मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
२०० मीमांसादर्शनम् [ सू० है। सूत्र अधिक विस्तृत हो जाता, अतः, व्याख्या की सुविधा के लिए भगवान् शबर- स्वामी ने एक-एक अंश लेकर व्याख्या की है। "तदर्थशास्त्रात्" सम्पूर्ण सूत्र के इस अंश का "मन्त्रानर्थक्यम्" इस अंश के साथ ही अन्वय है। इसमें "मन्त्र की निष्प्रयो- जनता" यह अंश साध्य है। "तदर्थशास्त्रात्" इत्यादि पञ्चम्यन्तपद हेतु है। पूर्वपक्षियों का कथन है कि मन्त्र के उच्चारण से अदृष्ट होता है। अर्थात् कर्मविशेष में यथाकथित रूप में मन्त्र का उच्चारण करने पर अदृष्ट या अपूर्व का उत्पादन होता है। इसी से कर्म में फल की प्राप्ति होती है। मन्त्र के पदों का अर्थ यज्ञ आदि कर्मों के किसी प्रयोजन का निर्वाह नहीं करता है। कारण, मन्त्र का अर्थ ब्राह्मणवाक्य से ही विज्ञापित हो जाता है, और जिसका अर्थ किसी अन्य प्रकार से विज्ञापित हो जाता है, वह अर्थ किसी अन्य प्रयोजन का साधक नहीं होता है, अर्थात् उससे किसी अन्य प्रयोजन की सिद्धि नहीं हो सकती है, अतः, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है। मन्त्र के अर्थ का कोई प्रयोजन नहीं हैं, वरन्, मन्त्र का उच्चारण अदृष्ट का जनक है। जैसे अभ्रि अर्थात् काठ के कुदाल के ग्रहण के समय "गायत्रेण त्वाच्छन्दसाऽददे त्रैष्टुभेन त्वाच्छन्दसाऽददे जागतेन त्वाच्छन्दसाऽददे पाङ्क्तेन त्वाच्छन्दसाऽददे" इस मन्त्र का पाठ किया जाता है। इसके अर्थ के द्वारा वस्तुविशेष का आदान अर्थात् ग्रहण अवगत होता है। ब्राह्मणग्रन्थ में कहा गया है "तां चतुर्भिरभ्रिमादत्ते" (तै० सं० ५।१।१) चार मन्त्रों से इस अभ्रि का ग्रहण करें। इसी प्रकार "इमामगृभ्णन् रशनामृतस्येत्यश्वा- भिधानीमादत्ते" (वा० सं० २२।१) इस स्थल में "इमामगृभ्णन् रशनामृतस्य" यह अंश मन्त्र है एवम् "इत्यश्वाभिधानीमादत्ते" यह अवशिष्ट अंश ब्राह्मण या विधायक है। यहाँ भी पूर्व के समान ब्राह्मणवाक्य के द्वारा ही मन्त्र से कथित रशना का ग्रहण कथित हो गया तो मन्त्र के द्वारा किसी अधिक अर्थ का बोध नहीं हो रहा है। इसी प्रकार "उरु प्रथस्व" (वा० सं० १।१२) यह एक मन्त्र है। हे पुरोडाश ! जिससे तुम विपुल रूप में हो सकते हो उसी रूप में अपना प्रसार करो। पुनः ब्राह्मणग्रन्थ में कहा गया है "उरु प्रथस्वेति पुरोडाशं प्रथयति" (तै० ब्रा० ३।२।८।४) उरु प्रथस्व यह कह कर पुरोडाश को फैलाये। इन स्थलों में मन्त्र के अर्थ को ब्राह्मणवाक्य ही कह रहा है, अत, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं हो सकता है। मन्त्र के अर्थ की विवक्षा मानकर ब्राह्मणवाक्य का अन्यथा व्याख्यान किया जा सकता है, किन्तु, यह भी ठीक नहीं है, वेद मन्त्र एवं ब्राह्मणात्मक होने पर भी ब्राह्मण विधिप्रधान है। विधि ही साक्षात् रूप में धर्म में प्रमाण है। विधि का अपने अर्थ में प्रामाण्य पूर्व सूत्र में ही सिद्ध किया गया है। यदि विधिवाक्य का अज्ञातज्ञापकत्वरूप प्रयोजन नहीं माना जाय तभी ब्राह्मण का अप्रामाण्य होगा, फलस्वरूप सम्पूर्ण वेद का ही अप्रामाण्य मानना होगा। इसलिए मन्त्र के अनुरोध से ब्राह्मण वाक्य का अर्थ
३१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २०१ अन्यथा नहीं हो सकता है। मन्त्र का अर्थ ब्राह्मण वाक्य में ही कथित होने से मन्त्र अर्थवाद के समान स्वार्थ में अप्रमाण है। मन्त्रों का केवल उच्चारण के द्वारा ही प्रयो- जन सिद्ध होता है, अतः, मन्त्र अदृष्ट या अपूर्व का ही जनक है। मन्त्र को उच्चारणार्थक मानने पर अदृष्टरूप प्रयोजन की कल्पना होगी और अर्थ की विवक्षा मानने पर दृष्ट प्रयोजन भी सिद्ध होगा, अतः, ब्राह्मण को अनुवादक मान कर भी मन्त्र अर्थ का अभिधायक होगा, अर्थात् मन्त्र का अर्थ विवक्षित रहेगा, इसलिए अन्य दोष के लिए द्वितीय सूत्र की अवतारणा की गई है। वाक्यान्नियमात्=मन्त्रवाक्यों का पदविन्यास नियमबद्ध है, अतः मन्त्रार्थ विवक्षित नहीं है। मन्त्र स्वार्थ का प्रतिपादक नहीं है, क्योंकि, मन्त्रवाक्य का पदविन्यास नियमबद्ध है। आशय यह है कि मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है, इसमें दूसरा कारण यह भी है कि मन्त्र के पदों का जो क्रम है, उसका परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। जैसे 'अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुद्' इस मन्त्र के पदों का क्रमभङ्ग कर 'अग्निर्दिवोमूर्द्धा' इस प्रकार पढ़ा जाय तो मन्त्र का पाठ विफल होगा; यह सभी को मानना पड़ेगा। अपने अर्थ का प्रकाश करना ही यदि मन्त्र का प्रयोजन होता तब यहाँ प्रयोग क्रम का बन्धन नहीं रहता, क्योंकि, मन्त्र के पदों का क्रमभङ्ग करने पर भी अर्थ की प्रतीति में किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं होती। पाठक्रम नियम को अदृष्टरूप प्रयोजन की सिद्धि के लिए मानने पर भी मन्त्रपाठ अर्थबोध के लिए ही है, इस आशङ्का से अन्यदोष की अवतारणा की गई है— बुद्धशास्त्रात् = ज्ञात विषय का ही अनुशासन होने से मन्त्रों का अर्थ विवक्षित नहीं है। मन्त्र स्वार्थ में विवक्षाशून्य है। आशय यह है कि पैर में जूता पहनने के बाद जूता पहनता है— यह कथन जैसे निष्प्रयोजन है, वैसे ही जो विषय पूर्व से अवगत है; उसी का पुनः मन्त्र से कथन निष्प्रयोजन है। याज्ञिकों को मन्त्रपाठ के पूर्व से ही अपने-अपने कर्तव्य की जानकारी रहती है, कारण, जो व्यक्ति जिसका जानकार नहीं रहता है वह व्यक्ति उस कर्म को नहीं कर सकता है। “अग्नीदग्नीन् विहर” (तै० सं० ६।३।१।२) हे अग्नीध्र अर्थात् ऋत्विग्विशेष अग्नि लेकर विहरण करें इत्यादि मन्त्र याज्ञिकों के कर्तव्य के बोधक हैं, इनके द्वारा अपने अर्थ का प्रतिपादन जूता पहनने के बाद जूता पहनने के समान निष्प्र- योजन है। इसलिए, मन्त्रों का अर्थ विवक्षित नहीं है। अवगत अर्थ का प्रमादवश विस्मरण के परिहार के लिए मन्त्र का अर्थ स्मारक हो सकता है, अतः अन्य दोष की आशङ्का से अन्य सूत्र की अवतारणा की है— अविद्यमानवचनात् = जिसका अस्तित्व नहीं है, उन वस्तुओं के विषय में कहा गया है, अतः, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है।
