मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
२ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः २७७ विवेकहेतुप्रत्यक्षादिविवेचनेति श्लोकद्वयेनाह-विषय इति । वेदस्वरूपावधारणद्वारेणार्थस्य धर्मज्ञानोपयोगित्वमाह - वेदोऽपीति । प्रत्यक्षमात्रेण वेदावधारणसिद्धेरादिशब्दादानर्थ- क्यमाशङ्क्य विप्रकीर्णत्विकेत्युक्तम् । प्रतीकग्रहणेन मन्त्रशेषस्यानुमेयत्वात्स्वयमश्रुतस्यापि कस्यचिद्वेदभागस्याप्तवाक्यावसेयत्वाद्विश्वजिदादौ च ज्योतिष्टोमवदित्यादिवाक्यशेषस्यो- पमानाधीनावगतित्वात्स्वर्गकाम इत्यस्य वार्थपत्तिगम्यत्वाद्विचित्रप्रमाणगम्य इत्यर्थः । न्यायविस्तरस्य धर्मज्ञानोपयोगित्वं मनुनाप्युक्तमित्याह - तथा चेति । त्रयमित्युपलक्षणार्थ- मुक्तम् । ननु तर्कस्य धर्मज्ञानोपयोगित्वे बौद्धादितर्काणामपि धर्मज्ञानोपयोगित्वं प्रसज्येतेत्या- शङ्क्य, तेषामपि पूर्वपक्षप्रतिपादनार्थत्वेनोपयोगादनिष्टापत्त्यभावं दर्शयितुमाह-प्रायेण चेति । कुमार्गप्रवृत्तावधर्मवासितान्तःकरणत्वं हेतुः । निश्चितचन्द्रैक्यस्य दोषवशाद् द्विचन्द्र- भ्रमोत्पादेऽपि द्वित्वानध्यवसायाद्धर्मतत्त्वज्ञानस्याधर्मवासनादोषात् कुमार्गप्रवृत्तावपि तत्राध्य- वसायानुपपत्तिमाशङ्क्य - तत्त्वज्ञानप्रतिबद्धत्वमुक्तम् । स्वोत्प्रेक्षितत्वनिरासार्थं लोकादि- मूलोपन्यासः । सर्वासां विरुद्धानां प्रतिपत्तीनां यानि मुखानि विषयास्तेषां प्रदर्शनं क्रियत इति शेषः । तेषां च मुखानामुपपत्तयः कथ्यन्त इति वक्ष्यमाणमाख्यातं विपरिणमय्याऽनु- षज्यते । तासां चोपपत्तीनां बलाबलसम्प्रधारणपूर्वकं तत्त्वनिश्चयस्य द्वारनियमे चोपपत्ति- रिति कथ्यत इत्यर्थः । ननु स्वोत्प्रेक्षितेनापि तर्केण तत्त्वनिश्चयोपपत्तेः, किं लोकादिप्रसूतै- स्तर्कशास्त्रैरित्याशङ्क्याह-अन्यथा पुनरिति । भ्रान्त्युत्पादनशक्तिहेतुत्वेनोक्तं बहुजनवचन- सम्मतत्वमुपपादयितुम् - अज्ञानबोधनादित्युकम् । न्यायविस्तरानभिज्ञत्वेनोपपत्तिबलाबल- ज्ञानरहितानां पुंसां बोधोत्पादनादित्यर्थः । ननु न्यायविस्तरस्योपदेशशास्त्रत्वाभावात्कथं तेन बलाबलावधारणमित्याशङ्क्याह- सर्वासु त्विति । स्वातन्त्र्येणेति । प्रत्यक्षादिप्रमाणानुसारेणेत्यर्थः । ननु धर्मप्रमाणनिरूपणार्थस्य तर्कस्योक्तेन प्रकारेणास्तु धर्मज्ञानोपयोगित्वं यस्तु सर्वं जगन्नित्यमेवेति सांख्यानां नित्यत्वैकान्तप्रतिपादनम्, बौद्धानां च सर्वं जगदनित्यमेव सर्वात्मना पृथग्भूतं चेत्यनित्यत्वपृथक्त्वैकान्तप्रतिपादनम् । अद्वैतवादिनां च सर्वेषामेकत्वै- कान्तप्रतिपादनम्, सामान्यविशेषयोश्च व्यतिरेकैकान्तप्रतिपादनमौलुक्यानाम्, आदिशब्दोपात्तं वा व्यतिरेकैकान्तप्रतिपादनं सांख्यानाम्, तस्य कथं धर्मज्ञानोपयोगितेत्याशङ्क्य निष्कृष्टैकैक- पदार्थांशनिरूपणार्थत्वेनोपयोगमाह - यदपि चेति । ननु समुग्धेनापि वस्तुना वाहन- दोहनादिव्यवहारसिद्धेः किमंशनिष्कर्षणेत्याशङ्क्य वाक्यार्थप्रतिपत्तेः पदार्थप्रतिपत्तिहेतु- कत्वात्पदार्थानां च वस्त्वंशविषयत्वात्तन्निष्कर्षोऽवश्यंकार्य इत्याह-अवश्यं चेति । एतदेव व्यतिरेकमुखेनोपपादयति - अन्यथेति । मन्त्रार्थवादी यः स्तुतिनिन्दालम्बननिरूपणार्थ- मध्येकान्तप्रतिपादनमवश्यंकार्यमित्याह - मन्त्रेति । ननु यैषा सुखदुःखमोहात्मकसत्वरजस्तमोरूपं प्रधानं जगतकारणमिति प्रक्रिया स्थिति- सिद्धान्तापरपर्याया सांख्यैः, पुरुष इति ब्रह्मविद्भिः, ईश्वर इति पातञ्जलैयैः परमाणव
२७८ मीमांसादर्शनम् [ सू०. इत्योलूक्यैरादिशब्दात्तत्तत्कार्यं जगदिति यथाक्रमं सांख्यादिभिः प्रतीताः प्रतिगताः प्रतिज्ञा- ताङ्गीकृताः किमासां सर्वासां मूलमित्याशङ्क्याह—याश्चैता इति । सृष्टिप्रलयादिरूपेणेति प्रधानादिभ्यो जगतः सृष्टिप्रलयादिरूपेणेति प्रधानादिभ्यो जगतः सृष्टिरुत्पत्तिः, तेष्वेव च प्रलय इत्युपादानकारणत्वमुक्तम् । आदिशब्देनेश्वरस्य निमित्तकारणत्वमुक्तम्, तृतीयेत्थम्भूत- लक्षणार्था सूक्ष्माद्वटबीजात् स्थूलवृक्षोत्पत्तिदर्शनात्प्रधानादेः सूक्ष्मात् स्थूलं जगदुत्पद्यत इत्यनुमानमित्यर्थः । प्रयोजने सत्यपि वेदप्रामाण्ये स्वर्गायागादीनां साध्यसाधकत्वावबोधे कथं सूक्ष्मादपूर्वात्स्वर्गादेः स्थूलस्योत्पत्तिः सम्भवतीति हेतुकानां विचिकित्सानिवृत्तिरित्याह- प्रयोजनतेति । सृष्टिप्रलयाङ्गीकरणस्य प्रयोजनमाह—सर्गेति । यस्मात्सत्यसति वा पुरुषकारे तद्वलेन दैवबलेन कार्यं प्रवर्त्तते, दैवोपरमे चोपरमति, सृष्ट्यादौ तु पुरुषकाराभावेऽपि दैवमात्रा- ज्जगदुत्पत्तेः प्रलयकाले च सत्यपि पुरुषकारे दैवोपरमे जगदुपरमते । तस्माद्दैवस्याधिकः पुरुषकारात्प्रभावः सामर्थ्यमिति मत्वा श्रौतस्मार्त्तकर्मानुष्ठाने यतितव्यमिति सृष्टिप्रलय- विषयस्यापि तर्कस्य धर्मोपयोगितेति भावः । विज्ञानमात्रादिप्रक्रियाणां मूलप्रयोजनं चाह—विज्ञानमात्रेति । निवर्त्तयितुं वादाना- मित्यन्वयः । एवं बाह्यतर्काणामपि कथंचिद्धर्मज्ञानोपयोगसम्भवान्नातिष्टापत्तिरित्युक्त्वा, प्रकृतं सकलं वेदातिरिक्तविद्यास्थानप्रामाण्यमुपसंहरति—इत्युपपन्नमिति । अतश्चोपसंहार- भाष्ये दृष्टादृष्टप्रयोजनभेदेन मूलविवेककथनं सर्वविषयमेव योजनीयमित्याह—सर्वत्र चेति । वृश्चिकविद्याग्रहणेनायुर्वेदोपलक्षणादादिशब्देन च नीतिशास्त्राद्युपसंग्रहात्त्रैवर्णिकपरिगृहीता- नामर्थकामोपयोगिनामपि विद्यास्थानानां प्रामाण्यं सूचितम् । त्रैवर्णिकापरिगृहीतानां बौद्धादि- ग्रन्थानां प्रामाण्याभ्यनुज्ञानाशङ्कया निषेत्स्यमानत्वात् ॥ २ ॥ ॥ इति प्रथमसर्वानवद्यकारिण्यां स्मृत्यधिकरणम् ॥ भा० प्र०—'अपि वा' = पूर्वपक्ष की निवृत्ति का द्योतक है । 'कर्तृसामान्यात्' = कर्ता अर्थात् वेदोक्त कर्मों के अनुष्ठान को करने वाले एवं स्मृति-निबन्ध की रचना करने वाले की समानता अर्थात् अभिन्नता है, अतः 'प्रमाणम्' = प्रमाण, 'अनुमानम्' = अनुमान अर्थात् वेदार्थ की अनुमापक शिष्टपरिगृहीत स्मृति, 'स्यात्' = होगी । क्योंकि वेद के द्वारा विहित कर्मों का अनुष्ठान करने वाला और स्मृति कर्ता अभिन्न है, अतः शिष्टों के द्वारा परिगृहीत मनु आदि स्मृतियाँ अवश्य ही प्रमाण है । (यह सिद्धान्त पक्ष है ।) आशय यह है कि इस सूत्र में कथित 'अपि वा' इस शब्द के द्वारा पूर्व सूत्र से जो पूर्वपक्ष की उपस्थापना की गई है, उसकी निवृत्ति की जा रही है । पूर्वपक्षियों = शिष्ट व्यक्तियों के द्वारा परिगृहीत स्मृतियों के अप्रामाण्य होने का सन्देह उत्थापित किया था—वह समीचीन नहीं है । शिष्टजनों से परिगृहीत स्मृतियां धर्म में प्रमाण है । शिष्ट =
२ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः १७२ वेद का प्रामाण्य स्वीकार करने वाला व्यक्ति शिष्ट कहा जाता है। वे ही शिष्टगण जब वेदोक्त कर्मों के समान एक ही तरह की श्रद्धा और विश्वास के साथ स्मृति विहित कर्मों का भी अनुष्ठान करते हैं, तब स्मृति का प्रामाण्य नहीं है—यह नहीं कहा जा सकता है। परम आस्तिक वेदप्रामाण्यवादी सर्वज्ञकल्प मनु आदि त्रैवर्णिक महर्षियों ने जब उसका संग्रह किया है एवं मनु आदि के समान सर्वज्ञ सदृश महर्षियों ने भी जब वेद- वाक्यों के समान ही सभी स्मृति वचनों का भी प्रामाण्य माना है, तब इन सभी शिष्टों से परिगृहीत स्मृतियों का भी प्रामाण्य अवश्य ही मानना होगा। इन स्मृति वचनों का मूलभूत वेद वचनों के न रहने पर जब स्मृति नहीं हो सकती है, तब अर्थापत्ति के द्वारा वेदवचन का अनुमान हो सकता है। इसलिए सूत्र में स्मृति को अनुमान शब्द से कहा गया है। अनुमान जैसे प्रत्यक्ष मूलक है वैसे ही स्मृति भी प्रत्यक्ष सदृश वेदवचन मूलक है। शास्त्र मत में उपलभ्यमान वेदवचन प्रत्यक्षपद से वाच्य है, क्योंकि, जो प्रत्यक्ष के समान ही निःसन्दिग्ध रूप में अलौकिक अर्थ को विज्ञापित करता है वह स्मृतिवचन अनुमान स्थानीय है, कारण जैसे अनुमान प्रत्यक्षका आश्रयण कर पदार्थ विषयक ज्ञान को उत्पन्न कराता है, वैसे ही स्मृति भी वेदवचन का आश्रयण कर अलौकिक धर्म और अधर्म के विषय में अनुभव उत्पन्न कराती है। यदि यह कहा जाय कि ऐसा मानने पर उसके मूलाधार भूत वेदवचन भी स्मृत होगा, अन्यथा वह वन्ध्य नारी के दौहित्र के घर के स्मरण के समान अप्रमाण होगा। इसके उत्तर में कहा गया है कि वेद की अनेक शाखाएँ थीं, जो सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं, उन शाखाओं में अवस्थित होने से स्मृति का मूलाधार वचन उपलब्ध नहीं है। वार्तिक- कार कुमारिल ने कहा कि उत्सन्नवाद को स्वीकार करना उचित नहीं है। अनुसन्धान करने पर स्मृतिवचनों का मूलाधार श्रुतिवचन दुर्लभ नहीं है। उस प्रसङ्ग में यह भी कहा जा सकता है कि श्रुतिवाक्य हैं तो स्मृतिवाक्य निरर्थक हैं। किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, कारण, वेद की एक-एक शाखा विभिन्न सम्प्रदायों में आबद्ध है। उन सम्प्रदायों की गुरुशिष्य-परम्परा ने उन शाखाओं को अक्षुण्ण रूप में धारण किया है, अतः, अपनी शाखा के समान दूसरी शाखा में आस्था-स्थापन करने पर साङ्कर्य्य होने से सम्प्रदाय का ही विनाश हो जायगा। इसलिए शाखाओं में अनेक शाखाओं के ग्रहण का आदर एक सम्प्रदाय को नहीं है। अपि तु ऐसा होने पर भी अन्य शाखाओं में स्थित सर्व- साधारण के लिए अवश्य अनुष्ठेय कर्मों की उपेक्षा नहीं की गई है इसलिए मनु आदि सर्वज्ञ महर्षियों ने सभी कर्मों का सभी शाखाओं में कथन न होने से एवं सभी के लिए वे अवश्य अनुष्ठान के योग्य भी हैं, अतः समो कर्मों को सभी शाखाओं से सङ्कलन कर स्मृति के रूप में निबद्ध कर दिया है। स्मृति का पाठ श्रुति के अध्ययन के समान विशेष नियमबद्ध न होने से उसके साथ श्रुति का साङ्कर्य्य सम्भव नहीं है। एक शाखा विशेष के सम्प्रदायबद्ध व्यक्ति साधारणतः अन्य शाखाओं का अध्ययन नहीं करते हैं अतः स्मृति का मूलभूत वहाँ के वेदवचनों को वे नहीं जान पाते हैं। इसलिए, यह
२८० मीमांसादर्शनम् [ सू० बन्ध्या के दौहित्र के मकान के स्मरण के समान इसको नहीं कहा जा सकता है। मनु आदि महर्षि यदि वेदवचन को ही स्मृति निबद्ध न करें तो उनके समान अन्य महर्षि उनका अनुष्ठान कैसे करेंगे ? अतः यह मानना होगा कि स्मृतिवाक्य श्रुतिवाक्य के समान ही प्रमाण हैं। पूर्वोक्त स्मृति के मूलाधार श्रुतिवचनों का भाष्यकार ने स्वयं उद्धार किया है। यथा "यां जानाः प्रतिनन्दति", इस वेदमन्त्र का एवं "एषा वै सम्वत्सरस्य पत्नी यदेकाष्टका" ये अर्थवाद वाक्य स्मृति के मूल हैं। "स्थलया उदकं परिगृह्णन्ति" यह अर्थवाद तडाग स्मृति का मूलवचन है। "धन्वन्निव प्रपा असि" यह मन्त्र प्रपा स्मृति का मूल है। भाष्य के आपातलभ्य अर्थ से यह अवगत होता है कि गुरु का अनुगमन, तडाग, प्रपा विषयक स्मृतियां दृष्टार्थ हैं, अर्थात् उनका दूसरे का उपकार करना आदि लौकिक प्रयोजन ही है। किन्तु वार्तिककार ने कहा है कि यह भाष्यकार का प्रौढ़िवाद मात्र है, वस्तुतः वे भी अदृष्ट जनक हैं अर्थात् धर्म के साधन हैं, किन्तु लौकिक प्रयोजनका निर्वाह उनका अविनाभूत फल है। स्मृति वेद विषयक हैं, वे धर्म में प्रमाण हैं इस प्रसङ्ग में सूत्र में सूचित अनुमान का स्वरूप निम्नलिखित है। स्मृतियां, वेद मूलक हैं ( प्रतिज्ञा ) क्योंकि, वेद प्रामाण्यवादी उनका कर्ता है ( हेतु ) जो वेदप्रामाण्यवादी कर्ता से निबद्ध नहीं हैं, वे वेदमूलक नहीं हैं, यथा बौद्धादि सम्प्रदाय के शास्त्र ( उदाहरण ) इसी प्रकार स्मृतियां धर्म में प्रमाण है ( प्रतिज्ञा ) क्योंकि, वे वेदमूलक हैं ( हेतु ) जो वेदमूलक नहीं हैं वे धर्म में प्रमाण नहीं है, यथा बौद्ध आदि सम्प्रदाय के शास्त्र ( उदाहरण ) ( स्मृति प्रामाण्याधिकरण ) ॥ २ ॥ [ २ ] विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम् ॥ ३ ॥ सि० शा० भा०—अथ यत्र श्रुतिविरोधस्तत्र कथम्। यथौदुम्बर्याः सर्ववेष्टनम्। 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' इति श्रुत्या विरुद्धम्। अष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि वेदब्रह्म- चर्यचरणं 'जातपुत्रः कृष्णकेशोऽग्नीनादधीत' इत्यनेन विरुद्धम्। क्रीतराजको भोज्यान्न इति 'तस्मादग्नीषोमीये संस्थिते यजमानस्य गृहेऽशितव्यम्' इत्यनेन विरुद्धम्। तत्प्रमाणम्, कर्तृसामान्यादित्येवं प्राप्ते— ब्रूमः।
