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मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ
१६मेघदूतम्

क्तार्थमर्थान्तरन्यासेन प्रदर्शयति कामार्त्तेति । हि = यतः, कामार्त्ताः = मारा-ऽऽकुलाः, चेतनऽचेतनेषु = सजीव-निर्जीवेषु, प्रकृतिकृपणाः = औत्सर्गिककदर्याः ( भवन्ति ) । मदनेन व्याकुलीकृतानां कर्तव्याऽकर्तव्यविषयकविवेकशून्यत्वेन अचेतनमपि मेघं प्रति याचना नाऽनुपयुक्ता इति भावः ।

शब्दार्थः— धूमज्योतिःसलिलमरुतां = धुआँ, तेजः, जल और वायु का सन्निपातः = मिश्रित समूह, मेघः = बादल, क्व = कहाँ, पटुकरणैः = कार्य में समर्थ इन्द्रिय वाले, प्राणिभिः = प्राणियों के द्वारा, प्रापणीयः = भेजे जाने योग्य, सन्देशार्थाः = सन्देश की बात, क्व = कहाँ, दोनों में महान् अन्तर है, इति = इस अन्तर को, औत्सुक्यात् = उत्सुकता के कारण, अपरिगणयन् = बिना विचार किये गुह्यकः = यक्ष ने, तं = उस मेघ से, ययाचे = याचना की, हि = क्योंकि, कामार्त्ताः = कामान्ध, चेतनाचेतनेषु = सजीव और निर्जीव वस्तुओं के विषय में, प्रकृति-कृपणाः = स्वाभाविक रूप से दीन, अर्थात् विवेकशून्य हो जाते हैं ।

भावार्थः— धूमाग्निजलमरुतां समवायरूपोऽयमचेतनः जलदः कुत्र ? कार्यसमर्थेन्द्रिययुक्तैश्चेतनैः वाहनीयाः सन्देशवचनाः कुत्र ? इत्युभयोर्मध्ये महदन्तरं वर्तते, तथापि औत्सुक्यादेवमन्तरं यक्षः अविचारयन् 'मत्संदेशं मत्प्रियापार्श्वं नय' इति ययाचे, अर्थान्तरन्यासेन तं द्रढयति यतो हि कामपीडिताः जनाः 'अयं चेतनः अयमचेतनः' इति विवेकशून्याः स्वभावेनैव भवन्ति ।

हिन्दी— धुआँ, अग्नि, जल और वायु के संमिश्रण से बना कहाँ यह अचेतन मेघ ? और अच्छी इन्द्रियों से युक्त प्राणियों के द्वारा पहुँचाये जाने योग्य सन्देश की बातें कहाँ ? दोनों में कितना अन्तर है, फिर भी उत्कण्ठावश यक्ष ने इस अन्तर को बिना विचारे मेघ से सन्देश ले जाने की याचना की, क्योंकि काम से पीडित जन यह चेतन है यह अचेतन है इस प्रकार के विवेक से शून्य स्वाभाविक रूप से हो जाते हैं ।

समासः— धूमश्च ज्योतिश्च सलिलञ्च मरुच्च = धूमज्योतिः-सलिलमरुतः, तेषाम् ( द्वन्द्व ) । पटूनि करणानि येषां तैः = पटुकरणैः ( बहुव्रीहि ) । सन्देशा एव अर्थाः = सन्देशार्थाः ( कर्मधारय ) । कामेन आर्ताः = कामार्ताः ( तृ० तत्० ) । चेतनाश्च अचेतनाश्च, चेतनाऽचेतनाः ( द्वन्द्व ) तेषु ।

पूर्वमेघः १७

कोशः— प्राणी तु चेतनो जन्मी जन्तुजन्यशरीरिणः इत्यमरः, करणं साधकतमं क्षेत्रगात्रेन्द्रियेष्वपि इत्यमरः, इष्टार्थोद्युक्त इत्यमरः, सलिलं कमलं जलम् इत्यमरः, यक्षराड्गुह्यकेश्वर इत्यमरः, कामः पञ्चशरः इत्यमरः ।

टिप्पणी— सन्निपातः—सम् + नि + पत् + अ = सन्निपातः यहाँ 'सम्' और 'नि' इन उपसर्ग पूर्व गिरने के अर्थ में विद्यमान पत् ( लृ ) धातु से भाव में 'घञ्' प्रत्यय होकर सन्निपातः यह रूप बना है । पटुकरणैः— क्रियन्त एभिरिति करणानि करण अर्थ में विद्यमान ( डु ) कृञ् धातु से ल्युट् प्रत्यय होकर करण यह शब्द बना है । पटु विशेषण है । ( कृ + अन = करण ) । प्राणी— प्राणमस्यास्तीति, इस विग्रह में "प्राण" शब्द से "इनि" प्रत्यय हुआ है । प्रापणीयाः— प्रापयितुं योग्याः इस विग्रह में 'प्र' उपसर्गपूर्वक 'आप्' धातु से 'अनीयर्' प्रत्यय करके प्रापणीयाः बनाया जाता है । संदेशाः— सम् + दिश् + अ = 'सम्' उपसर्गपूर्वक दिश् धातु से भाव में घञ् प्रत्यय होकर सन्देश यह रूप निष्पन्न होता है । अपरिगणयन्— परि + गण् + शतृ = परिगणयन् 'परि' उपसर्गपूर्वक गिनने के अर्थ में विद्यमान 'गण' ( संस्थाने ) धातु के प्रथमा के समानाधिकरण में भी 'लटः शतृशानचावप्रथमा समानाधिकरणे' इस सूत्र से शतृ प्रत्यय हुआ है, क्योंकि यहाँ लट् की अनुवृत्ति पहले से ही आती ही थी पुनः 'लट्' का विधान किया जाने के कारण । परिगणयन् यहाँ 'नञ्' सूत्र से समास हुआ है एवं 'नलोपो 'नञ्' से नकार का लोप हो गया और तदन्तर्वर्ति अकार बच गया है । गुह्यकः— संवरण अर्थ में विद्यमान 'गुह' धातु से 'ण्वुल्तृचौ' इस सूत्र से ण्वुल् प्रत्यय होकर 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' इस सूत्र से 'यक्' का आगम करके 'गुह्यक' यह रूप बनता है । गूहति धनं रक्षति इति गुह्यकः ( गुह + य + अक = गुह्यकः ) । यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि अमरकोषकार ने प्रथमकाण्ड के स्वर्गवर्ग में ही गुह्यक एवं यक्ष को अलग-अलग देवयोनि विशेष माना है । जैसे—

'विद्याधरोऽप्सरो' 'यक्ष' रक्षोगन्धर्व-किन्नराः ।
'पिशाचो' गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमीदेवयोनयः ॥

१८मेघदूतम्

परन्तु कालिदास ने इन दोनों शब्दों को पर्यायवाची माना है; क्योंकि प्रथम श्लोक में उन्होंने 'यक्ष' शब्द का प्रयोग करके पुनः पञ्चम श्लोक में उसी अभिप्राय से 'गुह्यक' शब्द का प्रयोग किया है। इस तरह इन दोनों में मतभेद प्रतीत होता है परन्तु उसका परिहार 'गोबलीवर्द' न्याय से किया जा सकता है। यहाँ कोशकार ने दोनों को अलग-अलग 'गोबलीवर्द न्याय' से माना है। जैसे 'गो' इस शब्द का अर्थ 'गाय' भी है और बलीवर्द ( बैल ) भी है। बलीवर्द में बलीवर्द रूप 'गो' का अभेद है एवं 'गाय' रूप गो का भेद है। इस प्रकार कोशकार व्याडि ने 'गुह्यक' शब्द का अर्थ 'धनरक्षक यक्ष' माना है। इस प्रकार एक पक्ष सामान्य हुआ और दूसरा गुह्यक धनरक्षक रूप विशेष। इस तरह दोनों के विरोध का परिहार—हो जाता है। धनं रक्षति ये यक्षास्ते स्युर्गुह्यकसंज्ञकाः इति व्याडिः। ययाचे=याचना अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'याच्' धातु के लिट् लकार के प्रथमपुरुष के एक वचन का यह रूप है। प्रकृति-कृपणाः = प्रकृत्या कृपणाः यहाँ 'प्रकृत्यादिभ्यः उपसंख्यानम्' इस सूत्र से तृतीया होकर तृ० तत्पुरुष समास हुआ है।