२०३ मीमांसादर्शनम् [ सू० आशय यह है कि मन्त्र का अर्थ विवक्षित होने पर यज्ञ के साधन या उपकरण का ही मन्त्र के द्वारा कहना उचित था। किन्तु, चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा। द्वे शीर्षे सप्तहस्तासो अस्य (ऋ० ४।५८।३) चार सींग, तीन पैर, दो मस्तक एवं सात हाँथ इत्यादि मन्त्र का अर्थ असम्भव है। क्योंकि, इस तरह की यज्ञसाधन वस्तु नहीं है। इसलिए सम्भव होने पर भी इससे यज्ञ में किसी प्रकार का उपकार नहीं हो सकता है। अतः, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है। ये मन्त्र उच्चारण से ही क्रिया के सम्पादक हैं और इसी से अदृष्ट या अपूर्व होता है। पूर्वोक्त मन्त्र के अनुरूप कोई देवता हो सकता है, इस आशङ्का से अन्य दोष की अवतारणा के लिए अचेतनेऽर्थवन्धनात् (जै० १।२।०५) सूत्र दिया है। अचेतनेऽर्थबन्धनात् = चेतनाहीन द्रव्य में सम्बोधन आदिरूप अर्थ का सम्बन्ध होने से मन्त्र का अर्थ अविवक्षित है। अर्थबन्धनात् = सम्बोधनादि रूप अर्थ का बन्ध = सम्बन्ध रहने से। आशय यह है कि “ओषधे त्रायस्वैनं, स्वधिते मैनं हिंसीः” (तै० सं० १।२।११) “शृणोति ग्रावाणः” (तै० सं० १।३।१३) हे औषधि ? तुम इसकी रक्षा करो, हे स्वधिति ? (कुठार या अस्त्रविशेष) तुम इसकी हिंसा मत करना। हे ग्रावण ? अर्थात् प्रस्तरखण्ड ? तुम सुनो इत्यादि मन्त्रों का अर्थ बाधित है। कारण, इन स्थलों में चैतन्य- शून्य औषधि, कुठार, प्रस्तर आदि को सम्बोधन किया है। सम्बोधन का अर्थ अभिमुखी- करण—वक्ता के प्रति मनोयोग आकर्षण है। किन्तु, चेतना-विहीन जडवस्तु का अभि- मुखी करण नहीं हो सकता है। इसलिए, मन्त्रों का अर्थ अविवक्षित है। जडवस्तु के अभिमानी देवता का व्यवहार व्याससूत्र में निर्दिष्ट किया गया है। अभिमानिव्यपदेशस्तु (वे० सू० २।१।५) अतः, औषधि आदि के अभिमानी चेतन देवता की विवक्षा की जा सकती है, इस आशङ्का से अन्य दोष के लिए सूत्र की अवतारणा कर रहे है— विप्रतिषेधात्=मन्त्र के पदों के अर्थों का परस्पर विरोध होने से मन्त्रों का अर्थ निष्प्रयोजन है। आशय यह है कि अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षम् (ऋ० १।८९।१०) अदिति ही द्यौ है, अदिति ही अन्तरिक्ष है, इत्यादि मन्त्रों के पदों में परस्पर विरोध है। कारण एकबार अदिति को द्यौ कहा गया है और पुनः उसी अदिति को अन्तरिक्ष कहा गया है। इसी एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे । असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् (वा० सं० १६।५४) रुद्र एक है, द्वितीय नहीं। जगत् में संख्याविहीन हजार-हजार रुद्र हैं, इत्यादि मन्त्रों के अर्थ में विशेष रूप से विरोध लक्षित होता है, कारण, एक बार एक रुद्र कहा गया और पुनः हजार-हजार रुद्र कहे गये हैं। इस प्रकार मन्त्र के पदों के अर्थ में विरोध होने से मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है।
३१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २०३ यदि यह कहा जाय कि त्वमेव माता च पिता त्वमेव इत्यादि के समान अन्तरिक्ष आदि रूप में अदिति की स्तुति की गई है। इसी प्रकार एक रुद्र की भी योग सामर्थ्य से अनेकरूपता हो सकती है, अतः, अर्थ में विरोध नहीं है, अतः अन्य दोष के लिए दूसरे सूत्र की अवतारणा की गई है । स्वाध्यायवद्वचनात्=वेद के अध्ययन के लिए जिस प्रकार "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" यह विधि है, प्रयोग के समय में मन्त्र के अर्थ जानने के लिए वैसी कोई विधि नहीं है। इसलिए, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है, या किसी समय पूर्णिका नाम की कोई स्त्री धान छांट रही थी। उसी के समीप में माणवक अध्ययन के समय अवघात मन्त्र का अभ्यास कर रहा था। अर्थ के प्रकाशन की विवक्षा वहाँ नहीं है। प्रत्येक मुसल के प्रहार के साथ मन्त्र को नहीं पढ़ा जा रहा था, अतः, अक्षर-ग्रहण के लिए ही उस मन्त्र का और अन्य मन्त्रों का अभ्यास करता है। अध्ययन के समय पढ़ा गया भी अवधान जैसे पूर्णिका नाम की स्त्री के प्रति अपने अर्थ का प्रकाशन नहीं करता है, वैसे ही कर्म के समय में भी वह अपने अर्थ को नहीं कहता है। स्वाध्यायवत् = स्वाध्याय के समान। अवचनात् = वचन न होने से। यदि यह कहा जाय कि माणवक को वहाँ अर्थ की विवक्षा नहीं है पूर्णिका भी अर्थ को जानने में असमर्थ है। कर्म में अध्वर्यु को अर्थ विवक्षा रहती है और बोध भी हो सकता है - इस आशङ्का से अन्य सूत्र की अवतारणा की गई है- अविज्ञेयात् = कतिपय ऐसे मन्त्र हैं, जिनका अर्थ अविज्ञेय है, अतः, वे उच्चारणरूप प्रयोजन के लिए हैं, वैसे ही अन्य मन्त्र भी हैं। आशय यह है कि मन्त्रों का अर्थ कर्म के अनुष्ठान में निष्प्रयोजन है, क्योंकि, "अम्यक् सा त इन्द्र ऋष्टिरस्मे, त्रीण्येव जर्फरी तुर्फरीतू", इत्यादि मन्त्रों का कोई अर्थ नहीं होता है। मन्त्रों का अर्थ विवक्षित होने पर इन मन्त्रों का भी अर्थ होता, किन्तु, इनका कोई अर्थ नहीं है। अतः, उक्त मन्त्र केवल पाठ के द्वारा ही यज्ञ का उपकारक है, अन्य मन्त्रों की भी वैसी ही स्थिति है। यदि यह कहा जाय कि ऐसे मन्त्रों के अर्थ के ज्ञान के लिए ही निगम, निरुक्त, व्याकरण प्रवृत्त हुए हैं--इस आशङ्का से अन्य सूत्र की अवतारणा की गई है। अविज्ञेयात् = कतिपय मन्त्रों का अर्थ अविज्ञेय है। अतः केवल उच्चारणार्थक होने से अन्य मन्त्र भी वैसे ही हैं। अनित्यसंयोगान्मन्त्रानर्थक्यम् = जननमरणशील अर्थ के वाचक शब्दों का प्रयोग होने से मन्त्र का अर्थ निष्प्रयोजन है। आशय यह है कि "किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः (ऋ० ६।५३।१४) इत्यादि मन्त्रों में कीकट नामक नगर, नैचाशाख नामक नगर एवं प्रमगन्द नामक राजा के
२०४ मीमांसादर्शनम् [ सू० विषय में उल्लेख है। यदि मन्त्र का अर्थ विवक्षित माना जाय तो इन पूर्वोक्त वस्तुओं की उत्पत्ति के बाद ही इन मन्त्रों की रचना माननी पड़ेगी। ऐसा मानने पर अनित्य वस्तुओं का प्रतिपादक होने से मन्त्र अनित्य हो जायगे और मन्त्र को भागविशेष में अनित्य मानने पर सम्पूर्ण वेद को ही अनित्य मानना पड़ेगा। इसलिए, यह अवश्य ही मानना होगा कि कर्मानुष्ठानरूप अर्थ के प्रकाशन में मन्त्र की सार्थकता नहीं है, फलतः मन्त्र की अनर्थकता या प्रयोजनशून्यता सिद्ध होती है। अदृष्ट या अपूर्व का उत्पादन करना ही मन्त्र का प्रयोजन है, अतः, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है। अनित्यसंयोगात् = जननमरणशील अर्थ के साथ संयोग अर्थात् वाचकता सम्बन्ध होने से, मन्त्रानर्थक्यम् = मन्त्रों का स्वार्थ निष्प्रयोजन है। यह पूर्व पक्ष है ॥ ३१ ॥ अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः ॥१.२.३२॥ शा० भा०-अविशिष्टस्तु लोके प्रयुज्यमानानां वेदे च पदानामर्थः। स यथैव लोके विवक्षितस्तथैव वेदेऽपि भवितुमर्हति। नैवम्। लोके तैरथैरवबुद्धैः संव्यव- हारः। इह देवताभिरप्रत्यक्षाभिर्यज्ञाङ्गैश्चाचेतनैः संलापे न कश्चिदङ्गस्योपकारः। यद्यदृष्टं परिकल्प्येत, उच्चारणादेव तद्भवितुमर्हति। यदि कर्तव्यम्, तत्प्रयोजनवत्, उच्चारणं च न कचञ्चित् न कर्तव्यम्, यद्यपूर्वाय, यद्यर्थाय। यद्यर्थो न प्रत्याय्यते, न किञ्चिदनर्थकम्। यदि न प्रयुज्यते, समाम्नानानर्थक्यम्। तस्मादुच्चारणाद- पूर्वम्। तथा च तदर्थशास्त्राद्युक्तम्। तदुच्यते। अर्थप्रत्यायनार्थमेव यज्ञे मन्त्रोच्चारणम्। यदुक्तं न देवताभिर्यज्ञाङ्गैश्च संलापे प्रयोजनमस्तीति यज्ञे। यज्ञाङ्गप्रकाशनमेव प्रयोजनम्। कथम्? न ह्यप्रकाशिते यज्ञे यज्ञाङ्गे च यागः शक्योऽभिनिर्वर्तयितुम्। तस्मात्तन्निवृत्त्यर्थमर्थप्रकाशनं महानुपकारः कर्मणः तच्च करोतीत्यवगम्यते। तस्मादस्त्यस्य प्रयोजनम्। तच्च दृष्टं न शक्यम- पवदितुं नार्थाभिधानं प्रयोजनमिति। नन्वर्थाभिधानेनोपकुर्वत्सु, तां चतुर्भिरादत्त इत्येवमाद्यनर्थकं कामं भवतु, न जातुचिदपजानीमहे दृष्टमर्थाभिधानस्योपकारकत्वम् ॥ ३२ ॥ भा० वि०-सिद्धान्तमाह-अविशिष्टस्त्विति। तुशब्दः पक्षव्यावर्तकः, यस्माल्लोके वेदे च वाक्यादर्थप्रत्ययोऽविशिष्टः तस्माद्यथा लोके प्रतीयमानोऽर्थो विवक्षितस्तथा वेदेऽपि विवक्षित एवं सोऽर्थो भवितुमर्हतीति सूत्रं व्याचष्टे-अविशिष्टस्त्विति। लोके प्रयुज्यमानानां पदानां वेदे च पदानां प्रयुज्यमानानामिति सम्बन्धः, इदमिह हृद्गतम्-यद्युच्चारणमात्रेणाहष्टादर्थता भवेत्, ततोऽविवक्षितार्थता कल्प्येत, न त्वेवं सम्भवति। तथा हि मन्त्रोच्चारणस्य तावत् कर्माङ्गत्वं प्रयाजादिवत् साक्षाद्वा मन्त्रादिद्वारेण वा प्रोक्षणादिवदभ्युवगम्यते साक्षादप्यङ्गत्वं प्रकरणेन