३ ] प्रथमा॑ध्याये तृतीयपादः २८१ अशक्यत्वादव्यामोह इत्यवगम्यते । कथमशक्यता ? स्पर्शविधानान्न सर्वा शक्या वेष्टितुं उद्गायता स्प्रष्टुं च । तामुद्गायता स्प्रष्टव्यामवगच्छन्तः केनेमं संप्रत्ययं बाधेमहि ? सर्ववेष्टनस्मरणेनेति ब्रूमः । ननु निर्मूलत्वाद्व्यामोहस्तत्स्मरणमिति वैदिकं वचनं मूलं भविष्यतीति । भवेद्वैदिकं वचनं मूलम्, यदि स्पर्शनं व्यामोहः । अव्यामोहे त्वशक्यत्वादनुपपन्नम् । यथाऽनुभवनमनुपपन्नमिति न कल्प्यते, तथा वैदिकमपि वचनम् । कथं तर्हि सर्ववेष्टनस्मरणम् ? व्यामोहः । कथं व्यामोहकल्पना ? श्रौतविज्ञानविरोधात् । अथ किमर्थं नेमौ विधी विकल्प्येते, व्रीहियववद्बृहद्रथन्तरवद्वा ? न नासति व्यामोहविज्ञाने विकल्पो भवति, यदि सर्ववेष्टनविज्ञानं प्रमाणम्, स्पर्शनं व्यामोहः । यदि स्पर्शनं प्रमाणम्, स्मृतिर्व्यामोहः । विकल्पं तु वदन्स्पर्शनस्य पक्षे तावत्प्रा- माण्यमनुमन्यते । तस्य च मूलं श्रुतिः । सा चेत्प्रमाणमनुमता, न पाक्षिकी । पाक्षिकं च सर्ववेष्टनस्मरणं पक्षे तावन्न शक्नोति श्रुतिं परिकल्पयितुम् । स्पर्शविज्ञानेन बाधितत्वात् । ततश्चाव्यामोहे च तस्मिन्नशक्या श्रुतिः कल्प- यितुम् । न चासावव्यामोहः पक्षे, पक्षे व्यामोहो भविष्यतीति । यदेव हि तस्यै- कस्मिन्पक्षे मूलम्, तदेवेतरस्मिन्नपि । एकस्मिंश्चेत्पक्षे न व्यामोहः, श्रुतिप्रामाण्यतुल्यत्वादितरत्राप्यव्यामोहः । न चासावेकस्मिन्पक्षे श्रुतिः, निबद्धाक्षरा हि सा, न प्रमादपाठ इति शक्या गदितुम् । तेन नैतत्पक्षे विज्ञानं व्यामोहात्पक्षान्तरं संक्रान्तमित्यवगम्यते । तत्र दुःश्रुतस्वप्नादिविज्ञानं मूलत्वं तु सर्ववेष्टनस्येति विरोधात्कल्प्यते । न हि तस्य सति विरोधे प्रामाण्यमभ्युपगन्तव्यमिति किंचिदस्ति प्रमाणम् । तस्माद्यथैवै- कस्मिन्पक्षे न शक्या श्रुतिः कल्पयितुमेवमपरस्मिन्पक्षे तुल्यकारणत्वात् । अपि चेतरेतराश्रयेऽन्यतः परिच्छेदात् । केयमितरेतराश्रयता ? प्रमाणायां स्मृतौ स्पर्शनं व्यामोहः, स्पर्शनं प्रमाणे, स्मृतिर्व्यामोहः । तदेतदितरेतराश्रयं भवति । तत्र स्पर्शनस्य क्लृप्तं मूलम्, कल्प्यं स्मृतेः । सोऽसावन्यतः परिच्छेदः । कल्प्यमूलत्वात्स्मृतिप्रामाण्यमनवकॢप्तम् । तदप्रामाण्यात्स्पर्शनं न व्यामोहः । तदव्यामोहात्स्मार्तश्रुतिकल्पनाऽनुपपन्ना, प्रमाणाभावात् । नन्वेवं सति व्रीहिसाधनत्वविज्ञानस्याप्यव्यामोहाद् यवश्रुतिर्नोपपद्येत । सत्यं नोपपद्यते, यद्यप्रत्यक्षा स्यात् । प्रत्यक्षा त्वेषा । न हि प्रत्यक्षमनुपपन्नं नामास्ति, द्वयोस्तु श्रुत्योर्भावात् । द्वे ह्येते वाक्ये । तत्रैकेन केवलयवसाधनता गम्यते, एकेन केवलव्रीहिसाधनता । न च वाक्येनावगतोऽर्थोऽपह्नूयते । तस्माद्व्रीहियवयोरुप- पन्नो विकल्पो बृहद्रथंतरयोश्च । तस्मादुक्तं श्रुतिविरुद्धा स्मृतिरप्रमाणमिति । अतश्च सर्ववेष्टनादि नाऽऽदरणीयम् ॥ ३ ॥ श्रुतिप्राबल्याधिकरणम् । इति भाष्यमत्तेन विरोधाधिकरणम्
१८३ मीमांसादर्शनम् [ सू० भा० वि०—अत्रत्यं भाष्यविवरणम् २५९ पृष्ठे द्रष्टव्यम् । त० वा०—स्मृतिप्रामाण्यमुत्सृष्टं प्रसक्तं सर्वगोचरम् । सति वेदविरुद्धत्वे तदिदानीमपोद्यते ॥ २२ विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमीयते । विरोधे वेदवाक्येन तेन चार्थेऽनधिष्ठिते ॥ २३ यावती स्मृतिः प्रत्यक्षवेदवाक्यविरुद्धा, तां सर्वामुदाहृत्य संप्रधार्यते किं पुनस्तादृश्यपि धर्मप्रमाणत्वेनावधार्यते, किं वा पर्युदस्यत इति । कुतः संशय इति चेत् ? तदुच्यते । विरोधपरिहाराद्वा सति वा तुल्यमूलतः । अबाधो वा भवेदस्या बाधो वा तद्विपर्ययात् ॥ २४ एकविषये विरुद्धाथोपसंहारिणी विज्ञाने विरुध्येते, बलवदबलवत्त्वनिर्णयाच्च बाध्यबाधकभावं प्रतिपद्येते । तद्यदि शङ्कितविरोधयोरपि श्रुतिस्मृत्योः केनचि- त्प्रकारेण भिन्नविषयत्वेन व्यवस्था सिध्येत् । विधेयप्रतिषेध्ययोर्वा विरोधाभावात् एकस्मिन्नपि विषये समुच्चयसंभवादेकप्रयोगगतत्वासंभवाद्वोभयोः प्रामाण्याङ्गी- करणेन प्रयोगान्तरे चोभयानुग्रहः स्यादित्येवं विकल्पाश्रयणेऽप्यत्यन्तविरोधा- भावात्प्रत्यक्षानुमितश्रुतिजनितज्ञानयोश्च वैदिकत्वाविशेषे तुल्यबलत्वकल्पनादु- भयप्रामाण्यमुपपत्स्यते । ततो यथोपन्यस्तविषयेऽपि स्मृतिप्रामाण्यमपेक्षितव्यम् । अथ तु प्रयत्नेनान्विष्यमाणेऽपि न विषयान्तरकृता व्यवस्था, नापि प्रमेयाविरो- धात्समुच्चयो नापि विकल्पेनोभयानुग्रहः, किं तर्ह्युभयपीडनादत्यन्तविरोध एव । प्रत्यक्षानुमेयश्रुत्योश्च लौकिकप्रत्यक्षानुमानवन्महान्बलविशेषस्तदा गत्यन्तराभावा- दुभयानुग्रहासंभवे श्रुतिबलीयस्त्वेन स्मृतिप्रामाण्यमुपेक्षणीयं भविष्यतीति । किं तावत्प्राप्नुयादत्र विरोधेऽपि प्रमाणता । अप्रामाण्यप्रसङ्गे हि मर्यादातिक्रमो भवेत् ॥ २५ अनाशङ्कितविप्रलम्भभ्रान्त्यादिमूला ह्यव्याहतवेदमूलत्वावधारणाः स्मृतयो निर्व्याजप्रामाण्याः शक्यन्ते धर्मव्यवहाराङ्गत्वेन स्थापयितुम् । यदा तु वेदविरुद्ध- त्व-हेतुदर्शन-परस्परविगानादिना केनचिदपि च्छलेनाऽऽसामप्रामाण्यं कल्प्यते, तदा बहुशाखाखिलप्रकरणादिभेदभिन्नेषु वेदेषु श्रुतिलिङ्गाद्यात्मकोपदेश-नामादि- द्वारातिदेशात्मकविचित्रप्रमाणभागेषु को जानाति का स्मृतिः कीदृशेन वेदभागेन विरुध्यमाना कदाऽनुमास्यत इति । अतश्चैवं जाताशङ्कैनैव क्वचिदपि विश्व- स्येत । अविश्वासाच्चात्यन्तमेव प्रामाण्यं प्रतिहन्येत । तथा हि— कदाचिच्छ्रुतिमूलत्वमुक्त्वा भ्रान्त्यादिमूलता । स्मृतिभिः प्रतिपन्ना चेत्कस्तामिन्द्रोऽपि वारयेत् ॥ २६