**अलंकार:—**इस श्लोक में विषमाऽलङ्कार एवं अर्थान्तरन्यासालङ्कार का अङ्गाङ्गिभाव होने के कारण 'सङ्कर' अलंकार है। क्योंकि श्लोक के पूर्वार्ध के प्रथम चरण में 'मेघ' एवं द्वितीय चरण में 'सन्देश' इन दो विरूप पदार्थों के संघटन होने के कारण साहित्यदर्पण के 'विरूपयोः संघटना या च तद्विषमं स्मृतम्' इस लक्षण के अनुसार यहाँ विषमाऽलङ्कार है। एवञ्च 'कामार्ताः हि प्रकृत' इत्यादि सामान्य से ऊपर के कहे गये विशेष का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यासाऽलङ्कार है॥ ५॥

जातं वंशे भुवन-विदिते पुष्करावर्तकानां
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः।
तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद्दूरबन्धुर्गतोऽहं
याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा॥ ६॥

पूर्वमेघः १९

अन्वयः—त्वां भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां वंशे जातं कामरूपं मघोनः प्रकृतिपुरुषं जानामि तेन विधिवशात् दूरबन्धुः अहं त्वयि अर्थित्वं गतः अधिगुणे मोघा याच्ञा वरम् अधमे लब्धकामा अपि न ( वरम् )।

व्याख्या—( हे मेघ ! ) त्वाम् = भवन्तम्, भुवनविदिते = लोक-विख्याते, पुष्करावर्तकानां = पुष्करावर्तकाऽख्यानां मेघानां, वंशे = अन्वये, जातम् = उत्पन्नम्, कामरूपं = यथेच्छविग्रहम्, मघोनः = इन्द्रस्य, प्रकृतिपुरुषम् = प्रधानपुरुषम्, जानामि = वेद्मि परिचिनोमीतियावत् । तेन = उच्चकुलोत्पन्नो भवानतः, विधिवशात् = दैवदुर्विपाकात्, दूरबन्धुः = वियुक्तप्रियः, अहं = यक्षः, त्वयि = भवति, भवत्समीपे इत्यर्थः, अर्थित्वम् = याचकत्वम्, गतः = प्राप्तः । अधिगुणे = गुणशालिनि पुरुषे, याच्ञा = याचना, मोघा अपि = व्यर्था अपि, वरम् = श्रेष्ठा, अधमे = गुणरहिते पुरुषे, लब्धकामा अपि = पूर्णमनोरथा अपि ( याच्ञा ) न ( वरम् ) इति ।

शब्दार्थः—(हे मेघ !) त्वाम् = तुमको, भुवन—विदिते = लोकविख्यात, पुष्करावर्तकानाम् = पुष्करावर्तक नाम वाले मेघों के ( श्रेष्ठ ), वंशे = कुल में, जातम् = उत्पन्न हुए को, कामरूपम् = अपना इच्छानुसार शरीर धारण करने वाले को, मघोनः = इन्द्र के, प्रकृतिपुरुषम् = प्रधान पुरुष को, जानामि = (मैं) जानता हूँ । तेन = चूंकि तुम अच्छे कुल में उत्पन्न हुए हो, इसलिये, विधिवशात् = दुर्भाग्यवश, दूरबन्धुः = प्रियजन से वियुक्त, अहम् = मैं, त्वयि = तुम्हारे पास, अर्थित्वम् = याचक रूप में, गतः = आया । अधिगुणे = गुणी व्यक्ति के पास, याच्ञा = याचना, मोघा अपि = निष्फला भी, वरम् = अच्छी है; परन्तु अधमे = गुणरहित व्यक्ति के पास, लब्धकामा अपि = पूर्ण अभिलाषा होने पर भी, न वरम् = श्रेष्ठ नहीं है ।

भावार्थः—हे जलद ! भुवनविख्याते, पुष्करावर्तकाभिधेयानां मेघानां वंशे उत्पन्नं यथेच्छ-विग्रहधारिणमिन्द्रस्य प्रधानपुरुषं भवन्तमहं जानामि, अत एव दैवदुर्विपाकात् प्रियायाः दूरस्थोऽहं भवत्सकाशं याचकत्वेनागतः । भवादृशे गुणशालिपुरुषे निष्फला अपि याचना श्रेष्ठा भवति, अधमे पुरुषे पूर्णाभिलाषा अपि न श्रेष्ठा भवति ।

२० मेघदूतम्

हिन्दी— हे मेघ ! भुवनविख्यात पुष्करावर्तक नामक मेघ के वंश में उत्पन्न, अपने इच्छानुकूल शरीर धारण करने में समर्थ, इन्द्र के प्रधान पुरुष आपको मैं जानता हूँ । इसलिए, दुर्भाग्यवश पत्नी से बिछुड़ा हुआ मैं आपके पास याचक बन के आया हूँ । क्योंकि ( आप के समान ) गुणी व्यक्ति के पास यदि याचना निष्फल भी हो जाय तो अच्छी है, परन्तु निर्गुणी व्यक्ति के पास यदि सफल हो जाय तो भी अच्छी नहीं है ।

समासः— भुवनेषु विदित इति भुवनविदितः ( स० तत्० ) तस्मिन्, पुष्कराश्च आवर्तकाश्च इति पुष्करावर्तकाः ( द्वन्द्व ) इति मल्लिनाथमतानुसारम् अन्ये तु एतन्नामकैक एव मेघः । प्रकृतिषु पुरुषः प्रकृतिपुरुषः (स० तत्०) तम् । कामकृतानि रूपाणि यस्य तम् ( मध्यम पदलोपी बहुव्रीहिः ) । दूरे बन्धुर्यस्य स ( बहुव्रीहिः ) । लब्धः कामः यया सा लब्धकामा ( बहुव्रीहिः ) ।

कोशः— 'जगती लोको विष्टपं भुवनं जगत् इत्यमरः । पुष्करं करिशुण्डाग्रे वाद्यभाण्डमुखे जले इत्यमरः । इन्द्रो मरुत्वान् मघवा इत्यमरः । प्रकृतिर्गुण-साम्ये स्यादमात्यादिस्वभावयोः इति मेदिनी । दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः इत्यमरः । सगोत्र-बान्धवज्ञाति बन्धु स्व-स्वजनाः समाः इत्यमरः । वनीयको याचनको मार्गणो याचकार्थिनौ इत्यमरः ।

टिप्पणी— भुवनविदिते यह सप्तमी समासान्त शब्द है । यहाँ ज्ञानार्थक ‘विद्’ धातु से भूतार्थ में ‘निष्ठा’ इस सूत्र से ‘क्त’ प्रत्यय किया गया है, न कि ‘मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च’ इस सूत्र से । क्योंकि यदि ‘मतिबुद्धि०’ इस सूत्र से वर्तमान अर्थ में ‘क्त’ प्रत्यय करेंगे तो ‘क्तस्य च वर्तमाने’ इस सूत्र से ‘भुवन’ शब्द से षष्ठी विभक्ति आयेगी एवञ्च ‘क्तेन च पूजायाम्’ इस सूत्र से समास का निषेध हो जायगा । फलस्वरूप ‘भुवनविदिते’ ऐसे शब्द निष्पन्न न होकर बल्कि ‘भुवनानां विदिते’ ऐसा असमस्त रूप होने लगेगा जो यहाँ इष्ट नहीं है । पुष्करावर्तकानाम् = मल्लिनाथजी ने ‘पुष्कराश्च आवर्तकाश्च’ ऐसा विग्रह करके उक्तपद को द्वन्द्व समासान्त माना है । परन्तु एक ही मेघ दो वंशों में कैसे उत्पन्न हो सकेगा ? इसलिए कुछ लोग विष्णुपुराण के—

