१—२९॥
संकृतिश्च त्रिमाष्टिश्च मनुः सम्बधिरेव वा।<br>तण्डिश्चेनातकिश्चैव तैलका दक्ष एव च॥ ३०<br>नारायणिर्शाषिणिश्च लौक्षिर्गार्ग्यहरिस्तथा।<br>गालवश्च अनेहश्च सर्वेषां प्रवरो मतः॥ ३१<br>अङ्गिराः संकृतिश्चैव गौरवीतिस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ३२<br>कात्यायनो हरितकः कौत्सः पिंगस्तथैव च।<br>हण्डिदासो वात्स्यायनिर्माद्रिमौलिः कुबेरणिः॥ ३३<br>भीमवेगः शाश्वदर्भिः सर्वे त्रिप्रवराः स्मृताः।<br>अङ्गिरा बृहदश्वश्च जीवनाश्वस्तथैव च॥ ३४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>बृहदुक्थो वामदेवस्तथा त्रिप्रवरा मताः॥ ३५<br>अङ्गिरा बृहदुक्थश्च वामदेवस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः॥ ३६<br>कुत्सगोत्रोद्भवाश्चैव तथा त्रिप्रवरा मताः।<br>अङ्गिराश्च सदस्युश्च पुरुकुत्सस्तथैव च।<br>कुत्साः कुत्सैरवैवाह्या एवमाहुः पुरातनाः॥ ३७<br>रथीतराणां प्रवरास्त्यार्षेयाः परिकीर्तिताः।<br>अङ्गिराश्च विरूपश्च तथैव च रथीतरः।<br>रथीतरा ह्यवैवाह्या नित्यमेव रथीतरैः॥ ३८<br>विष्णुसिद्धिः शिवमत्तिर्जतृणः कतृणस्तथा।<br>पुत्रवश्च महातेजास्तथा वैरपरायणः॥ ३९<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरो नृप।<br>अङ्गिराश्च विरूपश्च वृषपर्वस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४०संकृति, त्रिमाष्टि, मनु, सम्बधि, तण्डि, एनातकि (नाचिकेत), तैलक, दक्ष, नारायणिशार्षिणि, लौक्षि, गार्ग्य, हरि, गालव तथा अनेह—इन सबके प्रवर अङ्गिरा, संकृति तथा गौरवीति माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। कात्यायन, हरितक, कौत्स, पिङ्ग, हण्डिदास, वात्स्यायनि, माद्रि, मौलि, कुबेरणि, भीमवेग तथा शाश्वदर्भि—इन सभीके तीन प्रवर कहे गये हैं। उनके नाम हैं—अङ्गिरा, बृहदश्व तथा जीवनाश्व। इनके वंशवालोंमें भी परस्पर विवाह नहीं होता। बृहदुक्थ तथा वामदेवके भी तीन प्रवर माने गये हैं। उनके नाम है—अङ्गिरा, बृहदुक्थ तथा वामदेव। इन वंशवालोंमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। कुत्सगोत्रमें उत्पन्न होनेवालोंके तीन प्रवर हैं—अङ्गिरा, सदस्यु तथा पुरुकुत्स। प्राचीन लोग बतलाते हैं कि कुत्सगोत्रवालोंसे कुत्सगोत्रवालोंका विवाह नहीं होता। रथीतरके वंशमें उत्पन्न होनेवालोंके भी तीन प्रवर हैं—अङ्गिरा, विरूप तथा रथीतर। ये लोग आपसमें विवाह नहीं करते। विष्णुसिद्धि, शिवमत्ति, जतृण, कतृण, महातेजस्वी पुत्र तथा वैरपरायण—ये सभी अङ्गिरा, विरूप और वृषपर्व—इन तीन ऋषियोंके प्रवरवाले माने गये हैं। राजन्! इन ऋषियोंके वंशमें परस्पर विवाह-कर्म नहीं होता॥ ३०—४०॥
सात्यमुग्रिर्महातेजा हिरण्यस्तम्बिमुद्गलौ।<br>त्र्यार्षेयो हि मतस्तेषां सर्वेषां प्रवरो नृप॥ ४१<br>अङ्गिरा मत्स्यदग्धश्च मुद्गलश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४२महातेजस्वी सात्यमुग्रि, हिरण्यस्तम्बि तथा मुद्गल—ये सभी अङ्गिरा, मत्स्यदग्ध तथा महातपस्वी मुद्गल—इन तीन ऋषियोंके प्रवर माने गये हैं। इन तीन ऋषियोंके गोत्रोंमें उत्पन्न होनेवालोंका परस्पर विवाह नहीं होता।
हंसजिह्वो देवजिह्वो ह्यग्निजिह्वो विराडपः।<br>अपाग्नेयस्त्वश्वयुश्च परण्यस्ता विमौद्गलाः॥ ४३हंसजिह्व, देवजिह्व, अग्निजिह्व, विराडप, अपाग्नेय, अश्वयु, परण्यस्त तथा विमौद्गल—