३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः २८३ एकमूलव्यवस्थायां मूलान्तरनिराक्रिया । अप्रामाण्यनिवृत्त्यर्थं शक्या न तदुपेक्षणे ॥ २७ किं च—परस्परविरुद्धत्वं श्रुतीनां न भवेद्यदि । स्मृतेःश्रुतिविरुद्धायास्ततो मूलान्तरं भवेत् ॥ २८ यदा तूदितानुदिताग्निहोत्रहोमविविधवदतिरात्रगतषोडशिग्रहणवच्च सहस्रशः श्रुतयोऽप्यसंभववद्युगपदनुष्ठानार्थतया परस्परविरुद्धा दृश्यन्ते तदा यदि नाम कासांचित्स्मृतीनां स्ववेदशाखागतवचनविपरीतार्थशाखान्तरवचनमूलानामधीत- वाक्यविरोधो दृश्यतेऽस्तस्तावत्तैव सर्वशाखाप्रत्ययकर्मव्यवहारिणां स्वयमश्रुतान- धीतत्वमात्रेण दृढस्मरणोपस्थापितपुरुषान्तरस्थश्रुतिनिराकरणं न शोभते चैकं प्रतिशिष्यत इति हि सर्वश्रुतीनां सर्वपुरुषान्प्रति प्रामाण्यादध्ययनवच्च स्मृतेरपि श्रुतिधारणसामर्थ्यात् । तस्माद्यथा विरोधेऽपि पठ्यमानप्रमाणता । पठितस्मर्यमाणानां तथैवेत्यवधार्यताम् ॥ २९ किं च— अविरोधे श्रुतिमूलं न मूलान्तरसंभवः । विरोधे त्वन्यमूलत्वमिति स्यादर्थवैशसम् ॥ ३० मूलान्तरं निरस्तं च सामान्येनैव यत्पुरा । तदनुप्राप्यते पश्चाद्विरोधे नेत्यतिक्रिया ॥ ३१ तेनाऽऽसां श्रुतिमूलत्वं सर्वदैव व्यवस्थितम् । मूलान्तरप्रवेशे वा किं तत्प्रामाण्यतृष्णया ॥ ३२ किं च भ्रान्त्यादिमूलानां संभवासंभवाश्रयः । स्मृतीः प्रति विरुद्धोऽयं बाधपक्षो न युज्यते ॥ ३३ तेनाऽऽसां यदि वा नैव क्वचिदस्ति प्रमाणता । सर्वत्राव्याहता वा स्यान्न त्वर्धजरतीयता ॥ ३४ विरुद्धत्वं च जानन्ति स्मर्तारस्ताः स्मरन्ति यत् । वेदमूलबलं त्यक्त्वा किमन्यत्तत्र कारणम् ॥ ३५ गृह्यमाणनिमित्तत्वाद्यद्युच्येताप्रमाणता । उत्प्रेक्षणीयहेतुत्वात्सा सर्वत्र प्रसज्यते ॥ ३६ रागद्वेषमदोन्मादप्रमादालस्यलुब्धताः । क्व वा नोत्प्रेक्षितुं शक्याः स्मृत्यप्रामाण्यहेतवः ॥ ३७ अदुष्टेन हि चित्तेन सुलभा साधुमूलता । दुष्टमूलत्वलाभस्तु भवत्याशयदोषतः ॥ ३८
१८४ मीमांसादर्शनम् [ सू० का वा धर्मक्रिया यस्यां दृष्टो हेतुर्न युज्यते । कथंचिद्वा विरुद्धत्वं प्रत्यक्षश्रुतिभिः सह ॥ ३९ लोकायतिकमूर्खाणां नैवान्यत्कर्म विद्यते । यावत्किंचिददृष्टार्थं तद्दृष्टार्थं हि कुर्वते ॥ ४० वैदिकान्यपि कर्माणि दृष्टार्थान्येव ते विदुः । अल्पेनापि निमित्तेन विरोधं योजयन्ति च ॥ ४१ तेभ्यश्चेत्प्रसरो नाम दत्तो मीमांसकैः क्वचित् । न च कंचन मुञ्चेयुर्धर्ममार्गं हि ते तदा ॥ ४२ प्रसरं न लभन्ते हि यावत्क्वचन मर्कटाः । नाभिद्रवन्ति ते तावत्पिशाचा वा स्वगोचरे ॥ ४३ क्वचिद् दत्तेऽवकाशे हि स्वोत्प्रेक्षालब्धधामभिः । जीवितुं लभते कस्तैस्तन्मार्गपतितः स्वयम् ॥ ४४ तस्माल्लोकायतस्थानां धर्मनाशनशालिनाम् । एवं मीमांसकैः कार्यं न मनोरथपूरणम् ॥ ४५ यच्चाऽऽदौ श्रद्धया सिद्धं पुनर्न्यायेन साधितम् । आज्ञासिद्धप्रमाणत्वं पुराणादिचतुष्टयम् ॥ ४६ तत्तथैवानुमन्तव्यं कर्तव्यं नान्तरा श्लथम् । सर्वं श्लथयतः सीदेद् दुर्नद्धशकटादिवत् ॥ ४७ पक्षो योऽङ्गीकृतो येन तमत्रस्यन्स निर्वहेत् । हारयेदन्तरा त्रस्यन्भीतोपद्रवकारिभः ॥ ४८ वेदश्च यदि दृष्टार्थं श्रूयमाणविरोधि वा । न विदध्यात्ततस्तादृक्स्मृतिस्तन्मूलतां त्यजेत् ॥ ४९ यदा तु हन्तिपिष्यादिकर्म दृष्टं सहस्रशः । दृष्टार्थं विहितं वेदे तदा किं हेतुदर्शनैः ॥ ५० ऋत्विग्भ्यो दक्षिणादानं तानूनप्त्रादिकर्म च । यदृर्त्विग्यजमानानां दृष्टार्थं सर्वमिष्यते ॥ ५१ तद्यद्यवैदिकं तादृक्स्यात्ततोऽन्यदवैदिकम् । यदा चैवंविधान्येव वेदे कर्माणि सन्ति नः ॥ ५२ तदा किं नाम दृष्टार्थं बुद्ध्या सिध्येदवैदिकम् । तेनाऽऽदावेव या क्लृप्ता स्मार्तानां वेदमूलता ॥ ५३ निर्वोढव्येह सैकान्तात्किमिदं खिद्यतेऽधुना । तस्माद्वेदविरुद्धानां दृष्टार्थानां च हेतुभिः ॥ ५४ स्मृतीनां न प्रमाणत्वं विहन्तव्यं मनागपि । अवशिष्टं प्रमाणत्वं सर्वासां प्राप्तमीदृशम् ॥ ५५
• ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः -२८५ विरोधेऽप्यधुना युक्तमैवं प्राप्तेऽभिधीयते । विरोधे त्वनपेक्षं स्यात्प्रामाण्यं स्मृतिबन्धनम् ॥ ५६ अविरोधे हि वेदेन तन्मूलमनुमीयते । या तु वेदविरुद्धेह स्मृतिः काचन दृश्यते ॥ ५७ सा तु स्याद् भ्रान्तिमूलैव न स्पष्टश्रुतिमूलिका । स्वातन्त्र्येण प्रमाणत्वं स्मृतेस्तावन्न सम्मतम् ॥ ५८ वेदमूलानुमानं च प्रत्यक्षेण विरुध्यते । वेदवाक्यानुमानं हि तावदेव प्रवर्तते ॥ ५९ तदर्थविषये यावत्प्रत्यक्षं नोपलभ्यते । प्रत्यक्षे श्रूयमाणे तु न विद्येतानुमानिकम् ॥ ६० न हि हस्तिनि दृष्टेऽपि तत्पदेनानुमेष्यते । स्मृतीनां श्रुतिलिङ्गत्वमस्ति हस्तिपदादिवत् ॥ ६१ तत्प्रत्यक्षविरुद्धत्वे तद्वदेव निवार्यते । तावदेव स्फुरन्त्यर्थाः पुरस्तादानुमानिकाः ॥ ६२ यावत्प्रत्यक्षशास्त्रेण मूलमेषां न कृत्यते । कृत्तमूलाः स्फुरन्तोऽपि स्मृतयो न चिरायुषः ॥ ६३ निराधारत्वदोषेण शाखा इव वनस्पतेः । न हि साक्षात्प्रमाणत्वं स्मृतीनामुपपद्यते ॥ ६४ नान्यमूलं यतस्तत्तस्यात्तत्तु मूलं न विद्यते । प्रत्यक्षप्रतिबद्धा हि श्रुतिर्नास्त्यानुमानिकी ॥ ६५ नैराकाङ्क्ष्यात्प्रमातॄणामनुमानं न लभ्यते । प्रमेयं यत्परिच्छेद्यं भवेत्केनचिदात्मना ॥ ६६ तस्य स्यात्तत्परिच्छेदात्सावकाशप्रमाणता । ताद्रूप्येण परिच्छिन्ने तद्विपर्ययतोऽपि वा ॥ ६७ भूयस्तस्मिन्प्रमेये हि न प्रमाणं प्रवर्तते । भिन्नकक्षागते ये च प्रमाणे तत्र धावतः ॥ ६८ तयोः शीघ्रेण निर्णीते मन्थरं न प्रवर्तते । तद्धि दूरमपि प्राप्तमेकमप्यगतं पदम् ॥ ६९ इतरेण गतेनाऽऽदावेकान्तेनैव जीयते । यत्र शीघ्रतरं नास्ति तस्यार्थस्यापहारकम् ॥ ७० चिरेणापि व्रजेत्तत्र दुर्बलं न निवार्यते । न हि येन प्रमाणत्वं लब्धपूर्वं कदाचन ॥ ७१