पूर्वमेघः २१

‘पुष्करा नाम ये मेघा बृहन्तस्तोयमत्सराः ।
पुष्करावर्तकांस्तेन कारणेनेह शब्दिताः ॥’

इस उद्धरण के अनुसार प्रलयङ्कारी एक मेघवंश को ही ‘पुष्करावर्तक’ कहते हैं । मातृगोत्र एवं पितृगोत्र के प्रधान पुरुष ‘पुष्कर’ और ‘आवर्तक’ हो सकते हैं एवं उन दोनों की सन्तति एक मेघ हो सकता है, इस प्रकार मल्लिनाथ जी का भी व्याख्यान युक्तियुक्त माना जा सकता है । जातम् = प्रादुर्भाव अर्थ में विद्यमान ‘जन्’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके ‘जातम्’ शब्द निष्पन्न हुआ है । कामम् = काममस्यास्तीति इस विग्रह में ‘काम’ शब्द से ‘अर्श आदिभ्योऽच्’ इस सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय करके ‘कामम्’ शब्द बना है। जानामि = ‘ज्ञा’ धातु के उत्तम पुरुष के एकवचन का रूप जानामि होता है । ‘ज्ञाजनोर्जा’ इस सूत्र से ज्ञा के स्थान पर ‘जा’ आदेश है । अर्थित्वम् = असन्निहितोऽर्थोऽस्यास्तीति अर्थी’ यहाँ पर जिसके पास अर्थ न हो, अर्थात् अर्थ के असन्निधान में ‘अर्थ’ शब्द से ‘अर्थेन्चासन्निहिते’ इस सूत्र से इनि प्रत्यय हुआ है तथा ‘अर्थी’ (अर्थ + इन् ) यह रूप बना है । अर्थिनो भावः अर्थित्वम् ‘तस्य भावस्त्वतलौ’ इस सूत्र से भाव में ‘अर्थी’ शब्द से ‘त्व’ प्रत्यय होकर ‘त्वान्तं क्लीबम्’ के नियमानुसार नपुंसकान्त ‘अर्थित्वम्’ यह रूप बना है । अर्थ के सन्निधान में तो ‘अर्थवान्’ हुआ और जिसके पास अर्थ न हो वह ‘अर्थी’ हुआ । याच्ञा—याचन = याच्ञा याचना अर्थ में विद्यमान ‘याच्’ धातु से ‘यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ्’ इस सूत्र से ‘नङ्’ प्रत्यय हुआ है पश्चात् ‘स्तोः श्चुना श्चुः’ इस सूत्र से श्चुत्व एवं स्त्रीत्व विवक्षा में ‘टाप्’ करके ‘याच्ञा’ शब्द बना है ।

अलङ्कार—यहाँ अर्थित्व प्राप्त रूप विशेष अर्थ का समर्थन चतुर्थचरणस्थ सामान्यार्थ के द्वारा होने के कारण ‘अर्थान्तरन्यास अलंकार है ॥ ६ ॥

सन्तप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद ! प्रियायाः
सन्देशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य ।

२२ मेघदूतम्

गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणाम्
बाह्योद्यान-स्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या ॥७॥

अन्वयः—हे पयोद ! त्वं सन्तप्तानां शरणम् असि, तत् धनपतिक्रोध-विश्लेषितस्य मे सन्देशं प्रियाया हर । बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या अलका नाम यक्षेश्वराणां वसतिः ते गन्तव्या ।

व्याख्या—हे पयोद ! = हे जलद ! त्वम् सन्तप्तानाम् = आतपेन विरहेण वा पीडितानाम्, शरणं = रक्षकः, असि = वर्तसे, आतपपीडितं जलदानेन, विरहपीडितं स्वस्थान-प्रेरणया वा रक्ष्यसे इति भावः । तत् = तस्माद्धेतोः, रक्षकत्वादिति भावः । धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य = कुबेरकोपवियुक्तस्य, मे = मम यक्षस्य, सन्देशम् = वार्तां, प्रियायाः = प्रेयस्याः, पार्श्वम् इति शेषः । हर = नय । सा मत्प्रिया कुत्र वर्तते, तस्य स्थानस्य किन्नामेतिजिज्ञासायामाह । बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या = बाह्योद्याने = बहिरारामे, स्थितस्य = वर्तमानस्य, हरस्य = शम्भोः, शिरसि = मस्तके या चन्द्रिका = ज्योत्स्ना, तया धौतहर्म्या = प्रक्षालिताट्टालिका अलका, नाम = एतन्नामिका यक्षेश्वराणाम् = गुह्यकाधिपतीनाम्, वसतिः = स्थानम्, ते = मेघस्य, गन्तव्या = यातव्या ।

शब्दार्थः—हे पयोद ! = हे मेघ ! त्वम् = तुम, सन्तप्तानाम् = धूप से पीड़ित अथवा वियोग से पीड़ित जनों के, शरणम् = रक्षक, असि = हो । तत् = तुम रक्षक हो इसलिए, धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य = कुबेर के क्रोध के कारण अपनी प्रिया से वियुक्त, मे = मेरा ( यक्ष का ), सन्देशम् = सन्देश, प्रियायाः = प्रिया के पास, हर = पहुँचा दो । यदि तुम कहो कि, मेरी प्रिया कहाँ रहती है, उस स्थान का क्या नाम है तो सुनो, बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या = नगर से बाहर के उद्यान में विद्यमान शिव जी के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से जहाँ के महल धुल रहे हैं, अलका नाम = अलका नाम की यक्षेश्वराणाम् = कुबेर की ( वही ) वसतिः = नगरी, ते = तुम्हें, गन्तव्या = जाना है ।

पूर्वमेघः २३

भावार्थः—हे मेघ ! घर्मपीडितानां विरहसन्तप्तानां वा त्वं रक्षकोऽसि, अतः कुबेरकोपवियुक्तस्य मे यक्षस्य सन्देशं मत्प्रियायाः पार्श्वं प्रापय । यत्र मे प्रिया वसति तत्स्थानं कथयामि तथाहि यस्याः नगर्याः हर्म्यानि नगरबहिरा-रामस्थशिवशिरश्चन्द्रमसः कान्तिभिः सततं प्रक्षाल्यन्ते, सा अलका नाम्नी कुबेरस्य निवासभूमिरेव त्वया गन्तव्या । तत्रैव मत्प्रिया वर्तते इति भावः ।

हिन्दी—हे मेघ ! तुम सन्तप्त जनों के रक्षक हो, ( वह चाहे धूप से पीड़ित हों या विरह से ) अतः कुबेर के क्रोध के कारण अपनी प्रिया से वियुक्त मेरा सन्देश मेरी प्रिया के पास पहुँचा दो । जहाँ के भवन,नगर के बाहर स्थित बाग में विद्यमान शिवजी के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से धुलते रहते हैं, अलका नाम की उसी कुबेर की निवास भूमि में तुम्हें जाना है ।