८२२ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्र्यार्षेयाभिमतास्तेषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>अङ्गिराश्चैव ताण्डिश्च मौद्गल्यश्च महातपाः॥ ४४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>अपाण्डुश्च गुरुश्चैव तृतीयः शाकटायनः।<br>ततः प्रागाथमा नारी मार्कण्डो मरणः शिवः॥ ४५<br>कटुर्मर्कटपश्चैव तथा नाडायनो ह्यृषिः।<br>श्यामायनस्तथैवैषां त्र्यार्षेयाः प्रवराः शुभाः॥ ४६<br>अङ्गिराश्चाजमीढश्च कत्यश्चैव महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४७ये सभी अङ्गिरा, ताण्डि तथा महातपस्वी मौद्गल्य—इन तीनों ऋषियोंके प्रवर माने गये हैं। इनके वंशधरोंमें भी विवाह नहीं होता। अपाण्डु, गुरु, शाकटायन, प्रागाथमा, नारी, मार्कण्ड, मरण, शिव, कटु, मर्कटप, नाडायन तथा श्यामायन—ये सभी अङ्गिरा, अजमीढ तथा महातपस्वी कत्य—इन तीन ऋषियोंके प्रवरवाले माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होते।
तित्तिरिः कपिभूश्चैव गार्ग्यश्चैव महानृषिः।<br>त्र्यार्षेयो हि मतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः शुभः॥ ४८<br>अङ्गिरास्तित्तिरिश्चैव कपिभूश्च महानृषिः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४९तित्तिरि, कपिभू और महर्षि गार्ग्य—इन सबके अङ्गिरा, तित्तिरि तथा कपिभू नामक तीन प्रवर कहे गये हैं, जिनमें एक-दूसरेका विवाह निषिद्ध है।
अथ ऋक्षभरद्वाजौ ऋषिवान् मानवस्तथा।<br>ऋषिमैत्रवरश्चैव पञ्चार्षेयाः प्रकीर्तिताः॥ ५०<br>अङ्गिरा सभरद्वाजस्तथैव च बृहस्पतिः।<br>ऋषिमैत्रवरश्चैव ऋषिवान् मानवस्तथा।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ५१ऋक्ष, भरद्वाज, ऋषिवान्, मानव तथा मैत्रवर—ये पाँच आर्षेय कहे गये हैं। इनके अङ्गिरा, भरद्वाज, बृहस्पति, मैत्रवर, ऋषिवान् तथा मानव नामक पाँच प्रवर हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता।
भारद्वाजो हुतः शौङ्गः शैशिरेयस्तथैव च।<br>इत्येते कथिताः सर्वे द्वयामुष्यायणगोत्रजाः॥ ५२<br>पञ्चार्षेयास्तथा ह्येषां प्रवराः परिकीर्तिताः।<br>अङ्गिराश्च भरद्वाजस्तथैव च बृहस्पतिः॥ ५३<br>मौद्गल्यः शैशिरश्चैव प्रवराः परिकीर्तिताः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ५४भारद्वाज, हुत, शौङ्ग तथा शैशिरेय—ये सभी द्व्यामुष्यायण गोत्रमें उत्पन्न कहे गये हैं। इन सबके अङ्गिरा, भरद्वाज, बृहस्पति, मौद्गल्य तथा शैशिर नामक पाँच प्रवर हैं। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होता।
एते तवोक्ताङ्गिरसस्तु वंशे<br>महानुभावा ऋषिगोत्रकाराः।<br>येषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ ५५इस प्रकार मैंने आपसे इस अङ्गिरा-वंशमें उत्पन्न होनेवाले गोत्रप्रवर्तक महानुभाव ऋषियोंका वर्णन कर दिया, जिनके नामका उच्चारण करनेसे पुरुष अपने सभी पापोंसे छुटकारा पा लेता है॥ ४१—५५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तनेऽङ्गिरोवंशकीर्तनं नाम षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनप्रसङ्गमें अङ्गिरावंशवर्णन नामक एक सौ छानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९६॥

  • अध्याय १९७ * ८२३

एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय

महर्षि अत्रिके वंशका वर्णन

मत्स्य उवाच
अत्रिवंशसमुत्पन्नान् गोत्रकारान् निबोध मे।<br>कर्दमायनशाखेयास्तथा शारायणाश्च ये॥ १<br>उद्दालकिः शौनकणिरथः शौक्रतवश्च ये।<br>गौरग्रीवो गौरजिनस्तथा चैत्रायणाश्च ये॥ २<br>अर्धपण्या वामरथ्या गोपनास्तकिबिन्दवः।<br>कर्णजिह्वो हरप्रीतिलैंद्राणिः शाकलायनिः॥ ३<br>तैलपश्च सवैलेयो अत्रिर्गोणीपतिस्तथा।<br>जलदो भगपादश्च सौपुषिborderश्च महातपाः॥ ४<br>छन्दोगेयस्तथैतेषां त्र्यार्षेयाः प्रवरा मताः।<br>श्यावाश्वश्च तथात्रिश्च आर्चनानश एव च॥ ५<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>दाक्षिर्बलिः पर्णविborderश्च ऊर्णनाभिः शिलार्दनिः॥ ६<br>बीजवापी शिरीषश्च मौञ्जकेशो गविष्ठिरः।<br>भलन्दनस्तथैतेषां त्र्यार्षेयाः प्रवरा मताः॥ ७<br>अत्रिर्गविष्ठिरश्चैव तथा पूर्वातिथिः स्मृतः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ८<br>आत्रेयपुत्रिकापुत्रानत ऊर्ध्वं निबोध मे।<br>कालेयाश्च सवालेया वामरथ्यास्तथैव च॥ ९<br>धात्रेयाश्चैव मैत्रेयास्त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः।<br>अत्रिश्च वामरथ्यश्च पौत्रिश्चैव महार्नृषिः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १०<br>इत्यत्रिवंशप्रभवास्त्ववोक्ता<br>  महानुभावा नृप गोत्रकाराः।<br>येषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन<br>  पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ ११मत्स्यभगवान्ने कहा—राजेन्द्र! अब मुझसे महर्षि अत्रिके वंशके उत्पन्न हुए कर्दमायन तथा शारायणशाखीय गोत्रकर्ता मुनियोंका वर्णन सुनिये। ये हैं—उद्दालकि, शौनकणिरथ, शौक्रतव, गौरग्रीव, गौरजिन, चैत्रायण, अर्धपण्य, वामरथ्य, गोपन, अस्तकि, बिन्दु, कर्णजिह्व, हरप्रीति, लैंद्राणि, शाकलायनि, तैलप, सवैलेय, अत्रि, गोणीपति, जलद, भगपाद, महातपस्वी सौपुष्पि तथा छन्दोगेय—ये शरायणके वंशमें कर्दमायनशाखामें उत्पन्न हुए ऋषि हैं। इनके प्रवर श्यावाश्व, अत्रि और आर्चनानश—ये तीन हैं। इनमें परस्परमें विवाह नहीं होता। दाक्षि, बलि, पर्णवि, ऊर्णनाभि, शिलार्दनि, बीजवापी, शिरीष, मौञ्जकेश, गविष्ठिर तथा भलन्दन—इन ऋषियोंके अत्रि, गविष्ठिर तथा पूर्वातिथि—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध हैं। इसके बाद अब मुझसे अत्रिकी पुत्रिका आत्रेयीसे उत्पन्न प्रवरकर्ता ऋषियोंका विवरण सुनिये—कालेय, वालेय, वामरथ्य, धात्रेय तथा मैत्रेय—इन ऋषियोंके अत्रि, वामरथ्य और महर्षि पौत्रि—ये तीन प्रवर ऋषि माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होता। राजन्! इस प्रकार मैंने आपको इन अत्रिवंशमें उत्पन्न होनेवाले गोत्रकार महानुभाव ऋषियोंका नाम सुना दिया, जिनके नामसंकीर्तनमात्रसे मनुष्य अपने सभी पाप-कर्मोंसे छुटकारा पा जाता है॥ १-११॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तनेऽत्रिवंशानुकीर्तनं नाम सप्तनवड्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९७॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनप्रसङ्गमें अत्रिवंशवर्णन नामक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९७॥