१८६ मीमांसादर्शनम् [ सू० तेन तत्सर्वदा लभ्यमित्याज्ञापयतीश्वरः । सर्वमुत्पद्यमानं हि यद्यन्येन विरोधिना ॥ ७२ न रुध्यते ततस्तस्य सिद्धिः कालेन लभ्यते । यस्य तूत्पद्यमानस्य मूलमेव निकृत्यते ॥ ७३ मुखं वा रुध्यते तस्य नाऽऽत्मलाभः कदाचन । न च यद्वलवद्बुद्धमात्मानं नैव विन्दति ॥ ७४ अविरोधेऽपि तेनाऽऽत्मा न लब्धव्यः कथंचन । न चापि बाधकाभावाल्लब्ध आत्मेति सर्वदा ॥ ७५ लब्धव्यः स विरोधेऽपि पूर्वसामान्यदर्शनात् । उत्सर्गाश्चापवादश्च सर्वत्रैवोपलभ्यते ॥ ७६ तत्र नोत्सर्गमात्रेण सर्वमेवावरुध्यते । अपवादेन वा यस्मादुत्सर्गो बाधितः क्वचित् ॥ ७७ तस्मात्सर्वत्र बाध्योऽसावित्येतदपि नेष्यते । विषयाविषयौ ज्ञात्वा तेनोत्सर्गापवादयोः ॥ ७८ बाधाबाधौ विवेक्तव्यौ न तु सामान्यदर्शनात् । यो हि सामान्यदृष्टेन व्यवहारं निनीषति ॥ ७९ तृष्णाच्छेदो भवेत्तस्य मृगतृष्णाजलैरपि । बाधितां मृगतृष्णां वा दृष्ट्वा ह्रदगतोऽप्यसौ ॥ ८० विप्रलम्भभयादेव न स्नानादि समाचरेत् । तावदेव हि तोयादिज्ञानस्येष्टा प्रमाणता ॥ ८१ न तोयं मृगतृष्णेयमिति यावन्न बुध्यते । अनुमानं प्रमाणं च तावदर्थेषु जायते ॥ ८२ रुध्यते विषयो यावन्नास्य प्रत्यक्षजन्मना । एवं स्मृतिप्रमाणत्वे तावच्छ्रुत्यनुमानजम् ॥ ८३ यावत्प्रत्यक्षया श्रुत्या विषयो नावरुध्यते । अतः क्वचित्प्रमाणत्वं क्वचिदप्यप्रमाणताम् ॥ ८४ व्यवस्थापयता न्यायेनं भवेदर्थवैशसम् । प्रमाणत्वाप्रमाणत्वे प्रत्यक्षमृगतृष्णयोः ॥ ८५ यथा तथैव ते स्मृत्योरविरुद्धविरुद्धयोः । तस्मादेवं न वक्तव्यं सर्वासां वा प्रमाणता ॥ ८६ अथ वा सा न कस्याश्चिद्यदि क्वचिदनाश्रिता । तेन वेदविरुद्धानां स्मृतीनामप्रमाणता ॥ ८७ रुद्धश्रुत्यनुमानत्वादन्धमूला हि ता यतः ।
३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः १८७ तुल्यबलयोर्विकल्पशंका-निरासौ विकल्पः किं पुनस्तासां नेष्यते श्रुतिभिः सह ॥ ८८ उच्यते—विकल्पस्याष्टदोषत्वान्न तावत्स्वभ्युपेयता । पाक्षिके चाप्रमाणत्वे स्मृतयः सुनिराकराः ॥ ८९ तुल्यबलविकल्पो हि तावदष्टदोषत्वादगतिकगतिन्यायेन क्वचिदेवाऽऽश्रीयते । अतुल्यबलविकल्पस्यान्याय्यत्वम् किमुत कक्षान्तरितप्रामाण्यविषयमशिष्टविकल्पः । तथा हि—प्रमाणपदवीं यावन्नाऽऽरोहत्येव हि स्मृतिः । बाध्यते तावदत्यन्तं श्रुत्याऽन्यनिरपेक्षया ॥ ९० स्मृतेर्धर्मप्रमाणत्वं न तावत्स्वत इष्यते । तुल्यकक्षतया येन विकल्पपदवीं व्रजेत् ॥ ९१ पराधीनप्रमाणत्वान्न प्रमाणपदे स्थिता । श्रुत्या बाधितमात्राऽसौ पुनर्नोऽज्जीवितुं क्षमा ॥ ९२ विकल्पस्याष्टदोषत्ववर्णनम् तुल्यकक्षविकल्पोऽपि नाप्रामाण्येऽस्त्यकल्पिते । प्रमाणस्याप्रमाणत्वकल्पना च त्रिदोषभाक् ॥ ९३ प्रमाणत्वं प्रतीतं यदुज्ज्वलत्तदपह्नुतम् । एकस्तावदयं दोषः स्यात्प्रतीतिविपर्ययात् ॥ ९४ तथा तदप्रमाणत्वं यदभावप्रमाणकम् । भावे सत्यथ भावेन विनैव परिकल्प्यते ॥ ९५ सोऽपि स्यादपरो दोषः प्रमाणार्थविपर्ययात् । अङ्गीकृत्यापि तौ दोषौ पूर्वं केनापि हेतुना ॥ ९६ प्रयोगान्तरकाले तु पुनर्दोषद्वयं भवेत् । यदभावप्रमाणत्वं पूर्वमेतस्य कल्पितम् ॥ ९७ संप्रत्यपह्नुवानस्य दोष एको हि जायते । प्रत्यक्षं दृढरूपं च यत्पुरस्तान्निराकृतम् ॥ ९८ एष जायेत दोषोऽन्यस्तदुज्जीवयतः पुनः । वाक्यान्तरे दोषचतुष्टयस्योपपादनम् एवमेकत्र चत्वारो दोषा वाक्ये प्रदर्शिताः ॥ ९९ एत एव प्रसज्येरन्द्वितीयेऽपि प्रकल्पिते । एवमेषोऽष्टदोषोऽपि यद्व्रीहियववाक्ययोः ॥ १००
२८८ मीमांसादर्शनम् [ सू० विकल्प आश्रितस्तत्र गतिरन्या न विद्यते । व्रीहिशास्त्रप्रवृत्तौ हि यवशास्त्रेण कृष्यते ॥ १०१ श्रोता तत्र प्रवृत्तोऽपि व्रीहिशास्त्रेण कृष्यते । द्वाभ्यामश्वमुखीवच्च श्रुतिभ्यामभितः समम् ॥ १०२ श्रोतुराकृष्यमाणस्य बलाबलमपश्यतः । एकस्मिन्नुपसंहर्तुं बुद्धिं युक्त्या न पश्यतः ॥ १०३ उभयोरप्रमाणत्वं प्रतिघातात्प्रसज्यते । तत्र प्रामाण्ययोग्यस्य यदप्रामाण्यकल्पनम् ॥ १०४ तदनन्यगतित्वेन तथाऽप्यभ्युपगम्यते । सति गत्यन्तरे त्वेतन्नैव कल्पनमर्हति ॥ १०५ एकस्य वा प्रमाणत्वं परिहर्तुं न शक्यते । तदप्रामाण्यमात्रे तु न द्वयोरप्रमाणता ॥ १०६ सिद्धो लोकप्रवादोऽयमेकानेकविनाशिनाम् । सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्यर्धं त्यजति पण्डितः ॥ १०७ स चायमुभयोर्नाश उभयार्थापरिग्रहात् । मिश्रैर्वा यजमानस्य मिश्राणां विध्यदर्शनात् ॥ १०८ नियमार्थे ह्युभे शास्त्रे यवव्रीह्योर्विधातृणी । प्राप्ते चान्यनिवृत्त्यंशः फलमर्थात्प्रतीयते ॥ १०९ व्रीहयो निरपेक्षा हि ज्ञायन्ते यागसाधनम् । यवाश्चैवमतस्तेषां मिश्रत्वं नावकल्पते ॥ ११० नैव व्रीहिभिरिष्टं स्याद्यवैर्न च यथाश्रुतैः । मिश्रैरिज्येत चेत्तत्र भवेदुभयबाधनम् ॥ १११ एवमप्रतिपत्त्यैव तुल्यैषा मिश्रतामतिः । तेनोभयाप्रमाणत्वाद्युक्तैकैकाप्रमाणता ॥ ११२ सेयमत्यन्तमन्न्याय्या द्वयोरप्यनवस्थितिः । अव्यवस्था न युक्ता हि व्यवस्था यत्र लभ्यते ॥ ११३ सर्वत्रैव ह्येकरूपत्वावधारणेन निरूपितरूपं व्यवहर्तुं शक्यम् । तेन यस्य प्रमाणत्वं प्रमाणं सर्वदाऽस्तु तत् । यस्यापि त्वप्रमाणत्वमप्रमाणं तदुच्यताम् ॥ ११४ तदेव तु कदाचित्प्रमाणम्, कदाचिदप्रमाणमिति न कथंचिदपि विश्रम्भः स्यात् तदेतद्व्रीहियवश्रुत्योरत्यन्तापरिहार्यत्वादवश्यमापतितम् ।