३२ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः। २०५ वा स्याद् अध्ययनविधिसामर्थ्येन वा ? न तावत् प्रकरणेन कर्मप्रकरणे मन्त्रो- च्चारणस्याप्यविधानात् नाप्यध्ययनविधिसामर्थ्येन यथास्थितवेदाध्ययनविधा- नात् कर्मप्रकरणपठितानामपि तत्रैवाध्ययनं विदधता तन्नियमार्थवत्त्वाय कर्माङ्गत्वमाक्षिप्यते, मन्त्राङ्गत्वनिर्वाहाय कल्पनीयस्योच्चारणस्याक्षरग्रहण- निराकाङ्क्षस्य साक्षात्कर्माङ्गत्वयोगात् । नापि मन्त्रद्वारेणोच्चारणस्य कर्माङ्गत्वं मन्त्राणामक्रियारूपत्वेन प्रकरणाग्राह्यत्वात् अक्षरग्रहणाधीनपदपदार्थज्ञानयोरांप वाक्यार्थप्रत्ययनिराकाङ्क्षयोर्न प्रकरणग्राह्यत्वसम्भवः वाक्यार्थप्रत्ययोऽपि शास्त्रा- र्थविधारणवेलायामुत्पद्यमानोऽनुष्ठास्यमानार्थस्मृतिहेतुत्वान्न साक्षात्कर्माङ्गत्व- मश्नुवीत, तेनानुष्ठानौपयिकार्थप्रत्ययनिराकाङ्क्षाक्यादेवदृष्टादृष्टकल्पनानुपपत्तेः अर्थप्रत्ययपर्यन्तादेव मन्त्रोच्चारणाददृष्टं नियमरूपं कल्पनीयमिति मन्त्रोच्चा- रणस्याक्षरग्रहणादिपरम्परयानुष्ठास्यमानार्थस्मृतिहेतुत्वेन दृष्टार्थत्वोपपत्तेः न केवलादृष्टार्थत्वकल्पना युक्तेति हृदयम् । यथा लौकिकैरर्थैः शब्दावगतेः व्यवहारः नैवं वैदिकैः, अतः समवेतार्थत्वाभावाददृष्टार्थतैव मन्त्राणामिति वैषम्यं शङ्कते--नैवमिति । यज्ञाङ्गैरचेतनैरिति । ओषधिग्रावप्रभृतिभिरित्यर्थः, अप्रत्य- क्षाभिरचेतनैरिति च विशेषणव्यवहारयोग्यत्वसिद्धये यद्यप्ययोग्यैस्संलापो न दृष्टमुपकारं करोति, तथाप्यदृष्टार्थो भविष्यत्यत आह-यदििति । अर्थविवक्षा- सम्भवेनाभिधानस्यादृष्टार्थत्वकल्पनायामुच्चारणादेव तत्कल्पनं वरमित्यभिप्रायः, कस्मादेवम् ? इत्यत आह--यद्धीति । यदवश्यकर्तव्यमुच्चारणं तद्धि प्रयोजन- वद्युक्तं यस्मादित्यर्थः । उच्चारणस्यावश्यकत्वं प्रतिपादयति-न कथञ्चिदिति । कर्तव्यमुच्चारणमित्यनुषङ्गः, अदृष्टायार्थाभिधानाय वा कर्तव्यमित्यर्थः । नतूच्चारणवदर्थाभिधानमपि कर्तव्यमेवेत्याशङ्क्य यथाकर्मकाला प्रयोज्यत्वे मन्त्राणां समाम्नानाथैक्यं न तथार्थप्रत्यायनशून्यत्वे अदृष्टफलोच्चारणार्थतयाप्य- ध्ययनोपपत्तेरित्याह-यदर्थ इति । उच्चारणस्यैवावश्यकत्वे सिद्धे फलितमाह- तस्मादिति । उच्चारणस्यैवापूर्वार्थत्वं तदर्थशास्त्रादित्यादिभिरप्युक्तमित्याह- तच्चेति । शङ्कितं वैषम्यं परिहरति - तदित्यादिना । असमवेतार्थत्वेनादृष्टार्थ- त्वमुक्तं स्मारयति - नन्विति । देवस्य त्वेत्यादाविव समवेतशेषतयोपयोगदभि- धानार्थत्वमेव चतुरश्रमिति परिहरति - यज्ञ इति । ननु तत्प्रकाशनमपि कथं प्रयोजनमिति पृच्छति--कथमिति । अनुष्ठानो- पयोगादित्यत्तरमाह--नहीति । यज्ञग्रहणं दृष्टान्तार्थं तेन यागनिर्वृत्त्यर्थस्य प्रकाशनस्य समञ्जसं कर्मोपकारकत्वमित्याह--तस्मादिति । स्पष्टं च यज्ञाङ्ग- प्रकाशनं मन्त्रः करोतीति गम्यत इत्याह--तच्चेति । तेन बर्हिर्देवसदनं दामी- त्यादेस्सिद्धं प्रयोजकत्वमित्याह--तस्मादिति । न चैतस्मिन् दृष्टे सम्भवत्यदृष्ट- कल्पना साध्वीत्याह--तच्चेति । निगमयति-तेनेति ।
२०६ मीमांसादर्शनम् [ सू० ननु अस्तु श्रुत्यविनियुक्तानां बर्हिर्देवत्यादिमन्त्राणामर्थाभिधानार्थता श्रुति- विनियोज्यानां त्वर्थपरत्वे लिङ्गादेव विनियोगसिद्धेः विनियोजकशास्त्रानर्थक्यं स्यादिति शङ्कते-नन्विति । निगूढाभिप्रायः परिहरति-काममिति । दृष्टो- पकाराविरोधेन विनियोजकशास्त्रस्य विषयान्तरं कल्पनीयमिति निगूढो- भिप्रायः ॥३२॥ त० वा०-मन्त्रोच्चारणं तावदक्षरग्रहणेन निराकाङ्क्षोकृतं न साक्षात्क्र- त्वङ्गत्वं प्रतिपद्यते । अक्षराणां च द्रव्यवदनितिकर्तव्यतात्मकत्वात्प्रकरणेना- ग्रहणम् । एवं पदार्थज्ञानस्य वाक्यार्थप्रत्ययेन नैराकाङ्क्ष्यादग्रहणम् । वाक्यार्थ- प्रत्ययस्त्वकृतार्थः प्रकरणे विपरिवर्तमानः क्रियात्मकत्वात्प्रयोगवचनाकाङ्क्षितः कर्मसमवेतानुष्ठानस्य मानार्थस्मृतिफलत्वेनेतिकर्तव्यता भवति । तत्रादृष्टकल्पना- निमित्ताभावः । समाम्नानान्यथानुपपत्त्या हि तत्कल्प्येत, नोपपन्नेऽर्थवत्त्वे । यद्यपि च तत्कल्पनावसरो भवेत्, तथाऽपि कामं वाक्यार्थप्रत्ययादेव न त्वौपायि- कार्थप्रतीतिनिराकाङ्क्षाद्वाक्यात् । अवश्यं च दृष्टादृष्टयोर्विनियुज्यमानस्य प्रमाण- मुपन्यसितव्यम् । इह च प्रकरणाददृष्टार्थता लिङ्गाच्च दृष्टार्थता । न च प्रकरण- मशक्येऽर्थे विनियोक्तुमर्हतोत्येकान्तेनैतदापतति-यच्छक्नुयात्तन्मन्त्रेण कुर्या- दिति । न चासावदृष्टं शक्नोतीति लौकिकं वैदिकं वा प्रमाणं विद्यते । तस्मादु- भयोलिङ्गाप्रकरणयोर्दृष्टार्थप्रयोगेणैकवाक्यता । एवं च सति याज्ञिकप्रयोग- प्रसिद्धेर्न मूलान्तरकल्पनाक्लेशो भविष्यति । अतः स्वाभाविकमेवार्थप्राधान्यम- वस्थितम् । नैवमिति । न दृष्टोऽर्थो निर्वृत्त इत्येतावत्तैव तादर्थ्यमवसोयते । पुरुषार्थानुपयोगेन स्वाध्यायाध्ययनविधेरानर्थक्यात् । न च बुद्धशास्त्राविद्यमान- वचनार्थबन्धनान्मन्त्रार्थोपयोगः । तत्र यदि दूरेऽप्यदृष्टकल्पनातो न मुच्यामहे ततोऽतिक्रमणा भावादुच्चारणादेव कल्पनीयम् । उभयवादिसिद्धत्वादुच्चारण- कर्तव्य तायास्तत्प्रभवत्वाच्चादृष्टकल्पनस्य । तत्रोच्यते यज्ञे यज्ञाङ्गप्रकाशनमेव प्रयोजनमिति । यद्यपि लोकवत्तैर्न संव्य- वहारः तथाऽपि तत्तत्स्वरूपप्रकाशनमात्रमेवानुष्ठातृणामुपकरिष्यति । अतश्च यावन्मात्रमेवानौपयिकं सम्बोधनादि, कामं तन्न विवक्ष्येत, न तु तद्वशेन सर्वमेव त्यक्तव्यं न ह्यैकरूप्यं नाम केनचिन्नियतम् । तस्माद्यथादर्शनाभ्युपगमाद्बर्हिर्देव- सदनं दामीत्येवमादीनां तावदविहतगर्थप्राधान्यम् । तां चतुर्भिरादत्त इत्यत्रादि वदामः ॥३२॥ न्या० सु०-- सिद्धान्तसूत्रव्याख्यानार्थमविशिष्टस्त्वितिभाष्यं प्रतीतिमात्रेण विवक्षा- नुपपत्तेरयुक्तम शङ्क्योपपादयति-मन्त्रेति । अयमाशयः-मन्त्रोच्चारणस्य कर्माङ्गत्वं प्रयाजादिवत्साक्षाद्वाभ्युपगम्यते प्रोक्षणादिवद्वा । मन्त्रद्वारेण साक्षादप्यङ्गत्वं प्रकरणेन वा,