शाखाओंका वर्णन

८२४ | * मत्स्यपुराण *


एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय

प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि विश्वामित्रके वंशका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! अब मैं आपसे महर्षि अत्रिके ही वंशमें उत्पन्न अन्य शाखाका वर्णन कर रहा हूँ। नरेश्वर! महर्षि अत्रिके पुत्र श्रीमान् सोम हुए। उनके वंशमें विश्वामित्र उत्पन्न हुए, जिन्होंने अपनी तपस्याके बलसे ब्राह्मणत्वको प्राप्त किया। अब मैं उनके वंशका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। वैश्वामित्र (मधुच्छन्दा), देवरात, वैकृति, गालव, वतण्ड, शलंक, अभय, आयतायन, श्यामायन, याज्ञवल्क्य, जाबाल, सैन्धवायन, वाभ्रव्य, करीष, संश्रुत्य, संश्रुत, उलूप, औपहाव, पयोद, जनपादप, खरबाच, हलयम, साधित तथा वास्तुकौशिक—इन सभी ऋषियोंके वंशमें उत्पन्न होनेवालोंमें विश्वामित्र, देवरात तथा महायशस्वी उद्दाल—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। नराधिप! देवश्रवा, सुजातेय, सौमुक, कारुकायण, वैदेहरात तथा कुशिक—इन सभी महर्षियोंके वंशमें देवश्रवा, देवरात तथा विश्वामित्र—ये तीनों प्रवर माने गये हैं। इन वंशजोंमें परस्पर विवाह निषिद्ध है। राजन्! धनंजय, कपर्देय, परिकूट तथा पाणिनि*—इनके वंशमें विश्वामित्र, धनंजय और माधुच्छन्दस—ये तीन प्रवर माने गये हैं। विश्वामित्र, मधुच्छन्दा और अघमर्षण—इन तीन ऋषियोंके वंशजोंमें भी परस्पर विवाह नहीं होते॥ १–१२॥
अत्रेरेवापरं वंशं तव वक्ष्यामि पार्थिव।<br>अत्रेः सोमः सुतः श्रीमांस्तस्य वंशोद्भवो नृप॥ १<br>विश्वामित्रस्तु तपसा ब्राह्मण्यं समवाप्तवान्।<br>तस्य वंशमहं वक्ष्ये तन्मे निगदतः शृणु॥ २<br>वैश्वामित्रो देवरातस्तथा वैकृतिगालवः।<br>वतण्डश्च शलंकश्च ह्याभयश्चायतायनः॥ ३<br>श्यामायना याज्ञवल्क्या जाबालाः सैन्धवायनाः।<br>वाभ्रव्याश्च करीषाश्च संश्रुत्या अथ संश्रुताः॥ ४<br>उलूपा औपहावाश्च पयोदजनपादपाः।<br>खरवाचो हलयमाः साधिता वास्तुकौशिकाः॥ ५<br>त्र्यार्षेयाः प्रवरास्तेषां सर्वेषां परिकीर्तिताः।<br>विश्वामित्रो देवरात उद्दालश्च महायशाः॥ ६<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>देवश्रवाः सुजातेयाः सौमुकाः कारुकायणाः॥ ७<br>तथा वैदेहराता ये कुशिकाश्च नराधिप।<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः शुभः॥ ८<br>देवश्रवा देवरातो विश्वामित्रस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ९<br>धनंजयः कपर्देयः परिकूटश्च पार्थिव।<br>पाणिनिश्चैव त्र्यार्षेयाः सर्व एते प्रकीर्तिताः॥ १०<br>विश्वामित्रस्तथाद्यश्च माधुच्छन्दस एव च।<br>त्र्यार्षेयाः प्रवरा ह्येते ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ११<br>विश्वामित्रो मधुच्छन्दास्तथा चैवाघमर्षणः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १२
कामलायनिजश्चैव अश्मरथ्यस्तथैव च।<br>वञ्जुलिश्चापि त्र्यार्षेयः सर्वेषां प्रवरो मतः॥ १३कामलायनिज, अश्मरथ्य और वञ्जुलि—इन ऋषियोंके विश्वामित्र, अश्मरथ्य और महातपस्वी वञ्जुलि—ये तीनों प्रवर माने गये हैं।

* इससे सिद्ध है कि व्याकरण-कर्ता पाणिनि भी बहुत प्राचीन हैं।

२०३- प्रवरकीर्तनमें धर्मके वंशका वर्णन

* अध्याय १९९ *८२५

| विश्वामित्रश्चाश्मरथ्यो वञ्जुलिश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १४<br>विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकः पूरणस्तथा।<br>विश्वामित्रः पूरणश्च तयोर्द्वौ प्रवरौ स्मृतौ॥ १५<br>परस्परमवैवाह्याः पूरणाश्च परस्परम्।<br>लोहिता अष्टकाश्चैषां त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ १६<br>विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकश्च महातपाः।<br>अष्टका लोहितैर्नित्यमवैवाह्याः परस्परम्॥ १७<br>उदरेणुः क्रथकश्च ऋषिश्शोदावहिस्तथा।<br>आर्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः स्मृतः॥ १८<br>ऋणवन् गतिनश्चैव विश्वामित्रस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>उदुम्बरः सैषिरिटिर्ऋषिस्त्राक्षायणिस्तथा।<br>शाट्यायनिः करीराशी शालंकायनिलावकी।<br>मौञ्जायनिश्च भगवांस्त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ २०<br>खिलिखिलिस्तथा विद्द्यो विश्वामित्रस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ २१<br>एते तवोक्ताः कुशिका नरेन्द्र<br>महानुभावाः सततं द्विजेन्द्राः।<br>येषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ २२ | इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। विश्वामित्र, लोहित, अष्टक और पूरण—इनके विश्वामित्र और पूरण—ये दो प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध है। पूरण, लोहित तथा अष्टक—इन ऋषियोंके विश्वामित्र, लोहित तथा महातपस्वी अष्टक प्रवर माने गये हैं। इनमें अष्टक वंशवालोंका लोहित वंशवालोंके साथ परस्पर विवाह नहीं होता। उदरेणु, क्रथक तथा उदावहि—इन सबके ऋणवन्, गतिन तथा विश्वामित्र—ये तीन प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह निषिद्ध है। उदुम्बर, सैषिरिटि, त्राक्षायणि, शाट्यायनि, करीराशी, शालंकायनि, लावकि तथा ऐश्वर्यशाली मौञ्जायनि—इन ऋषियोंके खिलिखिलि, विद्द्य तथा विश्वामित्र—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। नरेन्द्र! मैंने आपसे इन कुशिकवंशी महानुभाव द्विजेन्द्रोंका वर्णन कर चुका। इनके नामसंकीर्तनसे मनुष्य समग्र पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १३—२२॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने विश्वामित्रवंशानुवर्णनं नामाष्टनवतत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें विश्वामित्रवंशानुवर्णन नामक एक सौ अठानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९८॥


एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय

गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि कश्यपके वंशका वर्णन

मत्स्य उवाच<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य तथा कुले।<br>गोत्रकारानृषीन् वक्ष्ये तेषां नामानि मे शृणु॥ १<br>आश्राायणिर्ऋषिगणो मेषकीरिटकायनाः।<br>उदग्रजा माठराश्च भोजा विनयलक्षणाः॥ २मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! महर्षि मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। अब मैं उन्हीं कश्यपके कुलमें जन्म लेनेवाले गोत्र-प्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर रहा हूँ, उनके नाम मुझसे सुनिये—आश्राायणि, मेपकीरिटकायन,