समासः—धनपतेः क्रोध = धनपतिक्रोधः ( ष० तत्० ) तेन विश्लेषितः तस्य ( तृ० तत्० ) धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य, बाह्यञ्च तदुद्यानं=बाह्योद्यानम् ( प्र० तत्० ) स्थितश्चासौ हर = स्थितहरः ( कर्मधारय ) बाह्योद्याने स्थितहरः = बाह्योद्यानस्थितहरः (स० तत्०) तस्य शिरः (ष० तत्०) तस्मिन् या चन्द्रिका ( स० तत्० ) तया धौतानि हर्म्याणि यत्र सा ( बहुव्रीहिः ) ।

कोशः—सन्तापः सञ्ज्वरः समौ इत्यमरः । शरणं गृहरक्षित्रोः इत्यमरः । चन्द्रिका कौमुदी ज्योत्स्ना इत्यमरः । सन्देशवाग् वाचिकं स्यात् इत्यमरः । हर्म्यादि धनिनां वासः इत्यमरः । नाम प्रकाश्य सम्भाव्य क्रोधोपगमकुत्सने इत्यमरः ।

टिप्पणीपयोद—पयो ददाति इति पयोदः उसके सम्बोधन में हे पयोद ! 'पयस्' उपपद रहते '(डु) दा' धातु से 'आतोऽनुपसर्गे कः' इस सूत्र से क प्रत्यय होकर 'पयोद' यह रूप बना है । सन्तप्तः—सम् + तप् + क्त = सम् उपसर्ग-पूर्वक 'तप्' धातु से क्त प्रत्यय होकर 'सन्तप्त' यह शब्द बना है । विश्लेषितः—वि + श्लिष् + क्त = वि उपसर्गपूर्वक 'श्लिष्' धातु से 'क्त' प्रत्यय हुआ है । प्रियायाः—'प्रीञ्' धातु से 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' से 'क' प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके प्रिया यह रूप बना है । बाह्यम्—'बहिस्' इस अव्यय से 'बहिष्पष्टिलोपो यञ् च' इस सूत्र से 'यञ्' प्रत्यय एवं टि रूप 'इस्' का लोप

२४ मेघदूतम्

करके 'तद्धितेष्वचामादेः' इस सूत्र से ञित्त्वात् वृद्धि करके 'बाह्यम्' यह रूप बनता है। गन्तव्या—'गम्' धातु से तव्यत् प्रत्यय होकर स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके 'गन्तव्या' यह रूप निष्पन्न होता है। 'तव्यत्' प्रत्यय कृत्य प्रत्यय है अतः 'गन्तव्या' के योग में 'कृत्यानां कर्तरि वा' इस सूत्र से कर्ता में विकल्प से षष्ठी हुई है ॥ ७ ॥

त्वामारूढं पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्ताः प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसन्त्यः ॥ कः संनद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायां न स्यादन्योऽप्यहमिव जनो यः पराधीनवृत्तिः ॥ ८ ॥

अन्वयः—पवनपदवीम् आरूढम् त्वाम् पथिकवनिताः प्रत्ययात् आश्वसन्त्यः उद्गृहीतालकान्ताः प्रेक्षिष्यन्ते । त्वयि संनद्धे अहम् इव यो जनः पराधीनवृत्तिः न स्यात् कः अन्यः अपि विरहविधुराम् जायम् उपेक्षेत ।

व्याख्या—पवनपदवीम्=पवनाध्वानम् गगनमितियावत् । आरूढम्=गतम्, त्वाम्=मेघम्, पथिकवनिताः=पान्थप्रियाः प्रोषितभर्तृका इत्यर्थः, प्रत्ययात्=विश्वासात् वल्लभागमनस्येति बोध्यः, आश्वसन्त्यः=प्राप्तविश्वासाः, उद्गृहीतालकान्ताः=उद्धृतकेशप्रान्ताः (सत्यः), इतस्ततः द्रष्टुम् उन्नमय्य केशाग्रभागं धृत्वेत्यर्थः । प्रेक्षिष्यन्ते=विलोकयिष्यन्ति । त्वयि=जलदे, संनद्धे=वृष्टये समुद्यते, अहमिव=मत्समानः, यः जनः=यो नरः, पराधीनवृत्तिः=पराधिकृतजीवनः, न स्यात्=नभवेत्, (तादृशः) कः=प्रियाविलासानभिज्ञः, अन्योऽपि=अपरोऽपि (जनः), विरहविधुराम्=विप्रलम्भव्यग्राम्, जायाम्=प्रियाम्; उपेक्षेत=उपेक्षां कुर्यात्, मेघाच्छन्ने न कोऽपि स्वतन्त्रः प्रियाविलासज्ञः जनः प्रियायाः उपेक्षां करोतीतिभावः ।

शब्दार्थः—पवनपदवीम्=आकाश में, आरूढम्=स्थित, त्वाम्=तुमको; पथिकवनिताः=पथिकों की पत्नियां, प्रत्ययात्=विश्वास के कारण, आश्वसन्त्यः=आश्वस्त होकर, उद्गृहीतालकान्ताः=केशों के अग्रभागको उठाकर

पूर्वमेघः २५

प्रेक्षिष्यन्ते = देखेंगी। त्वयि = तुम्हारे, अर्थात् मेघ के, संनद्धे = छा जाने पर; अहमिव = मेरे समान, यः जनः = जो पुरुष, पराधीनवृत्तिः = पराधीन जीवन वाला, न स्यात् = न हो (ऐसा) कः = कौन, अन्योऽपि = दूसरा व्यक्ति (होगा) जो, विरह-विधुराम् = विरह से व्याकुल, जायाम् = प्रिया को, उपेक्षेत = उपेक्षा करेगा। अर्थात् कोई भी नहीं करेगा।

भावार्थः—आकाशे विद्यमानं त्वां प्रोषितभर्तृकाः नार्यः विश्वासात् आश्वसन्त्यः सत्यः केशाग्रभागमुन्नमय्य अवलोकयिष्यन्ति। वर्षणाय समुद्यते त्वयि आगते को जन ईदृग् स्यात् यः खलु मत्सदृशः पराधीनजीवनः न स्यात् विरहव्याकुलायाः प्रियायाः उपेक्षां कुर्यात्। न कोऽपि कुर्यादिति भावः।

हिन्दी—हे मेघ ! जब तुम आकाश में छा जाओगे—उस समय तुमको पथिकों की प्रियाएँ अपने प्रिय के आगमन के विश्वास से आश्वस्त होकर अपने केशों के अग्रभाग को ऊपर उठाकर देखेंगी। तुम्हारे आ जाने पर मेरे समान जो पराधीन न हो ऐसा कौन पुरुष होगा जो अपनी विरह से व्याकुल प्रिया की उपेक्षा करेगा।

समासः—पवनस्य पदवी = पवनपदवी ताम् (ष० तत्०)। उद्गृहीताः अलकानामन्ताः याभिस्ताः = उद्गृहीतालकान्ताः (बहुव्रीहिः)। पथिकानां वनिताः पथिकवनिताः (ष० तत्०)। विरहेण विधुरा = विरह-विधुरा (तृ० तत्०)। विगताः धूः यस्याः सा विधुरा (बहुव्रीहिः)। परस्मिन्नधीना वृत्तिर्यस्य स पराधीनवृत्तिः (बहुव्रीहिः)।

कोशः—पन्थानः पदवी सृतिः इत्यमरः। प्रत्ययोऽधीनशपथज्ञानविश्वासहेतुषु इत्यमरः। अलकाश्चूर्णकुन्तलाः इत्यमरः। परतन्त्रः पराधीनः परवान्नाथवानपि इत्यमरः। विधुरं तु प्रविश्लेषे इत्यमरः। वृत्तिर्वर्तनं जीवने इत्यमरः।

टिप्पणीआरूढ = आ + रुह + क्त ‘आङ्’ उपसर्गपूर्वक रुह धातु से क्त प्रत्यय होकर आरूढ यह पद बना है।