३२ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २०७ स्यादध्ययनविधिसामर्थ्येन वा । न तावत्प्रकरणेन कर्म्मप्रकरणे मन्त्रोच्चारणस्याविधानात् स्वाध्यायःध्ययनविधिना यथाऽम्नानवेदाध्ययनविधानात्कर्मप्रकरणपठितानां तत्रैवाध्ययनं विदधता कर्मप्रकरणाध्ययननियमार्थवत्त्वाय तदङ्गत्वमाक्षिपन्नोच्चारणं विनाऽङ्गत्वायोगा- त्कर्मकालोच्चारणविधिकल्पने कृते कैमर्थ्यापेक्षायामुच्चारणस्य कर्माङ्गत्वमाक्षिप्यत इति चेत् ? न ।। मन्त्राङ्गत्वनिर्वाहाय कल्पितस्योच्चारणस्य मन्त्राक्षराभिव्यक्तिमात्रेण निरा- काङ्क्षस्य साक्षात्कर्म्माङ्गत्व्रायोगात् । नापि मन्त्रद्वारेणोच्चारणस्य कर्म्माङ्गत्वम्, मन्त्रा- क्षराणामक्रियारूपत्वेन प्रकरणाग्राह्यत्वात् । यथोक्तम् । नावान्तः क्रियायोगार्हते वाक्योकल्पितात् । गुणद्रव्ये कथम्भावैर्गृह्णन्ति प्रकृताः क्रियाः ।। इति (तं० वा० २८४) अध्ययनविध्याक्षिप्तस्याप्यङ्गत्वस्य स्वव्यापारं विनानुपपत्तेरुच्चारणस्य पुंव्यापारत्वे- नाभिधानमन्तरेणानिर्वाहात् । अत एव श्रुतिविनियुक्तानामपीषे त्वादीनामभिधानं विनाङ्ग- त्वानुपपत्तिः । न च पदार्थाभिधानव्यापारमात्रेणाङ्गत्वम्, कर्मानुष्ठानानोपयिकत्वेन तस्य वाक्यार्थमात्रप्रतिपादनमात्रे पर्यवसानात् । अतः प्रकरणावधारिताङ्गभावानां मन्त्राणां कर्मानुष्ठानोपयिकवाक्यार्थप्रतिपादनव्यापारेणाङ्गत्वतावसायात्, कर्मकाले मन्त्रोच्चारणार्थ- स्यार्थाभिधानपर्यवसानसिद्धिरिति कर्मसमवेतानुष्ठास्य मानार्थस्मृतिफलत्वेनेति करणामन्त्रा- भिपप्रायम् । क्रियमाणानुवादिनामनुष्ठीयमानार्थस्मृतिफलत्वात् । अनुमन्त्रणादीनां च कृताकृत- प्रत्यवेक्षणायानुष्ठितार्थस्मृतिफलत्वात्, प्रोत्साहनार्थानां चाग्नन्मस्वः, संज्योतिषाऽभूमेत्या- दीनां यदेव श्रद्धया करोति तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति वाक्यावधारितकर्माङ्गभूतश्रद्धा- जननार्थमनुष्ठेयकर्म्मस्मृतिफलत्वात्, स्तोत्रशस्त्रमन्त्राणां चारादुपकारकत्वं स्तुत्यर्थत्वेन कर्मसमवेतार्थप्रकाशनानियमात् । एवं च कर्मौपयिकाऽर्थाभिधानार्थत्वेन प्रकरण । ठार्थं.वोप- पत्तेर्नादृष्टकल्पना युक्तेत्याह—अतश्चेति । ननु प्रकारान्तरेणाप्यनुष्ठेयार्थस्मृतिसिद्धेर्मन्त्रनियमस्यादृष्टार्थत्वं त्वत्पक्षेऽपि कल्प्यम् । अत आह—यद्यपि चेति । लिङ्गाच्च दृष्टार्थतावगतेर्न दुर्बलप्रमाणवशेनार्हष्टार्थत्वं कल्पयितुं शक्यमित्याह—अवश्यं चेति । ननु प्रकरणबाधे सामान्यसंबन्धाभावात्तत्सापेक्षत्वेन लिङ्गस्याविनियोजकत्वं स्यादत आह—न चेति । नात्र प्रकरणावगम्यक्रतुसंबन्धाख्यसामान्यसम्बन्धो बाध्यते, विरोधा- भावाद् । द्वारविशेषसम्बन्धे तु विरोधः । तत्र च प्रकरणस्य शक्तिरूपलिङ्गसापेक्षत्वात्तद्- बाध्यत्वं युक्तमेवेत्याशयः । दृष्टार्थत्वेनाविरोधान्न कस्यचिद् बाध इत्याह—तस्मादिति । अभिधानार्थत्वाभावे च निर्व्यापाराणां मन्त्राणां प्रकरणग्रह णायोगादुच्चारणं व्यापारद्वारेण प्रकरणग्रहणे तस्यानुष्ठानौपयिकत्वेनाभिधानवत्कर्मविधिनानाक्षेपादविधानाच्चोच्चारण- द्वारेण प्रकरणग्रहणम्, प्रकरणग्रहणाच्चोच्चारणमितीतरेतराश्रयापत्तेरुच्चारणविधिकल्पनं
२०८ मीमांसादर्शनम् [ सू० विना कर्मकालोच्चारणकर्त्तव्यतायां प्रमाणाभावाद्याज्ञिकाचारदर्शनेनोच्चारणविधिकल्पने क्लेशः स्यादित्यन्तरन्यासेनाह-एवं चेति । उपसंहरति-अत इति । नैवमित्याशङ्का- भाष्यं व्याचष्टे नैवमित्यभिधानार्थत्वेऽप्यसमवेतार्थप्रकाशनस्यादृष्टार्थत्वापरिहारात् पर्यन्त- त्वकल्पनं न युक्तमित्याशयः । तदुच्यत इति परिहारभाष्यं व्याचष्टे-तत्रेति । ततश्च वचनान्नैषामितरार्थं प्रयुज्येतेत्यसमवेतस्यापि समवेतविशेषणत्वेनाभिधानस्यानवमे वक्ष्य- माणत्वाद्विशिष्टरूपप्रकाशनस्यादृष्टार्थत्वापरिहारात्, तात्पर्यपूर्वकमनुष्ठितमभ्युदयकारि भवतीति नियमाद्दृष्टकल्पनेन चाभिधानार्थवत्त्वोपपत्तेः काममित्युक्तम् । तस्मादस्तोत्युप- संहारभाष्यं व्याचष्टे-तस्मादिति । नन्वस्तु श्रुत्यविनियुक्तानामुक्तेन न्यायेनार्थप्राधान्ये; श्रुतिविनियुक्तानां त्वर्थप्राधान्ये अभ्यादानादिमन्त्राणां लिङ्गादेव विनियोगसिद्धेस्तदर्थशास्रानर्थक्यं स्यादत आह-तां चतुर्भिरिति । इतिकरणोऽत्र मन्त्रविनियोजकश्रुतिमात्रपरिग्रहार्थः । चतुर्भिरितितृतीया मन्त्राणां करणत्वेऽभिहिते, स्वव्यापारं विना तदयोगात् उच्चारणस्यात्तद्व्यापारत्वात्कर्मो- त्पत्त्यनुपयोगित्वाच्च स्वव्यापारकर्मोत्पत्त्युपयोग्यभिधानव्यापारेण करणत्वाध्यवसायाच्च- तुर्भिरभ्यादानयमभिदध्यादिति वाक्यार्थावगमे इति करणविनियुक्तानामर्थक्रियारूपत्वेन कथमभावाग्राह्यत्वात् द्रव्यदेवतावत्क्रियोत्पत्त्युपयोगित्वावगतेः कारकत्वावसायात्करणव्यति- रिक्तकारकत्वानुपपत्तेः, करणत्वनिश्चये सति पूर्ववदभिधानार्थत्वसिद्धेः स्तोत्रशस्त्रमन्त्राणां च स्तौतिशंसतिभ्यामेवाभिधानार्थत्वावसायात्तां चतुर्भिरादत्त इत्यादिश्रुतिविनियोज्येष्व- भ्यादानादिमन्त्रेषु तदर्थशास्रानर्थक्यप्रसङ्गायोगेनाप्यर्थप्राधान्यमविहतमित्यर्थः । अनेन च नन्वित्याशङ्काभाष्यस्य काममित्युत्तरभाष्यं व्याख्यातमथेत्याशङ्कानिराकरणार्थ- त्वेन ॥ ३२ ॥ मा० प्र०—लौकिक और वैदिक वाक्यों के भेद का कारण न रहने पर दोनों एक ही प्रकार के हैं । लौकिक वाक्यों से जिस प्रकार अर्थ की अभिव्यक्ति होती है वैदिक- वाक्यों से भी उसी तरह वाक्यार्थ का प्रकाशन होता है । पूर्वपक्ष के द्वारा यह स्थिर हुआ है कि मन्त्रों का अर्थ विवक्षित नहीं है, क्योकि मन्त्रों के स्वार्थ की विवक्षा मानने पर प्रदर्शित दोषों की सम्भावना है, अतः मन्त्रों को अदृष्टार्थक मानना ही युक्ति- सङ्गत है । जिस स्थल में दृष्ट प्रयोजन परिलक्षित नहीं होता है; वहाँ अदृष्ट की कल्पना करनी पड़ती है । किन्तु, साधारण रूप में मन्त्रों से अनुष्ठेय कर्मों का स्मरण होने से वही मन्त्रो- च्चारण का प्रयोजन है । यस्य दृष्टं न लभ्येत स्यात्तस्यादृष्टकल्पना । अनुष्ठेयस्मृतेश्चेह मन्त्रोच्चारणमर्थवत् ॥
३३ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २०९ अतः यज्ञ का विषय एवं यज्ञाङ्गों का प्रकाश कर ही मन्त्रोच्चारण सार्थक होता है। इसलिए मन्त्रों के स्वार्थ में आनर्थक्य की प्रसक्ति नहीं है। फलतः, अदृष्ट=अपूर्व ही मन्त्रों का प्रयोजन नहीं है। “अवशिष्टः”=विलक्षण नहीं, 'तु' = किन्तु, तु शब्द पूर्वपक्ष के निराकरण का सूचक है। “वाक्यार्थः” = वाक्य का अर्थ। [वैदिकवाक्यों का अर्थ लौकिक प्रयोग से विलक्षण नहीं है।] लौकिक और वैदिक दोनों स्थलों में वाक्यार्थ एक ही तरह अर्थ का प्रकाशक है ॥ ३२ ॥ अथ किं भवच्छास्त्रमनर्थकमेव ? न हि— गुणार्थेन पुनः श्रुतिः ॥ १. २. ३३॥ शा० भा०—यदुक्तम्, 'तां चतुर्भिंरादत्त' इति समुच्चयशब्दाभावान्न समुच्च- यार्थमिति। चतुःसंख्याविशिष्टमादानं कर्तव्यमिति वाक्यादवगम्यते। तदेकेन मन्त्रेण गृह्णन् यथाश्रुतं गृह्णीयादिति ॥ ३३ ॥ भा० वि०-परस्त्वगृहीताभिसन्धिराह—अथेति। तद्विनियोजकशास्त्र- मनर्थकं किम्, नैवानर्थक्यं युक्तमध्ययनविधिपरिग्रहविशेषादिति भावः। सिद्धान्ती स्वाभिप्रायं विवरीतुं सूत्रमवतारयति-न हीति। सूत्रं व्याख्यातुं नन्वर्थाभिधानेनेत्यादिनोक्तां शङ्कामनुवदति-यदुक्तमिति। देवस्य त्वेत्यादीना- मादानकरणत्वस्य लिङ्गादेवावगतेः तेषां चतुष्ट्वस्य चान्तरेण वचनमवगमात् समुच्चयः परिशिष्येत तस्य च चशब्दाद्यभावेनासम्भवात् वचनानर्थक्यमित्यर्थः, तदयुक्तमिति परिहारप्रतिज्ञां हृदि निधाय गुणार्थेनेत्यादिव्याचक्षाणो हेतुमाह- चतुःसङ्ख्येति। इह हि चतुःसङ्ख्याविशिष्टमन्त्रकरणकमादानं कर्तव्यमिति वाक्यादवगम्यते, तत्र यद्यप्यादानमर्थप्राप्तं मन्त्राश्च प्राप्ताः सामर्थ्येन, तथाप्य- नन्यलभ्यः शब्दार्थ इति न्यायेन चतुःसङ्ख्याकमन्त्रकरणत्वमात्रमनेन प्रतिपाद्य- मिति गम्यते, तस्माच्च शब्दाद्यभावेऽपि चतुःसङ्ख्यालक्षणगुणविधानेन समुच्च- यार्थत्वात् पुनः श्रवणस्य नानर्थक्यमिति हृदयम्। ननु लिङ्गबलादेकैकस्य मन्त्रस्यादानकरणत्वावगतेः कथं समुच्चयसिद्धि- रित्याशङ्क्य श्रुतिविरोधे लिङ्गस्याभासत्वान्मैवमित्याह-एकेनेति ॥ ३३ ॥ त० वा०—यद्यपि मन्त्राः प्राप्ताः सामर्थ्येन, तथाऽपि चतुःसंख्यामादाने विधास्यति। तत्रारुणैकहायनीन्यायेन परस्परनियमे सति मन्त्रगतचतुःसंख्या- विशिष्टमादानं चोदितं समुच्चयाहते कर्तुं न शक्यत इत्यर्थात्समुच्चयफलम्। १४