२०४- श्राद्धकल्प—पितृगाथा-कीर्तन

८२६ | * मत्स्यपुराण *

शालाहलेयाः कौरिष्टाः कन्यकाश्चासुरायणाः।<br>मन्दाकिन्यां वै मृगयाः श्रोतना भौतपायनाः ॥ ३<br>देवयाना गोमयाना ह्यधश्छायाभयाश्च ये।<br>कात्यायनाः शाक्रायणा बर्हियोगगदायनाः ॥ ४<br>भवनन्दिर्महाचक्रिर्दाक्षपायण एव च।<br>योधयानाः कार्त्तिक्यो हस्तिदानास्तथैव च॥ ५<br>वात्स्यायना निकृतजा ह्याश्वलायनिनस्तथा।<br>प्रागायणाः पैलमौलिराश्ववातायनस्तथा॥ ६<br>कौबेरकाश्च श्याकारा अग्निशर्माणायणश्च ये।<br>मेषपाः कैकरसपास्तथा चैव तु बभ्रवः॥ ७<br>प्राचेयो ज्ञानसंज्ञेया आग्रा प्रासेव्य एव च।<br>श्यामोदरा वैवशपास्तथा चैवोद्बलायनाः ॥ ८<br>काष्ठाहारिणमारीचा आजिहायनहास्तिकाः।<br>वैकणेयाः काश्यपेयाः सासिसाहारितायनाः ॥ ९<br>मातङ्गिनश्च भृगवस्त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः।<br>वत्सरः कश्यपश्चैव निध्रुवश्च महातपाः ॥ १०<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि द्वयामुष्यायणगोत्रजान् ॥ ११<br>अनसूयो नाकुरयः स्नातपो राजवर्तपः।<br>शैशिरोदवहिश्चैव सैरन्ध्री रौपसेवकिः॥ १२<br>यामुनिः काद्रुपिङ्गाक्षिः सजातम्बिस्तथैव च।<br>दिवावष्टाश्च इत्येते भक्त्या ज्ञेयाश्च काश्यपाः॥ १३<br>त्र्यार्षेयाश्च तथैवैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>वत्सरः कश्यपश्चैव वसिष्ठश्च महातपाः॥ १४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>संयातिश्च नभश्चोभौ पिप्पल्योऽथ जलंधरः ॥ १५<br>भुजातपूरः पूर्यश्च कर्दमो गर्दभीमुखः।<br>हिरण्यबाहुकैरातावुभौ काश्यपगोभिलौ ॥ १६<br>कुलहो वृषकण्डश्च मृगकेतुस्तथोत्तरः।<br>निदाघमसृणौ भर्त्स्या महान्तः केरलाश्च ये ॥ १७<br>शाण्डिल्यो दानवश्चैव तथा वै देवजातयः।<br>पैप्पलादिः सप्रवरा ऋषयः परिकीर्तिताः ॥ १८उदग्रज, माठर, भोज, विनय लक्षण, शालाहलेय, कौरिष्ट, कन्यक, आसुरायण, मन्दाकिनीमें उत्पन्न मृगय, श्रोतन, भौतपायन, देवयान, गोमयान, अधश्छाय, अभय, कात्यायन, शाक्रायण, बर्हियोग, गदायन, भवनन्दि, महाचक्रि, दाक्षपायण, बोधयान, कार्त्तिक्य, हस्तिदान, वात्स्यायन, निकृतज, आश्वलायनी, प्रागायण, पैलमौलि, आश्ववातायन, कौबेरक, श्याकार, अग्निशर्माण, मेषप, कैकरसप, वभ्रु, प्राचेय, ज्ञानसंज्ञेय, आग्न, प्रासेव्य, श्यामोदर, वैवशप, उद्बलायन, काष्ठाहारिण, मारीच, आजिहायन, हास्तिक, वैकर्णेय, काश्यपेय, सासि, साहारितायन तथा मातङ्गी भृगु—इन ऋषियोंके वत्सर, कश्यप तथा महातपस्वी निध्रुव—ये तीन प्रवर माने गये हैं। इनमें भी आपसमें विवाह नहीं होता॥१-१० ३॥<br><br>इसके उपरान्त अब मैं द्वयामुष्यायणके गोत्रमें उत्पन्न ऋषियोंके नामोंको बतला रहा हूँ—अनसूय, नाकुरय, स्नातप, राजवर्तप, शैशिर, उदवहि, सैरन्ध्री, रौपसेवकि, यामुनि, काद्रुपिंगाक्षि, सजातम्बि तथा दिवावष्ट—इन्हें भक्तिपूर्वक कश्यपके वंशमें उत्पन्न समझना चाहिये। इन सभी ऋषियोंके वत्सर, कश्यप तथा महातपस्वी वसिष्ठ—ये तीनों प्रवर माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। संयाति, नभ, पिप्पल्य, जलंधर, भुजातपूर, पूर्य, कर्दम, गर्दभीमुख, हिरण्यबाहु, कैरात, काश्यप, गोभिल, कुलह, वृषकण्ड, मृगकेतु, उत्तर, निदाघ, मसृण, भर्त्स्य, महान्, केरल, शाण्डिल्य, दानव, देवजाति तथा पैप्पलादि—इन सभी ऋषियोंके
* अध्याय २०० *८२७
त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>असितो देवलश्चैव कश्यपश्व महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>ऋषिप्रधानस्य च कश्यपस्य<br>दाक्षायणीभ्यः सकलं प्रसूतम्।<br>जगत्समग्रं मनुसिंह पुण्यं<br>किं ते प्रवक्ष्याम्यहमुत्तरं तु॥ २०असित, देवल तथा महातपस्वी कश्यप—ये तीनों ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजन्! ऋषियोंमें प्रमुख कश्यपद्वारा दाक्षायणीके गर्भसे इस समग्र जगत्की उत्पत्ति हुई है। अतः उनके वंशका यह विवरण अति पुण्यदायक है। इसके पश्चात् अब मैं तुमसे किस पवित्र कथाका वर्णन करूँ?॥ १९—२०॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने कश्यपवंशवर्णनं नाम नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें कश्यप-वंश-वर्णन नामक एक सौ निन्यानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९९॥