पथिकः—‘पथिन्’ शब्द से ‘पथःष्कन्’ इस सूत्र से ‘ष्कन्’ प्रत्यय का विधान करके ‘षः प्रत्ययस्य’ इस सूत्र से प्रत्यय के ‘ष’ कार का लोप आदि

२६ | मेघदूतम्

करके 'पथिक' शब्द की निष्पत्ति होती है । आश्वसन्त्यः—यहाँ पर महोपाध्याय श्रीमल्लिनाथ के मतानुसार 'आश्वसत्यः' ऐसा ही पाठ होना चाहिए, क्योंकि 'श्वस्' धातु का पाठ अदादि गण में होने के कारण 'शप्' का 'अदः प्रभृतिभ्यः शपः' इस सूत्र से लोप हो जाने के कारण 'शप्श्यनोर्नित्यम्' इस सूत्र के द्वारा जो 'नुम्' होता है वह नहीं होगा । अतः आश्वसत्यः ऐसा होना चाहिए । परन्तु महावैयाकरण भारवि का 'आश्वसेयुर्निशाचराः' एवं महाभारत का 'न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नाऽति विश्वसेत्' इत्यादि प्रयोगों के आधार पर—'भ्वादिस्तु आकृतिगणः तेन चुलुम्पतीत्यादिसंग्रहः' सिद्धान्तकौमुदी की इस पंक्ति के आधार पर 'श्वस्' धातु को भ्वादिगणी मानकर 'शप्' का लोप नहीं होने के कारण 'नुम्' हो जाने से 'आश्वसन्त्यः' यह पाठ भी समीचीन हो जाता है । पराधीनवृत्तिः—वर्तनं वृत्तिः । वर्तनार्थक वृत धातु में भाव में क्तिन् प्रत्यय होने से 'वृत्ति' यह शब्द बना है । परस्मिन्नधीना वृत्तिः=पराधीनवृत्तिः । विरहविधुरा—विगता धूः=भारः ( पुष्टिः ) यस्याः सा विधुरा । यहाँ वि उपसर्गपूर्वक 'धुर्' शब्द से उपपद समास करके 'ऋक्पूरब्धूपथामानक्षे' इस सूत्र से समासान्त 'अ' प्रत्यय होकर एवं स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् होकर 'विधुरा' यह शब्द बना है । जाया—जायते अस्यां ( पुत्ररूपेण ) इति जाया ताम् । 'पुत्ररूपेण' इसमें मनुस्मृति का निम्नलिखित उक्ति प्रमाण है—

'पतिर्भार्यां संप्रविश्य गर्भो भूत्वेह जायते ।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ॥

अर्थात्—पति, पत्नी में गर्भ रूप से प्रवेश होकर उत्पन्न ( जात ) होता है इसलिए पत्नी, 'जाया' कहलाती है । 'जनि प्रादुर्भावे' धातु से औणादिक 'जनेर्यक्' इस सूत्र से यक् प्रत्यय करके टाप् करके जाया यह शब्द बना है ।

अलङ्कार—यहाँ पर भी पूर्व श्लोकों की तरह सामान्य से विशेष का समर्थन होने के कारण 'अर्थान्तरन्यास' नामक अलंकार है ॥ ८ ॥

पूर्वमेघः २७

मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां
वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगन्धः ।
गर्भाधानक्षणपरिचयान्नूनमाबद्ध-मालाः
सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः ॥ ९ ॥

अन्वयः— अनुकूलः पवनो मन्दं यथा त्वां मन्दं नुदति । अयं सगन्धः ते वामः चातको मधुरं नदति । गर्भाधान-क्षणपरिचयात् आबद्धमालाः बलाकाः खे नयनसुभगं भवन्तं नूनं सेविष्यन्ते ।

व्याख्या— त्वत्यात्रा-काले शकुनान्यपि शुभानि वर्तन्त इति कथयति मन्दं मन्दमित्यादिना । अनुकूलः = अनुगुणः, पवनः = वायुः मन्दं यथा = स्थिरमिव, त्वाम् = भवन्तं, मन्दं = शनैः शनैः यथा स्यात्तथा, नुदति = चोदयति । अयं = पार्श्वस्थः, सगन्धः = सगर्वः, ते = भवत; वामः = अपसव्यभागे ( सुन्दरो वा ) चातकः = पक्षिविशेषः, मधुरं = मनोरमं यथा स्यात्तथा नदति = वक्ति । गर्भाधानक्षणपरिचयात् = रतिसमय-जातसंस्तवात्, आबद्धमालाः = रचितपङ्क्तयः, बलाकाः = बकप्रियाः, खे = गगने, नयनसुभगम् = दर्शनप्रियम्, भवन्तम् = मेघम्, नूनम् = अवश्यं, सेविष्यन्ते = समुपचारयिष्यन्ति । यात्राकाले पवना-नुकूल्यं चातकध्वनिः बलाकादर्शनं शुभ-सूचकमिति वदन्ति दैवज्ञाः ।

शब्दार्थः— अनुकूलः = अनुरूप, पवनः = हवा, मन्दं = मन्दगति वाला, त्वाम् = तुमको, मन्दम् = धीरे धीरे, नुदति = प्रेरित करता है । अयं = यह, सगर्वः = गर्वयुक्त, ते = तुम्हारे, वामः = बायें भाग मे अथवा सुन्दर, चातकः = पपीहा, मधुरं = श्रवणप्रिय, नदति = शब्द कर रहा है । गर्भाधानक्षणपरि-चयात् = गर्भाधान के समय परिचय होने के कारण, आबद्धमालाः = पंक्तिबद्ध, बलाकाः = बगुलियाँ, खे = आकाश में, नयनसुभगम् = देखने में सुन्दर, भवन्तम् = तुम्हारा, नूनम् = अवश्य, सेविष्यन्ते = आश्रयण करेंगी ।

भावार्थः— हे पयोद ! तव यात्रा-समये इमानि शुभसूचकानि शकुनान्यपि दृश्यन्ते । यथा—त्वदनुरूप एवं मन्दगतिर्वायुः शनैः शनैस्त्वां प्रेरयति एवञ्च त्वद्-

२८ मेघदूतम्

वामभागे सुन्दरश्चातकः कर्णप्रियं शब्दङ्करोति। अन्यदपि वर्तते शकुनम्। यथा- संभोगसमये भवता सह परिचयजननात् बद्धपङ्क्तयः बकाङ्गनाः नयनसुभगं भवन्तमवश्यमेव सेविष्यन्ते।

हिन्दी—हे मेघ ! तुम्हारी यात्रा के समय ये शुभशकुन भी दिखाई दे रहे हैं—जैसे तुम्हारे अनुकूल ही पवन मंद गति वाले तुम्हें धीरे-धीरे प्रेरित कर रहा है एवं तुम्हारे बायीं ओर पपीहा कर्णप्रिय शब्द बोल रहा है और भी शकुन हैं जैसे संभोग के समय तुमसे परिचय होने के कारण ये पंक्तिबद्ध बगु- लियां आँखों को अच्छे लगने वाले तेरा जरूर आश्रय लेंगीं।

समासः—गन्धेन सहितः = सगन्धः (तृ० बहुव्री०)। गर्भस्य आधानं गर्भाधानम् (ष० तत्०) तदेव क्षणः = गर्भाधानक्षणः (रूपक) तस्मिन् परिचयः = गर्भाधानक्षण-परिचयः (स० तत्०) तस्मात्। आबद्धा माला याभिस्ताः आबद्धमालाः (बहुव्रीहिः)।