२१० मीमांसादर्शनम् [ सू० अथ वा यावल्लिङ्गानुमिताः श्रुतयः प्रतिमन्त्रं कल्पयितुमारभ्यन्ते, तावदनेन प्रत्यक्षवचनेन चतुःसंख्याविशिष्टास्ते विहितास्तेनाप्राप्तविधिरेव वचनम् । तत्र तु विनाऽप्येतेन मन्त्रेष्वर्थप्राप्तवत्सु तत्परत्वे मन्दं फलमित्यनन्यलभ्यचतुःसंख्यार्थं तस्योपदेशः ॥३३॥ न्या० सु०—सूत्रमवतारयितुं न हीति भाष्यं व्याचष्टे—'वदाम' इति । नन्विति प्रोक्तामाशङ्कामनुभाष्य चतुःसंख्याविशिष्टमितिभाष्येण परिहृतम्, तदादानस्यापीष्टकामृग्व- यनार्थमर्थप्राप्तावे गुणार्थेनेति च सूत्रविरोधादयुक्तमित्याशङ्क्य व्याचष्टे— यद्यपीति । अर्थं प्राप्ते चादाने संख्याविधौ भवत्यादानसंख्याविशिष्टेत्यर्थः । विशिष्टादानविध्यभावादरुणै- काहायनीन्यायानुपपत्तेः अर्थप्राप्तस्य चादानस्यानुवाद्यत्वेनैकविधावितरेण विशेषितुमशक्यत्वा- त्लिङ्गतश्चैकैकस्यैव मन्त्रस्य प्राप्तेः । संख्यानाकाङ्क्षत्वात्समुच्चयासिद्धेरपरितोषात् फलतो गुणार्थत्वप्रतिपादनपरत्वेनान्यथा व्याचष्टे—अथ वेति ॥ ३३ ॥ भा० प्र०—"तां चतुर्भिरभ्रिमादत्ते" (श० ब्रा० ६।३।१।१९) इत्यादि ब्राह्मण वाक्यों के मन्त्रों से प्रकाशित विषय का ही उल्लेख किया गया है, चतुःसंख्या रूप गुण विधान करना ही इसका उद्देश्य है । अभिप्राय यह है कि अभिग्रहण विषयक चार मन्त्र हैं, उनमें किसी एक का उच्चारण करके ही अभ्रि का ग्रहण किया जा सकता है, किन्तु, उक्त ब्राह्मण ग्रन्थ से यह कहा गया है कि अभिग्रहण काल में इन चार मन्त्रों का पाठ करना चाहिए, इसलिए, इन स्थलों में पुनः उल्लेख न होने पर मन्त्र का स्वार्थ के प्रकाश में कोई बाधा नहीं है । "गुणार्थेन"= गुण विधान रूप प्रयोजन के लिए, "पुनः श्रुति." = पुनः ब्राह्मण वाक्य पढ़ा गया है । इस प्रसङ्ग में पूर्वपक्षी का यह आशय है कि "अभ्रिरसि नार्यसि" (वा० सं० ११।१०) यहाँ से आरम्भ कर "त्रैष्टुभेन त्वा च्छन्दसा ददे" यह मन्त्र कहा गया है, इसी मन्त्र से अभ्रि के आदान की प्रतीति सिद्ध है, पुनः ब्राह्मण में 'तां चतुर्भिरभ्रिमादत्ते इति विधीयते' (श० ब्रा० ६।३।१।१९) यह विधान व्यर्थ है । इसके उत्तर में कहा है कि मन्त्र से प्रतीत अर्थ का ही ब्राह्मण में पुनः श्रवण चार संख्या के विधान के रूप में उपयुक्त है । चार संख्या लक्षण गुण के लिए विधान न होने पर मन्त्रों में किसी एक मन्त्र से अभ्रि का आदान हो जाता है ॥ ३३ ॥ परिसंख्या ॥ १.२.३४ ॥ शा० भा०—परिसंचक्षाणे च, इमामगृभ्णन्नित्यश्वाभिधानीमादत्त इति त्रयो दोषाः प्रादुःष्युरिति । नैवं सम्बन्ध इत्यादत्त इति । कथं तर्हि, इत्याश्वाभिधानी- मिति । लिङ्गादशनामात्रे शब्दात्तु विशेषेऽश्वाभिधान्यामिति सति च वाक्ये
३४ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २११ लिङ्गं विनियोजकम् । तच्चास्य प्रकरणाम्नानानुमितं वाक्यं नास्ति । कतरत्तत् ? अनेन मन्त्रेणाऽऽदानं कुर्यादिति यस्मिन्सति रशनामात्रं लिङ्गात्प्रा- प्नोति । अश्वाभिधान्यां तु प्रत्यक्षमेव वचनम् । अस्मिन्सति, तदानुमानिकं नास्ति । तेन गर्दभरशनायां न प्राप्तिरेवेति ॥ ३४ ॥ भा० वि०—उदाहरणाम्तरे परोक्तमानर्थक्यं परिहरति - परिसङ्ख्येति । परिसङ्ख्या पुनः श्रवणफलमित्यर्थः, तत्र परोक्तान्दोषाननुवदति—परिसङ्ख्याणे चेति । इमामगृभ्णन् रशनामृतस्येत्येतस्मिन् वाक्ये परिसङ्ख्यां कुर्वति सति स्वार्थहान्यादयः त्रयो दोषाः प्राप्नुयुरिति यदुक्तमित्यर्थः, तदयुक्तमित्यध्याहार्यम्, तत्र स्वार्थहानिं तावत् परिहरति—नैवमिति । यद्येषा श्रुतिर्मन्त्रं रशनादानमात्रे विनियोजयेत्, ततो लिङ्गादेवाप्राप्तेः विध्यनर्थक्येन तत्परत्वरूपस्वार्थहानिः स्यान्न त्वेवमश्वाभिधानीविशिष्टरशनादाने मन्त्राविनियोजकत्वाद्वाक्यस्य, न चैव- मप्राप्तविधित्वात् परिसङ्ख्येयमिति वक्तव्यम्, फलेनैवमभिधानात् । तथा हि परिसङ्ख्याशब्दादेवकाराद्विना न श्रुत्या परिसङ्ख्यातवम्, वर्जनार्थफलत्वात्तु परि- सङ्ख्योच्यते, तच्च प्रकृतेऽप्यस्तीति परिसङ्ख्यातवोपपत्तिः, अतो न स्वार्थहानि- रित्यभिसन्धिः । इदानीं प्राप्तमेव बाधेत परार्थञ्च कल्प्येतेति दोषद्वयं परिहरति- लिङ्गादित्यादिना । रशनादाने=रशनामात्राभिधाने इतीति, तेनादावेव विशेष- श्रुतिपरिच्छिन्ने सति नैराकाङ्क्ष्यादेव मूलश्रुतिकल्पनासम्भवेन लिङ्गस्य विनि- योजकत्वाभावात् न गर्दभरशनादाने मन्त्राप्राप्तिरित्यर्थः, अस्तु तर्हि विना-श्रुति- कल्पनं लिङ्गं विनियोजकमित्यत आह—सति चेत्यादिना । वाक्यमिह श्रुतिः, ततः किमित्यत आह—तच्चेति । सामान्यविनियोजकं वाक्यं श्रुतिरस्य लिङ्गस्य कल्पनीयतया सामान्यप्रकरणाम्नानानुमितापि श्रुतिः प्रत्यक्षश्रुतिनैराकाङ्क्ष्येणा- नुमानासम्भवादेव नास्तीत्यर्थः, सामान्यविनियोजकश्रुत्याभावं विवरीतुं प्रश्नपूर्वकं श्रुतिस्वरूपं तावदाह—कतरदित्यादिना । ईदृशमेव तदित्यत्र लिङ्गमाह—यस्मि- न्निति । प्राप्नोति मन्त्रः तद्वाक्यमेतदेवेति शेषः, किमत इत्याशङ्क्य प्रत्यक्षश्रुति- विरोधेन तदभावं प्रकृते दर्शयति—अश्वाभिधान्यां त्विति । एकवाक्यत्वं मन्त्रस्या- श्वाभिधान्यामङ्गत्वमानुमानिकं तद्वाक्यं नास्ति, अनुमानमेव नोदेतीत्यर्थः, अतः प्राप्यभावान्न प्राप्तबाधोऽपि इति निगमयति—तेनेति । प्राप्यभावादेव गर्दभरशना नेत्ति प्रतिषेधान्यपरार्थत्वकल्पनापीत्याशयः ॥ ३४ ॥ त० वा०—यावद्धि मन्त्राम्नानमनवगतप्रयोजनम्, प्रकरणी चाकृतार्थः, तावद्यत्तत्सिद्धयर्थं कल्प्यते तत्सर्वं वैदिकं भवति । नैराकाङ्क्ष्योत्तरकालं तु कल्पितमपि पौरुषेयत्वादप्रमाणं स्यात् । न च श्रुतिमकल्पयित्वा लिङ्गादेः स्वातन्त्र्येण प्रामाण्यमिति वक्ष्यते ।
२१२ मीमांसादर्शनम् [ सू० तदेतदाह। सति च वाक्ये लिङ्गं विनियोजकं तच्चास्य नास्तीति। यदैव हि प्रकरणादनेन यजेत, रशनां वा गृह्णीयादिति कल्पयितुमिष्यते तदैवाश्वा- भिधानीमित्यनेनापहारो मन्त्रस्य। यद्यपि नैवं सम्बन्ध इत्यादत्त इति, कथं तर्हीत्यश्वाभिधानीमिति। तत्कारक सम्बन्धसम्भवात्क्रिययैव सह सामान्याभि- प्रायेण द्रष्टव्यम्। तस्मान्नाऽऽदानमात्रे विधीयते किं तर्ह्यश्वाभिधानीविशिष्टे। अथ वा फलतः पश्चात्तन्नकारक सम्बन्ध उपन्यस्यते। सर्वथा दर्शशास्त्रता नास्ति। यदि हि यदेव मन्त्रवचनात्प्राप्नुयात्तदेव प्रत्यक्षवचनेनोच्यते, ततो वयमुपालभ्येमहि। नन्वेवमप्राप्तविधीरेवायं संजात इति, न वक्तव्यं परिसंख्येति। फलेनैवमभिधानाददोषः। सर्वत्र हि परिसंख्याशब्दादेवकाराद्वा विना न श्रुत्या परिसंख्या नियमो वोच्यते, विधिरेव त्वेवंजातीयकस्य फलेनैवं व्यपदेशः। कस्तर्हि विधिनियमपरिसंख्यानां भेदः। उच्यते। अपूर्व-नियम-परिसंख्याविधीनां निरूपणम् विधिरत्यन्तमप्राप्ते नियमः पाक्षिके सति। तत्र चान्यत्र च प्राप्ते परिसंख्येति कीर्त्यते ॥ विधिरेव हि केनचिद्विशेषेणैवं भिद्यते। तत्र योऽत्यन्तमप्राप्तोः, न च प्राप्स्यति, प्राग्वचनादित्यवगम्यते, तत्र नियोगः शुद्ध एव विध्यर्था व्रीहीनप्रोक्षतीति। यत्र तु प्राग्वचनात्पाक्षिकी प्राप्तिः सम्भाव्यते, तत्राप्राप्तिपक्षं पूरयन्न्यो विधिः प्रवर्तते, स नियन्तृत्वात्नियम इत्युच्यते। यथा व्रीहीनवहन्तीति। तण्डुलनिष्प- त्त्यर्थाक्षेपादेव तत्सिद्धेर्न तत्प्राप्तिमात्रं विधेः फलम्, किं तर्हि अप्राप्तांशपूरणम्। तदप्राप्तिपक्षे च तण्डुलैरुपायान्तराण्याक्षिप्येरन्। पूरणे तु सति या तेषां निवृत्ति- रसावर्थान्न वाक्यात्। न च तद्धारणं नियमः। परिसंख्या हि तथा स्यात्। प्रत्यासन्नां वाऽवहन्तिनियततामुत्सृज्य नान्यनिवृत्तिफलकल्पनावसरः। तत्प्र- सक्तिद्वारा त्ववहन्तेरनियतिरासीदिति, नियमन्तर्गतैवार्थात्निवृत्तिर्गम्यते। न च प्राप्ते सति विधिरयं प्रवृत्तः, येनास्यान्निवृत्त्यर्थता कल्प्येत। प्रागेव तु प्रवर्त्त- मानेनार्थस्य प्रापकशक्तिनिरोधादन्याप्रप्तिः कृता, सा चार्थलभ्येति, न तयैव व्यपदिश्यते। यः पुनः प्राङ्नियोगात्तत्र चान्यत च प्राप्नुयादिति सम्भाव्यते, यत्र वा यच्चान्यच्च सा परिसंख्या। यथाऽत्रैवोदाहृते। यथा च गृहमेधीये पञ्चमे पक्षे। अत्रापि च न प्राप्ते सत्येषा प्रवर्त्तते, प्रापकस्य शास्त्रस्याननुमितत्वात्। कथं तर्हि ? यद्येतद्वाक्यं नाभविष्यत्तत एनं प्राप्स्यदिति। सर्वस्य प्रत्यक्षस्य वाक्यस्य
३४ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २१३ नानुमानिकवाक्यप्रतिबन्धमात्रं फलमिष्यते । किं हि तेन पठितेन यस्यान्यतोऽ- प्यर्थः सिद्धयति तदर्थं गर्दभरशनानिवृत्तिः फलं कल्प्यते । तेनैवं कल्प्यते कृत्वा- चिन्तान्यायेन यदि नामैत्रं वाक्यं न भवेत्, ततः कीदृशमनुष्ठानं स्यात् । तत्र मन्त्रप्राप्तिस्तावदेकान्तेन सिध्येदश्वाभिधान्याम्, तद्वदेव तु गर्दभरशनायामपि प्रसज्येत । यदा त्वनेन वाक्येन प्रत्यक्षेण नैराकाङ्क्ष्यादविशेषविनियोगसमर्थ- वाक्यानुमानं निषिद्धम्, तदा केवलाश्वाभिधानीविषयत्वसिद्धिरित्यपौनरुक्त्या- दर्थवद्वाक्यम् ॥३४॥ न्या० सु०--अत्र भाष्यकृता 'परिसञ्चक्षाणे चेति' पूर्वोक्तदोषत्रयमनुभाष्य लिङ्ग- प्राप्तमन्त्रादानसम्बन्धविधानानर्थक्यापत्तेः । स्वार्थहानं स्यात्, तदप्राप्तमन्त्राश्वाभिधाना- सम्बन्धविधानात्तु नैव दोषप्रसक्तिरिति नैवमित्यादिना स्वार्थहानि परिहृत्य, लिङ्गा- दित्यादिना श्रुतिपरिच्छिन्नेऽर्थे लिङ्गस्याविनियोजकत्वाद् गर्दभरशनासम्बन्धाप्राप्तेनं प्राप्त- बाधः प्राप्त्यभावादेव च गर्दभरशनादानेति प्रतिषेधायोगात्परार्थकपनाभाव इति दोषत्रयं परिहृतम् । तत्र प्राप्तबाधपरिहारभाष्यं तावदृजुत्वाद्व्याख्यातुमाह-यावद्धीति । नन्वप्रामाण्यापत्तेर्मा नाम रशनामात्रे मन्त्रविनियोजकश्रुतिः कल्प्यताम्, लिङ्गादेव तु विनियोगस्सेत्स्यत्यत आह-न चेति । उक्तेऽर्थे भाष्यं योजयति-तदेतदाहेति । श्रुत्यभि- प्रायो भाष्ये वाक्यशब्दः । स्वार्थहानपरिहारभाष्यमिदानीं व्याचष्टे-यदपीति । गर्हार्थे- नापिशब्देन क्लिष्टत्वमस्य भाष्यस्य सूचितम् । सामान्येनेत्यभिप्राय इति शाकपार्थिवादि- वन्मध्यमपदलोपी समासः सामान्यशब्देन निर्विशेषणत्वमुक्तं न शब्देनादाने मन्त्रस्य सम्बन्धो विधीयते, येन लैङ्गिकप्राप्तिः । सम्भवात्तदर्थशास्त्रानर्थक्यप्रसक्तेः स्वार्थहानं स्यादित्यर्थः । किमित्येवं व्याख्यायते इत्यपेक्षायाम्, यतः क्रिययैव मन्त्रस्य सम्बन्धो युक्त इत्यध्याहारेण योज्यम् । तदेव कुत इत्यपेक्षायां कारकाणां साक्षात्परस्परसम्बन्धाभावा- दित्युक्तम् । तेनादानसम्बन्धनिराकरणभाष्यस्यायमर्थो भवतीत्याह-तस्मादिति । का तर्हीत्यश्वाभिधानीमिति कारकसम्बन्धप्रतिपादकस्य भाष्यस्य गतिरत आह-किं तर्हीति । द्वितीयान्तेन कर्मशक्त्यवक्षिप्तविशिष्टक्रियासम्बन्धविवक्षयेदमुक्तमिति भावः । एवं व्याख्यायमाने विशिष्टानुवाददोषापत्तेरपरितोषादश्वाभिधान्युद्देशेन मन्त्रविशिष्टादान- विध्युत्तरकालं परस्परनियमलभ्यकारकसम्बन्धाभिप्रायेणान्यथा व्याचष्टे-अथ वेति । नन्वश्वाभिधानीविशिष्टेऽप्यादाने रशनादानत्वाविशेषणं लैङ्गिकमन्त्रप्राप्तिसम्भवात्तदर्थ- शास्त्रत्वमपरिहृतं स्यात्, अत आह--सर्वथेति । परिसंख्याफलत्वेनायं दोषः परिहार्य इत्याशयः । नन्वश्वाभिधान्यां मन्त्रविशिष्टादानविधौ वर्जनबोधकत्वाभावान्न परिसंख्यातवं स्यादि- त्याशङ्कते-नन्वेवमिति । परिहरति-फलेनेति । न चैवमौपचारिकत्वापत्तिः, फलत एव परिसंख्याव्यपदेशादित्याह-सर्वत्र हीति । प्रसङ्गान्नियमव्यपदेशोऽपि फलेनैवेति
२१४ मीमांसादर्शनम् [ सू० दर्शयितुं नियमग्रहणम् । परिसंख्या-वर्जनबुद्धिः । तदर्थो नञादिः परिसंख्याशब्दः । तस्माद्द्वा ब्राह्मणो न हन्तव्यो नेक्षेतोद्यन्तमादित्यमित्यादीनामेव श्रुत्या परिसंख्यात्वं निषेधपर्युदासव्यपदेशविशेषात्तु व्यवहारसिद्धेः न परिसंख्याव्यपदेशः । सत्यमेव वेदितव्य- मित्यादीनामेवकाराच्छ्रुत्या नियमत्वम् । अन्यत्र तु फलेनैव नियमपरिसंख्याव्यपदेशः । ननु प्रोक्षणादावप्यौदासीन्यनिवृत्तिकर्त्तव्यतानियमदर्शनादवघातादौ चाप्राप्तप्रापणाद्द- लनादिनिवृत्तिदर्शनात्, इमामगृभ्णन्नित्यादावपि चाप्राप्तप्रापणकर्त्तव्यतानियमदर्शनात् फलतो व्यपदेशः तत्सङ्करात् विद्यादीनां सङ्करप्रसङ्ग इत्यभिप्रायेण पृच्छति—कस्तर्हीति ? फलासङ्कराभिप्रायेणोत्तरमाह—उच्यत इति । श्लोकं व्याचष्टे—विधिरव हीति । कोऽसौ विशेष इत्यपेक्षायामाह—तत्रेति । विधेयस्वरूपप्राप्तेरेवात्र फलत्वसम्भवान्न तत्र नियमौ- दासीन्यनिवृत्त्योर्विप्रकृष्टयोः फलत्वं युक्तमिति भावः । अवघातादौ तु नियमताफलत्वान्नियमव्यपदेशमाह—यत्र त्विति । ननु तत्राप्यर्था- क्षेपात् प्रागेव प्रत्यक्षेण विधिनावघातादेरप्राप्तस्यैव विधेः स्वरूपप्राप्तिरेव फलं स्यादत आह—तण्डुलेति । नन्वर्थतः प्राप्तिसम्भवान्माभूत्प्राप्तिमात्रस्य फलत्वम् । अप्राप्तांशपूरण- वत्त्वन्यनिवृत्तेरपि प्रतीयमानायाः कस्मान्न फलत्वं स्यादत इत्याह—तदप्राप्नोति । अय- माशयः—अप्राप्तांशपूरणात्प्रागुपायान्तराक्षेपस्य निराकर्त्तुमशक्यत्वान्नितिवृत्त्यनुपपत्तेः उत्तरकालं चानुनिष्पादितत्वेन सिद्धेनं प्रयोजनापरपर्यायमन्यनिवृत्तेः फलत्वं युक्तमिति । प्रसिद्धनियमव्यपदेशहान्यापत्तेरपि नास्याः फलत्वमित्याह—न चेति । अविधेयगतत्वेन च विप्रकृष्टत्वान्नान्यनिवृत्तिः फलमित्याह—प्रत्यासन्नं वेति । नन्वन्यनिवृत्तेः फलत्वाभावे विध्यनिवारितत्वादुपायान्तराणामप्याक्षेपः प्रसज्येतेत्यत आह—तत्प्रसक्तोति । अन्य- [।निवृत्ति विना नियमानुपपत्तेर्नान्तरीक्यान्यनिवृत्त्यवगतेरुपायान्तराक्षेपवारणमित्याशयः । यदि चाक्षिप्तेषूपायान्तरेष्वयं विधिः प्रवर्त्तेत, ततः शास्त्रमन्तरेण प्राप्तोपायान्तरनिवृत्य- योगाच्छास्त्रस्येवान्यनिवृत्तावपि तात्पर्यकल्पना स्यात् न त्वेतदस्ति । श्रुतिकल्पनं विना- र्थाक्षेपस्याप्राप्तत्वेन मन्थरत्वाच्छीघ्रप्रवृत्तेन प्रत्यक्षेण विधिनेवैकोपायनियमे नैराकाङ्क्ष्ये- णार्थाक्षेपानुपपत्तेः प्रापकाभावादेवोपायान्तरनिवृत्तिसिद्धेनं शास्त्रस्य तत्पर्यन्तं व्यापारः कल्प्यत इत्यभिप्रायेणाह—न चेति । उपसंहरति—सा चेति । शेषपरिसंख्याशेषपरिसंख्यानिरूपणम् उभयोस्तु नित्यप्राप्तौ पुनर्वचनस्य स्वरूपप्राप्तिनियमफलत्वायोगानान्यनिवृत्तिफलत्वा- त्परिसंख्याव्यपदेश्यत्वमित्याह—यत्पुनरिति । प्राप्त इति सप्तम्याः, तत्र चान्यत्र चेति सप्तमीभ्यां वैयधिकरण्येनान्वये तत्र चान्यत्र च प्राप्नुयादित्यर्थो भवति, सामानाधिकरण्ये तु तच्चान्यच्चेति । यथासंख्येनोभयत्रोदाहरणमाह—यथेति । गृहमेधीयाधिकरणार्थवर्णनम् चातुर्मास्येषु साकमेधपर्वणि पूर्वैद्युर्गृहमेधीयेष्टिं विधाय श्रुतमाज्यभागौ यजति यज्ञ- ताया इत्युदाहृत्य दशमेऽष्टधा चिन्तयिष्यते ।