दो सौवाँ अध्याय

गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि वसिष्ठकी शाखाका कथन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! इसके बाद अब मैं वसिष्ठगोत्रमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। वसिष्ठगोत्रियोंका प्रवर एकमात्र वसिष्ठ ही है। इनका परस्पर विवाह नहीं होता। व्याघ्रपाद, औपगव, वैक्लव, शाद्वलायन, कपिष्ठल, औपलोम, अलब्ध, शठ, कठ, गौपायन, बोधप, दाकव्य, वाह्यक, बालिशय, पालिशय, वाग्ग्रन्थि, आपस्थूण, शीतवृत्त, ब्राह्मपुरेयक, लोभायन, स्वस्तिकर, शाण्डिलि, गौडिनि, वाडोहलि, सुमना, उपावृद्धि, चौलि, बौलि, ब्रह्मबल, पौलि, श्रवस्, पौण्डव तथा याज्ञवल्क्य—ये सभी महर्षि एक प्रवरवाले हैं। महर्षि वसिष्ठ इनके प्रवर हैं और इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। शैलालय, महाकर्ण, कौर्व्य, क्रोधिन, कपिञ्जल, बालखिल्य, भागवित्तायन, कौलायन, कालशिख, कोरकृष्ण, सुरायण, शाकाहार्य, शाकधी, काण्व, उपलप, शाकायन, उहाक, माषशरावय, दाकायन, बालवय, वाकय, गोरथ, लम्बायन, श्यामवय, क्रोडोदरायण,
वसिष्ठवंशजान् विप्रान् निबोध वदतो मम।<br>एकार्षेयस्तु प्रवरो वासिष्ठानां प्रकीर्तितः॥ १<br>वसिष्ठा एव वासिष्ठा अविवाह्या वसिष्ठजैः।<br>व्याघ्रपादा औपगवा वैक्लवा शाद्वलायनाः॥ २<br>कपिष्ठला औपलोमा अलब्धाश्च शठाः कठाः।<br>गौपायना बोधपाश्च दाकव्या ह्यथ वाह्यकाः॥ ३<br>बालिशयाः पालिशयास्ततो वाग्ग्रन्थयश्च ये।<br>आपस्थूणाः शीतवृत्तास्तथा ब्राह्मपुरेयकाः॥ ४<br>लोमायनाः स्वस्तिकराः शाण्डिलिगौडिनिस्तथा।<br>वाडोहलिश्च सुमनाश्चोपावृद्धिस्तथैव च॥ ५<br>चौलिर्वौलिर्ब्रह्मबलः पौलिः श्रवस एव च।<br>पौण्ड्वो याज्ञवल्क्यश्च एकार्षेया महर्षयः॥ ६<br>वसिष्ठ एषां प्रवरो ह्यवैवाह्याः परस्परम्।<br>शैलालयो महाकर्णः कौरव्यः क्रोधिनस्तथा॥ ७<br>कपिञ्जला वालखिल्या भागवित्तायनाश्च ये।<br>कौलायनः कालशिखः कोरकृष्णाः सुरायणाः॥ ८<br>शाकाहार्याः शाकधियः काण्वा उपलपाश्च ये।<br>शाकायना उहाकाश्च अथ माषशरावयः॥ ९<br>दाकायना बालवयो वाकयो गोरथास्तथा।<br>लम्बायनाः श्यामवयो ये च क्रोडोदरायणाः॥ १०

२०५- धेनु-दान-विधि

८२८ * मत्स्यपुराण *

| प्रलम्बायनाश्च ऋषय औपमन्यव एव च।<br>सांख्यायनाश्च ऋषयस्तथा वै वेदशेरकाः॥ ११<br>पालंकायन उद्गाहा ऋषयश्च बलेक्षवः।<br>मातेया ब्रह्ममलिनः पन्नागारिस्तथैव च॥ १२<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतश्चैषां सर्वेषां प्रवरस्तथा।<br>भगीवसुर्वसिष्ठश्च इन्द्रप्रमदिरेव च॥ १३ | प्रलम्बायन, औपमन्यु, सांख्य़ायन, वेदशेरक, पालंकायन, उद्गाह, बलेक्षु, मातेय, ब्रह्ममली तथा पन्नगारि—इन सभी ऋषियोंके भगीवसु, वसिष्ठ तथा इन्द्रप्रमदि—ये तीन ऋषि प्रवर कहे गये हैं। इनमें परस्पर विवाह निषिद्ध है॥ १—१३ १/२॥ | | परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>औपस्थलास्वस्थलयो बालो हालो हलाश्र्च ये ॥ १४<br>मध्यन्दिनो माक्षतयः पैप्पलादिर्विचक्षुषः।<br>त्रैशृङ्गायणासैबल्काः कुण्डिनश्च नरोत्तम ॥ १५<br>त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>वसिष्ठमित्रावरुणौ कुण्डिनश्च महातपाः॥ १६<br>दानकाया महावीर्या नागेयाः परमास्तथा।<br>आलम्बा वायनश्चापि ये चक्रोडादयो नराः ॥ १७<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>शिवकर्णौ वयश्चैव पादपश्च तथैव च॥ १८<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतश्चैषां सर्वेषां प्रवरस्तथा।<br>जातूकर्ण्यो वसिष्ठश्च तथैवात्रिश्च पार्थिव।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ १९<br>वसिष्ठवंशेऽभिहिता मयैते<br>ऋषिप्रधानाः सततं द्विजेन्द्राः।<br>येषां तु नाम्नां परिकीर्त्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ २० | नरोत्तम! औपस्थल, अस्वस्थलय, बाल, हाल, हल, मध्यन्दिन, माक्षतय, पैप्पलादि, विचक्षुष, त्रैशृङ्गायण, सैबल्क तथा कुण्डिन—इन सभी ऋषियोंके वसिष्ठ, मित्रावरुण तथा महातपस्वी कुण्डिन—ये तीन प्रवर माने गये हैं। दानकाय, महावीर्य, नागेय, परम, आलम्ब, वायन तथा चक्रोड आदि—इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। राजन्! शिवकर्ण, वय तथा पादप—इन सभीके जातूकर्ण्य, वसिष्ठ तथा अत्रि—ये तीन प्रवर कहे गये हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। इस प्रकार महर्षि वसिष्ठके गोत्रमें उत्पन्न हुए ऋषियोंकी नामावलि मैं आपसे बता चुका। इनके नामोंके संकीर्तनसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १४—२०॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने वसिष्ठगोत्रानुवर्णनं नाम द्विशततमोऽध्यायः॥ २०० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें वसिष्ठगोत्रानुवर्णन नामक दो सौवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०० ॥