कोशः—यथा सादृश्य-योग्यत्वं वीप्सा स्वार्थानतिक्रमे इति यादवः। गन्धो गन्धक आमोदे लेशे सम्बन्धगर्वयोः इति विश्वः। वामस्तु वक्रे रम्ये स्यात् सव्ये वामगतेऽपि च इति शब्दार्णवः। सारङ्गाः स्तोकश्चातकः समाः इत्यमरः। गर्भोपकारके ह्यग्नौ मुखे पनस-कण्टके। कुक्षौ कुक्षिस्थजन्तौ च इति यादवः। क्षण उद्धर्षो मह उद्धव उत्सवः इत्यमरः। संस्तवः स्यात्परिचयः इत्यमरः। बलाका विसकण्ठिका इत्यमरः। लोचनं नयनं नेत्रमीक्षणं चक्षुरक्षिणी दृग्दृष्टी इत्यमरः।

टिप्पणी—मन्दं मन्दमिति—इस पद को कई लोग 'नुदन' का विशेषण मानकर उसकी व्याख्या करते हैं। परंतु गुणवाचक पदों की वीप्सा न होने के कारण एवं 'मन्दं' इस शब्द के गुणवाचक होने के कारण 'वीप्सा' में द्वित्व नहीं होगा। यदि इस अर्थ में 'प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र से द्वित्व विधान करें तब भी 'कर्म धारयवदुत्तरेषु' इस सूत्र से सुब्विभक्ति का लोप हो जाने पर 'मन्दमन्दम्' ऐसा अनीप्सित रूप बनने लगेगा। इसकी अपेक्षा यदि हम प्रथम मन्दं को मेघ का विशेषण मानकर दूसरे मन्दं को 'नुदन'

पूर्वमेघः २९

क्रिया का विशेषण मानें और 'मन्दं त्वां यथा स्यात्तथा मन्दं नुदति' ऐसा अन्वय माने तो महाकवि की प्रामाणिकता के साथ ही अर्थ भी सुसंगत हो जायगा । वैसे तो 'निरङ्कुशाः हि कवयो भवन्ति' इसका आश्रय लेकर 'मन्दंमन्दं' इसको क्रियाविशेषण भी माना जा सकता है । नुदति-प्रेरणार्थक 'नुद्' धातु के लट् लकार के प्रथम पुरुष एक वचन का यह रूप है । सगन्धः-गन्धेन सहितः इस विग्रह में 'तेन सहेति तुल्ययोगे' इस सूत्र से ( बहुव्रीहि ) समास होकर 'वोपसर्जनस्य' इस सूत्र से 'सह' के स्थान पर 'स' यह आदेश विकल्प से होकर 'सगन्धः' ऐसा रूप बना है । जहाँ सह को स आदेश नहीं होगा वहाँ 'सहगन्धः' ऐसा रूप भी बनता है । श्लोकक्रम-कुछ टीकाकार 'तां चावश्यम्' इस श्लोक को नवम स्थान पर, जिसे मल्लिनाथ जी ने दशम स्थान पर रखा है रखते हैं और 'मन्दंमन्दं' को दशम स्थान पर । परन्तु यह क्रम उचित नहीं जँचता । इस काव्य का मुख्य अभिधेय 'सन्देश' पहुँचाना है । इसका कथन कवि ने 'सन्तप्तानाम्' इस सातवें श्लोक में कर दिया । तदनन्तर आनुषंगिक पथिक वनिताओं को आश्वासन का कथन 'अष्टम' में किया । तदनन्तर शुभशकुन का प्रदर्शन 'मन्दं मन्दं' इस श्लोक में यात्रानुरूप उचित ही है । तदनन्तर वह अवश्य जीवित है । अतः तुम्हारा जाना निरर्थक नहीं होगा इसकी पुष्टि 'तां चावश्यं' इस दशम श्लोक में उचित है ॥ ९ ॥

तां चावश्यं दिवसगणनातत्परामेकपत्नी-
मव्यापन्नामविहतगतिर्द्रक्ष्यसि भ्रातृजायाम् ।
आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां
सद्यःपाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि ॥१०॥

अन्वयः—( हे मेघ ) दिवसगणनातत्पराम् अव्यापन्नाम् एकपत्नीम् भ्रातृजायाम् ताम् अविहतगतिः ( त्वम् ) अवश्यं द्रक्ष्यसि आशाबन्धः प्रणयि कुसुमसदृशम् विप्रयोगे सद्यःपाति अंगनानां हृदयं प्रायशो रुणद्धि ।

व्याख्या—हे मेघ ! मत्प्रिया 'मृता अथवा व्रतभ्रष्टा' इति विनिश्चित्य त्वं स्वयात्रायाः वैयर्थ्यं नाऽशङ्कय । यतोहि-दिवसगणनातत्पराम्=

३० मेघदूतम्

याप्यवासरसंख्यानाऽसक्ताम्: अव्यापन्नाम् = जीविताम् ( अनेन स न मृता इति द्रढयति यक्षः) एवञ्च एकपत्नीम् = पतिव्रताम्, ( इत्यनेन तस्या व्रतास्खलनत्वञ्च प्रतिपादयति ) शापान्ते स आगमिष्यतीति पातिव्रत्यपूर्वकं साऽवश्यं प्राणान् धारयति इति भावः । भ्रातृजायाम् = बन्धुप्रियाम्, ताम् = मत्प्रियाम्, अविहतगतिः = अव्याहतगमनः ( सन् त्वम् ) अवश्यम् = नूनम्, द्रक्ष्यसि = अवलोकयिष्यसि । आशाबन्धः = तृष्णाबन्धनम्, प्रणयि = प्रेमपूर्णम्, कुसुमसदृशम् = पुष्पवन्मृदुभवतीति भावः । अत एव विप्रयोगे = विरहे प्रेमिणः इति शेषः । सद्यःपाति = तत्क्षणविनाशशीलम्, अङ्गनानाम् = वधूनाम्, हृदयम् = जीवनम्, प्रायशः = प्रायेण, रुणद्धि = नह्यति ।

शब्दार्थः —दिवसगणनातत्पराम् = अवधि के दिनों को गिनने में संलग्न, अव्यापन्नाम् = जीवित ( प्रिय आयेंगे इस आशा में ), एकपत्नीम् = पतिव्रता, भ्रातृजायाम् = अपनी भाभी, ताम् = उस मेरी पत्नी को, अविहतगतिः = बेरोक-टोक जाने वाले तुम, अवश्यं = निश्चित, द्रक्ष्यसि = देखोगे । आशाबंधः = आशा का बन्धनः, प्रणयि = प्रेमयुक्त, कुसुमसदृशम् = फूल की तरह कोमल, विप्रयोगे = विरह में, सद्यःपाति = तुरंत टूट जाने वाले, अंगनानाम् = स्त्रियों के, हृदयम् = हृदय को, प्रायशः = प्रायः, रुणद्धि = थामे रहता है ।

भावार्थः —हे मेघ विरहावशिष्टदिवसगणनासंलग्नाम्, प्रियागमनाशयाप्राणान्धारयन्तीमपासुलां मत्प्रियामविरुद्धगतिस्त्वमवश्यं विलोकयिष्यसि । आशारूपं बंधनं प्रेमपूर्णं कुसुमतुल्यमृदु प्रेमास्पदविरहे सद्योविनाशशालि बधूनां जीवितं प्रायशः रुणद्धि ।

हिन्दी—हे मेघ ! विरह के बचे दिनों को गिनने में लगी, मेरे आने की आशा से जीवित, पतिव्रता अपनी भाभी को ( मेरी पत्नी को ), अविहतगति वाले तुम अवश्य देखोगे, क्योंकि आशारूपी बंधन प्रेमपूर्ण फूल की तरह कोमल तथा प्रिय के विरह में तुरंत टूट जाने वाले अबलाओं के हृदय को प्रायः रोके रहता है ।

समासः —दिवसानां गणना = दिवसगणना (ष० तत्०) तस्यां तत्परा = दिवसगणनातत्परा ( स० तत्० ) ताम् । भ्रातुः जायाम् भ्रातृजायाम् ( ष०