३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः २८९ विकल्पपदमनारूढायाः स्मृतेः एकः बाधप्रकारः न हि तत्रैकरूपत्वे चिह्नं किंचिद् व्यवस्थितम् । येनैकत्र प्रमाणत्वं स्यादन्यत्राप्रमाणता ॥ ११५ श्रुतिस्मृत्योः पुनः स्पष्टं व्यवस्थाकारणद्वयम् । येन श्रुतेः प्रमाणत्वं स्यात्स्मृतेश्चाप्रमाणता ॥ ११६ स्वरूपेण तयोस्तावत्प्रमाणत्वाप्रमाणते । ततोऽन्यापेक्षया स्यातामप्रामाण्यप्रमाणते ॥ ११७ यो यस्य स्वरूपाश्रयो धर्मः प्राप्तः, स बलवत्ता कारणान्तरेण विपर्ययं प्रति- पद्यते । न च श्रुतिजनितप्रत्ययस्य स्मृतिजनितो बाधकत्वं प्रतिपद्यते । स्मार्तस्य बाधकः श्रौतो बलवत्त्वात्प्रतीयते । प्रत्यक्षे चानुमाने प्रागेतद्व्यवधारितम् ॥ ११८ श्रुतिलिङ्गे यथा चेष्टे व्यवस्थितबलाबले । संनिकृष्टविकृष्टार्थे तथैवेह श्रुतिस्मृती ॥ ११९ स्मृत्या प्रतीयते यावच्छ्रुत्या तावत्प्रमीयते । विरुद्धधर्मतामेको न च धर्मः प्रतीच्छति ॥ १२० न च शीघ्रगृहीतेऽर्थेऽस्ति चिरादागच्छतो गतिः । अश्वैरपहृतं को हि गर्दभैः प्राप्तुमर्हति ॥ १२१ स्मृत्या चार्थं परामृश्य यावत्तद्विषयां श्रुतिम् । अनुमातुं प्रवर्तेत तावत्सोऽर्थोऽन्यतो गतः ॥ १२२ किं कर्तव्यमितीदं च कर्ता यावदपेक्षते । प्रमाणं क्रमते तावत्प्रमिते तन्न जायते ॥ १२३ युगपत्प्रमिमीयातां यदि चार्थं श्रुतिस्मृती । अगृहीतविशेषत्वात्स्यातां तुल्यबले ततः ॥ १२४ यद्वा यावच्छ्रुतेरर्थः साक्षादेव प्रतीयते । तस्मिन्नेव क्षणे मूलं कल्पयेत्स्वं स्मृतिः श्रुतिम् ॥ १२५ ततोऽर्थविप्रकर्षेऽपि प्रमाणत्वेन तुल्यता । भवेदेव श्रुतिस्मृत्योरर्थः श्रुतिपरिग्रहात् ॥ १२६ यतः स्मृत्या गृहीतेऽपि चिरेण श्रुतिकल्पना । जायते क्लृप्तया तस्मात्सा बाध्येताप्रतिष्ठिता ॥ १२७ स्मृतिमूलानपेक्षा हि स्मृतित्वादेव हीयते । तदपेक्षा पुनः श्रुत्या बाध्यते मूलवर्जिता ॥ १२८ एष तावद्विकल्पपदमनारूढाया एव स्मृतेरेको बाधप्रकारः । १९
२९० मीमांसादर्शनम् [ सू० विकल्पपदमारूढायाःस्मृतेः बाधप्रकारो द्वितीयः द्वितीयेन प्रकारेण विकल्पपदवीं गता । आपन्ना पाक्षिकं बाधमत्यन्तं बाध्यते स्मृतिः ॥ १२९ तद्दर्शयति—‘विकल्पं तु वदन्पक्षे तावच्छ्रुतिप्रामाण्यमभ्युपैतीति’। तदा च स्मृत्यप्रामाण्यमवश्यंभावि, तस्याश्चाप्रामाण्यकल्पनायां न श्रुतेरिव तदध्यारोपः । किं तु तस्याः प्रमाणत्वं श्रुतिमूलत्वकारितम् । यतस्तस्मादतन्मूला तदानीं साऽवधार्यते ॥ १३० श्रुतिमूलत्वविच्छेदोत्तरकालं च प्राङ्निराकृतमूलान्तरोपप्लवादविगानस्मृत- पुरुषप्रणीतत्वनिर्णयाच्च नित्यत्वद्वारनिर्मूलत्वासंभवादवश्यंभावि विप्रलम्भाभिप्रा- यादि किंचिदेकं मूलमापद्यते । श्रुतिं मुक्त्वा च यन्मूलं स्मृतेरन्यत्प्रकल्प्यते । तेनेवास्याः प्रमाणत्वमत्यन्तं प्रतिहन्यते ॥ १३१ व्रीहिश्रुतिपरिग्रहकाले हि यवश्रुतेरभूतमेवाप्रामाण्यमध्यारोपितम् । तत्प्रयो- गान्तरवेलायां तुल्यसांप्रदायिकाम्नायमानत्वेन संनिकृष्टविप्रकृष्टार्थत्वादिविशेषाभा- वेन च पुनः सहजेन प्रामाण्येनाभिभूयते । न तु स्मृतेः प्रमाणत्वं पुनरुज्जीवितुं क्षमम् । विच्छिन्नश्रुतिमूलत्वाद् ग्रस्तं भ्रान्त्यादिहेतुभिः ॥ १३२ न ह्येकस्या एव स्मृतेः प्रत्यक्षश्रुत्यर्थापरिग्रहकालेऽनुमितश्रुतिमूलत्वं तत्प- रिग्रहाश्रयणे तु भ्रान्त्यादिमूलत्वमिति विरुद्धावधारणाऽवकल्पते । आह । सत्यं यदि प्रथममेव विकल्पकारी श्रुत्यर्थं परिगृह्य द्वितीयादिप्रयोगे स्मृत्यर्थपरिग्रहणा- योपतिष्ठेत । ततस्त्वदुक्तमार्गेण प्रतिहन्येत सर्वदा । न त्वेतस्य प्रसङ्गोऽस्ति स्मृतेः पूर्वंपरिग्रहे ॥ १३३ यो हि श्रुतिं प्रथममत्वान्यां श्रुतिमेवैकां पश्यति तस्याप्रतिहतश्रुत्यनुमान वृत्ते । न पश्चाच्छ्रूयमाणाऽपि श्रुतिः स्यात्प्रतिबन्धिका । गर्दभेनापनीतं हि हरेन्नाश्वश्चिराद् गतः ॥ १३४ न चैष नियमोऽस्ति जिज्ञासुभिः स्मृतिविरुद्धा श्रुतिरेव प्रथमं श्रोतव्येति । बहुजिज्ञासमानानां कदाचित्किंचिदापतेत् । पूर्वपश्चाद्दिभागेन न तद्धेतुबलाबलम् ॥ १३५
३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः २९१ आद्ये प्रपाठके येन व्रीहिशास्त्रं प्रतीयते । द्वितीये यवशास्त्रं च न तत्तत्प्रति दुर्बलम् ॥ १३६ स्वशाखाविहितैश्चापि शाखान्तरगतान्विधीन् । कल्पकारा निबध्नन्ति सर्व एव विकल्पितान् ॥ १३७ सर्वशाखोपसंहारो जैमिनेश्चापि संमतः । न तु पूर्वावबुद्धोऽर्थो बाधतेवोत्तरं विधिम् ॥ १३८ तस्मात्पौर्वापर्यश्रवणमनाश्रित्य 'न चैकं प्रति शिष्यत' इत्यनेन न्यायेन सर्वपुरुषान्प्रति नित्यावस्थितसमस्तपठ्यमानस्मर्यमाणवेदशास्त्रायत्तज्ञानेर्जिज्ञासुभि- रात्मीयशक्तिमात्रकारितपूर्वापरग्रहणविभागरेकभाष्यगतपूर्वोत्तरवर्णपदबद्धलाबल - मनपेक्ष्य मातापितृप्रणीतोपदेशवन्निर्विचिकित्समेव प्रामाण्यमभ्युपगन्तव्यम् । अन्यथा हि— पूर्वप्राप्तौ प्रमाणत्वं परत्वेनाप्रमाणताम् । प्रसज्यमानिकामेवं कोऽध्यवस्येत्सचेतनः ॥ १३९ इत्थं च भ्रान्तिमूलत्वप्रसङ्गे कल्पिते स्मृतेः । अविरोधेऽपि हि श्रुत्या प्रामाण्यं दुर्लभं भवेत् ॥ १४० सर्वैव श्रुतिमूलास्तः सर्वा वा भ्रान्तिमूलिका । स्मृतेरेवं निरूप्येत न तु स्यान्मूलसङ्करः ॥ १४१ उच्यते । यद्यपि पूर्वोपलब्धया स्मृत्या श्रुतिमनुपलभमानस्य प्रतिबन्धर- हितश्रुत्यनुमानं क्रियेत तथाऽपि कालान्तरे श्रुतिं श्रुत्वा तत्प्रतिपक्षस्मृतेर्बाधाध्यव सानादवश्यंभाविश्रुतिमूलत्वविच्छेदवशेन मूलान्तरसञ्चरणम् । ततश्च पूर्वविज्ञानं मिथ्यैतदिति चिन्तयन् । आदावेवाप्रमाणत्वं स्मृतेरित्यध्यवस्यति ॥ १४२ यो हि कूटकार्षापणेन कंचित्कालमज्ञो लोकमध्ये व्यवहरति न तेन विवे- कज्ञानजनितव्युत्पत्तिनाऽपि तथैव व्यवहर्तव्यम् । न चास्य तदानींतनज्ञानमात्रात् बाधबुद्धिर्भवति । समानविषयत्वाद्धि पूर्वेषामपि बाधनम् । न हि तेषाममिथ्यात्वे मिथ्येदानींतनं भवेत् ॥ १४३ ननु च प्रागवस्थायां श्रुतिर्यैवानुमीयते । सैवेदानीं विरुद्धेति गम्यते न पुनः स्मृतिः ॥ १४४ नैतदेवम् । प्रतिप्रयोगं प्रमाणपर्यालोचनात् । यदि ह्येकप्रयोगमात्रालोचनेनैव प्रयोगान्तराण्यप्यनुतिष्ठेयुः ततो येन व्रीहिशास्त्रमंप्रमाणीकृत्य यवाः परिगृह्येरन्, स यावज्जीवं तैरेव यजेतेति, नेव प्रतिपुरुषमुभाभ्यां विकल्प्यमानाभ्यां व्यवहारः