२०६- कृष्णमृगचर्मके दानकी विधि और उसका माहात्म्य

* अध्याय २०१ *

८२९


दो सौ एकवाँ अध्याय

प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि पराशरके वंशका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
वसिष्ठस्तु महातेजा निमेः पूर्वपुरोहितः।<br>बभूवुः पार्थिवश्रेष्ठ यज्ञास्तस्य समंततः॥ १<br><br>श्रान्तात्मा पार्थिवश्रेष्ठ विशश्राम तदा गुरुः।<br>तं गत्वा पार्थिवश्रेष्ठो निमिर्वचनमब्रवीत्॥ २<br><br>भगवन् यष्टुमिच्छामि तन्मां याजय मा चिरम्।<br>तमुवाच महातेजा वसिष्ठः पार्थिवोत्तमम्॥ ३<br><br>कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व तव यज्ञैः सुसत्तमैः।<br>श्रान्तोऽस्मि राजन् विश्रम्य याजयिष्यामि ते नृप॥ ४<br><br>एवमुक्तः प्रत्युवाच वसिष्ठं नृपसत्तमः।<br>पारलौकिककार्ये तु कः प्रतीक्षितुमुत्सहेत्॥ ५<br><br>न च मे सौहृदं ब्रह्मन् कृतान्तेन बलीयसा।<br>धर्मकार्ये त्वरा कार्या चलं यस्माद्धि जीवितम्॥ ६<br><br>धर्मपथ्यौदनो जन्तुर्मृतोऽपि सुखमश्नुते।<br>श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम्॥ ७<br><br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं चास्य न वा कृतम्।<br>क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्रगतमानसम् ॥ ८<br><br>वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति।<br>न कालस्य प्रियः कश्चिद् द्वेष्यश्चास्य न विद्यते॥ ९<br><br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे प्रसह्य हरते जनम्।<br>प्राणवायोश्चलत्वं च त्वया विदितमेव च॥ १०<br><br>यदत्र जीव्यते ब्रह्मन् क्षणमात्रं तदद्भुतम्।<br>शरीरं शाश्वतं मन्ये विद्याभ्यासे धनार्जने॥ ११<br><br>अशाश्वतं धर्मकार्ये ऋणवानस्मि संकटे।<br>सोऽहं सम्भृतसम्भारो भवन्मूलमुपागतः॥ १२<br><br>न चेद् याजयसे मां त्वमन्यं यास्यामि याजकम्।राजसत्तम! महातेजस्वी वसिष्ठजी निमिके पूर्व पुरोहित थे। उनके सदा चारों ओर यज्ञ होते रहते थे। पार्थिवश्रेष्ठ! किसी समय यज्ञोंका सम्पादन करानेसे श्रान्त हुए गुरु वसिष्ठ विश्राम कर रहे थे, उसी समय राजाओंमें श्रेष्ठ निमिने उनके पास जाकर इस प्रकार कहा—'भगवन्! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, अतः मेरा यज्ञ कराइये, देर मत कीजिये।' यह सुनकर महातेजस्वी वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ निमिसे कहा—'राजन्! मैं आपके श्रेष्ठ यज्ञोंका अनुष्ठान करानेसे थक गया हूँ, अतः कुछ कालतक प्रतीक्षा कीजिये। नरेश! विश्राम कर लेनेके बाद मैं पुनः आपका यज्ञ कराऊँगा।' ऐसा कहे जानेपर राजश्रेष्ठ निमिने वसिष्ठजीको इस प्रकार उत्तर दिया—'ब्रह्मन्! परलोक-सम्बन्धी कार्यमें कौन मनुष्य प्रतीक्षा करना चाहेगा? बलवान् यमराजसे मेरी कोई मित्रता तो है नहीं, अतः धर्मकार्यमें शीघ्रता ही करनी चाहिये; क्योंकि जीवन क्षणभङ्गुर है। धर्मरूप ओदनको पथ्य बनानेवाला प्राणी मरनेपर भी सुखका उपभोग करता है। इसलिये कल होनेवाले कार्यको आज ही एवं दूसरे प्रहरमें सम्पादित होनेवाले कार्यको पूर्वप्रहरमें ही सम्पन्न कर लेना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य कर लिया है अथवा नहीं। अतः मृत्यु खेत, बाजार और गृहमें आसक्त या अन्यत्र कहीं आसक्त मनवाले मनुष्यको उसी प्रकार लेकर चल देती है, जैसे भेड़िया मृगके बच्चेको लेकर चला जाता है। कालका न तो कोई प्रिय है और न कोई द्वेष्य ही है। आयुके साधक कर्मके क्षीण होते ही वह बलपूर्वक मनुष्यका अपहरण कर लेता है। प्राणवायुकी चञ्चलता तो आप भी जानते ही हैं। ब्रह्मन्! ऐसी दशामें जो क्षणभर भी जीवित रहता है, यही आश्चर्य है। विद्याके अभ्यास और धनके उपार्जनमें शरीरको चिरस्थायी समझना चाहिये, किंतु धर्म-कार्यमें उसे क्षणभङ्गुर मानना चाहिये। ऐसे संकटके समय मैं ऋणी बन गया हूँ, अतः मैं सभी द्रव्योंका आयोजन कर आपके चरणोंके निकट आया हूँ। यदि इस समय आप मेरा यज्ञ नहीं करायेंगे तो मैं किसी अन्य याजकके पास जाऊँगा'॥ १—१२ ३॥