पूर्वमेघः ३१

त्तत्०) । आशा एव बन्धः=आशाबन्धः (कर्मधारय) । कुसुमैः सदृशं=कुसुम-सदृशम् (तृ० तत्०) ।

कोशः—तत्परे प्रसितासक्तौ इत्यमरः, आशादिगति तृष्णयोः इति यादवः । आशाबन्धः समाश्वासे तथा मर्कटवासके इति मेदिनी । विप्रलम्भो विप्रयोगः इत्यमरः । हृदयं जीविते चित्ते वृक्षस्याकृतहृद्ययोः इति शब्दार्णवः ।

टिप्पणीगणना—संख्यानार्थक "गण्" धातु से णिच् प्रत्यय करके पश्चात् "युच्" प्रत्यय करके अनादेश करके स्त्रीत्वविवक्षा में "टाप्" करके "गणना" ऐसा रूप बनता है । (गण्+इ+अन् (युच्)+टाप्) । अव्यापन्ना—वि एवं आङ् उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक पत् धातु से "क्त" प्रत्यय करके टाप् करके व्यापन्ना बनाते हैं । न व्यापन्ना=अव्यापन्ना ताम् (नञ्०) एकपत्नीम्—एकः पतिर्यस्याः सा=एकपत्नी (बहुव्रीहि) ताम् । यहाँ "नित्यं सपत्न्यादिषु" इस सूत्र से "न" और "ङीप्" प्रत्यय हुआ है । अविहतगतिः—न विहता=अविहता गतिः यस्य सः अविहतगतिः (बहुव्रीहिः) । "गम्" धातु से क्तिन् प्रत्यय होकर "गतिः" ऐसा साधु होता है । विप्रयोगे—वि और प्र उपसर्गपूर्वक युज् (युजिर) धातु से भाव में "घञ्" प्रत्यय करके विप्रयोग ऐसा रूप बनता है । सद्यःपाति—सद्यः पतितुं शीलमस्य इस विग्रह में सद्यस् इस उपपदपूर्वक "पत्" धातु से "णिनि" प्रत्यय करके 'उपपदमतिङ्' से समास करके वृद्ध्यादि करके सद्यःपाति ऐसा रूप बनता है । अंगना-प्रशस्तानि अङ्गानि यासाम्, इस विग्रह में "अङ्ग" शब्द से "अङ्गात् कल्याणे" इस वार्तिक के अनुसार "लोमाऽदिपामाऽदिपिच्छाऽऽदिभ्यः शनेलचः" इस सूत्र से "न" प्रत्यय हुआ है ॥ १० ॥

कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलीन्ध्रामवन्ध्यां
तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः ।
आकैलासाद्विस-किसलयच्छेद-पाथेय-वन्तः
सम्पत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः ॥ ११ ॥

३ मे० दू०

३२ मेघदूतम्

अन्वयः—यत् महीम् उच्छिलीन्ध्राम् अवन्ध्यां च कर्तुं प्रभवति तत् श्रवणसुभगं ते गर्जितं श्रुत्वा मानसोत्काः बिसकिसलयच्छेद—पाथेयवन्तः राजहंसाः नभसि आकैलासात् भवतः सहाया सम्पत्स्यन्ते ।

व्याख्या—मार्गे भवतां सहायका अपि भविष्यन्ति इति प्रतिपादयति यत्= गर्जितं, महीम्=पृथ्वीम्, उच्छिलीन्ध्राम्=उद्गतकन्दलीम्, अत एव अवन्ध्याम्=उर्वराम्, कर्तुं=रचयितुम्, प्रभवति=शक्नोति । तत्=तथाभूतम्, ( लोकानाम् ) श्रवण-सुभगम्=कर्णपेयम्, ते=तव मेघस्येति भावः । गर्जितं=निर्घोषम्, श्रुत्वा=आकर्ण्य, मानसोत्काः=मानसरोवरं गन्तुमुन्मनाः, बिसकिसलयच्छेद-पाथेयवन्तः=मृणालाग्रभाग-शकल-सम्बलवन्तः, राजहंसाः=श्रेष्ठहंसाः, नभसि=आकाशे, आकैलासात्=कैलासं यावत्, भवतः=मेघस्य, सहायाः=सहगामिनः, संपत्स्यन्ते=भविष्यन्ति ।

सरलार्थ—यत्=जो ( गर्जन ), महीम्=पृथ्वी को, उच्छिलीन्ध्राम्=कन्दली युक्त, अबन्ध्याम्=फल युक्त, कर्तुं=करने में, प्रभवति=समर्थ है, तत्=उस, श्रवणसुभगं=सुनने में प्रिय, ते=तुम्हारा, गर्जितं=गर्जन को, श्रुत्वा=सुनकर, मानसोत्काः=मान-सरोवर जाने को उत्कण्ठित, बिसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः=कमलनाल के अग्रभाग के टुकड़ों को रास्ते के लिए जलपान बनाने वाले, राजहंसाः=श्रेष्ठहंस, नभसि=आकाश में, आकैलासात्=कैलास पर्वत तक, भवतः=तुम्हारा, सहायाः=साथ जानेवाले, सम्पत्स्यन्ते=बनेंगे ।

भावार्थः—हे जलद ! लोकानां श्रोत्रानन्ददं यद्भवदीयगर्जनं महीं कन्दलिकायुक्तां सफलां च सम्पादयति तदाकर्ण्य मानसरोवरं गन्तुमुत्कण्ठिताः मृणालाग्रभागं मार्गभक्ष्यत्वेन गृहीताः राजहंसाः कैलासपर्वतपर्यन्तं भवतः सहगामिनो भविष्यन्ति ।

हिन्दी—हे मेघ ! तुम्हारा जो गर्जन कानों को सुख देने वाला है और पृथ्वी को शिलीन्ध्रपुष्प से युक्त करने में तथा उर्वरा बनाने में समर्थ है तुम्हारे उस गर्जन को सुनकर मानसरोवर आने को उत्कण्ठित, रास्ते के भोजन के लिए मृणाल के आगे के भाग के टुकड़ों को लेकर चलने वाले राजहंस (श्रेष्ठ हंस) कैलास पर्वत तक तुम्हारा साथ देंगे ।

पूर्वमेघः ३३

टिप्पणी—कर्तुम्— 'कृञ्' धातु से “समानकर्तृकेषु तुमुन्” इस सूत्र से तुमुन् प्रत्यय होकर “कर्तुम्” ऐसा रूप बना है। प्रभवति— प्र उपसर्गपूर्वक 'भू' धातु के लट् लकार का रूप है प्रभवति। यद्यपि “भू” धातु का सत्ता (स्थिति) अर्थ है फिर भी “उपसर्गेणैव धात्वर्थो, बलादन्यत्र नीयते” इस युक्ति के अनुसार “प्र” उपसर्ग लग जाने के कारण यहाँ उसी धातु का अर्थ समर्थ हो गया। वैसे तो वैयाकरणों के मत में सभी अपेक्षित अर्थ धातु में ही रहते हैं, “अनेकार्थाः हि धातवः” इस वचन के अनुसार उपसर्ग तो द्योतक-मात्र है बोधक नहीं। गर्जितम्— “गर्ज” धातु के भाव में “नपुंसके भावे क्तः” इस सूत्र से “क्त” प्रत्यय और इडादि करके “गर्जितम्” ऐसा रूप बना है। मानसरोवरः— मानसम् (ब्रह्मणा) मनसा निर्मितं “मानसम्”। ब्रह्माजी ने इस तालाब की रचना मन से की थी अतः इसको “मानस” या मानसरोवर कहते हैं। कविप्रसिद्धि है कि वर्षा ऋतु में ही हंसगण मानसरोवर जाते हैं; क्योंकि अन्य ऋतुओं में उसमें बर्फ जम जाती है जो हंसों के लिए हानिकारक होती है। पाथेयम्— “पथिन्” शब्द से पथ्यतिथिवसति स्वपते-ढञ्” इस सूत्र से “ढञ्” प्रत्यय का विधान करते हैं पश्चात् उसके स्थान पर “आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम्” इस सूत्र से “एय्” आदेश होकर णित्त्वात् वृद्धि होकर “पाथेयम्” ऐसा रूप बना है ॥ ११ ॥

आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङ्ग्य शैलं
वन्द्यैः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु ।
काले काले भवति भवतो यस्य संयोगमेत्य
स्नेह-व्यक्तिश्चिर-विरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम् ॥ १२ ॥

अन्वयः— पुंसां वन्द्यैः रघुपतिपदैः मेखलासु अङ्कितम् तुङ्गम् प्रियसखम् अमुम् शैलम् आलिङ्ग्य आपृच्छस्व। काले काले भवतः संयोगम् एत्य चिरविरहजम् उष्णम् बाष्पम् मुञ्चतः यस्य स्नेहव्यक्तिः भवति।

व्याख्या— पुंसाम् = मानवानाम्, वन्द्यैः = पूज्यैः, रघुपतिपदैः = रामचन्द्रचरणैः, मेखलासु = कटिप्रदेशेषु, अङ्कितम् = चिह्नितम्, तुङ्गम् = अत्युच्चम्,

३४
मेघदूतम्

प्रियसखम् = मित्रवर्यम्, अमुम् = सम्मुखस्थम् रामगिरिम्, शैलम् = पर्वतम्, आलिङ्ग्य = आश्लिष्य, आपृच्छस्व = सभाजयस्व, हे मित्र ! अहं गच्छामीति संसूचयेतिभावः। काले काले = समये समये, भवतः = मेघस्य, संयोगम् = सान्निध्यम्; एत्य = प्राप्य, चिरविरहजम् = दीर्घकालिक-विरहजन्यम्, उष्णम् = तप्तम्, बाष्पम् = अश्रु, मुञ्चतः = त्यजतः, यस्य = रामगिरेः, स्नेहव्यक्तिः = प्रेमप्राकट्यं, भवति = वरीवर्तत इति अनुमीये।

शब्दार्थः—पुंसाम् = मानवों के, वन्द्यैः = पूज्य, रघुपतिपदैः = रामचन्द्रजी के चरणों से, मेखलासु = मध्यभाग में, अङ्कितम् = चिह्नित, तुङ्गम् = अत्यन्त ऊँचे, प्रियसखम् = अपने प्रिय मित्र, अमुम् = इस रामगिरि, शैलम् = पर्वत का, आलिङ्ग्य = आलिंगन कर, उससे, आपृच्छस्व = अनुमति ले लो। काले काले = समय समय पर, भवतः = तुम्हारे, संयोगम् = मिलने को, एत्य = प्राप्तकर, चिरविरहजम् = बहुत दिनों के वियोग से उत्पन्न, उष्णम् = गर्म, बाष्पम् = आंसू, त्यजतः = छोड़ते हुए; यस्य = जिसकी स्नेहव्यक्तिः = प्रेमाभिव्यक्ति; भवति = होती है।

भावार्थः—हे मेघ ! मानवाराध्यैः रामचन्द्रचरणविन्यासैः मेखलासु चिह्नितमेनं प्रियमित्रमत्युन्नतं रामगिरिमाश्लिष्य ततः अनुमिति गृह्णाण। तव संयोगं प्राप्य समये समये यस्य गिरेः चिरवियोगत्पन्नाश्रुभिः स्नेहाभिव्यक्तिः भवति।

हिन्दी—हे मेघ ! मानवमात्र के पूज्य श्रीरामचन्द्रजी के चरणों से चिह्नित मध्यप्रदेश वाले इस अपने मित्र रामगिरि से मिलकर उससे (अलका जाने की) अनुमति ले लो। तुम्हारा संयोग पाकर, समय-समय पर, बहुत दिनों के वियोग के कारण उत्पन्न उष्ण अश्रुओं के द्वारा जिसकी स्नेहव्यक्ति हुआ करती है।

समासः—रघूणां पतिः = रघुपतिः (ष० तत्०) तस्य पदानि = रघुपतिपदम् (ष० तत्०) तैः। प्रियश्चासौ सखा = प्रियसखः, तम् (कर्मधारय)। चिरविरहात् जातः = चिरविरहजः तम् (पञ्चमी तत्०)। स्नेहस्य व्यक्तिः स्नेहव्यक्तिः (ष० तत्०)।

पूर्वमेघः ३५

कोशः—मेखला श्रोणि-स्थानेऽद्रि कटके कटि-बन्धने, इति यादवः । आमन्त्रणसभाजने आप्रच्छनम्, इत्यमरः । उष्ण उष्मागमस्तपः, इत्यमरः । वाष्पं नेत्रजलोष्मणः विश्वः ।

टिप्पणीप्रियसखम् = प्रियश्चासौ सखा इस प्रकार कर्मधारय समास होने के पश्चात् 'राजाहःसखिभ्यष्टच्'-इस सूत्र से समासान्त टच् प्रत्यय करके "प्रिय सख" शब्द बना है उसी के द्वितीया विभक्ति का यह रूप है । वन्द्यैः पुंसाम्—यहाँ कृत्य प्रत्ययान्त "वन्द्य" के योग में पुंस शब्द से वैकल्पिक षष्ठी "कृत्यानां कर्तरि वा" से हुई है । पक्ष में तृतीया भी होती है । आपृच्छस्व—"आङ्" उपसर्गपूर्वक "प्रच्छ" धातु के लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का यह रूप है । यद्यपि यह धातु परस्मैपदी है फिर भी आङ् उपसर्ग हो जाने के कारण "आङि नुप्रच्छ्योः" इस सूत्र से आत्मनेपद होकर यह रूप बना है । काले काले—यहाँ वीप्सा में "नित्यवीप्सयोः' इस सूत्र से द्विरुक्ति हुई । स्नेह—स्निह् धातु से भाव में घञ् प्रत्यय हुआ है । व्यक्तिः—'वि' उपसर्गपूर्वक 'अञ्ज्' धातु से क्तिन् प्रत्यय करके 'व्यक्तिः' यह रूप बना है । चिरविरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम्—बहुत दिनों के बाद मिलन होने पर मित्रों के आँखों से आँसू गिरना स्वाभाविक है । वर्षा ऋतु में पर्वत से 'भाप' उत्पन्न होता है । कवि ने इसी को उपरोक्त भाव से 'उत्प्रेक्षित' किया है ॥ १२ ॥

मार्गं तावच्छृणु कथयतस्त्वत्—प्रयाणानुरूपं
सन्देशं मे तदनुजलद ! श्रोष्यसि श्रोत्रपेयम् ।
खिन्नः खिन्नः शिखरिषु पदं न्यस्य गन्तासि यत्र
क्षीणः क्षीणः परिलघु पयः स्रोतसां चोपभुज्य ॥ १३ ॥

अन्वयः—हे जलद ! तावत् कथयतः त्वत् प्रयाणानुरूपं मार्गं शृणु, तदनु श्रोत्रपेयं मे सन्देशं श्रोष्यसि । यत्र खिन्नः खिन्नः शिखरिषु पदं न्यस्य क्षीणः क्षीणः ( सन् ) स्रोतसां परिलघु पयश्च उपभुज्य गन्तासि ॥ १३ ॥

व्याख्या—हे जलद ! हे मेघ ! तावत् = प्रथमम्, कथयतः = वदतः, यक्षादिति शेषः, त्वत्प्रयाणानुरूपम् = भवदीययात्रानुकूलम्, मार्गम् = अध्वानम्,