३४ ] प्रथमांध्याये द्वितीयपादः ११५ तत्रातिदेशप्राप्तयोराज्यभागयोरनुवादमात्रमेतदित्याद्यः पक्षः। द्वितीयस्त्वानर्थक्यपरिहारायोभयत्र विहितयोराज्यभागयोरिहाभ्युदयकारित्वकल्पनया प्रकृतिवदित्थं कर्त्तव्यमित्युपदेशातिदेशाभ्यां संहृत्य विधिरिति। तृतीयस्तूभाभ्यां विधानस्यादृष्टार्थत्वापत्तेर्यज्ञताया इति च स्तुतिदर्शनात् प्रकृतगृह- मेधीयस्तुत्यर्थमिति । चतुर्थस्तु गृहमेधीयविध्येकवाक्यत्वाभावेन तत्प्रशंसार्थत्वायोगात् यज्ञताया इत्याज्य- भागस्तुतिप्रतीतेरनन्यपरं पुनः श्रवणमाज्यभागधर्म्मककर्मान्तरविधानार्थमिति । पञ्चमस्त्वाज्यभागशब्दस्य धर्मलक्षणार्थत्वापत्तेः कर्मान्तरविध्ययोगादतिदेशो नाज्य- भागयोः प्रयाजादिषु च प्राप्तेष्वाज्यभागपुनःश्रवणमन्यपरिसंख्यार्थमिति । सोऽयमिह दर्शितः । षष्ठस्तु चोदकप्राप्तेः प्राथम्यात्फलतः परिसंख्यानुपपत्तेस्त्रिदोषत्वापरिहारादुपदिष्टाज्य- भागवर्जमतिदेश इति । सप्तमस्त्वखण्डकरणोपकारातिदेशद्वारेण युगपत्सर्वपदार्थप्राप्तेस्तद्वर्जनपक्षस्य तृतीये चोदनार्थकार्त्स्न्यात्तु मुख्यविप्रतिषेधात्प्रकृत्यर्थमित्यत्र निराकृतत्वादाज्यभागयोरेवातिदेशो- पसंहार इति । इममपि पक्षमतिदेशस्य क्रत्वर्थपदार्थविशेषगोचरत्वेन सामान्यविधिरस्पष्टः संह्रियेत विशेषत इत्युपसंहारायोग्यत्वान्निराकृतस्य कॢप्तोपकारप्राकृताज्यभागनिराकाङ्क्षत्वेनाति- देशाभावाद् गृहमेधीयस्यापूर्वत्वज्ञापनार्थमिदं वचनमिति सिद्धान्तो वक्ष्यते । नन्वन्यनिवृत्तिफलत्वे परिसङ्ख्याया निवृत्तेः प्राप्तिपूर्वकत्वात्प्राप्तमन्त्रविषयत्वोपपत्तेः त्रिदोषतापपरिहार्यं स्यादत आह—अत्रापि चेति । नन्वेवं सत्यानुमानिकवाक्यप्रति- बन्धकत्वत्वेनाथंवत्त्वोपपत्तेर्न गर्दभरशनानिवृत्तिफलत्वं स्यादत आह—सर्वस्येति । अप्राप्तविधित्वेऽपि फलतः परिसंख्यात्वे विस्तरेणोक्तम् सुखग्रहणार्थं सफलयति—तेनेति । परिसंख्यानिरूपणस्य तदर्थंशास्त्रतापरिहारोपयोगितामाह—इत्यपौनरुक्त्यादिति ॥ ३४ ॥ भा० प्र०—"इमामगृभ्णन् रशनामृतस्य इत्यश्वाभिधानीमादत्ते' (वा० सं० २२।२) इत्यादि वाक्य कहे गये हैं, किन्तु पुनः उल्लेख नहीं है। कारण, 'अश्वरशना' एवं 'गर्दभ- रशना' दोनों की ही प्राप्ति की सम्भावना है। ब्राह्मणवाक्य में कहा गया है कि गर्दभरशना ग्रहणीय नहीं है अश्वरशना ही ग्राह्य है। इस प्रकार की विधि न रहने पर गर्दभरशना भी ग्राह्य हो सकती थी, कारण, अश्वरशना के समान वह भी प्रकरण प्राप्त है। किन्तु, ब्राह्मणोपदिष्ट परिसंख्या विधि गर्दभारशना की व्यावृत्ति कर देती है। इस प्रसङ्ग में पूर्वपक्षी कह सकते हैं कि परिसंख्या अर्थात् अन्य की निवृत्ति स्वीकार करने पर तीन दोषों की प्राप्ति होती है।
२१६ मीमांसादर्शनम् [ सू० १—श्रुतार्थ त्यागः—श्रुत अर्थात् वाक्य प्राप्त गर्दभरशना-ग्रहणरूप अर्थ का परि- त्याग करना होगा। २—अश्रुत अर्थ की कल्पना—गर्दभरशना ग्रहणत्यागरूप अश्रुत अर्थ की कल्पना करनी होगी। ३—प्राप्तबाध—प्रकरण या लिङ्ग अर्थात् सामर्थ्यवश प्राप्त गर्दभरशना का बाध करना होगा। अश्वरशना के समान गर्दभरशना भी प्रकरण या लिङ्ग के अनुसार ग्रह- णीय होता है, किन्तु, परिसंख्या के द्वारा बाधित होकर अश्वरशना के ग्रहण में ही पर्यवसित होता है, इस प्रकार तीन दोषों की प्रसक्ति होती है। पूर्वपक्षी ने परिसंख्या में इन तीन दोषों का उद्भावन किया है। किन्तु, ये दोष सङ्गत नहीं हैं। कारण, प्राप्त विषय का बाध होने पर ही उक्त तीन दोषों की सम्भावना होती। किन्तु, इस स्थल में प्रकरण या लिङ्गवश गर्दभरशना की प्राप्ति से पूर्व ही प्रत्यक्ष श्रुति के आधार पर अश्वरशना ग्रहण बोधित है, अतः, प्राप्तार्थ का बाध नहीं होता है। क्योंकि, प्रकरण या लिङ्ग स्वयं विनियोजक नहीं होता है, प्रकरण के द्वारा वाक्य, वाक्य के द्वारा लिङ्ग या सामर्थ्य एवं सामर्थ्य के द्वारा विधायिका श्रुति अनुमित होती है। "इत्य- श्वाभिधानीम्" इस स्थल में प्रत्यक्ष श्रुति ही अश्वरशना के ग्रहण का विधान करती है। प्रत्यक्ष श्रुति की अपेक्षा लिङ्ग या प्रकरण परवर्ती है, उसके द्वारा प्रत्यक्ष श्रुति के द्वारा किसी पदार्थ के प्राप्त होने के बाद ही अन्य पदार्थ की प्राप्ति होती है। जिस समय प्रत्यक्ष श्रुति के द्वारा किसी पदार्थ का विधान होता है, उस समय लिङ्ग आदि के द्वारा विहित पदार्थ की प्राप्ति की उपस्थिति न होने से उसके बाध का प्रश्न ही नहीं उठता है। अनुपस्थिति का बाध कैसे सम्भव है ? प्राप्त अर्थ का बाध न होने पर निषेध रूप पदार्थ की कल्पना एवं विधि के स्वार्थ त्याग का भी प्रश्न नहीं है। इस दृष्टि से मीमांसकों ने स्वीकार किया है कि प्राप्त परिसंख्या में ही तीन दोषों का प्रसङ्ग होता है, अप्राप्त परिसंख्या दोष शून्य है। अतः, त्रिविध दोषों में एक दोष भी यहाँ सम्भावित नहीं है। फलतः, परिसंख्या के कारण इस स्थल में पुनरुल्लेख नहीं है। 'परिसंख्या' = अन्य निवृत्ति। 'इत्यश्वाभिधानीमादत्ते' इत्यादि स्थल में परिसंख्या अर्थात् अन्य की निवृत्ति के लिए ही ब्राह्मणवाक्य कहा गया है। आशय यह है कि "इमामगृभ्णन् रशनामृतस्य" (वा० सं० २२।२) 'इत्यश्वा- भिधानीमादत्ते' इस मन्त्र के सामर्थ्य से ही प्राप्त रशनादान का ब्राह्मणवाक्य विनियोजक है, इसका पुनः कथन व्यर्थ है। 'गर्दभामिधानीमादत्ते' यह परिसंख्या है। परिसंख्या में तीन दोष हैं—आदत्ते यह रशनादान रूप स्वार्थ का परित्याग करेगा, गर्दभरशना के आदान का निषेध रूप अन्य अर्थ की शब्द से कल्पना करनी पड़ेगी, रशनात्व सामान्य के आदान से गर्दभरशना और अश्वरशना इन दोनों के आदान की प्राप्ति होने से गर्दभ-
३५ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २१७ रशना के आदान का बाध होगा। इस प्रसङ्ग में सिद्धान्ती का कथन है कि गर्दभरशना की अप्राप्ति ही है। प्रकरण पाठ की अन्यथा अनुपपत्ति होने से इस मन्त्र से 'आदान= ग्रहण करना चाहिए' इस वाक्य की परिकल्पना होती है। इस वाक्य से मन्त्र और आदान का सम्बन्ध सिद्ध होने के बाद किस विषय का आदान किया जाय इस अन्वेषण में लिङ्गवश रशनामात्र का आदान प्राप्त होने से गर्दभरशना की प्राप्ति होनी चाहिए। किन्तु, यह विलम्ब से प्राप्त है। अतः 'अश्वाभिधानीम्' इस प्रत्यक्ष वाक्य से मन्त्र और आदान का सम्बन्ध रहने पर लिङ्गाधीन रशना अर्थ का प्राप्त आदान की 'अश्वाभिधानीम्' इस श्रुति से विशेष व्यवस्था होती है। रशना विशेष का आदान अश्वरशना के आदान से मन्त्र निराकाङ्क्ष हो गया है, अतः, गर्दभरशना के आदान की अप्राप्ति होने से प्राप्त का बाध नहीं होता है। इसलिए निषेधार्थ की कल्पना और विधि व अर्थ का त्याग यहाँ नहीं है। अप्राप्त गर्दभरशना का निवारण की दृष्टि से परिसंख्या अर्थात् अन्य निवृत्ति कही गई है ॥ ३४ ॥ अर्थवादो वा ॥ १.२.३५ ॥ शा० भा०—उरु प्रथा उरु प्रथस्वेति पुरोडाशं प्रथयतीत्यर्थवादार्था पुनः श्रुतिः, यज्ञपतिमेव तत्प्रथयतीति। ननु नायं मन्त्रस्य वाक्यशेषो, न च प्राप्तस्य स्तुत्या प्रयोजनम्। सत्यम्। नायं मन्त्रस्य विधिः संस्तवः। प्रथनमेव तत्र स्तूयते। मन्त्रः पुन रूपादेव प्राप्त इहानूद्यते प्रथनं स्तोतुम्। इत्थं प्रथनं प्रशस्तं यत्क्रियमाणमेवंरूपेण मन्त्रेण क्रियते। कस्तदा भवति गुणः। 'यज्ञपतिमेव तत्प्रजया पशुभिः प्रथयति'। किमेतदेवास्य फलं भवति। नेति ब्रूमः। स्तुतिः कथं भविष्यतीत्येवमुच्यते कथमसति प्रथने प्रथयतीति शब्दः। मन्त्राभिधानात्। मन्त्रेण पुरोडाशमध्वर्युः प्रथस्वेति ब्रूते। यश्चैवं प्रथस्वेति ब्रूते, स प्रथयति। यथा यः कुर्विति ब्रूते, स कारयति ॥ ३५ ॥ भा० वि - परोक्तं शास्त्रान्तरानर्थक्यं परिहरति—अर्थवादो वेति। सूत्रं व्याकरोति—उरु प्रथस्वेतीति। अर्थवादार्थत्वेन=स्तुत्यर्थत्वेनेति यावत्, स्तुति- मभिनयति—यज्ञेति। ब्राह्मणप्रदेशाम्नातस्यास्य न मन्त्रप्रदेशाम्नातमन्त्रविशेष- लिङ्गप्रकरणानुमितविधिशेषत्वेन स्तुतित्वमित्युक्तमित्याशङ्कते—नन्विति। मन्त्र- स्य=मन्त्रलिङ्गानुमितस्य विधेरित्यर्थः, किं च स्वस्यैव परोचनाशक्त्याविभवेन निवृत्ताकाङ्क्षत्वान्न स्तुत्या सम्बन्ध इत्याह—न चेति। प्राप्तस्य=पर्यवसितस्येत्यर्थः, यद्यपि नायं मन्त्रस्य प्रथने विनियोगं विधत्ते, लिङ्गानुमितिविधिनेव तत्सिद्धेः, नापि विनियोगं स्तौति, प्रकरणान्तरस्थत्वादस्य, तथापि प्रथयतीति प्रथनोत्पत्ति विधायोरु प्रथस्वेति प्रथनं स्तूयते नानर्थक्यमिति परिहरति—उच्यते इत्यादिना।
२१८ मीमांसादर्शनम् [ सू० ननु यज्ञपतिमेव तत्प्रजया प्रथयसीति अनेनैव स्तुतौ सिद्धायां किं प्रथन- मन्त्रानुवादेनेति तत्राह - मन्त्रः पुनरिति । स्तोतुमिति । प्रथनसाधनमन्त्रपर्या- लोचनयापि स्तोतुमित्यर्थः, स्तुतिमभिनयति--इत्थमिति । नन्वनेन मन्त्रेण क्रियमाणमपि प्रथनं कथं प्रशस्तं भवतीति पृच्छति--कस्तद्वेति । उत्तरं-- यज्ञपतिमिति । एतन्मन्त्रशेषे हि उरु ते यज्ञपतिः प्रथतां इत्येवंरूपाण्यक्षराणि पठ्यन्ते, तत्र च पुरोडाशप्रथनस्य यजमानप्रथनसाधनत्वावगमात् स्पष्टा प्रथन- स्तुतिरित्यर्थः, यज्ञपतिप्रथनमस्य फलत्वेन स्तुतित्वेन वा सङ्कीर्त्यत इति जिज्ञा- सया पृच्छति--किमिति । अस्य पुरोडाशप्रथनस्य यज्ञपतिप्रथनमेव फलं भवति किं फलमस्यैवैतत् किं न स्यादिति भावः । लिङ्गविनियोज्यतया प्रमेयमन्त्रस्य फलप्रमापकत्वाभावात् प्रथनफलानुवादेन स्तुत्युपपत्तेश्च, स्तुत्यर्थतैव युक्तेति परिहरति - नेति । ब्रूम इति । ननु प्रयोज्यव्यापाराभिधानं विना प्रयोजकव्या- पाराभिधानासम्भवात् प्रथत इति च प्रयोज्यव्यापारानभिधानेन च प्रथयतीत्यपि निर्देशाासम्भवात् अप्रतीयमानप्रयोजकव्यापारविधानासम्भवाच्च न विधिशेषतया स्तुतित्वेनार्थवत्तेति चोदयति--कथमसतीति । प्रथने=प्रथनशब्द इत्यर्थः, ऊरु प्रथस्वेति प्रतीकोपात्तमन्त्राभिहितप्रथनरूपप्रयोज्यव्यापारमाश्रित्य प्रथयतीति प्रयोजकव्यापारविधिसम्भवाद्युक्ता स्तुत्यर्थतेति परिहरति--मन्त्राभिधानादिति । एतद्विवृणोति--मन्त्रेणेति । तथा किमित्यत आह--यश्चेति । प्रथस्वेति स्व- व्यापारे प्रथने पुरोडाशं प्रेरयन् ह्यध्वर्युः प्रथयति, ततश्च प्रथनरूपप्रयोज्यव्या- पाराभिधायित्वं मन्त्रस्य स्फुटमित्यर्थः, प्रयोज्यं स्वव्यापारे प्रेरयन् प्रयोजको भवतीत्यत्र दृष्टान्तमाह-यथेति ॥ ३५ ॥ त० वा०- यद्यपि प्रदेशान्तरस्थत्वान्मन्त्रविधानं न स्तूयते, तथाऽपि प्रथन- विधानात्तत्परोचनया च सकलं वाक्यमर्थवत् । तस्य ह्येतदेवोत्पत्तिवाक्यम् । ननु च पुरोडाशान्यथानुपपत्तिप्राप्तत्वात्प्रथनं न विधातव्यम् । नैतन्नियोगातः प्राप्नोति । द्रुततरं हि पिष्टमप्रथितमपि प्रथेत् । विधाने तु सति तादृशं कर्तव्यम्, येन प्रथयितव्यं भवति । एवं चाध्वर्युकर्तृकताऽपि सिद्ध्यति । पठ्यमानं ह्याध्वर्य- वसमाख्यां लब्ध्वा कर्तृविशेषं नियच्छति । अर्थप्राप्तं त्वसमाख्यातत्वान्न निया- मकं स्यात् । एवमर्थं च यद्यप्येकान्ततोऽर्थात्प्राप्नुयात्, तथाऽपि वाक्येनैव प्राप- यितव्यम् । तस्मादुपपन्नो प्रथनस्तुतिः । एवमपि यज्ञपतिमेव तत्प्रथयतीत्यनेन स्तुतौ सिद्धायां मन्त्रग्रहणमनर्थकम् । न । मन्त्रस्यैव स्तुत्यर्थमुपादानात्, प्रथनं कर्तव्यम्, तस्य हि क्रियमाणस्यायं मन्त्रः साधनं भवति । तत्र चोरु ते यज्ञपतिः भवतीति गुणो लभ्यते । किमेतदेवास्य फलमिति । नेत्याह । स्तुत्यर्थमेव तद् द्रव्यसंस्कारकर्मस्विति न्यायात् । यद्यप्यत्र
पादायापि व्यापारं शब्देन प्रयोजकव्यापारः सिद्ध्यतीत्येतदप्युत्तरं सम्भवति,
३५ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २१९ करणमन्त्राभिहितत्वात्फलं कल्प्येत, तथाऽपि ब्राह्मणे तावत्तत्संकीर्तनमेकान्तेन स्तावकम्। मन्त्रोऽपि तु लिङ्गविनियोज्यो न फलकल्पनायै प्रभवति। करण- विभक्तिविनियुक्तानां हि सकलोपयोगान्यथानुपत्त्या फलसाधनता युक्ता, लिङ्गा- नुमिता पुनः श्रुतिराकाङ्क्षावशेन क्रियाप्रकाशनमात्रविनियोगायैव ज्ञायते। तेनैवंजातीयको मन्त्रोऽपि प्रधानफलसंकीर्तनात्मिका स्तुतिरेवाभ्युपगन्तव्या। कथमसति प्रथन इति। कस्यायं प्रश्नः किं विध्युद्देशवर्तिनः पुरोडाशप्रथन- स्य, अथ वाऽर्थवादगतस्य यज्ञपतिप्रथनस्येति। द्विधाऽपि चायुक्तं पुरोडाशप्रथनं तावद् विधीयमानत्वादेव न प्रष्टव्यम्। न च मन्त्राभिधानात्तस्यास्तित्वम्, किं तर्हि ? स्वरूपसद्भावादित्युत्तरमप्यसम्बद्धम्। अथ पुनरितरार्थवादन्यायेन कथ- मरुदतीतिवत्प्रश्नः। तथाऽप्युत्तरमसम्बद्धम्। मन्त्रेणाध्वर्युः पुरोडाशमिति पुरोडाशेन सम्बध्यते, न यजमानेन। तस्मादग्रन्थ इति केचित्। उभयथाऽपि त्विदमदुष्टम्। अस्तु तावत्पुरोडाशप्रथने। तत्र हि याज्ञिकानां केषाञ्चिदय मन्त्रः कृत्वा प्रथनम्, अभिमर्शने प्रयुज्यते। सोऽयं स्वसिद्धान्तेन पृच्छति कथमसति वृत्ते प्रथने प्रयुज्यमानेनानेन प्रथयतीति। तत्राभ्युपेत्यवादेनोत्तरं मन्त्राभिधानादिति। यद्यपि प्रथनं प्रथमकृतत्वा- न्नास्ति, मन्त्रेण नु सत्तयोच्यत इत्युपपन्नः शब्दार्थः। अथ वा सर्वप्रयोजकव्यापा- राणां प्रयोज्यव्यापारपूर्वकत्वमर्थरूपेण स्थितमिति शब्दैरपि तथैव प्रवर्तितव्यम्। इह च स्तुतिविषयसिद्धयर्थं प्रथयतीत्येतद्विधीयत इत्युक्तम्। तत्राऽऽह नायं विधिः सम्भवति, विषयानुपपत्तेः। प्रयोजकव्यापारो हि प्रतीयमानस्तद्गोचरः स्यात्। स चानुपान्तप्रयोज्यव्यापारत्वान्न प्रतीयते, तेन यथा यजेतेत्यनुक्ते याजयतीति नोच्यते, तथैह प्रथेतेत्यनुक्ते प्रथयतीति न वाच्यम्। न चेह पुरोडाशः प्रथेत, तेन वा प्रथितव्यमित्युपादानमस्ति। तस्मिन्न- सति प्रथयतीत्यनुपपन्नम्। तदुपपादयति मन्त्राभिधानादिति प्रतीकगृहीतमन्त्रोपात्तप्रयोज्यव्यापारं हि ब्राह्मणं प्रथयतीति विधत्ते। यश्च प्रथस्वेति ब्रूत इत्यनेन पुरोडाशकर्तृकं क्रिया- मध्वर्युः प्रेष्यतीत्येतद्दर्शयति। यद्यपि च सम्भाव्यमानक्रियाणां प्रयोज्यानामनु- पादायापि व्यापारं शब्देन प्रयोजकव्यापारः सिद्ध्यतीत्येतदप्युत्तरं सम्भवति, तथाऽपि तूत्तरविभवाद्दुपादानपूर्वकतैवोत्का। अथ वाऽस्तु यजमानप्रथने कथमसतीति सर्वस्तुतीनां किञ्चिच्छब्दगतमर्थगतं वाऽऽलम्बनमुक्तम्। तदत्र किंनिबन्धना स्तुतिरिति। तदभिधीयते। मन्त्रोक्तमर्थ- माश्रित्य स्तुतिः प्रवर्तिष्यते। मन्त्रेणाध्वर्युः पुरोडाशं ब्रूत इति न पुरोडाशप्रथनो- पादानाभिप्रायम्, किं तर्हि पुरोडाशं ब्रवीति, उरु ते यज्ञपतिः प्रथतामिति।