८३० | * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
एवमुक्तस्तदा तेन निमिना ब्राह्मणोत्तमः ॥ १३<br>शशाप तं निमिं क्रोधाद् विदेहस्त्वं भविष्यसि।<br>श्रान्तं मां त्वं समुत्सृज्य यस्मादन्यं द्विजोत्तमम्॥ १४<br>धर्मज्ञस्तु नरेन्द्र त्वं याजकं कर्तुमिच्छसि।<br>निमिस्तं प्रत्युवाचाथ धर्मकार्यरत्तस्य मे॥ १५<br>विघ्नं करोषि नान्येन याजनं च तथेच्छसि।<br>शापं ददामि तस्मात् त्वं विदेहोऽथ भविष्यसि॥ १६<br>एवमुक्ते तु तौ जातौ विदेहौ द्विजपार्थिवौ।<br>देहहीनौ तयोर्जीवौ ब्रह्माणमुपजग्मतुः ॥ १७<br>तावागतौ समीक्ष्याथ ब्रह्मा वचनमब्रवीत्।<br>अद्यप्रभृति ते स्थानं निमिजीव ददाम्यहम् ॥ १८<br>नेत्रपक्ष्मसु सर्वेषां त्वं वसिष्यसि पार्थिव।<br>त्वत्सम्बन्धात् तथा तेषां निमेषः सम्भविष्यति ॥ १९<br>चालयिष्यन्ति तु तदा नेत्रपक्ष्माणि मानवाः।<br>एवमुक्तो मनुष्याणां नेत्रपक्ष्मसु सर्वशः॥ २०<br>जगाम निमिजीवस्तु वरदानात् स्वयम्भुवः।<br>वसिष्ठजीवो भगवान् ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ २१<br>मित्रावरुणयोः पुत्रो वसिष्ठ त्वं भविष्यसि।<br>वसिष्ठेति च ते नाम तत्रापि च भविष्यति॥ २२<br>जन्मद्वयमतीतं च तत्रापि त्वं स्मरिष्यसि।<br>एतस्मिन्नेव काले तु मित्रश्च वरुणस्तथा॥ २३<br>बदर्याश्रममासाद्य तपस्तेपतुरव्ययम्।<br>तपस्यतोस्तयोरेवं कदाचिन्माधवे ऋतौ॥ २४<br>पुष्पितद्रुमसंस्थाने शुभे दयितमारुते।<br>उर्वशी तु वरारोहा कुर्वती कुसुमोच्चयम् ॥ २५<br>सुसूक्ष्मरक्तवसना तयोर्दृष्टिपथं गता।<br>तां दृष्ट्वेन्दुमुखीं सुभ्रूं नीलनीरजलोचनाम् ॥ २६<br>उभौ चुक्षुभतुर्देवौ तद्रूपपरिमोहितौ।<br>तपस्यतोस्तयोर्वीर्यमस्खलच्च मृगासने ॥ २७<br>स्कन्नं रेतस्ततो दृष्ट्वा शापभीता वराप्सरा।<br>चकार कलशे शुक्लं तोयपूर्णे मनोरमे॥ २८<br>तस्मादृषिवरौ जातौ तेजसाप्रतिमौ भुवि।<br>वसिष्ठश्चाप्यगस्त्यश्च मित्रावरुणयोः सुतौ॥ २९तब उन निमिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठने क्रोधपूर्वक निमिको शाप देते हुए कहा—'नरेन्द्र! यदि तुम धर्मके ज्ञाता होकर भी मुझ थके हुए पुरोहितका परित्याग कर किसी अन्य ब्राह्मणश्रेष्ठको याजक बनाना चाहते हो तो तुम शरीररहित हो जाओगे।' तब निमिने उत्तर दिया—'मैं धार्मिक कार्यके लिये उद्यत हूँ, किंतु आप इसमें विघ्न डाल रहे हैं तथा दूसरेके द्वारा यज्ञ सम्पन्न होने देना भी नहीं चाहते, अतः मैं भी आपको शाप दे रहा हूँ कि आप भी विदेह हो जायेंगे।' ऐसा कहते ही वे दोनों ब्राह्मण और राजा शरीररहित हो गये। तब उन दोनोंके देहहीन जीव ब्रह्माके पास गये। उन दोनोंको आया हुआ देखकर ब्रह्मा इस प्रकार बोले—'निमिरूप जीव! आजसे मैं तुम्हारे लिये एक स्थान दे रहा हूँ। राजन्! तुम सभी प्राणियोंके नेत्रोंके पलकोंमें निवास करोगे। तुम्हारे संयोगसे ही उनके निमेष-उन्मेष (आँखका खुलना और बंद होना) होंगे। तब सभी मानव नेत्रोंके पलकोंको चलाते रहेंगे।' इस प्रकार कहे जानेपर निमिका जीव ब्रह्माके वरदानसे सभी मनुष्योंके नेत्र-पलकोंपर स्थित हो गया॥ १३–२० १/२ ॥<br><br>तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने वसिष्ठके जीवसे कहा—'वसिष्ठ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे। वहाँ भी तुम्हारा नाम वसिष्ठ ही होगा और तुम्हें बीते हुए दो जन्मोंका स्मरण बना रहेगा। इसी समय मित्र और वरुण—दोनों बदरिकाश्रममें आकर दुष्कर तपस्यामें तत्पर थे। इस प्रकार उन दोनोंके तपस्यामें रत रहनेपर किसी समय वसन्त-ऋतुमें जब सभी वृक्ष और लताएँ पुष्पित थीं, मन्द-मन्द मनोहर पवन प्रवाहित हो रहा था, सुन्दरी उर्वशी पुष्पोंको चुनती हुई वहाँ आयी। वह महीन लाल वस्त्र धारण किये हुए थी। संयोगवश वह उन दोनों तपस्वियोंकी आँखोंके सामने आ गयी। उसके नेत्र नील कमलके समान थे तथा मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर था। उस सुन्दर भौंहोंवाली उर्वशीको देखकर उसके रूपपर मोहित हो उन दोनों तपस्वियोंका मन क्षुब्ध हो उठा। तब तपस्या करते हुए ही उन दोनोंका वीर्य मृगासनपर स्खलित हो गया। तब शापसे भयभीत हुई सुन्दरी उर्वशीने उस वीर्यको जलपूर्ण मनोरम कलशमें रख दिया। उस कलशसे वसिष्ठ और अगस्त्य नामक दो ऋषिश्रेष्ठ उत्पन्न हुए, जो भूतलपर अनुपम तेजस्वी थे। वे मित्र और वरुणके पुत्र कहलाये। तदनन्तर वसिष्ठने
* अध्याय २०१ *८३१
वसिष्ठस्तूपयेमेऽथ भगिनीं नारदस्य तु।<br>अरुंधतीं वरारोहां तस्यां शक्तिमजीजनत्॥ ३०<br><br>शक्तेः पराशरः पुत्रस्तस्य वंशं निबोध मे।<br>यस्य द्वैपायनः पुत्रः स्वयं विष्णुरजायत॥ ३१<br><br>प्रकाशो जनितो लोके येन भारतचन्द्रमाः।<br>येनाज्ञानमोऽन्धस्य लोकस्योन्मीलनं कृतम्।<br>पराशरस्य तस्य त्वं शृणु वंशमनुत्तमम्॥ ३२देवर्षि नारदकी बहन सुन्दरी अरुन्धतीसे विवाह किया और उसके गर्भसे शक्ति नामक पुत्रको उत्पन्न किया। शक्तिके पुत्र पराशर हुए। अब मुझसे उनके वंशका वर्णन सुनिये। स्वयं भगवान् विष्णु पराशरके पुत्र-रूपमें द्वैपायन नामसे उत्पन्न हुए, जिन्होंने इस लोकमें भारतरूपी चन्द्रमाको प्रकाशित किया, जिससे अज्ञानान्धकारसे अन्धे हुए लोगोंके नेत्र खुल गये। अब उन पराशरके श्रेष्ठ वंशकी परम्परा सुनिये॥२९—३२॥
काण्डशयो वाहनपो जैह्रपो भौमतापनः।<br>गोपालिरेषां पञ्चम एते गौराः पराशराः॥ ३३<br><br>प्रपोह्या वाह्यमयाः ख्यातेयाः कौतुजातयः।<br>हर्यश्विः पञ्चमो ह्येषां नीला ज्ञेयाः पराशराः॥ ३४<br><br>कार्ष्णायनाः कपिमुखाः काकेयस्था जपातयः।<br>पुष्करः पञ्चमश्चैषां कृष्णा ज्ञेयाः पराशराः॥ ३५<br><br>श्राविष्ठायनबालेयाः स्वायष्ठाश्चोपयाश्च ये।<br>इषीकहस्तश्चैते वै पञ्च श्वेताः पराशराः॥ ३६<br><br>वाटिको बादरिश्चैव स्तम्बा वै क्रोधनायनाः।<br>क्षैमिरेषां पञ्चमस्तु एते श्यामाः पराशराः॥ ३७<br><br>खल्यायना वार्ष्णायनास्तैलेयाः खलु यूथपाः।<br>तन्तिरेषां पञ्चमस्तु एते धूम्राः पराशराः॥ ३८<br><br>पराशराणां सर्वेषां त्र्यार्षेयः प्रवरो मतः।<br>पराशरश्च शक्तिश्च वसिष्ठश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या सर्व एते पराशराः॥ ३९<br><br>उक्तास्तवैते नृप वंशमुख्याः<br>  पराशराः सूर्यसमप्रभावाः।<br>येषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन<br>  पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ ४०काण्डशय, वाहनप, जैहाप, भौमतापन और पाँचवें गोपालि—ये गौर पराशर नामसे प्रसिद्ध हैं। प्रपोह्य, वाह्यमय, ख्यातेय, कौतुजाति और पाँचवें हर्यश्वि—इन्हें नील पराशर जानना चाहिये। कार्ष्णायन, कपिमुख, काकेयस्थ, जपाति और पाँचवें पुष्कर—इन्हें कृष्ण पराशर समझना चाहिये। श्राविष्ठायन, बालेय, स्वायष्ट, उपय और इषीकहस्त—ये पाँच श्वेत पराशर हैं। वाटिक, बादरि, स्तम्ब, क्रोधनायन और पाँचवें क्षैमि—ये श्याम पराशर हैं। खल्यायन, वार्ष्णायन, तैलेय, यूथप और पाँचवें तन्ति—ये धूम्र पराशर हैं। इन सभी पराशरोंके पराशर, शक्ति और महातपस्वी वसिष्ठ—ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इन सभी पराशरोंका परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध है। राजन्! मैंने आपसे सूर्यके समान प्रभावशाली पराशरवंशी गोत्रप्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर दिया। इनके नामोंके परिकीर्तनसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥३३—४०॥
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इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने पराशरवंशवर्णनं नामैकाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनमें पराशर-वंश-वर्णन नामक दो सौ एकवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०१॥