२१२ मीमांसादर्शनम् [ सू० सिध्येत् । तेन यावत्प्रयोगभाविप्रमाणालोचनवशात्पूर्वानुमितां श्रुतिं क्वदचिप्यशृ- ण्वन्पुनरपि स्मृतिमेवोपलभ्य कर्तृसामान्यलिङ्गेनैव श्रुतिमनुमिमानः प्रत्यक्षया श्रुत्याऽऽक्षिप्तचित्ततया तत्प्रामाण्येनान्यथानुपपद्यमानेन स्मृत्यप्रामाण्यं कल्पयन्पूर्वा- वधारितमूलव्यत्ययमेव प्रतिपद्यते न पूर्वक्लृप्तमूलस्याप्रामाण्याध्यारोपम् । अपठ्य- मानतयैवास्य सुलभाज्ञानत्वात् । यच्चैतदनवस्थानं त्वया मां प्रति चोद्यते । भवतोऽपि तदस्त्येव तेनाचोद्यत्वमेकतः ॥ १४५ यदा ह्यादौ श्रुतिं श्रुत्वा स्मृतेर्न्नान्याऽनुमीयते । तदऽन्यमूलतापत्तेरेकान्तेनैव बाध्यते ॥ १४६ कालान्तरेऽपि यो बाधः स्फुटत्वेनावधार्यते । यत्तेनाप्यप्रमाणत्वं कृतं तन्न निवर्त्यते ॥ १४७ पूर्वस्मृतिग्राहिणां च स्वयं बाधमचेतयमानानामपि पुरुषान्तरस्य श्रुतिश्रवण- प्राथम्यबलेन बाधसंतानोऽनुवर्तत एव । पुरुषान्तरबाधोऽपि नैवालपं भ्रान्तिकारणम् । न हि द्विचन्द्रदिङ्मोहौ न बाध्यते नरान्तरैः ॥ १४८ ननु यवश्रुतेरपि तर्हि प्रमाणत्वेन परिगृह्यमाणायाः पुरुषान्तरबाधस्तदानी- मस्तीति मिथ्यात्वप्रसङ्गः । उच्यते— पठ्यमानत्वादुन्मज्जननिमज्जने । सर्वान्प्रति तयोस्तुल्ये विशेषोऽन्यो न गृह्यते ॥ १४९ स्मृतिस्तु यावतां पुंसां प्रथमं गोचरीभवेत् । तावतां सर्वदाऽभावाज्ञाप्रामाण्येन मुच्यते ॥ १५० अप्रमाण्यपदं चैकमस्त्येवं प्रथमं स्मृतेः । तावता लब्धमिथ्यात्वान्न श्रुतिं बाधितुं क्षमा ॥ १५१ अध्यारोप्येत मिथ्यात्वमुज्ज्वलायाः श्रुतेः पुनः । लब्धमेव स्मृतौ तच्चेत्किमर्थं कल्प्यते श्रुतेः ॥ १५२ विरुद्धयोर्हि श्रुतिस्मृत्योर्विकल्पप्रसङ्गेनावश्यं कल्पनीयेऽन्यतरत्राप्रमाणत्वे यावच्छ्रुतौ पटाच्छादनन्यायेन कल्पयितुमारभ्यते, तावत्स्मृतौ स्वरूपाश्रयं क्लृप्तमे- वोपलभ्य, संशयच्छेदे जाते न कदाचिदप्यभूताप्रामाण्याध्यारोपकल्पनोपपत्तिः । ननु श्रुत्यविरुद्धायाः श्रुतिमूलत्वनिश्चयः । अनुमानादपि प्राप्स्यन् केनचित्प्रतिबध्यते ॥ १५३
३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः २९३ तस्मात्कारणवैषम्यान्नोभयत्रैकरूपता । सिध्येन्मूलव्यवस्था हि प्रतिपक्षानुसारिणी ॥ १५४ ततश्चार्धवैशसप्रसङ्गन्निवृत्तिः । यथा—प्रमाणत्वाप्रमाणत्वे लिङ्गादीनां व्यवस्थिते । पूर्वैः सह विरुद्धत्वाविरुद्धत्वनिबन्धने ॥ १५५ तथेहापि व्यवस्थेष्टा न परस्परसङ्करः । प्रतिबन्धाभ्यनुज्ञाभ्यां श्रुत्या नास्त्येकरूपता ॥ १५६ यद्यप्यौदुम्बरीसर्ववेष्टनं धर्मशास्त्राध्येतृस्मृतिविलक्षणप्रत्यक्षश्रुत्यर्थोपसंहार- परसूत्रकारोपनिबद्धम्, तथाऽप्युपरिष्टाद्वक्ष्यमाणाल्पान्तरत्वाभिप्रायेण पुरुषोपदिष्ट- त्वाविशेषाच्च स्मृतिवदेवोदाहृतम् । क्रीतराजकभोज्यान्नत्ववचनं यद्यप्यथर्ववेदेऽस्ति, तथाऽपि तस्याऽऽहवनीय- संबद्धयज्ञकर्मोपकाराभावात्तदधिकृतत्रयीप्रतिपादिताग्नीषोमीयसंस्थावधिभोजनप्र- तिषेधविरोधात् “प्रकरणविशेषाद्विकृतौ विरोधि स्यात्” इत्यनेन न्यायेनाविकृता- नधिकृतबलाबलविशेषाभिप्रायेण स्मृतिपक्षनिक्षेपाद्भाष्यकारेणोदाह्रियते । कृष्णकेशत्वं च यद्यप्यनवस्थितवयोवस्थाकालविशेषं जातपुत्रत्वपक्षे संदिग्ध- समावेशं च, तथाऽपि 'युवैव धर्ममन्विच्छेदि'त्येवमादिस्मरणप्रकाशितार्थं यौवना- वस्थापरिग्रहादन्ततो वा वयोर्द्धानतिक्रमाश्रयणादष्टाचत्वारिंशद्वर्षब्रह्मचर्यप्रागुप- नयनसंबद्धकालस्य च वयसः सातिरेकद्विपञ्चाशच्चतुष्पञ्चाशन्मात्रसंवत्सरपरिमि- तत्वेनापरिहार्यवयोर्द्धानातिक्रमावश्यंभावित्वाद् व्यक्त एव विरोधो दृश्यते । ननु च पूर्वकृतसर्ववेष्टनोत्तरकालविहितवेष्टिताया एव स्पर्शनं संभवतीत्य- विरोधः । कथमविरोधो ? यदा स्पर्शनं नाम त्वगिन्द्रियद्वारं स्पृश्य संवेदनम् । न च वस्त्रान्तरिताया औदुम्बर्याः स्पर्शो गृह्यते । न च वस्त्रे स्पृश्यमान औदुम्बरी स्पृष्टा भवति । वस्त्रौदुम्बरीजातिव्यक्तिस्पर्शनामत्यन्तभेदात् । अथ संबन्धिसंस्पर्शात्स्पृष्टैवेत्यभिधीयते । भूमिस्पर्शेन तत्सिद्धेर्वृथा स्पर्शविधिर्भवेत् ॥ १५७ ननु भूमावौदुम्बरीबुद्ध्यभावाद्द्वस्त्रान्तरितायां च तद्बुद्ध्यव्यतिरेकाद् दृष्टा- न्तवैषम्यम् । तथा हि—वस्त्रान्तरितचाण्डालस्पर्शेऽप्यापतिते क्वचित् । साक्षात्स्पृष्टवदेवेष्टा सचेलस्नानशुद्धता ॥ १५८ सत्यं तत्रेष्यते स्नानं तद्वस्त्रस्पर्शकारितम् । अशुद्धिकारणं तद्धि चण्डालस्पर्शवन्मतम् ॥ १५९
२९४ मीमांसादर्शनम् [ सू० तथा च तद्वियुक्तेऽपि वस्त्रे तत्स्पर्शदूषिते । स्पृश्यमाने भवेत्येव दोषः संयुक्तवस्त्रवत् ॥ १६० कथं पुनरयं धर्मशास्त्रेष्वनुपनिबद्धोऽपि चण्डालस्पृष्टवस्त्रस्पर्शननिमित्तो दोषोऽ- ध्यवसीयते । कथं वा नेष्यते दोषः काष्ठलोष्टतृणादिषु । तत्स्पृष्टस्पृश्यमानेषु न क्रमन्तेऽत्र युक्तयः ॥ १६१ तदुच्यते--तथा काष्ठतृणादीनां मारुतादेव शुद्धता । स्मर्यंते वाससो नैवं तोयप्रक्षालनाद्विना ॥ १६२ नन्वमेध्येन लिप्तस्य सा शुद्धिरभिधीयते । न लिप्तग्रहणं तत्र पाठेऽस्ति तु चिरंतने ॥ १६३ अमेध्यस्यैवं यस्मात्पठन्ति । चण्डालस्पृष्टवाससश्चास्त्येवामेध्यता । तस्मादस्ति सलिलादिशुद्धिः । ननु च मनुष्यस्यैव चण्डालस्पर्श निमित्तप्रायश्चित्तविधानादशुद्धिरूपममेध्य- त्वं गम्यते न द्रव्यान्तरस्य गवाश्वादेः । ततश्च वस्त्रं किं गवाश्वादिवददुष्टमुत पुरुष- वद् दुष्टमिति सन्देहे गवाश्वादितुल्यमेवावधारयितुं युक्तम् । उच्यते—पुरुषस्य सचेलस्य स्नानं यस्माद्विधीयते । तस्मात्पुरुषवद्वस्त्रं न गवाश्वादिवन्मतम् ॥ १६४ यदाऽपि हि शुद्धेनैव हस्तादिना चण्डालः स्पृश्यते, गवादीनां तु चण्डाला- दिस्पृष्टानां स्नानप्रक्षालनविध्यभावाच्छुद्धिर्विज्ञायत इति, न तन्मध्यपातित्वम् । अतश्च नानेन प्रकारेणौदुम्बरीसंबद्धवस्त्रस्पर्शनात्तत्स्पर्शनज्ञानोपपत्तिः । यदा तु तयैवोद्गाता स्पृष्ट उद्गायेदिति विधिरस्तदाऽवश्यमेवौदुम्बरीत्वं चोद्गातृशरीरं प्राप्तव्यम् । अपाश्रयणाभ्युपगमपक्षोऽपि च स्पृष्ट्वापरित्यागेनैव स्थित इति, न समस्ताच्छादितायामवकल्पते । पराश्रितमपि च वस्त्रमुद्गातुराश्रयत्वं प्रतिपद्यते । तेनैवौदुम्बर्याश्रितेनोद्गायेत् । तस्मादस्ति सर्ववेष्टनस्पर्शनयोर्विरोध इति युक्तं बाध्यबाधकव्यवस्थापनम् । अथ किमर्थं नेमौ विधी विकल्प्येते इति । स्मृतेरविधायकत्वात्स्वयमतुल्य- बलत्वाच्च तदनुमितशाखान्तरपठितविधिपरिग्रहाभिप्रायेणोक्तम् । न नासति व्यामोहविज्ञान इति । पूर्वोक्तेनैव मार्गेण व्यामोहैकान्तकल्पनाम् । विकल्पेऽवश्यमापन्नां स्मृतावेव नियच्छति ॥ १६५ व्यामोहविज्ञानं च ज्ञानान्तर्गतव्यामोहत्वावधारणम्, तद्विज्ञानगतव्यामोह- रूपं वा विवक्ष्यते । तेन षष्ठीसमासः कर्मधारयो वा योज्यः । विकल्पं तु वद-
३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः २९५ ञ्चिति । कदाचित्स्मृतिमूलश्रुतिविच्छेदाद् भ्रान्त्यादिमूलत्वमापादयति । तादृश्या च सकृदपि श्रौतं विज्ञानमनुज्ञातमध्यारोप्यमाणव्यामोहाविषयत्वान्न कदाचित्प्रा- माण्यं त्यजतीत्यपाक्षिकत्वाभिधानम् । एवं केवलाप्रमाणत्वपक्षग्रहः तस्य पुनर्जी- वनासंभवादपाक्षिकं च सर्ववेष्टनस्मरणमित्याह—पाक्षिकं चेति । विकल्प- वादिसंमतपाक्षिकत्ववशादेव श्रुतिप्रामाण्यपक्षे स्मार्तश्रुतिकल्पनायामकृताया मूला- न्तरसंक्रान्तेः सर्वकालाप्रमाणत्वप्रसङ्गः । एकदाऽपि च लब्धप्रामाण्यावकाशा श्रुतिर्दुर्बलप्रतिपक्षतया न कदाचिदपि व्यामोही भविष्यतीति समर्थयमानो ‘यदेव हि तस्यैकस्मिन्पक्षे मूलमि'त्याह । नहि प्रमादपाठत्वं शक्यं कल्पयितुं श्रुतेः । दुःश्रुतस्वप्नविज्ञानमूलां त्वापद्यते स्मृतिः ॥ १६६ ‘तेन नैतत्पक्षे विज्ञानमिति'—प्रमाणविज्ञानमभिप्रेत्योक्तम् । व्यामोहात्प- क्षान्तरमिति । व्यामोहकल्पनातः प्रमाणाभावपक्षान्तरसंक्रमणं प्रतिषेधति । यद्वा स्मार्तज्ञानमेव पूर्वावधारितव्यामोहात्प्रामाण्यपक्षान्तरं न संक्रान्तमिति । दुःश्रुतस्वप्नादिमूलत्वेन श्रुतिविरोधं दर्शयति—‘तुल्यकारणत्वादिति' । बलीयः प्रतिपक्षनिराकृतत्वात्सर्वदैव श्रुत्यनुमानप्रतिबन्धान्न स्मृतेः प्रामाण्यपक्षसंक्रान्तिः । अपि चेतरेतराश्रयेऽन्यतः परिच्छेदादिति । उपरिष्टादितरेतरविरोधविवरणाद्वि- रोधमेवेतरेतराश्रयमाह— परस्परविरुद्धे हि विरुद्धव्यभिचारिवत् । प्रमाणे यत्र दृश्येते तत्रान्येनैव निर्णयः ॥ १६७ प्रमाणशब्दस्य ज्ञानसमानाधिकरणत्वेन भावोत्पन्नल्युडन्तत्वेन वा नपुंसक- लिङ्गत्वाद्भेदाः प्रमाणम् स्मृतयः प्रमाणमितिवत्प्रमाणं स्मृतौ स्पर्शनं व्यामोह इति भवितव्यम् । करणविशेषविवक्षायां वाऽभिधेयलिङ्गवचनानुवृत्तौ ल्युडन्ताट्टिड्ढा- णञिति ङीपि प्राप्ते प्रामाण्यं स्मृताविति प्रयोक्तव्यम् । तमिमममुभयअष्टं भाष्य- कारप्रयोगं समर्थयमानैरेवमनुगमः कर्तव्यः । दुरुक्तं चिन्ताकरणेन वार्तिकलक्षणस्य योजना प्रमाणमयते याति मूलभूतं श्रुतिं यतः । क्विबन्तादयतेस्तस्मात्प्रमाणा स्मृतिरुच्यते ॥ १६८ तत्र यद्यपि नित्यत्वात्क्विब्लोपः प्रथमं भवेत् । यलोपोऽपि भवेदेव वलादिप्रत्ययाश्रयः ॥ १६९ न च वर्णाश्रयत्वेन यलोपो न भविष्यति । व्योर्वलीति यलोपो हि वलादिप्रत्ययाश्रयः ॥ १७०
२९६ मीमांसादर्शनम् [ सू० यद्वा योगविभागेन वेव्यंबस्य च लुप्यते । वकारश्च यकारश्चेत्येवं लोपो भविष्यति ॥ १७१ यलोपे च कृतेऽकारो यः शुद्धः परिशिष्यते । तदन्तावधिकात्पश्चादतष्टाप्क्रियते स्त्रियाम् ॥ १७२ अकः सवर्णदीर्घत्वं परयोरन्तरङ्गतः । सर्वेणापि ततः कृत्वा प्रमाणेत्यनुगम्यते ॥ १७३ तदेतदितराश्रयं भवतीत्युक्तम् । यद्वा श्रुत्यप्रमाणत्वात्स्मृतेः प्रामाण्यमिष्यते । सिद्धाच्च तत्प्रमाणत्वाच्छ्रुत्यप्रामाण्यकल्पना ॥ १७४ तथा श्रुतिप्रमाणत्वात्स्मृत्यप्रामाण्यकल्पनम् । तदप्रामाण्यसिद्ध्या च श्रुतिप्रामाण्यनिश्चयः ॥ १७५ तदिदं विकल्पवादिना उभयत्रेतरेतराश्रयत्वम् । एकान्तवादिनस्त्वन्यतरत्र । तत्रान्यतः परिच्छेदाद्ग्राह्यं हेत्वन्तरं स्फुटम् । भाष्यकारस्त्विहोक्त्वैवं तयोरेकैकमुक्तवान् ॥ १७६ तत्र स्पर्शनस्य क्लृप्तं मूलं कल्प्यं स्मृतेरिति । समाधानम् नैवात्यन्ताप्रकृतहेत्वन्तराभिप्रायेणान्यतः परिच्छेदोऽभिहितः । प्रकृतयोरपि चयत्कृतगितरेतराश्रयत्वं तद्व्यतिरिक्तधर्मदर्शनान्निश्चीयमाने भवत्येवान्यतः परिच्छेदः । स्वतः स्थितात्प्रामाणत्वाच्छ्रुतेः स्यात् क्लृप्तमूलता ॥ १७७ स्मृतेः श्रुत्यनुमापकप्रामाण्यात्कल्प्यमूलता । ततश्च प्रत्यक्षश्रुत्यप्रामाण्यकल्प- नायत्तं स्मृतेः प्रामाण्यम्, तद्वलेन च श्रुत्यप्रामाण्यं कल्पयत इतरेतराश्रयत्वमपरि- हार्यम् । न चाध्यारोप्यमाणाऽपि श्रुतेः स्यादप्रमाणता । न च तस्यामसिद्धायां स्मृतिप्रामाण्यसंभवः ॥ १७८ बलवन्तं पराजित्य यः प्रतिष्ठातुमिच्छति । हस्तिना पादयोधीव संतिष्ठेताचिरादसौ ॥ १७९ एवं तावत्स्मृतिप्रामाण्यं कल्पयन्नेव यद्वादी पराजीयते । यदा तु श्रुतिप्रा- माण्यगतमितरेतराश्रयत्वमालोच्यते, तदा तत्रापि प्रतिपक्षभूतस्मृत्यप्रामाण्यापेक्षया निरपवादप्रामाण्यावधारणसिद्धेः पराधीनत्वात्पूर्वसिद्धस्मृत्यप्रामाण्यलिप्सायाम् । सिद्धमेवाप्रमाणत्वं स्वरूपाश्रयमादितः । क्षणमात्रमपि प्राप्य श्रुतिः प्रामाण्यमश्नुते ॥ १८०