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२०७- उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व

८३२ * मत्स्यपुराण *


दो सौ दोवाँ अध्याय

गोत्रप्रवरकीर्तनमें महर्षि अगस्त्य, पुलह, पुलस्त्य और क्रतुकी शाखाओंका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अतः परमगस्त्यस्य वक्ष्ये वंशोद्भवान् द्विजान्।<br>अगस्त्यश्चः करम्भश्चः कौसल्याः शकटास्तथा ॥ १<br>सुमेधसो मयोभुवस्तथा गान्धारकायणाः।<br>पौलस्त्याः पौलहाश्चैव क्रतुवंशभवास्तथा ॥ २<br>त्र्यार्षेयाभिमताश्चैषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>अगस्त्यश्च महेन्द्रश्च ऋषिश्चैव मयोभुवः ॥ ३<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>पौर्णमासाः पारणाश्च त्र्यार्षेयाः परिकीर्तिताः ॥ ४<br>अगस्त्यः पौर्णमासश्च पारणश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्याः पौर्णमासास्तु पारणैः ॥ ५<br>एवमुक्तो ऋषीणां तु वंश उत्तमपौरुषः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि किं भवानद्य कथ्यताम् ॥ ६राजन्! इसके बाद अब मैं अगस्त्यके वंशमें उत्पन्न हुए द्विजोंका वर्णन कर रहा हूँ। अगस्त्य, करम्भ, कौसल्य, शकट, सुमेधा, मयोभुव, गान्धारकायण, पौलस्त्य, पौलह तथा क्रतु-वंशोत्पन्न—इनके अगस्त्य, महेन्द्र और महर्षि मयोभुव—ये तीन शुभ प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता। पौर्णमास और पारण—इन ऋषियोंके अगस्त्य, पौर्णमास और महातपस्वी पारण—ये तीन प्रवर हैं। पौर्णमासोंका पारणोंके साथ विवाह निषिद्ध है। राजन्! इस प्रकार मैंने ऋषियोंके उत्तम पुरुषोंसे परिपूर्ण वंशका वर्णन कर दिया। इसके बाद अब मैं किसका वर्णन करूँ, यह अब आप बतलाइये॥ १—६॥
मनुरुवाचमनुजीने पूछा—
पुलहस्य पुलस्त्यस्य क्रतोश्चैव महात्मनः।<br>अगस्त्यस्य तथा चैव कथं वंशस्तदुच्यताम् ॥ ७भगवन्! पुलह, पुलस्त्य, महात्मा क्रतु और अगस्त्यका वंश कैसा था, इसे बतलाइये॥ ७॥
मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान् बोले—
क्रतुः खल्वनपत्योऽभूद् राजन् वैवस्वतेऽन्तरे।<br>इध्मवाहं स पुत्रत्वे जग्राह ऋषिसत्तमः ॥ ८<br>अगस्त्यपुत्रं धर्मज्ञमागस्त्याः क्रतवस्ततः।<br>पुलहस्य तथा पुत्रास्त्रयश्च पृथिवीपते ॥ ९<br>तेषां तु जन्म वक्ष्यामि उत्तरत्र यथाविधि।<br>पुलहस्तु प्रजां दृष्ट्वा नातिप्रीतमनाः स्वकाम् ॥ १०<br>अगस्त्यजं दृढास्यं तु पुत्रत्वे वृतवांस्ततः।<br>पौलहाश्च तथा राजन्नागस्त्याः परिकीर्तिताः ॥ ११<br>पुलस्त्यान्वयसम्भूतान् दृष्ट्वा रक्षःसमुद्भवान्।<br>अगस्त्यस्य सुतं धीमान् पुत्रत्वे वृतवांस्ततः ॥ १२<br>पौलस्त्याश्च तथा राजन्नागस्त्याः परिकीर्तिताः।<br>सगोत्रत्वादिमे सर्वे परस्परमनन्वयाः ॥ १३राजन्! वैवस्वत-मन्वन्तरमें क्रतु जब संतानहीन हो गये, तब उन ऋषिश्रेष्ठने अगस्त्यके धर्मज्ञ पुत्र इध्मवाहको पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया। तभीसे अगस्त्यवंशी क्रतुवंशी कहलाने लगे। भूपाल! पुलहके तीन पुत्र थे, उनका जन्म-वृत्तान्त मैं आगे विधिपूर्वक वर्णन करूँगा। पुलहका मन अपनी संतानको देखकर प्रसन्न नहीं रहता था, अतः उन्होंने अगस्त्यके पुत्र दृढास्यको पुत्ररूपमें वरण कर लिया। राजन्! इसीलिये पुलहवंशी अगस्त्यवंशीके नामसे कहे जाते हैं। पुलस्त्य ऋषि अपनी संततिको राक्षसोंसे उत्पन्न होते देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। तब उन बुद्धिमान्ने अगस्त्यके पुत्रको पुत्ररूपमें वरण कर लिया। राजन्! तभीसे पुलस्त्यवंशी भी अगस्त्यवंशी कहलाने लगे। सगोत्र होनेके कारण इन सभीमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध वर्जित है।